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Lucky Rajiv
लकी राजीव

“… देखो, मैं भइया जैसा नहीं हूं, जो भाभी की हां में हां मिलाते रहते हैं. भाभी उनसे ‌बिना पूछे हर काम करती हैं, मुझे अच्छा ‌नहीं लगता है… आज तुमने ‌भी वही किया. एक‌ बार भी तुमने पूछा नहीं मुझसे कि जाना है… और प्लीज़, अपना स्तर सुधारो… पसंद अच्छी करो. एक बात और है, मेरा नाम लेकर मत बुलाया करो. पति-पत्नी में पति का पद ऊंचा रहता है, ये तो सच बात है… तुम्हें ख़राब तो नहीं लग रहा है ना मेरा कहना!”

मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि सपने इस तरह सच भी होते हैं क्या? अभी पांच महीने पहले ही तो विनय से मैं रितु दीदी (ताऊजी की बेटी) की शादी में मिली. दीदी के देवर होने के नाते चुहलबाज़ी हुई… कब दोस्ती, फिर दोस्ती से ज़्यादा कुछ… और अब दस दिनों बाद हमारी सगाई है! हवाई जहाज में अकेले बैठे हुए मैं मुस्कुराने लगी… लेकिन रितु दीदी बहुत ख़ुश ‌नहीं हुई थीं ये सब सुनकर, क्यों? क्या वो मुझे अपनी देवरानी नहीं बनाना चाहती हैं? 
मम्मी ने भी यही कहा, “रितु ख़ुद तो सोने के सिंहासन पर विराजमान है, नौकर-चाकर से भरा हुआ घर है… तुम्हें क्यों चाहेगी वहां देखना… अपनी ‌मां की तरह ही है…” मम्मी की बात सुनकर मैं सहमत नहीं ‌हो‌ पाई थी. ताईजी और मम्मी में भले ही कितनी भी प्रतिस्पर्धा रही हो, पर रितु दीदी ने सदैव बड़ी बहन की तरह मुझे स्नेह और संरक्षण में संजोकर रखा था. दिल्ली एयरपोर्ट पर रितु दीदी प्रतीक्षा करते हुए मिल गईं, मैं लिपट गई.
“अब तो तुम मेरे पैर छूकर आशीर्वाद लिया करो, बहन से देवरानी बनने जा‌ रही हो…” उनकी बात सुनकर मेरे मन का मैल धुल गया. ख़ुश तो हैं दीदी इस रिश्ते से.
दीदी और जीजाजी दिल्ली में रहते थे. विनय भी जीजाजी के साथ बिज़नेस देखते थे… मां-पिता के न होने के कारण जीजाजी ने ही विनय को‌ पाला‌ था और अब रितु दीदी विनय का पूरा ध्यान‌ रखती थीं.
घर पहुंचते ही मैं दंग रह गई. दिल्ली जैसे शहर में इतना बड़ा घर! रंग-बिरंगे फूलों से सजी क्यारियां, सलीके‌ से लगे‌ पेड़ और हमारे स्वागत में हाथ बांधे‌ खड़े आधा दर्जन नौकर. विनय की ज़िद पर जीजाजी ने मुझे यहां बुलाया था सगाई की शाॅपिंग करने के लिए… मैं ये सोचकर गुलाबी हुई ‌जा‌ रही थी कि शाम को विनय से आमना-सामना होगा.
“निम्मी, तुम फ़िलहाल तो ऊपर रहोगी गेस्ट रूम में, मेरे बगलवाले ‌कमरे में… विनय के कमरे में शादी के बाद, ठीक है ना?” दीदी की छेड़छाड़ मेरे ‌गाल और ‌लाल कर रही थी.

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शाम को विनय और जीजाजी के आते ही ‌मैं और परेशान हो गई थी. विनय मुझे ‌बहुत प्यार से देख रहे थे और जीजाजी चिढ़ा रहे थे.
“देखो साली साहिबा, कल से आपकी शाॅपिंग शुरू… बिज़नेस के काम से इनको हफ़्तेभर की छुट्टी. ख़ूब घूमिए आप लोग… लेकिन रितु भी आपके साथ रहेगी, आप लोगों की निगरानी के लिए… ठीक है ‌निम्मी?” मैं शरमा रही थी. विनय एकदम से बोले, “भइया, निमिषा कहा करिए ना… निम्मी अच्छा नहीं ‌लगता है!”
अगले दिन से ‌ख़रीदारी शुरू हुई, इस शोरूम से उस शोरूम… इस डिज़ाइनर से ‌उस डिज़ाइनर तक… शाम होने तक मैं बहुत थक गई थी. विनय को‌ कुछ भी पसंद नहीं आया था. हालांकि एक लहंगे पर मेरा दिल आ गया था. कॉफी शॉप में मैंने कहा, “अरे, सगाई ही तो है! वही क्रीम कलरवाला लहंगा ले लेते हैं… इतना क्या सोचना?”
विनय ने‌ अजीब ढंग से जवाब दिया, “इसीलिए तो तुमको यहां बुलाया है! मुझे लग रहा था कि तुम कुछ भी ‌ना‌ पहन लो. मैडम, विनय की सगाई है… कोई मामूली बात नहीं है!” दीदी ने‌ कुछ ‌नहीं कहा, चुपचाप ‌कॉफी पीती रहीं.
दो-तीन दिनों में लहंगा, शेरवानी ‌सब लिया गया… ज़ेवर कैसे होंगे, डेकोरेशन, फूलों का रंग… इतनी बारीक़ी से ‌विनय पसंद कर रहे थे कि उबाऊ लगने लगा था. अगले दिन विनय को जीजाजी ने बुला लिया. मैं और दीदी दिल्ली घूमने निकल लिए. कितना सुहाना लग रहा था सब कुछ. अचानक ‌दीदी के पास विनय का फोन आया, उन्होंने मेरी ‌ओर बढ़ा दिया.
“निमिषा! तुम्हारा फोन‌ कहां है? और आज तुम बिना मुझे बताए कहां चली गई? मैं घर आया था तुम्हें लेने… मेकअप आर्टिस्ट के यहां जाना है, मेकअप ट्रायल‌ के लिए… तुरंत वहां पहुंचो, भाभी को एड्रेस पता है.”
मैं खिन्न हो‌ उठी थी. मेकअप कैसा होगा… ये‌ तो मैं भी देख सकती हूं ना. हर बात में विनय का हस्तक्षेप… ये सब क्या है? 
घर आते समय दीदी को घर छोड़कर हम दोनों बाहर खाना खाने चले गए. माहौल‌ अच्छा था… लेकिन मेरा मन नहीं ‌लग रहा था. विनय ने ‌बात शुरू की, “निमिषा, तुम जानती हो ‌ना मैंने पहली बार तुम्हें देखते ही सोच लिया था ‌कि शादी मैं तुमसे ही करूंगा… मैं कुछ बातें साफ़-साफ़ करना चाहता हूं. देखो, मैं भइया जैसा नहीं हूं, जो भाभी की हां में हां मिलाते रहते हैं. भाभी उनसे ‌बिना पूछे हर काम करती हैं, मुझे अच्छा ‌नहीं लगता है… आज तुमने ‌भी वही किया. एक‌ बार भी तुमने पूछा नहीं मुझसे कि जाना है… और प्लीज़, अपना स्तर सुधारो… पसंद अच्छी करो. एक बात और है, मेरा नाम लेकर मत बुलाया करो. पति-पत्नी में पति का पद ऊंचा रहता है, ये तो सच बात है… तुम्हें ख़राब तो नहीं लग रहा है ना मेरा कहना!”

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मैं मुस्कुरा दी… घर आने के बाद मेरा मुंह उतरा रहा. पूरी रात नींद नहीं आई. सुबह ‌सबके जाते ही दीदी को लेकर कमरे में आ गई. “दीदी, दो‌ दिनों ‌बाद मेरी सगाई है. कल‌ पापा-मम्मी भी आ जाएंगे… लेकिन मुझे कुछ सही नहीं लग रहा है.” मैंने ‌रितु दीदी को एक-एक बात बताई.
दीदी का चेहरा संजीदा होता जा रहा था, “निम्मी, मैं क्या बोलूं, शुरू में मैंने विरोध किया था किसी ने मेरी बात नहीं मानी… मैं नहीं चाहती थी कि तुम विनय से शादी करो… वो क्या है, उसको ‌मैं‌ जानती हूं. ग़ुस्से में जिस तरह वो‌ नौकरों पर चिल्लाता है, सामान फेंकता है, हर बात में अपना ही हुक्म चलाना… मुझसे भी कहता है कि भइया ने आपको बहुत छूट दे रखी है… ऐसे इंसान के साथ तुम मुरझा जाओगी निम्मी.” 
दीदी की बातें सुनकर मेरा रहा-सहा शक भी जाता रहा… आंखें भर आई थीं, लेकिन दिल मज़बूत करके एक फ़ैसला लिया. पापा को फोन किया, टिकट बुक कराई… विनय और जीजाजी को बुलाकर मैंने बात छेड़ दी.
विनय ने कांच की ग्लास ज़मीन पर पटक दी, “क्या बकवास है! परसों सगाई है, आज तुम पीछे नहीं हट सकती हो… किसी ने तुम्हें भड़काया है.” उसका इशारा दीदी की ओर था.
मैंने कहा, “मैं देख रही हूं ना आपका रवैया, आपको एक पत्नी नहीं एक गुड़िया चाहिए, हां में हां मिलानेवाली… निर्णय लेने में सक्षम, समझदार पत्नी नहीं… मैं बंदिशों में नहीं रह सकती हूं, समझिए इस बात को. हर बात आपके हिसाब से नहीं हो सकती है. पति-पत्नी के रिश्ते में सम्मान, समझ दोनों ओर से होनी चाहिए, एकतरफ़ा नहीं…” 
मैंने जीजाजी के पास आकर माफ़ी मांगी, “जीजाजी, मुझे माफ़ करिएगा.” वो कुछ बोले नहीं, नाराज़ लग रहे थे.
विनय ने मेरे पास आकर कहा, “निमिषा, मैं तुम्हें कितना पसंद करता हूं, तुम्हें पता है ना…”
मेरी आंखों में आंसू आ गए थे, “विनय, आपको मैं पसंद आ गई थी, आपने‌ मुझे चुना… लेकिन मेरे मन में तो… ख़ैर…” इससे ज़्यादा मैं कुछ बोल‌ नहीं पाई.
कमरे में आकर फूट-फूटकर रोती रही, सामान पैक करती रही… थोड़ी देर में निकल लूंगी, इस घर से, विनय की ज़िंदगी से… और अपने सपनों की दुनिया से… टूटे सपनों की किरचें चुभ रही थीं, दर्द हो रहा था… लेकिन एक सुकून भी था; जो प्यार आपको दम घोंटकर मारने पर आमादा हो जाए, उसका अधूरा रहना ही बेहतर है.

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मुरली मनोहर श्रीवास्तव

लक्ष्मी के मनोभाव का प्रकट न होना और शंकर के आध्यात्म से गुज़रते हुए भौतिक स्पर्श की अनुभूति का सांसारिक हो उठना ही रहस्यवाद है. एक गुरू इस रहस्यवाद को समझता है और वह संसार में रह कर भी उससे विरक्त हो उठता है.

बहुत आसान था अगर वह वैसे ही सब कुछ स्वीकार कर जी लेता जैसे उसे अपने आसपास दिखाई देते लोग जीते दिखाई देते हैं.
इंसान का बागी नेचर उसे बहुत तंग करता है. कई बार वह खुद भी परेशान हो जाते और सोचता क्या जरूरत है सच की गहराई में उतरने की. छोड़ो भी जो जैसा है वैसा है उसे चुपचाप वैसा ही मान लो, जैसे सारी दुनियां जी रही है वैसे ही जीते रहो शांति से जिंदगी पूरी हो जाएगी. लेकिन वह क्या करें उनसे सब कुछ जस का तस मान लेते नहीं बनता था.
बस यही वह मोड़ था जहां वह पिछले कई महीनों से खुद के भीतर बेचैनी महसूस कर रहे थे. जिंदगी का सीधा रास्ता तो कहता है, बहुत हुआ अब पैक करो, सेमेंट लो खुद को इस संसार से, बाहर कुछ नहीं रक्खा है अपने भीतर झांको और बचे हुए समय को पूजा पाठ में लगाओ इहलोक तो गया परलोक सुधार लो.
दूसरी तरफ उनका दिल इसे मानने को तैयार नहीं था। उनकी सोच कहती कि जब तक सांस चल रही है तब तक खुद को सरेंडर कर देने का कोई अर्थ नहीं है. कल वह जिस प्रवचन से लौटे थे वहां भी स्वामी जी ने, भले ही दक्षिणा को हाथ न लगाया हो उनके सेवादार भक्तों द्वारा संस्था को दिए जाने वाले दान को सहर्ष स्वीकार कर रहे थे. गुरु पूर्णिमा के अवसर पर स्वामी हृदयानंद के आश्रम की छटा देखने लायक होती. ऋषिकेश में उस आश्रम में कदम रखने का स्थान न होता. देश विदेश से हजारों भक्त वहां उतर पड़ते. वैसे भी ऋषिकेश के मनोरम स्थल पर पूरे साल आश्रम में लोग आते जाते रहते । वहां कोई डिमांड नहीं थी लेकिन कोई ऐसा भी नहीं था जो वहां आए और अपनी सामर्थ्य के अनुरूप दान दे कर न जाए. कोई भी संस्था बिना लक्ष्मी की कृपा के नहीं चलती.
लक्ष्मी अजीब बात है हमारे देश में स्त्रियों के नाम देवियों के नाम पर क्यों रखे जाते हैं. ओह यही तो नाम था उस साध्वी का जिसे मिलने शंकर पिछले चार साल से लगातार आ रहे थे. गेरूए वस्त्र में दमकती उसकी देह उन्हें विचलित कर देती. अद्भुत आकर्षण था लक्ष्मी के व्यक्तित्व में, धीर गंभीर और जब साध्वी प्रवचन देती तो लगता मां सरस्वती कंठ में बैठी हों.
लेकिन वही लक्ष्मी जब स्टेज से उतर आश्रम के काम देखती भक्तों को स्नेह बांटती, तो उनकी सरलता देखने लायक होती और कभी आश्रम के पेड़ पैधों और प्रकृति के बीच यह कोई उसे विहार करते हुए देख ले तो अप्सरा का भान हो. कोई सौंदर्य प्रसाधन नहीं नैसर्गिक सौंदर्य ऐसा कि, विश्वामित्र भी रीझ जाएं. बातें इतनी मधुर कि क्या बच्चे क्या बड़े और क्या प्रौढ़ सब लक्ष्मी के सानिध्य को तरसते रहते. वह जिससे हंस कर बोल दे वह उसका मुरीद हो जाए.
कब और कैसे शंकर इस आश्रम में लक्ष्मी के भक्त हो गए उन्हें पता ही न चला. वैसे शंकर खुद भी तो किसी कामदेव से कम न थे, लेकिन अपनी पद प्रतिष्ठा और नैतिकता से कुछ ऐसे बंधे हुए थे कि तिल भर भी मन को डावांडोल न होने देते.

