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काफ़ी सालों पहले की बात है. एक गांव में किशन नाम का एक गरीब किसान रहता था. वह काफ़ी मेहनत करता था लेकिन फिर भी उसका गुज़र-बसर बड़ी मुश्किल से हो रहा था. वो गांव के एक ज़मींदार के खेत पर काम करके किसी तरह अपना घर चला रहा था.

एक वक्त था जब किशन की हालत ऐसी नहीं थी. पहले किशन के भी खेत थे, लेकिन उसके पिता के बीमार होने के कारण उसे अपने सारे खेत बेचने पड़े. मज़दूरी में मिलने वाले पैसों से पिता का इलाज कराना और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था.

उसका हर दिन इसी सोच में गुज़र जाता कि कैसे घर की स्थिति को बेहतर किया जाए. एक दिन सुबह-सुबह ऐसे ही सोचते-सोचते वो ज़मींदार के खेत पर काम कर रहा था कि अचानक खुदाई करते-करते उसकी कुदाल किसी धातु से टकराई और तेज़ आवाज़ हुई. किशन ने सोचा कि आखिर ऐसा क्या है यहां ज़रा देखा जाए. उसने उस हिस्से को खोदना शुरू किया तो देखा एक बड़ा-सा पतीला है. पतीला देखकर किशन दुखी हो गया, क्योंकि किशन ने सोचा कि पतीले की जगह अगर गहने या ज़ेवरात होते तो उसके घर की हालत थोड़ी सुधर जाती. फिर किशन ने सोचा कि चलो, अब खाना ही खा लेता हूं. खाना खाने के लिए किशन ने अपने हाथ की कुदाल उस पतीले में ही फेंक दी और हाथ-मुंह धोकर खाना खाने लगा. खाना खाने के बाद जब किशन अपनी कुदाल उठाने के लिए उस पतीले के पास पहुंचा, तो वो हैरान हो गया. उस पतीले के अंदर एक नहीं, बल्कि बहुत सारे कुदाल थे. उसे कुछ समझ नहीं आया. तभी उसने अपने पास रखी एक टोकरी को भी उस पतीले में फेंक दिया. वो एक टोकरी भी पतीले के अंदर जाते ही बहुत सारी हो गईं. ये सब देखकर किशन खुश हो गया और उस चमत्कारी जादुई पतीले को अपने साथ घर लेकर चला आया.

अब वो रोज़ उस चमत्कारी पतीले में अपने कुछ औज़ार डालता और जब वो ज़्यादा हो जाते, तब उन्हें बाज़ार जाकर बेच आता. ऐसा करते-करते किशन ने काफ़ी पैसे कमाए और उसके घर की हालत सुधरने लगी. उसने अपने पिता का इलाज भी करवा लिया. एक दिन किशन ने कुछ गहने खरीदें और उन्हें भी पतीले में डाल दिया. वो गहने भी बहुत सारे बन गए. धीरे-धीरे किशन काफ़ी धनवान होने लगा और उसने ज़मींदार के यहां मज़दूरी करना भी छोड़ दिया.

किशन को इस तरह अमीर होते देख ज़मींदार मोहन को किशन पर शक़ हुआ और वो सीधे किशन के घर जा धमका. वहां उसे जादुई पतीले के बारे में पता चला. उसने किशन से पूछा- तुमने यह पतीला कब और किसके घर से चुराया सच-सच बताओ?

किशन सहम गया और डरी हुई आवाज़ में बोला- ये चमत्कारी पतीला मुझे खेत में खुदाई के समय मिला था. मैंने किसी के घर चोरी नहीं की है. बस फिर क्या था. खेत में खुदाई की बात सुनते ही ज़मींदार बोला- यह पतीला जब मेरे खेत से मिला, तो यह मेरा हुआ.

किशन ने जादुई पतीला ना लेकर जाने की बहुत मिन्नते कीं, लेकिन ज़मींदार मोहन ने उसकी एक नहीं सुनी और वो ज़बरदस्ती अपने साथ वो जादुई पतीला लेकर चला गया.

ज़मींदार ने भी किशन की ही तरह उसमें अलग-अलग सामान डालकर उन्हें बढ़ाना शुरू किया. एक दिन ज़मींदार ने अपने घर में मौजूद सारे गहने एक-एक करके उस पतीले में डाल दिए और रातोंरात वो और भी ज़्यादा धनवान हो गया.

यूं अचानक एकदम से ज़मींदार के इतने अधिक अमीर होने की खबर नगर के राजा तक भी पहुंच गई. पता लगाने पर राजा को भी जादुई पतीले की जानकारी मिली. राजा ने तुरंत अपने लोगों को भेजकर ज़मींदार के पास से वो चमत्कारी पतीला राजमहल मंगवा लिया.

