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कहानी- चली-चली रे पतंग (Short Story- Chali-Chali Re Patang)

‘अब जब सब चैन से हैं, तो लोगों को क्यों दर्द हो रहा है? कभी हवाहवाई, तो कभी चली-चली रे पतंग देखो… गा-गाकर छेड़ते हैं. पता नहीं लोग अपनी ज़िंदगी से ज़्यादा दूसरों की ज़िंदगी में दख़ल क्यों देते हैं? मैंने तो बच्चों को भी आज़ाद कर दिया. रहने दो उन्हें इसी सब में ख़ुश. अच्छा ही तो है किसी को ख़ुशी देना.’ वह मुस्कुराई.

Hindi Kahani

तिरपन वर्षीया उर्वशी आईने में संवरते हुए अपने दो-चार चमकते उन चांदी के तारों को देख रही थी, मानो वे उसकी उम्र की गवाही देने ज़बर्दस्ती उतर आए हों, जबकि उसका रूप लावण्य उसे 40 से ज़्यादा की मानने को तैयार न था. आंखों में वही चमक, शरीर में वैसा ही कसाव, खिलता गेहुंआ रंग, संतुलित कद-काठी, कोई भी कपड़े पहनती, तो उसका रूप खिल-खिल जाता.

पति अनंत को दुनिया से गए 17 साल बीत गए. एक अरसा निकल गया. कब तक रोती. आख़िर बेटे अनन्य और अक्षुण की परवरिश करनी थी. पुरातनपंथी ससुरालवालों के विरोध करने पर भी उसने अनंत की ही कंपनी में जॉब हासिल कर ली थी. अपने अच्छे पढ़े-लिखे होने का उसे फ़ायदा मिला. वह लगन और मेहनत से दिन-ब-दिन तऱक्क़ी करती चली गई. 50 की होते-होते दोनों बच्चों को उसने सेटल कर दिया. मिलनसार हंसमुख उर्वशी अपनी मीठी ज़ुबां से सबका मन मोह लेती. बहुत से स्त्री-पुरुष उसे अपना दोस्त मानने लगे थे. अपनी समस्या उससे शेयर करते, जिनका समाधान अक्सर उसके पास होता. दूसरों की मदद कर उसे बहुत ख़ुशी मिलती. उसका यूं खुले दिल से सबसे घुलना-मिलना कुछ लोगों को रास न आता, जिसमें पड़ोसी और रिश्तेदार सभी थे, लेकिन उस पर कोई असर न होता.

आज वो फिर तैयार होकर जयेश सर के घर जा रही थी. जयेश अग्रवाल उसके बॉस थे. ऑफिस के कामों में बिल्कुल परफेक्ट, पर घर के मामलों में जल्दी घबरा उठते. लड़केवाले उनकी बेटी को देखने आ रहे थे. पत्नी गांव की थीं, कुछ

ऊंच-नीच न हो जाए, इसलिए उनकी बेटी भी चाहती थी कि उर्वशी आंटी आ जाएं. वह उर्वशी से जब भी मिली, उसके अपनेपन और अपनी पीढ़ी जैसे नए विचारों से बेहद प्रभावित हुई थी.

“फिर कहां चली बनी-ठनी पतंग बनके मैडम हवाहवाई, छुट्टी के दिन तो चैन से बैठा करो घर पर हम सहेलियों के साथ. किट्टी में भी ज़माने से नहीं शामिल हुई.” बगलवाली मिसेज़ माथुर ने टोक दिया.

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“हां, बच्चे जो यहां नहीं, तो फ़ायदा क्यों न उठाए?” मेड को सब्ज़ी दिलवाती तारा चावला ने मुस्कुराते हुए चुटकी ली.

“हां, हम तो यूं ही घर में उलझी रह जाती हैं, घर का मैनेजमेंट, पूजा-व्रत, रिश्तेदारी इनके जैसे आज़ाद परिंदे हम कहां…”

“आज इस डाल पर कल उस डाल पर…” ऑटो से उतरी नैना वोहरा ने जोड़ दिया, तो सभी खिलखिलाकर हंस पड़ीं. कार बाहर निकालते हुए उनकी फ़ब्तियां उर्वशी के कानों में भी पड़ीं, जिसकी वह अब तो आदी हो चुकी थी. उसने मुस्कुराकर सबको बाय किया और आगे निकल गई.

उसके जाने के बाद भी औरतें उसके बारे में बातों का पूरा ग्रंथ रच डालतीं. ‘क्या जवाब दे ऐसे लोगों को जिन्हें जीना नहीं आता. वे आंख मूंदकर उसी पुराने ढर्रे पर चलना चाहती हैं, ज़रा भी बदलना नहीं चाहतीं.’ एक ही खोल के अंदर जीते-मरते हैं, बस यह सोचकर कि लोग क्या कहेंगे.’

एक बेटा लंदन में सेटल है और एक ने इसी शहर में अपनी ससुराल के पास घर ले लिया है, तो क्या करें, इनके जैसे माथा पीटें, रोएं बैठकर कि अकेले रह गए, ज़िंदगी बेकार हो गई. अब ज़िंदगी में जीने के लिए बचा क्या’ सोचते हुए उर्वशी ने गर्दन झटकी. मन ही मन मुस्कुराई और चल दी. अभी तो सही समय है कुछ करने का, अपने दायित्व सब पूरे हो गए. कुछ अपने लिए, कुछ औरों के लिए बस कुछ न कुछ नया करते जाना, सीखते जाना है.

उर्वशी लौटी, तो उसके चेहरे पर बड़ी तसल्ली की रौनक़ थी. जयेश सर की लड़की दिव्या का रिश्ता तय हो गया था. तुरंत ही सगाई की रस्म भी कर दी गई. उर्वशी ने सब बख़ूबी संभाल लिया था. जयेश का पूरा परिवार बहुत ख़ुश था. सारे लोग तो उसे अपने से लगते. चेंज करके जब वह बेड पर आई, तो सोचने लगी, कहां है वह अकेली? इतने लोग, इतने परिवार, इतने काम हैं यहां करने को, अभी खाली कहां? अकेली कहां? उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई. चश्मा उतारा और जाने वह कब नींद की आगोश में खो गई.

उर्वशी की औरों से अलग अपनी अनोखी दुनिया थी. वह बेहद क्रिएटिव थी, जिनके लिए उसे समय कम पड़ता. अपने इतने सारे शौक़ थे, फुर्सत में होती, तो कोई भी अपने पेंडिंग शौक़ के काम उठा लेती और चाव से मसरूफ़ हो जाती. नए गीत-ग़ज़ल लिखना, सुनना, गुनगुनाना, पेंटिंग, स्केच करना, नया प्लांट लगाना, कभी किचन में नई रेसिपी ट्राई करना या नया कुछ ईज़ाद करना.

कुछ न कुछ नया सीखते-करते रहना उसे अच्छा लगता, वरना वो बेचैन हो जाती. शादी के बाद ज़िम्मेदारियां संभालने में उसे व़क्त ही कहां था अपनी रुचि के काम करने के लिए. परिवार के साथ दायित्व निभाते हुए भी ख़ुश तो बहुत रही, पर अंदर से अनमयस्क-सी रही. कुछ छूटा-सा लगता था, तो अब ज़िंदगी का पूरा आनंद उठा  रही थी.

लोगों के कमेंट पर यही सोचती ‘पता नहीं पड़ोसिनों, रिश्तेदार महिलाओं को क्या परेशानी है. नहीं आता उनकी बातों में उसे मज़ा तो क्या करे? एक ही ढर्रे की बातें, वही टॉपिक, नई ड्रेस, साड़ी, शॉपिंग रेट, नई ज्वेलरी, नई गाड़ी या किसी की लड़की का किसी के साथ चक्कर, व्रत-पूजा-पाठ, सिद्ध बाबा के प्रवचन,

भजन-कीर्तन, मंदिर, तीर्थदर्शन या सास-ननद-पति पुराण और कैसे भूला जा सकता है उनका मेड-सर्वेंट चैप्टर… उफ़्फ़’ उर्वशी का दिल कांप उठता.

वह सोचती कम से कम ऑफिस कलीग्स या दोस्त ऐसी बेकार की बातें कर मेरा दिमाग़ और वक़्त तो नहीं ज़ाया करते. उनके साथ योग, वॉक, कभी कोई नेक काम, किसी की मदद के लिए चली जाती. फुर्सत होती, तो कभी अपने शौक़ पूरे करती. कभी दोस्तों के संग टेबल टेनिस-बैडमिंटन खेलती या कभी पिकनिक, टूरिस्ट प्लेस, कभी मूवी, बाहर रेस्टोरेंट में डिनर, तो कभी घर पर अपना बनाया स्पेशल लंच-स्नैक्स कराती. इसके अलावा कभी बेटे-बहू-बच्चे आ जाते या वो ख़ुद जाकर मिल आती बच्चों से, तो क्या बुरा है जीवन? उसने ख़ुद ही तो चुना था ये जीवन.

बहू शालिनी वैसे तो मॉडर्न ख़्यालों की थी, पर सास की आज़ादी से उसे भी अपने मायकेवालों की तरह ही गुरेज था. कहती, “इस उम्र में ये सब आवारगी-सी है. ये इतना खुलापन आज़ादी आपको शोभा नहीं देती. लोग बातें बनाते हैं, बदनामी होती है हमारी.”

वह जानती नहीं क्या? शालू अलग घर चाहती थी. इस बहाने अपने पति राघव को वो मायके के पास ही खींच ले गई. ज़िद करके वहीं एक दूसरा घर भी बनवा लिया. राघव ने तो बहुत कहा कि मां के बिना वह दूसरे घर में हरगिज़ रहने नहीं जाएगा, पर उर्वशी बच्चों की ख़ुशी समझ रही थी.

उसने राघव को समझाया, “तो इसमें ग़लत क्या है? ठीक ही है ना, सोसायटी के ये छोटे-छोटे फ्लैट हैं. घर में बच्चे के लिए खेलने की जगह कम है. वहां उसका मायका पास है. शालू ख़ुश रहेगी, मेरे पोते शैंकि को भी उसके मामा के बच्चे खेलने के लिए मिल जाया करेंगे और जगह भी. यह भी तो देख न, हम रहते तो एक छत के नीचे हैं, पर कितनी देर साथ बैठ पाते हैं. सभी अपने-अपने कामों में बिज़ी रहते हैं. ऐसे वीकेंड पर कभी तुम सब, कभी मैं

आते-जाते रहेंगे. जब चाहे वैसे भी मिलते रहेंगे. शालू ख़ुश रहेगी, तो तुझे भी ख़ुश रखेगी. तुम सब ख़ुश रहोगे, तो मैं भी ख़ुश और चाहिए भी क्या… बेकार की मेरी चिंता मत कर. इतने सारे शौक़ हैं मेरे, अकेली कहां हूं मैं? फिर यहां कितनी यादें बिखरी पड़ी हैं चारों ओर, जो मुझे जीवन से जोड़े रखती हैं.” किसी तरह उर्वशी राघव को समझा पाने में सफल हुई थी.