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लेकिन पता नहीं उन्हें क्या सूझी कि जब लक्ष्मी स्वामी हृदयानंद के सानिध्य में भजन प्रस्तुत कर रही थी कि वो बोल उठे, “गुरुदेव ये देवी तो बहुत सुंदर गाती हैं. क्या हम इन्हें अपने संस्थान में आमंत्रित कर सकते हैं.”
हृदयानंद बोले, “वत्स यह भी मेरे लिए ठीक वैसी ही है जैसे तुम. यह कोई छह महीने पहले आश्रम में आई थी और बस यहीं की हो कर रह गई. तुम देवी से पूछ लो उन्हें आपत्ति न हो, तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है.”
और इस तरह लक्ष्मी का आवागमन ऋषिकेश से मथुरा, वृंदावन होते हुए न जाने किस किस नगरी होने लगा था.
तमाम अध्यात्म के बाद भी मानव बस मानव होता है.
शंकर अपने पद और रसूख से उसके कार्यक्रम आयोजित करवाते रहते, जिसमें लक्ष्मी को उपहार से ले कर आर्थिक लाभ तक सब प्राप्त होता. कुछ वाणी कुछ लक्ष्मी का तेज और कुछ चेहरे पर अप्रतिम सौंदर्य के साथ विरक्तता के भाव लक्ष्मी के व्यक्तित्व को रहस्यमय बना देते, जिससे पंडाल में बैठे श्रोता मंत्रमुग्ध हो उसे देखते और सुनते रह जाते.
इधर निरंतर मुलाक़ात से शंकर और लक्ष्मी के बीच अच्छी बातचीत होने लगी थी, लेकिन भक्ति और वैराग्य के मध्य सांसारिक प्रेम के लिए स्थान नहीं होता. आश्चर्य यह कि भागवत कथा में गोपियों के रासलीला का प्रसंग हो या वास्तविक जीवन की रासलीला, कथा में आगे बढ़कर दोनों का ऐसा एकाकार होता कि शंकर के लिए लौकिक और अलौकिक जीवन में अंतर करना कठिन हो जाता.
हम सब सामान्य मनुष्य हैं और बाकी ओढ़े हुए चोले हैं. धीरे-धीरे वे लक्ष्मी के प्रवास के समय, उसके साथ एकांतवास भी कर लेते, जिसमें ढेर सारी आध्यात्म और अलौकिक प्रेम की बातें होती. लक्ष्मी भी उनके सिर पर हाथ रखती कभी उनके हाथों को अपने हाथों में स्नेह से भर लेती. निःसंदेह लक्ष्मी उम्र में उनसे काफ़ी छोटी थी. वे पचास पार कर रहे थे और लक्ष्मी अभी तीस-बत्तीस रही होगी.
आध्यात्मिकता के बावजूद वे लक्ष्मी के स्पर्श से धीरे-धीरे अपने भीतर उत्तेजना और वासना के भाव महसूस करते. यह रस उन्हें अनजाने ही लक्ष्मी से जोड़े जा रहा था, लेकिन आध्यात्म के अपने नियम होते हैं. लक्ष्मी ने कभी भी उन्हें अतिक्रमण करने की इजाज़त नहीं प्रदान की थी. साथ ही किसी भी कार्यक्रम में साध्वी के दरवाजे सभी के लिए सदैव खुले रहते हैं, सो चाह कर भी शंकर बहक नहीं सकते थे. लक्ष्मी जहां रुकती उस स्थान के दरवाजे बंद नहीं होते थे. एक बात और शंकर और लक्ष्मी के भावों में अंतर है या नहीं कह पाना मुश्किल था.
लक्ष्मी साध्वी थी उसने वैराग्य ग्रहण कर लिया था, सो भौतिक दृष्टि से उसके भाव मोह माया से दूर हों, ऐसी कल्पना की जा सकती थी. किसी व्यक्ति के भीतर कौन सी भावना जन्म ले रही है इसे मात्र वह ही समझ सकता है कोई और नहीं. लक्ष्मी का शंकर के सिर पर हाथ रखना वात्सल्य भाव भी हो सकता था. जो लोग मानसिक रूप से परिपक्व हो जाते हैं वे उम्र से परे निकल जाते हैं यह बात लक्ष्मी की बातचीत और प्रवचन में झलकती भी थी. लक्ष्मी के मनोभाव का प्रकट न होना और शंकर के आध्यात्म से गुज़रते हुए भौतिक स्पर्श की अनुभूति का सांसारिक हो उठना ही रहस्यवाद है. एक गुरू इस रहस्यवाद को समझता है और वह संसार में रह कर भी उससे विरक्त हो उठता है. खैर आज यहां इस बात का कोई अर्थ नहीं था.
शंकर आज गुरू पूर्णिमा के अवसर पर स्वामी हृदयानंद के आश्रम में बैठे थे और यह इस आश्रम में उनकी चौथी गुरू पूर्णिमा थी. इस बार उनकी धर्मपत्नी सरिता भी साथ आई थी. वास्तव में हरिद्वार और आश्रम की उत्तम व्यवस्था ने सरिता को मंत्रमुग्ध कर दिया था. घर गृहस्थी से बाहर निकल कर वह भी शांति का अनुभव कर रही थी.
इधर शंकर लक्ष्मी के सानिध्य में बैठे थे कि उनकी नज़र अपनी पत्नी सरिता पर पड़ी. वह भी अध्यात्म में डूबी स्वामी हृदयानंद से बातचीत में मग्न थी. स्वामी हृदयानंद हंसते-खिलखिलाते एक से बढ़कर एक जीवन के प्रसंग सुना रहे थे. कभी विदेश यात्रा का वर्णन करते, तो कभी गंगा की कलकल धारा में सरिता को बहा ले जाते. सरिता भी जैसे जीवन के सभी तनाव भूल लच्छेदार प्रसंग में खोई हुई थी. तभी किसी सेवादार ने स्वामी हृदयानंदजी से मंच तैयार होने की बात कही. स्पष्ट था कि अब हृदयानंदजी को उठ कर मंच पर जाना था, जहां अपार भीड़ उनके सत्संग और प्रवचन की प्रतीक्षा कर रही थी.
स्वामीजी ने बड़े ही आदर भाव से कहा, “मां, अब मैं सत्संग के लिए चलता हूं, फिर समय मिलेगा तो और चर्चा होगी. भागवत कथा पर आप जब भी मुझे आमंत्रित करेंगी आपके नगर निश्चित रूप से आऊंगा.”
इतना कह कर जैसे ही स्वामी हृदयानंद उठने को हुए सरिता ने झुक कर स्वामीजी के चरण स्पर्श किए और स्वामी हृदयानंद ने अपने आशीर्वाद का हाथ सरिता के सिर पर रखा. साथ ही हाथ हटाते समय सरिता का कंधा भी थपथपपाया. बोले, ” यह आपका ही आश्रम है नियमित आती रहना.”
स्वामी हृदयानंद तो इतना कहकर उठकर चल दिए. स्वामीजी के उठते ही लक्ष्मी भी उनके साथ उठकर चली गई.
लेकिन शंकर यह घटना बड़े ही ध्यान से देख रहे थे और अब अपने ही कशमकश में डूबे थे. आज उनके अपने मनोभाव जैसे उनसे ही चुगली कर रहे थे कि जिस प्रकार लक्ष्मी का स्पर्श उनके भीतर तरंग पैदा कर देता है, इस बात की क्या गारंटी है कि स्वामीजी या सरिता के भीतर स्पर्श मात्र से वह तरंग पैदा नहीं होगी.
किसी भी आध्यात्मिक प्रक्रिया में मन की चंचलता का अनुमान भर लगाया जा सकता है. वास्तविक मनःस्थिति का नहीं. और बस इतना सोचना था कि उनके भीतर वैराग्य और लौकिकता के बीच द्वंद प्रारम्भ हो गया. यह जो लहर है इस लहर का कोई ओर छोर नहीं होता और न ही ऐसे प्रश्नों के कोई सपष्ट उत्तर होते हैं कि व्यक्ति का स्पर्श सांसारिक है और कब आध्यात्मिक. वह चार साल से जिस अध्यात्म की खोज से गुज़रते हुए सांसारिकता और वैराग्य के बीच झूला झूल रहे थे, प्रीत की पेंग बढ़ा रहे थे और ख़ुद को अपने विचारों के खोल में सुरक्षित पा रहे थे, आज एक क्षण में उन्हे अपना सुरक्षा घेरा टूटता सा लगा. उन्हें एहसास हुआ कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए ही विरक्त हो जाना ही असली वैराग्य है. जिस रस को वह यहां आश्रम में चार साल से ढूंढ़ रहे हैं, वह एकमात्र मृगमरीचिका है, जिससे अति शीघ्र बाहर निकलना होगा.
यदि वे ऐसे ही कशमकश में जीते रहे, तो घर भी आश्रम हो जाएगा और तब न गृहस्थी बचेगी और न ही आश्रम में शरण मिलेगी. यह दूर से दिखाई देती आध्यात्म की रोशनी है, उसकी लौ को अपने भीतर ही जलाना होगा. इस कशमकश से बाहर निकलना ही होगा. जीवन के इन रहस्यवादी प्रश्नों के सटीक उत्तर कहीं नहीं मिलते…
अचानक उन्होने सरिता का हाथ पकड़ा बोले, ” सरिता, मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही है. काफ़ी ठंड-सी महसूस हो रही है. सुनो ज़रा ड्राइवर को बुलाओ. घर निकलते हैं. यहां बीमार पड़ गया, तो दिक़्क़त होगी. वैसे भी आश्रम के कार्यक्रम में मेरी वजह से रंग में भंग पड़े यह मैं नहीं चाहता.” सरिता ने पति को इस तरह घबराते और परेशान होते देखा, तो तुरंत मोबाइल से कॉल लगाकर ड्राइवर को बुला लिया.

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देखते ही देखते बस दस मिनट में एस यू वी 300 अस्सी की स्पीड से हरिद्वार से दिल्ली लौट रही थी. इस वक़्त दोनों के हृदय में न आश्रम था, न लक्ष्मी और न ही स्वामी हृदयानंद. शंकर शायद अपने जीवन की कशमकश से बाहर आ चुके थे. उनका सिर बैक सीट पर बैठी सरिता की गोद में था.

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“…मैं आज की नारी हूं. उस युग में द्रौपदी का चीरहरण, एक नारी मां होने के कारण भूल गई थी. लेकिन मैं पहले नारी हूं, उसके बाद एक मां. नारी का अपमान करनेवाले को मैं कभी माफ़ नहीं करूंगी फिर चाहे वह मेरा बेटा ही क्यों ना हो!..”

सूरज ढल रहा था अंधेरा पसरने की तैयारी में था. गांव की वह लड़कियां इसी अंधेरे का ही इंतज़ार करती हैं, जिनके घरों में शौचालय नहीं होते. गांव की एक ऐसी ही लड़की हाथ में लोटा लेकर सूनी जगह की तरफ़ जा रही थी, जहां कोई आता-जाता ना हो. ठाकुर रणवीर प्रताप अपनी ऊंची हवेली के झरोखे में खड़े होकर बाहर की तरफ़ देख रहे थे. ठाकुर अपने गांव के सबसे अधिक शक्तिशाली धनाढ्य और बहुत बड़ी हस्ती थे. उनका बेटा रणजीत अपनी मोटर साइकिल पर सवार उसी राह से निकल रहा था. सूने रास्ते पर लड़की को देखकर उसने मौक़े का फ़ायदा उठाना चाहा और लड़की के चारों तरफ़ बाइक गोल-गोल घुमाने लगा. लड़की निकलकर भागना चाह रही थी, लेकिन रणजीत ने बाइक रोक कर उसका हाथ पकड़ लिया और उसके साथ ज़बरदस्ती करने लगा.
ठाकुर रणवीर प्रताप ऊपर से देख रहे थे. अपने पुत्र की ऐसी हरकत देखकर वह बुत की तरह खड़े रहे. उनकी पत्नी ठकुराइन कब उनके पीछे आकर खड़ी हो गई, उन्हें पता ही नहीं चला.

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रणजीत अपनी हद को पार करे उससे पहले साइकिल पर एक नौजवान लड़का वहां से गुज़रा. एक लड़की को इस तरह मुसीबत में देखकर अपनी साइकिल ज़मीन पर पटक कर वह रणजीत से भिड़ गया. दोनों में हाथापाई होने लगी. लड़की मौक़ा मिलते ही वहां से भाग निकली और रोते हुए अपने घर पहुंची. उसे इस हालत में देखकर उसका भाई आगबबूला हो गया. उसने सीधे पंचायत में जाकर शिकायत दर्ज़ करवाई और तुरंत कार्यवाही करने की मांग रखी.
इधर दोनों लड़कों का झगड़ा काफ़ी बढ़ गया. शोर की आवाज़ से कुछ लोग वहां इकट्ठे हो गए. तभी रणजीत ने बाज़ी पलट दी और सब को बताया कि यह लड़का गांव की एक लड़की के साथ बदसलूकी कर रहा था. इसीलिए मैंने उस लड़की को बचाने की कोशिश की. वह लड़का सभी से कहने लगा रणजीत झूठ बोल रहा है, लड़की के साथ छेड़छाड़ यह कर रहा था. गांव के लोग रणवीर प्रताप के बेटे को देखकर डर गए थे और शक उस नौजवान लड़के पर ही कर रहे थे. तभी एक बुज़ुर्ग ने कहा, “चलो रणजीत साहब, पंचायत चलकर इसे सज़ा दिलवाते हैं.” रणजीत को अपनी हैसियत का बहुत गुमान था, वह जानता था उसे कुछ नहीं होनेवाला.
तुरंत पंचायत की आपातकालीन बैठक बुलाई गई. सभी पंचायत के लिए पहुंच गए. उस लड़की के भाई ने अपनी बहन को वहां लाना ठीक नहीं समझा. तभी एक-दूसरे पर आरोप लगाने का सिलसिला शुरु हो गया. रणजीत बहुत सफ़ाई से झूठ बोल रहा था और सभी रणवीर प्रताप के बेटे को बेगुनाह समझ कर दूसरे लड़के पर ही शक कर रहे थे. तभी अचानक ठाकुर का नौकर उन्हें बुलाने हवेली पहुंच गया.
“ठाकुरजी”, यह आवाज़ जैसे ही रणवीर प्रताप के कानों में आई, वह चौंक गए और जल्दी से नीचे आए.
ठाकुर का नौकर रामा उन्हें देखते ही बोल उठा, “जल्दी चलिए रणजीत भैया को पंचायत में ले गए हैं.”
ठाकुर और ठकुराइन तुरंत ही पंचायत में पहुंच गए. वहां जाते ही ठाकुर रणवीर प्रताप ने ग़ुस्से में कहा, “यह सब क्या हो रहा है? इतनी रात को मेरे बेटे को यहां क्यों लाए हो? क्या बात है?”
ठाकुर को सारी घटना से अवगत कराया गया. ठाकुर ने अपनी आंखों से सब कुछ देखा था, लेकिन पुत्र मोह में वह ऐसा प्रदर्शित कर रहे थे, मानो उन्हें कुछ नहीं पता.

