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पुलिस ने उन्हें जाने देने की विनती नहीं सुनी. उनके लिए ज़्यादा ज़रुरी था मुख्यमंत्री की कारों का कारवां गुज़रते समय व्यवस्था बनाए रखना. मुझे तो वह गणतंत्र का अपमान लगा था, पर आश्चर्य है कि जब मैंने यह घटना समाचार पत्रों में भेजी, तो कोई मेरी बात से सहमत नहीं हुआ अर्थात घटना छपी नहीं.

फिर वही शोर, वही बहसें, वही एक-दूसरे पर दोषारोपण, मैंने टीवी बंद कर दिया. कल चुनाव है. मुझे चैन से ठंडी सांस लेकर सोचना था, तोलना था. जाने क्यों उस घटना के बाद चुनाव वाले दिन मन बहुत तिक्त हो जाता है. याद आ जाती है वो घटना…
एक बार किसी शादी से लौटते समय हमारी कारें लगभग बीस मिनट के लिए रोक दी गईं और हमने तेईस लाल बत्ती वाली गाड़ियां सामने से गुज़रते देखीं. मगर जिस बात के कारण मैं यह क़िस्सा भूल नहीं पाई वह यह थी कि रोकी गई भीड़ में हमारी तरह ही दो और आम परिवार थे- एक किसी गर्भवती स्त्री का, जो प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी और एक वो जो किसी हाथ की हड्डी टूटे बच्चे को डॉक्टर के पास ले जा रहा था. पर पुलिस ने उन्हें जाने देने की विनती नहीं सुनी.


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उनके लिए ज़्यादा ज़रुरी था मुख्यमंत्री की कारों का कारवां गुज़रते समय व्यवस्था बनाए रखना. मुझे तो वह गणतंत्र का अपमान लगा था, पर आश्चर्य है कि जब मैंने यह घटना समाचार पत्रों में भेजी, तो कोई मेरी बात से सहमत नहीं हुआ अर्थात घटना छपी नहीं. उससे बड़ी विडंबना ये कि आज मेरे आलावा किसी को यह याद तक नहीं रहा.
दूसरे दिन मैं उठी, नित्य कार्य किए. ठंडी सांस लेकर आंखें मूंदकर ख़बरों को ‘रिकॉल’ किया, नापा-तौला और अपनी बाकी ज़िम्मेदारियों की तरह वोट देने निकल गई. क्योंकि मेरा विश्वास है कि कुछ भी हो, लोकतंत्र राजशाही से तो बेहतर ही है और इसे और बेहतर बनाना हमारे हाथ में कुछ-कुछ है और कुछ और होता जाएगा… बस हम अपने अच्छे-बुरे अनुभव बांटते रहें… सोचते रहें….

– भावना प्रकाश


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“बड़ी मुश्किल से पेट काट-काट कर पढ़ाया. अब शहर में नौकरी करता है.” उसकी आंखें फिर चमक उठी.
“पर अपने ही गुज़ारे लायक कमा पाता है. शादी हो गई है. दो बच्चे भी हैं. बाबूजी, बहुत प्यार करता है हम दोनों से, पर किराया, बच्चों की पढ़ाई… उसका दर्द मैं समझती हूं. हम बूढ़ा-बूढ़ी, अपने लायक कमा लेते हैं.” रुआंसी हो उठी वो.

आज फिर सुमित की नज़र सड़क पर बैठी उस वृद्धा पर अटक गई थी. वो रोज़ ही उसको उसी स्थान पर बैठे देखता, कभी लोगों से मनुहार करती, तो कभी एकाध लोग उससे सहानभूति दिखाते हुए गुल्लक ख़रीद भी लेते.
क्या होता होगा इतने थोड़े-से पैसों से? वो सोचता और आगे बढ़ जाता, पर आज कुछ सोचते हुए ठिठक गया.
“बाबूजी गुल्लक आपके बच्चों के लिए’ और दीया आपके पूजाघर के लिए…”
“हां! ठहरो भई, मैं पास में ही रेलवे कॉलोनी में रहता हूं. ऐसा करो, तुम ये टोकरा उठाकर मेरे साथ चलो. बच्चे ख़ुद ही पसंद कर लेंगे कि उन्हें कैसी गुल्लक चाहिए.”
आशा की एक चमक उभरी माई के चेहरे पर और वो अपनी टोकरी उठाकर सुमित के साथ चल दी.
चलते-चलते सुमित उससे उसके परिवार के विषय मे भी पूछता जा रहा था.
“घर में मरद है. सब्ज़ी का ठेला लगाता है और मैं ये गुल्लक बनाकर बेचती हूं…” वो बता रही थी.
“अच्छा!”
उसके हाथों में भरी चूड़ियां देख कर ही सुमित समझ गया था कि अभी उसका पति है.
“और बच्चे?”
“सिर्फ़ एक बेटा है, दूसरा हुआ ही नहीं…” वो किंचित हंसते हुए बता रही थी.
“बड़ी मुश्किल से पेट काट-काट कर पढ़ाया. अब शहर में नौकरी करता है.” उसकी आंखें फिर चमक उठी.


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“पर अपने ही गुज़ारे लायक कमा पाता है. शादी हो गई है. दो बच्चे भी हैं. बाबूजी, बहुत प्यार करता है हम दोनों से, पर किराया, बच्चों की पढ़ाई… उसका दर्द मैं समझती हूं. हम बूढ़ा-बूढ़ी, अपने लायक कमा लेते हैं.” रुआंसी हो उठी वो.
सुमित का घर आ चुका था. उसके साथ वृद्धा को देख नेहा, उसकी पत्नी की सवालिया निगाहें उसकी ओर उठी. उसे चुप रहने का इशारा करते हुए सुमित अंदर आया. बताया उसे साथ लाने का उद्देश्य. वो मदद करना चाहता था उसकी.
सुमित ने अपने दोनो बच्चों रेवा और रवि के लिए एक-एक गुल्लक ली और पूजाघर के लिए एक दीया.
माई आशीर्वाद देकर जाने को ही थी कि नेहा ने उसे रोका, “माई, हम लोग धुलाई की मशीन लानेवाले थे, पर क्या तुम हम लोगों के कपड़े धो दिया करोगी?”
“काहे नही बीबीजी, जुग, जुग जियो!”
“पर तुम लोगी क्या?”
“जो तुम ख़ुशी से दे दो.”
तब से माई रोज़ वहां आती, कपड़े धोती और अपनी गुल्लकें बेचने निकल जाती. बहुत आसरा हो चुका था उसे नेहा से, सो छोटे-मोटे काम भी निपटा देती.
सालभर गुज़र चुका था. माई के चेहरे पर रौनक़ आ चुकी थी. आज सुमित ने उसे बुलाया, “माई, एक बात बताओ? मूल प्यारा कि सूद?”
इस कहावत को माई शायद जानती थी.
“क्या बेटा…” मुस्कुराई वो.
“मुझे तो अपने दोहते अपने बेटे से अधिक प्यारे हैं.”
“हां, ये बात!”
तभी सुमित के दोनों बच्चे अपनी-अपनी गुल्लक लेकर कमरे में आए और माई के पैरों के पास रख दिया.
“ये क्या?” चौंक कर माई ने पूछा.


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सुमित और नेहा मुस्कुराए, सुमित बोला, “ये गुल्लक, तुम्हारा मूल और सूद है इसके अंदर…”
“नही बेटा, नही बीबीजी…”
“नही क्या? उठाओ इसे.” नेहा ने बनावटी ग़ुस्से से कहा और रोती हुई माई उनके चरणों में झुक गई.

– रश्मि सिन्हा

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“आप ऐसे क्यों नहीं सोचतीं कि सिर्फ़ बीमारी ही कंटेजियस नहीं थी. उस वक़्त कार्तिक के प्रति दिखाया मेरा कंसर्न और केयर भी कंटेजियस था. कार्तिक से मैंने ना केवल बीमारी, बल्कि उसने मेरे केयर और अफेक्शन को भी शेयर किया था.” मेहुल की हिमाकत और तर्क से जया ने ग़ुुस्से में फोन काट दिया.

“हैलो पापा, बिज़ी तो नहीं हो आप…”
“नहीं… बोलो… मेहुल.”
“पापा, मम्मी आसपास हैं क्या?”
“हां-हां बात कराऊं?”
“अरे नहीं, आप से ही बात करनी है. एक छोटी-सी प्रॉब्लम हो गई है.” मेहुल के ऐसा कहते ही आश्‍विन बाहर चले गए. वहां पर बैठी जया, फोन मेहुल का था ये समझ चुकी थी. कनेक्टिविटी की प्रॉब्लम होगी ये सोचकर आश्‍विन के अंदर आने का इंतज़ार करने लगी.
कुछ देर बाद वो आए और बिना कुछ बोले ही सोफे पर बैठ गए. जया आशंकित-सी बोली, “किसका फोन था… मेहुल का था क्या? कोई परेशानी तो नहीं है, सब ठीक तो है ना…”
“ओ हो जया! तुम्हारी यही प्रॉब्लम है, बहुत जल्दी परेशान हो जाती हो. अरे सब ठीक है, मेहुल भी ठीक है… थोड़ा परेशान है. उसे चिकनपॉक्स हो गया है.”
“हे भगवान! चिकनपॉक्स कैसे हो गया, और आप कह रहे है सब ठीक है… कितना कहा था इस लड़के से की साफ़-सफ़ाई से रहे, लेकिन सुनते कहां हैैं आजकल के बच्चे, सब अपनी मर्ज़ी के मालिक जो हैं.“
“जया तुम्हारी यही आदत पसंद नहीं है, ज़रा-ज़रा सी बात पर परेशान हो जाती हो. इसीलिए मेहुल ने तुम्हें नही बताया… अरे! ठीक है वो.. वैसे भी आज उसका ये तीसरा दिन है.”
“क्या…?” जया अवाक् सी आश्‍विन का मुंह ताकती रह गई. सहसा हड़बड़ाती हुई बोली, “तीन दिन हो गए हैं और उसे अब फ़ुर्सत मिली है फोन करने की… आप अभी; बस अभी मेहुल से बात कराइए…” “देखो जया, उसे अभी तुम्हारे सपोर्ट की ज़रूरत है. ज़रा आराम से बात करना… ” बात पूरी होने से पहले रुआंसी-सी जया फोन मिला चुकी थी.
“मेहुल, कैसा है तू… और पापा क्या बोल रहें हैं तीन दिन हो गए हैं.” “हां मम्मा, दो दिन तो समझ में आया ही नहीं कि ये दाने कैसे हैं. फिर कार्तिक को डाउट हुआ कि शायद ये चिकनपॉक्स है. आज डॉक्टर ने भी कह दिया, तो आपको फोन कर रहा हूं.” मेहुल की आवाज़ सुनते ही जया का गला भर आया…
“कैसे हो गया तुझे चिकनपॉक्स..? किसी को था क्या?”
“मम्मी, ये तो मौसम ही है… किसी को भी हो सकता है…”
“जबसे तुमने पीजी में रहना शुरू किया है, तब से बोल रही हूं, थोड़ी साफ़-सफ़ाई रखा करो. बाहर से आकर हाथ अच्छे से धोना, रोज़ नहाकर…”
“ओहो मम्मी, अब तो हो ही गया है ना. आपको तो बताना ही नहीं चाहिए… इतनी जल्दी हाइपर हो जाती हैं, और वैसे भी ज़्यादा नहीं हुआ है.”
“अच्छा, मैं पापा को वहां भेज रही हूंं तुम घर आ जाओ…”
“बिल्कुल नहीं, मेरे इम्तिहान आनेवाले हैं. वैसे भी ट्रैवलिंग सेफ नहीं है, कंटेजियस डिसीज़ है.”
“अच्छा, फिर मैं आ जाती हूं…”
“आप तो बिलकुल मत आना. मुझे पढ़ाई करनी है. डिस्टर्ब होगा.”
“वैसे भी दो ही कमरे हैं. एक में मैं हूंं, दूसरे में कार्तिक और सौरभ हैं.” “तुम्हारे दोस्तों को कोई प्रॉब्लम नहीं है…”
“नहीं… मम्मी, सौरभ कुछ दिनों के लिए कहीं और शिफ्ट हो गया है… कार्तिक मेरी मदद के लिए यहीं रुका है.”
“मेहुल, मेरा मन नहीं मान रहा है, इसमें बड़े परहेज़ की ज़रूरत होती है. नीम की पत्तियों का इंतज़ाम, खानपान में परहेज़ और…” रफ़्तार से बोलती जया की परहेज़ों की लंबी सूची पर मेहुल ने विराम लगाया. “मम्मी मैंने नेट पर सब सर्च कर लिया है. डॉक्टर को भी दिखा दिया है. उनके निर्देशों को अच्छे से फॉलो कर रहा हूं और नीम की पत्तियों का ढेर लगा है. रही मेरे खाने-पीने की बात, तो कार्तिक मेस से बनवाकर ला देता है. नीम का तेल, नरियल पानी, जूस सब अरेंज कर देता है…”


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“एक बात बता मेहुल, सौरभ चला गया है दूसरी जगह; ऐसे में कार्तिक तुम्हारे साथ कैसे… उसे कोई दिक्क़त नहीं होती है क्या?” “मम्मी, सौरभ को हम लोगों ने ही दूसरी जगह शिफ्ट होने को कहा था. इम्तिहान के दिनों में रिस्क लेना ठीक नही है और रही बात कार्तिक की, तो उसे पहले हो चुका है तो कोई टेंशन नही. और वो मेरे साथ-साथ अपना ध्यान भी रखता है. दूसरे कमरे में रहता है… यहां तक कि बाथरूम भी बेचारा ऊपर वाले पीजी का इस्तेमाल करता है. मैं रेस्ट कर रहा हूंं. बाहर नहीं निकलता हूंं, दूसरों का भी ध्यान रखना पड़ता है ना… फ़िक्र मत करो, मैं अपना हालचाल देता रहूंगा.” उस दिन जया पूरे दिन किसी ना किसी से फोन पर बात करते हुए इस बीमारी से ठीक होने के नुस्ख़ों को संग्रहित करती रही. मेहुल को फोन कर चेताती रही. एक-एक पल काटना मुश्किल था, लेकिन आश्‍विन शांत थे, वे जया को समझाते, “तुम्हारी चिंता मात्र से मेहुल ठीक नहीं होगा, इस वक़्त उसे ज़रूरत है तुम्हारे निर्देशों की और दुआओं की. तीन दिन से उसने संभाला ही है.”
“क्यों संभाला है उसने सब अकेले… ऐसे समय पर हमें मेहुल के साथ होना चाहिए.”
“जया हमारे वहां जाने से या उसके यहां आने से उसका समय ख़राब होता. मेरे हिसाब से वो अकेले ज़्यादा ज़िम्मेदारी से परिस्थितियों से निपटेगा.” रात को जया की ज़िद्द पर स्काइप पर मेहुल ने बात की, उसे देखकर तो मन भर आया, लेकिन कमरे का हुलिया देखकर वो तनावमुक्त हो गई थी. कैमरा घुमाकर एक-एक चीज़ का मुआयना करवाया मेहुल ने… नीम की पत्तियां, नीम का तेल, नारियल पानी, जूस, दानों पर लगाने वाली क्रीम पोटेशियम परमैग्नेट सब कुछ वहां रखा दिखा.
“मेहुल, तुझे इतना सब कुछ किसने बताया?”
“कुछ कार्तिक ने और बाकी सब गूगल बाबा ने…” मेहुल ने हंसकर जवाब दिया.
धीरे-धीरे आठ दिन हो गए थे. मेहुल ठीक होने लगा था. नवें दिन अपने डॉक्टर से जया की बात करवाई, तो वो भी हंस रहे थे, “आजकल नेट युग में लोग समस्याओं की जड़ तक पहुंचकर इलाज खोज लेते हैं और तो और दो-तीन दवाओं के नाम भी इनसे ही मुझे पता चले… तब मैने कहा कि ये अपने आप ही ठीक हो जाएगा, बस सावधानी बरतने की ज़रूरत है. मेरे सभी निर्देशों को बहुत अच्छे से फॉलो किया है आपके बेटे ने. पहले तो मैने कह दिया था कि पैरेंट्स को बुला लो, लेकिन ये बोला, पैरेंट्स क्या करेंगे? ख़ुद टेंशन में रहेंगे और हमें भी टेंशन ही देंगे.” डॉक्टर की बातों पर जया हंस पड़ी, लेकिन उसका मन भीग-भीग गया.
“क्या करता बेचारा मेहुल, इम्तिहान के दिनों में ख़ुद का ध्यान रखना तो ज़रूरी था ही. वो भी अकेले. क्या वो नहीं जानती, ख़ुद के खाने पर उसका कितना कंट्रोल है. उसका बस चले तो दिनभर तला-भुना खाए… और कार्तिक, उसने भी तो कितना ध्यान रखा.” जया को रह-रह कर कार्तिक पर भी स्नेह उमड़ आता.
“ऐसे समय पर उसका साथ देनेवाला लड़का बहुत ही सुंदर मन का होगा, वरना कौन करता है दूसरों के लिए इतना. पराए शहर में दोस्तों का साथ कितना ज़रूरी होता है, वो आज समझ पा रही थी.” “तुम्हारा बेटा अब ठीक है. ख़ुश तो हो ना…” जहां आश्‍विन बोल रहे थे, वहीं जया डॉक्टर से हुई बात बताकर हंस रही थी. उसे याद आया जब मेहुल के दाने सूखने लगे थे, तब बड़ी चिंता थी. जानती थी कि ऐसे समय में उठनेवाली खारिश मेहुल को परेशान कर देगी.
उसने स्काइप पर मेहुल से कहा, “अभी बहुत खारिश होगी, तुम अपने नाख़ून मत लगाना; वरना वो दाग़ छोड़ जाएंगे.”
“मम्मी आप चिंता मत करो, मैं नीम की पत्तियों से सहलाकर खारिश मिटा लेता हूंं. ये टिप मैंने नेट पर पढ़ी थी. देखो ये डॉक्टर की दी हुई क्रीम है, इससे स्किन मॉइश्‍चराइज़ करता हूंं, तो इरिटेशन कम होती है.” उसकी बात से जया प्रभावित थी.
वह मेहुल को जितना बताती, मेहुल उसके सामने और बहुत से तार्किक तथ्य रखकर चौंका देता. जब जया ने मेहुल से उसकी डायट के बारे में बात की और तली-भुनी चीज़ो से दूर रहने को बोला, तब उसने बताया, “मम्मी, डॉक्टर ने भी ऑयली चीज़ें खाने को मना किया है, इसलिए अपना ध्यान रखता हूंं. बिल्कुल बॉयल खाना अरेंज होना मुश्किल है, फिर भी कार्तिक जुगाड़ कर ही देता है. हालांकि बोर हो गया हूंं फीका खाकर… लेकिन मुझे जल्दी ठीक होना है. मैंने नेट पर सर्च किया था, तो पता चला ऑयली फूड इसलिए मना करते हैं, क्योंकि किसी-किसी के इंटेस्टाइन में भी दाने हो जाते है ऐसे में ऑयली और स्पाइसी फूड प्रॉब्लम करते हैं.” जिस तर्क से मेहुल ने समझाया था, वो लॉजिक तो जया ने कभी लगाया ही नहीं.
जान गई थी कि इन बच्चों ने काफ़ी गहरे तक जानकारियां खंगाल डाली हैं. नेट से दूर रहने की सलाह देनेवाली जया आज की तकनीक का लोहा मान गई थी. दस-बारह दिनों के भीतर मेहुल बिल्कुल ठीक था. इम्तिहान भी सकुशल सम्पन्न हो गए थे. जया ने राहत की सांस ली.
“सच आश्‍विन, किस तरह से इस लड़के ने संभाला है सब अकेले… मुझ पर दबाव ना डालता, तो एक पल की देरी ना करती वहां पहुंचने में…”
“हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए कार्तिक का जिसने उसकी इतनी मदद की है.”
“आप ठीक कह रहे हैं, सोच रही हूंं कार्तिक के लिए कोई गिफ्ट भेज दूं. मैं अभी मेहुल से बात करती हूंं.” कहते हुए जया ने फोन लगा दिया था. उससे फोन पर पूछा, तो मेहुल बोला, “मम्मी, गिफ्ट की ज़रूरत नहीं है. फिर भी आप चाहती हैं, तो आज मेरे और कार्तिक के लिए मूवी और डिनर स्पांसर करवा दो.” जया हंसते हुए बोली, “तुम मेरी कार्तिक से बात करवा दो कम से कम मैं उसे थैंक्स तो बोल दूं.” मेहुल ने कार्तिक को फोन दिया, जया ने भावुक होकर उसे थैंक्स बोला, तो कार्तिक ने झेंपते हुए कहा, “आंटी, मैं अपने दोस्त की मदद नहीं करता तो कौन करता? आप दूर थे, इसलिए ज़्यादा परेशान थे. वरना यहां सब कुछ आराम से मैनेज हो गया था.”
“फिर भी कार्तिक, चिकनपॉक्स कितना कंटेजियस होता है. ये जानते हुए भी…”
“तो क्या हुआ आंटी, कुछ दिन पहले मुझे भी तो चिकनपॉक्स हो गया था. तब मेहुल ने भी तो ख़तरा उठाकर मेरी देखभाल की थी. मेरी फैमिली तो बहुत दूर थी. चेन्नई से मां का आना संभव नहीं था. मेहुल की हेल्प से जब मैं ठीक हुआ तो मेरी मम्मी ऐसे ही इमोशनल थी जैसे आज आप हैं.” कार्तिक के खुलासे पर दो पल तो जया के मुंह से कुछ निकला ही नहीं…
“क्या तुम्हें भी चिकनपॉक्स हुआ था?” फोन मेहुल ने ले लिया था. “अरे मम्मी, पुरानी बात हो गई है. अब फोन रख रहा हूं और हां कार्तिक को देनेवाली ट्रीट याद रखना.” फोन रखते ही जया का ग़ुस्सा फट पड़ा था.