‘अब जब सब चैन से हैं, तो लोगों को क्यों दर्द हो रहा है? कभी हवाहवाई, तो कभी चली-चली रे पतंग देखो… गा-गाकर छेड़ते हैं. पता नहीं लोग अपनी ज़िंदगी से ज़्यादा दूसरों की ज़िंदगी में दख़ल क्यों देते हैं. मैंने तो बच्चों को भी आज़ाद कर दिया. रहने दो उन्हें इसी सब में ख़ुश. अच्छा ही तो है किसी को ख़ुशी देना.’ वह मुस्कुराई.

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आसमान पर बादलों की टोलियां ठंडी हवाओं के साथ मस्ती में उड़ रही थीं. वह धीरे-धीरे ख़ुद ही गुनगुना उठी- चली-चली रे पतंग, देखो चली रे… उसने वॉर्डरोब से धानी रंग की साड़ी निकाली और पहनकर आईने के सामने आ खड़ी हुई. काला बॉर्डर उसकी खुली रंगत पर ख़ूब खिल रहा था. बालों को संवारा, पर बांधने को दिल नहीं किया उसका.

आज सच में दिल की पतंग आसमान छूने उड़ी-उड़ी जा रही थी. उसने ग़ज़लों का बज रहा रिकॉर्ड बंद कर दिया. अपना गाना उसे अधिक रुचिकर लग रहा था. सुबह बना रही पेंटिंग को उसने झीने कपड़े से कवर किया. खुली कलर ट्यूब के ढक्कन बंद करके उसने सैंडल पहनी. मोबाइल और पर्स उठाया, घर लॉक किया और गुनगुनाते हुए बाहर पैदल ही निकल आई.

पास के मार्केट से बड़ा-सा केक लिया और छोटे-छोटे बहुत सारे गिफ्ट्स. आज फिर उसे ‘आशियां’ अनाथालय जाना था. वहां किसी बच्चे का जन्मदिन है. वह देर-सबेर ज़रूर पहुंचती. आज तो संडे ही था. वह ढेर सारे पैकेट्स के साथ सुहावने मौसम का मज़ा लेते आहिस्ता-आहिस्ता चलते हुए घर लौटी, तो सब्ज़ी लेते-लेते गप्पे लड़ा रही पड़ोसिनों के कमेंट शुरू हो गए.

“कहां की तैयारी है मैडम हवाहवाई! संडे को भी पतंग बनी लहराती-इठलाती कहां से आई, कहां को चली?”

“आज कोई दोस्त आ नहीं रहे क्या?”

“कितने सारे दोस्त हैं इनके… आज  कोई भी नहीं…” चुटकी ली गई थी.

“औरतें कम, पुरुष ज़्यादा ये नहीं ध्यान दिया?” वही व्यंग्यात्मक सम्मिलित हंसी.

“पतंग-सी उड़ना है, तो किसी से डोर बांध क्यों नहीं लेती? कोई देखनेवाला तो है नहीं, आज़ाद हो.”

“एक कट गई, तो कोई और डोर मिल जाएगी भई…” वही ठहाके.

“बताओ तो हमें भी चली-चली रे पतंग कहां चली रे…?”

मन तो कर रहा है गाकर ही सुना दूं इन्हें. चली बादलों के पार अपनी कार पे सवार…सारी दुनिया ये देख-देख जली रे… बादल झूमेंगे, तो मोर को नाचने से कौन रोक पाएगा भला… पर क्या बताए इनको, इन्हें कुछ सही समझ आएगा क्या भला? बस, इसी तरह की बकवास बातों में ही इनकी ज़िंदगी का आनंद है. कुछ कहूं तो पल्ले पड़नेवाला नहीं. वह जवाब में उन्हें क्या बोलती, “बस यूं ही.” कहकर मुस्कुरा दी.

सारे उपहार पैकेट्स कार में डाले, फिर सामने ठेले पर से अपने लिए नमक नींबू लगा गर्म भुट्टा ख़रीदा, दांतों में दबाया और मौसम का आनंद लेते हुए उत्साह से चल पड़ी ऐसे गंतव्य की ओर, जहां बहुत सारे नन्हें उत्कंठापूर्वक उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे.

Neerja Shrivastav

डॉ. नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू’

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कहानी- जीत गई ज़िंदगी (Short Story- Jeet Gayi Zindagi)

इस अंतिम अस्पताल में वह यंत्रवत घुसा. निराशा से चारों ओर नज़र दौड़ायी, पर असफल रहा. वापस जाते पैरों को किसी के कराहने की आवाज़ ने रोक लिया. मुड़कर देखा, कोने के बेड पर हाथों में नलियां, वेंटीलेटर लगाए कोई लेटा था. गौर से देखा, वह रिया ही थी… उसे अपनी आंखों और क़िस्मत पर विश्‍वास ही नहीं हो रहा था. वह रिया के माथे पर हाथ फेरने लगा, “रिया… उठो… मैं आ गया हूं… उठो… रिया…” मगर वह बेहोश हो चुकी थी. उसका हाथ अपने हाथों में लिए, उससे माफ़ी मांगता, बातें करता प्रतीक रातभर जागा रहा. इस भयानक बम विस्फोट में रिया के बचने को एक चमत्कार मान ईश्‍वर की ख़ूब मिन्नतें करता रहा.

Hindi Short Story

रिया का मन आज सुबह से ही कच्चा हो रहा था. फटाफट काम निपटाते हाथ प्रतीक की आंखों में अपने लिए चिढ़ और नफ़रत के सम्मिश्रित भाव देख ठिठककर रह गए. कहां चूक गई वह? मल्टीनेशनल कंपनी के हज़ारों लोगों को संभालती सीईओ काफ़ी कोशिशों के बावजूद अपना घर बिखरने से नहीं बचा पाई. मन में दबा दुख और आंसुओं का आवेग आंखों के रास्ते बाहर आना चाहता था. किसी तरह ज़ब्त कर गई रिया. चुप-सी उदास दीवारें और पराए होते अपने के बीच रहना बहुत मुश्किल लग रहा था. आहत् अहम् ने न जाने किन आक्रोश भरे क्षणों में अलग होने का निर्णय ले लिया. उसी की काग़ज़ी खानापूर्ति के लिए दोनों चार बजे वकील के पास आने वाले थे.

घर से निकलते हुए रिया के पैरों में मानो बेड़ियां पड़ गईं. एक लंबी सांस ले पूरे घर को आंखों में समेटते बाहर निकली. मानो अब शायद ही वापसी हो.

वकील के यहां तलाक़नामे पर हस्ताक्षर करते रिया के हाथ एकबारगी कांपे. कनखियों से देखा… प्रतीक का भी यही हाल था. दोनों ख़ामोशी के साथ ही बाहर निकले. चर्चगेट स्टेशन पहुंचते ही प्रतीक ने चुप्पी तोड़ी.

“तुम घर पहुंचो, मैं बाद में आऊंगा.” और उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही दरवाज़े से बाहर निकल गया.

‘अब मेरा साथ घर तक भी गवारा नहीं.’ मन रो उठा रिया का. शायद बाहर की मूसलाधार बारिश भी उसका साथ दे रही थी.

लोकल ट्रेन में बैठते ही उसके विचारों की श्रृंखला फिर शुरू हो गयी. कितना प्यार किया करते थे दोनों एक-दूसरे से. प्रेम में आकंठ डूबे रहते. दोनों के परिवार इस शादी के ख़िलाफ़ थे. सारी कठिनाइयां झेलते, आपसी विश्‍वास के सहारे दो वर्ष का लंबा अंतराल गुज़र गया था. बीतते समय ने प्यार की नींव और मज़बूत कर दी थी. लेकिन दोनों के परिवारवालों का दिल फिर भी नहीं पिघला. अब और इंतज़ार न करते हुए दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली. दहलीज़ लांघते ही रिया अय्यर रिया प्रतीक माथुर बन गई. जीवन में ख़ुशियां ही ख़ुशियां थीं. ऑफ़िस से घर लौटने का दोनों को बेसब्री से इंतज़ार होता, लेकिन धीरे-धीरे यह प्यार न जाने कहां खोता चला गया. प्यार की जगह कड़वाहट ने ले ली थी.

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ब्रांद्रा स्टेशन पास आने लगा. विचारों को झटक रिया उठकर दरवाज़े तक आई कि अचानक भयानक आवाज़ से ज़ोरदार बम विस्फोट हुआ. वह कुछ समझ पाती, इससे पहले ही ज़ोरदार धक्के से वह दरवाज़े के बाहर फेंक दी गई. सिर झनझना उठा. चारों ओर ख़ून ही ख़ून, मांस के लोथड़े और चीत्कारें. अर्द्धचेतनावस्था में ही उसने देखा कुछ लोग उसे उठाकर दौड़ रहे हैं. दर्द की एक टीस पूरे शरीर में फैल गई. आंखों के आगे अंधेरा छा गया. शायद बेहोश हो गई थी वह.

प्रतीक थके-थके क़दमों से घर जाने के लिए चर्चगेट पहुंचा. बाहर की दुनिया से बेख़बर अपनी ही धुन में खोया था. स्टेशन पर ख़ूब भीड़ थी. लोग बातें कर रहे थे.

“पिछले ह़फ़्ते तेज़ बारिश ने दम निकाल दिया. उसके बाद भिवंडी में हुआ दंगा दहशत फैला गया. दो दिन पहले शिवसेना की तोड़-फोड़ से डरे लोग संभले भी नहीं थे कि आज 11 जुलाई का ये बम विस्फोट. पता नहीं और क्या-क्या देखना बाकी है.”

बम विस्फोट..? प्रतीक के कान खड़े हो गए. पूछने पर पता चला सात जगहों पर बम विस्फोट हुए हैं और वो भी प्रथम श्रेणी के डिब्बे में. प्रतीक के तो होश उड़ गए. हाथ-पैर कांपने लगे.

“रि…या…” वह ज़ोर से चिल्लाया. सिर पकड़कर नीचे बैठ गया और दहाड़े मारकर रोने लगा. विस्फोट 6.24 को बांद्रा में हुआ था और रिया उसी ट्रेन में थी.

लोगों ने प्रतीक को संभाला और उसे फ़ोन करने की सलाह दी. “हां… हां… फ़ोन करता हूं…” कांपते हाथ न जाने कितनी बार डायल करते रहे, पर फ़ोन नहीं लगा, ना ही मोबाइल और ना ही घर का. लगता भी कैसे, लगभग सभी मुंबईवासी और दूसरे शहरों में रहनेवाले लोग अपने घरवालों और रिश्तेदारों की सलामती जानने के लिए फ़ोन कर रहे थे. इससे सारे नेटवर्क जाम हो गए थे.

काफ़ी रात हो गई थी. प्रतीक जल्द-से-जल्द बांद्रा पहुंचना चाहता था, पर ट्रेनें रद्द हो गई थीं. लोगों का बड़ा-सा हजूम चर्चगेट से भाईंदर और विरार तक पैदल ही भूखा-प्यासा अपने-अपने घरों की ओर भाग रहा था. अनेक शंका-कुशंकाओं के साथ कि कहीं हमारा कोई अपना तो इस विस्फोट में नहीं…? इन भागते पैरों को ताक़त देने के लिए लोग रास्तों में मदद के लिए खड़े थे. स्थानीय निवासी और सेवाभावी संस्थाओं के कार्यकर्ता तो पीने के पानी से लेकर चाय-बिस्किट तक बड़े ही अनुशासित तरी़के से बांट रहे थे, कहीं-कहीं आग्रह के साथ और कहीं मीठी ज़बरदस्ती के साथ. उन अनजान लोगों का प्रेम और अपनापन देख प्रतीक की आंखें बरबस ही गीली हो गईं.

किसी तरह प्रतीक बांद्रा स्टेशन पहुंचा. वहां का दृश्य देखकर उसका दिल दहल गया. मृतकों के शरीर के अवयव जहां-तहां पड़े थे. हाथ कहीं, तो पैर कहीं. सब ओर ख़ून और मांस के चीथड़े. दर्द से चिल्लाते घायल लोगों का बिखरा सामान, ट्रेन की टूटी हुई ख़ून से सनी खिड़कियां, उखड़ी हुई सीटें, विस्फोट की तीव्रता बयान कर रही थीं. आस-पास के लोग घर में डरकर, दुबककर बैठने की बजाय घायल लोगों को जल्द-से-जल्द अस्पताल पहुंचा रहे थे. घर की चादरों और साड़ियों से स्ट्रेचर का काम लिया जा रहा था.

“कहां हो… रिया…” प्रतीक की मानो धड़कनें रुक गई थीं.

“अरे बाबा… यहीं तो हूं… तुम भी ना… ख़ामख़ाह… बेकार शोर मचाते हो.” प्रतीक की जान में जान आई. आंखों में चमक लिए उसने मुड़कर देखा. ओह…. नहीं…. यह तो उसका भ्रम था. ये तो घर के रोज़मर्रा के संवाद थे. प्रतीक पुकारता और रिया ऐसे ही जवाब देती. उसकी प्रोजेक्ट रिपोर्ट के लिए रात-रात भर जागती. उसके साथ विभिन्न संदर्भ ढूंढ़ती, उसका मार्गदर्शन करती रिया उसे याद आने लगी.

काम करते-करते झपकी लगने पर वह सो जाता, परंतु सुबह उसे सारी रिपोर्ट टाइपिंग कर प्रिंटआउट के साथ तैयार मिलतीं. यह रिया का ही कमाल था, जबकि उसे भी सुबह घर के सारे काम निपटाकर ऑफ़िस जाना पड़ता था.

एक दिन उसके बीमार होने पर मना करने के बावजूद रिया अपना प्रेज़ेंटेशन छोड़ सारा दिन उसके सिरहाने बैठी रही, जबकि इस प्रेज़ेन्टेशन के बाद उसे प्रमोशन मिलना तय था. पुरानी बातें याद कर सोच में पड़ गया प्रतीक. ऐसी गुणी, प्रतिभा संपन्न, प्यार करनेवाली पत्नी को वो तलाक़ देने जा रहा था. रिया का पहले खा लेना, उसे खाने के लिए ना पूछना, घर को सलीके से ना रखना या प्रतीक का चीज़ें बेतरतीब रखना, गीला तौलिया बिस्तर पर डाल देना, एक-दूसरे के लिए व़क़्त न होना… ये सब तो इतने बड़े झगड़े की वजह नहीं हो सकती कि तलाक़ ही ले लिया जाए. क्या हमारा ईगो हमारे प्यार से बड़ा हो गया था? और इस प्यार का एहसास होने के लिए क्या इस हादसे का होना ज़रूरी था? यदि वह पहले ही समझ पाता तो शायद रिया को इस तरह ना खोता, धिक्कार है उस पर.

“कहां हो.. रिया…” चलते-चलते थक गया था प्रतीक. एक ओर भय से पागल मन और दूसरी ओर टीवी पर दिखता हाहाकार उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल चक्कर काटने पर मजबूर कर रहे थे.

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अस्पतालों की अवस्था तो और भी विकट थी, चारों ओर शोर ही शोर. “हैलो… पचास बेड और भिजवाओ… एम्बुलेंस प्लेटफॉर्म पर भेजो… सर्जन एनस्थेटिस्ट को कॉल करो… साथ ही सांत्वना के शब्द घबराओ मत… सब ठीक होगा… डॉक्टर जी जान से सेवा में लगे थे. डॉक्टरों द्वारा रक्तदान की अपील करने से पहले ही अस्पताल के बाहर लगी लंबी लाइन ने दो घंटों में ही ख़ून का स्टॉक पूरा कर दिया. इस विलक्षण तेज़ी, भावना और अपनेपन ने प्रतीक को हिम्मत बंधायी और रिया के जीवित रहने की आस भी जगायी. उसे लगा पूरी मुंबई सारी रात नहीं सोयी है और उस जैसे अनेक शोकमग्न लोगों के दुःख में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से शामिल है.

इस अंतिम अस्पताल में वह यंत्रवत घुसा. निराशा से चारों ओर नज़र दौड़ायी, पर असफल रहा. वापस जाते पैरों को किसी के कराहने की आवाज़ ने रोक लिया. मुड़कर देखा, कोने के बेड पर हाथों में नलियां, वेंटीलेटर लगाए कोई लेटा था. गौर से देखा, वह रिया ही थी… उसे अपनी आंखों और क़िस्मत पर विश्‍वास ही नहीं हो रहा था. वह रिया के माथे पर हाथ फेरने लगा, “रिया… उठो… मैं आ गया हूं… उठो… रिया…” मगर वह बेहोश हो चुकी थी. उसका हाथ अपने हाथों में लिए, उससे माफ़ी मांगता, बातें करता प्रतीक रातभर जागा रहा. इस भयानक बम विस्फोट में रिया के बचने को एक चमत्कार मान ईश्‍वर की ख़ूब मिन्नतें करता रहा.

आज तीन दिन बाद रिया ने आंखें खोलीं. शायद यह प्रतीक का प्यार ही था, जो उसे मौत के मुंह से बचा लाया. वेंटीलेटर हटा दिया गया.

“अब ख़तरा टल गया है.” डॉक्टर बोले.

“थैंक्यू… डॉक्टर… थैंक्यू…” डबडबाई आंखों से प्रतीक डॉक्टर के पैरों पर गिर पड़ा. रिया आश्‍चर्यचकित-सी प्रतीक के उदास आंसू भरे चेहरे, सूनी आंखों और बढ़ी हुई दाढ़ी को देख रही थी. उसका हाथ अपने हाथों में ले प्रतीक बहुत कुछ कह रहा था, पर रिया कुछ भी समझ नहीं पा रही थी.

“विस्फोट की तीव्र आवाज़ से इनकी सुनने की शक्ति चली गई है.” डॉक्टर ने एक और आघात किया.

“घबराने की कोई बात नहीं, लगभग सभी पेशेंट्स की यही समस्या है. एक से तीन महीने में यह समस्या अपने आप ठीक हो जाएगी.” प्रतीक ने चैन की सांस ली.  हाथों में हाथ लिए दोनों बड़ी देर तक रोते रहे, पर ये ख़ुशी के आंसू थे. उनका प्यार ख़त्म थोड़े ही हुआ था, वह तो जमी हुई काई के नीचे ठहरे पानी की तरह था और अब तो यह जमी हुई परत भी हट चुकी थी. ज़िंदगी और मौत के बीच झूलती रिया ने प्रतीक को एहसास दिलाया था कि वह रिया से अब भी बेहद प्यार करता है. साथ ही यह भी कि छोटे-मोटे झगड़े तो हर गृहस्थी में होते रहते हैं, उन्हें ज़्यादा तूल देना ठीक नहीं. प्रतीक के इस प्यार, लगाव और देखभाल को रिया भी महसूस कर रही थी और पछता रही थी. सब कुछ पहले जैसा हो गया था. इस बम विस्फोट से न जाने कितनी ज़िंदगियां उजड़ गईं, मगर एक ज़िंदगी संवर गई.

रिया के मुंह से आश्‍चर्यमिश्रित चीख सुन प्रतीक ने सिर उठाकर सामने देखा. दोनों के परिवारवाले खड़े थे, जो टीवी में इन्हें देख यहां पहुंचे थे. इस भयानक

हादसे ने सारी कड़वाहट मिटा दी थी. सिर पर बंधी पट्टी, दोनों हाथों में जलने के ज़ख़्म और पैर में फ्रैक्चर लिए रिया ने उठने की कोशिश की.

“बस… बस… बहू… जल्दी से ठीक होकर घर आ जाओ.” प्रतीक की मां ने कहा. दोनों ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे. ख़ुशियां फिर लौट आई थीं. हां… ज़िंदगी जीत गई थी.

– डॉ. सुषमा श्रीराव

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कहानी- सेल्फी (Short Story- Selfie)

काश! राहुल से उसका अफेयर न होता. अब वह ऐसे चक्रव्यूह में फंस गई थी, जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं जानती थी. एक ऐसा भंवर उसे लील लेने को आतुर था, जिसकी कोई लहर किनारे की ओर नहीं जा रही थी. इस भंवर में अब उसका डूबना निश्‍चित था.

Hindi Short Story

गाजर का हलवा प्लेट में डालकर वह सीढ़ियों की ओर बढ़ी. अनु को हलवा बहुत पसंद है. अभी वह आख़िरी सीढ़ी तक पहुंची ही थी कि उसे हंसी का सम्मिलित स्वर सुनाई दिया. शायद अनु का बॉयफ्रेंड अंकुर आया हुआ था. अंकुर को वह अच्छी तरह जानती है. अक्सर अनु के पास पढ़ने आता है. दोनों मिलकर प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रहे हैं. ज्यों ही उसने टैरेस पर क़दम रखा, सामने का दृश्य देख वह सकपका गई.

अनु अंकुर के आलिंगन में थी और वह उसे किस करते हुए सेल्फी ले रहा था. यकायक उसके समूचे शरीर में झुरझुरी-सी दौड़ गई और सर्दी में भी माथे पर पसीने की बूंदें चमक उठीं. वह ख़ामोशी से नीचे उतर आई. घबराहट के कारण उसे बेचैनी हो रही थी. थोड़ी देर बाद अंकुर चला गया, तो अनु उसके पास आ बैठी.

“क्या बात है दीदी, आपकी तबीयत ठीक नहीं है क्या?” उसने अनु की तरफ़ देखा और गंभीर स्वर में बोली, “अनु, तुम मेरी छोटी बहन के समान हो. अन्यथा न लो, तो तुमसे कुछ कहना चाहती हूं.”

“कहिए न दीदी, क्या बात है?”

“मैं जानती हूं तुम और अंकुर एक-दूसरे को चाहते हो और तुम्हारे घरवालों ने भी तुम्हारे रिश्ते पर स्वीकृति की मोहर लगा दी है. फिर भी विवाह से पूर्व इस तरह से सेल्फी लेना उचित नहीं.” अनु की भावभंगिमा कठोर हो गई. वह बोली, “ओह दीदी, दिस इज़ टू मच. आप हमारी जासूसी करती हैं. मेरे पर्सनल मैटर्स में बोलने का आपको कोई अधिकार नहीं.” दनदनाती हुई वह सीढ़ियां चढ़ गई. हतप्रभ रह गई वह. अनु से उसे ऐसे व्यवहार की अपेक्षा कदापि नहीं थी. खाना खाने का फिर उसका मन नहीं हुआ. वह बिस्तर पर जा लेटी. विवाह के पश्‍चात् उसने जब यह फ्लैट ख़रीदा था, तो बतौर पेइंग गेस्ट अनु को ऊपर का कमरा दे दिया था. अनु उसके कलीग की कज़िन थी और उसे दो साल के लिए एक कमरा चाहिए था, जहां वह आराम से पढ़ाई कर सके. अनु और वह आपस में जल्दी ही घुल-मिल गए थे. इस समय उसकी आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे और मन के कैनवास पर पिछले एक साल की स्मृतियां चलचित्र की भांति उभरकर उसे विचलित कर रही थीं.

वह दिन उसके ज़ेहन में जीवंत हो उठा, जब राहुल के बुलाने पर ऑफिस से सीधी वह कॉफी हाउस पहुंची थी.  राहुल उसकी प्रतीक्षा कर रहा था. “कॉन्ग्रैचुलेशन्स रिया, तुम्हारी शादी फिक्स हो गई. मैं बहुत ख़ुश हूं कि तुमने अपनी ज़िंदगी का इतना बड़ा ़फैसला ले लिया और मुझे बताना भी ज़रूरी नहीं समझा.” राहुल के व्यंग्यात्मक स्वर से उसका मलिन चेहरा और बुझ गया था.

“मैं विवश थी राहुल, क्या करती? पापा से बहुत कहा, पर वे इंतज़ार करने के लिए सहमत नहीं हुए. मैंने तुम्हें पहले ही बताया था कि जब से मम्मी का स्वर्गवास हुआ है, पापा को मेरे विवाह की जल्दी है, लेकिन तुमने मेरी बात को गंभीरता से नहीं लिया. बीटेक के बाद अच्छी-भली जॉब छोड़कर एमबीए करने लगे.” उसका स्वर भीग उठा था.

“नहीं रिया, तुम्हारा निश्‍चय पक्का होता, तो अंकल तुम्हें विवश नहीं कर सकते थे. तुम कोई दूध पीती बच्ची नहीं हो. इंजीनियर हो और अब तो मेरा एमबीए भी कंप्लीट हो चुका है. जल्दी ही जॉब भी मिल जाएगी. इतना समय हम दोनों ने साथ गुज़ारा, किंतु तुमने सब भुला दिया. रिया, मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूंगा.”  क्रोध और पीड़ा के मिले-जुले भाव से राहुल का चेहरा लाल हो उठा था. बोझिल मन लिए वह घर लौट आई थी.

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10 दिन पहले उसके पापा डॉ. राजेश ने उसका रिश्ता सौरभ से पक्का कर दिया था. उसने पापा को काफ़ी समझाया था कि वह कुछ दिन राहुल के जॉब लगने की प्रतीक्षा करें, पर पापा नहीं माने और उन्होंने ज़बरन सौरभ से उसकी सगाई कर दी. सौरभ मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब करता था.

घर-परिवार भी अच्छा था. उन दिनों उसका मन बेहद उद्विग्न रहता था. मम्मी को याद करके वह कलपती. काश! वे ज़िंदा होतीं, तो उसकी ज़िंदगी को यूं बिखरने न देतीं.

धीरे-धीरे एक माह बीत गया और फिर आई वह कभी न भूल सकनेवाली स्याह रात. अब तक क़िस्से-कहानियों या फिर फिल्मों में ही ब्लैकमेलिंग होते देखी थी. कभी ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि एक दिन स्वयं उसका शिकार हो जाएगी. उस रात खाना खाकर वह अपने रूम में पहुंची ही थी कि एक अनजान नंबर से उसे कॉल आया. फोन रिसीव करते ही एक आवाज़ उसके कानों से टकराई,  “तुम मुझे नहीं जानती हो रिया, पर मैं तुम्हें अच्छी तरह से जानता हूं. तुम कंप्यूटर इंजीनियर हो. तुम्हारे पापा डॉ. राजेश मेहता शहर के जानेमाने सर्जन हैं.”

“कौन हो तुम? क्या चाहते हो?“

“उत्तेजित मत हो. मैं तुम्हारे बारे में सब कुछ जानता हूं. सौरभ के साथ तुम्हारी सगाई के बारे में भी और राहुल के साथ तुम्हारे अफेयर के बारे में भी.”

“देखो, तुम जो कोई भी हो, मुझे परेशान किया, तो मैं पुलिस में रिपोर्ट कर दूंगी.”  “पुलिस में जाने की ग़लती मत करना, अन्यथा बहुत पछताओगी. यकीन नहीं आ रहा न, चलो मैं तुम्हारे मोबाइल पर कुछ भेज रहा हूं.” और चंद सेकंड में उसके मोबाइल पर जो फोटो आई, उसे देख उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई. उसे लगा, वह चक्कर खाकर गिर पड़ेगी. वह उसकी और राहुल की फोटो थी, जिसमें वह राहुल के साथ आलिंगनबद्ध थी और राहुल उसे किस कर रहा था.

जैसे अनगिनत बिजलियां उस पर एक साथ टूटकर गिर पड़ी हों. उसकी संपूर्ण चेतना बिल्कुल जड़ हो गई थी. पूरा ब्रह्मांड उसे घूमता-सा जान पड़ा था.

“रिया, यह फोटो तुम्हारे पापा और सौरभ को भेज दी जाए, तो कैसा रहे?” और फिर वही हुआ जो ऐसे केस में होता है, पैसों की डिमांड. फोन कट गया था. कितनी ही देर तक वह जड़वत बैठी रही थी. यह कैसी मुसीबत में फंस गई वह. कौन उसे ब्लैकमेल कर सकता है? तभी दिमाग़ में राहुल का नाम कौंधा. अवश्य ही वह राहुल है, क्योंकि फोटो उसी के पास थी. वह सारी रात बिस्तर पर पड़ी करवटें बदलती रही थी. कितना नाज़ था उसे स्वयं की समझदारी पर कि वह कभी कोई ग़लत काम नहीं कर सकती. एक बार उसकी फ्रेंड नेहा ने अपने बॉयफ्रेंड को पत्र लिख दिया था. कितना नाराज़ हुई थी वह उस पर. देर तक समझाती रही थी कि कभी किसी के पास कोई लेटर या अपना फोटो नहीं छोड़ना चाहिए और अब स्वयं यह भूल कर बैठी थी. कहां गया उसका वह आत्मविश्‍वास. प्यार के उन्माद में ऐसी बह गई कि अपने संस्कार भी भुला बैठी और ब्लैकमेलिंग जैसे संगीन मामले में फंस गई.

अगले दिन उसके कहने पर राहुल उससे मिला. उसे देखते ही वह बिफर पड़ी, “तुम इतना गिर जाओगे, मैं सोच भी नहीं सकती थी. मैं तुमसे शादी नहीं कर रही, तो तुम मुझे ब्लैकमेल करोगे?”

“यह क्या अनाप-शनाप बोल रही हो. मैं तुम्हें ब्लैकमेल कर रहा हूं. दिमाग़ ख़राब तो नहीं हो गया तुम्हारा. आख़िर बात क्या है?” उसने सारी बात बताकर कहा, “वह सेल्फी तुम्हीं ने ली थी न राहुल, फिर मैं यह कैसे मान लूं कि यह हरकत तुम्हारी नहीं है.”

“रिया प्लीज़, मुझ पर ऐसा घृणित इल्ज़ाम मत लगाओ. मैं कभी तुम्हारा बुरा नहीं चाहूंगा. तुम कहो, तो मैं तुम्हारी कुछ मदद करूं.”

“ओह राहुल, तुम पहले ही से काफ़ी मदद कर रहे हो?”  कड़वाहट से बोल वह घर लौट आई थी. फिर किस तरह उससे एक अनजान मफलर से चेहरा ढके व्यक्ति ने रुपए लिए, इस बात को याद कर जनवरी की इस ठंड में भी उसका शरीर पसीने से भीग रहा था. उस घटना ने उसकी ज़िंदगी ही बदलकर रख दी थी. अब हर पल वह डरी-सहमी-सी रहती कि कहीं उस व्यक्ति का दोबारा फोन न आ जाए. जब भी उसके मोबाइल की घंटी बजती, वह चिहुंक पड़ती. एक सर्द लहर-सी उसके समूचे शरीर में दौड़ जाती. चेहरा स़फेद पड़ जाता. उसकी यह हालत उसके पापा से अधिक दिनों तक छिपी नहीं रह सकी. एक दिन नाश्ते के टेबल पर उन्होंने पूछ ही लिया था, “रिया, देख रहा हूं आजकल तुम दिनोंदिन कमज़ोर और पीली पड़ती जा रही हो. कहीं तुम्हें कोई प्रॉब्लम तो नहीं है?”

“नहीं पापा, प्रॉब्लम क्या होगी. ऑफिस में काम का बहुत प्रेशर है.” कहकर वह अपने रूम में चली गई थी. 15 दिन ही बीते होंगे कि उस रात दोबारा उसके सिर पर सैकड़ों ज्वालामुखी फट गए थे. गर्म-गर्म लावा बनकर शब्द कानों में पड़ रहे थे, “इतने बड़े बाप की बेटी हो. अच्छी-ख़ासी ज्वेलरी होगी तुम्हारे पास. बस, वही चाहिए मुझे.”  कटे वृक्ष के समान वह पलंग पर गिरकर फूट-फूटकर रो पड़ी थी.

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काश! राहुल से उसका अफेयर न होता. अब वह ऐसे चक्रव्यूह में फंस गई थी, जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं जानती थी. एक ऐसा भंवर उसे लील लेने को आतुर था, जिसकी कोई लहर किनारे की ओर नहीं जा रही थी. इस भंवर में अब उसका डूबना निश्‍चित था. इससे पहले कि उसकी भूल पापा को पता चले और उनकी आंखों में उसके लिए नफ़रत और क्रोध दिखाई दे, उसे अपना जीवन समाप्त कर लेना चाहिए. हां, मृत्यु में ही उसकी मुक्ति है. कितनी ही देर तक वह रोती रही. निराशा की एक गहरी परत उसके चारों ओर लिपटती जा रही थी. रात के अंधियारे में उसकी व्यथा सुननेवाला कोई नहीं था. रो-रोकर जब जी कुछ हल्का हुआ, तो विचारों ने करवट बदली. उ़फ्, यह क्या सोच रही है वह. उसके जीवन पर पापा का क्या कोई अधिकार नहीं? उनके लाड़-प्यार का क्या यही प्रतिदान है? अभी तक तो वह मम्मी के ग़म से नहीं उबर पाए हैं. अब बेटी के बिछोह का इतना बड़ा सदमा क्या उन्हें जीते जी नहीं मार देगा? नहीं… नहीं… वह ऐसा कायरतापूर्ण क़दम कभी नहीं उठाएगी. मन ही मन वह ईश्‍वर का नमन करने लगी. काश! नियति उसे इस चक्रव्यूह को भेदने का कोई उपाय सुझा दे और वह उस व्यक्ति को सज़ा दिलवा सके, ताकि भविष्य में वह कभी किसी युवती का जीवन ख़राब न कर सके.

अगली शाम पापा के मित्र इंस्पेक्टर यादव ने जिस व्यक्ति को अरेस्ट किया, वह और कोई नहीं सौरभ था. वह अचम्भित, स्तब्ध थी, उसका होनेवाला पति ही उसकी ज़िंदगी के साथ ख़िलवाड़ कर रहा था. इंस्पेक्टर यादव ने बताया था, “जिस मोबाइल से सौरभ ने तुमको फोन किया था, उसके आईएमईआई नंबर को हमने ट्रेस किया. साथ ही वह ज्वेलरी बॉक्स, जो उसने तुम्हारी कार से उठवाया था, उसमें जीपीएस ट्रैकर लगा हुआ था. उसी की बदौलत हम सौरभ को पकड़ पाए.”

सौरभ को सगाई के पश्‍चात् पता चला था कि रिया का पिछले तीन सालों से राहुल से अफेयर चल रहा था. वह यह शादी नहीं करना चाहता था, पर रिश्ता तोड़ने से पहले कुछ पैसा ऐंठना चाहता था. राहुल को जॉब की तलाश थी. उसने राहुल को जॉब का आश्‍वासन देकर उससे दोस्ती की और फिर उसकी अनुपस्थिति में उसके मोबाइल से फोटो अपने मोबाइल पर फॉरवर्ड कर ली. उसी रात उसने रिया को फोटो भेजी थी.

उसमें इतना साहस भी नहीं बचा था कि वह पापा का सामना कर पाती. ग्लानि और शर्मिंदगी का एहसास उसके हृदय को मथे डाल रहा था. अंतस की पीड़ा आंखों से आंसू बनकर बह रही थी. आज उसकी वजह से उसके पापा की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई थी. काश! यह धरती फट जाती और वह उसमें समा जाती. पापा उसकी मनःस्थिति समझ रहे थे. इसलिए स्वयं उसके कमरे में चले आए. “मुझे क्षमा कर दीजिए पापा.” उनके कंधे पर सिर रख वह बिलख पड़ी.

“जो कुछ भी हुआ, उसे एक दुखद स्वप्न समझकर भूल जाओ. अच्छा हुआ, व़क्त रहते तुमने मुझे सब कुछ बता दिया. इंस्पेक्टर यादव मेरे मित्र हैं. उन्होंने मुझे आश्‍वासन दिया कि वह इस बात को मीडिया में नहीं आने देंगे, अन्यथा हमारी कितनी बदनामी होती. आधुनिकता के नाम पर आज की युवापीढ़ी का इस तरह का खुला अमर्यादित व्यवहार क्या जायज़ है?” भर्राए कंठ से पापा बोले थे. देर तक वह उसका सिर सहलाते रहे. भावनाओं का आवेग कुछ कम हुआ, तो उन्होंने कहा,  “याद रखो बेटा, हमारे कर्म ही जीवन को आकार देते हैं. वे कर्म ही होते हैं, जो हमारा वर्तमान और भविष्य निर्धारित करते हैं. भूल मेरी भी है, जल्दबाज़ी में इतना ग़लत फैसला ले बैठा.”

कुछ दिनों बाद ही उसका विवाह राहुल के साथ हो गया था. सोचते-सोचते उसने माथे पर किसी के कोमल हाथों का स्पर्श महसूस किया, तो आंखें खोल दीं. पश्‍चाताप का भाव चेहरे पर लिए उसके समीप अनु बैठी हुई थी. “आई एम सॉरी दीदी. ऊपर जाकर ठंडे दिमाग़ से सोचा, तो लगा आप बिल्कुल सही कह रही थीं. विवाह से पूर्व किसी पर भी इतना विश्‍वास करना उचित नहीं. मैंने आपको बहुत दुख पहुंचाया दीदी. मुझे क्षमा कर दीजिए.” उसने स्नेह से अनु का हाथ थाम लिया,  “मुझे ख़ुशी है, तुमने अपनी दीदी की बात का मान रखा.”

“अच्छा, अब उठिए दीदी. हाथ-मुंह धो लीजिए. राहुल भइया आने ही वाले होंगे. मैं जानती हूं, आपने खाना भी नहीं खाया होगा. मैं आप दोनों के लिए चाय और नाश्ता ला रही हूं.” चंद मिनटों बाद ही राहुल आ गया. मंत्रमुग्ध दृष्टि से उसे निहारते हुए बोला, “हुज़ूर, आज इस चांद-से मुखड़े पर बेमौसम बदलियां क्यों छाई हुई हैं?”

उसने उसे अपनी बांहों के घेरे में ले लिया. जैसे ही उसने अपनी और रिया की एक सेल्फी लेनी चाही, उसे एक करंट-सा लगा. छिटककर वह दूर होते हुए बोली, “नहीं राहुल, सेल्फी नहीं.” राहुल खिलखिलाकर हंस पड़ा. क़रीब आकर उसकी पलकों को चूमते हुए बोला, “अरे यार, अब हम दोनों पति-पत्नी हैं.” उसके अधरों पर भी स्निग्ध मुस्कान तैर गई. राहुल की आगोश में सिमटकर उसने उसके सीने पर सिर रख दिया. अब वह अतीत की स्याह परछाइयों से पूरी तरह से मुक्त थी.

renu mandal

      रेनू मंडल

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कहानी- परिवेश (Short Story- Parivesh)

आज के ज़माने में अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा होना सुखद है. हम सभी एक अलग परिवेश में पले-बढ़े हैं. हमारी अपनी अलग महत्वाकांक्षाएं हैं. ऐसे में बिल्कुल नए परिवेश में ढलना एक दुश्कर कार्य है. शादी के बाद सामंजस्य ज़रूरी है, पर सामंजस्य के नाम पर, जहां पूरे अस्तित्व को दांव पर लगा देना उचित नहीं है, वहीं अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उस घर की सुख-शांति को दांव पर लगाना भी ठीक नहीं है.

Hindi Stories

“क्या हुआ अदिति? इस तरह मुस्कुरा क्यूं रही है?” दीप्ति के यह पूछते ही अदिति की हंसी छूट गई. बड़ी मुश्किल से ख़ुद को संयत करके बोली, “मैं सोच रही थी कि अगर ईश्‍वर ने इस दिल को ज़ुबां दी होती और साथ में स्वर भी दिया होता तो क्या होता?”

“इस दुनिया में घमासान छिड़ा होता और क्या होता. तू भी न, कितनी बेतुकी बातें सोचती है. वैसे देखा जाए, तो दिल बोलता तो है, बस सामनेवाले के दिल के तार जुड़े होने चाहिए, तभी तो मां-बाप, प्रेमी-प्रेमिका, दोस्त ये सभी एक-दूसरे की भावनाओं को बिन बताए ही समझ लेते हैं, जैसे मैंने समझ लिया है कि यह बेतुकी बात तेरे दिल में ऐसे ही तो नहीं आई है.” दीप्ति की बात सुनकर अचानक ही अदिति संजीदा हो उठी.

कुछ सोचते हुए बोली, “दीप्ति, अक्सर हम रिश्ते बनाने में जल्दबाज़ी कर जाते हैं और जब तक हमें अपनी ग़लती का एहसास होता है, तब तक हम एक कमिटमेंट के बोझ तले दब चुके होते हैं. अगर इस दिल को स्वर मिला होता, तो तुरंत हम एक-दूसरे की बातों को समझकर, रिश्तों को आगे बढ़ाने से पहले एक-दूसरे के दिल की आवाज़ सुनकर सही निर्णय पर तो पहुंचते. स्वार्थ और मजबूरी पर टिके रिश्तों की पहचान तो की जा सकती, क्षणिक जज़्बात को संभालने का मौक़ा तो मिलता. सामनेवाले को स्वयं ही बिन बताए बात समझने का मौक़ा मिलता और ग़लतफ़हमियों की गुंजाइश तो न होती.”

अदिति एक ही सांस में बोलती चली गई, तो दीप्ति ने उसे टोका, “अदिति, तू सिक्के के एक ही पहलू पर विचार कर रही है. दूसरा पहलू तो देख, कितना भयानक है. तेरी इस बेतुकी सोच से मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं. ईश्‍वर ने सोच-समझकर दिल को ज़ुबां नहीं दी है, ताकि हमारे रिश्तों में परदा पड़ा रहे और सुधार की गुंजाइश बनी रहे, रिश्तों की डोर नाज़ुक होती है. हमारे मन के भीतर चलते सवाल-जवाब और तनाव को ये डोर सह नहीं पाएगी और इसे टूटते देर नहीं लगेगी. सोच अगर इस दिल को ज़ुबां मिल जाए, तो रिश्ते कितनी बेरहमी से चटकेंगे. आज अगर हमें किसी रिश्ते से मुंह मोड़ना भी पड़े, तो कम से कम इतना ध्यान तो रखें कि जीवन में किसी मोड़ पर मुलाक़ात हो, तो मुस्कुराकर एक-दूसरे को पहचानकर आगे बढ़ें, न कि एक कड़वाहट के साथ उपेक्षा से मुंह फेर लें. पर ये बता कि ये फितूर तुझे सूझा कैसे? क्या चल रहा है तेरे मन में?”

प्रश्‍न उछालकर दीप्ति किचन की ओर चली गई और अदिति का मन उस प्रश्‍न में उलझ गया. क्या बताए वह दीप्ति को कि जिस जतिन के साथ एक महीने पहले तक उसने हर हाल में साथ जीने-मरने की क़समें खाई थीं, आज उसी रिश्ते पर उसका मन पुनर्विचार करने को मजबूर हो गया है.

दीप्ति और अदिति दोनों कॉलेज के दिनों की सहेलियां हैं. दीप्ति एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती है, वहीं अदिति एमबीए कर रही है और आजकल दीप्ति के साथ ही रह रही है. एक-दूसरे की राज़दार होने के साथ-साथ वे एक-दूसरे को भरपूर स्पेस भी देती हैं. इसके अलावा समय-समय पर एक-दूसरे की समस्याओं के समाधान के लिए उचित मार्ग भी सुझाती हैं.

एमबीए के दूसरे साल में इंडस्ट्रियल-ट्रेनिंग के दौरान अदिति की मुलाक़ात जतिन से हुई. एक बड़ी कंपनी को सहजता से चलाते हुए जतिन के सभ्य और आकर्षक व्यक्तित्व से प्रभावित अदिति उसे कब दिल दे बैठी, पता ही न चला. मॉडर्न और कुछ कर दिखाने की तमन्ना रखनेवाली अदिति के मोहपाश ने जतिन को कब बांध लिया, वो जान ही नहीं पाया.

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अदिति के जन्मदिन पर जतिन उसे डिनर पर ले गया, उस दिन वह साड़ी में बिल्कुल अलग अंदाज़ में दिख रही थी. हमेशा वेस्टर्न कपड़ों में दिखनेवाली अदिति को इस रूप में देखकर जतिन ख़ुद को रोक नहीं पाया. रूमानियत से भरा वह अदिति को प्रपोज़ कर बैठा, जिसे अदिति ने भी सहर्ष स्वीकार कर लिया.

दोनों इस रोमांच से गुज़र ही रहे थे कि तभी जतिन का बर्थडे आ गया. दीप्ति और अदिति बड़े उत्साह से केक और बुके लेकर उसे सरप्राइज़ देने उसके घर पहुंचीं, तो वे ख़ुद सरप्राइज़ हो गईं. जब उन्होंने जतिन के घर में एक शांत और पारंपरिक माहौल देखा, तब उनका उत्साह शीघ्र ही ठंडा पड़ गया.

उन्हें यूं आया देख जतिन कुछ संकोच में पड़ गया. तभी वहां जतिन की मां आ गईं. सादगी और स्नेह से भरी जतिन की मां से अदिति काफ़ी प्रभावित हुई. बातों ही बातों में जतिन ने बताया कि बिज़नेस क्लास से जुड़े होने के कारण उसका परिवार आज भी संयुक्त रूप से रहता है.

घर का संचालन उसकी मां की देख-रेख में घर की दोनों बहुओं द्वारा किया जाता है, तो घर में सभी भाई बिज़नेस में उनके पिता के अनुभवों के आधार पर चलते हैं. कितनी भी डिग्रियां वे हासिल कर लें, वे सभी उनके अनुभवों के आगे बेकार हैं. जतिन की मां ने बड़े उत्साह से बताया कि जतिन के भाई की शादी हाल ही में हुई है. अपनी बहू के बारे में बताते हुए उनकी आंखों में संतुष्टि व प्रसन्नता के चिह्न थे.

अदिति ने घर के रख-रखाव को देखकर कहा, “आंटी, आपने घर को कितने पारंपरिक तरी़के से रखा है.”

तो वो हंसते हुए बोलीं, “बेटी, परंपराओं की ये अमूल्य निधि ही हमारे घर की पहचान है. हम सभी परिवारजनों ने इसे सुरक्षित रखने में अपना-अपना योगदान दिया है. ईश्‍वर की कृपा से मेरी दोनों बहुओं ने भी मेरा बड़ा साथ दिया है.” यह कहते हुए उनकी आंखों में संतोष उतर आया था.

बड़ी भावुकता के साथ जब उन्होंने कहा, “ये भगवान का आशीर्वाद ही है कि यत्नपूर्वक संजोई परंपराओं की अमूल्य निधि को मेरा परिवार आगे बढ़ा रहा है.” यह सुनकर जहां अदिति कुछ सोच में पड़ गई, वहीं दीप्ति उनके घर के परिवेश को देखकर उत्साहित नज़र आ रही थी और तारी़फें करते नहीं थक रही थी.

जतिन की मां उन्हें भोजनकक्ष की ओर ले गई, जहां डायनिंग टेबल की जगह आकर्षक चौकियां लगी हुई थीं, जिनमें सुंदर नक्काशी की हुई थी. थालियों में लगा राजसी नाश्ता देखकर तो उनकी आंखें फैल गईं. अदिति और दीप्ति ने जींस पहनी थी, इसलिए  नीचे बैठने में कुछ दिक़्क़त हुई. जतिन की मां ने बड़े मनुहार के साथ उन्हें नाश्ता करवाया.

रोज़ ब्रेड-बटर पर आश्रित दीप्ति के लिए आज का ब्रेकफास्ट किसी फाइव स्टार होटल के नाश्ते से कम नहीं था. तभी जतिन की दोनों भाभियां आम रस लेकर आईं. सिर पर पल्ला लिए उन्हें देख अदिति कुछ और सिमट गई. उनके घर के पारंपरिक माहौल में वह स्वयं को असहज महसूस करने लगी थी.

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“आप कुछ और लीजिए न.” छोटी बहू के पूछने पर जतिन की मां बोली, “तुम लोग बातें करो, मैं कुछ देर में आऊंगी.” अदिति ने दोनों बहुओं के चेहरे को ध्यानपूर्वक पढ़ा, लेकिन उन चेहरों में थकावट और शिकायत का रंचमात्र भी चिह्न नहीं था. अदिति से रहा नहीं गया और वह बोल पड़ी, “सिर पर पल्ला रखने से कभी आपको उलझन नहीं होती है?”

“नहीं, बिल्कुल भी नहीं. ऐसा नहीं है कि हम आज की आधुनिक दुनिया से अपरिचित हैं. हम सबके लिए ये बड़े सम्मान की बात है कि हम अपने परिवार की गरिमा का ख़्याल रखें और अपनी संस्कृति की धरोहर को संभालें.” सहज और आत्मविश्‍वास के साथ कही बात ने अदिति को निरुत्तर कर दिया.

तभी पास खड़े जतिन ने कहा, “इस घर के परिवेश में अब तक सभी बहुएं सहर्ष और सहज ही ढल गई हैं.” यह कहते हुए उसने अदिति के चेहरे को पढ़ने की कोशिश की. चलते समय सभी ने जतिन के जन्मदिन पर घर आने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया था. जतिन के परिवार को नज़दीक से समझने के बाद जहां दीप्ति उत्साहित थी, वहीं अदिति किसी और सोच में पड़ी थी.

जाने क्यूं उस परिवेश की भूरि-भूरि प्रशंसा के बावजूद स्वयं को उस माहौल में ढालने के ख़्याल से ही वो तनावग्रस्त महसूस करने लगी थी. वह ख़ुद से प्रश्‍न करने लगी कि क्या ये वही जतिन है, जिससे उसने प्यार किया था? या फिर उनका प्यार उस मुक़ाम पर नहीं पहुंच पाया, जिसमें सामंजस्य के लिए किसी और सोच-विचार की कोई जगह नहीं होती है? क्या उसका प्यार अभी कच्चा है? जिस जतिन को उसने दिल दिया था और जो उस दिन अपने घर पर मिला था, दोनों के बीच अंतर को पाटने की कशमकश में पूरा दिन निकल गया.

“अदिति, आज खाना नहीं खाना क्या?”

“आ… हां.” अदिति मानो नींद से जागी हो. खाने की मेज़ पर छाई चुप्पी को दीप्ति ने तोड़ा, “अदिति, तेरे दिल में जो भी है, उसे जल्द-से-जल्द जतिन को बताना बेहतर है. आज के ज़माने में अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा होना सुखद है. हम सभी एक अलग परिवेश में पले-बढ़े हैं. हमारी अपनी अलग महत्वाकांक्षाएं हैं. ऐसे में बिल्कुल नए परिवेश में ढलना एक दुश्कर कार्य है. शादी के बाद सामंजस्य ज़रूरी है, पर सामंजस्य के नाम पर, जहां पूरे अस्तित्व को दांव पर लगा देना उचित नहीं है, वहीं अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उस घर की सुख-शांति को दांव पर लगाना भी ठीक नहीं है. सच-सच बताना अदिति उनके घर में जो शांति और सुकून था, क्या वो पहली बारिश की बूंदों के बाद उठी सोंधी महक-सा नहीं था? पर बावजूद इसके तुम तनाव में थीं, क्योंकि तुम स्वयं को उन परिस्थितियों में रखकर देख रही थीं, जबकि मैंने उस महक को भीतर तक महसूस किया, क्योंकि मैं जानती थी कि मैं यहां थोड़ी देर के लिए रुकी हूं. मेरी एक अलग दुनिया बाहर इंतज़ार कर रही है, पर तुम वहां ठहरकर अपने मन मुताबिक दुनिया की खोज कर रही थी. अगर तुम अपनी ज़रूरतों के हिसाब से चलोगी, तो ये तुम्हारी स्वार्थपरता होगी, क्योंकि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तुम्हें उस घर की चूलें हिलानी पड़ेंगी.”

“पर एक बात बताओ दीप्ति, क्या कभी उस घर में परिवर्तन नहीं हुआ होगा?” “परिवर्तन ज़रूर आया होगा, पर वो तूफ़ान बनकर नहीं आया होगा. उसने अपनी पैठ धीमी गति से की होगी. जतिन के परिवार में, जो स्त्रियां हैं, वे सभी उसी मिलते-जुलते परिवेश से आई हैं. उनका उस परिवार में घुल-मिल जाना मुश्किल नहीं है. वो घर ऐसे लोगों पर टिका है, जो स्वयं से पहले दूसरों के बारे में सोचते हैं. जतिन के घर जाकर एक सुकून का एहसास होता है, पर उसके पीछे न जाने कितने लोगों का योगदान है. तुम्हारा और जतिन का रिश्ता अभी कितना आगे बढ़ा है, यह तुम्हारा व्यक्तिगत मामला है. अगर अब तुम उस घर जाना चाहती हो, तो उस घर के परिवेश को, जो वहां की पहचान है, मन से स्वीकारना होगा. उसे ज्यों का त्यों कैसे रख पाओगी, इस पर विचार कर लेना.”

दीप्ति की बातों से अदिति के मस्तिष्क में मंथन उद्वेलित हो चुका था. काफ़ी सोच-विचार के बाद रात तक अदिति निर्णय ले चुकी थी. सुबह उठते ही उसने जतिन को फोन किया. तय समय पर दोनों कॉफी हाउस में थे. आज जहां अदिति तनावरहित थी, वहीं जतिन कुछ असमंजस की स्थिति में था.

जतिन के कुछ बोलने से पहले अदिति बोल पड़ी, “आज मैं जो कुछ कहूंगी, मुझे विश्‍वास है तुम समझने की कोशिश करोगे. जतिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि तुम्हारे घर के परिवेश और वातावरण ने मुझे बहुत प्रभावित किया. आज के समय में भी अपनी संस्कृति को संभालना सुखद अनुभव है. जिन परंपराओं का निर्वाह तुम्हारे परिवार में हो रहा है, उनके साथ ज़्यादती होगी अगर मैं तुम्हारे परिवार में शामिल हुई तो… क्योंकि तुम्हारे और मेरे परिवेश में एक बड़ा अंतर है. उस अंतर को पाटने के लिए मैं तुम्हारे परिवार या स्वयं के अस्तित्व को दांव पर नहीं लगाना चाहती हूं. मैं तुम्हारे घर पर आकर सुकून के कुछ क्षण तो बिता सकती हूं, पर पूरी ज़िंदगी नहीं, क्योंकि मेरी अपनी अलग उड़ान है, मुझे अपनी मंज़िल तक पहुंचना है.”

अदिति ने अपने दिल की बात कहकर जतिन की ओर देखा, तो ऐसा लगा कि कुछ देर पहले उसके चेहरे पर छाए असमंजस के बादल छंट गए और मुस्कान के रूप में सुनहरी धूप ने जगह ले ली हो.

दिल से एक बोझ उतरने से वह तनावमुक्त दिखा, “थैंक्स अदिति, तुमने जिस सहजता के साथ अपनी बात कही, उसके लिए मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूं. जीवन में कुछ निर्णय समझदारी से लिए जाते हैं. उस दिन जब तुम मेरे घर आईं, तब भावी बहू के रूप में तुम्हें देखकर मैं तनावग्रस्त हो गया था. मैंने भावावेश में आकर तुम्हें प्रपोज़ तो कर दिया, पर उसके बाद एक दिन भी चैन से नहीं बैठा हूं. मैं हर पल तुम्हें अपने परिवार में फिट करने की जद्दोज़ेहद में लगा रहता था. तुम्हें अपने परिवार में सम्मिलित करके मैं स्वयं, तुम्हारे और अपने परिवारजन, किसी के साथ भी न्याय नहीं कर पाता. रिश्ता वही है, जो सहजता से निभे, वरना समझौता अधिक दिन तक नहीं टिकता है. सच तो यह है कि मैं ऊपर से कैसा भी दिखूं, पर अंदर से मेरा मन अपने परिवेश से भीतर तक जुड़ा हुआ है.”

“ये सच है जतिन कि तुम्हारी पहचान ने मुझे बहुत प्रभावित किया है. मैं अपने जीवन में उसके कुछ अंश ज़रूर डालना चाहूंगी, पर पूरी तरह से उसमें ढलना मुमकिन नहीं है, क्योंकि मेरी परवरिश अलग ढंग से हुई है. मेरी आकांक्षाएं भिन्न हैं. सच, आज कितने दिनों के बाद हम तनावमुक्त हुए हैं. ऐसा लग रहा है, हम दोनों ने आज अपने सिमटे पंख खोल दिए हों.”

दीप्ति की उचित सलाह पर जतिन और अदिति ने अपना रिश्ता तोड़ा तो ज़रूर था, पर उसमें कड़वाहट नहीं, समझदारी और दूरदर्शिता की मिठास थी. जहां अदिति जतिन के परिवार में पूरी गरिमा के साथ निभाई जानेवाली परंपराओं की मीठी छाप लेकर घर लौटी थी, वहीं जतिन अदिति की क़ाबिलियत तथा उसकी उड़ान को शुभकामनाओं से भरकर अपने परिवार के पास वापस लौट चुका था.

Minu tripathi

      मीनू त्रिपाठी

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कहानी- सीक्वल 2 (Short Story- Sequel 2)

माना बच्चा मां के पेट में रहता है, लेकिन जुड़ा तो पिता के दिल से भी रहता है. तुम गर्भस्थ शिशु को सुनने का प्रयास करना. देखना, उसकी धड़कनें स्वतः ही तुम्हारे दिल में उतरती चली जाएंगी. गर्भ में आने से लेकर गर्भनाल से जुदा होने तक वह तुम्हारे क्रियाकलापों और सोच-विचार से भी उतना ही प्रभावित होगा जितना अपनी मां से, क्योंकि उसकी मां के क्रियाकलाप और सोच-विचार तुमसे जुड़े हैं. तुम मां और शिशु के बीच की अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी हो. और कड़ी का महत्व हमेशा लड़ी से ज़्यादा होता है, क्योंकि वही लड़ी को तोड़ती या जोड़ती है.

Hindi Kahani

सुशांत के जाते ही स्वाति को फिर से टेबल, दराजें आदि टटोलते देख रमाजी से रहा न गया. “बेटी, तुम क्या टटोलती रहती हो? कुछ परेशानी है?” सास द्वारा चोरी पकड़ी जाते देख स्वाति एकदम झेंप गई.

“इस समय तुम्हें ज़रा भी टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं है. किसी भी तरह का तनाव बच्चे पर ग़लत असर डाल सकता है.”

“तो क्या सारी ज़िम्मेदारी होनेवाली मां की ही है? होनेवाले पिता का भी तो कोई फर्ज़ बनता है न मम्मीजी.” इतने समय से स्वाति के सीने में पनपता दर्द आख़िर फटकर बाहर आ ही गया था.

“कैसी बातें कर रही हो बेटी तुम? सुशांत तुम्हारा इतना तो ख़याल रखता है.” रमाजी बहू के आक्षेप से हैरान थीं.

“मैं कब कहती हूं कि ख़याल नहीं रखते? लेकिन मुझे धोखा तो न दें. शरीर फैलकर अनाकर्षक हो रहा है तो वे और कहीं…”

रमाजी को तो सांप सूंघ गया. “किसने कहा तुझसे ऐसा? सुशांत ऐसा नहीं कर सकता.”

“आप उनकी मां हैं न, इसलिए ऐसा कह रही हैं. लेकिन मैंने अपनी आंखों से उन्हें छुप-छुपकर उसके पत्र पढ़ते देखा है.”

“किसके?”

“अब यह मैं क्या जानूं? अपने लाडले से ही पूछिए न?” स्वाति की रुलाई फूट पड़ने को थी. लेकिन रमाजी ने धीरज रखते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा. फिर हाथ पकड़कर उसे पलंग तक ले गई और धीरे से लिटा दिया.

“मैं शाम को सुशांत से स्वयं बात करूंगी. तुम विश्‍वास रखो, ऐसी कोई बात नहीं है.”

‘काश न हो…’ सोचते हुए स्वाति आंखें मूंदकर सोने का प्रयास करने लगी. डिलीवरी का समय एकदम पास जान उसकी रातों की नींद उड़ गई थी. हालांकि रमाजी ने आकर सब संभाल लिया था. उसकी मम्मी ने भी व़क़्त पर पहुंच जाने का आश्‍वासन दिया था. रमाजी और फ़ोन पर मम्मी उसे नसीहतें देती रहती थीं, हिम्मत बंधाती रहती थीं. पर फिर भी कोई न कोई परेशानी उसे घेरे रहती. समस्या मात्र शारीरिक रहती तो फिर भी ठीक था. लेकिन पति सुशांत के प्रति जब से उसके मन में शक के कीड़े ने जन्म लिया था, तब से वह मानसिक तनाव में भी रहने लगी थी. और इसी बात ने रमाजी को बेहद चिंतित कर दिया. शाम को सुशांत के घर लौटते ही उन्होंने उसे आड़े हाथों लिया. इस अनपेक्षित प्रहार से सुशांत एकदम बौखला उठा. उसने सफ़ाई पेश करने का प्रयास किया तो स्वाति भूखी शेरनी की तरह गरज उठी.

“मम्मीजी, इनसे कहिए कि वो पत्र निकालकर दिखाएं जो ये चोरी-चोरी पढ़ते हैं.”

“क… कौन-सा पत्र?”

“झूठ मत बोलो. मैंने अपनी आंखों से तुम्हें कभी बाथरूम में, तो कभी बालकनी में तो कभी मेरे सो जाने के भ्रम में चोरी-चोरी उसके पत्र पढ़ते देखा है.”

“हूं… तो यह बात है.” सुशांत ने अपनी जेब से एक पत्र निकालकर दिखाया. “शायद तुम इस पत्र की बात कर रही हो?”

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“हां, यही… देखा मम्मीजी आपने? इसे अपने साथ जेब में लेकर घूमते हैं. और मैं यहां…” स्वाति की बात अधूरी ही रह गई, क्योंकि सुशांत पत्र मां के हाथ में थमाकर तेज़ी से घर से बाहर निकल गया था. सास-बहू किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी उसे जाते देखती रह गईं. रमाजी की नज़रें हाथ में पकड़े पत्र पर गईं तो वह चौंक उठी, “अरे, यह तो तुम्हारे पापाजी के हाथ का लिखा पत्र है!”

“क्या?” स्वाति चौंक उठी.

रमाजी पत्र पढ़ने में खो गईं. स्वाति ने भी अपनी नज़रें उसी पर गड़ा दीं.

प्रिय बेटे सुशांत,

मेरा पत्र पाकर तुम हैरत में पड़ गए होगे न? दरअसल जब से पता चला है कि मैं दादा बननेवाला हूं, मैं ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा हूं और तभी से तुम्हें पत्र लिखने की सोच रहा हूं. लगभग रोज़ ही रमा को बहू से फ़ोन पर बात करते सुनता हूं. अपने खाने-पीने का ख़याल रखना, रोज़ दोनों व़क़्त नियम से दूध पीना, सूखे मेवे, फल आदि बराबर खाना, भारी सामान मत उठाना. कपड़ों या पानी से भरी बाल्टी ख़ुद मत उठाना. सुशांत या बाई से कह देना… क्या? सवेरे जी मिचलाता है? अब बेटी यह तो इस दौरान होता ही है. पास में बिस्किट रखकर सोया करो. सवेरे उठकर दो बिस्किट खाकर ही बिस्तर से नीचे उतरा करो… आयरन और कैल्शियम बराबर ले रही हो न? बिल्कुल चिंता मत करना. इस समय किसी भी तरह का टेंशन लेना बिल्कुल ठीक नहीं है. मैं डिलीवरी से काफ़ी पहले आ जाऊंगी और सब संभाल लूंगी… हां, पर तब तक अपना ख़याल रखना.

