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क्या हुआ जो उसे नित्येंद्र सर पसंद आने लगे हैं, क्या हुआ जो उनको देखना, उनको सुनना, उनके निकट रहना उसे अच्छा लगता है. ये कोई पाप तो नहीं. वैसे भी ऐसा करके वह अपने पूर्व पति की तरह किसी के साथ धोखा तो नहीं कर रही है. यह बस एक खेल है, जिसे खेलना उसे अच्छा लग रहा है और न खेलना उसके बस में भी नहीं.

वैसे तो विधि को शेयर्ड कैब में बैठना बिल्कुल पसंद नहीं था, कहा करती थी ‘मुझे नहीं पसंद किसी ऐरे-ग़ैरे के कंधे मुझे छुएं.’ मगर आज जल्दबाज़ी में पर्स में एक्स्ट्रा कैश रखना भूल गई, तो शेयर्ड कैब लेना उसकी मजबूरी हो चली थी. बड़े उखड़े मूड से कैब का दरवाज़ा खोला, लेकिन फिर जो हुआ, उसे तो ईश्‍वरीय योजना ही कहा जाएगा. वह जो पहले से कैब की पिछली सीट पर बैठा था, जिसके परफ्यूम से पूरी कैब महक रही थी, जिसने विधि को पहले कुछ पल ठहरी हुई नज़रों से देखा और फिर थोड़ा सरककर बैठ गया. पता नहीं क्यों उसकी बाजू छू जाने से विधि को थोड़ा भी बुरा नहीं लगा था.
वो पहली नज़र कुछ तो कमाल कर गई थी उसके भीतर. ऐसा होता है कभी-कभी दो अपरिचितों में, पहली ही नज़र में एक कनेक्शन-सा बन जाता है. दिल से दिल का तार जुड़ जाता है, कभी कुछ देर के लिए, तो कभी जन्म-जन्मांतर के लिए. विधि पूरे रास्ते बड़ा संभलकर बैठी रही, तन से भी और मन से भी. नज़रें
इधर-उधर डोलकर वापस उसी अपरिचित की टोह में लग जातीं, जिसके
ज़रा-सा छू जाने भर से वह अजीब-सी सिहरन से भर रही थी.
“भइया, ज़रा अगले मोड़ पर बैंक के सामने रोकना प्लीज़.” ‘आह! यह भारी और मीठी आवाज़’ विधि के कानों में कैसा अमृत-सा घोल गई. वह अपरिचित कैब से उतर गया. उतरकर दरवाज़ा बंद करते हुए फिर वही कयामत की नज़र, जो विधि की बड़ी-बड़ी आंखों के रास्ते उसके दिल को भेदकर चली गई.

कैब के चलते ही विधि ने गहरी सांस भरी. ये क्या हुआ है आज उसे? माना उसके पीजी कॉलेज का पहला दिन है, तो क्या उसकी वही तीन साल पुरानी कॉलेज लाइफ भी लौट आई है? किसी आकर्षक पुरुष को देखनेभर से अंदर कुछ हलचल हो जाना, कुछ सोया-सा जाग जाना… यह क्यों हुआ, उसे ख़ुद समझ नहीं आ रहा था.
ख़ैर, वह देहरादून के आरवी कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट के मेनगेट पर उतरी और पूछते-पाछते अपने सेक्शन में जाकर बैठ गई. आधी से ज़्यादा क्लास खाली थी, स़िर्फ एक कोने में 6-7 लड़कियों का ग्रुप चुहलबाज़ियां कर रहा था, जिसके कुछ कतरे उड़कर उस तक पहुंच रहे थे. ‘क्या बात कर रही हो…’ ‘सच्ची…’ ‘किसने बताया…’ ‘पक्की खबर…’ ‘अरे एकदम पक्की,’ ‘नताशा दी ने बताया, अरे वही, सेकंड ईयर बी सेक्शन की सीनियर. वो बेचारी भी बेहद उदास लग रही थी. क्यों ना हो, उसने तो ख़ूब दाने डाले थे, मगर भुने नहीं… हा-हा-हा…,’ ‘सच्ची, आज तो ना जाने कितनों के दिल टूटकर बिखरे होंगे, इस दिल के टुकड़े हज़ार हुए, कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा. हा-हा-हा…’ फिर खिलखिलाती हास्य ध्वनियां. “हाय! आपसे इस बेवफ़ाई की उम्मीद न थी, चुपके-चुपके एंगेजमेंट कर आए. हमने तो सुना था, आजीवन ब्रह्मचारी रहने का अटल इरादा किए बैठे हैं, तभी तो प्रपोज़ल नहीं भिजवाया था, वरना मम्मी-पापा तो आए दिन पूछते हैं, कोई हो तो बता दो, वरना हम देखना शुरू कर देते हैं.” एक लड़की अपने फोन को निहारते बोली. शायद उसी हीरो की फोटो खोल रखी थी, जिसकी ये सभी दीवानी बनी बैठी थीं.


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विधि को यह सब सुनकर बड़ा ग़ुस्सा आया, ‘क्या नॉनसेंस मचा रखी है क्लास में. यहां पढ़ने आती हैं या यही सब करने.’ विधि ख़ुद को उन लड़कियों से मैच्योर समझ रही थी. समझती भी क्यों ना, बीए के बाद तीन साल का ब्रेक ना लिया होता, तो आज इन सबकी सीनियर होती. सोचा था आज पहले दिन थोड़ा जल्दी पहुंच किसी क्लासमेट से बात कर छूटा पोर्शन समझ लेगी. महीनेभर लेट एडमिशन जो लिया था उसने, मगर ये सब तो न जाने किस कन्हैया की गोपियां बनी बैठी हैं. वैसे कौन है ऐसा, जिसने सभी लड़कियों पर सामूहिक रूप से जादू चलाया हुआ है? जानने की उत्कंठा तो विधि ने भी महसूस की.
कुछ मिनटों में क्लास भर गई. चुहलबाज़ियां अभी भी जारी थीं, ‘आएंगे कि नहीं, कहीं डेट पर तो नहीं निकल लिए अपनी वुड बी के साथ.’ ‘हाय ये ना कहो यानी आज आई टॉनिक से भी जाएंगे. कोई फ़ायदा नहीं हुआ आज आने का.’ ‘आ गए, आ गए, शऽऽ…’ एक ख़ामोश चुप्पी और फिर ‘गुड मॉर्निंग सऽऽर’ का मधुर गान प्रस्तुत हुआ.
“गुड मॉर्निंग, गुड मॉर्निंग!”
विधि के कान लड़कियों की बातों से हटकर ख़ुद-ब-ख़ुद उस गुड मॉर्निंग की तरफ़ खिंच चले. वही कैबवाली मीठी आवाज़. ओ माय गॉड! चेहरा भी वही यानी बंदा भी वही. फिर एक सिहरन से उसका पूरा शरीर झनझना गया. पहले वह चौंकी और फिर एक मीठी-सी हंसी भीतर-ही-भीतर फूट पड़ी. लगा जैसे वह भी उन्हीं लड़कियों के समूह में से एक हो चली थी. काश! टाइम से एडमिशन ले लिया होता, एक हसीं ख़्याल ने उसे गुदगुदा दिया और फिर दूसरा ख़्याल- ओह! इन्हीं महाशय की हाल ही में एंगेजमेंट हुई है, जिसका शोक सारी लड़कियां मना रही हैं यानी ये जादू स़िर्फ मुझ पर नहीं चला था, बंदे की पर्सनैलिटी ही ऐसी है, कितनों को घायल किए बैठा है.
ये थे फाइन आर्ट लेक्चरर नित्येंद्र शर्मा, जो दिखने में किसी फिल्मी हीरो से कम न थे, भले ही वह हीरो 70-80 के दशक का ही क्यों न हो. बड़ा मनमोहक सौम्य व्यक्तित्व, साफ़ रंग, लंबा कद, हल्के घुंघराले बाल और हर पल मुस्कुराती मासूम-सी आंखें. सोने पे सुहागा ये कि ये लेक्चरर बैचलर भी थे, तभी तो एमए फस्ट ईयर की लड़कियों के दिल इनको देखकर धड़क रहे थे.
नित्येंद्र शर्मा ने आते ही अटेंडेंस ली. एक नया नाम जो आज ही रजिस्टर में जुड़ा था, पुकारा गया श्रीमती विधि मिश्रा, तो उन्होंने नज़र उठाकर ‘प्ऱेजेंट सर’ कहनेवाली लड़की को देखा. उस पल जैसे व़क्त रुक चला था. थोड़ी देर की स्तब्धता के बाद हड़बड़ाहट में रजिस्टर बंद किया और पढ़ाने के लिए उठे ही थे कि ‘कॉन्ग्रैच्युलेशन सर’ की बारिशें शुरू हो गईं.
“अरे भई किसलिए?”
“हमें पता चला है सर कि आपकी एंगेजमेंट हो गई है. हम आपको बचकर नहीं जाने देंगे. हमें पार्टी चाहिए. कम-से-कम मिठाई तो बनती ही है.” क्लास की सबसे चंचल नवयौवना इठलाकर बोली. नित्येंद्र शर्मा वापस हड़बड़ा गए और सकुचाती-सी नज़रें श्रीमती विधि मिश्रा के भावविहीन चेहरे का मुआयना कर आईं. उतरा चेहरा बता रहा था कि वहां शायद हालात से समझौता हो चुका था.
ख़ैर, आज पोट्रेट मेकिंग क्लास भी नित्येंद्र शर्मा के ज़िम्मे थी. सब छात्राएं
अपने-अपने काम में व्यस्त थीं. यूं ही
घूमते-घामते विधि के पास पहुंच गए और सकुचाते से पूछ बैठे, “विधिजी आपका नाम ग़लती से श्रीमती विधि लिखा गया या…?”
“जी सर, वही नाम है.” जवाब देते हुए विधि की नज़रें नीची रहीं और उसके ब्रश थामे हाथ कैनवास पर खेलते रहे.
“ओह! बस यूं ही पूछा, क्योंकि आपको देखकर लगता तो नहीं…” जैसे ही विधि ने नित्येंद्र सर को नज़र उठाकर देखा, तो उन्हें लगा कि वे रंगे हाथों पकड़े गए. सच आकर्षण की अपनी तरंगें होती हैं, जिन्हें कितना भी कैद कर लो, दूसरे तक पहुंच ही जाती हैं. वे वहां से निकल लिए और किसी दूसरे स्टूडेंट का कैनवास देखकर कुछ समझाने लगे, मगर विधि साफ़-साफ़ महसूस कर रही थी कि सर की एक नज़र अभी भी उसी पर जमी है.
दो महीने नज़रों के इसी खेल में निकल गए. एक को ‘श्रीमती’ के लेबल ने आगे नहीं बढ़ने दिया, दूसरी ओर ‘जस्ट एंगेज्ड’ का ‘नो गो’ बोर्ड टंगा था. मगर नित्येंद्र सर की चाल-ढाल और रंगत बदल चुकी थी. विधि के सामने कुछ असहज हो जाते थे. व्यवहार में एक संकोच-सा फूट पड़ता था. उड़ती चिड़िया के पर गिनने का दावा करनेवाली कुछ तेज़तर्रार लड़कियों ने यह संकोच भांप लिया था, मगर ‘श्रीमती’ के टैग ने विधि को ‘बेनीफिट ऑफ डाउट’ दे रखा था.
इस नए शहर की नई पेइंग गेस्ट विधि के बाक़ी दिन तो कॉलेज के सहारे कट जाते थे, मगर वीकेंड उसे काट खाने को दौड़ता. हर व़क्त एक अजीब-सी बेचैनी से घिरी रहती थी, इसीलिए सोचा मसूरी में हो रही एक आर्ट वर्कशॉप ही कर ली जाए और वह शुक्रवार शाम को ही देहरादून से मसूरी के लिए निकल पड़ी. मसूरी का घंटेभर का ही रास्ता था. होटल में चेकइन कर एक सनसेट व्यू पर लगी बेंच पर जाकर बैठ गई.


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वहां मौसम कुछ ख़ास खुला हुआ नहीं था. ढलते सूरज की बादलों से लुकाछिपी चल रही थी. कुछ देर पहले हुई हल्की बारिश के बाद बादल फिर बरसने को तैयार बैठे थे. ठीक उसके मन की तरह. सोचा था इन ख़ूबसूरत फ़िज़ाओं में आकर उसे अच्छा लगेगा, मगर हुआ ठीक उल्टा. ना जाने क्यों दिल घनघोर उदासी से भर गया. भीतर सवाल उठ रहे थे. ‘क्यों बैठी है यहां, क्या ज़रूरत थी यहां आने की? किससे भाग रही है, ख़ुद से या नित्येंद्र सर से? और क्या भागना संभव है, क्योंकि जिसकी यह ख़ुराफ़ात है, वह तो हर पल उसके साथ चल रहा है. उसका अपना मन जो आजकल कुछ ऐसा चाहने लगा है, जो हो ही नहीं सकता.
सामने बिखरा यह अनुपम सौंदर्य उसके अकेलेपन के एहसास को और कुरेद रहा था. नित्येंद्र सर की याद, जो शहर के शोरगुल में कुछ दब-सी जाती थी, यहां इस एकांत में इतनी प्रबल, इतनी मुखर हो उठी थी, जैसे कोई ठीक सिर के ऊपर हथौड़ा मार रहा हो. वह उन्हें इतनी बुरी तरह मिस कर सकती है, यह रहस्य अभी-अभी उसके सामने खुला, जब यूं ही बैठे-बैठे आंखों से कुछ आंसू लुढ़ककर गालों को भिगो गए. वह उन्हें बेरहमी से पोंछकर आंख बंदकर बेंच की बैक पर सिर टिकाकर बैठ गई. बाहर के दृश्य से बंद आंखों के भीतर चल रहे दृश्य उसे ज़्यादा सुकून देने लगे. हंसते-मुस्कुराते नित्येंद्र सर, धीमे से विधिजी कहते नित्येंद्र सर, उसके पोट्रेट को करेक्ट करने के बहाने बेहद पास आते नित्येंद्र सर, सबकी नज़रें बचाकर उसे कनखियों से देखते नित्येंद्र सर… विधि जैसे किसी अंतहीन चलचित्र को देख रही थी.
कभी-कभी वाक़ई कोई दर्द दुआ की तरह कुबूल हो जाता है, सच्चे आंसू असर कर जाते हैं, तभी तो वह हो गया, जो विधि की कल्पनाओं से भी परे था. अगली सुबह वर्कशॉप में नित्येंद्र सर मौजूद थे, क्योंकि वर्कशॉप उन्हीं की थी. उन्हें देखकर विधि का मन किया कि भागकर लिपट जाए उनसे और लड़ पड़े, बता नहीं सकते थे, आपकी ही वर्कशॉप है, कितना दर्द झेल रही थी कल शाम से, मगर आपको क्या?
आज सर फॉर्मल की जगह हल्के आसमानी टी-शर्ट और डेनिम जींस में ग़ज़ब ढा रहे थे. एक इंस्ट्रक्टर की तरह नहीं, बल्कि टीममेट की तरह सबसे
घुलमिल रहे थे. विधि ने एक नज़र ख़ुद पर डाली, ‘ओह! कितनी लापरवाही से चली आई यहां, पुराना सूट, पुरानी चप्पल, बाल भी बेतरतीब से लिपटे हुए, चेहरे पर भी बारह बजे हैं.’ विधि ख़ुद ही भीड़ में छिपने लगी, मगर कितना छिप सकती थी भला? सर ख़ुद उसके पास आ गए और कहने लगे, “आपको यहां देखकर ख़ुशी हुई विधिजी, काफ़ी पैशनेट हैं आप कला के लिए.” विधि कुछ न कह सकी. मैंने कल ही प्रतिभागियों के नाम की लिस्ट देखी थी. उसमें आपका नाम देखकर सोचा कि पूछ लूं, अगर साथ चलना चाहें तो, मगर मेरे पास आपका नंबर नहीं था.”
विधि एक सांस में झट से अपना फोन नंबर बोल गई और फिर ख़ुद ही झेंप गई. उसे ऐसे देख सर मुस्कुरा उठे. आज नित्येंद्र सर कुछ अलग ही अंदाज़ में थे. बहुत खुले हुए से लग रहे थे. उनकी कही हर एक बात विधि ऐसे मनोयोग से सुन रही थी जैसे कोई रामभक्त रामायण का पाठ सुनता है. फिर मॉडल पोट्रेटिंग की शुरुआत हुई. सर ने एक बड़ी ख़ूबसूरत लड़की को मॉडल बनने के लिए बुलाया, तो वह बड़ी चहकते हुए आ गई. इधर सर उसके चेहरे और बालों को सही पोज़ दे रहे थे, उधर विधि की ईर्ष्या बाहर फूटने को तैयार बैठी थी. तभी उसकी नज़र नित्येंद्र सर की एंगेजमेंट रिंग पर गई. ये क्या बेवकूफ़ी कर रही है वह, सब कुछ जानते हुए भी. सर एंगेज्ड हैं और वह श्रीमती. फिर क्यों उन पर इतना अधिकार-सा महसूस होता है. किसने दिया ये अधिकार? किसी ने नहीं, तो फिर ये जलन, ये पज़ेसिवनेस. एक बार टूटकर मन नहीं भरा, जो दोबारा टूटकर बिखरने को तैयार बैठी है, मगर क्या करे, दिल है किमानता नहीं.
लंच ब्रेक पर नित्येंद्र सर ख़ुद ही विधि के
पास आकर बैठ गए, “तो विधिजी कैसा लग रहा है यहां आकर?”
‘बहुत ही बढ़िया, इससे बेहतर तो कुछ हो ही नहीं सकता था. आप, मैं और ये ख़ुशगवार मौसम…’ दिल में तो बहुत कुछ उबल रहा था, मगर मुंह से इतना ही निकला, “गुड सर, बहुत-सी नई चीज़ें सीखने को मिल रही हैं, जो सिलेबस में कवर नहीं होतीं.”
“हां वो तो है. तुम्हें बुरा न लगे, तो एक बात पूछूं?” सर प्लेट में चम्मच घुमाते हुए बोले, “आप देहरादून में अकेले रहकर पढ़ रही हैं, आपके पति कहीं बाहर जॉब पर हैं क्या? ये कोर्स तो हर शहर में होता है?”
आज उसकी दुखती रग छू दी गई थी, वो भी उसके द्वारा, जिससे वह उम्मीद नहीं कर रही थी. उसकी गंभीर चुप्पी देखकर सर ने बात पलटी, “बताना कोई ज़रूरी नहीं, यूं ही पूछ लिया था, आप खाइए आराम से.” मगर अब विधि के गले से कौर नीचे नहीं उतर रहा था. एक ख़्याली महल जैसे भरभरा गया था, “हां वो बाहर रहते हैं इसीलिए…” कुछ हकलाते से धीमे शब्द निकले, “वैसे आपकी शादी कब है सर, कोई डेट फिक्स हुई?”
“शादी… डेट… कुछ फिक्स नहीं हुई अभी.” पलटवार सुन नित्येंद्र सर भी हड़बड़ा गए.
“लड़की तो फिक्स है ना, जिससे शादी होनी है?” विधि ने सवालिया नज़रों से देखा, तो वे, “मुझे देर हो रही है.” कहकर फ़टाफ़ट उठकर भाग खड़े हुए.
पूरा दिन यूं ही गुज़रकर शाम में और शाम सुबह में तब्दील हो गई. आज विधि एक्साइटमेंट में समय से पहले ही पहुंच गई, मगर सर अपने समय पर ही आए. आज उन्होंने पहले सभी को पेंसिल स्केच की टास्क दी, टॉपिक था- परित्यक्ता. डिस्क्रिप्शन बताए गए थे एक नवयौवना जिसकी उदास आंखें ईश्‍वर से जैसे पूछ रही हैं, मेरे साथ ही क्यों…? उस का रूठा शृंगार, टूटा मन, अकेलापन… स्केच में नज़र आना चाहिए. इस टास्क के लिए ज़्यादातर को बस सीता मैया ही परफेक्ट मॉडल नज़र आईर्ं और उसी छवि को स्केच में उतार दिया गया… जंगल में बैठी विरहणी स्त्री का अश्रुरंजित चेहरा, वेदना से झुका सिर. “अरे बाप रे! कितनी कॉमन सोच है आप सबकी… कोई नवीनता नहीं… सबके सब जैसे कॉपी पेस्ट लग रहे हैं…” तभी एक स्केच देखकर सर ठिठक गए. “ये किसने बनाया है, नख-शिख शृंगार धारण किए नाचती-उछलती, उत्साह से भरी खिलखिलाती लड़की, लगता है टास्क ठीक से नहीं सुना था.”


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“सुना था सर.” विधि ने गंभीरता से जवाब दिया.
“तो फिर… परित्यक्ता का मतलब जानती हो, जिसका साथी उसे छोड़ दे, क्या वह ऐसी होती है?”
“क्यों नहीं हो सकती है सर, यह उसकी अपनी चॉइस है, चाहे तो वो बाक़ी स्केच की तरह अपनी क़िस्मत को कोसते हुए आंसू बहाए या मेरे स्केच की तरह एक ज़बर्दस्ती का बंधन टूटने का सेलीब्रेशन मनाए, नाचे-गाए और अपने जीवन की एक नई शुरूआत करे.”
विधि की आंखों की भावभंगिमा देख नित्येंद्र सर को लगा जैसे उनके सामने कोई वीर रस में पगी कविता खड़ी हो… ‘ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो, श्रीमती विधि मिश्रा थी…’ बाक़ी सभी वर्कशॉप से निकल रहे थे, मगर विधि को नित्येंद्र सर ने रोक लिया. उस एक स्केच ने शायद कहीं एक उम्मीद का दीया टिमटिमा दिया था, “विधिजी, ये हिंदुस्तान है. यहां परित्यक्ता की वही परिभाषा है, जो बा़क़ी लोगों ने बनाई है. उसी इमेज पर नंबर मिलेंगे आपके क्रांतिकारी विचार एग्ज़ाम में नहीं चलेंगे. वहां मत बनाइएगा, ज़ीरो मिलेगा.”
“मिलेगा तो मिले सर, कुछ मार्क्स के लिए मैं अपनी सोच नहीं बदलूंगी.”
“अच्छा तो बताइए, क्या आपने समाज में ऐसी कोई लड़की देखी है, जो छोड़ेे जाने के बाद दुखी होने की बजाय आपके स्केच की तरह झूम उठे.”
“जी हां जानती हूं और आप भी जानते हैं, क्योंकि वह मैं ही हूं.”
“क्या मतलब?”
“मतलब ये कि मेरे पति ने फैमिली प्रेशर में मुझसे शादी तो कर ली, लेकिन ज़्यादा देर तक ये प्रेशर झेल नहीं पाए और महीनेभर के अंदर ही मुझे छोड़ अपनी प्रेमिका के साथ भाग गए. मैंने बजाय रोने-धोने के, अपनी क़िस्मत और घरवालों को दोष देने के जीवन की नई शुरुआत की और यहां इस नए शहर, नए कॉलेज में पढ़ाई पूरी करने चली आई. कुछ समय में हमारा क़ानूनी रूप से अलगाव हो जाएगा, फिर मेरे नाम के आगे लगा ये श्रीमती का पुछल्ला भी हमेशा के लिए हट जाएगा. स्केच में वो कोई और नहीं मैं ही हूं सर.” कहते हुए ना जाने क्यों विधि की आंखें भर आईर्ं. एक बोझ जो दिल पर लेकर घूम रही थी, यकायक उतर गया.
क्या हुआ जो उसे नित्येंद्र सर पसंद आने लगे हैं, क्या हुआ जो उनको देखना, उनको सुनना, उनके निकट रहना उसे अच्छा लगता है. ये कोई पाप तो नहीं. वैसे भी ऐसा करके वह अपने पूर्व पति की तरह किसी के साथ धोखा तो नहीं कर रही है. यह बस एक खेल है, जिसे खेलना उसे अच्छा लग रहा है और न खेलना उसके बस में भी नहीं. मगर नित्येंद्र सर ऐसा क्यों कर रहे हैं, उनकी सगाई हो चुकी है. वे तो किसी के लिए प्रतिबद्ध हैं, क्या उनका इस खेल में शामिल होना धोखा नहीं? पाप नहीं?
पलभर के लिए विधि को जैसे सामने बैठे उस आकर्षक चेहरे से वितृष्णा हो उठी. देखा तो सर बैठे हुए अपने हाथों से रिंग उतार रहे थे. उंगली की वो जगह लाल हुई पड़ी थी, “ओह! बड़ी अनकंफर्टेबल है ये. मैं इसे और नहीं पहन सकता.”
“ये तो आपकी एंगेजमेंट रिंग है ना सर?”
“एंगेजमेंट रिंग… किसने कहा कि मेरी एंगेजमेंट हुई है?”
“सभी लड़कियां कह रही थीं.”
“क्या कह रही थीं?”
“कह रही थीं कि…” जो कुछ कह रही थीं, वह बताना विधि के लिए संभव नहीं था, तो वह मुस्कुराकर रह गई.
“आप तो कॉलेज में नई हैं और समझदार भी, इसलिए आपको बता रहा हूं, पर प्लीज़ किसी से कहना मत.”
“क्या सर?” समझदारवाले कॉम्प्लीमेंट पर विधि थोड़ा इतरा गई.
“मेरी कोई एंगेजमेंट नहीं हुई. पता नहीं किसने अफ़वाह फैला दी. हां, इतना ज़रूर है कि मैंने इस अफ़वाह का खंडन नहीं किया.”
“क्यों सर?”
“ताकि इस कॉलेज में शांति से पढ़ा सकूं, वरना मुझे रोज़ मेरी बाइक में छिपाकर रखे गए लव लेटर प्राप्त होते थे. चार महीने पहले न जाने किसने मेरा फोन नंबर सार्वजनिक कर दिया था, तो शादी के प्रपोज़ल आने लगे थे. तो जैसे लड़कियां शादी के बाद मांग भरकर और मंगलसूत्र पहनकर सबको बता देती हैं ना कि आई एम बुक्ड, अब मेरी तरफ़ देखना भी नहीं, इसी तरह मैंने सोचा क्यों न मैं भी एक फेक रिंग पहनकर कॉलेज की छात्राओं की ऐसी मेहरबानियों से बच जाऊं.”
“तो कुछ फ़ायदा हुआ सर?” विधि शरारत से बोली.
“फ़ायदे का तो पता नहीं, मगर नुक़सान होता दिख रहा था, इसलिए आज उतार दी.” कहते हुए जिस नज़र से नित्येंद्र सर ने विधि को देखा, उसका रोम-रोम झनझना उठा.
“पहन लीजिए सर, कुछ अफ़वाहें बनी रहें, इसी में बेहतरी होती है.” कहते हुए विधि ने नित्येंद्र सर के हाथों से रिंग लेकर उन्हें दोबारा पहना दी. नज़रों का खेल, जो उस कैब में शुरू हुआ था, अभी पूरा तो नहीं हुआ था, मगर उसके विजेता दोनों ही खिलाड़ी थे.