उस जादुई पतीले के राजमहल में पहुंचते ही राजा ने अपने आसपास मौजूद तमाम क़ीमती सामान उसमें डालना शुरू दिया. सामान को बढ़ता देखकर राजा दंग रह गया. राजा ने सोचा कि देखने में तो ये पतीला बड़ा साधारण सा दिखता है, लेकिन इसके अंदर ज़रूर कुछ असाधारण होगा. बस फिर क्या था वो ललची राजा खुद उस पतीले के अंदर चला गया और देखते-ही-देखते उस पतीले से बहुत सारे राजा निकल आए. अब पतीले से निकला हर राजा बोलने लगा- मैं इस नगर का असली राजा हूं, तुम्हें तो इस जादुई पतीले ने बनाया है. ऐसा होते-होते सारे राजा आपस में ही लड़ने लगे और उनकी इस भयानक लड़ाई में सभी राजा लड़कर मर गए. इस लड़ाई के दौरान वो जादुई पतीला भी टूट गया.

जादुई पतीले के कारण राजमहल में हुई इस लड़ाई के बारे में नगर में सबको पता चल गया. जैसे ही ये जानकारी मज़दूर किशन और ज़मींदार को मिली तो उन्होंने राहत की सांस लेकर सोचा कि अच्छा हुआ कि हमने उस जादुई पतीले का इस्तेमाल सही तरीक़े से किया. उस राजा ने अपनी मूर्खता के कारण अपनी जान ही खो दी.

सीख: मूर्खता और लालच का अंत बुरा ही होता है, किसी मूर्ख के पास अच्छी चीज़ कभी नहीं टिकती क्योंकि वो उसका सही इस्तेमाल करने की समझ ही नहीं रखता. इसलिए किसी भी सामान का इस्तेमाल संभलकर करना चाहिए और लालच से बचना चाहिए.

एक बार महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में नीलकेतु नाम का एक व्यक्ति आया. नीलकेतु काफी दुबला पतला सा था. उसने राजा को बताया कि वह नील देश से आया है और विश्व भ्रमण के लिए निकला हुआ है. उसने राजा से ये भी कहा कि वो सारी दुनिया का भ्रमण कर चुका है और सभी जगह घूमने के बाद राजा के दरबार में आया है.

यह सुनकर महाराज काफी खुश हुए और नीलकेतु का विशेष व्यक्ति की तरह स्वागत-सत्कार किया. नीलकेतु को उन्होंने शाही अतिथि घोषित कर दिया. राजा द्वारा किए गए आदर-सत्कार को देखकर नील केतु भी काफी खुश हुआ. नील केतु ने महाराज से कहा कि महाराज मैं ऐसी जगह जानता हूं, जहां पर कई सारी परियां रहती हैं. मैं उनको अपने जादू से यहां पर बुला भी सकता हूं.

महाराज काफ़ी खुश हो गए और नीलकेतु से बोले उसके लिए मुझे क्या करना पड़ेगा? महाराज की बात सुनकर उसने कहा कि आपको रात के वक़्त तालाब के पास आना पड़ेगा महाराज. मैं उनको मनोरंजन और नृत्य के लिए बुला सकता हूं.

महाराज ने नीलकेतु की बात मान ली और रात को अपने घोड़े पर बैठकर तालाब की ओर चल दिए. तालाब पहुंचकर उन्होंने देखा कि पास के ही एक किले के सामने नीलकेतु खड़ा था, महाराज उनके पास गए, तो नीलकेतु ने महाराज का स्वागत किया और कहा कि मैंने सारा इंतज़ाम कर लिया है. सारी परियां किले के अंदर ही मौजूद हैं.

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राजा और नीलकेतु जैसे ही किले के अंदर जाने लगे, तभी कुछ सैनिकों ने नीलकेतु को बंधक बना लिया, महाराज हैरान होकर देखते ही रह गए और वो समझ नहीं पाए कि आख़िर माजरा क्या है? महाराज ने सैनिकों से पूछा कि आप लोगों ने इनको बंधक क्यों बनाया है? तभी क़िले के भीतर से तेनालीरामा आए और बोले मैं बताता हूं महाराज कि हक़ीक़त क्या है. दरअसल यह नीलकेतु कोई यात्री या आम व्यक्ति नहीं है और ना ही यह विश्व भ्रमण करके आया है. यह नीलदेश का रक्षा मंत्री है. इसने आपको धोखे से यहां तक बुलाया है और यह आपको मारना चाहता है.

महाराज आश्चर्यचकित थे और उन्होंने तेनालीरामा का आभार व्यक्त किया और अपनी जान बचाने के लिए धन्यवाद कहा. महाराज ने तेनाली से पूछा कि तुम्हें यह बात कैसे पता चली?

