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इस जीवन यात्रा में मेरे अनेक मित्र रहें. कारोबारियों, ज़मींदारों से मेरा संपर्क घनिष्ठ रहा है. अक्सर मैंने उन्हें दयनीय और असहाय पाया है. सहायकों, नौकरों की दया पर निर्भर. प्रायः असहाय और परेशान. तभी तो उनको जीवन के नाम पर अच्छी-ख़ासी उम्र में भी किसी न किसी आदमी का सहारा हर समय चाहिए था, बस यूं ही उनका अनमोल जीवन बीत गया.

मनोरंजन और तफ़रीह के लिए कुछ युवाओं का दल किसी गांव में भ्रमण करके आनंदित हुआ जा रहा था. एक किसान को अमरूद के पेड़ पर फावडा़ चलाते देखकर वो सभी उत्सुकतावश उसके नज़दीक चले गए और देखते रह गए कि इतनी फुर्ति से काम कर रहा वो किसान, तो पचास से भी ऊपर का ही लगता था. उसने हंसकर उन सभी युवकों का स्वागत किया और वहां से कच्ची मूली, गाजर, अमरूद, अनार आदि तोड़कर खाने की सहर्ष अनुमति भी दे दी.
युवक उस लंबे-चौड़े खेत में घूम-फिरकर प्रकृति के थाल में सजी ताज़ा फल-सब्ज़ी की दावत का मज़ा लेने लगे. किसान के अतिरिक्त दर्जन भर लोग वहां तरह-तरह के काम कर रहे थे. कोई गुडा़ई कर रहा था, कोई खेत सींच रहा था, कोई मेड़बंदी कर रहा था, कोई हरा साग चुन रहा था, कोई टमाटर के फलदार कोमल पौधों को लकड़ियां लगाकर सहारा दे रहा था.
वहां सरसों, सोयाबीन, मूंगफली, मटर, टमाटर, धनिया, पालक आदि सभी की हरी-भरी फसल लहलहा रही थी.
ज़रा-सी देर मे वो युवक यह तो साफ़ समझ गए कि यही किसान यहां का मालिक है और उन सभी को यह भी अच्छी तरह दिखाई दे रहा था कि वो स्वयं दिन-रात मेहनत करता है, मानो किसी मेहनती मजदूर का पुत्र हो. वहां काम कर रहे अन्य सहायकों के प्रति उसकी इतनी आत्मीयता थी कि उस किसान के आज और उस समय के व्यवहार से उसकी हर दिवस की पूरी दिनचर्या और उसके इस कृषक जीवन की सरलता का सुमधुर परिचय मिल रहा था.
उसके आग्रह पर युवक ख़ुशी-ख़ुशी उसके घर भी गए, जो वही खेतों के बीचोंबीच बना था. गोबर से लीपा हुआ आंगन अंदर भी कच्चा फ़र्श था. और बाहर दो बडे-बड़े माटी के चूल्हे सुलग रहे थे. उनमें दाल और भात पक रहा था, अरहर, मूंग, मसूर की दाल से पकने की ख़ुशबू किसी भूख पैदा करनेवाले जादू का काम रही थी.
अब वो सिलबट्टे पर ताज़ा हरा धनिया और पुदीना लेकर पीसने लगा, तो युवकों ने उसको रोककर वह काम अपने हाथ मे ले लिया. सबने ही बारी-बारी से पुदीना और धनिया पीसने का मज़ेदार काम किया. पीसते समय जब धनिये, पुदीने का रस कभी-कभी उनकी आंख या चेहरे पर उछल कर लग जाता, तो वो आनंद से भर उठते.


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“सुनो, अब बीच में एक-दो हरी मिर्च भी कूट लो, पर आंख बचाना.” किसान ने स्नान करते-करते पास ही कुंए से आवाज़ देकर कहा, तो उनमें से दो युवक तुरंत ताज़ी हरी मिर्च तोड़ लाए. बहुत देर तक वो बार-बार हरी मिर्च की मादक महक महसूस करने के लिए हथेली को नाक के पास ले जाते रहे. इसी दौरान वो मुड़-मुड़ कर उस क्यारी में उग रहे उन मिर्च के पौधों को देखकर सोचते भी रहे कि इतनी ताज़गी तो महंगा डिओडरेंट भी नहीं दे सकता.
अब वहीं पास में रखा चाकू लेकर ताज़ा टमाटर और मूली का सलाद जब वो युवक काटने लगे, तो चाकू की धार लगने के बाद उसमें से टपकते रस और मूली, टमाटर दोनों की मिली-जुली महक ने उनको दीवाना कर दिया. चूल्हे पर हांडी मे पकी वह दाल को चखते ही उनको ऐसा ज़ायका मिला कि वो किसान को बोले बगैर न रह सके, “आप तो जीते जी स्वर्ग का भरपूर मज़ा ले रहे हैं.”
“बिल्कुल मैं ख़ुद से भी हर रोज़ यही कहता हूं.” वो किसान हंसते-हंसते बोल उठा.
उसके घर की सजावट और रहन-सहन की सरलता से उसके अंतरमन का आभास अत्यंत सुंदर रूप से उसकी दोनों आंखों में झलक रहा था.
युवक देख ही चुके थे कि उसके हृदय में किसानों के प्रति कैसी आंतरिक सहानुभूति उमड़ी पड़ती है.
“धरती माता भी ऐसे बच्चों को कितना प्यार देती होगी.” एक युवक नीम की छांव में लगी खाट पर बैठकर बोला.
अब सबको वापस लौटना था.
उसमें से एक युवक से रहा नहीं गया और वहां से जाते-जाते एक बार सवाल कर ही लिया, “अब आप साठ बरस पूरे कर चुके हो. ये इतनी सारे खेत सब आपकी ही संपत्ति है, तो अब कुछ आराम और सुख-सुविधा से रहने का मन नहीं करता ?”
“मुझे मेहनत से बड़ा मनोरंजन कुछ और लगता ही नहीं.” कहकर उन्होंने जब अपनी आंखें ऊपर की ओर उठाई, तो उनमें दैवीय तेज नज़र आ रहा था.
फिर ज़रा-सा रूककर वो बोले, “हां, मैं भी माटी का पुतला ही तो हूं. कभी-कभी तो बहुत ही तीव्रता से आता भी है भोग और ऐशोआराम का लालच, मगर मेरे रक्त में जुझारूपन से भरे पूर्वजों का संस्कार भी है, इसलिए मैं और मेरा संकल्प उसे शासक नहीं बनने देते.”
वो सभी उसको कौतूहल से देख-सुन रहे थे.
“बस, एक यही बात नहीं इसके अलावा और भी कारण हैं. इस जीवन यात्रा में मेरे अनेक मित्र रहें. कारोबारियों, ज़मींदारों से मेरा संपर्क घनिष्ठ रहा है. अक्सर मैंने उन्हें दयनीय और असहाय पाया है. सहायकों, नौकरों की दया पर निर्भर. प्रायः असहाय और परेशान. तभी तो उनको जीवन के नाम पर अच्छी-ख़ासी उम्र में भी किसी न किसी आदमी का सहारा हर समय चाहिए था, बस यूं ही उनका अनमोल जीवन बीत गया. मगर जानते हो उनके ही घर पर काम करनेवाले नौकर-चाकर उनकी हालत देखकर जागृत थे.


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सब खुली छूट थी, पर कोई आलसी या लापरवाह नहीं था. वो सब नौकर नब्बे से ऊपर दुनिया को जीकर गए.” वो बस अपनी बात कह ही सके थे कि फिर एक सवाल उनकी तरफ़ उछलकर आया कि आप इतने सजग हैं, पर यहां गांव मे ही रहकर आपकी कोई पहचान नहीं बन सकेगी. आप इतना अच्छा उदाहरण हैं, पर आपको कोई सम्मान या नाम यहां रहकर कैसे मिलेगा.” यह सुनकर वो हौले-से हंसे फिर तुरंत गंभीर होकर बोले, “आप लोगों के दिलों मे रहना नई पीढ़ी के संग रहना सबसे बडा़ पुरस्कार है.” और फिर किसी सवाल का मतलब ही नहीं रह गया था.
शहर में अपने बसेरे की तरफ़ प्रस्थान करते युवक आज के अपने देहात भ्रमण को किसी कार्यशाला से कम नहीं समझ रहे थे.

पूनम पांडे

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मेरी मम्मी, दादी और भाभी कितनी भाग्यशाली हैं कि वे ऐसे परिवार में हैं, जहां महिलाओं को कितना मान-सम्मान दिया जाता है. पापा मम्मी को कितना प्यार करते हैं. हर बात या निर्णय में मम्मी को बराबर का स्थान मिलता है. और दादी, दादी तो उनसे भी बढ़कर दादा को प्यारी हैं. दादा तो दादी को आप ही कहते हैं. पत्नी तो पति को आप कहती है, पर पति तो पत्नी को तुम ही कहता है, पर दादा तो दादी को साक्षात देवी मानते हैं. लेकिन दादी रोज़ काली कमली क्यों ओढ़े रहती हैं, यह सुमन कभी नहीं जान पाई.

पति उमेश द्वारा गाल पर मारे गए तमाचे की आवाज़ सुमन को किसी दूर स्कूल की तालियों की गड़गड़ाहट की तरह लगती थी. सुमन जब तीसरे दर्जे में पढ़ती थी, तब स्कूल में सुबह होनेवाली प्रार्थना में दादा द्वारा सिखाए गए संस्कृत के श्लोक ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते… ‘ गाती तब उस तमाचे जैसी ही आवाज़ करती तालियां बजती थीं. यह आवाज उसे उत्साहित करती थी. सात साल की गुड़िया जैसी सुमन बहुत ख़ुश होती थी.
और आज एक नारी के रूप में मान-सम्मान की कौन कहे, पति उमेश की ओर से उसे आदर भी नहीं मिलता था. दादाजी ने बचपन में उसे जो मूल्य सिखाए थे कि ‘स्त्री तो लक्ष्मी है, स्त्री तो देवी होती है, स्त्री के समान कोई रत्न नहीं है’, वह सब सुमन की ससुराल में बेकार थे.
सुमन का पालन-पोषण गांव में हुआ था. उसके परिवार में मां-बाप, एक भाई और दादा-दादी थे. सुमन और उसके भाई को पूजा-पाठ करना, मंत्र कंठस्थ करके गाना, धार्मिक पुस्तकें पढ़ना, यह सब दादाजी ने बचपन से ही सिखाया था, इसलिए भाई-बहन को भक्ति में गहरी रुचि थी.
जबकि ससुराल में इसका एकदम उल्टा था. यहां सुबह दादाजी की तरह कोई पूजा-पाठ या धूप-अगरबत्ती नहीं करता था. कोई सुबह उठकर मां की तरह धीमे-धीमे गायत्री मंत्र गाते हुए रसोई में काम भी नहीं करता था. दादी की तरह काली कमली ओढ़ कर माला भी नहीं फेरता था. भाई अशोक की तरह दादा-दादी और मम्मी-पापा के चरण स्पर्श करके शास्त्रीय संगीत का अभ्यास नहीं भी करता था. यह सब सुमन को बड़ा अजीब लगता था.
उमेश जब भी सुमन को कुछ कहता, सुमन यही सोचती कि उसका कैसा विवेकी और धार्मिक परिवार है और उसका कैसा ख़राब नसीब था कि वह इस परिवार में आ गई.


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फोन की घंटी बजी. सुमन ने फोन उठाया, तो दूसरी ओर अशोक की होनेवाली पत्नी थी आशा भाभी. उससे थोड़ी देर बातें करके फोन कटा, तो वह फिर सोचने लगी- ‘मेरी मम्मी, दादी और भाभी कितनी भाग्यशाली हैं कि वे ऐसे परिवार में हैं, जहां महिलाओं को कितना मान-सम्मान दिया जाता है. पापा मम्मी को कितना प्यार करते हैं. हर बात या निर्णय में मम्मी को बराबर का स्थान मिलता है. और दादी, दादी तो उनसे भी बढ़कर दादा को प्यारी हैं. दादा तो दादी को आप ही कहते हैं. पत्नी तो पति को आप कहती है, पर पति तो पत्नी को तुम ही कहता है, पर दादा तो दादी को साक्षात देवी मानते हैं. लेकिन दादी रोज़ काली कमली क्यों ओढ़े रहती हैं, यह सुमन कभी नहीं जान पाई.
तभी सुमन की सास ने उसे बुलाया. जिस तरह मायके को छोड़कर वह ससुराल आ गई थी, उसी तरह विचारों को छोड़कर वह कमरे से बाहर आ गई. वह सास के पास पहुंची, तो सास ने कहा, “सुमन रविवार को घर में भगवान सत्यनारायण की पूजा रखी गई है. इसलिए आज से ही घर की साफ़-सफ़ाई शुरू कर दो. और हां, अपने मायकेवालों साथ-साथ सभी सगे-संबंधियों को फोन करके बुलाने की भी ज़िम्मेदारी तुम्हारी ही है.”
सुमन ने वैसा ही किया, जैसा सास ने कहा था. रविवार का दिन आ गया. सभी रिश्तेदार पूजा में शामिल होने के लिए आ गए थे. पूजा शुरू होनेवाली थी. सुमन अपने कमरे में साड़ी और गहने पहनकर तैयार हो रही थी. तभी गुस्से में लाल-पीला होता हुआ उमेश कमरे में आया, “यह मेरे शर्ट की बटन टूटी हुई है. तुम्हें पहले ही देख लेना चाहिए था. अब मैं क्या पहनूं?”
“मुझे पता नहीं था कि आप यही शर्ट पहनेंगें. लाइए अभी लगाए देती हूं बटन.”
“अब क्या लगाओगी बटन. इसे रखो.” कहकर उमेश ने सुमन को ज़ोर से धक्का मारा और कमरे से बाहर चला गया.
पीछे रखी मेज सुमन के सिर में लगी. सिर फट गया और वहां से खून बहने लगा. उसने जल्दी से खून साफ़ किया. दवा और पट्टी बांध कर वह सिर को साड़ी से ढंक कर जैसे कुछ हुआ ही नहीं, इस तरह पूजा में आ गई.
पूजा शुरू हुई, पर सुमन का मन पूजा में कहां लग रहा था. वह तो मन ही मन रो रही थी. दादा की सिखाई स्त्री सम्मान की बातें, स्कूल में पढ़ाए गए श्लोक स्त्री रत्न है, स्त्री देवी है, यह सब उसे भ्रम लग रहा था. जैसे-तैसे करके उसने पूजा पूरी की और रसोई की तैयारी के लिए रसोई की ओर भागी.
वहां मम्मी और दादी पहले से ही खाना बनाने में लगी थीं. वहां कोई दूसरा नहीं था, इसलिए पहले न रो पानेवाली सुमन मां और दादी के आगे रो पड़ी. तभी उसकी साड़ी भी सिर से खिसक गई. सिर पर पट्टी बंधी देख कर मां ने पूछा, “अरे, यह क्या हुआ?”
सुमन ने रोते-रोते पूरी बात बताई. मम्मी तो कुछ नहीं बोलीं, बस चुपचाप उसकी बातें सुनती रहीं, पर दादी बोलीं, “अरे, यह सब तो चलता ही रहता है. इसमें रोने की क्या बात है. किसी दूसरे ने तो नहीं मारा, पति ने ही तो मारा है न?”