Deepti Mittal
दीप्ति मित्तल

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“अरे हां अम्मा, संभालकर लगाई थीं. दोनों सिरों को अटकाया था चिमटी से, पर चिमटी ही बकवास थी. अब उनमें शर्ट संभालने की नीयत ही न हो, तो कोई क्या करे.”
आरती के मुंह से यह सुनकर नरेंद्र की हंसी छूट गई. समझदार अम्मा ने उस पर भी लापरवाही से कपड़े फैलाने की तोहमत लगाई होगी, तभी उसने चिमटियों का मानवीकरण कर दिया.
भला हुआ जो आज इतवार के दिन पत्नी की मदद कराने की गरज से उन्होंने कपड़े नहीं फैलाए, वरना सारा दोषारोपण उन पर ही होता.

‘‘अरे सुनो, सुबह तुम्हारी नीलीवाली शर्ट धोकर फैलाई थी, तुमने उतारी है क्या?” आरती के कहने पर नरेंद्र ने अख़बार से सिर उठाया और धीमे से ‘ना’ में सिर हिलाकर वापस अख़बार में डूब गए. पतिदेव की ना से व्यथित वह चिहुंककर बोली, “हाय राम! लगता है हवा में तुम्हारी शर्ट उड़ गई.”
“क्या बात करती हो?” अख़बार वहीं फेंककर नरेंद्र अपनी प्रिय नीली शर्ट को देखने बालकनी में आए. आरती बालकनी से झांकती हुई बोली, “बड़ी बेकार चिमटियां लाए हो. पता है कितने कपड़े उड़ चुके हैं इन मरदूद चिमटियों की वजह से.”
‘जाऊं क्या नीचे, मिलेगी क्या शर्ट? वैसे मुश्किल ही है मिलना?’ सरीखे ख़ुद से किए सवाल-जवाब के साथ चिमटियों को कोसती वह तीसरी मंज़िल से नीचे उतरी.
नरेंद्र चिंता से नीचे झांककर इधर-उधर नज़र दौड़ाकर अपनी पसंदीदा कमीज़ को देखने लगे. क़रीब दस मिनट बाद आरती आई, तो नरेंद्र ने पूछा, “क्या हुआ,
मिली क्या?”
“नहीं मिली, हवा चल रही है सो जाने कहां उड़ गई होगी?”
“हवा इतनी भी तेज़ नहीं थी कि कमीज़ चिमटियों की पकड़ से छूट जाए.”
“अरे, काहे की पकड़, बड़ी बेकार निकली ये चिमटियां.”
“बेकार होनी तो नहीं चाहिए. होम सिटीज़ की चीज़ें तो एक-से-एक नायाब होती हैं.”
“महंगी और सुंदर चीज़ें हमेशा अच्छी निकलें, ये क्या जरूरी है?” आरती हल्का-सा झुंझलाई.
फिर मायूसी से बोली, “कभी-कभी छोटी दुकानों से ली गई चीज़ ज़्यादा टिकाऊ और बढ़िया निकलती है. बड़े मॉल से लेने का प्रलोभन हमें भारी पड़ गया. तीन कपड़े अब तक उड़ चुके हैं.”
आरती का चिमटी पुराण बहुत देर तक चलता, पर भला हो सासू मां के फोन का, जिसने उन्हें बचा लिया.
“हेलो” के साथ “अरे, अब क्या बताऊं?” कहकर एक लंबी सांस के पश्‍चात आरती द्वारा कुछ देर पहले उड़ी शर्ट का सारा दोष पतिदेव पर ही थोपा गया. चिमटियों के अदूरदर्शी ख़रीददार पर संपूर्ण घटना का दारोमदार नरेंद्र पर डालते हुए ख़ुद की वेदना-संवेदना मां के साथ सहजभाव से साझा की जाने लगीं.
“अब क्या बताऊं अम्मा, इनको गली-बाज़ार की दुकानें तो सुहाती नहीं हैं. भला बताओ मॉल से चिमटियां उठा लाए. बस, दिखने में ही ख़ास थीं. सब-की-सब बेकार निकलीं. आज मंजूषा दीदी की दी हुई शर्ट उड़ गई. पिछले हफ़्ते मेरा दुपट्टा और उससे पहले…” लब्बोलुआब यह कि अपनी अम्मा के सामने पतिदेव की ख़रीददारी की समझ की धज्जियां जमकर उड़ाई गईं.
कुछ देर अख़बार के पन्ने उलटने-पलटने के बाद नरेंद्र वहां से उठकर बालकनी में चले आए. जानते थे कि अब घंटेभर की फुर्सत हो गई. मां-बेटी अपने मन की एक-एक बात जब तक कह-सुन न लेंगी, तब तक उनके दिल को सुकून न पहुंचेगा.
बालकनी में गमले में लगे दो-चार पौधों की सूखी पत्तियां निकालकर पानी देकर क़रीब 10 मिनट बाद आए तो भी वही टॉपिक छिड़ा पड़ा था.
“अरे हां अम्मा, संभालकर लगाई थीं. दोनों सिरों को अटकाया था चिमटी से, पर चिमटी ही बकवास थी. अब उनमें शर्ट संभालने की नीयत ही न हो, तो कोई क्या करे.”


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आरती के मुंह से यह सुनकर नरेंद्र की हंसी छूट गई. समझदार अम्मा ने उस पर भी लापरवाही से कपड़े फैलाने की तोहमत लगाई होगी, तभी उसने चिमटियों का मानवीकरण कर दिया.
भला हुआ जो आज इतवार के दिन पत्नी की मदद कराने की गरज से उन्होंने कपड़े नहीं फैलाए, वरना सारा दोषारोपण उन पर ही होता.
आधा घंटा बीत चुका था. वह अभी भी धीमे-धीमे अम्मा से बतिया रही थी. हल्की खुसफुस में चिमटियों का कोई ज़िक्र नहीं था. एकाध बार मोनिका भाभी का नाम सुनकर लगा कि विषय परिवर्तन हो चुका है. 45-50 मिनट बाद आरती ने फोन रखा और वहीं गुमसुम सी बैठ गई.
“क्या हुआ, सब ठीक तो है न?”
नरेंद्र के पूछने पर वह बुझे मन से बोली, “अम्मा की क़िस्मत भी कैसी है, इस उम्र में भी पूरे घर की ज़िम्मेदारी ओढ़े हैं.”
“क्या हुआ? बेटे-बहू व पोती के होते अब क्यों उलझाती हैं ख़ुद को गृहस्थी में.”
“70 साल की उम्र में कोई ख़ुद को गृहस्थी में ख़ुशी से झोंकता है क्या?”
“तो अपने बेटे-बहू से कहें.”
“बहू से कहकर घर की कलह मोल लें क्या? और रही बात बेटे की, तो उसी का मुंह देखकर वह काम में जुटी रहती हैं. गिरीश भइया भी सब समझते हैं. सुबह जितना होता है, काम करवाकर जाते हैं. शाम को अम्मा के काम में हाथ बंटाते हैं, पर हमेशा ऐसे कैसे चलेगा? मोनिका भाभी ने तो भइया को ग़ुलाम बना लिया है.”
“ये ग़लत बात है आरती. मोनिका भाभी भी तो दफ़्तर जाती हैं.”
“तो क्या भइया नहीं जाते? रेवती को छोड़कर इन्हें पसंद किया. अम्मा की क़िस्मत में बहू का सुख नहीं लिखा.”
आरती की बात का नरेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया. वह भलीभांति समझते थे कि रेवती की ननद न बन पाने की कसक उसके ताऊजी के बेटे की शादी में जाकर बढ़ गई है.
नरेंद्र के ताऊजी के बेटे की शादी में रेवती को देख अम्मा और आरती दोनों चौंक पड़ी थीं. नरेंद्र तब तक नहीं जानते थे कि रेवती भाभी का रिश्ता आरती के भाई के लिए आया था.
“अरे सुन, ये तो वही है न जिसे हम देखने गए थे. पटपड़गंजवाली…” अम्मा ने आरती से पूछा, तो वह भी विस्मय से भर गई.
“हां मां, है तो रेवती ही, पर ये यहां कैसे? इनसे पूछती हूं.” नरेंद्र से पूछने पर पता चला कि रेवती उनके ताऊजी के साले की बहू है.
“हाय नरेंद्र, इसे हम गिरीश भइया के लिए देखने गए थे. मंदिर में दिखाया गया था- बिल्कुल झल्ली-सी दिखती थी. अब देखो, बहुत बदल गई है.”
रेवती ने भी आरती और अम्मा को पहचान लिया था, पर उनकी उपस्थिति में सहज रहते हुए अतीत से दूरी बनाए रखी.
इसके विपरीत आरती और अम्माजी पूरी शादी में उसे देखकर आहें भरती रहीं. लेडीज़ संगीत पर वह खुलकर नृत्य करती हुई किसी फिल्म की चंचल हसीना से कम नहीं लगी. शादी के कामकाज में उसकी फुर्ती और सुघड़ता देखकर आरती और अम्माजी को महसूस हुआ कि उन्होंने नायाब हीरा पत्थर समझकर गंवा दिया.
उस व़क्त तो ‘आरती, अम्मा को समझाओ तुम. रेवती बिलकुल सीधी-सादी सी है. मेरे साथ नहीं चल पाएगी’ गिरीश भइया ने आरती से मनुहार की और वह अपने बड़े भाई के पक्ष में खड़ी हो गई.
“अम्मा, गिरीश भइया कितने हैंडसम हैं.


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मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हैं. इनके साथ के सभी दोस्तों की शादी नौकरीपेशा लड़कियों से हुई है. तुम एकदम घरेलू बहू ले आओगी… कुछ तो आजकल की मॉडर्न लड़कियोंवाली बात हो…”
आरती के कहने पर मां के ‘घर-परिवार जाना-बूझा है’ सरीखे तर्क कमज़ोर पड़ गए.
फिर कुछ और रिश्ते आए सभी में कुछ-न-कुछ ख़ामियां दिखीं, सो बात न बन सकी. उसी दौरान गिरीश भइया ने अपने एक दोस्त की शादी में मोनिका को देखा था.
रंग-रूप अतिसाधारण होते हुए भी भइया मोनिका पर लट्टू हो गए. सभी ने इसे शादी का योग-संजोग मानकर भइया के लिए मोनिका को स्वीकार कर लिया.
दो लोगों की तनख़्वाह आएगी, तो घर चलेगा नहीं दौड़ेगा. यार-दोस्तों ने भी यही पट्टी पढ़ाई और वाकई भइया दौड़ते ही रहे.
मोनिका का बैंक बैलेंस उसके मायकेवाले संभालते रहे, जबकि भइया अकेले लोन तले दबे सबको ज़ाहिर करते रहे कि सुख सुविधाभरे जीवन की वस्तुएं जुटाने में मोनिका का बराबर का योगदान है. घर के कामों में वह अनाड़ी थी और अनाड़ी ही बनी रही. ऑफिस जाने से पहले वह ऐसी हड़बड़ी और हाय-तौबा मचाती कि चाय का कप तक उसके हाथों में पकड़ाने में भलाई दिखती.
शाम को जब घर आती, तो थकी-हारी वह बिस्तर में पस्त पड़ जाती. खाने के लिए डायनिंग टेबल पर बुलाना भी गुनाह लगता. नौकरी न चल रही हो, तो छोड़ दो, इस बात पर वह नारी अस्तित्व के झंडे तले खड़ी हो कहती, “क्या मैं सब्ज़ियां काटने, रोटियां पकाने में जीवन खपाऊं? क्या इसी दिन के लिए मुझे मां-बाप ने पढ़ाया है.” उसके बिखरते अस्तित्व को संभालने में ही घर की शांति मुमकिन थी.
रिश्तेदारों को घर पर बुलाना और उनके घर जाना उसे गवारा नहीं था, पर अपने हमउम्र दोस्तों के संग घूमने-फिरने के लिए वह सदैव तत्पर रहती. दोस्तों और मायकेवालों के संग बिताया समय उसके लिए नायाब होता, पर ससुराल के किसी रिश्तेदार के संग बिताया समय सज़ायाफ़्ता लगता. अपने सर्कल में एक्टिव मोनिका ससुराल के किसी रिश्तेदार के आने पर उदासीनता दिखाती.
सेजल के जन्म के बाद भी मोनिका का वही रवैया रहा. उसके लिए बच्ची को जन्म देना ही बड़ी बात थी. “लालन-पालन मैं करूंगी, तुम उसकी ज़रा भी चिंता मत करना.” यह आश्‍वासन अम्मा ने उन्हें पहले ही दे दिया था. सो सेजल अपने पापा-दादी के हाथों ही पली-बढ़ी.
आरती को याद आया कि शादी-ब्याह के व्यस्ततम समय में भी रेवती अक्सर फोन लिए बैठी रहती. सब रेवती को चिढ़ाते कि तुम्हारी बिटिया ग्यारहवीं का इम्तिहान दे रही है या तुम? कितना परेशान होती हो?
रेवती की बिटिया पढ़ाई में बहुत तेज़ है. बहुत ध्यान रखती है रेवती उसका. सब कहते, ख़ुद उसने भी देखा कि कैसे रेवती अपने ससुरालवालोेंं पर अपनी स्नेहमयी पकड़ बनाए थी. सास की दवा, ससुर के कपड़े, बेटी की पढ़ाई, पति के खाने-पीने का ध्यान. वहीं किसी को यह कहते भी सुना, “रेवतीजी, अबकी आप की पेंटिंग की प्रदर्शनी लगे, तो बताना…”
“प्रदर्शनी?” अम्मा के साथ उसका भी मुंह खुला रह गया. जब किसी ने बताया कि रेवती बहुत अच्छी पेंटिंग बनाती है. प्रदर्शनी लगती है उसकी पेंटिंग्स की, विदेशों में भी जाती है.
उनके सामने जब रेवती के व्यक्तित्व का एक नया कलापक्ष आया तब अम्मा ने ख़ुशी, दुख और विस्मय के मिले-जुले भाव से आरती को देखा.
उन्हें याद आया कि जब ‘हमारी बेटी पेंटिंग बहुत अच्छी बनाती है.’ कहकर रेवती के पिता ने अपनी बेटी का यह गुण उजागर किया, तब सबने उसे बड़े हल्के में लिया था.
साधारण साज-सज्जा में सिर झुकाए रेवती किसी को रिझा न पाई. अपनी
जात-बिरादरी और जान-पहचान की रिश्तेदारी द्वारा लाया रिश्ता अम्मा के अलावा किसी के मन न भाया था. रेवती के आचार-व्यवहार के अच्छे होने की सूचना कई सूत्रों से मिली थी, पर अम्मा भइया को राज़ी न कर पाईं.
“अम्मा सिलाई, बुनाई, पेंटिंगवाला ज़माना अब नहीं है. लड़की की शैक्षणिक योग्यता क्या है? करियर के प्रति उसका विज़न क्या है? आजकल ये मायने रखता है.” भइया झुंझलाकर बोले थे.
नरेंद्र के ताऊजी के बेटे की शादी में अम्मा ठंडी सांस लेते हुए बोली थीं, “रेवती बढ़िया लड़की थी, हम लोगों ने मूर्खता की जो छोड़ दी.”
“धीरे बोलो अम्मा, अब इस बात का क्या फ़ायदा? जो है उसी में ख़ुश रहो.” आरती ने अम्मा को तसल्ली दी, पर सच कहें, तो उसके मन में भी रेवती जैसी भाभी न होने की कसक बढ़ गई. नरेंद्र के ताऊजी के बेटे की शादी में रेवती को क्या देखा, मोनिका मन से और उतर गई. हालांकि सच ये भी था कि मोनिका के कदम मन पर कभी पड़े ही न थे.
अपने काम-से-काम रखनेवाली मोनिका ने कभी प्रयास ही नहीं किया कि वह अपने ससुरालवालों के मन पर पकड़ बनाए. उन्हें संतुष्ट रखने का कभी तो कोई प्रयास करे. वह तो बस निज हितों तक सीमित अपने में ही मगन थी.
यदि साफ़ व कठोर शब्दों में कहें, तो वह अव्वल नंबर की स्वार्थी थी. उसके विचित्र स्वभाव को अब सबने अपनी नियति मानकर स्वीकारा लिया था. अम्मा और उसकी बात तो छोड़ ही दिया जाए. अपने पति को रसोई में अम्मा के साथ जुटा देखकर भी उसे कोई ग्लानि नहीं होती थी. पत्नी के प्रति अम्मा का ग़ुस्सा न फूटे, घर में कोई क्लेश न हो, बस इसी जुगत में जहां गिरीश भइया चकरघिन्नी के माफ़िक घूमकर अम्मा के साथ रसोई का काम निपटवाते, वहीं अम्मा भी बेटे को कष्ट न हो, इस प्रयास में उम्र से परे जाकर ख़ुद को घर-गृहस्थी में लपेट लेतीं.
आरती के ज़ोर देने पर अम्मा कामवाली बाई से एक समय का खाना बनवाने लगी थीं.


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कोई मेहमान आता, तो गिरीश भइया अपनी पत्नी के ऊपर ऑफ़िस के लोड की कहानियां रचते. मेहमान को बाहर ले जाकर खाना खिलाते, क्योंकि घर में बहू का रसोई में कोई योगदान न होना, उसकी उदासीनता, ससुराल के लोगों से कोई जुड़ाव न होना समेत कई उठनेवाले प्रश्‍न उनकी पसंद पर प्रश्‍नचिह्न लगा सकते थे.
अम्मा की चिंता निरंतर बनी रहती कि अभी तो वह जैसे-तैसे सब काम संभाल रही हैं, पर भविष्य में ये घर कैसे चलेगा? मोनिका के पल-पल बनते-बिगड़ते मूड पर गिरीश भइया के सब्र का बांध कब तक बंधा रहेगा. अम्मा की हारी-बीमारी में भइया ही रसोई संभालना सीखने लगे थे. बेटी सेजल अपनी मम्मी के नक़्शेकदम पर चल रही है. वह बख़ूबी समझती है कि उसके मम्मी-पापा दो अलग-अलग दिशाएं हैं, इसका पूरा फ़ायदा उठाने से वह कभी नहीं चूकती. उसकी जो मांगें पापा और दादी नहीं पूरा करते, वह अपनी मम्मी से पूरा करवा लेती है.
सेजल, अम्मा-भइया के हाथों पली बढ़ी. उसके लालन-पालन में भाभी का कोई योगदान नहीं रहा, पर बड़ी होती बेटी के सामने ख़ुुद को श्रेष्ठ साबित करने का अवसर मोनिका भाभी नहीं चूकना चाहती थीं. जिस ज़िद को अम्मा-भइया नकारते, उसे भाभी स्वीकारतीं. वह सेजल की हर नाजायज़ मांग पूरी करके उसे अपने पाले में रखतीं. अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए बेटी के प्रति अपनाया दोस्ताना व्यवहार सेजल को स्वार्थी बना गया है. उसकी बढ़ती मांगें और उद्दंडता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, अब वह भइया-अम्मा के क़ाबू में नहीं है और भाभी आंख मूंदकर बैठी हैं. गोया कि उनकी पकड़ अपनी बेटी पर भी न के बराबर है.
घर के दरवाज़े की बजती घंटी से आरती ने सोच-विचार के दायरे से बाहर आते हुए दरवाज़ा खोला, तो देखा सोसायटी का गार्ड हाथों में नीली कमीज़ लिए पूछ रहा था, “साहब की शर्ट है क्या? पीछे पोर्च में एक गाड़ी के नीचे पड़ी मिली.”
“अरे हां, इनकी है.” वह ख़ुशी से चिल्लाई.
नरेंद्र अपनी नीली शर्ट को देख ख़ुुश थे.
आरती ने सारी चिमटियां खोलकर रखते हुए कहा, “आज से ये चिमटियां कभी नहीं लगाऊंगी.”
“क्या करोगी इनका?”
“करना क्या है पड़ी रहेंगी. बस, तार में नहीं लगेंगी.”
नरेंद्र अजीब नज़रों से उसे देखते हुए बोले, “तुम भी अजीब हो. बेकार हैं, तो फेंको इन्हें.”
“हां, बेकार तो हैं, पर कितनी महंगी लाए थे.”
“तो क्या हुआ? अपना गुण छोड़ चुकी हैं, इसलिए इनकी जगह डस्टबिन में है. आज शाम को बाज़ार से दूसरी ले आएंगे.”
नरेंद्र द्वारा चिमटियों को फेंकने का फरमान सुनाने के बावजूद आरती ने उन्हें उठाकर एक खाली डिब्बे में डाल दिया और सोच में डूब गई. जगमगाती आलीशान बड़ी-बड़ी दुकानों से मन को लुभाती वस्तुओं की ख़रीदी मन को सुख-संतोष से भरे, यह ज़रूरी नहीं. चिमटियां भी सिखा गईं कि ‘हमें देख-समझकर परखकर ही ख़रीदें, वरना हम नुक़सान ही पहुंचाएंगी.’
फिर रिश्ते बनाने में इतनी अदूरदर्शिता और जल्दबाज़ी कैसे दिखा गए. ये तो चिमटियां थीं, सो फेंक देने का आदेश मिला, पर रिश्ते फेंके और छोड़े नहीं जा सकते हैं. रिश्ते बोझ न बनें, इसके लिए सोच-समझकर ही जोड़े जाने चाहिए. कुछ देर के लिए ख़ुशी देनेवाला बाहरी रंगरूप, चकाचौंध को सुंदरता का मानक समझना बेमानी है. अंदरूनी शुद्धता, त्याग और समर्पण ही जीवन को स्थिरता देते हैं, इसीलिए चिमटी हो या रिश्ते, इनके स्वाभाविक गुणों की परख और समझ आवश्यक है.

Meenu Tripathi
मीनू त्रिपाठी

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“लत अच्छी हो या बुरी, एक बार लग जाए, तो फिर छूटती नहीं है. मैं तो चाहता हूं बच्चों-बड़ों सब को लिखने-पढ़ने की लत लग जाए. अपने पोते-पोती को छुट्टियों में दिनभर टीवी, फोन में घुसा देखकर मैंने घर पर यह छोटी-सी लाइब्रेरी शुरू की थी. आरंभ में मुझे टाइम देना पड़ा. अब तो बच्चे ही आपस में मिलकर उसे संभाल रहे हैं. सफ़र पर निकलता हूं, तो उसी ख़ज़ाने का थोड़ा-सा हिस्सा साथ रख लेता हूं.”