तेनाली ने कहा कि मुझे तो इस पर पहले दिन से शक हो गया था जब यह दरबार में आया था और इसीलिए मैंने कुछ सेवकों को इसकी जासूसी करने के लिए इसके पीछे लगा दिया था और उन जासूसों ने ही मुझे यह खबर दी कि यह आपको मारने के उद्देश्य से यहां पहुंचा है. यह पूरी योजना बनाकर आपको झूठ बोलकर धोखे से मारने के लिए और विजयनगर पर कब्जा करने के उद्देश्य से आया था.

तेनालीरामा की सूझबूझ से महाराज काफ़ी प्रसन्न हुए और उन्होंने एक बार फिर से उनका धन्यवाद दिया.

सीख: किसी भी अपरिचित व अनजान आदमी पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि वो कोई बहुरूपिया भी हो सकता है और आपको धोखा भी दे सकता है. व्यक्ति को पूरी तरह से परखने के बाद ही उस पर विश्वास करना चाहिए. सतर्कता से काम लेना चाहिए.

एक दिन बादशाह अकबर के दरबार की कार्यवाही चल रही थी कि अचानक बादशाह को न जाने क्या सूझी और वो बीरबल के मज़े लेने की सोचने लगे. उन्होंने बीरबल से मसखरी में एक टेढ़ा सवाल पूछा कि बीरबल, बताओ ज़रा कि हथेली पर बाल क्यों नहीं उगते?

सवाल सुनते ही बीरबल की समझ में आ गया कि बादशाह मजाक करना चाहते हैं और उनके मज़े लेना चाहते हैं.

बीरबल फ़ौरन जवाब न देकर सोच में डूबे हुए थे कि बादशाह ने उनको टोका- आज क्या बात है बीरबल, वैसे तो तुम हर सवाल का जवाब तपाक से दे देते हो. आज क्या हो गया?

बीरबल ने शांत मन से कहा- कुछ नहीं हुआ जहांपनाह! मैं तो ये सोच रहा था कि किसकी हथेली पर?

अकबर अपनी हथेली दिखाते हुए बोले कि हमारी हथेली पर बीरबल.

Akbar Aur Birbal Ki Kahani
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बीरबल समझाते हुए बोले- हुज़ूर! आपकी हथेली पर बाल कैसे उगेंगे? आप दिन भर अपने हाथों से उपहार वितरित करते रहते हैं. लगातार घर्षण की वजह से आपकी हथेली पर बाल उगना मुमकिन नहीं.

ठीक है बीरबल, चलो मान लेते हैं, मगर तुम्हारी हथेली पर भी बाल नहीं है. उसका क्या कारण है? अकबर ने सोचा आज बीरबल को पूरी तरह चकरा ही देंगे और उसके खूब मज़े लेंगे.

अकबर के सवाल सुनकर दरबारियों के भी कान खड़े हो गए और उनको भी लगने लगा कि बीरबल आज बुरे फंसे और वो अब अकबर के सवाल का जवाब नहीं दे पाएंगे.

इतने में ही बीरबल ने कहा कि जहांपनाह मेरी हथेली पर बाल इसलिए नहीं क्योंकि मैं हमेशा आपसे इनाम लेता रहता हूं, तो भला मेरी हथेली पर बाल कैसे रहेंगे?

बादशाह यहीं नहीं रुके, तपाक से तीसरा सवाल कर बैठे- हमारी और तुम्हारी बात को जाने दो. हम इनाम देते हैं और तुम लेते रहते हो इसलिए हमारी हथेलियों पर बाल नहीं, लेकिन इन दरबारियों का क्या? ये तो हमसे हमेशा ईनाम नहीं लेते. ऐसे में इनकी हथेलियों पर बाल क्यों नहीं हैं?

सभी दरबारियों को लगा कि इस सवाल पर अब बीरबल फंस गए, आज उनकी हार निश्चित है, वो मन ही मन खुश हो रहे थे कि बीरबल का जवाब हाज़िर था- हुज़ूर! आप ईनाम देते रहते हैं और मैं ईनाम लेता रहता हूं और इसे देख ये सभी दरबारी ईर्ष्या में हाथ मलते रह जाते हैं, इसलिए इनकी हथेली पर भी बाल नहीं है.

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बीरबल वैसे भी अपनी तेज़ बुद्धि, हाज़िरजवाबी और वाक्पटुता के लिए प्रसिद्ध थे. हर बार की तरह इस बार भी बीरबल ने यह साबित कर दिखाया और बीरबल के जवाब से अकबर ख़ुशी से ठहाका लगा उठे, वहीं बाक़ी दरबारी फिर हाथ मलते रह गए.

सीख: ऐसा कोई सवाल नहीं और ऐसी कोई समस्या नहीं, जिसका हल नहीं हो. बस अपनी बुद्धि को हमेशा तेज़ और मन को साफ़ रखें. हाज़िरजवाबी के लिए दिमागी रूप से सतर्क होना बेहद ज़रूरी है. कभी भी कठिन से कठिन प्रश्न देख बिना कोशिश किए हथियार न डालें!

