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कहानी- वापसी (Short Story- Wapsi)

परिवार के इस आपसी वार्तालाप से संशय की दीवारें ख़ुद ही ढह गई थीं. उस घर का हर सदस्य सहज था. न कोई शिकायत थी, न कोई मन आहत. आपसी संवाद कायम था. कहीं कोई मौन, शंका-आशंका दीवारें खड़ी नहीं कर रही थीं.

Kahani

“पापा, देखिए तो ज़रा किसका फोन है.” नैना की आवाज़ पर शरद ने बगल में बजते फोन का रिसीवर उठा लिया.

“हेलो.” बोलते ही पहचानी-सी आवाज़ आई, “अंकल प्रणाम, नारायण बोल रहा हूं.” शरद अपने मथुरावाले घर के किराएदार नारायण की आवाज़ पहचान गए. कुछ कहते, उससे पहले ही नारायण एक सांस में बोलता चला गया, “अंकल, मैंने मकान के नीचे के कमरों की साफ़-सफ़ाई करवा दी है. अब आप जब भी आओ परेशानी नहीं होगी. दो-तीन दिन में लॉन की घास भी कट जाएगी, बहुत बड़ी हो गई थी और हां, बरसात में पीछेवाली नाली ब्लॉक हो गई थी, सो पीछेवाले कमरे में पानी अंदर चला गया था. एक बड़ा बक्सा रखा है, उसमें शायद आंटी बिस्तर-रजाई रखती थीं, वो बक्सा नीचे से भीगा लगा, शायद पानी गया हो, अब आप लोग आकर देखिएगा. इतने दिनों बाद आप घर आएंगे, बड़ा अच्छा लगेगा.”

“कौन मैं…” हकलाते हुए शरदजी के मुंह से इतना ही निकला. कुछ समझते, उससे पहले ही नैना ने फोन का रिसीवर उनके हाथ से ले लिया. शरदजी इत्मीनान से बात करती बहू नैना को देखते रहे. वो धीमे शब्दों में फुसफुसाती हुई बोल रही थी, पर कुछ अस्फुट शब्द कानों में पड़ गए. “अब तुम फोन मेरे मोबाइल पर करना, वहां का इंतज़ाम बढ़िया रखना. पापा आ रहे हैं कोई द़िक्क़त नहीं होनी चाहिए.” शरदजी को मानो सांप सूंघ गया.

उनके घर की साफ़-सफ़ाई हो रही है यानी उनका दाना-पानी यहां से उठ गया है. दस महीने पहले वो पत्नी शिखा के देहांत के बाद उस सूने घर को किराएदार नारायण के भरोसे छोड़कर अपने बेटे शौर्य के यहां आगरा आ गए, पर रम नहीं पाए. दस महीने बाद भी पत्नी वियोग से उबरकर एक नई जगह पर स्थापित होना उनके लिए मुश्किल साबित हो रहा था. पर यहां रहना इतना भी मुश्किल नहीं था कि वो पुराने घर में जाने की बात सोचें, जिसमें शिखा की यादों के साथ अकेलेपन की टीस और वीरानी थी. लेकिन उनकी यात्रा का बाक़ायदा इंतज़ाम करवाया जा रहा है और उन्हें ख़बर तक नहीं है, ये जानकर वे बेचैन हो उठे थे.

नैना ने रिसीवर रख दिया, तो शरदजी ने प्रश्‍नवाचक नज़रें उस पर टिका दीं, पर वो बिना कुछ कहे वहां से चली गई. शरदजी सोच में डूब गए कि अब उन्हें अपने पुराने घर में रहना होगा. कैसे रह पाएंगे वो अकेले? कैसा लगेगा बिना पत्नी के उस घर में जीवनयापन करना? यहां कम से कम बेटे-बहू के होते हुए हर प्रकार की चिंता से तो मुक्त थे, पर उन्होंने इसे अपना घर माना भी कब था. इसीलिए शायद बेटे ने उन्हें घर भेजने का इंतज़ाम कर दिया है.

मुखर्जी साहब का कहा सच हो गया, “अगर हम बच्चों से दूरी बनाकर रखें, स्वयं मेहमानों-सा आचरण करें और बच्चों से अपेक्षा करें कि वो हमें घर का सदस्य मानें, तो ये कैसे संभव है. अपनी पत्नी के जाने के बाद मैं बेटे के पास एक मजबूरी समझकर रहता, तो जीना मुश्किल हो जाता. मेरा भी और इन बच्चों का भी. जब रहना ही है, तो मन से जुड़कर रहो.” मुखर्जी साहब के कहे फलस़फे को वो भी सही समय पर जीवन में उतार लेते, तो शायद इस उम्र में अकेले रहने का दंश न सहना पड़ता. पर वो तो पत्नी वियोग में ऐसे डूबे कि अपने ही बच्चों का सुख पराया दिखने लगा था. उनका दुख स़िर्फ उनका है इसी को सत्य मानते आए.

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अपनी पत्नी की मृत्यु के दस महीने बाद भी बेटे-बहू को कुछ सहज पलों को जीते देख वो असहज होते. शिखा के जाने का असर स़िर्फ उन पर पड़ा है, उनके मन में ये बात घर कर गई थी. पत्नी की मृत्यु के छह महीने बाद तीन साल के पोते का जन्मदिन आया. बेटे-बहू दोनों उम्मीद लगाए बैठे थे कि पापा बर्थडे को लेकर कोई पहल करें, पर वो निर्विकार बने बैठे रहे. शाम तक उनकी ओर से कोई पहल न होती देख, बहू ने बाहर डिनर का प्रोग्राम बना लिया. शरदजी को चलने के लिए कहा गया, तो बड़ी मुश्किल से जाने को तैयार तो हुए, पर वहां मौन साधे रहे. ऐसे माहौल में नैना और शौर्य के चेहरे अपराधबोध से भर गए थे.

शरद को याद आया कि लगभग उस दिन के बाद से ही उन्होंने नैना के स्वभाव में बदलाव महसूस किया. अब नैना उनको छोटे-छोटे काम बताने लगी थी, मसलन- दूध ले आना, गमलों में पानी डाल देना. सनी को स्कूल बस स्टॉप तक छोड़ आने को कहना. शौर्य उसे टोकता, तो कहती “पापा कब तक अपने कमरे में यूं बैठे रहेंगे, कुछ करेंगे तो मन लगेगा.” शरदजी को नैना की ये बातें नागवार लगती थीं. काश! वो पहले ही ख़ुद को थोड़ा बदलते, तो आज ये स्थिति नहीं आती.

आज उन्हें अपने पड़ोसी मुखर्जी साहब के घर देखा वो परिदृश्य भी याद आ रहा था, जहां सुबह-सुबह की भागदौड़ बिल्कुल उनके घर जैसी थी. उनके बहू-बेटे भी नैना और शौर्य की तरह सुबह की व्यस्तता में डूबे थे. उस दिन अख़बार की अदला-बदली होने के कारण शरदजी मुखर्जी साहब के घर गए, तो उन्होंने चाय पीने के लिए उनको बैठा लिया.

मुखर्जी साहब ख़ुद चाय बनाने लगे. आश्‍चर्य से ताकते शरदजी को उन्होंने बताया कि वे सुबह-सुबह घर के कामों में व्यस्त बहू के दैनिक कार्यों को बाधित नहीं करते हैं. और तो और, उस दिन ऑफिस जाते अपने बेटे से अपने टूटे चश्मे को बनवाने के लिए कहा, तो उनके बेटे के जवाब को सुनकर भी शरदजी को हैरानी हुई थी, “पापा, आज तो ऑडिट है, बिल्कुल समय नहीं है. आज नहीं करवा पाऊंगा.” अपने बेटे के इंकार पर मुखर्जी साहब बिना शिकन कुछ चिंता में डूबे-से बोले, “अरे, फिर बिजली का बिल कैसे जमा होगा? उसकी तो आज आख़िरी तारीख़ है. आज मैं ही निकलता हूं जमा करवा आऊंगा.” इस बात पर उनकी बहू बोली, “ना ना पापा, आप कहां जाएंगे. मौसम का भी कोई भरोसा नहीं, कब बरसात हो जाए. मैं किसी से बात करती हूं. बिल जमा हो जाएगा और हां आज मार्केट जाऊंगी, तब आपका चश्मा ठीक करवा लाऊंगी.” परिवार के इस आपसी वार्तालाप से संशय की दीवारें ख़ुद ही ढह गई थीं. उस घर का हर सदस्य सहज था. न कोई शिकायत थी, न कोई मन आहत. आपसी संवाद कायम था. कहीं कोई मौन, शंका-आशंका दीवारें खड़ी नहीं कर रही थीं. शरदजी मन ही मन कल्पना कर रहे थे कि यदि शौर्य उनके किसी काम को करने से मना करता, तो क्या होता? क्या वे मन ही मन आहत होकर मौन धारण कर लेते या फिर अपनी लाचारी पर कुढ़ते. मुखर्जी साहब के व्यवहार से उन्होंने सीख तो ली, पर उस सीख को जीवन में उतार पाने में देर कर दी. तभी तो उनको मथुरा वापस भेजने की तैयारी हो रही है.

आदत के अनुसार शरदजी ने आज भी मौन धारण कर लिया था. एक हफ़्ते बाद शौर्य और नैना को कुछ तैयारी में व्यस्त देख जान गए थे कि उनकी विदाई का समय आ गया है. बेटे-बहू उनको भेजने से पहले बताना भी ज़रूरी नहीं समझते, ये टीस लिए वो शौर्य से बात करने के लिए उनके कमरे तक पहुंचे, पर बहू की आवाज़ सुनकर क़दम ठिठक गए.

“पापा की उदासी घर में कैसी बोझिलता भर देती है ना.” जवाब में बेटे ने कहा, “मम्मी का चले जाना, फिर पापा का मथुरा से आगरा आना, जीवन में अचानक हुए इन परिवर्तनों को पापा अभी तक स्वीकार नहीं कर पाए हैं. सोच रहा हूं मथुरा जानेवाली बात पापा को बता दूं.”

“ना-ना कोई ज़रूरत नहीं है. वैसे लगता है कि उन्हें कुछ-कुछ अंदेशा है. उस दिन नारायण का फोन उन्होंने ही उठाया था.” बेटे-बहू के आपसी वार्तालाप को सुन वो बिना कुछ कहे वापस लौट आए. मन में शून्यता लिए वो आनेवाली संभावनाओं में डूब गए. दुख का सैलाब मन डुबोने लगा. देर रात तक वे अपनी दिवंगत पत्नी से बातें करते रहे. ऐसा प्रतीत हुआ मानो पत्नी शिखा तस्वीर से निकलकर सम्मुख आ खड़ी हुई हो. शरदजी सिसकी लेकर बोले, “तुम क्यों चली गई, ऐसे तो दो दिन के लिए भी कहीं जाना होता, तो दस इंतज़ाम करके जाती थी. हमेशा के लिए जाते समय मेरा ख़्याल नहीं आया?” लगा शिखाजी उनके हाथ को सहलाकर बोल रही हैं, “सुनो, तुम शौर्य के साथ ही रहना. सुन रहे हो ना…” शरदजी पत्नी से कुछ कहना चाहते थे, पर आवाज़ फंस गई, वे बोल रहे थे, पर शब्द मुंह से नहीं निकले.

“क्या हुआ पापा? कोई बुरा सपना देखा क्या?” शौर्य उनको हिलाते हुए कह रहा था. “जल्दी तैयार हो जाइए कहीं चलना है.”

“कहां?” शरदजी ने पूछा, तो पलभर मौन रहकर शौर्य बोला, “आज मथुरा जा रहे हैं.”

“क्यों? अचानक…” शरदजी के स्वर कुछ कातर से लगे, तो शौर्य सधे शब्दों में बोला, “आपका मन यहां नहीं लगता है. जिस हालात में आप यहां आए थे, उसमें ऐसा होना कोई आश्‍चर्य नहीं है. मथुरा में आपको शांति मिलेगी.” आशंका से घिरे शरदजी बहू-बेटे और पोते के साथ अपने घर मथुरा पहुंचे, तो विस्मय हुआ. जिस वीरान घर को वो रोते छोड़कर आए थे, उसमें फूलों और आम के पत्तों के बंदनवार लगे हुए थे.

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पंडितजी को देख वो चौंके. स्वागत करने आए उत्साहित नारायण से पूछा, “आज कुछ है क्या?” तो शौर्य ने झट से उनके चरण स्पर्श करते हुए कहा, “हां पापा, आज आपका जन्मदिन है और ये हमारी तरफ़ से आपको दिया उपहार है.” अकेलेपन का… फीकी मुस्कान के साथ शरदजी के मुंह से ये शब्द निकलते, उससे पहले ही शिखा की मुस्कुराती तस्वीर ने अपनी ओर ध्यान खींच लिया. नैना उत्साहपूर्वक बोली, “पापा, मम्मीजी आपके जन्मदिन पर पूजा रखवाती थीं. आपने एक दिन बताया था कि उनकी इच्छा भागवत पाठ करवाने की थी, पर बीमारी के चलते नहीं करवा पाईं. आज आपके जन्मदिन से भागवत पाठ का शुभारंभ होगा. अभी मंदिर के लिए निकलना है.” फीकी मुस्कान के साथ शरदजी बोले, “एक हफ़्ते क्या तुम लोग रुकोगे?”

“हां पापा, भागवत क्या आप अकेले संभाल पाएंगे. मंदिर में पूजा में रोज़ ही तीन-चार घंटे लगेंगे. रहना तो पड़ेगा. फिर हमारे रहने से आपका मन भी लगा रहेगा.” शौर्य की बात पर शरदजी कुछ नहीं बोले. पूजा विधि-विधान से आरंभ हो गई थी. भागवत कथा के दौरान शरदजी थक जाते, तो नैना उनको घर भेजकर ख़ुद रुक जाती. लौटकर आती, तो आश्‍चर्य होता. शरदजी उनके लिए चाय की व्यवस्था करके रखते. पानी समय से आता था, तो वे भरकर रख देते और तो और, सुबह टहलते हुए जाते और दूध-सब्ज़ी लिए आते. आख़िर ये सब बाद में भी तो देखना है. सोचकर वो घर के काम में हाथ बंटाते. पूजा की तैयारी बड़े मन से करते, लेकिन भागवत समाप्त हुई, तो शरदजी भावुक हो गए. आंखों में आंसू आने से रोक नहीं पाए, तो शौर्य उनके कंधे पर हाथ रखकर बोला, “पापा, आपका अकेलापन हमसे किसी भी तरह से छिपा नहीं है, पर अब आपको ख़ुद को संभालना होगा.” वापसी की तैयारी होने लगी थी. ‘जेहि विधि राखे राम तेहि विधि रहिए…’ बुदबुदाते शरदजी से शौर्य पूछ रहा था. “पापा, अब चलने की तैयारी करें.”

“हां बेटा, अब कब तक रुक पाओगे तुम लोग? चलना तो है ही.” शरदजी बोले, तो नैना ने कहा, “पापा, हम लोग कोशिश करेंगे कि दो-तीन महीने में कुछ दिन आगरा से मथुरा आ जाएं. हमारे लिए भी चेंज हो जाएगा. ठीेक है ना पापा.” “जैसा तुम लोग ठीक समझो. ख़ैर अपना ख़्याल रखना.” शरदजी डूबते मन से बोले, तो नैना और शौर्य चौंके. शौर्य ने विस्मय से पूछा, “ख़्याल रखना मतलब…? कहीं आप यहीं रुकने का मन तो नहीं बना रहे हैं.” शौर्य की बात सुनकर नैना कहने लगी, “कैसी बात कर रहे हैं आप. पापा यहां क्यों रहेंगे? फिर हमने वादा किया तो है कि यहां महीने-दो महीने में आते रहेंगे.”

“तो-तो क्या मैं भी चल रहा हूं?” शरदजी की आवाज़ ख़ुशी से कांपी, तो नैना अपने सिर पर हाथ रखती हुई बोली, “पापा, डाउट क्या है इसमें?” सब मौन एक-दूसरे के मन में हुई ग़लतफ़हमी को पढ़ रहे थे. तभी नैना संजीदगी से बोली, “पापा, जब तक मम्मी आपके साथ थीं, हमें तसल्ली थी कि एक-दूसरे का ख़्याल रखने के लिए आप दोनों साथ हैं. लेकिन अब आपके अकेले रहने की बात तो हम कभी सोच भी नहीं सकते हैं. मम्मी के जाने का दुख स़िर्फ आपको ही नहीं, हमें भी है. लेकिन हमें अब आपकी चिंता है. यूं दुखी रहने से आप डिप्रेशन में चले जाएंगे. हमने मम्मी को तो खो दिया, पर आपको नहीं खोना चाहते हैं. पापा, प्लीज़ मम्मी की ख़ुशनुमा यादों के सहारे ख़ुश रहने की कोशिश करिए. उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी यादकर हमारे बीच उनको ज़िंदा रखिए.”

“एक बात समझ में नहीं आ रही है. ये बात आपके दिमाग़ में कैसे आई कि हम आपको यहां छोड़ जाएंगे.” शौर्य अब भी उलझन में था. उसके प्रश्‍न पर शरदजी कुछ संकोच से बोले, “अब क्या कहूं बेटे, शायद मैं ख़ुद को तुम लोगों के संग जोड़ नहीं पाया. मैं अपने ‘मैं’ के संग जीता रहा.”

“चलो छोड़ो ये सब. जो हुआ सो हुआ. हम आपके जन्मदिन को ख़ास तरी़के से मनाना चाहते थे, जिसके लिए शायद आप राज़ी ना होते, इसलिए आपसे साफ़ बात नहीं कर पाए.” नैना के कहते ही शरद पोते के हाथों को स्नेह से थामकर बोले, “चलो-चलो, अब निकलना भी है. देर करना ठीक नहीं. और नैना बेटी, खाने के चक्कर में मत पड़ना. सब कुछ बाहर मिलता है. बाहर ही खा लेंगे.” कहते हुए शरद चलने की तैयारी में जुट गए.

घर से बाहर जाते समय बैठक में लगी पत्नी की तस्वीर को शरदजी ने निहारा, तो नैना ने झट से तस्वीर उठा ली, फिर अपने ससुर को थमाते हुए बोली, “पापा, मम्मी को साथ लिए चलिए. जब हम, मतलब हम सब यहां आएंगे, तो मम्मीजी को साथ लेते आएंगे.” उसकी बात पर जिस तरह से शरदजी के चेहरे पर सुर्खी आई, उसे देख नैना और शौर्य दोनों हंस पड़े. शरदजी ने गाड़ी में बैठकर तस्वीर की ओर देखा, तो लगा शिखा मुस्कुराती हुई कह रही है, “आज इतने दिनों बाद तुम्हें देखकर अच्छा लग रहा है. मेरे बच्चों का ध्यान रखना. ये मेरी ही तो निशानियां हैं.” पत्नी की बात शरदजी के दिल में उतर गई. धीमे से सबकी नज़र बचाकर उन्होंने पत्नी की तस्वीर सीने से लगा ली. और मुस्कुरा पड़े. ‘मैं’ के संकीर्ण दायरे के बाहर की विस्तृत दुनिया देख आज वो ख़ुद को हल्का और प्रसन्न महसूस कर रहे थे.

Meenu Tripathi

      मीनू त्रिपाठी   

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कहानी- कुछ बात है उसमें (Short Story- Kuch Baat Hai Usme)

उसने ख़ुद नोट किया है कि वह सबको बहुत प्यार करती है. बहुत ध्यान रखती है हर बात का. वह कहां इन बातों में तनु की बराबरी कर सकता है. प्यार और चिंता वह भी करता है, पर जिस तरह तनु ख़ुद तकलीफ़ उठाकर, अतिरिक्त मेहनत करके घर में सबके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहती है, वह नहीं कर पाता है.

Kahani

राहुल अपनी पढ़ाई में व्यस्त था. उसकी परीक्षाएं चल रही थीं. डोरबेल बजी, तो मन मारकर उठा. वह घर पर अकेला था, तो उठकर देखना ही था. कुरियर था. उसने साइन करके कुरियर लिया. बाहर से देखने पर ही समझ आ रहा था कि कोई पत्रिका है. उसने लिफ़ा़फे को खोलकर पत्रिका निकाली, उल्टा-पल्टा, कहानियों में लेखकों के नाम देखे, अपनी मम्मी वसुधा शर्मा का नाम दिखा, तो होंठों पर एक भली-सी मुस्कुराहट आई. वह बेड पर लेटकर कहानी पर नज़र डालने लगा.

पढ़ते-पढ़ते उसकी मुखाकृति बदलती चली गई. चेहरा तन गया. यह क्या बात हुई, मम्मी की हर कहानी में पात्रों का बेटी के प्रति इतना स्नेह क्यों उमड़ता है? बेटियों की इतनी तारीफ़ क्यों करती हैं मम्मी हर कहानी में? बाहरी व्यक्ति समझे या न समझे, पर हम तीनों तो अक्सर समझ ही जाते हैं न कि कहानी किस पर लिखी है. और यह तनु! अभी कॉलेज से आएगी, आते ही कहानी पढ़ेगी और फिर मुझे चिढ़ाएगी, “अरे, मम्मी ने फिर इस कहानी में एक बेटी की तारीफ़ कर दी.” हर कहानी में मम्मी तनु की किसी बात की तारीफ़ करती हैं. राहुल को इतना ग़ुस्सा आया कि उसने पूरी कहानी पढ़ी ही नहीं. वसुधा इस समय किटी पार्टी में गई हुई थी, तनु कॉलेज और कपिल ऑफिस में थे. तीन बज रहे थे, राहुल का मूड बुरी तरह ख़राब हो गया था.

वसुधा सात-आठ वर्षों से लेखन में सक्रिय है. अक्सर राहुल मां की प्रकाशित कहानियां नहीं पढ़ता है, पर कभी-कभी मूड होता है, तो उठा लेता है. कई बार उससे दो वर्ष बड़ी बहन तनु ही ज़बर्दस्ती उसके हाथ में पत्रिका पकड़ाकर कहती है, “लो राहुल, पढ़ लो. बढ़िया कहानी लिखी है मम्मी ने.” और जब वह पढ़ता है, तो सिर पकड़ लेता है और चिढ़कर कहता है, “मां, आप कभी मेरी तारीफ़ नहीं लिख सकतीं क्या, बस इसके ही क़िस्से लिखती रहती हैं. ऐसा क्या है तनु में?” वसुधा हंसकर उसके बाल सहलाते हुए कहती है, “ओह बेटा, बुरा क्यों मानते हो? कहानी ही तो है, इतना सीरियसली क्यों ले रहे हो?”

“बाहरवाले समझेंगे कहानी ही है, पर हमें तो पढ़कर ही समझ आ जाता है न कि तनु की किस बात की तारीफ़ आपने कर दी है.” वसुधा के लिए राहुल को समझाना हर बार मुश्किल ही होता है. चार बजे तक तनु भी घर आ गई. राहुल का फूला मुंह देखकर पूछा, “क्या हुआ? भूख लगी है क्या?” राहुल ने ‘ना’ में गर्दन हिलाई. तनु फ्रेश होकर फिर पूछने लगी, “क्या हुआ? तैयारी नहीं हुई क्या पेपर की?”

“नहीं, पढ़ रहा हूं. थोड़ी बाकी है.” कहकर वह पढ़ने बैठ गया. तनु भी पास रखी पत्रिका उठाकर उत्साहित-सी मां की नई प्रकाशित कहानी पढ़ने लगी, तभी राहुल के मोबाइल पर वसुधा का फोन आया, “राहुल, हमारी एक फ्रेंड बीमार है. हम सब उसे देखने जा रहे हैं. थोड़ी देर हो जाएगी आने में.”

