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काफ़ी समय पहले की बात है, एक जंगल में एक खरगोश अपने परिवार के साथ रहता था. खरगोश अपने परिवार के साथ जंगल के जिस इलाक़े में रहता था, वहां आसपास बड़े व ख़तरनाक जानवरों की काफ़ी अधिक संख्या थी. खरगोश और उसका परिवार हमेशा इस बात से सहमे और डरे रहते थे कि कहीं कोई जानवर आकर उन्हें मार न दे या नुकसान न पहुंचाए. इसी वजह से जब भी उन्हें अपने घर के आस-पास हल्की सी भी हलचल दिखाई-सुनाई देती, तो वो फटाफट डर के मारे अपने बिल में छुप जाते थे.

ख़रगोशों पर दूसरे जानवरों का डर इस कदर हावी था कि उनकी आहट तक सुनने भर से कई खरगोशों की डर से ही मौत हो गई थी. रोज़-रोज़ इस डर को सामने देखकर वो खरगोश बेहद परेशान रहने लगा था.

इसी बीच एक दिन घोड़ों का दल उनके घर के पास से गुज़रा और घोड़ों की आवाज़ सुनकर सभी सहम गए. वो सभी हमेशा की तरह अपने बिल में जाकर छुप गए और डर के मारे पूरा दिन कोई भी ख़रगोश बिल से बाहर नहीं निकला. यहां तक कि खाने की तालाश में भी कोई बाहर नहीं गया.

ख़रगोशों और अपने परिवार को इस हालत में देखकर वो खरगोश बहुत दुखी था. उसने भगवान से शिकायत कर उन्हें कोसते हुए कहा कि हे भगवान आपने हमें इतना कमज़ोर क्यों बनाया है? इस तरह सहम और डरकर जीने का आख़िर क्या फायदा? हमें हर दिन अपनी जान का ख़तरा और डर बना रहता है. इसीलिए सभी खरगोशों ने मिलकर एक दुखद फैसला किया कि हर समय डर-डर कर और यूं बिल में छुपकर रहने से तो अच्छा होगा कि हम सब मिलकर अपनी जान ही दे देते हैं. ऐसे डरकर जीने से तो बेहतर होगा कि हम एक साथ अपना जीवन त्याग दें.

बस यही फ़ैसला करके सभी खरगोश इकट्ठे हुए और आत्महत्या करने के लिए नदी की ओर निकल गए. अब खरगोश और उसका पूरा परिवार नदी के पास पहुंच चुके थे. उसी नदी के पास बहुत सारे चूहों के बिल थे. जैसे ही चूहों ने खरगोशों को नदी की ओर आते देखा तो वो सभी डर गए और इधर-उधर भागने लगे. कुछ चूहे बिल में घुस गए, तो कुछ ने तो डर के मारे नदी में ही छलांग लगा दी और उनकी मौत हो गई. इसी वजह से चारों ओर अफरातफरी का माहौल बन चुका था.

चूहों को खुद से यूं डरते हुए देखकर खरगोश और उसका परिवार हैरान हो गया था. उन्हें इस बात का यकीन ही नहीं हो रहा था कि उन्हें देखकर भी कोई इस क़दर दहशत में आ सकता, अब तक वो खुद को ही दुनिया का सबसे कमजोर प्राणी समझते थे और भगवान को कोसते और दोष देते थे.

लेकिन अब खरगोशों को समझ में आ गया था कि ईश्वर ने दुनिया में कई तरह के भिन्न-भिन्न प्राणियों और जीव-जन्तुओं को उनकी अपनी अलग-अलग खासियत के साथ बनाया है. जो जैसा है, उसे वैसे ही स्वीकार करना चाहिए. सबके अपने गुण व दोष हैं. अगर किसी में कमी है, तो उसमें कुछ विशेष गुण भी हैं. न तो हर किसी में एक जैसे गुण हो सकते और न ही एक ही तरह के दोष. अब ख़रगोश अपने गुणों को भी पहचान चुके थे और ये समझ चुके थे कि सिर्फ़ अपने डर और दोष पर ही ध्यान देकर ऐसे डरना और जीवन त्यागना ग़लत फ़ैसला है. ये समझने के बाद खरगोश और उसका परिवार घर वापस अपने घर आ गया.

सीख: अपनी कमज़ोरी और डर को खुद पर कभी हावी न होने दें. भगवान और प्रकृति ने सभी को अलग-अलग ख़ास शक्तियां देकर हर किसी को ख़ास और शक्तिशाली बनाया है. हर कोई अलग-अलग क्षेत्र में माहिर होते. बस ज़रूरत है अपनी शक्तियों और गुणों को पहचानने की और अपनी ताक़त को जानने की.

एक घने जंगल में तीन बैल मिल-जुलकर रहा करते थे. तीनों बैलों में अच्छी दोस्ती थी. वो तीनों सारे काम एक साथ मिलकर करते थे. जंगल में घास चरने के लिए भी वो एक साथ ही जाया करते थे. उसी जंगल में एक खूंखार शेर भी रहता था और इस शेर की कई दिनों से इन तीनों बैल पर नज़र थी. वह इन तीनों को मारकर खा जाना चाहता था, लेकिन वो ये भी जानता था कि जब तक इनकी दोस्ती है और ये तीनों एकजुट हैं तब तक वो अपने मनसूबों में कामयाब नहीं हो सकता, क्योंकि उसने कई बार बैलों पर आक्रमण भी किया, लेकिन बैलों की आपसी मित्रता के कारण वो कभी सफल नहीं हो पाया. जब शेर उन पर हमला करता था, तो तीनों बैल शेर को घेरकर अपने नुकीले सींगों से अपनी रक्षा करते थे.

वो तीनों बैल काफ़ी हट्टे-कट्टे भी थे और ऐसे में तीनों बैल साथ मिलकर कई बार शेर को भगा चुके थे, लेकिन शेर अपने अपमान का बदला लेने को व्याकुल था और वो किसी भी तरह उन तीनों को खाना चाहता था.

शेर ने एक तरकीब निकाली और एक दिन इन तीनों को अलग करने के लिए एक चाल चली. शेर ने बैलों को अलग करने के लिए जंगल में एक अफवाह फैला दी कि इन तीनों बैलों में से एक बैल अपने साथियों को धोखा दे रहा है. उन बैलों तक जब ये अफ़वाह पहुंची तो उनके बीच इस बात को लेकर शक पैदा हों गया और वो सोचने लगे कि आखिर वो कौन है, जो हमें धोखा दे रहा है?

बस फिर क्या था, दोस्ती में दरार आनी शुरू हो गई और एक दिन इसी बात को लेकर तीनों बैलों में झगड़ा हो गया. शेर अपनी चाल में कामयाब हो चुका था. उनकी दोस्ती टूट चुकी थी और अब तीनों बैल अलग-अलग रहने लगे थे. वो अलग-अलग ही जंगल में चरने जाने लगे थे.

शेर को तो इसी मौके का इंतजार था. शेर ने उन तीनों बैलों में से एक पर हमला बोल दिया. वो बैल अकेला था इसलिए शेर का मुकाबला नहीं कर पाया और शेर उसे मारकर खा गया. कुछ दिनों के बाद शेर ने दूसरे बैल पर भी हमला कर दिया और उसे मारकर खा गया और ऐसा ही उसने तीसरे बैल के साथ भी किया. शेर ने तीनों बैलों की दोस्ती तोड़कर उन्हें अपना शिकार बना लिया था और वो अपनी चाल में कामयाब हो गया था.

सीख : कभी भी दूसरों की बातों में नहीं आना चाहिए और किसी भी बात पर आंख मूंदकर भरोसा करने से पहले उस बात की जांच-परख कर लेनी चाहिए. साथ ही इस बात में भी सच्चाई है कि एकता में बड़ी ताकत होती है. हमें हमेशा आपस में मिलकर रहना चाहिए, अपनों पर शक करने से पहले उसके परिणाम सोच लेने चाहिए.

एक बार बादशाह अकबर के दरबार में एक व्यक्ति नौकरी मांगने पहुंचा. कुछ देर उसकी बातें सुनने और बुद्धि की परीक्षा लेने के बाद बादशाह ने उसे चुंगी वसूलने वाला अधिकारी बना दिया.

बीरबल भी उस वक्त दरबार में मौजूद थे। और उन्होंने भी सब देखा-सुना. बीरबल ने कुछ देर ध्यान से उस आदमी को देखा और उसके जाने के बाद कहा कि महाराज यह व्यक्ति कुछ ज्यादा ही चालाक लग रहा है. मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह जल्द ही कुछ-न-कुछ बेईमानी जरूर करेगा.

ख़ैर, कुछ समय गुजरा और अब उस व्यक्ति ने टैक्स वसूलने का काम पूरी तरह संभाल लिया था. सब कुछ उसने अपने हाथों में ले लिया था. एक दिन बादशाह अकबर के पास कुछ लोग उस अधिकारी की शिकायत लेकर आए. धीरे-धीरे उसकी शिकायतें बढ़ने लगीं, पर शिकायतें मामूली थीं, इसलिए उनपर ज्यादा किसी ने ध्यान नहीं दिया.

लेकिन अब उस आदमी पर लोगों को परेशान करने और रिश्वत लेने के आरोप भी लगने लगे थे और इन इतनी शिकायतों के बाद बादशाह ने सोचा कि इसका तबादला ऐसी जगह कर देता हूं, जहां इसे बेईमानी करने का मौका ही न मिले.

बादशाह ने फैसला किया कि उसे अस्तबल का मुंशी बनाया जाएगा. अकबर ने सोचा कि घोड़ों की लीद उठवाने के काम में ये क्या ही बेईमानी कर पाएगा भला?

वहां मुंशी के पद पर पहुंचते ही उस व्यक्ति ने फिर रिश्वत लेना शुरू कर दिया. उसने घोड़े की देखभाल करनेवालों को धमकाया कि तुम लोग घोड़ों को कम दाना-पानी खिलाते हो, इसलिए मुझे लीद को तोलने के लिए भेजना होगा. अब अगर लीद का वजन कम हुआ, तो सबकी शिकायत बादशाह से कर दूंगा. इस तरह से उस मुंशी से परेशान होकर हर घोड़े के हिसाब से उसे एक रुपये लोगों ने देना शुरू कर दिया.

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कुछ समय बाद यह बात भी अकबर तक पहुंच गई और उन्होंने मुंशी को सीधे यमुना की लहरें गिनने का कार्य सौंप दिया. बादशाह को यक़ीन था कि यहां तो यह कोई बेईमानी कर ही नहीं पाएगा.

कुछ ही दिनों में जैसे ही वो व्यक्ति यमुना किनारे पहुंचा, तो वहां भी उसने अपना बेईमान और चालाक दिमाग दौड़ा लिया. वो नाव से सवारी करने वालों को रोक-रोककर कहता कि मैं लहरें गिन रहा हूं, ऐसे में तुम लोग यहां से नहीं निकल सकते हो, इसी जगह पर दो-तीन दिन तक रुकना होगा. रोज-रोज ऐसी बातें सुनकर नाव चलाने वालों ने अपने कार्य को जारी रखने के लिए उसे दस-दस रुपये की रिश्वत देना शुरू कर दिया.

यमुना किनारे भी वो व्यक्ति खूब बेईमानी कर रहा था. कुछ समय बाद यह बात भी बादशाह तक पहुंच गई. तभी अकबर ने एक लिखा हुआ आदेश भिजवाया- नाव को रोको मत, जाने दो.

वो व्यक्ति शातिर था, उसने बादशाह के आदेश वाले पत्र को- नावों को रोको, मत जाने दो… कर दिया. इस थोड़ी हेरफेर के बाद उसने अकबर का आदेश वहां टंगवा दिया. आखिर में उससे परेशान होकर बादशाह ने उसे नौकरी से ही निकाल दिया.

बादशाह को अब बीरबल की बात याद आ गई कि ये आदमी बेईमानी जरूर करेगा और उन्होंने सोचा कि बीरबल एकदम सही था और मुझे पहली गलती में ही इस व्यक्ति को कठोर दंड देना चाहिए.

सीख : चोर चोरी से जाए पर हेराफेरी से न जाए, यह बात एकदम सही है. बेईमान व्यक्ति अपनी बेईमानी कहीं भी जाने पर नहीं छोड़ता है और दुष्ट अपनी दुष्टता से कभी बाज़ नहीं आता.

काफ़ी सालों पहले की बात है. एक गांव में किशन नाम का एक गरीब किसान रहता था. वह काफ़ी मेहनत करता था लेकिन फिर भी उसका गुज़र-बसर बड़ी मुश्किल से हो रहा था. वो गांव के एक ज़मींदार के खेत पर काम करके किसी तरह अपना घर चला रहा था.

एक वक्त था जब किशन की हालत ऐसी नहीं थी. पहले किशन के भी खेत थे, लेकिन उसके पिता के बीमार होने के कारण उसे अपने सारे खेत बेचने पड़े. मज़दूरी में मिलने वाले पैसों से पिता का इलाज कराना और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था.

उसका हर दिन इसी सोच में गुज़र जाता कि कैसे घर की स्थिति को बेहतर किया जाए. एक दिन सुबह-सुबह ऐसे ही सोचते-सोचते वो ज़मींदार के खेत पर काम कर रहा था कि अचानक खुदाई करते-करते उसकी कुदाल किसी धातु से टकराई और तेज़ आवाज़ हुई. किशन ने सोचा कि आखिर ऐसा क्या है यहां ज़रा देखा जाए. उसने उस हिस्से को खोदना शुरू किया तो देखा एक बड़ा-सा पतीला है. पतीला देखकर किशन दुखी हो गया, क्योंकि किशन ने सोचा कि पतीले की जगह अगर गहने या ज़ेवरात होते तो उसके घर की हालत थोड़ी सुधर जाती. फिर किशन ने सोचा कि चलो, अब खाना ही खा लेता हूं. खाना खाने के लिए किशन ने अपने हाथ की कुदाल उस पतीले में ही फेंक दी और हाथ-मुंह धोकर खाना खाने लगा. खाना खाने के बाद जब किशन अपनी कुदाल उठाने के लिए उस पतीले के पास पहुंचा, तो वो हैरान हो गया. उस पतीले के अंदर एक नहीं, बल्कि बहुत सारे कुदाल थे. उसे कुछ समझ नहीं आया. तभी उसने अपने पास रखी एक टोकरी को भी उस पतीले में फेंक दिया. वो एक टोकरी भी पतीले के अंदर जाते ही बहुत सारी हो गईं. ये सब देखकर किशन खुश हो गया और उस चमत्कारी जादुई पतीले को अपने साथ घर लेकर चला आया.

अब वो रोज़ उस चमत्कारी पतीले में अपने कुछ औज़ार डालता और जब वो ज़्यादा हो जाते, तब उन्हें बाज़ार जाकर बेच आता. ऐसा करते-करते किशन ने काफ़ी पैसे कमाए और उसके घर की हालत सुधरने लगी. उसने अपने पिता का इलाज भी करवा लिया. एक दिन किशन ने कुछ गहने खरीदें और उन्हें भी पतीले में डाल दिया. वो गहने भी बहुत सारे बन गए. धीरे-धीरे किशन काफ़ी धनवान होने लगा और उसने ज़मींदार के यहां मज़दूरी करना भी छोड़ दिया.

किशन को इस तरह अमीर होते देख ज़मींदार मोहन को किशन पर शक़ हुआ और वो सीधे किशन के घर जा धमका. वहां उसे जादुई पतीले के बारे में पता चला. उसने किशन से पूछा- तुमने यह पतीला कब और किसके घर से चुराया सच-सच बताओ?

किशन सहम गया और डरी हुई आवाज़ में बोला- ये चमत्कारी पतीला मुझे खेत में खुदाई के समय मिला था. मैंने किसी के घर चोरी नहीं की है. बस फिर क्या था. खेत में खुदाई की बात सुनते ही ज़मींदार बोला- यह पतीला जब मेरे खेत से मिला, तो यह मेरा हुआ.

किशन ने जादुई पतीला ना लेकर जाने की बहुत मिन्नते कीं, लेकिन ज़मींदार मोहन ने उसकी एक नहीं सुनी और वो ज़बरदस्ती अपने साथ वो जादुई पतीला लेकर चला गया.

ज़मींदार ने भी किशन की ही तरह उसमें अलग-अलग सामान डालकर उन्हें बढ़ाना शुरू किया. एक दिन ज़मींदार ने अपने घर में मौजूद सारे गहने एक-एक करके उस पतीले में डाल दिए और रातोंरात वो और भी ज़्यादा धनवान हो गया.

यूं अचानक एकदम से ज़मींदार के इतने अधिक अमीर होने की खबर नगर के राजा तक भी पहुंच गई. पता लगाने पर राजा को भी जादुई पतीले की जानकारी मिली. राजा ने तुरंत अपने लोगों को भेजकर ज़मींदार के पास से वो चमत्कारी पतीला राजमहल मंगवा लिया.

उस जादुई पतीले के राजमहल में पहुंचते ही राजा ने अपने आसपास मौजूद तमाम क़ीमती सामान उसमें डालना शुरू दिया. सामान को बढ़ता देखकर राजा दंग रह गया. राजा ने सोचा कि देखने में तो ये पतीला बड़ा साधारण सा दिखता है, लेकिन इसके अंदर ज़रूर कुछ असाधारण होगा. बस फिर क्या था वो ललची राजा खुद उस पतीले के अंदर चला गया और देखते-ही-देखते उस पतीले से बहुत सारे राजा निकल आए. अब पतीले से निकला हर राजा बोलने लगा- मैं इस नगर का असली राजा हूं, तुम्हें तो इस जादुई पतीले ने बनाया है. ऐसा होते-होते सारे राजा आपस में ही लड़ने लगे और उनकी इस भयानक लड़ाई में सभी राजा लड़कर मर गए. इस लड़ाई के दौरान वो जादुई पतीला भी टूट गया.

जादुई पतीले के कारण राजमहल में हुई इस लड़ाई के बारे में नगर में सबको पता चल गया. जैसे ही ये जानकारी मज़दूर किशन और ज़मींदार को मिली तो उन्होंने राहत की सांस लेकर सोचा कि अच्छा हुआ कि हमने उस जादुई पतीले का इस्तेमाल सही तरीक़े से किया. उस राजा ने अपनी मूर्खता के कारण अपनी जान ही खो दी.

सीख: मूर्खता और लालच का अंत बुरा ही होता है, किसी मूर्ख के पास अच्छी चीज़ कभी नहीं टिकती क्योंकि वो उसका सही इस्तेमाल करने की समझ ही नहीं रखता. इसलिए किसी भी सामान का इस्तेमाल संभलकर करना चाहिए और लालच से बचना चाहिए.

बहुत समय पहले की बात है, हिम्मतनगर नाम के एक गांव में दो मित्र रहते थे, जिनका नाम धर्मबुद्धि और पापबुद्धि था. धर्मबुद्धि सीधा-साधा ईमानदार और नेक इंसान था और पापबुद्धि बेहद धूर्त और चालाक था. पापबुद्धि के चालक मन में एक दिन ये ख्याल आया कि मैं धर्मबुद्धि के साथ दूसरे नगर जाकर ढेर सारा धन कमाऊंगा और किसी ना किसी तरीके से वह सारा धन धर्मबुद्धि से हड़प लूंगा और आगे का सारा जीवन बड़े ही सुख-चैन से बिताऊंगा.

उसने किसी ना किसी तरीके से धर्मबुद्धि को अपने साथ चलने के लिए तैयार कर लिया और फिर दोनों अन्य नगर के लिए निकल गए. जाते समय वे अपने साथ ढेर सारा सामान लेकर गए थे और उसे अन्य नगरी में मुंह मांगे दामों में बेचकर खूब पैसा और स्वर्ण मुद्राएं इकट्ठी कर ली. दोनों ख़ुशी-ख़ुशी अपने गांव की ओर लौटने लगे.

