Spiritual

यहां उत्सव मनाया जा रहा है, क्योंकि यहां आनंद घटा है, घट रहा है। यहां धीरे-धीरे लोग आनंद के स्वाद में तल्लीन होते जा रहे हैं. यहां वीणा बजी है, धीरे-धीरे बहरे से
बहरे कानों को भी सुनाई पड़ने लगी है। बीन के बजने पर जैसे सांप नाच उठता है, ऐसे आनंद के भीतर बजने पर तुम भी नाच उठोगे; उसी नाच का नाम उत्सव है।

Osho

उत्सव का अर्थ है: अनुग्रह। उत्सव का अर्थ है: धन्यवाद। उत्सव का अर्थ है: मुझ अपात्र को इतना दिया! इतना जिसकी न मैं कल्पना कर सकता था न कामना! मेरी झोली में पूरा आकाश भर दिया! मेरे हृदय में पूरा अस्तित्व उड़ेल दिया! मेरे इस छोटे से घट में शाश्‍वत अमृत डाल दिया! अब मैं क्या करूं?

उस अपूर्व आनंद की स्थिति में नाचोगे नहीं? गाओगे नहीं? उल्लास, उमंग, उत्साह न जगेगा? हजार-हजार रूपों में जगेगा। उसका नाम उत्सव है। आनंद का अनुभव और फिर
वाणी से उसे कहने का उपाय न मिलने के कारण उत्सव पैदा होता है। उत्सव आनंद की अभिव्यक्ति है- शब्द में नहीं; जीवन में, आचरण में।

जो लोग बाहर से देखते हैं, जो कभी यहां आते भी नहीं, उन्हें तो यही लगता है कि राग-रंग चल रहा है। यहां उत्सव पैदा हुआ है। और स्वभावतः, परमात्मा भी उतरे तुम्हारे
भीतर तो भी तुम्हारा उत्सव तो बहुत कुछ वैसा ही होगा न जैसा जगत का होता है। किसी को धन मिल जाए और नाच उठे और मीरा को कृष्ण मिले और मीरा नाच उठी।
अगर तुम नाच ही देखोगे तो दोनों का नाच एक जैसा ही मालूम होगा, क्योंकि नाच तो देह से प्रकट हो रहा है। लेकिन कारण भिन्न-भिन्न हैं। मीरा इसलिए नाच रही है कि ध्यान मिला, और तुम इसलिए नाच रहे हो कि लॉटरी मिल गई। दोनों के कारण भिन्न हैं।

आनंद फैलाव है, दुख सिकुड़ाव है। तुमने अनुभव भी किया होगा, जब तुम दुखी होते हो तो बिल्कुल सिकुड़ जाते हो। जब तुम दुखी होते हो, तुम द्वार-दरवाजे बंद करके एक कोने में पड़े रहते हो। तुम चाहते हो कोई मिले न, कोई बोले न, कोई देखे न, कोई दिखाई न पड़े। बहुत दुख की अवस्था में आदमी आत्मघात तक कर लेता है। वह भी सिकुड़ने का ही अंतिम उपाय है। ऐसा सिकुड़ जाता है कि अब दोबारा न देखना है रोशनी सूरज की, न देखना है चेहरे लोगों के, न देखना है खिलते गुलाब। जब अपना गुलाब न खिला, जब अपना सूरज न उगा, जब अपने प्राण न जगे, तो अब दुनिया जागती रहे इससे क्या, हम तो सोते हैं!

विराट के साथ एक हो जाना आनंद। लेकिन आनंद को समा तो न सकोगे। आनंद तो उछलेगा। आनंद तो अभिव्यक्त होगा। आनंद तो बजेगा हजार-हजार रागों में। आनंद तो
बरसेगा हजार-हजार रंगों में। वही उत्सव है।

नाचो, गाओ, ध्यान में डूबो… ओशो से जानिए सच्ची ख़ुशी क्या है… देखें ये वीडियो:

आनंद है आत्म-अनुभव। उत्सव है परमात्मा के प्रति धन्यवाद।

जिन कुंजों में श्याम विहंसते राधा का भी ध्यान वहीं है।
नेक अनेक देख छवि मैंने मधुकर व्रत ले झूला डाला,
फूली डाल कदंब बिना ऋतु गलबांही की सरसी माला;
जहां जहां श्यामा रस गर्वित छवि का नवल विधान वहीं है।
जिन कुंजों में श्याम विहंसते राधा का भी ध्यान वहीं है।

और अगर तुम्हारी तैयारी हो तो बिना ऋतु भी कदंब की डाल फूल जाए। और तुम्हारी तैयारी हो तो कभी भी वसंत आने को तैयार है। वसंत द्वार पर खड़ा है। मधुमास तुम्हारी झोली भर देने को आतुर है… फूलों से, तारों से।