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इतना कह कर दादी ने हमेशा ओढ़े रहनेवाली काली कमरी हटाई और सालों पुराने हाथ पर दागे और चोट लगे निशान दिखाए. उसी समय हाॅल में बैठे दादाजी की आवाज़ सुनाई दी, “भई घर की लक्ष्मी तो स्त्री ही है. किसी दूसरे को पूजने की क्या ज़रूरत है. शास्त्रों में भी कहा गया है कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता…”

वीरेंद्र बहादुर सिंह

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अपने मम्मी-पापा की बंदिशों में उसे और नहीं रहना था. वह ज़िंदगी को अपने ढंग से जीना चाहती थी.
एक दिन वह दस बजे रात अपनी सहपाठी रिचा की बर्थडे पार्टी से घर लौट रही थी. सार्थक उसे बाहर तक छोड़ने चला आया. जान-बूझकर पूर्वी ने इस समय उसे साथ आने से नहीं रोका. वह आज अपनी मंशा पापा को जतला देना चाहती थी.


कॉलेज से घर आते ही पूर्वी ने बैग एक किनारे सरकाया और बोली, “मम्मी, मुझे आज रात रुही के भाई की सगाई में जाना है.”
“अपने पापा से पूछ लो. वे इजाज़त दे देते हैं, तो मुझे कोई एतराज नहीं है.”
“मैं आपसे पूछ रही हूं. मेरे लिए पापा से बढ़कर आप हैं. आज मैं किसी की बात नहीं सुनूंगी. मुझे जाना है, तो बस जाना है. बहुत हो गई आपकी पाबंदियां.”
“ऐसा नहीं कहते. पापा जो करते हैं तुम्हारी भलाई के लिए करते हैं.”
“तुम्हें उनकी भलाई दिखाई देती है. मुझे लगता है वे मेरे सबसे बड़े दुश्मन हैं, जो इस तरह सताकर मुझसे बदला ले रहे हैं.”
इतना कहकर वह दनदनाती हुई अपने कमरे में चली गई और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया. लोकेश मां-बेटी के बीच हुई सारी बातें सुन रहे थे. उन्हें ख़ुद समझ नहीं आ रहा था पूर्वी को कैसे समझाएं? दिन-प्रतिदिन वह बगावती होती जा रही थी. मम्मी-पापा की कोई बात सुनने के लिए राजी ही नहीं होती. उसे पापा की हिदायतें पहले से ही पसंद नहीं थी, लेकिन अब उसे अपने पापा बहुत बुरे लगते हैं, जो हर समय उसे नसीहत ही देते रहते.
ज्योति ड्राॅइंगरूम में आकर बोली,
“तुमने पूर्वी की बातें सुन ली हैं. मुझे समझ नहीं आता इसे कैसे समझाऊं? बाहर का माहौल देखकर भी इसकी समझ में कुछ नहीं आता. इसे अपने साथी दिखाई देते हैं कि वे क्या कर रहे हैं? मम्मी-पापा क्या कह रहे हैं, इससे इसे कोई मतलब नहीं. लड़की जवान हो गई है. अब उस पर ज़्यादा बंदिशें लगाना ठीक नहीं है लोकेश.”
“यह तुम कह रही हो?”
“क्या करूं मैं उसकी मां हूं. उसे इस तरह तनाव में नहीं देख सकती.”
“ठीक है वह जाना चाहती है, तो जाए. याद रखें रात नौ बजे मैं ख़ुद उसे लेने रूही के घर आ जाऊंगा. तब उसे बुरा नहीं लगना चाहिए.”
बाप-बेटी के बीच में ज्योति बुरी तरह पिस रही थी. उसे समझ नहीं आता वह किसका साथ दे? बेटी को देखती,  तो लगता है ज़माने के हिसाब से उसका नज़रिया सही है और लोकेश से बात करती, तब भी यही महसूस होता है कि वह अपने अनुभवों से सही कह रहे हैं. दो रिश्तो के बीच में फंसी वह कभी किसी एक के हक़ में निर्णय ले ही नहीं पाती.
बहुत देर बाद पूर्वी कमरे से बाहर निकली. उसके चेहरे पर अभी तक तनाव की लकीरें दिखाई दे रही थीं. ज्योति बोली, “पूर्वी, समझने की कोशिश किया करो. तुम हमारी इकलौती औलाद हो. हमें तुम्हारी बहुत चिंता रहती है.”
“चिंता करना बुरी बात नहीं है मम्मी. आपकी चिंताओं ने मेरा सांस लेना तक दूभर कर दिया है. मेरे दोस्त मेरा कितना मज़ाक उड़ाते हैं. आप सोच भी नहीं सकतीं वे मेरे बारे में क्या कुछ कहते हैं.”
“ठीक है चली जाना, लेकिन याद रखना नौ बजे पापा तुम्हें लेने आ जाएंगे.”
इस समय पूर्वी को ज़्यादा बहस करना ठीक नहीं लगा. आज उसकी ज़िद के आगे पापा ने उसे कुछ घंटे  दोस्तों के साथ बिताने की छूट दे दी थी. उसने सोच लिया बगैर बगावत के उसकी समस्या का हल नहीं निकल सकता. लिहाज़ा वह अपनी बात मनवाने के लिए बगावती तेवर अपनाएगी.


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शाम को सबसे पहले पूर्वी को आया देख रूही बोली, “तुम इस समय यहां?”
“क्यों क्या हो गया? मैं नहीं आ सकती.”
“क्यों नहीं आ सकती हो, लेकिन पहली बार तुम्हें शाम के समय घर से बाहर देख रही हूं. हम तो यार-दोस्तों के साथ देर रात तक मौज-मस्ती करते हैं. एक तुम हो, जो अंधेरा होते ही घर में छुपकर बैठ जाती हो.”
“अब ताने बंद भी कर दे. मैं यहां मस्ती करने आई हूं, ना कि तेरी जली-कटी बातें सुनने के लिए.”
कुछ ही देर में उनके और दोस्त वहां पहुंच गए. सबने फंक्शन का ख़ूब लुत्फ़ उठाया. पूर्वी की नज़र घड़ी पर लगी हुई थी. जैसे ही वह चलने को तैयार हुई सार्थक बोला, “मैं तुम्हें छोड़ देता हूं.”
“नहीं यार, कहीं पापा ने देख लिया, तो कयामत आ जाएगी.”
“इतनी रात को अकेले कैसे जाओगी?”
“अकेले कहां मेरे पापा बाहर खड़े मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे.” बोलकर वह ख़ुद ही हंस दी.
इससे ज़्यादा सार्थक के पास उससे पूछने के लिए कुछ भी न था. वह उसका सबसे अच्छा दोस्त था. वे दोनों कई सालों से एक-दूसरे को जानते थे और अब उनकी दोस्ती प्यार में बदलने लगी थी. सार्थक यह बात उससे कई बार कह चुका था, लेकिन पूर्वी ने अभी तक अपनी ओर से इज़हार नहीं किया था. वह पापा से डरती थी कि वे इस रिश्ते के लिए कभी राज़ी नहीं होगें.
गेट के सामने दूसरी ओर लोकेश पूर्वी का इंतज़ार कर रहे थे. उसने सार्थक को अपने साथ बाहर आने से मना कर दिया था. गाड़ी देखकर वह उस ओर बढ़ गई. 
पापा ने पूछा, “कैसा रहा आज का फंक्शन?”
“बहुत अच्छा. पहली बार इतनी देर तक घर से बाहर दोस्तों के साथ समय बिताने का मौक़ा मिला.”
“अच्छी बात है.” कहकर लोकेश ने बात ख़त्म कर दी.
रास्तेभर दोनों ने कोई बात नहीं की. पूर्वी आज अपनी बात मनवाकर बहुत  ख़ुश थी. वह सोच रही थी‌ कि
पापा चाहते, तो इंटर करने के बाद उसे किसी अच्छे कॉलेज में घर से बाहर पढ़ने के लिए भेज सकते थे. लेकिन उन्होंने उसे बीएससी करने के लिए मजबूर किया. उसने कहा भी, “पापा मैं इंजीनियरिंग करना चाहती हूं.”
“लड़कियों के लिए सबसे अच्छी  टीचिंग लाइन होती है. मैं चाहता हूं तुम एमएससी करके पीएचडी करो और किसी यूनिवर्सिटी में पढ़ाओ तुम्हारे भविष्य के लिए यही अच्छा रहेगा.”
“मुझे नहीं बनना लेक्चरार.”
पूर्वी ने तुरंत विरोध जता दिया. इस पर भी लोकेश अपनी बात से ज़रा  नहीं हटे और बोले, “मैं तुम्हें किसी भी क़ीमत पर पढ़ने के लिए बाहर नहीं भेजूंगा. मेरी बात कान खोलकर सुन लो.”
पूर्वी कुछ दिन तक पापा से बहुत नाराज़ रही. उसे मजबूरी में यहां बीएससी करनी पड़ी. इस समय वह फाइनल ईयर में थी.
कई बार उसका जी करता वह पढ़ाई-लिखाई सब कुछ छोड़कर किसी के साथ यहां से भाग जाए और पापा के चंगुल से हमेशा के लिए मुक्त हो जाए. पर वह इतना साहस कभी नहीं जुटा पाई. आज उसने इसकी पहल कर दी थी. उसे लगा उसकी इच्छा के आगे मजबूर मम्मी-पापा को एक न एक दिन झुकना ही पड़ेगा. भले ही यह एक छोटा कदम था, लेकिन इसी के बलबूते अब वह कोई दूसरा बड़ा कदम उठा सकती थी.
घर आते ही मम्मी ने पूछा,
“कैसा रहा आज का फंक्शन?”
“बहुत अच्छा मज़ा आ गया. मेरे सारे दोस्त आए थे. वे आए दिन इनका मज़ा उठाते हैं मुझे यह मौक़ा आज पहली बार मिला है.”
“तुम्हें अच्छा लगा मेरे लिए इतना ही बहुत है. रात काफ़ी हो गई है अब सो जाओ.” ज्योति बोली और अपने कमरे की ओर बढ़ गई.
लोकेश को आज नींद नहीं आ रही थी. ज्योति ने पूछा, “क्या हुआ?”
“पूर्वी की मनमानी हद से ज़्यादा बढ़ती जा रही हैं. तुम उसे समझाती क्यों नहीं?”
“समझाती हूं. अब वह छोटी बच्ची नहीं रह गई, जो हर बात पर हम उसे उंगली पकड़कर चलना सिखाएं. उसकी अपनी समझ है. उसे अपने दोस्तों की ज़िंदगी ज़्यादा अच्छी लगती है. हमें उस पर प्रतिबंध नहीं लगाने चाहिए.”
ज्योति की बात सुनकर लोकेश चुप हो गए. कुछ ही महीनों में पूर्वी के एग्ज़ाम शुरु हो गए थे. इस बार भी उसने सबसे अच्छा प्रदर्शन कर काॅलेज में टॉप किया था. वह  फिजिक्स में एमएससी करना चाहती थी. उसे यक़ीन था इस विषय की मदद से वह इंजीनियरिंग क्षेत्र में घुसने का प्रयास कर सकती है. पापा उसके चुनाव से सहमत थे.
सार्थक ने इसी साल एमएससी पूरी कर ली थी. वह एक भले घर का लड़का था. उसके पापा यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे. वे बेटे को पढ़ा-लिखाकर प्राध्यापक बनाना चाहते थे. सार्थक को इस पर कोई ऐतराज़ न था. वह मन लगाकर पढ़ रहा था और अच्छे नंबरों से डिग्री हासिल कर ली थी. वह पूर्वी से दो साल सीनियर था. पूर्वी ने सोच लिया वह बहुत जल्दी बगावत करके पापा को इस बारे में सब कुछ बता देगी.
अब वह उसे छोटे समारोह में जाने से नहीं रोकते थे, लेकिन रात में उसे घर से बाहर रहने की इज़ाजत अभी भी न थी. पूर्वी को यह अच्छा न लगता. उसकी सब दोस्त अपने बॉयफ्रेंड के साथ देर रात तक ख़ूब मौज-मस्ती करतीं, लेकिन उसके लिए समय सीमा निर्धारित थी.
फाइनल ईयर में पहुंचते ही पूर्वी ने सार्थक से शादी करने का मन बना लिया. अपने मम्मी-पापा की बंदिशों में उसे और नहीं रहना था. वह ज़िंदगी को अपने ढंग से जीना चाहती थी.
एक दिन वह दस बजे रात अपनी सहपाठी रिचा की बर्थडे पार्टी से घर लौट रही थी. सार्थक उसे बाहर तक छोड़ने चला आया. जान-बूझकर पूर्वी ने इस समय उसे साथ आने से नहीं रोका. वह आज अपनी मंशा पापा को जतला देना चाहती थी. गाड़ी में बैठते हुए पापा ने पूछा, “वह लड़का कौन था, जो तुम्हें बाहर छोड़ने आया था?”
“सार्थक मेरा दोस्त है पापा. वह बहुत अच्छा लड़का है.”
“तुमने लड़कों से भी दोस्ती कर ली. वैसे दोस्ती करना कोई बुरी बात नहीं है. नए ज़माने में क्या लड़के और क्या लड़कियां? जिससे विचार मिल जाए, वही दोस्त बन जाता है. आगे क्या विचार है?” पापा ने पूछा.
उसे समझ नहीं आया क्या जवाब दें?वह सोच रही थी यह सुनकर पापा आगबबूला हो जाएंगे और उसका घर से निकलना तक बंद कर देंगे.
“पढ़ाई पूरी करते ही हम शादी कर लेंगे.”
“तुम चाहो तो उससे अभी शादी कर सकती हो.” लोकेश बोले, तो पूर्वी का मुंह खुला का खुला रह गया. पापा से वह ऐसे अप्रत्याशित व्यवहार की  सपने में भी उम्मीद नहीं कर सकती थी. उन्होंने इससे आगे कुछ नहीं कहा. न ही इस बारे में मम्मी से कोई बात की. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था वह अब क्या करे? उसने शादी के बारे में  सार्थक से अभी बात तक नहीं की थी .
अगले दिन उसने सार्थक को सारी बात बता दी और बोली, “तुम क्या चाहते हो बता दो?”
“पूर्वी मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं.”
“फिर शुभ काम में देरी कैसी? हम इम्तिहानों का इंतज़ार क्यों करें? तुम चाहो, तो हमारी शादी बहुत जल्दी हो सकती है.”
“तुम्हारे पापा मान गए?”
“हां. तुम्हें मेरी बात पर यक़ीन नहीं आ रहा. तुम भी अपने मम्मी-पापा से बात कर लो. अगर वे तैयार हैं, तो यह शादी इसी महीने हो सकती है.”
सार्थक के पापा चाहते थे कि लड़का पहले पीएचडी करके लेक्चरार बन जाए उसके बाद शादी के बारे में सोचे. लेकिन उसकी ज़िद के आगे वे मजबूर हो गए थे.
ज्योति ने सुना तो वह परेशान हो गई.
“तुम सच में पूर्वी की शादी सार्थक से करने के लिए राज़ी हो?”
“हां. तुम जान रही हो वह हमारी बंदिशों से छूटना चाहती है. मुझे अब उसे आज़ाद करना ही ठीक लग रहा है.”
दोनों परिवारों की रज़ामंदी से सार्थक और पूर्वी की महीनेभर के अंदर शादी हो गई. पूर्वी ख़ुशी-ख़ुशी ससुराल चली गई. विदाई के समय उसकी आंखों में आंसू तक न थे. पूर्वी को लगा जैसे वह आसमान में एक खुले पक्षी की तरह उड़ रही हो. जहां उसे रोकने-टोकनेवाला कोई नहीं था. उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि पापा उसके पसंद के लड़के से इतनी जल्दी उसकी शादी करा देंगे. यह तो चमत्कार ही हो गया था. वह इसे अपनी बगावत का परिणाम समझ रही थी.
पूर्वी को ससुराल में कोई परेशानी नहीं थी. सास-ससुर बहुत प्यार करने वाले थे. अपने पापा की बंदिशों से छूटकर पूर्वी यहां अपने आपको बहुत हल्का महसूस कर रही थी. एक दिन पूर्वी सुबह उठकर पापाजी के लिए चाय लेकर गई तो वे बोले,
“तुम्हारे मम्मी-पापा ने तुम्हें बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं. हमारी क़िस्मत अच्छी थी, जो हमें इतनी अच्छी बहू मिली.”
उनके मुंह से अपनी तारीफ़ सुनकर पूर्वी को बहुत अच्छा लगा.
“तुम्हें यहां कोई परेशानी तो नहीं?”


