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मोदीजी के फैन गुल पनाग के लाडले… (Gul Panag’s Little Baby Also Recognises Modiji)

हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी को बड़े-बुज़ुर्ग, महिला ही नहीं, बल्कि बच्चे भी बेहद पसंद करते हैं, जैसा की अभिनेत्री गुल पनाग के नन्हे बेटे निहाल के मासूम अंदाज़ से लगता है. यह मोदीजी के प्रभावशाली व्यक्तित्व का भी जीता जागता उदाहरण है कि बच्चे भी उनके ज़बर्दस्त फैन हैं.

Gul Panag's Little Baby

 

सोशल मीडिया पर गुल पनाग ने अपने नन्हे लाड़ले निहाल का एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें पत्रिका में मोदीजी की तस्वीर को देखकर छोटू निहाल न केवल उन्हें तुरंत पहचान जाते हैं, बल्कि अपनी मासूम भोली भाषा में मोदीजी… मोदीजी… भी कहते हैं. कहानी यही पर ख़त्म नहीं होती.

गुल द्वारा शेयर किए गए इस वीडियो पर मोदीजी भी निहाल हो गए और उन्होंने इसे रीट्विट करने के साथ-साथ इसका ख़ूबसूरत जवाब भी दिया है.

उन्होंने नन्हे निहाल को आशीर्वाद देने के साथ सुनहरे भविष्य की शुभकामनाएं दीं. साथ ही गुल पनाग की भी तारीफ़ करते हुए उन्हें निहाल के लिए बेहतरीन मार्गदर्शक व मेंटर होने का भी विश्‍वास जताया.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश-दुनिया में तो मशहूर हैं ही, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में भी उनका अच्छा क्रेज़ देखने मिलता है. जब पिछले दिनों चीन के प्रधानमंत्री भारत आए थे, तब तमिलनाडु में उनकी मोदीजी से मुलाक़ातें हुई थीं. उसी दौरान सुबह की सैर पर उन्होंने सागर किनारे सैर करते हुए रास्ते में पड़े कचरे को भी उठाते हुए स्वच्छता अभियान का बेहतरीन उदाहरण पेश किया था. उनके इस वीडियो को सभी ने ख़ूब पसंद किया और फिल्मी सितारों ने इसे ख़ूब शेयर भी कियाविशेषतौर पर अक्षय कुमार, अनुपम खेर, करण जौहर, विवेक ओबेरॉय आदि ने. मोदीजी की कार्यप्रणाली, चुस्ती-फुर्ती, कर्मठता हर किसी को प्रेरित करती है. वे सोशल मीडिया पर भी ख़ूब एक्टिव रहते हैं, जिससे हर कोई उनसे आसानी से जुड़ जाता है. हाल ही में सोशल मीडिया पर मोदीजी के फॉलोवर्स इस कदर बढ़े कि वे शीर्ष पर विराजमान हैं.

Gul Panag's Little Baby

Gul Panag's Little Baby

यह भी पढ़ेद कपिल शर्मा शोः गोविंदा की पत्नी सुनीता के व्यवहार से कृष्णा अभिषेक को लगा गहरा धक्का (Govinda’s Wife Sunita Leaves Krushna Abhishek Saddened And Shocked By Her Rigid Diktat)

 

लवडम के लिए जन्में हैं अबराम(Shah Rukh Khan Says that Abram is Born For Lovedom)

शाहरुख ख़ान को लगता है कि उनकी तीसरी संतान अबराम बहुत भाग्यशाली है, क्योंकि उसे सभी का प्यार मिल रहा है. शाहरुख का मानना है कि अबराम का जन्म स्टारडम से ज़्यादा लवडम के लिए हुआ है.

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फिल्म जर्नलिस्ट और लेखिका भावना सोमाया ने मंगलवार को ट्विटर पर शाहरुख़ व गौरी के बेटे की तारीफ़ करते हुए लिखा था कि अबराम जिस तरह अपने पापा के फैन्स को देखकर हाथ हिलाकर उनका अभिवादन करता है, वो मुझे बहुत पसंद है. वो भीड़ को देखकर बिल्कुल नहीं घबराता, जिसे देखकर लगता है कि उसका जन्म स्टारडम के लिए हुआ है. इसका जवाब देते हुए शाहरुख ने लिखा, मुझे लगता है कि,”अबराम का जन्म स्टारडम से ज़्यादा लवडम के लिए हुआ है. वो बहुत भाग्यशाली और ब्लेस्ड है कि उसे इतने लोगों का प्यार मिल रहा है.”

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एक इंटरव्यू के दौरान शाहरुख ने यह बताया था कि जहां आर्यन और सुहाना ज़्यादा लोगों से मिलना-जुलना पसंद नहीं करते, वहीं अबराम को यह सब अच्छा लगता है. उसका व्यवहार दोस्ताना है. मेरे फैन्स को देखकर वह बहुत ख़ुश हो जाता है. शाहरुख ने बताया कि मेरे जन्मदिन पर जब लोग मेरा चिल्लाते हैं तो वो मेरे पास भागकर आता है और कहता है कि लोग आए हैं, चलो उनसे मिलने चलते हैं. वो मुझे खींचकर बाहर लाता है और मेरे साथ लोगों का अभिवादन करता है.

Awww! तुषार के बेटे के बर्थ डे पर करीना कपूर खान के छोटे नवाब तैमूर बन गए स्टार!, देखें पिक्चर्स (Mommy Kareena Kapoor Khan And Baby Taimur At Tusshar Kapoor Son Laksshya’s Birthday)

Kareena Kapoor Khan

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तैमूर अली खान अभी से स्टार बन गए हैं. पैदा होते ही तैमूर के बारे में बातें होने लगी थीं और अब छोटे नवाब तैमूर मम्मी करीना से भी ज़्यादा मशहूर हो गए हैं. जी हां मौक़ा था तुषार कपूर के बेटे लक्ष्य की बर्थेडे पार्टी में करीना और सैफ अली खान के बेटे तैमूर अली खान ही छाए रहे. जैसे ही करीना तैमूर को लेकर बर्थडे पार्टी में पहुंची सारे कैमरे तैमूर की ओर घूम गए. हर कोई तैमूर को कैमरे में कैद करना चाह रहा था. तैमूर भी मॉमी करीना के साथ कैमरे के लिए पोज़ देते नज़र आए. देखे पिक्चर्स.

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रिश्तों में तय करें बेटों की भी ज़िम्मेदारियां (How To Make Your Son More Responsible)

ज़िम्मेदारियां

बेहिसाब ख़ामोशियां… चंद तन्हाइयां… कुछ दबी सिसकियां, तो कुछ थकी-हारी परछाइयां… बहुत कुछ कहने को था, पर लबों में ताक़त नहीं थी… मगर अब व़क्त ने लफ़्ज़ों को अपने दायरे तोड़ने की इजाज़त जो दी, तो कुछ वर्जनाएं टूटने लगीं… दबी सिसकियों को बोल मिले, तो ख़ामोशियां बोल उठीं, तन्हाइयां काफ़ूर हुईं, तो परछाइयां खुले आसमान में उड़ने का शौक़ भी रखने लगीं… बराबरी का हक़ अब कुछ-कुछ मिलने लगा है… बराबरी का एहसास अब दिल में भी पलने लगा है…

ज़िम्मेदारियां

हम भले ही लिंग के आधार पर भेदभाव को नकारने की बातें करते हैं, लेकिन हमारे व्यवहार में, घरों में और रिश्तों में वो भेदभाव अब भी बना हुआ है. यही वजह है कि रिश्तों में हम बेटियों की ज़िम्मेदारियां तो तय कर देते हैं, लेकिन बेटों को उनकी हदें और ज़िम्मेदारियां कभी बताते ही नहीं. चूंकि अब समाज बदल रहा है, तो बेहतर होगा कि हम भी अपनी सोच का दायरा बढ़ा लें और रिश्तों में बेटों को भी ज़िम्मेदारी का एहसास कराएं.