और तुम्हें थोड़ी-थोड़ी झलक मिलने लगे श्याम की, सत्य की, या स्वयं की, कि बस तुम्हारे जीवन में झूला डला! कि आया सावन! कि आया गीत गाने का मौसम! कि पैरों में घूंघर बांधने का क्षण! कि ढोलों पर थाप देने का क्षण! कि बजे अब बांसुरी! यह सुनते हो दूर कोयल की कुहू-कुहू! ऐसे ही तुम्हारे प्राणों में भी कोयल छिपी है। तुम्हारे अंतरतम में भी पपीहा है, जो पुकार रहा है-पी कहां! मगर तुम्हारे सिर में इतना शोरगुल है कि उस शोरगुल के कारण तुम सुन नहीं पाते।

आनंद है अनुभव। लेकिन हमारे मन की आदतें तो दुख ही दुख की हैं। शिकायत, निंदा, विरोध, ये हमारी मन की आदतें हैं। इन आदतों से जागो तो आनंद तो अभी घट जाए… इसी क्षण, यहीं! क्योंकि सारा अस्तित्व आनंद से भरपूर है, लबालब है। सिर्फ तुम उसे अपने भीतर लेने को राजी नहीं हो। तुम्हारे द्वार-दरवाजे बंद हैं।

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खोलो द्वार-दरवाजे! ये तुम्हारी सारी इंद्रियां आनंद के द्वार बनें। यह तुम्हारी देह आनंद को झेलने के लिए पात्र बने। यह तुम्हारा मन आनंद को अंगीकार करने के योग्य शांत
बने। ये तुम्हारे प्राण आनंदित होने के योग्य विस्तीर्ण हों। फिर जो होगा वह उत्सव है। फिर तुम भी चांद-तारों के साथ, फूलों के साथ, वृक्षों के साथ, हवाओं के साथ नाच सकोगे। उत्सव आनंद की अभिव्यक्ति है।

उत्सव आमार जाति पुस्तक से /सौजन्य ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन

भगवान शिव के 108 नाम और उनका अर्थ जानना हर शिवभक्त के लिए ज़रूरी है. देवों के देव महादेव के अनेक रूप हैं और उनके हर रूप का अलग नाम है. सोमवार के दिन जब भगवान शिव की उपासना करें, तो शिव के 108 नाम जरूर जपें. भगवान शिव के 108 नाम जपने से पहले आपको यदि उनके हर नाम का अर्थ पता हो, तो आप भगवान शिव के हर रूप को भलीभांति समझ सकेंगे. हर शिवभक्त को भगवान शिव के 108 नाम और उनका अर्थ मालूम होना ही चाहिए इसलिए हम आपको बता रहे हैं भगवान शिव के 108 नाम और उनका अर्थ.

Names Of Lord Shiva With Meanings

 