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“नहीं मम्मीजी, मैं यहां बहुत ख़ुश हूं.”
पूर्वी वहां से सीधे अपने कमरे में आई और बोली, “यहां आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है सार्थक. सच में पापाजी कितने अच्छे है. मेरा बहुत ख़्याल रखते हैं. एक मेरे पापा है जो…”
“तुम्हारे पापा भी बहुत अच्छे हैं. तुम्हें उनके बारे में ऐसा नहीं सोचना चाहिए.” सार्थक उसे बीच में टोकते हुए बोला .
“तुम उन्हें जानते ही कितना हो, जो उनकी तरफ़दारी कर रहे हो? मैंने उनके साथ जो भुगता है वह मैं ही जानती हूं.”
“मैंने उन्हें जितना जाना है, उसे देखकर कह सकता हूं वह एक बेमिसाल पापा है. केयरिंग और दूसरों की इच्छा का सम्मान करनेवाले. मैं कहना नहीं चाहता था, लेकिन तुम मुझे मजबूर कर रही  हो. वे तुम्हारी इतनी केयर करते थे कि उनके पास तुम्हारे सारे दोस्तों की पूरी कुंडली थी.”
“यह क्या कह रहे हो?”
“मैं सच कह रहा हूं. पापाजी को पता था तुम मुझसे प्यार करती हो. उन्होंने मेरी कुंडली भी अच्छी तरह छान ली थी. यहां तक कि वे एडमिशन के बहाने पापा से भी कॉलेज में मिलने गए थे. पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद  उन्हें तुम्हारी मेरी दोस्ती पर कोई ऐतराज़ नहीं था. तभी वे इतनी जल्दी शादी के लिए तैयार हो गए.”
“और क्या जानते हो तुम उनके बारे में?”
“कहूंगा तो तुम्हें लगेगा मैंने तुम्हें यह सब पहले क्यों नहीं बताया? यह सच है कि कुछ साल पहले उनके सीनियर  राघव की बहन के साथ कुछ दोस्तों ने कोल्ड ड्रिंक में नशा मिलाकर उसके साथ हैवानियत की. उसके बाद उसे मारकर जंगल में फेंक दिया. इस घटना से वे बहुत डर गए और तुम्हें लेकर सचेत रहने लगे. वे बहुत ज़िम्मेदार और केयरिंग पापा है. तुम उनके बारे में बहुत ग़लत सोचती हो.”
“उन्होंने यह बात मुझे क्यों नहीं बताई?”
“तुम उनकी बात पर कभी यक़ीन नहीं करती. तुम सोचती वे तुम्हें झूठी कहानी सुना रहे हैं. कोई भी मां-बाप अपने बच्चों का बुरा नहीं चाहते. उनकी दिली इच्छा रहती है कि उनके बच्चे हमेशा ख़ुश रहें और शादी के बाद दोनों घरों का मान भी रखें.”
सार्थक की बात सुनकर पूर्वी चुप हो गई. आज उसे पापा के लिए कहे शब्दों पर बड़ा खेद हो रहा था. वह अपने पापा के लिए क्या कुछ नहीं कहती थी. वे चुपचाप सुनते रहते थे कभी प्रतिकार नहीं करते थे. इस पर भी वे उसे घर से बाहर रहने की ढील नहीं देते थे. शायद यह उनकी सजगता का परिणाम था कि आज वह इतने अच्छे घर की बहू बनकर ख़ुशहाल ज़िंदगी जी रही थी.
पूर्वी का जी चाहा अभी पापा से मिलने चली जाए, लेकिन झिझक के कारण चुप रही.
सार्थक उसकी मनोदशा को भांप रहा था. वह बोला, “अच्छी शुरुआत में देर नहीं करनी चाहिए पूर्वी. तुम चाहो तो उनसे फोन पर बात कर सकती हो.”
उसने मम्मी को फोन मिलाया. थोड़ी देर बात करके वह बोली, “पापा कहां हैं?”
“ड्राॅइंगरूम में टीवी देख रहे हैं. बात करोगी उनसे?” कहकर मम्मी ने फोन लोकेश को थमा दिया.
“कैसी हो पूर्वी?” पापा बोले, तो बदले में उन्हें पूर्वी की सिसकियों के साथ इतना ही सुनाई दिया,
“आई मिस यू पापा.”
उधर से भी रूंधे गले से पापा की आवाज़ आई, “हमेशा ख़ुश रहना बेटी. हमें तुम्हारी बहुत याद आती है.”
इससे आगे दोनों ही कुछ न बोल सके. सिसकियों की आवाज़ें दोनों के दिल के जज़्बात एक-दूसरों तक पहुंचा रही थी.
पूर्वी बहुत देर तक फोन पर सिसकती रही. सार्थक ने उसे चुप कराने की ज़रूरत नहीं समझी. आज जी भर रो लेने के बाद पापा के प्रति उसके अंदर का सारा रोष तिरोहित हो गया था.

Dr. K. Rani

डॉ. के. रानी

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वृंदा दीदी ने क्लास में डायरी लिखने की बात कही, तब से मैं अपनी वेदना डायरी में लिखने लगी. पर कोई पढ़ न ले, इसलिए पन्ना फाड़ देती. धीरे-धीरे मेरी हिम्मत बढ़ती गई.. और जैसे-जैसे मेरी व्यथा डायरी में फलती गई, मेरा मन हल्का होता गया…
जैसे-जैसे किताब के पन्ने पलटते गए, वैसे-वैसे हिना की मानसिक स्थिति और उसका संघर्षभरा जीवन वृंदा के मानस पटल पर उतरता गया.

सुबह से दौड़भाग कर रही वृंदा ने दो बार घर देख लिया था कि कोई सामान छूट तो नहीं रहा है. एक दिन पहले ही बेटे अनुपम ने सामान पैक करके सुबह तैयार रहने के लिए कह दिया था. हमेशा की तरह इस बार भी वृंदा के जन्मदिन पर कहीं बाहर घूमने जाने की व्यवस्था की होगी. गाड़ी भेज रहा है यह तो ठीक है, पर यह भी तो कहना चाहिए था कि कहां जाना है, कितने दिन के लिए जाना है, कितना सामान ले जाना है? तभी डोरबेल के बजने से उनकी विचार श्रंखला टूटी.
इस समय कौन आया होगा? मणी को उन्होंने आज आने के लिए पहले ही मना कर दिया था. मंजी तो एक सप्ताह तक दिखाई देनेवाली नहीं है. अनुपम का ड्राइवर भी 11 बजे तक आनेवाला था. असमंजस में वृंदा ने दरवाज़ा खोला. सामने कुरियरवाला खड़ा था.
कुरियर लेकर अंदर आई वृंदा उसे उलट-पलट कर देखने लगीं. क्या होगा इसमें? भेजनेवाले का नाम भी नहीं दिखाई दे रहा था. आकाश के जाने के बाद मुश्किल से ही कभी इस घर में कुरियर आया हो. और आज अचानक इस तरह? एक साथ अनेक सवाल उनके मन में उठे. थोड़ा काम और घर के फर्नीचर पर चादर डालना बाकी था. ‘अभी तो अनु के ड्राइवर को आने में देर लगेगी, चलो पहले कुरियर देख लेती हूं. उसके बाद बाकी का काम कर लूंगीं…’ यह बड़बड़ाते हुए वृंदा कुरियर खोलने लगीं.
‘रतनपुर के संस्मरण’ (हिना सुधीर) शीर्षकवाली किताब देखकर उनकी धड़कन तो बढ़ी ही, किताब अर्पण में अपना नाम देखकर ख़ुशी और आश्चर्य से वह किताब के पन्ने पलटने लगीं. जैसे-जैसे वह रतनपुर के बारे में जो लिखा था पढ़ती गईं, वैसे-वैसे ख़ुद वहां बिताए अच्छे दिनों को याद करते हुए अतीत में खो गईं.
वृंदा नौवीं की परीक्षा देकर छुट्टियों में माता-पिता के साथ पहली बार रतनपुर गई थी. चारों ओर पेड़ों और पहाड़ों की श्रृंखला, रंग-बिरंगें फूलों, तरुओं की शीतल छाया में कलरव करते पक्षियों और कलकल करते झरनों के बीच बसा रतनपुर सुंदर तो था, पर वहां पहुंचने का रास्ता बहुत कठिनाइयों भरा था. वाहन को आधे रास्ते में ही छोड़ कर सांप की तरह टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर पैदल चल जंगल के बीच से वहां पहुंचना होता था. लाल मिट्टी के गारे से लीपी और देशी नरियों वाले छप्पर के छोटे-छोटे घर इधर-उधर बिखरे थे. गांव में अभी आधुनिकता का बिगुल नहीं बजा था. बिजली व टेलीफोन अभी वहां रहनेवालों ने देखा तक नहीं था. अच्छे-बुरे मौक़े पर गांव का एक आदमी पहाड़ी पर चढ़कर थाली बजा कर संदेश देता था. उसके बाद पूरा गांव इकट्ठा हो जाता. पहाड़ी गांव में ज्वार-बाजरा और मकाई के अलावा कुछ पैदा नहीं होता था. गुड़, सब्ज़ी बाजरा-मकाई की रोटी और जंगल में पैदा होनेवाली चीज़ों से पलते गांववाले त्योहारों पर जो खाना बनाते, उसके सामने होटल का महंगा खाना भी फीका लगता.


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मासूम वृंदा को तो रतनपुर की हरियाली और वहां के लोगों की सादी-सरल जीवनशैली इतनी भा गई थी कि उसने भविष्य में इन लोगों के लिए कुछ करने का निर्णय ले लिया था.
रतनपुर की यादगार मुलाक़ात के दस साल बाद शहर की बढ़िया नौकरी छोड़कर वृंदा उस इलाके के गरीब बच्चों को शिक्षा देनेवाली एक संस्था में शिक्षिका की नौकरी कर ली थी. पर्वतीय इलाके के लोग रोजी-रोटी के लिए दूसरे इलाकों में चले जाते थे. इसलिए अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए संस्था में छोड़कर साल-छह महीने में एकाध बार मिलने आते थे. इसलिए बच्चों की सारी ज़िम्मेदारी वृंदा की ही होती थी. उन बच्चों के विकास के लिए ही वृंदा ने रतनपुर को अपनी कर्मभूमि बनाई थी. नौकरी के दौरान न जाने कितने बच्चे आए और गए, उनमें एक बच्ची वह हिना…
घर की डोरबेल फिर बजी.
“मांजी… ओ मांजी…” किसी ने आवाज़ लगाई.
अंजान आवाज़ से वृंदा चौंकीं.
“अनुपमजी ने भेजा है आपको लेने के लिए.”
“हां, आती हूं.”
फर्नीचर चादर से ढंककर, बाकी का काम जल्दी-जल्दी निबटाकर वृंदा गाड़ी की पिछली सीट पर बैठ कर वह किताब पढ़ने लगीं. लिखा भले हिना ने था, पर संस्मरण तो ख़ुद के थे न. इसलिए वह संस्मरणों में डूब गईं.
‘रविवार को घर से कोई मिलने आएगा, इस आशा में मेरे अलावा सभी लड़कियां राह देखती रहतीं. मुझ से तो कोई मिलने नहीं आएगा, यह उम्मीद होने से रविवार जल्दी न आए मैं यही सोचती रहती. संस्था में छोड़ जाने के बाद कभी कोई मुझे देखने नहीं आया था. घर जाने पर मुझे पता चला कि मेरे माता-पिता अलग हो गए हैं…’
किताब के ये वाक्य पढ़कर वृंदा अचानक चौंकीं. कुछ साल पूर्व की घटना याद आते ही वृंदा की नज़र के सामने अनुपम का मासूम चेहरा नाचने लगा. आंखें बंद करके वह कुछ सोचने लगीं, पर मन किताब पढ़ने के लिए ललचाने लगा.
‘मेरे मां-बाप एक-दूसरे से अलग हो गए और अन्य लोगों के साथ रहने लगे. मैं घर गई, तब बगलवाले चाचा ने पूछा, “तुम किसके साथ रहोगी?” मुझे तो दोनों के साथ रहना था, पर यह संभव नहीं था. इसलिए वह मुझे नानी के घर छोड़ गए. नानी मुझे संस्था के भरोसे छोड़कर चली गईं. उसके बाद मुझसे मिलने या मेरा हालचाल लेने कोई नहीं आया. मेरे साथ पढ़नेवाली लड़कियों की मम्मियां मिलने आतीं, तो उन्हें नहलातीं, उनके कपड़े धोतीं, उन्हें खिलातीं, तो मुझे भी अपनी मां की याद आती. इसलिए रविवार को मैं पूरे दिन कमरे के बाहर नहीं निकलती…
“तुम से कोई मिलने नहीं आया?” कभी कोई मुझसे पूछता, तो मैं “वे काम पर से आए नहीं होंगें…” यह कहकर मैं बात को टाल देती. मेरे मां-बाप अपनी नई ज़िंदगी जीने लगे थे, पर मेरा क्या? मेरी क्या ग़लती थी, जो मुझे इस तरह अकेली छोड़ दिया. न जाने कितने दिनों तक मैं यह सोचते हुए परेशान होती रही. मैं अपनी वेदना किसी से कह नहीं सकती थी, इसलिए में ख़ूब रोती.