गांव से पास पहुंचने पर बस कुछ दूर पहले ही पाप बुद्धि ने धर्म बुद्धि से कहा- अगर हम इतना सारा धन एक साथ गांव में ले जाएंगे तो हो सकता है कि गांव वाले हमसे कुछ धनराशि कर्ज के रूप में ले लें या हो सकता है कि लोग हमसे जलने लगें या फिर कोई चोर इस धन को हमसे चुरा ले. इसलिए हमें इस धन को किसी सुरक्षित स्थान पर छुपा देना चाहिए. इतना सारा धन एक साथ देखने पर तो किसी साधु-संन्यासी, योगी-महात्मा का मन भी डोल सकता है.

धर्मबुद्धि ने पापबुद्धि की बात से सहमति जताई और दोनों ने जंगल में एक सुरक्षित जगह खोजी और एक पेड़ के नीचे गड्ढा खोदकर उसमें धन को छिपा दिया. इसके बाद दोनों गांव चले गए.

एक रात पापबुद्धि ने मौका पाकर जंगल में जाकर वो सारा धन निकाल लिया और अपने साथ ले गया. धर्मबुद्धि इस बात से अनजान था और कई दिन बीत जाने के बाद वो पापबुद्धि के पास आया और बोला- भाई मुझे धन की आवश्यकता आ पड़ी है, आप चलो मेरे साथ तो हम दोनों उस गाढ़े हुए धन को निकाल लाते हैं. पापबुद्धि तैयार हो गया.

दोनों ने जब इस पेड़ के पास से मिट्टी हटाई तो वहां पर कुछ नहीं था. पापबुद्धि ने सीधे-सीधे धर्मबुद्धि पर धन चुराने का आरोप लगा दिया. इस बात पर दोनों में बहस होने लगी और फिर जब दोनों में झगड़ा बढ़ा तो दोनों न्यायाधीश के पास पहुंचे.

दोनों से कहा गया कि वो अपना पक्ष रखें. इसके बाद न्यायाधीश ने सच्चाई का पता लगाने के लिए दिव्य परीक्षा लेने का निर्णय लिया और दोनों से कहा कि वो जलती हुई आग में हाथ डालें. पापबुद्धि ने इसका विरोध किया और कहा कि आग में हाथ डालने की ज़रूरत नाहीं है, सच्चाई की गवाही तो वन देवता देंगे. न्यायाधीश तैयार हो गए.

धूर्त पापबुद्धि ने पहले ही एक खोखले वृक्ष के तने में अपने पिता को बैठा दिया था. जब उस पेड़ के पास पहुंच कर न्यायाधीश ने वन देवता से पूछा कि दोनों में से चोर कौन है तो पेड़ के तने से आवाज़ आई कि चोर धर्मबुद्धि है.

धर्मबुद्धि ने जब यह सुना तो उसने उस पेड़ के नीचे आग लगा दी. थोड़ी देर में जब आग बढ़ने लगी तो पापबुद्धि का पिता भी जलने लगा और कुछ देर में आग से झुलसने के कारण पापबुद्धि का पिता रोने-चिल्लाने लगा और वो तड़पते हुए उस पेड़ से बाहर निकल आया वो भी एकदम झुलसा हुआ और उसने न्यायाधीश के सामने पापबुद्धि की सारी योजना का खुलासा कर दिया.

सच्चाई सामने आने पर न्यायाधीश ने पापबुद्धि को मौत कि सज़ा सुनाई.

सीख: लालच बुरी बला है और उससे भी बुरा है अपनों के साथ धोखा और विश्वासघात करना. इन बुराइयों से दूर रहें और ईमानदारी व सच्चाई के साथ चलें.

बीरबल अक्सर अकबर को बहुत सी बातें बताया करते थे उसी में से एक कहावत बीरबल ने काफ़ी पहले राजा अकबर को सुनाई थी. एक दिन दोपहर में राजा अकबर अपने दरबार में बैठे कि अचानक उन्हें बीरबल की बताई वो बात याद आ गई. बीरबल ने उन्हें एक कहावत सुनाई थी- खाकर लेट जा और मारकर भाग जा- ये एक सयाने मनुष्य की निशानी होती है.

राजा ने सोचा कि अभी दोपहर का समय है. ज़रूर बीरबल खाने के बाद लेटने की तैयारी में होगा. क्यों न आज उसकी बात को गलत साबित किया जाए. यह सोचकर उन्होंने एक सेवक को सारी बात समझाई और आदेश दिया कि बीरबल को इसी वक्त फ़ौरन दरबार में उपस्थित होने का संदेश दिया जाए.

सेवक राजा का आदेश लेकर बीरबल के पास पहुंचा और बीरबल अभी खाना खाकर बैठे ही थे. बीरबल वो आदेश सुनते ही के राजा की मंशा समझ गए. उन्होंने सेवक से कहा- तुम थोड़ी देर रुको मैं कपड़े बदलकर तुम्हारे साथ ही चलता हूं.

बीरबल ने अपने लिए एक चुस्त तंग पजामा चुना. पजामा चुस्त था तो उसे पहनने के लिए उन्हें बिस्तर पर लेटना पड़ा. बीरबल पजामे को पहनने के बहाने कर काफ़ी देर बिस्तर पर लेटे रहे और फिर सेवक के साथ दरबार की ओर चल दिए.

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राजा बड़ी बेसब्री से दरबार में बीरबल की ही राह देख रहे थे और उनके वहां पहुंचते ही राजा ने पूछा- क्यों, आज खाने के बाद लेटे थे या नहीं? बीरबल बोले- जी महाराज, ज़रूर लेटा था. यह सुनकर राजा को बहुत गुस्सा आया और क्रोधित स्वर में उन्होंने बीरबल से पूछा- इसका मतलब यह है कि तुमने मेरे आदेश की अवहेलना कर मेरा अपमान किया. तुम उसी समय मेरे सामने क्यों उपस्थित नहीं हुए? इसके लिए मैं तुम्हें सज़ा दूंगा.

बीरबल ने भी फ़ौरन जवाब दिया, नहीं महाराज. आपके आदेश की अवहेलना नहीं की मैंने. कपड़े बदलकर मैं फ़ौरन आपके पास ही आया हूं. हां, ये सच है कि मैं थोड़ी देर लेटा था, क्योंकि मुझे इस तंग पजामे को पहनने के लिए बिस्तर पर लेटना पड़ा था, आपको मुझ पर यकीन न हो तो आप सेवक से इस बारे में पूछ सकते हैं. बीरबल ने मुस्कुराते हुए सहज भाव से कहा तो बीरबल की बात को सुनकर बादशाह अकबर हंसे बिना रह न सके और उन्होंने बीरबल को दरबार से जाने दिया.

सीख: चतुराई, धैर्य और शांत मन से परिस्थिति को समझते सही कदम उठाया जाए तो हम बड़ी से बड़ी मुसीबत से बच सकते हैं.

काफ़ी समय पहले की बात है, दिनपुर गांव में सोहन नाम का एक मिठाई वाला था. वो गांव जितना खूबसूरत था उतनी ही प्रसिद्ध थी सोहन की मिठाई की दुकान. लगभग पूरा गांव उसकी दुकान की मिठाई ही लेता था.

सोहन और उसकी पत्नी शुद्ध देसी घी की मिठाई बना कर बेचते थे, इसलिए वो मिठाई सभी को पसंद थी. काफ़ी बिक्री के कारण उसकी दुकान भी अच्छी चल रही थी जिससे उसको काफी मुनाफा भी हो रहा था. पर न जाने क्यों इतना सब होने पर भी सोहन अपनी कमाई से खुश और संतुष्ट नहीं था. वो और मुनाफ़ा चाहता था और अपनी कमाई बढ़ाने के लिए उसने एक तरकीब भी निकाली. वो शहर से एक चुम्बक का टुकड़ा ले आया, जो उसने अपने तराजू पर लगा दिया जिससे वो घपला-घोटाला कर सके और मुनाफ़ा कमा सके.

इसके बाद एक ग्राहक आया और उसने एक किलो जलेबी मांगी. सोहन ने चुम्बक को लगाकर जलेबी तोल दी और ज़्यादा मुनाफ़ा कर लिया. वो काफ़ी खुश हुआ. उसने अपनी पत्नी को ज्यादा मुनाफ़े के बारे में बताया तो उसकी पत्नी ने सोहन से इसका कारण पूछा. सोहन ने चुम्बक वाली बात बता दी. लेकिन उसकी पत्नी ने उसको समझाया कि ये सही नहीं है और ग्राहकों के साथ धोखेबाजी है. उनकी दुकान अच्छी-ख़ासी चल रही है इसलिए वह ऐसा घोटाला न करे, लेकिन सोहन पर उसका लालच हावी था और उसने पत्नी की राय को अनसुना कर ये धांधली जारी रखी.

एक दिन सोहन की दुकान पर रवि नाम का एक लड़का आया उसने सोहन से 2 किलो जलेबी मांगी. सोहन से वैसे ही जलेबी तोल कर दे दी. रवि को संदेह हुआ और उसने जब जलेबी को देखा तो सोहन को बोला यह तो कम लग रही है. क्या आप इसको दोबारा तोल सकते हो? इस पर सोहन को गुस्सा आ गया और वो रवि को बोला कि तुमको जलेबी चाहिए तो ले लो वरना जाओ क्योंकि मुझे और भी बहुत काम है.

रवि वहां से एक जलेबी लेकर चला गया लेकिन वह दूसरी दूकान में गया और उसने जलेबी को दोबारा तुलवाया, जिससे उसको पता चला की जलेबी आधा किलो कम थी. इसके बाद रवि एक तराजू लेकर सोहन की दुकान में गया और उस तराज़ू को उसने दुकान के बाहर रख दिया.

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अब रवि ने सभी गांव वालों को ज़ोर-ज़ोर से बोलकर इकट्ठा कर लिया. सोहन को घबराहट होने लगी और उसने रवि को फटकार लगाई कि वो आख़िर ये तमाशा क्यों कर रहा है? रवि ने सोहन और बाक़ी लोगों को बताया कि वो अब सबको जादू दिखाएगा. उसने कहा कि आप जो भी मिठाई सोहन की दुकान से ख़रीदोगे तो वो इस तराज़ू में अपने आप कम हो जाएगी.

इसके बाद लोगों ने मिठाइयां तुलवाई और ये पाया कि सोहन की दुकान की मिठाई का वज़न तो वाक़ई अन्य दुकानों की मिठाई से कम निकला. इसके बाद रवि ने सोहन के तराजू में लगा चुम्बक लोगों को दिखाया और सारी बात बताई. सच जानकर लोगों को बहुत ग़ुस्सा आया और उन्होंने सोहन की खूब पिटाई की. घबराए सोहन ने लोगों से वादा किया कि इस बार उसे माफ़ कर दें वो आगे से ऐसा काम कभी नहीं करेगा. उसने माना कि वो लालच में आ गया था.

लेकिन सोहन पर से अब गांववालों का विश्वास उठ गया यह और उसकी इस धोखेबाजी से पूरा गांव नाराज़ था, इसलिए लोगों ने उसकी दुकान में जाना काफी कम कर दिया था. लेकिन अब सोहन के पास पछताने के अलावा कुछ और नहीं बचा, क्योंकि उसने ज़रा से अधिक मुनाफ़े के लालच में अपना ईमान खोकर धोखा किया जिससे उसे पहले जो मुनाफ़ा हो रहा था अब उससे भी हाथ धोना पड़ा.

सीख: लालच बुरी बला है, कम समय में जल्दी और ज़्यादा मुनाफ़े के चक्कर में बड़ा नुक़सान ही उठाना पड़ता है. इसके अलावा आपका सम्मान व इज़्ज़त भी जाती है. इसलिए मेहनत और ईमानदारी की कमाई ही फलती-फूलती है.

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एक घने जंगल के पास एक नदी बहती थी और उसी जंगल के बीचोंबीच एक तालाब था, जिसमें ढेर सारे मेंढक रहते थे. वो सभी तालाब में ही रहते और खाते-पीते थे. उन्हीं में एक मेंढक अपने तीन बच्चों के साथ उसी तालाब में रहता था. वो खूब खाता-पीता और मस्त रहता था, इसी वजह से उस मेंढक की सेहत अच्छी-खासी हो चुकी थी और वो उस तालाब का सबसे बड़ा और विशाल मेंढक बन चुका था. उस मेंढक को अपने बड़े शरीर पर बड़ा घमंड हो चला था. उसके बच्चे भी उसे देखकर काफी खुश होते थे. उसके बच्चों को लगता कि उनके पिता ही दुनिया में सबसे बड़े, शक्तिशाली और बलवान हैं. वो मेंढक भी अपने बच्चों को अपने बारे में बड़ाई मारनेवाली मनगढ़ंत व झूठी कहानियां सुनाता और उनके सामने शक्तिशाली होने का दिखावा करता था.

समय यूं ही बीत रहा था कि एक दिन मेंढक के बच्चे खेलते-खेलते तालाब से बाहर चले गए और जब वो पास के एक गांव में पहुंचे, तो वहां उनकी नज़र एक बैल पर पड़ी. उसे देखते ही उनकी आंखें खुली की खुली रह गईं. उन्होंने कभी इतना विशाल और बड़ा जीव नहीं देखा था. उनकी ज़िंदगी तो अब तक तालाब तक ही सीमित थी. बाहरी दुनिया से उनका कोई वास्ता नहीं था. इसलिए उस बैल को देखकर वो डर गए. वो बैल तो अपनी धुन में मज़े से घास खा रहा था, लेकिन वो बच्चे चकित होकर उस बैल को देखे जा रहे थे. इसी बीच घास खाते-खाते बैल ने ज़ोर से हुंकार लगाई. बस फिर क्या था, तीनों बच्चे डर के मारे भागकर सीधे तालाब में अपने पिता के पास आ गए. उनके घमंडी पिता ने उनके डर का कारण पूछा, तो उन्होंने अपने पिता को बताया कि आज उनकी आंखों ने क्या देखा. उन्होंने अपने पिता से कहा कि हमने आज आपसे भी बहुत बड़ा, विशाल और ताकतवर जीव को देखा.

Panchatantra Story
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बच्चे आगे बोले कि हमको तो आज तक यही लगता था कि आप ही इस दुनिया में सबसे विशाल, बड़े और ताक़तवर हो! यह सुनते ही मेंढक के अहंकार को ठेस पहुंची. उसने एक लंबी सांस भरकर खुद को फुला लिया, ताकि उसका शरीर बड़ा दिखे और अपने बच्चों से कहा क्या वो उससे भी बड़ा जीव था? उसके बच्चों ने कहा, हां वो आप से बहुत बड़ा था.

मेंढक का क्रोध बढ़ गया… उसने ग़ुस्से में आकार और भी ज़्यादा सांस भरकर खुद को फुलाया और फिर पूछा, क्या अब भी वो जीव मुझसे बड़ा था? बच्चों ने कहा, हां पिताजी, ये तो कुछ भी नहीं, वो आपसे कई गुना बड़ा था. मेंढक से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई और वो सांस फुला-फुलाकर खुद को गुब्बारे की तरह फुलाता चला गया. फिर एक वक्त आया जब उसका शरीर पूरी तरह फुल गया और वो फट गया और अपने इस झूठे अहंकार के चक्कर में वो अपनी जान से ही हाथ धो बैठा.

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सीख: झूठे दिखावे और अहंकार से दूर रहना चाहिए. किसी भी बात का घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि घमंड करने से कोई लाभ नहीं होता, बल्कि खुद का ही नुकसान होता है, जैसा कि उस घमंडी मेंढक का हुआ. विनम्र रहें और अपनी शक्ति या हुनर का सही इस्तेमाल करें, न कि झूठा दिखावा.

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बीरबल की तेज़ बुद्धि और बादशाह अकबर का उनके प्रति विशेष स्नेह देख कई लोग ईर्ष्या करते थे बीरबल से. एक दिन दरबार में बादशाह अकबर बीरबल की तारीफ़ कर रहे थे, तो बादशाह ने देखा कि एक दरबारी खुश नहीं था, उन्होंने कारण पूछा, तो उस मंत्री ने कहा कि महाराज, माना बीरबल बड़ा ही तेज़ बुद्धि वाला है, लेकिन वो खुद को इतना ही होशियार समझता है और इतना ही अक्लमंद है वो, तो उसे कहिए कि वो आपके लिए बैल का दूध लेकर आए.

बादशाह ने पहले तो कहा कि भला बैल का दूध कैसे हो सकता है? फिर उस मंत्री ने कहा कि ये तो बीरबल जैसे होशियार व्यक्ति के लिए बड़ी चुनौती नहीं है, तो अकबर ने भी बीरबल की अक्लमंदी की परीक्षा लेने की सोची. अकबर बोले- बीरबल, क्या तुम मानते हो कि दुनिया में कोई कार्य असंभव नहीं?

बिल्कुल हुज़ूर, बीरबल ने कहा.

ठीक है, तो क्या तुम हमें बैल का दूध लाकर दे सकते हो?

बीरबल के पास हां कहने के अलावा कोई चारा नहीं था, लेकिन वो गहरी चिंता में थे कि आख़िर कैसे वो इस चुनौती को पूरा करें. घर आकर उन्होंने अपनी पत्नी व पुत्री से भी इसकी चर्चा की.

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रात हुई और बीरबल की पुत्री अकबर के महल के पीछे स्थित कुएं पर गई और पीट-पीटकर कपड़े धोने लगी. कपड़े पीटने की आवाज़ सुनकर बादशाह की नींद खुल गई. खिड़की से देखा कि कोई लड़की कुएं पर कपड़े धो रही है.

अकबर ने सिपाही को भेजा और उस लड़की से पूछा- इतनी रात गए कपड़े क्यों धो रही हो बच्ची?

बीरबल की पुत्री बोली, महाराज, मेरी माता घर पर नहीं है. वे कुछ महीनों से मायके में हैं. उनकी अनुपस्थिति में आज मेरे पिता ने एक बच्चे को जन्म दिया. दिन-भर मुझे उनकी सेवा-पानी करनी पड़ी इसलिए समय नहीं मिला, तो अब कपड़े धोने रात को यहां आई हूं!

लड़की की बात सुन अकबर को ग़ुस्सा आ गया और उन्होंने कहा- नादान लड़की, आदमी बच्चे पैदा करते हैं क्या? इसलिए जो सच है वो बता, तुझे माफ़ी मिल जाएगी, वर्ना सज़ा भुगतने के लिए तैयार रहना.

लड़की ने कहा, यही सच है. क्यों नहीं करते आदमी बच्चे पैदा, ज़रूर करते हैं हुज़ूर! जब बैल दूध दे सकता है, तो आदमी भी बच्चे पैदा कर सकते हैं.

ये सुनते ही अकबर का ग़ुस्सा ठंडा पड़ गया और उन्होंने पूछा- तुम हो कौन?

इतने में ही पेड़ के पीछे छिपे बीरबल ने सामने आकर कहा- ये मेरी पुत्री है महाराज.

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ओह, तो ये सब तुमने किया? बादशाह ने कहा.

ज़ी हुज़ूर, माफ़ी चाहता हूं पर और कोई रास्ता भी नहीं था अपनी बात समझाने का.

एक बार फिर अकबर ने बीरबल की अक्लमंदी और चतुराई का लोहा माना और अगले दिन दरबारियों को पूरा क़िस्सा सुनाते हुए बीरबल की खूब प्रशंसा की और उनकी पुत्री की भी, साथ ही इनाम भी दिया, जिसे देख बीरबल से ईर्ष्या रखनेवालों के मुंह लटक गए और वो जलभुन कर रह गए!

सीख: ऐसी कोई समस्या या सवाल नहीं जिसका हल या समाधान नहीं, बस शांत मन से अपने दिमाग़ का सही इस्तेमाल करने की ज़रूरत है, जिससे जलनेवाले चारों खाने चित्त हो जाएंगे और आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे!

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एक दिन बादशाह अकबर के दरबार की कार्यवाही चल रही थी कि अचानक बादशाह को न जाने क्या सूझी और वो बीरबल के मज़े लेने की सोचने लगे. उन्होंने बीरबल से मसखरी में एक टेढ़ा सवाल पूछा कि बीरबल, बताओ ज़रा कि हथेली पर बाल क्यों नहीं उगते?

सवाल सुनते ही बीरबल की समझ में आ गया कि बादशाह मजाक करना चाहते हैं और उनके मज़े लेना चाहते हैं.

बीरबल फ़ौरन जवाब न देकर सोच में डूबे हुए थे कि बादशाह ने उनको टोका- आज क्या बात है बीरबल, वैसे तो तुम हर सवाल का जवाब तपाक से दे देते हो. आज क्या हो गया?

बीरबल ने शांत मन से कहा- कुछ नहीं हुआ जहांपनाह! मैं तो ये सोच रहा था कि किसकी हथेली पर?

अकबर अपनी हथेली दिखाते हुए बोले कि हमारी हथेली पर बीरबल.

Akbar Aur Birbal Ki Kahani
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बीरबल समझाते हुए बोले- हुज़ूर! आपकी हथेली पर बाल कैसे उगेंगे? आप दिन भर अपने हाथों से उपहार वितरित करते रहते हैं. लगातार घर्षण की वजह से आपकी हथेली पर बाल उगना मुमकिन नहीं.

ठीक है बीरबल, चलो मान लेते हैं, मगर तुम्हारी हथेली पर भी बाल नहीं है. उसका क्या कारण है? अकबर ने सोचा आज बीरबल को पूरी तरह चकरा ही देंगे और उसके खूब मज़े लेंगे.

अकबर के सवाल सुनकर दरबारियों के भी कान खड़े हो गए और उनको भी लगने लगा कि बीरबल आज बुरे फंसे और वो अब अकबर के सवाल का जवाब नहीं दे पाएंगे.

इतने में ही बीरबल ने कहा कि जहांपनाह मेरी हथेली पर बाल इसलिए नहीं क्योंकि मैं हमेशा आपसे इनाम लेता रहता हूं, तो भला मेरी हथेली पर बाल कैसे रहेंगे?

बादशाह यहीं नहीं रुके, तपाक से तीसरा सवाल कर बैठे- हमारी और तुम्हारी बात को जाने दो. हम इनाम देते हैं और तुम लेते रहते हो इसलिए हमारी हथेलियों पर बाल नहीं, लेकिन इन दरबारियों का क्या? ये तो हमसे हमेशा ईनाम नहीं लेते. ऐसे में इनकी हथेलियों पर बाल क्यों नहीं हैं?

सभी दरबारियों को लगा कि इस सवाल पर अब बीरबल फंस गए, आज उनकी हार निश्चित है, वो मन ही मन खुश हो रहे थे कि बीरबल का जवाब हाज़िर था- हुज़ूर! आप ईनाम देते रहते हैं और मैं ईनाम लेता रहता हूं और इसे देख ये सभी दरबारी ईर्ष्या में हाथ मलते रह जाते हैं, इसलिए इनकी हथेली पर भी बाल नहीं है.

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बीरबल वैसे भी अपनी तेज़ बुद्धि, हाज़िरजवाबी और वाक्पटुता के लिए प्रसिद्ध थे. हर बार की तरह इस बार भी बीरबल ने यह साबित कर दिखाया और बीरबल के जवाब से अकबर ख़ुशी से ठहाका लगा उठे, वहीं बाक़ी दरबारी फिर हाथ मलते रह गए.

सीख: ऐसा कोई सवाल नहीं और ऐसी कोई समस्या नहीं, जिसका हल नहीं हो. बस अपनी बुद्धि को हमेशा तेज़ और मन को साफ़ रखें. हाज़िरजवाबी के लिए दिमागी रूप से सतर्क होना बेहद ज़रूरी है. कभी भी कठिन से कठिन प्रश्न देख बिना कोशिश किए हथियार न डालें!

बादशाह अकबर एक रोज़ अपने घोड़े पर बैठकर शाही बाग में घूमने गए, उनके साथ बीरबल भी था.
बाग में चारों ओर हरे-भरे वृक्ष और हरी-हरी घास देखकर अकबर को बहुत आनंद आया और उनका मन प्रसन्न हो गया. लेकिन फिर उनके मन में एक ख़याल आया, उन्हें लगा कि ऐसे हरे-भरे बगीचे में सैर करने के लिए तो घोड़ा भी हरे रंग का ही होना चाहिए.

उन्होंने बीरबल से कहा- बीरबल क्या तुम्हें नहीं लगता कि इस हरे-भरे बाग का मज़ा दुगुना हो जाए, तो मुझे लगता है कि इसके लिए मुझे हरे रंग का घोड़ा चाहिए. तुम मुझे सात दिन में हरे रंग का घोड़ा ला दो. अगर तुम हरे रंग का घोड़ा न ला सके तो हमें अपनी शक्ल मत दिखाना.
वैसे बादशाह अकबर और बीरबल दोनों ही यह अच्छी तरह जानते थे कि हरे रंग का घोड़ा तो होता ही नहीं है, लेकिन बादशाह अकबर को तो बीरबल की परीक्षा लेनी थी, इसलिए उन्होंने बीरबल की बुद्धि को परखने के लिए ये शर्त रखी.

बादशाह अकबर ये देखना और परखना चाहते थे कि क्या इस प्रकार के अटपटे सवाल करने पर बीरबल अपनी हार स्वीकार करके यह कहेगा कि जहांपनाह मैं हार गया… लेकिन क्या ऐसा संभव था क्योंकि बीरबल भी अपने जैसे एक ही थे. बीरबल की तेज़ बुद्धि और हाज़िरजवाबी के सामने सभी को मुंह की ही खानी पड़ती थी. तो इस बार भी बीरबल ने चुनौती स्वीकार कर ली.

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बीरबल इस हरे रंग के छोड़ की खोज के बहाने सात दिन तक इधर-उधर घूमते रहे ताकि इस गुथी को सुलझा सकें और फिर आठवें दिन वे दरबार में हाजिर हुए और बादशाह से बोले- ‘जहांपनाह! मुझे हरे रंग का घोड़ा मिल गया है…
बादशाह बड़े हैरान हुए aur उन्होंने उत्सुकता दिखते हुए कहा कि बीरबल ‘जल्दी बताओ, कहां है हरा घोड़ा?

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बीरबल ने कहा, ‘बादशाह अकबर, मैंने बड़ी मुश्किल से हरा घोड़ा खोजा है और वो घोड़ा तो आपको मिल ही जाएगा, लेकिन, उसके मालिक ने दो शर्त रखी हैं, उन्हें पूरा करने के बाद ही वो घोड़ा आपका हो सकेगा.

अकबर ने भी फ़ौरन कहा कि जल्दी बताओ कौन सी शर्तें हैं वो, हम ज़रूर पूरा करेंगे.

बीरबल ने भी फ़ौरन जवाब दिया कि पहली शर्त तो यह है कि घोड़ा लेने के लिए आपको स्वयं जाना होगा जहांपनाह!

बादशाह ने कहा-

इसमें कौन सी बड़ी बात है, यह तो बड़ी आसान शर्त है. हम स्वयं जाएंगे… अब बताओ दूसरी शर्त क्या है?

बीरबल ने मुस्कुराते हुए बताया कि जहांपनाह, ‘घोड़ा खास रंग का है, इसलिए उसे लाने का दिन भी खास ही होगा, इसलिए उसका मालिक कहता है कि सप्ताह के सात दिनों के अलावा किसी भी दिन आकर उसे ले जाओ, घोड़ा तुम्हारा होगा.

बीरबल की ये बात सुन बादशाह अकबर बीरबल का मुंह देखते रह गए… बीरबल ने भी हंसते हुए कहा कि महाराज, अब हरे रंग का घोड़ा लाना हो, तो उसकी शर्तें भी माननी ही पड़ेगी, तभी तो ख़ास रंग का घोड़ा आपका होगा.

बीरबल की चतुराई पर बादशाह अकबर खिलखिला कर हंस पड़े. बीरबल की तेज़ बुद्धि से वह खुश हुए और समझ गए कि बीरबल को मूर्ख बनाना या उससे जीत पाना असंभव है!

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सीख: हर सवाल और हर समस्या का समाधान होता है, बस ज़रूरत है शांत मन से और चतुराई से अपनी बुद्धि का उपयोग कर उपाय खोजने की, जिससे मुश्किल से मुश्किल लग रहे सवाल और समस्या का भी आसानी से हल निकाला जा सकता है!

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एक गांव में एक धोबी अपने गधे के साथ रहता था. वह अपनी रोज़ी-रोटी के लिए रोज सुबह अपने गधे के साथ लोगों के घरों से गंदे कपड़े लाता और उन्हें धोकर वापस दे आता. वो दिनभर इसी काम में लगा रहता और किसी तरह गुज़र-बसर कर रहा था.

वो गधा भी कई सालों से धोबी के साथ काम कर रहा था और उम्र बढ़ने के साथ व समय के साथ-साथ वह बूढ़ा हो गया था. जिसकी वजह से उसका शरीर भी कमजोर हो चला था, जिस वजह से अब वो ज्यादा कपड़ों का वजन भी नहीं उठा पाता था… उसकी उम्र के चलते उसकी कमजोरी बढ़ती चली जा रही थी.

एक दिन दोपहर के वक्त धोबी अपने गधे के साथ कपड़े धोने घाट जा रहा था. गर्मी बहुत ज़्यादा थी और कड़ी धूप की से दोनों ही बेहाल थे. चलते-चलते धूप और कमजोरी की वजह से अचानक गधे का पैर लड़खड़ाया और वह एक गहरे गड्ढे में गिर गया. इस अचानक हुए घटनाक्रम से धोबी घबरा गया. उसका गधा भी सकते में था और धोबी उसे बाहर निकालने की कोशिश में जुट गया. लेकिन गधा और धोबी दोनों नाकामयाब रहे, हालाँकि बूढ़ा और कमजोर होने पर भी गधे ने भी पूरी ताक़त लगा दी थी पर दोनो असफल हो रहे थे और उनके प्रयास नाकाफ़ी साबित हुए.

धोबी और गधे की ऐसी हालत देख को गांव वाले भी उसकी मदद के लिए पहुंच गए, लेकिन कोई भी उसे गड्ढे से बाहर नहीं निकाल पाया. तब सभी को यही लगा कि अब कुछ माहिर हो सकता और गांववालों ने धोबी से कहा कि ये गधा तो अब बूढ़ा हो गया है, इसलिए इसको बाहर निकलने की बजाय समझदारी इसी में है कि इस गड्ढे में मिट्टी डालकर उसे यहीं दफना दिया जाए, क्योंकि सारी कोशिशें बेकार हि होंगी. धोबी ने भी सोचा कि ये सब सही कह रहे हैं और वो भी इस बात के लिए तैयार हो गया.

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बस फिर क्या था, गांववालों ने अब गड्ढे में मिट्टी डालनी शुरू कर दी. गधा इससे पहले कि कुछ समझ पाता गांववाले अपना निर्णय ले चुके थे और जैसे ही गधे को समझ आया कि उसके साथ क्या हो रहा है, तो वहकुछ देर चिल्लाया, बहुत दुखी हुआ और उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे, लेकिन कुछ देर बाद उसने चुप्पी साध ली और वो एकदम चुप हो गया!

लेकिन इसी बीच धोबी की नज़र गड्ढे में फ़ंसे अपने गधे की हरकत पर पड़ी, उसने देखा कि गधा कुछ अजीब सी हरकत कर रहा है. जैसे ही गांव वाले उस पर मिट्टी डालते, वो अपने शरीर से मिट्टी को नीचे गड्ढे में गिरा देता और खुद उस मिट्टी के ऊपर चढ़ जाता. वो लगातार ऐसा करत रहा, यही क्रम चलता रहा, जिससे गड्ढे में मिट्टी तो भरती रही लेकिन गधा बड़ी चतुराई से उस मिट्टी को नीचे अपने ऊपर से झटककर नीचे गिरा देता और खुद उस पर चढ़ते हुए ऊपर आता गया. गांववाले भी ये देख हैरान हो गए और अपने गधे की इस चतुराई को देखकर धोबी भी हैरान रह गया और उसकी आंखें नम हो गईं.

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सीख: कहानी से यही सीख मिलती है कि परिस्थितियाँ भले ही कितनी मुश्किल और नाज़ुक क्यों न हों, अगर बुद्धि, समझदारी और धैर्य से काम लिया जाए तो मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति को भी पार कर सकते हैं. गड्ढा कितना भी गहरा हो यानी परेशानी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसे समझदारी से मिट्टी की तरह हटाकर उससे पार पाने का जज़्बा बनाए रखें, सफलता ज़रूर मिलेगी!

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