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“आश्‍विन कितना बेवकूफ़ है ये मेहुल. उसने हमें बताया नहीं की ये कंटेजियस डिसीज़ उसे कार्तिक से हुई है. ख़ुद का ज़रा ध्यान नहीं है. ऐसा भी क्या दोस्ती निभानी कि ख़ुद के लिए मुसीबत ओढ़ ले.” क्रोध में बोलती जया का मूड पूरे दिन ख़राब रहा.
दूसरे दिन मेहुल से बात करते समय भी ग़ुस्सा टपक रहा था.
“मम्मी एक हफ़्ते का टर्म ब्रेक है. कार्तिक का घर बहुत दूर है, वो घर नहीं जा रहा है क्या मैं उसे अपने साथ ला सकता हूंं.”
“बस कर मेहुल… इस कार्तिक की वजह से तेरे ऊपर मुसीबत आई कितने बेवकूफ़ हो तुम. तुमसे स्मार्ट तो सौरभ है, जो कहीं और शिफ्ट हो गया था.”
“मम्मी जब कार्तिक बीमार था, तब सौरभ भी हमारे साथ था. मुझे चिकनपॉक्स तब हुआ जब इम्तिहान होनेवाले थे. ऐसे में सौरभ का रुकना ठीक नहीं था और कार्तिक को कोई ख़तरा नहीं था, क्योंकि उसे तो पहले ही हो चुका था. और वैसे भी हम जानते हैं कि चिकनपॉक्स कंटेजियस होता है, इसलिए ख़ुद भी दूूर रहते थे.”
“तुम लोग ख़ुद को बड़े अक्लमंद समझते हो, ये जानते हुए भी कि ये कितना कंटेजियस है तुमने बेवकूफ़ी की.”
“मम्मी, कल तक आप कार्तिक की तारीफ़ करते नहीं थक रही थीं. उसने मेरी मदद की, वो आपको बहुत अच्छा लगा, लेकिन मेरी मदद आपको बेवकूफ़ी लग रही है. मम्मी थोड़ा समझदार बनिए, जितनी मदद मैंने कार्तिक की, उससे कई गुना मदद उसने मेरी की. हिसाब बराबर. सच बताइए मम्मी, क्या आप सौरभ से नाराज़ नहीं थी. जो मुझे ऐसी हालत में छोड़कर चला गया था. अब जब मैं कार्तिक को छोड़कर नहीं गया, ये जानकर आपका मूड ख़राब हो गया है. ज़रूरत पड़ने पर आप मेरे पास तुरंत आ जातीं, लेकिन सोचो कार्तिक के पैरेंट्स चेन्नई में रहते हैं, उन्हें आने-जाने में ही तीन दिन लग जाते. मम्मी उसकी बीमारी कंटेजियस थी… तो मेरी केयर और कंसर्न भी कंटेजियस था. मम्मी ये ज़रूरी नहीं है कि चिकनपॉक्स मुझे कार्तिक की वजह से हुआ है कॉलेज में भी कई बच्चों को चिकनपॉक्स हुआ था. मैंने और सौरभ दोनों ने बहुत एहतियात बरती थी. और फिर आप ऐसे क्यों नहीं सोचतीं कि सिर्फ़ बीमारी ही कंटेजियस नहीं थी. उस वक़्त कार्तिक के प्रति दिखाया मेरा कंसर्न और केयर भी कंटेजियस था. कार्तिक से मैंने ना केवल बीमारी, बल्कि उसने मेरे केयर और अफेक्शन को भी शेयर किया था.” मेहुल की हिमाकत और तर्क से जया ने ग़ुुस्से में फोन काट दिया.
“आश्‍विन ये लड़का दुनियादारी कब समझेगा?” कुछ देर की चुप्पी के बाद आश्‍विन बोले, “जया, ठंडे दिमाग़ से सोचोगी और ग़ौर करोगी तो तुम्हें मेहुल पर गर्व होगा. हमारे मेहुल का व्यक्तित्त्व और सोच का दायरा कितना विस्तृत है. एक-दूसरे की परेशानियों को बांट कितनी सहजता से समस्या का हल ढूंढ़ लिया.” आश्‍विन की बात सुनकर जया की आंखें भर आई थी. बार-बार मेहुल के शब्द कौंध रहे थे… कंटेजियस बीमारी ही नहीं मेरा केयर और कंसर्न भी था… सच कहा था आश्‍विन ने, आज उसने बेटे का ये पक्ष भी देखा था.
घर में छाई चुप्पी के कुछ देर बाद आश्‍विन को जया बड़े इत्मिनान से मोबाइल पर बात करती नज़र आई. मां-बेटे के संवाद सुनाई तो नहीं दे रहे थे, लेकिन जया के चेहरे पर छाए उत्साह से वतावरण की नरमी का अंदाज़ा हो गया था. जया की नज़र सहसा आश्‍विन पर पड़ी, तो मुस्कुरा पड़ी, “मैंने कह दिया है कि वो कार्तिक को टर्म ब्रेक में ले आए. बेचारा चेन्नई तो जा नहीं सकता है. यहां आएगा तो उसके लिए चेंज हो जाएगा.”
जया अभी भी बोल रही थी, “हम बड़े भी जाने-अनजाने कैसी ग़लत सोच को बच्चों के सामने रखकर ख़ुद भी छोटे बन जाते हैं. ये तो कहो अपना मेहुल समझदार है, सही-ग़लत समझता है. भरोसा है दुनियादारी निभा ही लेगा.” आश्‍विन मुस्कुराकर सोच रहे थे, ‘वाक़ई कंटेजियस है… सहयोग, समर्पण और स्नेह. लोगों को अपनी चपेट में ले ही लिया. यहां तक कि जया को भी…’

– मीनू त्रिपाठी

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वो बता रही थी.. दस की उम्र से समाज सेवा, बारह तक अपना सभी काम ख़ुद करने लगना और अट्ठारह की उम्र से माता-पिता से किसी भी तरह की आर्थिक मदद लेना बंद. अपने सभी ख़र्चे ख़ुद निकालना यहां तक कि पढ़ाई का ख़र्च भी…

यूरोप की एक लड़की के विश्व भ्रमण के कीर्तिमान की ख़बर सुन मेरी बेटी पहले चहक उठी, फिर मुझसे रूठकर बोली, “तुम मुझे कनाट प्लेस तक अकेले नहीं जाने देतीं और वो देखो… मेरी ही उम्र की है और उसके माता-पिता उसे पूरी दुनिया अकेले घूमने देने से नहीं डरे.” मैंने कहा, “ठीक है, ज़रा उसकी जीवनी देखो यू-ट्यूब पर.”


बेटी ने मेरे साथ देखना शुरू किया…
वो बता रही थी.. दस की उम्र से समाज सेवा, बारह तक अपना सभी काम ख़ुद करने लगना और अट्ठारह की उम्र से माता-पिता से किसी भी तरह की आर्थिक मदद लेना बंद.


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अपने सभी ख़र्चे ख़ुद निकालना यहां तक कि पढ़ाई का ख़र्च भी… कहना न होगा इतना देखते-देखते बेटी को भूख भी लग गई थी. उसे याद आ गया था कि उसे मेरे हाथ के ढोकले बहुत पसंद हैं और उसने कई दिनों से वो खाए नहीं हैं. यही नहीं वो होमवर्क भी याद आ गया था, जिसे अपने पापा की मदद से करना था.
आज़ादी कर्तव्य पहले है और अधिकार बाद में ये बात उदाहरणों से समझानी पड़ती है.

– भावना प्रकाश


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उसके कपडे़ लगभग भीगे हुए थे. कुछ बूंदें उसके चेहरे से फिसलती हुई नीचे गिर रही थीं और कुछ उसके बंधे हुए बालों के बीच क़ैद हो चुकी थीं. लेडीज़ परफ़्यूम का तेज़ झोंका उस लड़की के आते ही टपरी में फैल गया था. एक पल को केशव को लगा मानो वो सड़क के किनारे किसी टपरी में खड़ा ख़ुद को बारिश से बचाने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि किसी ख़ूबसूरत आइलैंड में सैर पर हो, जहां अभी-अभी पहली बारिश हुई है और मिट्टी की ख़ुशबू सारे आसमान में फैली हुई है.

पिछले आधे घंटे से हो रही ज़ोरदार बारिश आख़िरकार धीमी पड़ने लगी थी. आसमान भी पहले से साफ़ हो चुका था, लेकिन सड़क के गड्ढों में भरे मटमैले पानी पर गिर रही बारिश की नन्ही बूंदों को देखकर इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता था की बारिश की हल्की फुहार अब भी जारी है. दुकानों के बाहर शेड के नीचे खड़े लोग धीरे-धीरे करके एक बार फिर सफ़र पर निकलने लगे थे.
एक छोटे मेडिकल स्टोर के बाहर पिछले आधे घंटे में क़रीबन ग्यारह लोग बारिश से बचने के लिए जमा हो चुके थे. उन ग्यारह लोगों में केशव भी शामिल था. केशव सुबह जब घर से चला, तो आसमान एकदम साफ़ था. बारिश तो दूर हल्की छाया होने के भी आसार कहीं नज़र नहीं आ रहे थे. लेकिन दोपहर बाद मौसम ने जो अपना मिज़ाज बदला की बस मौसम ही होकर रह गया. शायद इसी वजह से अचानक से बदल जाने वालों को मौसम की तरह बदलना कह दिया जाता है.
ख़ैर बारिश अब रुक चुकी थी और बाकी सब की तरह अपना हेलमेट दुकान के काउंटर से उठाते हुए केशव भी घर को निकल पड़ा था. उसने बाइक की सीट पर ठहरी हुई बारिश की बूंदों को हाथ से साफ़ किया और हेलमेट पहनते हुए एक बार फिर सड़क पर था. हवा में तैर रही पानी की बौछार उसके हेलमेट के खुले शीशे से अंदर आकर उसके चेहरे पर जमती जा रही थी और इकठ्ठा होकर उसके गर्दन से नीचे पहुंच उसके गर्म शरीर में सिहरन पैदा कर रही थी.
वहीं उस मेडिकल स्टोर जिस पर कुछ देर पहले केशव रुका हुआ था से दो दुकान छोड़ एक कपडे की दुकान पर नेहा ठहरी हुई थी. वैसे तो नेहा और केशव का आपस में कोई रिश्ता नहीं था, दोनों एक-दूसरे को जानते भी नहीं थे, दोनों ने एक-दूसरे को कभी देखा भी नहीं था, लेकिन दुनिया में कई ऐसे लोग होते हैं, जिनसे हमारा रिश्ता होता है. भले हम उनसे कभी न मिले, कभी उन्हें न देखे या कभी उनके सामने न आए. कुछ रिश्ते मिलने के, देखने के या बनाए जाने के मोहताज़ नहीं होते, वो बस होते हैं. एक ऐसा ही रिश्ता नेहा और केशव का भी था. अभी-अभी केशव उस रिश्ते के बहुत क़रीब से गुज़रा था.


अब तक नेहा भी कपडे की दुकान से निकल रोड पर खड़े अपने ग्रे कलर के एक्टिवा स्कूटर तक आ चुकी थी. उसने कंधे पर टंगा कत्थई रंग का बैग सीट के नीचे डिग्गी में रखा और घर जाने को चल पड़ी. जहां केशव की बाइक हवा से बातें करते हुए तेज़ी से आगे बढ़ रही थी, वहीं नेहा की स्कूटर ने अब तक एक बार भी पचास से ऊपर जा सकने का सौभाग्य नहीं पाया था.
बाइक की रफ़्तार और बगल से गुज़रती गाड़ियों से उछलते गंदे पानी के छींटों से अपने नए सफ़ेद जूतों को बचाने के लिए केशव भरसक प्रयास कर रहा था. कभी वो पैरों को उठाकर लेग गार्ड में रख लेता तो कभी बाइक को डामर की सड़क से किनारे मिट्टी में ले जाकर अपने जूतों को बचाने का प्रयास करता. उसने ये सफ़ेद महंगे जूते पिछले हफ़्ते ही ख़रीदे थे और आज इस पहली बारिश में उन्हें लाल काला नहीं हो जाने देना चाहता था. उसे अफ़सोस हो रहा था अपने सुबह के उस फ़ैसले पर जब उसने शू रैक में रखे नीले जूते की जगह इन सफ़ेद जूतों को निकाला था.
ख़ैर कुछ मिनटों के सफ़र के बाद बारिश की गिरती नन्ही बूंदें एक बार फिर से भारी होने लगी थी. उनकी बादलों से टूटकर ज़मीन तक आने की रफ़्तार तेज़ होने लगी थी. गड्ढों में एक दफ़ा फिर से बाढ़ आने को थी. पिछले एक घंटे के सफ़र में केशव के साथ ऐसा कई बार हो चुका था. वो कुछ देर रास्ते पर चलता और बारिश फिर तेज़ हो जाती. बारिश तेज़ होते ही वो फिर किसी जगह आसरा ले लेता और बारिश के रुकते ही फिर सफ़र पर चल पड़ता था.
उसने इस बार भी ऐसा ही किया था. इसके पहले की बारिश उसे पूरी तरह से भीगा दे उसने सबसे पहले पड़ने वाली एक छोटी पान की टपरी में पनाह ले ली थी. बाइक रोड में किनारे खड़ी करके वो लगभग भागते हुए पान की टपरी के नीचे बने शेड तक पहुंचा था. उसने हेलमेट निकाल हाथ में ही थामे रखा और दुकान के बाहर रखी नीले रंग की लकड़ी की बेंच में बैठ गया. उस दुकान के अलावा वहां आसपास और कोई दुकान नहीं थी. पूरे रास्ते या तो खुले खेत थे या फिर इक्का-दुक्का कच्चे मकान. लोगों से ज़्यादा घर सिर्फ़ बड़े शहरों में ही देखने को मिलते हैं, ग्रामीण इलाकों में आज भी एक घर के बाद मीलों का फासला होता है, वो भी ख़ासकर हाईवे के किनारे बसी हुई बस्तियों में.
पान की उस टपरी के अंदर तक़रीबन 35 साल का एक आदमी मोबाइल में वीडियो देखने में व्यस्त था. मोटरसाइकिल खड़ी करके दुकान के बाहर पहुंच बेंच में केशव के बैठने तक के पूरे वाकये में एक बार भी उस आदमी ने केशव की तरफ़ नहीं देखा था. उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था की कौन आया या कौन गया. हां, बस वो बीच-बीच में वीडियो को देख ज़ोर से हंसता और चुप हो जाता. दो लोगो के साथ होने पर भी एक को बिल्कुल अकेला महसूस करवाने की ये कला सिर्फ़ मोबाइल जैसे आविष्कार के द्वारा ही लाई जा सकती थी.
टपरी के बाहर बांस की बल्लियों को ज़मीन में गाड उसके ऊपर सूखे घास और छोटी लकड़ियों को मिलाकर बनाई हुई छत लगाई गई थी, जिसके ऊपर एक पुराना टीन बंधा हुआ था, ताकि पानी को अंदर आने से रोका जा सके. बांस की उन बल्लियों में अब तक फफूंद ने उगना भी शुरू कर दिया था.
बारिश तेज़ होने के साथ ही पानी की बौछार अंदर आने लगी थी, जिसके साथ ही केशव ने अपना बेंच किनारे से सरका कर मध्य में कर लिया था. अभी केशव ख़ुद को तेज़ हवाओं और बौछारों से बचाने की नाकाम कोशिश में था जब एक ग्रे एक्टिवा स्कूटर तेज़ी से आकर रोड के किनारे खड़ी केशव की बाइक के बगल में रुका था. स्कूटर के रुकते ही उसमें सवार लड़की ठीक वैसे ही भागती हुई टपरी में आई थी जैसे कुछ देर पहले केशव आया था. उसके कपडे़ लगभग भीगे हुए थे. कुछ बूंदें उसके चेहरे से फिसलती हुई नीचे गिर रही थीं और कुछ उसके बंधे हुए बालों के बीच क़ैद हो चुकी थीं. लेडीज़ परफ़्यूम का तेज़ झोंका उस लड़की के आते ही टपरी में फैल गया था. एक पल को केशव को लगा मानो वो सड़क के किनारे किसी टपरी में खड़ा ख़ुद को बारिश से बचाने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि किसी ख़ूबसूरत आइलैंड में सैर पर हो, जहां अभी-अभी पहली बारिश हुई है और मिट्टी की ख़ुशबू सारे आसमान में फैली हुई है.
उसे लगा की ये छत की सूखी हुई घास कभी भी वापस से हरी हो जाएगी. बांस के डंडों में उगी हुई फफूंद की जगह नई हरी पत्तियां निकल आएंगी. पहली बार जब इश्क़ किसी से टकराता है, तो जाने क्यों उसे हर चीज़ हरी नज़र आने लगती है. दुकानवाले की एक बार फिर तेज़ हंसी से केशव की मृगतृष्णा टूटी थी. दुकानवाले को केशव की आशिक़ी या नेहा की ख़ूबसूरती में कोई इंटरेस्ट नहीं था, वो तो यूट्यूब में चल रही पिक्चर में खोया हुआ था. उसके लिए मोबाइल में दिख रही नायिका वो सब कर सकती थी, जो नेहा ने केशव के लिए किया था.