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वृंदा दीदी ने क्लास में डायरी लिखने की बात कही, तब से मैं अपनी वेदना डायरी में लिखने लगी. पर कोई पढ़ न ले, इसलिए पन्ना फाड़ देती. धीरे-धीरे मेरी हिम्मत बढ़ती गई.. और जैसे-जैसे मेरी व्यथा डायरी में फलती गई, मेरा मन हल्का होता गया…
जैसे-जैसे किताब के पन्ने पलटते गए, वैसे-वैसे हिना की मानसिक स्थिति और उसका संघर्षभरा जीवन वृंदा के मानस पटल पर उतरता गया.
‘बेचारी हिना ने बचपन में कितना दुख झेला. मां-बाप ने अपने झगड़े में मासूम हिना के भविष्य के बारे में बिल्कुल नहीं सोचा…’ इसी तरह की बातें सोचते हुए वृंदा की छलकती आंखें फिर से किताब में मग्न हो गईं.
साल बीतते रहे और मै अधिक से अधिक समझदार होती गई. मनोबल मज़बूत करके पढ़ाई पूरी करके जीवन संवारने का कारण मात्र वृंदा दीदी थीं. उनका प्रेम, स्नेहभरा स्वभाव, जीवन जीने की शैली और उनका व्यक्तित्व देखकर मुझे बहुत हिम्मत मिलती. वृंदा दीदी और आकाश सर के सुखी परिवार को याद करके यही लगता कि अगर मेरे पिता भी आकाश सर की तरह समझदार होते, तो हमारा भी हंसता-खेलता परिवार होता…
आकाश का नाम पढ़कर वृंदा का मन विचलित हो गया. किताब किनारे रख कर मन में ही बोली, ‘सुखी परिवार! आकाश की समझदारी के बारे में हिना को कहां से पता चला? शहरी वातावरण में रचा-बसा आकाश मन से नहीं, मजबूरी में संस्था से जुड़ा था.
रतनपुर जैसे ही छोड़ने का अवसर मिला, मुझसे कहा था, “अगर तुम्हें मेरे साथ रहना हो, तो रतनपुर छोड़ कर शहर चलो. न चलना हो, तो मुझे तलाक़ दे दो और ज़िंदगीभर सेवा करती रहो.” अगर अनुपम पेट में न होता, तो मैं उसी समय आकाश को छोड़ देती. मजबूरी में आकाश के साथ शहर जाना पड़ा था.
आकाश प्राकृतिक अमृत छोड़ कर कृत्रिम मृगजल के पीछे भागा और उसी मृगजल रूपी कृत्रिमता ने उसकी जान ले ली. विचारों में खोई वृंदा की आंखें कब लग गईं, उन्हें ख़्याल ही नहीं रहा.
जागने पर वृंदा ने खिड़की का शीशा खोला, तो वही हरियाली, दोनों ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों की श्रृंखला और टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता. रास्ते के किनारे टोकरी में फल लिए खड़े बच्चे और लकड़ी की छोटे-छोटे खिलौने बेचते लोग. वृंदा को विश्वास ही नहीं हुआ कि वह अपनी कर्मभूमि की ओर जा रही है. पानी जमा करने के लिए बना डैम, रास्ते के किनारे दिखाई देती इक्का-दुक्का दुकानें और पहाड़ काट कर बनाई गई पक्की सड़क देखकर वृंदा को लगा, ‘अब यहां पहले जैसी दिक्कतें नहीं रही.’
मुख्य रास्ते से गाड़ी मुड़कर घने वृक्षों के बीच एक बड़े दरवाज़े के सामने रुक गई.
‘मातृछाया’ शीर्षक के नीचे अपना नाम देखकर वृंदा कुछ सोचतीं, उसके पहले ही अनुपम ने आकर उनके चरण स्पर्श करते हुए पूछा, “मां, जन्मदिन की भेंट कैसी लगी? मैंने इस संस्था को ख़रीद कर अब आपके नाम से शुरू की है.”

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वृंदा कुछ कहतीं, उसके पहले ही संस्था के बच्चे दौड़कर वृंदा से लिपट गए. सभी को प्यार करते हुए वृंदा ने कहा, “मैं आ गई हूं. अब आगे का मेरा जीवन तुम लोगों के लिए है. अब किसी बच्चे को रविवार का डर नहीं सताएगा. माता-पिता के बगैर दुखी नहीं होना पड़ेगा.”
“क्या हुआ मां?” अनुपम ने पूछा.
“कुछ नहीं बेटा. सोच रही थी कि सालों पहले मैं और तुम्हारे पिता अलग हो गए होते, तो आज तुम्हारा क्या होता? उस समय तुम्हारे भविष्य के बारे में सोचकर जिस संस्था से दूर हुई थी, उससे फिर से मेरा मिलन करा कर तुम ने मुझे मेरे जीवन की मूल्यवान भेंट दी है. मेरे जीवन में पड़ी दरार को जोड़कर तुम ने मेरी कोख को रोशन कर दिया है.” कह कर भावविभोर वृंदा ने बेटे को सीने से लगा लिया.

Virendra Bahadur Singh
वीरेंद्र बहादुर सिंह

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उसने थरथराते शब्दों में कहा, “शालू दी, यह साड़ी…” वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि शालू दी बोली, “हां, यह हल्के रंग की साड़ी सुलोचना दीदी के लिए रख दो, वह विधवा हैं, उनके लिए ठीक रहेगा.” कहते हुए शालू दी कमरे से निकल गई. नीलू बेजान-सी होकर साड़ी को सीने से लगाकर बैठ गई. उसकी आंखों के सामने उसकी मां का चेहरा तैर गया और आंखें नम हो गई.

शालू दीदी रीतू बेरी के डिज़ाइन किए हुए दो लाख का लहंगा पहन, तमाम जेवरातों से लदी-फदी अपनी पच्चीसवीं शादी की सालगिरह में आए हुए मेहमानों की मेहमांनवाज़ी कर रही थी. इस मेहमांनवाज़ी में अगर कोई उनकी तारीफ़ कर देता, तो वह इतराती हुई यह बताना नहीं भूलती कि यह रीतू बेरी द्वारा डिज़ाइन किया हुआ लहंगा है.
इतराए भी क्यों नहीं! ईश्वर ने दोनों बहनों में एक की क़िस्मत में अर्स लिखा, तो दूसरी के क़िस्मत में फ़र्श. फ़र्श से क़िस्मत जुड़ी होने की वजह से ही शायद नीलू ज़िंदगी की तमाम वास्तविकताओं और नैतिकताओं से जुड़ी हुई थी. जहां शालू के पति ऐसे ओहदे पर थे, जहां सामने से लक्ष्मी का आगमन कम तथा पिछले दरवाज़े से ज़्यादा होता था. वहीं नीलू के पति एक अदद अध्यापक थे, जिनका वेतन मुंशी प्रेमचंद के कथनानुसार पूर्णमासी का चांद ही होता था, जो महीने का अंतिम पखवारा आते-आते अमावस्या में तब्दील होने लगती. गनीमत यही था कि पूर्णमासी भी आने में देर नहीं लगती, वह निश्चित समय पर आ ही जाती.
सालगिरह का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद अब मेहमानों के विदा होने का समय आ गया था. तभी भीड़ में से शालू दी नीलू का हाथ पकड़कर एक कमरे में ले गई. वहां उसने एक बॉक्स की ओर इशारा करके नीलू से कहा, “इसमें रिश्तेदारों के यहां से मिली हुई बहुत-सी साड़ियां हैं, जो मेरे स्टैण्डर्ड का नहीं था, इसलिए मैं पहनी नहीं. तुम इन्हीं साड़ियों में से ज़रा छांटकर मेरे मेहमानों यानी देवरानी, जेठानी, सास, ननदें, भाभियों जिसके लायक जो लगे निकालकर रख दो.”
नीलू हतप्रभ थी. इतनी करोड़पति शालू दी और मेहमानों की विदाई रिश्तेदारों के यहां से मिली हुई साड़ियों से? खैर! बड़े लोगों की बड़ी बातें.
नीलू बॉक्स खोलकर साडियां छांटने लगी. अचानक उसके हाथ एक हल्के रंग की शिफॉन की साड़ी आई. यह साड़ी उसे कुछ जानी-पहचानी सी लगी. वह उसे हाथ में लेकर उलट-पुलट कर देखने लगी. फिर तो वह हैरान-सी रह गई. उसे सब कुछ याद आ गया था. वह साड़ी उठाकर सीने से लगा रही थी, तभी शालू दी कमरे में आई.


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उसने थरथराते शब्दों में कहा, “शालू दी, यह साड़ी…” वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि शालू दी बोली, “हां, यह हल्के रंग की साड़ी सुलोचना दीदी के लिए रख दो, वह विधवा हैं, उनके लिए ठीक रहेगा.” कहते हुए शालू दी कमरे से निकल गई.
नीलू बेजान-सी होकर साड़ी को सीने से लगाकर बैठ गई. उसकी आंखों के सामने उसकी मां का चेहरा तैर गया और आंखें नम हो गई.
दो साल पहले कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की वजह से मां को दोनों बहनों में से किसी एक के पास रहना था, क्योंकि उसका भाई अभी छोटा था. सारी सुख-सुविधाएं देखते हुए मां ने भी शालू दी के पास ही रहने का फ़ैसला लिया था. यह उचित भी था, क्योंकि नीलू के पास न तो इतनी सुख-सुविधाएं थीं और न सरकारी नौकरों का अमला. साथ ही उसके बच्चे भी अभी बहुत छोटे थे.
पर नीलू मां से मिलने आई थी. मिलने आते वक़्त वह एक शिफॉन की साड़ी लाई थी, जो उसकी मां को बहुत पसंद आया था. साड़ी पहनकर वह बहुत ख़ुश भी हुई थीं. मां की ख़ुशी व पसंद देखकर नीलू अपने घर आते ही एक और साड़ी उनके लिए कुरियर कर दी थी. लेकिन कुरियर मिलने के अगले दिन ही मां चल बसी थीं. वह साड़ी पहन भी न सकीं.
मां के गुज़रने के कुछ दिनों बाद नीलू ने रोते-रोते शालू दी से पूछा था, “दीदी,आप उस साड़ी का क्या की? मां तो पहन भी न सकी.”
शालू दी का जवाब था, “मां की अंतयेष्टि में मैंने पंडितजी को दान कर दी.”
लेकिन नीलू वह साड़ी ज़िंदगी में कभी भूल नहीं सकती, जो उसने अंतिम बार मां के लिए पसंद की थी. यह वही साड़ी थी.
तभी शालू कमरे में आई और एक-एक साड़ी उठाकर ले जाने लगी, मेहमानों की विदाई करने के लिए.
नीलू अपनी मां की साड़ी को सीने से लगाए काफ़ी दयाभरी दृष्टि से शालू दी को देखती हुई सोचने लगी, ‘बेचारी शालू दी, न जाने कहां-कहां और कितनी बार अपने जमीर से गरीब हुई हैं, तब जाकर यह अमीरी मिली है.

Ratna Srivastava
रत्ना श्रीवास्तव



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प्लैटो ने अपने गुरु से कहा,‌ “यूनानी समाज आपके उच्च कोटि के विचारों के लायक नहीं है, अतः आप यहां से भाग चलिए. हम आपको लेने आए हैं.
सुकरात चाहते तो आसानी से भाग सकते थे, परन्तु उनका उत्तर था कि “यदि मैं भाग गया, तो मेरा शरीर तो बच जाएगा, परन्तु मेरे विचार मर जाएगें.

469 ईसा पूर्व जन्में सुकरात एक युनानी दार्शनिक थे. पश्चिमी दर्शन के विकास में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है.
उन्होंने पुरातन रूढ़ियों पर प्रहार किया. उनके अनुसार ‘यदि ईश्वर है, तो वह एक ही हो सकता है.’ उनकी बातों में दम था और उनकी बातें तर्कसम्मत होती थीं.
सुकरात ने कोई ग्रंथ नहीं लिखा. सूफ़ियों की तरह वह मौलिक शिक्षा देते थे. सुबह-सवेरे घर से निकल पड़ते और युवक-युवतियों को इकट्ठा कर उन्हें ईमानदार, सच्चे और दृढ़ संकल्प रहने का उपदेश देते.
युवक-युवतियां उनकी बातों के दीवाने थे. वह उनकी बातें बड़े ध्यान से सुनते.
युनानी समाज डर गया कि सुकरात सब पुरानी परम्पराओं को तोड़ देंगे. कुछ प्रभावशाली लोग भी इनमें शामिल थे. वह सब सुकरात के विरुद्ध एकजुट हो गए. और उन पर तरुणों को बिगाड़ने, देव निंदा करने के झूठे आरोपों में मुक़दमा कर दिया. और ‘ज़हर द्वारा मारने’ का दण्ड देकर उन्हें कोठरी में बंद कर दिया गया.
उनके प्रिय शिष्य प्लैटो ने अपने अन्य साथियों से मिलकर सुकरात को जेल से भगाने की योजना बनाई. जज और जेलर को घूंस देकर भीतर सुकरात की कोठरी तक जा पहुंचे.


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प्लैटो ने अपने गुरु से कहा,‌ “यूनानी समाज आपके उच्च कोटि के विचारों के लायक नहीं है, अतः आप यहां से भाग चलिए. हम आपको लेने आए हैं.
सुकरात चाहते तो आसानी से भाग सकते थे, परन्तु उनका उत्तर था कि “यदि मैं भाग गया, तो मेरा शरीर तो बच जाएगा, परन्तु मेरे विचार मर जाएगें.
और यदि मैं मर गया, तो मेरे विचार ज़िन्दा रहेंगे. और मैं इन दोनों में से अपने विचारों का ज़िन्दा रहना पसन्द करूंगा.”
उन्होंने स्वयं प्याला उठा कर ज़हर पी लिया.
और सच है उनके विचार उनके शिष्य प्लैटो और फिर अरस्तू द्वारा आगे बढ़े. आज वह विश्वभर में जाने जाते हैं.

– उषा वधवा


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“मुझे ही शुरुआत करनी होगी, इसीलिए मैंने फोन पर सभी से बात की है. उन्हें बुलाया है अपने घर पर. इस दिवाली दीप-करंजी-फुलझड़ियां सब कुछ साझा मेरे घर पर होगा. और हां, दिवाली पर सास यहां आएगी न, फिर वे मेरे ही पास रहेंगी. मैंने तय कर लिया है और उन्हें अपना फ़ैसला भी सुना दिया है.”
“तुम्हारे पति क्या बोले तुम्हारा फ़ैसला सुनकर?”