ट्रेन में बैठते ही दीपू ने मम्मी के पर्स से मोबाइल निकाला, ईयरफोन लगाए और खेलना शुरू कर दिया. मम्मी विनीता ने देखकर भी अनदेखा कर दिया. आख़िर कितनी बार समझाए कोई? वैसे भी उनका मूड ठीक नहीं था. अभी तो यूरोप टूर की थकान भी नहीं उतरी थी कि कहीं शोक में जाना पड़ रहा है. सारी पारिवारिक ज़िम्मेदारियां उन्हें ही निभानी पड़ती हैं. दीपू के स्कूल की छुट्टियां थीं, तो उसे भी साथ लेना पड़ गया. आठ वर्षीय इस तूफ़ान को संभालना वैसे भी और किसी के बस की बात नहीं थी.
“तुम्हें परेशान नहीं करेगा. तुम्हारा मोबाइल लेकर एक कोने में बैठा रहेगा.” पराग ने कहा तो विनीता भड़क गई थी.
“यह क्या कम परेशानी है? समझ नहीं आता कैसे यह गंदी आदत छुड़ाएं? इस मोबाइल फोन के कारण आजकल के बच्चे हाथ से लिखना और किताबें पढ़ना ही भूल गए हैं.”
“बेटे, इधर खिड़की से देखो. कितनी सुंदर वादियां हैं! अपनी ट्रेन का इंजन मुड़ते हुए कितना सुंदर लग रहा है?” कानों में एक वृद्ध सहयात्री के स्वर पड़े, तो विनीता वर्तमान में लौटी. बेटे का ध्यान बाहर की ओर आकर्षित करने का उन सहयात्री का प्रयास और मंतव्य समझ वह शर्मिंदा हो उठी. लेकिन दीपू के जवाब ने उनकी शर्मिंदगी और बढ़ा दी.
“स्विट्ज़रलैंड में ऐसे बहुतेरे दृश्य देखे थे. पूरा यूरोप ही एकदम साफ़ और सुंदर है. बस हमारे ही देश में गंदगी और गर्मी भरी पड़ी है.” दीपू ने मुंह बनाया था.
“एक बात बताओ बेटे. यदि तुम्हारे दोस्त का घर तुम्हारे घर से ज़्यादा साफ़ और सुंदर है, तो क्या तुम वहां जाकर रहने लग जाओगे?”
दीपू मोबाइल फोन भूलकर सोचने की मुद्रा में आ गया. फोन की स्क्रीन पर आंखें गड़ाए आसपास बैठे यात्री भी उत्सुकता से उन्हें देखने लगे. वे सज्जन हंसने लगे.
“नहीं न! तुम अपने ही घर को स्वच्छ और सुंदर बनाओगे… अच्छा यह बताओ तुम्हें पुस्तकें पढ़ना पसंद है? मेरे पास ढेर सारी कॉमिक्स हैं, कार्टून के साथ-साथ पंचतंत्र की कहानियां भी हैं.” उन सज्जन ने सीट के नीचे से अपना बैग खींचकर पिंकी, बिल्लू, चाचा चौधरी, मीरा बाई, महाराणा प्रताप… जैसे मशहूर क़िरदारों से जुड़ी किताबें एक के बाद एक निकालनी शुरू की, तो आसपास बैटमैन, स्पाइडरमैन बनकर कूदते-फांदते, अब तक लोगों की नाक में दम किए हुए बच्चे भी आ जुटे और लगे अपनी-अपनी पसंद की किताबें खींचने.
“दादाजी ये… दादाजी वो…” की पुकार से डिब्बा गूंज उठा. विनीता की आश्‍चर्य और उम्मीदभरी नज़रें पुस्तकें टटोलते दीपू पर टिक गईं.
एक महिला सहयात्री ने टिप्पणी की.
“दादाजी, आप तो चलती-फिरती लाइब्रेरी हैं, पर मानना पड़ेगा, बच्चों-बड़ों सब को व्यस्त कर दिया है आपने!”
दादाजी ने नज़रें उठाकर देखा. वाक़ई बच्चों के साथ-साथ डिब्बे के बड़ी उम्र के सहयात्री भी मोबाइल फोन रखकर, किताबें उठा-उठाकर पन्ने पलटने लगे थे. कई तो आसपास से बेख़बर पूरी तरह पढ़ने में तल्लीन हो गए थे. दादाजी मुस्कुरा उठे.

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“लत अच्छी हो या बुरी, एक बार लग जाए, तो फिर छूटती नहीं है. मैं तो चाहता हूं बच्चों-बड़ों सब को लिखने-पढ़ने की लत लग जाए. अपने पोते-पोती को छुट्टियों में दिनभर टीवी, फोन में घुसा देखकर मैंने घर पर यह छोटी-सी लाइब्रेरी शुरू की थी. आरंभ में मुझे टाइम देना पड़ा. अब तो बच्चे ही आपस में मिलकर उसे संभाल रहे हैं. सफ़र पर निकलता हूं, तो उसी ख़ज़ाने का थोड़ा-सा हिस्सा साथ रख लेता हूं.”
“वाह, आपके आसपास रहनेवाली मांओं का सिरदर्द ख़त्म हो गया होगा?” विनीता ने उत्सुकता दर्शाई.
“बिल्कुल! और बच्चों में लिखने-पढ़ने की आदत विकसित हो रही है सो अलग, वरना कंप्यूटर, मोबाइल फोन ने तो आजकल के बच्चों का हाथ से लिखना और किताबें पढ़ना ही छुड़ा दिया है.”
“हां, यह बात तो दादाजी सही कह रहे हैं.”
कानाफूसी होने लगी. बच्चों के दादाजी अब जगत दादाजी बन सबके आकर्षण का केंद्र बन गए थे. दादाजी इन सबसे बेपरवाह बच्चों का परिचय जानने में जुटे थे, दीपू उर्फ़ दीपंकर, मनु, मानस, चिंकी, नाम्या.
नन्हीं चिंकी जिसने अभी पढ़ना-लिखना नहीं सीखा था, अचानक पूछ बैठी, “आपका क्या नाम है?”
“दादाजी.”
“स्कूल में भी?” नन्हीं चिंकी ने हैरानी से पूछा, तो सारे बच्चे हंसने लगे.
“पगली, दादाजी स्कूल नहीं जाते. घर पर ही रहते हैं.”
“सच! पर मेरे घर में तो नहीं हैं. मुझे तो प्ले स्कूल से लौटकर घर में अकेले ही रहना पड़ता है.”
वहीं बैठे चिंकी के माता-पिता के चेहरों पर अपराधबोध उभर आया था. दादाजी ने तुरंत स्थिति संभाल ली.
“बेटी, वे तुम्हारे अच्छे भविष्य के लिए ही नौकरी कर रहे हैं. और देखो, इससे तुम भी कितनी जल्दी स्मार्ट और आत्मनिर्भर हो गई हो, तो यह तुम्हारा प्राइज़ पिंकी और नटखट गिलहरी.”
अपना पुरस्कार पाकर चिंकी ख़ुशी से झूम उठी और मम्मी से पिंकी की कहानी सुनने लगी. अन्य बच्चे उम्मीद से दादाजी को देखने लगे, तो दादाजी उनका मंतव्य समझ गए.
“अच्छा बच्चों, बताओ तुम किस ट्रेन में सफ़र कर रहे हो? वह कहां से कहां के बीच चलती हेै? बीच में कौन-से बड़े स्टेशन आते हैं?”
सही जवाब देकर अपनी पसंद की कॉमिक्स बुक लेकर डब्बू ख़ुशी-ख़ुशी मम्मी-पापा को दिखाने चला गया, तो बाक़ी बच्चे उम्मीद से अगले सवालों का इंतज़ार करने लगे. दादाजी ने उन्हें निराश नहीं होने दिया.
“पिछला स्टेशन कौन-सा था?”
“मकराना.”
“क्यों प्रसिद्ध है?”
“संगमरमर के लिए.”
“संगमरमर से बनी प्रस़िद्ध इमारत?”
“ताजमहल.”
अमर चित्र कथा रामायण पर नज़रें गड़ाए बैठी मिनी ने अंतिम सही उत्तर देकर झट से रामायण उठाकर ले ली.
“मुझे राम-सीता अच्छे लगते हैं. रावण तो घमंडी था.”
“तभी तो दशहरे पर उसे जलाते हैं.” चिराग़ ने अपना ज्ञान बघारा.
“इसलिए बच्चों, हमें बांसुरी की तरह होना चाहिए, फुटबाल की तरह नहीं. कैसे? कोई समझा सकता है?”
सभी बच्चे और बड़े भी सोचने की मुद्रा में आ गए, पर बाज़ी मारी मिनी ने.

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“फुटबाल घमंडी है. अपने अंदर भरी गई हवा को अपने पास ही रख लेती हेै, इसलिए लोग उसे पांवों से ठोकरें मारते हैं. बांसुरी विनम्र है. अपने अंदर फूंकी गई हवा को मधुर स्वर लहरी के रूप में लौटाती है, इसलिए सब उसे होंठों से लगाना चाहते हैं. श्रीकृष्ण भी.”
“वाह, वाह!” सबने उन्मुक्त कंठ से मिनी की तारीफ़ की.
“यह मुझे मेरे दादाजी ने बताया था. वे मुझे पुस्तकों से अच्छी-अच्छी कहानियां और बातें बताते हैं. यह ‘रामायण’ मैंने उन्हीं के लिए ली है. इसे भी हम मिलकर पढ़ेंगे.”
मिनी के पापा ने गर्व से बेटी की पीठ थपथपाई, तो कई जोड़ी आंखें उन पर टिककर बहुत कुछ सोचने को विवश हो गईं.
लेकिन दादाजी को तो और बच्चों का भी सोचना था.
“अब कौन बच्चा मुझे यह बताएगा कि कौन-सा स्टेशन किस खाने की चीज़ के लिए प्रसिद्ध है? अपने देश, प्रांत के बारे में इतनी जानकारी तो हमें होनी चाहिए न?”
दीपू के चेहरे पर फिर हताशा की रेखा खिंच गई. प्राइज़ पाने के सारे मौक़े उसके हाथ से निकलते जा रहे थे. किंतु प्रणव ने उत्साहित होकर जवाब देना शुरू कर दिया, “सेंदड़ा के दही वड़ेे, ब्यावर की तिलपट्टी, नसीराबाद की कचौड़ी…”
“बस करो भई, मेरे मुंह में पानी आने लगा है. वाकई हमारे देसी व्यंजनों का जवाब नहीं. चलो अब एक अंतिम सवाल- आपमें से किसने हाल ही में विदेश यात्रा की है और…” दादाजी का सवाल पूरा भी नहीं हो पाया था कि दीपू ख़ुशी से चिल्ला उठा. “मैंने… मैंने… मेरा प्राइज़.”
“बेटा, पूरा सवाल तो सुन लो और आपकी बकेट लिस्ट में क्या है?”
दीपू सोचने की मुद्रा में आ गया. सब की नज़रें उस पर टिकी थीं, विशेषकर विनीता की.
“अपना देश! अब मैं अपना देश और विशेषकर मेरा प्रांत राजस्थान पूरा का पूरा घूमना और देखना चाहूंगा.”
“बहुत ख़ूब!” दादाजी ने अपनी बैग से एक बेहद सुंदर डायरी और उतना ही आकर्षक पेन निकालकर दीपू को थमा दिया. “यह प्राइज़ तुम्हारे दूसरे जवाब के लिए है. बेटा, विदेश घूमना, वहां पढ़ने जाना बुरी बात नहीं है, पर उसकी तुलना में अपने देश को लेकर हीनता का भाव रखना, हमेशा के लिए विदेश में ही बस जाना मेरी नज़र में उचित नहीं है.
निःसंदेह हमें वहां की स्वच्छता व अनुशासन को अपनाना चाहिए, पर अपनी सभ्यता, अपने संस्कारों पर भी गर्व होना चाहिए. अपनी उच्च शिक्षा का प्रयोग अपने देश को उन्नत बनाने के लिए करना चाहिए. तुम लोगों की सोच पर ही इस देश का भविष्य टिका है और हम सबको तुम सबसे बहुत उम्मीदें हैं. ज़्यादा बड़ी-बड़ी बातें करके तुम बच्चों को बोर नहीं करूंगा.”
दीपू अभी भी अपनी डायरी और पेन में ही खोया हुआ था. उसकी मासूमियत पर रीझ दादाजी उसके कान में फुसफुसाए, “अब हमेशा ऐसी ही अच्छी सोच रखकर अच्छे बच्चे बने रहना. देखो मम्मी कितना गर्व अनुभव कर रही हैं?” विनीता की आंखें गर्व से छलक आई थीं.
“आपके छोटे से घर का गूगल आपकी मम्मी हैं. उन्हें सब पता होता है- आपके सामान से लेकर आपकी भावनाओं तक का.” फिर गला खंखारकर दादाजी ज़ोर से बोलने लगे, “दीपू, बेटा मैं चाहता हूं इस डायरी में तुम रोज़ एक निबंध लिखो. अपनी विदेश यात्रा, यह रेल यात्रा, तुम्हारी बकेट लिस्ट…”
“मैं लिखूंगा, मम्मी को पढ़ाऊंगा. पर आपको कैसे पढ़ाऊंगा? आप तो पता नहीं आज के बाद फिर कभी मिलोगे या नहीं?” दीपू उदास हो गया था. कुछ समय साथ बिताए सफ़र में ही वह दादाजी से आत्मीयता महसूस करने लगा था. शायद बाक़ी बच्चे भी जुदाई का ग़म अनुभव करने लगे थे, क्योंकि सभी के चेहरे उतर गए थे.
“अरे, इसमें क्या है? जो भी लिखो तस्वीर खींचकर अपनी मम्मी के मोबाइल से मुझे भेज देना.” सारे बच्चे और यात्री दादाजी को आश्‍चर्य से देखने लगे. विनीता ने साहस करके पूछ ही लिया, “पर आप तो स्मार्टफोन, टीवी, कंप्यूटर आदि के ख़िलाफ़ हैं न?”
“नहीं! अरे भई विज्ञान ने इतने आविष्कार किए हैं, तो हमें उनका फ़ायदा तो उठाना ही चाहिए. बस, इतना ख़्याल रखना चाहिए कि हम अति का शिकार न हो जाएं, क्योंकि तब विज्ञान वरदान न बनकर अभिशाप बन जाता है.”
अब विनीता व कुछ और भी मम्मियां खुलकर सामने आ गईं. “यही हम भी अपने पति और बच्चों को समझाना चाहती हैं. घर में रहते हुए घरवालों से संवाद न बनाए रखकर टीवी, मोबाइल आदि से चिपके रहना रिश्तों में दूरियां लाता है.”

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“नौकरी मैं भी करती हूं, लेकिन घर में घुसते ही ऑफिस को दिमाग़ से बाहर रख देती हूं और यही अपेक्षा पति और बच्चों से भी करती हूं, पर उन्हें टीवी, लैपटॉप से चिपके देख कोफ़्त होती है.” डब्बू की मम्मी ने अपनी बात रखी, तो डब्बू और उसके पापा ने स्वयं को सुधारने का वचन दिया. विनीता का स्टेशन समीप आ रहा था. उसने सामान समेटना शुरू किया, तो दीपू को मानो होश आया. “दादाजी जल्दी से अपना नंबर दीजिए. मैं मम्मी के मोबाइल में सेव कर लेता हूं.”
“हमें भी… हमें भी…” सारे बच्चे चिल्ला उठे.
दादाजी ने नंबर बोला, तो सब बच्चों ने अपने-अपने मम्मी या पापा के मोबाइल में नोट कर लिया. फिर एक-दूसरे का मुंह देखने लगे. आपस में खुसर-पुसर भी करने लगे. “क्या हुआ?” दादाजी पूछे बिना न रह सके.
“मैंने कर लिया.” दीपू ख़ुशी से चिल्लाया.
“पर क्या?” सब अभिभावक और दादाजी हैरान थे.
“हम आपस में खुसुर-फुसुर कर रहे थे कि दादाजी का नंबर किस नाम से सेव करें, क्योंकि दादाजी नाम से कइयों के मोबाइल में नंबर सेव हैं.” दीपू ने बताया.
“फिर?” एक सम्मिलित स्वर गूंजा.
“मैंने सेव किया है- रॉकस्टार दादाजी.”
“हुर्रे! हम भी इसी नाम से सेव करेंगे.” बच्चे चिल्लाए. “दादाजी रॉक्स.” बच्चों के साथ-साथ सारे यात्री भी उल्लास से चिल्ला उठे.

Sangeeta Mathur
संगीता माथुर

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“चेंजिंग रूम में अकेले में कपड़े चेंज करना कोई गुनाह तो है नहीं, जो लड़कियां डर जाएं. गुनाह तो इसने किया है. डरना तो इसे चाहिए.” दूसरी लड़की बोली.
“ऐसे लोगों को समझ लेना चाहिए कि ये हाथ चूड़ी पहनने के साथ ही डम्बल भी उठाते हैं.” एक ने डम्बल हाथ में लेकर कहा.

“रुको पूर्वी. ज़रा इधर तो आओ एक मिनट…”
पूर्वी ट्रेडमिल से उतरकर ट्विस्टर पर जा रही थी, तभी जिम के एक ट्रेनर जिमी ने उसे रोका.
“जी सर कहिए क्या हुआ.” पूर्वी ने पूछा.
जिमी ने इधर-उधर देखा, आसपास कोई नहीं था. उसने अपना मोबाइल निकाला और पूर्वी को एक वीडियो क्लिप दिखाने लगा. पूर्वी सन्न रह गई. आज जिम आने के बाद एक्सरसाइज़ शुरू करने के पहले जब वह चेंजिंग रूम में कपड़े बदल रही थी, तब जिमी ने वहां मोबाइल छुपाकर उसका वीडियो बना लिया था.
“कल दोपहर को डेढ़ बजे घर आ जाना मेरे और जो मैं मांगू वो चुपचाप दे देना, नहीं तो ये वीडियो सबको दिखा दूंगा और सोशल मीडिया पर भी पोस्ट कर दूंगा…” जिमी के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी.
“कल क्यों सर, जो आप चाहते हो वो मैं अभी दे देती हूं आपको.” पूर्वी बोली.
फिर ज़ोर से चिल्लाकर सबसे बोली, “सब लोग सुनो… ये जिमी सर ने कपड़े चेंज करते हुए मेरा वीडियो बना लिया है. अब ये चाहते हैं कि मैं इनकी मांग पूरी करूं. आज जो मेरे साथ किया इसने, वो कल बाकियों के साथ करेगा.”
सभी लड़कियां और दूसरे ट्रेनर उसके आसपास इकठ्ठे हो गए.
“अब तुम लोग ही बोलो मुझे क्या करना चाहिए.” पूर्वी ने पूछा
“करना क्या चाहिए, चल इसके कपड़े उतारकर इसका ही वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करना चाहिए, ताकि आगे से कोई और ऐसी घिनौनी हिम्मत न करे.” एक लड़की बोली.
“चेंजिंग रूम में अकेले में कपड़े चेंज करना कोई गुनाह तो है नहीं, जो लड़कियां डर जाएं. गुनाह तो इसने किया है. डरना तो इसे चाहिए.” दूसरी लड़की बोली.
“ऐसे लोगों को समझ लेना चाहिए कि ये हाथ चूड़ी पहनने के साथ ही डम्बल भी उठाते हैं.” एक ने डम्बल हाथ में लेकर कहा.
“चल इसका वीडियो बनाओ, ताकि आगे से हमारी प्राइवेसी और इज़्ज़त से कोई खिलवाड़ करने की कोशिश न करे.”
आधे घंटे बाद लहूलुहान जिमी हवालात में था.

Dr. Vinita Rahurikar
डॉ. विनीता राहुरीकर

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Kahaniya

“तुम ना वसु, एकदम अजीब-सा रिएक्शन दे रही हो… दिनभर अरुण के बारे में बात कर सकती हो, ढूंढ़-ढूंढ़कर उनकी फोटो फेसबुक पर देख सकती हो, यहां तक कि कपड़े भी अब उनकी पसंद के पहनती हो, लेकिन एक भ्रम में जीना है बस! कब तक उन्हीं कड़वी यादों से लड़ती रहोगी, बाहर आओ.. गुलज़ार साहब इंतज़ार कर रहे हैं.” वो मुस्कुरा दी.

अलार्म बंद करके मैं रजाई में दुबकी रही. सवा छह ही था, आधा घंटा और सही. वैसे भी टहलने तो जाना नहीं था… पार्क याद आते ही मन खिन्न हो गया. कल तक तो केवल यही वजह ही रह गई थी ख़ुश रहने की, अब वो भी ख़त्म हो चुकी थी. सामनेवाले घरों की सफ़ेद, पीली बत्तियां जल चुकी थीं. एक-एक करके सब ताला लगाकर पार्क की ओर निकलने भी लगे होंगे… सरिता अपने उसी पुराने लाल-पीली पट्टियों वाले रोएंदार स्वेटर में तेज चाल से चलती हुई, मंकी कैप पहनकर कुर्ते की जेब में बांहें डालकर एक गर्म कोना तलाशते हुए शर्मा अंकल, सुबह-सुबह काला चश्मा लगाकर टहलनेवाला उस अमीर बिल्डर का नाटा-सा लड़का और?.. और कोई नहीं! मैंने सिर झटका, मैं उनके बारे में सोचना भी नहीं चाहती थी… बिल्कुल भी नहीं… मैंने रजाई सिर तक खींच ली. मेरे आस-पास सब कुछ काला-काला था, लेकिन अरुण मुझे एकदम साफ़ दिखाई दे रहे थे; काल रंग का ट्रैक सूट, आंखों पर भूरे फ्रेमवाला चश्मा, बालों मे हल्की सफ़ेदी और चेहरे पर असामान्य संजीदगी! इतने अंधेरे में दिमाग़ और तेज भाग रहा था…
साल भर हो गए हमें इस तरह पार्क में मिलते-जुलते, हंसते-मुस्कुराते. बात राजनीति, क्रिकेट, सम-सामयिक जैसे मुद्दों से आगे बढ़कर उनकी शादी, तलाक़ की वजह, घर-परिवार से होते हुए साहित्य पर आकर ठहर गई थी.
“कल मैं एक उपन्यास पढ़ रहा था.. उसमें नायिका को आपकी तरह कॉटन की साड़ियां पसंद थीं.” क़रीब तीन महीने पहले की बात होगी, एक अजीब-सी दृष्टि से मेरी तरफ देखते हुए अरुण मुस्कुराने लगे.
“आपको बैंक से आने के बाद उपन्यास पढ़ने का टाइम मिल जाता है?” मैंने बात टाली.
“बिल्कुल मिल जाता है वसुंधराजी. घर में पत्नी तो है नहीं, जो किताब छीनकर रख देगी.. टाइम ही टाइम है.” ज़िन्दगी से मिली कड़वाहट अक्सर उनकी बातों मे छलक आती थी और वही एक पल होता था, जो मेरे सारे घाव भी हरे कर जाता था.
मैंने भी कब सोचा था कि कॉलेज में किसी एक झूठे वादे से टूटा दिल कभी किसी और पर विश्‍वास करने लायक नहीं बचेगा, और ज़िंदगी घर से स्कूल, स्कूल से घर में बीत जाएगीे… रटी-रटाई बातें वही बातें, हर साल बच्चों को पढ़ाना, पैरेंट्स-टीचर मीटिंग, कॉपी- जांचना और स्टाफ रूम की खुसुर-फुसुर में बिना मन के मुस्कुराने की कोशिश करना… कहने को तो सब चल रहा था, महसूस करो तो सब रुका हुआ था! अलार्म एक बार फिर चीखा.. मैंने हड़बड़ाकर रजाई फेंकी, सात बज गए थे. साढ़े सात तक रमिया आ जाएगी, फिर तैयार होना, स्कूल जाना… घड़ी जैसा बीतना जीवन का- बारह से तीन, तीन से छह, छह से नौ और फिर नौ से वापस सुई का बारह पर आना.
“आज आप पारिक नहीं गईं दीदी?” अपनी चाभी से दरवाज़ा खोलकर अंदर आई रमिया मुझे देखकर चौंक गई.
“हां… देर से आंख खुली… ये क्या भेष बनाकर आई हो आज?” मैं उसको ऊपर से नीचे तक देखते हुए बोली; एकदम चमकता हुआ गाढ़े हरे रंग का कुर्ता, लाल सलवार और लाल चुन्नी.. पान से रंगे दांत और चवन्नी जितनी बड़ी बिंदी!
“गोपाल के पप्पा लेके आए ये सूट…” गुनगुनाते हुए वो खाना बनाने में लग गई.. मैं भन्ना कर रह गई! अभी पिछले हफ़्ते इसने अनगिनत गालियों को कभी संज्ञा, कभी विशेषण की तरह प्रयोग किया था इसी ‘गोपाल के पप्पा’ यानी अपने पति के लिए और आज चली आई उसके नाम की माला जपते. खिड़की से झांककर देखा, लोग पार्क से लौट रहे थे.. मन फिर डूबने लगा, रह-रहकर कल वाली बात याद आ रही थी. सब कुछ ठीक तो चल रहा था, अचानक अरुण का वो संदेश आना… नहीं, वो बात कहीं से भी सही नहीं थी.