एक गांव में एक धोबी अपने गधे के साथ रहता था. वह अपनी रोज़ी-रोटी के लिए रोज सुबह अपने गधे के साथ लोगों के घरों से गंदे कपड़े लाता और उन्हें धोकर वापस दे आता. वो दिनभर इसी काम में लगा रहता और किसी तरह गुज़र-बसर कर रहा था.

वो गधा भी कई सालों से धोबी के साथ काम कर रहा था और उम्र बढ़ने के साथ व समय के साथ-साथ वह बूढ़ा हो गया था. जिसकी वजह से उसका शरीर भी कमजोर हो चला था, जिस वजह से अब वो ज्यादा कपड़ों का वजन भी नहीं उठा पाता था… उसकी उम्र के चलते उसकी कमजोरी बढ़ती चली जा रही थी.

एक दिन दोपहर के वक्त धोबी अपने गधे के साथ कपड़े धोने घाट जा रहा था. गर्मी बहुत ज़्यादा थी और कड़ी धूप की से दोनों ही बेहाल थे. चलते-चलते धूप और कमजोरी की वजह से अचानक गधे का पैर लड़खड़ाया और वह एक गहरे गड्ढे में गिर गया. इस अचानक हुए घटनाक्रम से धोबी घबरा गया. उसका गधा भी सकते में था और धोबी उसे बाहर निकालने की कोशिश में जुट गया. लेकिन गधा और धोबी दोनों नाकामयाब रहे, हालाँकि बूढ़ा और कमजोर होने पर भी गधे ने भी पूरी ताक़त लगा दी थी पर दोनो असफल हो रहे थे और उनके प्रयास नाकाफ़ी साबित हुए.

धोबी और गधे की ऐसी हालत देख को गांव वाले भी उसकी मदद के लिए पहुंच गए, लेकिन कोई भी उसे गड्ढे से बाहर नहीं निकाल पाया. तब सभी को यही लगा कि अब कुछ माहिर हो सकता और गांववालों ने धोबी से कहा कि ये गधा तो अब बूढ़ा हो गया है, इसलिए इसको बाहर निकलने की बजाय समझदारी इसी में है कि इस गड्ढे में मिट्टी डालकर उसे यहीं दफना दिया जाए, क्योंकि सारी कोशिशें बेकार हि होंगी. धोबी ने भी सोचा कि ये सब सही कह रहे हैं और वो भी इस बात के लिए तैयार हो गया.

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बस फिर क्या था, गांववालों ने अब गड्ढे में मिट्टी डालनी शुरू कर दी. गधा इससे पहले कि कुछ समझ पाता गांववाले अपना निर्णय ले चुके थे और जैसे ही गधे को समझ आया कि उसके साथ क्या हो रहा है, तो वहकुछ देर चिल्लाया, बहुत दुखी हुआ और उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे, लेकिन कुछ देर बाद उसने चुप्पी साध ली और वो एकदम चुप हो गया!

लेकिन इसी बीच धोबी की नज़र गड्ढे में फ़ंसे अपने गधे की हरकत पर पड़ी, उसने देखा कि गधा कुछ अजीब सी हरकत कर रहा है. जैसे ही गांव वाले उस पर मिट्टी डालते, वो अपने शरीर से मिट्टी को नीचे गड्ढे में गिरा देता और खुद उस मिट्टी के ऊपर चढ़ जाता. वो लगातार ऐसा करत रहा, यही क्रम चलता रहा, जिससे गड्ढे में मिट्टी तो भरती रही लेकिन गधा बड़ी चतुराई से उस मिट्टी को नीचे अपने ऊपर से झटककर नीचे गिरा देता और खुद उस पर चढ़ते हुए ऊपर आता गया. गांववाले भी ये देख हैरान हो गए और अपने गधे की इस चतुराई को देखकर धोबी भी हैरान रह गया और उसकी आंखें नम हो गईं.

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सीख: कहानी से यही सीख मिलती है कि परिस्थितियाँ भले ही कितनी मुश्किल और नाज़ुक क्यों न हों, अगर बुद्धि, समझदारी और धैर्य से काम लिया जाए तो मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति को भी पार कर सकते हैं. गड्ढा कितना भी गहरा हो यानी परेशानी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसे समझदारी से मिट्टी की तरह हटाकर उससे पार पाने का जज़्बा बनाए रखें, सफलता ज़रूर मिलेगी!

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एक गांव में एक मेहनती और साधारण व्यापारी रहता था. उसके पास एक गधा था. व्यापारी अपने गधे से बहुत प्यार करता था और गधा भी अपने मालिक से प्यार करता था. व्यापारी काफ़ी दयालु और अच्छा इंसान था. लेकिन उसका गधा बेहद आलसी और कामचोर था. उसे सिर्फ खाना और आराम पंसद था. वो व्यापारी रोज़ सुबह अपना सामान गधे पर रखकर बाज़ार ले जाता और शाम को बचा हुआ सामान वापस ले आता, लेकिन गधे को काम करना बिल्कुल पसंद नहीं था.

वो व्यापारी हमेशा अलग-अलग चीज़ें बाज़ार में बेचने के लिए ले जाता था. एक दिन व्यापारी को पता चला कि बाज़ार में नमक की बहुत ज़्यादा मांग है और फ़िलहाल नमक का व्यापार करने में अधिक फायदा है, तो व्यापारी ने निर्णय लिया कि अब वो नमक ही बेचेगा.

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व्यापारी ने अगले दिन गधे की पीठ पर नमक की बोरियां लादी और बाज़ार की तरफ चल पड़ा. नमक की बोरियां बहुत भारी थीं, जिससे गधे को चलने में परेशानी हो रही थी, लेकिन किसी तरह गधा नमक की बोरियां लेकर आधे रास्ते तक आ गया.

बाज़ार जाने के रास्ते में ही बीच में एक नदी पड़ती थी, जिस पर पुल बना हुआ था, गधा जैसे ही नदी पार करने के लिए उस पुल पर चढ़ा तो लड़खड़ाकर सीधे नदी में जा गिरा. व्यापारी बहुत घबरा गया और उसने जल्दी से गधे को नदी से किसी तरह बाहर निकाला. जब गधा नदी से बाहर आया, तो उसे महसूस हुआ कि पीठ पर लदी बोरियां हल्की हो गई हैं. क्योंकि उन बोरियों में से ज्यादातर नमक पानी में घुल चुका था.

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आलसी गधे को अब अपना वज़न कम करने की तरकीब सूझ गई. वह अब रोज़ नदी में जानबूझकर गिरने लगा. जिससे नमक नदी के पानी में घुल जाता और बोरियों का भार हल्का हो जाता. लेकिन गधे की इस हरकत से व्यापारी को नुकसान उठाना पड़ रहा था. व्यापारी गधे की इस चालाकी को समझ गया. व्यापारी ने सोचा कि इस गधे को सबक़ सिखाना ही पड़ेगा.

व्यापारी ने एक तरकीब निकाली और अगले दिन गधे पर रूई की बोरियां लाद दीं और बाज़ार की तरफ चलने लगा. जब गधा पुल पर पहुंचा, तो वह फिर से जानबूझकर पानी में गिर गया, लेकिन पानी में गिरने के कारण रूई में पानी भर गया और बोरियों का वज़न पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गया था. पीठ पर लदे वज़न के कारण गधे को बहुत ज़्यादा परेशानी होने लगी. अगले दो-तीन दिनों तक गधा जब भी पानी में गिरता तो उसपर लादा हुआ वज़न दोगुना हो जाता. आखिरकार गधे ने हार मान ली और अब वो चुपचाप बिना पानी में गिरे ही पुल पार करने लगा.

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उसके बाद से व्यापारी जब गधे को लेकर बाज़ार जाने लगा तो गधा चुपचाल बिना नदी में गिरे पुल पार कर लेता. इतना ही नहीं, उसके बाद से गधे ने कभी भी वज़न लादने में आलस नहीं दिखाया. गधे का आलसीपन ख़त्म हो गया था और धीरे-धीरे व्यापारी के सारे नुकसान की भी भरपाई होने लगी.

सीख: इस कहानी से सीख मिलती है कि कभी भी अपने काम से जी नहीं चुराना चाहिए. कर्तव्य का पालन करने में आलस नही करना चाहिए. साथ ही व्यापारी की तरह समझ और सूझ-बूझ से यह सबक़ मिलता है कि अपनी बुद्धि और सूझबूझ से किसी भी काम को आसानी से किया जा सकता है और विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बनाया जा सकता है.

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रोज़ की तरह बादशाह अकबर के दरबार की कार्यवाही चल रही थी, सभी अपनी-अपनी समस्याएं लेकर आ रहे थे, जिनका समाधान बादशाह कर रहे थे. इसी बीच एक दरबारी हाथ में शीशे का एक मर्तबान लिए वहां आया, तो बादशाह ने हैरानी से पूछा कि क्या है इस मर्तबान में ?

वह बोला, महाराज इसमें रेत और चीनी का मिश्रण है.
बादशाह ने पूछा कि वह किसलिए ?

दरबारी ने कहा महाराज मैं माफी चाहता हूं, लेकिन दरबारी हमने बीरबल की बुद्धिमत्ता की इतनी बातें सुनी हैं तो हम बीरबल की क़ाबिलियत को परखना चाहते हैं. हम चाहते हैं कि वह रेत से चीनी का दाना-दाना अलग कर दे लेकिन बिना पानी के प्रयोग के.
बादशाह बीरबल से मुखातिब हुए और मुस्कुराते हुए बोले- बीरबल, रोज ही तुम्हारे सामने एक नई समस्या रख दी जाती, तुम्हें बिना पानी में घोले इस रेत में से चीनी को अलग करना है.
बीरबल ने बड़े आराम से कहा- कोई समस्या नहीं जहांपना, यह तो मेरे बाएं हाथ का काम है.
यह कहकर बीरबल ने वह मर्तबान उठाया और दरबार से बाहर का रुख़ किया. बाकी दरबारी भी पीछे थे.

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बीरबल बाहर बाग में पहुंचकर रुके और मर्तबान से भरा सारा मिश्रण आम के एक बड़े पेड़ के चारों ओर बिखेर दिया.
इस व्यक्ति ने पूछा कि यह तुम क्या कर रहे हो ?
बीरबल ने कहा- यह तुम्हें कल पता चलेगा. इसके बाद सभी दरबार में लौट आए.
अगले दिन सुबह फिर वे सभी उस आम के पेड़ के निकट जा पहुंचे और सब हैरान थे कि वहां अब केवल रेत पड़ी थी, चीनी के सारे दाने चींटियां बटोरकर अपने बिलों में पहुंचा चुकी थीं. कुछ चींटियां अभी भी चीनी के दाने घसीटकर ले जाती दिखाई दे रही थीं.
उस व्यक्ति ने पूछा कि लेकिन सारी चीनी कहां चली गई ?
बीरबल ने धीरे से उसके कान फुसफुसाकर कहा- रेत से अलग हो गई.

यह सुनकर सभी जोरों से हंस पड़े और वह व्यक्ति छोटा सा मुंह लेकर वहां से खिसक लिया.
बादशाह अकबर समेत सभी दरबारी बीरबल की चतुराई का गुणगानकरने लगे.

सीख: अगर कोई गुणी और चतुर है तो उससे सीख लो, ना कि ईर्ष्या करो, क्योंकि किसी को नीचा दिखाने का प्रयास आपके लिए हानिकारक हो सकता है.

मित्र की सलाह
बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में एक धोबी रहता था लेकिन वो बहुत कंजूस था. उसका एक गधा था, धोबी दिनभर उससे काम कराता और वो गधा दिनभर कपडों के गट्ठर इधर से उधर ढोने में लगा रहता. धोबी ना सिर्फ़ कंजूस था बल्कि निर्दयी भी था. अपने गधे को वो भूखा ही रखता था और उसके लिए चारे का प्रबंध नहीं करता था. बस रात को उसे चरने के लिए खुला छोड देता था. लेकिन पास में कोई चरागाह भी नहीं था इसलिए गधा बहुत कमज़ोर और दुर्बल हो गया था.
एक रात वो गधा चारे की तलाश में घूम रहा था तो उसकी मुलाकात एक गीदड़ से हुई. गीदड़ ने उससे पूछा कि वो इतना कमज़ोर क्यों है?
गधे ने अपना दुख उसे बताया कि कैसे उसे दिन भर काम करना पडता है और उसका मालिक उसे खाने को कुछ नहीं देता, इसलिए वो रात को अंधेरे में खाने की तलाश करता रहता है.
गीदड़ बोला, मित्र अब तुम्हें घबराने की बात नहीं, समझो अब तुम्हारे दुःख और भुखमरी के दिन ख़त्म. यहां पास में ही एक बड़ा सब्जियों और फलों का बाग़ है. वहां तरह-तरह की सब्जियां और मीठे फल उगे रहते हैं. हर तरह की सब्ज़ी और फल की बहार है. मैंने बाग़ में घुसने का गुप्त मार्ग भी बना रखा है. मैं तो हर रात अंदर घुसकर छककर खाता हूं. तुम भी मेरे साथ आया करो.
बस फिर क्या था गधा भी गीदड़ के साथ हो लिया और बाग़ में घुसकर महीनों के बाद पहली बार गधे ने भरपेट खाना खाया. अब यह हर रात का सिलसिला हो गया था. दोनों रात भर बाग़ में ही रहये और दिन निकलने से पहले गीदड़ जंगल की ओर चला जाता और गधा अपने धोबी के पास आ जाता.
धीरे-धीरे गधे की कमज़ोरी दूर होने लगी, उसका शरीर भरने लगा, बालों में चमक आने लगी और वो खुश रहने लगा, क्योंकि वो अपनी भुखमरी के दिन बिल्कुल भूल गया था.

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एक रात खूब खाने के बाद गधे का मूड काफ़ी अच्छा हो गया और वो झूमने लगा. वो अपना मुंह ऊपर उठाकर कान फडफडाने लगा और लोटने लगा. गीदड़ को शंका हुई तो उसने चिंतित होकर पूछा कि आख़िर तुम यह क्या कर रहे हो? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना?
गधा बोला आज मैं बहुत खुश हूं और फिर आंखें बंद करके मस्त स्वर में बोला कि मेरा दिल गाना गाने का कर रहा हैं. अच्छा भोजन करने के बाद मैं प्रसन्न हूं. एक गाना तो बनता है. सोच रहा हूं ढेंचू राग गाऊँ!
गीदड़ उसकी बात सुन घबरा गया और उसने तुरंत चेतावनी दी मेरे भाई ऐसा न करना, क्योंकि हम दोनों यहां चोरी कर रहे हैं ऐसे में तुम्हारा गाना सुन माली जाग जाएगा और हम मुश्किल में पड़ जाएँगे. मुसीबत को न्यौता मत दो.
गधे ने गीदड़ को देखा और बोला, तुम जंगली के जंगली ही रहोगे. हम ख़ानदानी गायक हैं, तुम संगीत के बारे में क्या जानो?
गीदड़ ने फिर समझाया कि भले ही मैं संगीत के बारे में कुछ नहीं जानता, लेकिन मैं जान बचाना जानता हूं. तुम ज़िद छोडो, उसी में हम दोनों की भलाई है, वर्ना तुम्हारी ढेंचू सुन के माली जाग जाएगा.

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गधे ने गीदड़ की बात का बुरा मानकर कहा, तुम मेरा अपमान कर रहे हो, तुमको मेरा राग बेसुरा लगता है जबकि हम गधे एक लय में रेंकते हैं, जो तुम जैसे मूर्खों की समझ में नहीं आ सकता.
गीदड़ बोला चलो माना कि मैं मूर्ख जंगली हूं लेकिन एक मित्र के नाते मेरी सलाह मानो और अपना मुंह मत खोलो, वर्ना मालिक भी जाग जाएगा.
गधा हंसकर बोला- अरे मूर्ख गीदड़! मेरा राग सुनकर बाग़ के चौकीदार तो क्या, बाग़ का मालिक भी फूलों का हार लेकर आएगा और मेरे गले में डालकर मेरा सम्मान करेगा.

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गीदड़ ने को लगा इस मूर्ख को समझाने से कोई फायदा नहीं, उसने चतुराई से काम लिया और हाथ जोडकर बोला, मेरे प्यारे गधे भाई, मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो गया है, तुम महान गायक हो और मैं तुम्हारे गले में डालने के लिए फूलों की माला लाना चाहता हूं, तुम मेरे जाने के दस मिनट बाद ही गाना शुरू करना, ताकि मैं गाना समाप्त होने तक फूल मालाएं लेकर लौट सकूं.
गधे ने गर्व से सहमति में सिर हिलाया और गीदड़ वहां से जंगल की ओर भाग गया. गधे ने उसके जाने के कुछ समय बाद मस्त होकर रेंकना शुरू किया. उसकी आवाज़ सुनते ही बाग़ के चौकीदार जाग गए और लाठी लेकर दौडे. वहां पहुंचते ही गधे को देखकर चौकीदार बोला, अच्छा तो तू है, तू ही वो दुष्ट गधा है जो हमारा बाग़ में चोरी से फल सब्ज़ी खाता था.
बस उसके बाद गधे पर डंडों की बरसात होने लगी और कुछ ही देर में गधा अधमरा होकर गिरकर बेहोश हो गया!

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि अगर कोई हमारा मित्र हमारी भलाई के लिए कुछ समझाता है, तो उसे मान लेना चाहिए. अपने हितैषियों की सलाह पर गौर करना चाहिए ना कि अपने घमंड में ग़लत रास्ता अपनाकर खुद को मुसीबत में डालना चाहिए! अपनी कमज़ोरियों को पहचानने की क्षमता रखनी चाहिए वर्ना नतीजा बुरा हो सकता है.

काफ़ी समय पहले एक गांव में एक किसान अपनी पत्नी के साथ रहता था. किसान बूढ़ा था, लेकिन उसकी पत्नी जवान थी और इसी वजह से किसान की पत्नी अपने पति से खुश नहीं थी. वो हमेशा दुखी रहती थी, क्योंकि उसके मन में एक युवा साथी का सपना पल रहा था. यही वजह थी कि वो हमेशा बाहर घूमती रहती थी.

उसकी मन की दशा एक ठग भांप गया और वो उस महिला का पीछा करने लगा और एक दिन उस ठग को मौक़ा मिल ही गया. उसने किसान की पत्नी को ठगने के इरादे से एक झूठी कहानी सुनाई. ठग ने कहा- मेरी पत्नी का देहांत हो चुका है और अब मैं अकेला हूं. मैं तुम्हारी सुंदरता पर मोहित हो गया हूं. मैं तुम्हारे साथ ही जीवन यापन करना चाहता हूं और तुम्हें अपने साथ शहर ले जाना चाहता हूं.