“पिछले क़रीब दो वर्ष से घर में न जाने क्यों एक अजीब-सी चुप्पी पसरी है. यूं तो कोरोना ने ही सब की कमर तोड़ कर रखी है. न तो कोई सामाजिक गतिविधियां और न ही किसी से मेल-मिलाप.
पर महसूस होता है कि कहीं न कहीं मैं फ़ालतू में ही कोरोना को दोष दे रही हूं. यह मेल-मिलाप तो बरसों से ही धीरे-धीरे कम होता जा रहा था और अब तो जैसे नाम मात्र के ही रिश्ते रह गए हैं.
रिश्तों की बात करें, तो जैसे जंग लगी मशीन. जब भी छुओ जंग हाथ में लग जाता है और जब किसी से बात करो, तो मशीन से खड़-खच, खड़-खच आती आवाज़ की तरह एक-दूसरे से खिंचाव-सा बातों में महसूस होता है.
बरसों पुरानी सहेलियां हैं, तुम-हम स्नेहा. हम दोनों के बीच तो कोई खिंचाव नहीं आया अब तक. जब हम दोनों पड़ोसियों की तरह हैदराबाद में रहते थे तब भी पक्की सहेलियां थीं और अब मैं पिछले छह वर्षों से यहां बैंगलुरू आ गई हूं तब भी हम दोनों फोन पर ख़ूब बातें करते हैं. तुम भी मुझे जब तुम्हारा मन चाहे खरी-खोटी सुनाए बगैर नहीं रहती और मैं भी मौक़ा चूकती नहीं. फिर भी हम दोनों में एक लगाव-सा है.
यह भरोसा, यह प्रेम हमारे अपने रिश्तेदारों में क्यों खो सा जाता है?”‌ निहारिका ने स्नेहा से फोन पर अपना मन हल्का किया शायद आज वह कुछ ज़्यादा ही अपसेट थी.
“हम्म, बात तो तुम्हारी सही है निहारिका. मुझे स्वयं भी आश्चर्य होता है यही सोच-सोचकर कि कैसे मेरे भाई विवाहोपरांत इतने बदल गए? तुम्हें तो याद होगा जब मेरी मां अपने अंतिम क्षणों में थीं दोनों भाई मां को संभालने भी नहीं गए. तब मेरे पति ने मुझे ज़बर्दस्ती मां के पास भेजा और कहा, “तुम संभाल आओ कुछ दिन अपनी मां को.”
“मां ज़िंदा थीं, तब तो फिर भी उनके फोन आते थे कभी-कभार, पर उनके बाद तो बस पूछो ही मत.” स्नेहा का गला रुंध गया था.


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“यह तो अच्छा है कि हम दोनों सहेलियां एक-दूसरे पर भरोसा करती हैं और अपनी बातें एक-दूसरे से कह मन हल्का कर लेती हैं, वरना कितना अकेलापन है जीवन में.” निहारिका ने रुआंसे स्वर में कहा.     
यदि अपना बचपन याद करूं, तो सचमुच कई बार तो आंखें ही भर आती हैं. हम तीन भाई-बहन आपस में कितनी मौज-मस्ती किया करते थे. एक बार तो होली पर मेरे भाई के दोस्त हमारे घर आ पहुंचे और बोले, “क्यों न हम अपने मोहल्ले में रहनेवाले पड़ोसियों के टायटिल बनाएं.”
बड़ा भाई, उसके दोस्त और मैं साथ में बैठ गए और सारी रात हम टायटिल में फेर-बदल करते रहे और अंत में क़रीब चार बजे टायटिल फाइनल हुए.
फिर उन्होंने मुझे कहा, “चल अब काग़ज़ पर तू लिख सारे टायटिल.”
उस ज़माने में घर में लैपटॉप और प्रिंटर तो होते नहीं थे. मैंने बड़ी मेहनत से सभी के नाम के साथ उनके टायटिल काग़ज़ पर लिख दिए. कुल अट्ठाइस कॉपी तैयार की टायटिल की और होली की पहली रात जब होलिका दहन के बाद सब अपने-अपने घर जा कर सो गए और मोहल्ले के सभी घरों की बत्तियां बंद हो गईं, तब हम निकल पड़े टायटिल के लिफ़ाफ़ों के साथ.
वैसे भी हम तो उत्तर भारत से हैं, वहां तो इन दिनों ख़ूब ठंड पड़ती है. अक्सर सभी शाम ढलते ही घर को सब तरफ़ से माचिस की डिब्बी के समान बंद कर रजाइयों में दुबक जाते हैं.
हां, तो मैं कह रही थी जैसे ही बत्तियां बंद हुई हम तीनों ने टायटिल के पेपर्स अलग-अलग लिफ़ाफ़ों में डालकर हर एक घर में डाल दिए और स्वयं अपने घरों में चुपचाप आ कर सो गए.
सुबह रंगपंचमी के दिन जागे भी देर से. मोहल्ले में ख़ूब रौनक़ लगी हुई थी. हमारे पड़ोसी अंकल रंगे-पुते सिलसिला फिल्म का गीत है न- रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे… पर आंटी के हाथ में हाथ डाल नाच रहे थे.
तब हर त्योहार पर हिजड़े भी बख़्शीश लेने आया करते थे. वे भी अंकल-आंटी के साथ नाचने लगे, क्योंकि वे हिजड़े हर त्योहार पर आते थे, सो उनसे भी अपनापन था. सचमुच कितना रोमांचक था वह दृश्य और समय. हमारे बच्चे क्या जी पाएंगे ऐसे दिन कभी?


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जैसे ही मैं पुराने कपड़े पहन घर से बाहर निकली, होली की मस्ती में मस्त मेरे मित्रों ने घसीट कर मुझे गोद में उठाया और एक घर के सामने पानी की टंकी रखी होती थी (गायों के पानी पीने के लिए) उसमें ले जाकर पटक दिया. जब मैं बाहर निकलने की कोशिश करूं, तब वे मुझे फिर से उस टंकी में धकेल देते. तभी उन मित्रो में से एक बोली, “और बना टायटिल, मैं आदमखोर और तू क्या?..”
मैंने किसी भी तरह के टायटिल से बेख़बर होने का नाटक करते हुए कहा, “कैसे टायटिल? ये क्या कह रही है तू…”
“इसको पानी में डुबकी दे तो, ताकि इसकी याददाश्त लौट आए…”  दूसरी ने कहा और मुझे फिर से पानी में डुबकी दी.
“दरअसल, एक लड़की थी, जो बहुत ही लड़ाका स्वभाव की थी हमने उसका टायटिल नेम ‘आदमखोर’ रख दिया था…”
स्नेहा अपने बचपन की होली की घटना बताते हुए फोन पर ख़ूब ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाने लगी. उसने घटना इतने मज़ेदार लहज़े में सुनाई कि निहारिका भी हंसे बगैर न रह सकी.
“अच्छा चलो अब मैं रसोई में जाऊं मैंने आज खाने की तैयारी भी नहीं की है.” निहारिका ने उसे अपनी मसरूफ़ियत जताते हुए कहा.
“अरे, रुको पूरी बात तो सुनो. फिर जब शाम को सब नहा-धो लिए तब उस आदमखोर लड़की के माता-पिता हमारे घर शिकायत लेकर आए. मेरे पापा समझ गए थे कि सारी कारिस्तानी हमारी ही है, क्योंकि वह लड़की बार-बार कह रही थी कि अंकल हैंडराइटिंग चेक करिए स्नेहा की ही है. उस समय तो पापा ने उन्हें समझा-बुझा कर भेज दिया. किन्तु बाद में हम तीनों भाई-बहन की क्लास ली और समझाया कि त्योहार ख़ुशियों के लिए होते हैं. रूठों को मना लो, बिछुड़ों को मिला दो और किसी का दिल न दुखाओ…” स्नेहा ने अपनी बात पूरी की और रौब से कहा जा अब खाना बना.
इसी तरह के खट्टे-मीठे क़िस्से अक्सर वे दोनों याद किया करतीं.


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निहारिका भी उन दिनों को याद करने लगी थी, जब उसके पति का हैदराबाद से बैंगलुरू तबादला हुआ था. एक शाम बेटे को पार्क में खेलने के लिए छोड़ वे दोनों पड़ोस के सुपर मार्केट रत्नादीप में ग्राॅसरी लेने गए. ग्राॅसरी ख़रीद कर साथ में ही लगे आगरा स्वीट्स एंड नमकींस पर बेटी के लिए मूंग दाल हलवा लेने भी रुके. देखा गरमा-गरम समोसे आए थे. निहारिका ने स्नेहा से कहा, “चल न स्नेहा समोसे खाते हैं, बच्चों के लिए भी पैक करवा लेंगे.”
“पर मैं तो घर पर डिनर बनाकर आई हूं, अभी समोसे खा लिए तो रात के खाने के लिए किसी को भूख नहीं लगेगी.” स्नेहा ने अपनी बात बताई.
“छोड़ न डिनर को, एक दिन में क्या फ़र्क पड़ जाएगा? मेरे साथ फिर न जाने कब समोसे खाएगी. मेरा तो हैदराबाद वैसे ही छूटनेवाला है.” निहारिका ने उससे फिर समोसे खाने का आग्रह किया.
स्नेहा निहारिका के आग्रह को टाल न सकी और दोनों ने दो-दो गरमा-गरम समोसे खाए. सचमुच आज भी याद करो, तो वह स्वाद मुंह में जैसे अभी तक ज्यों का त्यों रखा हो. शायद वह साथ का स्वाद था समोसे का नहीं. जब साथी प्यारा और मनभावन हो, तो उसके साथ बिताया हर पल सदा याद रहता ही है.
एक दिन निहारिका बहुत ही लो फील कर रही थी, सो उसने स्नेहा को फोन किया, “घर में पतिदेव अनमने से रहते हैं स्नेहा, जब से ससुरजी का देहांत हुआ है वे अपनी मां के लिए चिंतित हैं. तुम तो जानती हो हमारे संयुक्त परिवार के तो तीन हिस्से हो चुके हैं. सास शुरू से ही दोनों बहुओं के साथ नहीं रहना चाहती थीं. अब मैं तो यहां हूं और देवर उन्हें साथ रखने को तैयार नहीं.” निहारिका ने सब्ज़ी काटते हुए स्नेहा को फोन पर बताया.
“मुझे तो उनसे मिले ही कई वर्ष हो गए. उन्होंने मुझ पर बहुत ही घटिया एवं भद्दे इल्ज़ाम लगाए थे और मेरे पति ने उन्हें कुछ भी कहा ही नहीं. तब से मैंने सास से दूरी बना ली थी. हालांकि मेरे पति मुझसे कुछ कहते नहीं, लेकिन मैं उन्हें समझती हूं कि वे मन ही मन घुट रहे हैं अपनी मां के लिए.” 
“पहले जब हम संयुक्त परिवार में रहते थे, तो घर में सास ख़ूब कलह-क्लेश किया करती थीं. देवर भी उनका पक्ष लेकर मुझसे ख़ूब झगड़ा करते, लेकिन तब मेरे पति और मुझ में प्यार था. हम कई बार साथ में रोया भी करते थे और यह सोचकर दुखी होते कि हमारी नई शादी को परिवार के सभी सदस्यों ने नर्क कर दिया था. ऐसा महसूस होता था कि जैसे हर दिन पूरा परिवार मिलकर हमारे ख़िलाफ़ षड्यंत्र रच रहा हो.” 
“अब वह सब समस्या तो ख़त्म हो गई, लेकिन आख़िर वे हैं तो माता-पिता, भाई-बहन ही न. मेरे ससुर अपने अंतिम क्षणों में बहुत दुख पाए. देवर ने उन्हें नौकरों के भरोसे छोड़ दिया, पर अपने घर में न ले गया. अब मेरे पति अपने सगे छोटे भाई से नाराज़ हैं, जबकि एक समय ऐसा था कि उसके लिए वे स्वयं मुझसे भी झगड़ पड़ते थे. कभी वही भाई अपने बड़े भाई को सब कुछ मानता था, वही अब दगा दे गया.”
“तुम उसे देवर की ग़लती क्यों मानती हो आख़िर तुम्हारे सास-ससुर ने स्वयं ही तो अकेले रहने का फ़ैसला किया था न निहारिका.”
“मेरे पति ने देवर को ख़ूब ज़ोर देकर कहा है कि अब मां को अपने साथ रखो, पर उसके पास तो हर दिन नए बहाने हैं.” निहारिका ने दुखी स्वर में कहा.


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“ससुरजी के बारहवें और अब पिछले महीने बरसी में तो सभी शामिल हुए ही थे. किन्तु इस ग्यारह माह के अंतराल में दोनों भाइयों में भी बोलचाल बंद ही रही है. परिवार तो जैसे बिखर ही गया. हमने ऐसा तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था.”
“बात तो दुख की ही है निहारिका, पर हम जो सोचते हैं, जो ख़्वाब बुनते हैं सभी साकार तो नहीं होते न.” शायद स्नेहा ऐसा कह निहारिका का दुख बांटना चाहती थी.
क़रीब एक हफ़्ते बाद स्नेहा ने निहारिका को फोन किया, “कैसी हो? अरे भाई दीपावली नज़दीक है. लंबे समय से कोरोना के चलते कहीं आना-जाना हुआ नहीं, ऐसा करो इस वर्ष तुम सपरिवार दीपावली पर हमारे यहां आ जाओ. बच्चों के लिए चेंज और तुम्हारा-हमारा मिलना हो जाएगा.”
“हमारा कुछ और प्लान है दीपावली के लिए स्नेहा.”
“अच्छा जी प्लान भी बन गया अभी से ही.” 
“इस बार हमने तय किया है कि दिवाली पूरे परिवार के साथ मनाएंगे.”
“मतलब, तुम अपनी सास के घर जा रही हो दिवाली पर या फिर मायके?” 
“नहीं, इस बार मेरे भाइयों और देवर के परिवार, मेरे माता-पिता और सास भी दीपावली पर हमारे यहां आ रहे हैं. सब के फ्लाइट के टिकट हमने बुक कर दिए हैं.”
“अरे ! अचानक से यह कैसे?”
“मैंने बहुत सोचा स्नेहा. सोचकर निष्कर्ष भी निकाला कि विवाहोपरांत भले ही हमें तकलीफ़ें आईं, किन्तु हम पति-पत्नी में आपसी प्यार और सम्मान था. मेरा मन भी शांत निर्मल पानी-सा स्वच्छ था. हम भाई-बहन तो बचपन में भी झगड़ते थे, किन्तु वह झगड़ा हम भूल भी तो जाते थे. फिर अब मन में गांठें क्यों?
कहीं जो ग़लतियां मेरी सास ने कीं, वही ग़लतियां मैं भी तो नहीं कर रही?”
“कैसे?”
“मेरे विवाहोपरांत मेरी सास का किसी से भी मिलना-जुलना नहीं था. बहुत ईगो रखा उन्होंने और अब मैं भी तो वही करने लगी हूं. मन में सबसे गांठ बांध ली है. मैं अपने पति को दुखी नहीं देख सकती और फिर हमारे बच्चे भी तो हम से ही सीखेंगे न रिश्ते-नातों का मोल. आज हम अपने रिश्तों से दूर हुए अपने-अपने परिवारों में व्यस्त हैं, कल ये दोनों भाई-बहन भी यही करेंगे तो? उफ्फ्फ़ ! मैं ये न होने दूंगी स्नेहा.
मुझे ही शुरुआत करनी होगी, इसीलिए मैंने फोन पर सभी से बात की है. उन्हें बुलाया है अपने घर पर. इस दिवाली पर दीप-करंजी-फुलझड़ियां सब कुछ साझा मेरे घर पर होगा. और हां, दिवाली पर सास यहां आएगी न, फिर वे मेरे ही पास रहेंगी. मैंने तय कर लिया है और उन्हें अपना फ़ैसला भी सुना दिया है.”
“तुम्हारे पति क्या बोले तुम्हारा फ़ैसला सुनकर?”
वे बोले, “अब तुम मेरे हर रंग में रंग गई हो और मुझे पूरा भरोसा है कि दीपशिखा बनकर घर को जगमग रखोगी निहारिका.”
स्नेहा, मेरा घर पुनः रौशनी से सराबोर एवं करंजियों की मिठास लिए भोर में चहकती चिड़ियों-सा चहचहा रहा है.”