भगवान शिव के 108 नाम और उनका अर्थ

1. शिव – कल्याण स्वरूप
2. महेश्वर – माया के अधीश्वर
3. शम्भू – आनंद स्वरूप वाले
4. पिनाकी – पिनाक धनुष धारण करने वाले
5. शशिशेखर – चंद्रमा धारण करने वाले
6. वामदेव – अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
7. विरूपाक्ष – विचित्र अथवा तीन आंख वाले
8. कपर्दी – जटा धारण करने वाले
9. नीललोहित – नीले और लाल रंग वाले
10. शंकर – सबका कल्याण करने वाले
11. शूलपाणी – हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले
12. खटवांगी – खटिया का एक पाया रखने वाले
13. विष्णुवल्लभ – भगवान विष्णु के अति प्रिय
14. शिपिविष्ट – सितुहा में प्रवेश करने वाले
15. अंबिकानाथ – देवी भगवती के पति
16. श्रीकण्ठ – सुंदर कण्ठ वाले
17. भक्तवत्सल – भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले
18. भव – संसार के रूप में प्रकट होने वाले
19. शर्व – कष्टों को नष्ट करने वाले
20. त्रिलोकेश – तीनों लोकों के स्वामी
21. शितिकण्ठ – सफेद कण्ठ वाले
22. शिवाप्रिय – पार्वती के प्रिय
23. उग्र – अत्यंत उग्र रूप वाले
24. कपाली – कपाल धारण करने वाले
25. कामारी – कामदेव के शत्रु, अंधकार को हरने वाले
26. सुरसूदन – अंधक दैत्य को मारने वाले
27. गंगाधर – गंगा को जटाओं में धारण करने वाले
28. ललाटाक्ष – माथे पर आंख धारण किए हुए
29. महाकाल – कालों के भी काल
30. कृपानिधि – करुणा की खान
31. भीम – भयंकर या रुद्र रूप वाले
32. परशुहस्त – हाथ में फरसा धारण करने वाले
33. मृगपाणी – हाथ में हिरण धारण करने वाले
34. जटाधर – जटा रखने वाले
35. कैलाशवासी – कैलाश पर निवास करने वाले
36. कवची – कवच धारण करने वाले
37. कठोर – अत्यंत मजबूत देह वाले
38. त्रिपुरांतक – त्रिपुरासुर का विनाश करने वाले
39. वृषांक – बैल-चिह्न की ध्वजा वाले
40. वृषभारूढ़ – बैल पर सवार होने वाले
41. भस्मोद्धूलितविग्रह – भस्म लगाने वाले
42. सामप्रिय – सामगान से प्रेम करने वाले
43. स्वरमयी – सातों स्वरों में निवास करने वाले
44. त्रयीमूर्ति – वेद रूपी विग्रह करने वाले
45. अनीश्वर – जो स्वयं ही सबके स्वामी है
46. सर्वज्ञ – सब कुछ जानने वाले
47. परमात्मा – सब आत्माओं में सर्वोच्च
48. सोमसूर्याग्निलोचन – चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी आंख वाले
49. हवि – आहुति रूपी द्रव्य वाले
50. यज्ञमय – यज्ञ स्वरूप वाले
51. सोम – उमा के सहित रूप वाले
52. पंचवक्त्र – पांच मुख वाले
53. सदाशिव – नित्य कल्याण रूप वाले
54. विश्वेश्वर – विश्व के ईश्वर
55. वीरभद्र – वीर तथा शांत स्वरूप वाले
56. गणनाथ – गणों के स्वामी
57. प्रजापति – प्रजा का पालन- पोषण करने वाले
58. हिरण्यरेता – स्वर्ण तेज वाले
59. दुर्धुर्ष – किसी से न हारने वाले
60. गिरीश – पर्वतों के स्वामी
61. गिरिश्वर – कैलाश पर्वत पर रहने वाले
62. अनघ – पापरहित या पुण्य आत्मा
63. भुजंगभूषण – सांपों व नागों के आभूषण धारण करने वाले
64. भर्ग – पापों का नाश करने वाले
65. गिरिधन्वा – मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले
66. गिरिप्रिय – पर्वत को प्रेम करने वाले
67. कृत्तिवासा – गजचर्म पहनने वाले
68. पुराराति – पुरों का नाश करने वाले
69. भगवान् – सर्वसमर्थ ऐश्वर्य संपन्न
70. प्रमथाधिप – प्रथम गणों के अधिपति
71. मृत्युंजय – मृत्यु को जीतने वाले
72. सूक्ष्मतनु – सूक्ष्म शरीर वाले
73. जगद्व्यापी – जगत में व्याप्त होकर रहने वाले
74. जगद्गुरू – जगत के गुरु
75. व्योमकेश – आकाश रूपी बाल वाले
76. महासेनजनक – कार्तिकेय के पिता
77. चारुविक्रम – सुन्दर पराक्रम वाले
78. रूद्र – उग्र रूप वाले
79. भूतपति – भूतप्रेत व पंचभूतों के स्वामी
80. स्थाणु – स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
81. अहिर्बुध्न्य – कुण्डलिनी- धारण करने वाले
82. दिगम्बर – नग्न, आकाश रूपी वस्त्र वाले
83. अष्टमूर्ति – आठ रूप वाले
84. अनेकात्मा – अनेक आत्मा वाले
85. सात्त्विक – सत्व गुण वाले
86. शुद्धविग्रह – दिव्यमूर्ति वाले
87. शाश्वत – नित्य रहने वाले
88. खण्डपरशु – टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले
89. अज – जन्म रहित
90. पाशविमोचन – बंधन से छुड़ाने वाले
91. मृड – सुखस्वरूप वाले
92. पशुपति – पशुओं के स्वामी
93. देव – स्वयं प्रकाश रूप
94. महादेव – देवों के देव
95. अव्यय – खर्च होने पर भी न घटने वाले
96. हरि – विष्णु समरूपी
97. पूषदन्तभित् – पूषा के दांत उखाड़ने वाले
98. अव्यग्र – व्यथित न होने वाले
99. दक्षाध्वरहर – दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले
100. हर – पापों को हरने वाले
101. भगनेत्रभिद् – भग देवता की आंख फोड़ने वाले
102. अव्यक्त – इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
103. सहस्राक्ष – अनंत आँख वाले
104. सहस्रपाद – अनंत पैर वाले
105. अपवर्गप्रद – मोक्ष देने वाले
106. अनंत – देशकाल वस्तु रूपी परिच्छेद से रहित
107. तारक – तारने वाले
108. परमेश्वर – प्रथम ईश्वर

अपनी राशि के अनुसार करें भगवान शिव की पूजा- पूरी होगी हर मनोकामना, देखें वीडियो: