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मॉनसून स्किन केयर (Monsoon Skin Care)

Monsoon Skin Care

मॉनसून स्किन केयर (Monsoon Skin Care): बारिश के मौसम में आपके हुस्न की परवाह है हमें, इसीलिए लाए हैं मॉनसून स्किन केयर, ताकि इस मौसम में भी आप अपना ख़ास ख़्याल रख सकें.

तेरी पलकों पर मैंने उस रोज़ जो सावन रखा था, आज बरसकर मुहब्बत बन गया है… तेरे हसीन लबों पर मेरे होंठों से जो गुलाब खिला था, आज बिखरकर वो तेरा यौवन बन गया है… मखमली बदन से तेरे लिपट गई थीं जो शबनम की बूंदें, वो कहकशां का नूर बन गईं, तेरी मदहोश नज़रें मेरी चाहत का सुरूर बन गईं… भीगते मौसम में तेरी सांसों की गर्मियां, जैसे कर रही हैं अजीब-सी सरग़ोशियां… महकता हुस्न तेरा, बहकता मन मेरा, मचलते अरमान तेरे, सुलगती हसरतें मेरी… ख़ामोशियों की आहट अब बस तेरे-मेरे दरमियान, आज मेरा इश्क़ छोड़ जाएगा तेरे वजूद पर अपने निशान…

जनरल टिप्स

–   बारिश में त्वचा चिपचिपी हो जाती है. बेहतर होगा दिन में 3 बार स्किन को क्लीन करें, ताकि अतिरिक्त तेल व गंदगी साफ़ हो सके और आपके रोमछिद्रों में वो जमा न हो सके.

–    बारिश में अल्कोहल फ्री टोनर यूज़ करें, क्योंकि इस मौसम में नमी बढ़ने की वजह से त्वचा के रोमछिद्र खुल जाते हैं.

–    मॉनसून में कड़ी धूप नहीं होती, तो हम में से अधिकतर लोग बारिश शुरू होते ही सनस्क्रीन का इस्तेमाल बंद कर देते हैं, लेकिन मौसम चाहे जो भी हो, सनस्क्रीन लगाना बहुत ज़रूरी है.

–    अक्सर लोगों को लगता है कि मॉनसून में स्किन को मॉइश्‍चराइज़ करने की ज़रूरत नहीं, लेकिन हर मौसम में स्किन का डेली रूटीन फॉलो करना बहुत ज़रूरी है.

–    स्किन केयर रूटीन में सोप फ्री क्लींज़र का इस्तेमाल करें, वरना स्किन ड्राई हो जाएगी.

–    नियमित रूप से स्क्रब भी करें, ताकि मृत त्वचा निकल जाए और त्वचा डल व बेजान न लगे.

–    ब्लीचिंग और फेशियल्स इस मौसम में अवॉइड करें, क्योंकि इससे त्वचा रूखी हो सकती है.

–    अगर आपकी स्किन ड्राई है, तो बादाम या शहद का होममेड क्लींज़र यूज़ करें. 8-10 बादाम को पीसकर 2 टीस्पून शहद मिलाएं. इसे मसाज करते हुए अप्लाई करें. 5 मिनट बाद चेहरा धो लें.

–   अगर स्किन ऑयली है, तो ओटमील स्क्रब या पपीते के पल्प से एक्सफोलिएट करें.

–    ड्राई स्किन की टोनिंग के लिए 1 टीस्पून दूध में 5 बूंदें कैमोमॉइल की मिलाकर यूज़ करें.

–    ऑयली स्किन के लिए 1 टीस्पून पानी में 5 बूंदें लैवेंडर ऑयल की मिलाएं.

– ऑयली या कॉम्बीनेशन स्किन है, तो 2 टीस्पून गुलाबजल में 2-2 बूंदें स्ट्रॉबेरी ऑयल और ऑरेंज ऑयल की मिलाकर चेहरे व गर्दन पर लगाएं. 10 मिनट बाद धो लें.

Monsoon Skin Care

मॉनसून फेस पैक्स

– 3 टीस्पून ओटमील पाउडर, 1 अंडे का स़फेद भाग, 1-1 टीस्पून शहद और दही. सबको मिला लें. चेहरा अच्छी तरह क्लीन कर लें और पैक अप्लाई करें. सूखने पर धो लें.

–    3 टीस्पून ओटमील पाउडर, 1-1 टेबलस्पून गुलाबजल, शहद और दही. सबको मिलाकर पेस्ट बना लें. चेहरे पर लगाएं. सूखने पर धो लें. हफ़्ते में दो बार यह यूज़ करें.

–    मुलतानी मिट्टी और गुलाबजल को मिलाकर पेस्ट बना लें. चेहरे पर लगाएं. सूखने पर धो लें. हफ़्ते में एक बार यह प्रयोग करें. चिपचिपी और ऑयली स्किन से छुटकारा मिलेगा.

–   2 टेबलस्पून चंदन पाउडर को आधा कप गुलाबजल में मिलाएं. इसमें 1 टेबलस्पून हल्दी मिलाएं. इस पैक को 20-30 मिनट तक लगाकर रखें. ठंडे पानी से धो लें. यह दाग़-धब्बे दूर करके त्वचा को ग्लोइंग इफेक्ट देगा.

–    2-2 टेबलस्पून जोजोबा ऑयल और दही में 1 टेबलस्पून शहद मिलाएं. चेहरे व गर्दन पर लगाएं. 10-15 मिनट बाद माइल्ड फेस वॉश से धो लें. यह पैक ड्राई स्किन के लिए बहुत अच्छा है.

–    मॉनसून में फ्रूट पैक्स बहुत फ़ायदेमंद रहते हैं. पपीता, सेब और पीच को मैश करें. इसमें 2 टेबलस्पून दूध मिलाएं. चेहरे व गर्दन पर अप्लाई करें. 15-20 मिनट बाद ठंडे पानी से धो लें. यह न स़िर्फ त्वचा को ग्लोइंग इफेक्ट देता है, बल्कि बैक्टीरिया से त्वचा का बचाव भी करता है.

–   चॉकलेट पैक भी मॉनसून में अच्छा होता है. 1 टेबलस्पून कोको पाउडर में 2 टेबलस्पून दूध मिलाएं. 20 मिनट तक लगाकर रखें, फिर धो लें.

–   1 टीस्पून बेसन में चुटकीभर हल्दी पाउडर मिलाएं. इसमें 2-3 बूंदें नींबू का रस और 1-2 टीस्पून गुलाबजल मिलाकर पेस्ट बना लें. चेहरे पर लगाएं. 15 मिनट बाद धो लें.

–    अखरोट को पीसकर पाउडर बना लें. अखरोट पाउडर, मुलतानी मिट्टी, पोस्तादाने और दही- सभी समान मात्रा में लें. अच्छी तरह मिलाकर चेहरे पर लगाएं. 10 मिनट बाद इसे स्क्रब करते हुए हटाएं और ठंडे पानी से धो लें. यह मृत त्वचा को हटाकर त्वचा को निखारता है.

–    2-2 टेबलस्पून जोजोबा ऑयल और दही में 1 टेबलस्पून शहद मिलाएं. चेहरे व गर्दन पर लगाएं. 10-15 मिनट बाद माइल्ड फेस वॉश से धो लें. यह पैक ड्राई स्किन के लिए बहुत अच्छा है.

–   4-5 स्ट्रॉबेरीज़ को मैश कर लें. इसमें 1 टेबलस्पून ब्रैंडी मिलाएं. 2 टेबलस्पून मुलतानी मिट्टी, गुलाबजल की कुछ बूंदें और 2 टेबलस्पून ब्रेड का चूरा मिलाकर पेस्ट बना लें. चेहरे पर अप्लाई करें. 15-20 मिनट बाद धो लें.

–    2 टेबलस्पून ग्रीन टी को ब्लेंडर में ब्लेंड करके पाउडर कर लें. इसमें 1 टेबलस्पून दही मिलाएं. चाहें तो कुछ बूंदें अपने मनपसंद एसेंशियल ऑयल की भी मिला सकती हैं. इसे मसाज करते हुए चेहरे व गर्दन पर लगाएं. 10 मिनट बाद गुनगुने पानी से धो लें. यह पैक पिंपल्स और चेहरे के दाग़-धब्बों के लिए बहुत फ़ायदेमंद है.

–    1 सेब को मैश कर लें. इसमें दूध और कुछ बूंदें कैमोमॉइल ऑयल की मिलाकर अच्छी तरह ब्लेंड करें. 15 मिनट तक चेहरे पर लगाकर रखें, फिर धो लें.

–    2 टीस्पून शहद में आधे नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर लगाएं. सूखने पर धो लें. मॉनसून में यह आपकी स्किन को हेल्दी और ग्लोइंग रखेगा.

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Skin Care Tips

मॉनसून स्किन प्रॉब्लम्स और सोल्यूशन्स

–   मॉनसून में स्किन ऑयली और चिपचिपी हो जाती है, जिससे कई तरह की समस्याएं बढ़ जाती हैं, जैसे- पिंपल्स, ब्लैकहेड्स, व्हाइटहेड्स, आदि. गुलाबजल को ककड़ी के रस में मिलाकर अप्लाई करने से त्वचा का चिपचिपापन कम होता है.

–   पिंपल्स और रैशेज़ होने पर मेडिकेटेड क्लींज़र से दिन में दो बार फेस क्लीन करें. रोज़ बेस्ड एस्ट्रिंजेंट या टोनर यूज़ करें.

–    दिन में कई बार पानी से चेहरा धोएं.

–    मुलतानी मिट्टी पैक का इस्तेमाल करें. इससे त्वचा का एक्स्ट्रा ऑयल निकल जाएगा. चिपचिपापन कम हो जाएगा और मुंहासों में भी लाभ होगा.

–    चंदन पाउडर का पैक भी स्किन को सूदिंग इफेक्ट देगा और पिंपल्स को कंट्रोल में रखेगा.

–    नीम के पत्तों का पेस्ट अप्लाई करें.

–   मेथी के पत्तों को पीसकर उसका पेस्ट अप्लाई करें. 15-20 मिनट बाद धो लें. इससे पिंपल्स की समस्या काफ़ी हद तक कम हो जाएगी.

–    चंदन पाउडर को गुलाबजल में मिलाकर लगाएं. 20 मिनट बाद धो लें.

–    मुट्ठीभर नीम के पत्तों को 4 कप पानी में एक घंटे तक धीमी आंच पर उबालें. इसे रातभर अलग रख दें और सुबह छानकर इस पानी से चेहरा धोएं.

–    बेसन में दही और हल्दी पाउडर मिलाकर स्क्रब करें.

–    टमाटर के पल्प को मैश करके चेहरे पर मसाज करते हुए अप्लाई करें. कुछ देर तक स्क्रब करते रहें और हो सके तो यह उपाय रात को सोने से पहले करें. पैक को रातभर लगा रहने दें और चेहरा सुबह धोएं.

–    नींबू का रस चेहरे पर अप्लाई करें. आधे नींबू के रस में चुटकीभर नमक मिलाकर 20 मिनट तक लगाकर रखें. गुनगुने पानी से धो लें.

–   मूंगफली के तेल की कुछ बूंदों में 2-3 बूंद नींबू के रस की मिलाएं. ब्लैक और व्हाइट हेड्स पर लगाएं. आधे घंटे बाद धो लें.

–    दालचीनी पाउडर में नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर अप्लाई करें. 20 मिनट बाद धो लें. यह पैक मृत त्वचा को हटाकर चेहरे पर निखार भी लाता है.

–   नियमित रूप से स्टीम लेने से त्वचा की इन समस्याओं से निजात मिलती है.

–    हेल्दी डायट लें. पानी ख़ूब पीएं.

–    स्क्रबिंग भी नियमित रूप से करें. इससे डेड स्किन हट जाती है और स्किन ग्लो करती है.

–    अगर पिंपल्स बहुत ज़्यादा हैं, तो स्क्रब न करें. दिन में 3-4 बार स़िर्फ पानी से चेहरा धोएं.

–    रैशेज़ की समस्या है, तो गुलाबजल यूज़ करें.

 

गीता शर्मा

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हार्मोंस कर सकते हैं दांतों को बीमार (Hormones And Dental Health)

Hormones And Dental Health

हमारे शरीर में अनेक प्रकार के हार्मोंस (Hormones) स्रावित होते हैं. किशोरावस्था से लेकर मेनोपॉज़ (Menospause) तक हार्मोंस के स्तर में बदलाव होता रहता है. यही बदलाव हमारे डेंटल हेल्थ (Dental Health) को भी प्रभावित करता है और हमें पता भी नहीं चलता. जीवन के इसी बदलाव की अन्य अवस्थाएं, जैसे- प्यूबर्टी (Puberty), पीरियड्स का आना (Periods), प्रेग्नेंसी (Pregnancy), ब्रेस्टफीडिंग (Breastfeeding) और मेनोपॉज़ डेंटल हेल्थ को किस तरह प्रभावित करते हैं, यह जानने के लिए हमने बात की डेंटिस्ट डॉ. नूपुर श्रीराव से.

Hormones And Dental Health

प्यूबर्टी: इस अवस्था में प्रोजेस्टेरॉन और एस्ट्रोजन का स्तर अधिक बढ़ जाता है, जिसके कारण कई बार मसूड़ों में सूजन और ब्लीडिंग होने लगती है. इन समस्याओं को नज़रअंदाज़ करने पर ‘जिंजिवाइटिस’ नामक दांतों की बीमारी हो जाती है. इस उम्र में लड़कियां मीठा, जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक बहुत अधिक पीती हैं, जिससे हार्मोंस असंतुलित होने लगते हैं और इनका बुरा असर डेंटल हेल्थ पर पड़ने लगता है.

समाधान

  • डॉक्टर से दांतों की क्लीनिंग कराएं, अन्यथा दांतों में सड़न हो सकती है.
  • हेल्दी दांतों के लिए हेल्दी फूड और नट्स खाएं.
  • रोज़ाना दिन में 2 बार ब्रश करें.
  • नारियल पानी और नींबू पानी पीएं.

पीरियड्स आना: अक्सर महिलाएं पीरियड्स आने के पहले दांतों की समस्याएं, जैसे- मसूड़ों का फूलना, उनमें दर्द होना आदि शिकायतें करती हैं. पीरियड्स के दौरान शरीर में प्रोजेस्टेरॉन हार्मोन के स्तर में बदलाव होता है, जिसके कारण यह समस्या होती है.

समाधान

  • अन्न के कण दांतों में फंसे रहने के कारण उनमें सड़न होने लगती है, इसलिए हर बार खाना खाने के बाद कुल्ला करना न भूलें.
  • पानी में कुछ बूंदें एंटीबैक्टीरियल ऑयल, जैसे- लौंग का तेल, दालचीनी का तेल और यूकेलिप्टस ऑयल की डालकर गरारे करें.
  • कच्चा प्याज़ और लहसुन को भोजन में शामिल करें, क्योंकि इनमें ऐसे एंटीबैक्टीरियल तत्व होते हैं, जो इस समस्या से निजात दिलाते हैं.