Rochika Arun Sharma
रोचिका अरुण शर्मा



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अगले दिन, दिन चढ़ने पर रंगोली के रंग एक-दूसरे पर चढ़े हुए कुछ बदरंग से दिखे. दीयों से तेल सूख गया था. उनके किनारे कालिख-सी देख उसने दीये हटा दिए. सावधानी के बावजूद शाम तक रंगोली का पूर्व रूप वह कायम ना रख पाई.
दूसरे दिन अन्विका चली गई और सुदीप्ता घर आ गई. टॉम बॉय चहकती सुदीप्ता के आने से घर का कोना-कोना मुस्कुरा उठा. उत्सव के साथ हंसते-खिलखिलाते उसे देख लगा मानो घर में आज लक्ष्मी का प्रवेश हुआ है.

“भाभीजी, और कोई काम है, तो जल्दी बता दो. आज शाम को नहीं आऊंगी…” कामवाली बाई शन्नो के कहने पर अन्विका उसे डांटते हुई बोली, “आज दिवाली के दिन मदद की ज़रूरत है, तो तुम्हें जल्दी जाना है और शाम को भी छुट्टी ले रही हो…”
“हां तो, मैं त्योहार नहीं मनाऊंगी क्या?” शन्नो दो दिन के लिए आई मेहमान अन्विका के टोकने पर नाराज़ होकर बोली.
बीच-बचावकर उर्मिला ने शन्नो से कुछ और काम करवाकर भेज दिया, तो अन्विका चिढ़कर बोली, “आंटी, आपने इसे बहुत ढील दी है. अभी तो कॉरीडोर में दीये लगाने हैं, डेकोर भी चेंज करना है.”
“छोड़ो न अन्विका, वो सुबह आ गई, यही बहुत है, वरना त्योहार के दिन बिन बताए छुट्टी मारने का भी इनका रिवाज़ है. तुम चिंता मत करो, हम मिलकर कर लेंगे.”
उर्मिला ने अन्विका को समझाया, तो वेदांत ने परिहास किया, “उर्मिला, तुमने अन्विका से काम करवाने के लिए उसे पीजी (पेइंग गेस्ट) से यहां बुलाया है क्या?” यह सुनकर उर्मिला हंसते हुए बोली, “अरे, मैं कहां उसे कुछ करने को कह रही हूं? वो ख़ुद ही सुबह से काम में लगी हुई है. पीजी से इसे  बुलाया था कि त्योहार के दिन अपने घर को मिस न करे. यहां घर का फील मिले, पर इसने ख़ुद ही काम ओढ़ लिए, तो मैं क्या करूं?”
उर्मिला की स्नेहभरी उलाहना सुन फिरनी के लिए ड्राययफ्रूट्स काटती अन्विका बोली, “आंटी, घर जैसा फील लेने के लिए ही काम कर रही हूं. मम्मी होतीं, तो मेरा पूरा इस्तेमाल करतीं. डेकोरेशन से लेकर खाने तक मुझे ही लगना पड़ता. सच कहूं आंटी, ये सब करना मुझे अच्छा भी लगता है. दिवाली में परफेक्शन के साथ कुछ ख़ास करने में ही तो मज़ा है.”
यह सुनकर उर्मिला ने स्नेह से अन्विका के सिर पर हाथ फेरा. अन्विका उसकी प्रिय सहेली अनीता की बेटी है. अनीता आगरा में रहती है और उसकी बेटी अन्विका उर्मिला के शहर जयपुर में पीजी में रहकर एक फर्निशिंग हाउस में इंटीरियर डेकोरेशन कंसल्टेंट का काम कर रही है. इस बार एक बड़ा प्रोजेक्ट हाथ में था, इसलिए वह आगरा नहीं गई. ऐसे में उर्मिला ने उसे दिवाली अपने साथ मनाने का न्योता दिया और वह सहर्ष तैयार हो गई. उर्मिला के घर में उसे घर के सदस्य-सा मान मिलता है.
अन्विका को देख अक्सर उर्मिला के मुंह से निकलता काश! मेरी भी अन्विका जैसी एक बेटी होती. इसके प्रत्युत्तर में उसे यदाकदा सुनने को मिलता, बेटी नहीं है तो क्या हुआ… बहू को बेटी बनाकर बेटी का सुख भोगना… उसकी कल्पना में आनेवाली बहू के रूप में अन्विका फिट बैठने लगी.


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एक बार उर्मिला के घर में साधिकार अन्विका को कुछ काम करते देखकर उर्मिला की ननद ने कह दिया, “भाभी, जानी-पहचानी लड़की है. करियर के साथ घर के कामकाज में भी दक्ष है. क्यों नहीं इसे ही बहू बनाकर घर ले आती.” ननद की बात वह गंभीरता से लेती, उससे पहले ही बेटे ने सुदीप्ता को जीवनसंगिनी के रूप में अपनाने की पेशकश कर दी.
“उर्मिला, तुम आज सुदीप्ता को फोन कर लेना. वह भी अकेली है. उत्सव बता रहा था, इस बार वह अपने घर नहीं गई.”
वेदांत के कहने पर उर्मिला विचारों के घेरे से बाहर आई. उत्सव अपने पापा से कह रहा था, “पापा, अभी सुदीप्ता को फोन करने का फ़ायदा नहीं है. अभी तो चादर तान के सो रही होगी. 11 बजे के बाद मम्मी से बात करवा दूंगा.”
“इस बार तानकर सोने दे, अगली दिवाली में तुम्हारी मम्मी उसे सोने नहीं देगी. जैसे अन्विका को सुबह से काम में लगाया है, वैसे ही अगले साल सुदीप्ता जुटी होगी.” पिता-पुत्र के संवाद सुनकर उर्मिला का मन विषाद से भर गया. कितना चाव था अन्विका जैसी बहू घर आती, पर टॉम बॉय सुदीप्ता का चुनाव करके उत्सव ने सारे अरमानों पर पानी फेर दिया.
“आंटी, फिरनी और शाही पनीर टेस्ट करिए, बताइए कैसी बनी है?” अन्विका के टोकने पर उर्मिला ने गहरी अर्थपूर्ण नज़र वेदांत और उत्सव की ओर उठाई. उत्सव तो नहीं समझा, पर वेदांत उसकी नज़र में छिपे मंतव्य को भांपते हुए परिहास करते बोले, “वाह उर्मिला! तुम्हारे तो मज़े हैं. फिरनी और शाही पनीर अन्विका से बनवाकर उसे ख़ूब घर-सा माहौल दिया.”
वेदांत की बात पर अन्विका चहककर बोली, “अंकल, आंटी को कुछ मत कहिए. वाकई मुझे आज घर-सा फील मिल रहा है. आंटी, उत्सव से रंगोली कलर्स मंगवा दीजिए. मैं रंगोली बनाकर उसके आसपास दीये लगाऊंगी.” उसके उत्साह पर उर्मिला मुस्कुरा दी.
दोपहर 12 बजे के आसपास अन्विका रंगोली बनाने बैठी, तो उसे देखने उर्मिला भी पास में कुर्सी डालकर बैठ गई. रंगोली के चटख रंगों में डूबी वह उत्सव की आवाज़ पर चौंकी, “मम्मी, सुदीप्ता का फोन है. वह दिवाली की बधाई देना चाह रही है.” उत्सव के कहने पर उर्मिला ने “ओह! सुबह हो गई तुम्हारी सुदीप्ता की…” तंज कसते हुए अनमने भाव से फोन लिया.


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फोन के दूसरी तरफ़ से, “हैप्पी दिवाली.” कहती सुदीप्ता की चहकती आवाज़ पर कुछ ठंडेपन से उर्मिला ने कहा, “और बताओ, दिवाली में क्या ख़ास कर रही हो? मिठाई-रंगोली वगैरह बनाई या नहीं…”
यह सुनकर सुदीप्ता हड़बड़ाकर बोली, “मम्मीजी, रंगोली तो मुझे बनानी नहीं आती, मार्केट से रेडीमेडवाली लाई हूं, वही लगा दूंगी. कल मेड से ढेर सारी मिठाई बनवाई थी.”
“ढेर सारी क्यों…?” उर्मिला के पूछने पर वह उत्साह से बोली, “पार्टी है न आज घर में.”
“ओह! त्योहार के दिन पार्टी… फिर तो तुम्हें यहां आने का समय नहीं मिलेगा… ख़ैर आज त्योहार के दिन कुछ तो अपने हाथ से बनाओगी.” यह सुनकर वह, ‘हां, हां, बिल्कुल बनाऊंगी.’ बोलते हुए यकायक अटकी, फिर बोली, “दरअसल आज अपनी मेड को छुट्टी दी है. दिवाली है न… लेकिन मेरी मकान मालकिन आंटी किचन में मेरी मदद कर रही हैं…”
“क्या बन रहा है किचन में…?”
“आलू की जीरेवाली सब्ज़ी और हलवा अच्छा बना लेती हूं, इसलिए वह मेरे जिम्मे… छोले और पूरी आंटी बनाएंगी.”
सुदीप्ता से बात करके उर्मिला ने फोन उत्सव को पकड़ा दिया. उत्सव टहल-टहलकर मुस्कुराते हुए देर तक बात करता रहा. उर्मिला का मन सहसा वितृष्णा से भरकर रंगोली बनाती अन्विका पर टिका, तो डूबता मन रंगोली के चटख रंगों में यह सोचकर और डूब गया कि काश! उत्सव अन्विका के आगे-पीछे घूमता. काश! अन्विका घर में बहू बनकर आ जाती.
“हैप्पी दिवाली आंटीजी.” बड़ी अदा से अपनी रंगी हुई उंगलियों से रंगोली की ओर संकेत करती अन्विका बड़ी प्यारी लग रही थी. भावुक उर्मिला ने भावातिरेक में उसे गले से लगा लिया.
लंच के बाद अन्विका आराम करने अपने कमरे में चली गई, तो उत्सव बोला, “मम्मी, सुदीप्ता रात को आप सबको खाने पर बुलाना चाह रही थी, पर मैंने मना कर दिया, क्योंकि आज शाम को घर में पूजा होगी और खाना आप ट्रेडीशनल और स्पेशल बनाती हो.”
उत्सव की बात पर उर्मिला तल्ख़ लहज़े में बोली, “अच्छा किया, जो उसे मना कर दिया. अभी मेरे रहते ऐसे दिन नहीं आए हैं, जो शाही पनीर, पूरनपोली, दहीभल्ले, कचौरी, पुलाव, फिरनी जैसे पकवान छोड़कर जीरा-आलू व हलवा खाएं. उसका जीरा आलू व हलवा भई, तुम्हें मुबारक…”
मम्मी के मुंह से सुने रूखे शब्द और सख़्त लहज़े में सुदीप्ता के प्रति उनके मन की भावनाओं को भांपकर अवाक उत्सव संभलकर बोला, “मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि आप अभी भी सुदीप्ता को स्वीकार नहीं कर पाई हो…”


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यह सुनकर उर्मिला गंभीरता से बोली, “अब तुमने पूछ ही लिया है, तो त्योहार के दिन झूठ नहीं बोलूंगी. तेरी दोस्त के रूप में मन भले स्वीकारे, पर बहू के रूप में उसे मन स्वीकारे, ऐसा उसमें कुछ भी नहीं.” उर्मिला की दो टूक पर आहत उत्सव बोला, “तो एक सास के रूप में आपकी नज़रों में आदर्श बहू कौन है? ज़रा मैं भी सुनूं…”
“अब पूछ ही लिया है, तो सुन ले, हर सास ऐसी गुणी बहू पसंद करती है, जिसके होने से घर का कोना-कोना मुस्कुरा दे.”
यह सुनकर उत्सव चिढ़कर ‘मैं सुदीप्ता के पास जा रहा हूं.’ कहते हुए घर से निकल गया. वेदांत उर्मिला पर बरस पड़े.
“ये तुम ठीक नहीं कर रही हो, जो सच है उसे स्वीकारो. उत्सव सुदीप्ता को पसंद करता है, उससे शादी करना चाहता है, यही सच है.
सुदीप्ता को देखने का उसका अपना नज़रिया है. वह तुम्हारी नज़र से अपनी जीवनसंगिनी को नहीं देख सकता, इस सच को तुम नहीं स्वीकारोगी, तो दुख को आमंत्रण दोगी देख लेना…”
पति  की बातों से आहत उर्मिला बोली, “क्या करूं, मां हूं. अपने बेटे के ग़लत निर्णय पर उसे टोकना कैसे छोडूं.”
“तो ठीक है, जैसा मर्ज़ी है करो. अपनी बातों से बेटे को दुखी करो. शायद उससे ही तुम्हें तसल्ली मिले…”
दुखी मन से वेदांत भी चले गए, तो उर्मिला का मन भर आया. त्योहार के दिन पति-बेटे दोनों के मन को दुखा दिया.
रात को पूजा के समय तक उत्सव घर नहीं पहुंचा था. घर में पूजा हो गई. दीये भी लग गए, तो सहसा उर्मिला ने अन्विका को घर का ख़्याल रखने को कहकर वेदांत को सुदीप्ता के पीजी चलने को कहा.
सुदीप्ता से मिलकर वह उत्सव के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहती थी. वेदांत को पत्नी के इस सद्प्रयास पर संतुष्टि का अनुभव हुआ. पत्नी की पहल का स्वागत करते हुए वे अपनी होनेवाली बहू से मिलने उसके पीजी पहुंचे. घर के बाहर ही सुदीप्ता और उत्सव कुछ बच्चों के साथ पटाखे जलाते दिखे. उर्मिला और वेदांत को देखकर दोनों उत्साहित हो गए. सुदीप्ता उत्साह से उर्मिला के गले लग गई. जींस और साधारण टी-शर्ट पहनी सुदीप्ता को देख उर्मिला के मन-मस्तिष्क में एक बार फिर सजी-संवरी सलीकेदार अन्विका छा गई. शोरगुल करते बच्चों की ओर इशारा करती सुदीप्ता बोली, “पास की बस्ती से आए ये बच्चे आज हमारे मेहमान हैं.”
उत्सव-सुदीप्ता, वेदांत-उर्मिला को लेकर घर के भीतर आए, तो घर का हाल देख उर्मिला विस्मय में पड़ गई.
अस्त-व्यस्त घर में चारों ओर बिखरे सामान के साथ गिफ़्ट रैपर और जूठे बर्तन पड़े थे. घर को अजीब नज़रों से देखती उर्मिला को देख सुदीप्ता कुछ झेंप-सी गई.
बैठने के बाद वेदांत-उर्मिला ने नोटिस किया कि हर थोड़ी देर में घर की कॉलबेल बजती. मेहमान आते दिवाली की शुभकामना के साथ सुदीप्ता को  छोटे-बड़े पैकेट थमाते और वह उन्हें ‘थैंक्यू’ बोलती और फिर वो चले जाते. वेदांत-उर्मिला की आंखों में प्रश्‍न देखकर उत्सव ने बताया.


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“मम्मी इस बार सुदीप्ता ने एक मुहिम चलाई है, जिसका नाम है ‘आओ दीये जलाएं’. सुख-सुविधा से वंचित लोग दिवाली का त्योहार ख़ुशी-ख़ुशी मना पाएं, इसलिए लोगों से खिलौने, बर्तन, मिठाई, नए कपड़े और खाना इकट्ठे करके हम उन लोगों तक पहुंचा रहे हैं, जिनके लिए दीपावली का त्योहार मनाना एक सपना है.”
सुदीप्ता भी उत्साह से बोल पड़ी, “मम्मीजी, इस बार दिवाली कुछ ख़ास तरी़के से मनाने का मन किया, तो बस यही तरीक़ा सूझा. अभावग्रस्त लोगों के घर अचानक दीये, पटाखे व खाना लेकर पहुंचो, तो उनके चेहरों पर मुस्कान और ख़ुशी देखनेवाली होती है.”
“ये विचार अपने आप में लाना बहुत बड़ी बात है क्यों उर्मिला?…” वेदांत ने सुदीप्ता की सराहना करते हुए उर्मिला की ओर कुछ अच्छा सुनने की उम्मीद से देखा, पर वह चुप रही. अलबत्ता  सुदीप्ता ने बड़ी सरलता से कहा, “अंकल ये सब मैं अकेले नहीं कर पाती, अगर मुझे उत्सव, मेरी मकान मालकिन और कॉलोनी के बाकी लोगों का साथ नहीं मिलता. इस मुहिम की सफलता देखिए, अभी भी लोग इस उम्मीद से सामान ला रहे हैं कि हम उन्हें ज़रूरतमंदों तक पहुंचाएंगे.”
“तुम मुझे बताती, तो मैं भी कुछ ले आती…” उर्मिला के कहने पर वह भावुकता से बोली, “मम्मी, दिवाली के दिन घर छोड़कर आप मुझसे मिलने आईं, ये क्या कम है.”
पूरे उत्साह से वह उर्मिला को बता रही थी, “मम्मी, आज मेरा रियल टेस्ट हुआ. पूरे चार किलो आलू की जीरेवाली सब्ज़ी और तीन किलो आटे की पूरियां बनाईं और साथ में हलवा भी… पर हां, ये सब मैंने अकेले नहीं किया. आंटी, मतलब मेरी मकान मालकिन ने मेरी पूरी मदद की. मम्मी, मेरे हाथ का हलवा खाएंगी…?” जवाब सुने बगैर वह रसोई में चली गई.
उनके आने की ख़बर सुदीप्ता की मकान मालकिन को भी मिल गई थी, सो वो भी चाय, नमकीन और मिठाई लिए चली आईं. बातों-बातों में उन्होंने सुदीप्ता की तारीफ़ करते हुए कहा, “आज ऐसे बच्चे इस घर में मेहमान बनकर आए हैं, जिन्हें हम घर में घुसने नहीं देते, पर सुदीप्ता ने उन्हें खाना खिलाया, गेम खिलाए और तोह़फे दिए… सच बताऊं, तो मुझे भी त्योहार मनाने का ये निराला ढंग बहुत भाया.”
कुछ देर में सुदीप्ता अपने हाथ का बनाया हलवा  माइक्रोवेव में गर्म करके ले आई. जाने क्यों उसका स्वाद उर्मिला को प्रसाद-सा मालूम हुआ, जो हर हाल में स्वादिष्ट लगता है.
घर आए बस्ती के बच्चों की टोली को बहलाती, उनसे बात करती सुदीप्ता का थकान में डूबा पसीने से लथपथ चेहरा जाने क्यों उर्मिला को भला लगा.


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उत्सव उर्मिला को सफ़ाई दे रहा था, “मम्मी, आपको बुरा तो नहीं लगा, जो आज त्योहार के दिन यहां आ गया. मैं तो बस इससे मिलने आया था. यह आसपास की झुग्गी-झोपड़ी के ढेर सारे  बच्चों को बटोरकर खाना खिला रही थी. ढेर सारे गिफ़्ट बांटने के लिए रखे थे. मुझे लगा इसकी मदद कर दूं… तोह़फे बांटने निकल गए. फिर बच्चों के साथ दीये जलाए, तो समय का पता ही नहीं चला… तोह़फे देने का एक्सपीरिएंस तो अमेज़िंग था.
एक सफ़ाईकर्मी तो पटाखे-मिठाई देख रो ही पड़ा… मैंने हाथ जोड़कर कहा, “दादा छोटी-सी चीज़ है इतनी भावुकता क्यों?” यह सुनकर वो बोले, “भइया, चीज़ें छोटी-बड़ी कौन देख रहा है. मैं तो आज देनेवाले के भाव पर बेमोल बिक गया.”
इधर-उधर की बातचीत के बीच सुदीप्ता लाए हुए गिफ़्ट एक बड़े थैले में समेटती रही. फिर उत्सव के पास आकर उसकी आंखों में बड़े प्यार से झांककर बोली, “तुम अब घर जाओ. आंटीजी के साथ बाकी सामान मैं पहुंचा आऊंगी और हां, बिना तुम्हारी मदद के मैं आज कुछ न कर पाती… थैंक्यू…”
प्रत्युत्तर में उत्सव मुस्कुरा दिया. उन दोनों के बीच की केमेस्ट्री देख वेदांत ने उर्मिला की ओर गहरी नज़र से देखा.
उर्मिला, वेदांत व उत्सव घर के लिए निकल चुके थे. आसपास बजते पटाखे और रोशनी की रौनक़ के बीच उत्सव के सुनाए ‘आओ दीये जलाएं’ मुहिम के भावुक अनुभव सुनते-सुनते कब घर आया, पता ही नहीं चला.
घर में अन्विका रंगोली के पास रखे दीयों में मनोयोग से तेल डालती दिखी.
अगले दिन, दिन चढ़ने पर रंगोली के रंग एक-दूसरे पर चढ़े हुए कुछ बदरंग से दिखे. दीयों से तेल सूख गया था. उनके किनारे कालिख-सी देख उसने दीये हटा दिए. सावधानी के बावजूद शाम तक रंगोली का पूर्व रूप वह कायम ना रख पाई.
दूसरे दिन अन्विका चली गई और सुदीप्ता घर आ गई. टॉम बॉय चहकती सुदीप्ता के आने से घर का कोना-कोना मुस्कुरा उठा. उत्सव के साथ हंसते-खिलखिलाते उसे देख लगा मानो घर में आज लक्ष्मी का प्रवेश हुआ है.
बनाव-सिंगार न होने के बावजूद सुदीप्ता के दीप्त चेहरे की कोमलता और सहज मुस्कान आज जाने क्यों उर्मिला का ध्यान कुछ ऐसे खींच रही थी जैसे वह उसे पहली बार देख रही हो. उसे अपने भीतर कुछ बदला-बदला-सा लगा, तो वह समझ गई कि सुदीप्ता वही है, बस उसे देखने-परखने का नज़रिया बदल चुका है.

 

Meenu Tripathi
   मीनू त्रिपाठी

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चित्रकारों के सामने समस्या यह थी कि एक आंख न होने पर चित्र सुन्दर नहीं लगेगा और ग़ुस्से में राजा उन्हें मृत्यु दण्ड भी दे सकते हैं.
और यदि दोनों आंख बनाते हैं, तो ग़लत चित्र होने के कारण वे दण्डित कर सकते हैं.

प्राचीन काल की बात है. एक राजा जिसकी एक आंख कानी थी उसे अपना एक अच्छा-सा चित्र बनवाने की इच्छा हुई. उसने राज्य के चित्रकारों को आमंत्रित किया. चित्रकारों के सामने समस्या यह थी कि एक आंख न होने पर चित्र सुन्दर नहीं लगेगा और ग़ुस्से में राजा उन्हें मृत्यु दण्ड भी दे सकते हैं.
और यदि दोनों आंख बनाते हैं, तो ग़लत चित्र होने के कारण वे दण्डित कर सकते हैं, इसलिए वह चित्र बनाने में आनाकानी करने लगे.


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कुछ समय पश्चात दूर शहर से एक चित्रकार आया और उसने राजा का चित्र बनाने की घोषणा की.
चित्रकार ने अपने चित्र में राजा को एक धनुर्धर के रूप में दिखाया. दिखाया कि राजा घोड़े पर सवार है और दूर कहीं निशाना साध रहे हैं. और निशाना साधने के कारण उनकी एक आंख (कानी आंख) बंद दिखाई.
राजा ने प्रसन्न होकर चित्रकार को बड़ा सा पारितोषिक दिया.
निष्कर्ष यह हुआ कि हर समस्या का हल होता है, घबराने से बेहतर है उसका हल तलाशा जाए.

Usha Wadhwa
उषा वधवा


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आप हर वक़्त मुझे मेरे फर्ज़ और कर्तव्य की याद दिलाते रहे, लेकिन कभी यह जानने की ज़रूरत नहीं समझी कि मुझे क्या चाहिए, किस बात से मुझे ख़ुशी मिलती है. छोटी-छोटी ग़लतियों पर “दिमाग़ तो है नहीं,” “कुछ करने का ढंग नहीं है,”… जैसे ताने सुनकर मेरा भी दिल तार-तार हो जाता है. क्या कभी आपने महसूस किया?

कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था. विश्वनाथजी को यक़ीन नहीं हो रहा था कि जिस गुड़िया जैसी बेटी को उन्होंने नाजों से पाला, आज वही उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ अंर्तजातीय विवाह करने की बात कह रही है. वह अपने प्यार-दुलार, पालन-पोषण, संस्कार, उसके फज़ूल के नखरे उठाने की दुहाई देते रहे, लेकिन नेहा का साफ़-साफ़ कहना था, “इसलिए तो पापा, मैं उसी लड़के से शादी करना चाहती हूं, जो मुझे जानता है. आपकी तरह प्यार करता है. मेरे नखरे उठाता है. पापा प्लीज़…”
विश्वनाथजी को अपने सीधे-सादे, आज्ञाकारी बेटे पर पूरा विश्वास था. नेहा तो बचपन से ही ज़िदी थी. वह किसी की न तो सुनती थी, न समझती थी. विश्वनाथजी आशाभरी नज़रों से बेटे की तरफ़ देखे, शायद उनका बुद्धिमान और आज्ञाकारी बेटा नेहा को समाज की ऊंच-नीच समझा सके. लेकिन बेटे ने जब मुंह खोला, तो विश्वनाथजी सकते में आ गए. बेटे का कहना था, “नेहा ठीक ही तो कह रही है पापा. नेहा और अमर एक-दूसरे को प्यार करते हैं. वे दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हैं. एक-दूसरे के लिए मान-सम्मान की भावना है तथा दोनों एक-दूसरे के लिए महत्वपूर्ण हैं. सबसे बड़ी बात दोनों एक-दूसरे की अच्छाइयों के साथ-साथ बुराइयों को भी स्वीकार करते हुए साथ रहने का फ़ैसला ले रहे है. और यही उनके ख़ुशहाल जीवन की मज़बूत नींव का आधार है. दो अजनबी जब विवाह बंधन में बंधते हैं, तो उनकी आधी ज़िंदगी एक-दूसरे को समझने में ही लग जाती है. अगर विचार न मिले, तो पूरी ज़िंदगी समझौता करते ही बीतती है. और अगर धैर्य का अभाव हो, फिर तो ज़िंदगी लड़ते-झगड़ते, एक-दूसरे को इग्नोर करते और अपमानित करते ही बीतती है और इस तरह वे ख़ुश नहीं रह पाते.”
विश्वनाथजी का सिर घूमने लगा. वह अपनी पत्नी की तरफ़ मुखातिब होकर बोले, “देख रही हो अपनी औलादों को. हमने इनकी परवरिश में क्या कमी रखी, जो आज ये ऐसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं. हमारी भी तो अरेंज मैरेज हुई है. क्या मैंने तुम्हें और तुम्हारी भावनाओँ को नहीं समझा? तुम्हें इज्ज़त व मान-सम्मान नहीं दिया?क्या तुम मेरे साथ ख़ुश नही हो?”


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सरोजिनी ने बहुत उदास व भेदपूर्ण नज़रों से विश्वनाथजी की तरफ़ देखा और कंपकंपाते लबों से हिम्मत जुटाकर बोली, “ख़ुश… ख़ुश तो मैं हूं, लेकिन आपकी ख़ुशी के साथ, आपने जो चाहा उसमें मैं साथ दी, तब तो ख़ुशियां हैं, लेकिन मैं कभी किसी बात का विरोध की, तो न तो आप कभी मेरी बात सुने, न माने और न कभी महत्व दिया. आप हर वक़्त मुझे मेरे फर्ज़ और कर्तव्य की याद दिलाते रहे, लेकिन कभी यह जानने की ज़रूरत नहीं समझी कि मुझे क्या चाहिए, किस बात से मुझे ख़ुशी मिलती है. छोटी-छोटी ग़लतियों पर “दिमाग़ तो है नहीं,” “कुछ करने का ढंग नहीं है,”… जैसे ताने सुनकर मेरा भी दिल तार-तार हो जाता है. क्या कभी आपने महसूस किया? कभी आपको यह लगा कि मेरे पास भी एक दिल है, जिसे बुरा लगता है और जो नि:स्वार्थ प्यार ढूंढ़ता है, जो मेरी अच्छाइयों के साथ-साथ मेरी बुराइयों को भी हंसते-हंसते स्वीकार करे.
कम-से-कम नेहा के साथ तो ऐसा नहीं होगा. ज़िंदगी उसके लिए सिकुड़ी, सिमटी, सहमी-सहमी सी नहीं, बल्कि खुले आसमान की तरह होगी. ज़िंदगी उसके लिए ज़िंदगी होगी…
प्यार, अपनापन, मान-सम्मान और ज़िंदादिली से भरी हुई ज़िंदगी… उसको समझनेवाला, उसकी कदर करनेवाला उसका हमसफ़र उसका पति होगा.”
सरोजिनी की सांसें फूलने लगी. गला रूंध गया. रूंधे गले से वे बोलीं, “मैं नेहा के साथ हूं…” कहते-कहते वह फफक पड़ीं.
विश्वनाथजी आसमान से गिरे, तो खजूर पर भी नहीं अटके सीधे धरा पर धराशायी हो गए. उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि सीधी-सादी दिखनेवाली पत्नी के अंदर इतना व्यथित हृदय और इतना आक्रोश उनके प्रति होगा. उन्हें महसूस हुआ कि जैसा वो सोचते हैं, वही सही नहीं है. कहीं-न-कहीं कुछ ग़लत है, तभी तो इतना बड़ा इंकलाब उनके घर आया है.
विश्वनाथजी की दूरदर्शिता ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि इस इंकलाब (परिवर्तन) की आंधी के सामने अगर वह तनकर खड़े होते हैं, तो सब कुछ बिखर जाएगा. हवा के रूख के साथ चलने से ही ज़िंदगी आगे बढ़ सकती है.
उन्होंने पत्नी को प्यार से अपने पास बिठाते हुए बोला, “अब तक तुम मेरे लिए गए फ़ैसलों को सिर झुकाकर मानती आई हो, आज मैं तुम्हारे फ़ैसले के आगे नत-मस्तक हूं.”
“पापा, आप कितने अच्छे हैं.” कहते हुए दोनों बच्चे अपने पापा से लिपट गए.