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“वसुंधरा, ऐसा नहीं लग रहा है कि हमें जहां जाना है, हम वहीं से भाग रहे हैं? मैंने पहले भी तुमसे इस बारे में बात करने की कोशिश की, तुम टाल गई. ग्रो अप… ऐसे कब तक चलेगा? तुम्हे नहीं लगता, अब इस दोस्तीवाले भ्रम से हमें बाहर आना चाहिए?”
मैने मोबाइल फोन उठाकर ये संदेश फिर से पढ़ा, कल से अनगिनत बार ये संदेश पढ़ चुकी हूं… ना जवाब दिया, ना अरुण का फोन उठाया. आख़िरी डर था सुबह की सैर में आमना-सामना होने का.. उससे भी बच गई. मोबाइल फोन वायब्रेट हो रहा था, “हैलो! हां पापा, गुड मॉर्निंग! नहीं.. आज टहलने नहीं गई, बस निकलूंगी अभी स्कूल के लिए!”
“कल से छुट्टियां लग रही हैं ना, आ जाओ इधर ही… नया साल साथ मना लेंगे. रिंकी-पिंकी भी बहुत याद कर रही थीं तुमको, देख लेना बिट्टो.. ठीक है, ठीक है, स्कूल से आकर फोन मिलाना.”
ऑटो में बैठते ही मोबाइल का नेटवर्क बंद कर दिया, हर थोड़ी देर में पीं-पीं करता एक संदेश…”आपका दिन शुभ हो”, ” नए साल की बधाई एडवांस में”… जैसे चलताऊ संदेश और गजक की एक फोटो के साथ “सर्दियों में गजक मेरी ओर से” जैसे वाहियात संदेश. कितना समय है लोगों के पास बर्बाद करने के लिए, फ़ालतू बातों पर हंसने के लिए… अगर चाहो कि दो घड़ी किसी के कंधे पर सिर रखकर सुस्ता लो, तो कोई नहीं. पापा घर बुला रहे हैं, चली जाऊं क्या? दस दिनों की छुट्टियां हैं तो… भइया से, बच्चों से, सबसे मिलना हो जाएगा और भाभी? मन कसैला हो गया.. दो दिनों तक सब ठीक चलता है फिर तीसरे दिन घुमा-फिराकर वही एक बात “तुम शादी कर लेती, तो हम लोग भी फ्री हो जाते”… अरे! कौन-सी अपनी ज़िम्मेदारी सौंप रखी है मैंने किसी के कंधे पर? अकेले रहती हूं,अपना ख़र्चा उठाती हूं… बीमार हो जाऊं, परेशान हो जाऊं, तब भी किसी को फोन नहीं करती. हां, मां थीं, तो बात अलग थी… अब तो वो भी नहीं हैं. ऑटो रिक्शा बहुत तेज चल रहा था, आंसू गाल पर गिरकर चेहरे को और ठंडा कर रहे थे, मैंने शॉल कसकर लपेट लिया.. मां बहुत याद आ रही थीं.
“हमने तो साफ़ कह दिया इनसे, ” शैलजाजी ने स्टाफ रूम में अपने घर की बातों का पुलिंदा खोलना शुरू किया, “ना हम मायके जाएंगे, ना ससुराल… छुट्टियां हैं, कहीं बढ़िया जगह ले चलो घुमाने.. है कि नहीं?”
“मैंने ख़ुद यही कहा.. और जानती हैं, जवाब में वो पीली साड़ीवाला कांड लेकर बैठ गए… बताया था न मैंने?” मोनिका खुफिया हंसी हंसती हुई कोई बेहद व्यक्तिगत बात सार्वजनिक कर रही थी.. और श्रोताओ को असीम आनंद की अनुभूति हो रही थी. मैं फिर फोन निकालकर उसी संदेश में खो गई… ऐसे थोड़ी मैं ‘दोस्ती से आगे बढ़कर’ सोच लूंगी! वैसी कोई बात भी नहीं थी मेरे मन में, बेचैनी हो रही थी… अभी तक शिखा क्लास ख़त्म करके आई नहीं थी।
“चलें, चाय पीने? या ऐसे ही मुँह बनाती रहोगी इनके फूहड़ मज़ाक पर…” शिखा मेरा कंधा थपथपाते हुए फुसफुसाई.
“चलो यार… वैसे ही दिमाग़ ख़राब है आज”… मैं बड़बड़ाते हुए उठी.
कैंटीन में आकर बैठते ही मैने मन खोला, “शिखा, बहुत ज़रूरी बात करनी है तुमसे..”
“क्या हुआ, तुम्हारे गुलज़ार साहब ने तुमको लाल गुलाब दे दिया क्या?” वो आंख मारकर मुस्कुरा दी. मैं अवाक रह गई! ये कैसे जान गई?”
“अब बताओगी भी, क्या हुआ?” वो झुंझला रही थी… मैंने फोन निकालकर, संदेश उसको दिखाया..
“तुमने क्या जवाब दिया? या शायद दिया ही नहीं, है ना! “शिखा मेरा चेहरा पढ़ते हुए बोली.
“इसमें जवाब देने लायक है ही क्या? फिल्मोंवाली बातें हैं.. दोस्ती से आगे बढ़ना, बकवास.” मैंने चाय का एक घूंट भरा.
“तुम ना वसु, एकदम अजीब-सा रिएक्शन दे रही हो… दिनभर अरुण के बारे में बात कर सकती हो, ढूंढ़-ढूंढ़कर उनकी फोटो फेसबुक पर देख सकती हो, यहां तक कि कपड़े भी अब उनकी पसंद के पहनती हो, लेकिन एक भ्रम में जीना है बस! कब तक उन्हीं कड़वी यादों से लड़ती रहोगी, बाहर आओ.. गुलज़ार साहब इंतज़ार कर रहे हैं.” वो मुस्कुरा दी.
“मैं अब पिछला कुछ याद नहीं करती शिखा, सब भूल चुकी हूं… और ये तुमसे किसने कहा कि मैं उनके पसंद के कपड़े पहनती हूं?” कहने को तो मैं कह गई, लेकिन ये दोनों बातें झूठ थीं. जब से अरुण ने कॉटन साड़ियोंवाली बात कही थी, मैं ज़्यादातर वही पहनती थी… यहां तक कि सुबह सैर के वक्त भी. जहां तक सवाल था, दूसरे झूठ का… मैं अभी तक उसी झूठ से आहत, यादों के उसी जंगल में भटक रही थी जहां मोहित मुझे छोड़कर गया था.


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घर आकर बहुत देर तक फेसबुक देखती रही. ये फेसबुक की दुनिया भी ना… किसी ने अपने पति को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए लिखा था, “दुनिया के सबसे अच्छे पति को जन्मदिन मुबारक हो!” जिसके जवाब में उसके पति ने “मैं सौभाग्यशाली हूं, जो मुझे तुम मिली…” लिखा और ये सब पढ़कर ताली बजानेवाले अनगिनत लोग, उंह! ऐसे रिश्तों की दुकान लगाते हुए मन नहीं ऊब जाता? और भी बहुत सारे ‘प्रदर्शन’ देखते हुए, अपने को रोकते हुए भी, ना चाहते हुए भी मैं फिर से मोहित के प्रोफाइल में चली गई. बीवी, बच्चों और बंगला-गाड़ी के साथ अनगिनत तस्वीरें… बीच-बीच में अमेरिकी समुद्र तटों पर धूप का चश्मा लगाकर लेटे हुए तस्वीरें. मन भर आया.. कितनी आसानी से मुझसे इतने बड़े-बड़े झूठ बोले गए,
“बस नौकरी लगने की देर है… फिर तो कोई नहीं रोक सकता तुम्हे मिसेज़ मोहित मेहरा बनने से, बस तुम ऐसे घबराया मत करो.”
“और क्या, अब तो अमेरिका मे रहेंगे… आराम से, बस शादी के बाद तुम ये लंबे-लंबे कुर्ते ना पहनना…”
“बिज़ी रहता हूं वसुंधरा, अब हर दिन तो बात नहीं कर सकता ना.”
‌दिनों से हफ़्तों और फिर हफ़्तों से महीनों के फ़ासले… और फिर वो फोन, “वसुंधरा, मां बिल्कुल तैयार नहीं है हमारे रिश्ते के लिए, हमें अपने परिवार के लिए सब कुछ भूलना होगा… तुम सुन रही हो ना?” मैंने फोन पटक दिया था, इससे ज़्यादा और मैं क्या सुनती? असलियत तो ये थी कि शहर के बड़े उद्योगपति की बेटी को अपनी पत्नी बनाना मोहित के लिए एक बड़ी छलांग थी… फिर मैं कहां और मेरा प्यार कहां?
“अंधेरा किए काहे बैठी हैं दीदी? साम हो गई…” रमिया ने आते ही टप्प से लाइट जला दी, “रो रही हैं? सिर पिरा रहा है?”
बिना मेरा जवाब सुने, तेल की शीशी लाकर सिर दबाने लगी… मेरे आंसू और तेज गिरने लगे थे. कितना अपनापन लग रहा था इस स्पर्श में… मैंने उसकी गोदी में सिर टिका दिया.
“दीदी… पांच सौ सातवाली बंगालन हमसे पूछ रही थीं, तुम्हारी टीचर दीदी ने शादी क्यों नहीं की? हमने कहा, दीदी के जैसा कोई सुंदर आदमी मिलेगा क्या उनको…”
उसके भोलेपन पर मैं आंखें बंद किए हुए मुस्कुरा दी… ये सब बातें केवल मुझे ख़ुश करने के लिए वो बोल रही थी. सिर हल्का लग रहा था, मैंने उससे चाय बनाने को कहकर फोन उठाया, ओह! फोन की घंटी बंद थी… सात छूटी हुई काॅल पड़ी थीं! एक पापा की, तीन शिखा की और तीन अरुण की… इतनी देर में संदेश भी बहुत सारे आ चुके थे.
पापा ने मेरी भतीजियों की कुछ तस्वीरें भेजी थीं.
स्कूलवाले समूह पर कुछ चुटकुले,
और…
अरुण का एक छोटा सा संदेश… “क्या आज हम मिल सकते हैं?..”
मैं बहुत देर तक उनकी फोटो देखती रही. शिखा सही कहती है. कुछ सालों बाद अरुण एकदम गुलज़ार साहब जैसे दिखने लगेंगे. वही संजीदगी, वही प्रबुद्धता और वैसी ही उदास आंखें! तीन-चार बार संदेश टाइप किया, फिर हटाया.. कितनी उलझन हो रही थी, कब तक ऐसे टालना ठीक है? क्यों नहीं साफ़-साफ़ मना कर देती? पता नहीं क्या सोचकर, रमिया को रात के खाने के लिए समझाकर सीधे मैं उनके फ्लैट पहुंच गई.
“साहब हैं?” दरवाज़ा श्यामू ने खोला.
“साहब तो अस्पताल में हैं ना…” उसने ऐसे बताया जैसे मुझे ये बात पता होनी चाहिए थी.
“अस्पताल में हैं मतलब,” मेरी आवाज़ में घबराहट आ चुकी थी. मेरी अनभिज्ञता से आश्वस्त होकर उसने पूरी बात खोली, “थोड़ी देर पहले पेट में दरद हुआ साहब को, इस तरफ़… फिर बेहोस हो गए, हम सब जनी तुरंत ले गए अस्पताल…”
“तुम सब, मतलब और कौन?” मेरे हाथ-पैर ढीले हो रहे थे.
“भाटिया मैडम, सर्मा जी और हम…”
मिसेज़ भाटिया को फ़ोन करके बात की और अगले आधे घंटे के अंदर मैं अस्पताल में थी.
“अरुण को हल्का दर्द रहता था, ही जस्ट इग्नोर्ड!, ” मिसेज़ भाटिया बोलीं, “इट वाज़ एपेन्डिसाइटिस. आज तेज़ दर्द उठा, अचानक बेहोश हो गया. श्यामू मेरे घर आया, हम लोग फटाफट यहां लेकर आए… यू नो वसुंधरा, डॉक्टर ने कहा एक घंटा भी देर से आते तो रिस्की था.”
मैंने फोन में संदेश आने का समय देखा, शायद ये सब इसके तुरंत बाद ही हुआ होगा… मेरी आंखें भरी हुई थीं, क्यों भरी हुई थीं, पता नहीं. जितनी देर ऑपरेशन चला, मैं वहीं बाहर कुर्सी पर सिर टिकाए अधमरी सी बैठी रही.. मुझे हो क्या रहा था? ऐसा तो कुछ है नहीं ना, एक ‘दोस्ती’ ही ना? उसमें ऐसी घबराहट जैसे मेरे हाथों से रेत फ़िसली जा रही हो…
“सब ठीक है अब तो… रूम में शिफ्ट कर रहे हैं.” शर्माजी ने आकर बताया, “आप लोग घर जाइए, मैं हूं यहां.”
पता नहीं मेरे अंदर से कौन बोला, “मैं रुक रही हूं यहां… आप मुझे पेपर्स दे दीजिए.”
ये एक ऐसा पल था, जहां ना मुझे बदनामी दिख रही थी, ना लोगो की खुफ़िया निगाहें… ना अरुण और मेरे संबंध पर उठती लोगों की उंगलियां, मुझे सिर्फ़ और सिर्फ़ अरुण दिखाई दे रहे थे.
क़रीब चार घंटे बाद अरुण को होश आया, डॉक्टर और नर्स से घिरे हुए बस वो आँखों में कुछ सवाल लिए लेटे रहे, मैं जान-बूझकर उनकी ओर कम से कम देख रही थी…
“कल से इनको हल्का खाना दे सकते हैं… सूप या खिचड़ी जैसा कुछ, और चार दिन बाद यहां से छुट्टी. नया साल आप घर पर मनाइएगा मिस्टर अरुण.” डॉक्टर मुस्कुराते हुए चला गया.


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‌अरुण आंखें बंद किए लेटे थे और मैं थोड़ी दूर रखे पतले से बेड पर दीवार से सिर टिकाकर बैठी थी. पूरी रात ऐसे ही बीती. बीच-बीच में जब नर्स ड्रिप चेक करने आती थी.. सन्नाटा तभी टूटता था.
“आप लोग थोड़ी देर यहां हैं ना अभी, मैं घर से फ्रेश होकर आती हूं.” सुबह बिल्डिंग के लोग उन्हें देखने आए, तो मैंने अपना सामान उठाते हुए पूछा.
“ये लोग हैं यहां, आप… मतलब, हो जाएगा मैनेज.” अरुण की हल्की-सी आवाज़ सुनाई दी, और जो नहीं कहा गया वो भी सुनाई दिया (आप हैं कौन जो इतना परेशान हो रही हैं)… किसी तरह हिम्मत बटोरकर मैंने कहा, “स्कूल बंद है, मैं फ्री हूं… बाकी लोगों का ऑफिस होगा.”
ऑटोरिक्शा में बैठकर मैं अपने मन की थैली को टटोलती रही… केवल यही कारण है यहां रुकने का? अगर स्कूल होता तो? मैं छुट्टी ले लेती… जो जवाब आ रहा था, वो मुझे और व्यथित कर रहा था, जिसके लिए एक और सवाल- मैं क्यों छुट्टी ले लेती?
“हां, मैं समझ रही हूं, लेकिन तुम रो क्यों रही हो?.. हैलो! वसुंधरा, कुछ बोलो…” घर आते ही मैने शिखा को फोन किया और बताते-बताते रो पड़ी.
“पता नहीं यार, इस तरह से अस्पताल में अरुण को देखकर अजीब-सा लगा.” मैंने किसी तरह अपनी बात समझानी चाही.
“ऐसा लगा जैसे कुछ है जो मुझसे छूटनेवाला है.. कोई जानेवाला है…”
“तो मत जाने दो वसु! कब तक भागोगी इस तरह, अंकल भी तो तुम्हें सेटल्ड देखना चाहते हैं… 40 की होने जा रही हो,अरुण भी तुमसे दो-चार साल बड़े ही होंगे.. सुन रही हो ना.”
“वही तो.” मैंने उसकी बात काटी, “ये कोई उम्र है क्या साथी ढूंढ़ने की… “
“वसुंधरा, इसी उम्र में तो हमें एक कंधा चाहिए होता है सिर टिकाने के लिए… किसी के पास बैठकर बिना कहे सब कुछ कहने और सुनने के लिए, अब तो तुम भी मान रही हो ना कि ये दोस्ती से ज़्यादा कुछ है.. बोलो?”
मेरे पास जवाब था भी और नहीं भी… अस्पताल में जितनी देर अरुण के साथ रहती, सब कुछ पूर्ण लगता था. थोड़ी देर के लिए भी घर आती, तो जैसे अपना एक हिस्सा वहीं छोड़ आती थी. चार दिन कैसे बीत गए, पता नहीं…
“कल छुट्टी मिल जाएगी आपको इस कैदखाने से.” मैंने अरुण के आगे सूप रखते हुए कहा.
“हां, और तुमको भी इस नाटक से… है ना? ” एकदम से ‘आप’ से ‘तुम’ पर आना और वो भी इस सवाल के साथ, मैं चुपचाप सामान समेटती रही.
“मैं तुमसे बात कर रहा हूं वसुन्धरा! इतने दिन मेरे लिए बर्बाद करने की क्या ज़रूरत थी?.. क्या नाटक नहीं है ये सब?” अरुण सूप को एक तरफ़ कर चुके थे.
“चलिए नाटक ही सही.. आप सूप पीजिए.” मैंने पास आकर टेबल सीधी की. अरुण ने मेरा हाथ पकड़ कर वहीं बैठा लिया, “वसुंधरा, मैंने तुमसे कुछ पूछा था.. तुम्हारी चुप्पी में मुझे तुम्हारा जवाब मिल गया था. लेकिन अब ये सब? इतने दिनों से ये सब, इस तरह से… प्लीज़ कुछ बोलो.” वो अभी भी मेरा हाथ पकड़े हुए थे.
“आपको सब साफ़ सुनना है क्या?” मैंने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश भी नहीं की थी… ना चाहते हुए भी एक रंग था, जो मेरे चेहरे पर फैल रहा था, एक मुस्कुराहट भी… जो धीरे-धीरे बड़ी होती जा रही थी. अरुण एकदम से मुस्कुराने लगे थे, “पता है, नाइट शिफ्ट वाली नर्स क्या कह रही थी? कह रही थी, तुम्हारा वाइफ बहुत ग़ुस्सा करता है… तुम लड़ ली थी ना उससे जाकर?”
मैं अपने को रोकते हुए भी खिलखिलाकर हंसने लगी थी. अरुण मुझे एकटक देखते हुए हंस रहे थे… दरवाज़े पर हुई खट-खट से हमारे हाथ अलग हुए. सफ़ाईवाला लड़का खड़ा था.
“साहब, नए साल की बख्सीस…” वो हाथ में झाड़ू-बाल्टी लिए मुस्कुरा रहा था.
“आज तो 31 दिसंबर है, आने तो दो नया साल…” मैं उससे बोली.
“हमारे लिए तो आ गया है नया साल, ” अरुण शरारत भरी आंखों से मुझे देख रहे थे, ” वसु! पर्स से सौ रुपए निकालकर इसको दे दो.. ये वाला न्यू इयर बहुत हैप्पी है!..”

Lucky Rajiv
लकी राजीव

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Kahaniya

“मैं आपकी तरह बंजर ज़मीन पर फसल के झूठे सपने नहीं उगाना चाहता. मुझे शहर में अच्छी नौकरी मिल रही है. मैं अब वापस नहीं आऊंगा. ऐसा किसान किस काम का जिसकी ख़ुद की थाली खाली हो…”

खेत से लौटते ही सुखीराम ने पूछा, “बुधली, आज लालटेन क्यों नहीं जलाई अगर टीराच नहीं होता, तो अंधेरे में झोपड़ा ढूंढ़ न पाते हम, लाओ जलाए देते हैं.” बुधला ने हाथ से माचिस छीन ली और बोली, “बड़े राजा भोज बन रहे हो, मिट्टी का तेल अब थोड़ा ही बचा है, भोलू जब पढ़ने बैठेगा, तो जलाए देंगे लालटेन.” खाना खाकर बुधली ने लालटेन जलाई और पढ़ते हुए भोलू के सामने रख दी, और ख़ुद आंगन में चांद की रोशनी में बैठे सुखीराम के पास जाकर बैठ गई.
दोनों चुपचाप कभी अपने बंजर खेत देखते, तो कभी आसमान में चांद को. बुधली बोली, “कल जब बिजली आवेगी, तो टीराच में बिजली भर लेना और फून में भी. पंप चालू कर के खेत में पानी भी तनिक ज़्यादा दे देना, देखना सालभर में ज़मीन लहलहा उठेगी.” सुखीराम बोला, “बड़ी मूरख है तू, रात के अंधेरे में भी दिन के सपने देखना नहीं छोड़ती. इत्ता सा खेत बचा है, जो बंजर होने को है. ज़मीन के सीने में पानी ही नहीं है, तो बीज पनपेगा कैसे? 24 घंटा में 4 घंटा बिजली आवे है, अब इत्ते से बखत में आदमी क्या-क्या करे? बारिश की राह देखना, तो हमने बंद ही कर दिया है. बस, इस साल की फसल अच्छी हो जाए, भोलू कॉलेज ख़त्म कर लें, तो बैंक का कर्जा चुका देंगे. बड़े सपने हैं बुधली हमारे. अब यह टूटे घर से झांकती रोशनी और तुम्हारी फटी साड़ियां हमसे बर्दाश्त नहीं होती.”
बुधला बोली, “फिजूल में चिंता करते हो, भोलू शहर से नई-नई चीज़ें लाकर फसल उगाएगा फिर सब वापस आ जाएगा.”
भोलू परीक्षा देने शहर चला गया. कर्जा लेकर सुखीराम ने नई उम्मीदों की फिर से बुवाई की. इस बार उम्मीद धरती का सीना चीरकर ऊपर आई. पूरे खेत में हरी कोंपले फूटी थी. बुधला तो किसी नवयौवना की भांति उछल-कूद रही थी. पूरे 5 साल बाद भूरी धरती पर हरी छटा छाई थी. सपने जैसे आंखों से निकलकर ज़मीन पर बिखरते जा रहे थे.
एक दिन सुखीराम ने पूछा, “बुधली बिजली क्यों नहीं आई खेत में पानी छोड़ना था.” सिर्फ़ उसी दिन नहीं अगले 15 दिनों तक बिजली नहीं आई. कुएं से खेतों को सींचकर अब सुखीराम के हाथों ने भी जवाब दे दिया. फसल की प्यास अब घड़ों और बाल्टियों से बूझनेवाली नहीं थी.
सुखीराम ने अपनी आख़िरी उम्मीद भोलू को फोन लगाया.
भोलू बोला, “बापू मैं तो पहले ही कहता था खेतों में कुछ नहीं रखा. मैं आपकी तरह बंजर ज़मीन पर फसल के झूठे सपने नहीं उगाना चाहता. मुझे शहर में अच्छी नौकरी मिल रही है. मैं अब वापस नहीं आऊंगा. ऐसा किसान किस काम का जिसकी ख़ुद की थाली खाली हो. चार-पांच साल में आपको भी यहां बुला लूंगा.” सुखीराम ने फोन रख दिया.
आज भी कुटिया में लालटेन नहीं जली और शायद यह बंजर ज़मीनों का किसान अब कभी लालटेन जलाएगा भी नहीं.

– विजया कठाले

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Kahani

कितना डर गए होंगे तुम जब वह गाड़ी हमसे टकराई थी. शायद तुमने मुझे ढूंढ़ा भी होगा, कितना दर्द हुआ होगा. पर मेरा दुर्भाग्य मैं तुम्हारे पास थी, पर बेहोश…
कुछ देर बाद शालिनी ने अपने बेजान शरीर और मन को समेटा.

कहानियां या तो सच्ची होती हैं या काल्पनिक, पर कहानियां कभी झूठी नहीं होती. जब व्यक्ति परिस्थितियों के महासागर में ख़ुद को मथता है, तभी जीवन का अमृत ऊपर आता है. ऐसे में किसी न किसी को तो अमृत के साथ निकले विष को पीना ही पड़ता है. यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है, ना झूठी ना काल्पनिक, पर सच्ची..!

