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बर्थ एनिवर्सरी- बचपन से ही आसमान की सैर करना चाहती थीं कल्पना चावला (55th Birth Anniversary of kalpana Chawla)

कल्पना चावला

कल्पना चावला

अंतरिक्ष में जानेवाली भारतीय मूल की पहली महिला बनने का गौरव हासिल करनेवाली कल्पना चावला का जीवन भले ही बहुत छोटा था, मगर इस छोटी सी ज़िंदगी में उन्होंने वो कर दिखाया जो लाखों लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गया. कल्पना चावला की बर्थ एनिवर्सरी के मौ़के पर आइए, आपको बताते हैं उनसे जुड़ी कुछ ख़ास बातें.

* कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च 1962 में करनाल में हुआ था.

* करनाल के टैगोर स्कूल से शुरुआती पढ़ाई के बाद कल्पना ने 1982 में चंडीगढ़ इंजीनियरिंग कॉलेज से एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री और 1984 से टेक्सास यूनिवर्सिटी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की डिग्री ली.

* कल्पना जेआरडी टाटा (जो पायलट होने के साथ ही नामी बिज़नेसमेन भी थे) से बहुत प्रभावित और प्रेरित थीं.

* 1988 में उन्होंने नासा के लिए काम करना शुरू किया और यही उनकी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट था.

* अंतरिक्ष की सैर का उनका सपना पूरा हुआ 1997 में, जब कल्पना चावला ने स्पेस शटल कोलम्बिया से पहली अंतरिक्ष यात्रा की.

* अंतरिक्ष की पहली यात्रा के दौरान उन्होंने अंतरिक्ष मे 372 घंटे बिताए और पृथ्वी की 252 परिक्रमाएं पूरी की.

* कल्पना ने स्पेस के लिए दूसरी उड़ान 2003 में कोलंबिया शटल से भरी और ये उनकी ज़िंदगी की आख़िरी उड़ान साबित हुई. 01 फरवरी 2003 को  कोलम्बिया स्पेस शटल लैंडिंग से पहले ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया और कल्पना के साथ बाकी सभी 6 अंतरिक्ष यात्रियों की मृत्यु हो गई.

समय से पहले बड़े होते बच्चे

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दिल्ली के एक स्कूल में 2 बच्चों ने आपत्तिजनक स्थिति में अपना एमएमएस बनाया और दोस्तों को भेज दिया… एक टीनएज बच्चे ने छोटी बच्ची के साथ बलात्कार किया… कुछ बच्चे स्कूल में असामान्य अवस्था में पाए गए और जब उनसे पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि हम रेप गेम खेल रहे थे… माता-पिता अपने बच्चों के बारे में ऐसी बातें सपने में भी नहीं सोच सकते, पर ये आज की सच्चाई है. आज बच्चे तेज़ी से अपनी उम्र से पहले ही बड़े हो रहे हैं. ऐसे में पैरेंट्स को उन्हें हैंडल करना किसी चैलेंज से कम नहीं.

 

मुझे चांद-खिलौना ला दो मां… मुझे तारों तक पहुंचा दो मां… नन्हीं-सी गुड़िया ला दो मां… प्यारी-सी चुनरी दिला दो मां… पहन चुनरिया नाचूंगी, गुड़िया का ब्याह रचाऊंगी…” ऐसी ही ख़्वाहिशें थीं और कुछ ऐसा ही था हमारा बचपन और शायद 20-25 साल पहले तक भी बच्चों का बचपन कुछ ऐसा ही मासूमियत भरा था, लेकिन आज बचपन ऐसा नहीं है. आज के बच्चे कच्ची उम्र में ही जाने-अनजाने वयस्कों की तरह व्यवहार करने लगे हैं और उसे सही भी समझते हैं.

बोल्ड होते बच्चे

पुरानी पीढ़ी जिन विषयों पर युवावस्था में भी बातें करने से कतराती थी, वो बातें मासूम बच्चे या टीनएजर बेहिचक करने लगे हैं. 30 वर्षीया विनिता अपनी 4 साल की बेटी के साथ खिलौने की दुकान पर गई थी. वहां एक डॉल देखकर वो मचल गई कि बस यही चाहिए. विनिता के मना करने पर बच्ची ने कहा, “प्लीज़ मम्मा, ले दो ना. देखो ना कितनी हॉट और सेक्सी लग रही है.” 4 साल की बेटी के मुंह से निकले ऐसे शब्दों ने उसे अंदर तक हिला दिया, लेकिन आज ऐसे शब्द बोलचाल की भाषा मेंे बच्चे बड़ी सहजता से इस्तेमाल कर रहे हैं, भले ही वे इसका अर्थ समझें या न समझें. इतना ही नहीं, वे सेक्स की आधी-अधूरी जानकारी के साथ एक्सपेरिमेंट करने से भी नहीं कतराते. इस बात का खुलासा करते हुए सिनेमा हॉल में टिकट बुकिंग विंडो पर बैठनेवाले महेश कहते हैं, “बच्चे नकली आईडी प्रूफ़ के साथ एडल्ट फ़िल्म आराम से देखते हैं. शक के बावजूद हम कुछ नहीं कर पाते हैं.”
आजकल बच्चियांं मल्लिका व राखी बनना चाहती हैं. मुन्नी-शीला जैसा डांस करना चाहती हैं. छोटे-छोटे लड़कों की पसंद भी मुन्नी-शीला है. आज 4-10 साल की उम्र में ही बच्चे हॉट और सेक्सी की चाहत में सेक्सी कपड़े पहनना चाहते हैं. उत्तेजित क़िस्म के डांस करना चाहते हैं.