घर के काम की ज़िम्मेदारियां
– अक्सर भारतीय परिवारों में घरेलू काम की ज़िम्मेदारियां स़िर्फ बेटियों पर ही डाली जाती हैं. बचपन से ङ्गपराये घर जाना हैफ की सोच के दायरे में ही बेटियों की परवरिश की जाती है.
– यही वजह है कि घर के काम बेटों को सिखाए ही नहीं जाते और उनका यह ज़ेहन ही नहीं बन पाता कि उन्हें भी घरेलू काम आने चाहिए.
– चाहे बेटी हो या बेटा- दोनों को ही हर काम की ज़िम्मेदारी दें.
– बच्चों के मन में लिंग के आधार पर काम के भेद की भावना कभी न जगाएं, वरना अक्सर हम देखते हैं कि घर में भले ही भाई अपनी बहन से छोटा हो या बड़ा- वो बहन से अपने भी काम उसी रुआब से करवाता है, जैसा आप अपनी बेटी से करवाते हैं.
– पानी लेना, चाय बनाना, अपने खाने की प्लेट ख़ुद उठाकर रखना, अपना सामान समेटकर सली़के से रखना आदि काम बेटों को भी ज़रूर सिखाएं.

बड़ों का आदर-सम्मान करना
– कोई रिश्तेदार या दोस्त घर पर आ जाए, तो बेटी के साथ-साथ बेटे को भी यह ज़रूर बताएं कि बड़ों के सामने सलीक़ा कितना
ज़रूरी है.
– चाहे बात करने का तरीक़ा हो या हंसने-बोलने का, दूसरों के सामने बच्चे ही पैरेंट्स की परवरिश का प्रतिबिंब होते हैं. ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि बेटों को भी वही संस्कार दें, जो बेटियों को हर बात पर दिए जाते हैं.
– लड़कियों से कैसे बात करनी चाहिए, किस तरह से उनकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए, उन्हें किस तरह से सम्मान देना चाहिए… आदि बातों की भी शिक्षा ज़रूरी है.
– घर व बाहर भी बुज़ुर्गों से कैसे पेश आना चाहिए, अगर उनके पास कोई भारी सामान वगैरह है, तो आगे बढ़कर उठा लेना चाहिए, उनके साथ व़क्त बिताना, उनसे बातें शेयर करना, उनका हाथ थामकर सहारा देना आदि व्यवहार बेटों को संवेदनशील बनाने में सहायता करेगा और वो अपनी ज़िम्मेदारियां बेहतर तरी़के से समझ व निभा पाएंगे.

ज़िम्मेदारियां

अनुशासन ज़रूरी है
– तुम सुबह जल्दी उठने की आदत डालो, तुम्हें शादी के बाद देर तक सोने को नहीं मिलेगा… टीवी देखना कम करो और खाना बनाने में मदद करो, कुछ अच्छा सीखोगी, तो ससुराल में काम ही आएगा… शाम को देर तक घर से बाहर रहना लड़कियों के लिए ठीक नहीं… आदि… इस तरह की बातें अक्सर मांएं अपनी बेटियों को सिखाती रहती हैं, लेकिन क्या कभी बेटों को अनुशासन सिखाने पर इतना ज़ोर दिया जाता है?
– घर से बाहर रात को कितने बजे तक रहना है या सुबह सोकर कितनी जल्दी उठना है, ये तमाम बातें अनुशासन के दायरे में आती हैं और अनुशासन सबके लिए समान ही होना चाहिए.
– खाना बनाना हो या घर की साफ़-सफ़ाई, बेटों को कभी भी इन कामों के दायरे में लाया ही नहीं जाता, लेकिन यदि कभी ऐसी नौबत आ जाए कि उन्हें अकेले रहना पड़े या अपना काम ख़ुद करना पड़े, तो बेहतर होगा कि उन्हें इस मामले में भी बेटियों की तरह ही आत्मनिर्भर बनाया जाए. बेसिक घरेलू काम घर में सभी को आने चाहिए, इसमें बेटा या बेटी को आधार बनाकर एक को सारे काम सिखा देना और दूसरे को पूरी छूट दे देना ग़लत है.

ज़िम्मेदारियां

शादी से पहले की सीख
– शादी से पहले बेटियों को बहुत-सी हिदायतों के साथ विदा किया जाता है, लेकिन क्या कभी बेटों को भी हिदायतें दी जाती हैं कि शादी के बाद उसे कैसा व्यवहार करना चाहिए? यक़ीनन नहीं.
– बेहतर होगा कि बेटों को भी एडजेस्टमेंट करना सिखाया जाए.
– नए रिश्तों से जुड़ने के बाद की ज़िम्मेदारियां समझाई जाएं.
– किस तरह से नई-नवेली दुल्हन को सपोर्ट करना है, उसके परिवार से किस तरह से जुड़ना है आदि बातें बेटों को भी ज़रूर बताई जानी चाहिए.
– हालांकि भारतीय पैरेंट्स से इस तरह की उम्मीद न के बराबर ही होती है कि वो इस तरह से अपने बेटे को समझाएं, लेकिन आज समय बदल रहा है, तो लोगों की सोच में भी कुछ बदलाव आया है.
– आज की जनरेशन काफ़ी बदल गई है. फिर भी यदि पैरेंट्स नहीं समझा सकते, तो प्री मैरिज काउंसलिंग के लिए ज़रूर काउंसलर के पास जाना चाहिए.

शादी के बाद
– अक्सर शादी के बाद बहुओं को हर कोई नई-नई सीख व सलाहेें देता पाया गया है, लेकिन बेटों को शायद ही कभी कोई ज़िम्मेदारियों की बातें समझाता होगा.
– शादी स़िर्फ लड़की ने लड़के से नहीं की होती, बल्कि यह दोनों तरफ़ का रिश्ता होता है, तो ज़िम्मेदारियां भी समान होनी चाहिए.
– बेटों को यह महसूस कराना ज़रूरी है कि स़िर्फ बहू ही नए माहौल में एडजेस्ट नहीं करेगी, बल्कि उन्हें भी पत्नी के अनुसार ख़ुद को ढालने का प्रयत्न करना होगा, पत्नी को हर काम में सहयोग करना होगा और पत्नी की हर संभव सहायता करनी होगी, ताकि वो बेहतर महसूस कर सके.
– इसके अलावा जितने भी रीति-रिवाज़ व परंपराएं हैं, उन्हें निभाने की ज़िम्मेदारी भी दोनों की होनी चाहिए.
– अक्सर शादी के बाद ससुरालपक्ष और मायके, दोनों को निभाने की ज़िम्मेदारी लड़की पर ही छोड़ दी जाती है. जबकि कोई भी मौक़ा या अवसर हो, तो ज़रूरी है लड़के भी उसमें उतनी ही ज़िम्मेदारी के साथ शामिल हों, जितना लड़कियों से उम्मीद की जाती है.
– इसके लिए बेहतर होगा कि जब भी घर में या किसी रिश्तेदार के यहां भी कोई अवसर पड़े, जैसे- किसी का बर्थडे या शादी, तो बेटों को उनके काम व ज़िम्मेदारी की लिस्ट थमा दी जानी चाहिए कि ये काम तुम्हारे ही ज़िम्मे हैं. इसी तरह घर के हर सदस्य को उसका काम बांट देना चाहिए. इससे वो ज़िम्मेदारी से न तो पीछा छुड़ा पाएंगे और न ही भाग पाएंगे.