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“नहीं, नहीं मेरा बेटा ऐसा कर ही नहीं सकता. इस नालायक लड़के को दंड दिया जाए.” ठाकुर रणवीर प्रताप नें चिल्लाते हुए कहा.
इससे पहले कि मुखिया कुछ बोले ठकुराइन बीच में ही बोल पड़ी, “रुक जाओ आज का फ़ैसला मैं करूंगी. ठाकुरजी आप धृतराष्ट्र हो सकते हैं, किंतु मैं गांधारी नहीं, जो नारी की इज़्ज़त पर हाथ डालनेवाले बेटे को वज्र का बना दे और उसे बचाने का हर मुमकिन प्रयत्न करे. मैं आज की नारी हूं. उस युग में द्रौपदी का चीरहरण, एक नारी मां होने के कारण भूल गई थी. लेकिन मैं पहले नारी हूं, उसके बाद एक मां. नारी का अपमान करनेवाले को मैं कभी माफ़ नहीं करूंगी फिर चाहे वह मेरा बेटा ही क्यों ना हो! मुखिया यहां दोषी रणजीत है और यह सब मैंने अपनी आंखों से देखा है, आप उसे सज़ा दें.”

– रत्ना पांडे

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संजीव जायसवाल ‘संजय’
               

मास्टार दीनानाथ ने काग़ज़ देखा, तो चौंक पड़े. कल उन्होंने बच्चों को रेखागणित पढ़ाते समय ब्लैक बोर्ड पर कुछ रेखाचित्र बनाए थे. हुबहू वही रेखाचित्र उस काग़ज़ पर बने हुए थे.
“किसने बनाया है इन्हें?” मास्टर दीनानाथ ने अपनी आंखों पर चढ़े चश्मे को ठीक करते हुए पूछा.
गोपाल ने कोई उत्तर नहीं दिया, तो सुखराम ने डपटा, “अबे चुप क्यूं है? बताता क्यूं नहीं कि ये फालतू काम तूने किया है.”
“ये गोपाल ने बनाया है?” मास्टर दीनानाथ बुरी तरह चौंक पड़े.

“कामचोर कहीं का, मैंने तुझे काम करने भेजा था और तू यहां बैठा लकीरें खींच रहा है.” सुखराम की कर्कश आवाज़ सुनाई पड़ी.
सुखराम, गोपाल को बुरी तरह पीट रहा था. वह रो-रो कर कहे जा रहा था, “बापू, मत मारो मुझे. मैं अभी सारा काम करे डालता हूं.”
उन दोनों के चिल्लाने की आवाज़ सुन मास्टर दीनानाथ झल्लाते हुए उठ बैठे. यह रोज़- रोज़ का तमाशा हो गया था. सुखराम उनकी प्राइमरी पाठशाला में पिछले 20 वर्षों से झाडू लगा रहा था. पिछले दो वर्षों से वह बीमार रहने लगा था, इसलिए अपने बेटे गोपाल को काम पर भेजने लगा था.
किंतु गोपाल झाड़ू लगाने की बजाय इधर-उधर बैठा रहता, इसलिए सुखराम अक्सर उसकी पिटाई कर देता था. मास्टर दीनानाथ का क्वॉर्टर पाठशाला के भीतर ही था. इसलिए बाप-बेटे के चिल्लाने की आवाज़ें उनके कानों तक पहुंच जाती थी. इससे उन्हें बहुत उलझन होती थी. धीरे-धीरे वे भी गोपाल से चिढ़ने लगे थे.
पिछले महीने की बात है. वे कक्षा पांचवी में गणित पढ़ा रहे थे. तभी उन्हें लगा कि खिड़की के पीछे कोई खड़ा है. उन्होंने कड़कते हुए पूछा, “कौन है वहां?”
यह सुनते ही खिड़की के पीछे खड़ी आकृति भागी. उन्होंने कक्षा के बच्चों से चिल्लाते हुए कहा, “पकड़ो उसे, भागने न पाए.”
कई लड़के एक साथ दौड़ पड़े. थोड़ी ही देर में वे गोपाल को घसीटते हुए ले आए. लगता था कि वह गिर पड़ा था, क्योंकि उसकी कुहनियां छिल गई थीं और उनसे हल्का-हल्का खून बह रहा था.
उसे देखते ही मास्टर दीनानाथ ने डपटते हुए पूछा, “खिड़की के पीछे क्या कर रहा था?”
गोपाल ने कोई उत्तर नहीं दिया. उसका मौन देख मास्टर दीनानाथ का पारा चढ़ गया. उन्होनें चिल्लाते हुए कहा, “जल्दी बता, वहां क्या कर रहा था, वरना हाथ-पैर तोड़ दूंगा.”

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“कुछ नहीं कर रहा था.” गोपाल ने सहमते हुए मुंह खोला.
“कुछ नहीं के बच्चे. मैं जानता हूं चोरी करने के लिए बच्चों का सामान ताक रहा होगा.” मास्टर दीनानाथ फट पड़े.
यह सुन गोपाल की आंखें छलछला आईं और वह भर्राए स्वर में बोला, “मास्टरजी, मैं चोर नहीं हूं.”
“चोर नहीं है, तो वहां क्या कर रहा था?” मास्टर दीनानाथ ने ज़ोर से डपटा.
गोपाल ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों को उठा कर उनकी ओर देखा. उनमें अजीब से भाव समाए हुए थे. उसके होंठ भी थरथरा रहे थे. ऐसा लगता था कि वह कुछ कहना चाह रहा है. किन्तु कुछ कहने की बजाय अचानक उसने ज़ोर का झटका दिया और अपने को छुड़ा कर वहां से भाग लिया. कई बच्चे उसके पीछे दौड़े, लेकिन उसे पकड़ नहीं पाए.
मास्टर दीनानाथ का मन खिन्न हो गया था. उस दिन वे ठीक से पढ़ा नहीं पाए. इसके बाद उन्होंने कई बार गोपाल को खिड़की के पीछे खड़ा देखा. उसे पकड़ने के लिए उन्होने कई बार बच्चों को दौड़ाया, लेकिन हमेशा असफलता हाथ लगती. इससे उनकी खीझ बढ़ती जा रही थी.
परेशान होकर तीन दिन पहले उन्होंने सुखराम से कहा कि छुट्टी के बाद वह गोपाल को उनके पास लेकर आए, वरना वे उसे स्कूल में काम नहीं करने देंगे. आशंकित सुखराम स्कूल के बाद गोपाल को घसीटते हुए उनके पास ले आया. उन्होंने कई बार पूछा कि वह खिड़की के पीछे क्यूं खड़ा होता है. किन्तु गोपाल ने आज भी कोई उत्तर नहीं दिया इससे उनका पारा चढ़ गया.
उन्होंने उसे झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ते हुए धमकी दी, “अगर आज के बाद कक्षा के आसपास भी दिखाई पड़े, तो तुम बाप-बेटे को स्कूल में काम नहीं करने दूंगा.”
धमकी काम कर गई. सुखराम ने उन्हीं के सामने गोपाल की ख़ूब पिटाई की. इसके बाद अगले दो दिन तक वह खिड़की के आसपास नज़र नहीं आया. मास्टर दीनानाथ ने राहत की सांस ली. किन्तु आज सुबह-सुबह फिर वही चीख-चिल्लाहट शुरू हो गई.
मास्टर दीनानाथ ने ़फैसला किया कि वे आज आर-पार का ़फैसला करके ी रहेेंगे और तमतमाते हुए अपने क्वॉर्टर से बाहर निकले. एक कक्षा के सामने बैठा गोपाल सिसक रहा था. उसकी बगल में खड़ा सुखराम हांफ रहा था. आज उसकी तबीयत कुछ ज़्यादा ही ख़राब मालूम पड़ रही थी.
“यह सुबह-सुबह क्या तमाशा बना रखा है तुम लोगों ने?” मास्टर दीनानाथ उन्हें देखते ही फट पड़े.
“क्या बताऊं मास्टर साहब, मेरी तो क़िस्मत ही फूटी है. एक ही लड़का है, सोचता था कि काम में हाथ बंटाएगा. लेकिन ये नालायक काम करने की बजाय यहां बैठा काग़ज़ पर लकीरें खींच रहा है.” कहते हुए सुखराम ने एक काग़ज़ उनकी ओर बढ़ा दिया.
मास्टार दीनानाथ ने काग़ज़ देखा, तो चौंक पड़े. कल उन्होंने बच्चों को रेखागणित पढ़ाते समय ब्लैक बोर्ड पर कुछ रेखाचित्र बनाए थे. हुबहू वही रेखाचित्र उस काग़ज़ पर बने हुए थे.
“किसने बनाया है इन्हें?” मास्टर दीनानाथ ने अपनी आंखों पर चढ़े चश्मे को ठीक करते हुए पूछा.
गोपाल ने कोई उत्तर नहीं दिया, तो सुखराम ने डपटा, “अबे चुप क्यूं है? बताता क्यूं नहीं कि ये फालतू काम तूने किया है.”
“ये गोपाल ने बनाया है?” मास्टर दीनानाथ बुरी तरह चौंक पड़े.
“हां मास्टर साहब, झाडू लगाने की बजाय ये यहां बैठा समय बर्बाद कर रहा था. इसे माफ़ कर दीजिए. मैं अभी फटाफट पूरे स्कूल की सफ़ाई करवाए दे रहा हूं.” सुखराम हाथ जोड़ते हुए बोला. उसके मन में काम छूट जाने का भय समा गया था.
बात मास्टर दीनानाथ की समझ में आने लगी थी. उन्होने गंभीर स्वर में कहा, “सुखराम, ये फालतू का काम नहीं है. यह तो वो काम है, जो कक्षा के ज़्यादातर बच्चे नहीं कर पाते हैं. तुम्हारे बेटे ने तो कमाल कर दिया है, लेकिन समझ में नहीं आता कि इसने किया कैसे.”
सुखराम की समझ में नहीं आया कि हमेशा डांटने-फटकारने वाले मास्टरजी इतने शांत कैसे हो गए. वह बस आंखें फाड़े उनके चेहरे की ओर देखता रहा.
मास्टर दीनानाथ गोपाल के क़रीब पहुंचे और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, “एक दिन में कोई इतने अच्छे रेखाचित्र बनाना नहीं सीख सकता. सच-सच बताओ तुमने यह कैसे सीखा?”
स्नेह की छाया मिलते ही गोपाल का दर्द आंसू बन बाहर निकल पड़ा. वो सिसकते हुए बोला, “मास्टरजी, जब आप बच्चों को पढ़ाते हैं, तो मैं खिड़की के पीछे छुप कर सुनता रहता हूं. उसी से थोड़ा-बहुत लिखना-पढ़ना सीख गया हूं.”
मास्टर दीनानाथ को लगा जैसे वे आसमान से गिर पड़े हों. गोपाल आज तक एकलव्य की तरह विद्या की साधना करता रहा और वे द्रोणाचार्य की तरह उसे दंडित करते रहे. उसे अपमानित करते रहे. कितना महान है वह और कितने छोटे हैं वे. उनका मन आत्मग्लानि से भर उठा.
उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, “बेटा, तुमने आज तक मुझे बताया क्यूं नहीं ?”
“मैं सफ़ाईवाले का बेटा हूं. डरता था कि आप कहीं डांट न दें.” गोपाल ने हिचकी भरते हुए उनके चेहरे की ओर देखा.
मास्टर दीनानाथ के अंदर इतना साहस न था कि वे गोपाल की आंखों की ओर देख सकें. उन्होंने सुखराम की ओर मुड़ते हुये पूछा, “तुमने आज तक अपने बेटे को पढ़ने के लिए क्यों नहीं भेजा?”


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“पढ़-लिख क्या करेगा? सफ़ाईवाला है, बड़ा होकर झाडू ही लगाना है. अगर थोड़ी-बहुत कलम पकड़ना सीख गया, तो फिर ढंग से झाडू नहीं पकड़ पाएगा.” सुखराम ने सांस भरते हुए कहा.
मास्टर दीनानाथ ने चंद क्षणों तक उसके चेहरे की ओर देखा फिर बोले, “तुमने बहुत बड़ी ग़लती की है. आज ज़माना बदल गया है. कोई ज़रूरी नहीं कि सफ़ाईवाले का बेटा सफ़ाईवाला ही बने. वह अफसर भी बन सकता है. उसे स्कूल न भेज कर तुमने ग़लती की है और उससे भी बड़ी ग़लती मैंने उसका अपमान करके की है. हम दोनों को अपनी ग़लती सुधारनी होगी. इसका एक ही उपाय है कि गोपाल को लिखा-पढ़ा कर बड़ा आदमी बनाया जाए.”
“मास्टरजी, आप कहीं मज़ाक तो नहीं कर रहे?” सुखराम की आंखें आश्‍चर्य से फैल गईं. उसे अपने कानों पर विश्‍वास नहीं होे रहा था.
“सुखराम, तुम्हारा बेटा अपमानित होकर भी अपनी साधना करता रहा है. वह एकलव्य की तरह महान है, लेकिन मैं द्रोणाचार्य की तरह उंगली काटकर उसकी साधना भंग नहीं करना चाहता. मैंने आज तक उसका बहुत अपमान किया है, अब उसका प्रायश्‍चित करना चाहता हूं. गोपाल में प्रतिभा और लगन है. तुम बस हामी भर दो. आज से उसकी फीस और किताबों का ख़र्चा मैं उठाऊंगा. देखना एक दिन वह बहुत बड़ा आदमी बनेगा.” मास्टर दीनानाथ का स्वर भावुक हो उठा.
यह सुन गोपाल की आंखें प्रसन्नता से खिल उठीं. उनमें अनेक दीप एक साथ जगमगा उठे थे. अपने आंसू पोंछ वह मास्टर दीनानाथ के चरणों की ओर झुक गया, लेकिन उन्होंने उसे बीच में ही रोककर अपने सीने से लगा लिया.
सुखराम की आंखों से भी ख़ुशी के आंसू बहने लगे थे.

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शगुन भी आश्चर्य करती की यह फोन पर अपने परिवारजन से बात करते कभी भी ऊंची आवाज़ नहीं करती. हमेशा ख़ुशमिजाज़ रहना, गुनगुनाते हुए काम करना, आगे बढ़कर लोगों की मदद करना जैसे काम से शगुन यक़ीन नहीं कर पा रही थी कि कोई इतना सहज कैसे रह सकता है. उसको कमतर आंकते वो अक्सर उस पर अपना हुक्म चलाने का प्रयास करती. सीमा सरल रहते या तो उसकी बात मान लेती या हंसी में ऐसे टालती की शगुन को बुरा भी नहीं लगता. शगुन अपने पूर्व की उपलब्धियों के बखान उसके सामने कर अपनी तारीफ़ सुनने को बेताब रहती, पर सीमा उसके मन-मुताबिक़ प्रतिक्रिया नहीं देती, तो वो और बैचेन हो जाती.

बचपन से ही बहुत तेज-तर्रार थी शगुन. चार साल की उम्र से ही उसे लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचना आ गया था. ऊर्जा से भरपूर कुछ ना कुछ करते रहना उसकी फ़ितरत बन गई थी. चाहे ग़लत हो या सही, जोड़ना, तोड़ना, बनाना, बिगाड़ना फिर बना देना यही सब चलता ही रहता था. माता-पिता को भी उसके अंदर एक सामान्य से कहीं अधिक बुद्धिमान बच्चा नज़र आता, जिसको प्रदर्शित करने का दोनों ही कोई मौक़ा नहीं चूकते. मित्रों, जानकारों के सामने उसके चित्रों का बखान हो या कोई नया क्राफ्ट बढ़-चढ़ कर उसकी प्रशंसा की जाती. शगुन भी अब इतनी अभ्यस्त हो चुकी थी कि उसे हर समय प्रशंसा आवश्यक हो गई. कोई अगर प्रशंसा ना करें, तो वो नाराज़ और चिड़चिडी़ हो जाती. उसे लगने लगा की बस वो ही सबसे बेहतर है और वो ही सब कुछ जानती है.
दस साल की होते-होते पढ़ाई में अपनी प्रभुता रखते अब वो अन्य बच्चों के अलावा टीचर्स को भी कमतर आंकने लगी थी. पढ़ाती टीचर्स को बीच में टोकना और अपनी महत्ता दर्शाती बात को बेमौक़े रखने से उससे टीचर्स परेशान होने लगे. पर अच्छे अंक सफलता और बेहतरी का मापदंड होना शगुन की सभी ग़लतियां ढापने के लिए काफ़ी था. ‘मैं अच्छी हूं’ से ‘मैं ही अच्छी हूं’ के भाव ने कब मज़बूती से व्यवहार में जगह बना ली इसका आभास भी शायद शगुन को नहीं हो पाया. किशोरावस्था से वयस्क होने तक उसके ‘अटेंशन सीकर’ का भाव भी वयस्क हो चुका था.

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पहले से ही तय लक्ष्य की प्राप्ति में एक कदम आगे बढ़ाते उसने भौतिक शास्त्र में स्नातक होने के लिए दिल्ली के नामी कॉलेज में प्रवेश ले लिया था. खोजी और जिज्ञासु मन ने एक नामी वैज्ञानिक बनने की ठान ली थी. अपने को सबसे बेहतर माननेवाली शगुन को नए माहौल और लोगों के साथ तालमेल बिठाने में काफ़ी मुश्किल पेश आने लगी. वहां सब एक से बढ़कर एक क़ाबिल और तेज दिमाग़ लोगों का समंदर था, जो शगुन जैसे छोटे से पोखर का ध्यान खींचने में असमर्थ था. सेंटर ऑफ अट्रैक्शन रहने की आदि शगुन के लिए यह एक बहुत ही असहज स्थिति थी. आते ही अपने झंडे गाड़ देने का ख़्वाब लेकर आई छोटे शहर की लड़की के लिए यह किसी गहरे दुख से कम नही था. वाह-वाह और शाबाश सुनने के आदि कान अब उसके आगे बढ़कर किए मित्रता प्रस्ताव पर भी उपहास के शब्दों से आहत हो रहे थे. रोज़ शाम को अपने माता-पिता से फोन पर भड़ास निकालने उसे एक महीने से ज़्यादा हो गया था, पर पांच हज़ार विद्यार्थियो के विश्वविद्यालय में वो सिर्फ़ एक मित्र बना पाने मे सफल हो पाई थी और वो भी उसकी रूम पार्टनर थी. इसलिए उसके साथ वक़्त गुज़ारना इच्छा से ज़्यादा मजबूरी थी. सीमा दक्षिण भारतीय, कम बोलनेवाली लड़की थी. शांत मिजाज़ और चेहरे पर सदा दिखनेवाली मंद मुस्कान उसकी पहचान थी. शगुन की बातें वो बडे़ ध्यान से सुनती और बहुत कम शब्दों में अपनी बात को कह लेती थी. शगुन भी आश्चर्य करती की यह फोन पर अपने परिवारजन से बात करते कभी भी ऊंची आवाज़ नहीं करती. हमेशा ख़ुशमिजाज़ रहना, गुनगुनाते हुए काम करना, आगे बढ़कर लोगों की मदद करना जैसे काम से शगुन यक़ीन नहीं कर पा रही थी कि कोई इतना सहज कैसे रह सकता है. उसको कमतर आंकते वो अक्सर उस पर अपना हुक्म चलाने का प्रयास करती. सीमा सरल रहते या तो उसकी बात मान लेती या हंसी में ऐसे टालती की शगुन को बुरा भी नहीं लगता. शगुन अपने पूर्व की उपलब्धियों के बखान उसके सामने कर अपनी तारीफ़ सुनने को बेताब रहती, पर सीमा उसके मन-मुताबिक़ प्रतिक्रिया नहीं देती, तो वो और बैचेन हो जाती.
रविवार की छुट्टी के दिन दोनों शहर घूमने और ज़रूरी सामान ख़रीदने चले गए. शगुन ने कुछ मंहगी पोशाक ख़रीदी, तो सीमा ने चयन करने में उसकी मदद कर दी, पर अपने लिए कुछ ना लिया.
स्टेशनरी की दुकान से जब सीमा ने अपने लिए दो बडे केनवॉस और रंग ख़रीदे, तो शगुन आश्चर्य से बोली, “अरे, तुम भी पेंटिंग करती हो, तुमने कभी बताया नहीं? चलो मैं भी एक कैनवॉस ले लेती हूं.” रात का भोजन कर शगुन तो थककर सो गई, पर सीमा ने अपनी चित्रकारी शुरू कर दी.
चार घंटे लगातार शांत वातावरण और शांत मन ने एक दौड़ते श्वेत अश्व का नयनाभिराम चित्र लगभग तैयार कर लिया. सुबह शगुन सोकर उठी, तो चित्र देखकर दंग रह गई. उसे विश्वास नहीं हुआ कि एक रात में इतनी सुंदर पेंटिंग भी कोई बना सकता है. सीमा के जागने पर उसने शिकायत की, “तुम इतना अच्छा पेंटिंग करती हो और तुमने कभी ज़िक्र भी नहीं किया?” सीमा हौले से मुस्कुराते हुए बोली, “तुम अपने बारे में इतनी मशगूल रही कि मुझे सुनने का तुम्हारा मन कभी नज़र ही नहीं आया. जैसा तुम बताती हो, तुम भी बहुत अच्छी चित्रकारी करती ही होगी.”
“हां, पर तुम्हारा तो बेहतरीन हाथ है.” शगुन को आज पहली बार कमतरी का एहसास हो रहा था. अगले एक हफ़्ते तक उस चित्र पर सीमा ने काम कर उसे एकटक देखने लायक बना दिया, तो शगुन को अपने अंदर किसी हमउम्र के लिए पहली बार सम्मान के भाव महसूस हुए. अब वो सीमा पर हावी होने के प्रयास को छोड़कर सार्थक चर्चा करती. जैसे-जैसे वो उसके बारे में जानती गई, वैसे-वैसे वह अपने ‘मैं ही सर्वश्रेष्ठ’ के भाव से मुक्त होती गई.

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पहला सेमेस्टर पूरा हो चुका था. शगुन पहले दस में भी नहीं थी और सीमा ने तीसरा स्थान प्राप्त किया था. क्लास के सभी लोगों ने अपने घर जाने से पहले एक छोटी-सी पार्टी रखी थी. जब सीमा ने एक सुंदर लोकगीत गाया. सभी दंग रह गए. सधा कंठ और सधा स्वर. शगुन अब पूरी तरह सीमा की मुरीद हो चुकी थी. उससे पूरे उल्लास और स्नेह से जब सीमा को गले लगाया, तो ख़ुद उसे अपने दंभ की बर्फ़ पिघलती-सी नज़र आई. कमरे में सामान पैक करते बातचीत से उसे नई बात पता चली कि सीमा एक प्रशिक्षित कत्थक नृत्यांगना है. इतनी सारी ख़ूबियां और इतनी सरल, शगुन अब भी यक़ीन नहीं कर पा रही थी. सीमा के स्वभाव और पांच महीने की संगत ने शगुन को आत्मावलोकन करना तो सिखा ही दिया था. पांच महीने बाद माता-पिता भी घर लौटी नई शगुन को देख अचंभित थे, जिसमें आत्मविश्वास बेशक थोड़ा कम था, पर जीवन को सकारात्मक नज़रिए से देखने का वयस्क भाव पूरी तरह दृष्टिगोचर था जो अब तक दिखने से नदारद था.

– संदीप पांडे

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“अरे वाह कमला, ये तो बहुत अच्छा किया तूने. तुझे तो ‘सुपर मां’ का ख़िताब मिलना चाहिए.” और सारी महिलाएं ज़ोरदार तालियों के साथ कमला के इस फ़ैसले का स्वागत करने लगीं.
और वही बैठीं मिसेज़ शर्मा शर्म से लाल हो अपना मुंह नीचे की ओर झुका के बैठ गईं, जिन्होंने लोक लाज के कारण अपनी इकलौती बेटी को ससुराल के कष्ट सहने को मजबूर कर दिया था.

छोटी-सी नन्हीं बच्ची को गोद में लिए कमला अपनी बिटिया के साथ चली आ रही थी. यहां पूस माह की दोपहरी में धूप सेंकती कुर्सियों पर तमाम बड़े घर की महिलाएं बैठी हुई थीं जहां कमला काम करती थी. तभी उन्हीं महिलाओं में से एक ने कमला को टोका, “अरे कमला, दो दिन से काम पर क्यों नहीं आई? कहां गई थी बिना बताए? और ये पूनम को सुसराल से क्यों ले आई? अभी तो इसकी बेटी महीनेभर की भी नहीं हुई.”

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तभी कमला अपने बुंदेली अंदाज़ में बोली, “अरे दीदी, का बताएं दामाद मारत हतो और गाली-गलोच सो अलग… आप लोग तो जानती हो, अगर पति इज्ज़त न करे, तो सासरे बारे तो ठीकई आएं, जेई से रिपोर्ट करा आए सबकी और पूनम को संगे लिवा लाए. बहुत हो गओ. कहां तक सहती बिटिया… पूनम ने फोन करो कि ‘बहुत मारो आज अम्मा! दहेज के ताने दे रहे सब… सो अचानक से जावो हो और आप लोगन को बता न पाए.”
“अरे वाह कमला, ये तो बहुत अच्छा किया तूने. तुझे तो ‘सुपर मां’ का ख़िताब मिलना चाहिए.” और सारी महिलाएं ज़ोरदार तालियों के साथ कमला के इस फ़ैसले का स्वागत करने लगीं. कमला ने बेटी के दर्द को समझा. उसे न केवल ससुराल की अत्याचार व प्रताड़ना से बचाया, बल्कि साथ ले आने का कठोर फ़ैसला भी किया.

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और वही बैठीं मिसेज़ शर्मा शर्म से लाल हो अपना मुंह नीचे की ओर झुका के बैठ गईं, जिन्होंने लोक लाज के कारण अपनी इकलौती बेटी को ससुराल के कष्ट सहने को मजबूर कर दिया था. मगर अब क्या हो सकता था? मायकेवालों से मदद की भीख मांगते-मांगते उनकी बेटी अब दुनिया को अलविदा कह चुकी थी.

पूर्ति वैभव खरे

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संजीव जायसवाल ‘संजय’

“तुम सब बेकार की बहस मत करो. आजकल एस.एम.एस, फेसबुक और व्हाट्सएप का इस्तेमाल तो राह चलता आदमी भी करता है. लेकिन बड़ी-बड़ी सेलिब्रेटीज़ की आंखों का तारा तो मैं ही हूं. उनकी एक-एक ट्वीट को लाखों-करोड़ों लोग फॉलो करते हैं, रीट्वीट करते हैं, इसलिए सोशल मीडिया का असली राजकुमार मैं हुआ.”

रात के बारह बज रहे थे. चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था. पढ़ाई पूरी करने के बाद देवांग गहरी नींद में सो रहा था. उसका स्मार्ट फोन मेज पर रखा हुआ था.
अचानक स्मार्ट फोन से एस.एम.एस. बाहर निकला और हाथ नचाते हुए बोला, “मैं हूं सोशल मीडिया का राजकुमार. पहले लोगों का संदेश पहुंचाने में हफ़्तों लगते थे, लेकिन मैं पलक झपकते ही संदेश पहुंचा देता हूं, इसलिए मैं हुआ सोशल मीडिया का राजकुमार.”
“राजकुमार नहीं तुम सोशल मीडिया के बंदर हो बंदर…” तभी फेसबुक ने स्मार्टफोन से बाहर निकलते हुए कहा.
“तुमने मुझे बंदर क्यूं कहा?” एस.एम.एस ने मुंह बनाया.
“तुम्हारा न कोई रूप न कोई रंग. बस तुम दुनिया में थोड़ा पहले आ गए थे, इसलिए तुम्हारी तुलना इंसानों के पूर्वज बंदरों से की जा सकती है.” फेसबुक हंसा.
फिर बोला, “सोशल मीडिया का असली राजकुमार तो मैं हूं. पूरी दुनिया में अरबों लोग मेरे दीवाने हैं. मैं न केवल उनके संदेश पहुचाता हूं, बल्कि उनकी फोटो, वीडियो, ऑडियो सब कुछ पहुंचाता हूं.”
“लेकिन फटाफट संदेश लाना ले जाना हो, तो मैं ही सबके काम आता हूं.” एस.एम.एस ने धीमे स्वर में कहा. फेसबुक की उपयोगिता सुन उसका मन बुझ सा गया था.

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“तुम किस ज़माने की बात कर रहे हो? आजकल लोग संदेश भेजकर उसके उत्तर का इंतज़ार नहीं करते, बल्कि मेरी मदद से डायरेक्ट चैटिंग करते हैं.” फेसबुक ने अकड़ते हुए उसकी बात काटी.
“ऐ ज़्यादा गप्प मत हांक.” तभी व्हाट्सएप स्मार्ट फोन से बाहर निकला और हाथ नचाते हुए बोला, “आजकल किसके पास इतनी ़फुर्सत है कि चैटिंग के लिए तुम्हारे दरवाज़े खोले और बंद करे.”
“दरवाज़े? कैसे दरवाज़े?” फेसबुक ने पूछा.
“अरे, तुम्हें चलाने से पहले लॉग इन और बाद में लॉग आउट करना किसी दरवाज़े को खोलने और बंद करने से कम झंझटी है क्या?” व्हाट्सएप ने मुंह बनाया फिर अकड़ते हुए बोला, “आजकल तो लोग संदेश भेजने के साथ-साथ चैटिंग करने के लिए भी मुझे ही पंसद करते हैं, क्योंकि मैं चौबीसों घंटे सेवा में मौजूद रहता हूं. मेरे साथ ताला और दरवाज़ा खोलने का भी कोई झंझट नहीं, इसलिए सोशल मीडिया का असली राजकुमार मैं हुआ.”
“ज़्यादा शेखी मात झाड़. पूरी दुनिया जानती है कि तेरी कंपनी को मेरे मालिक ने ख़रीद लिया है. अब तुम राजकुमार नहीं मेरे ग़ुलाम हो.” फेसबुक ने आंखे तरेरीं.
यह व्हाट्सएप की कमज़ोर नस थी. फेसबुक की बात सुन वह तिलमिला उठा. वह कोई तीखा उत्तर देने जा रहा था कि तभी टिवट्र उछलता हुआ बाहर आया और आंखें नचाते हुए बोला, “तुम सब बेकार की बहस मत करो. आजकल एस.एम.एस, फेसबुक और व्हाट्सएप का इस्तेमाल तो राह चलता आदमी भी करता है. लेकिन बड़ी-बड़ी सेलिब्रेटीज़ की आंखों का तारा तो मैं ही हूं. उनकी एक-एक ट्वीट को लाखों-करोड़ों लोग फॉलो करते हैं, रीट्वीट करते हैं, इसलिए सोशल मीडिया का असली राजकुमार मैं हुआ.”
ट्विटर की बात ख़त्म भी नहीं हुई थी कि नया नवेला इंस्टाग्राम बीच में कूद पड़ा. फिर तो होड़ सी लग गई. स्काइप, मैसेंजर. वाइबर, हैंगआउट जैसे महारथी मैदान में आ गए और अपने-अपने को सोशल मीडिया का राजकुमार साबित करने लगे.
दिवांग गहरी नींद में सो रहा था, लेकिन उसकी मेज पर एक लिफ़ाफ़ा रखा हुआ था. वह काफ़ी देर से सभी की बातें सुन रहा था. उससे रहा नहीं गया. उसने अपना हाथ उठाते हुए कहा, “शांत हो जाओ भाइयों! शांत! मेरे पास एक तरीक़ा है, जिससे साबित हो जाएगा कि तुम सब में असली राजकुमार कौन है.”
“कैसा तरीक़ा? जल्दी बताइए.” सारे दावेदार एक साथ बोल पड़े.


“तुम सभी संदेश पहुंचाने के महारथी हो?” लिफ़ा़फे ने पूछा.
“हां.” सभी ने सिर हिलाया.
“देवांग भइया को इंजीनियरिंग में एडमिशन लेना है. उनका फॉर्म और बैंक ड्राफ्ट मेरे पास है. तुम में जो सबसे पहले इन्हें पहुंचा आएगा, वही सोशल मीडिया का असली राजकुमार होगा.” लिफ़ा़फे ने कहा.
“यह तो बहुत आसान है. आप दोनों का स्कैन करवा दीजिए. मैं फटाफट पहुंचा आता हूं.” फेसबुक और इंस्टाग्राम एक साथ बोले.
“स्कैनिंग की ज़रूरत नहीं. आप दोनों की फोटो खींच दीजिए. मैं पलक झपकते पहुंचा दूंगा.” व्हाट्सएप ने अकड़ते हुए कहा.
यह सुन लिफ़ाफ़ा हल्का-सा हंसा फिर बोला, “क्या आप लोगों को लगता है कि कॉलेजवाले बिना ओरिजनल फॉर्म और बैंकवाले बिना ओरिजनल ड्राफ्ट के मान जाएंगे?”
यह सुन सन्नाटा छा गया. तब लिफ़ा़फे ने टोका, “तुम सब लोग बहुत तेज और शक्तिशाली हो. देवांग भइया तुम सबके दोस्त हैं. क्या तुम लोग उनका इतना छोटा-सा काम नहीं करोगे?”
“माफ़ करना. यह काम मैं नहीं कर सकता.” फेसबुक ने अपनी आंखें झुका लीं.
“तुम दोनों तो बिल्कुल लेटेस्ट टेक्नोलॉजी से लैस हो. क्या तुम लोग भी इतना छोटा-सा काम नहीं कर सकते?” लिफ़ा़फे ने ट्विटर और इंस्टाग्राम से पूछा.
उन दोनों ने भी अपनी आंखें झुका लीं. लिफ़ा़फे ने एक-एक करके स्काइप, मैसेंजर, एस.एम.एस, एम.एम.एस, वाइबर, ब्लूटुथ, हैंगआउट सहित सोशल मीडिया के सभी महारथियों से पूछा, लेकिन यह काम कर पाना किसी के भी बस में न था.
“जानते हो यह काम कौन कर सकता है?” लिफ़ा़फे ने पूछा.
“कौन कर सकता है?” सभी एक साथ बोले.

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“पांच रुपया का यह लिफ़ाफ़ा, जिसे तुम लोग गुज़रे ज़माने की बेकार चीज़ समझते हो.” लिफ़ा़फे ने सभी पर एक दृष्टि दौड़ाई, फिर बोला, “मैं पहुंचाऊंगा दिवांग भइया का फॉर्म और ड्राफ्ट, ताकि उनका अच्छे से कॉलेज में एडमिशन हो सके.”
“तब तो सोशल मीडिया के असली राजकुमार आप हुए.” ट्विटर तपाक से बोला.
“नहीं, हम में से कोई भी राजकुमार नहीं हैं. हम सब मनुष्य की सुविधा के लिए बने हैं, जैसे- फ्रिज, एसी, कूलर, पंखा सब बिजली परिवार के हैं, लेकिन सबकी अपनी-अपनी उपयोगिता है. वैसे ही हम सब भी एक ही परिवार के हैं. हम में कोई भी छोटा-बड़ा नहीं हैं. हम सबका काम मनुष्य के जीवन को आसान बनाना है.” लिफ़ा़फे ने शांत स्वर में समझाया.
लिफ़ा़फे की बात सबकी समझ में आ गई. सभी ने प्रण किया कि वे अब कभी आपस में बहस नहीं करेगे और देवांग भइया के लिए जी जान से काम करेंगे.

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“पिछली बार ख़ूब मज़ा आया था जहां आप लेकर गए थे. कितने सारे बच्चे थे. उनके शूज़ भी नहीं थे. फिर मम्मा और आपने मेरे हाथ से सबको कलरफुल शूज़ दिलाए थे और सबको पाव भाजी भी खिलाई थी. केक काटते समय तो सबने कितने ज़ोर से हैप्पी बर्थडे सॉन्ग गाया था. एक बच्चे ने तो वही पर मुझे काग़ज़ से फूल बना कर दिया था. हम फिर वही चलेंगे.” ईशान ने चहकते हुए पूछा.

“पापा अगले महीने मैं 6 ईयरस् का हो जाऊंगा.”
ईशान के कथन मे छुपा प्रश्न अजय ने भांप लिया कि बेटा उसके जन्मदिन के लिए पापा क्या तैयारी कर रहे है और क्या तोहफ़ा देने की सोच रहे हैं.
मुस्कुराते हुए अजय ने पूछा, ‘बेटा, दो साल पहले तुम्हारे बर्थडे पर तुम्हे क्या गिफ्टस मिले थे?”
“मामा ने रिमोटवाली गाड़ी दी थी और चाची एक ड्रेस लाई थी और मेरे दोस्त भी लाए थे…”
“अब वो गिफ्टस् कहां है?”
“कार तो थोड़े दिन मे ही ख़राब हो गई थी और ड्रेस भी छोटी हो गई और…”

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“पिछले साल बर्थडे पर हम कहां गए थे?”
“पिछली बार ख़ूब मज़ा आया था जहां आप लेकर गए थे. कितने सारे बच्चे थे. उनके शूज़ भी नहीं थे. फिर मम्मा और आपने मेरे हाथ से सबको कलरफुल शूज़ दिलाए थे और सबको पाव भाजी भी खिलाई थी. केक काटते समय तो सबने कितने ज़ोर से हैप्पी बर्थडे सॉन्ग गाया था. एक बच्चे ने तो वही पर मुझे काग़ज़ से फूल बना कर दिया था. हम फिर वही चलेंगे.” ईशान ने चहकते हुए पूछा.
“नही इस बार हम आपको बहुत सारे बूढ़े अंकल के पास ले चलेंगे. उनको तुम झांसी की रानी वाली कविता सुनाना, जो तुम पूरे जोश में गाते हो. फिर हम देवांश को भी ले चलेंगे, वो गाना बहुत अच्छा गाता है.”
“हां… हां देवांश को भी और मोनिका को भी.”
“केक भी हम एक नही दो काटेंगे.” मम्मी ने दूध का ग्लास हाथ में थमाते ईशान से कहा.
“एक केक मैं ओवन में बनाऊंगी और दूसरा आटे गुड का हलवा, जो कटेगा भी और बंटेगा भी.”

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ईशान के चेहरे पर दबे छुपे ही सही संतोष के भाव अजय ने पत्नी संग पढ़ लिए थे. देने की ख़ूशी का बेटे द्वारा आत्मसात होता ज्ञान दोनों महसूस कर पा रहे थे.

– संदीप पांडे

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मीनू त्रिपाठी

“साहब, मेरा बेटा मेरी मदद करने आया है. अपनी गाड़ी में बजरी भर कर पहुंचाएगा.” राजू के हाथ में खिलौनेवाले ट्रक की ओर इशारा करते हुए जगन बोला, तो ठेकेदार ने हंसकर कहा, “बजरी पहुंचे न पहुंचे चाइल्ड लेबर के अपराध में मैं ज़रूर जेल पहुंच जाऊंगा.”

“राजू…” जगन ने घर मे घुसते ही बेटे को आवाज़ लगाई, तो उसका चार साल का बेटा गाल फुलाए सामने आकर खड़ा हो गया.
“क्या हुआ, मम्मी ने डांट लगाई है क्या?” पूछने पर उसने हां में सिर हिलाया. मम्मी ने उसे क्यों डांटा है यह पूछने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी राजू की मां पानी के ग्लास के साथ शिकायतों का पुलिंदा ले आईं और खोलकर बैठ गईं.
“दिनभर खेलता रहता है ये राजू… आज इसकी टीचर ने भी इसकी शिकायत की है.” राजू की परेशान मम्मी अपने सिर पर हाथ रखकर देर तक उसकी शिकायतें करती रहीं.
“पढ़-लिखकर बड़ा अफ़सर बन जाए, इसलिए चार घरों का काम करके खटती हूं. तुम सड़क पर गिट्टी-बजरी ढोकर इसकी स्कूल की फीस भर रहे हो और ये हमारी मेहनत पानी किए दे रहा है.”
“जब देखो पढ़ाई… पढ़ाई… मत जमा करो फीस, मत पढ़ाओ मुझे.” बोलते-बोलते राजू बुक्का फाड़ कर रोने लगा, तो उसकी मां और जगन दोनों हैरान रह गए.
कुछ देर बाद जगन राजू की मां से हताशा भरे स्वर में बोला, “कितना छोटा है अपना राजू. तुम तो पढ़ाई-पढ़ाई करके पढ़ने के प्रति अरुचि पैदा करवा दोगी.”