मीडिया व मॉडर्न लाइफ़स्टाइल भी ज़िम्मेदार

चाइल्ड सायकोलॉजी की टीचर वंदना उपाध्याय कहती हैं, “बच्चे ये सब कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें अपने आसपास यही सब दिखाई दे रहा है. मीडिया व मॉडर्न लाइफ़स्टाइल उन्हें सिखा रहा है कि सुंदर व सेक्सी दिखने के आगे अन्य गुणों का मोल फीका है. बच्चों को सुपरस्टार बनाने की होड़ में कभी-कभी पैरेंट्स भी अनजाने ही इन चीज़ों को बढ़ावा दे जाते हैं.”
सायकोलॉजिस्ट अरुणेश कुमार का कहना है, “हमारे बच्चों का दिमाग़ पहले से ही इंटरनेट से मिलनेवाली आधी-अधूरी जानकारी से भरा हुआ है. इसके साथ जो दूसरी समस्या जुड़ी है, वो यह है कि हमारे घरों में अभी भी सेक्स जैसे विषय पर बातचीत नहीं की जाती है, तो उन्हें सही ज्ञान या सीमा के बारे में कहां से समझ में आएगा?”
महानगरीय संस्कृति ने भी इन बातों को बढ़ावा दिया है. वर्किंग पैरेंट्स अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं. बच्चे घर से बाहर जाकर मस्ती न करें, इसलिए उन्हें कंप्यूटर और वीडियो गेम थमा देते हैं, ताकि वो घर पर ही एंजॉय कर सकें. उन्हें ़ज़्यादा से ज़्यादा सुविधाएं प्रदान करते हैं. अब बच्चे घर पर रह कर क्या रहे हैं, भला इसका पैरेंट्स को कहां पता होता है? ऐसे में वो इंटरनेट का ग़लत इस्तेमाल भी करने लग जाते हैं.
हालांकि आज बच्चों के साथ किसी बात के लिए जोर-ज़बरदस्ती नहीं की जानी चाहिए. इस तरह उन्हें रोका भी नहीं जा सकता है, लेकिन यह कहकर भी पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता है कि ‘हम क्या करें. बच्चे सुनते ही नहीं हैं, समझना ही नहीं चाहते हैं’ आज ब्लैक एंड व्हाइट का ज़माना नहीं है. बच्चों की दुनिया में रंगीन सपने हैं. अतः उनके सपनों में रंग भरना भी पैरेंट्स की ही ज़िम्मेदारी है. शुरू से उन्हें संतुलित मनोरंजन व अनुशासन की आदत होनी चाहिए और उन्हें जानना चाहिए कि हर चीज़ या हर बात की एक उम्र होती है.
बच्चों के ऐसे व्यवहार के पीछे कई कारण हो सकते हैं. आइए, इनमें से कुछ आम कारणों पर नज़र डालें-
जिज्ञासु प्रवृत्ति- बच्चों में हर बात को जानने की जिज्ञासा होती है. यह उनकी सहज प्रवृत्ति है. वे कहीं कुछ भी होता देखते हैं, तो उसे ख़ुद भी करके देखना चाहते हैं. उनके मन में विपरीत सेक्स के शारीरिक अंगों के प्रति भी जिज्ञासा होती है. यदि इस जिज्ञासा को सही तरी़के से हैंडल न किया गया, तो ये ग़लत मनोभावों को जन्म देती है.
खुलकर बातचीत न होना- हमारे देश में आज भी पैरेंट्स अपने बच्चों से सेक्स के विषय में बात नहीं करते हैं. बच्चा यदि सवाल करता है, तो उसे डांटकर चुप करा दिया जाता है. धीरे-धीरे बच्चे इधर-उधर से आधी-अधूरी जानकारी हासिल करने लगते हैं और ग़लत राह पर भटक जाते हैं. उम्र के साथ उनको सेक्स से संबंधित ज़रूरी जानकारी भी दी जानी चाहिए. बेहतर तो यही है कि पैरेंट्स स्वयं उनसे बात करें और सही ज्ञान दें.
प्राइवेसी व स्पेस- प्राइवेसी ने जहां एक तरफ़ बच्चे को थोड़ा आत्मनिर्भर बनाया है, वहीं दूसरी तरफ़ उन्हें बिगाड़ने में भी कमी नहीं रखी है. 14 वर्षीय राहुल दिनभर अपने कमरे में रहता है. कंप्यूटर जैसी सब सुविधाएं हैं, दोस्त भी आते हैं. गेम्स भी खेलते हैं. एक दिन मम्मी के अचानक प्रवेश करने पर राहुल ने तुरंत टोक दिया, “मम्मी, नॉक करके आया कीजिए.” जब चुपचाप छानबीन की गई, तो ड्रग्स, अश्‍लील साहित्य व अनेक नग्न चित्र मिले. स्पेस व प्राइवेसी आत्मनिर्भता के लिए सही है, लेकिन यह देखना भी ज़रूरी है कि एकांत में बच्चे करते क्या हैं. कहीं वे एकांत का नाजायज़ फ़ायदा तो नहीं उठा रहे हैं.
भावनात्मक जुड़ाव का अभाव- कुछ लोगों का मानना है कि वर्किंग पैरेंट्स बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते, इसलिए बच्चे बिगड़ जाते हैं. ये सच नहीं है. समस्या तब बढ़ती है, जब पैरेंट्स साथ होकर भी भावनात्मक रूप से उनसे जुड़ नहीं पाते हैं, बल्कि उनकी ज़रूरतें पूरी करके और पैसे कमाकर यह समझ लेते हैं कि बच्चों को पूरा प्यार दे रहे हैं. वे साथ खाना तो खाते हैं, लेकिन टीवी देखते हुए. धीरे-धीरे घर में पसरता कम्यूनिकेशन गैप बच्चों को दोस्तों के क़रीब ले आता है. फिर तो सही-ग़लत की दुनिया या आधी-अधूरी जानकारी का रास्ता भी दोस्त ही बनते हैं.
शक्की पैरेंट्स- 15 वर्षीय रोहित अपने मम्मी-पापा के शक्की स्वभाव से परेशान है. कहीं मीडिया में बच्चों के बिगड़ने की कोई ख़बर आई नहीं कि रोहित पर पाबंदियां बढ़ जाती हैं. उसके दोस्तों पर शक किया जाने लगता है. पैरेंट्स ऐसे व्यवहार करते हैं, मानो बच्चे कुछ छुपा रहे हैं. बच्चों को जब महसूस होता है कि पैरेंट्स को उन पर भरोसा नहीं है, तो वो भी उनसे बातें छुपाने लगते हैं. इस तरह बच्चा साथ रहकर भी अकेला हो जाता है और उसके ग़लत रास्ते की ओर बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है.

क्या करें पैरेंट्स?

कम्यूनिकेशन गैप न आने दें- समस्याएं तभी बढ़ती हैं, जब आपसी बातचीत का ज़रिया रुक जाता है और बातें अनकही रह जाती हैं. साथ ही बच्चों से बातचीत करते समय उनकी समस्या को समझने के लिए आपको उनके स्तर पर आना होगा, क्योंकि आप उनकी उम्र के दौर से गुज़र चुके हैं. वो आपकी उम्र की विचार शक्ति तक नहीं पहुंचे हैं.
रिश्तों व संस्कारों की अहमियत समझाएं- बचपन से ही सही व अच्छे संस्कारों के साथ उनकी परवरिश करें. आदर्श माता-पिता बनें, तभी वो सही दृष्टिकोण को अपना सकेंगे और रिश्तों को समझेंगे. उनमें पॉज़िटिव सोच बढ़ेगी और ग़लत हरकतों से दूर रह पाएंगे.
अलग कमरा दें, अलग ज़िंदगी नहीं- यदि सुविधा है और आपने अपने बच्चों को अलग कमरा दिया है, तो शुरू से ही उसके कमरे में आते-जाते रहें. वहां बैठकर बातें करें और पूरी कोशिश करें कि उसकी ज़िंदगी उस कमरे में सिमटकर न रह जाए. अपनी आलमारी अरेंज करते समय उसकी मदद लें और उसके कमरे की साफ़-सफ़ाई में उसकी मदद करें, ताकि आपस में खुलापन बना रहे.
अच्छी क़िताबें पढ़ने की आदत डालें- क़िताबों से बच्चों का परिचय एक वर्ष की उम्र के अंदर ही हो जाना चाहिए. जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगें, उम्र के अनुसार उन्हें अच्छी क़िताबें पढ़ने के लिए दें, ताकि शुरू से अच्छा साहित्य व अच्छी पुस्तकों के प्रति सम्मान बना रहे. अच्छी क़िताबें पढ़ने से तर्क बुद्धि विकसित होती है तथा सही-ग़लत की पहचान समय पर आने लगती है.
पैसे से प्यार को न जोड़ें- प्यार के नाम पर बच्चों की हर सही-ग़लत मांग को पूरा न करें. आप उन्हें समय नहीं दे पा रहे हैं, इस कारण हीनभावना या अपराधबोध मन में मत पालें, क्योंकि आप जो कर रहे हैं, उन्हीं के लिए कर रहे हैं. बच्चों की हर मांग को पूरी करने से पहले देखें कि वो कितनी ज़रूरी है. उसे ख़ुश करने के लिए पैसे मत दें.
दोस्त बनें- बच्चों को हर बात शेयर करने की छूट दें. कई बार पैरेंट्स पूरी बात सुने बिना ही अपनी टिप्पणी या निर्णय दे बैठते हैं. ऐसे में बच्चा अपनी बात शेयर नहीं करना चाहता. बच्चों को समझने के आपके तरी़के सही हो सकते हैं, लेकिन उनकी उम्र और उस उम्र की जिज्ञासा को समझना ज़रूरी है. उनके साथ टीवी प्रोग्राम देखें. साथ डिनर करें. उसके दोस्त बनें. फिर देखिए वो अपनी हर बात आपसे शेयर करने लगेगा.
उपदेश देनेे की बजाय बच्चे की भी सुनें- हमारे यहां बड़े हमेशा बच्चों को उपदेश देते रहते हैं यानी उन्हें समझाते रहते हैं. यदि पिता की उम्र 60 की है और बेटे की 35, तो भी पिता उसे उपदेश देना अपना अधिकार समझते हैं. ऐसा करने से बचें. बच्चों को सही दिशा देने या उनकी ग़लत बातों को जानने के लिए ज़रूरी है कि धैर्य के साथ उन्हें सुना जाए. अपनी बात रखने का उन्हें मौक़ा दिया जाए. हम जितना ज़्यादा बच्चों को सुनेंगे, उतनी अच्छी तरह उनकी मनोवृत्ति समझ पाएंगे व उनके क़दम बहकने से पहले ही उन्हें रोक पाएंगे.