अब तक नेहा बेंच के दूसरे छोर पर बैठ चुकी थी. बेंच में तीन लोगों के बैठने की जगह थी और इस तरह से नेहा और केशव के बीच लगभग डेढ़ फीट की दूरी थी. केशव को ये डेढ़ फीट की दूरी दुनिया में सुदूर स्थित दो देशों के बीच की दूरी जैसी प्रतीत हो रही थी. नेहा को वहां आए ज़्यादा वक़्त नहीं बीता था जब टपरी के सामने से दो बाइक्स में कुल चार लड़के तेज़ी से गुज़रे थे. गुज़रते हुए उन्होंने वहां नेहा को बैठे देख लिया था और केशव को इस बात का अंदेशा हो गया था कि वो लड़के वापस आ सकते हैं और ऐसा हुआ भी. जल्द ही वो दोनों मोटरसाइकिल्स लौट आई थी. अब तक बारिश और तेज़ हो चुकी थी और आसमान में अंधेरा छाने लगा था. जल्द ही वो चारों लड़के भी टपरी के नीचे पहुंच चुके थे.
“और भैया, क्या हाल है?” आए हुए लड़कों में से एक ने नेहा को घूरते हुए दुकानवाले से सवाल किया था.
उसका सवाल सुन दुकानवाले ने एक नज़र उसे देखा और फिर बिना कोई जवाब दिए नज़रें मोबाइल में कर ली जैसे उसे अंदाज़ा था की ये सवाल उसके लिए किया ही नहीं गया है. अब तक टेंशन फ्री नज़र आ रही नेहा अचानक से 6 अनजान मर्दों के बीच इस सूनसान दुकान में चिंतित नज़र आने लगी थी और इसके पहले की आए हुए लड़के उसके और केशव के बीच बची हुई खाली जगह पर बैठें नेहा ने केशव की ओर सरकते हुए बेंच पर अपनी जगह छोड़ दी थी. उसके ऐसा करते ही केशव को आश्चर्य हुआ था. ये क्या कर दिया था नेहा ने? उसने दो देशों के बीच की दूरी ख़त्म कर दी थी. उसने तो पूरा का पूरा भूगोल ही एक पल में पलट दिया था. उसने दुनिया एक झटके में समेटकर छोटी कर दी थी. केशव को ये भूगोल का बदलना, दुनिया का इस तरीक़े से सिमटना अच्छा लगा था. मन ही मन उसने उन लड़कों को धन्यवाद भी दिया था. उसने सुना था की अगर लड़के चाहे, तो दुनिया बदल सकते हैं, लेकिन उसने ऐसा होते हुए आज पहली बार देखा था. अनजाने में ही सही पर आख़िरकार उन चार लड़कों ने दुनिया बदल ही दी थी.
नेहा के सरकते ही चार लड़कों में से एक लड़का नेहा के ठीक बगल में बैठ गया था. नेहा ने अपना दूर तक बेपरवाही से फैला हुआ दुपट्टा उठाकर अपनी गोद में समेट लिया था. दुनिया में बहुत कम लोगो को ये बात मालूम है की लड़की का दुपट्टा उसके जिस्म का ही हिस्सा होता है. अब तक बेंच पर तीन लोग बैठ चुके थे. तभी एक दूसरे लड़के ने अपने बेंच पर बैठे हुए दोस्त से थोड़ा सरकने और उसके बैठने की जगह बनाने का अनुरोध किया था. उस लड़के के ऐसा कहते ही नेहा के बगल में बैठा हुआ लड़का पूरी तरह से नेहा से सट गया था. उसका कंधा अब नेहा से टकराने लगा था और साफ़ तौर पर नज़र आ रहा था की नेहा उनकी इस हरकत से अनकंफर्टेबल महसूस कर रही थी. टपरी की उस छोटी छत के नीचे इतनी जगह भी नहीं थी की नेहा उठकर खड़ी हो जाए. उसके ऐसा करने से वो खड़े बाकी दो लड़कों के बीच हो जानेवाली थी. उसके लिए स्थिति अब परेशानी बनने लगी थी. उसे समझ आ रहा था की लड़कों ने जान-बूझकर बेंच पर इस तरीक़े से बैठने की कोशिश की है.
केशव को भी ये बात समझ आ रही थी, वो चाहता तो नेहा को साइड करके ख़ुद उन लड़कों के बीच आ सकता था, लेकिन इससे केशव का मन तो सुकून पा लेता नेहा का नहीं. नेहा को तो किसी न किसी लड़के से सट कर बैठना ही होता. चाहे वो उन चार में से कोई एक होता या फिर केशव. और पसंद केशव को नेहा आई थी, न की नेहा को केशव की कि वो केशव के बगल में सुरक्षित महसूस करती.
नेहा को इस तरीक़े से अनकंफर्टेबल होता देख उन लड़कों की बदतमीज़ी बढ़ती जा रही थी, जो केशव को रास नहीं आ रहा था. उसने जेब से मोबाइल निकाल उसमे कुछ टाइप किया और धीरे से नेहा को दिखाया.


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‘जो मैं कहूं उसमें शामिल हो जाना, कोई सवाल मत करना या तुम मुझे नहीं जानती ऐसा मत जताना.’ केशव ने अपने मोबाइल में लिख नेहा को दिखाया और वापस जेब में रख लिया.
“वैसे आरुषि आज तुम लेट कैसे हो गई रोज़ तो तुम दोपहर में ही घर चली जाया करती हो?” मोबाइल जेब में रखने के कुछ देर बाद केशव ने अपनी चाल शुरू की थी. पहले तो नेहा को समझ नहीं आया की आख़िर वो कर क्या रहा है, लेकिन फिर उसने इस झूठ में शामिल हो जाना सही समझा.
“हां, आज कुछ ज़रुरी काम था तो लेट हो गया.” नेहा ने बिना केशव की तरफ़ देखे जवाब दिया था.
“अच्छा और वैसे कल महेश भैया दिल्ली से आ रहे हैं न?” केशव ने नेहा के जवाब देते ही एक नया सवाल छेड़ा था.
“हां.” नेहा ने सिर्फ़ हां में जवाब दिया. उसे अब तक ये खेल समझ नहीं आ रहा था, पर केशव ने अपनी बात आगे जारी रखी.
“यार तुम्हारा ठीक है, तुम्हे पहले भी किसी चीज़ का डर नहीं था और जो थोड़ा-बहुत रहा होगा अब वो भी चला जाएगा. तुम्हारे पापा डीएसपी हैं ये बात जानकर आज तक किसी ने कॉलेज में तुमसे बदतमीज़ी नहीं की और फिर अब तो तुम्हारे भैया भी पुलिस में हो गए हैं. अब तो किसी की मजाल नहीं की तुमसे उलझ जाए.” केशव ने अब अपनी चाल चल दी थी. उसकी बात सुनकर नेहा को एक पल को लगा की वो उसे कोई और समझ रहा है. भला उसका दसवीं क्लास में पढ़नेवाला भाई अचानक पुलिस में कैसे भर्ती हो गया और उसके पापा जो कॉलेज में प्रोफेसर हैं डीएसपी कब बन गए. उसने आश्चर्य से केशव की तरफ़ देखा, लेकिन केशव की आंखों में साफ़-साफ़ दिख रहा था की उसे कुछ नहीं पता, वो तो बस एक झूठ को सच मनवाने की कोशिश में हैं. नेहा ने वो झूठ पढ़ लिया था और फिर मुस्कुराकर बस इतना ही कहा.
“सो तो है.”
नेहा के इतना कहते ही दुकानदार जो अब तक वीडियो देखने में व्यस्त था अचानक से नेहा को देखने लगा था. उसे ज़रा भी अंदाजा नहीं था की शहर के डीएसपी की बेटी उसकी टपरी के नीचे बैठी हुई है. उसने वीडियो बंद कर दिया. उसे डर सताने लगा था की न जाने वीडियो से आनेवाली आवाज़ में ऐसा क्या निकल जाए की, उसकी छोटी-सी गृहस्थी अचानक से मुसीबत में पड़ जाए और उसके घर समन टपक पड़े. वहीं चारों लड़के जो कुछ देर पहले तक अपनी डबल मीनिंग बातों से नेहा को टीज़ करने की कोशिश कर रहे थे चुप हो गए थे. उन्हें अचानक नेहा गुलाबी सलवार सूट की बजाय खाकी वर्दी में दिखने लगी थी. नेहा से सटकर बैठा हुआ लड़का उसकी बातें सुनते ही दूर जा किसी से फोन पर अचानक बातें करने लगा था.
ये सब देख नेहा को हंसी आ गई. उसने सिर नीचे झुका अपनी मुस्कान छुपाने की कोशिश की थी. झुके हुए सिर से उसने एक नज़र केशव पर डाली. दोनों की आंखों में शरारत उभर कर गुज़र गई थी. दुकानवाला अब तक सीधा होकर बैठ गया था और नेहा को विश्वास हो गया कि अगर कुछ देर बारिश नहीं रुकी, तो वो नेहा के लिए चाय-नाश्ते और कुर्सी के इंतज़ाम में लग जाएगा.
जल्द ही वो चारों लड़के आपस में बातें करने लगे और फिर पल भर में वहां से गायब हो चुके थे.


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उनके जाते ही नेहा ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगी.
“यार कमाल के आदमी हो तुम.” नेहा ने हंसते हुए केशव की ओर देखकर कहा था.
“करना पड़ता है.” केशव भी बदले में मुस्कुरा पड़ा.
“वैसे तुम्हे बता दूं कि मेरा न तो नाम आरुषि है और न ही मेरे पापा डीएसपी और भैया पुलिस में हैं.” नेहा ने अब तक मुस्कुराते हुए बताया.
“जानता हूं, लेकिन अगर कुछ देर के लिए तुम्हारे आरुषि बनने, अंकल के डीएसपी बनने और तुम्हारे भैया के पुलिस फोर्स ज्वाइन करने से ये सब किया जा सकता था, तो इसमें हर्ज़ ही क्या है.” केशव ने कहा.
“हम्म वैसे थैंक यू. सच में मुझे समझ नहीं आ रहा था की क्या करूं और ऐसा कुछ तो कभी मेरे दिमाग़ में आ नहीं सकता था, लेकिन भविष्य ने ऐसी कोई परेशानी हुई तो हमेशा ये पैंतरा आज़मा लूंगी.” नेहा ने केशव को धन्यवाद देते हुए कहा.
अब तक बारिश कम हो चली थी. नेहा और केशव बेंच से उठ किनारे पर खड़े थे, जहां छत पर रखे टीन की नालियों से गिरता पानी नीचे मिट्टी में गहरा सुराख़ कर चुका था.
“वैसे मेरा नाम नेहा गिरी है.”
“ओके, एंड माय नेम इज़ केशव.”
“नाइस टू मीट यू केशव एंड थैंक यू वन्स अगेन.” कहते हुए नेहा ने अपनी स्कूटर की तरफ़ चलना शुरू कर दिया था. उसने स्टैंड से स्कूटर हटाया ही था कि केशव ने उसे आवाज़ लगा दी थी.
“अच्छा अगर कभी तुमसे मिलना हुआ तो?”
“तो पुलिस कॉलोनी आ जाना, डीएसपी सर का घर वहीं पर हैं.” नेहा ने हंसकर स्कूटर पर बैठते हुए जवाब दिया था. उसकी बात सुन केशव भी मुस्कुरा पड़ा.
“वैसे पुलिस लाइन के पीछे आर्य कॉलोनी है, वहां प्रोफेसर गिरी का घर आसानी से ढूंढ़ा जा सकता है.” कहते हुए नेहा की स्कूटर आगे बढ़ गई थी. केशव अब तक अपनी जगह पर खड़ा मुस्कुरा रहा था.
नेहा के जाते ही उसकी नज़र नीचे की तरफ़ गई. टीन से गिर रही पानी की बूंदें सीधे उसके सफ़ेद जूतों में आ रही थीं. उसके सफ़ेद जूते अब तक लाल पड़ चुके थे, पर अब उनका गंदा होना केशव को खला नहीं था. ये पहली बारिश की पहली मुलाक़ात की निशानी बन चुके थे.

डॉ. गौरव यादव

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“… आज मेरी बात कान खोलकर सुन लो. जब तक बिज़नेस में इंट्रेस्ट नहीं दिखाओगे या कोई नौकरी नहीं करोगे, मैं तुम्हारी शादी किसी हालत में नहीं करने वाला. तुम्हारी ख़ातिर मैं किसी पराए घर की लड़की की ज़िंदगी जहन्नुम नहीं बनाने वाला.”

“पापा, मुझे अपनी एक कॉलेज फ्रेंड हिना से शादी करनी है.”
“अरे बरखुरदार, पहले अपने पैरों पर तो खड़े हो जाओ. शादी करके क्या खिलाओगे उसे और क्या सुख दोगे? अट्ठाईस बरस के होने आए, तुम्हें दिन-रात दोस्तों की अड्डेबाज़ी से फुर्सत मिले, तब तो किसी काम-धंधे के बारे में सोचो तुम. हज़ार बार कहा है थोड़ा ऑफिस में बैठा करो. बिज़नेस में मेरा हाथ बंटाओ, लेकिन तुम्हें अपने फ्रेंड और पिकनिक पार्टी की चकल्लस से समय मिले, तब तो तुम इनके बारे में सोचोगे. आज मेरी बात कान खोलकर सुन लो. जब तक बिज़नेस में इंट्रेस्ट नहीं दिखाओगे या कोई नौकरी नहीं करोगे, मैं तुम्हारी शादी किसी हालत में नहीं करने वाला. तुम्हारी ख़ातिर मैं किसी पराए घर की लड़की की ज़िंदगी जहन्नुम नहीं बनाने वाला.”
“पापा प्लीज़, शादी हो जाएगी, तो मैं ख़ुद-ब-खुद ज़िम्मेदार बन जाऊंगा. प्रॉमिज़, ऑफिस भी रोज़ जाया करूंगा आपकी क़सम.”
“नहीं… नहीं बेटे… कोरी प्रॉमिज़ और क़समों से मैं नहीं पिघलने वाला. पहले बिज़नेस में लगो, फिर ज़रूर शादी कर दूंगा.”
“पापा प्लीज़…”
“राहिल! बस अब इस मुद्दे पर और कोई बहस नहीं.” दीक्षितजी ने आंखें तरेरते हुए कहा.
“पापा प्लीज़… हिना के पैरेंट्स उसकी शादी कहीं और कर देंगे. मैं उसके बिना ज़िंदगी जीने की सोच भी नहीं सकता. प्लीज़ पापा… मान जाइए ना.”
“मेरी बात मान लो. फिर मुझे इस शादी से कोई एतराज़ नहीं होगा.”
“पापा…”
“बस… बस… मुझे तंग ना करो. मुझे अभी यह बहुत ज़रूरी रिपोर्ट तैयार करनी है.”
दीक्षितजी ने रिपोर्ट बनानी शुरू कर दी, लेकिन वह उसमें कॉन्सन्ट्रेट नहीं कर पा रहे थे. मन में पुरानी स्मृतियों की पोटली बरबस धीमे-धीमे खुलती जा रही थी.
राहिल महज़ एक वर्ष का था, जब उनकी पत्नी एक दुर्लभ बीमारी का शिकार हो उनके विवाह के मात्र तीन वर्ष बाद भगवान को प्यारी हो गई थी. तब से उन्होंने राहिल को अपने सीने से लगाकर पाला. सौतेली मां उनकी आंख के तारे को साथ कोई दुर्व्यवहार करे मात्र इस डर से उन्होंने दोबारा विवाह करने का ख़्याल तक मन में नहीं लाया. हर विपदा की आंच से उसे बचाते हुए अपने वात्सल्य की शीतल छांव में उसे महफ़ूज़ रखा.
पर शायद यहीं उनसे भूल हो गई. राहिल एक बेहद भावुक और स्नेही स्वभाव का लड़का था. शायद मातृविहीन बेटे से अति लाड़-प्यार और पालन-पोषण में अनुशासन की कमी से वह बचपन से ही एक गैरज़िम्मेदार व्यक्तित्व के रूप में उभरा. स्कूल में, घर में हर जगह अपनी ज़िम्मेदारियों से दूर भागता. उम्र बढ़ने के साथ-साथ दीक्षितजी बेटे की इस कमी को देखकर क्षुब्ध हो जाते.
उसे लाख समझाते, बिना ज़िम्मेदार बने ज़िंदगी के कोई मायने नहीं होते, लेकिन राहिल को अपनी मनमौजी बिंदास ज़िंदगी बहुत प्रिय लगती.


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उस दिन दीक्षितजी खाने की टेबल पर बेटे का इंतज़ार कर रहे थे कि अपने सामने बेटे को एक साधारण-सी जींस और एक कैजुअल सी कुर्ती पहने मांग भर सिंदूर और गले में मंगलसूत्र पहने एक सांवली-सलोनी सी लड़की को देखकर हतप्रभ रह गए.
“पापा, यह हिना है. हमने कोर्ट मैरिज कर ली है. वेरी सॉरी पापा, लेकिन मेरे सामने इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था…” और यह कहते हुए दोनों उनके पैरों पर झुक गए.
बेटे के इस गैरज़िम्मेदार आचरण पर तिलमिलाते हुए उन्होंने अपना मुंह मोड़ लिया.
उनकी आशा के विपरीत हिना एक बेहद समझदार, ज़िम्मेदार और सुलझी हुई लड़की थी. उसने धीरे-धीरे घर की सारी ज़िम्मेदारियां संभाल लीं, ख़ासकर वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाते ससुर की. वह बेहद ज़िम्मेदारी से उनके खान-पान, दवाइयां, कपड़े आदि का पूरे मन से ध्यान रखती. घर के नौकर-चाकर उसके मृदु सहृदय स्वभाव की तारीफ़ करते नहीं अघाते.
वक़्त के साथ वह हिना के नितांत स्नेही और केयरिंग स्वभाव से पिघलने लगे. उसमें उन्हें अपनी अजन्मी बेटी की प्रतिच्छाया नज़र आती. धीरे-धीरे उन्हें एहसास होने लगा था कि उनके घोर लापरवाह मनमौजी बेटे के लिए हिना से अच्छा मैच कोई हो ही नहीं सकता था.
हिना के संपर्क में आकर उनके बेटे की तो मानो कायापलट हो गई थी. विवाह से पहले वह अमूमन रात-बिरात बहुत देर से दोस्तों के साथ मौजमस्ती कर घर लौटता, सुबह ग्यारह-बारह बजे से पहले बिस्तर नहीं छोड़ता. विवाह के बाद धीरे-धीरे उसकी यारी-दोस्ती ख़त्म होती जा रही थी. वह अधिकतर घर में ही रहता. हिना के साथ-साथ दिनोंदिन वृद्ध होते पिता की ज़रूरतों का ध्यान रखता. आगे बढ़कर उनके खाने-पीने और आराम पर नज़र रखने लगा था.
राहिल-हिना के विवाह के पूरे दो वर्ष होने आए. बेटे की व्यापार में अरुचि देख पिछले कुछ महीनों से दीक्षितजी ने हिना को अपने साथ ऑफिस ले जाना शुरू कर दिया, यह सोच कर कि बेटा नहीं, तो बहू ही उनका व्यापार देखे-समझे और आगे बढ़ाए.
हिना उनके मार्गदर्शन में व्यापार की बारीकियां सीखने का प्रयास कर रही थी. पिछले कुछ दिनों से तो राहील भी हिना और उनके साथ ऑफिस जाने लगा था.
उस दिन रविवार था.
दीक्षितजी सुबह-सुबह अपने कमरे में अपनी आराम कुर्सी पर बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे कि तभी हिना ने उनसे कहा, “पापा! आपने कल की मीटिंग के लिए जो प्रेजेंटेशन बनाने के लिए बोला था, वह बिल्कुल तैयार है.”
दीक्षितजी ने उसे पूरा देखा और उसे इतना बढ़िया प्रेज़ेंटेशन बनाने की बधाई दी.
“बेटा बहुत बढ़िया प्रेजेंटेशन बना है. कांग्रेच्युलेशन्स.”
“पापा, अब एक राज़ की बात. यह पूरा प्रेजेंटेशन राहिल ने बनाया है.”
दीक्षितजी को अपने कानों पर यक़ीन नहीं हुआ और उन्होंने उससे कहा, “हो ही नहीं सकता. उस नालायक को तो मेरे इस नए प्रोजेक्ट की एबीसी भी नहीं पता. तो फिर वह इतना बढ़िया प्रेजेंटेशन कैसे बना सकता है? ना… ना… तुम मेरा मन रखने के लिए मुझसे यह कह रही हो.”
“पापा! पिछले दो-तीन महीनों से राहिल मेरे साथ ऑफिस आकर मेरे चेंबर में ही पूरे-पूरे दिन बैठ रहा है ना? तो पापा वह मेरे साथ बस टाइमपास नहीं करता, बल्कि बृजेशजी और मुझ से ऑफिस का कामकाज समझा करता था. आज फादर्स डे है पापा, राहिल द्वारा बनाया गया यह प्रेजेंटेशन आपके लिए उसका आज का तोहफ़ा है.”
“हां पापा, हिना ठीक कह रही है. नए प्रोजेक्ट की सारी जानकारी ब्रजेशजी और हिना से लेकर मैंने ख़ुद ही यह प्रेजेंटेशन बनाया है. हैप्पी फादर्स डे पापा.”
“हैप्पी फादर्स डे पापा. पापा आपकी छत्रछाया हम दोनों पर हमेशा यूं ही बनी रहे. लव यू.”