प्रेग्नेंसी: गर्भवती महिलाओं में हार्मोंस का स्तर अस्थिर होता है. यह कभी कम, तो कभी ज़्यादा होता है. इससे कई बार दांतों की समस्याएं हो जाती हैं, जैसे- मसूड़ों का लाल होना, उनमें सूजन और दर्द होना आदि.

समाधान

  • दिन में 2 बार ब्रश करने और दांतों को फ्लॉस करने की आदत डालें.
  • कुछ भी खाने के बाद तुरंत कुल्ला करें.
  • प्रेग्नेंसी के दौरान गर्भवती महिला को कैल्शियम, विटामिन डी और फोलिक एसिड की अधिक मात्रा में ज़रूरत होती है, इसलिए डॉक्टरी सलाहानुसार इन्हें अपने भोजन में ज़रूर शामिल करें.

स्तनपान: प्रेग्नेंसी के बाद स्ट्रेस और तनाव के साथ-साथ थकान भी बहुत बढ़ जाती है. हार्मोंस में भी बहुत परिवर्तन होते हैं, जिसके कारण दांतों में सड़न और मसूड़ों की बीमारियां हो सकती हैं.

समाधान

  • स्तनपान करानेवाली महिलाएं कैल्शियम और ओमेगा 3 फैटी एसिडयुक्त आहार लें.
  • भोजन में हेल्दी फूड खाएं.
  • शरीर में पानी की कमी न होने दें.

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Hormones And Dental Health

मेनोपॉज़: मेनोपॉज़ के दौरान हार्मोंस असंतुलित होते रहते हैं, जिससे महिलाओं को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जैसे- मुंह का स्वाद ख़राब होना, मुंह में जलन होना, सेंसिटिविटी आदि. कई बार मसूड़ों और दांतों के रोग भी हो जाते हैं. मेनोपॉज़ में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर कम होने लगता है, जिससे हड्डियां कमज़ोर होने लगती हैं.

समाधान

  • दांतों की सुरक्षा के लिए फ्लोरॉइड टूथपेस्ट का प्रयोग करें.
  • हड्डियों की मज़बूती के लिए डॉक्टर की सलाहानुसार अपनी डायट में कैल्शियम और विटामिन डी आवश्यक मात्रा में शामिल करें.
  • तली-भुनी, नमकीन, तीखी और दांतों में चिपकनेवाली चीज़ें न खाएं.
  • चाय, कॉफी, अल्कोहल और तंबाकू का सेवन कम करें.

गर्भ निरोधक गोलियां: गर्भ निरोधक गोलियों में प्रोजेस्टेरॉन हार्मोन होता है. अत: इनका अधिक सेवन करने से हार्मोन असंतुलित होने लगते हैं, जिससे मसूड़ों में सूजन और पेट की समस्याएं, जैसे- कब्ज़, पेट का फूलना आदि होती हैं. इन समस्याओं के कारण मुंह में बदबू आना और दांतों में सड़न भी हो सकती है.

समाधान

  • डॉक्टर की सलाह से प्रोबायोटिक टैबलेट और विटामिन बी कॉम्प्लेक्स की गोलियां लें.

स्वस्थ दांतों के लिए ईज़ी टिप्स

  • मीठा खाने की बजाय फल व सूखे मेवे खाएं.
  • कोल्ड ड्रिंक, कोल्ड कॉफी, फू्रट जूस के बदले नारियल पानी या नींबू पानी पीएं.
  • जिनके दांतों में बे्रसेस लगे हुए हैं, उन्हें दांतों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि अन्न के कण दांतों में चिपक व फंस जाने के कारण दांतों में सड़न हो सकती है.
  • कुछ भी खाने-पीने के बाद अच्छी तरह से कुल्ला करें.
  • डॉक्टर की सलाह से रात को माउथवॉश से गरारे करके सोएं.
  • स्तनपान करानेवाली महिलाएं तिल व अलसी खाएं. इनमें कैल्शियम और ओमेगा 3 फैटी एसिड अधिक मात्रा में होता है, जो दांतों के लिए बहुत फ़ायदेमंद है.
  • 8-10 ग्लास पानी पीएं.
  • दांतों की छोटी सी समस्या को नज़रअंदाज़ न करें. तुरंत डॉक्टर को दिखाएं.

 

–  नेहा श्रीराव

क्या करें जब बच्चा हकलाए? (How To Help A Stammering Child?)

kya kare jab bachcha haklaye image

छोटे बच्चों में हकलाने की समस्या बहुत गंभीर बात नहीं है. लेकिन इस कारण जब उसके संगी-साथी या पैरेन्ट्स मज़ाक उड़ाते हैं या नकल करते हैं, तो बच्चे में धीरे-धीरे हीनभावना आने लगती है और बच्चा लोगों से मिलने-जुलने से कतराने लगता है. ऐसा बच्चा उदास और गुमसुम रहने लगता है.

हकलाने वाले बच्चे एक ही अक्षर या शब्द को लम्बा खींचते हैं. कोई वाक्य बोलते वक्त अचानक किसी अक्षर या शब्द पर अटक जाते हैं और उसे बार-बार बोलने की कोशिश करते हैं. अलग-अलग बच्चों में इसके लक्षण भी अलग-अलग होते हैं. प्राय: हर सौ लोगों में एक इस दोष से पीड़ित होता है. कोई बार-बार किसी ख़ास अक्षर या शब्द पर ही अटकता है, तो कोई अचानक किसी भी शब्द पर अटक जाता है. कई बार सामान्य रूप से बातचीत करनेवाले बच्चे या बड़े भी भय, शर्म, तनाव, निराशा या आत्मविश्‍वास डगमगाने की स्थिति में हकलाने लगते हैं.
यह ज़रूरी नहीं कि हकलानेवाला बच्चा गा नहीं सकता. ऐसे कई मामले देखने में आते हैं कि सामान्य बातचीत में हकलाने वाला बच्चा किसी शब्द पर अटकता है, लेकिन कविता या गाना सुनाते वक्त उसी अक्षर या शब्द को बड़ी सहजता से बोल जाता है.

कब और क्यों हो सकती है समस्या?

हकलाहट अथवा स्टैमरिंग आमतौर पर तीन से पांच साल की उम्र में शुरू होती है. पांच से नौ साल के बच्चों में यह दोष धीरे-धीरे कम हो जाता है तथा 12-13 साल के बच्चों में बहुत कम पाया जाता है. चिकित्सकों के मुताबिक शुरुआती दौर में लगभग 5 फीसदी बच्चों में यह दोष पाया जाता है. इनमें से 5 फीसदी बच्चे बिना किसी मदद या इलाज के अपने आप ठीक बोलने लगते हैं.

एक दिलचस्प तथ्य यह है कि लड़कियों के मुक़ाबले लड़कों में यह भाषा संबंधी दोष 5 गुना ज़्यादा पाया जाता है. वैसे तो यह एक सामान्य दोष है और शुरुआती दौर में संभवत: बच्चे की भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ न होने के कारण भी हो सकता है. फिर भी कई ऐसे मनोवैज्ञानिक कारण हैं, जिनकी वजह से ऐसा होता है. शारीरिक दोष तो बहुत कम बच्चों में पाया जाता है. मुख्यत: भावनाओं के भारी झंझावात और असमंजस की स्थिति में उलझने के कारण ही ऐसा होता है. बच्चा एक साथ अपनी स्कूल, घर, मित्र मंडली, पैरेन्ट्स, टीचर्स आदि की बातों में उलझा होता है, उसी के प्रभाव से ऐसा हो जाता है. कई बार किसी के भय से वह बोलना छोड देता है. इससे भी बोलने की क्षमता प्रभावित होती है.

उपचार क्या है?

* इस दोष का इलाज किसी दवा से नहीं किया जाता. स्पीच थेरेपिस्ट और मनोवैज्ञानिक ही इस समस्या का निदान कर सकते हैं.
* सर्वप्रथम हकलाहट का कारण जानने की कोशिश की जाती है.
* बच्चे के मन में किसी प्रकार का भय हो, तो उसे दूर करने की कोशिश होती है.
* उसके मन में आत्मविश्‍वास पैदा किया जाता है और दिमाग़ से यह बात दूर करने के प्रयास किए जाते हैं कि उसके अन्दर किसी प्रकार का दोष है.
* बच्चे को तनावमुक्त रखना ही मनोवैज्ञानिक और स्पीच थेरेपिस्ट का मुख्य उद्देश्य होता है.
* स्पीच थेरेपिस्ट उन्हीं शब्दों या अक्षरों को बच्चे से बार-बार बुलवाता है, जिन्हें बोलने में उसे परेशानी होती है.
* ज्यों-ज्यों निरन्तर अभ्यास के कारण बच्चे का उच्चारण सुधरता है, उसके मन में आत्मविश्‍वास आने लगता है.
* अधिकांश मामलों में सुधार स्पष्ट नज़र आने लगता है.

पैरेन्ट्स क्या करें?

* पेरेन्ट्स को सदैव इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा भयभीत या तनावग्रस्त न रहे.
* अगर बच्चा हकलाता है, तो उसका न स्वयं मज़ाक उड़ाएं न किसी को उड़ाने दें.
* आपका दो पल का मज़ाक उसे ज़िन्दगीभर के लिए तकलीफ़ दे सकता है.
* बच्चे को ज़्यादा से ज़्यादा बोलने के लिए प्रेरित करें.
* बच्चे की मौजूदगी में उसके दोष के बारे में चर्चा करने से बचें.
* बच्चे को कहानी, कविता, गीत आदि सुनाने के लिए प्रेरित करें व उसकी प्रशंसा कर उसे प्रोत्साहन दें.
* दूसरे बच्चों से तुलना करके उसे लज्जित करने का प्रयास बिल्कुल न करें.

* बच्चा कोई वाक्य बोलते वक्त अटकता हो, तो धैर्य से उसकी बात सुनें और उसे ही अपना वाक्य पूरा करने दें. आप उस वाक्य को पूरा न करें.

– अंजू जैन

रिलेशनशिप की 5 लेटेस्ट प्रॉब्लम्स व उनके स्मार्ट हल (5 latest Relationship problems and smart solutions)

Relationship problems and smart solutions

पति-पत्नी के रिश्ते की नाज़ुक डोर प्यार, विश्‍वास, भरोसे व अपनेपन जैसे मज़बूत धागों से बंधी होती है. इनमें ज़रा-सी भी उलझन दिलों में दरार डाल देती है और रिश्ते दरकने लगते हैं. कहीं आपकी शादीशुदा ज़िंदगी में भी तो कोई रिलेशनशिप प्रॉब्लम नहीं? अगर है, तो आइए जानें, रिलेशनशिप की 5 लेटेस्ट प्रॉब्लम्स (Relationship problems and smart solutions) व उनके स्मार्ट हल.

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1. कम्युनिकेशन गैप

हर सफल रिश्ते की नींव कम्युनिकेशन यानी बातचीत व सही व्यवहार पर टिकी होती है. जॉन ग्रे की क़िताब ङ्गमेन आर फ्रॉम मास, वुमन आर फ्रॉम वीनसफ में लेखक ने लिखा है, ङ्गस्त्री और पुरुष दोनों का संबंध अलग-अलग ग्रहों से है, इसलिए उनमें रिलेशन प्रॉब्लम्स होती हैं, जिससे महिलाएं चाहती हैं कि कोई उन्हें ध्यान से सुने, उनकी बातों परध्यान दे, पर पुरुष उन्हें समझ नहीं पाते और अपनी व्यस्तता के कारण उन्हें समाधानों की एक लंबी-चौड़ी लिस्ट थमा देते हैं.
अक्सर महिलाएं कहना कुछ चाहती हैं, पर वे कहती कुछ और हैं, जैसे- ङ्गकोई बात नहीं, मैं ये काम कर लूंगी,फ तो पुरुषों को समझ जाना चाहिए कि कुछ बात है और वह चाहती है कि आप उनसे कहें कि नहीं, नहीं मैं वो काम कर लूंगा, पर पुरुष इसे समझ ही नहीं पाते. इसी वजह से पत्नी को लगता है कि उसके पति उसे समझते ही नहीं, जिससे उनके रिश्ते में प्रॉब्लम्स आने लगती हैं.
ऐसी ही न जाने कितनी बातों की वजह से पति-पत्नी के रिश्ते में ख़ामोशी आने लगती है, जो धीरे-धीरे उनके रिश्ते को ख़ामोश करने लगती है, इसलिए अपने रिश्ते को बचाने के लिए उसमें कभी भी ख़ामोशी को न आने दें.
स्मार्ट हल
* कम्युनिकेशन यानी बातचीत का अर्थ केवल बोलना नहीं है, बल्कि सामनेवाले की बातों को ग़ौर से सुनना और समझना भी है.
* माना घर-गृहस्थी और करियर के चक्कर में आप एक-दूसरे के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं, पर आपके पार्टनर के बिना कैसी घर-गृहस्थी?
* पार्टनर के बीच बातचीत बहुत ज़रूरी है. एक-दूसरे की मजबूरियों और समस्याओं को समझने की कोशिश करें और कोई भी फैसला लेने से पहले खुलकर उस विषय पर बात करें.
* कितनी भी नाराज़गी क्यूं न हो, बात करना बंद न करें.
* इसके लिए किसी न किसी को तो पहल करनी ही होगी, तो उनके पहल करने का इंतज़ार न करें और अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त कर दें.
* हमेशा याद रखें कि ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिसका हल बातचीत से नहीं निकल सकता. बड़ी से बड़ी समस्या का हल बैठकर निकाला जा सकता है.

2. नो टाइम फॉर सेक्स

शादीशुदा ज़िंदगी को सफल बनाने में सेक्सुअल रिलेशन अहम् भूमिका अदा करती है. आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, जल्दी से जल्दी सब कुछ पा लेने की होड़ में अक्सर रिश्ते कहीं पिछड़ जाते हैं, ख़ासकर शहरों में, जहां दोनों ही पार्टनर्स कामकाजी हैं, एक-दूसरे के लिए क्वालिटी टाइम निकालना मुश्किल हो जाता है, जिसका असर उनके शादीशुदा जीवन पर पड़ता है.
स्मार्ट हल
* चाहे कितने भी बिज़ी हों, एक-दूसरे के लिए समय ज़रूर निकालें. ध्यान रखें, सेक्स शादीशुदा ज़िंदगी के लिए टॉनिक की तरह है.
* इसके लिए ज़रूरी है कि दोनों ही खुलकर अपनी भावनाएं एक-दूसरे से व्यक्त करें.
* वीकेंड पर या छुट्टी के दिन ऑफ़िस को भूल जाएं. पूरा दिन साथ-साथ बिताएं. रोमांटिक बातें करें. आउटिंग पर जाएं.
* एक-दूसरे को छोटे-छोटे गिफ्ट्स देकर भी आप अपनी भावनाओं को ज़ाहिर कर सकते हैं.
* शादीशुदा ज़िंदगी में ताज़गी बनाए रखने के लिए हर छह महीने पर या साल में कम से कम एक बार स़िर्फ आप दोनों घूमने जाएं. ऐसे में सारे गिले-शिकवे भी दूर हो जाते हैं और आपकी सेक्सुअल लाइफ भी रिन्यू हो जाती है.

3. फाइनेंशियल प्रॉब्लम्स

अक्सर पैसे ख़र्च करने के मामले में दोनों पार्टनर अलग होते हैं. एक को बहुत ख़र्च करना पसंद होता है, तो दूसरे को बचत करने की या कम ख़र्च करने की आदत होती है. कई बार तो पार्टनर के बीच इस बात को लेकर झगड़े हो जाते हैैं कि कौन कितना ख़र्च करेगा. व्यक्तिगत ख़र्च को प्राथमिकता देकर घर ख़र्च को अनदेखा करना भी इसका एक प्रमुख कारण है.
स्मार्ट हल
* दोनों पार्टनर्स बैठकर फाइनेंशियल प्लानिंग करें. इन्वेस्टमेंट आदि के अलावा घरेलू ख़र्चों में दोनों मिलकर सहयोग करें.
* हर महीने का बजट बनाएं, ताकि फ़िज़ूलख़र्ची न हो.
* अपने पार्टनर से अपने व्यक्तिगत ख़र्चों को छुपाए नहीं.

4. नो टाइम फॉर किड्स

कहते हैं, बच्चा पति-पत्नी के बीच के सभी गिले-शिकवे दूर कर उन्हें और क़रीब ले आता है, लेकिन आज कपल्स के पास इतना समय ही नहीं रहता कि वे बच्चे प्लान कर सकें. करियर बनाने और भविष्य को सुरक्षित करने के चक्कर में दोनों ही पार्टनर अपने रिश्ते से ज़्यादा काम को अहमियत देते हैं. बच्चे की ज़िम्मेदारी लेने के लिए उनके पास समय ही नहीं होता. लेकिन उम्र के एक पड़ाव पर उन्हें जब बच्चे की कमी का एहसास होता है, तब अपनी झुंझलाहट वो एक-दूसरे पर ही निकालते हैं और एक-दूसरे को दोषी ठहराते हैं, जिससे रिश्तों में खटास आने लगती है.
स्मार्ट हल
* दोनों को ही यह बात समझनी होगी कि करियर उनके रिश्ते से बढ़कर नहीं है और हर चीज़ की एक सही उम्र होती है, अगर उसी उम्र में वह हो जाए, तो ज़्यादा बेहतर है. इसलिए बच्चा प्लान करने में देरी न करें.
* ध्यान रखें कि बच्चे जीने के मक़सद होते हैं. पति-पत्नी के रिश्ते की कड़ी होते हैं, जो उन्हें स्नेह के बंधन से जोड़े रखते हैं.
* माना कि बच्चों की परवरिश एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है, लेकिन दोनों
के सहयोग से इसे आसान बनाया जा सकता है.

5. ऑफिस रोमांस

कॉम्पटीशन के इस दौर में हर कोई आगे निकलना चाहता है. ऐसे में ज़्यादा समय तक काम करना हमारी आदत में शुमार हो जाता है. घर से ज़्यादा वक़्त हम ऑफिस में गुज़ारते हैं, जिसकी वजह से कलीग्स में एक भावनात्मक लगाव हो जाता है. ऐसी कई बातें होती हैं, जो हम अपने पार्टनर से न शेयर करके अपने कलीग्स से शेयर करने लगते हैं. कभी-कभी यह लगाव अफेयर का रूप ले लेता है, जिसका असर उनकी शादीशुदा ज़िंदगी पर भी पड़ता है. यह स़िर्फ पुरुषों तक ही सीमित नहीं है, महिलाएं भी इसमें उतनी ही भागीदार हैं, इसलिए दोनों को ही अपने रिश्तों पर ग़ौर करने की ज़रूरत है.
स्मार्ट हल
* अगर आपको ऐसा एहसास हो रहा है कि आप अपने कलीग्स के साथ कुछ ज़्यादा ही इन्वॉल्व हो रहे हैं, तो वहीं पर अपने क़दम पीछे खींच लें.
* अपने पार्टनर के साथ ज़्यादा से ज़्यादा क्वालिटी समय बिताने की कोशिश करें.
* अपने पार्टनर से बेवफ़ाई की भावना आपको आत्मग्लानि से भर देगी और आपकी ख़ुशहाल ज़िंदगी ख़ुशहाल नहीं रह जाएगी, इसलिए अपने रिश्ते में ईमानदारी बनाए रखें.
* रिश्तों की अहमियत को समझने की कोशिश करें और साथ ही अपने पार्टनर को भी समझने की कोशिश करें.
जानें स्वस्थ रिश्तों के लक्षण
1. दो व्यक्तियों के बीच की आपसी समझ ही स्वस्थ रिश्ते का सबसे बड़ा लक्षण है. पति-पत्नी बिना बोले एक-दूसरे की भावनाओं को समझ जाते हैं, तो स्वस्थ रिश्ते का इससे बड़ा उदाहरण नहीं है.
2. पति-पत्नी दोनों ही ख़ुश व तनावमुक्त होते हैं.
3. दोनों ही अपनी ज़िम्मेदारियां दूसरे पर नहीं थोपते, बल्कि उन्हें बांटने का पूरा प्रयास करते हैं.
4. दोनों में मन-मुटाव कम ही होते हैं, क्योंकि दोनों हर समस्या का समाधान मिलकर निकालते हैं. हर अहम् ़फैसलों में दोनों की सहमति होती है.
5. दोनों न स़िर्फ एक-दूसरे के काम में हाथ बंटाते हैं, बल्कि उनके काम का सम्मान भी करते हैं और उनके तनाव को समझते हैं.
6. ऐसे कपल्स एक-दूसरे पर निर्भर नहीं होते, बल्कि हर क़दम पर एक-दूसरे का साथ निभाते हैं.
7. स्वस्थ रिश्तों में पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ भरपूर क्वालिटी समय बिताते हैं. एक-दूसरे को ख़ुश रखने की हर संभव कोशिश करते हैं.
8. दोनों ही एक-दूसरे पर इतना विश्‍वास करते हैं कि दूसरों के बहकावे में कभी नहीं आते.

– अनीता सिंह

मुफ़्त के सलाहकारों से रहें सावधान (Stay Away From Free And Unwanted Advises)

कैसे सुलझाएं इन लाइफस्टाइल संबंधी सेक्स प्रॉब्लम्स को? (How To Deal With Lifestyle Related Sex Problems?)

Lifestyle Related Sex Problems

कई बार ऐसा होता है कि एक पार्टनर की सेक्स की इच्छा होती है, जबकि दूसरे की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं होती (Lifestyle Related Sex Problems). ऐसे में कपल्स कई बार हफ़्तों, महीनों तक सेेक्स लाइफ एंजॉय नहीं कर पाते और अधिकतर मामलों में ग़लतफ़हमियों के कारण भी ऐसा होता है. इसी पहलू को जानने की कोशिश करते हैं.

Lifestyle Related Sex Problems

बढ़ते तनाव से इच्छा में कमी
कुछ लोगों का मानना है कि अधिक स्ट्रेस की स्थिति से सेक्सुअल डिज़ायर में कमी आती है, लेकिन यह बात पूरी सच नहीं है. काम का बोझ, बॉस की झिड़की, प्रेज़ेंटेशन का प्रेशर और काम के बढ़ते घंटे तनाव को काफ़ी बढ़ा देते हैं और तनाव को सेक्सुअल डिज़ायर में कमी का कारण मान लिया जाता है. इससे पार्टनर के बीच ग़लतफ़हमी की दीवार खड़ी हो जाती है. उन्हें लगता है कि उनका पार्टनर अब पहले की तरह उनसे प्यार नहीं करता और न ही पार्टनर की उनमें कोई दिलचस्पी है. बस, इसी बात पर झगड़े शुरू हो जाते हैं और इन सबका परिणाम ये होता है कि पुरुष अपनी सेक्सुअल पावर पर ही शक करने लगते हैं, जिससे बात और बिगड़ जाती है.

समाधान- वैवाहिक जीवन में सेक्सुअल डिज़ायर में कमी के पड़ाव आते-जाते रहते हैं, अतः इसके लिए तनाव को पूरी तरह दोषी नहीं माना जा सकता. तनाव के अलावा बिज़ी लाइफस्टाइल और खानपान की ग़लत आदतें भी सेक्स लाइफ पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं. इसके अलावा कम्यूनिकेशन गैप भी दिलों के बीच दूरियां बढ़ा देता है. इसलिए पार्टनर के साथ कम से कम उन बातों को ज़रूर शेयर करें, जो आपको परेशान कर रही हैं. इससे तनाव कम होगा और आप रिलैक्स महसूस करेंगे. फिर भी यदि लगे कि स्ट्रेस सेक्सुअल लाइफ पर हावी हो रहा है, तो काउंसलर या सेक्स थेरेपिस्ट की सलाह लें.

हार्मोंस का असंतुलन
लोगों का यह सोचना कि महिलाओं के मूड और सेक्स की इच्छा के लिए हार्मोंस असंतुलन ही ज़िम्मेदार हैं, पूरी तरह सच नहीं है.

समाधान- आपसी झगड़े, मन-मुटाव, कम्यूनिकेशन गैप आदि भी इसके कारण हो सकते हैं. सेक्सुअल डिज़ायर की कमी की मुख्य वजह नींद पूरी न होना भी हो सकती है. हर व्यक्ति को कम से कम 6 से 7 घंटे सोना चाहिए. इसके अलावा हमारा मानसिक स्वास्थ्य, ग़लत खानपान और थकान भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं. महिलाओं में सेक्स की इच्छा इस बात पर निर्भर करती है कि उनके अपने पार्टनर के साथ संबंध कैसे हैं? जो महिलाएं हीनभावना या नकारात्मक सोच की शिकार होती हैं, उनमें सेक्स की इच्छा कम होती है. अतः यह पुरुष पार्टनर की ज़िम्मेदारी बनती है कि उनकी नकारात्मक सोच को बदलें, उनका आत्मविश्‍वास बढ़ाएं, इसके लिए उन्हें खुलकर बातचीत करनी चाहिए, ताकि वैवाहिक संबंध मधुर बने रहें.

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हमेशा दवाइयों का इस्तेमाल
लोगों का मानना है कि दवाइयों के प्रयोग से सेक्सुअल डिज़ायर की कमी को दूर किया जा सकता है, लेकिन दवाइयों को हमेशा अंतिम विकल्प के रूप में रखा जाना चाहिए, क्योंकि कई बार इनका उल्टा असर भी होता है.

समाधान- सबसे पहले समस्या की जड़ तक जाएं और उसे दूर करने की कोशिश करें. कई बार समझाने से ही समस्या हल हो जाती है. आज की वर्किंग वुमन को पर्सनल और प्रोफेशनल लेवल पर ख़ुद को साबित करना पड़ता है. ऑफिस में बॉस और काम का टेंशन, घर में बच्चों को संभालना व गृहस्थी की ज़िम्मेदारी, इन सबको बैलेंस करते-करते वो इतनी थक जाती है कि सेक्स की इच्छा कहीं दबकर रह जाती है. ऐसे में पार्टनर यदि थोड़ी-बहुत ज़िम्मेदारी उठाए और ढेर सारा प्यार दे, तो समस्या आसानी से सुलझ सकती है. हां, इसके लिए धैर्य रखना ज़रूरी है.

इमोशनल इंटीमेसी
इमोशनल इंटीमेसी शेयर करनेवाले कपल्स ख़ुद को सेफ महसूस करते हैं, पर यह इमोशनल इंटीमेसी कई बार इतनी बढ़ जाती है कि न तो उन्हें सेक्स की ज़रूरत महसूस होती है और न ही सेक्स की इच्छा होती है. सेक्सुअल डिज़ायर की कमी के कारण वे सेक्स लाइफ को ठीक से एंजॉय नहीं कर पाते. उनके लिए सेक्स बस एक रूटीन बनकर रह जाता है.

समाधान- ऐसा न हो इसके लिए पार्टनर के साथ सेक्सी व रोमांटिक बातें करें, बेडरूम का माहौल रूमानी बनाएं, लाइट म्यूज़िक, कैंडल्स की हल्की रोशनी और सेक्सी ड्रेस पहनकर पार्टनर को इंप्रेस करें. सेक्सुअल लाइफ को रिचार्ज करने के लिए कुछ दिनों के लिए घर से दूर किसी रोमांटिक जगह पर कुछ पल साथ बिताएं.

एक की इच्छा, दूसरे की नहीं
कभी-कभी ऐसा होता है कि एक पार्टनर की सेक्स की इच्छा होती है और दूसरा नहीं चाहता. इसे सेक्सुअल डिज़ायर की कमी मान लिया जाता है. धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति गंभीर बन जाती है.

समाधान- यह बिल्कुल सामान्य समस्या है. अक्सर कई पुरुष अन्य तरी़के, जैसे- गिफ्ट देकर या मीठी-मीठी बातें करके पार्टनर का दिल बहलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसा करते समय वे यह बात भूल जाते हैं कि महिलाएं गिफ्ट से ज़्यादा प्यार करने, बांहों में लेने और किस करने से ख़ुश होती हैं. वे पार्टनर का स्पर्श चाहती हैं, क्योंकि यही स्पर्श उन्हें प्यार का एहसास कराता है. अतः इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि अन्य किसी भी तरी़के से जताया गया प्यार फिज़िकल क्लोजनेस का पर्याय नहीं हो सकता. यदि सेक्स की इच्छा में कमी या सेक्स संबंधी कोई समस्या हो, तो उसे छुपाने की बजाय पार्टनर से इस बारे में खुलकर बात करें. इससे आप दोनों के बीच ग़लतफ़हमी नहीं होगी और आपके संबंध मधुर बने रहेंगे. यदि समस्या गहरी हो, तो डॉक्टर की सलाह लें.

प्यार में कमी
ऐसा माना जाता है कि एक पार्टनर की सेक्सुअल डिज़ायर में कमी से दूसरे पार्टनर का उसके प्रति प्यार कम होता जाता है.

समाधान- यह केवल वहम है. ऐसा कुछ भी नहीं होता. समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले तो यह पता लगाएं कि सेक्स की इच्छा में कमी का क्या कारण है? महिलाएं शादी के कुछ सालों बाद या बच्चे के जन्म के बाद अक्सर मोटी हो जाती हैं, जिससे उनका आत्मविश्‍वास कम हो जाता है. उन्हें लगता है कि अब उनकी बॉडी सेक्सी नहीं रही. उनका बेडौल शरीर देखकर पार्टनर क्या सोचेगा? यही नकारात्मक सोच उनकी सेक्स में दिलचस्पी कम कर देता है. कई बार मोटापे के कारण पुरुषों को भी संबंध बनाने में परेशानी होती है. डायट और नियमित एक्सरसाइज़ से मोटापे को कंट्रोल किया जा सकता है. नकारात्मक विचारों को दूर करने के लिए साइकोसेक्सुअल थेरेपिस्ट या काउंसलर की सलाह ली जा सकती है.

नशे का सहारा लेना
सेक्सुअल डिज़ायर को बढ़ाने के लिए लोग अल्कोहल, सिगरेट आदि का सेवन करते हैं. ऐसे लोगों की मान्यता है कि इससे सेक्स पावर बढ़ता है.

समाधान- यह बिल्कुल ग़लत है. वैसे भी पुरुष सेक्स को बहुत महत्व देते हैं. यदि उनकी सेक्सुअल डिज़ायर में कमी आती है, तो वे परेशान हो जाते हैं और मूड बनाने के लिए कई बार नशे का सहारा लेते हैं, जिससे शरीर में कई बदलाव आते हैं और इसका असर सेक्स लाइफ पर भी पड़ता है. सिगरेट में कई प्रकार के विषैले पदार्थ होते हैं, जो नपुंसकता पैदा करते हैं. इसी तरह अल्कोहल के सेवन से भी डिज़ायर में कमी आती है, लेकिन इन तथ्यों को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. यदि हेल्दी सेक्स लाइफ चाहते हैं, तो अल्कोहल और सिगरेट से दूर रहें.

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डिफिकल्ट होती पैरेंटिंग (Parenting is a challenging task)

खुला वातावरण, उन्मुक्त सोच और इन सबके बीच मासूमियत खोता बचपन… ये तमाम बातें हैं, जो पैरेंटिंग को और भी मुश्किल व चैलेंजिंग बनाती जा रही हैं. एक ओर जहां बच्चे बाहरी वातावरण से प्रभावित होकर अपने तरी़के से जीने की ज़िद लिए आगे बढ़ते हैं, तो वहीं दूसरी ओर अभिभावक इस दुविधा को मन में पाले रहते हैं कि कहां रोकें और कहां छूट दें.

 

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बदलती सोच के साथ समाज तेज़ी से बदल रहा है और इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं बच्चे. और चूंकि बच्चे प्रभावित हो रहे हैं, तो ज़ाहिर-सी बात है, अभिभावकों की चिंताएं बढ़ रही हैं.
हमारे समाज में एक सोच सदियों से चली आ रही है कि बच्चों पर पैरेंट्स का इतना हक़ है कि वे जब, जैसे चाहें उन्हें डांट-डपट सकते हैं, मार सकते हैं, उन पर प्रतिबंध लगा सकते हैं इत्यादि. हालांकि समय के साथ-साथ इस सोच में बदलाव आया है. लेकिन ये बदलाव बच्चों में ज़्यादा तेज़ी से आ रहा है बजाय पैरेंट्स के. पैरेंट्स आज भी कहीं न कहीं उसी पारंपरिक सोच के साथ जीते हैं कि बच्चों को ज़्यादा आज़ादी नहीं दी जानी चाहिए, उनके मन में बड़ों का डर होना ही चाहिए. उन्हें ज़िंदगी में क़ामयाब होना है, तो खेल-कूद के बजाय पढ़ाई पर ही ध्यान देना चाहिए आदि. हम आज भी यही सोचते हैं कि बच्चों के टीचर्स को तो बच्चों को पढ़ाने और उन्हें हैंडल करने की ट्रेनिंग मिलनी चाहिए, मगर पैरेंट्स को कुछ भी सीखने की ज़रूरत नहीं. जबकि पैरेंटिंग भी एक आर्ट है और आज तो पैरेंटिंग एक चैलेंज भी बन गई है. ऐसे में पैरेंट्स को ही अपने बच्चों को समझकर उनका फ्रेंड, फिलोसॉफ़र और गाइड बनना होगा.

क्यों परेशान हैं पैरेंट्स?

पैरेंट्स के मन में बच्चों को लेकर कई तरह के सवाल उठते हैं और यह स्वाभाविक भी है. कुछ पैरेंट्स सोचते हैं कि बच्चों को डरा-धमकाकर रखना चाहिए, ताकि वो अनुशासन में रहें और कुछ को लगता है कि बढ़ते बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखना चाहिए. लेकिन बहुत कम लोग ही यह समझ पाते हैं कि इन दोनों के बीच का रास्ता भी हो सकता है. जहां ज़रूरत हो, वहां दोस्त बनें. लेकिन जब-जब एक मार्गदर्शक के रूप में बच्चों को आपकी ज़रूरत हो या पैरेंट्स ख़ुद ये महसूस करें कि उन्हें थोड़ी सख़्ती करनी पड़ेगी तो वहां दोस्त की नहीं, अभिभावक की भूमिका निभाएं.

पैरेंट्स की डिफिकल्टीज़

आज के बच्चे ज़िद्दी, ग़ुस्सैल और विद्रोही होते जा रहे हैं.
बड़ों का आदर-सम्मान नहीं करते.
सीधे जवाब दे देते हैं.
कम उम्र में ही सेक्स की बातें करने लगते हैं.
शॉर्टकट्स में विश्‍वास करते हैं.
संस्कारों की बातें उन्हें बोर लगती हैं.

टीनएजर्स की पैरेंटिंग और भी चैलेंजिंग

टीनएजर्स की पैरेंटिंग आजकल एक चुनौती बनती जा रही है, क्योंकि टीनएजर्स उन सभी चीज़ों, बातों और लाइफ़ स्टाइल का सामना करते हैं, जो फैमिली वैल्यूज़ को चैलेंज करती हैं. ऐसे में संस्कारों और आज़ाद सोच के बीच टकराव होना लाज़मी है और पैरेंट्स निम्नलिखित समस्याओं से जूझने लगते हैं-
बच्चों को कितनी छूट दें.
कितनी पॉकेटमनी दें.
युवा होती बेटी पर कितनी पाबंदी लगाएं.
यही पाबंदियां बेटों पर भी लगाएं कि नहीं.
देर रात बाहर रहने या रात में दोस्तों के यहां रुकने की इजाज़त दें या नहीं.
किस तरह के दोस्तों की संगत में रहते हैं, उस पर टोकें या नहीं.
ग़लतियों पर किस तरह से डांटें और डांटें भी या नहीं.
पढ़ाई के लिए कितना दबाव डालें.

तकनीक ने भी बढ़ाई है डिफिकल्टीज़

इंटरनेट- जहां इंटरनेट आज की बड़ी ज़रूरत बन चुकी है, वहीं पैरेंट्स के लिए एक डिफिकल्टी भी है, क्योंकि न तो बच्चों को पूरी तरह से इनके प्रभाव व प्रयोग से रोका जा सकता है और न ही इसके लिए पूरी छूट दी जा सकती है. बच्चे चैटिंग की लत में पड़ जाते हैं या फिर अश्‍लील साइट्स पर जाकर ग़लत दिशा में भटक सकते हैं.
टीवी और फ़िल्में- शोधों से पता चला है कि जो बच्चे ज़्यादा टीवी देखते हैं, वे हिंसा के प्रति संवेदनहीन हो जाते हैं.
आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति- बच्चों पर प्रेशर बढ़ रहा है और पैरेंट्स की मजबूरी यह है कि वे अपने बच्चों को पिछड़ते नहीं देखना चाहते. ऐसे में वे भूल जाते हैं कि बच्चों की अपनी पसंद और क्षमताएं होती हैं. बच्चे के मन को बिना पढ़े कोई निर्णय न लें, वरना बच्चों में यह भावना आ जाती है कि पैरेंट्स उन्हें लेकर संवेदनहीन हैं और ऐसे में बच्चे ग़लत क़दम उठा सकते हैं.

पैरेंटिंग स्किल्स इंप्रूव करें

वो ज़माना अब नहीं रहा कि बच्चे की छोटी-सी ग़लती पर आप ज़ोर से चिल्ला दें या उसे एक चपत लगा दें. ये पुराने तरी़के हैं पैरेंटिंग के. आज बढ़ते बच्चे की बदलती ज़रूरतों के अनुसार पैरेंट्स को भी बदलना पड़ता है.
बच्चे के बिहेवियर को हमेशा जज करने के बजाय उसके साथ, उसकी बातों को एंजॉय करें.
हमेशा पढ़ाई और ट्यूशन की ही बातें न करें.
बच्चे की भी अपनी सोच है, उसकी बातों और चाहतों को आप महत्व देते हैं, उसे इस बात का एहसास करवाएं.
उसके साथ बैठकर अगर होमवर्क करवाना आपको ज़रूरी लगता है, तो उसके साथ खेलने के लिए भी व़क़्त निकालें.
आजकल पैरेंटिंग पर बहुत-सी वेबसाइट्स हैं. वर्क शॉप्स के ज़रिए भी पैरेंटिंग टिप्स लिए जा सकते हैं.
पैरेंट्स को काउंसलिंग की ज़रूरत नहीं, यह धारणा ही ग़लत है. बच्चे को कोई समस्या है, तो पैरेंट्स को भी काउंसलिंग सेशन लेने चाहिए.
ग़लत काम करने पर उसे डांटते हैं, तो अच्छा काम करने पर ग़िफ़्ट भी दें.

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कैसे कम होंगी डिफिकल्टीज़?

पैरेंटिंग की डिफिकल्टीज़ के संदर्भ में सायकोथेरेपिस्ट चित्रा मुंशी कहती हैं-
दुनिया बदल गई, व़क़्त बदल गया, इसलिए पैरेंटिंग के तरी़के भी बदल जाएं, ऐसा मैं नहीं कहती. लेकिन पैरेंट्स के लिए यह ज़रूरी है कि वो ओपन ऐटिट्यूड रखें.
हर बच्चे का अलग टेंपरामेंट होता है, वो एक स्वभाव लेकर पैदा होता है, कुछ बच्चे तो पैदा ही होते हैं डिफिकल्ट टेंपरामेंट के साथ, जैसे- सोने का फिक्स टाइम नहीं होता या बहुत ज़्यादा ग़ुस्सेवाले या चिड़चिड़े होते हैं. इसकी वजह जेनेटिक भी हो सकती है, जिसे बदला नहीं जा सकता और जहां तक घर का वातावरण है, वो पैरेंट्स पर निर्भर करता है. लेकिन पैरेंट्स उसे बदलने के प्रति ज़्यादा गंभीर नहीं होते.
जन्म से लेकर 8-10 साल की उम्र तक बच्चा सेपरेशन और स्ट्रेंजर एंज़ाइटी से गुज़रता है. उसके मन में पैरेंट्स से दूर जाने का डर रहता है, इसीलिए पहली बार स्कूल जाते व़क़्त, स्कूल चेंज होने पर या वर्किंग मदर है, तो मां को ऑफ़िस जाते देख बच्चा रोता है. अनजाने लोगों के आगे वो स्ट्रेंजर एंज़ाइटी के कारण शर्माता है. इसलिए बच्चे पर किसी भी चीज़ के लिए दबाव न डालें.
बच्चे को अनुशासन सिखाने का तरीक़ा मारना-पीटना तो बिल्कुल नहीं है, क्योंकि ये फिज़िकल एब्यूज़ होगा. किसी भी तरह का उत्पीड़न बच्चे के विकास में बाधक हो सकता है.
बच्चों को उपेक्षित न महसूस कराएं. पैरेंट्स भी सुनने की आदत डालें और बच्चों की बातों को गंभीरता से लें.
सारे अधिकार अपने ही पास न रखकर बच्चों को भी कुछ निर्णय लेने की आज़ादी दें. इससे बच्चों को भी ज़िम्मेदारी का एहसास होगा.
बच्चों को छोटे चैलेंजेज़ लेने दें. यदि बच्चा रोज़ एक ही ग़लती करता है और आप उसे रोज़ समझाती हैं, फिर भी वो नहीं समझता तो एक दिन उसे अपनी भूल का ख़ामियाज़ा भुगतने दें.
किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चे यानी 12 से 19 वर्ष की उम्र में बच्चे सबसे ज़्यादा दुविधा में होते हैं. अपोज़िट सेक्स की तरफ़ भी वो आकर्षित होने लगते हैं और पैरेंट्स से ज़्यादा फ्रेंड्स की तरफ़ उनका झुकाव होने लगता है. ऐसे में पैरेंट्स यह न समझें कि बच्चों को उनकी ज़रूरत नहीं, बल्कि उस उम्र में तो उनकी ज़रूरत और बढ़ जाती है.
बच्चों की जासूसी न करें, उनके प्रति सेंसिटिव बनें और अगर पैरेंट्स को लगता है कि बच्चा ग़लत रास्ते पर जा रहा है, तो काउंसलर की मदद लें.
बच्चे को कम उम्र में एकांत में कंप्यूटर हैंडल न करने दें, वरना वह इंटरनेट आदि का ग़लत इस्तेमाल कर सकता है. बेहतर होगा कंप्यूटर किसी ऐसी जगह पर रखें, जहां बच्चा आपकी नज़र के सामने ही उस पर काम करे.
कम मार्क्स लाने पर बच्चों को कभी न डांटें, क्योंकि हर बच्चे की अलग क्षमताएं होती हैं. 95% लाना आपका लक्ष्य हो सकता है बच्चे का नहीं, अपनी चाहत उस पर न थोपें.
बच्चों के सामने स्वयं का उदाहरण रखें. आप चाहते हैं कि बच्चा सच बोले, ईमानदार और चरित्रवान बने, लेकिन क्या आप बच्चे के सामने यही उदाहरण रखते हैं? बच्चा आप पर तभी विश्‍वास करेगा, जब आप ईमानदार होंगे.
पैरेंट्स वर्कशॉप अटेंड करें, ख़ुद भी काउंसलर के पास जाएं, इससे भी आपकी डिफिकल्टीज़ कम होंगी और आप बच्चों के साथ बेहतर तरी़के से डील कर पाएंगे.

डिफिकल्टीज़ कम हो सकती हैं यदि-

बच्चों को सपोर्ट करें.
उन्हें स्पेस दें.
उनकी क्षमताएं समझें, उनकी तुलना दूसरे बच्चों से न करें.
उनकी कमज़ोरियां भी जानें.
कोई भी पऱफेक्ट नहीं है, इस बात को पैरेंट्स भी समझें.
बच्चों को ज़रूरत से ज़्यादा प्रेशराइज़ न करें.
हर बात के लिए उन्हें ही ज़िम्मेदार न ठहराएं.
दूसरों के सामने बच्चे की बुराई
हर समय उन पर नज़र न रखें.

ध्यान रखें-

आपके द्वारा दी गई आज़ादी को बच्चा हल्के में लेकर उसका फ़ायदा न उठाने लगे.
यदि रात में बच्चे के घर लौटने का व़क़्त आपने निर्धारित किया है, तो बच्चा उसे गंभीरता से ले.
बेटा हो या बेटी- दोनों के लिए समान नियम ही हों.
ओवर प्रोटेक्टिव न बनें.
कम उम्र के बच्चों को लैपटॉप या मोबाइल ग़िफ़्ट में न दें.
उन्हें ज़िम्मेदारी का एहसास करवाएं. अपने छोटे-मोटे काम उन्हें ख़ुद करने दें, जैसे- अपना रूम साफ़ रखने को कहें, अपना स्कूल बैग ख़ुद तैयार करने को कहें.

– गीता शर्मा

बाल मज़दूरी… कब तक और क्यों? (Child labor … how long and why?)

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अक्सर देखा है उन मासूम आंखों में सपनों को मरते हुए… रोज़ाना, हर दिन, हर पल… एक ख़्वाब को धीरे-धीरे दम तोड़ते हुए… अपने आस-पास ही रोज़ उन डूबते सपनों की सिसकियां हम सुनते हैं… कभी सिगनल पर नन्हें हाथों में फूल बेचते हुए… तो कभी कोई खिलौना, कोई क़िताब बेचते हुए ये बच्चे रोज़ अपनी रोटी का जुगाड़ करते नज़र आते हैं और हम इन्हें हिकारत की नज़र से देखकर मुंह मोड़ लेते हैं… इनका कुसूर स़िर्फ इतना है कि ये मजबूर हैं, क्योंकि ये बाल मज़दूर हैं.

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जी हां, बाल मज़दूर का अर्थ यूं तो हर देश, हर समाज, हर क़ानून अपनी तरह से लगाता है, लेकिन हमारी नज़र में हर वो बच्चा, जो अपना बचपन खोकर स़िर्फ रोटी के जुगाड़ में लगा रहता है, जो स्कूल नहीं जा सकता, जो सपने नहीं देख सकता और जो अपने हक़ के लिए लड़ नहीं सकता, बाल मज़दूर है. दुख की बात है कि भारत में बाल मज़दूरी विश्‍व में सबसे अधिक है.

क्यों होती है बाल मज़दूरी?

– ग़रीबी, अशिक्षा और पारिवारिक व सामाजिक असुरक्षा इसका सबसे बड़ा कारण है.

– शहरों में जिस तरह से घरेलू नौकर के रूप में बच्चों से काम करवाने का चलन बढ़ा है, वो चलन अब बेलगाम हो चुका है.

– कहने को तो चाइल्ड लेबर एक्ट है, लेकिन हम अपने आसपास ही देखते हैं कि छोटे-छोटे होटलों, ढाबों या गैराज में बच्चों से कितना काम करवाया जाता है, क्योंकि क़ानून में इस तरह के प्रावधान हैं कि इन जगहों पर बच्चों से आसानी से काम करवाते हुए भी क़ानून के शिकंजे से दूर रहा जा सकता है.

– यही नहीं, कई ऐसे काम हैं, जो बच्चों के लिए ख़तरनाक हैं और जहां बच्चों के काम करने पर पूरी तरह से पाबंदी है, लेकिन वहां भी ग़ैरक़ानूनी तरी़के से बच्चों से काम करवाया जाता है.

– इन जगहों पर अमानवीय हालातों में इन बच्चों से 14-16 घंटों तक लगातार काम करवाया जाता है. इसके अलावा घरों में भी जो बच्चे काम करते हैं उन पर भी कई तरह ज़्यादती होती हैं, जैसे- खाना न मिलना, पैसे न मिलना, हिंसक व्यवहार, यौन शोषण आदि. लेकिन फिर भी यह सिलसिला थम नहीं रहा.

– दरअसल, यह एक आर्थिक व सामाजिक समस्या है, जिसका निवारण स़िर्फ क़ानून नहीं कर सकता.

– 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम करवाना क़ानूनन अपराध है, लेकिन फिर भी हम बहुत ही कम उम्र के बच्चों को अपने आसपास काम करते देखते हैं.

– बच्चों के रूप में सस्ते लेबर मिल जाते हैं.

– बच्चों का शोषण आसान होता है.

– उन्हें डराया-धमकाया जा सकता है.

– वो विरोध नहीं कर पाते. इन्हीं सब वजहों से बाल मज़दूरी ख़त्म नहीं हो रही.

– ग़रीब व अशिक्षित लोग ख़ुद मजबूर होते हैं. वो बच्चों को स्कूल भेजना अफॉर्ड नहीं कर सकते, उनके लिए जो बच्चा दिनभर कुछ काम करके थोड़े-से पैसे घर ले आए, वही काम का है.

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एक्ट का इफेक्ट?

क्या कहता है क़ानून? क्या हैं प्रावधान और कहां कमियां रह गई हैं… इन तमाम बातों की जानकारी दे रहे हैं बॉम्बे हाइकोर्ट के सीनियर लॉयर एडवोकेट योगेश धनेश भारद्वाज.

– चाइल्ड लेबर एक्ट (प्रॉहिबिशन एंड रेग्युलेशन) 1986 के तहत 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चे ख़तरनाक माने जानेवाले कामों व जगहों में काम नहीं कर सकते. ये ख़तरनाक काम कौन-कौन से हैं, इसकी लिस्ट में समय-समय पर संशोधन व विस्तार वर्ष 2006 व वर्ष 2008 में हुआ है.

– इससे पहले द फैक्टरीज़ एक्ट 1948 में 14 साल से कम आयु के बच्चों को किसी भी फैक्ट्री में काम करने से मनाही है. इस क़ानून में ये भी नियम बनाए गए हैं कि कौन, किस तरह से और कितने समय के लिए प्री एडल्ट्स (15-18 वर्ष की आयुवाले) को फैक्ट्री में काम करवा सकता है.

– द माइन्स एक्ट 1952 भी महत्वपूर्ण है. यह क़ानून 18 वर्ष की कम आयु के बच्चों को खदानों में काम करने से प्रतिबंधित करता है.

– द जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन) ऑफ चिल्ड्रन एक्ट 2000 के तहत बच्चों का ख़तरनाक कामों में संलिप्त होना अपराध माना जाएगा. इसमें उन लोगों के लिए सज़ा का भी प्रावधान है, जो बच्चों को इन कामों के लिए मजबूर करते हैं या बच्चों से बंधुआ मज़दूरी करवाते हैं.

– द राइट ऑफ चिल्ड्रन टु फ्री एंड कंपल्सरी एजुकेशन एक्ट 2009 में 6 से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को शिक्षा के अधिकार का आदेश दिया है. इसके अलावा इसमें यह भी आदेश है कि सभी प्राइवेट स्कूलों में 25% सीटें ग़रीब तबके व शारीरिक रूप से असक्षम बच्चों के लिए रखी जाएंगी.

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कितना कमज़ोर है क़ानून?
क़ानून भले ही बन जाते हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण होता है उन्हें लागू करवाना. विभिन्न विभागों में आपसी समन्वय की कमी से क़ानून लागू नहीं हो पाते. दूसरी तरफ़ बच्चों के पैरेंट्स ही ख़ुद नहीं चाहते कि उनके बच्चे का काम छूटे, क्योंकि उनकी रोज़ी-रोटी का ज़रिया कम हो जाएगा. चूंकि क़ानून में प्रावधान है कि बच्चे परिवार के काम (खेती या अन्य व्यवसाय आदि) में हाथ बंटा सकते हैं, तो इसका फ़ायदा आराम से उठाया जाता है, जिसके चलते बाल मज़दूरी ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही.
इसके अलावा बाल मज़दूरी से रिहा हुए बच्चों के पुनर्वसन को लेकर भी अब तक काफ़ी उदासीनता बनी रही, जिस वजह से समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा.
हालांकि अब सरकार मन बना रही है कि 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों पर पूरी तरह से काम करने पर रोक लगा दी जाए, तो इस संदर्भ में एडवोकेट योगेश कहते हैं कि जहां तक क़ानून में संशोधन की बात है, तो इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस बदलाव या संशोधन से वाकई कोई बदलाव आएगा? यहां भी फैमिली बिज़नेस या एंटरटेनमेंट से जुड़े कामों को करने की छूट तो मिल ही रही है, जिस वजह से बच्चों को बचाने और पढ़ाने की मुहिम प्रभावित ज़रूरी होगी.
मेरा स़िर्फ यही मानना है कि जहां तक बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों की बात हो, वहां कोई समझौता या शर्त नहीं होनी चाहिए.
हर बच्चे को शिक्षा का और अपने पैरेंट्स के साथ रहने का पूरा अधिकार है और हमें हर शर्त पर उनके इन अधिकारों की रक्षा करनी ही चाहिए.
बावजूद इसके नए संशोधित क़ानून में कई सकारात्मक बातें भी हैं, जैसे अब तक तो 1986 के क़ानून के तहत ख़तरनाक जगहों पर काम करने पर स़िर्फ 14 साल से कम आयु के बच्चों पर ही रोक थी, लेकिन अब 15-18 साल की उम्र के बच्चों को भी इस श्रेणी में लाया गया है. यह बहुत ही अच्छा संकेत है. इसके अलावा और भी अच्छा प्रस्ताव है कि अब राज्य सरकार बाल मज़दूरी से बचाए गए बच्चों के पुनर्वसन के लिए अतिरिक्त निधि (चाइल्ड एंड एडॉलसेंट लेबर रिहैबिलिटेशन फंड) भी प्रदान करेगी.

बाल मज़दूरी का प्रभाव

जो बच्चे इसे झेलते हैं, उन पर इसका शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक प्रभाव पड़ता ही है.

– इन बच्चों को सामान्य बचपन नहीं मिलता.

– कुपोषण का शिकार होते हैं.

– अमानवीय व गंदे माहौल, जैसे- पटाखा बनाने के कारखानों, कोयला खदानें आदि में काम करने पर इनका स्वास्थ्य ख़राब होता है.

– कमज़ोरी के कारण ये जल्दी बीमार पड़ते हैं.

– ज़री के काम, डायमंड इंडस्ट्री, सिल्क इंडस्ट्री व कार्पेट बनाने के कामों में भी अधिकतर बच्चे ही जुटे रहते हैं, जहां इनसे लगातार कई घंटों तक काम करवाया जाता है, जिससे इनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है.

– घरेलू काम करनेवाले बच्चों की हालत भी कोई बहुत अच्छी नहीं होती. उनकी उम्र व क्षमता से अधिक उनसे काम करवाया जाता है.

– मानसिक रूप से भी यह सामान्य बच्चों की तरह नहीं रह पाते. अशिक्षा की वजह से इनका पूरा भविष्य ही अंधकारमय हो जाता है.

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एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में काम कर रहे बच्चे क्या बाल मज़दूर माने जाएंगे?

इस विषय पर काफ़ी बहस पहले ही की जा चुकी है. कुछ लोगों का यह मानना है कि उन पर रोक लगाने से आप उनके टैलेंट को भी दबा देंगे, क्योंकि जिन बच्चों में हुनर है, उसे बचपन से ही बढ़ावा न दिया गया, तो यह भी उनके साथ अन्याय ही होगा.
क़ानून में संशोधन के प्रयास पिछले काफ़ी समय से किए जा रहे हैं, लेकिन ये बिल पेंडिंग ही रहा, लेकिन अब इसे लागू करने का प्रयास फिर से हो रहा है. इसमें एंटरटेनमेंट से जुड़े क्षेत्र के बच्चों की वर्किंग कंडिशन और टाइम को भी नियंत्रित व बेहतर बनाने पर ज़ोर दिया गया है, जिससे बच्चों पर बोझ भी न पड़े और उनका टैलेंट भी प्रभावित न हो.

– गीता शर्मा

लें सेक्सुअल लाइफ का हेल्थ टेस्ट (Health test for sexual life)

Health test for sexual life

जिस तरह हेल्दी बने रहने के लिए हम समय-समय पर ज़रूरी हेल्थ चेकअप्स (Health test for sexual life) कराते हैं, ठीक उसी तरह अपनी सेक्सुअल लाइफ को भी हेल्दी बनाए रखने के लिए हमें कुछ हेल्थ टेस्ट्स कराने चाहिए. इन टेस्ट्स के बारे में अधिक जानकारी के लिए हमने बात की सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. राजन भोसले (एमडी, ऑनरेबल प्रोफेसर एंड एचओडी, डिपार्टमेंट ऑफ सेक्सुअल मेडिसिन, केईएम हॉस्पिटल, मुंबई) से.

Health test for sexual life

सेक्सुअल हेल्थ चेकअप्स

हेल्दी सेक्स लाइफ के लिए आपका सेक्सुअली हेल्दी रहना बहुत ज़रूरी है. अगर आप सेक्सुअली एक्टिव नहीं हैं या किसी रिलेशनशिप में भी नहीं हैं, फिर भी ये हेल्थ चेकअप्स आपके लिए उतने ही ज़रूरी हैं.

कब कराएं चेकअप?

अगर आप सेक्सुअली एक्टिव हैं, तो आपको नियमित समय पर सेक्सुअल हेल्थ चेकअप्स कराते रहना चाहिए. अपनी लाइफस्टाइल और सेक्सुअल एक्टिविटी के आधार पर तय करें कि आपको कितने अंतराल पर टेस्ट कराने चाहिए. अगर इसमें से कोई भी स्थिति हो, तो सेक्सुअल हेल्थ टेस्ट कराएं-

– अगर आपको आशंका है कि आपको सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन (एसटीआई) हो सकता है.

– अगर आपने अनसेफ सेक्स किया हो और अच्छा फील न कर रहे हों.

– सेक्स के दौरान कंडोम फट या फिसल गया हो.

– आपके एक से अधिक पार्टनर से संबंध हैं.

– आपके पार्टनर के एक से अधिक पार्टनर हैं.

– आपको शक है कि बिना स्टरलाइज़ किया हुआ इंजेक्शन आपको लगाया गया है.

सेक्सुअल हेल्थ टेस्ट्स दो तरह के होते हैं-

1. लैंगिग क्षमता या क़ाबिलीयत को जाननेवाले टेस्ट

2. यौन संक्रमण या यौन रोगों की जांच के लिए टेस्ट

डॉ. राजन भोसले के अनुसार, अगर आपको कोई सेक्सुअल प्रॉब्लम है, गुप्तांगों में दर्द है या फिर आपको लगता है कि शायद आप सेक्सुअली फिट नहीं हैं, तो ये टेस्ट्स ज़रूर कराएं.

लैंगिग क्षमता परखनेवाले टेस्ट्स- महिलाओं-पुरुषों दोनों के लिए

सीरम टेस्टोस्टेरॉन लेवल: टेस्टोस्टेरॉन लेवल टेस्ट के ज़रिए ब्लड में मौजूद टेस्टोस्टेरॉन लेवल के बारे में जानकारी मिलती है. टेस्टोस्टेरॉन सेक्स हार्मोन है, जो महिलाओं और पुरुषों दोनों में होता है.

एसएचबीजी: सेक्स हार्मोन बाइंडिंग ग्लोबुलिन के ज़रिए जहां पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन की कमी की जांच की जाती है, वहीं महिलाओं में इसकी अधिकता के बारे में पता लगाया जाता है. इसकी कमी और अधिकता दोनों ही आपकी सेक्सुअल लाइफ के लिए हेल्दी नहीं.
सीरम प्रोलैक्टिन: यह एक तरह का ब्लड टेस्ट है, जिससे ब्लड में प्रोलैक्टिन के लेवल की जांच की जाती है. महिलाओं और पुरुषों दोनों के रिप्रोडक्टिव हेल्थ में यह अहम् भूमिका निभाता है. इसलिए बेवजह के सिरदर्द और सेक्सुअल ड्राइव में कमी की शिकायत पर डॉक्टर आपको इसकी सलाह दे सकते हैं.

एफएसएच टेस्ट: फॉलिकल स्टिमुलेटिंग हार्मोन टेस्ट महिलाओं और पुरुषों के रिप्रोडक्टिव सिस्टम में अहम् भूमिका निभाता है. महिलाओं में अनियमित पीरियड्स और इंफर्टिलिटी प्रॉब्लम्स और पुरुषों में लो स्पर्म काउंट और टेस्टिकुलर डिस्फंक्शन के लिए यह टेस्ट कराया जाता है.

एलएच टेस्ट: ल्युटिनाइंज़िंग हार्मोन टेस्ट ब्लड या यूरिन के ज़रिए किया जाता है. महिलाओं व पुरुषों के रिप्रोडक्टिव सिस्टम की जांच और ओवरी से निकलनेवाले एग्स का विश्‍लेषण किया जाता है. अगर कोई महिला कंसीव नहीं कर पाती है, तो पति-पत्नी दोनों को यह टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है.

टी3, टी4, टीएसएच: थायरॉइड की जांच के लिए ये टेस्ट्स कराए जाते हैं. थायरॉइड रिप्रोडक्टिव सिस्टम को बाधित करता है, जिससे महिलाएं कंसीव नहीं कर पातीं. बहुत से मामलों में महिलाओं को थायरॉइड होता है, पर उन्हें इसकी जानकारी नहीं होती, जिसके कारण वो कंसीव नहीं कर पातीं. ऐसे में थायरॉइड लेवल की जानकारी किसी के लिए भी बहुत ज़रूरी हो जाती है.

ब्लड शुगर: ब्लड शुगर जहां आपकी कामोत्तेजना में कमी लाता है, वहीं सेक्स के प्रति रुचि कम होने लगती है. ब्लड शुगर पुरुषों व महिलाओं दोनों में सेक्सुअल डिस्फंक्शन का कारण बनता है. ऐसे में अगर आपको लगता है कि आपकी कामोत्तेजना में कमी आ गई है, तो डॉक्टर की सलाह पर अपना ब्लड शुगर ज़रूर चेक करें.

लिपिड प्रोफाइल: कोलेस्ट्रॉल लेवल महिलाओं और पुरुषों में सेक्सुअल फंक्शन्स को प्रभावित करता है. कोलेस्ट्रॉल जितना आपके हार्ट के लिए नुक़सानदायक है, उतना ही आपकी सेक्सुअल लाइफ के लिए भी. ऐसे में अपनी सेक्सुअल लाइफ को हेल्दी बनाए रखने के लिए नियमित समय पर लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराना ज़रूरी हो जाता है.

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पुरुषों के लिए

पेनाइल डॉपलर स्टडी: गुप्तांग में रक्तसंचार के बारे में जानने के लिए यह टेस्ट किया जाता है. इस टेस्ट की मदद से पुरुषों में सबसे आम समस्या इरेक्टाइल डिस्फंक्शन के बारे में पता चलता है.

टेस्टिकल्स चेकअप: समय-समय पर पुरुषों को अपने टेस्टिकल्स की जांच कराते रहना चाहिए. इससे किसी भी तरह की असामान्य गांठ या सूजन होने पर आपको तुरंत पता चल जाएगा. यह इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि यह टेस्टिकल कैंसर का कारण भी हो सकता है. अगर आपको कुछ भी असामान्य लगे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

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महिलाओं के लिए

एस्ट्रोजेन व प्रोजेस्टेरॉन: ये दोनों ही हार्मोंस महिलाओं के लिए बहुत ज़रूरी होते हैं. महिलाओं की कार्यक्षमता को बेहतर बनाए रखने के साथ-साथ उनकी सेक्सुअल लाइफ को हेल्दी बनाने में ये अहम् भूमिका निभाते हैं.

यूटरस और ओवरीज़ की सोनोग्राफी: सोेनोग्राफी के ज़रिए यूटरस और ओवरीज़ की सही तरी़के से जांच हो पाती है, जिससे उनमें होनेवाली किसी भी तरह की समस्या की जांच की जा सकती है. महिलाओें की सेक्सुअल हेल्थ के लिए सोनोग्राफी के ज़रिए इनकी नियमित रूप से जांच ज़रूरी है.

गुप्तांगों की जांच: अगर आपको लगता है कि आपकी सेक्सुअल लाइफ में समस्या आ रही है, तो किसी अच्छे गायनाकोलॉजिस्ट से मिलकर फिज़िकल एक्ज़ामिनेशन करा लें.

Health test for sexual life

यौन संक्रमण या यौन रोगों की जांच के लिए टेस्ट

एसटीआई स्क्रीनिंग: यह एक ब्लड टेस्ट है, जिसके ज़रिए सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन्स की जांच होती है. अगर आपमें भी निम्नलिखित लक्षण नज़र आते हैं, तो एसटीआई स्क्रीनिंग ज़रूर कराएं. अगर आपके गुप्तांग से डिस्चार्ज हो रहा हो, पेशाब करते समय दर्द हो, गुप्तांग में फुंसी या छाले हों, खुजली हो, सेक्स के दौरान दर्द हो, तो ये टेस्ट ज़रूर कराएं.

एचआईवी1 और एचआईवी2: जैसा कि सभी को पता है कि एड्स के लक्षण दिखाई नहीं देते और सालों बाद जब वे हमारी रोगप्रतिरोधक क्षमता को कमज़ोर कर देते हैं, तब इनके बारे में पता चलता है. ऐसे में इनके प्रति सतर्कता ही आपको इनसे बचा सकती है. एचआईवी टेस्ट्स कराना आपके लिए ही फ़ायदेमंद होगा.

हर्पिस: यह एक आम सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ है. आमतौर पर इसके लक्षण दिखाई ही नहीं देते, जिससे व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि उसे हर्पिस है. संक्रामक होने के कारण इसकी जल्द से जल्द जांच ज़रूरी हो जाती है. अगर आपके गुप्तांगों में घाव हो, तो डॉक्टर को इस बारे में बताएं, वो एचएसवी1 और एचएसवी2 टेस्ट की सलाह देंगे.

वीडीआरएल: सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन का पता लगाने के लिए यह टेस्ट किया जाता है.

पुरुषों के लिए
प्रोस्टेट स्क्रीनिंग: प्रोस्टेट कैंसर की जांच के लिए प्रोस्टेट स्क्रीनिंग बहुत ज़रूरी है. उम्र बढ़ने के साथ ही प्रोस्टेट कैंसर की संभावना भी बढ़ने लगती है, ऐसे में यह टेस्ट ज़रूरी हो जाता है. फैमिली हिस्ट्रीवाले पुरुषों को ख़ास ध्यान रखना चाहिए. अगर आपको यूरिन पास करने में तकलीफ़ हो, यूरिन या सिमेन में ब्लड आए, तो तुरंत अपने डॉक्टर से सलाह लें.

महिलाओं के लिए
सर्वाइकल स्मीयर टेस्ट: स्मीयर टेस्ट को पैप टेस्ट भी कहते हैं. सर्विक्स यानी गर्भाशय ग्रीवा कितना हेल्दी है जानने के लिए ही यह टेस्ट किया जाता है. यह टेस्ट कैंसर की जांच के लिए नहीं है, पर इसकी मदद से कैंसर को टाला जा सकता है. 25-60 साल की सभी महिलाओं को हर 3-5 साल में यह टेस्ट कराना चाहिए.

ब्रेस्ट्स की जांच: ब्रेस्ट कैंसर से बचने के लिए नियमित रूप से ब्रेस्ट्स का सेल्फ एक्ज़ामिनेशन बहुत ज़रूरी है. हाल ही में हुई स्टडीज़ में यह बात पता चली है कि ब्रेस्ट कैंसर शहरी महिलाओं में मौत का प्रमुख कारण बन गया है. ऐसे में ब्रेस्ट्स की जांच बहुत ज़रूरी हो जाती है. ब्रेस्ट्स में सूजन या गांठ का महसूस होना, ब्रेस्ट्स के आकार व रंगत में बदलाव, निप्पल्स का अंदर की तरफ़ घुसा हुआ होना ब्रेस्ट कैंसर के लक्षण हो सकते हैं. हर महीने पीरियड्स के बाद सेल्फ ब्रेस्ट एक्ज़ामिनेशन ज़रूर करें.

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सेक्सुअल हेल्थ टिप्स

– 40 की उम्र के बाद सभी महिलाओं को सालाना मैमोग्राफी करानी चाहिए.

– 40 की उम्र के बाद सभी पुरुषों को सालाना प्रोस्टेट स्क्रीनिंग नियमित रूप से करानी चाहिए.

– महिलाओं को किसी भी तरह का डिस्चार्ज होने पर तुरंत गायनाकोलॉजिस्ट से मिलना चाहिए.

– किसी भी तरह के इंफेक्शन से बचने के लिए सेक्सुअल हाइजीन का ध्यान रखें.

– सेक्सुअल हेल्थ के लिए लो फैट व हाई फाइबर डायट लें.

– डायबिटीज़ और ब्लडप्रेशर को कंट्रोल में रखने के लिए खाने में शक्कर और नमक की मात्रा कम रखें.

– सेक्सुअल फिटनेस के लिए कंप्लीट बॉडी फिटनेस बहुत ज़रूरी है, इसलिए हफ़्ते में 5 दिन 40 मिनट तक ब्रिस्क वॉक (तेज़ चलना) करें.

– अनीता सिंह

रिश्तों में ज़रूरत से ज़्यादा स्पेस कहीं कर न दे अपनों को दूर…(Too much space in relationships can be dangerous)

Space in relationships

कभी हाथों में थामे हाथ, तो कभी लबों पर बस तेरी ही बात… धीरे-धीरे ख़्वाब छूटे… लबों पर बसे जज़्बात छूटे… दिल की हसरतें बाकी तो हैं अभी, पर न जाने किस मोड़ पर कुछ एहसास छूटे… न तुमको ख़बर हुई, न हमें पता चला… कब साथ चलते-चलते हमारे हाथ छूटे…

Space in relationships

अक्सर ऐसा होता है कि हम अपने रिश्ते में समझ ही नहीं पाते कि कब और कैसे इतनी दूरियां (Space in relationships) आ गईं, जबकि पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यही लगता है कि सब कुछ तो ठीक ही था… जी हां, ऐसा इसलिए होता है कि हम सो कॉल्ड स्पेस के नाम पर कुछ ज़्यादा ही दूरियां बना लेते हैं और कब ये दूरियां रिश्तों को ख़त्म करने लगती हैं, हमें एहसास ही नहीं होता.

अति किसी भी चीज़ की सही नहीं: चाहे कोई अच्छी ही चीज़ क्यों न हो, पर ओवरडोज़ किसी भी चीज़ का सही नहीं है.

– यह ठीक है कि आपको बार-बार पार्टनर को टोकना या उसके किसी भी काम में दख़ल देना पसंद नहीं, लेकिन इसका यह भी अर्थ नहीं कि बिल्कुल ही न टोकें.

– हो सकता है आपके न टोकने का कोई ग़लत मतलब निकाल ले. इससे न स़िर्फ रिश्ते में दूरियां बढ़ेंगी, बल्कि नीरसता भी आएगी.

– पार्टनर को लगेगा कि आपको तो उनकी किसी भी बात से कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता और दूसरी तरफ़ यह भी हो सकता है कि वो ग़लत राह पर भी चले जाएं.

विश्‍वास और अंधविश्‍वास के बीच का फ़र्क़ समझें: आप एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, यह अच्छी बात है. लेकिन चेक कर लें कि कहीं यह विश्‍वास अंधविश्‍वास में तो तब्दील नहीं हो गया?

– जी हां, अक्सर ऐसा ही होता है, जब हम आंख मूंदकर भरोसा करते हैं, तो भरोसा टूट भी सकता है. और तब बहुत अधिक तकलीफ़ होती है और इस बात का मलाल भी कि क्यों नहीं थोड़ी-सी सतर्कता व सावधानी बरती.

स्पेस का मतलब लापरवाह होना नहीं: हर बात पर आजकल यह जुमला चिपका दिया जाता है कि हर रिश्ते में स्पेस ज़रूरी है, लेकिन स्पेस कितना और किस हद तक, इसका दायरा भी तो हमें ही तय करना होगा.

– स्पेस के नाम पर आप अपने रिश्ते के प्रति इतने लापरवाह न हो जाएं कि एक-दूसरे की तरफ़ ध्यान ही न दें और धीरे-धीरे रिश्ते में से रोमांस ही गायब हो जाए.

कम्यूनिकेशन न के बराबर ही तो नहीं रह गया: यह सही है कि दिनभर जासूसों की तरह पार्टनर की ख़बर या उस पर नज़र रखना ठीक नहीं, लेकिन ख़बर ही न रखना ख़तरे की निशानी है.

– ऐसे में कम्यूनिकेशन गैप इस हद तक बढ़ जाता है कि यदि आप कुछ सवाल करते भी हैं, तो पार्टनर को वो दख़लअंदाज़ी लगने लगता है, क्योंकि उसको आदत ही नहीं इसकी.

स्पेस का सही अर्थ समझें: स्पेस का मतलब रिश्ते के प्रति बेपरवाह हो जाना नहीं होता.

– स्पेस(Space in relationships) उतना ही होना चाहिए, जितना रिश्ते को सांस लेने के लिए ज़रूरी हो. उसे खुली हवा में छोड़ देंगे, तो वो बेलगाम पतंग की तरह छूटता ही जाएगा.

– आजकल अक्सर कपल्स अपने-अपने फोन्स पर, विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बिज़ी रहते हैं और दोनों ही पार्टनर्स को इसमें दिलचस्पी कम ही रहती है कि उसका पार्टनर कहां किसके साथ बिज़ी है.

– फोन नहीं, तो लैपटॉप्स या टीवी देखने में लोग अधिक समय बिताना पसंद करते हैं, बजाय एक-दूसरे के साथ के.

– डिजिटल वर्ल्ड ने भी हमें स्पेस के नाम पर बहुत ज़्यादा ओपन स्पेस दे दिया है, जहां हम अपने रिश्तों से दूर होते जाते हैं और नए-नए रिश्तों के जाल में फंसते चले जाते हैं.

– बेहतर होगा इससे बचें या कम से कम इस पर नज़र रखें.

छूट के नाम पर असंतुलित तो नहीं हो गया रिश्ता: आपको अंदाज़ा भी नहीं हो पाता कि कब आपका वो रिश्ता असंतुलित हो गया, जिसे आप अब तक परफेक्ट समझ रहे थे.

– इतना स्पेस दिया कि आप दोनों के बीच अब स़िर्फ स्पेस ही रह गया. बैलेंस या संतुलन बेहद ज़रूरी है हर रिश्ते के लिए.

– पार्टनर का डेली रूटीन, उसके फ्रेंड्स, वो किससे बात करता है, किसके मेल्स उसे आते हैं आदि बातों की कम से कम हल्की-सी जानकारी ज़रूर रखें.

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क्या करें, क्या न करें?

– एक-दूसरे पर भरोसा करें, लेकिन आंखें न मूंद लें.

– इतने भी बेपरवाह न हो जाएं कि रिश्ते से रोमांस गायब होने लगे.

– रिश्ते में गर्माहट बनाए रखने के लिए रोमांटिक बातें करें, डेट्स प्लान करें.

– निजी पलों को जीने के लिए व़क्त ज़रूर निकालें. एक-दूसरे की कंपनी एंजॉय करें और कभी-कभी सरप्राइज़ भी दें.

– ऐसा न हो कि आप दोनों ही अपने-अपने फ्रेंड्स सर्कल के साथ ही पार्टी करते रह जाएं और यह भी याद न रहे कि आख़िरी बार आप दोनों ने साथ में व़क्त कब गुज़ारा था.

– अगर आपको लग रहा है कि आपका रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा, तो उसके कारणों पर आपस में बैठकर चर्चा करें और समाधान भी निकालें.

– थोड़ी रोक-टोक और दख़लअंदाज़ी रिश्तों में जीवंतता बनाए रखती है. इसे रिश्तों से गायब न होने दें.

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हर रिश्ते पर यही नियम लागू होता है

– चाहे पैरेंट्स हों, भाई-बहन, दोस्ती या अन्य कोई भी रिश्ता, ज़रूरत से ज़्यादा स्पेस आपके बीच दूरियां ही बढ़ाएगी.

– अगर पैरेंट्स बच्चों को ज़रूरत से ज़्यादा स्पेस देते हैं, तो हो सकता है वो भटक जाएं.

– बच्चों को अनुशासन में रखना उनकी ज़िम्मेदारी है, कुछ नियम और निर्देशों का पालन हर रिश्ते में ज़रूरी होता ही है, वरना प्रतिबद्धता और रिश्ते में भरोसा रह ही नहीं जाता.

– लेकिन आज की जनरेशन इसी अनुशासन को निजी जीवन में दख़लअंदाज़ी मानती है, जिससे सीमा रेखा तय करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है.

– एक व़क्त था, जब भाई-बहन या सिबलिंग्स आपस में बहुत-से सीक्रेट्स शेयर करते थे, लेकिन अब ‘स्पेस’ के नाम पर सब कुछ सीक्रेट ही रह जाता है और अगर किसी से कुछ पूछो, तो जवाब यही मिलता है कि ये हमारी पर्सनल लाइफ है, आख़िर हमें भी तो स्पेस चाहिए. 

– इसी चक्कर में एक व़क्त ऐसा आता है, जब स़िर्फ स्पेस ही रह जाता है. बेहतर होगा, व़क्त रहते इस स्थिति को समझें और अपने रिश्ते को सेफ करें.

– गीता शर्मा

सेक्सुअल प्रॉब्लम्स के घरेलू नुस्ख़े (Home Remedies For Sex Problems)

Home Remedies For Sex Problems

Aditya-Shraddha

इन दिनों सेक्स संबंधी समस्याएं काफ़ी बढ़ रही हैं. ऐसे में इन होम रेमेडीज़ से न केवल सेक्सुअल प्रॉब्लम्स (Home Remedies For Sex Problems) को दूर किया जा सकता है, बल्कि सेक्सुअल लाइफ भी इम्प्रूव की जा सकती है. इसके बारे में पारस ब्लिस हॉस्पिटल की कंस्लटेंट गायनाकोलॉजिस्ट
डॉ. प्रीति रहेजा ने उपयोगी जानकारियां दीं.

स्वप्नदोष (नाइट फॉल)

– जिन लोगों को अधिक स्वप्नदोष की समस्या है, वे हर रोज़ आंवले का मुरब्बा खाएं.

– लहसुन की दो कली दरदरा कूटकर निगल जाएं. फिर थोड़ी देर बाद गाजर का जूस पीएं.

– काली तुलसी की 10-12 पत्तियां पानी के साथ लें.

– तुलसी की जड़ के टुकड़े को पीसकर पानी के साथ लें. यदि जड़ न ले सकें, तो 2 चम्मच तुलसी का बीज शाम के समय मेें खाएं.

– आधा चम्मच मुलहठी का चूर्ण और एक चम्मच आक की छाल का चूर्ण दूध के साथ लें.

– एक लीटर पानी में त्रिफला चूर्ण रातभर भिगोकर रखें. सुबह छानकर पीएं.

– यदि हर रोज़ नीम की पत्तियां ख़ूब चबाकर खाएं, तो नाइट फॉल की समस्या दूर हो जाती है.

शीघ्रपतन (इजैक्युलेशन)

– आधा-आधा चम्मच शहद, मिश्री व स़फेद प्याज़ का रस मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें.

– रात को सोते समय 1 चम्मच त्रिफला का चूर्ण 5 मुनक्कों के साथ लें और ऊपर से ठंडा पानी पीएं.

– सुबह खाली पेट 2 छुहारे ख़ूब चबाकर दो हफ़्ते तक खाएं. फिर तीसरे हफ़्ते 3 छुहारे और चौथे हफ़्ते 4 छुहारे रोज़ खाएं. इसके साथ ही रात को सोते समय दो हफ़्ते तक 2 छुहारे, फिर तीसरे व चौथे हफ़्ते से तीन महीने तक 4 छुहारे 250 मि.ली. दूध में उबालकर गुठली निकालकर ख़ूब चबा-चबाकर खाएं और ऊपर से दूध पीएं.

– 100-100 ग्राम अश्‍वगंधा, बिदारीकंद व स़फेद मूसली को लेकर बारीक़ चूर्ण बनाकर रख लें. 5 ग्राम इस चूर्ण को सुबह-शाम दूध के साथ लें.

– आधा किलो इमली के बीज को 3 दिन तक पानी में भिगोकर रखें. फिर छिलके निकालकर स़फेद बीजों को खरल में पीस लें और इसमें आधा किलो मिश्री मिलाकर कांच के बर्तन में रख दें. इसे सुबह-शाम आधा चम्मच दूध के साथ लें.

नपुंसकता (इम्पोटेंसी)

– जायफल को घिसकर दूध में मिलाकर 3 दिन तक पीएं.

– 2 चम्मच प्याज़ के रस में 1 चम्मच शुद्ध घी मिलाकर सुबह के समय 3-4 हफ़्ते तक लें.

– 10-10 ग्राम स़फेद मूसली, अश्‍वगंधा चूर्ण, तालमखाना व कौंच बीज चूर्ण- सभी को मिलाकर रख लें. इसे 5 ग्राम की मात्रा में ठंडे दूध के साथ लें.

– 25 ग्राम सिंघाड़े का आटा, 50 ग्राम शक्कर, 15 ग्राम घी व पाव लीटर दूध लेकर हलवा बनाकर खाएं.

– काले तिल व गुड़ का लड्डू बनाकर नियमित रूप से खाएं.

– 6-6 ग्राम तालमखाना, गोखरू व उटंगन के बीज के चूर्ण को आधा लीटर दूध में पकाएं. जब पानी आधा रह जाए, तब आंच पर से उतारकर ठंडा कर पीएं. इसका 21 दिनों तक सेवन करें.

– उड़द की दाल को भिगोकर पीस लें. फिर इसे दही के साथ गूंधकर वड़े बनाकर फ्राई करके खाएं.

बांझपन (इंफर्टिलिटी)

– सुबह के समय 5 कली लहसुन चबाकर ऊपर से दूध पीएं.

– माहवारी के समय तुलसी के बीज चबाने से या पानी में पीसकर लेने या काढ़ा बनाकर सेवन करने से कंसीव होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.

– 1 कप गुनगुने पानी में 1 चम्मच दालचीनी का चूर्ण मिलाकर 1 महीने तक दिन में एक बार रोज़ाना लें. साथ ही अपने भोजन-नाश्ता में भी दालचीनी चूर्ण मिलाकर खाएं.

– अनार के बीज व छाल को बराबर मात्रा में मिलाकर बारीक़ चूर्ण बनाकर एक एयर टाइट जार में रख लें. कुछ हफ़्तों तक इस मिश्रण को आधा चम्मच दिन में दो बार गुनगुने पानी से लें. साथ ही ताज़ा अनार का फल व रस भी ले सकते हैं.

– 50 ग्राम गुलकंद में 20 ग्राम सौंफ मिलाकर चबाकर खाएं और एक ग्लास दूध पीएं. इसका नियमित रूप से सेवन करने से इंफर्टिलिटी की समस्या दूर होती है.

– पीरियड्स के बाद एक हफ़्ते तक 2 ग्राम नागकेसर के चूर्ण को दूध के साथ लें.

– महिलाएं शतावरी चूर्ण को घी-दूध मिलाकर लें. इससेे गर्भाशय की सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी और वे कंसीव भी कर सकेंगी.

– प्रजनन क्षमता को बढ़ाने के लिए योग-प्राणायाम की मदद भी ले सकते हैं, जैसे- भ्रामरी प्राणायाम, योग निद्रा, हस्तपादासन, जानु शीर्षासन, पश्‍चिमोत्तासन, विपरीतकरणी, शोधन प्राणायाम आदि.

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सेक्स लाइफ को इम्प्रूव करने के लिए

– 100 मि.ली. पेठे के रस में शक्कर मिलाकर सुबह-शाम पीएं.

– 2-4 सूखे अंजीर दूध में पकाकर खाएं और ऊपर से दूध पीएं.

– दूध में 10 ग्राम गोखरू का चूर्ण व 15 ग्राम काला तिल पकाकर पीएं.

– रिसर्च के अनुसार, हर रोज़ अनार के जूस का सेवन वियाग्रा की तरह काम करता है.

– सूर्यास्त से पहले बरगद के पत्ते तोड़कर उसमें से निकलनेवाले दूध की 10-12 बूंदें बताशे पर रखकर खाएं.

– एक चम्मच शहद में एक चम्मच हल्दी पाउडर मिलाकर हर रोज़ सुबह खाली पेट लें.

– 2 ग्राम इलायची के दानों का चूर्ण, 1 ग्राम जावित्री का चूर्ण, 5 बादाम व 10 ग्राम मिश्री लें. बादाम को रातभर भिगोकर सुबह पीसकर पेस्ट बना लें. फिर इसमें अन्य सामग्री व 2 चम्मच मक्खन मिला लें. हर रोज़ सुबह नियमित रूप से लें.

– रेषा गुप्ता

होम रेमेडीज़ फॉर ब्यूटी

एक ख़्वाब, मोती-सा शफ्फ़ाफ़… एक ख़्याल तेरा, चांद-सा बेदाग़… महकता चंदन, तेरा बदन…
आफ़ताब-सा रौशन तेरा तन… फ़रिश्ते भी छुप-छुपकर देखते हैं तुझे… कभी ताजमहल, तो कभी कयामत कहते हैं तुझे… तेरी एक नज़र पर लाखों गुलाब खिल उठते हैं… तेरे एक लफ़्ज़ पर हज़ारों कंवल महक उठते हैं… मखमली काया तेरी, जैसे संगमरमर कोई… रेशमी ज़ुल़्फें तेरी जैसे काली घटा कोई…

 

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स्किन केयर टिप्स

स्किन हमेशा ख़ूबसूरत और जवां बनी रहे, इसके लिए अपनाएं ये ईज़ी होम रेमेडीज़.

नींबू: क्लीन और क्लीयर स्किन के लिए नींबू सबसे बेहतरीन है. इसमें मौजूद सिट्रिक एसिड डेड सेल्स को हटाता है और इसका विटामिन सी डार्क स्पॉट्स को हटाने में मदद करता है. इसमें ब्लीचिंग प्रॉपर्टीज़ भी होती हैं, जो कॉम्प्लेक्शन को निखारती हैं.

– ताज़ा नींबू का रस पूरे चेहरे व गर्दन पर अप्लाई करें. 10 मिनट बाद गुनगुने पानी से धो लें. इसके बाद ककड़ी की स्लाइस को रब करें. स्किन एकदम स्मूद और फ्रेश हो जाएगी. यह रोज़ करें या हर दूसरे दिन.

– आधा नींबू का रस लें, उसमें 2 टेबलस्पून शहद मिलाएं. चेहरे पर लगाकर 15-20 मिनट बाद धो लें.

– एक्सफोलिएट करने के लिए 2 टीस्पून नींबू के रस में थोड़ी-सी शक्कर मिलाएं. चेहरे, गर्दन और हाथों पर गोलाई में रब करें और फिर 10 मिनट तक लगाकर रखें. यह हफ़्ते में एक बार करें और ग्लोइंग स्किन पाएं.

हल्दी: यह एंटीसेप्टिक होने के साथ-साथ दाग़-धब्बों से भी छुटकारा दिलाती है.

– 1 टेबलस्पून हल्दी पाउडर में पाइनेप्पल जूस मिलाकर पेस्ट तैयार कर लें. इसे चेहरे व गर्दन पर अप्लाई करें. सूखने पर गुनगुने पानी से धो लें. इसे हफ़्ते में 2-3 बार करें, इससे डार्क स्पॉट्स से छुटकारा मिलेगा.

– हल्दी पाउडर और बेसन समान मात्रा में लेकर दूध या पानी मिक्स करें और पेस्ट तैयार कर लें. चेहरे पर लगाएं. सूखने पर गुनगुने पानी से हल्का-सा मसाज करते हुए पेस्ट हटाएं. अपनी स्किन टोन को बेहतर करने के लिए हफ़्ते में एक बार यह उपाय करें.

शहद: क्लीयर स्किन के लिए बहुत ज़रूरी है कि उसे मॉइश्‍चराइज़्ड रखा जाए. शहद बहुत ही अच्छा मॉइश्‍चराइज़र है. साथ ही इसमें एंटीबैक्टीरियल प्रॉपर्टीज़ भी होती हैं.

– शहद को चेहरे पर अप्लाई करें. सूखने पर गुनगुने पानी से धो लें. स्मूद स्किन के लिए यह रोज़ करें या हर दूसरे दिन ट्राई करें.

– 1 टीस्पून शहद में 2 टीस्पून दूध और 1 टीस्पून बेसन मिलाएं. चेहरे पर अप्लाई करें. 20 मिनट बाद गुनगुने पानी से धो लें. ग्लोइंग स्किन पाने के लिए यह फेस मास्क हफ़्ते में एक बार ट्राई करें.

एलोवीरा: यह एंटी एलर्जिक, एंटीबैक्टीरियल और एंटी इंफ्लेमेट्री होता है. स्किन को हेल्दी रखता है और नए सेल्स के निर्माण की क्रिया को तेज़ करने में भी मदद करता है.

– एलोवीरा के ताज़ा पल्प को कॉटन बॉल की सहायता से फेस पर अप्लाई करें. सूखने पर गुनगुने पानी से धो लें. यह उपाय रोज़ करें.

बेकिंग सोडा: यह स्किन का पीएच बैलेंस बनाए रखता है. यह एक्सफोलिएट करके डेड सेल्स को भी हटाता है. साथ ही यह एंटीसेप्टिक भी है.

– 1 टीस्पून बेकिंग सोडा में 1 टीस्पून पानी या नींबू का रस मिलाकर पेस्ट बना लें. इससे एक्सफोलिएट करें. गुनगुने पानी से धो लें. इसे हफ़्ते में 2-3 बार करें.

– 1-1 टीस्पून बेकिंग सोडा और शहद मिला लें. फेस धो लें और हल्की गीली स्किन पर यह पेस्ट अप्लाई करके एक मिनट तक मसाज करें. गुनगुने पानी से धो लें. उसके बाद ठंडे पानी से भी धोएं. यह उपाय हफ़्ते में एक बार करें.

कुकुंबर: इसमें हाइड्रेटिंग, नरिशिंग और एस्ट्रिंजेंट प्रॉपर्टीज़ होती हैं. यह डैमेज्ड स्किन सेल्स को रिपेयर करता है.

– ककड़ी की थिक स्लाइस काटकर रात को सोने से पहले चेहरे पर रब करें. सुबह गुनगुने पानी से धो लें. यह रोज़ करें.

– ककड़ी और नींबू का रस समान मात्रा में लें. अच्छी तरह मिक्स करें और चेहरे पर अप्लाई करें. सूखने पर धो लें. यह रोज़ करें.

पपीता: स्किन का टेक्स्चर बेहतर करता है, जिससे स्किन क्लीन और क्लीयर लगती है. इसमें नेचुरल ब्लीचिंग प्रॉपर्टीज़ भी होती हैं.

– पपीते को काटकर उसमें चंदन पाउडर और शहद मिलाकर ग्राइंड कर लें. इसे चेहरे व गर्दन पर लगाएं. आधे घंटे बाद धो लें. टॉवल से थपथपाकर पोंछें और गुलाबजल लगाएं. हफ़्ते में एक बार यह रेसिपी ट्राई करें.

पुदीना: इसमें मौजूद मेंथॉल में कूलिंग प्रॉपर्टीज़ होती हैं.

– 1 टीस्पून पुदीने का पाउडर, 1 टेबलस्पून दही और थोड़ी मुल्तानी मिट्टी. सबको मिक्स करें और चेहरे व गर्दन पर अप्लाई करें. सूखने पर गुनगुने पानी से धो लें. यह मास्क हफ़्ते में एक बार लगाएं. स्किन एकदम क्लीयर लगेगी.

नारियल तेल: यह एंटी ऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है.

– नारियल तेल को गुनगुना करें और चेहरे पर लगाएं. गर्दन व हाथ-पैरों पर भी लगा सकते हैं. मसाज करें और 10 मिनट बाद गुनगुने पानी से धो लें. बेजान त्वचा भी ग्लो करने लगेगी.
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स्किन प्रॉब्लम्स और होममेड सोल्यूशन्स

– पिंपल्स होने पर टूथपेस्ट अप्लाई करें. इससे इंस्टेंट रिलीफ मिलता है और लालिमा भी कम हो जाती है.

– पिंपल्स होने पर ब़र्फ को कपड़े में लपेटकर रब करें. ये पिंपल्स के दर्द, सूजन व लालिमा को कम करती है.

– वैसे पिंपल्स की समस्या ऑयली स्किनवालों को अधिक होती है. अगर आपकी स्किन बहुत ऑयली है, तो अंडे के स़फेद भाग में आधे नींबू का रस मिलाकर अप्लाई करें और 15 मिनट बाद धो लें. इससे स्किन में कसाव भी आएगा और अतिरिक्त ऑयल भी निकल जाएगा.

– टमाटर को काटकर स्किन पर रब करें. 15 मिनट बाद धो लें. यह भी एक्स्ट्रा ऑयल को निकालकर स्किन को हेल्दी ग्लो
देता है.

– पिंपल्स के ज़िद्दी मार्क्स से छुटकारा पाने के लिए 3 टेबलस्पून शक्कर और 1-1 टेबलस्पून मिल्क पाउडर व शहद लें. सबको मिलाकर चेहरे पर मसाज करें. थोड़ी देर स्क्रब करके 15 मिनट तक लगे रहने दें, फिर धो लें.

– थोड़ी-सी हल्दी में 1 टीस्पून एलोवीरा पल्प मिलाकर चेहरे पर लगाएं. 20 मिनट बाद धो लें. इससे भी पिंपल्स के दाग़-धब्बे कम होते हैं.

– चंदन पाउडर में गुलाबजल मिलाकर दाग़-धब्बों पर अप्लाई करें. सूखने पर धो लें. यह उपाय दिन में दो बार करें और एक हफ़्ते में ही रिज़ल्ट देखें.

– ब्लैक-व्हाइट हेड्स रिमूव करने का सबसे आसान उपाय है स्टीमिंग. 1-2 मिनट तक स्टीम लें, फिर नेचुरल एक्सफोलिएटर से स्क्रब करें.

– घर पर स्क्रब तैयार करने के लिए बादाम को पीस लें और बेसन व पानी में मिलाकर पेस्ट तैयार कर लें. इससे स्क्रब करें. यह भी ब्लैक और व्हाइट हेड्स को हटाने का बेहतरीन उपाय है.

– 2 टेबलस्पून दही में नींबू का रस मिलाकर प्रभावित हिस्सों पर लगाएं.

– हेल्दी डायट लें. पानी संतुलित मात्रा में पीएं और स्ट्रेस फ्री रहें.

– बाहर जाते समय सन प्रोटेक्शन का ख़्याल ज़रूर रखें.

– गीता शर्मा

रिंकल फ्री स्किन के बेस्ट ट्रिक्स

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– गालों व आंखों के चारों ओर की झुर्रियां मिटाने के लिए रात को दूध की मलाई में बारीक़ आटा मिलाकर पेस्ट बना लें. इसे चेहरे पर लगाकर 15 मिनट बाद गीले हाथों से चेहरे को ख़ूब मलें व सारा आटा रगड़कर हटा लें. इसके बाद चेहरा ठंडे पानी से धो लें. इससे चेहरे को झुर्रियां दूर हो जाती हैं.

– पके हुए पपीते के टुकड़े को मसलकर चेहरे पर लगाएं. कुछ देर बाद स्नान कर लें. कुछ दिन लगातार ऐसा करने से चेहरे की झुर्रियां कम हो जाती हैं. साथ दाग़-धब्बे, मुंहासे मिटकर चेहरे की रंगत बढ़ जाती है.

– आंखों के छोर की रेखाएं दूर करने के लिए खीरे के टुकड़े काटकर आंखों पर लगाकर कुछ देर लेट जाएं. इसे रोज़ एक बार कुछ हफ़्ते तक करें. इससे झुर्रियां दूर हो जाती हैं.

– झुर्रियां दूर करने के लिए अंकुरित चने व मूंग को सुबह व शाम खाएं. इनमें विटामिन ई होता है, जो झुर्रियां मिटाने व त्वचा को जवां बनाए रखने में मदद करता है.

– एक पका केला, एक टेबलस्पून शहद व एक कप दही- तीनों को मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को चेहरे व गर्दन पर लगाएं. दस मिनट बाद चेहरे को धो लें. इसे हफ़्ते में तीन दिन तक करें.

– एक टेबलस्पून शहद में एक टीस्पून दालचीनी पाउडर मिलाकर चेहरे पर लगाएं. फिर थोड़ी देर बाद ठंडे पानी में थोड़ा-सा स़फेद सिरका
मिलाकर चेहरे को धो लें.

– एक टेबलस्पून कॉफी पाउडर, एक टीस्पून दूध व एक टीस्पून शहद- तीनों को फेंटकर पेस्ट बना लें. इसे चेहरे पर लगाकर 10 मिनट बाद चेहरा धो लें. ये चेहरे पर निखार लाने के साथ बारीक़ रेखाओं को भी छुपा देता है. इसे हफ़्ते में दो दिन लगाएं.

– कुछ हफ़्ते तक रोज़ शाम को गाजर का रस पीएं.

– यदि आप गालों पर नींबू का रस लगाकर, नींबू निचोड़ छिलके कुछ दिन रगड़ें, तो गाल झुर्रियां दूर होने लगती हैं.

– आधा टीस्पून दूध की ठंडी मलाई में 4-5 बूंदें नींबू के रस मिलाकर झुर्रियों पर सोते समय लगाएं.

– गुनगुने पानी से चेहरा अच्छी तरह से धोएं और बाद में टॉवेल से पोंछकर साफ़ कर लें. इसके बाद चेहरे पर मलाई लगाकर तब तक रगड़ते रहे, जब तक क क्रीम घुलकर त्वचा में रम न जाए. फिर आधे घंटे बाद स्नान कर लें. ध्यान रहे, चेहरे को पानी से धोएं और साबुन का इस्तेमाल न करें. इसे 15-20 दिन तक रोज़ करने से झुर्रियां दूर हो जाती हैं व चेहरे के दाग़-धब्बे भी मिट जाते हैं.

– मलाई का इस्तेमाल करने के बाद यदि चेहरे पर धीरे-धीरे ऑलिव ऑयल से मसाज करें, तो चेहरे पर और भी चमक आ जाती है.

– स्नान से पहले पपीते का पल्प गर्दन पर रगड़ेें. इससे त्वचा की गंदगी-झुर्रियां दूर हो जाएगी.

– आंवला व संतरा रिंकल फ्री स्किन के लिए काफ़ी फ़ायदेमंद है. इसमें एंटीऑक्सीडेंट व विटामिन सी प्रचुर मात्रा में होता है, जो एंज़िंग की प्रक्रिया को धीमा कर देता है, जिससे त्वचा जवां व खिली-खिली नज़र आती है.

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झुर्रियों को दूर करने के लिए एक्सरसाइज़ व योग

– ई और ओ बोलते हुए एक बार चेहरे को फैलाएं और फिर सिकोड़े.

– ई उच्चारण के साथ ऐसा पोज़ बनाएं मानो आप मुस्कुराने जा रही हैं. कुछ समय इसी पोज़ में रहने के बाद होंठों को आगे की तरफ़ बढ़ाते हुए ऐसा करें मानो आप सीटी बजाना चाह रहे हैं. इससे गालों की अच्छी एक्सरसाइज़ होती है. गाल ख़ूबसूरत होते हैं व झुर्रियां नहीं होती हैं. इसे एक बार में 15 से 20 बार करें और दिन में 3 बार करें.

– मुंह से फूंक मारते हुए गाल फुलाएं व पेट चिपका लें. अब नाक से सांस लें. यह प्रक्रिया 15 से 20 बार करें और दिन में तीन बार करें.

– सिंहासन योगासन से चेहरे की झुर्रियों को प्रभावशाली तरी़के से दूर किया जा सकता है.

– अपनी कमर व गला को सीधे रखते हुए वज्रासन में घुटनों के बल बैठकर घुटने थोड़े फैला दें. दोनों हथेलियां भीतर की ओर रखते हुए घुटनों के बीच ज़मीन पर जमा लें. उंगलियों को फैला लें. मुंह को जितना खोला जा सके, उतना खोलते हुए जीभ को अधिक से अधिक बाहर निकालते हुए आंखें खुली रखें व गले को तानते हुए सिंह की तरह अपना उग्र रूप बनाएं.

– इस आसन के अभ्यास से कंठ और मुंह के स्नायु में खिंचाव आता है, जिससे मुंह और आंखों के आसपास की झुर्रियां दूर हो जाती हैं.

– माथे की झुर्रियां को दूर करने के लिए हथेली की मदद से माथे को पीछे की ओर जहां से बालों की सीमा शुरू होती है, मसाज करें. यदि माथे पर कोई रेखा हो, तो कुछ दिन लगातार करने से दूर हो जाती है.

– चेहरे को साफ़ किए बिना कभी मसाज न करें. जिस तरफ़ झुर्रियां पड़ती हो, उसके ठीक विपरीत दिशा में उंगलियों के पोरों पर गुनगुने ऑलिव ऑयल की कुछ बूंदें लगाकर मसाज करें. मसाज करते समय या तेल लगाते समय माथे को दोनों हथेलियों से धीरे-धीरे ऊपर की ओर व कनपटी की ओर उंगलियां ले जाते हुए रगड़ें और चेहरे की त्वचा को ऊपर की ओर रब करते हुए हथेलियों को कानों और सिर की ओर ले जाएं. गालों को नीचे से कनपटी की दिशा की ऊपर की ओर व कनपटी की तरफ़ ले जाएं.

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इन बातों का भी रखें ख़्याल

– सन एक्सपोज़र अवॉइड करें.

– सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें.

– प्रदूषित वातावरण में न जाएं या फिर ख़ुद को प्रोटेक्ट करके जाएं.

– मॉइश्‍चराइज़र का इस्तेमाल करें.

– रेग्युलर एक्सरसाइज़ करें.

– न्यूट्रीशियस डायट लें.

– ठंडा पानी ढीली त्वचा में कसाव लाने व रक्तसंचार को ठीक करने के लिए प्रभावशाली है.

– चेहरा धोने के बाद उसे कभी भी टॉवेल से न पोंछें, बल्कि हथेलियों से थपथपाकर चेहरे का पानी सुखाएं.

– ऐसा करने से पानी का कुछ भाग त्वचा के अंदर चला जाता है, जिससे चेहरे की ताज़गी व ख़ूबसूरती बनी रहती है और चेहरे पर झुर्रियां नहीं पड़ती हैं.

– हमेशा ख़ुश व तनावमुक्त रहें, इससे त्वचा ख़ूबसूरत बनी रहती है.

– ऊषा गुप्ता