रत्ना श्रीवास्तव


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उस पहाड़ी नज़र ने उसके इश्क़िया अंदाज़ को भांप लिया और उस चाय बेचनेवाले युवक से उसको संदेश भिजवाया और वो युवक मस्ती में जाकर उसके कानों में फुसफुसाया.
“पलकें भी नहीं झपका रहे हो ये कैसे देख रहे हो मुझे…”
“हां, क्या…” वो चौंक ही पड़ा, पर उससे पहले युवक ने उसके ठंड से कंपकंपाते हुए हाथों पर गरमागरम चाय थमा दी.


“कोई घर अपनी अद्भुत सजावट ख़राब होने से नहीं, बल्कि अपने गिने-चुने सदस्यों के दूर चले जाने से खाली होता है.” मां उसको फोन करती रहीं और एहसास दिलाती रहीं कि वो घर से निकला है, तो घर खाली-खाली सा हो गया है.
“मां, अब मैं बीस साल का हूं. आपने कहा कि दस दिन का अवकाश है, तो दुनिया को समझो. अब वही तो कर रहा हूं. ओह, मेरी मम्मा! आप ही तो कहती हो कोई भी जीवन यूं ही तो ख़ास नहीं होता, उसको संवारना पड़ता है.”
“ठीक है बेटा, तुम अपने दिल की करो, मगर मां को मत भूल जाना.”
“मां, मैं पिछले बीस साल से सिर्फ़ आपकी ही बात मानता आया हूं. आप जो कहती हो, वही करता हूं ना मां…”
“मैने कब कहा कि हमेशा अच्छी बातें करो, पर हां मन ही मन यह मनोकामना ज़रूर की.” मां ने और ढेर सारा प्यार उडे़लते हुए कहा.
वो अब मां को ख़ूब भावुक करता रहा तब तक जब तक कि मां की किटी का समय नहीं हो गया.
जब मां ने ख़ुद ही गुडबाय कहा, तब जाकर चैन पाया उसने. बस, कुछ घंटों मे वो भवाली पहुंचनेवाला था. अभी बस रामपुर पहुंची थी. किला दूर से दिखाई दे रहा था. कितनी चहल-पहल और रौनक़ थी रामपुर में. उसने बाहर झांक कर बार- बार देखा. बहुत ही मज़ेदार नज़ारे थे.
एक किशोरी नींबू पानी बेच रही थी. उसने भी ख़रीदा और गटागट पी गया. अब बस फिर चल पड़ी थी.
इस बार वो अपनी मर्ज़ी से बस में ही आया था. मां ने बीस हज़ार रुपए उसके खाते में डाले थे कि टैक्सी कर लेना, पर वो टैक्सी से जान-बूझकर नहीं गया. दरअसल, वो सफ़र के पल-पल का आनंद लेना चाहता था.
नींबू पानी पीकर उसे मीठी-सी झपकी आ गई और रामपुर के बाद पंतनगर, टांडा का घनघोर जंगल.
रूद्रपुर, बिलासपुर, काठगोदाम, कब पार किया उसे ख़बर ही नहीं लगी.
भवाली… भवाली… का शोर सुनकर उसकी आंख खुली. आहा! तो अब वो भवाली आ गया था.
वो पहली बार किसी पहाड़ी यात्रा पर गया था. जब उसने झक्क सफ़ेद बर्फ़ से संवरे ऊंचे- ऊंचे पहाड़ देखे, तो अपलक निहारता ही रह गया. वो जी भरकर इस सुंदरता को पी लेना चाहता था.
उधर एक युवती रेडीमेड नाश्ता बेच रही थी.

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उस पहाड़ी नज़र ने उसके इश्क़िया अंदाज़ को भांप लिया और उस चाय बेचनेवाले युवक से उसको संदेश भिजवाया और वो युवक मस्ती में जाकर उसके कानों में फुसफुसाया.
“पलकें भी नहीं झपका रहे हो ये कैसे देख रहे हो मुझे…”
“हां, क्या…” वो चौंक ही पड़ा, पर उससे पहले युवक ने उसके ठंड से कंपकंपाते हुए हाथों पर गरमागरम चाय थमा दी.
उसने चाय सुड़कते हुई उस युवक की आवाज़ को फिर याद किया और अभी-अभी कहे गए शब्द दोहराए, तो पहाड़ी युवती के सुर को उसके दिल ने भी सुन और समझ लिया.
पहले तो उसको कुछ संकोच सा हुआ और मन ही मन उसने सोचा, ‘अभी इस ज़मीन पर पैर रखे हुए दस मिनट ही हुए है इतनी जल्दी भी ठीक नहीं.’
मगर अगले ही सेकंड उसको याद आया कि बस दस दिन हैं उसके पास. अब अगर वो हर बात और हर मौक़ा टालता ही जाएगा, तो कुछ तज़ुर्बा होगा कैसै?
इसलिए वो एक संतुलन बनाता हुआ नज़रें हटाए बगैर ही बुदबुदाया. “बचपन में मैंने निजी जीवन के अनुभव से एक बात सीखी थी कि फोटो लेते समय शरीर के किसी अंग को हरकत नहीं करनी है. सांस भी रोक कर रखनी है. अब मेरी जो आंखें हैं वो अपनी सांस रोककर मेरे दिल में बना रही हैं तुम्हारा स्कैच.” उसकी यह बात वहां उसी युवक ने जस की तस पहुंचा दी.
उसके आसपासवाले एक स्थानीय लड़के ने भी यह सब सुना और उसको मंद-मंद मुस्कुराता देखकर पहाड़ी युवती शर्म से लाल हो गई. इस रूहानी इश्क़ को महसूस कर वहां की बर्फ़ भी ज़रा-सी पिघल गई और पास बह रही पहाड़ी नदी के पानी में मिल गई. पर दस मिनट बाद व्यवहारिकता के धरातल पर भी उन दोनों की गपशप हो ही गई. वो युवती टूरिस्ट गाइड थी. चार घंटे के तीन सौ रुपए मेहनताना लेती थी.
‘वाह! क्या सचमुच’ उसने मन ही मन सोचा. मगर आगे सचमुच बहुत सुविधा हो गई. उसी युवती ने वाज़िब दामों पर एक गेस्ट हाउस दिलवा दिया और अगले दिन नैनीताल पूरा घुमा लाई. नैनीताल में एक साधारण भोजनालय में खाना और चाय-नाश्ता दोनों ने साथ-साथ ही किया. तीस रुपए बस का किराया और दिनभर खाना, चाय, चना जोर गरम.. सब मिलाकर पांच सौ रुपए भी पूरे ख़र्च नहीं हुए थे. कमाल हो गया. यह युवती तो उसके लिए चमत्कार थी. दिनभर में वो समझ गया था कि बहुत समझदार भी थी. वो लोग शाम को वापस भवाली लौट आए थे. कितनी ऊर्जा थी उसमें. वो मन ही मन उसकी तारीफ़ करता रहा.
एकाध बार उसके चेहरे पर कुछ अजीब-सी उदासी देखकर वो बोली थी, “ये लो अनारदाना. मुंह में रखो और सेहत बनाओ.” उसने अनारदाना चखा सचमुच बहुत ही ज़ायकेदार था.
वो कहने लगी, “सुनो, जो निराश हो गई है. वह अगर तुम्हारी आत्मा है, तो किसी भी उपाय से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. पहाड़-समंदर घूमने से, संगीत-कला-साहित्य से भी बस थोडा फ़र्क़ पड़ेगा. और वह भी कुछ देर के लिए. निराशा की बैचेनी, तो बस उदासी तोड़कर जीने से दूर होती है. अपने मूड के ख़िलाफ़ बग़ावत करने से दूर होती है. हर माहौल में आंखों से आंखे मिलाकर खड़े रहने से दूर होती है.
शान से, असली इंसान की तरह जीने के मज़े लूटने हैं, तो जागरूक हो जाओ. अपने भीतर जितना भी जीवन है, वो औरों को बांटते चलो. फिर देखो कितना अनुकूल असर होता है.”
और अपनी बात पूरी करके उसने छह घंटे के पूरे पैसे उसको थमा दिए.
वो युवती उससे उम्र मेंं कुछ बड़ी थी.
आगे रानीखेत, अल्मोड़ा आदि की बस यात्रा उसने अच्छी तरह समझा दी थी. उसने कुछ भी ठीक से नहीं सुना यही सोचकर कि वो युवती भी साथ तो चलेगी ही. मगर वो हर जगह अकेला ही गया. उसके बाद वो चार दिन उसको बिल्कुल नज़र नहीं आई. अब कुल चार दिन और बचे थे उसने पिथौरागढ़ घूमने का कार्यक्रम बनाया और युवती साथ हो ली.
उसको उस युवती में कुछ ख़ास नज़र आया. सबसे कमाल की बात तो यह थी कि मां के दिए हुए रुपए काफ़ी बच गए थे या यूं कहें उसमें से बहुत-सी राशि वैसे के वैसी ही पड़ी थी.
उसने चीड और देवदार की सूखी लकड़ी से बनी कुछ कलाकृतियां ख़रीद लीं और वहां पर शॉल की फैक्ट्री से मां, उनकी कुछ सखियां
और अपने मित्रों के लिए शॉल, मफलर , टोपियां पसंद कर ख़रीद लीं.
दो दिन बाद वो दोनों पिथौरागढ़ से वापस आ गए. यात्रा बहुत रोमांचक रही और सुकूनदायक भी. वो उससे कुछ कहना चाहता था, पर वो हमेशा ही उलझी हुई मिलती थी.
मन की बात कहने का अवसर अपने बेकरार दिल के सामने बेकार कर देना समय की नहीं, भावनात्मक स्तर पर व्यक्ति की हार है. वो यही सोच रहा था, पर कुछ नहीं कर पा रहा था. अब एक दिन और बचा था. उसने आसपास के इलाके ज्योलीकोट और दो गांव घूमने का निश्चय किया. वो यह सब नक्शे पर देख ही रहा था कि वो युवती उसके पास भागी-भागी चली आई. हांफते हुए वो बोली, “ज़रा-सा अभिनय कर दो ना.”
“क्या? पर क्यों?” वो चौक पड़ा.
“अरे, सुनो बस बस… वैसे ही जो तुमने पिथौरागढ़ के रिजार्ट में किया था. तुम कह रहे थे ना कि तुम बहुत अच्छी आवाज़ भी निकाल लेते हो.”
“ये क्या कह रही हो. मैं अभिनय और अभी.. ये सब क्या.. ओह, तुम्हारी इसी अदा पर तो फ़िदा हूं मैं.”
“तुम बस मस्त-मगन रहते हो और फालतू कुछ सोचने में समय ख़राब नहीं करते. चलो.. चलो.. शुरू हो जाओ ना.”
“हां, हां.. ठीक है. अभी करता हूं.”
“मगर वो.. वो नहीं.. ये सुनो…” वो बोलती गई.
“सुनो, बस तो अभी यहां एक लफंगा आएगा. उसको कह देना कि तुम फिल्म डायरेक्टर हो और अब मैं तुम्हारी अगली हीरोइन.”
“पर मैं तो अभी बस बीस बीस साल का हूं?” कहकर वो टालने लगा.
“हां, हां.. उससे कुछ नहीं होता. बस, इतना कर दो. ये पुराना आशिक़ है मेरा, मगर तंग कर रहा है. इसे ज़रा बता दो कि तुम मुझे कितना चाहते हो. फिर मुझे तसल्ली से सगाई करनी है. वो देखो, वो बस चालक.. वो उधर देखो, वही जो हम को पिथौरागढ़ अपनी बस में लेकर गया और वापस भी लाया…”
वो बोलती जा रही थी और उसका दिमाग़ चकरघिन्नी बना जा रहा था.
वो अचानक गहरे सदमे में आ गया, पर उसकी बात मान ली और उम्दा अभिनय किया. युवती ने दूर से सारा तमाशा देखा और
उंगली का इशारा भी करती रही.
वो उसी समय बैग लेकर दिल्ली की तरफ़ जाती हुई एक बस में चढ़ा और पलट कर भी नहीं देखा. उसको लगा कि उसके दिल में गहरे घाव हो गए हैं और बहुत सारा नमक अपने किसी घाव में लगा दिया है.

Poonam

पूनम पांडे


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पक्षी को देख कर साफ़ लग रहा था कि उसने उड़कर जान बचाने की कोशिश नही की थी. यह देखकर सभी को बहुत आश्चर्य हुआ.
एक लड़के ने जब उस पक्षी को हटाया, तो उसके नीचे से तीन चूजे दिखाई दिए, जो जीवित थे. बच्चों को बचाने के लिए उसने उन्हें अपने पंखों के नीचे छुपा लिया था.

गांव के सरकारी स्कूल में संस्कृत की क्लास चल रही थी. गुरुजी दिवाली की छुट्टियों का काम बता रहे थे.
तभी किसी शरारती विद्यार्थी के पटाखे से स्कूल के स्टोर रूम में पड़ी दरी और कपड़ो में आग लग गई. देखते ही देखते आग ने भीषण रूप ले लिया. वहां रखा सारा फर्नीचर भी जल कर राख गया.
सारे छात्र पास के घरों से, हैंडपंपों से, जो भी बर्तन हाथ में आया, उसी में पानी भर-भरकर आग बुझाने लगे.
आग बुझने के काफ़ी देर बाद जब स्टोर रूम के अंदर कुछ लोग गए, तो उनकी नज़र स्टोर रूम की छज्जी पर गई. वहां एक पक्षी जल कर कोयला हो गया था.
पक्षी को देख कर साफ़ लग रहा था कि उसने उड़कर जान बचाने की कोशिश नही की थी. यह देखकर सभी को बहुत आश्चर्य हुआ.
एक लड़के ने जब उस पक्षी को हटाया, तो उसके नीचे से तीन चूजे दिखाई दिए, जो जीवित थे. बच्चों को बचाने के लिए उसने उन्हें अपने पंखों के नीचे छुपा लिया था.
एक छात्र ने संस्कृतवाले गुरुजी से पूछा, “गुरुजी, इस पक्षी को अपने बच्चों से कितना मोह था कि इसने उन्हें बचाने के लिए अपनी जान तक दे दी?”


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गुरुजी ने कहा, “बेटा, यह मोह नहीं, मां का प्रेम है. मोह करनेवाला इस विकट परिस्थिति में अपनी जान बचा कर भाग जाता. बेटा, प्रेम और मोह में ज़मीन आसामान का फ़र्क है.
मोह में स्वार्थ निहित होता है और प्रेम में त्याग होता है. भगवान ने मां को प्रेम की मूर्ति बनाया है और इस दुनिया में मां के प्रेम से बढ़कर कुछ और नहीं है. मां के उपकारों से हम कभी भी उपकृत नहीं हो सकते.”

वीरेंद्र बहादुर सिंह

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