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“ओके मम्मी.” कहकर राहुल ने फोन रखा, पास में लेटी आराम कर रही तनु को मां के देर से आने के बारे में बताया, तनु ने पलभर सोचा, फिर कहा, “अच्छा, मम्मी देर से आएंगी.” फिर झटके से उठकर बैठ गई, “राहुल, आज डिनर मैं तैयार करके मम्मी को सरप्राइज़ दूं, वे थकी हुई आएंगी, तो उन्हें कुछ आराम मिल जाएगा.”

खाने-पीने के शौक़ीन राहुल की आंखें चमक उठीं, “तनु, बाहर से ऑर्डर कर लें?”

“नहीं, पापा भी आनेवाले हैं, उन्हें घर का ही पसंद है न!”

“फिर क्या बनाएगी?”

“बता क्या बनाऊं, पर कुछ आसान बताना, पुलाव और रायता बना लूं?”

“पुलाव खाने का तो मूड नहीं है, पूरी-सब्ज़ी बनाएगी?”

“ठीक है, कोशिश करती हूं.” तनु झटपट उठकर किचन में गई, आलू उबालने रखे और काम शुरू किया. मां को सरप्राइज़ देने के लिए वह उत्साहित थी, कपिल भी ऑफिस से आ गए. वसुधा के कुछ देर से आने की जानकारी उन्हें भी थी. तनु ने उत्साहित स्वर में बताया, “पापा, आज डिनर मैं तैयार कर रही हूं.”

“वाह! गुड. वसुधा तो ख़ुश हो जाएगी. आज उसे किचन से ब्रेक मिल ही गया.” पिता-पुत्री की स्नेहभरी बातचीत चलती रही. राहुल का ध्यान फिर कहानी की तरफ़ चला गया था, उसका मूड फिर ख़राब हो गया.

वसुधा आई, तो आम बातचीत के बाद फ्रेश होकर बोली, “चलो, अब तुम लोगों के लिए कुछ बनाया जाए.” वसुधा का हाथ पकड़कर तनु ने कहा, “मम्मी, आओ न किचन में.”

“चलो.” कहते हुए किचन में गई, तो सब्ज़ी बन चुकी थी, एक थाली में टेढ़ी मेढ़ी पूरियां बेलकर रखी हुई थीं. वसुधा ने हैरान होते हुए तनु को बांहों में भरकर कहा, “ओह बेटा, तुमने तो बहुत कुछ कर लिया.” पास खड़े राहुल के गंभीर चेहरे पर नज़र डालते हुए वसुधा ने पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

“कुछ नहीं.”

तनु ने कहा, “मम्मी, आज इसका मूड ख़राब है, बता नहीं रहा है.”

वसुधा ने फिर पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

“बाद में बताऊंगा.” कहकर राहुल अपने रूम में चला गया. काफ़ी काम तो तनु कर ही चुकी थी. तीनों को बिठाकर वसुधा ने खाना खिलाया, उसका खाना तो किटी में ही हो गया था. डाइनिंग टेबल पर भी राहुल का उखड़ा मूड सबने महसूस किया था. सोने से पहले तनु और कपिल दोनों ड्रॉइंगरूम में बैठे अपने फोन में व्यस्त दिखे, तो वसुधा चुपचाप राहुल के कमरे में गई. उसके सिर पर जैसे ही हाथ रखा, राहुल उसका हाथ हटाते हुए तुनका, “रहने दो मम्मी.”

“अरे, क्या हुआ? बताओ तो.”

राहुल जैसे तैयार ही बैठा था, “आज ही नहीं, हर बार सोचता हूं आपसे पूछूंगा, पर ख़ुद ही टाल जाता हूं. आज फिर आपकी कहानी छपी है. कहानी भले ही किसी और परिवार की है, पर उसमें भी एक बेटी के बारे में पढ़ते हुए यही लगा कि वह तनु पर है. आपकी हर कहानी में तनु क्यों आ जाती है, मैं क्यों नहीं? आज तो मुझे बहुत ग़ुस्सा आया आप पर. उस कहानी में मैं साफ़ समझ गया कि तनु की किस बात की तारीफ़ हो रही है, ऐसा क्या है तनु में!” बेहद गंभीर, शांत स्वर में वसुधा ने कहा, “बस इतनी-सी बात है? राहुल, मैं कुछ नहीं कहूंगी, मन शांत हो जाए, दिमाग़ ठंडा हो जाए, तो थोड़ा समय निकालकर ख़ुद ही सोचना कि ऐसा क्या है तनु में.” कहते-कहते वसुधा की आंखें भीग उठीं और गला रुंध-सा गया, तो राहुल चौंक गया, शर्मिंदगी-सी हो आई थी अचानक. राहुल का कंधा थपथपाकर वसुधा चुपचाप उठकर अपने बेडरूम में चली गई, कपिल भी सोने आ गए थे.

तनु भी सो चुकी थी, पर आज राहुल की आंखों में नींद नहीं थी. वह मां की कही बात पर ग़ौर करने लगा, ऐसा क्या है तनु में, जो उसमें नहीं है. यह उसे ही सोचना है. वह शांत, ठंडे मन से अपनी और तनु की तुलना करने लगा और एक-एक करके न जाने तनु की कितनी बातें उसे याद आती गईं, जो उसके मन पर छाई धुंध को साफ़ करती चली गईं. हां, वह नहीं है तनु की तरह, उसमें वो सब ख़ूबियां कहां हैं, जो तनु में हैं.

उससे दो साल बड़ी तनु कितनी समझदार है. घर में सबका कितना ध्यान रखती है. मां की हर ख़ुशी में उसकी ख़ुशी छुपी होती है. उसने आज की ही बात से सोचना शुरू किया, वह भी तो कॉलेज से आई थी. मां को आराम मिल जाए, यह सोचकर फ़ौरन किचन में जाकर जो कर सकती थी, करने लगी थी. बेचारी पुलाव-रायता सोच रही थी, जो आसानी से बन भी जाता, पर वह पुलाव ज़्यादा पसंद नहीं करता. उसने कहां इस बात की चिंता की कि पूरी-सब्ज़ी बनाना तनु के लिए कितना मुश्किल होगा. उसने तो बस फ़रमाइश कर दी. यह जानते हुए भी कि मां भी तलने का काम तनु से नहीं करवातीं. और तनु, उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं आई. मां को अक्सर कमरदर्द रहता है. तनु हर काम में इस बात का ध्यान रखती है कि मां के ऊपर अतिरिक्त काम का बोझ न पड़े और वह, किसी भी स्थिति में अपना खाना भी ख़ुद लेकर नहीं खाता, यह कहकर कि उसे ख़ुद लेना पसंद नहीं है. वह तो साफ़-साफ़ कह देता है कि उसे घर का कोई काम करना पसंद नहीं है और अगर कोई उसे बाहर का काम बताता है, तो भी वह टाल जाता है. उसे किसी काम में रुचि नहीं रहती. वह स़िर्फ अपने बारे में सोचता है. अपने दोस्त, कॉलेज, फुटबॉल, फोन, टीवी… बस, वह प्यार तो घर में सबको करता है, पर कोई भी काम करने से वह पीछे हटता है.

किसी का बर्थडे हो, मम्मी-पापा की मैरिज एनिवर्सरी हो, मदर्स डे हो या फादर्स डे- तनु कितने दिन पहले से ही उससे सलाह-मशवरा करके गिफ्ट्स के बारे में सोचती है, अपनी पॉकेटमनी का सारा पैसा ख़र्च कर देती है. और वह ख़ुद? ‘हां-हूं’ के अलावा कोई रुचि नहीं दिखाता, तनु भी दुखी होकर कह ही देती है, “मैं तुझसे कौन-सा पैसा मांग रही हूं, इंट्रेस्ट तो दिखा ही सकता है न राहुल?” उसने ख़ुद नोट किया है कि वह सबको बहुत प्यार करती है. बहुत ध्यान रखती है हर बात का. वह कहां इन बातों में तनु की बराबरी कर सकता है. प्यार और चिंता वह भी करता है, पर जिस तरह तनु ख़ुद तकलीफ़ उठाकर, अतिरिक्त मेहनत करके घर में सबके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहती है, वह नहीं कर पाता है. किसी भी अवसर पर किसी के लिए कोई गिफ्ट लाने के लिए वह घंटों बाज़ार में भटकती है, पर उसके कहने पर भी वह कभी साथ नहीं जाता. अस्वस्थता के चलते मां जो कुछ खाना प्लेट में लगाकर तनु को देती है, वह बिना शिकायत के ख़ुशी-ख़ुशी खा लेती है और वह? किसी चीज़ से कोई समझौता नहीं. जो नहीं पसंद, वह नहीं खाना, चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे उसके लिए भयंकर कमरदर्द से पीड़ित मां को दोबारा खड़े होकर कुछ अलग से बनाना पड़े. आत्ममंथन के साथ-साथ राहुल की आत्मग्लानि बढ़ती जा रही थी. पता नहीं, तनु की कितनी बातें याद आती जा रही थीं. बराबर के बेड पर गहरी नींद में सोई बहन के निश्छल चेहरे पर नज़र पड़ते ही राहुल के होंठों पर मीठी-सी मुस्कान आ गई. हां, कुछ बात है उसमें, सोचकर वह मन ही मन मुस्कुरा उठा. अचानक किचन में उसे कोई आवाज़ सुनाई दी. जाकर देखा वसुधा पानी पीने उठी थी. राहुल ने कहा, “क्या हुआ मां, सोई नहीं?”

“नहीं, नींद नहीं आ रही, तुम नहीं सोए?”

“नहीं.”

“क्यों?”

“बस, कुछ सोच रहा था.”

“क्या?”

यह भी पढ़ेरिश्तों से जूझते परिवार (Families Dealing With Relationships)

राहुल मुस्कुराते हुए बोला, “यही कि कुछ बात है उसमें.” वसुधा ने भी मुस्कुराते हुए उसका गाल थपथपा दिया, “तुम में भी तो है कुछ बात, जो इतनी रात तक बहन के बारे में सोच रहे हो. मेरा प्यारा बच्चा.” कहकर वसुधा ने अपने से ऊंचे होते बेटे के कंधे पर सिर रख दिया. राहुल की बातों से मन में एक मायूसी-सी आ गई थी, अब उसकी जगह निश्‍चिंतता ने ले ली थी.

“क्या सोच रही हो मां?”

“यही कि एक कहानी तो तुम पर लिखनी ही पड़ेगी.” ज़ोर से हंस पड़ा था राहुल.

Poonam Ahmed

पूनम अहमद

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कहानी- समझौता नहीं समर्पण (Short Story- Samjhota Nahi Samarpan)

“रिश्ते बैंक की तरह होते हैं. बैंक में स़िर्फ डिमांड करने से काम नहीं चलता, पहले वहां उतना ही डिपॉज़िट करना पड़ता है. इसी तरह रिश्तों में अगर प्यार और सम्मान चाहिए, तो प्यार और सम्मान देना सीखो. स़िर्फ डिमांड पर डिमांड करने से बहुत जल्दी अकाउंट खाली हो जाता है.”

 Hindi Kahani

”रिश्ते बनते तो प्यार से हैं, लेकिन निभाए समझौते से ही जाते हैं, जो जितना ज़्यादा समझौता करेगा, उसका जीवन और रिश्ता उतना ही सुखी दिखेगा लोगों को.” मनस्वी ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा.

बाहर घना कोहरा छाया हुआ था. बूंदें बरस रही थीं, दिलों की उदासी मौसम पर छाई थी और मौसम की उदासी दिलों पर. बादलों से पानी की नहीं, दर्द की बूंदें बरस रही थीं. अन्वी ने शॉल को अपने कंधों पर कसकर लपेट लिया.

“तो क्या दीदी, रिश्तों में प्यार कभी बचता ही नहीं है?”

“होता है, शुरू में रिश्ते प्यार के मलमल में ही लिपटे होते हैं, लेकिन बहुत जल्द ही प्यार का मलमल फट जाता है और रिश्तों को ढंकने के लिए समझौते का पैबंद लगाना पड़ता है. प्यार की बजाय समझौते का पैबंद ही मज़बूत होता है और ज़िंदगीभर रिश्तों को बांधे रखता है.” मनस्वी ने एक गहरी सांस ली. उसकी गर्म सांसों की धुंध खिड़की के शीशे पर जमा होकर उसे धुंधला कर रही थी.

“तो क्या रिश्ते कभी भी स़िर्फ और स़िर्फ प्यार के ही सहारे नहीं चल सकते?” अन्वी ने कंपकंपाती आवाज़ में पूछा, पता नहीं उसकी आवाज़ में कंपन ठंड के कारण थी या अपने सवाल के कारण.

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“रिश्ते खड़े तो प्यार के पैरों पर होते हैं, लेकिन उम्र का सफ़र समझौते की बैसाखी के सहारे तय करते हैं.” मनस्वी के स्वर में घना सर्द कोहरा छाया था.

अन्वी के पैर कंपकंपा गए. अब की उसने अपने पैरों को शॉल से ढंक लिया, फिर भी ऐसा लग रहा था, जैसे कमज़ोर से हो गए हैं. पता नहीं उठकर चल पाएगी या नहीं. बाहर छाया कोहरा दोनों के सीने में जम गया था. लाइब्रेरी की क़िताबें भी अपने-अपने पन्नों को समेटकर आलमारियों में दुबकी पड़ी थीं. मन में छाया अंधेरा अब डूबती शाम का घनेरा बनकर कमरे में उतर गया.

“तुम दोनों यहां अंधेरे में बैठी क्या कर रही हो? मैं कब से तुम दोनों को सब ओर ढूंढ़ रही हूं और बैठी ही हो, तो कम से कम बत्ती तो जला लेतीं. शाम की चाय का भी होश नहीं रहा आज?” अम्मा ने आकर लाइब्रेरी की बत्ती जलाकर थोड़े रोष भरे स्वर में कहा, फिर मनस्वी की ओर संदेह भरी दृष्टि से देखा. मनस्वी उनकी दृष्टि में छिपे अर्थ को समझकर मन ही मन चिढ़ गई.

अचानक अम्मा के आने से अन्वी शर्मिंदा होकर हड़बड़ा गई. बातों में शाम कब इतनी गहरा गई पता ही नहीं चला.

“माफ़ करना अम्मा, दीदी से बातें करते हुए समय का ख़्याल ही नहीं रहा. मैं अभी चाय का इंतज़ाम देखती हूं.” अन्वी उठकर बाहर जाने लगी.

“चाय हो चुकी है, तुम दोनों के लिए बाहर टेबल पर रखी है, चलकर पी लो.” अम्मा का स्वर काफ़ी कुछ ठंडा हो चला था. मगर उनकी आंखों का रोष अब भी मनस्वी के चेहरे पर जमा हुआ था. आजकल वे देख रही थीं, अन्वी कुछ परेशान और उदास-सी लगती है. आकाश से भी कुछ खिंची-खिंची-सी रहती है. नई-नई शादी है, एक-दूसरे को समझने में, सामंजस्य बिठाने में थोड़ा समय तो लगता है, यही सोचकर उन्होंने अन्वी से कभी कुछ पूछा नहीं. यूं भी किसी के निजी जीवन में दख़ल देना उनके स्वभाव में नहीं था, लेकिन अब देख रही है, मनस्वी जब से आई है अन्वी के चेहरे की उदासी दिनोंदिन गहराती जा रही है. जब भी मनस्वी आती है, अन्वी के चेहरे पर उदासी की चादर खिंच जाती है.

छह महीने ही तो हुए हैं, अन्वी को आकाश की बहू बनाकर घर लाई हैं और आकाश की शादी के सालभर पहले बेटी मनस्वी की शादी हुई है. जितना होनहार और समझदार दामाद मिला है, उतनी ही प्यारी बहू भी मिली है. अन्वी घर की परंपराओं का पूरे मनोयोग से पालन करती है. घर के प्रति सारे कर्त्तव्य निभाती है, लेकिन दो-तीन महीनों से वे देख रही थीं, अन्वी बुझी-बुझी-सी रहती है और जब भी मनस्वी आती है, तब दोनों में पता नहीं क्या बातें होती हैं कि अन्वी और उदास हो जाती है. मनस्वी स्वयं भी तो वैसी ख़ुश नहीं दिखती, जैसी अभय जैसा पति मिलने के बाद उसे दिखना चाहिए.

क्या करें? मनस्वी बहुत डिमांडिंग है. रिश्तों से हर बात में बहुत ज़्यादा उम्मीदें रखती है. हर रिश्ते में उसे लगता है कि सामनेवाला उसे हथेली पर लेकर घूमता रहे, उस पर भी छोटी-छोटी बातों में उसके अहम् को ठेस लगती है और मुंह फूल जाता है. हर्ट होकर वह अपने आपको और दूसरों को दुखी करती रहती है. बचपन से ही उसे समझाने का बहुत प्रयत्न किया उन्होंने, लेकिन वह नहीं सुधरी. वो तो भला हो अभय जैसे समझदार पति का, जो तब भी हर बार स्थिति को संभाल लेता है, वरना भगवान जाने मनस्वी का ससुराल में क्या होता. फिर भी अभय के आगे उन्हें कभी-कभी अपराधबोध होने लगता है. मनस्वी की नादानियों को वो कितनी समझदारी से संभाल लेता है.

रात के खाने के टेबल पर अभय, आकाश और बाबूजी ने मिलकर मज़ेदार बातों से माहौल को काफ़ी हल्का-फुल्का कर दिया था. यूं भी घर की तीनों औरतों के मन पर छाये अपनी-अपनी चिंताओं के बादलों की उन्हें कोई ख़बर नहीं थी. वे तीनों तो अपनी रौ में मस्त थे. डिनर के बाद अभय मनस्वी को लेकर घर चला गया. अम्मा ने राहत की सांस ली. अगर मनस्वी यहां रहती, तो अन्वी और उसमें फिर पति-पत्नी के संबंधों को लेकर बात होती और अपने डिमांडिंग नेचर के कारण वह अन्वी को ग़लत राय ही देती.

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उस रात देर तक अन्वी को नींद नहीं आई, रिश्ते समझौते के पैबंद, समझौते की बैसाखियां, बस यही सब उसके मन-मस्तिष्क में घूमता रहा. क्या सच में ही कुछ ही दिनों में रिश्तों में प्यार ख़त्म हो जाता है और स़िर्फ समझौता ही करना पड़ता है. आकाश के साथ क्या हर बात में स़िर्फ एडजस्ट ही करना होगा? सुबह की चाय से लेकर रात में बिस्तर तक हर बात सिर झुकाकर माननी पड़ेगी. तभी लोगों के सामने यह भ्रम बना रहेगा कि वे दोनों बहुत सुखी हैं. ऐसे तो साथ सुख न होकर बोझ बन जाएगा.

दो दिन पहले की ही बात है. एक जगह शादी में जाना था. अन्वी ने अपनी मनपसंद साड़ी और गहने निकालकर रखे थे दोपहर से ही, लेकिन ऑफिस से आते ही आकाश ने उसकी पसंद की बजाय अपनी पसंद की साड़ी दी उसे पहनने को.

अब कपड़े भी दूसरे की मर्ज़ी से पहनने पड़ेंगे क्या? फिर आकाश ने भी पूछा था कि मैं क्या पहनूं? लेकिन अन्वी ने उस पर अपनी पसंद नहीं थोपी. कहा जो मन हो पहन लीजिए.

एक दिन उसका मनोहर डेयरी में खाना खाने का मन था, लेकिन आकाश उसे विंड एंड वेव्स ले गया. ऐसी कितनी ही बातें हैं, जो रोज़ होती हैं और अन्वी को ही आख़िर समझौता करना पड़ता है, लेकिन ये सारी बातें कहे किससे, कौन समझेगा? बस, एक मनस्वी दीदी हैं, जिनसे बातें करके थोड़ा मन हल्का हो जाता है, वे ही समझाती हैं अन्वी को.

सात-आठ दिन बाद मनस्वी फिर आई, एक ही शहर में ब्याही थी, तो आना-जाना लगा रहता था. दिन में दोनों शॉपिंग करने गईं और फिर चार बजे तक घर आ गईं. अन्वी ने सबके लिए चाय बनाई, अम्मा-बाबूजी को उनके कमरे में चाय देकर अन्वी अपनी और मनस्वी की चाय लेकर बेडरूम में आ गई. दोनों बातें करने लगीं. अन्वी ने मनस्वी के साथ साड़ी और मनोहर डेयरीवाली बातें शेयर कीं. मनस्वी ने उसके दुख को समझा, समझौता करना पड़ा उस पर सहानुभूति जताई. दोनों अपने में ऐसी खोई हुई थीं कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब से अम्मा दरवाज़े की आड़ में खड़ी होकर उनकी बातें सुन रही थीं.

जब अम्मा से रहा नहीं गया, तो वे कमरे में अंदर चली आईं. उन्हें देखकर दोनों हड़बड़ा गईं.

“शाबाश बेटा! रिश्तों का क्या ख़ूब विश्‍लेषण किया है तुम लोगों ने. प्यार को एकबारगी सिरे से ख़ारिज करके समझौते की बैसाखियां ही लाद दीं. लेकिन एक बार भी सोचा नहीं कि प्यार के पैर पोलियो की बीमारी से तुमने ही तो ख़राब किए हैं.” अम्मा दोनों की ओर देखकर बोलीं.

“जी मांजी, हम तो बस…” अन्वी अम्मा के सामने अपनी कही हुई बातें याद करके शर्मिंदा-सी हो गई.

“पहले तो मैं तुम्हारी ही समस्या का समाधान कर दूं अन्वी. शनिवार-रविवार को मनोहर डेयरी में इतनी भीड़ होती है कि वहां पैर रखने की भी जगह नहीं मिलती और शोरगुल अलग होता है. हो सकता है, आकाश तुम्हें आराम और सुकून के पल देना चाहता हो, इसलिए तुम्हें बड़े और खुले रेस्टोरेंट में ले गया. इसे तुम सकारात्मक ढंग से भी ले सकती थी, लेकिन उसके प्यार को तुमने समझौते का बोझ बनाकर अपने मन पर ओढ़ लिया और शादी में तुम लाइट पीच कलर की साड़ी पहन रही थी, जबकि तुम्हारा रंग गोरा है, तो आकाश ने इसीलिए डार्क कलर की साड़ी पहनने को कहा था, क्योंकि रात में वह रंग तुम पर ख़ूब खिल रहा था. पति अगर यह चाहे कि उसकी पत्नी सुंदर दिखे, तो यह उसका प्यार होता है न कि किसी तरह का समझौता करने का दबाव.” अम्मा ने एक अफ़सोसभरी निगाह अन्वी पर डाली.

अन्वी सिर नीचे किए चुपचाप सुनती रही. उसकी आंखों से बस आंसू बरसने ही वाले थे.

“किसी अपने की ख़ुशी के लिए उसकी कोई बात मान लेना समझौता नहीं, सहज समर्पण होता है, मगर तुम लोग समझौते और समर्पण के बीच के अंतर को समझ ही नहीं पाते हो. समर्पण में आपसी सामंजस्य होता है. उससे रिश्तों में प्रेम बना रहता है, लेकिन अगर रिश्ते में समझौते की बैसाखी थाम लोगी, तो दोष तुम्हारा है, रिश्ते का नहीं.” अम्मा मनस्वी की ओर देखकर कठोर स्वर में बोलीं.

“रिश्ते बैंक की तरह होते हैं. बैंक में स़िर्फ डिमांड करने से काम नहीं चलता, पहले वहां उतना ही डिपॉज़िट करना पड़ता है. इसी तरह रिश्तों में अगर प्यार और सम्मान चाहिए, तो प्यार और सम्मान देना सीखो. स़िर्फ डिमांड पर डिमांड करने से बहुत जल्दी अकाउंट खाली हो जाता है.” अम्मा ने एक बार फिर मनस्वी पर कटाक्ष किया.

मनस्वी गर्दन झुकाए चुपचाप सुन रही थी और अन्वी की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे.