– प्रसून भार्गव

रिश्तों में ज़रूरत से ज़्यादा स्पेस कहीं कर न दे अपनों को दूर…(Too much space in relationships can be dangerous)

Space in relationships

कभी हाथों में थामे हाथ, तो कभी लबों पर बस तेरी ही बात… धीरे-धीरे ख़्वाब छूटे… लबों पर बसे जज़्बात छूटे… दिल की हसरतें बाकी तो हैं अभी, पर न जाने किस मोड़ पर कुछ एहसास छूटे… न तुमको ख़बर हुई, न हमें पता चला… कब साथ चलते-चलते हमारे हाथ छूटे…

Space in relationships

अक्सर ऐसा होता है कि हम अपने रिश्ते में समझ ही नहीं पाते कि कब और कैसे इतनी दूरियां (Space in relationships) आ गईं, जबकि पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यही लगता है कि सब कुछ तो ठीक ही था… जी हां, ऐसा इसलिए होता है कि हम सो कॉल्ड स्पेस के नाम पर कुछ ज़्यादा ही दूरियां बना लेते हैं और कब ये दूरियां रिश्तों को ख़त्म करने लगती हैं, हमें एहसास ही नहीं होता.

अति किसी भी चीज़ की सही नहीं: चाहे कोई अच्छी ही चीज़ क्यों न हो, पर ओवरडोज़ किसी भी चीज़ का सही नहीं है.

– यह ठीक है कि आपको बार-बार पार्टनर को टोकना या उसके किसी भी काम में दख़ल देना पसंद नहीं, लेकिन इसका यह भी अर्थ नहीं कि बिल्कुल ही न टोकें.

– हो सकता है आपके न टोकने का कोई ग़लत मतलब निकाल ले. इससे न स़िर्फ रिश्ते में दूरियां बढ़ेंगी, बल्कि नीरसता भी आएगी.

– पार्टनर को लगेगा कि आपको तो उनकी किसी भी बात से कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता और दूसरी तरफ़ यह भी हो सकता है कि वो ग़लत राह पर भी चले जाएं.

विश्‍वास और अंधविश्‍वास के बीच का फ़र्क़ समझें: आप एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, यह अच्छी बात है. लेकिन चेक कर लें कि कहीं यह विश्‍वास अंधविश्‍वास में तो तब्दील नहीं हो गया?

– जी हां, अक्सर ऐसा ही होता है, जब हम आंख मूंदकर भरोसा करते हैं, तो भरोसा टूट भी सकता है. और तब बहुत अधिक तकलीफ़ होती है और इस बात का मलाल भी कि क्यों नहीं थोड़ी-सी सतर्कता व सावधानी बरती.

स्पेस का मतलब लापरवाह होना नहीं: हर बात पर आजकल यह जुमला चिपका दिया जाता है कि हर रिश्ते में स्पेस ज़रूरी है, लेकिन स्पेस कितना और किस हद तक, इसका दायरा भी तो हमें ही तय करना होगा.

– स्पेस के नाम पर आप अपने रिश्ते के प्रति इतने लापरवाह न हो जाएं कि एक-दूसरे की तरफ़ ध्यान ही न दें और धीरे-धीरे रिश्ते में से रोमांस ही गायब हो जाए.

कम्यूनिकेशन न के बराबर ही तो नहीं रह गया: यह सही है कि दिनभर जासूसों की तरह पार्टनर की ख़बर या उस पर नज़र रखना ठीक नहीं, लेकिन ख़बर ही न रखना ख़तरे की निशानी है.

– ऐसे में कम्यूनिकेशन गैप इस हद तक बढ़ जाता है कि यदि आप कुछ सवाल करते भी हैं, तो पार्टनर को वो दख़लअंदाज़ी लगने लगता है, क्योंकि उसको आदत ही नहीं इसकी.

स्पेस का सही अर्थ समझें: स्पेस का मतलब रिश्ते के प्रति बेपरवाह हो जाना नहीं होता.

– स्पेस(Space in relationships) उतना ही होना चाहिए, जितना रिश्ते को सांस लेने के लिए ज़रूरी हो. उसे खुली हवा में छोड़ देंगे, तो वो बेलगाम पतंग की तरह छूटता ही जाएगा.

– आजकल अक्सर कपल्स अपने-अपने फोन्स पर, विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बिज़ी रहते हैं और दोनों ही पार्टनर्स को इसमें दिलचस्पी कम ही रहती है कि उसका पार्टनर कहां किसके साथ बिज़ी है.

– फोन नहीं, तो लैपटॉप्स या टीवी देखने में लोग अधिक समय बिताना पसंद करते हैं, बजाय एक-दूसरे के साथ के.

– डिजिटल वर्ल्ड ने भी हमें स्पेस के नाम पर बहुत ज़्यादा ओपन स्पेस दे दिया है, जहां हम अपने रिश्तों से दूर होते जाते हैं और नए-नए रिश्तों के जाल में फंसते चले जाते हैं.

– बेहतर होगा इससे बचें या कम से कम इस पर नज़र रखें.

छूट के नाम पर असंतुलित तो नहीं हो गया रिश्ता: आपको अंदाज़ा भी नहीं हो पाता कि कब आपका वो रिश्ता असंतुलित हो गया, जिसे आप अब तक परफेक्ट समझ रहे थे.

– इतना स्पेस दिया कि आप दोनों के बीच अब स़िर्फ स्पेस ही रह गया. बैलेंस या संतुलन बेहद ज़रूरी है हर रिश्ते के लिए.

– पार्टनर का डेली रूटीन, उसके फ्रेंड्स, वो किससे बात करता है, किसके मेल्स उसे आते हैं आदि बातों की कम से कम हल्की-सी जानकारी ज़रूर रखें.

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क्या करें, क्या न करें?

– एक-दूसरे पर भरोसा करें, लेकिन आंखें न मूंद लें.

– इतने भी बेपरवाह न हो जाएं कि रिश्ते से रोमांस गायब होने लगे.

– रिश्ते में गर्माहट बनाए रखने के लिए रोमांटिक बातें करें, डेट्स प्लान करें.

– निजी पलों को जीने के लिए व़क्त ज़रूर निकालें. एक-दूसरे की कंपनी एंजॉय करें और कभी-कभी सरप्राइज़ भी दें.

– ऐसा न हो कि आप दोनों ही अपने-अपने फ्रेंड्स सर्कल के साथ ही पार्टी करते रह जाएं और यह भी याद न रहे कि आख़िरी बार आप दोनों ने साथ में व़क्त कब गुज़ारा था.

– अगर आपको लग रहा है कि आपका रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा, तो उसके कारणों पर आपस में बैठकर चर्चा करें और समाधान भी निकालें.

– थोड़ी रोक-टोक और दख़लअंदाज़ी रिश्तों में जीवंतता बनाए रखती है. इसे रिश्तों से गायब न होने दें.

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हर रिश्ते पर यही नियम लागू होता है

– चाहे पैरेंट्स हों, भाई-बहन, दोस्ती या अन्य कोई भी रिश्ता, ज़रूरत से ज़्यादा स्पेस आपके बीच दूरियां ही बढ़ाएगी.

– अगर पैरेंट्स बच्चों को ज़रूरत से ज़्यादा स्पेस देते हैं, तो हो सकता है वो भटक जाएं.

– बच्चों को अनुशासन में रखना उनकी ज़िम्मेदारी है, कुछ नियम और निर्देशों का पालन हर रिश्ते में ज़रूरी होता ही है, वरना प्रतिबद्धता और रिश्ते में भरोसा रह ही नहीं जाता.

– लेकिन आज की जनरेशन इसी अनुशासन को निजी जीवन में दख़लअंदाज़ी मानती है, जिससे सीमा रेखा तय करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है.

– एक व़क्त था, जब भाई-बहन या सिबलिंग्स आपस में बहुत-से सीक्रेट्स शेयर करते थे, लेकिन अब ‘स्पेस’ के नाम पर सब कुछ सीक्रेट ही रह जाता है और अगर किसी से कुछ पूछो, तो जवाब यही मिलता है कि ये हमारी पर्सनल लाइफ है, आख़िर हमें भी तो स्पेस चाहिए. 

– इसी चक्कर में एक व़क्त ऐसा आता है, जब स़िर्फ स्पेस ही रह जाता है. बेहतर होगा, व़क्त रहते इस स्थिति को समझें और अपने रिश्ते को सेफ करें.