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दीक्षितजी ने भावविह्वल हो अपने दोनों बच्चों को सीने से लगा लिया. उनके हृदय की ख़ुशी उनके मन में समाए ना समाई और आंखों की राह झर-झर बह निकली और वह हिना और बेटे को आशीर्वाद देते हुए बुदबुदा उठे, “जीते रहो मेरे बच्चों हिना-राहिल… मेरी बरसों की साध पूरी हुई. राहिल के इस कायाकल्प का पूरा-पूरा श्रेय तुम्हें जाता है मेरी बिटिया.”
“नहीं, नहीं पापा! राहिल भी अपने बदलाव के लिए मेरे बराबर का ही जोड़ीदार है. चलिए इसी ख़ुशी में हम अभी शहर से बाहर एक रिजॉर्ट चल रहे हैं. वहां रात को एक रॉकिंग पार्टी करेंगे.”
“हां पापा जल्दी से तैयार हो जाइए.”
दीक्षितजी को लगा, यह हक़ीक़त नहीं, बल्कि कोई मीठा ख़्वाब था.
वे भावुक मन के साथ मुस्कुरा दिए.

रेणु गुप्ता

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तुमने कहा मैं एक ग़ुुस्सैल इंसान बन गई हूं और तुम चाहे जो कर लो, मैं ख़ुश नहीं होती. अगर मैं तुम्हारी जगह होती, तो आज की स्थिति में किसी भी तरह से बाध्य होकर शादी नहीं करती. मैं केवल तुमसे उस समान साझेदारी की उम्मीद कर रही थी, जिसका वादा तुमने किया था.

जैसे ही वृंदा ने वरुण से विदा ली और वह ट्रेन में सवार हुई, तो बहुत हल्कापन महसूस हुआ उसे. एक अध्याय के अंत होने जैसा सुकून उसके भीतर था. ट्रेन चलते ही गुज़रते रास्ते और तेजी से पटरियों के साथ दौड़ लगाते पेड़ों, गांवों और बादलों के झुंड के साथ बीती बातें भी उसके मन में उथल-पुथल मचाने लगीं. पुरानी यादें, बीती घटनाएं इंसान का पीछा कभी नहीं छोड़तीं और ये तो बहुत पुरानी यादें भी नहीं थीं. सब कुछ अभी घटा लग रहा था.
उन दोनों की मुलाक़ात इंजीनियरिंग कॉलेज की कैंटीन में हुई थी. दोनों एक ही बैच में थे. क्लास में जाने-पहचाने चेहरों से जब कैंटीन में मुलाक़ात होती है, तो साथ बैठकर गप्पबाजी करना, किसी विषय पर गंभीरता से चिंतन करना या कंपनी देने के लिए कॉफी पीना बहुत आम बात होती है. वह उसके बिल का भुगतान करने लगा, तो उसने टोक दिया कि वह ख़ुद ही पेमेंट करेगी. लेकिन अगले ही पल बैग टटोलने पर उसे अपनी ग़लती का एहसास हुआ और शर्मिंदगी भी हुई. वह क्रैडिट कार्ड बैग में रखना भूल गई थी. उसने बहुत सहजता से और उसे बुरा न लगे, कुछ इस अंदाज़ में यह कहते हुए बिल का भुगतान कर दिया कि अगली बार वह उसे कॉफी पिला सकती है.
क्लास एक हो, विषय एक हो और रुचियां भी लगभग समान हों, तो दोस्ती होने में बहुत समय नहीं लगता. उनके बीच भी दोस्ती हो गई. साथ व़क्त गुज़ारते-गुज़ारते, एक-दूसरे के साथ बातें शेयर करते, प्यार पनपने में भी देर नहीं लगी. प्रोजेक्ट्स पर एक-दूसरे की मदद करते और जब मौक़ा मिलता फिल्म देखने भी चले जाते.
उनके प्यार को कॉलेज के गलियारों और क्लास में चर्चा का विषय बनते देर नहीं लगी. प्रेमी युगल की मदद करने में छात्र भी जुट गए. कभी उनके क्लास से गायब होने पर बचाते, तो कभी उन्हें किसी रेस्तरां में डेट पर भेज देते.
आख़री साल वरुण ने शादी का प्रस्ताव रखा. वृंदा ने तो तब तक शादी के बारे में सोचा तक नहीं था.
“क्यों, क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करतीं?” वरुण ने सवाल उसके सामने उछाल दिया था. उसे कतई उम्मीद नहीं थी कि वृंदा शादी के लिए मना कर सकती है.
“कैसा बेकार का सवाल कर रहे हो? हमारे प्यार के बारे में शायद पूरा कॉलेज जानता है. इतने साल साथ-साथ गुज़ारने के बाद ऐसा सवाल तुम्हारे मन में आना मेरे प्रति शंका रखने जैसा है.” वह भी तुनक कर बोली थी.
“हद होती है. प्यार है, तो बस बिना कुछ सोचे-समझे शादी कर लो.”
वह तो जीवन में कुछ बनना चाहती है. आगे पढ़ना चाहती है. दुनिया में अपनी पहचान बनाना चाहती है. और वरुण को भी तो अभी सैटेल होना है. माना कि प्लेसमेंट हो गया है, पर अभी तो शुरुआत है. क्या नौकरी पाने के सिवाय उसके और सपने नहीं हैं? उसके तो हैं.
“मैं अभी नौकरी नहीं करना चाहती और पढ़ना है मुझे. कुछ अलग करना है. वैसे भी मैं एक पारंपरिक पत्नी की भूमिका निभाने के लिए तैयार नहीं हूं.”


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उसकी स्पष्टवादिता से भौंचक रह गया था वरुण. कोई आख़िर इतने अच्छे लाइफ पार्टनर को इंतज़ार करने के लिए कह सकता है. लड़कियां ऐसा नहीं करतीं और उनके परिवारवाले भी हाथ आए ऐसे सुयोग्य वर को कभी हाथ से जाने देना पसंद नहीं करते.
“लेकिन, द़िक्क़त क्या है? नौकरी मिल ही गई है. अभी किराए पर घर ले लेंगे. फिर धीरे-धीरे सब चीज़ें जुटा लेंगे. हम दोनों कमाएंगे, तो परेशानी नहीं होगी. हम एक-दूसरे से प्यार करते हैं, एक-दूसरे को अपना दिल दिया है, तो हमारी साझेदारी भी बराबर की होगी. हम एक-दूसरे से कोई अपेक्षा नहीं रखेंगे. मिलजुलकर सब काम करेंगे.
लेकिन वह आश्‍वस्त नहीं थी. आख़िरकार वरुण के बहुत बाध्य करने पर वह शादी के बंधन में बंधने से पहले कुछ साल साथ रहने के लिए तैयार हो गई. लिव-इन-रिलेशन के लिए किसी ने स्वीकृति नहीं दी, पर वृंदा ख़ुद के लिए रास्ते स्वयं ही तय करना चाहती थी.
वृंदा को आईआईटी मुंबई में दाख़िला मिल गया, तो उन्होंने उसके पास में ही एक छोटा-सा फ्लैट किराए पर ले लिया. वरुण की जॉब ऐसी थी, जिसमें वर्क फ्रॉम होम की सुविधा थी. वैसे भी उसका ऑफिस घर से बहुत दूर था, इसलिए यह व्यवस्था उसके लिए सुविधाजनक थी.
पहले कुछ महीने तो किसी जादुई एहसास में डूबे बीते. वह सुबह उसके साथ कॉलेज तक उसे छोड़ने जाता, उसके वापस आने पर दरवाज़े पर उसका इंतज़ार करता मिलता. दोनों एक साथ रात का खाना बनाते और दिनभर की बातें शेयर करते. हवा में प्यार घुला हुआ था, उनके रेशे-रेशे में प्यार पगी बातें लहराती रहतीं.
साथ रहते-रहते, प्रेम की पींगे झूलते-झूलते धीरे-धीरे वास्तविकता से भी सामना होने लगा. फिर ऐसी चीज़ें दिखने लगीं, जो पहले या तो दिखाई नहीं देती थीं या वे देखना नहीं चाहते थे. शुरुआत हुई छोटे-छोटे मुद्दों के सिर उठाने से. “न तो तुम ऑर्गेनाइज़्ड हो, न ही साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखते हो. पूरा दिन घर में होते हो, फिर भी कोई चीज़ करीने से रखने का तुम्हारे पास समय नहीं होता. बिखरी हुई चीज़ों के बीच बैठकर काम कैसे कर पाते हो तुम?” वृंदा खीझ उठती.
घर आकर वह पढ़ाई करे या बाकी सारे काम! लेकिन वरुण बेपरवाह बना रहा. पूरा दिन बिस्तर पर बैठा, कभी लेटकर काम करता. यहां तक कि खाने की प्लेट भी बिस्तर पर पड़ी रहती. कभी नहाता, कभी नहीं. गंदे कपड़े वॉशिंग मशीन में डालने तक की जहमत न करता.
“कम से कम प्लेट उठाकर किचन में तो रख आया करो. बर्तन और किचन साफ़ कर दिया करो, तो मुझे कुछ मदद मिल जाएगी. कपड़े तो बदल लिया करो. गंदे कपड़े कभी पलंग पर, कभी कुर्सी पर छोड़ देते हो. मैं आकर यह सब संभालूं या पढ़ाई करूं और घर के बाकी काम करूं? बराबर की साझेदारीवाली बात भूले तो नहीं हो न तुम?” वृंदा बहुत कोशिश करती कि वह झल्लाहट न दिखाए, पर उसकी खीझ शब्दों से झलक ही जाती.
“बिल्कुल नहीं. कल से तुम्हें शिकायत का कोई मौक़ा नहीं दूंगा.” वरुण हंसते हुए जवाब देता. लेकिन वह कल कभी नहीं आता. बेशक एक-दो बार जूठे बर्तन सिंक में रखे ज़रूर मिले.
वृंदा को लगा कि वरुण खाना बनाते समय केवल किचन में खड़े होकर उससे बात करता है. मदद किसी भी तरह की नहीं करता.
“क्या तुम आलू छील दोगे? दाल-चावल भी धो देना.” वृंदा ने एक दिन कह ही दिया.
“यह सब कैसे करते हैं? मुझे तो नहीं आता.” वरुण का जवाब सुन वृंदा चिढ़ गई, पर धैर्य रखते हुए बोली, “कुछ मुश्किल नहीं है. एक बार करोगे तो सीख जाओगे.” वह उसे सिखाने लगी. केवल किचन का काम ही नहीं, घर के बहुत से ऐसे काम जो आसान होते हैं और बचपन में जिन्हें मांएं अपने बच्चों को सिखा ही देती हैं.


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“इकलौता हूं न, इसलिए मां ने पलकों पर बिठाकर रखा. कभी कुछ सिखाया ही नहीं.” उसकी बात सुन वृंदा को हंसी आ गई थी.
“बाप रे, पलकों पर कैसे उठाया इतना बोझ!”
वृंदा को तब पहली बार ऐसा लगा था कि वह 25 साल के एक आदमी की मां बन गई है. और यह सुखद एहसास नहीं था. वह इसे स्वीकारने को तैयार नहीं थी.
जब वह खाना बनाती या कुछ और काम में उससे मदद मांगती तो वह कहता है कि उसकी मीटिंग है या प्रेजेंटेशन तैयार करनी है. दिनभर कॉलेज में पढ़ाई करने और शाम को आकर फिर पढ़ने, घर का काम करने, सुबह की तैयारी करने, वरुण का नाश्ता, लंच बनाने में वृंदा थक जाती थी. वरुण उससे बैठे-बैठे बस मांग करता, जो उसे किसी आदेश की तरह लगतीं.
वृंदा समझ चुकी थी यह समान भागीदारी नहीं है, जिसका वादा वरुण ने उससे किया था. असल में वह पुरुष था जिसके लिए घर का काम करने का अर्थ था अपना उपहास उड़वाना या जोरू का ग़ुलाम कहलवाना. उसकी मां वरुण के किसी भी निर्णय से ख़ुश नहीं थीं, लेकिन घर के काम करने की बात पर तो वह नाराज़ थीं. वरुण के लाख दिखावा करने के बावजूद कि वह बराबर की साझेदारी में विश्‍वास करता है, वृंदा पर ही सारी ज़िम्मेदारियों का भार था. हां, पैसे वरुण ही ख़र्च करता था.
वह कुछ कहती, तो बहस लड़ाई और चुप्पी पर जाकर ख़त्म होती. बात ही मत करो, वरुण को यह विकल्प बहुत पसंद आया. जब तक वह उससे माफ़ी नहीं मांगती या उसे मनाती नहीं, वह मुंह बनाए बैठा रहता. उसे लग रहा था कि वह प्रेयसी कम और मां की भूमिका में ढलती जा रही है.
जब वे कॉलेज में थे, तो अपने दोस्तों के साथ पार्टियों में जाते थे. वे डेट नाइट्स के लिए बाहर जाते थे. अब वरुण काउच पोटैटो बन चुका था. उसके सभी सहकर्मी भी घर से ही काम करते थे, इसलिए उनके सभी सोशल इवेंट्स भी ऑनलाइन होते थे. वृंदा के दोस्तों से मिलने में वरुण को कोई दिलचस्पी नहीं थी. जब भी वह उससे बात करने की कोशिश करती, तो कहतो कहता, “बहुत बिज़ी हूं्. और इतनी मेहनत मैं तुम्हारे सपनों को पूरा करने के लिए ही कर रहा हूं. अगर तुम चाहो तो मैं कहीं और नौकरी कर सकता हूं्. फिर मुझे राज़ ऑफिस जाना होगा और हो सकता है वह भी घर से दूर हो. फिर हम यहां नहीं रह पाएंगे. तुम्हें ही कॉलेज आने-जाने में परेशानी होगी.”


उनके बीच का शारीरिक रिश्ता भी मशीनी हो गया था. वह बेमन से उसकी इच्छाओं के आगे झुकती.
इस सारे तनाव ने वृंदा पर मानसिक और भावनात्मक रूप से भारी असर डाला. उसकी पढ़ाई पर इसका प्रभाव दिखा और उसके प्रोफेसर जिन्हें उसमें एक ब्राइट स्टूडेंट नज़र आता था निराश होने लगे. वह जितना कर सकती थी, स्वयं से और परिस्थितियों से लड़ते हुए हारने लगी थी. कुछ बनने का सपना रखनेवाली, आईआईटी में प्रवेश पानेवाली उस प्रतिभाशाली लड़की को मुश्किल से एक सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी मिल पाई्.
नौकरी के साथ काम का प्रेशर बढ़ा, पर वरुण का व्यवहार नहीं बदला. साझेदारी केवल बातों में थी. इन चार वर्षों ने वृंदा को एक थकी हुई, क्रोधी महिला बना दिया था. एक दिन वरुण जब अपनी मां से मिलने इंदौर जाने लगा, तो वृंदा ने भी साथ चलने की ज़िद की. हमेशा वरुण अकेले ही जाता था. वह कहती कि अपने परिवार से उसे भी मिलवाओ, तो यह कहकर टाल जाता कि समय आने पर मिलवा दूंगा. मां बहुत पुराने ख़्यालों की हैं.
लेकिन इस बार वह अड़ गई. वरुण उसके तेवर देख समझ गया कि इस बार वह नहीं रुकने वाली.
“मां, यह वृंदा है, मेरी दोस्त. हम कॉलेज में साथ पढ़ते थे.”
वृंदा आश्‍चर्यचकित रह गई. एक दोस्त के रूप में वह कैसे मां से मिलवा सकता है. उसके परिवार ने बहुत ही संदिग्ध ढंग से उसका स्वागत किया. दोस्त शब्द उनके संस्कारों में अटक रहा था. वृंदा को भी वरुण के साथ में अजनबीपन का एहसास हो रहा था.
अगले दिन वरुण की मां ने कुछ लड़कियों की फोटो वरुण के सामने रख दीं.
“पंडितजी ने तुम्हारे लिए हमें कई लड़कियों की फोटो दिखाई थीं, पर हमें यही पसंद आईं. तुम बताओ तुम्हें कौन-सी अच्छी लगी है.” वरुण ने उस समय कुछ नहीं कहा.
“वरुण! तुमने कुछ कहा क्यों नहीं? तुम उन्हें हमारे बारे में क्यों नहीं बता रहे?” वृंदा ने पूछा. “यह इतना आसान नहीं है!” वरुण ने कहा.
“इसका मतलब क्या समझूं? हम एक-दूसरे से ही शादी करनेवाले हैं न?”
“मैं तो हमेशा से यही चाहता था. लेकिन इन दिनों तुम चिढ़ी रहती हो. हमेशा नाराज़ रहती हो. मैं चाहे कुछ भी कर लूं, तुमको ख़ुुश रखना असंभव लग रहा है. कुछ समय मुझे सोचने के लिए चाहिए. बराबर की साझेदारी में ऐसा थोड़े होता है कि तुम केवल मुझसे अपेक्षाएं रखो.”
वृंदा को लगा कि वह दोषी न होते हुए भी वरुण उसे ही ग़लत ठहरा रहा है. अगले दिन उसने वरुण से कहा कि बॉस ने तुरंत वापस आने को कहा है, कोई ज़रूरी मीटिंग वह करना चाहते हैं. वह उसे विदा लेकर मुंबई के लिए ट्रेन में सवार हो गई.
मुंबई पहुंचने के बाद, उसने अपना बैग पैक किया और दूसरे फ्लैट में अपनी सहेली के पास शिफ्ट हो गई. पीछे एक पत्र वरुण के नाम छोड़ गई.


प्रिय वरुण,
मेरा इस तरह जाना हो सकता है तुम्हारे अहं को चोट पहुंचाए. मैं तुम्हें हार्टलेस लगूं, पर मेरा जाना ही सही ़फैसला है. तुम हमारे रिश्ते को लेकर विचार करना चाहते हो. मुझे लगता है कि मैं भी ऐसा चाहती हूं्. तुमने कहा मैं एक ग़ुुस्सैल इंसान बन गई हूं और तुम चाहे जो कर लो, मैं ख़ुश नहीं होती. अगर मैं तुम्हारी जगह होती, तो आज की स्थिति में किसी भी तरह से बाध्य होकर शादी नहीं करती. मैं केवल तुमसे उस समान साझेदारी की उम्मीद कर रही थी, जिसका वादा तुमने किया था. लेकिन मुझे एक-दूसरे से कोई अपेक्षा न रखने का अर्थ समझ में नहीं आया. मैं समझी ही नहीं कि बिना किसी अपेक्षा के समान साझेदारी कैसे कर सकते हैं. बराबर के भागीदार बनना चाहते हैं, तो अपने साथी से अपनी भूमिका निभाने की अपेक्षा रखना ग़लत कैसे हो सकता है? एक-दूसरे की दुनिया का हिस्सा बनने की उम्मीद करना अनुचित कैसे हो सकता है? लेकिन हमारी तो दुनिया ही अलग हो गई. तुम मुझमें मां ही ढूंढ़ते रहे, जो केवल तुम्हारे हर काम को पूरा करने के लिए दौड़ती रहती थीं तुम्हारे बचपन में. बचपन ही क्यों, वह तो अभी भी दौड़ती हैं. यह वह जीवन नहीं है, जिसकी मैंने कल्पना की थी. तुमने आज तक जो कुछ भी मेरे लिए किया है, एक दोस्त होने के नाते मैं तुम्हारा उसके लिए शुक्रिया कह सकती हूं, पर मेरे प्यार को जो तुमने चोट पहुंचाई है, उसके लिए मेरा तुम्हारी ज़िंदगी से चले जाना ही सही निर्णय है.
वृंदा

सुमन बाजपेयी

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“हां वानी, शिव, तुम्हारा शिव. ओह वानी मैंने तुम्हे कहां नहीं खोजा. जब से दिल्ली आया हूं हर जगह तुम्हे ही खोज रहा था. सुना था मैंने की शादी के बाद तुम दिल्ली में रहती हो. कैसी हो वानी? तुम ठीक तो हो ना?” शिव बोलता ही जा रहा था.
“मैं ठीक हूं शिव, तुम कैसे हो? इतने सालों बाद भी पहचान गए मुझे.”
“पहचानता कैसे ना वानी, मेरी हर किताब में ज़िक्र है तुम्हारा.”
कितना ख़ुश हुई थी वानी ये सुनकर. अच्छा लगा था उसे की शिव आज भी उसके बारे में लिखता है.

सुबह के क़रीब सात बज रहे थे. वानी ने हॉल का एसी बंद करके खिड़कियां खोल दी थी. दिल्ली में ऐसा मौसम कभी-कभी देखने को मिलता है. रातभर बारिश होती रही और आज सुबह से ही सुकून देनेवाली हवाएं चल रही थी. रात ठीक से सो ना सकी थी वानी. महेश कल रात फिर घर नहीं लौटा था. वानी बिस्तर पर अकेले ही नींद तलाशती रही थी.
कॉफी का कप हाथ में थामे गार्डन में निकल पड़ी थी वो. बारिश की वजह से घास अब तक गीली थी. वानी ने चप्पल निकाल दी और नंगे पैर ही घास पर चलने लगी. उसने कॉफी ख़त्म की ही थी की पोर्च पर एक गाडी आकर रुकी. शायद महेश लौट आया था.
वानी तेजी से चलकर पोर्च तक आई, पर ये क्या, महेश तो था ही नहीं, उसका ड्राइवर राजेश था. अकेले.
“साहब कहां हैं?” वानी ने पूछा.
“मैडम, साहब को अर्जेंट बैंगलुरू जाना पड़ा और मुझे गाडी घर ले जाने को कहा. उन्होंने कहा हैं की वो दो-तीन दिन में लौट आएंगे.” राजेश ने गाडी पार्क करके बताया और चाबी वानी की ओर बढ़ा दी.
महेश ये छोटी सी बात उसे फोन करके भी तो बता सकता था ना. रात भी उसने कई बार फोन किया, पर महेश ने एक बार भी उसका फोन नहीं उठाया था. कुछ ही दिन में वानी की मैरिज एनिवर्सरी थी और वो जानती थी की हमेशा की तरह इस बार भी महेश भूल जाएगा. 20 सालों के रिश्ते में महेश ने और दिया भी क्या था उसे सिवाए अकेलेपन के. वानी के मां-बाप ने चुना था महेश को. शादी के बाद महेश ने वानी को हर चीज़ दी सिवाए वक़्त के. वक़्त नहीं था उसके पास. अपने बिज़नेस में ही खोया रहता था. सुबह होते ही निकल जाता और देर रात वापस आता.
अकेलापन दुनिया का सबसे बड़ा रोग होता है. ये मजबूर कर देता है हमे हर वो काम करने के लिए जो हम नहीं करना चाहते. वानी माखीजा पिछले कई सालों से इस अकेलेपन को जी रही है. 16 साल पहले उसकी बेटी शिवानी के जन्म के साथ उसे लगा था की शायद अब उसका अकेलापन कम हो जाएगा, लेकिन वक़्त के साथ शिवानी बड़ी हो गई, अपनी दुनिया में व्यस्त हो गई और वानी एक बार फिर अकेली रह गई थी.
कुछ देर बाद वानी हॉल में बैठी शॉपिंग वेबसाइट्स देख रही थी. महेश को भले याद ना रहे पर हर साल की तरह इस साल भी वो ठीक रात बारह बजे महेश को तोहफ़ा देकर एनिवर्सरी विश करना चाहती थी. पर वो महेश को तोहफ़े में क्या दे? रिस्ट वॉच उसने पिछले साल ही दी थी और उसके पिछले साल परफ्यूम. तो फिर क्या दे वो महेश को? कोई अच्छी किताब दे दे क्या? किताबें पढ़ने का शौक है उसे. हां, किताब सही रहेगी सोचते ही वानी पहुंच गई थी किताबों के सेक्शन में और घंटों की मशक्कत के बाद एक किताब पसंद की थी. लेखक का नाम देखते ही कुछ बीट्स धड़कना भूल गया था वानी का दिल. शिव माथुर. हां, यही नाम तो लिखा था. पर क्या ये वही शिव था, वानी का शिव. उसका पहला प्यार. वानी बार-बार उस नाम को देखती रही, सोचती रही की कहीं उसकी नज़रें धोखा तो नहीं खा रही. पर ये उसकी नज़रों का धोखा नहीं था. पहचान ली थी वानी ने किताब के आख़िरी में छपी उसकी तस्वीर और लौट गई थी अतीत में जब वो और शिव साथ थे.

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वानी ने शिव को पहली बार कॉलेज फेस्ट में सुना था. कितनी ख़ूबसूरत कविताएं लिखता था वो. गेहुंआ रंग. 6 फीट लंबा कद और गहरी काली उसकी आंखें, जो सारे शो के दौरान वानी पर ही टिकी हुई थी. अगले दिन वानी पहुंच गई थी कैंटीन में शिव को ढूंढ़ते हुए. सामना होते ही हथेली आगे कर दी थी उसके और कहा था, “ऑटोग्राफ.”
शर्म से झेंपते हुए शिव ने जवाब दिया था, “मेरा ऑटोग्राफ? मैं कोई सेलिब्रिटी थोड़ी हूं.”
“पर बहुत जल्द बननेवाले हो, चलो अब जल्दी साइन करो.” वानी ने हथेली लहराते हुए जवाब दिया था. उसकी हथेली थाम शिव ने लिख दिया था अपना नाम. ये पहली मुलाक़ात जल्द ही रोज़ाना होने लगी. कुछ ही दिनों में प्यार करने लगे थे दोनों.
वानी का ध्यान डोरबेल की आवाज़ से टूटा था. उसकी बेटी शिवानी स्कूल से वापस आ गई थी.


रात बारिश फिर दिल्ली को भिगोती रही. धोती रही पेड़, पत्तियों और दिलों में जमी धुंध को. महेश अब तक नहीं लौटा था. वानी ने एक कप कॉफी बनाई और बालकनी में निकल आई. आज सुबह से ही जबसे उसने शिव की किताब देखी थी उसका मन कुछ परेशान सा था. बालकनी में आते ही उसने कॉफी एक तरफ़ रखी और खोजने लगी थी शिव को फेसबुक पर. जल्द ही शिव का फेसबुक अकाउंट उसके सामने था. इतने सालों बाद शिव को देखना सुकून भरा था. शिव की तस्वीरों को निहारते हुए वानी एक बार फिर पहुंच गई थी उस दिन में जब वो शिव से आख़िरी बार मिली थी.
कॉलेज के आख़िरी दिन थे. प्लेसमेंट के लिए कम्पनीज कॉलेज आनेवाली थी. वानी के हाथ में दो फॉर्म थे, उसने एक फॉर्म शिव के सामने रख दिया था जिसे देखकर शिव ने पूछा था.
“क्या है ये?”
“अरे, बाबा परसों के इंटरव्यू का फॉर्म है.” वानी ने बताया था. शिव ने उसकी बात पर ख़ास ध्यान नहीं दिया और फॉर्म साइड में करके कहा था.
“वानी मैं इस इंटरव्यू में नहीं आ पाऊंगा. तुम तो जानती हो ये जॉब -वॉब मेरे लिए है ही नहीं. मै अपनी कहानियों में ख़ुश हूं.”
“कहानियों में ख़ुश हूं और ज़िंदगी, उसके लिए क्या करनेवाले हो?”
“पता नहीं पर जॉब तो बिल्कुल नहीं, मैं अपनी किताब लिखूंगा.”
“ओह तो मैं क्या समझू मैं अगले पाउलो कोएल्हो से बात कर रही हूं?” वानी के लहजे में तंज था.
“तुम मेरा मज़ाक बना रही हो वानी?”
“नहीं शिव तुम्हारा मज़ाक मैं नहीं तुम ख़ुद बना रहे हो और चलो एक बार को मैं तुम्हारी बात मान भी लू, लेकिन पापा इस बात को कभी नहीं समझेंगे. प्लीज़ ऐसा मत करो.” कितनी कोशिश की थी वानी ने शिव को मनाने की, मगर वो अड़ा रहा अपनी ज़िद पर. दो दिन बाद सब इंटरव्यू में शामिल हुए पर शिव नहीं.
वानी के अंदर ग़ुस्सा था. कितनी अच्छी जॉब मिल सकती थी शिव को. पर उसे, उसे तो लेखक बनना था. ठीक है जब उसे शौक ही है धक्के खाने का तो खाता रहे. उस दिन के बाद वानी ने शिव से कोई कॉन्टेक्ट नहीं किया. कुछ दिनों बाद घर पर वानी की शादी की बात चलने लगी थी. शहर के बड़े बिज़नेसमैन से तय किया जा चुका था उसका रिश्ता. जल्द ही शादी करके दिल्ली आ गई थी वो. शिव के ख़्यालों में खोए हुए वानी कब बालकनी से उठकर बेड तक आ गई और फिर सो गई उसे पता ही नहीं चला था.
सुबह हमेशा एक नई उम्मीद लेकर आती हैं. कुछ नया पा सकने की उम्मीद. वानी आज सुबह से ख़ुश-सी थी. सोशल मीडिया में ही सही पर उसने फिर से पा लिया था शिव को. देख डाली थी उसने शिव की पूरी फेसबुक प्रोफाइल. एक मशहूर लेखक बन चुका है अब वो. पांच बेस्टसेलर किताबों का लेखक. उम्मीद का बीज एक बार फिर से पलने लगा था वानी के दिल में. शिव से दोबारा जुड़ सकने की उम्मीद. पर ये भी सच था की उसमे नहीं थी हिम्मत अपने नाम से शिव से कॉन्टेक्ट करने की. तो क्या हुआ? ऐसा कहीं लिखा तो नहीं हैं की वो अपने नाम से ही शिव से कॉन्टेक्ट करे. वो किसी दूसरे नाम से भी तो उससे बात कर सकती है. उसे बस शिव की खैरियत ही तो जाननी थी. वानी ने जल्द ही एक नई आईडी बना ली थी, एक नए नाम के साथ, ‘यादें रेशम सी’ नाम से और भेज दिया था शिव को “हाय” का मैसेज.
रात खाने के बाद रोज़ की तरह वानी एक कप कॉफी के साथ बालकनी में थी जब किसी का मैसेज आया था. वानी ने मैसेज देखा और देखते ही उछल पड़ी थी. शिव का मैसेज था. उसने सिर्फ़ इतना ही लिखा था. “हैलो.”

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कॉफी छोड़ वानी ने तुरंत टाइप करना शुरू किया.
“हाय, वैसे आप शिव ही हो ना? क्या है आपको तो दिनभर में कई मैसेज आते होंगे, तो क्या आप सबको जवाब देते हो?”
इस बार जवाब जल्दी आया था, लिखा था.
“हां, शिव ही हूं, और कोशिश यही रहती है की सबको जवाब दे सकूं.”
“ओके, वैसे क्या आप अभी चांद देख सकते हैं?” वानी ने पूछा.
“हां, खिड़की से दिख तो रहा है, वैसे चांद क्यों, कुछ ख़ास है आज?” शिव ने कहा.
“नहीं ख़ास नहीं है, बस मुझे आदत है रोज़ रात डिनर के बाद कॉफी पीते हुए चांद देखने की, तो सोचा आपसे भी पूछ लू. आप लेखकों की तो प्रेरणा होता है ना चांद?”
“हा हा, हां कई लोग ऐसा कहते है.”
कुछ और भी सवाल किए थे वानी ने उस रात, जिनके जवाब शिव ने दिए थे.


अब वानी का मन ख़ुश रहने लगा था. वो सुबह ही शिव को मैसेज कर देती और दिन जवाब के इंतज़ार में गुज़र जाता. देर से ही सही पर शिव के जवाब आते. इंतज़ार इतना ख़ूबसूरत हो सकता है वानी को आज पता चला था.
जून का महीना था. शिव को मैसेज करते वानी को महीनेभर से ज़्यादा बीत गए थे. ख़ुद को अकेला पाते ही वानी ने खोल ली थी शिव की फेसबुक प्रोफाइल. शिव ने अपने बुक लॉन्च का प्लान डाल रखा था. १३ जून भोपाल. १५ जून दिल्ली.
१५ जून तो आज है. यानी की शिव दिल्ली में है. उसने एक नज़र घडी पर डाली. दोपहर के १२ बजने को थे. बुक लॉन्च का समय दो बजे का था. वानी को जल्द ही कोई फ़ैसला करना था. आनन-फानन में उसने साड़ी बदली और दो बजने के पहले बुक स्टोर के बाहर थी. शिव को देखने का इससे बेहतर मौक़ा उसे शायद ही मिलनेवाला था, लेकिन ये क्या, लाख कोशिशों के बावजूद भी नहीं कर पा रही थी वो हिम्मत शिव का सामना करने की. क्या कहेगी उससे? जल्द ही हार मान ली थी उसने और बगल के कॉफी शॉप में आकर बैठ गई थी.
वो वहां घंटेभर से ज़्यादा बैठी रही. अब तक तो शिव का लॉन्च ख़त्म भी हो गया होगा. उसने एक नज़र घडी पर डाली और उठकर बाहर को चल पड़ी और तभी वो किसी से टकरा गई थी.
“आई एम सॉरी, रियली सॉरी.”
वानी ने बिना उस शख़्स की तरफ़ देखे, फ़र्श पर अपना बिखर चुका सामान समेटते हुए कहा था.
“वानी, वानी मखीजा?” अजनबी नहीं था वो शख़्स. पहचान लिया था उसने वानी को और इस तरह अपना नाम पुकारे जाने पर वानी ने उस शख़्स की तरफ़ देखा था और फिर देखती ही रह गई थी. सामने शिव खड़ा था.
“व्हाट ए प्लैसेंट सरप्राइज़ वानी?”
शिव ने आगे कहा पर वानी बस उसे घूरे जा रही थी और सिर्फ़ इतना ही कह सकी थी. “शिव.”
“हां वानी, शिव, तुम्हारा शिव. ओह वानी मैंने तुम्हे कहां नहीं खोजा. जब से दिल्ली आया हूं हर जगह तुम्हे ही खोज रहा था. सुना था मैंने की शादी के बाद तुम दिल्ली में रहती हो. कैसी हो वानी? तुम ठीक तो हो ना?” शिव बोलता ही जा रहा था.
“मैं ठीक हूं शिव, तुम कैसे हो? इतने सालों बाद भी पहचान गए मुझे.”
“पहचानता कैसे ना वानी, मेरी हर किताब में ज़िक्र है तुम्हारा.”
कितना ख़ुश हुई थी वानी ये सुनकर. अच्छा लगा था उसे की शिव आज भी उसके बारे में लिखता है. शिव लगातार बोले जा रहा था, पर वानी सुकून से देखती रही थी उसे जैसे सालों की भरपाई कर रही हो. बीस सालों में ज़रा भी नहीं बदला था बस माथे के पास के कुछ बाल सफ़ेद हो गए थे.
वानी, शिव में खोई हुई थी जब उसका मोबाइल बजा. उसकी बेटी का फोन था.
“शिव अब मुझे जाना होगा.” वानी ने फोन रखते ही कहा और फिर कुछ देर ठहर कर पूछा. “कल हम मिल सकते हैं क्या? कल दिल्ली में हो ना?”
“हां ज़रूर, कल बारह बजे मिलते हैं इसी जगह.” शिव ने कहा और वानी चली गई थी.
जून के मौसम में दिल्ली ख़ूब तपती है, लेकिन आज सुबह से वानी के दिल में बारिशें हो रही थी. वो शिव से जो मिलनेवाली थी. घंटों की मशक्कत के बाद एक पीली साड़ी चुनी थी उसने और निकल गई थी शिव से मिलने. उसे देखते ही खड़ा हो गया था शिव और कहा था.
“पीली साड़ी में बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो.”
तो आख़िरकार उसने नोटिस कर ही लिया. जल्द दोनों बातों में खो गए थे. शिव अपने क़िस्से बता रहा था, जिन्हे सुनकर वानी खिलखिलाकर हंस रही थी.
दो घंटे से ज़्यादा बीत गए जब शिव ने वानी को बोलने से रोका था. शिव के टोकते ही उदासी की एक लकीर वानी के माथे से होते हुए उसके पूरे चेहरे पर फ़ैल गई थी.
कहते हैं, स्त्री मन आनेवाले हर ख़तरे को सबसे पहले भांप लेता है. यहां भी वही हुआ था. वानी ने जान लिया था शिव का इस तरह से उसे टोंके जाने का कारण और फिर शिव ने कह ही दिया था.
“पांच बजे फ्लाइट है मेरी. अब मुझे जाना होगा.”
वानी ने बिना कोई जवाब दिए सिर नीचे झुका लिया था. शिव अपनी जगह पर जाने को खड़ा हो गया. वानी का दिल तेज़ी से धड़क रहा था. शिव आगे कुछ कहता इसके पहले ही वानी ने कहा था.
“शिव, तुम्हारे जाने से पहले मैं एक आख़िरी बात तुमसे कहना चाहती हूं. जानते हो कल मैं अनजाने में इस कॉफी शॉप में नहीं आई थी, बल्कि मैं जानती थी की तुम दिल्ली में हो और यहां जान-बूझकर आई थी, ताकि तुम्हे देख सकूं पर फिर तुम्हारा सामना करने की हिम्मत ना जुटा सकी. मुझे लगा था शायद तुम मुझे भूल चुके होगे.”
“ऐसा नहीं है वानी, तुम भी तो मुझे नहीं भूली हो. आज भी मैसेज करती हो, हां, वो अलग बात है किसी और नाम से. मैं जानता हूं वानी की वो ‘यादें रेशम सी’ तुम ही हो. पहले दिन से जानता हूं. तुम्हारे सिवा और कौन डिनर के बाद चांद देखते हुए कॉफी पीता है. तुमने फोटो में चेहरा ज़रूर छुपा लिया था, लेकिन तुम्हारी गर्दन पर बने वो तीन स्टार मैं आज भी पहचान सकता हूं. ज़िंदगी हमें चाहे जिस मोड़ पर ले जाए, पर हम हमेशा दोस्त रहेंगे.” कहकर शिव ने अपनी उंगलियां वानी की उंगलियों से फंसा ली थी.


वानी कुछ देर ख़ामोश रही और फिर उठकर शिव के गले से लग गई. उसने देर तक शिव को बांहों से लगाए रखा था. वानी से अलग होते ही शिव निकल गया था एयरपोर्ट के लिए.
आहिस्ता-आहिस्ता ज़िंदगी बीतती रही. शिव और वानी दोबारा कभी मिल न सके. उनका प्यार कभी भी फेसबुक से निकल कर व्हाट्सप्प या मोबाइल नंबर तक नहीं पहुंचा. महेश अपने बिज़नेस में अब और भी ज़्यादा व्यस्त रहने लगा है. वानी की बेटी एक बड़ी क्रिमिनल लॉयर बन चुकी है. वानी आज भी शिव को फेसबुक पर मैसेज करती है और फिर सारा दिन जवाब के इंतज़ार में निकाल देती है. वो शिव की लिखी हर किताब सबसे पहले पढ़ती है. उसके सारे इंटरव्यूज़ रिवाइंड कर करके देखती है. डिनर के बाद चांद देखना वो आज भी नहीं भूलती.
कुछ गुनाहों की सुनवाई दुनिया की किसी अदालत में नहीं होती, उनकी सज़ा उम्र देकर भी चुकाई नहीं जा सकती. शिव और वानी दोनों ख़ामोशी से अपनी-अपनी सज़ा काट रहे हैं.

डॉ. गौरव यादव

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“रमन का फोन आया था. रैंबों के मां-बाप का अता-पता पूछ रहे थे?”
“क्या?” पावनी बुरी तरह चौंक गई. वह तो सोच रही थी कि अब मसला सुलझ गया.
“मैंने कहा कि मेरी मौसीजी के फीमेल डॉगी का बच्चा है. मां तो साधारण है. पिता का पता नहीं.” बात पूरी होते-होते रवीना अपनी हंसी न रोक पाई. पावनी भी हंसने लगी.
दोनों सहेलियां बहुत दिनों बाद दिल खोल कर खिलखिला रही थीं.
“पता है, रमन हिदायत भी दे रहे थे कि मौसीजी को अपनी फीमेल डॉग ऐसे खुली नहीं छोड़नी चाहिए.”
“हे भगवान, मतलब कि बंधन यहां भी फीमेल पर ही. मेल डॉग छुट्टा घूमता रहे, कोई बात नहीं.” पावनी हंसी रोकते हुए किसी तरह बोली.