“हलवे में अगर मिठास चाहिए, तो उसमें चीनी मिलानी पड़ती है. करेले का रस मिलाकर मिठास की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. इतना ज़्यादा डिमांडिंग बनोगी मनस्वी, तो रिश्तों और जीवन में हमेशा कड़वाहट व दूरियां ही हासिल होंगी, क्योंकि तुम देना नहीं जानती स़िर्फ लेने की इच्छा रखती हो.” अम्मा एक गहरी सांस भरकर बोलीं. “समझौते का ज़हर अपने दिमाग़ से निकालकर समर्पण के रेशमी धागों में बंधकर प्रेम को सहेजना सीखोगी, तो दांपत्य का सफ़र

उम्रभर प्यार से चलता रहेगा.” कहकर अम्मा कमरे से बाहर चली गईं.

मनस्वी और अन्वी अपराधबोध से सिर झुकाए खड़ी थीं, लेकिन घने कोहरे को चीरकर सुनहरी धूप के समान दोनों के मन में अम्मा समर्पण के रेशमी धागे बुनने में सफल हो चुकी थी.

–  अभिलाषा राहुरीकर

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कहानी- पिघलती सिल्लियां (Short Story- Pighalti Silliyaan)

काश सुजीत, तुम कहकर जाते, यूं ही बिना कुछ कहे अचानक चले गए. बेटे के आने का इंतज़ार तो कर लेते… उसे सच तो बता देते… कम-से-कम यह तो कह देते कि मां का ख़्याल रखना, वह स़िर्फ तेरे लिए ही जीती-मरती है. जैसे ज़िंदगीभर पलायन करते रहे, ज़िम्मेदारियों से वैसे ही आख़िरी क्षणों में भी चुपचाप चले गए. वरना जिसे कभी दिल की बीमारी न हो, उसका दिल अचानक काम करना कैसे बंद कर सकता है.

 Kahaniya

उसके और मेरे बीच ब़र्फ की टनों सिल्लियां जम चुकी हैं. मज़े की बात है कि कभी क्षणांश एकाध सिल्ली थोड़ी-सी कहीं, किसी कोने से पिघलती भी है और दो-चार बूंदों की नमी दिखने भी लगती है, तो तुरंत अविश्‍वास और नफ़रत की सर्द हवाएं चलने लगती हैं. मन में जमी सोच की फफूंद नमी को ढंक देती है. फिर से सिल्लियां ठोस और पथरीली हो जाती हैं.

ब़र्फ की ये चौकोर सिल्लियां आकार व अनुपात में समान व नुकीली न होने के बावजूद, किसी टूटे कांच के टुकड़े की मानिंद उसके दिल में जा चुभती हैं. उससे उठनेवाली पीड़ा इतनी पैनी होती है कि उसका पूरा अस्तित्व हिल जाता है. कितना तो रो चुकी है वह, अपने भाग्य को भी कोस चुकी है. ईश्‍वर के सामने कितनी प्रार्थनाएं कर चुकी है. पंडितों की बातों पर विश्‍वास कर जिसने जो उपाय करने को कहा, उसने वे भी किए… आस सब कुछ करवाती है, शायद इस तरह से ही सिल्लियां पिघल जाएं, पर सब व्यर्थ गया.

गुज़रते समय के साथ सिल्लियां इतनी सख़्त होती गईं कि पत्थर की तरह ही लगने लगीं. छुओ तो भी चोट पहुंचाएंगी और यूं ही सामने रहें, तो भी मन को चुभती रहेंगी. पीड़ा शरीर की हो या मन की… दर्द हर हालत में होता है. और उसे तो वर्षों हो गए हैं इस चुभन को सहते हुए. बच्चा अगर मां से मुंह मोड़ ले, तो शायद उससे बड़ी पीड़ा और कोई नहीं होती. मां के लिए उसका बच्चा ही सब कुछ होता है… उसके लिए वह दुनिया से लड़ने को तत्पर रहती है, ताकि दुख की आंच उस तक न पहुंच पाए, पर विडंबना तो यह है कि उसे अपने आंचल में सुरक्षित रखने के बावजूद वह उससे दूर हो गया. उसे लगता है कि उसकी मां ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन है, जो उसकी ख़ुशियों पर ग्रहण लगाना चाहती है.

उसे पता ही नहीं चला कि वह कैसे उससे दूर होता गया. वजह तो वह आज तक नहीं जान पाई है. उसे यही समझ आता है कि नौकरी और घर के काम में व्यस्तता की वजह से वह उसे उतना टाइम नहीं दे पाई, जो सुजीत उसे देते थे. उनका ख़ुद का बिज़नेस था और वैसे भी किसी चीज़ की कभी परवाह ही नहीं की थी, इसलिए उनका मस्त रहना शिवम को बहुत भाता था. घर-बाहर की सारी ज़िम्मेदारियों से चूर वह अक्सर झुंझला जाती थी और सुजीत पर आनेवाली खीझ और ग़ुस्सा शिवम पर निकाल देती थी.

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“पापा को देखो वह कितना कूल रहते हैं और एक आप हैं कि हमेशा चिढ़ती रहती हैं.” शिवम अक्सर उसे कहता और वह फट पड़ती, “पापा, जैसी मस्त लाइफ नहीं है मेरी. दोपहर बाद घर से जाते हैं, न काम की टेंशन है न घर की. थकती मैं हूं, वह नहीं, तो कूल तो रहेंगे ही.”

सुजीत तब उसका पक्ष लेने की बजाय शिवम की हां में हां मिलाते हुए कहते,  “पता नहीं क्यों थकती हो इतना. सारी दुनिया की महिलाएं काम करती हैं. तुम्हें तो बस हमेशा लड़ने का बहाना चाहिए. आदत है यह तुम्हारी.” सुजीत के

साथ-साथ धीरे-धीरे शिवम भी उसी टोन में बोलने लगा और अनजाने ही उनके बीच एक खाई बनती चली गई. सुजीत ने उन दोनों के बीच मीडिएटर की भूमिका निभानी शुरू कर दी और मां-बेटे के बीच मौन पसरता गया. ऐसी कठोर सिल्लियां शिवम के मन में जम गईं कि वह उन्हें पिघला ही न पाई. विदेश में पढ़ाई करने के लिए जाने के बाद से उनके बीच की शब्दों की टूटी-फूटी कड़ियां भी टूट गईं. वह तरसती ही रही अपने बेटे से बात करने के लिए. सुजीत ही थोड़ा-बहुत जब मन होता, तो उसके बारे में बता देते. दूरियां ख़त्म करने की बजाय न जाने क्यों सुजीत उन्हें और लंबी करते गए.

ऐसा कैसे हो सकता है कि एक बेटा अपनी मां से नफ़रत करे..? यही सवाल उसे मथता रहता. शिवानी इस बात को हज़ारों बार दिन में नकारती. “अरे ब़र्फ और मंगानी पड़ेगी, अभी तो पांच घंटे और हैं शिवम के आने में.” जेठानी के स्वर से वह अपने मन के भीतर छिपी अनगिनत वेदनाओं की गठरियों की गांठों को फिर से लगा, उनकी ओर देखने लगी.

“शिवानी, यहां आसपास कोई मार्केट होगी न, जहां से ब़र्फ मिल सके.” जेठानी ने उससे पूछा.

वह आज ही सुबह इंदौर से दिल्ली आई थीं. यहां के न तो उन्हें रास्ते पता थे और न ही बाज़ारों के बारे में कोई जानकारी थी. धीरे-धीरे बाकी रिश्तेदार भी जुट रहे थे, पर चूंकि परिवार में और कोई नहीं था, इसलिए शिवानी को ही सारे काम करने पड़ रहे थे. घर में कौन-सा सामान कहां रखा है, यह उसे ही बताना पड़ रहा था. चादरें कमरे में बिछा दी गई थीं… कभी पूजा की कोई सामग्री चाहिए… कभी रसोई में से कोई पुकार लेता…

हालांकि उसकी मौसी उसे बार-बार हिदायत दे रही थीं कि ऐसे में उठते नहीं है. “तू बैठी रह. रिश्तेदार, तेरे पड़ोसी, जानकार सब आ रहे हैं, तेरा उठना ठीक नहीं है.” पर क्या करे शिवानी…

भाई-बहनों ने अंतिम यात्रा की सारी तैयारियां कर दी थीं, पर उन्हें भी तो बताना ही था कि कहां क्या रखा है?

व्यस्तता कई बार आंसुओं को आंखों में ही कैद कर देती है. कहां है उसके पास शोक मनाने का समय… अभी तो यक़ीन तक नहीं आया है कि सुजीत चले गए हैं. सब कुछ कितना अचानक हुआ. रात को ही तो अस्पताल ले गई थी, डॉक्टर ने कहा, “हार्ट अटैक आया है…”

“पर कैसे? कब? बिल्कुल ठीक थे यह तो. कोई हार्ट प्रॉब्लम भी नहीं थी.”

“शुगर पेशेंट के साथ ऐसा हो जाता है. आपने बताया था न कि शुगर काफ़ी घट-बढ़ रही थी.”

उस पल ऐसा लगा था कि कोई पंछी फुर्र से उड़ गया हो.

काश सुजीत, तुम कहकर जाते, यूं ही बिना कुछ कहे अचानक चले गए. बेटे के आने का इंतज़ार तो कर लेते… उसे सच तो बता देते… कम-से-कम यह तो कह देते कि मां का ख़्याल रखना, वह स़िर्फ तेरे लिए ही जीती-मरती है. जैसे ज़िंदगीभर पलायन करते रहे, ज़िम्मेदारियों से वैसे ही आख़िरी क्षणों में भी चुपचाप चले गए. वरना जिसे कभी दिल की बीमारी न हो, उसका दिल अचानक काम करना कैसे बंद कर सकता है. शुगर ज़रूर उस रात भी बहुत घट-बढ़ रही थी. इंसुलिन भी नहीं लगाया था यह सोचकर कि शायद इस तरह कंट्रोल में आ जाए. कहां रहा कंट्रोल में कुछ… अचानक शुगर पचास हो गई. जल्दी से उसने कुछ मीठे बिस्किट खिला दिए. चेक की, तो इस बार 500 पहुंच गई थी. अस्पताल लेकर भागी, पर ईसीजी करते ही डॉक्टर ने बता दिया था कि हार्ट केवल पच्चीस प्रतिशत ही काम कर रहा है. सबको बुला लीजिए, कोई चांस नहीं है बचने का. हम इन्हें वेंटीलेटर पर डाल देते हैं.

वेंटीलेटर पर डालने की बात सुन उसकी रूह कांप गई थी. सुजीत का निस्तेज चेहरा देख मन भीग गया था उसका. बरसों की नाराज़गी, ग़ुस्सा और उसका उसे हमेशा अपमानित करना सब भूल गई थी वह. प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए जब उसने सुजीत को दलिया खिलाने की कोशिश की, तो उसकी आंखों के कोर भीग गए थे. शायद पश्‍चाताप हो रहा हो.

“बिल्कुल चिंता मत करो. तुम ठीक हो जाओगे. थोड़ी हिम्मत रखो और दवाइयों को रिस्पॉन्ड करो. डॉक्टर कह रहे हैं कि तुम मशीनें देखकर घबरा रहे हो. दवाइयां काम ही नहीं कर रही हैं.” उसने सांत्वना देने की कोशिश की थी. सुजीत एकदम ख़ामोश थे… कुछ नहीं कहा, न कुछ पूछा. शिवानी की तरह उन्होंने भी कहां सोचा होगा कि उनका अंतिम व़क्त आ गया है. जब तक कुछ घटे नहीं, कौन इस बात को मानना चाहता है.

“मौसी, शिवम आ गया.” मेरे भांजे ने कहा, तो सब उसकी ओर लपके. सबसे लिपटकर वह रो रहा था, पर उसके पास नहीं आया. शिवानी कब से केवल भीतर ही भीतर रो रही थी, पर शिवम को देखते ही उसका बांध सारे किनारों को तोड़ता हुआ वेग से बह निकला था. जब से आया था, पापा के सिरहाने ही बैठा हुआ था. उनके माथे पर बार-बार हाथ फेर रहा था, मानो कहीं किसी कोने में आशा हो कि शायद पापा उसके स्पर्श को महसूस कर, उसे एक बार आंख खोलकर देख लेंगे और कहेंगे, “आ गया मेरे बर्रे…” बचपन से ही शिवम को वे दोनों न जाने प्यार से कितने नामों से पुकारते आए थे. बिना अर्थोंवाले नाम… सुजीत कहते, “सारा दिन चिपका रहता है यह मुझसे जैसे बर्रा हो, जो चिपक जाए, तो पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जाता है.”

जब उसका मुंडन हुआ था, तो वह इतना प्यारा लगता था कि उसके सिर पर बार-बार हाथ फेरते हुए वह उसे ‘टकली’ कहती. कोई उसे शिवानी का ‘शिव’ कहता, दोस्त अक्सर उसे ‘शि’ कहकर पुकारते… शॉर्ट फॉर्म के ट्रेंड की वजह से. बचपन से ही वह इतना प्यारा था कि जो भी उसे देखता, उस पर स्नेह लुटाने लगता. पड़ोसी और सोसाइटी के लोग प्यार से ‘शिबु’ कहते थे.

शिवानी का मन कर रहा था कि शिवम को अपने सीने से चिपटाकर इतना रोए कि बरसों से जमे आंसू सारी ब़र्फ की सिल्लियों को पिघला दें, पर आने के बाद भी उसने न तो उसकी ओर देखा था और न ही कोई बात की थी. अपने अंदर न जाने कितने तूफ़ान समेटे रहता है. हमेशा उसे यही लगता रहा है कि पापा बीमार हैं, तो मां ज़िम्मेदार है, पापा मां के साथ बुरा सुलूक करते हैं, तो भी मां ही दोषी है… कहीं वह आज भी पापा की मौत का ज़िम्मेदार उसे तो नहीं ठहरा रहा… कांप गई थी शिवानी.

सुजीत को ब़र्फ की सिल्लियों से उठाकर अर्थी पर रख दिया गया था. स़फेद दुशालों से उसे ढंका जा रहा था. फूलमालाओं को पूरे शरीर पर बिछा दिया गया था. अब ले जाने की तैयारी थी. चार कंधों पर जाता है मनुष्य… कैसी विडंबना है यह भी… दुनिया से प्रस्थान करने के लिए भी हमें कंधे चाहिए होते हैं, सारी ज़िंदगी तो हम कंधे ढूंढ़ते ही रहते हैं. ले जाने की तैयारी पूरी हो चुकी थी, बस उससे कहा जा रहा था कि सुजीत के तीन चक्कर काट ले और कहे कि उसने उसे क्षमा कर दिया. उसकी चूड़ियां उतारकर सुजीत के साथ लपेट दी गईं. बिंदी पोंछ दी गई. उसे लग रहा था सैलाब उमड़ रहा है उसके भीतर चाहे जैसा था, था तो उसका पति… चाहे कितने दुख दिए, पर इस तरह जाना बर्दाश्त नहीं हो रहा था. प्यार के कण तो उनके बीच फिर भी व्याप्त ही रहे, बेशक विषमताओं की वजह से वे दिखे नहीं. फूट-फूटकर रो पड़ी वह. लिपट गई सुजीत से… आख़िरी बार महसूस करना चाहती थी उसे.

रुदन का हाहाकार मानो फैल गया था, तभी शिवम ने उसे उठाया. पलभर को दोनों की नज़रें मिलीं. उसका पूरा शरीर कांप रहा था, आंसू गालों को भिगो रहे थे. शिवानी ने कुछ कहना चाहा कि तभी शिवम ने उसे गले से लगा लिया.

“मत रोओ मम्मी, शायद ऐसा ही होना था. संभालो अपने आपको… मैं हूं न. आप रोओगे तो पापा को दुख होगा. उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी. जाने दो उन्हें चैन से.”

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उसका और शिवम का रुदन कमरे में भर गया था. नीचे शवदाह की गाड़ी खड़ी थी. वह नीचे जाने के लिए सीढ़ियां उतरने लगी.

ब़र्फ की सिल्लियां पिघल रही हैं. “कमरे में पानी फैल रहा है, इन्हें उठाकर बाहर फेंक दो.” बुआ ने कहा. उसे लगा सारी सिल्लियां पिघल गई हैं.

Suman Bajpai

सुमन बाजपेयी

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कहानी- लहर (Short Story- Lehar)

“वैसे भी अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? कभी फिर से घर बसाने का ख़्याल नहीं आता?” “कोई उचित पात्र मिला तो वह भी कर लूंगी. नहीं तो अपना कमा-खा रही हूं, कहां दिक़्क़त है? परिवर्तन की लहर धीरे-धीरे ही उठती है. यह कल्पना करना कि एक दिन कोई आंधी-तूफ़ान आएगा और पलक झपकते सब बदल जाएगा, बेव़कूफ़ी है.”

Hindi Kahaniya

बाहर धूप में मां और किरण आंटी को गप्पे मारते देख मैंने अनुजा को उनके पास ही छोड़ दिया और ख़ुद आवश्यक क़िताबें और नोट्स लेने अंदर आ गई. रसोई से आती भीनी-भीनी मीठी ख़ुशबू से मेरे क़दम स्वतः ही रसोई की ओर उठ गए. मेरी पसंद का गाजर का हलवा बन रहा था. मैं अपना लोभ संवरण नहीं कर पाई. रसोई में क़दम रखने ही वाली थी कि तभी बरामदे में ही आसन जमाए बैठी दादी का कठोर स्वर गूंज उठा, “तुझे इन दिनों रसोई में घुसने की मनाही है न?”

साड़ी के आंचल से हलवा उतारती चाची के हाथ कांप गए. उन्होंने मुझे कमरे में ही हलवा पहुंचाने का इशारा किया. उखड़े मूड से मैं कमरे में आकर क़िताबें निकालने लगी. अपने मिलनसार स्वभाव के अनुरूप मेरे बाहर आने तक अनुजा मां और आंटी से दोस्ताना गांठ चुकी थी. तीनों को मज़े से गपशप करते देख मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट तैर उठी. उसे क़िताबें और नोट्स थमाकर रवाना करके मैं अंदर आ गई. पीछे-पीछे मां और आंटी भी अंदर आ चुकी थीं.

“नई आई है तेरे कॉलेज में?” मां ने बातचीत का सूत्र पकड़ते हुए कहा.

“हां! मेरे ही विषय में है. अब मेरे काम का बोझ थोड़ा हल्का हो जाएगा.”

“व्यवहार की अच्छी है. सुंदर, सुशील, मिलनसार और ऊपर से अच्छी पढ़ी-लिखी, नौकरीवाली. उम्र भी ज़्यादा नहीं लगती.” आंटी ने कहा तो मैं उनकी वैवाहिक विज्ञापन जैसी भाषा सुनकर चौंक उठी. मां ने बात स्पष्ट की.

“तेरी सहेली आंटी की जाति की ही है. अपने वकील भतीजे के लिए वह उन्हें सर्वथा उपयुक्त लग रही है.” आंटी शायद मां के बात छेड़ने का ही इंतज़ार कर रही थीं, क्योंकि इसके बाद उन्होंेने अपने भतीजे के गुणों और खानदान की तारीफ़ में जो लंबे-चौड़े कसीदे काढ़ने शुरू किए, तो मेरे रोकने पर ही रुकीं.

“मैं आपको कल ही अनुजा से बात करके बताती हूं.” कहकर मैंने बमुश्किल एकतरफ़ा वार्ता को विराम लगाया.

अगले दिन ही कॉलेज में एकांत में मैंने उसके सम्मुख किरण आंटी का प्रस्ताव रख दिया था. वह ठठाकर हंस पड़ी थी. मुझे उसकी हंसी चुभ गई.

“तुम्हें नापसंद है, तो इंकार कर दो. इसमें हंसीवाली क्या बात है?”

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“अपनी आंटी को बता देना कि मैं विधवा हूं. फिर देखते हैं कि उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है?”

मैं अब सचमुच नाराज़ हो गई थी.

“अनुजा, मुझे ऐसे बेहूदे मज़ाक पसंद नहीं हैं. तुम्हें रिश्ता नहीं पसंद तो ऐसे ही इंकार कर दो.”

अनुजा भी अब गंभीर हो गई थी, “मैं मज़ाक नहीं कर रही, सच्चाई बता रही हूं.”

मैं हैरानी से आंखें फाड़े उसे देखती रह गई थी. आत्मविश्‍वास से लबरेज़ उस संयमित व्यक्तित्व की बात पर यदि अविश्‍वास करने की कोई वजह नहीं थी, तो विश्‍वास करने को भी दिल गवाही नहीं दे रहा था.

“मेरी क्लास का वक़्त हो गया है. इस विषय पर फिर कभी बात करेंगे.” घड़ी देखते हुए वह उठ गई थी. मैं देर तक उसे जाते देखती रही. चुस्त सलवार-कमीज़ पर ढीला-सा जूड़ा, आंखों पर महंगे फ्रेम का चश्मा, मीडियम हीलवाले सैंडल और एक हाथ में अदा से पकड़े नोट्स… उसके गरिमामय व्यक्तित्व में आधुनिकता और शालीनता का अद्भुत सामंजस्य था, जिसे देखकर विवाहित-अविवाहित का भेद करना ही मुश्किल था, उसके लिए विधवा होने की बात कैसे सोची जा सकती थी? जब से कुछ समझदार हुई हूं विधवा के नाम से मेरे सम्मुख चाची का चेहरा ही उभरता है.

मुड़ी-तुड़ी रंग उड़ी साड़ियों में घर के कामों में जुटी चाची. कभी कपड़े धोती, कभी खाना बनाती, कभी गेहूं साफ़ करती. इस पर भी घरवालों का नज़रिया ऐसा मानो दो वक़्त का खाना देकर उन पर एहसान कर रहे हों. मां ही कभी-कभार चुपके से उन्हें मिठाई, पकवान आदि पकड़ा देतीं. अभी दिवाली पर भी मां के आग्रह पर ही पापा सब घरवालों के नए कपड़ों के साथ चाची के लिए भी एक नई साड़ी ले आए थे, जिसे चाची ने बेहद सकुचाते हुए कृतार्थ भाव से ग्रहण कर लिया था. चाची कभी भी अधिकार भाव सेे कुछ क्यूं नहीं लेती या मांगती?… अपने मन में उठे सवाल पर मैं ख़ुद ही चौंक उठी थी, क्योंकि आज से पहले मेरे मन में इस तरह के कभी कोई सवाल नहीं आए थे.

लंच टाइम में अनुजा हमेशा की तरह हंसते-मुस्कुराते मिली, लेकिन मुझे असहज पाकर बोल उठी, “लगता है तू अभी तक सुबहवाले झटके से उभरी नहीं है?”

“और क्या! तुमने कभी बताया ही नहीं? किसी को मालूम ही नहीं!”

“तो तुम क्या अपेक्षा रखती हो कि मैं सिर पर विधवा की तख़्ती लगाकर घूमूं?” मैं उसके तीखे वार से एकदम सकपका गई.

“आई एम सॉरी! मेरा वो मतलब नहीं था. दरअसल, हमेशा से ही घर में ऐसा वातावरण देखा, तो मेरी सोच भी वैसी ही हो गई थी.

मुझे ख़ुद आश्‍चर्य हो रहा है कि इससे पहले मैंने कभी अपने पूर्वाग्रहों के खोल से बाहर आने का प्रयास क्यों नहीं किया? सुबह से अब तक मैं इस बारे में कितना कुछ सोच चुकी हूं, जो आज से पहले कभी दिमाग़ में आया ही नहीं.” मैंने उसे अपने घर के वातावरण के बारे में सब कुछ खोलकर बता दिया था. सुनकर वह गंभीर हो गई थी.

“मुझे तुम्हारी दादी पर तरस और चाची पर ग़ुस्सा आ रहा है.”

“तुम ग़लती से उल्टा बोल गई हो.” मैंने उसे तुरंत टोका था.

“नहीं, मैं सही बोल रही हूं. अपनी हालत के लिए दूसरे लोगों से ज़्यादा इंसान ख़ुद ज़िम्मेदार होता है. तुम्हारी चाची ने ख़ुद को पूरी तरह से क़िस्मत और दूसरों के रहमोकरम पर छोड़ रखा है. क्या वे नहीं जानतीं कि क़िस्मत के भरोसे काग़ज़ उड़ता है, पतंग तो अपनी क़ाबिलीयत से ही उड़ती है? क़िस्मत साथ दे न दे, क़ाबिलीयत ज़रूर साथ देती है. मयंक की दुर्घटना में मौत के बाद कुछ समय तक मैं भी काग़ज़ की तरह इधर-उधर उड़ती रही थी. जिधर हवा का झोंका बहा ले जाता, बह जाती. कभी मायकेवालों के भरोसे, तो कभी ससुरालवालों के भरोसे.

लेकिन जल्दी ही इस बेग़ैरत ज़िंदगी से मैं ऊब गई. आगे बढ़ने के लिए अपनों को सीढ़ी बनाकर सहारा लेना तो उचित है, पर उन्हें हमेशा के लिए बैसाखी बनाकर चिपके रहना सर्वथा ठीक नहीं. मैंने नौकरी के लिए हाथ-पांव मारने आरंभ किए. घर की चारदीवारी से निकली, ताज़ी हवा में सांस ली, चार लोगों से मिली तो ख़ुद को बना-संवारकर रखने की आवश्यकता महसूस हुई. फिर जब नौकरी पर जाने लगी, हाथ में चार पैसे आने लगे, तो अपनी तरह से जीने की इच्छा जाग उठी.”

“वैसे भी अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? कभी फिर से घर बसाने का ख़्याल नहीं आता?”

“कोई उचित पात्र मिला तो वह भी कर लूंगी. नहीं तो अपना कमा-खा रही हूं, कहां दिक़्क़त है? परिवर्तन की लहर धीरे-धीरे ही उठती है. यह कल्पना करना कि एक दिन कोई आंधी-तूफ़ान आएगा और पलक झपकते सब बदल जाएगा, बेव़कूफ़ी है.”

“हूं” मेरी गर्दन सहमति में हिलने लगी थी. “पर दादी पर तरस क्यों आता है? वे तो इतनी निरंकुश हैं!”

“दरअसल, जितनी वे निरंकुश हैं, अंदर से ख़ुद को उतना ही असुरक्षित महसूस करती हैं. दिन-प्रतिदिन बढ़ती शारीरिक अक्षमता इंसान की मानसिक असुरक्षा का दायरा बढ़ा देती है. उन्हें हर पल यह भय सताता रहता है कि घरवालों की नज़र में उनकी अहमियत कम से कमतर होती जा रही है. किसी भी तरह ख़ुद से बांधे रखने की चेष्टा में वे हर समय सबका ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करती रहती हैं. कभी अपनी बीमारी का हवाला देकर, कभी अपना असंतोष ज़ाहिर कर वे तिल का ताड़ बनाने का प्रयास करती हैं. उनका दिमाग़ हर वक़्त यही रणनीति बनाने में व्यस्त रहता है कि किसका ध्यान कैसे आकर्षित करना है, किसको कैसे अपने चंगुल में रखना है. अब ऐसे इंसान पर तरस नहीं आएगा, तो और क्या होगा? मन में वे भी जानती हैं कि वे तुम लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं. वे यह भी जानती हैं कि उनके प्रति तुम्हारा सम्मान मात्र दिखावा है, प्यार नहीं. पर वे बेचारी इसी से ख़ुद को भरमाने का प्रयास कर रही हैं.”

“सार यह है कि हैं तो दोनों ही असंतुष्ट और अवांछनीय.” मैंने कटु सच्चाई उगल दी थी.

“और ऐसा बनने के लिए औरों से ज़्यादा वे ख़ुद ज़िम्मेदार हैं. एक तो कुदरत ने पति नामक संबल छीनकर उन पर वैसे ही घोर अत्याचार किया है. ऐसे विपरीत परिस्थितियों में उनके अंदर से इस तरह की अतिशय प्रतिक्रियाएं निकलकर आना स्वाभाविक है. मेरा अनुभव कहता है कि मुश्किल भरे दौर में भी इंसान जितना सहज और सरल बना रहे, मुश्किलों का सामना करना उतना ही आसान हो जाता है. ज़िंदगी चाहे थोड़ी बची हो, चाहे ज़्यादा उसे जीभर कर जी लेने में ही समझदारी है.”

मेरी सोच की दिशा अचानक ही बदलने लगी थी. चाची इतनी निरीह क्यों बनी रहती हैं? स़िर्फ इसलिए कि वे विधवा हैं? पर विधवा होना कोई अपराध तो नहीं? विधवा तो दादी भी हैं. पर उनका कैसे घर में एकछत्र साम्राज्य चलता है? घर में सब उनसे कैसे डरे-डरे रहते हैं! बरामदे में तख़्त पर बैठे-बैठे वे सब घरवालों को निर्देश देती रहती हैं. तो क्या उनका सम्मान उनकी उम्र की वजह से है? जब चाची उम्रदराज़ हो जाएंगी, तो क्या वे भी ऐसे ही तख़्त पर बैठकर हुक्म चलाएंगी? बात मेरे गले के नीचे नहीं उतर रही थी. मुझे ख़ुद पर भी आश्‍चर्य हो रहा था, मैं अब तक इतने तार्किक ढंग से क्यूं नहीं सोच पाई? बरसों से घर में जो देखते-सुनते बड़ी हुई, उसे ही सच और सही मानने लगी. कभी अपने नज़रिए से किसी बात को जानने-समझने का प्रयास ही नहीं किया. उम्र में अनुजा मुझसे 4-5 वर्ष बड़ी, तो चाची से लगभग इतनी ही छोटी होगी. लेकिन दोनों के वैधव्य में मुझे कोई साम्य नज़र नहीं आ रहा था.

अगले दिन मैंने मां को अनुजा की सच्चाई बताई, तो मेरी तरह वे भी बौखला उठीं, “क्या ज़माना आ गया है? विधवाएं भी ऐसे बन-ठनकर रहने लगी हैं.” मेरी नज़रें कमरे में झाड़ू लगाती चाची पर अटक गईं. एक ज़माने में कितने आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं वे? और आज कितनी दीन-हीन लग रही थीं. मैं तुरंत मां को टोक बैठी थी, “इसमें बुराई क्या है मां? सुदर्शन व्यक्तित्व न केवल दूसरों को सुहाता है, वरन् ख़ुद को भी संतुष्टि देता है. औरों के लिए न सही, इंसान को ख़ुद के लिए सलीके से बन-संवरकर रहना चाहिए.”

मैं कह रही थी, तब देखा चाची के झाड़ू लगाते हाथ थम-से गए हैं. तीर निशाने पर लगता देख मैंने आगे बात बढ़ाई, “और फिर आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान ये तो ऐसे गहने हैं, जो इंसान के व्यक्तित्व में वैसे ही चार चांद लगा देते हैं.”

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चाची को सोच में डूबा देख मैं समझ गई कि काम हो गया है. मैं नहाकर निकली, तो दादी ने आवाज़ लगाई.

“अपनी मां से क्या बहस कर रही थी? समाज के जो तौर-तरी़के होंगे, उसी हिसाब से तो हर इंसान को रहना होगा न! पूर्वजों ने कुछ सोच-समझकर ही सब नियम-कायदे बनाए हैं. हम भी तो सब मान रहे हैं. तू क्या अनूठी है?”

“नियम-कायदे अप्रासंगिक हो जाएं, तो उन्हें बदल देने में ही समझदारी है.” मैंने हिम्मत करके कड़ा प्रतिवाद किया.

“तू अपने साथ पूरे परिवार को पाप का भागी बनाएगी. ले यह भगवान के पाठ की क़िताब पकड़, आज से रोज़ नहा-धोकर भगवान का पाठ किया कर. तभी तुझे सद्बुद्धि आएगी.”

“मुझे कॉलेज के लिए देर हो रही है. वैसे भी इन पुस्तकों में मेरी रुचि नहीं है. मैं तो कभी आपको मेरी पुस्तकें पढ़ने के लिए नहीं कहती? रही बात नियम-कायदे मानने की, तो यह अपनी-अपनी समझ की बात है. यह ज़रूरी नहीं कि एक स्थिति विशेष में सभी इंसान समान प्रतिक्रिया दें. गरम पानी में उबालने पर अंडा सख्त हो जाता है, जबकि आलू नरम. आपदा आने पर इंसान टूटकर बिखर भी सकता है, तो निखरकर उभर भी सकता है. परिस्थिति से ज़्यादा इंसान की अपनी क्षमता उसे शक्तिशाली या कमज़ोर बनाती है. मेरी नज़र में शक्तिशाली वह है जिसकी बात लोग दिल से मानें न कि डर से.” दादी मेरा इशारा समझ भौंचक्की-सी मुझे देख रही थीं.

घर के लोग एक-एक कर आसपास जुटने लगे थे. उनकी चिंतनशील मुद्राएं बता रही थीं कि घर में परिवर्तन की लहर उठ चुकी है.

Sangeeta Mathur

      संगीता माथुर

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कहानी- अब समझी हूं (Short Story- Ab Samjhi Hun)

क्या मांएं एक ही मिट्टी की बनी होती हैं? क्या हर मां एक जैसा ही सोचती है? आज जब हर बात अपने पर बीत रही है, तो मां को समझना कितना आसान होता जा है, पर सालों लगते हैं इसमें.

Kahaniya

संडे था, सुबह के नौ बजे थे. मैं मां से फोन पर बातें कर रही थी. रात को उन्हें बुख़ार था. मैं कह रही थी, “वहां ठंड बहुत होगी, ठंडे पानी में हाथ मत डालना, काकी को कहना वे सब काम ठीक से कर जाएंगी, दवाई टाइम से ले लेना.”

और भी बहुत सारी बातें करके मैंने फोन रख दिया. रिया सोकर उठी ही थी, बोली, “नानी से तो आपने रात में सोते हुए भी बात की थी, अब फिर.

आजकल आप बहुत बात करती हो नानी से, पहले तो इतने फोन नहीं करती थीं आप!”

“हां, आजकल बहुत करती हूं.”

“क्यों मां?”

“पता नहीं, आजकल बहुत मन करता है उनसे बात करने का.”

मैं नाश्ता बनाने किचन में चली गई, हाथ तो काम में व्यस्त हो ही गए थे, पर मन! मन तो वहीं रिया की बात पर अटक गया था कि आजकल आप बहुत फोन करती हो नानी को! ठीक ही तो कह रही है रिया, पहले तो दूसरे-तीसरे दिन कर पाती थी. अपने घर के कामों, व्यस्तताओं के बीच उनका हालचाल लेकर अपने जीवन में रमी हुई थी, पर अब घर भी वही है, काम भी वही है, व्यस्तताएं भी वही हैं, कुछ नहीं बदला है. वही दिनचर्या, पर प्रत्यक्षत: भले ही कुछ भी बदला हुआ न दिख रहा हो, पर मेरे मन के भीतर कहीं किसी कोने में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है.

तीन महीने पहले जब पार्थ उच्च शिक्षा के लिए विदेश गया, तो उसके जाने के बाद जो मुझे एहसास हुआ, उसने मुझे पूरी तरह बदलकर रख दिया है. अब समझी हूं मैं मां के दिल की बातें. जब से पार्थ गया है, मुझे रात-दिन उसका ख़्याल रहता है. मेरा बेटा पहली बार तो गया है घर से बाहर, वो भी इतनी दूर कि मिलना कब होगा यह भी तय नहीं है. फोन पर ही तो टिका है सब. जब उसका फोन आता है, जी उठती हूं मैं. उसका चेहरा जैसे आंखों के आगे आ जाता है. कभी वो अधिक व्यस्त होता है, तो पूरा दिन फोन न करके सीधे रात को ही करता है, तो कैसा उदास, खाली-खाली-सा दिन बीतता है.

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एक छोटी-सी घड़ी भी ले आई हूं, जिसे पेरिस के उसके समय से मिलाकर रख दिया है. आते-जाते घड़ी देखती रहती हूं कि अब वहां इतने बजे हैं, अब वो सो रहा होगा, अब यह करेगा, अब वो करेगा… जैसे-जैसे इस मन:स्थिति से गुज़रती रही, मां की याद मन में पहले से कहीं ज़्यादा आकर हलचल मचाती रही. वे भी तो मेरे फोन का इसी तरह इंतज़ार कर रही होंगी? उन्हें भी तो मेरा फोन करना इतना ही अच्छा लगता होगा. वे दिल्ली में अकेली रहती हैं, मैं यहां मुंबई से उन्हें फोन करने में कुछ लापरवाही-सी क्यों करती रही, यह सोचकर थोड़ी ग्लानि होती है.

मैंने क्यों नहीं उन्हें ऐसे फोन रोज़ किए? आज पार्थ जब पूछता है कि खाने में क्या बनाया? आपकी किटी पार्टी कब है? आप कब सोकर उठीं? कितने बजे सोई थीं? सैर पर गई थीं? तबीयत कैसी है? आजकल क्या लिख रही हैं? कौन-सी बुक पढ़ी? आपकी फ्रेंड्स के क्या हाल हैं?… आदि तो मन ख़ुशी से भर उठता है. वो जब मेरी हर बात में रुचि दिखाता है, तो मुझे कितना अच्छा लगता है? मैंने भी पहले अपनी मां से ये सब क्यों नहीं पूछा? सच यही है न कि जब अपने पर बीतती है, तब पता चलता है. यह एक ही बात क्यों, मां की बहुत-सी बातें ऐसी हैं, जो समय के साथ-साथ मुझे बहुत-कुछ समझाती चली गई हैं.

मुझसे पांच साल बड़े विनय भैया, जो घरेलू समस्याओं के चलते भाभी और बच्चों के साथ अलग रहते हैं. हम दोनों के ही विवाह से पहले जब हम झगड़ते थे, तब मां के समझाने पर हम दोनों ही अपना पक्ष रखते हुए मां की बातों से मुश्किल से ही सहमत होते थे. तब मां कितनी परेशान होती रही होंगी, यह भी अब समझ आया है. पार्थ और रिया जब-जब लड़े, मैंने अपना सिर पकड़ लिया. कई बार मैंने यह भी ग़ौर किया कि मेरे मुंह से भी वही बातें तो निकल रही थीं, जो मां मेरे और विनय भइया के झगड़े निपटाने के दौरान कहा करती थीं.

क्या मांएं एक ही मिट्टी की बनी होती हैं? क्या हर मां एक जैसा ही सोचती है? आज जब हर बात अपने पर बीत रही है, तो मां को समझना कितना आसान होता जा रहा है, पर सालों लगते हैं इसमें. पिताजी की असमय मृत्यु पर उन्होंने कितने दुख झेले होंगे समझती हूं. रिश्तेदारों से निभाने में कितने धैर्य की ज़रूरत होती है, अब समझ आया है.

उस समय कुछ रिश्तेदारों से मां ने पूरी तरह से संबंध तोड़ लिए थे. उस समय कम उम्र में मुझे मां की यह बात पसंद नहीं आई थी, पर अब ख़ुद अनचाहे, स्वार्थी, दिल को दुखी करनेवाले रिश्तों से मैंने स्वयं को दूर कर लिया है. अब समझ में आया है कि कुछ रिश्तों को अपने मन की शांति के लिए तोड़ने में ही भलाई होती है. यही तो विडंबना है कि हमें अपने माता-पिता के दुख-दर्द समझने में काफ़ी समय लग जाता है. समय के बीतने के बाद कुछ किया भी तो नहीं जा सकता न, पर अब जितना भी समय जिसके पास है, उसका एक-एक पल तो जिया जा सकता है!

अब तो मेरे फोन करने पर मां ही हैरान होकर कहती हैं, “अरे, अभी सुबह ही तो बात हुई थी तुमसे. दोपहर होते ही फिर मां की याद आ गई?” मैं भी लाड़ में कह देती हूं, “मां की याद आने का भी कोई टाइम होता है क्या?” वे हंस पड़ती हैं. कई बार पूछ चुकी हैं, “तुम्हें हुआ क्या है? पार्थ की बहुत याद आती है न?” मां हैं न, पा लेती हैं इस उम्र में भी मेरे मन की थाह.

मां जब अपनी फ्रेंड्स के साथ घूमने जाती हैं, कभी कोई तीर्थ या कभी कहीं और तब फोन पर जब मैं पूछती हूं, “मां, मज़ा आया फ्रेंड्स के साथ?” तो मां का जवाब हमेशा यही होता है, “हां, अच्छा तो लगा, पर जितना मज़ा अपने बच्चों के साथ समय बिताने में आता है, उतना किसी के साथ नहीं आता. कितनी भी सुंदर जगह चले जाओ, मन में विनय और तुम्हारी याद रहती है.” अभी तक तो मैंने इस बात को बहुत ही हल्के में लिया था कि ऐसे ही कह रही होंगी, पर अब मैं जब रजत और रिया के साथ कहीं जाती हूं, तो पार्थ मीलों दूर बैठा भी मेरे साथ-साथ होता है मेरे मन में, कि अभी साथ होता तो यह मांगता, यह ज़िद करता और पता नहीं क्या-क्या.

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आज मां की एक-एक बात कितनी सच लग रही है. कुछ सालों बाद रिया का विवाह होगा, पार्थ की गृहस्थी बसेगी, दोनों बच्चे अपनी-अपनी दुनिया में रम जाएंगे. फिर तो पता नहीं मां की क्या-क्या बातें और याद आएंगी, उनकी कौन-सी भावनाओं का मुझे भी एहसास होगा. लेकिन यह सच है कि आजकल मां की बहुत याद आती है. उनके जीवन की, उनकी बातों की गहराई तो काफ़ी समझ चुकी हूं, कितनी बाकी है देखते हैं.

Poonam Ahmed

    पूनम अहमद

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कहानी- विराम (Short Story- Viram)

कौशल को भी धक्का लगा था. जैसे-तैसे उन्होंने विहान को जगाया. घर का माहौल तनाव से भर गया. पूरे घर में सन्नाटा-सा छा गया. हर किसी के मन में यही सवाल उठ रहा था कि आख़िर ग़लती कहां हुई? विहान को अपराधबोध व पश्‍चाताप हो रहा था. वो अपने व्यवहार का आत्मविश्‍लेषण करने लगा, तब उसे एहसास हुआ कि मम्मी ने उसे सही राह दिखाने की कितनी कोशिश की, पर पापा के शह के कारण वह बिगड़ता चला गया.

 Kahani

लंबी स्याह रात… किले के प्राचीरों से ऊंची और न ख़त्म होनेवाली चढ़ाई… कहीं कोई ओर-छोर दिखाई ही नहीं देता है. क्या हो रहा है उसकी ज़िंदगी में? आख़िर ठहराव क्यों नहीं आ रहा है? समुद्र में लहरें मानो लगातार उठा-पटक कर रही हैं. उसे जिस शांत नदी की तलाश थी, वह तो जैसे किसी रेगिस्तानी रेत में जाकर कहीं समा गई है.

रात-दिन, बरस-दर-बरस, निरुद्देश्य से यूं ही सरकते जा रहे हैं. यह कहना कितना आसान है कि जीवन है, तो उम्मीद है… बस, आगे बढ़ते जाओ. ‘कर्म किए जा, फल की चिंता मत कर,’ गीता का यह ज्ञान सुनने में और दूसरों को देने में बहुत अच्छा लगता है, पर स्वयं इस पर अमल करना कितना कठिन कार्य है, यह तो वही जानता है, जो दूसरों की सलाह का पात्र बनता है. सच में सलाह देना कितना आसान काम है… कुछ शब्द ही तो मुंह से निकालने पड़ते हैं. वे भी ऐसे शब्द, जो सुनने और कहने दोनों में ही बहुत कर्णप्रिय लगते हैं. ‘आज नहीं तो कल सब ठीक हो जाएगा.’ ‘जैसे अच्छा व़क्त नहीं रहा, वैसे बुरा भी नहीं रहेगा.’ ‘पतझड़ के बाद ही वसंत आता है.’ ‘बी पॉज़ीटिव’. किसी की तकलीफ़ को देख सांत्वना देना मानो हर कोई अपना फ़र्ज़ समझता है.

उसे भी ऐसे सलाहकार बहुत मिले. उसकी ज़िंदगी में आनेवाले उतार-चढ़ाव से उसे कोई निकाल तो नहीं पाया, पर सांत्वना देने में किसी ने कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन क्या सच में ऐसे आदर्श वाक्यों से अशांत व्यक्ति शांत हो पाता है? उसके मन को राहत मिल पाती है? जिसके घाव रिस रहे हों, उसे तो शायद ऐसी सीखें ज़्यादा कचोटती होंगी और अंदर ही अंदर अवश्य ही झल्लाता होगा कि ‘जाके पैर न फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई.’ अपने दर्द को ख़ुद ही महसूस किया जा सकता है, दूसरा केवल ऊपरी पीड़ा देख पाता है, भीतर चल रहे झंझावात को वह कैसे महसूस कर सकता है? जैसे उसके भीतर चलता रहता था विहान को लेकर. हर समय उसे ही लेकर वह फ़िक़्रमंद रहती. बस, वह ख़ुश रहे, उसका करियर बन जाए और वह सेटल हो जाए. इसके अलावा और उसने क्या चाहा था? लेकिन स़िर्फ हार ही मिली उसे. तो क्या उसकी चाहत कुछ ज़्यादा ही बड़ी थी? क्या उसने कुछ ज़्यादा ही अपेक्षा रख ली थी अपनी ज़िंदगी से?

क्या वास्तव में समय के साथ सब ठीक हो जाता है? क्या व़क्त घावों पर मलहम लगाने का काम करता है? होता ही होगा, तभी तो सब एक ही बात कहते हैं. उसके मन के घोड़े बेलगाम भागे जा रहे थे. ज़िंदगी जब मशीन-सी हो जाती है, तब सब नीरस लगने लगता है. फिर न वसंत के आगमन का एहसास होता है और न ही पक्षियों का मीठा कलरव लुभाता है. प्रकृति के अनूठे सौंदर्य से भी मन अभिभूत नहीं होता. बहती नदी का रिदम भी तब आकर्षित नहीं करता है. बस, ज़िंदगी मशीनी हो जाती है और हम दिन-रात बिना सोचे-समझे, बिना अपने उद्देश्य का अवलोकन किए, बिना अपने लक्ष्यों पर फोकस किए दौड़ते चले जाते हैं.

बुआ ठीक ही कहा करती थीं कि चाहे शरीर हो या मन, उनकी सही तरह से देखभाल न करो, तो ज़ंग लग जाता है. बिल्कुल मशीन की तरह. और वह तो बिना रुके चली जा रही है. अगर तार्किक ढंग से देखा जाए, तो उसके शरीर में ज़ंग नहीं लगना चाहिए, क्योंकि ज़ंग तो रुकने पर लगता है यानी कि इस तर्क के सामने भी उसकी ज़िंदगी के समीकरण उलटकर रह गए हैं. वह रुक नहीं पा रही है, इसलिए ज़ंग लग रहा है. आख़िर विराम तो चाहिए ही…

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विडंबना तो यह है कि विराम न लेने के बावजूद उसे कहा जाता है कि ‘आख़िर तुम करती ही क्या हो? तुम्हारा कॉन्ट्रीब्यूशन है ही क्या? सारे दिन घर पर ही तो रहती हो. बाहर निकलो, तो पता चलेगा कि कितनी थकावट होती है.’

यह सुनकर लगता है, मानो किसी ने उसके कानों में पिघला हुआ सीसा उड़ेल दिया है. जिस इंसान को उसने बग़ैर अपने बारे में सोचे अपनी ज़िंदगी के 23 साल समर्पित कर दिए हों, उसके मुंह से यह सब सुन उसे लगता कि जैसे वह छली गई है. उसका सारा विश्‍वास-प्यार, सच कहा जाए तो सारा गुमान धराशायी हो जाता. इस इंसान के साथ सात फेरे लेकर जब उसने अपनी एक नई दुनिया बसाई थी, तो उसी पल उस पर आंख मूंदकर विश्‍वास कर लिया था. वह जैसा-जैसा कहता गया, वह करती गई. सवाल उसके मन में उठते थे, बहुत बार विरोध करने की इच्छा भी बलवती हुई, लेकिन तब तक उनके बीच विहान आ गया.

पति कौशल से दो बोल प्यार के सुनने को तरसते उसके कान और कुछ सम्मान की आशा में हर बार सपने संजोती उसकी उम्मीदें जब लगातार उसे धोखा देने लगीं, तो उसका केंद्रबिंदु बन गया उसका बेटा विहान. बस, इसी कोशिश में वह कौशल का टॉर्चर और ब्लैकमेलिंग एटीट्यूड सहती रही कि उसे विहान को एक अच्छा इंसान बनाना है. उसे कौशल की स्वार्थी सोच और पैसे को ही सबसे बड़ा रिश्ता मानने के अहंकार से दूर रखने की एक ज़िद-सी आ गई.

“तुझे अपने पापा जैसा नहीं बनना है.” विहान जब छोटा था, तो वह उसे अक्सर कहती. छोटा था, तो विहान उससे ही चिपका रहता, कौशल से बचता, लेकिन कौशल के मेनिपुलेशन से वह उसे कहां बचा पाई थी. कौशल जान गए थे कि उसे बस में करना है, तो विहान को अपनी मुट्ठी में करना होगा, क्योंकि जैसे राजकुमारी की जान तोते में बसती थी, उसकी मां की जान भी उसमें बसती है.

विहान को एक सुखद भविष्य देने के जुनून में वह जाने-अनजाने उसके प्रति कठोर होती गई. डिसिप्लिन में रहने और सिस्टमैटिक बनने का पाठ पढ़ाते-पढ़ाते वह कई बार उसके प्रति बहुत कटु भी हो जाती. बस, यही भय उसे सताता रहता कि कहीं विहान भी अपनेपापा जैसा न बन जाए, जिसे ज़िंदगी में एक सिस्टम को न फॉलो करना और बीवी की बात-बात में खिल्ली उड़ाना आत्मतुष्टि देता हो. जिसके लिए बीवी का मतलब खाना बनानेवाली मेड से ज़्यादा कुछ न हो. जब खाएं, उससे पहले ही सब्ज़ी छौंकी जाए और गर्म-गर्म रोटियां सर्व की जाएं. पहले बनाकर रखने का मतलब है कि तुम आलसी हो, तुम्हें कुछ नहीं आता. जैसे सुपीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स इंसान को भ्रमित जीवन जीने को मजबूर करता है, वैसे ही इंफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स भी इंसान को उलझाए रखता है. फ़र्क़ इतना है कि सुपीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स में इंसान अपने को बेहतर साबित करने के प्रयास में दूसरों को हीन दिखाने की कोशिश में लगा रहता है, जबकि इंफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स में इंसान अपनी हीनता छिपाने के लिए दूसरे को कमतर दिखाने की कोशिश में लगा रहता है.

जब कोई भय जुनून बन जाता है, तो शायद उसका चेहरा ही बदल जाता है. उसका असर नकारात्मक भी हो सकता है. तब यह बात कहां सूझती है, लेकिन उसके साथ ऐसा ही हुआ. वह तो बिना विराम लिए अपने जुनून के साथ आगे बढ़ रही थी. घर-गृहस्थी को संभालते हुए हर संभव कोशिश के साथ कि चलो एक दिन तो सब ठीक हो जाएगा. पर कौशल के इंफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स ने उसे ‘डिवाइड एंड रूल’ करने को उकसाया. वह विहान को सलीके से जीने का पाठ पढ़ाती, उसे व्यवस्थित रहने और पढ़ाई में ध्यान लगाने को कहती, तो दूसरी ओर कौशल विहान से कहता, “मस्त रहा कर. ज़्यादा करीने से चीज़ों को रखकर क्या हो जाएगा. रही बात पढ़ने की, तो अपने को परेशान करने की आवश्यकता नहीं है. कहीं कुछ नहीं बन पाया या नौकरी नहीं मिली, तो भी क्या फ़िक़्र है. मेरा बिज़नेस तो है न, पापा-बेटे मिलकर संभाल लेंगे.”

तब वह चीख पड़ती, “कौशल, वह इंजीनियर बनना चाहता है, उसे बचपन से ही शौक़ है. देखा नहीं कैसे हमेशा पेचकस और बाकी के टूल्स लिए घूमता रहता है. उसे उसके लक्ष्य से भटकाओ नहीं. मैं नहीं चाहती कि वह तुम्हारी तरह बिज़नेस करे. उसे आईआईटी की तैयारी करने दो.”

“तुम कितनी क्रूर हो. बहुत अत्याचार करती हो उस पर. हर समय पढ़ने के लिए कहना क्या अच्छी बात है. जा बेटा, तू कंप्यूटर पर गेम्स खेल जाकर.”

विहान को वह इस तरह समय बर्बाद करने से रोकती, तो पहले तो वह मान जाता था, पर धीरे-धीरे कौशल की शह पाकर वह विद्रोही होने लगा. “क्या प्रॉब्लम है आपकी? हमेशा मेरे पीछे पड़ी रहती हो. चार क़िताबें क्या पढ़ लीं, आप ख़ुद को महान समझने लगी हो. आप बहुत बुरी मां हो. हमेशा डांटती और टोकती रहती हो. पापा कितने अच्छे हैं, कभी कुछ नहीं कहते.” अवाक् रह गई थी वह. बचपन में बच्चे ऐसा कह देते हैं, पर दसवीं में पढ़नेवाला बेटा ऐसा कहे, तो लगता है, जैसे वह मां की ममता को ही ललकार रहा हो. सच में उसकी ज़िंदगी में लगातार बेटे के भविष्य को निखारने और उसे सही मार्गदर्शन देने की चाह में ज़ंग लग गया था.

सही कहा है किसी ने कि आपका सबसे बड़ा दुश्मन वही है, जो आपकी ग़लतियों पर पर्दा डाले, लेकिन यहां तो इसके उलट हो रहा था. विहान तो उसे ही अपना दुश्मन समझने लगा था. कौशल जितनी देर घर में होता, टीवी पर संस्कार या आस्था जैसे चैनल लगाकर बैठा रहता. घंटों वह बाबाओं के प्रवचन सुनता. वह चिढ़ती कि तुम क्यों ये फ़िज़ूल के कार्यक्रम देख समय बर्बाद करते हो. विहान ने जब देखा कि मम्मी ऐसा करने से पापा को मना करती है, तो वह पापा की सोच को जस्टीफाई करने के लिए या शायद अपनी मां को ग़लत साबित करने के लिए ख़ुद भी वही चैनल देखने लगा.

जब वह बारहवीं में पहुंचा, तो कौशल की सोच उस पर पूरी तरह से हावी हो चुकी थी, यहां तक कि वह उससे बात भी नहीं करता था. उसका बनाया खाना तक नहीं खाता, तब कौशल उसे बाहर से खाना खिलाकर लाते, लेकिन डांटा कभी नहीं कि ‘तुम अपनी मम्मी के साथ इतना बुरा व्यवहार क्यों करते हो’ या ‘मां की इज़्ज़त करनी चाहिए.’ वह कौशल से कुछ कहती, तो वह उसे ही गालियां देने लगता. विहान भी जब-तब उसे गालियां देने लगा, तो उसे महसूस हुआ कि सच में निरंतर अपने बेटे के लिए भागती उसकी ज़िंदगी मानो ज़ंग खा गई है. विराम तो लगाना ही होगा, वरना विहान की ज़िंदगी को कोई राह नहीं मिल पाएगी.

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उसने विहान को कुछ भी कहना या टोकना छोड़ दिया. जब वह उसकी बात नहीं मानता तो यही सही, वही दिल पर पत्थर रखकर उससे विमुख हो जाएगी. पापा की राह चलना चाहता है, तो ठीक है. बची हुई डोर भी हाथ से छूटते ही विहान के तो जैसे पर निकल आए. वह बिल्कुल बेकाबू हो गया. पढ़ाई-लिखाई सब ताक पर रख दी. दोस्तों के साथ घूमना, कंप्यूटर और मोबाइल पर गेम खेलना. पूरी-पूरी रात टीवी पर फिल्में देखना. वह चुपचाप सब देख रही थी. देख रही थी कि कौशल उसे कुछ नहीं कह रहे हैं, बल्कि उसकी मांगों को पूरा कर रहे हैं. कई बार उसे ताना देते, “क्या हुआ, तेरी मां आजकल तुझे कुछ कहती नहीं, लगता है उसका सारा जोश ठंडा पड़ गया है या फिर अनुशासन में रहने का बुख़ार उतर गया है.”

बारहवीं के बोर्ड एक्ज़ाम का पहला पेपर और विहान नौ बजे तक सो रहा था. उसने एक बार उठाया, तो ज़ोर से उसने उसका हाथ झटक दिया. दस बज गए, लेकिन वह पेपर देने ही नहीं गया. उस पल उसे लगा था कि वह हार गई है. सारे सपने चूर-चूर हो गए थे. उसका बेटा कभी ऐसा करेगा, कल्पना से बाहर की बात थी.

कौशल को भी धक्का लगा था. जैसे-तैसे उन्होंने विहान को जगाया. घर का माहौल तनाव से भर गया. पूरे घर में सन्नाटा-सा छा गया. हर किसी के मन में यही सवाल उठ रहा था कि आख़िर ग़लती कहां हुई? विहान को अपराधबोध व पश्‍चाताप हो रहा था. वो अपने व्यवहार का आत्मविश्‍लेषण करने लगा, तब उसे एहसास हुआ कि मम्मी ने उसे सही राह दिखाने की कितनी कोशिश की, पर पापा के शह के कारण वह बिगड़ता चला गया. जब कौशल ने विहान को समझाने की कोशिश की कि उसने अपना पूरा साल ख़राब कर लिया, तो वह उन पर ही ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा.

“पापा, आप ज़िम्मेदार हो इन सबके. मम्मी मुझे समझाती थी, तो आप मुझे कंप्यूटर खेलने के लिए उकसाते थे. ख़ुद कभी ऑर्गेनाइज़्ड नहीं रहे, तो मुझे भी अपने जैसा बना डाला. आप सचमुच बुरे हो और सेल्फिश भी. मम्मी को नीचा दिखाने के चक्कर में आप मेरे जीवन से खेल गए. आई एम सॉरी मम्मी. काश! आप मुझे डांटना न छोड़तीं.”

बिलखते हुए विहान को उसने जब सीने से लगाया, तो लगा कि उसकी ममता तृप्त हो गई है.

“बेटा, एक साल ख़राब होना उतना इम्पॉर्टेंट नहीं है, जितना कि उसकी और अपने जीवन की क़ीमत समझ लेना. मैं तुम्हारे साथ अगर सख़्त व्यवहार करती थी, तो इसलिए क्योंकि तुम्हारी भलाई चाहती थी. सिस्टम को न फॉलो करने से हम अपने लक्ष्य पर फोकस नहीं कर पाते हैं.”

सही ही कहते हैं लोग कि ‘पतझड़ के बाद ही वसंत आता है.’ लेकिन वह भी एक बात कहना चाहती है कि कभी-कभी ज़िंदगी को ज़ंग लगने से बचाने के लिए विराम देना भी आवश्यक है.

Suman Bajpai

     सुमन बाजपेयी

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कहानी- क्यूटनेस ओवरलोडेड (Short Story- Cuteness Overloaded)

स्मिता ने वीडियो देखने आरंभ किए, तो देखती ही रह गई. मॉल में हिचकिचाती मां को हाथ पकड़कर एस्केलेटर चढ़ाते नीलेश और पल्लवी, मां का विस्फारित नेत्रों से चारों ओर ताकना उसे अंदर तक गुदगुदा गया… यह मेरा धूप में सूखता स्मार्टफोन! चिकनाई हटाने के लिए मां ने डिटर्जेंट से धोकर सुखा दिया था… और यह उदास मां! चार दिनों से अनजाने में हुए इस नुक़सान का मातम मना रही हैं. मैं और पल्लवी समझा-समझाकर थक गए.

Kahaniya

डॉ. स्मिता वैसे भी कोई कॉन्फ्रेंस, सेमिनार आदि नहीं छोड़ती थी. फिर इस बार तो कॉन्फ्रेंस उनके छोटे भाई के शहर में थी. मां से मिलने का यह सुनहरा अवसर वह भला कैसे छोड़ सकती थी? शादी के बाद से ही नीलेश और पल्लवी उसे बुला रहे हैं. पर आजकल हर कोई अपने काम में इतना मसरूफ़ है कि बिना काम कहीं जाने का व़क्त निकाल ही नहीं पाता. तभी तो पति निशांत ने भी साथ चलने से इंकार कर दिया था.

“नहीं बाबा, तुम्हारी गायनाकोलॉजिस्ट मीट में मेरा क्या काम? मैं अपना क्लीनिक ही देखना पसंद करूंगा.”

स्मिता का उत्साह इससे ज़रा भी कम नहीं हो पाया था. ‘मायका’ शब्द मात्र से स्त्रियों में भर जानेवाली ऊर्जा से वह भी अछूती नहीं थी. भाई-भाभी के लिए उपहार ख़रीदने के बाद उसने मां के लिए भी एक सुंदर-सी गरम शॉल ख़रीद ली थी. वज़न में हल्की, आरामदायक हल्के रंग की यह शॉल मां को अवश्य पसंद आएगी. कल्पना में शॉल ओढ़े सैर के लिए निकलती मां का चेहरा आंखों के सामने आया, स्मिता के चेहरे पर स्वतः ही स्मित मुस्कान बिखर गई.

मां तो उसे देखकर ही उल्लासित हुई थीं, छोटे भाई नीलेश और नई भाभी पल्लवी ने भी उसे हाथों हाथ लिया, तो स्मिता का मायके आने का उत्साह द्विगुणित हो गया. नाश्ते में मां ने उसकी मनपसंद बेडमी पूरी बनाकर परोसी, तो स्मिता के मुंह में पानी भर आया. इससे पूर्व कि वह ढेर सारी पूरियां अपनी प्लेट में रख पाती, उसके मोबाइल पर कोई आवश्यक कॉल आ गई. वह मोबाइल लेकर थोड़ा दूर हटकर बतियाने लगी, पर उसकी नज़रें डायनिंग टेबल पर ही जमी थीं. मां उठकर अपने हाथों से नीलेश की प्लेट में पूरियां परोसने लगीं, तो नीलेश ने झटके से प्लेट हटा ली.

“क्या कर रही हो मां? जानती तो हो मैं डायट पर हूं. पल्लवी मेरे लिए दो टोस्ट पर बटर लगा दो.”

“ला, मैं लगा देती हूं. उसे नाश्ता करने दे. उसे भी तो ऑफिस निकलना है.” मां ने अपना नाश्ता छोड़कर उसके लिए टोस्ट पर बटर लगा दिया था. लेकिन ढेर सारा बटर देख नीलेश फिर भड़क उठा था.

“इतना सारा बटर! मां तुम रहने दो. पल्लवी, मैंने तुम्हें लगाने को कहा था.”

“हूं… हां!” सहमी-सी पल्लवी ने अपना दूध का ग्लास रख तुरंत दूसरे टोस्ट पर हल्का-सा बटर लगा दिया था और नीलेश की प्लेट में रख दिया था. तब तक स्मिता भी फोन पर वार्तालाप समाप्त कर डायनिंग टेबल पर आ चुकी थी. सब चुपचाप नाश्ता करते रहे. स्मिता ने चाहा पूरियों की तारीफ़ कर वह वातावरण को हल्का बना दे, पर मां का उतरा चेहरा देखकर उसने चुप रह जाना ही श्रेयस्कर समझा. शाम को जल्दी लौटने का आश्‍वासन देकर तीनों निकल गए थे.

रात का खाना कुक ने ही बनाया था. सबने साथ बैठकर खाया. स्मिता ने खाने की तारीफ़ की, साथ ही मां के हाथ की उड़द दाल, चावलवाली तहरी खाने की इच्छा भी ज़ाहिर की.

“पल्लवी, पता है मां साबूत उड़द और चावल की इतनी खिली-खिली तहरी बनाती हैं कि देखकर ही दिल ख़ुश हो जाता है. उसमें ढेर सारे घी वाला साबूत लाल मिर्च और जीरे का तड़का! उफ़्फ़! मेरे तो अभी से मुंह में पानी आने लगा. मैंने कई बार बनाने का प्रयास किया, पर वो मां वाला स्वाद नहीं ला पाई.” स्मिता पल्लवी को विस्तार से रेसिपी समझाने लगी. फिर अंत में यह और जोड़ दिया, “नीलेश को भी बहुत पसंद हेै यह डिश. क्यों नीलेश?”

“हां बिल्कुल! बनाओ न मां!” मोबाइल पर व्यस्त नीलेश ने संक्षेप में सहमति दे दी थी.

अगले दिन स्मिता को देर से जाना था, इसलिए वह अभी तक सो ही रही थी. कानों में नीलेश के ज़ोर से बोलने का स्वर पड़ा, तो उसकी आंख खुल गई.

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“यह मेरे पसंदीदा शर्ट का क्या कबाड़ा कर दिया है पल्लवी तुमने? स़फेद को आसमानी कर दिया है. आजकल कौन नील लगाता है?”

पल्लवी सकपकाई-सी खड़ी थी. तभी मां आ गईं, “अरे, तेरे सारे स़फेद कपड़ों पर कल मैंने नील लगाई थी. याद नहीं, तू कितनी गहरी नीलवाले कपड़े पहनता था? पूरे नीले ही करवा लेता था. यह तो मैंने बहुत हल्की लगाई है, ताकि ऑफिस में ख़राब न दिखे.”

नीलेश ने झुंझलाहट में शर्ट पलंग पर फेंक दी थी और पल्लवी से आलमारी में से दूसरी शर्ट देने को कहा. मां निढाल-सी लौट आई थीं. उनकी बेचारगी देख स्मिता की आंखें गीली हो गई थीं. मां का हाथ अपने हाथों में ले वह कहे बिना नहीं रह सकी थी, “क्यों करती हो मां यह सब? जब किसी को आपकी, आपके काम की, आपकी भावनाओं की कद्र ही नहीं है…”

“मैं नहीं करती बेटी! मेरी ममता मुझसे यह सब करवा लेती है. मैं तो उन लोगों की मदद करना चाहती हूं. मेरा आत्मसम्मान मुझे किसी पर बोझ बनकर रहने की इजाज़त नहीं देता. पर क्या करूं? सब उलट-पुलट हो जाता है.”

“नीलेश-पल्लवी भी तुम्हें आराम देना चाहते हैं मां! घर में इतने नौकर-चाकर हैं तो सही. फिर अब तो पल्लवी भी है नीलेश की देखरेख को. आपको क्या ज़रूरत है सबकी फ़िक्र करने की?” स्मिता ने मां को थोथी सांत्वना दी थी. थोथी इसलिए, क्योंकि अपने आश्‍वासनों के प्रति वह स्वयं भी आश्‍वस्त नहीं थी. उसे अपना बचपन और मां-पापा का लाड़-दुलार याद आ रहा था. व़क्त के साथ-साथ रिश्तों के समीकरण इतने उलट-पुलट क्यों जाते हैं? माता-पिता के लिए अपने बच्चों की लापरवाहियों, ग़ैरज़िम्मेदाराना हरकतों को माफ़ या नज़रअंदाज़ करना कितना आसान होता है. नाराज़ या क्रोधित होने की बजाय वे उसमें भी बच्चों की मासूमियत खोज लेते हैं. लेकिन बड़े होने पर वे ही बच्चे बुज़ुर्ग माता-पिता की अज्ञानतावश की गई ग़लतियों पर खीझ जाते हैं, ग़ुस्सा करने लगते हैं. हमारी सहनशीलता इतनी कम क्यों हो गई है? यदि बुढ़ापा बचपन का पुनरागमन है, तो बुढ़ापे की नादानियों में हमें मासूमियत नज़र क्यों नहीं आती? जो कुछ उनके लिए इतना सहज, सरल था हमारे लिए इतना मुश्किल क्यों है?

बे्रकफास्ट टेबल पर नीलेश ने बताया कि रात के खाने पर उसने अपने कुछ विदेशी क्लाइंट्स को आमंत्रित किया है. उनके लिए सी फूड, मैक्सिकन आदि बाहर से आ जाएगा.

“पल्लवी, तुम थोड़ा ड्रिंक्स, क्रॉकरी, सजावट आदि देख लेना. मैं शायद उन लोगों के साथ ही घर पहुंचूं. दीदी, आप भी हमें जॉइन करेंगी न?”

“अं… टाइम पर आ गई, तो मिल लूंगी सबसे. थोड़ा-बहुत साथ खा भी लूंगी, पर वैसे मुझे यह सब ज़्यादा पसंद नहीं है. मां, आपके लिए जो बनेगा, मैं तो वही खाऊंगी.”

नीलेश पल्लवी को और भी निर्देश देता रहा. नाश्ता समाप्त कर उठने तक पार्टी की समस्त रूपरेखा तैयार हो चुकी थी. स्मिता ने कहा, वह जल्दी लौटने का प्रयास करेगी, ताकि पल्लवी की मदद कर सके. किंतु लौटते-लौटते उसे देर हो गई थी. घर पहुंचकर पता चला कि पल्लवी ख़ुद भी थोड़ी देर पहले ही लौटी है. ऑफिस में कुछ काम आ गया था.

“पर तैयारी तो सब हो गई दिखती है?” चकित-सी स्मिता ने सब ओर नज़रें दौड़ाते हुए हैरानी ज़ाहिर की, तो कृतज्ञता से अभिभूत पल्लवी ने रहस्योद्घाटन किया.

“यह सब मम्मीजी ने करवाया है. मैं तो देर हो जाने के कारण ख़ुद घबराई-सी घर पहुंची थी, पर यहां आकर देखा, तो सब तैयार मिला.”

“सब मेरे सामने ही तो तय हुआ था. तुम्हें आते नहीं देखा, तो मैंने सोचा मैं ही करवा लूं, वरना नीलेश आते ही तुम पर सवार हो जाएगा. बचपन से ही थोड़ा अधीर है वह! तुम उसकी बातों का बुरा मत माना करो… हां, कुछ कमी रह गई हो, तो तुम ठीक कर लो.”

“कोई कमी नहीं है मम्मीजी. सब एकदम परफेक्ट है! इतना अच्छा तो मैं भी नहीं कर सकती थी.” पल्लवी ने भूरि-भूरि प्रशंसा की, तो मां एकदम बच्चों की तरह उत्साहित हो उठीं.

“तुम लोग अब तैयार हो जाओ. नीलेश मेहमानों को लेकर आता ही होगा.”

जैसी कि उम्मीद थी, पार्टी बहुत अच्छी रही. सबके कहने पर मां एक बार बैठक में आकर मेहमानों से मिल लीं. बाकी समय वे अंदर ही व्यवस्था देखती रहीं. मेहमानों को विदा कर जब तीनों घर में प्रविष्ट हुए, तो देसी घी के तड़के की सुगंध से घर महक रहा था.

“वॉव, लगता है मेरी पसंदीदा तहरी बनी है.” स्मिता सुगंध का आनंद लेती हुई डायनिंग टेबल तक पहुंच गई. उसका अनुमान सही था. गरमागरम तहरी सजाए मां उसी का इंतज़ार कर रही थीं.

“तुमने तो खा लिया होता मां. तुम क्यों भूखी रहीं? मैंने तो मेहमानों के संग थोड़ा खा लिया था.” कहते हुए स्मिता ने प्लेट में तहरी परोसकर पहला चम्मच मां के मुंह में और दूसरा चम्मच अपने मुंह में रख लिया.

यह भी पढ़ेघर को मकां बनाते चले गए… रिश्ते छूटते चले गए… (Home And Family- How To Move From Conflict To Harmony)

“वाह, कब से इस स्वाद के लिए तरस रही थी. नीलेश, आ चख. तुझे भी तो यह बहुत पसंद है.” स्मिता ने आग्रह किया, तो नीलश ने एक चम्मच भरकर उसी प्लेट से खाना आरंभ कर दिया. एक, दो, तीन… नीलेश को गपागप खाते देख स्मिता चिल्ला पड़ी.

“तू अलग ही ले ले भाई.”

नीलेश सचमुच अलग प्लेट भरकर खाने बैठ गया.

“आपने अभी तो भरपेट खाना खाया था.” पल्लवी के मुंह से बेसाख़्ता निकल गया.

“लो, तुम भी टेस्ट करो. इसके लिए तो मैं बचपन में भी पेट में अलग जगह रखता था.” नीलेश को स्पीड से खाता देख पल्लवी के मन का डर ज़ुबां पर आ गया.

“आप लोगों को कम न पड़ जाए. और कुछ बना दूं?”

“अरे, तू अपने लिए परोस ना. मैंने बहुत सारी बनाई है. कम होगी, तो मैं बना दूंगी.” मां ने पल्लवी को जबरन साथ खाने बैठा लिया.

“मां, याद है बचपन में एक बार नीलेश सारी तहरी चट कर गया था. तुम दोबारा बनाने उठीं, तो वह तुम्हारी मदद के लिए रसोई में आ गया था और फिर जल्दबाज़ी में दाल-चावल के डिब्बे ही उलट डाले थे.”

“यह नटखट तो हमेशा ऐसे ही काम बढ़ाता था. मेरा किशन कन्हैया!” मां ने लाड़ से बेटे को देखा. “जाले उतारने में मदद करने आता, तो एकाध बल्ब या ट्यूबलाइट फूटना तय था. एक बार तो टीवी स्क्रीन ही तोड़ डाली थी.” मां ख़ूब रस ले-लेकर बता रही थीं.

“क्या? फिर तो ख़ूब मार पड़ी होगी इन्हें?” पल्लवी बोल पड़ी.

“नहीं. मारता तो कोई भी नहीं था. पापा ने डांटा अवश्य था और मां ने तो हमेशा की तरह प्यार से समझा भर दिया था.” कहने के बाद अपने ही शब्दों पर ग़ौर करता नीलेश कुछ सोचने लगा था.

“एक बार तो इसने मां की महंगी सिल्क साड़ी पानी में डुबोकर सत्यानाश कर डाली थी.” स्मिता ने याद दिलाया.

“दरअसल, पार्टी में मैं इसे गोद में बिठाकर खाना खिला रही थी. इससे मेरी साड़ी पर कुछ गिर गया. घर लौटकर मैंने साड़ी उतारकर ड्राइक्लीन के लिए रख दी. इसने चुपके से उसे पानी में भिगो दिया. पूरी साड़ी ही गई. बेचारा मासूम नेकी करना चाहता और नुक़सान हो जाता.”

“काहे का मासूम! बदमाश था.” स्मिता बोली.

“तू बड़ी दूध की धुली थी! रोज़ रसोई में रोटी बनाने के लिए खिलौने के चौका-बेलन लेकर आ जाती और मेरा दिमाग़ खाती.”

मां ने याद दिलाया.

“और क्या? एक बोरी आटा, तो बिगाड़ा ही होगा इसने!” नीलेश कहां चूकनेवाला था.

“किसी ने कुछ नहीं बिगाड़ा. उन छोटे-छोटे शरारती पलों ने तो रिश्तों को जोड़ने का काम किया. अपनत्व जगाकर प्यार के तंतुओं को जोड़े रखा. समय की आड़ में जब रिश्तों के महल ढहने लगते हैं, तब अपनत्वभरे उन पलों की स्मृति ही हमारा संबल बन जाती है.” भावनाओं में बहती मां उन पलों को याद कर एकाएक बहुत प्रसन्न और संतुष्ट नज़र आने लगी थीं.

दो दिनों के अल्प प्रवास में स्मिता के लिए ये सबसे यादगार सुकूनमय पल थे और सबसे भव्य दावत भी.

अपने शहर लौटकर, तो वह फिर आपाधापीभरी ज़िंदगी में व्यस्त हो गई थी. नीलेश का नाराज़गी भरा फोन आया, तो वह चौंकी, “आपको कुछ वीडियोज़ भेजे थे. तब से आपके कमेंट का इंतज़ार कर रहा हूं.”

“ओह, देखती हूं.” स्मिता ने वीडियो देखने आरंभ किए, तो देखती ही रह गई. मॉल में हिचकिचाती मां को हाथ पकड़कर एस्केलेटर चढ़ाते नीलेश और पल्लवी, मां का विस्फारित नेत्रों से चारों ओर ताकना उसे अंदर तक गुदगुदा गया… यह मेरा धूप में सूखता स्मार्टफोन! चिकनाई हटाने के लिए मां ने डिटर्जेंट से धोकर सुखा दिया था… और यह उदास मां! चार दिनों से अनजाने में हुए इस नुक़सान का मातम मना रही हैं. मैं और पल्लवी समझा-समझाकर थक गए.

‘ओह! बेचारी भोली मां.’ स्मिता बुदबुदा उठी. एक अन्य वीडियो में मां बेहद डरते हुए फुट मसाजर पर पांव रखे हुए थीं. नीलेश और पल्लवी ने एक-एक पांव जबरन पकड़ रखा था. थोड़ी देर में वे रिलैक्स होती नज़र आईं, तो स्मिता के होंठों पर मुस्कुराहट और आंखों में नमी तैर गई. उसके लिए समय थम-सा गया था. इससे पूर्व कि उसका अधीर भाई उसे दोबारा कमेंट के लिए कॉल करे, स्मिता की उंगलियां मोबाइल पर थिरकने लगी थीं.

‘क्यूटनेस ओवरलोडेड…’

इतने क्यूट कमेंट ने नीलेश की आंखें नम कर दी थीं.

Sangeeta Mathur

संगीता माथुर

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कहानी- टूटे खिलौने (Short Story- Toote Khilone)

इतना सुनते ही उसका हाथ फिसला और वायलिन का तार टूट गया. उसके बाद वायलिन बजना बंद हो गया. ऐसी कितनी ही घटनाएं भरी पड़ी हैं ज़िंदगी के सुरों के बिखरने की, फिर भी वह सही सलामत है. भला खिलौनों के टूटने से कहीं आदमी टूटता है. खिलौने तो बस जज़्बात भर होते हैं और आदमी को जीने के लिए भावनाओं से अधिक ज़रूरत प्रैक्टिकल बनने की होती है. ज़ज़्बात का बिखरना भी कहीं दिखाई देता है? वह तो एक अंदरूनी प्रक्रिया है.

Kahani

उसने कुर्सी का हत्था पकड़कर ख़ुद को संभाला. ऐसे लग रहा था कि चक्कर खाकर गिर पड़ेगा. आंखों के आगे अंधेरा छा रहा था. तभी भीतर से ज़ोर का अट्टहास सुनाई पड़ा, जैसे कोई कह रहा हो- बस, लड़ चुके अपने आप से? वह जवाब देना चाहता था उन बहुत से सवालों का, जो सालों से उसे घेरे हुए थे, लेकिन उसे लगा कहने के लिए व़क़्त कम है. फिर वह कहे किससे? काश! कोई उसकी बात भी सुनता.

दर्द बढ़ रहा था कि तभी लगा कोई उससे कह रहा हो- बस, इतनी जल्दी हार मान गए. उसने आंखें फैलाकर और भीतर झांकने की कोशिश की, अरे यह तो उसके खिलौने की सेना के टैंक का सिपाही था. दर्द में भी वह मुस्कुरा दिया. ‘हां दोस्त, तुम्हें तो मैं बचपन से जानता हूं और सचमुच तुम बहुत बहादुर हो.’ सिपाही बोला, ‘तुम्हें याद है मेरे हाथ टूटे हुए हैं और फिर भी मैंने हार नहीं मानी, जबकि तुम हो कि सब कुछ सही सलामत होते हुए भी टूट रहे हो. देखो, शरीर से टूटा आदमी नहीं हारता. हां, जिस दिन तुम दिल से टूट जाओगे, उस दिन सचमुच हार जाओगे. यह हार ज़िंदगी के जंग की हार होगी. उठो, तुम्हें अपनी बात कहने और अपना पक्ष रखने के लिए अभी और जीना है.’ उसे लगा दिल का दर्द कम हो रहा है. कोई है जो उसे कह रहा है ज़िंदगी में इतनी जल्दी हार नहीं मानते. उसकी आंखों से झर-झर आंसू बह निकले.

उसने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई, गहरा अंधेरा था. बस बरामदे में नाइट बल्ब टिमटिमा रहा था. उसे अपना खिलौनेवाला सिपाही याद आया. बहुत प्यार करता था वह अपने इस सिपाही से. हर समय हाथ में दबाए पूरे घर में दौड़ता रहता और रात में सोता तो सिरहाने रखकर. उसे लगता जब तक यह सिपाही उसके साथ है, तब तक कोई उसे नहीं हरा सकता.

एक दिन छोटे भाई ने खेल-खेल में सिपाही को दीवार पर दे मारा. सिपाही के हाथ टूट गए. भाई जीतना चाहता था और सिपाही की बांह तोड़कर वह ख़ुद को विजयी समझ रहा था. तब उसने रोते हुए भाई की शिकायत पापा से की तो वे बोले, ‘आपस में समझ लो. छोटा भाई है. उसे उत्पात करने का अधिकार है. हां, तुम बड़े हो, उसे क्षमा कर दो.’ भाई को रोते देख वह बोला, ‘भैया, आप भी मेरा खिलौना तोड़ दो, बात बराबर हो जाएगी.’ और वह बोला, ‘कोई बात नहीं भाई, मैं इसके हाथ जोड़ दूंगा, पर तुम्हारा खिलौना नहीं तोड़ूंगा. भला तुम्हारे खिलौने तोड़ने से मेरे सिपाही का हाथ थोड़ी जुड़ जाएगा. तुमने अपने कोर्स की क़िताब में वह कहानी नहीं पढ़ी, जिसमें राजा ने तीर से घायल हंस उस राजकुमार को दिया, जिसने उसे चोट लगने पर बचाया था. उसे नहीं, जिसने उसे तीर मारकर धरती पर गिराया था. जानते हो क्यों? क्योंकि मारनेवाले से बचानेवाले का अधिकार ज़्यादा होता है.’ आह! फिर एक टीस उठी. बड़े होने पर भाई को मकान चाहिए था और उसने रिश्तों को खिलौने की तरह ही तोड़ दिया. अजीब-सी बात है… उसके साथ वह तो सदैव ही सही रास्ते पर चलता है, नीति का ध्यान रखता है और सब के सब उसी से नाराज़ हो जाते हैं. और एक दिन दिल की दीवार पर भावनाओं का ख़ून बिखर जाता है. वह सिर से पांव तक लहूलुहान हो उठता है और फिर ऐसे ही कभी कोई सिपाही, तो कभी वायलिन उसे जीने की ताक़त दे देता है.

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वायलिन का ध्यान आते ही एक पुरानी बात याद करके उसे हंसी आ गई. उस दिन वह ख़ुशी बांटने के लिए घर में वायलिन बजा रहा था कि भीतर से आवाज़ आई, ‘प्लीज़, यह बाजा मत बजाया करो. तुम्हें भले ही इसके सुरों से ख़ुशी मिलती हो, पर आस-पड़ोस से लेकर घर के सभी सदस्य तुम्हारे इस वायलिन के बजने से डिस्टर्ब हो जाते हैं.’ इतना सुनते ही उसका हाथ फिसला और वायलिन का तार टूट गया. उसके बाद वायलिन बजना बंद हो गया. ऐसी कितनी ही घटनाएं भरी पड़ी हैं ज़िंदगी के सुरों के बिखरने की, फिर भी वह सही सलामत है. भला खिलौनों के टूटने से कहीं आदमी टूटता है. खिलौने तो बस जज़्बात भर होते हैं और आदमी को जीने के लिए भावनाओं से अधिक ज़रूरत प्रैक्टिकल बनने की होती है. ज़ज़्बात का बिखरना भी कहीं दिखाई देता है? वह तो एक अंदरूनी प्रक्रिया है.

उसने फ्रिज से पानी की बॉटल निकाली और ग्लास में पानी डाल पीने लगा. जैसे-जैसे पानी की घूंट गले के नीचे उतरती, उसे लगता तबियत बेहतर हो रही है. यह क्या है? कौन है? जो उसे अकेले में तंग करता है, उसके अपने ही विचार तो उसे मथ डालते हैं.

उसे लगा इस बार उसे शतरंज के मोहरे चुनौती दे रहे हैं. ज़िंदगी इतनी सरल होती तो आज साठ पार करने के बाद सभी ज़िम्मेदारियों को पूरा कर वह इतना बेचैन न होता. उसे लगा चौसर पर बिछा काला बादशाह हंस रहा है- देखो, तुम्हें स़फेद मोहरे से खेल रहे अपने ही लोगों को मात देनी है. तुम्हें अपने पैदल लड़ाने हैं, घोड़े और ऊंट कटाने हैं और हर हाल में मुझे बचाना है.

वह चौंका. यह खिलौने का बादशाह उसके दिल में बैठकर कैसा क़िरदार निभा रहा है. नहीं, असली ज़िंदगी कोई शतरंज की बिसात नहीं है जिस पर रिश्ते दांव पर लगा दिए जाएं. वह क्यों अहंकार के बादशाह को बचाने के लिए अपने हाथी-घोड़े बलिदान कर देता है?

इससे पहले कि वह कुछ और सोचता, भावनात्मक दौरा आगे बढ़ता तभी फ़ोन की घंटी बज उठी. इतनी रात गए कौन फ़ोन कर रहा है. उसका दिल धकड़ने लगा. कहीं यह भी कोई भ्रम न हो? अपने आप से बातचीत का ही हिस्सा. मगर नहीं फ़ोन की घंटी लगातार बज रही थी और उसके जगे होने का एहसास करा रही थी.

वह उठा. उसने रिसीवर उठाया और धीरे से बोला, “हैलो…”

उधर से आवाज़ आई, “हैलो पापा, आप सो तो नहीं रहे थे. हैप्पी बर्थडे पापा.”

“कौन? कौन बेटा अरूप तुम…” उसकी आंखों से झर-झर आंसू बह निकले. “कैसे हो बेटा? पूरे तीन साल बाद तुम्हारी आवाज़ सुन रहा हूं.”

“मैं ठीक हूं पापा. पहले सोचा रात में फ़ोन करूं कि न करूं, फिर दिल नहीं माना.”

“बेटा, कब से तरस रहा था तुम्हारी आवाज़ सुनने को.”

“तो पापा फ़ोन क्यों नहीं किया?”

“बेटा, तुमने भी तो फ़ोन नहीं किया मुझे.”

“ओह, पापा आप मुझसे नाराज़ थे और मैं डर रहा था.”

“बेटा, मैं नाराज़ था तो क्या? तुम माफ़ी मांग लेते या मुझे मना लेते.”

“पापा, मैं आपको बचपन से जानता हूं.  आप अपनी जगह सही होते हैं.”

“बेटा, जब मैं सही हूं, तो तुम मेरी बात मान क्यों नहीं लेते?”

अरूप बोला, “पापा, बस यही डर तो सबको आपसे बात करने से रोक देता है. पापा, आप इतने ज़िद्दी क्यों हैं?”

अरूप को लगा उधर से रोने की आवाज़ आ रही है. “बेटा, मैं क्या करूं? अब इस उम्र में ख़ुद को बदल तो नहीं सकता. मैं सही हूं इतना तो जानता हूं, पर आज पता लगा कि मैं ज़िद्दी भी हूं. ज़िद्दी हूं तभी तो अकेला हूं.”

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तभी अरूप बोला, “पापा प्लीज़, आप रोइए मत. आप तो बहुत मज़बूत हैं और मैं आज आपका दिल नहीं दुखाना चाहता. आई एम सॉरी पापा. लीजिए, मम्मी से बात करिए.”

“हैलो शेखर, ओ शेखर मेरी भी सुनोगे कि बस अकेले ही रोते रहोगे.”

“हां बोलो, तुम्हारी बात नहीं सुनूंगा तो किसकी सुनूंगा.”

“शेखर, मैंने बहू देखी है बहुत सुंदर और सुशील है. देखो, अरूप तुम्हारा बेटा है और उसका अपनी ज़िंदगी के बारे में ़फैसला लेने का कुछ हक़ तो बनता है.”

“बात उसकी पसंद की नहीं है, तुम तो जानती हो मैं उसे कितना प्यार करता हूं. क्या वह मेरी एक बात नहीं मान सकता था. भारतीय रीति से किसी हिंदुस्तानी लड़की से शादी कर लेता. अपने देश में क्या लड़कियों की कमी है.”

“शेखर, एक बार बहू को देख तो लो, मेरा तो दिल जीत लिया उसने. सुनो, अरूप का इंडिया आने का मन कर रहा है और बहू भी आना चाहती है. उसके पापा अमेरिकन हैं, पर उसकी मां केरल की है और पूरे भारतीय संस्कारवाली. उसके मामा भारत में रहते हैं और दोनों पूरे रीति-रिवाज़ से शादी करना चाहते हैं.”

उसे कुछ अच्छा महसूस हुआ. “ठीक है, जैसा तुम लोग चाहो.”

अरूप बोला, “पापा प्लीज़, मुझे माफ़ कर दो.”

शेखर बोला, “बेटा, मुझसे अलग होकर तुम देश से दूर हो, दिल से नहीं.”

“पापा, मैं आ रहा हूं.”

अरूप को लगा अब पापा कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं. वह धीरे-से बोला, “पापा, अपना ख़याल रखना.”

उसके शरीर की तनी हुई नसें ढीली पड़ चुकी थीं और अपने आपसे वार्तालाप का स्वर कुछ स्पष्ट हो रहा था. इस समय उसे अपना वायलिन बेतरह याद आ रहा था. उसने आलमारी के ऊपर नज़र डाली. वायलिन वहीं था, कुछ धूल जम गई थी. उसने हिम्मत कर उसे उठा लिया. एक टूटा हुआ तार जैसे कुछ कह रहा हो. उसने बेस से तार ढीला किया और टूटे तार को जोड़ जैसे ही हाथ फेरा वायलिन से सुर फूट पड़े. उसका चेहरा मुस्कुरा उठा. एक, दो, तीन और वह धीरे-धीरे वायलिन के सुर साधने लगा. चेहरे से तनाव के बादल छंट रहे थे.

इससे पहले कि वह उन सुरों में खो जाता, फ़ोन फिर बज उठा.

इस बार वह शांत था, कोई बेचैनी नहीं और न ही रात का एहसास.

उसने आराम से फ़ोन उठाया. आज उसका बर्थडे है और ज़रूर यह भी किसी बहुत अपने की ही आवाज़ थी. “भैया, जन्मदिन की बधाई.”

“कैसे हो सुधीर? बड़े सालों बाद तुम्हें भैया याद आए.”

“भैया, क्या करूं? अपनी ग़लती का जितना एहसास होता, उतना ही मैं संकोच के मारे तुम से बात नहीं कर पाता.”

“क्या सुधीर, कहीं अपनों से बात करने में भी संकोच होता है. आज पांच साल बाद बात  भी कर रहा है, तो बड़े भाई को रुलाने के लिए.”

“भैया, मुझे घर पर कब्ज़ा करके कुछ भी हासिल नहीं हुआ. मैंने थोड़े-से ज़मीन के लिए जीते-जागते अपने लोगों को खो दिया. इसका एहसास मुझे तब हुआ, जब शादी के बाद पिंकी बेटी ने कहा कि पापा, यह घर मेरा नहीं है और मेरा मायका ताऊजी के घर में है. मैं इस घर में तभी क़दम रखूंगी जब आप ताऊजी को यहां लेकर आओगे. भैया, मुझे यह घर काटने को दौड़ता है. सच है भैया, ईंट और गारे से तो मकान बनता है, घर तो घरवालों से बनता है. भैया, आप यहां आ जाओ या फिर मुझे अपने पास बुला लो. रहना ही तो है, कहीं भी रह लूंगा. दीवारें हमारे जाने के बाद भी यहीं खड़ी रहेंगी. हां, दिल के बीच की दीवारें गिर गईं तो जीवन जीना आसान हो जाएगा. वह लगातार बोलता ही जा रहा था.

“भैया, तुम्हें याद है, जब हम बालू के टीले में घरौंदा बनाते थे तो एक तरफ़ से तुम अपना दरवाज़ा बनाते और दूसरे तरफ़ से मैं अपना और  फिर जब हम अपने-अपने दरवाज़े में हाथ डालते, तो हमारे हाथ उस घरौंदे  में एक-दूसरे को पकड़ लेते और हम कहते, हमारे दरवाज़े अलग हो सकते हैं, पर घर नहीं.”

“सुधीर, अब तू भी मुझे रुलाएगा क्या? अभी अरू का फ़ोन आया था, वह आ

रहा है.”

“क्या कह रहे हो भैया? अरू आ रहा है? मेरी तो आंखें ही तरस गई थीं उसे

देखने को.”

“हां सुधीर, अरू आ रहा है और बहू भी पसंद कर ली है उसने. उसकी शादी यहीं करनी है बड़ी धूमधाम से और सुनो, पिंकी बेटी को मेरे पास भेज देना. कह देना तुम्हारे ताऊजी और मुझमें कोई मतभेद नहीं है. अब बचे ही कितने दिन हैं हमारी ज़िंदगी के, जो गिले-शिकवे लेकर ऊपर जाएं.”

“ऐसा मत कहो भैया, भगवान तुम्हें लंबी उम्र दें.”

“सुधीर, देर मत करना, कल सुबह ही आ जाओ, सारी तैयारी तुम्हें ही करनी है.”

इस बार शेखर को लगा कि सुधीर रो रहा हैै. “क्या हुआ सुधीर? तू रो क्यों

रहा है?”

“भैया, यह सोचकर कि तुम्हें कितना ग़लत समझ बैठा? मुझे पता होता कि तुम इतनी आसानी से मुझे माफ़ कर दोगे, तो भला मैं माफ़ी मांगने में इतने साल क्यों लगाता?”

“सुधीर, इतनी उम्र बीत जाने पर भी अपने भाई को नहीं समझ पाए. अब तुम भी अरूप की तरह यह मत कह देना कि भैया, तुम ज़िद्दी हो.” दोनों भाई हंस पड़े.

“और सुनो सुधीर, कल आना तो हीरा हलवाई की बालुशाही ज़रूर लाना. मुद्दत हो गई मुझे ऐसी बालुशाही खाए.” इसके बाद अगर फ़ोन हाथ में रहता भी तो बात नहीं हो पाती.

फ़ोन रखते ही शेखर को लगा, कहीं ऐसा न हो ख़ुशी से हार्ट फेल हो जाए.

वह सोचने लगा- जब मिट्टी के टूटे और बेजान ख़िलौने फिर से जुड़ सकते हैं, तो हमारे टूटे रिश्ते, जिनमें एक-दूसरे की भावनाओं को समझने की ताक़त है, वे दुबारा क्यों नहीं जुड़ सकते? सचमुच उसे लगा, टूटे रिश्तों को जोड़कर वह ज़िंदगी की जंग जीत गया है.