– गीता शर्मा

स्मार्ट स्पेस सेविंग फर्नीचर

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प्रॉपर्टी की आसमान छूती क़ीमतों के कारण बड़ा और आलिशान मकान ख़रीदना हर किसी के बस की बात नहीं है. शहरों में अक्सर छोटे घरों में ही लोगों को गुज़ारा करना पड़ता है. ऐसे में छोटे से घर में फर्नीचर सिलेक्ट करना बहुत मुश्किल हो जाता है. आपकी परेशानी दूर करने के लिए हम बता रहे हैं कुछ स्मार्ट आइडियाज़, जिससे आप अपने ड्रीम होम को दे सकती हैं अट्रैक्टिव लुक.

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सोफा कम बॉक्स बेड
अपने किसी दोस्त या कलीग के घर में लग्ज़ीरियस सोफा देखकर यदि आप भी उसे अपने स्मॉल साइज़ लिविंग रूम में लाने की सोच रही हैं, तो ऐसी ग़लती न करें. छोटे कमरे में बड़ा फर्नीचर रखने से कमरा भरा-भरा दिखेगा. एल शेप सोफा आपके कमरे को पूरी तरह से कवर कर लेगा और कमरे में बिल्कुल जगह नहीं बचेगी.

स्मार्ट आइडिया
बड़ा सोफा रखने की बजाय आप सोफा कम बॉक्स बेड का सिलेक्शन करें. दिन में ये सोफा का काम करेगा और रात में इसे आप बेड की तरह यूज़ कर सकती हैं. इतना ही नहीं, बॉक्स होने के कारण आप इसमें सामान भी रख सकती हैं.

 

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वॉल बेड
बड़े शहरों, ख़ासकर मेट्रो सिटीज़ में फ्लैट के कमरे इतने छोटे होते हैं कि किंगसाइज़ बेड रखने के बाद बेडरूम में जगह ही नहीं बचती. भले ही किंग साइज़ बेड पर सोने में आनंद आता है, लेकिन ये पूरे कमरे को कवर कर लेता है, जिससे कमरे में स़िर्फ बेड ही बेड दिखाई देगा.

स्मार्ट आइडिया
आप चाहें तो न्यू ट्रेंड को फॉलो करते हुए बेडरूम के लिए वॉल बेड ले सकती हैं. इससे जब आपको सोना हो, तो बेड नीचे कर लें, वरना इसे वॉल पर फिट कर दें.

 

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डायनिंग टेबल एंड चेयर्स
आजकल डायनिंग रूम की जगह डायनिंग एरिया मिलने लगा है. हॉल में एक किनारे पर जगह होती है, जहां लोग डायनिंग टेबल रख देते हैं. मेहमानों के आने के बाद डायनिंग चेयर्स को कभी टेबल के ऊपर तो कभी किसी तरह से एडजस्ट करना पड़ता है.

स्मार्ट आइडिया
मार्केट में ऐसे डायनिंग टेबल मिलने लगे हैं, जो काम ख़त्म होने के बाद आपस में जुड़ जाते हैं. इससे न स़िर्फ टेबल की जगह बचती है, बल्कि इसमें आप डायनिंग संबंधी सामान भी रख सकती हैं.

 

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फोल्ड डाउन टेबल
लिविंग रूम में ही बड़ा-सा स्टडी टेबल रखने की मजबूरी कमरे के लुक को बिगाड़ देती है. इससे कमरा भरा लगने के साथ ही बदसूरत भी लगने लगता है. किसी के आ जाने पर आप समझ नहीं पाते कि इस स्टडी टेबल का क्या किया जाए.

स्मार्ट आइडिया
अपने पुराने स्टडी टेबल को हटाइए और घर ले आइए फोल्ड डाउन टेबल. ये दीवार में फिट होता है. जब यूज़ करना हो, तो इसे लगाइए. ये दीवार पर कुछ इस तरह फिट हो जाता है कि लगता है मानों कोई पेंटिंग हो.

 

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स्टेयर ड्रॉवर्स
फैमिली बड़ी होने के कारण क्या आपके घर में भी कई अलमारी और वॉर्डरोब हैं, जो जगह घेरे हुए हैं. आपको सामान रखने के लिए घर में अलग से ड्रॉवर बनवाने और ख़र्च करने की ज़रूरत नहीं है. आप उसी जगह को सही तरह से एडजस्ट करके यूज़ कर सकती हैं.

स्मार्ट आइडिया
घर में बनी सीढ़ियों का यूज़ भी आप सामान रखने के लिए कर सकती हैं. सीढ़ियों के नीचे ड्रॉवर बनवाएं. ये एक्स्ट्रा जगह भी नहीं लेंगे और इनमें आप आसानी से सामान भी रख सकेंगी. इतना ही नहीं, इससे आपको अलग से शू रैक रखने की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी.

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आयर्निंग बोर्ड मिरर
घर में बड़ा-सा ड्रेसिंग टेबल रखकर बेडरूम के साइज़ को कम करने की भूल न करें. इससे कमरा और छोटा लगेगा. साथ ही कपड़ों को प्रेस करने के लिए जगह घेरता आयर्निंग बोर्ड भी घर का लुक बिगाड़ देता है.

स्मार्ट आइडिया
आप चाहें तो इन दोनों को क्लब कर सकती हैं. जी हां, आयर्निंग बोर्ड मिरर से आप दोनों काम कर सकती हैं.

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पेंटिंग कम ज्वेलरी स्टोरेज
आमतौैर पर महिलाओं को ज्वेलरी का बहुत शौक़ होता है. उनके पास ज्वेलरी का अच्छा-खासा कलेक्शन होता है. ऐसे में ज्वेलरी को वो कभी दरवाज़े के पीछे, तो कभी वॉल हैंगिंग पर लटका देती हैं, जिससे कमरे का लुक बिगड़ जाता है. आप ऐसी ग़लती न करें. ज्वेलरी रखने के लिए दीवार पर पेंटिंग कम ज्वेलरी स्टोरेज बनवाएं. इससे सारी ज्वेलरी सुरक्षित रहेगी और बेडरूम/लिविंग रूम का लुक भी बदल जाएगा.

 

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बुक चेयर
पूरे घर में बुक्स बिखरी रहती हैं और उन्हें रखने के लिए अलग से बुक शेल्फ बनवाने की जगह नहीं है, तो आज ही घर ले आइए बुक चेयर और एक्स्ट्रा जगह बचाइए.

 

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विंडो ब्लाइंड्स
अगर आपके घर में कपड़े सुखाने की जगह नहीं है, तो आप अपने विंडो ब्लाइंड्स को यूज़ कर सकती हैं. इससे घर में कपड़े सुखाने के लिए एक्स्ट्रा जगह भी नहीं लगेगी और कपड़े सूख भी जाएंगे.

– श्वेता सिंह

रिश्तों में बचें इन चीज़ों के ओवरडोज़ से (Overdose of love in relationships)

Overdose of love

Overdose of love

मनोचिकित्सक डॉ. चंद्रशेखर सुशील कहते हैं कि एक-दूसरे की परवाह, प्यार व अपनापन अच्छा है, पर जब कोई भी भावना अत्यधिक (Overdose of love) हो जाए, तो समझिए कुछ बुरा हो सकता है. इसी तरह से फैमिली काउंसलर श्रीमती सुमन भंडारी का मानना है कि हर शादी- चाहे लव मैरिज हो या अरेंज्ड, एक समझौता होती है. रिश्तों में ट्रांसपरेंसी होना बेहद ज़रूरी है, लेकिन ओवरडोज़ नहीं. आइए देखें कि किन भावनाओं के अतिरेक से हमें बचना चाहिए-

पज़ेसिवनेस

किसी भी क़रीबी रिश्ते में पज़ेसिव होना स्वाभाविक है, परंतु अत्यधिक पज़ेसिव होने से आप सामनेवाले को स्पेस नहीं दे पाते. आपको लगता है कि आप उससे बेइंतहा (Overdose of love) प्यार कर रहे हैं, उसकी केयर कर रहे हैं, लेकिन इसके चलते आप उसकी पर्सनल स्पेस को ख़त्म कर देते हैं, जिससे उसे घुटन होने लगती है.

एडवोकेट कल्पना शर्मा बताती हैं कि तलाक़ के कई कारणों में ओवर पज़ेसिवनेस बड़ा फैक्टर है. पति-पत्नी में से कोई एक यदि इससे ग्रस्त है, तो ईर्ष्या, घुटन, कुढ़न आती ही है और ज़िंदगी नासूर बन जाती है. जिसे भी आप प्यार करते हैं, उसकी जगह ख़ुद को रखकर सोचें कि कहीं आप भी ओवर पज़ेसिव तो नहीं? यदि हां, तो स्वयं को तुरंत बदलने की कोशिश करें.

स्पेस न देना

पति-पत्नी या सहेलियों में नज़दीकी स्वाभाविक है. एक-दूसरे की अंतरंग बातें जानना भी सहज है, पर समस्या तब होती है, जब दोनों एक-दूसरे को अपने मन मुताबिक़ चलाना चाहते हैं और हर बात की रिपोर्ट मांगते हैं, फ्री टाइम बिल्कुल नहीं देते. ऐसे में हर बात की सफ़ाई देते-देते थकान व नीरसता आने लगती है. ‘सरप्राइज़’ रिश्तों में हमेशा नयापन लाता है, जिसके लिए थोड़ी दूरी और स्पेस ज़रूरी है. कुछ दूरी रिश्तों में मिठास भी भर देती है. बेहतर होगा कि जब भी संभव हो, कुछ समय दोस्त, जीवनसाथी, सहेली से अलग भी बिताने का प्रयत्न करें. आपके रिश्तों में नई उष्मा का संचार होगा.