पावनी और रवीना सुबह की सैर पर थीं. बचपन की दोनों सहेलियां गप्पे मारती हुई निर्जन सड़क पर चली जा रहीं थीं. वे गप्पों में इतनी मशगूल थीं कि उन्हें हल्की बूंदा-बांदी से भी कोई फर्क़ नहीं पड़ रहा था. पावनी कह रही थी, “यार आजकल घर में पिता-पुत्र का द्वंद छिड़ा है.”
“वो क्यों?” रवीना ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की.
“शुभम कहता है, वो आएगा… लेकिन रमन को उससे सख्त नफ़रत है.” पावनी रटा रटाया सा बोली चली जा रही थी.
रवीना ने बीच में टोका, “पर वो कौन… यह भी बताएगी कि नहीं.”
“मैंने कितनी बार कहा रमन से, आने दो बच्चे की ख़ुशी के लिए… आख़िर कितना रहेगा हमारे पास. दसवीं में आ गया है, पर इन पतियों का तो भगवान ही मालिक है. हर वक़्त हिटलरी हुक्म सुना देते हैं.” पावनी के चेहरे पर इस समय युद्ध करनेवाले भाव थे. इसी तिलमिलाहट में उसकी चाल तेज हो गई थी.
“ओफ्फो! तू भी कोई कम नहीं. जब लड़ना होता है, तो भीगी बिल्ली बन जाती है. सारी हेकड़ी मेरे सामने ही दिखाती है. अब इतनी तेज क्यों चल रही है. रमन तो दो दिन से टूर पर गए हैं.”
“अरे हां…” पावनी पलभर थम गई.


“क्या करूं? शुभम की ज़िद है कि उसे एक पपी पालना है और रमन को तो कुत्तों से सख्त नफ़रत है.”
“यह कोई इतनी बड़ी बात तो नहीं.”
“रमन को हर बात पर अपनी चलाने की आदत है. शुभम कितना अकेलापन महसूस करता है. बचपन में अपने लिए भाई-बहन की ज़िद करता था. हमेशा पूछता था, “मम्मी, मेरे सभी दोस्तों के भाई-बहन हैं. मेरा कोई भाई-बहन क्यों नहीं है?” सच कहती हूं रवीना कितना दिल दुखता था मेरा, पर रमन को तो एक ही बच्चा चाहिए था. किसी तरह भी तैयार नहीं हुए. अब शुभम बहुत दिनों से एक पपी पालने की ज़िद कर रहा है. यह कोई बड़ी भारी ज़िद है क्या, तू ही बता..?” पावनी ने रुक कर अपनी निगाहें रवीना के चेहरे पर टिका दी.
“समस्या इतनी बड़ी भी नहीं है, जिसके लिए तू इतनी परेशान हो रही है.”
“तेरे लिए नहीं, मुझे पूछ, घर में रोने-पीटने जैसा माहौल रहता है हर वक़्त… इतनी टेंशन तो सीमा पर भी नहीं होती होगी कि दोनों तरफ़ बंदे अपने ही हों.”
रवीना की हंसी छूट गई. उसे हंसता देख पावनी उसे रोष से घूरने लगी.
“मैं तेरी मुश्किल समझ रही हूं. किशोर उम्र के बच्चे अपनी ज़िद मनवाने के लिए किस कदर परेशान कर देते हैं और पति तो इस ग्रह का प्राणी होता ही नहीं. वह एक तरह से पृथ्वी पर एलियन है.”
“यार ये पति एलियन पहले से ही होते हैं या बाद में बन जाते हैं.” पावनी झुंझलाकर बोली.
“अरे नहीं भई, पहले वे भी अपने मम्मी-पापा के ज़िद्दी लाडले बच्चे होते हैं. शादी होते ही एलियन बन जाते हैं.” रवीना के पति विश्लेषण पर पावनी की बेसाख्ता हंसी छूट गई.


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दोनों की मुक्त खिलखिलाहट के बीच एक मासूम सा क्रंदन गूंजा. पहले तो दोनों ने अनसुना कर दिया, लेकिन क्रंदन इतना करुण था कि दोनों सहेलियां उसके श्रोत को ढूंढ़ने के लिए मजबूर हो गईं. वे धीरे-धीरे आवाज़ की दिशा में सड़क के किनारे की तरफ़ बढ़ने लगीं.
“अरे, यह देख पावनी, लगता है आज तेरी फ़रियाद पूरी होने का दिन है.”
“क्या है…?” कहकर पावनी रवीना के पास पहुंची तो देखा, कुत्ते का एक छोटा सा पिल्ला कूड़ेदान की ओट में छिपा भीग कर रो रहा था.
“अरे यह तो बहुत छोटा है. किस ह्रदयहीन ने इसे यहां छोड़ दिया, बारिश में भीगने के लिए.”
“दरअसल, यह भीग नहीं रहा. भीगने का लुत्फ उठा रहा है और गाने गा रहा है.” रवीना ने वस्तुस्थिति समझाई.
“चुप कर, हर समय मज़ाक के मूड में रहती है. एक तो घर में भी पिल्ले की टेंशन… ऊपर से यह दर्दनाक दृश्य.” पावनी ने रवीना को डपटा.
“दर्दनाक दृश्य? ओह, तो तू इसे हंसते-खेलते दृश्य में बदल सकती है.” रवीना बोली.
“नहीं, बिल्कुल नहीं…” पावनी, रवीना का मंतव्य समझ कर पीछे हट गई. यह सड़क का कुत्ता. .रमन जो थोड़ा बहुत मानेंगे भी तो इसका इतिहास, भूगोल सुन-देखकर मुझे और शुभम को भी सड़क पर खड़ा कर देंगे.”
“अरे तो तुझे हरिशचंद्र बनने को कौन कह रहा है.-कह देना किसी फ्रेंड के घर से लाई है.” रवीना ने राह सुझाई.
“तू तो ऐसा कह रही है जैसे यह बड़ा होगा ही नहीं…बड़ा होने पर इसकी सड़कीली लुक बाहर आ जाएगी.” पावनी ने अपना शक ज़ाहिर किया.
“गांव बसा नहीं, लुटेरे पहले आ गए…” रवीना ने मुहावरा छोड़ा.
“यह मुहावरा बिल्कुल भी मैच नहीं कर रहा…” पावनी स्नेह व लालच से पिल्ले को निहार रही थी। उसकी आंखों के सामने शुभम का अकेलापन कौंध रहा था. पपी के लिए उसकी ज़िद आजकल उसका सिरदर्द बनी हुई है. रवीना जानती है, एक बेजुबान पेट कैसे अकेले बच्चे को इमोशनल सपोर्ट दे सकता है, लेकिन यह बात रमन को समझानी मुश्किल थी. वह अपनी सोच में गुम थी कि रवीना ने राह सुझाई, “तू मुहावरे को छोड़. जब तक यह बड़ा होगा, तब तक तो घर में रच बस जाएगा…फिर रमन कुछ नहीं कर पाएंगे.”
“बात तो तू ठीक कह रही है, पर यह इतना भीगा हुआ और गंदा है कि उठा कर कैसे ले जाएं..?”
“छाते के अंदर रख कर…” रवीना ने छाता आगे किया और पिल्ले को उसके अंदर रख कर ढक दिया, “यह आईडिया सही रहेगा पावनी. सड़क के कुत्ते के साथ तुम्हें भी अधिक मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी. एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगा देना और खाना दे देना. बस, पल जाएगा बेचारा गरीब.” रवीना ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा, “इसके नखरे भी नहीं उठाने पड़ेंगे, इसलिए रमन को भी अधिक ऐतराज नहीं होगा.” पिल्ले को लेकर दोनों घर की तरफ़ चल दी.
रवीना का घर पहले पड़ता था और पावनी का बाद में. दुविधा व दुश्चिंता में घिरी पावनी घर पहुंच गई. घर जाकर पावनी ने गंदे पिल्ले को गर्म पानी से नहलाया, दूध पीने को दिया और हीटर ऑन कर दिया. भूखा पिल्ला चपर-चपर दूध पीने लगा. पेट भर गया, बाल भी सूख गए.
शुभम अभी स्कूल से नहीं आया था, लेकिन नन्हा पिल्ला अपनी बाल सुलभ चपलता पर उतर आया था. कभी पर्दे से खेलने लगता, तो कभी शुभम के जूतों के अंदर घुसने की कोशिश करता. कुछ नहीं तो कमरे में रखी फुटबॉल को लुढ़काने लगता. कभी पावनी की गोद में चढ़ जाता. आश्चर्यचकित पावनी को उससे हर पल स्नेह हो रहा था.
2 बजे शुभम स्कूल से आया. जैसे ही वह घर में घुसा, पपी को देखते ही ख़ुशी से उछल पड़ा.
“मम्मी ये कहां से आया. कब आया, कहां से लाईं?” उसने प्रश्नों की झड़ी लगा दी.
“वह सब बाद में बताऊंगी…” पावनी स्नेहसिक्त निगाहों से शुभम के प्रसन्न चेहरे को देख रही थी. एक साधारण सा पपी भी अकेले बच्चे के लिए कितना मायने रखता है.
“यह मेरे साथ ख़ूब खेलेगा. लव यू मम्मी. मैं इसे अपने कमरे में सुलाऊंगा. मैं इसके सारे काम करूंगा. आप बिल्कुल भी चिंता मत करना.” शुभम उसके गाल पर प्यार कर पपी को उठा अपने गाल से सटाता हुआ बोला, “लेकिन पापा इसे रखने तो देंगे न….” पावनी एकाएक चौंक गई. पपी के साथ की प्रसन्नता भरी व्यस्तता में यह बात तो वह भूल ही गई थी। उसे फ़िलहाल कोई उत्तर नहीं सूझा.
अभी रमन के आने में दो दिन बाकी थे. शुभम भी सब भूल कर पपी के साथ व्यस्त हो गया.
“मम्मी इसका नाम क्या रखें?”
“तू बता…क्या रखेगा?”

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“मेरे एक दोस्त के डोबरमैन का नाम ‘रैंबो‘ है… इसका नाम रैंबो रख देते हैं.” इतने पिद्दी से पपी का नाम रैंबो सोच कर पावनी के चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ गई.
अगले दो दिन बहुत व्यस्त और मज़ेदार बीते. शुभम को इतना ख़ुश व भरा-पूरा सा उसने कभी महसूस नहीं किया था. रवीना का फोन आया, “अरे यार कहां व्यस्त है. दो दिन से सैर पर भी नहीं…”
“रैंबो को घर पर अकेले छोड़ कर कैसे आऊं…” पावनी ने अपनी मजबूरी जताई.
“ये रैंबो कौन..?” रवीना ने चकरा कर पूछा.
“अरे तूने ही तो रैंबो को घर लाने के लिए कहा था.” पावनी ऐसे बोली, जैसे रवीना को सब कुछ पता होना चाहिए था.
“अरे, वह पिद्दी मरियल सा कुत्ता रैंबो कब से बना…” रवीना हंसते हुए बोली.
पावनी को बुरा लगा, “अब वह रैंबो है…” गंभीरता उसके स्वर में छलक रही थी.
“दो दिन में बात यहां तक आ पहुंच गई… वो मुझसे भी प्रिय हो गया.”
“हां, हो गया… अब टेंशन यह है कि कल रात रमन पहुंचनेवाले हैं.” पावनी बोली.
“हां, तो क्या हुआ… तू बहुत बहादुर है, मुझे मालूम है. यह मोर्चा भी तू पार कर जाएगी.” रवीना ने उसे उकसाया.
“तू भी न मुझे चने के झाड़ पर चढ़ा देती है.आख़िर उस भयंकर तूफ़ान का सामना तो मुझे ही करना है, जो कल आनेवाला है.”
“कुछ नहीं होगा. तूने वह कहावत नहीं सुनी, हिम्मते मर्दा मददे खुदा…” रवीना ने उसे फिर हिम्मत दिलाई.
दूसरे दिन रविवार था. रात तक रमन आनेवाले थे. शुभम रैंबो से ऐसे खेल रहा था जैसे आख़िररी बार खेल रहा हो. बेचैन-सी इधर-उधर घूमती पावनी रमन के आने के लिए जरा भी उत्साहित नहीं थी. रैंबो कोई निर्जीव चीज़ तो था नहीं कि कहीं छुपा दें या फिर कूड़ेदान में फेंक दें.
आख़िर शाम आ गई और बीत भी गई. रात 9 बजे फ्लाइट लैंड कर जाती है. वह रैंबो के लिए दूध ले आई, “शुभम, इसे जल्दी से दूध पिला और छत की तरफ़ जानेवाली सीढ़ियों के नीचे गत्ते के डिब्बे में सुला कर दरवाज़ा बंद कर दे.”
“लेकिन मम्मी सुबह क्या होगा?”
“सुबह की सुबह देखेंगे, वरना तो आते ही महाभारत कथा आरंभ हो जाएगी.”
रैंबो कोई आदमी का बच्चा थोड़े ही न था, जो किसी सांसारिक नियम से बंधा था. रैंबो तो आजकल के बच्चों की ही तरह निशाचर था. आख़िर नई पीढ़ी का जो था. दिनभर अलसाया रहता और रात होते ही एक्टिव हो जाता. दूध पीकर तो वह और भी फूर्तीला हो कुलांचे भर रहा था. तभी फोन की घंटी बज गई. रमन का फोन था. 15-20 मिनट में पहुंचने ही वाले थे.
पावनी ने रैंबो को ज़ोर से डांटकर, एक थप्पड़ लगा दिया. वह कूं कूं… करता शुभम की गोद में बैठ गया. शुभम का दिल टूट गया. सोने के लिए बचपन में उसे भी एक थप्पड़ पड़ जाता था कभी-कभी. उसने एक छोटा तौलिया गत्ते के डिब्बे में बिछा कर उसे रख दिया. मजबूरी में रैंबो लटक गया और 5-10 मिनट में सो भी गया. शुभम ने डिब्बा सीढ़ी के नीचे रख कर दरवाज़ा बंद कर दिया. पावनी ने चैन की सांस ली. तभी डोरबेल बज गई.
दरवाज़ा खोलते हुए पावनी आज कुछ ज़्यादा ही मुस्कुरा रही थी. रमन ख़ुश हो गए.
“वाह! क्या बात है. लगता है इस बार बहुत मिस किया मुझे.” कहते हुए रमन अंदर आ गए.
“हमेशा ही करती हूं.” पावनी ने स्वर में मिश्री घोली.
“लेकिन आज घर की फ़िज़ा कुछ बदली-बदली-सी नज़र आ रही है.” रमन इधर-उधर देखते हुए बोले.
शुभम जल्दी से अपने कमरे में जा कर पढ़ाई में उलझ गया और पावनी किचन में चली गई. रमन हक्के-बक्के रह गए. रमन नहा-धोकर, चेंज करके आए, तो पावनी और शुभम डाइनिंग टेबल पर बैठे उनका इंतज़ार कर रहे थे.
“आज आते ही खाना लगा दिया. क्या बात है?”
“कोई बात नहीं. आप थक गए होंगे. खाना खाकर सो जाते हैं.” पावनी हड़बड़ाकर बोली.
“अच्छा? ठीक है जैसा तुम चाहो.” रमन ने अर्थपूर्ण मुस्कुराहट पावनी पर फेंकी. पावनी ने नज़रें इधर-उधर कर दी.
जब तक खाना खाकर तीनों कमरे में नहीं आ गए, पावनी की सांसें अटकी ही रही, लेकिन अलसुबह शोरगुल ने पावनी की नींद खुल गई. उसने बगल में सोए रमन पर नज़र डाली, लेकिन यह क्या, रमन तो अपनी जगह से गायब थे. ओह! फिर तो लगता है, अभी तक विश्व में जितने भी भयंकर तूफ़ान आए हैं, उनमें से सबसे बड़ा वाला उनके घर आ गया, ‘रवीना की बच्ची, यह सब तेरी पढ़ाई पट्टी है. तूने ही लालच दिया था मुझे…’
वह हिम्मत कर कमरे से बाहर आई. बाहर का दृश्य देख कर उसके होश उड़ गए. रमन दोनों हाथ कमर पर रखे, प्रश्नवाचक नज़रों से सीढ़ीवाले बंद दरवाज़े को घूर रहे थे. शुभम अपने कमरे के दरवाज़े पर खड़ा बेबसी से कभी पापा और कभी बंद दरवाज़े को देख रहा था. जिसके पीछे रैंबों ने तूफ़ान मचा रखा था. वह दरवाज़े के नीचे अपने पंजे मार-मार कर लगातार रो रहा था, जिससे काफ़ी सुरीला संगीत पैदा हो रहा था.
“यह तो किसी पिल्ले की आवाज़ है… क्या छत का दरवाज़ा खुला रह गया था.” वे परिस्थितियों का सही आकलन करने की नाकाम कोशिश कर रहे थे. बाहर की आवाज़ सुन कर तो रैंबो ने गज़ब की उछल-कूद मचानी शुरू कर दी थी. आख़िर शुभम से न रहा गया.
“क्या पापा… इतना नन्हा बच्चा छत में कैसे चढ़ जाएगा.” कहते हुए उसने दरवाज़ा खोल दिया. दरवाज़ा खुलते ही रैंबों कूं कूं… का शोर मचा कर शुभम के पैरों को चाटने लगा. पावनी जल्दी से किचन में दूध लेने खिसक गई, लेकिन रमन की आंखें कपाल तक चढ़ गई.
“कोई मुझे बताएगा… यह पिल्ला कहां से आया..?” अब रमन को कुछ-कुछ वस्तुस्थिति का सही ज्ञान होने लगा था. तब तक पावनी दूध रैंबो के आगे रख चुपचाप सावधान की मुद्रा में खड़ी हो गई. भूखा रैंबो दूध पीता बहुत ही प्यारा लग रहा था, पर एलियन का दिल भी कहीं पिघलता है.


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“मैंने कुछ पूछा है तुम दोनों से. कहां से आया यह?” रमन एकाएक चिल्लाकर बोले.
“रवीना लाई. शुभम बहुत दिनों से ज़िद कर रहा था इसलिए.” पावनी के मुंह से झोंक में निकल गया.
“कहां से लाई. उसे पता है न कि मैं कुत्ते बिल्कुल भी पसंद नहीं करता.”
“लेकिन शुभम को बहुत पसंद है और मुझे भी. घर में सिर्फ़ आप ही नहीं रहते.” पावनी को रवीना की बात याद आ गई थी तभी हिम्मत करके बोल गई.
“ये कुत्ते सिर्फ़ खेलने, प्यार करने के लिए ही नहीं होते. गंदा भी करते हैं. इन्हें ट्रेंड भी करना पड़ता है. घुमाने भी ले जाना पड़ता है. मैं इसे घर में ज़रा भी बरदाश्त नहीं कर सकता.” रमन ने नफ़रत से रैंबो को देखा.
“हम दोनों मिल-जुलकर कर लेंगे.” पावनी और शुभम एक साथ बोले.
“बिल्कुल नहीं. कान खोलकर सुन लो तुम दोनों. आज जब मैं ऑफिस से लौंटूं, तो मुझे यह पिल्ला घर में नज़र नहीं आना चाहिए.” हिटलरी हुक्म सुना रमन अबाउट टर्न हो गए.
“पिल्ला नहीं रैंबो है यह.” शुभम बोला, लेकिन तब तक बाथरूम का दरवाज़ा एक धमाके के साथ बंद हो चुका था.
“अब..?” शुभम ने ग़मगीन आंखों से उसकी तरफ़ देखा, “मैं इसको स्कूल बैग में डाल कर अपने साथ ले जाऊंगा. किसी पर भरोसा नहीं रहा मुझे.” शुभम ने भी अपने कमरे का दरवाज़ा धड़ाम से बंद कर दिया.
पावनी ने बारी-बारी दोनों दरवाज़ों को शक की नज़र से निहारा और किचन में चली गई. घर में तूफ़ान के आने से पहले का मरघट- सा सन्नाटा छा गया था. उसके बाद जो कुछ हुआ इशारों में हुआ. शुभम स्कूल चला गया और रमन ऑफिस.
लेकिन रात को सब फिर एक-दूसरे के सामने थे और रैंबो बदस्तूर कुलांचे भर रहा था. आज वह रमन के पैरों से खेलने की कोशिश में लगा था. शायद उसे भी दुनियादारी समझ आ गई थी कि कौन-सी सरकार सत्ता में है. रमन ने उसे पैरों से परे फेंक दिया.
“यह अभी तक यहीं हैं. ठीक है मैं ही इसे अभी रवीना को वापस कर आता हूं.” रमन अपनी जगह से उठे. पापा का इरादा भांप शुभम ने रैंबों के साथ अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया. रमन पावनी को घूरते रह गए.
अब रोज़ यही होने लगा. रैंबो ने भी रमन को अपने ख़िलाफ़ देख विद्रोह का मोर्चा खोल दिया था. रमन रैंबों को बाहर करने के लिए रोज़ नई-नई तरकीब लड़ाते और रैंबो कभी उनकी चप्पल के ऊपर पॉटी कर देता, कभी कारपेट पर सू सू. कभी उनके मोजे कुतर देता, तो कभी एक जूता गायब कर देता. पावनी को रैंबों और रमन के बीच शांति स्थापित करनी मुश्किल हो रही थी. माहौल गरमाता देख शुभम रैंबो के साथ अपने कमरे में बंद हो जाता. ऐसे ही सी-सॉ खेलते दिन बीत रहे थे. कभी एक का पलड़ा भारी होता, तो कभी दूसरे का.