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“छोटा है, इसलिए अभी से इसे अच्छी आदतें सिखा रही हूं. पढ़ाई-पढ़ाई सिर्फ़ पढ़ने के समय ही कहती हूं. खेलने से किसने मना किया है. ख़ूब खेले, पर ये तो पढ़ने के समय ही खेलना चाहता है.”
राजू की मम्मी की बात सुनकर जगन ने प्यार से राजू से कहा, “राजू, ये तो सही नही है. खेलने को मना थोड़े करती है तुम्हारी मम्मी, पर पढ़ने के समय खेलोगे तो ग़ुस्सा करेंगी ही…”
हमेशा राजू का पक्ष लेनेवाले पापा भी मम्मी का पक्ष लेने लगे, तो वह रूठकर , “मै किसी से बात नहीं करूंगा. कोई मुझे प्यार नहीं करता. कोई खेलने नहीं देता…” कहकर फिर से बिसूरने लगा.
अपने लाडले को रूठा देखकर जगन ने झोले में हाथ डाला और लाल रंग का एक प्लास्टिक का ट्रक निकालकर उसको थमाया, तो बिसूरता राजू सहसा ख़ुश हो गया और आंखें चमक उठी.
मम्मी की डांट के चक्कर में वह भूल ही गया था कि आज तो पापा उसके लिए खिलौनावाला ट्रक लानेवाले थे. चार दिन पहले उसने दुकान में इसे देखा था और मचल उठा था, “मुझे ये चाहिए…”
बाद में ले दूंगा का आश्वासन जगन ने दिया और अपनी खाली जेब दिखलाई, तब वह दुकान से टला.
दो दिन से वह शाम को अपने पापा का दौड़कर स्वागत करता है और खिलौनेवाला ट्रक न देखकर ठुनकने लगता है. पर आज के लिए पापा ने पक्का वायदा किया था कि जो भी हो जाए वह उसके लिए लाल वाला ट्रक लेकर ही आएंगे.
“वैसे ही नही पढ़ता-लिखता है आपने खिलौना और लाकर दे दिया.” राजू की मम्मी बड़बड़ाती हुई चली गई, तो जगन उससे बोले, “मम्मी बहुत नाराज़ है. उनको ख़ुश करने के लिए पढ़ना होगा.”
“पापा, मुझे पढ़ना अच्छा नहीं लगता.” राजू ने मुंह बनाकर कहा, तो जगन ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “पढ़ोगे नहीं, तो मेरी तरह गिट्टी-बजरी ढोना पड़ेगा. तुम्हारे नरम-नरम हाथ मेरे हाथों की तरह खुरदरे और कटे-फटे से हो जाएंगे.”
“नही होंगे, मैं हाथों से बजरी थोड़ी न उठाऊंगा. मेरा ट्रक उठाएगा.” अपने खिलौनेवाले ट्रक के साथ खेलने में मगन राजू बोला, तो उसके पापा चौंक उठे. फिर प्यार से उसका सिर सहला दिया और सोच में डूब गए. रात को राजू सो गया, पर उसके मम्मी-पापा देर रात तक बात करते रहे.
दूसरे दिन सुबह-सुबह राजू को उठाते हुए जगन बोले, “ए राजू उठ जा. आज मेरे साथ काम पर चल…”
काम पर जाने की बात सुनकर राजू आंखें मींचता हुआ उठा और बोला, “और स्कूल…”
“छोड़ न स्कूल… तुम्हारा तो वैसे भी पढ़ने में मन नही लगता…”
“और मम्मी, वह जाने देंगी?”
“क्यो नहीं जाने दूंगी. अब जब तुम्हारा पढ़ने में मन ही नहीं लगता है, तो फिर ठीक है, जा अपने पापा का हाथ बंटा आ….” ।
यह सुनकर राजू तो खु़शी से झूम उठा. आज न स्कूल, न पढ़ने की बात… वह फटाफट उठकर तैयार हुआ और खिलौने वाला ट्रक उठाकर पापा के साथ साइट पर जहां काम हो रहा था वहां चल दिया.
“अरे जगन, धूल, धूप-मिट्टी में बच्चे को क्यों ले आए.” जो मिलता वह यही पूछता. जवाब में, “हमारा राजू अब से स्कूल नहीं जाएगा मेरी मदद करेगा.” कहकर जगन सबको हैरान और नन्हे राजू को ख़ुश कर देता.
साइट पर जगन के साथ राजू को देखकर ठेकेदार ने पूछा, “इसे क्यों ले आए.”
“साहब, मेरा बेटा मेरी मदद करने आया है. अपनी गाड़ी में बजरी भर कर पहुंचाएगा.” राजू के हाथ में खिलौनेवाले ट्रक की ओर इशारा करते हुए जगन बोला, तो ठेकेदार ने हंसकर कहा, “बजरी पहुंचे न पहुंचे चाइल्ड लेबर के अपराध में मैं ज़रूर जेल पहुंच जाऊंगा.”
हंसी-मज़ाक के बीच जगन ने धूप में पड़ी बजरी के पहाड़नुमा ढेर के ऊपर बैठाकर कहा, “देख राजू, इतनी सारी बजरी हमें ढोना है।”
“इत्ती सारी…” कहकर बेचारा राजू आंखें फाड़कर कभी अपने ट्रक को देखता, तो कभी बजरी…
“तू चलकर आया है, इसलिए थोड़ा सुस्ता ले, तब तक मैं काम पर लगता हूं.” कहकर जगन तसले में बजरी उठाने लगा और सिर पर लादकर सड़क पर डालने लगा. पच्चीसों चक्कर लगाकर जब जगन अपने चेहरे का पसीना पोंछता हुआ आया, तो देखा राजू बजरी के सिंहासन पर बुत बना बैठा था.
“क्या सोच रहा है राजू, अब मैं आराम करता हूं तू अपने ट्रक से बजरी पहुंचा वहां.”

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जगन की बात ठेकेदार के कानों में पड़ी, तो वह हंसते हुए गुमसुम से बैठे राजू से बोला, “राजू बेटा, जो पापा की बात मानी, तो पूरा जीवन इस ट्रक में बजरी लेकर वहां पहुंचाओगे तब भी नही पहुंचेगी. और जगन तुम पिता हो या क्या हो, धूप में झुलस रहा है बच्चा, उठाओ उसे वहां से…”
“साहब, पिता हूं इसीलिए झुलसा रहा हूं. स्कूल न जाना पड़े, इसलिए यह ख़ुशी-ख़ुशी मेरे साथ चला आया है… अब कल शायद…” जगन की अधूरी बात ठेकेदार को पूरी समझ में आ गई.
शाम को राजू घर आया, तो मां ने पूछा, “क्यों राजू, तुमने पापा की मदद की या नही…”
“ज़रूर करता पर बजरी ढोने के लिए इसका ट्रक थोड़ा छोटा पड़ गया था.” जवाब जगन ने दिया, तो राजू झट से बोला, “थोड़ा नहीं बहुत-बहुत छोटा था.”
थके हुए राजू के कुम्हलाए चेहरे को देख मम्मी उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “थक गया होगा, चल हाथ-मुंह धो ले फिर दूध दे दूं.”
“हां बहुत थक गया, पर पापा तो बहुत-बहुत ज़्यादा थके हैं. उनको मेरे हिस्से का भी दूध देना और हां पापा कल से आप बजरी मत ढोना.”
“क्यों?”
“क्यो क्या! कितना मेहनतवाला काम है कोई और काम देखो…”
“अब तुम्हारा पापा पढ़ा-लिखा नहीं है न राजू, इसलिए उसे बजरी तो ढोनी ही पड़ेगी.”
राजू का मुंह उतरा देख वह स्नेह से बोले, “इसीलिए मम्मी तुम्हे पढ़ने-लिखने को कहती है, ताकि तुम बड़े अफ़सर बनो और…”
“बड़ा अफ़सर बन जाऊंगा, तब तो नहीं ढोओगे न…”
“बिल्कुल नहीं…” जगन ने कहा, तो राजू गंभीर मुद्रा में बैठ गया और उसकी मम्मी मुस्कुराते हुए जगन की कल रात को कही बात याद करने लगीं, “पढ़ने के प्रति रुचि जगाने के लिए बजरी कैसे उठाई जाती है यह उसे दिखाना पड़ेगा.”
उस दिन तो थका हुआ राजू सो गया, पर अगले दिन की स्वर्णिम किरण राजू को सही राह पर ले जाएगी, इस बात का विश्वास राजू के मम्मी-पापा को सुकूनभरी नींद में डूबा गई.

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भावना प्रकाश

पंखुड़ी अपने होनेवाले पति और ससुराल से कतई ख़ुश नहीं थी और मम्मी की नज़र में ये सब बचपना था. वो जब उनकी शिकायत करती, मम्मी व्यावहारिकता के उपदेश लेकर बैठ जातीं. “समझौता तो लड़की को ही करना पड़ता है. मुझे देखो, एक सुंदर साड़ी ख़रीदने की, एक मनपसंद गहना ले पाने की ख़्वाहिश में उम्र बीत गई. तुम्हें क्या पता कितनी तकलीफ़ होती है एक दिन में सौ बार मन मारकर जीने में. और फिर देख, धन से सारी दुनिया में सम्मान भी मिलता है. सारे रिश्तेदार इस रिश्ते के होने से हमें कितना मान देने लगे हैें.”

पंखुड़ी का चीत्कार करता मन ये मानने को तैयार ही नहीं था कि अब नयन से उसका कोई रिश्ता नहीं रहेगा. उसे अब ज़िंदगीभर के लिए किसी और को समर्पित हो जाना है. नयन उसके लिए पराया होगा और वो नयन के लिए. क्या सात फेरों की अग्नि कोमल भावों को जलाकर राख कर पाएगी? और इससे भी बड़ी बात ये कि क्या वो गर्वित के फ्रेम में सजी तस्वीर बनकर जी पाएगी? बिना अपनी अस्मिता के, स़िर्फ एक शोपीस की तरह? पर वो ़फैसला ले चुकी है… पर क्या सचमुच वो ़फैसला ले चुकी है? या मम्मी को अपना ़फैसला ख़ुद पर थोपने दे चुकी है?
तभी उसका ध्यान ब्यूटीशियन की ओर गया और वो उसका मन समझ गई. नयन के साथ रहकर उसे भी मन पढ़ना आ गया है शायद. उसे पता है शहर के सबसे प्रसिद्ध ब्यूटीपार्लर की सबसे कुशल ब्यूटीशियन आज अपनी कला से संतुष्ट नहीं हो पा रही है.
“क्या हुआ? मैं सुंदर नहीं लग पा रही?” उसे परेशान-सी देखकर पंखुड़ी ही मुस्कुराकर पूछ उठी.
वो सकपका गई, “नहीं, नहीं आप सौंदर्य की प्रतिमा हैं पर… पर कुछ कमी-सी लग रही है, जो समझ में नहीं आ रही.”
“चिंता मत करिए, मैं संतुष्ट हूं.” पंखुड़ी ने उसका वाक्य हल्की-सी हंसी के साथ पूरा किया और उठ गई. अपना लेटेस्ट कशीदाकारी का बेशक़ीमती लहंगा नज़ाकत के साथ उठाए पार्लर का कमरा और कॉरीडोर पार करके कार तक पहुंचते हुए पंखुड़ी सारी तारीफ़ भरी नज़रें हसरत के साथ अपनी ओर उठी महसूस कर रही थी.
कार में बैठकर ड्राइवर को चलने का आदेश दे, पंखुड़ी ने सिर हेडरेस्ट से टिकाकर पलकें मूंद लीं. कैसे कहती ब्यूटीशियन से कि वो जानती है कि क्या कमी है. मन की सच्ची ख़ुुशी के बिना कोई सुंदर लग सकता है भला? फिर क्या फ़ायदा ऐसी सुंदरता का, जिसके दम पर मम्मी को गुमान था कि लड़केवाले मांग कर ले जाएंगे. मांग कर तो ले जा रहे हैं लड़केवाले, पर बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई प्रदर्शनी में सजी पेंटिग पर मुग्ध होकर मुंहमांगे दाम देकर कहे कि इसे मेरे इंटीरियर डेकोरेटर के पास फ्रेम कराने भेज दो.
तभी नयन का वॉइस मैसेज आ गया- ‘तुम्हारे नेट के एग़्जाम की डेट आ गई है. उसका लिंक और सभी ज़रूरी सामग्री तुम्हारे लैपटॉप में
डाउनलोड कर दी है. ऑल द बेस्ट फॉर एवरीथिंग.’ एक और मैसेज था जिसे सुनने के बाद पंखुड़ी के लिए आंसू रोकना मुश्किल हो गया- ‘हमेशा ख़ुश रहना और किसी भी ज़रूरत के लिए मुझे बताने में सकुचाने न लगना. हम दोस्त थे, हैं और रहेंगे.’
ओह नयन! तुम इतने समझदार और इतने बुद्धू एक साथ कैसे हो सकते हो? क्यों नहीं समझ पाए तुम मेरा मन? नहीं, ऐसा हो ही नहीं सकता कि तुम मेरा मन न समझ पाओ. फिर क्यों तुमने बगावत के लिए मेरा साथ नहीं दिया? मुझमें न सही तुममें तो आत्मविश्‍वास की कोई कमी नहीं? फिर वो आत्मविश्‍वास मम्मी का मन बदलने के लिए काम में क्यों नहीं लाए? और मैं भी कितनी बेवकूफ़ हूं. तुम्हें ये समझाने की कभी कोशिश ही नहीं की कि मैं वहां ख़ुश नहीं रहूंगी. क्या करूं, तुम्हें कैसे समझाती कि अपने आत्मसम्मान को गिरवी रखकर कोई ख़ुशी नहीं ख़रीदी जा सकती. पर तभी पंखुड़ी के विचारों ने दिशा बदली. नयन से बेहतर इस बात को और कौन समझ सकता है. उसने तो कदम-कदम पर… तो क्या इसीलिए नयन ने…? उसकी मम्मी के विरुद्ध जाकर उसे अपनाकर क्या नयन का आत्मसम्मान आहत नहीं होगा? पंखुड़ी के मानस पर अतीत का चलचित्र चलने लगा.


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उसके घर के बगल में घर था नयन का. पहली बार नयन को कब लड़ते देखा था आत्मसम्मान के लिए? छह-सात साल के रहे होंगे दोनों. उस दिन वे दोनों पार्क में थे, जो उनके घर के सामने स़िफर्र् चौड़ी सड़क के पार था. पापा उनकी निगरानी के लिए बेंच पर बैठे थे, तभी ऑफिस से ज़रूरी फोन आ गया. उन्होंने घर की ओर निकलते हुए यूं ही कह दिया, “पंखुड़ी बेटा, अगर घर आना तो नयन का हाथ पकड़ लेना.”
“मुझे नहीं पकड़ना किसी का हाथ. मैं ख़ुद अपना ख़्याल रख सकता हूं.” नेत्रहीन नयन के तमतमाए चेहरे को देखकर सब सकते में आ गए थेे. तभी पापा ने बात सम्हाली थी, “अरे बेटा, तुम तो अपना ध्यान रख सकते हो, पर पंखुड़ी तो नहीं रख सकती न! कितनी अल्हड़ और लापरवाह है. चलती कहीं है, देखती कहीं और गिरती रहती है. मैंने पंखुड़ी से तुम्हारा हाथ पकड़ने को कहा, ताकि तुम उसका ध्यान रख सको.”
उस दिन नन्हें नयन ने जो प्यार से आगे बढ़कर उसका हाथ थामा, तो आज तक नहीं छोड़ा. कहा जाता है कि जब ईश्‍वर कुछ लेता है, तो बदले में बहुत कुछ अनोखा देता भी है. नेत्रहीन नयन इस बात का अनूठा उदाहरण था. गज़ब की चेतना और सतर्कता थी उसके अंदर.
बहुत छोटी उम्र से वो अपना ध्यान ख़ुद रखना सीख गया था. सच ही था, कई बार दोनों के मम्मी-पापा ने देखा और इस बात पर हंसे थे कि पंखुड़ी लड़खड़ाकर गिरने को हुई और नयन ने आगे बढ़कर उसे सम्हाल लिया. पंखुड़ी कहां है, और किस संकट में फंसनेवाली है, वो ये महसूस कर सकता था.
धीरे-धीरे पंखुड़ी भी उसे महसूस करना सीख गई. पार्क में बच्चे उसे साथ खिलाने की ज़िद करने पर मुंह बिचकाते. कुछ बच्चे तो साफ़ शब्दों में उसके अंधेपन की खिल्ली उड़ाते हुए उसको साथ खिलाने से मना कर देते. ऐसे में नयन के चेहरे पर छपी उदासी और बेबसी पंखुड़ी की बर्दाश्त से बाहर हो जाती. वो नयन के लिए सबसे झगड़ पड़ती. और घर आकर भी, कभी-कभी तो बहुत दिनों तक ग़ुस्सा रहती. उन बच्चों से बोलना, उनके साथ खेलना बंद कर देती. लेकिन नयन उसे समझाता, शांत करता और कहता कि वो खेले, नयन उसके जीतने से ख़ुश होता है. वो पार्क की बेंच पर बैठ जाता और उसका ख़ुश चेहरा और ताली बजाती भंगिमा पंखुड़ी के लिए जीत की प्रेरणा बन जाती. पार्क में कुछ पतझड़ और बसंत बीतते-बीतते पंखुड़ी थोड़ी समझदार हो गई और उसे नयन के ख़ुश चेहरे के पीछे छिपी अकेलेपन की उदासी की परत साफ़ दिखाई देने लगी, लेकिन खेल छोड़कर नयन के पास बैठकर बातें करने के लिए बनाया गया कोई भी बहाना नयन तुरंत समझ जाता, “तू खेलेगी नहीं, तो मैं तेरे साथ पार्क आना बंद कर दूंगा. अगर तुझे जीतते या जीत के लिए संघर्ष करते नहीं देखना है, तो मेरा यहां आना बेकार है.” नयन के स्वर की सख़्ती पंखुड़ी के दिल को छू जाती.
शुरुआती कक्षाओं में नयन को उसकी मां ने घर पर ही पढ़ाया. बिना ब्रेल लिपि में सिद्धहस्त हुए वो स्कूल जा नहीं सकता था. पंखुड़ी स्कूल से लौटते ही सीधे नयन के घर आती. हालांकि मम्मी से इसके लिए बहुत डांट खाती, पर नयन से सारी बातें शेयर किए बिना न उसे भूख लगती थी, न चैन पड़ता था.