तारीफ़ करना

तारीफ़ करना और सुनना हम सभी को बहुत अच्छा लगता है, पर बहुत अधिक तारीफ़ करने से सामनेवाला उसे सहज तौर पर लेने लगता है. संगी-साथियों में भी अधिक तारीफ़ से वे आपको लाइटली लेने लगते हैं या बात की वैल्यू नहीं समझ पाते. नतीजतन आपका मन बुझ जाता है. तारीफ़ कीजिए, पर सोच-समझकर और बार-बार मत दोहराइए.

प्रोटेक्टिव होना

रिलेशनशिप में हम अपनों के प्रति प्रोटेक्टिव हो जाते हैं. पैरेंट्स, पत्नी, बच्चे, बहन या प्रेमिका किसी की भी चिंता करना अच्छा है, पर इतनी चिंता करना कि वो असहज हो जाएं? आप पर पूर्णतया निर्भर हो जाएं, ठीक नहीं. बेटियों या अपनी पत्नी को सुरक्षा की दृष्टि से घर से बाहर न निकलने देना, मनचाहे कपड़े न पहनने देना, मनचाही नौकरी न करने देना या दूसरे शहर न जाने देना उनके व्यक्तित्व को कमज़ोर बनाएगा और फ्रस्ट्रेशन डेवलप करेगा. बेहतर होगा कि आप उनके व्यक्तित्व को ग्रो करने दें. श्रीमती भंडारी बताती हैं कि आजकल शादियां देर से होती हैं. लड़का-लड़की दोनों इंडिपेंडेंट होते हैं, ऐसे में यदि वो एक-दूसरे के प्रति ओवरप्रोटेक्टिव होंगे, तो दोनों का ईगो टकराएगा. इसीलिए प्री मैरिटल काउंसलिंग बहुत ज़रूरी है. अक्सर छोटी-सी ग़लती विवाह विच्छेद का कारण बन जाती है.

हर बात शेयर करना

शेयरिंग किसी भी रिश्ते की मज़बूती का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, लेकिन हर ग़ैरज़रूरी बात व चीज़ भी शेयर करने लग जाएं, तो अक्सर ग़लतफ़हमियों की संभावना अधिक हो जाती है. ख़ासतौर से पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका को हर बात शेयर नहीं करनी चाहिए. उदाहरण के तौर पर, यदि आप अपने किसी कलीग के बारे में या किसी के स्वभाव के बारे में बात करते हैं या ऑफिस की, घर की हर बात शेयर करते हैं, तो आपका पार्टनर अपनी राय देगा या अपने तरी़के से चीज़ों को समझकर रिएक्ट करेगा, जिससे बात-बात में ही विवाद व झगड़े हो जाते हैं. इसलिए शेयरिंग एक सीमा तक ही ठीक है. अत्यधिक शेयरिंग कई बार रिश्तों में खटास ला देती है.

अत्यधिक अपेक्षाएं

सास को बहू से, पति को पत्नी से, बच्चों को पैरेंट्स से, दोस्तों को आपस में एक-दूसरे से उम्मीदें होती हैं. हर रिश्ता उम्मीदों पर टिका होता है. सायकोलॉजिस्ट रश्मि सक्सेना कहती हैं कि बहुत ज़्यादा एक्सपेक्टेशन से रिश्ते ख़त्म हो जाते हैं. हम दूसरे से ज़रूरत से ज़्यादा उम्मीद करते रहते हैं, बिना उसकी परिस्थितियों को समझे. साथ ही हम यह भूल जाते हैं कि हमने उनके लिए क्या किया? कई बार अव्यावहारिक उम्मीदें कर बैठते हैं, नतीजा मनमुटाव, द्वेष, अलगाव. इसीलिए दूसरों से बहुत अधिक अपेक्षाएं न रखें, आप सुखी रहेंगे और आपके रिश्ते क़ामयाब.

वाचालता

कुछ रिश्ते हमारे पारंपरिक समाज में बड़े ख़ुशमिज़ाज, चटपटे व रसीले माने जाते हैं- जीजा-साली, देवर-भाभी में चुहल आम बात है, पर इन नाज़ुक रिश्तों में अधिक वाचाल होना मुसीबत मोल लेना है. मर्यादा को समझकर, सीमा में रहना ही श्रेयस्कर है. मस्ती-मज़ाक में कब रिश्तों की मर्यादा व सीमा टूट जाती है और सामनेवाले को ठेस लग जाती है, हम समझ ही नहीं पाते. इसलिए सीमा में रहकर ही मज़ाक करें, तो बेहतर होगा.
मस्ती-मज़ाक, रोमांस, चुहल, छेड़खानी, एक-दूसरे का ध्यान रखना- यह सभी विभिन्न रिश्तों की अलग पहचान है और जब तक ये अलग-अलग भाव रिश्तों में नहीं होंगे, जीवन का मज़ा भी नहीं आएगा. बस, बचना स़िर्फ अति से है, क्योंकि अधिक मिठास भी सेहत को नुक़सान पहुंचाती है.

– पूनम मेहता