– मनोहर

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कहानी- अचीवमेंट (Short Story- Achievement)

रमा को आज दिन की पार्टी की कुछ बातें याद आ रही थीं. मां की सहेलियों ने जब उमा दी और उससे पूछा था कि क्या कर रही हो आजकल, तो उमा दी ने गर्वभरे स्वर में अपने कामकाजी होने के बारे में बताया था. उसके ‘हाउसवाइफ हूं’ कहने पर मां ने जैसे शर्मिंदा होते हुए कहा था, “इसने नहीं किया कुछ. बस, घर पर आराम किया है.”

Kahaniya

रात के ग्यारह बज रहे थे. रमा ने सोने से पहले मां के कमरे में झांका, वे बेड पर लेटीं उमा दी से बात कर रही थीं. अपने से आठ वर्ष बड़ी उमा दी और मां को ‘गुडनाइट’ बोलने के लिए वह अंदर आ गई, ‘गुडनाइट’ कहते हुए पूछा, “मां, थक गई हैं क्या?”

“नहीं-नहीं, बिल्कुल नहीं. आज का दिन तो बहुत अच्छा रहा. बहुत मज़ा आया, उमा दी भी अभी यही कह रही थीं. नींद ना आ रही है तो आओ, बैठो.”

“नहीं मां, नींद तो आ रही है. अब कल सुबह बात करेंगे.” कहकर रमा दूसरे कमरे में सोने आ गई, उमा दी भी अभी उसके पास सोने वाली हैं, रमा कई बातें सोचने लगी. आज मां का पचहत्तरवां जन्मदिन था. वह मुंबई से, उमा दी दिल्ली से मेरठ पहुंची हैं. अनिल भैया जो रमा से पांच साल बड़े हैं, उनसे फोन पर बात कर रमा और उमा दी ने एक सरप्राइज़ पार्टी रखी थी. रमा कल रात उमा दी के पास दिल्ली पहुंच गई थी. आज सुबह-सुबह मेरठ आकर मां को सरप्राइज़ दिया है. मां टीचर थीं, अब रिटायर्ड हैं. उमा दी भी एक अच्छी कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत हैं. रमा हाउसवाइफ है, दोपहर में मां की ख़ास सहेलियों को एक होटल में लंच पर आमंत्रित किया गया था. मां बहुत ख़ुश थीं. उन्हें देखकर उमा दी, अनिल भैया और रमा भी ख़ुश हो रहे थे. पिता का स्वर्गवास तो सालों पहले हो गया था. मां को ख़ुश रखने के लिए तीनों यथासंभव कोशिश करते थे.

जब भी रमा मेरठ आती है, मन में एक उदासी घिरी रहती है. यह उदासी वह कभी किसी से शेयर नहीं कर पाई. हां, अनजाने में ही अनिल भैया उसका साथ देते रहे हैं. रेखा भाभी और भतीजी काव्या से भी उसका मन ख़ुश रहता है, पर मां और दी! पता नहीं जान-बूझकर या अनजाने में वे दोनों रमा का दिल सालों से दुखाती रही हैं. अगर अनजाने में, तो दोनों की इतनी कम उम्र तो है नहीं कि वे किसी को दिल दुखानेवाली बातें कहें और उन्हें महसूस न हो और अगर जान-बूझकर, तो यह कितना कटु सत्य है कि आपके अपने ही आपका मन सबसे ज़्यादा आहत करते हैं. अगर बाहरवाले आपके मन को कष्ट पहुंचाते हैं, तो आप उनसे अपने संबंध सीमित कर एक किनारा कर सकते हैं, पर इन सबसे क़रीबी रिश्तों का क्या किया जाए, जिन्हें आपकी आंतरिक पीड़ा का एहसास नहीं होता.

अभी भी उसका मन तो था कि मां और बहन के साथ बहुत-सी बातें करे. दो दिन बाद चली ही जाएगी, पर बातों का अंत क्या होता है इसका जो अनुभव उसे था, उसे देखते हुए उसने अकेले लेटना ही ठीक समझा.

मुंबई में रमा अपने पति विपिन और बच्चों तन्मय व तन्वी के साथ अपनी गृहस्थी में बहुत ख़ुश और संतुष्ट थी. सुशिक्षित होने के बावजूद रमा ने घर और बच्चों की उचित देख-रेख को ही प्राथमिकता देते हुए कभी कोई नौकरी करने के बारे में नहीं सोचा था. इसके पीछे भी उसके अपने कुछ तीखे-कटु अनुभव थे. विपिन और बच्चों ने उसे हमेशा प्यार और आदर दिया था. उसे कभी अपने हाउसवाइफ होने पर दुख नहीं था, पर वह जब भी मां और उमा दी से मिलती, तो दोनों ही उस पर वर्किंग वुमन न होने का ताना कसतीं. मां का तो हमेशा यही कहना होता था, “तुझे इतना पढ़ाया-लिखाया, तूने कुछ नहीं किया. अगर तुझे घर-गृहस्थी में ही जीवन ख़राब करना था, तो बता देती. मैं क्यों इतना पढ़ाती-लिखाती.” उमा दी ने भी हमेशा ऐसी बातें ही की थीं. “भई, हाउसवाइफ के रंग-ढंग तो मैं अपनी पड़ोसनों के रोज़ ही देखती हूं, कोई काम नहीं होता उन्हें, बस गेट पर खड़े होकर गप्पे लड़वा लो. मैं तो पूरा दिन घर पर रहने की सोच भी नहीं सकती.” मां और बहन की ऐसी बातें रमा के दिल पर गहरा प्रहार-सा कर जातीं, लगता क्या सचमुच जीवन में उसने कुछ नहीं किया? भैया ने हमेशा उसकी उदार मन से प्रशंसा की थी. पता नहीं कितनी ही बातें उसे अक्सर याद आती रहती थीं, जब मां और उमा दी ने उसका मज़ाक उड़ाया था. उमा दी सोने आईं, तो रमा ने अपनी आंखें यूं ही बंद कर लीं. दिन की बहुत-सी बातें याद आ गई थीं, तो अब बात करने का मन ही नहीं हो रहा था. उमा दी भी उसे सोया समझ चुपचाप सो गई थीं.

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रमा को आज दिन की पार्टी की कुछ बातें याद आ रही थीं. मां की सहेलियों ने जब उमा दी और उससे पूछा था कि क्या कर रही हो आजकल, तो उमा दी ने गर्वभरे स्वर में अपने कामकाजी होने के बारे में बताया था. उसके ‘हाउसवाइफ हूं’ कहने पर मां ने जैसे शर्मिंदा होते हुए कहा था, “इसने नहीं किया कुछ. बस, घर पर आराम किया है.” छलछलाई आंखों को बड़ी मुश्किल से रोका था रमा ने. मन अंदर तक कड़वाहट से भर गया था. उसके सब्र का पैमाना अब छलकने लगा था, पर हमेशा की तरह इन कटाक्षों का जवाब देने से उसने ख़ुद को रोक ही लिया था. फिर कितने ही विचारों के आरोह-अवरोह में डूबते-उतराते उसकी आंख लग गई थी.

अगला दिन भी घर में कब बीत गया, पता ही नहीं चला. फिर अगली सुबह उमा दी और रमा साथ ही निकलनेवाली थीं. प्रोग्राम यही था कि उमा दी रमा को एयरपोर्ट छोड़कर अपने घर चली जाएंगी. दोनों पैकिंग कर रही थीं, तभी मां वहीं पास आकर बैठ गईं. कुछ इधर-उधर की बातों के बाद बोलीं, “रमा, तुम थोड़ा रुक जातीं.”

“नहीं मां, विपिन और बच्चों को परेशानी होती है. बच्चों की परीक्षाएं भी शुरू होनेवाली हैं. मेरा वहां रहना अभी ज़रूरी है.” उमा दी ने कहा, “अरे, सब मैनेज कर लेते हैं. मैं भी तो छुट्टियों में यहां आती रहती हूं वहां सबको छोड़कर. एक तो पता नहीं घर में रहनेवाली लेडीज़ को यह क्यों लगता है कि उनके कहीं जाने से कोई काम रुकता है. मुझे देखो, मैं तो ऑफिस से भी छुट्टी लेकर यहां आई हूं. घर के काम क्या चीज़ हैं. क्या तुम सचमुच घर-गृहस्थी के अलावा कुछ नहीं सोचती रमा?” अपमान का एक घूंट जैसे रमा के गले में अटक-सा गया. मां भी शुरू हो गईं, “इसने यही तो किया है हमेशा, इसी में तो रच-बस गई है. वैेसे रमा, परसों पार्टी में जब सब अपने बारे में, अपनी बेटी-बहू के अचीवमेंट्स के बारे में बता रही थीं, तुम्हें मन में दुख तो होता होगा न कि सारी पढ़ाई-लिखाई ख़राब कर दी.”

आज रमा को जैसे स्वाभिमान ने झिंझोड़ दिया, पलभर में ही उसके दिल से सारा लिहाज़, सारी झिझक, संकोच ख़त्म हो गया. वह बेहद गंभीर स्वर में कहने लगी, “मां, मेरे दिल में कामकाजी महिलाओं के लिए बहुत सम्मान है. वे घर-गृहस्थी के साथ ऑफिस की ज़िम्मेदारियां भी संभालती हैं, पर आप लोग मेरे जीवन को, घर-गृहस्थी संभालने की मेरी चॉइस को इतना तुच्छ क्यों समझती हैं? मैंने सचमुच कुछ नहीं किया होगा, ऐसा आपको लगता है, मैं ऐसा नहीं समझती. मेरा अचीवमेंट मुझे हज़ारों, लाखों रुपए नहीं देता, पर जो देता है वह अमूल्य है. मैंने अपने बच्चों को बचपन की, अपने स्नेह की, अपने रात-दिन के लाड़-प्यार की मधुर यादें दी हैं, जो दुर्भाग्यवश मेरे पास नहीं हैं. आपके आत्मनिर्भर होने के दंभी स्वभाव ने दिन-रात आहत किया है मुझे. आपको याद है मेरी सहेली विभा, उसकी मम्मी बेहद सरल, आम-सी गृहिणी थीं. मैं जब भी कभी स्कूल से उसके साथ उसके घर जाती थी, तो सरिता आंटी हम दोनों को कितने स्नेह से बिठाकर खाना खिलाती थीं. मैं कभी उन्हें भूल नहीं पाई और जब कभी वह मेरे साथ हमारे घर आती थी, तो आपका कहना होता था, “मैं तो काम करके आई हूं, यह दोस्ती ख़ुद ही निभाओ. ख़ुद बनाओ और खिलाओ. मैं कोई हाउसवाइफ हूं, जो किचन में ही घुसी रहूं.”

मां, मैंने आपको कभी घर के किसी काम में रुचि लेते नहीं देखा, आपको बाहर रहना ही अच्छा लगता था. चाहे स्कूल हो या छुट्टियां हों, मेरा बचपन कितना अकेला और उदास रहा है, आपको क्या पता. आपके घर से बाहर रहने के शौक़ में मैंने क्या-क्या सहा है, आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकतीं. मुझे ख़ुद ही नहीं पता, आधुनिक, शिक्षित माहौल में रहने के बावजूद अल्प शिक्षिता, सरल, स्नेही सरिता आंटी कब मेरी आदर्श बनती गईं. मैंने अपने बच्चों को वही स्नेह व सुरक्षा देने का प्रयत्न किया है, जो मुझे विभा के घर जाकर महसूस होता था. मैं इस बात को भी खुले दिल से स्वीकार करती हूं कि पिताजी के न रहने पर आपने ही घर संभाला है, पर मां, आत्मनिर्भर होने का इतना दंभ! इतना घमंड कि आप मेरे हर काम को हेय दृष्टि से देखती आई हैं. यहां तक कि आप मेरे पास मुंबई आने पर मेरे साफ़-सफ़ाई और घर को व्यवस्थित रखने के शौक़ का मज़ाक उड़ाती हैं, क्यों? मां, हम अपनी मां, बहन, बेटी की बात छोड़ भी दें, तो एक औरत होने के नाते आप दूसरी औरत के किसी काम को, उसकी लगन को, उसकी मेहनत को क्यों कोमल, स्नेही, उदार मन से स्वीकार नहीं सकतीं?

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मैं अपना अचीवमेंट आप जैसे लोगों को समझा भी नहीं पाऊंगी. बस, मेरे बच्चे कभी यह बात नहीं कहेंगे कि उनका बचपन उदास, अकेले, आहत व उपेक्षित बीता है. इस बात की गारंटी देती हूं मैं और यही गारंटी मेरा अचीवमेंट है मां.” कहते-कहते रमा अपने सिर पर स्नेहिल स्पर्श से चौंकी, पता नहीं कब से पीछे खड़े अनिल भैया ने अपना हाथ उसके सिर पर रखा था. उसकी नज़रें भैया से मिलीं, तो उनकी आंखों में जो कुछ उसे दिखा, भीगी आंखों के साथ मुस्कुरा दी रमा. मां और उमा दी अवाक् बैठी थीं, रमा ने कहा, “मां, दी, मेरी बातों से आपको दुख पहुंचा हो, तो आई एम सॉरी. आज ख़ुद को रोक नहीं पाई.” रमा ने अपना बैग बंद कर सामने रखे ड्रेसिंग टेबल में स्वयं को देखा, अपना ही चेहरा आज शांत और ख़ुश लगा. मन पंख-सा हल्का हो गया था. सालों का गुबार निकलने के बाद अब बहुत शांत था मन.

Poonam Ahmed

पूनम अहमद

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कहानी- तुम्हारी मां (Short Story- Tumhari Maa)

विरह के बाद का प्रेम और तीव्र होता है. आज यह कहने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं कि वे दस दिन मेरे जीवन के अत्यधिक सुंदर दिन थे. प्रेम वह शब्द है, जिसकी व्याख्या असंभव है, पर इसमें जीवन छुपा है. जीने की चाह छुपी है.

Kahani

कहीं पढ़ा था मैंने कि जिस क्षण एक शिशु पैदा होता है, उसी क्षण मां का भी जन्म होता है. उसका अस्तित्व पहले से कभी विद्यमान नहीं होता. एक औरत अवश्य होती है, लेकिन एक मां, कभी नहीं. एक मां कुछ ऐसी है, जो पूर्णतया नई है. यह शब्द मेरे नहीं हैं, किंतु सत्य हैं.

स्वयं को एक नूतन संरचना प्रदानकर मैं, एक कन्या से पहले पत्नी और फिर मां बनी. इस जीवन में अनगिनत भूमिकाओं को निभाते हुए मैंने अपने हर कर्त्तव्य का पालन पूरी ईमानदारी से किया. मैं शिशु से बालिका बनी, फिर किशोरी, फिर युवती, फिर औरत और फिर मां. इस जीवन के हर वसंत और हर पतझड़ को मैंने भी वैसे ही जीया है, जैसे कि तुम जी रहे हो और आगे भी जिओगे. फिर मेरी इच्छाएं और ज़रूरतें तुमसे भिन्न कैसे हो सकती हैं? मैं भी हाड़-मांस से कृत एक इंसान हूं, ठीक तुम्हारे समान. मुझे पारलौकिक अथवा देवी परिभाषित कर दंडित क्यों कर रहे हो?

तुम्हें याद है कक्षा नौ में तुम में चिड़चिड़ापन आ गया था. दिनभर कमरे में गुमसुम बैठे रहते थे. तुम्हारी नानी, जिसे पढ़ाई का तनाव समझ रही थीं, मैं जानती थी कि वह पहले प्रेम की आहट थी. उस प्रथम पीड़ा को हमने साथ ही झेला था और शीघ्र ही तुम उस दौर से निकल आए थे.

किंतु जब मैं इस उम्र में थी, मेरे पास न प्रेम को समझ पाने की परिपक्वता थी और न दिल टूट पाने के बाद का संबल. उन दिनों हम ऐसी बातें न अपने

माता-पिता से कहने की हिम्मत कर पाते थे और न वे समझने की. इसलिए जब कक्षा आठ में ज्ञान हमारी स्कूल में पढ़ने आया, तो प्रारंभ में अपने भीतर के उन्माद को मैं समझ ही नहीं पाई थी.

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कक्षा आठ से बारहवीं तक हम साथ ही पढ़े, किंतु मात्र मुस्कुराहटों के हमारे मध्य कोई संवाद नहीं हुआ. फेयरवेल पार्टी में भी हम, मात्र फिर मिलेंगे के अतिरिक्त एक-दूसरे से कुछ कह नहीं पाए थे. परंतु हां, जब उसके शहर से बाहर चले जाने की ख़बर मुझे मिली थी, तो कई महीनों तक मेरे आंसू नहीं थमे थे. उसके बाद समय के साथ ज़िंदगी आगे बढ़ गई और मैंने एक विद्यार्थी की भूमिका का अच्छा निर्वाहन करते हुए एक बैंक में नौकरी प्राप्त कर ली थी.

प्रेम फिर दुबारा मेरे जीवन में नहीं आया. संभवतः तुम यह जानकर दुखी होगे, किंतु सत्य यही है. तुम्हारे पिता से विवाह एक समझौता था और संपूर्ण जीवन मैंने उस समझौते को ही निभाया था. ऐसा नहीं है कि प्रेम दुबारा नहीं हो सकता, किंतु यह भी तय है कि प्रेम किया नहीं जा सकता.

मेरे माता-पिता ने जतिनजी का चुनाव मेरे लिए किया था. एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए पुत्री का विवाह किसी युद्ध जीतने जैसा ही है और जब पुत्रियों की संख्या चार हो, तो बिना शर्त विवाह के लिए तैयार हो जानेवाला पुरुष देवतातुल्य हो जाता है. मेरी नौकरी और मेरी योग्यता का मूल्य मात्र यह था कि जतिनजी और उनका परिवार इस अतिरिक्त आय के घर आने से प्रसन्न थे. जिस रिश्ते की जड़ में ही स्वार्थ की खाद हो, वहां प्रेम का अंकुर कैसे पनप सकता था?

किंतु मेरी इस कृत्रिम बगिया में भी फूल खिला, जब तुमने जन्म लिया था. जब मैं अपनी नौकरी और तुम में व्यस्त थी, तभी जतिनजी के फेफड़ों में उस घातक रोग का प्रवेश हुआ. फिर आरंभ हुआ था मेरा वास्तविक संघर्ष. घर, ऑफिस और हॉस्पिटल के मध्य सामंजस्य स्थापित करने में मैं पराजित तो नहीं हुई थी, किंतु एक अंतहीन पीड़ा का अनुभव अवश्य कर रही थी. इस पीड़ा चक्रव्यूह में मुझे सहारा देने, वह पुनः मेरे जीवन में आ गया था. नियति का खेल ही था कि ज्ञान ही वह कैंसर स्पेशलिस्ट था, जिसका मुझे एक महीने से इंतज़ार था.

समय और परिस्थिति हमें निकट लाती चली गई. जतिनजी की बीमारी का कारण उनके परिवारवाले मुझे मानकर लगातार प्रताड़ित करते थे. पति की बीमारी, उनके परिवारवालों के आक्षेप, नन्हे से तुम और ऑफिस की ज़िम्मेदारियां… यह सभी निभाते हुए मैं कई बार टूटी थी, किंतु ज्ञान मेरा अवलंब बन मुझे पुनः जोड़ देता था.

न उसने कभी कुछ कहा और न मैंने कुछ पूछा, हमारी भावनाओं को शब्दों की आवश्यकता ही नहीं थी. जतिनजी की मृत्यु के बाद घटनाक्रम शीघ्रता से बदलता चला गया था. उनके परिवारवालों के व्यवहार से तो मैं अवगत थी ही, अब उनका एक पैशाचिक रूप भी मेरे सम्मुख आ गया था. जतिनजी द्वारा बनाए गए मकान को हथियाने के लिए उन्होंने छल और बल दोनों का उपयोग किया. उस समय यदि ज्ञान और मेरी नौकरी का संबल नहीं होता, तो संभवतः मैं वह युद्ध हार ही जाती.

इस दौरान मैं और ज्ञान अधिक क़रीब आ गए थे. वह हमारे रिश्ते को नाम देने के लिए व्यग्र था. एक युद्ध जतिन के परिवार के साथ कोर्ट में चल रहा था और एक युद्ध मेरे भीतर.

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अंततः मैं केस जीत गई थी. केस जीतने की ख़ुशी में उसने मुझसे एक पार्टी का आग्रह किया था. मैं जानती थी, दूसरे केस की सुनवाई का समय आ गया था. हम दोनों होटल मानसिंह के डाइनिंग एरिया में आमने-सामने बैठे थे और ज्ञान के वे शब्द मेरे कानों में संगीत की स्वर लहरियों की तरह पड़े थे.

“थाम लो ये हाथ मेरा कि अब विरह की इस पीड़ा को आराम मिले… भटकते हुए इस बादल को उसका मुट्ठीभर आसमान मिले…”

उस समय तो मैं मात्र मुस्कुराहट ही भेंट स्वरूप दे पाई थी, किंतु घर लौटकर मैंने अपना फैसला ज्ञान को सुना दिया था.

जब मैं घर पहुंची थी, तुम सो चुके थे. तुम्हारा ख़्याल रखने के लिए जिस आया को मैंने रखा था, उसने बताया था कि तुम सोने से पहले बार-बार मुझे पुकार रहे थे. आज पहली बार तुम बिना मेरी लोरी के सोए थे. तुम्हारे पास लेटकर जब मैं तुम्हारे बालों को सहला रही थी, तो तुम्हारे गालों पर आंसुओं की एक रेखा ठहरी हुई मिली. आत्मग्लानि से मेरा मन रो उठा था. ज्ञान के कुछ पल के सानिध्य ने मुझे मेरे बच्चे के प्रति बेपरवाह कर दिया था, तो उसके मेरे जीवन में आ जाने पर कहीं मैं अपने बच्चे को पूरी तरह से उपेक्षित न कर दूं. मैं जानती थी कि ऐसा सोचना अतिशयोक्ति थी, किंतु मैंने चुनाव कर लिया था. एक मां ने एक प्रेमिका को पराजित कर दिया था. मेरी इच्छा का सम्मान करते हुए एक बार पुनः वह मेरे जीवन से चला गया था.

समय दौड़ता रहा और तुम प्रगति के पथ पर बढ़ते गए. इतना आगे बढ़ गए कि मां कहीं पीछे छूट गई. साल में एक बार जर्मनी से आते हो और पूरे महीने इस देश की बुराइयां मुझे गिनाते रहते हो. 25 वर्ष की छोटी-सी आयु में जो सफलता तुमने हासिल की है, सभी उसकी मिसालें देते हैं. प्रसन्न मैं भी हूं और अकेली भी हूं.

तुम्हारे एक फोन के लिए घंटों इंतज़ार करती हूं. तुम्हें याद है, तुम पहले कितनी बातें किया करते थे. जब तक सारी बात मुझे बता न दो, तुम्हें नींद नहीं आती थी. मैं तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त थी, किंतु अब तुम्हारे पास मुझसे शेयर करने लायक कुछ भी नहीं था. मैं अपने दोस्त को मिस करती थी. तुम्हें याद तो होगा कि एक शाम मैंने तुम्हें फोन किया था. असमय फोन करने के लिए तुम नाराज़ भी हुए थे. मैंने तुम्हें अपने प्रमोशन के बारे में बताने के लिए फोन किया था, किंतु तुम अपने दोस्तों के साथ इतने बिज़ी थे कि अपनी मां को ठीक से बधाई भी नहीं दे पाए और जब अगले दिन मैंने शिकायत की, तो तुम कैसे भड़क गए थे, “मां! आप यह बार-बार फोन की बात मत किया करो. कितनी बात करूं आपसे? आप जॉब से छुट्टी लेकर बाहर क्यों नहीं जातीं. बाहर जाओ, दुनिया घूमो. कितना कुछ है देखने और करने को. अब आप वे सभी ख़्वाहिशें पूरी कर सकती हैं, जो कभी अधूरी रह गई थीं और प्लीज़ उम्र की बात न करें. 48 वर्ष की आयु में अपनेआप को आप बूढ़ी कह रही हैं, यहां 90 वर्ष के बुज़ुर्ग दुनिया घूम रहे हैं.”