बड़े से बड़ा तूफ़ान भी आख़िर मंद पड़ जाता है. विद्रोह की ताक़त कमज़ोर पड़ने लगती है. रमन अब गाहे-बगाहे रैंबो को अपने पैरों के साथ खेलने देते. अपना एक चप्पल-जूता गायब होने पर ढूंढ़ने को कहते. लेकिन जब वह उनके जूते-चप्पल को टॉयलेट समझ लेता, तब बीच-बचाव करना मुश्किल हो जाता. लेकिन पावनी और शुभम फिर भी राहत महसूस कर रहे थे, क्योंकि रैंबो को वापस करने की बात वह अब धीरे से कहते. दोनों ने सोचा, चलो ख़तरा टल गया.
लेकिन एक दिन शाम को रवीना दनदनाती हुई आई और पावनी पर फट पड़ी, “यार तेरी मुझे फंसाने की आदत कब जाएगी. कॉलेज लाइफ से यही कर रही है, फ्रेंड का नाम लेने के लिए क्या मैं ही रह गई थी.”
“अब क्या किया मैंने?” पावनी आश्चर्य से बोली.
“रमन का फोन आया था. रैंबों के मां-बाप का अता-पता पूछ रहे थे?”
“क्या?” पावनी बुरी तरह चौंक गई. वह तो सोच रही थी कि अब मसला सुलझ गया.
“मैंने कहा कि मेरी मौसीजी के फीमेल डॉगी का बच्चा है. मां तो साधारण है. पिता का पता नहीं.” बात पूरी होते-होते रवीना अपनी हंसी न रोक पाई. पावनी भी हंसने लगी.
दोनों सहेलियां बहुत दिनों बाद दिल खोल कर खिलखिला रही थीं.
“पता है, रमन हिदायत भी दे रहे थे कि मौसीजी को अपनी फीमेल डॉग ऐसे खुली नहीं छोड़नी चाहिए.”
“हे भगवान, मतलब कि बंधन यहां भी फीमेल पर ही. मेल डॉग छुट्टा घूमता रहे, कोई बात नहीं.” पावनी हंसी रोकते हुए किसी तरह बोली.
“अरे क्या बात कही.” रवीना ने पावनी से हाई फाइव किया.
“लेकिन इतना बड़ा झूठ आख़िर कब तक छिपाएंगे. मैं तो सोच रही थी कि रमन अब भूल गए होंगे, पर तेरी बातों ने तो मुझे उलझा दिया.”
“मैं भी यही सोच रही हूं पावनी. सच बता दे, फिर रमन का जो भी फ़ैसला हो.”
“मैं रैंबो को कहीं नहीं जाने दूंगा.” उनकी बातें अंदर से सुनता शुभम अपने कमरे से बाहर आ गया. साथ ही उछलता-कूदता रैंबो भी. आजकल देखभाल से वह गोलू-मोलू सा हो रहा था. रवीना ने झुक कर उसे गोद में उठा लिया, “यह तो बहुत प्यारा हो गया. रमन का दिल फिर भी नहीं पिघल रहा. यार सही में पति इस पृथ्वी पर एलियन ही होते हैं.”
“हां, और अब यह एलियन सच जानकर किसी भी तरह रैंबो को घर में नहीं रहने देंगे. जब से यह आया था, घर में जैसे बहार आ गई थी.” पावनी बेहद मायूसी से बोली. सुनकर शुभम की आंखें आंसुओं से भर गईं.


तभी रैंबो रवीना के हाथ से फिसल कर दरवाज़े की तरफ़ भाग गया. दरवाज़े पर रमन खड़े बहुत देर से उनकी बातें सुन रहे थे. अब कोई राज़, राज़ न रहा था. पावनी और रवीना सन्न खड़ी रह गई. शुभम रैंबो को उठाकर चेहरे पर अवज्ञा के भाव लिए अपने कमरे में चला गया. जिसे तीनों ने पढ़ लिया.
रमन को देखकर हमेशा मज़ाक के मूड में रहनेवाली रवीना आज बिना दुआ-सलाम किए, चुपचाप बाहर निकलकर वापस चली गई. रमन को बहुत अखरा. पलभर ठिठक कर वे बेडरूम में जाकर कपड़े बदल फ्रेश होकर आ गए. पावनी ने चाय-नाश्ता टेबल पर रखा और अपनी चाय उठाकर जाने लगी, तो रमन ने उसका हाथ पकड़ कर वापस बिठा लिया.
“क्या बात है..?” रवीना झुंझलाकर बोली.
“मेरी बात तो सुनो…”
“अब क्या सुनना है… तुम्हारा घर… तुम्हारा फ़ैसला… तुम जो चाहे करो.”
“तुम समझती क्यों नहीं… पिल्ला पालना कोई खिलौना रखना नहीं है… शुभम तो नादान है, पर तुम तो समझदार हो.”
“हां मैं तो तब भी समझदार थी, जब तुमने शुभम को बिना कारण अकेला रखा. अकेले बच्चे को साथ के लिए मैंने दुखी होते देखा है. उसके अनगिनत सवालों के जवाब दिए हैं मैंने. तुमसे तब भी एक अच्छा पपी पालने के लिए कहा, लेकिन तुम कभी नहीं माने. उतनी ही बार अपने अंदर छटपटाहट महसूस की है मैंने. इतने दिनों से हम सब तुम्हारी डर से झूठ बोल रहे है. आख़िर क्यों? ऐसा क्या मांग लिया शुभम ने और ऐसा क्या गुनाह कर दिया मैंने. कितना ख़ुश है अकेला बच्चा उस नादान से पपी के साथ. आख़िर, सभी को अपना प्यार लुटाने के लिए कोई तो चाहिए. पपी के साथ वह जिस तरह से भागता-दौड़ता है, प्यार करता है… क्या इस उम्र का बच्चा माता-पिता के साथ कर सकता है. पर तुम्हें क्या.;घर तुम्हारा है. फ़ैसले तुम्हारे हैं. मैं और शुभम तो तुम्हारे घर में रह रहे हैं न…” बोलते-बोलते पावनी की आवाज़ भर्रा गई. रमन हतप्रभ देखते रह गए.
तभी बाहर से रवीना की आवाज़ सुनाई दी. छलछलाई आंखें लिए पावनी बाहर चली गई. बाहर रवीना, पावनी से कह रही थी, “रैंबो को दे दे पावनी. मैं उसके लिए किसी से बात कर आई हूं, वो लेने को तैयार हैं.”
पावनी रैंबो को उठाकर ले आई. पीछे-पीछे रुआंसा सा शुभम भी. तभी रमन भी बाहर आ गए. पावनी ने रैंबो को रवीना की गोद में दिया, वह फिर से फिसल कर रमन की तरफ़ भाग गया. इस बार रमन ने उसे गोद में उठा लिया.
“तू अब कहीं नहीं जाएगा रैंबो. मैं पृथ्वी पर एलियन बिल्कुल नहीं कहलाना चाहता.” कहकर रमन रवीना की तरफ़ देख कर शरारत से मुस्कुराए. फिर पावनी के कधों के इर्दगिर्द अपनी बांहें फैलाते हुए बोले, “मुझे माफ़ कर दो पावनी, इस नज़रिए व इतनी गहराई से मैंने कभी सोचा ही नहीं. और हां, अब कभी मत कहना कि यह घर तुम्हारा नहीं. यह घर भी तुम्हारा और इसके फ़ैसले भी तुम्हारे.”
सुनहली धूप चटक गई एकाएक पावनी के चेहरे पर. ख़ुशी से गमकता शुभम मम्मी-पापा व रैंबो से एक साथ लिपट गया.
“हुर्रे… ये हुई न बात… एक फोटो तो बनती है… इस हैप्पी फैमिली की.” रवीना ने अपना मोबाइल निकाला और एक फोटो खींच दी. आज वास्तव में रैंबो के आने से घर में बहार आ गई थी.

Sudha Jugran
सुधा जुगरान

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सुनीता ने अपने पति से कहा, “अजय, क्या महिलाएं किसी भी उम्र में सुरक्षित नहीं है? कितना अजीब लगता है और कितना दुख होता है, इस आयु के साथ इस तरह की हरकतें देखकर… क्या संस्कार दिए होंगे उसने अपने परिवार को खासतौर पर अपने बेटे को?”

साठ वर्ष की आयु पार कर चुकी सुनीता सुंदर होने के साथ ही आकर्षक व्यक्तित्व की भी धनी थी. सुंदर छवि के कारण नारी को कठिनाइयों का सामना करना ही पड़ता है. जवानी की दहलीज़ पर कदम रखने के बाद से ही पुरुष का छिछोरापन उनके द्वारा कि गई अप्रिय हरकतें और उनकी नीयत का पता चलने लगता है. सुनीता ने भी पुरुष के ऐसे रूप अवश्य देखे थे, इसलिए वह इस तरह के लोगों की औकात अच्छी तरह से पहचानती थी.
अब तो वह दादी-नानी बन चुकी थी, नाती-पोतोंवाली सुनीता अब अपने आपको पूरी तरह सुरक्षित समझती थी. दिखने में वह अभी भी अपनी उम्र से काफ़ी कम ही लगती थी. गठा हुआ सुंदर शरीर, उसकी चाल-ढाल, उसकी जवानी का दर्पण दिखाते थे.


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सुबह टहलने के लिए नित्य ही जानेवाली सुनीता यह महसूस कर रही थी कि कुछ दिनों से एक बुज़ुर्ग जान-बूझकर बार-बार उसी रास्ते से अपनी साइकिल से गुज़रता है, जहां से वह जाती है. जवानी के दिनों में तो हर लड़की इस तरह की घटनाओं का शिकार होती है, उनसे जूझती रहती है. सुनीता ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उम्र के इस पड़ाव पर ऐसे भी लोग होते हैं, जो वृद्धावस्था आने तक भी छिछोरेपन से बाज़ नहीं आते हैं और जवानी की बचकानी हरकतों को इस उम्र में भी दोहराते हैं.
सुनीता ने अपने पति से कहा, “अजय, क्या महिलाएं किसी भी उम्र में सुरक्षित नहीं है? कितना अजीब लगता है और कितना दुख होता है, इस आयु के साथ इस तरह की हरकतें देखकर… क्या संस्कार दिए होंगे उसने अपने परिवार को खासतौर पर अपने बेटे को?”
अजय ने बीच में ही टोका, “क्या हुआ सुनीता ऐसी बातें क्यों कर रही हो तुम?”
तब सुनीता ने अजय को बताया, “पिछले कुछ दिनों से एक बुज़ुर्ग साइकिल से बार-बार मेरे पीछे आता है. उसके ऐसा करने से मुझे बहुत ग़ुस्सा आता है और बहुत ही ख़राब लगता है.”
तब अजय ने सुनीता को समझाते हुए कहा, “सुनीता, तुम ध्यान ही मत दो. इस तरह के लोग भी होते हैं, जिनका चरित्र यदि ख़राब है, तो वह वैसा ही रहता है. वह अपने आपको बदल नहीं पाते.”
“लेकिन अजय ऐसे लोगों के लिए दिल में कितनी घृणा उत्पन्न होती है. कितना ग़ुस्सा आता है उन पर नफ़रत के लायक होते हैं वे. काश! ऐसे लोग इस नफ़रत को समझ सकें और इस तरह की घटिया हरकतें करना बंद करें.”
अजय, मेरा मन तो करता है कि उस इंसान की बहन, बेटी और पत्नी को उसकी इस हरकत के बारे में बता दूं, लेकिन मैं सोचती हूं कि उसके परिवार को शर्मिंदा कैसे करुं? उसकी पत्नी को दुखी करना और बेटी के सामने एक बुज़ुर्ग पिता का अपमान करना मुझे ठीक नहीं लग रहा, क्योंकि उन सभी की नज़रों में वह उनका हीरो है.”
“हर घर में पिता अपनी बेटी के लिए उसका हीरो होता है, पत्नी के लिए सच्चा जीवनसाथी और बहन के लिए रक्षा करनेवाला उसका भाई. इन सब के साथ ही यदि वह चरित्रहीन है, तो वह इंसान दूसरी महिलाओं के लिए नफ़रत का पात्र भी हो सकता है.”
“तुम बिल्कुल ठीक कह रही हो सुनीता, एक पत्नी अपने पति के और बेटी अपने पिता के विषय में इस तरह की बातें सुनकर कतई विश्वास नहीं कर सकतीं, क्योंकि वह हमेशा उनका वह रूप देखती हैं, जो एक पति और पिता का होता है. वे तो उनका वह रूप कभी नहीं देख पातीं, जो एक पराई स्त्री देख लेती है.”


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“हां अजय, किसी परिवार को शर्मिंदा करने से बेहतर है कि मैं ही अपना रास्ता बदल लूं, ताकि मुझे भी इस मानसिक तनाव से ना गुज़रना पड़े और मन सुबह-सुबह पक्षियों को देखकर, प्रकृति का आनंद ले सके.”
तब सुनीता को वह पुराने दिन याद आ गए, जब वह सहेलियों के साथ ऐसी अप्रिय घटनाओं का शिकार हो जाया करती थी और अपना रास्ता बदल दिया करती थी. आज इस उम्र में भी रास्ता बदलना पड़ेगा, ऐसा तो सुनीता ने कभी सोचा ना था!

रत्ना पांडे

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Photo Courtesy: Freepik

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सुमन चौंकी! सचिन ‘साहेब’ अभी-अभी इसी पुरस्कार की तो बात कर रहे थे और उन्होंने मुझे यही कहा था ‘किसी को बताना नहीं.’ ये हर कोई इस प्रतियोगिता की जानकारी गुप्त क्यों रखना चाह रहा है?
“पारुल एक बात पूछूं? तुमको यह जानकारी कहां से मिली?”
“दी! वह नहीं बता सकती, जिन्होंने मुझे बताया है उन्होंने किसी और को बताने को मना किया था. फिर मैंने सोचा आप तो मेरी अपनी हैं, मेरी कितनी मदद करती हैं, इसलिए आपको बताए बिना मुझसे रहा नहीं गया. ”
सुमन को कुछ खटका और वह तुरंत बोल पड़ी, “कहीं सचिन ‘साहेब’ ने तो नहीं बताया?” यह नाम सुनकर पारुल हड़बड़ा गई.

“अरे कब से फोन बज रहा है उठाओ ना? डिस्टर्ब हो रहा है भई!” सुमन चाय पीते हुए ग़लती से फोन उस कमरे में छोड़ आई थी, जहां पर उसके पति निखिल वर्क फ्रॉम होम कर रहे थे.
“आ रही हूं… किसका फोन है?” सुमन रसोई से ही चिल्लाई.
“तुम्हारे साहेब का!” निखिल ने भी उसी कोफ़्त से चिल्लाकर जवाब दिया. जब तक सुमन ने कमरे में आकर फोन उठाया, तब तक कॉल डिस्कनेक्ट हो चुकी थी.
“तुम्हारे साहेब को कोई काम-धंधा नहीं है क्या? सुबह-सुबह फोन मिला देते हैं. कॉल बैक कर लो, कहीं तुम लेखन जगत की किसी ज़रूरी बात से महरूम ना रह जाओ…” निखिल ने हंसते हुए व्यंग्य बाण चलाया. सुमन ने उसकी तरफ़ बुरा-सा मुंह बनाया और फोन लेकर चलती बनी. बाहर आकर भी उसने वापस ‘साहेब’ को फोन नहीं मिलाया. निखिल को क्या बोलती, वो ख़ुद ही त्रस्त हो चुकी थी उनसे.
माफ़ कीजिए, आपसे इन तीनों का पूरा परिचय नहीं कराया. दिल्ली निवासी सुमन एक जानी-मानी कहानीकार थी, जो प्रिंट और डिजिटल पत्र-पत्रिकाओं में काफ़ु समय से सुमन ‘पुष्प’ नाम से कहानियां लिखा करती थी. उम्र 45 पार हो गई थी. बेटी मानसी मेडिकल की तैयारी कर रही थी. पति निखिल सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे, जो पहले लॉकडाउन के बाद से ही वर्क फ्रॉम होम कर रहे थे. 3 बीएचके फ्लैट में तीनों प्राणियों को अपने लिए एक-एक कमरा मिल जाता था, इसलिए तीनों का काम सुकून से चल रहा था.
अपने-अपने कमरों में लैपटॉप खोले निखिल ऑफिस का काम करता, मानसी पढ़ाई करती और सुमन दैनिक घरेलू दायित्वों से निपट कहानियां लिख लिया करती. साथ ही कुछ कहानीकार दोस्तों से गप्पे मार लिया करती, जिससे कहानी जगत की गतिविधियों के बारे में पता चलता रहता. उसकी लेखक मित्र मंडली में 4-5 लोग ही थे, मगर पिछले सालभर से इस मंडली में एक नए रोचक पात्र जुड़े थे सचिन ‘साहेब’.
ये इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्राध्यापक थे और शौकिया कहानियां लिखते थे. इनकी कहानियां सामान्य ही होती, फिर भी ख़ुद को बड़ा साहित्यकार समझने में कोई कसर न छोड़ते. सुमन से इनकी जान-पहचान सोशल मीडिया पर बने एक साहित्यिक ग्रुप पर हुई थी. उन्होंने सुमन की कहानियों की तारीफ़ों में कसीदे पढ़ते हुए उसे मैसेंजर में संदेश भेजने आरंभ कर दिए. तारीफों में किसी भी तरह की असभ्यता, अशिष्टता न होती इसलिए सुमन भी धन्यवाद लिख दिया करती.


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एक दिन एक कहानी प्रतियोगिता की आवश्यक सूचना देने हेतु सचिन ‘साहेब’ ने सुमन का फोन नंबर मांगा. उसने भी दे दिया और तब से वे उसे आए दिन फोन करने लगे. ऊपरी तौर पर देखा जाए, तो उनकी बातों में कुछ भी ऐसा ना होता जिस पर ऐतराज़ किया जा सके या तो लेखन की तारीफ़ होती या किसी ना किसी तरह की जानकारी होती. पर कुछ तो था जो सुमन को अखर जाता. उसकी छठी इंद्री उसको आभास दिलाती, कहीं कुछ तो गड़बड़ है, इनसे ज़्यादा फार्मल नहीं होना चाहिए, मगर किसी प्रत्यक्ष प्रमाण के अभाव में सुमन उनकी बजाय अपनी सोच पर ही संशय कर लिया करती. सचिन ‘साहेब’ के साथ एक समस्या और थी, वो ये कि उनका फोन एक बार ले लिया जाता, तो फिर जल्दी पीछा ना छूटता. पता नहीं कहां-कहां की हांकते.
सुमन ने अपने फोन पर उनका नाम सचिन ‘साहेब’ सेव किया हुआ था, जिसे देखकर निखिल बड़ा मज़ाक उड़ाते.
“ये ‘साहेब’ से क्या मतलब है?”
सुमन समझाती ‘साहेब’ उनका तखल्लुस है यानी उपनाम. लगभग सभी लेखक अपना कोई उपनाम रखते हैं जैसे साहिर ‘लुधियानवी’, जिगर ‘मुरादाबादी’ मैंने भी तो रखा सुमन ‘पुष्प’.”
“वह तो ठीक है मगर ‘साहेब’ ही क्यों? कुछ और भी हो सकता था… ‘दास’ ही रख लेते?”
“उनका तखल्लुस उनकी मर्जी, तुम्हें क्या?” सुमन निखिल को झिड़क देती. तब से उनका फोन आते ही निखिल “साहेब, का फोन आ गया, साहेब याद कर रहे हैं…” कहकर सुमन को चिढ़ाना शुरू कर देते.
हुआ यूं कि साल भर में सुमन का सचिन ‘साहेब’ से दो-तीन बार कभी पुस्तक मेले में तो कभी साहित्यिक सम्मेलन में सपत्निक मिलना भी हो गया. सुमन को उनकी पत्नी सरला नाम के अनुरूप बड़ी विनम्र और मिलनसार महिला लगी. दोनों में अच्छी बातचीत हुई थी. व्यक्तिगत् रूप से भी सुमन को सचिन ‘साहेब’ बड़े भद्र और हंसमुख आदमी लगे. इन कारणों से भी वह उनको बड़े सम्मान की दृष्टि से देखने लगी थी.
आज वह जल्दी से काम निपटा कर एक नई कहानी शुरू करना चाहती थी इसलिए ‘साहेब’ को कॉल बैक कर समय बर्बाद करना उचित नहीं समाझा. लैपटॉप खोला ही था कि वापस उनका फोन आ गया. सुमन ने अनमने ही सही, मगर उठा लिया. हर बार की तरह फिर वही पिछली प्रकाशित कहानी की तारीफ़ों के पुल बंधे, लेखनी की खू़्ब तारीफें की. इसके अलावा एक महत्वपूर्ण जानकारी शेयर की।
“साहित्य कला निकेतन में कहानी प्रतियोगिता आयोजित होने जा रही है. वहां पर अपना नव प्रकाशित कहानी संग्रह ज़रूर भेजिएगा. अच्छा पुरस्कार है. मेरी चयनकर्ताओं से अच्छी जान-पहचान है. वे आप जैसी लेखनी को ही ढूंढ़ रहे हैं. मैं लिख कर दे सकता हूं, वहां आपकी किताब ही जीतेगी…”
“मेरी कहानियों में इस भरोसे के लिए आपका धन्यवाद.” सुमन ने अतिरेक प्रशंसा से झेंपते हुए कहा.
“एक बात और कहनी है, देखिए यह बात मैं सिर्फ़ आपको बता रहा हूं, क्योंकि समकालीन रचनाकारों में बस एक आप ही हैं, जो इस पुरस्कार के योग्य हैं, बाकी सब तो साहित्य का नाम डुबोने में लगे हैं. इसलिए ये बात कहीं शेयर मत कीजिएगा.”