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कभी-कभी मम्मी ज़्यादा चिढ़ जातीं, तो पापा कहते, “जाने दो. दोनों अकेले हैं और अपना अकेलापन बांट लेते हैं, ये तो अच्छी बात है.” नयन के मम्मी-पापा भी पंखुड़ी पर जान छिड़कते थे और अपने पापा की तो वो जान थी. उसके क्लर्क पिता ने ़फैसला किया था कि वो एक ही संतान करेंगे, ताकि उसकी हर ज़रूरत पूरी कर सकें.
फिर वो दिन भी आया जब नयन को स्कूल जाना था. नयन के उत्साह का ठिकाना नहीं था. अकेलेपन की अंध गुफा में उसका स़िर्फ एक साथी था- पंखुड़ी. पर आज उसके सामने एक ऐसी दुनिया खुलनेवाली थी, जो न स़िर्फ उसे नए दोस्त देनेवाली थी, बल्कि कहीं न कहीं उसे सामान्य की श्रेणी में भी रखनेवाली थी. वो भी सब बच्चों की तरह स्कूल जाएगा. उसके पास भी करने के लिए बहुत सारी गतिविधियां और लौटकर मम्मी-पापा को बताने के लिए ढेर सारी बातें होंगी. पंखुड़ी ने गेट, फिर मैदान, फिर कक्षाओं का ऐसा खाका खींचा था कि उसे पूर्ण विश्‍वास हो गया था कि वो कहीं गिरेगा नहीं.
लेकिन पहले ही दिन उसका सामना इस बेरहम दुनिया से हुआ. कुछ उसकी अतुलनीय मेधा तथा संजीदगी थी और कुछ अध्यापिकाओं
की संवेदनशीलता और सहानुभूति कि पहले ही दिन से उसे अध्यापिकाओं की इतनी प्रशंसा और प्रोत्साहन मिला कि वो कुछ बिगड़े विद्यार्थियों की ईर्ष्या का कारण बन गया. वो उसे
तरह-तरह से परेशान करते. स़िर्फ उपहास ही नहीं उड़ाते, बल्कि उसकी नेत्रहीनता का फ़ायदा उठाकर उसे चोट पहुंचाने का भी कोई मौक़ा न छोड़ते.
स्कूल खुलने के दस ही दिन बाद पंखुड़ी की बैडमिंटन की इंटर-स्कूल प्रतियोगिता में चयन के लिए प्रतियोगिता होनेवाली थी. नयन को पंखुड़ी के ही वर्ग में रखा गया था, ताकि वो अकेला महसूस न करे. प्रधानाध्यापिका ने भी पंखुड़ी को बुलाकर समझाया था कि वो नयन का विशेष ध्यान रखे. यदि बच्चे उसके साथ दुर्व्यवहार करें, तो तुरंत सूचित करे. लेकिन पंखुड़ी को पूरा समय खेल के अभ्यास में जाना होता था. वो लंच के समय या अति आवश्यक क्लास अटेंड करने ही कक्षा में आती और नयन से पूछती कि सब ठीक है, तो वो ख़ुुश नज़र आता.
उस दिन पंखुड़ी बहुत ख़ुश थी कि दर्शकों की भीड़ में नयन भी होगा उसका उत्साह बढ़ाने को. उधर वो शरारती लड़के नयन के साथ कुछ और ही खेल खेल रहे थे. वो नयन को खेल के मैदान की बजाय बिना बाउंड्री वॉल वाले टेरेस पर ले गए थे. एक ने उसकी छड़ी छीन ली और उसे रास्ता ढूंढ़ने को कहकर ठहाके लगा रहे थे कि एक अध्यापिका पहुंच गईं.
“तुमने अपनी दोस्त पंखुड़ी या किसी अध्यापिका को पहले क्यों नहीं बताया?” उन बच्चों को सज़ा देने के बाद प्रधानाध्यापिका ने नयन से पूछा.
“पंखुड़ी को पता नहीं चलना चाहिए. वो बहुत भावुक भी है और ग़ुस्सैल भी. अगर उसे पता चला, तो वो मुझे छोड़कर अभ्यास में नहीं जाएगी और मेरे लिए लड़कर इतना ग़ुस्सा पाल लेगी मन में कि खेल में ध्यान भी नहीं लगा पाएगी. इस तरह किसी इंटर-स्कूल प्रतियोगिता में जाने का उसका ख़्वाब पूरा नहीं हो पाएगा. मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण ऐसा हो. वैसे भी मेरे जीवन की व्यावहारिक समस्याओं से मुझे ही जूझना सीखना चाहिए.”
नयन की समझदारी और आत्मसम्मान की भावना उस दिन दरवाज़े पर उसकी बातें सुन रही पंखुड़ी के साथ-साथ अध्यापिकाओं की आंखों में भी पानी ले आई थी.

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घड़ी की सुइयां अपनी गति से चलती रहीं. कैशोर्य की दहलीज़ पर कदम रखने के साथ ही पंखुड़ी का असाधारण सौंदर्य लोगों की प्रशंसा के साथ-साथ ईर्ष्या और पंखुड़ी की मां के असाधारण सपनों का कारण बनता जा रहा था. अठारह की होते-होते उसके लिए रिश्तेदारों ने तीन-चार रिश्ते बता दिए.
घर में बात चलाई, तो पंखुड़ी के पिता भड़क उठे. मां और रिश्तेदारों ने तमाम तर्क दिए, पर पिता की सख्त आवाज़ ने बातचीत का अंत कर दिया.
“जब तक पंखुड़ी जितना पढ़ना चाहती है, उतना पढ़कर आत्मनिर्भर नहीं हो जाती, मैं उसकी शादी के विषय में कुछ नहीं सुनना चाहता.”
दरवाज़े के पीछे से सब कुछ सुन रही पंखुड़ी का मन हुआ दौड़कर पापा से लिपट जाए. पापा उसे समझते हैं, इस बात से उसका मन प्रफुल्लित था, लेकिन उसके मन में कूटकर संस्कार भरनेवाली मां थीं. नौ-दस साल की उम्र से ही मां ने पापा से लिपट-चिमट जाने, उन्हें चुंबन देने या बहुत क़रीब बैठकर दिल की बातें करने पर बवाल खड़ा करना शुरू कर दिया था. मां की सख्ती से बोली जानेवाली बातों की निरंतरता ने उसके और पापा के बीच संवाद की भी दूरी बना दी थीे.
स्कूल में लंच में या खाली समय में दिल की सभी उहापोह नयन के दिल में डालकर वह निश्‍चिंत हो जाती और नयन कुछ ही दिनों में समाधान परोस देता, “तुम ह्यूमैनिटीज़ में ग्रेजुएशन करो. विषय तुम्हारी पसंद के मैंने बता ही दिए हैं. तीन सालों में ये तय कर लेंगे कि तीनों में से कौन-सा तुम्हें सबसे ज़्यादा पसंद है. फिर…”
“वाह!” मेरा मन हल्का हो गया.
“पता है नयन? मैं यही चाह रही थी, पर मुझे पता ही नहीं था कि… कौन कहता है कि तुम नेत्रहीन हो. तुम्हारी नज़रें तो एक्सरे मशीन की तरह हैं, जो मेरे दिल की वो बातें भी समझकर मुझे ही समझा देती हैं, जिन्हें मैं ख़ुद से भी नहीं जान पाती.” उन दोनों के ठहाके लड़कों की ईर्ष्या का कारण बनते और नयन उस ईर्ष्या के परिणामस्वरूप अक्सर अपमानित होता. पंखुड़ी उनसे लड़ती और ख़बर मम्मी तक पहुंचने पर मम्मी पंखुड़ी की ख़बर लेतीं. उम्र के साथ पंखुड़ी पर मम्मी की हुकूमत बढ़ती गई और उसका आत्मविश्‍वास सिकुड़ता गया.
स्कूल के साथ ही नयन का स्कूल में मिलनेवाला साथ भी ख़त्म हो गया और घर में मम्मी की पाबंदियों ने भौतिक दूरी भी बना दी. लेकिन अब वे मन से और क़रीब आ गए थे. उन्हें वॉइस मैसेज के जरिए दिल के दर्द बांटने से रोकना मम्मी के बस से बाहर था.
नयन संगीत का व्याख्याता बन चुका था. उधर पंखुड़ी को पास के छोटे स्कूल में नौकरी मिल गई और मम्मी को पापा की शर्त ख़त्म होने की शांति. तभी ये रिश्ता घर चलकर आया और मम्मी को मनचाही मुराद मिल गई.
पंखुड़ी के आंगन से तेज़ी से बोलने पर नयन के आंगन में बात सुनाई देती थी. छुट्टी का दिन था. मम्मी ने जान-बूझकर आंगन में बात छेड़ी थी.
“शायद पंखुड़ी नेट क्रैक करना चाहती है और फिर शायद उसका मन… एक बार उससे पूछ लेना चाहिए.” पापा की इतनी-सी बात पर मम्मी आगबबूला हो गईं.
“आख़िर चाहते क्या हैं आप? लड़की को घर बिठाकर रखना है या एक अपाहिज़ की छड़ी बनाने का इरादा है? पंखुड़ी के अठारह की होने के बाद से तीन रिश्ते छोड़ चुके हैं हम. या तो आप मुझे इस रिश्ते में कोई एक कमी बता दीजिए या बात पक्की करने जाइए.” नयन सब कुछ सुन चुका था.
पंखुड़ी फिर भी उसकी राय लेने गई, तो उसने कह दिया, “रिश्ते में कमी तो सच में कोई नहीं नज़र आती. तुम ख़ुश रहोगी.” पंखुड़ी के शब्द निःशब्द हो गए और पलकों से नदी बह चली. मम्मी की अनुपस्थिति में पापा उसकी राय जानने आए थे. बहुत सुगबुगाया था मन, लेकिन क्या कहती. उसने और नयन ने दिल की गहराई में दफ़न अपने जज़्बातों को शब्द कभी दिए ही नहीं थे. ऐसे में अकेले अपने जज़्बातों को शब्दों का जामा पहनाने का कोई संबल उसके पास नहीं था. उसके शब्द मन की कैद में छटपटाते ही रह गए.
सगाई हुई और लड़केवालों ने शुरू किया सिलसिला पंखुड़ी नाम की ख़ूूबसूरत पेंटिंग को अपने घर के बेशक़ीमती फ्रेम में मढ़ने के लिए उसके व्यक्तित्व की कांट-छांट का. हालांकि मम्मी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था, जब पहली बार महंगी शोफर ड्रिवेन कार पंखुड़ी को शादी की शॉपिंग के लिए लेने आई थी.
लेकिन शॉपिंग से लौटकर पंखुड़ी रोते हुए मम्मी से लिपट गई थी. शॉपिंग के दौरान महंगे रेस्टॉरेंट में लंच के लिए गए थे वो. उसके होनेवाले पति गर्वित ने उसका मज़ाक बनाते हुए उसे कांटे-छुरी से नज़ाकत के साथ खाना सीखने की हिदायत दी थी. रेस्टॉॅरेंट में खाने से पहले शराब लेना उसके लिए स्टेटस सिंबल था और भी बहुत कुछ…
“घर आ गया.” ड्राइवर की आवाज़ से पंखुड़ी वर्तमान में लौटी और अपना लहंगा समेटकर अपने कमरे में आ गई. तभी सास का फोन आ गया, “तुम दोबारा पार्लर चली जाओ. हमारे उस लुच्चे वेडिंग प्लानर ने दगाबाज़ी कर दी. हमारे बिज़नेस राइवल का थीम ही हमें बता दिया, जिनके बेटे की शादी अभी पिछले महीने हुई थी. अब हम भी वही थीम ड्रेसेस पहनेंगे, तो लोगों को लगेगा कि हमने नकल की है. ऐसी ही गफ़लत के लिए हमने सबकी दूसरी पोशाकें तैयार करवाकर रखी थीं.”
“… लेकिन तैयार करने में तो पार्लर ने दो घंटे का समय…”
“अरे अभी तो सब पीकर टुन्न हैं. बारात निकलने के बाद डांस में समय लगेगा. बारात पहुंचने से पहले आ जाओगी वापस.”
“लेकिन मम्मीजी, वो लहंगा बहुत गड़ता…”
“देखो, जो कह दिया वो करो. एक बात तुम आज ध्यान से सुन लो. हमारे यहां बहुओं को न कहने की इजाज़त नहीं है.” बात समाप्त करके सास ने फोन रख दिया और उससे मिलने आए नयन ने सुन लिया. थोड़ी देर दोनों पलकों पर नदी बांधे निःशब्द बैठे रहेे.