कांच का दरवाज़ा खोलकर जब डॉक्टर अंदर आया, तो अर्ध अवस्था में पड़ी शालिनी का दिल रेल की गति से धड़क रहा था. लकवे के कारण दायां शरीर बेजान था, पर मन 12 वर्षीय बेटे की एक झलक पाने को बेचैन था. वह डॉक्टर से अपने बेटे की खोज-ख़बर लेना चाहती थी, पर ना तो हाथ काम कर रहे थे और ना ही जिव्हा में प्राण ही बचे थे. असंख्य नलियों और सुइयों के जाल में वह फंसी हुई थी. डॉक्टर पास बैठ कर बोला, “मैं जानता हूं कि जो बात मैं करनेवाला हूं उसके लिए ना तो यह समय सही है, ना जगह और ना ही परिस्थितियां, आप और हम दोनों जानते हैं पृथ्वी पिछले 15 दिनों से मौत से लड़ रहा है, पर अब हमें ऐसा लगता है कि उम्मीद ना के बराबर है. वेंटिलेटर हटाने का निर्णय आपका होगा. “
शारीरिक और मानसिक तौर पर विवश शालिनी ने डॉक्टर से समय मांगा. वह शिथील-सी बिस्तर पर पड़ी रही. अब उस जाल से बाहर निकलने की जद्दोज़ेहद ख़त्म हो गई थी. अब वह बिस्तर उसे स्मृतियों का अनंत महासागर लग रहा था, जिसमें वह परत दर परत नीचे जा रही थी.
मन के गोताखोर ने स्मृतियों के उस सागर में डुबकी लगाई और वह ख़ुद से बातें करने लगी- पृथ्वी तुम्हारे पापा की मौत के बाद तुम्हारा भविष्य ही तो मेरा जीवन था. तुम जब फुटबॉल खेलते तो लगता जैसे मैं ख़ुद पूरे मैदान में दौड़ रही हूं, तुम्हारे लिए खाना पका कर मेरा पेट भर जाता. उस दिन भी हम कितने ख़ुश थे, जब तक वह एक्सीडेंट ना हुआ था. अगर मुझे पता होता कि वह पल हमारी बातचीत का आख़िरी पल है, तो मैं तुमसे वह सब कुछ कह देती, जो मैं तुम्हें बताना चाहती थी. तुम्हारा माथा चुमती, गले लगाती. कितना डर गए होंगे तुम जब वह गाड़ी हमसे टकराई थी. शायद तुमने मुझे ढूंढ़ा भी होगा, कितना दर्द हुआ होगा. पर मेरा दुर्भाग्य मैं तुम्हारे पास थी, पर बेहोश…
कुछ देर बाद शालिनी ने अपने बेजान शरीर और मन को समेटा.

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दिन में एक बार ब्रेन डेड हुए पृथ्वी को मां का स्पर्श कराने आईसीयू से लाया जाता था, ताकि मां के स्पर्श से पृथ्वी में कुछ हलचल हो. उस दिन भी लाया गया. शालिनी ने अपने अधमरे शरीर से बेटे के सिर पर हाथ फेरा. वह सोच रही थी कि जब इसका जन्म हुआ था, तब यह रोया नहीं था, फिर इसे मेरे छाती पर रखकर मेरी धड़कन सुनाई गई, तब वह रोया था. पर आज शायद ऐसा नहीं होगा…
उसने पृथ्वी के कान में कुछ कहा और फिर डॉक्टर से कहा, “डॉक्टर वेंटिलेटर हटा दें और इसके वाइटल आर्गन किसी ज़रूरतमंद को डोनेट कर दें.”
पृथ्वी को वहां से ले जाया गया.
डॉक्टर ने पूछा, “आपने बेटे से कान में क्या कहा?” शालिनी ने बताया, ” मैंने उससे बोला कि तुम बहुत बहादुर हो, ऐसे ही रहना, मुझे तुम पर गर्व है, क्योंकि तुम कई लोगों को जीवनदान देकर जा रहे हो मेरे बच्चे!.

माधवी निबंधे

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राजीव के ऑफिस जाने के बाद नीता मोबाइल लेकर बैठ गई. यही तो समय होता है उसका अपना. फिर आज तो बहुत ख़ास दिन है. उसने कल रात के चेरी के केक काटने के फोटो सोशल मीडिया पर डाले. फिर देर तक बधाइयों का सिलसिला चलता रहा और नीता लाइक गिनती और कमेंट पर धन्यवाद देती ख़ुश होती जा रही थी कि कितने सारे लोग चेरी को प्यार से दुआएं दे रहे हैं.

आज चेरी का जन्मदिन था. रात बारह बजे ही नीता और राजीव ने केक काटकर जन्मदिन मनाने की शुरुआत कर दी थी. लेकिन चेरी सुबह से ही कुछ अनमनी-सी लग रही थी.
राजीव के ऑफिस जाने के बाद नीता मोबाइल लेकर बैठ गई. यही तो समय होता है उसका अपना. फिर आज तो बहुत ख़ास दिन है. उसने कल रात के चेरी के केक काटने के फोटो सोशल मीडिया पर डाले. फिर देर तक बधाइयों का सिलसिला चलता रहा और नीता लाइक गिनती और कमेंट पर धन्यवाद देती ख़ुश होती जा रही थी कि कितने सारे लोग चेरी को प्यार से दुआएं दे रहे हैं. देश, विदेश तक से भी. उसका ध्यान भी नहीं गया कि चेरी अनमनी-सी कितनी देर से उसके पास बैठी थी. बहुत देर बाद उसने मोबाइल पर आंखें गढ़ाए ही पूछा, “क्या बात है बेटी. कुछ कहना है क्या?”
“मां, तुम मुझे जन्मदिन का कोई उपहार नहीं दोगी क्या?” चेरी ने कहा.
“अरे उपहार तो पहले ही दे दिया है. ड्रेस और नई साइकिल दिला तो दी तुम्हे.” नीता ने जवाब दिया. इतने में चार कमेंट आ चुके थे.
“मुझे कुछ और भी चाहिए.” चेरी बोली.
“क्या चाहिए बोलो, पापा को बता देती हूं शाम को लेते आएंगे.” नीता लोगों को धन्यवाद देते हुए बोली.
“नहीं मुझे तुमसे कुछ चाहिए मां. आज मेरे जन्मदिन पर तुम एक दिन अपना मोबाइल बंद रखकर क्या मुझे अपना पूरा समय दे सकती हो?”

डॉ. विनीता राहुरीकर

Kahaniya


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अगली सुबह मिनी जब ससुरजी के लिए चाय लेकर आई, तो थोड़ा चिढी हुई सी थी… मगर पिता के दिए संस्कार ऐसे थे कि कभी अपनी मर्यादा नहीं भूलती थी. वो ससुरजी को अपने प्रोग्राम के बारे में सूचित करते हुए कहने लगी, “पिताजी, जैसा आपने कहा था मैं शुक्रवार को पापा के यहां जा रही हूं. उनको बता भी दिया है. बड़े ख़ुश थे. कह रहे थे कि वसीयत बनवाने वाले हैं और संपत्ति का आधा हिस्सा मेरे नाम करना चाहते हैं, मगर मैंने साफ़ मना कर दिया. मैंने उन्हें बता दिया कि ऐसा सोचना भी मत, पिताजी बहुत नाराज़ हो जाएंगे.”
“नाराज़… मैं… क्यों?” आशाओं पर पानी फिरा देख ससुरजी हड़बड़ा गए.

       “मिनी बेटा, मैं आज सोच रहा था कि तुम्हें मायके गए हुए सालभर से ज़्यादा हो गया. हम सबका ध्यान रखते-रखते, लगता है तुम अपना मायका ही भूल गई हो... तुम तो अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गई, मगर ज़रा अपने पापा की तो सोचो, उनका मन तुम्हें देखने को कितना तड़पता होगा... भले मुंह से कुछ न कहे, मगर मैं जानता हूं पिता का मन तो बेटी में ही पड़ा रहता है.” 
   सुबह-सुबह ससुरजी के मुंह से ये मिश्री घुले वचन सुनकर मिनी हक्की-बक्की रह गई. सोचने लगी यह आज सूरज कौन-सी दिशा में निकला है... आज तक तो ऐसा कभी नहीं हुआ था. कितना तड़पती है वह मायके जाने के लिए... मगर ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबकर कभी निकल ही नहीं पाती. 
 जब सासू मां ज़िंदा थीं, तो फिर भी बच्चों की गर्मियों की छुट्टियों में चली जाया करती थी, मगर उनके जाने के बाद, तो कभी इस घर की चाकरी से फ़ुर्सत ही नहीं मिली. जब भी मायके जाने का नाम लेती हूं, तो मनीष हमेशा मान जाते हैं, मगर ससुरजी... ये ही सबसे ज़्यादा हल्ला मचाते हैं. कभी कहेंगें, "मुझसे इस उम्र में बाहर का नहीं खाया जाता, पेट ख़राब हो जाता है" जबकि मेरे से छुपकर दोस्तों के साथ ख़ूब होटलों के चक्कर लगाते हैं और शाम को वापस आकर कह देते हैं कि दिन का खाया हजम नहीं हुआ, इसलिए अब डिनर नहीं करूंगा...
     अगर घर पर खाना बनाने के लिए कोई कुक लगा दूं, तो उसके खाने में दस बुराई निकालकर भरी थाली छोड़ खड़े हो जाते हैं. इन्ही के कारण तो पिछले डेढ़ साल से मायके की सूरत नहीं देख पाई, जबकि 5-6 घंटे का ही रास्ता है. पर आज ये गंगा उल्टी की दिशा में कैसे बह रही है... कुछ तो बात है. 
   मिनी को दाल में पक्के से काला नज़र आ रहा था, इसलिए इतना बड़ा ऑफर सुनने के  बाद भी उसके चेहरे पर कोई उत्साह न देख ससुरजी ने आगे बोलना शुरू किया,  “दरअसल, आज तुम्हारे पिताजी का फोन आया था. सबके हालचाल पूछ रहे थे. मैं तो उनके स्वर से ही उनकी पीड़ा समझ गया कि वे तुमसे मिलने को कितने ललायित हैं, मगर खुलकर कुछ कह नहीं पा रहे हैं. ऐसा करो, दो-चार दिन मायके रह आओ, उनको भी अच्छा लगेगा और तुम्हारा भी चेंज हो जाएगा.” यह अविश्वसनीय प्रस्ताव सुनकर मिनी जैसे बेहोश होते-होते बची.
 “वो तो ठीक है पिताजी, मगर अभी बच्चों की छुट्टियां कहां हैं.” 
“अरे, कौन-सा बच्चे वकालत की पढ़ाई कर रहे हैं, जो दो-चार दिन में बड़ा नुक़सान हो जाएगा... एक पांचवी में है, दूसरा दूसरी में... दो दिन की छुट्टी करा लो, शनिवार-इतवार लगाकर 4 दिन में आ जाना.”  मिनी को यह उदारता अभी भी हजम नहीं हो रही थी फिर भी कुछ पूछ नहीं पाई, इसलिए वहां से चुपचाप चली आई. 


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   शाम को मनीष को जब बताया, तो वह भी चकित रह गए. 

“पिताजी ऐसा बोल रहे हैं. मैंने तो जब भी उनसे ऐसा कुछ कहता हूं, दस बातें सुना डालते हैं, मायके में रहने का इतना शौक था, तो ब्याह ही क्यों किया था… शादी के बाद लड़की की पहली ज़िम्मेदारी ससुराल की बनती है. मायके के लिए तो वह मेहमान होती है… वगैरह…वगैरह… ऐसा करो मिनी, इससे पहले कि उनका दिमाग़ पलटे चुपचाप मायके निकल लो और मैं तो कहता हूं 2-4 दिन नहीं, बल्कि एक-दो हफ़्ते लगाकर मन भर रह आओ…” मनीष ने चुटकी ली.
शाम को सब बैठे डिनर कर रहे थे, तो ससुर ने पुनः पूछा, “तो बहू क्या सोचा तुमने?”
मिनी की बजाय मनीष ही बोल पड़े, “सोचना क्या है पिताजी आप इतना कह रहे हैं, तो चली जाएगी. मैं कल ही उसके टिकट निकलवा लूंगा.” पतिदेव की तत्परता देख मिनी मुस्कुरा उठी.
“हां.. हां.. ज़रूर जाओ बहू, सचमुच तुम्हारे पिताजी का सोचता हूं, तो बड़ा लगता है तुम्हारी माताजी के देहांत के बाद वह अकेले रह गए हैं.”
“अकेले क्यों, भैया-भाभी भी तो साथ हैं और वे पिताजी का भरपूर ध्यान रखते हैं.” मिनी को ससुरजी के कहने का तरीक़ा थोड़ा अखरा.
“हां ध्यान तो रखते हैं, मगर पिता का दिल तो बेटी में पड़ा ही होता है. मैं तो उन्हें कितनी बार बोल चुका हूं, दो-चार दिन के लिए यहां आकर बिटिया के पास भी रहा करें. हमें भी अच्छा लगेगा.” मिनी दोबारा बेहोश होते-होते बची. यह क्या हो गया आज पिताजी को… मेरे पापा जब कभी यहां पर आए और चाय-नाश्ता भी कर लिया, तो अगले 2 दिनों में ही ये यही सुनाते रहे कि शास्त्रों में तो बेटी के घर का खाने वाला नरकगामी बताया गया है. सास कुछ न कहती, मगर ससुरजी ताने मारने का कोई मौक़ा ना छोडते… कभी कहते कन्यादान के बाद कन्या मायके के लिए पराई हो जाती है. दो-चार दिन मेहमान बनकर रहती है और लौट आती है… उसका वहां कोई हक़ नहीं रहता, पर आज तो ससुरजी महानता की मूर्ति बने जा रहे हैं.
“अरे आजकल बेटा-बेटी में कुछ फ़र्क थोड़े ही है… माता-पिता पर दोनों का ही बराबर का हक़ बनता है. आजकल तो सरकार ने भी क़ानून बना दिया है कि पिता की संपत्ति में बेटा-बेटी का बराबर का हक़ है… मेरे कोई बेटी नहीं, वरना में उसे अपनी संपत्ति में हिस्सा ज़रूर देता…”
संपत्ति और हिस्से जैसे शब्द सुन मिनी को यकायक झटका लगा. पिता की संपत्ति में बेटी का हक़…आज पिताजी ये कौन-सा नया राग छेड़ रहे हैं… पापा कुछ दिनों पहले वसीयत बनवाने की बात, तो कह रहे थे… ओह! कहीं इसीलिए तो मुझ पर यह अतिरिक्त प्रेम नहीं उमड़ रहा… मेरी भावनाओं की यकायक चिंता होने लगी, मिनी थोड़ा चौकन्नी हो गई.
मनीष ने डिनर के बाद ही अगले शुक्रवार की ट्रेन की ऑनलाइन बुकिंग करा दी थी. बच्चों को जब पता चला, तो वे आज से ही पढ़ाई-लिखाई छोड़ ननिहाल की बातें करने लगे… नानू कैसे उन्हें अपने साथ बाज़ार ले जाकर मनपसंद आइसक्रीम खिलाते थे… मामी कैसे उनके लिए नई-नई डिश बनाती थी… उनके बच्चों के साथ कैसे सारा दिन धमाचौकड़ी मचती थी और मामा… वो तो उनके लिए जैसे अलादिन का जिन्न थे, वे जो-जो फ़रमाईश करते जाते, पल में हाज़िर कर देते… कोई पिक्चर देखनी हो, वीडियों गेम खेलना हो… या कहीं घूमने जाना हो… कुछ भी. सच, मिनी अपने से ज़्यादा बच्चों की ऐक्साइटमेंट देखकर ख़ुश थी. कारण जो भी हो, मगर ससुरजी के लिए उसके दिल से धन्यवाद निकल रहे थे.

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रात को फोन पर उसने पापा को अपने आने का प्रोग्राम बताया, तो वे बहुत ख़ुश हुए. कहने लगे, “आज ही तेरे ससुर साहब से सुबह बात हुई थी. सोचा नहीं था, वे तुझे इतनी जल्दी भेजने को तैयार होंगे.” 

“वो तो ठीक है पापा, मगर क्या आपने उनसे कुछ और भी बात की थी… कुछ प्राॅपर्टी से संबंधित…”
“हां, कही तो थी. उन्हें बताया था कि इस सप्ताह वसीयत बनवा रहा हूं, यही आख़िरी काम बचा है, इसे निपटाकर सारी ज़िम्मेदारियों से फ्री हो जाऊंगा… अब तू आ ही रही है, तो अच्छा है, जो कुछ है, तुम दोनों के सामने आधा-आधा बांटकर चैन की सांस लूंगा.”
अब मिनी को सारा माजरा समझ आ गया कि क्यों ससुरजी उसे मायके भेजने के लिए इतने उतावले थे. वे चाहते थे कि मैं मायके जाऊं और वसीयत मेरे सामने बने, ताकि मुझे मेरा हिस्सा मिल जाए… इतने प्यार और परवाह में लपेटकर जिस तरह से उन्होंने अपनी मंशा दिखाई, उसे सोचकर ही मिनी का मन कसैला हो उठा.
वैसे पापा के पास संपत्ति के नाम पर है ही क्या, सारी जमा-पूंजी तो हमारी पढ़ाई-लिखाई और शादी पर ही लगा दी. ले देकर एक दो मंज़िला मकान है. भाई को तो पीछे से प्राॅपर्टी के नाम पर वही एक सहारा है, मैं उसमें से भी हिस्सा ले लूं..? छीः ससुरजी ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं? क्या कमी है उनके पास… दो-दो मकान हैं, एक प्लॉट है, मनीष इकलौते बेटे हैं.. फिर क्यों इतनी हाय-हाय?
अगली सुबह मिनी जब ससुरजी के लिए चाय लेकर आई, तो थोड़ा चिढी हुई सी थी… मगर पिता के दिए संस्कार ऐसे थे कि कभी अपनी मर्यादा नहीं भूलती थी. वो ससुरजी को अपने प्रोग्राम के बारे में सूचित करते हुए कहने लगी, “पिताजी, जैसा आपने कहा था मैं शुक्रवार को पापा के यहां जा रही हूं. उनको बता भी दिया है. बड़े ख़ुश थे. कह रहे थे कि वसीयत बनवाने वाले हैं और संपत्ति का आधा हिस्सा मेरे नाम करना चाहते हैं, मगर मैंने साफ़ मना कर दिया. मैंने उन्हें बता दिया कि ऐसा सोचना भी मत, पिताजी बहुत नाराज़ हो जाएंगे.”
“नाराज़… मैं… क्यों?” आशाओं पर पानी फिरा देख ससुरजी हड़बड़ा गए.
“आप ही तो कहा करते थे पिताजी, कन्यादान के बाद लड़की पराई हो जाती है, उसका मायके पर कोई हक़ नहीं रहता… अब जब कोई हक़ ही नहीं बचता, तो फिर संपत्ति में कैसे हक़ बनता है… मैंने उन्हें बता दिया कि ऐसा करने पर आपको बहुत बुरा लगेगा…”
ससुर साहब का चेहरा उतर गया, फिर बात संभालते हुए बोले, “अरे, वो सब तो पुराने चलन हैं, बेटी… आजकल यह सब कौन मानता है. आजकल तो बेटा-बेटी बराबर हैं. पहले हमें समझ नहीं थी, इसलिए ऐसा कह गए होगे.. मगर अब हमने भी ज़माने के हिसाब से चलना सीख लिया है. देखो, तुम मना मत करो. उस घर में तुम्हारा हिस्सा रहेगा, तो पिता के बाद भी तुम्हारा मायका खुला रहेगा. भाई-भाभी इज्ज़त करेंगे, वरना तो रिश्तों को बदलते देर नहीं लगती.” पिताजी बोलते जा रहे थे और मिनी भीतर ही भीतर सुलग रही थी. ‘अपने हिसाब से रिश्तों की बिसात बैठाना और उसे अपने मतलब के लिए आज़माना, तो कोई आपसे सीखे पिताजी’ मगर संस्कारवश चुप रही. फिर थोड़ी देर कुछ सोचकर बोली, “ठीक है पिताजी, यदि आप मानते हैं कि बेटा-बेटी दोनों का बराबर हक़ है, तो ऐसा ही सही, मैं उन्हें मना नहीं करूंगी.” सुनकर पिताजी के चेहरे पर मुस्कान दौड़ आई. आंखों में लालच के डोरे तैरने लगे. मिनी बनावटी मुस्कान लिए उठ खड़ी हुई.
कामकाजी स्त्रियों के लिए दिन गुज़रते देर नहीं लगती, दिन इधर शुरू होता है, उधर ख़त्म.. मिनी के ये 4-5 दिन इसी गति से गुज़र उस मुक़ाम पर आकर खड़े हो गए थे, जहां वह ट्रेन में बैठ गई थी. अपने मायके जाने के लिए.
जैसे-जैसे ट्रेन खेत-खलिहानो से गुज़रते हुए मायके के शहर की ओर बढ़ रही थी, मिनी का दिल बल्लियों उछलने लगा था, क्योंकि मायका किसी मकान का नाम नहीं होता… ना ही मायका किसी एक परिवार तक सीमित होता है… मायके की परिधि में तो वो पूरा शहर और उस तक जानेवाले तमाम रास्ते भी समाए होते हैं… किसी एक पर पग रखने की देर होती है, लगता है, मायके की चौखट छू ली…


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घर पहुंचकर मिनी के भईया-भाभी ने उनका ख़ूब सत्कार किया. पापा से भी भरपूर दुलार मिला. तरस गई थी इस सुख के लिए. थक गई थी, मां, बहू और पत्नी बनते हुए... कुछ दिन ही सही, उसने लाड़ली बेटी होने का पूरा लुत्फ़ उठाया. बात जब वसीयत की आई, तो उसने कुछ भी लेने से मना कर दिया. मगर भईया उसे समझाने लगे, “देख मिनी, कमी ना तेरे पास है, ना मेरे पास है. पापा का जो दिल कर रहा है, उन्हें करने दे. उन्होंने अपने दोनों बच्चों में कभी फ़र्क नहीं किया. अगर आज करेंगे, तो अपराधबोध से घिरे रहेंगे, जो उनकी सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा. इसलिए वो जो भी देना चाहते हैं, उसे उनकी ख़ुशी के लिए, उनका आर्शीवाद समझकर रख ले.”
बहुत समझाने पर मिनी ने पापा की बात मान ली. उसने मायके से ही पिताजी को फोन पर बता दिया था कि पिताजी ने भाई की सहमति से घर में उसे भी हिस्सा दिया है और वह दो दिन बाद लौट रही है. यह ख़बर सुन उसके ससुर बहुत ख़ुश थे. अब तो बस बहू का इंतज़ार था, ताकि आकर वापस पहले की तरह घर संभाल ले. 
मिनी जब घर में आई, तो ससुर अचंभित रह गए, क्योंकि दो बडे सूटकेस के साथ उसके पापा भी साथ आए थे. मनीष ने उनकी भाग-भागकर आवभगत की और उनका सामान गेस्ट रूम में रख दिया. 

“बहू, समधीजी यहां किसी डाॅक्टर को दिखाने आए हैं क्या? तबियत ढ़ीली-सी लग रही है उनकी… वैसे उनका कितने दिनों का प्रोग्राम है?” ससुरजी बड़ी चतुराई से समधी के आने की वजह जानना चाह रहे थे.
“पापा तो बिल्कुल भले-चंगे हैं पिताजी. किसी को नहीं दिखाना है, न ही कहीं जाना है. दरअसल, आपने ही कहा था ना कि आज के ज़माने में बेटा-बेटी का बराबर का हक़ है , बेटियों को भी संपत्ति में बराबर का हक़ मिलना चाहिए, इसीलिए संपत्ति के साथ-साथ मैं भईया से अपने हक़ के पापा भी साथ ले आई. मेरी मायके की असली पूंजी तो वही हैं ना… मैंने भईया से कहा, ‘तुमने बहुत साल पापा की सेवा कर ली, अब मेरी बारी है, इसलिए आज से पापा हमारे साथ ही रहेंगे. जैसे एक पापा का ध्यान रखती हूं, वैसे दूसरे पापा का भी रखूंगी…” कहकर आत्मविश्‍वास से भरी एक बेटी अपने पापा को उनका कमरा दिखाने चली गई. अब बेहोश होने की बारी उसके ससुर साहब की थी.

Deepti Mittal
दीप्ति मित्तल

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Story

वह बेसब्री से विनय के आने के दिन गिनने लगी थी. सोच रही थी कि विनय आए और बीमार होने पर डांट-डपट करे… ज़बर्दस्ती खिचड़ी खिलाए.. उस पर सौ पाबंदियां लगाए… 4 स्वेटर पहनाए… चाहे तो कोट पहनकर सोने के लिए कहे. अब वह बिल्कुल नहीं चिढ़ेगी… सारा कहना मानेगी.
सोच-सोचकर उसकी आंखें विनय के प्रति दिल में उमड़ आए भावों से भरती जा रही थी.

”शुभा, सो गई क्या? लो खाना खालो.”
”खाना..?” पुलकित सी वह फटाफट रजाई फेंक, उठ खड़ी हुई, ”हां, बहुत भूख भी लग रही है.” बेचैनी से प्लेट पकड़ती हुई वह बोली, लेकिन यह क्या, ”फिर मूंग की खिचड़ी… मुझे तो आज खाना खाना है.” वह बच्चों की तरह तुनकते हुए बोली, ”लक्ष्मी को बुलाओ जरा.”
”लक्ष्मीईईई…” उसने ज़ोर से आवाज़ दी. लक्ष्मी दौड़ती हुई आ गई, ”जी भाभीजी.”
”तूने फिर मेरे लिए मूंग की खिचड़ी बनाई?”
”भैया ने कहा.” उसके ग़ुस्से को नज़रअंदाज़ करती लक्ष्मी, विनय की तरफ़ देख कुटिलता से मुस्कुराई.
”क्यों? आज तो छह दिन हो गए… मेरी तबीयत तो अब बिल्कुल ठीक है.”
”अभी तक तुम्हें कमज़ोरी की वजह से चक्कर आ रहे है… कुछ दिन खिचड़ी खानी पड़ेगी. ” उसके तुनकने का विनय पर लेशमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ा. वे गंभीर मुखमुद्रा में थे.
”मुझे नहीं खानी है खिचड़ी… मुझे खाना खाना है.”
”खिचड़ी भी खाना ही होती है.”
”ऊब गई मैं खिचड़ी खाते-खाते… खिचड़ी ही खिलानी थी, तो कम से कम पुलाव जैसा बना देती है लक्ष्मी.” वह लक्ष्मी की तरफ़ देखकर बोली. सुनकर लक्ष्मी पल्लू में मुस्कान दबाए वापस पलट गई.
”और चाहिए होगा, तो आवाज़ दे देना.” कहते हुए विनय भी कमरे से बाहर निकल गए.
”और चाहिए… माई फुट… इसी को देखकर उल्टी आ रही है…” वह ग़ुस्से में बड़बड़ाई.
तभी फोन की घंटी बज उठी. फोन समीर का था. एक बार तो दिल किया फोन पर ही समीर का गला दबा दे. उस दिन बहला-फुसलाकर बुलाया था, एक चाइनीज़ रेस्तरां में, ‘आजा बढ़िया ट्रीट दूंगा… मेरा प्रमोशन हुआ है‘ समीर उसके बचपन का स्कूल, काॅलेज का दोस्त था.
वह भी चली गई. इतना तीखा-चटपटा, खाते समय तो बहुत मज़ा आया, पर दूसरे दिन पेट ख़राब हो गया. विनय तब ऑफिस में थे. पहले तो सोचा कि विनय को बताए ही ना, इसलिए उसने जो दवाइयां घर पर उपलब्ध थी, खा ली.
विनय को बताने का मतलब, मूंग की खिचड़ी… वो भी न जाने कितने दिनों तक. उन्हें सेफ साइड में रहने की आदत जो है. फिर उसके कहीं आने-जाने पर, कमज़ोरी का हवाला देकर, पूर्ण प्रतिबंध… इसीलिए वह अपनी छोटी-मोटी बीमारियां विनय से अक्सर छिपा देती है.
”हैलो…” फोन उठाते हुए वह बोली.
”कैसी हो..?” समीर का स्वर कुछ उदास व दर्दीला था.
”कैसी हो मतलब… 6 दिन में तुमने एक भी फोन नहीं किया. पता भी है, उस दिन से तबीयत कितनी ख़राब है… तब से मूंग की खिचड़ी खा रही हूं.” वह सारा ग़ुस्सा समीर पर निकालते हुए बोली.
”ओह! तो क्या तुम भी..?” उसकी आवाज़ में कुछ राहत उभर आई.
”मैं भी मतलब..?”
”क्योंकि मैं भी उस दिन से खिचड़ी खा रहा हूं… सौम्या कुछ और खाने को ही नहीं दे रही…”
शुभा ठहाका मारकर हंस पड़ी, ”बड़ा ज़बर्दस्त अटैक था उस चाइनीज़ फूड का.”
”तुम हंस रही हो… पता भी है, भूख के मारे पेट में चूहे कूद रहे हैं…”
”मेरे भी…” शुभा खिचड़ी को घूरते हुए बोली.
”यार किन के पल्ले पड़ गए हैं… मां-बाप ने कहां फंसा दिया… तुझ से कहा था उस समय… भाग चल मेरे साथ…”


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”ऐसे कैसे भाग जाती… नौकरी तो थी नहीं तुम्हारी… हम दोनों के माता-पिता जात-पांत में उलझे थे, जिनको ग़लती से पसंद आ गई थी, वे जल्दी शादी के लिए पीछे पड़े थे… मेरे माता-पिता तुम्हारी डर से आनन-फानन में मेरी शादी निबटा देना चाहते थे… बताओ कैसे भागती… दोनो सड़क पर भीख मांगते क्या?”
बचपन के दोस्त शुभा व समीर एक ही काॅलोनी में रहते थे. दिल-दिमाग़, विचार, स्वभाव सब में समान थे. दोनों की बहुत पटती थी. एक-दूसरे के घर में आना-जाना था. दोनों के घरवाले उन्हें पसंद करते थे. लेकिन जब शुभा ने मां से कहा कि वह समीर से शादी करना चाहती है, तो घर में जैसे प्रलय आ गई.
समीर तो अपने घर में कुछ बोल भी न पाया था कि यह ख़बर उसके घर के पिछले दरवाज़े से प्रवेश कर गई और दोनों के पिता हिटलर बन गए. लेकिन यह सब इतनी शांति से चुपचाप हुआ कि दोनों कुछ न बोल पाए और शुभा की शादी विनय से हो गई.
दोनों परिवारों ने उन्हें ऐसे जताया जैसे कुछ हुआ ही न हो. 3 साल बाद समीर का विवाह भी हो गया और सभी परिवारों ने उनकी बचपन की दोस्ती को इज्ज़त के साथ स्वीकार कर लिया गया.
”मेरे कहने से उस समय भाग जाती, तो भीख मांगकर ही गुज़ारा कर लेते थोड़े दिन, पर यह आए दिन की खिचड़ी तो न खानी पड़ती.” समीर भी शायद अपने घर में उस समय खिचड़ी को ही घूर रहा था.
”पता है, मुझे तो कभी-कभी लगता है कि विनय मुझ पर अपनी खुंदक निकालने का मौक़ा ढूंढ़ते रहते हैं… ज़रा-सा बीमार हुई नहीं कि खिचड़ी…” शुभा ने अपनी भड़ास निकाली.
”हां, सही कह रही है… सौम्या का भी मुझे यही लगता है.” समीर ने शुभा की हां में हां मिलाई.” हम दोनों कितने अच्छे हैं ना… जरा भी डोमिनेट नहीं करते एक दूसरे को.”
”मैं तुम्हें कभी खिचड़ी खाने के लिये ज़बर्दस्ती न करती…” शुभा ने लंबी आह भरी.
”मैं भी…” समीर ने उसकी बात का अनुमोदन किया, ”अच्छा, गुड नाइट… कोशिश करता हूं इस नामुराद खिचड़ी को खाने की…”
बात चाहे खिचड़ी की हो रही थी, पर शुभा व समीर का दिल हर वक़्त एक-दूसरे में ही अटका रहता था. शादी तो माता-पिता ने कर दी थी. अच्छे पति-पत्नी की तरह निभा भी रहे थे, पर हर समय उनके दिलो-दिमाग़ में एक-दूसरे को न पाने की कसक बनी रहती. हालांकि दोनों का बचपन का दोस्तानाभरा प्यार बिल्कुल सात्विक था. दिल में कोई विकार न था, पर एक-दूसरे पर भरोसा ऐसा कि कोई भी बात अपने लाइफ पार्टनर को बताने से पहले एक-दूसरे को बताते थे.
शुभा जितना विश्‍वास समीर पर करती, उतना किसी पर नहीं. यही हाल समीर का था. दिल तो दोनों का करता कि उनकी बातें कभी ख़त्म ही न हो, पर मजबूरी थी. ख़ूबसूरत, गुण संपन्न शुभा हर समय समीर के दिमाग में छाई रहती. वही उसकी पहली पसंद थी. वह हर वक़्त सौम्या में शुभा की झलक ढूंढ़ता रहता.
शुभा की शादी को 20 साल से अधिक हो गए थे. उसके दोनों बच्चे स्कूल की पढ़ाई पूरी करके बाहर पढ़ने चले गए थे. पर समय ने, शादी ने, उम्र ने उन दोनों के रिश्ते में रंचमात्र भी दरार नहीं डाली. लगता था जैसे विधि ने उन्हें एक-दूसरे का पूरक तो बनाया, पर जोड़ी बनाना भूल गया. प्रेम, स्नेह, ममता, विश्‍वास की जो मिलीजुली भावनाएं उनके दिलों में एक-दूसरे के लिए उभरती वह अपने लाइफ पार्टनर के लिए कभी न उभरती.
ग़मगीन-सी शुभा खिचड़ी खाने की कोशिश करने लगी. तभी विनय मोबाइल उठाए आ गए, ”लो बात करो… कार्तिक का फोन है…”
”हैलो..” खिचड़ी खाते हुए वह बेटे से बात करने के लिये ज़रा भी उत्सुक नहीं थी.
”हैलो माॅम… कैसी हैं आप… पापा कह रहे थे कि अभी भी बहुत कमजो़री है… अपना ध्यान रखिए… अभी कुछ दिन खिचड़ी ही खाइए.” कार्तिक कुछ दबे स्वर में बोला. शुभा को लगा, कार्तिक हंसी दबाकर बोल रहा है.
”तेरा गला मुझे ख़राब लग रहा है… कोल्ड ड्रिंक पीना बंद क्यों नहीं करता कुछ दिन.” शुभा ने नहले पर दहला मारा.
”मेरा गला बिल्कुल ठीक है माॅम…” वह खंखारता हुआ बोला, “पर आप अपना पूरा ध्यान रखिए और अभी कुछ दिन खिचड़ी ही खाइए.”


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”उफ़!” शुभा फोन पटकते-पटकते रह गई, क्योंकि कार्तिक तब तक फोन बंद कर चुका था. कल के बच्चे भी फ्री की सलाह दे देते हैं. वह 2-4 चम्मच खिचड़ी निगलकर, प्लेट किचन में रखने के लिए उठी, तभी विनय आ गए.
”कहां जा रही हो..?”
”जहन्नुम.” वह मन ही मन भुनभुनाई. “किचन में प्लेट रखने जा रही हूं.”
”अरे, पर तुमने तो कुछ खाया ही नहीं.” उसे लगा विनय मुस्कुरा रहे हैं, पर वास्तव में ऐसा नहीं था.
”हां, छप्पन पकवान धरे थे न प्लेट में… देखकर ही मन भर गया.” वह बड़बड़ाई.
”तुम सो जाओ. प्लेट मैं रख देता हूं.” प्लेट लेकर विनय बाहर चले गए.
“ये विनय भी न… पति कम पिता ज़्यादा हैं, केयर करने पर उतरते हैं, तो ऐसा उतरते हैं कि न चाहते हुए भी उसे बचपन के दिन याद आ जाते हैं. जब मां पेट ख़राब होने पर खिचड़ी खिलाती थी और ज़ुकाम होने पर काढ़ा पिलाती थी.
”ई.ई…ई…यूयू यू…” काढ़े का स्वाद याद आते ही उसे उल्टी आने को हुई. शादी के पहले तक उसने दवाइयां नहीं के बराबर खाई थीं. मां घर के नुस्खे़ ही आज़माती थी, पर विनय तो उसे हर छोटी-मोटी तकलीफ़ में भी डाॅक्टर के पास ले जाते और दवाइयां खिला देते थे. यहां तक कि उसके बच्चे भी दवाइयां खा-खाकर ही बड़े हुए. आजकल के बच्चों के पास, तो बीमार होने का भी टाइम नहीं है. ‘बस दवाई खाओ और काम पर जाओ…‘ बुदबुदाते हुए वह लेट गई.
सुबह उठी, तो उसे अपनी तबीयत और भी सही लग रही थी. उसका दिल किया कुछ अच्छा-सा नाश्ता करे. बढ़िया-सा तैयार होकर अपनी किसी सहेली के घर जाए, लेकिन उसे ख़ुद की तबीयत ठीक लगने से क्या फ़ायदा. सोचते-सोचते वह क्षुब्द हो गई. उसकी तबीयत ठीक है या नहीं… यह भी उसे विनय ही बताएंगे. उसका मूड फिर ख़राब होने लगा.
वैसे चाहे उसे पूछे न.. पर उसके बीमार होने पर विनय उसके आगे-पीछे ऐसे घूमने लगते हैं, जैसे पक्का प्रबंध कर रहे हों कि दोबारा बीमार न पड़े. सर्दियों में घर से बाहर जाते समय उसके पहने हुए कपड़े गिनते हैं. कम लगे, तो ऊपर से जैकेट पहनने का हुक्म सुना देते.
सोचते-सोचते अचानक उसे ताव आ गया… भन्नाती हुई बुदबुदाई, ‘अरे यार पति, पति जैसा होना चाहिए… बिल्कुल दोस्त जैसा… कभी नोक-झोंक हो, तो कभी खट्टा-मीठा झगड़ा… फिर रूठना-मनाना… कभी बेपरवाह हंसना… कभी चाट गली में चाट खाना, फिल्म देखना, बाहर खाना. कभी आपस में लड़ाई हो, तो पड़ोसी देश बन जाएं… कभी मिट्ठी हो, तो खिचड़ी पक जाए.‘
“ओह खिचड़ी…” शुभा को फिर खिचड़ी याद आ गई. लंबी सिसकारीभर कर सोचने लगी, ‘काश! विनय आज टूर पर चले जाएं और वह अपनी सहेलियों के साथ डे आउट करे या फिर समीर के साथ फिल्म देखे, बाहर लंच करे‘ कितना मज़ा आएगा.
‘समीर की बीवी सौम्या भी पक्की बोर चीज़ है. गंभीरता से गृहस्थी चलानेवाली… ज़रा भी मस्ती नहीं उसमें. समीर भी जब-तब यही शिकायत करता है. वह बिल्कुल विनय जैसी है. विनय को भी कोई शौक नहीं… बस ऑफिस जाना और घर आना.‘
विनय तो जैसे ताक में ही रहते हैं कि कब शुभा बीमार पड़े और कब उसे खिचड़ी खिलाए. बच्चों के साथ भी यही करते थे. शुभा इस बात पर रोज़ अफ़सोस करती कि क्यों न भाग गई, उस समय समीर के साथ. समीर में तो कोई कमी ही नहीं है, बिल्कुल वैसा है जैसा वह चाहती है.
लंबा-ऊंचा समीर जैसा दिखता है, वैसा ही मस्तमौला भी है. गंभीरता भी है और मस्ती भी… नोक-झोंक पर उतरता है, तो हंसा-हंसाकर पेट दुखा देता है. जब किसी बात पर समझाता है, तो गुरू बन जाता है. उसके उदास होने पर उसके और उसकी उदासी के बीच ढाल बन जाता है. ये नहीं कि ज़रा-सी बीमारी में पटाक से खिचड़ी खिला दे.
ख़ैर कुछ दिनों में वह बिल्कुल ठीक हो गई और ज़िंदगी फिर अपनी रफ़्तार से दौड़ने लगी. इसी बीच विनय को 15 दिनों की ट्रेनिंग के लिए मुंबई जाना पड़ा. ‘अब आयेगा मज़ा‘ शुभा ने सोचा. विनय के साथ तो ज़िंदगी सूखी रोटी-सब्जी जैसी थी, इसलिए विनय के जाते ही उसने अपनी सभी सखी-सहेलियों व समीर को भी सब कुछ बता दिया.
10-12 दिन तो उसके ख़ूब मस्ती में बीते, ‘पता नहीं ये मस्ती विनय के साथ क्यों नहीं हो पाती…‘ इन दिनों हल्की सर्दी होते हुए भी स्वेटर नहीं पहना… अक्सर बाहर ही खाया. समीर के साथ भी ख़ूब गप्पें लड़ाई. वह अपनी मस्ती में विनय की अनुपस्थिति ख़ूब एंजॉय कर रही थी.
लेकिन एक दिन उसे अपनी तबीयत कुछ गिरी हुई सी लगने लगी. गले में दर्द शुरू हुआ और बुखार ने आ घेरा. अपने प्रति वह हमेशा से लापरवाह थी. आदत पड़ गई थी इतने सालों में कि विनय अपने आप देखेंगे. एक ही रात में बुखार सीधे 103 चला गया. समीर को फोन किया. वह आया और उसे डाॅक्टर को दिखा लाया. लोकल होने की वजह से मां उसके पास रहने आ गई.
लेकिन बुखार की तीव्रता में बिस्तर पर लेटे-लेटे एकाएक विनय बहुत याद आने लगे. मां उसे ज़बर्दस्ती कुछ खाने के लिए कहती, तो वह चिढ़ जाती. मां हारकर चुप हो जाती, लेकिन विनय चुप न होते थे. अपने हाथ से चाहे दो चम्मच ही सही पर खिलाकर ही मानते थे.


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उसे तो इतनी ज़्यादा केयर व पैंपर होने की आदत पड़ गई थी कि विनय की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता था. समीर जब-तब कह देता, ‘क्या यार 2 दिन में ही पस्त हो गई… इतने बुखार में तो मैं ऑफिस जाता हूं‘
सुनकर उसे विनय की याद और शिद्दत से आती. यों तो सभी उसका ख़्याल रखने की कोशिश कर रहे थे, पर उसे तो लग रहा था कि विनय नहीं है, इसीलिए वह ठीक नहीं हो रही है. वह बेसब्री से विनय के आने के दिन गिनने लगी थी. सोच रही थी कि विनय आए और बीमार होने पर डांट-डपट करे… ज़बर्दस्ती खिचड़ी खिलाए.. उस पर सौ पाबंदियां लगाए… 4 स्वेटर पहनाए… चाहे तो कोट पहनकर सोने के लिए कहे. अब वह बिल्कुल नहीं चिढ़ेगी… सारा कहना मानेगी.
सोच-सोचकर उसकी आंखें विनय के प्रति दिल में उमड़ आए भावों से भरती जा रही थी. यह सच है कि समीर उसकी दिली पसंद है, पर विनय उसकी आदत है. पसंद तो समय के साथ बदल जाती है, लेकिन इतने सालों की आदत नहीं छूट सकती. हालांकि समीर के आभामंडल की तपिस से वह जब-तब पिघल जाती है, पर विनय की शीतलता के सुरक्षा घेरे की आदत हो गई है उसे.
सोचते-सोचते उसे नींद आ गई. बुखार की बेहोशी में वह न जाने कितनी देर तक सोती रही. तभी उसे अपने माथे पर किसी के हाथों का स्पर्श महसूस हुआ. उसने जल्दी से आंखें खोली, “अरे तुम… कब आए? तुमको तो परसों आना था…” पुलकित हो वह सुखद आश्चर्य से बोली.
”मां से तुम्हारे बीमार होने का पता चला… इसलिए किसी तरह जल्दी आ गया. मां कह रही थी कि तुम बिना कुछ खाए ही सो गई… लो थोड़ी-सी खिचड़ी खालो… कपड़े नहीं पहने होंगे ठीक से… इसीलिए सर्दी-बुखार हो गया… तुम्हें किसी बात का ध्यान तो रहता नहीं है.” विनय बड़बड़ा रहे थे और वह मुग्ध भाव से उन्हें निहार रही थी. लग रहा था अब वह जल्दी ठीक हो जाएगी. वह कुछ बोलने को हुई, तो विनय अपनी ही रौ में बोले, ”कुछ और नहीं मिलेगा… चुपचाप ये खिचड़ी खाओ… कम से कम 15 दिन तो तुम्हें अब खिचड़ी खानी पड़ेगी. वह मन ही मन हंस पड़ी.. ‘खिचड़ी की बारगेनिंग‘ तो बाद में कर लेगी. अभी तो वह विनय के ग़ुस्से के पीछे के प्यार में डूब गई थी.
”जितने दिन कहोगे… उतने दिन खिचड़ी खाऊंगी… जब तक कहोगे… घर से बाहर कदम भी नहीं रखूंगी…” कहते हुए उसने मुंह खोल दिया. विनय ने हंसकर उसके मुंह में खिचड़ी डाल दी. अनायास ही उसकी पलकें भीग गईं.
”क्या हुआ…” द्रवित हो विनय उसके पास बैठ गया.
”कुछ नहीं…जब तुम खिलाते हो न, तो खिचड़ी बहुत स्वादिष्ट लगती है.” वह प्लेट एक तरफ़ रख, विनय से लिपट गई. पहली बार एक निश्छल प्रेम की खिचड़ी उनके बीच पकने लगी थी.

Sudha Jugran
सुधा जुगरान

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“सर, खाना चाहे जहां मिले, बस मां के हाथों का हो. वो मां चाहे जिसकी हो, स्वाद होता ही है.” यह सुनकर महेंद्र ने कहा था, “मैंने अपनी मां को हमेशा फाइलों में उलझे देखा है. उन्हें खाना बनाना सख़्त नापसंद था. जो कभी कुक छुट्टी लेता भी था, तो वह होटल ही ले जाती थी या खाना घर आ जाता था.”
“ओह! फिर तो आप रहने ही दीजिए. आप स्वादिष्ट ही परोसिए. तुष्टिदायक खाने का स्वाद आप नहीं समझेंगे…”