ज़िम्मेदारियां

बच्चों की ज़िम्मेदारियां
– बच्चा दोनों की ही ज़िम्मेदारी होता है, लेकिन इसे निभाने का ज़िम्मा अनकहे ही मांओं पर आ जाता है.
– बच्चे से जुड़ी हर छोटी-बड़ी चीज़ के लिए घर के सदस्यों से लेकर ख़ुद पति भी अपनी पत्नी से ही जवाब मांगते हैं.
– लेकिन अब बेटों को यह एहसास कराना ज़रूरी है कि बच्चों के प्रति वो भी उतने ही जवाबदेह हैं, जितना वो अपनी पत्नी को समझते हैं.
– पैरेंट्स मीटिंग हो या बच्चों को होमवर्क करवाना हो, माता-पिता को ज़िम्मेदारी बांटनी होगी. लेकिन अक्सर हमारे परिवारों में बेटे शुरू से अपने घरों में अपनी मम्मी को ये तमाम काम करते देखते आए हैं, लेकिन आज के जो पैरेंट्स हैं, वो अपने परिवार से इसकी शुरुआत कर सकते हैं, ताकि उनके बेटों को आगे चलकर रिश्तों में ज़िम्मेदारियों का एहसास हो सके.

करियर की ज़िम्मेदारी
– आजकल वर्किंग कपल्स का कल्चर बढ़ता जा रहा है, लेकिन जब भी कॉम्प्रोमाइज़ करने की बारी आती है, तो यह समझ लिया जाता है कि पत्नी ही करेगी, क्योंकि बेटों को तो कॉम्प्रोमाइज़ करना कभी सिखाया ही नहीं जाता.
– आप ऐसा न करें. बेहतर होगा कि मिल-बांटकर ज़िम्मेदारी निभाना सिखाएं. बांटने, शेयर करने व सपोर्ट करने का जज़्बा बेटों में भी पैदा करें. बचपन में अपनी बहन के लिए वे ये सब करेंगे, तो आगे चलकर महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव बढ़ेगा और वो बेहतर पति साबित होंगे.
– घर में बहन न भी हो, तो भी महिलाओं के प्रति सम्मान व समान भाव रखने की भावना उनमें ज़रूर होनी चाहिए और ऐसा तभी होगा, जब उनकी परवरिश इस तरह से की जाएगी.
– अगर दोनों ही थके-हारे घर आते हैं, तो काम भी मिलकर करना होगा, वरना पत्नी आते ही घर के काम में जुट जाती है और पति महाशय फ्रेश होकर टीवी के सामने चाय की चुस्कियां लेते हुए पसर जाते हैं.

– गीता शर्मा

बॉलीवुड की मां निरूपा रॉय के कमरे को लेकर रियल लाइफ में दोनों बेटों के बीच दीवार (Nirupa Roy’s sons fighting over the late actress bedroom)

निरूपा रॉय

निरूपा रॉय

बॉलीवुड में मां का किरदार निभाने वाली स्व. निरूपा रॉय के घर में बेटों के रिश्तों में भी दीवार आ गई है. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि निरूपा रॉय के कमरे को लेकर उनके दोनों बेटों किरन और योगेश में ठन गई है. निरूपा रॉय के दोनों बेटे उनके बेडरूम पर दावा कर रहे हैं, उनकी कहना है कि उनकी भावनाएं इस कमरे से जुड़ी हुई हैं.
वैसे साल 2004 में निरूपा रॉय की मौत के बाद से ही उनकी संपत्ति को लेकर विवाद शुरु हो गया था. उनकी पूरी संपत्ति लगभग 100 करोड़ की है. उनका 3000 स्क्वैर का अपार्टमेंट है, जिसमें किरन और योगेश के हिस्से में दो दो बेडरूम हैं. साथ ही इसमें 8000 स्क्वैर का गार्डन भी है.

बेटा नहीं, बेटी कहो

क्या मेरा शृंगार मेरी कमज़ोरी है? हाथों की चूड़ियां ज़ंजीर हैं जैसे कोई, पैरों की पायल बेड़ियां हो गईं शायद… माथे की बिंदी ने लाजवंती बना दिया या कानों की बाली ने दासी बना दिया…?
मेरी ख़ूबसूरती के सारे प्रतीक मेरी कमज़ोरी की निशानी कब, क्यों और आख़िर कैसे बना दिए गए? मेरा बेटी होना ही क्या मेरा कमज़ोर होना है? आज जब मैं एक बेटी होकर भी घर की सारी ज़िम्मेदारियां पूरी करती हूं, तो क्यों तारीफ़ के नाम पर बार-बार यही सुनने को मिलता है कि ये हमारी बेटी नहीं, बेटा है?

जी हां, आज भी अक्सर हम अपने घरों या आसपास में इस तरह की बातें सुनते हैं, लेकिन ये तमाम बातें मन में एक सोच को ज़रूर जन्म देती हैं कि बेटी को बेटी ही क्यों नहीं रहने दिया जाता, अगर वो मज़बूत इरादोंवाली और ज़िम्मेदारियां उठानेवाली है, तो उसकी तुलना बेटों से की जाने लगती है. इन्हीं सवालों पर हम चर्चा करेंगे, शायद किसी अंजाम तक पहुंच जाएं…

कारण

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पारंपरिक सोच: चूंकि हमारे समाज में बेटों को घर का मुखिया मानकर हर काम की ज़िम्मेदारी की उम्मीद उनसे ही की जाती है, तो ऐसे में बेटी यदि इन कामों को करे, तो हम उसे बेटे जैसा मानते हैं, क्योंकि समाज में यह सोच नहीं बन पाई है अब तक कि बेटियों की भी ज़िम्मेदारियां होती हैं घर के प्रति.
दूसरी तरफ़ बेटा शब्द हमें आज भी गौरवान्वित कर जाता है, जिस गर्व से समाज में ‘बेटा’ शब्द बोला जाता है, वो गर्व ‘बेटी’ शब्द के प्रति नहीं जुड़ा है. दरअसल, बात स़िर्फ शब्द की नहीं, इसकी जड़ हमारी सोच से जुड़ी हुई है. हमारी पारंपरिक सोच यही है कि बेटा वंश चलाता है, बेटा परिवार चलाता है, बेटा बुढ़ापे का सहारा है… जबकि आज की बेटियों ने इन तमाम दकियानूसी ख़्यालात को ग़लत साबित कर दिखाया है, लेकिन उसके हक़ की इज़्ज़त आज भी उसे नहीं मिल रही, क्योंकि जो भी बेटियां इस तरह की तमाम ज़िम्मेदारियां निभाती हैं, उन्हें बेटे की ही उपाधि से नवाज़ा जाता है.

कैज़ुअल अप्रोच: हमारा पारिवारिक ढांचा अब भी ऐसा है कि बेटियों से हम ज़्यादा उम्मीदें नहीं लगाते. इसलिए वो जो भी करती हैं, हमें ‘एक्स्ट्रा’ ही लगता है. उनके प्रति बहुत ही कैज़ुअल अप्रोच रखते हैं कि बेचारी लड़की होकर आख़िर कितना करेगी और
क्यों करेगी?

पराया धन: आज भी बेटियों को हम घर का एक स्थायी सदस्य न मानकर पराया धन ही मानते हैं. उसे बोझ या ज़िम्मेदारी ही समझते हैं. यदि वो घर के प्रति या अपने पैरेंट्स के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करती है, तो हमें लगता है कि वह बेटों की भूमिका निभा रही है.

नज़ाकत का प्रतीक: चूंकि लड़कियां शरीर से नाज़ुक होती हैं, तो उनकी नज़ाकत को कमज़ोरी से जोड़कर देखा जाता है. यही वजह है कि बेटियां जब भी कोई अच्छा व ज़िम्मेदारी का काम करती हैं, तो कहा जाता है कि यह बेटी नहीं, बेटा है घर का यानी बेटा अपने आप में मज़बूती व ज़िम्मेदारी का प्रतीक बन गया और बेटी कमज़ोरी का.

समाज का नज़रिया: भारतीय समाज ही नहीं, कई अन्य देशों व समाजों में भी महिलाओं को कमज़ोर आंका जाता है. उन्हें सजावट या उपभोग की वस्तु मात्र समझा जाता है. ऐसे में वहां जब लड़कियां कुछ अलग कर दिखाती हैं, तो वो दुनिया के लिए बड़ी ख़बर बन जाती है.
शायद इन जुमलों को अब बदलने का व़क्त आ गया है-

– अरे, क्या लड़कियों की तरह रो रहा है… तू तो मर्द है, लड़का होकर आंसू बहाना तुझे शोभा नहीं देता. अक्सर ये जुमला हम अपने आसपास व घरों में भी सुनते आ रहे हैं. जब भी कोई लड़का रोता है, भले ही वो बच्चा ही क्यों न हो, तो ख़ुद मां या उसकी बड़ी बहन के मुंह से पहला वाक्य यही निकलता है- क्या लड़कियों की तरह रो रहा है. स्ट्रॉन्ग बन.

– अगर तुमसे यह काम नहीं होता, तो हाथों में चूड़ियां पहन लो… चूड़ियां, जो नारी का शृंगार होती हैं. उसके सौंदर्य का प्रतीक होती हैं, उन्हें भी कमज़ोरी की निशानी के तौर पर देखा जाता है. अगर कोई पुरुष किसी काम में कमज़ोर पड़ जाए या फिर उसे ललकारना हो, तो स्वयं महिलाएं भी यह बोलती मिलती हैं कि यह तुम्हारे बस की बात नहीं, तुम चूड़ियां पहन लो…

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– ये लड़कों वाले काम तुम क्यों कर रही हो? जब भी कोई शारीरिक मेहनत का काम हो और कोई लड़की उसे करती नज़र आए, तो अक्सर यही कहा जाता है कि ये लड़कोंवाले काम हैं, तुम्हें ये सब करना शोभा नहीं देता. शायद अब व़क्त आ गया है कि हमें ख़ुद थोड़ा सतर्क रहना होगा अपने शब्दों के चयन में और अपने व्यवहार में, ताकि अंजाने ही सही, लेकिन इस तरह के भेदभाव के बीज, जो हम बचपन से अपनी संतानों के मन में बोते आ रहे हैं, उनसे वो बच सकें.

वक्त बदल रहा है

 

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– वक्त, समाज की सोच और लोगों का नज़रिया भी अब बदल रहा है. कई ऐसे काम हैं, जहां पहले महिलाओं का दख़ल तक नहीं था, जो स़िर्फ पुरुषों के ही माने जाते थे, वहां भी अब बेटियां अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं और इतना ही नहीं, अपने अच्छे काम से सबकी वाहवाही भी लूट रही हैं.

– सेना में अब तक महिलाओं की भूमिका सीमित थी, लेकिन अब उन्हें भी पूरा मौक़ा मिलेगा. सबसे बड़ी बात कि भारतीय वायुसेना में अब महिला फाइटर पायलेट्स को भी जगह मिलेगी यानी महिलाएं अब फाइटर प्लेन उड़ा सकेंगी.

– अब लोग समझने लगे हैं कि कोमल और कमज़ोर दो अलग-अलग शब्द हैं और बेटियां भले ही कोमल हों, पर कमज़ोर बिल्कुल नहीं हैं. इसलिए हर बेटी अब यही कहना चाहती है कि प्लीज़ हमें बेटा नहीं, बेटी कहो.

एक्सपर्ट ओपिनियन

इस विषय में हमने बात की सायकोथेरेपिस्ट डॉ. चित्रा मुंशी से-

– दरअसल, समाज की प्रवृत्ति सदियों से ऐसी ही बनी हुई है, ख़ासतौर से अगर हम पूर्वी देशों की बात करें, तो हमारे समाज में लिंग के आधार पर भूमिकाएं अधिक बंटी हुई हैं, बजाय रिश्तों के आधार पर.

–  पुरुषों को रोटी कमानेवाला यानी ब्रेड अर्नर माना जाता है. ऐसे में जिन परिवारों में ये भूमिका बेटों की जगह बेटियां निभाती हैं, वहां इसके साथ एक गिल्ट यानी अपराधबोध जुड़ जाता है. लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि यह निर्णय कौन लेता है कि ये काम किसका है और किसका नहीं?

– यहां समाज की प्रचलित मान्यताओं को ही हम आधार बना लेते हैं, जैसे- 10 में से 8 लोग यही सोच रखते हैं कि यह काम बेटों का है और दो लोग इसमें भेदभाव नहीं करते, तो हम 8 लोगों को आधार बना लेते हैं, क्योंकि मेजोरिटी यही सोचती है.

– इस तरह सायकोसोशल डेवलपमेंट जेंडर डिफरेंस सिखाता है, न कि बायलॉजिकल डिफरेंस. असली फ़र्क़ समाज क्या भूमिका दे रहा है, उसी पर निर्भर करता है और हमारे यहां लड़कियों को केयरटेकर का रोल ही दिया जाता है. उदाहरण के तौर पर- अगर घर में बच्चों को अपनी मातृभाषा बोलनी नहीं आती, तो हर कोई स्त्री से ही सवाल करेगा कि बच्चों को कुछ सिखाया नहीं, कोई भी बच्चों के पिता से नहीं पूछेगा, बल्कि उसके प्रति सहानुभूति व्यक्त करेगा कि ये बेचारा तो दिनभर कमाने में ही लगा रहता है, इसके पास समय ही कहां है.

– यहां मैं यह ज़रूर कहना चाहूंगी कि यह अपेक्षा रखना कि समाज जल्द ही बदल जाएगा, ग़लत है, क्योंकि इसमें सदियां लगेंगी, लेकिन जागरूकता ज़रूर फैलाई जा सकती है, क्योंकि यह समाज हम से ही बना है, हम यदि अपने घर से बदलाव की शुरुआत करते हैं और ये जो एक चक्र बना हुआ है, उसे तोड़ते हैं, तो धीरे-धीरे बदलाव संभव है.

– चूंकि समय बदल रहा है, तो आज की ज़रूरतें व हमारी भूमिकाएं भी बदल रही हैं. आज हमें उस पारंपरिक चक्र की ज़रूरत नहीं है, जो पहले हुआ करती थी. ऐसे में इस चक्र को बदलना
ज़रूरी है.

–  हम यह नहीं कह सकते कि सब कुछ एकदम से बदल डालो या परंपराएं तोड़ दो, लेकिन हमें इस प्रवाह की दिशा को मोड़ना होगा और न स़िर्फ मोड़ना होगा, बल्कि लगातार इसका फॉलोअप करना होगा कि क्या सच में अपने स्तर पर, अपने घरों में व आसपास हम बदलाव लाने का सफल प्रयास कर रहे हैं?

– छोटे स्तर पर ये प्रयास होने चाहिए. अगर कोई टीचर है, तो वो अपने विद्यार्थियों को समानता की बात समझा सकता है, अगर कोई लेखक है, तो वो लेखों के ज़रिए जागरूकता ला सकता है. इसी तरह से हम अपने घरों में, अपने रिश्तों व रिश्तों की भूमिकाओं में परिवर्तन ला सकते हैं, ताकि ये भूमिकाएं लिंग के आधार पर न होकर रिश्तों के आधार पर हों.

– गीता शर्मा

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