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“तुमने ये सब पहले क्यों नहीं बताया?”
“तुम तो मेरा चेहरा पढ़ लेते थे. तुमने ख़ुुद क्यों नहीं पढ़ लिया? तुम कैसे नहीं देख पाए मेरा दिन-ब-दिन मुरझाता चेहरा?” पंखुड़ी की वेदना नाराज़गी के बहाव में बह रही थी कि उसने अपने होंठ काट लिए. क्या वो नयन की नेत्रहीनता का मज़ाक बना रही है?
पर नयन उसकी व्यथा में उसके साथ बह रहा था. उसने पंखुड़ी के शब्दों को सामान्य ढंग से लिया. “हां, नहीं देख सका, क्योंकि शादी तय होने के बाद से तुम मेरे सामने आई ही नहीं. पिछले चार महीनों में एक बार भी नहीं. कोई वॉइस मैसेज भी भेजतीं, तो तुम्हारी आवाज़ में ही तुम्हारी परेशानी दिख जाती मुझे. मैं तो तुम्हारी दूरियों का कारण ये समझता रहा कि तुम सात फेरों की पवित्र अग्नि के सामने किसी और की होने से पहले मेरे प्रति अपने अनुराग को भूलना चाहती हो, इसलिए भौतिक दूरी का सहारा ले रही हो और
मैं भी इसीलिए…”
“भूलना चाहती हूं? मैं तुम्हारे प्यार को भूल सकती हूं? भौतिक दूरी के सहारे? तुमने ये सोच भी कैसे लिया?” कहते हुए पंखुड़ी मुड़ी तो लहंगे से अटककर गिरने को हुई और नयन ने तुरंत आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया. पंखुड़ी ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया.
“ये अभी-अभी हमने क्या कहा नयन? जो जज़्बात कभी शब्द न बन सके, उन जज़्बातों को आज शब्द मिले? आज जब…” पंखुड़ी फूटकर रो पड़ी और नयन ने उसका चेहरा अपने हाथों में ले लिया और उसके आंसू पोछते हुए बोला, “अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा. तुम इस शादी से मना कर दो. मैं तुम्हारी मम्मी को मनाने में तुम्हारा साथ दूंगा.”
“तुम?” पंखुड़ी नाराज़गी से बोली.
“देखो पंखुड़ी, बात को समझने की कोशिश करो. दोनों समस्याओं को अलग रखो. तुम्हारी मम्मी तुम्हारी शादी एक अपाहिज़ से यानी मुझसे नहीं करना चाहतीं. इसे मैं ग़लत नहीं मानता. इसलिए तब मैंने तुम्हारा साथ नहीं दिया. सोचा था तुम पति का प्यार पाकर मुझे भूल सकोगी, लेकिन एक ऐसी जगह शादी करने को तैयार हो जाना, जहां तुम्हारे मन की कद्र नहीं, आत्मसम्मान की कद्र नहीं, ये सरासर ग़लत निर्णय है. मैं तुम्हें ये निर्णय नहीं लेने दूंगा.” पंखुड़ी की उम्मीद बंध गई, पर दूसरे ही पल वो फिर सहम गई.
“बारात दरवाज़े आ गई है. सारी तैयारियां हो गई हैं. अब कैसे..?”
“बारात और तैयारियां शादी के लिए होती हैं, शादी बारात और तैयारियों के लिए नहीं…” पापा उन लोगों की सारी बातें सुन रहे थे और अब उनका दृढ़ स्वर गूंजा.
“वैसे भी बारात दरवाज़े पर नहीं जनवासे में है, जहां ज़्यादातर लोग पीकर धुत हैं. पिछले चार महीनो में मैं उनके अहंकार और तानों से आहत होकर भी चुप रहा ये सोचकर कि मेरी बेटी ख़ुश है, पर मुझे क्या पता था कि मेरी बेटी…” उन्होंने बांहें फैला दीं और पंखुड़ी उनसे लिपट गई. पंखुड़ी को सांत्वना का दुलार करने के बाद वो मम्मी की ओर मुखातिब हुए, “ऐसी जगह ब्याहना चाहती हो तुम बेटी को जहां उसे न कहने का भी अधिकार नहीं? कैसे तुम उसका मुरझाता चेहरा और आंसू न देख पाई मां होकर भी?” मां ने सिर झुका लिया.
“मुझे भी स्थिति की गंभीरता का एहसास आज ही हुआ. जब पंखुड़ी की सास का फोन मेरे पास आया. बड़े ही अहंकारी लहजे में पंखुड़ी की दोबारा तैयार होने की ना-नुकुर की शिकायत करते हुए.”
पापा ने तुरंत पंखुड़ी की सास को फोन लगाया, “आपके यहां बहुओं को न कहने का हक़ नहीं है न? पर हम तो न कह सकते हैं. नाज़ों से पाली बेटी है मेरी, एक इंसान, एक व्यक्तित्व… कोई तस्वीर नहीं, जिसे आपके घर के फ्रेम में मढ़ने के लिए दे देंगे.” पापा फूटकर रो दिए और पंखुड़ी को ऐसे दुलारने लगे जैसे सालों की कसर पूरी कर लेना चाहते हों. नयन जाने लगा, तो उन्होंने पंखुड़ी को छोड़कर उसका हाथ थाम लिया और पंखुड़ी का हाथ उसके हाथ में देकर बोले, “इसे देखा तो स़िर्फ तुमने है. तुम ही इसे समझ सकते हो, इसका ध्यान रख सकते हो. देखना ये कभी गिरने न पाए, कभी हारने न पाए…”

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“महाराज युधिष्ठिर को इस यज्ञ से कुछ भी पुण्य प्राप्त नहीं हुआ है.” कारण पूछने पर उसने बताया, “असली यज्ञ तो उस ब्राह्मण परिवार का था, जहां से मैं आ रहा हूं और जहां मेरा आधा शरीर सोने का हो गया है. परन्तु महाराज युधिष्ठिर का यह यज्ञ पाखंड है, दिखावा है. इसमें राजा को कोई पुण्य नहीं मिला है.”

कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडव विजयी हुए और युधिष्ठिर राजा बन गए. श्रीकृष्ण ने उन्हें यज्ञ करने की सलाह दी, ताकि युद्ध में अपने सगे-संबंधियों की हत्या के पाप का प्रायश्चित हो सके. अतः भव्य यज्ञ का आयोजन हुआ. अनगिनत पकवान बने. सबने जी भर के खाया.
ज़रूरतमंदों को दिल खोलकर दान दिया गया.
सब ओर यज्ञ की वाह वाही होने लगी. ऋषि मुनि सब ने प्रशंसा की. इससे युधिष्ठिर को अहंकार हो आया.
सब ने देखा कि एक नेवला जिसका आधा शरीर सोने का और आधा सामान्य था, इधर-उधर घूम रहा है और जहां भी वह बचा हुआ भोजन देखता है, उस पर अपना शरीर रगड़ने लगता है.
बात समझ नहीं आ रही थी, तो श्रीकृष्ण ने एक ऋषि से कहा कि इस नेवले को थोड़ी देर के लिए वाणी दे दो, ताकि वह उससे बचे हुए भोजन पर लोट लगाने का कारण जान सकें. ऋषि ने नेवले पर मंत्र वाला पानी छिड़का, जिससे वह बोलने लगा.
नेवले से पूछने पर उसने कहा, “महाराज युधिष्ठिर को इस यज्ञ से कुछ भी पुण्य प्राप्त नहीं हुआ है.” कारण पूछने पर उसने बताया, “असली यज्ञ तो उस ब्राह्मण परिवार का था, जहां से मैं आ रहा हूं और जहां मेरा आधा शरीर सोने का हो गया है. परन्तु महाराज युधिष्ठिर का यह यज्ञ पाखंड है, दिखावा है. इसमें राजा को कोई पुण्य नहीं मिला है.”


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महाराज युधिष्ठिर के कारण पूछने पर नेवले ने बताया, “एक गरीब ब्राह्मण था. उनके घर में चार प्राणी थे. पति-पत्नी और बेटा-बहू. उनके घर मुश्किल से भोजन का जुगाड़ हो पाता था. कभी वह भी न हो पाता, तो वह खेतों में अनाज के गिरे दाने चुन लाते और वही पकाकर, मिल-बांट कर खा लेते.
एक दिन वह यही भोजन करने बैठे ही थे कि एक अतिथि आ गया, जिसे ज़ोर की भूख लगी थी. ब्राह्मण ने अपना हिस्साअतिथि के आगे रख दिया. पर अतिथि बहुत भूखा था और इतने कम भोजन से उसका पेट नहीं भरा, तो गृहस्वामिनी ने अपने हिस्से का भोजन अतिथि को खिला दिया. अतिथि तब भी भूखा रहा. अब पुत्र ने और उसके बाद बहू ने भी अपने हिस्से का भोजन अतिथि को खिला दिया. तब जाकर उस का पेट भरा.
गृहस्वामिनी ने थाली धोई, तो नाली की राह थाली की जूठन बाहर आ गई. संयोगवश मैं उधर से निकल रहा था और उस जूठन में गिर पड़ा. उस जूठन के स्पर्श मात्र से मेरा आधा शरीर सोने का हो गया, जो देखने में विचित्र लगता है.
आपके यज्ञ की सुन मैं यहां इसी उद्देश्य से आया था. आपका भोज तो धर्म भोज होगा ही. उस में लोट लगाने से मेरा बाकी शरीर भी सोने का हो जाए. परन्तु मैं ग़लत था. अनेक बार लोट लगाने पर भी मेरा शरीर सोने का नहीं हुआ.”


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कोई भी धार्मिक काम तब तक सफल नहीं माना जाता, जब तक उसमें सच्ची श्रद्धा, समर्पण और निष्ठा का भाव न हो. जब आप ईश्वर का दिया ही उसे समर्पित कर रहे हो, तो फिर उसमें अहंकार कैसा?

– उषा वधवा

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Photo Courtesy: Freepik

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भावना प्रकाश

“मुझे पहले ही समझ जाना चाहिए था जब सोसायटी के सोशल मीडिया ग्रुप पर भी किसी ने पेड़ लगाने की योजना पर कोई रिस्पॉन्स नहीं दिया गया था. ऐसे ग्रुप का फ़ायदा क्या जहां सिर्फ़ पंचायत में समय ख़राब किया जाता हो.” मैं ग़ुस्से में सेक्रेटरी को सुनाकर आ गई.

हम तपती दोपहर में शॉपिंग से लौटे थे. उफ़! फिर पेड़ के नीचे पड़ोसन ने कार खड़ी कर दी.
“मुझे इतना ग़ुस्सा आ रहा है कि…” मेरी बात बेटी ने हंसकर काट दी, “कि अगर तुम सुपर-वुमन होतीं, तो उसकी कार उठाकर फेंक देतीं, यही न?” उसके हंसने से मेरा ग़ुस्सा और बढ़ गया.
“तुम चाबी लेकर घर चलो. मैं कार पार्क करके सोसायटी ऑफिस में मिलकर आती हूं.”
सोसायटी ऑफिस में मुझे जैसा कि पता ही था, दो टूक-सा जवाब मिला, “सोसायटी पार्किंग में फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व का नियम है. किसी प्लेस पर पहले कार खड़ी करनेवाले से हम ये कहकर कार हटवा नहीं सकते कि किसी और को खड़ी करनी है.” पर मैं भी अबकी पूरी तैयारी के साथ गई थी.

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“अबकी आपको पूरा वाकया सुनना ही पड़ेगा. जब बिल्डर हमें फ्लैट्स हैंडओवर कर रहा था, तब सिर्फ़ मैंने मीटिंग में मुद्दा उठाया था कि उसने तय शर्तों के मुताबिक़ छाया देनेवाले पेड़ नहीं लगाए हैं. तब तो किसी ने मेरा साथ नहीं दिया. अगर दस लोग भी साथ खड़े हो जाते, तो बिल्डर को पेड़ लगवाने पड़ते. खैर, जो हुआ सो हुआ. मैं हर मॉनसून में अपने पैसों से पेड़ ख़रीदकर लाती हूं और अपनी मेहनत से लगाती हूं. और तो और अपने पैसों से ट्री-गार्ड भी लगाती हूं. ग्राउंड फ्लोर पर पेड़ के नज़दीक रहनेवालों से इतना नहीं होता कि पेड़ की सुरक्षा करें या पानी ही डाल दें. मैं ही बोतल में भर-भरकर पानी डालती हूं…” मेरी आगे की बात सेक्रेटरी मैडम ने सुननी भी ज़रूरी नहीं समझी.
“सॉरी मैडम, आप पेड़ के लिए कुछ भी करें अगर वो सार्वजनिक ज़मीन पर लगा है, तो वो सार्वजनिक सम्पत्ति ही होगी.”
“पर आप मेरी पूरी बात तो सुने. मैं तो आपसे सिर्फ़ इतनी उम्मीद करती हूं कि आप मेरी पेड़ लगाने की योजनाबद्ध मेहनत में साथ दें. इसे सोसायटी का…”
“सॉरी मैम, हम रेज़ीडेंट्स को उपदेश नहीं दे सकते.”
“मुझे पहले ही समझ जाना चाहिए था जब सोसायटी के सोशल मीडिया ग्रुप पर भी किसी ने पेड़ लगाने की योजना पर कोई रिस्पॉन्स नहीं दिया गया था. ऐसे ग्रुप का फ़ायदा क्या जहां सिर्फ़ पंचायत में समय ख़राब किया जाता हो.” मैं ग़ुस्से में सेक्रेटरी को सुनाकर आ गई.
मैं भन्नाया सिर लेकर घर आई, तो बेटी किसी से बात कर रही थी. कुछ ही देर में बच्चों से मेरा घर भर गया.
“आंटी, हमें स्कूल प्रोजेक्ट के तहत पेड़ लगाने होते हैं. सोसायटी ग्रुप पर हम आपके मैसेज और योजनाएं पढ़ते रहते हैं. आप हमें अपनी योजनाओं के कार्यकर्ता बना लीजिए. देखिएगा एक दिन किसी को कार खड़ी करने के लिए पेड़ की छाया की कमी नहीं होगी. यही तो आप चाहती हैं न?”

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“पेड़ ख़रीदने के पैसे भी ख़र्च नहीं करने पड़ेंगे. हमने आपके निर्देशित तरीक़ों से इतने पेड़ बीज से उगाए हैं.” कहते हुए बच्चों ने कुछ छोटे-छोटे पुराने डब्बों में उगी नई कोंपलें आगे कर दीं. मैं उन्हें अभिभूत होकर देखे जा रही थी. वाह, मेरे छोटे-छोटे प्रयासों ने नई जनरेशन के मन में पर्यावरण को लेकर जागृति भर दी! ये तो छाया के नीचे कार खड़ी करने की जगह मिल जाने से भी अच्छी बात हुई.’ है न?

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