“सर, आपने मुझे बुलाया है क्या..?”
“हां विकास, कल सुबह अहमदाबाद में एक काॅन्फ्रेंस है. मुझे अभी वहां के लिए निकलना है, तुम भी साथ चलो, अगर कोई दिक़्क़त न हो तो…” होटल के मैनेजर महेंद्र ने अपने सुपरवाइज़र विकास से पूछा, तो वह बोला, “हां सर, कोई दिक़्क़त नहीं है, पर जा कैसे रहे हैं? बाय रोड जा रहे हैं, तो अति उत्तम. सर बाय रोड जाने पर रास्ते में मेरा गांव ‘मेनार’ आएगा. सर, इन दिनों वहां बड़े प्रवासी पक्षी आते है. इस वक़्त फ्लेमिंगो भी दिख जाएगी…”
अपने प्रकृति प्रेमी मैनेजेर के सामने पक्षी विहार का प्रस्ताव रखकर विकास ने उम्मीदभरी नज़रे उन पर टिका दी… मैनेजर बिना कोई जवाब दिए कंप्यूटर के स्क्रीन को देर तक घूरते रहे, फिर बिना उसकी ओर देखे बोले, “ह्म्म्म.. बाय रोड ही जाएंगे…”
“सर, मेनार जाएंगे?”
“रास्ते में है या…”
“सर, बस दस-पन्द्रह किलोमीटर का एक कट लेना होगा. मैं दूरबीन-कैमरा रख लेता हूं.” अपनी उत्तेजना पर भरसक काबू पाते, वह बोला, तो इस बार मैनेजर मुस्कुराकर स्क्रीन पर ही नज़र टिकाए बोले, “चलो देखते हैं… समय से पहुंचे तो ही जा पाएंगे.”
वह समझते थे प्रवासी पक्षी, तो बहाना है असल उतावलापन तो अपने घर जाने का है… महेंद्र जानते थे कि मेनार में उसका घर है.
रास्ते में महेंद्र ने उससे पूछा, “क्या फ्लेमिंगो दिखेगी.”
“अरे सर, आप एक बार वहां चलिए तो सही. इतनी बड़ी संख्या में पक्षी दिखेंगे कि आपका तो मन ख़ुश हो जाएगा. क़िस्मत अच्छी रही, तो फ्लेमिंगो भी दिखेगी. सर, बड़ा ख़ुशक़िस्मत है हमारा गांव, जो वहां प्रवासी पक्षी आते है. आप चलिए तो सही मज़ा आ जाएगा.”
“घर में कौन-कौन है तुम्हारे.” महेंद्र ने पूछा, तो वह बोला, “सर, बस मां ही हैं. मुझे देखेंगी, तो ख़ुश हो जाएंगी.”
“तुमने उन्हें बताया है कि हम आ रहे हैं.”
“नहीं सर.”
“अच्छा किया, फोन मत करना. कहीं नहीं जा पाए, तो उन्हें बुरा लगेगा.”
“जी सर, बस एक बात की हिचकिचाहट है, जो अचानक मां के पास गए, तो वह हडबडा जाएंगी. उनको पकाकर खिलाने का बहुत शौक है मेरी मां के हाथो में अन्नपूर्णा का आशीर्वाद है. जब तक दस व्यंजन न परोस दे, उन्हें चैन नहीं मिलता. इधर कुछ दिनों से उनकी तबियत भी ठीक नहीं है.” आख़िरी कुछ शब्द उसने कुछ धीमे स्वर में मानो ख़ुद से ही कहे हो. कुछ पल के मौन के बाद महेंद्र बोले, “मुझे तो अहमदाबाद में चार-पांच दिन लगेंगे. तुम कल काॅन्फ्रेंस के बाद घर चले जाना. दो-तीन दिन की छुट्टियां मैं अरेंज कर देता हूं.” मैनजर की बात विकास के मन को छू गई.
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उसका संकोच जाता रहा. फोन न करने का निर्णय ठीक ही था, एक तो ट्रैफिक का कुछ कहा नहीं जा सकता है, दूसरा वह अचानक पहुंचकर अपनी मां के भाव देखना चाहता था, वरना यह तो तय था कि मां को उनके आने का पता चला, तो स्वागत में ख़ुद को शर्तिया झोंक देतीं. अपने सुपरवाइज़र को सोच-विचार में पड़ा देखकर वह बोले, “विकास, तुम बिल्कुल कॉन्शस मत हो, लंच रास्ते में करेंगे. घंटा-दो घंटा तुम्हारे घर रुककर बर्ड्स देखते हुए आगे निकल जाएंगे. डिनर का शैड्यूल, तो अहमदाबाद में ही है. तुम तो बस मांजी के हाथों की चाय पिलवा देना.”
महेंद्र के कहते ही आदतन विकास के मुंह से निकला, “अरे सर, कभी फ़ुर्सत में चलिए. वह एक घंटे में ही देखना क्या-क्या बना देगी. उसके हाथों की फिरनी, मालपुए, कढी और भरवां करेले… उनके हाथ का खाना खाकर फाइव स्टार का खाना भूल जाएंगे.”
ये कोई पहली बार नहीं था जब उसने मां के हाथों के भोजन की तारीफ़ की हो. वैसे भी होटल इंडस्ट्री से जुड़े होने के कारण अक्सर खाने-पीने और स्वाद से जुडी बातें होना सामान्य था. कहां का क्या प्रसिद्ध है, क्या मसाले पड़ते हैं, खाने का प्रेजेंटेशन क्या है… ये सब जानने के लिए महेंद्र अपने होटल के सभी कर्मचारियों से फीडबैक लेते रहते है. यहां तक कि घर-परिवारों में बननेवाले खाने के स्वाद की भी ख़ूब चर्चा होती है. उनके होटल के शैफ इस प्रकार की चर्चा में शामिल होकर अपने स्वाद में नित नया बदलाव करते हुए पाक कला को विस्तार देते है. यहां तक कि स्वाद, रंग-रूप मसालों की टोह लेने खुफ़िया तरीक़े से भी किचन सेक्शन के लोगों को अन्य स्थानों पर भेजा जाता है.
होटल के मैनेजर महेंद्र और सुपरवाइज़र विकास को अहमदाबाद में होटल इंडस्ट्री से जुड़े लोगो की एक काॅन्फ्रेंस में हिस्सा लेने अहमदाबाद पहुंचना था. होटल इंडस्ट्री से जुड़े होने के कारण अपने अति व्यस्त शैड्यूल में ख़ुद के लिए समय चुराना पड़ता है. ऑफीशियल ट्रिप में मनोरंजन का तड़का लगाने के उद्देश्य से होटल मैनेजर महेंद्र अपने सुपरवाइज़र विकास के मेनार गांव होते हुए जाने को तैयार हो गए. रास्तेभर वो दोनों काॅन्फ्रेंस में डिस्कस की जानेवाली बातों और अपने एजेंडे पर चर्चा करते रहे.
बातों ही बातों में विकास ने कहा, “सर आज के आपाधापी भरे युग में प्रेजेंटेशन पर बड़ा ध्यान दिया जाता है, पर यदि हम कभी-कभार ‘डे स्पेशल’ में घर का तुष्टिदायक खाना परोसे तो बढ़िया हो.”
विकास की बात सुनकर महेंद्र ख़ूब हंसे, फिर बोले, “भई, इसके लिए तो ‘तुष्टिदायक’ क्या है इसको परिभाषित करो.”
“सर तुष्टिदायक, जैसे घर का खाना, जिसमें प्रेजेंटेशन से अधिक स्वाद पर ध्यान दिया जाता हो, जिसे खाने के बाद भी भूख बाकी रहे पेट भर जाए, पर नियत न भरे, जिसे खाने के लिए कस्टमर हमारे होटल का रुख करे.”
“देखो विकास, मैंने तो सदा ही कुक के हाथ का बना खाया है. रिच इन्ग्रीडीयेंट्स के साथ खाना सदा अच्छा ही लगा. और सच बताऊं, तो हम उसी में संतुष्ट रहे.” यह सुनकर विकास बोला, “सर, संतुष्ट होने और आत्मतुष्टि में महीन-सा अंतर है.”
“अब ये अंतर समझने के लिए समय किसके पास है. हम तो ग्राहकों की संतुष्टि के लिए काम करते हैं और उसके लिए तो एक से बढ़कर एक शैफ है हमारे पास.”
“सर, शैफ संतुष्टि दे सकते हैं, पर आत्मतुष्टिदायक खाना बनाने के लिए रसोई को समर्पित मनोयोग से घर की क्षुदा शांत करनेवाली महिला चाहिए. मेरे हिसाब से किचन का एक सेक्शन ट्रेडीशनल फूड को समर्पित होना चाहिए और बनानेवाली महिला भी आम समर्पित गृहिणी, जो खाने खिलाने में आनंद अनुभव करे, वही खाने में आत्मतुष्टि डाल सकती है.”
“भई, ऐसा है हमारे घर में तो किसी को भी इतनी फ़ुर्सत नहीं थी, जो रसोई में समय गुज़ारे. हां, हमारी फ़रमायशे हमारे घर के कुक ने पूरी की है.”
“सर, आपने यदि मां के हाथों का बना नहीं खाया है, तो स्वाद और प्रेजेंटेशन को ही अहमियत दें और आत्मतुष्टिदायक को जाने दे.”
“हम्म्म! बेहतर होगा भई, आत्मतुष्टिदायक भोजन की परिभाषा मेरी समझ से परे हैं.”
ऐसी ही हल्की-फुल्की बातों में रास्ता कब कटा पता ही न चला. मेनार गांव आन पहुंचा था. साधारण से कसबेनुमा स्थान में पर्यटकों की कोई चहल-पहल नहीं थी.
विकास कह रहा था, “सर, यहां ब्रह्मसरोवर में लाखों की संख्या में प्रवासी पक्षी आते है. ये क्षेत्र अधिक प्रचारित नहीं है, न ही यहां पर्यटकों के लिए सुविधाएं जुटाई गई हैं. यही वजह है, जो एकांत और नैसर्गिक वातावरण में यहां प्रवासी पक्षी विचरते है. मुट्ठीभर पक्षी प्रेमी वहां पहुंचते हैं और चुपचाप आकर चले जाते है.
हमारा पूरा कस्बा ही पक्षी प्रेमी है. ये लोग स्वयं को इस क्षेत्र से जुड़ा होने पर गौरवान्वित महसूस ज़रूर करते है, पर प्रोपोगंडा करके क़स्बे की शान्ति को मीडिया या पर्यटन की भेंट नहीं चढ़ाना चाहते. तभी शायद यहां हर साल पक्षी आ भी पाते हैं.” कहते-कहते वह अपने घर के दरवाज़े पर पहुंच गया. दरवाज़ा खटखटाया, तो मां उसे देखकर हैरान रह गई.
मां कृशकाय हालत में थी. मां को इतना कमज़ोर और बीमार देखकर शिशिर के चेहरे पर चिंता की रेखाएं आ गई. संकोच में घिरी विकास की मां एक प्लेट में पेड़े और पानी लाई, तो महेंद्र उनके संकोच को दूर करने की गरज़ से बोले, “मांजी, हम तो बस यहां से निकल रहे थे, सो मिलने चले आए. आप ज़रा भी परेशान न होना. अभी तो बस पक्षियों को देख आए, फिर आपके हाथों की बनी अदरकवाली चाय पिएंगे.” महेंद्र के कहने पर उनके चेहरे पर संकोचस्मित मुस्कुराहट घिर आई.
विकास अपने मैनेजेर को ब्रह्म तालाब ले गया, तो आश्चर्य से उनका मुंह खुला रह गया. अद्भुत स्थान था. कौन सोच सकता था कि हाईवे से डेढ़ किलोमीटर अन्दर कच्ची सड़क पर कच्चे-पक्के मकानों के बीच खुले स्थान में दूर तक पक्षियों का बसेरा होगा. चकित से साइबेरिया से आए लाखों की तादाद में पक्षी देख-देखकर वह अभिभूत हो रहे थे. खड्डे भरे कच्चे रास्ते और हाइवे के किनारे बसे मेनार में इतनी तादाद में पक्षी आते है ये कल्पना से परे था.
महेंद्र देर तक बर्ड वॉचिंग करते रहे. दो घंटे कहां बीते पता ही न चला. कुछ ही देर में शाम का धुंधलका होने लगा, तो सारे पक्षी ज़मीन पर आ गए. प्रकृति के रचे अद्भुत दृश्य में खोए वह विकास की बेचैनी को नहीं देख पाए.

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विकास उनके पास खड़ा इस चिंता में खोया था कि यदि देर हो जाएगी, तो क्या महज़ चाय पीकर वह निकलेंगे… और जो औपचारितावश खाने को पूछ लिया, तो कहीं सरल ह्रदय मैनेजर खाना खाने के लिए बैठ ही न जाए. ऐसा हुआ तो मां क्या पकाकर खिलाएगी.
आख़िरकार महेंद्र ने कैमरा समेटा और वापसी में मंदिर, तालाब, गांव के स्कूल और कच्चे मकानों को देखते-देखते विकास के घर आए..
घर में प्रवेश करते ही घी-चीनी की फैली सोंधी महक से विकास ने सहज ही अंदाजा लगा लिया कि मां ने शीरा बनाया है.
महेंद्र कुछ सकुचाते बैठे ही थे कि वैजन्ती देवी आकर बोलीं, “चलो, हाथ-मुंह धो लो. अब देखो भूख लगी हो या न लगी हो, थोड़ा तो खाना ही पड़ेगा. हां खाना बहुत ही सादा बनाया है, पर जो भी बनाया है खाकर जाओ, वरना मेरे गले से निवाला नहीं उतरेगा.”
असमंजस की अवस्था में महेंद्र उठ गए, तो वैजन्ती देवी अपने बेटे की ओर शिकायती नज़रों से देख बोली, “जो बता देता, तो कुछ तैयारी करके रखती. अफ़सोस रहेगा की ढंग से जीमा नहीं पाई.”
जाने क्या था उनकी बातों में जो महेंद्र उन्हें मना नहीं कर पाए और चुपचाप पाटे पर बैठ गए और यंत्रवत विकास भी…
वैजन्ती देवी ने धीमे से कहा, “घर में लौकी फरियाई थी, सो तोड़कर तरकारी बनाए हैं.” कहते हुए थाली में सब्ज़ी परोस दी. साथ में उड़द की दाल और बाजरे की रोटी, गुड और लहसुन-मिर्ची की चटनी. विकास मात्र तीन सालन देख असहज था. उसने कैसे सोच लिया की मां बिना खाना खिलाए जाने देगी. बिना पूर्व सूचना दिए वह आ गया और समय होता तो मां उसके लिए पकवान बनाने में जुट जाती, पर उनकी अस्वस्थता के चलते… पर अब क्या हो सकता था. कितनी बार उसने मां के हाथों बने पकवानों की चर्चा की है… पर आज मात्र तीन सादे सालन. आज ख़ुद कही याद आई… “सर, खाना चाहे जहां मिले, बस मां के हाथों का हो. वो मां चाहे जिसकी हो, स्वाद होता ही है.” यह सुनकर महेंद्र ने कहा था, “मैंने अपनी मां को हमेशा फाइलों में उलझे देखा है. उन्हें खाना बनाना सख़्त नापसंद था. जो कभी कुक छुट्टी लेता भी था, तो वह होटल ही ले जाती थी या खाना घर आ जाता था.”
“ओह! फिर तो आप रहने ही दीजिए. आप स्वादिष्ट ही परोसिए. तुष्टिदायक खाने का स्वाद आप नहीं समझेंगे…” यह सुनकर महेंद्र हंसकर कहते, “नहीं-नहीं विकास, तुम समझाओ.”


“सर, स्वाद को कैसे समझाऊं… मैं तो अपनी मां के हाथों के स्वाद को ढूंढ़ता हूं. तभी तो किसी परिपक्व महिला की सिफ़ारिश कर रहा हूं, जो आम रसोई का स्वाद यहां लाए. ट्रेडीशनल सिंपल फूड को थाली तक पहुचाएं और वह प्रेजेंटेशन से ज़्यादा स्वाद को अहमियत दे. यक़ीनन कुछ लोग, जो लंबे समय तक अच्छे प्रजेंटेशन के साथ होटल का खाना खा रहे है, वो ये खाना भी ज़रूर चखेंगे.” पूर्व में हुए वार्तालाप दोहराता हुआ वह थाली घूरता रहा, “क्या हुआ खाना जम नहीं रहा क्या.” यह सुनकर भी उसने कुछ नहीं कहा और महेंद्र भी मौन भाव से रोटी-दाल चुभलाते रहे. लौकी का हलवा डालने के लिए वैजन्ती देवी ने कड़छी बढ़ाई, तो महेंद्र ने पूछा, “ये क्या है?”
वैजन्ती बोली, “हलवा है लौकी का. तुम खाते तो हो न?” यह सुनकर वह कुछ पल के मौन के बाद गर्दन हिलाकर हामी भरते हुए थाली में हलवा डलवाने लगे. जहां वैजन्ती आत्मसंतुष्टि से भरी दोनों को खाते देख रही थी, वहीं विकास कनखियों से अपने मैनेजेर के हाव-भाव देख रहा था.
अपनी मां के हाथों के स्वाद को लेकर उसने क्या-क्या कसीदे नहीं गढ़े थे- मेरी मां आधे घंटे में पकवानों की कतार लगा देती है. स्वाद ऐसा कि पेट भर जाए मन न भरे… वो अन्नपूर्णा है… अन्नपूर्णा…“
“मांजी, आप सचमुच अन्नपूर्णा है. पेट भर गया, पर मन न भरा…” सहसा महेंद्र का स्वर कानो में पड़ा. ये क्या महेंद्र तो वैजन्ती के दोनों हाथो को पकड़कर मस्तक से छुआकर भावुक स्वर में प्रशंसा कर रहे थे. विकास के मुंह से विस्फारित से स्वर पड़े, “इतना सादा खाना…”


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“… सादा खाना मन को छू गया. आत्मतुष्टि को आज महसूस किया है. मांजी ऐसी तृप्तता रोज़ के खाने में क्यों नहीं मिलती है. मंदिर के प्रसाद सा स्वाद है और क्यों न होता भला- धैर्य-स्नेह, पकाई-सफ़ाई से बना खाना प्रसाद ही तो है.”
मैनेजेर को यूं भावुक देखकर विकास चहका, “अन्नपूर्णा तो है ही मां. आप कभी फ़ुर्सत में तो आइए सर, थाली-कटोरियों से भर जाएगी.”
“कटोरियों से भरी थाली में शायद आत्मतुष्टि की जगह न होगी.”
“लो देखो, होटल का मैनेजर बाजरे का रोटला-लहसुन की चटनी की बड़ाई करे है.” वैजन्ती देवी मुंह पर पल्लू रखकर हंसती बोली, तो महेंद्र ने उनके सामने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा, “हमारे यहां खाना पसंद आने पर शिष्टाचार के नाते रेसिपी यानी बनाने की विधि पूछी जाती है. पर मैं नहीं पूछूंगा, क्योंकि विधि जितनी सहज है उतनी कठिन भी. धैर्य, स्नेह और समर्पण से बना स्वाद अलौकिक तो होना ही था.”
“अरे, इत्ते बड़े होटल के मैनेजर कुछ ज़्यादा ही मान बढाए हैं…”
यह सुनकर विकास ने चुटकी ली, “मां, सच तो बोले हैं सर, होटल के तेल-मसाले में डूबकर तुष्टि दम तोड़ देती है.”
“बचपन से आज तक स्वादिष्ट खाना ख़ूब खाया, बस मां के हाथों का नसीब नहीं हुआ, सो आज वो भी स्वाद पा लिया…” महेंद्र को भावुक देख वैजन्ती भी भावुक हो गईं, “कुछ देर और ठहरना होता, तो सामान मंगवाकर कुछ ख़ास परोसती थाली में… जी संतुष्ट हो जाहोता…”
“तब शायद लौकी के हलवे का स्वाद, बाजरे की रोटी का सोंधापन, और दाल और लहसुन की चटनी का स्वाद ज़ुबान पर नहीं ठहरता… तैयारी से बनाए खाने में प्रसाद सा स्वाद-आत्मतुष्टि मिलती क्या?..”
यह सुनकर विकास हंसकर बोला, “तो सर, आत्मतुष्टि का अर्थ समझ ही गए आप.”
“बिलकुल समझा, होटल की फ्रोजन सब्ज़ियां घर की तुड़ी ओरगेनिक ताज़ी सब्ज़ियों से भला क्या मुक़ाबला करेंगी… सोंधी रोटियों में चुपड़ा घी, सादी ताज़ी सब्ज़ी और वाह लौकी का हलवा इतना स्वादिष्ट हो सकता है क्या… ये खाना तो भारी पड़ा फाइव स्टार होटल के खाने पर…”
मैनेजेर के मुंह से तारीफ़ सुनकर वैजन्ती का चेहरा खिल सा गया… “मां तू बीमार तो नहीं लगती…”
“बीमार हूं, तो लागूं न… इत्ते दिनां बाद अपने हाथों का बनाकर खिलाया है… बिल्कुल चंगी हो गई मैं तो..”
वहां से विदा लेकर जो चले, तो रास्तेभर कुछ खाने की इच्छा न हुई… अहमदाबाद के फार्मल डिनर में बस खानापूर्ति ही की गई.
दूसरे दिन काॅन्फ्रेंस में महेंद्र सहसा बोल उठे, “होटल इंडस्ट्री में यदि सस्टेन करना है, तो ग्राहक के मन को समझना होगा… वो घर छोड़कर हमारे पास आता है, तो उसकी आत्मसंतुष्टि हमारा दायित्त्व है.” इन पंक्तियों पर हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. होटल रेड कारपेट के मैनेजर अपने सुपरवाइज़र विकास मिश्रा की ओर देखकर मुस्कुरा दिए… महेंद्र की आत्मतुष्टि की बात को बहुत सराहा गया.
“सर, आज तो आप छ गए…”
“हुम्म… आज इस सेमिनार में उठी तालियों की गूंज तुम्हारे नाम करता हूं. तुम उसके सही हक़दार हो…” अपने सह्रदय मैनेजेर की बात से विकास मुस्कुरा उठा था.

Meenu Tripathi
मीनू त्रिपाठी

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Short Story

“सोच लो। फिर ऐसा ना हो की ग़ुलाम अपनी रानी साहिबा को छोड़ दे.” अनीता ने अमन से मुस्कुराते हुए कहा.
“जो चाहिए बोलो. आज पहली बार तुम मुझसे कुछ मांगोगी और तुम्हारा हक़ और बढ़ गया.” अमन ने बड़े प्यार से कहा. “मुझे डेस्टिनेशन वेडिंग करनी है, ग्रीस में.” अनीता ने एक ही सांस में अपनी बात कह दी.
“ग्रीस!” अमन भी कुछ पल के लिए चौंक-सा गया.