Panchatantra Ki Kahani
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किसान की पत्नी यह सुनते ही खुश हो गई. वो तैयार हो गई और झट से बोली- मैं तुम्हारे साथ चलूंगी, लेकिन मेरे पति के पास बहुत धन है. पहले मैं उसे ले आती हूं. उन पैसों से हमारा भविष्य सुरक्षित होगा और हम जीवनभर आराम से रहेंगे. यह सुनकर चोर ने कहा कि ठीक है तुम जाओ और कल सुबह इसी जगह आना मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.

किसान की पत्नी ने सारी तैयारी कर ली. जब उसने देखा कि पति गहरी नींद में है तो उसने सारे गहने और पैसों को पोटली में बांधा और ठग के पास चली गई. दोनों दूसरे शहर की ओर निकल गए. इसी बीच ठग के मन में बार बार यही विचार आता रहा कि इस महिला को साथ ले जाने में ख़तरा है, कहीं इसका पति इसे खोजते हुए पीछे ना आ जाए और मुझ तक पहुंच गया तो ये सारा धन भी हाथ से जाएगा.

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ठग अब उस महिला से पीछा छुड़ाने का उपाय सोचने लगा. तभी रास्ते में एक नदी मिली. नदी को देखते ही ठग को एक तरकीब सूझी और वह महिला से बोला- यह नदी काफ़ी गहरी है, इसलिए इसे मैं तुम्हें पार करवाऊंगा, लेकिन पहले मैं यह पोटली नदी के उस पार रखूंगा फिर तुम्हें साथ ले जाऊंगा, क्योंकि दोनों को साथ ले जाना संभव नहीं. महिला ने ठग पर ज़रा भी शक नहीं किया और वो फ़ौरन मान गई, उसने कहा- हां, ऐसा करना ठीक रहेगा. इसके अलावा ठग ने महिला के पहने हुए गहने भी उतरवा के पोटली में रख लिए, उसने कहा भारी ज़ेवरों के साथ नदी पार करने में बाधा हो सकती है.

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बस फिर क्या था, ठग मन ही मन खुश हुआ और पोटली में बंधा धन लेकर नदी के पार चला गया. किसान की पत्नी उसके लौटने का इंतजार करती रही, लेकिन वो फिर कभी लौटकर नहीं आया. किसान की पत्नी को अपनी बेवक़ूफ़ी पर रोना आने लगा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी. पैसे भी गए, इज़्ज़त भी गई और वो कहीं की ना रही.

सीख : ग़लत कर्मों और धोखेबाज़ी का फल हमेशा बुरा ही होता है. रिश्तों में ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी और ख़ुशी होती है. जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है, जैसी करनी वैसी भरनी!

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पंचतंत्र की कहानी: चूहा और संन्यासी (The Hermit And The Mouse)

बहुत समय पहले की बात है. एक गांव में एक संन्यासी रहता था. वह संन्यासी एकांत में गांव के एक मंदिर में रहता था और लोगों की सेवा करता था. भिक्षा मांगकर जो कुछ भी उसे मिलता, वह उसे उन लोगों को दान कर देता, जो मंदिर के रख-रखाव व साफ़-सफ़ाई करने में उसका सहयोग करते थे.

उस मंदिर में एक शैतान चूहा भी रहता था. वह चूहा अक्सर उस संन्यासी का रखा हुआ अन्न खा जाता था. संन्यासी ने चूहे को कई भगाने की कई कोशिशें कीं, लेकिन वह चकमा देकर छिप जाता.

संन्यासी ने उस चूहे को पकड़ने की भी काफी कोशिश की, लेकिन वह हर बार असफल रहता. एकदिन परेशान होकर संन्यासी अपने एक मित्र के पास गया.

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उसके मित्र ने उसे एक योजना बताई कि चूहे ने मंदिर में अपना कहीं बिल बना रखा होगा और वह वहां अपना सारा खाना जमा करता होगा. अगर उसके बिल तक पहुंचकर सारा खाना निकाल लिया जाए, तो चूहा खुद ही कमज़ोर होकर मर जायेगा.

अब संन्यासी और उसके मित्र ने बिल को खोजना शुरू कर दिया और बहुत ढूंढ़ने के बाद अंत में उनको बिल मिल ही गया जिसमें चूहे ने खूब सारा अन्न चुराकर इकठ्ठा कर रखा था. उन्होंने बिल खोदकर सारा अन्न बाहर निकाल लिया.

अब चूहे को खाना नहीं मिला तो वह कमज़ोर हो गया और संन्यासी ने अपनी छड़ी से कमज़ोर चूहे पर हमला किया. चूहा डरकर तुरंत भाग खड़ा हुआ और फिर कभी मंदिर में नहीं आया.

सीख: अपने शत्रु को परास्त है तो पहले उसकी शक्तियों पर हमला करो. शक्तियां खत्म तो शत्रु स्वयं कमज़ोर पड़ जायेगा.

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