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“जी ज़रूर, आप मुझे पता दीजिएगा.”
सुमन फोन पर बात कर ही रही थी कि पीछे से लगातार पारूल शर्मा के फोन आए जा रहे थे. सचिन ‘साहेब’ का फोन रख उसने पारूल का फोन उठाया. वह नवांकुर लेखिका थी. सुमन को बड़ी दीदी की तरह मानती थी. उससे हर तरह का सलाह-मशवरा कर लिया करती थी. साथ ही पारूल सुमन के लिए सोर्स ऑफ इंफोर्मेशन थी. लेखन जगत में क्या चल रहा है, एक-एक बात की जानकारी पारूल जुटा लिया करती थी और ब्रॉडकास्ट किया करती थी.
“दी! आपको एक ज़रूरी बात बतानी है.”
“हां, कहो ना.”
“मगर प्रॉमिस कीजिए किसी और को नहीं बताएंगी.”
“हां बाबा नहीं बताऊंगी.”
“तो सुनिए, साहित्य कला निकेतन में एक प्रतियोगिता आयोजित होने जा रही है. अच्छा पुरस्कार है वहां पर अपनी पुस्तक ज़रूर भेजिएगा. मैं एड्रेस मिलते ही आपको फॉरवर्ड कर दूंगी.”
सुमन चौंकी! सचिन ‘साहेब’ अभी-अभी इसी पुरस्कार की तो बात कर रहे थे और उन्होंने मुझे यही कहा था ‘किसी को बताना नहीं.’ ये हर कोई इस प्रतियोगिता की जानकारी गुप्त क्यों रखना चाह रहा है?
“पारुल एक बात पूछूं? तुमको यह जानकारी कहां से मिली?”
“दी! वह नहीं बता सकती, जिन्होंने मुझे बताया है उन्होंने किसी और को बताने को मना किया था. फिर मैंने सोचा आप तो मेरी अपनी हैं, मेरी कितनी मदद करती हैं, इसलिए आपको बताए बिना मुझसे रहा नहीं गया. ”
सुमन को कुछ खटका और वह तुरंत बोल पड़ी, “कहीं सचिन ‘साहेब’ ने तो नहीं बताया?” यह नाम सुनकर पारुल हड़बड़ा गई.
“अरे बोल ना…” सुमन ने ज़ोर देकर पूछा.
“दी आपको कैसे पता चला? देखिए उन्हें पता ना चले कि मैंने आपको बता दिया. उन्होंने मुझे किसी को भी बताने को मना किया था.”
यह सुनकर सुमन को बड़ा ग़ुस्सा आया. “अरे! जब तुम्हारा फोन आ रहा था, तब मैं उन्हीं से बात कर रही थी. वे मुझे भी इसी पुरस्कार के बारे में बता रहे थे. साथ ही यह भी कह रहे थे कि किसी को मत बताना.”
“क्या?” सुनकर पारुल के कान खड़े हो गए.
“अरे ऐसा कैसे? मेरे से इतने प्रामिस लिए कि ये बात वे सिर्फ़ मुझे बता रहे हैं, मैं और किसी को ना बताऊं.”
“मुझसे भी यही कहा था. कह रहे थे समकालीन लेखिकाओं में मैं स्रर्वश्रेष्ठ हूं, इसलिए वे चाहते हैं ये पुरस्कार मुझे ही मिले.”
“अरे दी, सेम टू सेम! मुझे भी कहा था! हे भगवान! कितना दोगला आदमी निकला ये!” पारूल की आवाज़ में कड़वाहट घुल गई.
दोनों तरफ़ घोर अंधकार छा गया. ये क्या माज़रा था! एक प्रशंसा के एक तीर से दो निशाने साधे जा रहे थे… निंदा का मारा तो आत्मरक्षा के जुगाड़ भी कर ले, मगर प्रशंसा के मारे को तो भनक भी ना लगे कि उसका कैसे बेवकूफ़ बनाया जा रहा है.
इसके बाद धीरे-धीरे दोनों ने उनके बारे में जो भी बातें एक-दूसरे को बताई, वे कॉमन थी. यानी दोनों की भरपूर सराहना करना, नियमित फोन करना, फ्रेंड, फिलॉसफर, गाइड की भूमिका निभाते हुए तारीफ़ें बटोरना… और ये जताना कि ये कृपा सिर्फ़ अकेले उन्हीं पर हो रही है, क्योंकि सिर्फ़ वे ही हैं जो इस कृपा की पात्र हैं.
सुमन तो नाक की सीध में चलनेवाली, सीधी-सादी लेखिका थी, मगर तेज़तर्रार पारूल कहां सचिन ‘साहेब’ को सस्ते में छोड़नेवाली थी. उससे तो वह भोला प्राणी लगभग रोज़ ही बहाने से बतियाया करता था. पारूल ये सोचकर ही सिहर गई कि जिसे वो अपना शुभचिंतक, समर्पित पाठक समझ रही थी, वह अधेड़ उम्र का आदमी अपनी बेटी की उम्र की लड़की को बातों के जाल में फंसाकर उससे निकटता का रस ले रहा था, उससे फ्लर्ट कर अपनी मानसिक कुंठा शांत कर रहा था.
माथे पर ग़ुस्से की लकीरें खींचे पारूल पूरा दिन फुल फॉर्म में रही. दस जगह फोन कर डाले और शाम तक तीन-चार और लेखिकाओं से बातचीत कर जानकारी जुटा ली कि ऐसा वे सभी के साथ किया करते हैं. सचिन ‘साहेब’ के शहर इलाहाबाद की ही एक लेखिका कौमुदी श्रीवास्तव ने तो यह तक बताया, “मैंने उनके बारे एक बात बार-बार नोटिस की है कि वे अपनी पत्नी की उपस्थिति में लेखिकाओं को जरा भी भाव नहीं देते. बड़ी सज्जनता से एक संयमित दूरी बनाए रखते हैं. संक्षिप्त-सा वार्तालाप करते हैं. लेकिन जब पत्नी सामने ना हो, तब उनके भीतर लेखिकाओं के प्रति भरा प्रेम, मंगलभावना प्रबल होकर छलक-छलक कर बाहर आती है.” पारूल से यह बात सुनकर सुमन को भी बहुत कुछ याद आने लगा. कितनी बार ऐसा हुआ कि सचिन ‘साहेब’ का फोन आता था, वे लंबी-लंबी हांकते थे. सुमन बीच में कहा भी करती थी, ज़रा भाभीजी से बात कराइए, उन्हें भी नमस्ते कह लें. तो वे कुछ ना कुछ बहाना बना दिया करते थेः यानी वे पत्नी की अनुपस्थिति में ही महिलाओं को फोन करते हैं?


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सुमन सन्न थी. सचिन ‘साहेब’ की जो सज्जन छवि उसने मन में बनाई हुई थी, वो आज भरभरा कर गिर गई थी. वह जान गई थी कि उनकी ये विशेष कृपाएं सिर्फ़ लेखिकाओं पर ही बरसती थी. पुरूष कलमकार उनकी इस कृपा दृष्टि से पूरी तरह अछूते थे. सुमन ने एक लेखक साथी से इस संबंध में बात की, तो वह हंसते हुए बोले थे. “अच्छा है आप समझ गई, हम तो उनका ये रूप कब से देख रहे है. अपनी इसी रंगीले स्वभाव के कारण लेखको में उनका नाम सचिन ‘छबीला’ प्रसिद्ध है.”
अब तो सुमन को कांटों तो खून नहीं था. निखिल उसकी हालत देख कर हंस-हंस कर दुहरे हुए जा रहे थे.
“और सुनो झूठी तारीफ़ें… अरे माना मैं तुम्हारी कहानियों की कम तारीफ़ करता हूं, मगर जो करता हूं सच्ची करता हूं, मगर तुम्हारा खून तो साहेब की झूठी तारीफ़ों से ही बढ़ता था ना… वैसे तो तुम राइटर अपने आपको बड़े बुद्धिजीवी बनते हो और इतनी-सी बात नहीं समझ पाए कि कौन, कब, क्यूं, ज़रूरत से ज़्यादा चेप रहा है?”
सुमन बुरी तरह चिढ़ी हुई थी. नहीं! इस बंदे को ऐसे तो नहीं छोड़नेवाले, कुछ ना कुछ सबक तो सिखाना ही पड़ेगा.
सारी जानकारियां जुटाकर और तैयारियां कर एक शाम पारूल और सुमन ने अपनी ही जैसी तीन लेखिकाओं की एक कॉन्फ्रेंस कॉल रखी. मुद्दा था सचिन ‘साहेब’ जैसे झूठे, फ्लर्ट को कैसे सबक सिखाया जाए. वो जो अपनी पत्नी की आंखों में देवता समान बना बैठा है और गाइड, फिलॉसफर बनकर अपने हिडन ऐजेंडा पूरा कर रहा है, उसे यूं सस्ते में नहीं छोड़ना चाहिए.
सुमन ने सबसे पहले उनकी पत्नी का फोन नंबर अरेंज करने को कहा, जिसकी ज़िम्मेदारी उन्हीं के शहर की कौमुदी ने ले ली. कौमुदी की एक सहेली सचिन ‘साहेब’ की सोसायटी में रहती थी. उस सोसायटी की महिलाओं ने एक वॉट्सअप ग्रुप बनाया हुआ था, जिसमें उनकी पत्नी सरला भी शामिल थी, इसलिए कौमुदी को उनका नंबर खोजने में परेशानी नहीं हुई.
उस मीटिंग में सबने मिलकर पहले तो सचिन ‘साहेब’ को जी भरके कोसा, फिर सबने अपने-अपने अनुभव शेयर किए कि सिर्फ़ वे एक अकेले ऐसे रंगीले छुपे रूस्तम नहीं हैं और भी कुछ हैं, जो महिला साथियों की शराफ़त का फ़ायदा उठाते हुए भी शरीफ़ बने हुए हैं. वे सोशल मीडिया में पब्लिकली तो सज्जन और शांत बने रहते हैं, लेकिन पर्सनल मैसेज में ख़ूब फूल, गुलदस्ते, सुप्रभात, शुभरात्रि के संदेश भेजते हैं, वो भी रूमानी शेरो-शायरी, कविताओं के साथ..! इन सबको कुछ ना कुछ सबक सिखाना तो बनता ही था, मगर सबसे पहले सचिन ‘साहेब’ से निपटना था. उनके लिए बहुत सोच-विचार कर कुछ तय किया गया, जिसे सही समय पर सही तरीक़े से अंजाम देना था .
दो दिन बाद सचिन ‘साहेब’ के दिल में फिर मनचली हिलोंरे उठीं और आज उन्होंने फोन मिलाया पारूल को. पारूल तो दो दिनों से इसी घड़ी के इंतज़ार में चौकस थी. जैसे ही उनकी कॉल देखी, तुरंत ईयर फोन लगाकर उनकी कॉल रिसीव की और ख़ूब बातें बनाने लगी. बीच में उसने उनकी पत्नी के बारे में पूछा, तो वे हमेशा की तरह ये कह कर टाल गए, “पत्नी ज़रा पड़ोस में गई हैं. आती हैं तो बात कराता हूं…’ बात करते-करते पारूल ने सुमन को मैसेज कर दिया कि मेरी ‘साहेब’ से बात चल रही है, वे कह रहे हैं पत्नी पड़ोस में गई हुई हैं. बस ठीक उसी समय सुमन ने सचिन ‘साहेब’ की पत्नी सरला को फोन मिला दिया और बातचीत शुरू कर दी.


“नमस्ते सरलाजी, कैसी हैं आप? जब से हम साहित्य सम्मेलन में मिले थे, तब से बड़ी इच्छा थी आपसे बात करने की. सचिनजी के तो हर दूसरे, तीसरे दिन फोन आते रहते हैं. ख़ूब बात करते हैं. उनकी बातें इतनी रोचक होती हैं कि कब घंटा बीत जाता है, पता ही नहीं चलता… मैं उनको बार-बार बोलती भी हूं कि ज़रा आपसे भी बात कराएं, मगर आप हमेशा कहीं बाहर गई हुई होती हैं या सो रही होती हैं…”
“अरे, ये क्या कह रही हैं आप! जब से ये मुआ कोरोना आया है मैं तो कहीं आती-जाती ही नहीं, घर में ही रहती हूं और दोपहर में तो मैं बिल्कुल नहीं सोती…”
“ओह! अच्छा! फिर वो हर बार ऐसा क्यो कहते हैं? बड़े आश्चर्य की बात है ये तो… मेरा तो बड़ा मन करता है आपसे बात करने का… चलिए छोड़िए, अभी तो आप पड़ोस में आई हुई हैं, व्यस्त होंगी, घर पहुंचकर बताइएगा तब आराम से बात करेंगे.”
“अरे! किसने कहां पड़ोस में गई हूं, मैं तो घर पर ही हूं.”
“ओह, मगर सचिनजी जो अभी घंटेभर से लेखिका पारूल शर्मा से फोन पर बात कर रहे हैं, उन्होंने ही पारूल को बताया कि आप तो पड़ोस में गई हैं, अतः आपसे बात नहीं हो पाएगी… दरअसल, हुआ यूं कि हम एक ऑनलाइन महिला सम्मेलन में आपको आमत्रिंत करना चाहते थे, उसी सिलसिले में आपसे बात करना चाहते थे. इसीलिए पारूल ने मुझे मैसेज कर दिया था कि मैं आपके फोन पर आपसे सीधे बात कर लूं, क्योंकि सचिनजी को तो आप जानती ही हैं, एक बार हमें फोन मिला लें, तो घंटे भर से पहले रखते ही नहीं. कितनी तारीफ़ें करते हैं, कितना मार्गर्शन देते हैं, वो भी किसी एक को नहीं, सभी लेखिकाओं को…” सुमन बड़ी चालाकी से पासे फेंक रही थी. सरला के भीतर जो आग लग चुकी थी, उसने जो जो जलाया था उसकी गंध सुमन तक भी पहुंच रही थी.
“घंटे भर से बात कर रहे हैं? मैंने उनसे कहा था बाज़ार से ज़रा सब्ज़ी वगैरह ले आओ, तो बोलने लगे, अभी बहुत ज़रूरी लेखन कार्य में व्यस्त हूं, इसलिए अपने कमरे में जा रहा हूं, बिल्कुल डिस्टर्ब नहीं करना…”
“बस ऐसे ही मूडी हैं वे… ‘पति के मन का ऊंट कब किस करवट बैठ जाए, ख़ुद पति भी नहीं जान पाता, पत्नी भला कैसे जान पाएगी… उन्हीं की एक कहानी की पंक्ति है, मुझे बड़ी पसंद है…” सुमन ने हंसते हुए कहा. “वैसे भी व्यक्तिगत हित से ज़्यादा परहित ज़्यादा भाता है उन्हें… संत आदमी जो ठहरे… दे रहें होंगे कुछ ज्ञान पारूल को.”
“आए बड़े संत…” सरला बुदबुदाई. “अच्छा अभी फोन रखती हूं फिर बात करते हैं.” सरला ने जिस ताव में फोन काटा सुमन समझ चुकी थी अब ये बम जाकर सीधा ‘साहेब’ पर फटेगा. उसके मुंह से हंसते हुए बरबस निकल पड़ा, “ऐ साहेब तेरी साहिबी आज लुटी बेभाव…”
उस दिन के बाद से सुमन के मोबाइल पर निखिल ने कभी सचिन ‘साहेब’ नाम से फोन घनघनाता नहीं सुना.

Deepti Mittal
दीप्ति मित्तल

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तभी शाहिद की बेटी रजिया रोते हुए आईसीयू की ओर बढ़ी, लेकिन दरवाज़े के पास पहुंच कर उसके कदम थम गए. सालों पहले घटी घटना उसे याद आ गई. उसके अब्बू ने उससे संबंध तोड़ लिए थे. उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि अब उनकी कोई बेटी नहीं है.

शाहिद को कार्डियाक सर्जिकल ऑपरेशन थिएटर से बाहर लाया गया. शाहिद को ऑपरेशन के समय दिए गए एनेस्थेसिया का असर अभी भी था. अभी वह पूरी तरह से होश में नहीं आया था. उसे कार्डियाक आईसीयू में भर्ती कर दिया गया.


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तभी शाहिद की बेटी रजिया रोते हुए आईसीयू की ओर बढ़ी, लेकिन दरवाज़े के पास पहुंच कर उसके कदम थम गए. सालों पहले घटी घटना उसे याद आ गई. उसके अब्बू ने उससे संबंध तोड़ लिए थे. उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि अब उनकी कोई बेटी नहीं है. क्योंकि रजिया ने आठ साल पहले एक हिंदू लड़के से प्रेमविवाह कर लिया था. जबकि उसके अब्बू इसके सख्त विरोधी थे. फिर भी रजिया आईसीयू में जा कर अब्बू के बेड के पास बैठ गई.
थोड़ी देर बाद शाहिद को होश आया. रजिया को देख कर उन्हें ग़ुस्सा आ गया. अपना मुंह फेर कर उन्होंने कहा, “तू हट जा मेरे सामने से. मैं तेरा मुंह नहीं देखना चाहता. अगर तू ने किसी मुस्लिम लड़के से प्यार किया होता, तो मैं ख़ुशी-ख़ुशी तेरा निकाह उसके साथ करा देता. पर तू ने एक काफ़िर से निकाह किया है, इसलिए अब तेरा और मेरा कोई रिश्ता नहीं रहा.”
“अब्बा, आप भले ही मेरा और मेरे पति आशीष के हिंदू होने का विरोध करें, मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है. परंतु आप एक बात याद रखिएगा, आप के अंदर जो हृदय धड़क रहा है, वह एक हिंदू का ही है. आपके शरीर में धड़कने वाला हृदय आशीष के चचेरे भाई राकेश का है. उनका एक्सीडेंट होने की वजह से डॉक्टर ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया था, इसलिए उनका हृदय आपको प्रत्यारोपित कर दिया गया है.”


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यह सुनकर शाहिद रजिया को गले से लगाकर रोने लगे. अभी तक वह जिस जाति-धर्म को मान रहे थे, वास्तव में वह कुछ नहीं होता. अब तक वह जो नहीं समझ पाए थे, आज उनकी लाड़ली बेटी रजिया ने समझा दिया था.

वीरेंद्र बहादुर सिंह

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