तुम्हारी इस बात से प्रेरित होकर मैंने तुम्हारे पास जर्मनी आने की इच्छा ज़ाहिर की, तो कितनी निर्ममता से तुमने मना कर दिया था.

“आप इतनी दूर अकेली ट्रैवल नहीं कर पाओगी. मै अंडमान के हेवलॉक आइलैंड की बुकिंग करा देता हूं. समंदर के पास के रिसॉर्ट की बुकिंग करा रहा हूं. चाहो तो रात में भी वहां बैठ पाओगी. आपको तो वैसे भी समंदर के पास बैठना बहुत पसंद है.”

जो मां अकेली इस संसार में तुम्हारी ढाल बनकर रही, तुम उस मां को एक सफ़र का डर दिखा रहे थे, किंतु मैं चली गई थी. सागर के प्रति मेरा लगाव तुम्हें याद था और मेरे लिए यह बहुत था. तब कहां जानती थी कि चतुर नियति मुझे पुनः छलने को तैयार बैठी है.

सागर के किनारे स्थित वह रिसॉर्ट वाकई में सुंदर और सुरक्षित था. रात के खाने के बाद सागर के पास पड़ी हुई कुर्सियों में से एक पर बैठकर मैं लहरों के शोर का आनंद लेने लगी थी. तभी ऐसा लगा, जैसे एक आकृति मेरे निकट आकर सहसा थम गई हो. रात की नीरवता में सागर के शोर के मध्य एक अनजान के सानिध्य से मैं घबरा गई थी, किंतु उस स्वर की कोमलता ने मुझे बांध लिया था. उस कंठ को न पहचान पाऊं, मैं इतनी मूर्ख नहीं थी. वह ज्ञान ही था.

मध्यरात्रि तक हमारी ख़ामोशियां संवाद करती रहीं. मैं चलने को हुई, तो उसने इशारे से रुकने को कहा और बोला, “दिल की आख़िरी गली में तुम्हारे आने, फिर लौट जाने के क्रम में, तुम्हारे कदमों के जो निशान बने थे, वो आज भी, साफ़, सुंदर और सुरक्षित हैं.”

विरह के बाद का प्रेम और तीव्र होता है. आज यह कहने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं कि वे दस दिन मेरे जीवन के अत्यधिक सुंदर दिन थे. प्रेम वह शब्द है, जिसकी व्याख्या असंभव है, पर इसमें जीवन छुपा है. जीने की चाह छुपी है. कभी डर, तो कभी निडरता है. कभी समर्पण, तो कभी अलगाव है. इस आयु में पुनः प्रेम और उस प्रेम के लिए समाज से लड़ पाने की कल्पना भी हास्यास्पद लगती है, किंतु यदि साथी ज्ञान जैसा हो, तो उसके समर्पण के सम्मुख हर बाधा नतमस्तक हो जाती है.

मैं इस बार उसकी दस्तक पर द्वार खोलकर उस स्नेह का संपूर्ण सम्मान और प्रेम से स्वागत करना चाहती थी. मुझे लगा था कि मेरा सखा, मेरा बेटा अपनी मां को समझेगा, किंतु तुमने न केवल अपनी मां की भावनाओं का अपमान किया, बल्कि उसके त्याग और परवरिश पर भी प्रश्‍न उठाया.

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अधृत! क्या तुम्हें पता है, मैंने तुम्हारा नाम अधृत क्यों रखा? अधृत अर्थात् वह जिसे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है, किंतु जो दूसरों की सहायता के लिए सदा उपस्थित होता है. भगवान विष्णु के सहस्रों नामों में से मैंने तुम्हारे लिए यह नाम इसलिए चुना, क्योंकि मैं चाहती थी तुम में इन गुणों का समावेश हो.

किंतु कल जब फोन पर मैंने अपना निर्णय तुम्हें बताया, तो  तुम्हारे शब्दों में मिश्रित नफ़रत और असहयोग सुनकर मुझे भान हुआ कि मैं संभवतः वास्तविकता में तुम्हारे अंदर किसी भी तरह की भावना प्रवाहित करने में हार गई थी.

अधू! मेरे बच्चे… एक मां के रूप में मैं सदा तुमसे प्रेम करती रहूंगी, किंतु गर्व! गर्व तब करूंगी, जब तुम अपने नाम की सार्थकता को न केवल समझ लोगे, वरन उसे अंगीकार कर लोगे. मैंने तुम्हें एक भ्रूण से शिशु, फिर बालक, बालक से किशोर और किशोर से पुरुष बनते देखा है. आज आशा करती हूं कि शीघ्र ही तुम्हें वह पुरुष बनते हुए देखूं, जो स्वार्थ का चश्मा उतारकर परमार्थ और प्रेम को देख पाए.

मैं निर्णय ले चुकी हूं! इस जीवन में संभवतः पहली बार स्वयं के लिए आगे बढ़ी हूं. यदि मेरा सखा साथ होगा, तो मेरी ख़ुशी बढ़ जाएगी. अगर ऐसा कर पाओ, तो जल्द मिलेंगे, तुम्हारी मां के विवाह में.

  पल्लवी पुंडीर

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कहानी- झूले हिंडोले (Short Story- Jhoole Hindole)

अटैचमेंट नाम की चीज़ उमेश में नहीं है. जब से शादी हुई, उसने उसके अंदर एक अलग ही एटीट्यूड देखा है. उमेश को वह क़सूरवार ज़्यादा नहीं मानती, क्योंकि जानती है कि उसकी परिस्थितियों ने उसे ऐसा बना दिया है, पर वह उसे कितनी बार समझा चुकी है कि अब सब कुछ बदल चुका है.

Hindi Kahani

कभी-कभी जब वह बचपन की खट्टी-मीठी यादों का पिटारा खोलकर बैठ जाती, तो उसके मन में जैसे हिलोरें उठने लगतीं. उस समय वह पिटारे में से एक-एक कर भूली-बिसरी स्मृतियों को निकालते हुए इतनी मग्न हो जाती कि आसपास क्या घट रहा है, इसकी सुधबुध ही खो बैठती. उमेश उससे कुछ पूछ रहे होते और वह स्मृतियों के हिंडोले में झूल रही होती. उसे उस समय उमेश की आवाज़ की बजाय बसंती हवा की गुनगुनाहट सुनाई दे रही होती, गौरैयों की चहचहाहट सुनाई दे रही होती, धूप में सूखती अचार-बड़ियां और मां का सेवइयां तोड़ना याद आ रहा होता. भाई का चोटी पकड़कर खींचना और बात न मानने पर जिज्जी का अपने बड़े-बड़े नाख़ूनों को दिखाकर डराना याद आ रहा होता. उन क्षणों में उसे एहसास ही नहीं होता था कि एक मीठी-सी मुस्कान उसके होंठों पर खिल आई है… तंद्रा तब भंग होती, जब उमेश ज़ोर से उसका कंधा झिंझोड़ उसे हिंडोले से नीचे ही गिरा देते.

“पुरानी बातों को अब भी क्यों याद करती रहती हो. जो बीत गया, सो बीत गया, लेकिन तुम हो कि न जाने कौन-से काठ-कबाड़ निकालकर उन्हें दोबारा संजोकर रखती रहती हो. सच में, मुझे तो लगता है कि मैंने किसी पढ़ी-लिखी गंवार से शादी की है.” उमेश भड़क उठते. वह घबराकर अपने पिटारे में ताला लगा देती और उसे मन के भीतर ऐसे लपेटकर रख देती मानो ज़रा-सा भी सुराख रह गया, तो उसकी स्मृतियां उसमें से सरक जाएंगी. वह इतनी सावधानी से कभी अपने ज्वेलरी बॉक्स को भी नहीं संभालती थी, जितना कि यादों के पिटारे को.

“उमेश, ये मेरी वे यादें हैं, जिन्हें मैंने जीया है. ये काठ-कबाड़ नहीं हैं. मैं यह नहीं कहती कि अतीत की परछाइयों के साथ जिओ, पर वे पल जो गुज़र गए हैं, वे ख़ुशियों से भरे थे. वे बातें, वे घटनाएं, जिनके बारे में सोचते ही होंठों पर हंसी थिरक जाए, उनके बारे में अगर कभी-कभार बात कर ली जाए, तो वे ज़िंदगी में रंग भर देती हैं. वैसे भी किससे बात करूं. न ही तुम्हारे पास मेरे लिए व़क्त है और न ही बच्चों के पास. इसी यादों के पिटारे को जब-तब निकालकर कुछ पल ख़ुश हो लेती हूं. ऐसा लगता है कि उन बीते लम्हों के साथ मैं संवाद कर पा रही हूं.” कहते-कहते वह भावुक हो उठती.

“इन भावनाओं के साथ जीने का कोई फ़ायदा नहीं है. बाहर निकलो इन भावनाओं के पिंजरे से हरीतिमा.” उमेश उकताकर उसके पास से उठ जाते. आख़िरकार उस जैसी औरत को झेलना क्या आसान काम था.                                                                                        हर चीज़ को फ़ायदे-नुक़सान से माप-तौलकर देखना उमेश की प्रवृत्ति थी. वह हमेशा जोड़-तोड़ में ही लगा रहता. वह कमाती है, इसलिए वह उसे सह रहा है.

जाने-अनजाने इस बात का एहसास उसे वह बरसों से कराता आ रहा है और कहीं वह उसके सिर का ताज बनने की कोशिश न करे, पैरों की जूती ही बनी रहे, इसलिए यह भी जतलाता है कि उसकी कमाई से उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. वह जब चाहे नौकरी छोड़ सकती है. वह उसे रोटी की कमी नहीं होने देगा.

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हंसने के सिवाय हरीतिमा के पास और कोई विकल्प नहीं है. उमेश के चेहरे पर छाई तिलमिलाहट पर चढ़ी त्योरियां, शायद उसके चेहरे पर हमेशा के लिए फिट हो चुकी थीं और उस समय देखते ही बनती थीं. उसे समझाना बेकार है कि एक पत्नी को पति से रोटी के अतिरिक्त भी कुछ अपेक्षाएं हो सकती हैं. एक पत्नी पति से प्यार और थोड़ा-सा सम्मान चाहती है. कुछ देर उसके पास बैठकर उसके दिल की बातें सुन ले और यह आश्‍वासन दे दे कि मैं तुम्हारे साथ हूं. बस, हरीतिमा ने भी यही चाहा था. उसके पीछे छूटे रिश्तों और स्मृतियों को सहेजे नहीं, लेकिन कम-से-कम मज़ाक भी न उड़ाए. उसका ऐसा चाहना क्या बहुत ज़्यादा एक्सपेक्ट करने के ब्रैकेट में आता है.

उमेश अक्सर कहता है, “तुम्हारी उम्मीदें ज़रूरत से ज़्यादा हैं. आगे बढ़ो और ज़िंदगी को बिंदास होकर जिओ. जैसे चल रहा है चलने दो, उसे बदलने की कोशिश मत करो. क्या हमेशा रिश्तों को जीने की बात करती रहती हो. मुझे देखो सालों बीत गए, कभी जाता हूं भोपाल या ग्वालियर अपने भाई-बहनों से मिलने. एंजॉय करो लाइफ को, बाई हुक और बाई क्रुक.”

उमेश की समय से दो क़दम आगे चलने की ललक उसे कंपा जाती. कई बार उसे प्रतीत होता है कि उमेश ने अपने चारों ओर असंख्य जाले बुन डाले हैं. वैसे ही जैसे मकड़ी के जाले होते हैं, जिसमें कोई फंस जाए, तो निकलना मुश्किल हो जाता है. विडंबना तो यह है कि उमेश ख़ुद ही अपने बुने जालों में निरंतर फंसते जा रहे हैं. “तुमसे बात करने और यहां तक कि पास आने में डर-सा लगने लगा है.” एक दिन हरीतिमा ने न जाने किस धुन में कह दिया था.

सुनते ही उमेश भड़क उठा था, “क्यों? क्या मैं कैक्टस हूं, जिसे छूने से तुम्हारी उंगलियां लहूलुहान हो जाएंगी? समझती क्या हो अपने आपको? हो क्या तुम सिवाय एक सेंटीमेंटल फूल के? जब देखो यादों और रिश्तों में जीती रहती हो. बचपन बीत गया, पर कहती हो वे यादें ठंडी-ठंडी फुहारों की तरह तुम्हें भिगो देती हैं. ठंडी फुहारें… फिल्मी जीवन जीना पसंद करती हो तुम तो…”

अटैचमेंट नाम की चीज़ उमेश में नहीं है. जब से शादी हुई, उसने उसके अंदर एक अलग ही एटीट्यूड देखा है. उमेश को वह क़सूरवार ज़्यादा नहीं मानती, क्योंकि जानती है कि उसकी परिस्थितियों ने उसे ऐसा बना दिया है, पर वह उसे कितनी बार समझा चुकी है कि अब सब कुछ बदल चुका है. उसके जीवन में प्यार और भरोसा करनेवाली उसकी पत्नी है, बच्चे हैं, पर उमेश अब भी अपने में ही सिमटा रहता है. मां-पिता के बचपन में ही गुज़र जाने के बाद उमेश ने जो तकली़फें झेलीं और रिश्तेदारों ने भरोसा तोड़ा, उससे उसके अंदर भरी कड़वाहट अभी तक बाहर नहीं निकली है. सबसे छोटा होने पर भी भाई-बहनों ने उसकी परवाह नहीं की. आख़िर उनकी भी अपनी समस्याएं थीं. संघर्षों से लगातार जूझते रहने के कारण सेंटीमेंट्स तो क्या बचते उमेश में, सहजता भी बाक़ी न रही उसमें.

हरीतिमा और बच्चों का प्यार व भरोसा पाने के बाद भी उमेश के भीतर जमा आक्रोश आज तक बाहर नहीं निकला है. केंचुल से तो उसे ख़ुद ही बाहर निकलना होगा. हरीतिमा के लाख चाहने या प्रयास करने से क्या होगा. उमेश के जो मन में आता है, उसे सुना देते हैं. बच्चे भी उस समय उसके उफ़नते ग़ुस्से के आगे कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पाते थे. जानते थे कि कुछ कहा, तो वे भी उस आग में झुलस जाएंगे. सच है कि वह भावुक है, इसीलिए तो आज भी उन तमाम रिश्तों को निभा पा रही है. वह भी उमेश की तरह हमेशा नुकीले पत्थरों पर कदम रखकर चलती, तो कभी भी रिश्तों की राह तय नहीं कर पाती. पीहर हो या ससुराल, हर रिश्ता उसने संभाला हुआ है. जब बच्चे छोटे थे, तो हर जगह उन्हें अपने साथ ले जाती थी, पर अब वे अपनी व्यस्तताओं के कारण कहीं जा नहीं पाते हैं और अब उनकी उम्र भी ऐसी है कि ज़बर्दस्ती नहीं की जा सकती.

उमेश को दोस्तों का साथ तो पसंद है, पर रिश्तेदारी में आना-जाना नहीं. चाहे अपने ही भाई-बहन के यहां क्यों न जाना हो. कभी फोन पर भी उनसे बात नहीं करता. और उसके चाहे भाई-बहन हों या अन्य रिश्तेदार, यहां तक कि दूर के

मामा-बुआ भी, रिश्तों का सोंधापन अभी भी क़ायम है. कितने महत्वपूर्ण होते हैं ये रिश्ते… उमेश समझते ही नहीं या समझना ही नहीं चाहते. भगवान का शुक्र है कि आज तक उन्हें किसी की ज़रूरत नहीं पड़ी, पर कभी कुछ ऊंच-नीच हो गई, तो ये अपने ही काम आएंगे.      अंकिता और पारित के आपसी प्यार और तक़रार को देखती है, तो सोचती है कि आज एक-दूसरे के बिना न रहनेवाले ये भाई-बहन क्या बड़े होकर अपनी इन खट्टी-मीठी यादों का मज़ाक उड़ाएंगे. क्या ये भी एक दिन अपने इस प्यार और तक़रार को भूल जाएंगे. इनके बीच भी संवेदनहीनता पसर जाएगी और जब अंकिता विवाह कर चली जाएगी, तो अपने भाई के साथ बिताए इन पलों को भूल जाएगी. बचपन की स्मृतियों के हिंडोले में झूलना क्या उसे मूर्खतापूर्ण बात लगेगी या फिर पारित ही अंकिता के नटखटपन, उसे घोड़ा बनाने या राखी पर ज़िद कर मनचाहा उपहार लेना आउटडेटेड होना मानेगा… स्मृतियों पर आख़िर धूल क्यों जमने दी जाती है? क्या ज़रूरत है यह सब तमाशा करने की?

“मैं तो तुम्हारी मम्मी के कितने ही चाचा-फूफा को जानता नहीं. कोई पार्टी की ज़रूरत नहीं है, चलेंगे किसी होटल में डिनर करने बस.” उमेश ने भड़कते हुए कहा.

उनकी शादी की बीसवीं सालगिरह थी और बच्चे ज़िद कर रहे थे कि एक बड़ा-सा आयोजन किया जाए और इसी बात को लेकर उमेश को घोर आपत्ति थी.

यह भी पढ़ेक्या आप भी 2, 11, 20 और 29 को जन्मे हैं, तो आपका रूलिंग नंबर है- 2 (Numerology Number 2: Personality And Characteristics)

“नहीं पापा, इस बार तो आपको मानना ही पड़ेगा. इट्स गोइंग टू बी फन.” पारित अड़ गया था. “हां पापा, कितना समय हो गया है आपके फैमिली मेंबर्स से मिले? फेसबुक और व्हाट्सऐप पर चैट करने से मज़ा नहीं आता है. मिलने का मज़ा तो कुछ अलग ही होता है और आप तो ले जाने से रहे हमें उनके यहां.”

उमेश की त्योरियां चढ़ गईं. चेहरे पर कठोरता और गहरी हो गई. पर इस बार जैसे बच्चे उसके व्यवहार को सहन करने को तैयार नहीं थे. वैसे भी बच्चे उसे ‘बोर इंसान’ कहा करते थे. अचानक पारित ज़ोर से बोला, “आपकी प्रॉब्लम क्या है पापा? आप ख़ुश क्यों नहीं रह सकते? आपकी वजह से घर का माहौल हमेशा बोझिल रहता है. हमें घर में अपने फ्रेंड्स को बुलाने में डर लगता है. इससे तो अच्छा है कि आप हमारा गला घोंट दो.”

सन्नाटा सा छा गया.

“ज़्यादा बकवास करने की ज़रूरत नहीं है.” उमेश चिल्लाया. हालांकि उसकी तनी त्योरियां थोड़ी ढीली पड़ गई थीं. “मैंने कह दिया, तो बस यही फाइनल है और बहस नहीं चाहिए मुझे इस विषय पर.”

“तो ठीक है, मेरा भी फैसला सुन लीजिए पापा, अब मैं आपके साथ नहीं रहूंगा, चला जाऊंगा कहीं भी…”

इतना आक्रोश देखकर उमेश हैरान रह गया. आज तक बच्चों ने कभी उसे उल्टा जवाब नहीं दिया था.

“ऐसा क्यों कह रहे हो तुम बेटा, पर मैं भी क्या करूं? मैं ऐसा बन गया हूं.” उमेश की आवाज़ में कंपन महसूस किया हरीतिमा ने. आंखों में नमी थी.

“जब 10 साल का था, पैरेंट्स गुज़र गए. बड़े भाई-बहन भी बहुत ज़्यादा बड़े नहीं थे. रिश्तेदारों ने सारी प्रॉपर्टी हड़प ली और हम लोगों को अपने-अपने तरी़के से संघर्ष करना पड़ा. 20 साल का था, जब शहर चला आया. जो काम मिला किया.

भाई-बहनों से संपर्क टूट गया और लोगों पर से विश्‍वास तो पहले ही उठ गया था, इसलिए अटैचमेंट जैसी भावना से अपने को दूर कर लिया. बस, कमाने की धुन लग गई, ताकि फिर से रोटी के लिए किसी का मुंह न ताकना पड़े, शायद इसीलिए इतना रूखा हो गया. याद नहीं मैं पिछली बार कब हंसा था.”

“पर पापा, अब तो सब बदल गया है. हम आपके साथ हैं, आपसे प्यार करते हैं. फिर कड़वी यादों को भुला क्यों नहीं देते? मम्मी और हम दोनों तो आपके साथ हंसना चाहते हैं, खुलकर जीना चाहते हैं. क्या बहुत ज़्यादा है आपके लिए, यह सब देना…” पारित और अंकिता उमेश के गले लग गए. पहली बार बिना किसी खौफ़ या हिचक के. हरीतिमा ने प्यारभरी नज़रों से उमेश को देखा, मानो कह रही हो, उमेश जी लो आज के सुखों को.

उस दिन अपने भाई-बहनों, भतीजों और कजिन्स को देखते ही उमेश के चेहरे पर छाई रहनेवाली तिलमिलाहट और ‘मुझे परवाह नहीं’ वाली परत न जाने कहां गायब हो गई थी. शुरू में झिझका, झुंझलाहट भी थी और औपचारिकता का भाव भी. आसान नहीं था उसके लिए सहज बने रहना, पर पारित और अंकिता उसके साथ खड़े रहे. कुछ समय बाद उमेश के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान तैर गई. सब कुछ मानो क्षणिक था.

अपने भाई-बहनों से मिलते ही मानो संवेदनशीलता का कोई झरना बह उठा. आंखें भी नम हो गई थीं. उमेश में भी फीलिंग्स हैं, तो क्या ‘एचीव’ करने की चाह में वे कहीं दफ़न हो गई थीं. अन्य मेहमानों के जाने के बाद देर रात जब वह अपने भाई-बहनों के साथ बैठा, तो यादों के न जाने कितने पिटारे खुल गए.

बीती बातों को याद कर वह इतना हंसा कि वह ही नहीं, बच्चे भी उसे हंसता देख हैरान रह गए. अपने बचपन के सुखद पलों को जीने लगा वह. यहां तक कि रिश्तेदारों के बीच मज़ाक की फुलझड़ियां उसने छोड़ीं. छेड़छाड़ और मस्ती के अनेक अनार जलाए, मानो वह बरसों से दबी अपनी भावनाओं को आज खुलकर बाहर लाना चाहता हो. ऐसा लगा, जैसे वह भी स्मृतियों के हिंडोले में झूलने का आनंद ले रहा है.

धरती की तपिश जब बारिश की तेज़ बौछारों से बाहर आती है, तो पहले एक गरम एहसास से भर देती है, जो बहुत असहज कर देता है, पर फिर हर तरफ़ मिट्टी की सोंधी सुगंध फैल जाती है. उमेश ने भी जैसे उसी सुगंध को महसूस कर लिया था. कब सुबह हुई, पता ही नहीं चला. स्मृतियों पर जमी धूल कब की साफ़ हो चुकी थी.

“हरीतिमा, क्यों न कुछ दिनों के लिए कहीं घूम आएं. बच्चे तो अब अकेले रह सकते हैं. कितना व़क्त हो गया है, तुम्हारे साथ अकेले समय बिताए. एक बार फिर से हमें एक-दूसरे को जानने का मौक़ा मिल जाएगा.” उमेश ने उसका हाथ थामते हुए कहा. उसने हैरानी से उमेश को देखा. न चेहरे पर तिलमिलाहट थी, न ही त्योरियां चढ़ी हुई थीं. आंखों में प्यार और छुअन में सम्मान का एहसास हुआ उसे. जिस संवेदनहीनता ने उनके रिश्ते में दरार और शुष्कता ला दी थी, उसकी जगह उस कोमलता ने ले ली थी, जो रिश्ते को पैनेपन और कंटीला होने से बचाती है. हरीतिमा ने सहमति से सिर हिला दिया.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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