आज अमन बहुत ख़ुश था। आज उसकी और अनीता की सगाई थी। अमन और अनीता बचपन से ही साथ में थे। मुंबई शहर की भीड़भाड़ सड़कों के बीच में बसी एक २० मंज़िल बिल्डिंग में दोनों अपने परिवार के साथ रहते थे। अमन का घर बारहवीं मंज़िल पर था और अनीता का दसवीं मंज़िल पर।
दोनों एक ही स्कूल में पढ़े, स्कूल से दोस्ती हुई, यह दोस्ती कॉलेज तक भी आगे बढ़ी और फिर प्यार में तब्दील हो गई। दोनों के परिवार में भी काफ़ी मेलजोल था। दरअसल दोनों के परिवार उत्तर प्रदेश से ही थे और एक ही जाती के थे, इसलिए दोनों के परिवार ने भी उनके रिश्ते को मंज़ूरी दे दी थी। हालांकि दोनों के स्वभाव में ज़मीन-आसमान का फ़र्क था।
अमन एक शांत और सुलझा हुआ लड़का था। उसे दोस्त बनाने में काफ़ी समय लगता था। पढ़ाई में अव्वल था और उसने अपनी इंजीनियरिंग पूरी कर ली थी और एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर की पोस्ट पर काम कर रहा था। दूसरी ओर अनीता यानी की बिना बंदिशोंवाली हवा। हर वक़्त वह ख़ुश रहती थी। चाहे अमन को कोई भी बड़ी चिंता क्यों न हो, अनीता उसके चेहरे पर मुस्कान ले आती। अगर अमन शांत पानी था, तो आरती पानी के अंदर का तूफ़ान। कहते है ना, अपोजिट अट्रैक्शन, बस वही थी वजह दोनों के गहरे प्यार की। आरती ने इंजीनियरिंग तो कर ली, लेकिन वह तो बिना बंदिशों की चिड़िया थी, वह उड़ना चाहती थी। इसीलिए उसने एयरहोस्टेस की ट्रेनिंग ले ली और एक बड़ी एयरलाइन्स में एयरहोस्टेस की नौकरी करने लगी।
दोनों अपनी ज़िंदगी में मस्त थे। अच्छी जॉब, एक-दूसरे के लिए ढेर सारा प्यार और क्या चाहिए! परिवार ने भी उनके प्यार को हामी भर दी थी। और आख़िर में वह दिन आ ही गया, जब दोनों के रिश्ते को नया नाम मिलनेवाला था। दोनों अब गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड के बदले मंगेतर बननेवाले थे।
सगाई की सारी रस्म ख़त्म हो गई थी। दोस्त, रिश्तेदार धीरे-धीरे आशीर्वाद दे के विदा ले रहे थे। परिवार की सहमति से दोनों रस्म ख़त्म होने के बाद अपनी सगाई को सेलिब्रेट करने के लिए बाहर आए। दोनों की ख़ुशी उनके चेहरे पर साफ़-साफ़ दिख रही थी।
अनीता ने अपने चुलबुले अंदाज़ में अमन से कहा, “मेरी गिफ्ट किधर है?”
अमन ने भी मज़ाकिया बनते हुए कहा, “मुझसे बढ़कर कोई बड़ी गिफ्ट हो सकती है क्या तुम्हारे लिए?” और यह सुनकर अनीता रूठने का नाटक करने लगी।
उसे मनाते हुए अमन बोला, “अच्छा सॉरी, मैं मज़ाक कर रहा था। क्या चाहिए हमारी रानी साहिबा को? यह ग़ुलाम उनका हर हुकुम अदा करेगा।” अमन काफ़ी रोमांटिक मूड में था।
“सोच लो। फिर ऐसा ना हो की ग़ुलाम अपनी रानी साहिबा को छोड़ दे।” अनीता ने अमन से मुस्कुराते हुए कहा।
“जो चाहिए बोलो। आज पहली बार तुम मुझसे कुछ मांगोगी और तुम्हारा हक़ और बढ़ गया।” अमन ने बड़े प्यार से कहा।
“मुझे डेस्टिनेशन वेडिंग करनी है, ग्रीस में।” अनीता ने एक ही सांस में अपनी बात कह दी.
“ग्रीस!” अमन भी कुछ पल के लिए चौंक-सा गया।
फिर उसने आरती को समझाने की कोशिश की ग्रीस में शादी करना कितना महंगा है और काफ़ी सारा ख़र्च हो सकता है। लेकिन अनीता उसकी बात समझ नहीं रही थी। वह ज़िद कर बैठी थी कि उसे शादी ग्रीस में ही करनी है।
अमन उसकी हर इच्छा पूरी करना चाहता था, लेकिन उसे यह भी पता था कि इतना ख़र्च वह और उसका परिवार उठा नहीं पाएगा। उसने अनीता को समझाने की काफ़ी कोशिश की, लेकिन अनीता ने उसकी एक ना मानी। और आख़िर में वह रूठकर खड़ी हुई और बोली, “मुझे तब तक फोन मत करना, जब तक तुम मेरी बात नहीं मानते।” और इतना कहकर वह वहां से चली गई। अमन ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा।
अनीता की ज़िद करने की आदत नई नहीं थी। वह कभी भी किसी भी बात पर ज़िद करती और अमन उससे पूरा भी करता, लेकिन इस बार जो हठ अनीता ने पकड़ी है, उसके बारे में अमन ने कभी सोचा भी ना था
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अमन अपने घर आया और चुपचाप अपने कमरे में चला गया। उसने घरवालों को कुछ नहीं बताया। उसे लगा एक-दो दिन में अनीता शांत हो जाएगी और फिर वह उसे मना लेगा। लेकिन उसे क्या मालूम था कि आज के बाद उसकी और अनीता के प्यार की नई परिभाषा जन्म लेगी।
दो दिन तक अनीता का ना ही फोन आया और ना ही उसने अमन का फोन उठाया। तभी उसकी मां ने पूछा, “बेटा, सगाई के बाद अनीता दिखी नहीं। पहले तो रोज़ घर आती थी, लेकिन उस दिन के बाद वह दिखी भी नहीं। सबकुछ ठीक तो है तुम दोनो के बीच में?” अमन की मां ने उसे प्यार से पूछा।
“हां मां। सब ठीक है। हो सकता है तबियत ख़राब हो।” अमन ने अपनी नज़रे चुराते हुए अपनी मां से कहा।
“बेटा तुम जरा देखकर आओ वह कैसी है। आजकल न्यूज़ चैनल पर जो कोरोना की ख़बरें आ रही है उससे मुझे चिंता हो रही है। और पता नहीं उसकी फ्लाइट में अगर किसी कोरोनाग्रस्त ने सफ़र किया होगा तो! बेटा तू मेरे लिए एक बार देखकर आ जा, मुझे बड़ी चिंता हो रही है।” अमन की मां ने उसे चिंताभरे स्वर में कहा।
“चिंता मत करो मां में अभी जाता हूं।” और इतना कहकर अमन तुरंत ही अनीता के घर जाने के लिए निकल गया। सिर्फ़ दो ही मंज़िल का फासला था इसलिए उसे ज़्यादा वक़्त नहीं लगा पहुंचने में। उसने जा के देखा, तो अनीता के फ्लैट के दरवाज़े पर ताला लगा हुआ था। ताला देखकर उसे थोड़ा अजीब लगा। उसने तुरंत ही अनीता को फोन किया, लेकिन उसका फोन बंद आ रहा था।
अमन ने कुछ पल के लिए सोचा और उसने अनीता के पिताजी को फोन किया। सामने से अनीता के पिताजी ने फोन उठा लिया, तो अमन तुरंत ही बोल पड़ा, “नमस्ते अंकल। में अनीता को फोन लगा रहा था, लेकिन उसका फोन बंद आ रहा है। और यहां आ कर देखा, तो घर के दरवाज़े पर ताला लगा हुआ है?”
सामने से अनीता के पिताजी ने बड़े आराम से जवाब देते हुए कहा, ” बेटा हम लोग दिल्ली आए है। अनीता की दादी सगाई में नहीं आ पाई था ना, तो उनका आशीर्वाद लेने के लिए आए है। प्लान कल रात को ही बना और सुबह की फ्लाइट से हम यहां आए है। शायद अनीता के फोन की बैटरी डिस्चार्ज हो गई होगी, मैं उसे कहता हूं तुम्हें फोन करे। ओके बेटा और कुछ?”
अमन कुछ बोलने जा रहा था, तभी अनीता के पिताजी ने कहा, “और हां अपनी मां-पिताजी को मेरा एक मैसेज देना बेटा। उनको कहना हम दिल्ली आए है अनीता की दादी का आशीर्वाद लेने. हम लोग चार-पांच दिन में आ जाएंगे। आने के बाद हम शादी की तैयारी के बारे में बात करेंगे। ओके बेटा, जय भैरव!” इतना बोलते ही उन्होंने फोन रख दिया।
अमन ने भी अपनी ओर से धैर्य से उनकी बात को सुना। फोन कट होने के बाद वह सोचने लगा कि इतना गुस्सा की अनीता ने एक बार भी नहीं बताया की वह दिल्ली जा रही है। वह समझ गया कि इस बार आसान नहीं होगा अनीता को मनाना। वह वापस अपने घर गया और अपनी मां को अनीता के पिताजी का मैसेज दिया।
शाम को अमन परिवार के साथ चाय-नाश्ता कर रहा था और टेलीविज़न पर देश के प्रधानमंत्री देश को सम्बोधित कर रहे थे। पूरा परिवार उनकी बात को ध्यान से सुन रहा था। हालांकि अमन का ध्यान अपने मोबाइल की तरफ़ था. वह हर कुछ पल के बाद मोबाइल को देखता कि शायद अनीता ने कोई फोन या मैसेज किया हो, लेकिन हर बार उसे निराश ही हाथ लगती. तभी प्रधानमंत्रीजी ने घोषणा की कि कोरोना महामारी को काबू करने के लिए और उससे लड़ने के लिए आज रात से देशभर में लाॅकडाउन होने जा रहा है। कोई भी ट्रैन, बस और फ्लाइट्स के द्वारा सफ़र नहीं कर पाएंगे। घोषणा सुनते ही अमन की मानो पैरों तले ज़मीन ही खिसक गई।

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अमन तुरंत ही उठकर अपने कमरे में चला गया और दरवाज़ा बंदकर दिया। उसने अनीता को ना जाने कितनी बार फोन किया, लेकिन अनीता हर बार फोन कट कर देती। और आख़िर में अमन थक गया और अपने बिस्तर पर सिर पकड़कर बैठ गया। वह अनीता के लिए चिंतित हो गया। तभी उसके फोन का मैसेज टोन बजा। अमन ने देखा तो अनीता का मैसेज था। अनीता का मैसेज देखते ही अमन की ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, लेकिन यह ख़ुशी ज़्यादा देर तक नहीं थी।
मैसेज में अनीता ने साफ-साफ़ लिखा था कि वह अपनी बात पर कायम है और अमन उससे बार-बार मैसेज और कॉल करके परेशान ना करे। अगर अमन उसकी बात पूरी नहीं कर सकता, तो वह यह सगाई तोड़ देगी। अनीता का मैसेज पढ़ते ही अमन को जैसे झटका लगा और वह मायूस-सा हो गया। वह अनीता को अच्छी तरह से जानता था और उसे मालूम था कि अनीता ने जो ठान ली वह करके ही मानेगी। अमन थोड़ा रोने जैसा हो गया और अपने कमरे के अकेलेपन का फ़ायदा उठाते हुए अपने आंसू को बहने से रोका नहीं।
लाॅकडाउन में दिन गुज़रने लगे। अमन अपने दुख को छुपाकर चेहरे पर झूठी हंसी लेकर सबसे सामने आता और ज़्यादातर वह अपने कमरे में ही रहता। न्यूज़ चैनल पर कोरोना की ख़बरें और बढ़ते हुए मरीज़ों की संख्या उसके मन में अनीता के लिए चिंता और पैदा कर देती, लेकिन वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। हर पल उसे मन करता की अनीता को फोन या मैसेज करे, लेकिन अपने आपको रोक लेता। उसे डर था की कही उसकी यह हरकत की वजह से अनीता सगाई तोड़ ना दे।
हालांकि अमन के मां-पिता और अनीता के माता-पिता के बीच हर तीन-चार दिन में बात होती रहती और उससे अमन को मालूम पड़ता कि अनीता कुशल से है। अमन की मां को धीरे धीरे अमन के दुख का अंदाज़ा होने लगा था। वह देख रही थीं कि उसके बेटे को कोई बात खाई जा रही है।
अमन अपने कमरे में बैठा हुआ था, तभी उसकी मां उसके लिए नाश्ता लेकर आई। अपनी मां को देखकर अमन थोड़ा चौंक गया और बोला, “अरे मां! तुमने क्यों तकलीफ़ की मुझे बुला लेतीं? “
अमन की मां ने उसकी आंखों में देखा, तो अमन ने अपनी नज़रे चुराने की कोशिश की। अमन की मां ने नाश्ता बिस्तर के पास रखे एक छोटे टेबल पर रखा और अमन के पास बैठकर बोली, ” बेटा, काफ़ी दिनों से देख रही हूं कि तू किसी उलझन में है। क्या बात है बेटा?”
“नहीं मां कुछ भी तो नहीं है। मै एकदम ठीक हूं।” अमन ने अपनी नज़रे चुराते हुए कहा।
“मां हूं तेरी। नौ महीने अपनी कोख में रखा है तुझे। तुझे तुझसे ज़्यादा में जानती हूं। अब बता बात क्या है? ” अमन की मां ने कहा।
उनकी बात सुनकर अमन भावुक हो गया और उसकी आंखों में आंसू आ गए। अपने बेटे की आंख में आंसू देखकर मां का दिल भी रो उठा और वह बोल पड़ीं, ” बेटा क्या हुआ? क्या बात है, जो तुम्हे खाए जा रही है?”
अमन अपने मां के गले लग गया और एक बच्चे की तरह रोने लगा। उसकी मां ने भी उसको अपना मन हल्का करने दिया। कुछ पल के बाद अमन शांत हुआ और अपनी मां को धीरे-धीरे सब बात बताई। अमन की मां ने उसकी पूरी बात सुनी और कहा, “बस, इतनी सी बात के लिए तू दुखी था! मेरे प्यारे बेटे एक बार तो मांगा होता इस मां से, क्या तू इतना बड़ा हो गया कि अपनी मां से कुछ नहीं मांगेगा!”
“नहीं मां ऐसी बात नहीं है, लेकिन मैं आप लोगो को मुसीबत में नहीं डालना चाहता था। ” अमन ने कहा।
“मुसीबत! कैसी मुसीबत? एकलौते बेटे की ख़ुशी अपने मां-बाप के लिए अभिमान होती है। अनीता मेरी होनेवाली बहू है और उसका पूरा अधिकार है अपने होनेवाले पति से कुछ मांगने का और आखिरकार शादी एक ही बार होती है बेटे, तो वह यादगार तो होनी ही चाहिए।” अमन की मां की आंखों में एक चमक थी।
“लेकिन मां अनीता की मांग है ग्रीस में शादी करना और कितना ख़र्चा होगा। आना-जाना, रहना सब कुछ। मां हम इतना नहीं अफ़्फोर्ड कर सकते।”
“कौन कहता है की हम अफ़्फोर्ड नहीं कर सकते?” और अमन के पिताजी कमरे में दाखिल हुए।
“पिताजी आप!” अमन के मूह से अनायास निकल गया।
“हां बेटा में। मेरी तीन करोड़ की म्यूचुअल फंड मैच्योर हो रही है अगले महीने और तुम्हारे गुप्ता अंकल का वहां अपना होटल है, जो हमे किफायती दाम में मिल जाएगा, तो अब प्रॉब्लम क्या है? और वैसे भी जो भी होगा लाॅकडाउन के बाद ही होगा, तब तक थोड़ा और ब्याज कमा लेंगे।”
अपने पापा की बात सुनते ही अमन की चेहरे की ख़ुशी लौट आई और ख़ुशी के मारे रोते हुए अपने माता-पिता के गले लग गया। वे भी उसे प्यार से सहलाने लगे।
“मैं अभी अनीता को यह ख़ुशख़बरी देता हूं!”
“हां बेटा जल्दी दे दो ख़ुशख़बरी मालूम पड़ा तुमको यहां रखकर अनीता अकेली ही ग्रीस चली गई.” अमन के पापा ने उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा।
“आप भी ना, मेरे बेटे को परेशान मत करो। जा बेटा जल्दी से मेरी बहू को फोन लगा।” अमन की मां ने कहा।
अमन ने तुरंत ही बिना समय गवाएं अपने मोबाइल से अनीता का नंबर लगाया, लेकिन उसका फ़ोन बंद आ रहा था। उसने अपने माता-पिता को अनीता के माता-पिता को फोन करने के लिए कहा। उन्होंने भी कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे। अनीता के माता-पिता का भी फोन नहीं लग रहा था। अमन ने उसके दादी के नंबर पर फोन करने के लिए कहा, लेकिन उसके माता-पिता के पास अनीता की दादी का नंबर नहीं था।

अमन वापस मायूस हो गया। उसने मन ही मन यह सोच लिया कि अनीता ने अपने माता-पिता को बोल के सगाई तोड़ने का फ़ैसला लिया होगा, इसीलिए उन लोगों ने अपने नंबर बंद कर दिए हैं। अमन के माता-पिता ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वे असफल रहे।
एक-एक दिन गुज़र रहे थे और अमन मायूसी के अंधरे में उतर रहा था। उसके माता-पिता से उसकी यह हालत देखी नहीं जा रही थी और वह किसी तरह से अनीता और उसके परिवार से काॅन्टेक्ट करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन हर बार वे लोग असफल होते। एक तरफ़ देश कोरोना महामारी और लॉकडाउन का सामना कर रहा था और एक तरफ़ अमन की ज़िंदगी भी लॉकडाउन की तरह सिमट रही थी।
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ना खाने का ध्यान ना पीने का ध्यान और मुस्कुराना तो जैसे वह भूल ही गया था। दिनभर अपने कमरे में ही रहता और दिनभर अनीता की यादों में और उसके साथ बिताए हुए ख़ुशीभरे लम्हों को याद करता। उसके माता-पिता उसे समझाने की कोशिश करते, लेकिन असफल रहते।
एक दिन अमन अपने बिस्तर पर सो रहा था और तभी मोबाइल फोन की रिंग बजी। अमन ने बिना देखे ही फोन कट कर दिया। कुछ पल के बाद वापस फोन की रिंग बजी। इस बार अमन ने नींदभरी आंखों से फोन की स्क्रीन पर देखा, तो उसकी नींद ही उड़ गई, अनीता के नंबर से वीडियो कॉल आ रहा था।
अमन तुरंत ही नींद से उठकर बैठ गया और फ़ोन रिसीव किया। उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था, क्योंकि सामने वीडियो कॉल पर अनीता ख़ुद थी। अनीता की आंखे भी नम थी। “अमन आई लव यू” अनीता ने कहा और रोने लगी।”
“आई लव यू टू। कहां हो? आई मिस्ड यू। ” अमन ने भी ख़ुशी के मारे कहा।
फिर अनीता ने अपने आपको शांत करते हुए कहा, “मैं दो दिन में आ रही हूं। आकर सारी बात बताती हूं। तब तक अपना ख़्याल रखना एंड आई लव यू।” और अनीता ने फोन कट कर दिया।
अमन की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। वह दौड़ते हुए अपने कमरे के बाहर गया और अपने माता-पिता को सारी बात बताई। वे लोग भी अमन की बात सुनकर ख़ुश हुए और अपने बेटे के चेहरे पर लौटी हुई मुस्कान को देखकर मन ही मन भगवान का धन्यवाद करने लगे। अमन की ख़ुशी इस वक़्त आसमान की ऊंचाई को छू रही थी और क्यों ना हो, आख़िरकार उसके प्यार के लॉकडाउन का अनलॉक हो रहा था।
अमन अब इस दो दिन के गुज़रने की राह देख रहा था, लेकिन एक-एक पल उसके लिए सदियों जैसे थे। जैसे-तैसे करके दो दिन बीत गए। तीसरे दिन की सुबह को बिल्डिंग में एक एम्बुलेंस आई। उसमें से अनीता और उसका परिवार निकला। अमन अपनी बालकनी में से यह सब देख रहा था। एम्बुलेंस में से एक और आदमी निकला, जिसने पूरे शरीर को ढंक रखा था। मुंह में मास्क और हाथों में ग्लव्स थे। आंखों पर भी प्लास्टिक के बड़े चश्मे चढ़ा रखे थे। उसने अनीता और उसके परिवार को कुछ काग़ज़ दिए और फिर वापस एम्बुलेंस में बैठ गया। एम्बुलेंस वापस चली गई और अनीता अपने परिवार के साथ बिल्डिंग में दाखिल हुई।
अमन तुरंत ही भागा, जल्दबाज़ी में उसने चप्पल भी नहीं पहने थे। अनीता और उसके परिवार के पहले वह पहुंच गया और अनीता के फ्लैट के बाहर खड़ा होकर लिफ्ट की तरफ़ देखने लगा। लिफ्ट धीरे-धीरे नीचे से ऊपर आ रही थी । ५, ६ ७, जैसे-जैसे लिफ्ट ऊपर आ रही थी, अमन के दिल की धड़कन भी तेज़ हो रही थी। १० मंज़िल पर आते ही अनीता लिफ्ट के बाहर आई और उसकी नज़र सामने खड़े अमन पर पड़ी। वह तुरंत ही भागकर अमन के गले लग गई और एक बच्चे की तरह रोने लगी ।
अमन की आंखों में भी आंसू थे और वह उससे प्यार से सहला रहा था। लिफ्ट के बाहर खड़े अनीता के माता-पिता और सीढ़ियों पर खड़े अमन के माता-पिता भी भावुक हो गए और उनकी आंखें भी नम हो गई थीं। अनीता अभी भी अमन से लिपटकर रो रही थी। अमन के माता-पिता ने अनीता और उसके परिवार को अपने घर पर आने के लिए कहा और वहा शांति से बैठ के बात करने के लिए कहा। अनीता के पिताजी ने तुरंत ही अमन के परिवार के सामने अपने हाथ जोड़े और रोने लगे। अमन के पिताजी ने तुरंत ही उनको गले लगाकर संभाला और उन तीनों को अपने घर ले गए।
अमन की मां सब के लिए चाय-नाश्ता लेकर आई। सब सोफे पर शांत बैठे थे। अमन और अनीता एक कोने में खड़े थे। इस बैचेनीभरी शांति को तोड़ते हुए अमन के पिताजी ने कहा, “जी आप लोग कुछ लीजिए। इतनी लम्बी यात्रा में थक गए होंगे।” उनकी बात सुनकर अनीता वापस रोने लगी। आज अनीता का एक अलग ही रूप था। चूलबुल अनीता की जगह एक शांत और गंभीर अनीता अमन के सामने खड़ी थी।
अनीता के पिता ने बात शुरू करते हुए कहा, “हम सगाई के दो दिन बाद दिल्ली गए थे मेरी मां से मिलने। वह सगाई में नहीं आ पाई थीं, तो उनका आशीर्वाद लेने के लिए गए थे। वैसे कोई प्लान नहीं था, लेकिन सगाई के दूसरे दिन रात में अनीता ने अचानक से हमसे अपनी इच्छा बताई और हम दूसरे दिन निकल गए। दूसरे ही दिन लॉकडाउन हुआ, तो हम लोग उधर ही फंस गए थे। “
अपनी बात बोलकर अनीता के पिताजी रुक गए और थोड़ा पानी पिया। फिर एक नज़र सब पर डालने के बाद बोलना शुरू किया,” वैसे तो हम अपने बच्चों को सिखाते है कि अपने मां-बाप की बात मानो, लेकिन कभी-कभी हम बड़े लोग ही यह बात भूल जाते है। यही ग़लती हमसे हुई।” अनीता के पापा का गला भर आया और उन्होंने एक घूंट पानी और पिया और अपनी बात आगे बढाई।
“सरकार के नियमों का उल्लंघन करने में मुझे पता ही नहीं चला कि मैं अपने परिवार के लिए ख़तरा बन रहा हूं। रोज़ सुबह वॉक पर जाना और शाम में पार्क में जाना मेरा नियम बन गया था। एक-दो बार तो मैं पुलिस को धोखा देकर दिल्ली से द्वारका तक जाकर आया था। एक दिन अचानक पता नहीं कैसे, लेकिन मेरी तबियत ख़राब हो गई। बुखार और गले में तकलीफ़ हो गई । हमने वहा पर टेस्ट कराया, तो मालूम पड़ा कि मैं कोरोना पॉजिटिव हूं। ” इतना बोलते अनीता के पापा चुप हो गए। बाकि सब लोग भी उन्हें देख रहे थे। अमन ने अनीता की तरफ़ देखा, तो अनीता ने अपना सिर शर्म के मारे झुका दिया। उसकी आंख में अभी भी आंसू थे।
अनीता के पापा ने आगे कहना शुरू किया,” जब मुझे पता चला कि में कोरोना पॉजिटिव हूं तो मुझे ख़ुद से ज़्यादा अपने परिवार की चिंता हुई। सबका टेस्ट हुआ। अनीता, अनीता की मां, मेरे भाई, उसकी बीवी और मेरी मां सबका टेस्ट हुआ और जिसका डर था वही हुआ। मेरी वजह से मेरा सारा परिवार इस महामारी का शिकार हो चुका था। हम लोगों को हॉस्पिटल ले जाया गया और तीन हफ़्ते हम लोगों का लगातार इलाज हो रहा था।” अनीता के पापा का गला भर आया और उनकी आंखों मैं आंसू आ गए।
अमन के पापा ने तुरंत ही उनके कंधे पर हाथ रखते हुए उनकी हिम्मत बंधाई। उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “हम लोग तो इस महामारी को हराने में सफल रहे, लेकिन मेरी मां उसे नहीं हरा पाई। हमे उनके आख़री दर्शन भी नहीं करने को मिले।” और इतना कहकर वह रोने लगे। सबकी आंखें नम थीं और सब के आंखों में आंसू थे। अमन के माता-पिता अनीता के माता-पिता को दिलासा दे रहे थे। कुछ देर बाद अनीता के पापा ने कहा, “मेरे एक रिश्तेदार की मदद से हम हॉस्पिटल से निकलकर सीधा मुंबई के लिए एम्बुलेंस में रवाना हुए। हमने तो कोरोना को हराया लेकिन मेरी मां…” और इतना बोलते वह वापस रोने लगे।
माहौल काफ़ी ग़मगीन था। सबकी आंखों में आंसू थे। तभी अनीता ने अमन का हाथ पकड़ा और कहा, “क्या तुम मुझे माफ़ करोगे?” अनीता की आंखें नम थीं।
अमन कुछ बोले उसके पहले ही अनीता ने कहा, “इस २१ दिन, जो हॉस्पिटल में बिताए, तब मुझे एहसास हुआ कि मैं अपनी ज़िद की वजह से क्या खो रही थी। तुम्हें याद है बचपन में अगर मुझे जरा-सी खरोंच भी आती, तो तुम मेरा कितना ख़्याल रखते? पढ़ाई के बहाने बार-बार मेरी ख़बर लेने आते। हम बड़े हुए, लेकिन तुमने अपने प्यार को कभी कम नहीं होने दिया। हर पल मैंने तुम्हारे साथ बिताए हुए हर पल को वापस जिया इस २१ दिनों में और तब जाकर मालूम हुआ कि मेरा असली डेस्टिनेशन ग्रीस नहीं, तुम्हारा दिल है। आज सही मायने में प्यार की असली परिभाषा समझ में आई। अपनों का साथ ही असली प्यार है। अगर आज में वापस आई हूं, तो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे प्यार की वजह से।” अनीता की आंखों में आंसू थे।
अनीता ने अपने आंसू को पोछा और आगे अपनी बात बढ़ाते हुए बोली, “मैं तो अपनी ज़िद में भूल ही गई थी कि मैं अपने इस प्यारे से रिश्ते के साथ खेल रही हूं। मैंने तुम्हारा और तुम्हारे प्यार का अपमान किया है। शायद आज मेरी ही ज़िद की वजह से दादी हमारे बीच नहीं है, क्योंकि मैंने ही पापा को गुस्से में आकर वहां जाने के लिए कहा था। आज तुम्हारी अनीता अपनी ही नज़रों में गिर गई है अमन।” अपनी बात पूरी करते-करते अनीता रोने लगी।


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“नहीं अनीता ख़ुद को दोष देने से जो हुआ वह बदला तो नहीं जा सकता। माना की तुमने ज़िद की, लेकिन क्या इसी वजह से तुम ग़लत हो गई? तुम अपने होनेवाले पति से नहीं मांगोगी, तो किसे कहोगी? और वैसे भी तुम्हारे दूर जाने के बाद मुझे भी पता चला है कि मेरे जीवन में तुम्हारा कितना महत्व है। हम कुछ दिन दूर ज़रूर थे, लेकिन इसी दूरी ने हमारे बीच की नज़दीकी को और बढ़ा दिया है। आई लव यू अनीता।” अमन ने भी अपने दिल की बात बोल दी।
अमन की बात सुनकर अनीता रोते-रोते अमन के गले लग गई और अमन ने तुरंत ही अनीता को गले लगा लिया और दोनों की आंखों में से आंसुओं की धारा बहने लगी। उन दोनों के माता-पिता भी दोनों को मन ही मन आशीर्वाद दे रहे थे। देश का लॉकडाउन तो जारी था, लेकिन अमन और अनीता के प्यार की नई परिभाषा अनलॉक हो गई थी।

Nirav Shah
नीरव शाह

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