तुम्हारी सास के भी रोज़ ऐसे ही हिदायत भरे फ़ोन आते होंगे. मां बनना है ही इतनी महत्वपूर्ण और गौरवपूर्ण बात. लेकिन एक बात तुम्हें भी खटकती होगी कि तुम भी तो पिता बनने जा रहे हो, फिर कोई तुम्हें इतना महत्व क्यों नहीं दे रहा? इस समय तुम्हारी अनुभूतियों को मुझसे बेहतर और कोई नहीं समझ सकता. लेकिन हम पुरुष बेचारे इस तरह के अनुभव फ़ोन पर शेयर नहीं कर सकते. झिझक होती है. इसलिए बहुत सोच-विचारकर आख़िर मैंने तुम्हें पत्र लिखने का निर्णय लिया.

मैं जानता हूं कि पापा बनने की ख़बर सुनते ही तुम्हारा दिल बल्लियों उछलने लगा होगा. मुझे भी जब डॉक्टर ने तुम्हारे अपनी मां के पेट में आने की सूचना दी थी, तो मेरे पांव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे. एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर लेने का-सा एहसास अंदर से उठा था. मन कर रहा था घर, ऑफ़िस, आस-पड़ोस में सबको चीख-चीखकर बताऊं कि मैं पापा बननेवाला हूं और मैंने ऐसा किया भी. चिल्लाकर तो नहीं, पर शर्माते, हिचकिचाते, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में सबको जता दिया था कि मैं पापा बनने जा रहा हूं.

उस समय हमारा संयुक्त परिवार था और घर में बड़े-बुज़ुर्गों का थोड़ा ज़्यादा ही लिहाज़ करने का रिवाज़ था. इसलिए मैं रमा का खुलकर ख़याल तो नहीं रख सका. पर हां, अपनी ओर से पूरा ध्यान रखता था. ऑफ़िस से लौटते व़क़्त चुपके से उसके लिए मिठाई या समोसे बंधवा लाता. कभी उसकी पान खाने की इच्छा होती तो रात को टहलाने के बहाने उसे पान खिला लाता. भरे-पूरे घर में भीनी-भीनी ख़ुशबू बिखेरते मिठाई-नमकीन को छुपाकर लाना बेहद जीवट का काम था. पर उन्हें खाते हुए रमा के चेहरे पर जो असीम तृप्ति के भाव उभरते, उन्हें देख मन गहरे आत्मसंतोष से भर जाता. इस दौरान लड़कियों का मन खट्टा, तीखा, मीठा और कभी-कभी तो मिट्टी, चॉक आदि खाने के लिए भी मचल जाता है. तुम बहू की स्वादेन्द्रिय का रुख़ जानकर उसे परितृप्त करने का प्रयास करना. देखना, तुम्हें भी कितनी तृप्ति का एहसास होगा? ऐसा लगेगा, सब तुम्हारे अपने पेट में जा रहा है.

मैं तुम्हें विशेषतः यह बताने के लिए पत्र लिख रहा हूं कि मैंने इस दौरान रमा का कैसे ध्यान रखा और जो मैं नहीं कर पाया, वो तुमसे करने की उम्मीद रखता हूं. पुरुष अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने में हमेशा से ही कंजूस रहे हैं. इसीलिए शायद पितृत्व को वो गौरव नहीं मिल सका, जो मातृत्व को हासिल है, वरना नंद ने भी कान्हा को उतना ही चाहा था जितना यशोदा ने. लेकिन ग्रंथों के पन्ने यशोदा की ममता के गान से भरे हुए हैं और गली-गली चर्चे भी यशोदा के ही होते हैं. ख़ैर, इन छोटी-छोटी बातों से पिता की महानता और उसका प्यार कम नहीं हो जाएगा.

रमा को उन दिनों सवेरे जल्दी उठने में परेशानी होती थी. मैं चाहता था सुबह की चाय मैं बनाकर उसे बिस्तर पर ही दूं, पर संकोचवश ऐसा कभी नहीं कर पाया. उसे ही सवेरे उठकर काम करना होता था. हालांकि मां, बहन उसकी मदद करती थीं, ख़याल भी रखती थीं. लेकिन मैं उसके लिए कुछ ख़ास नहीं कर पाने के कारण मन मसोसकर रह जाता था. एक दिन तो मैं ऑफ़िस के लिए निकल रहा था और रमा को उल्टियां शुरू हो गईं. मैं पलटकर उसे संभालने लगा. लेकिन तुरंत ही मां आ गई. ‘हम संभाल लेंगे. तुम जाओ, तुम्हें देर हो रही है.’ मुझे जाना पड़ा. उस व़क़्त रमा मुझे जिन कातर निगाहों से ताक रही थी, उन निगाहों को याद कर सीना आज भी छलनी हो जाता है. तुम्हारा तो फिर एकल परिवार है और बहू नौकरी भी करती है. उसे तो तुम्हारे सहारे की और ज़्यादा ज़रूरत है. बेटा, एक बात हमेशा याद रखना. एक स्त्री के लिए उसका पति सबसे बड़ा संबल होता है. ख़ुद से भी ज़्यादा वह उस पर भरोसा करती है. कभी भी कहीं भी उसके इस विश्‍वास को मत तोड़ना, चाहे इसके लिए संकोच और मर्यादा की बेड़ियां ही क्यों न तोड़नी पड़ जाएं…

पत्र पढ़ती रमाजी की आंखों के सामने अक्षर धुंधलाने लगे थे. उन्होंने घबराकर आंखें पोंछीं तो दो बूंद आंसू टपक पड़े. स्वाति हैरानी से कभी सास को निहारती तो कभी पत्र को. दोनों फिर पत्र पढ़ने में मशगूल हो गईं.

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… थोड़ा ज़्यादा ही गंभीर और भावुक हो गया हूं मैं! चलो, अब कुछ मज़ेदार बातें करते हैं. आख़िर इतने ख़ुशी का मौक़ा है. सब लोग बहू को अच्छा खिलाने-पिलाने की हिदायत दे रहे होंगे. पर मैं कहता हूं उसके साथ-साथ तुम अपने खाने-पीने का भी पूरा ख़याल रखना. आख़िर उसे और घर को संभालना तो तुम्हें ही है न? यदि तुम ही बीमार हो जाओगे तो… और फिर कल को एक नन्हा-मुन्ना भी आ जाएगा. उसके साथ तो तुम्हारी ज़िम्मेदारी व कार्यभार और भी बढ़ जाएगा. इसलिए अपने खाने-पीने का ख़याल ख़ुद रखना. जो फल, जूस, मेवे, घी आदि बहू को खिलाओ, थोड़ा ख़ुद भी खाना. माना बच्चा मां के पेट में रहता है, लेकिन जुड़ा तो पिता के दिल से भी रहता है. तुम गर्भस्थ शिशु को सुनने का प्रयास करना. देखना, उसकी धड़कनें स्वतः ही तुम्हारे दिल में उतरती चली जाएंगी. गर्भ में आने से लेकर गर्भनाल से जुदा होने तक वह तुम्हारे क्रियाकलापों और सोच-विचार से भी उतना ही प्रभावित होगा जितना अपनी मां से, क्योंकि उसकी मां के क्रियाकलाप और सोच-विचार तुमसे जुड़े हैं. तुम मां और शिशु के बीच की अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी हो. और कड़ी का महत्व हमेशा लड़ी से ज़्यादा होता है, क्योंकि वही लड़ी को तोड़ती या जोड़ती है.

गर्भनाल से जुदा होकर एक स्वतंत्र अस्तित्व जब तुम्हारी गोद में आएगा तो ख़ुशियों के साथ-साथ तुम्हारी ज़िम्मेदारियां भी कई गुना बढ़ जाएंगी. शुक्र है, अपनी उन ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए तुम्हारे पास पैटरनिटी लीव यानी पितृत्व अवकाश का विकल्प है, जो हमारे समय नहीं था. उसका पूरा सदुपयोग करना. बच्चे के पालन-पोषण संबंधी टिप्स मैं तुम्हें इस पत्र के सीक्वल-2 में दूंगा.

पत्र लंबा होता जा रहा है, पर देख रहा हूं कुछ महत्वपूर्ण बातें अभी भी छूटी जा रही हैं, जो शायद तुम्हें अभी तक किसी और ने नहीं बताई होंगी. गर्भावस्था के दौरान लगनेवाले टिटनेस के इंजेक्शन बहू को अवश्य लगवा देना और उसकी डॉक्टरी जांच बराबर करवाते रहना. बच्चे के टीकाकरण और देखभाल संबंधी जानकारी सीक्वल-2 में दूंगा. अब सबसे महत्वपूर्ण बात, हमारे लिए सबसे आवश्यक है सुरक्षित प्रसव और स्वस्थ शिशु. शिशु लड़का हो, चाहे लड़की, हमारे लिए परिवार में उसका आगमन बेहद हर्ष और उल्लास का विषय होगा. याद रहे, भ्रूण के लिंग निर्धारण के लिए उत्तरदायी स़िर्फ और स़िर्फ उसका पिता ही होता है. इसके लिए उसकी मां को प्रताड़ित करना बेहद घृणित और संकुचित सोच है.

रमा ने नन्हे शिशु के स्वागत की तैयारियां आरंभ कर दी हैं. झबले, पोतड़े, टोपी, मोजे आदि जाने क्या-क्या तैयार किए हैं. दादी बनने के उसके बड़े अरमान हैं. पर याद है न, हर अरमान और गौरव के साथ कुछ ज़िम्मेदारियां जुड़ी होती हैं. उन्हें पूरा करके ही उस गौरव का भरपूर लुत्फ़ उठाया जा सकता है. तुम्हें एक पिता नहीं, एक अच्छा पिता बनने के लिए ढेरों शुभकामनाएं. बहू को ढेर सारा आशीर्वाद और दुलार. ख़ुशख़बरी का बेसब्री से इंतज़ार करता.

तुम्हारा पिता

पत्र समाप्ति के साथ-साथ रमाजी की आंखों से गंगा-यमुना प्रवाहित होने लगी थी. स्वाति की आंखें भी भीग गई थीं. अचानक उसे सुशांत की अनुपस्थिति का ख़याल आया.

“मम्मीजी, सुशांत कहां चले गए? मेरा मन बहुत घबरा रहा है. मुझे उन पर इस तरह अविश्‍वास नहीं करना चाहिए था. लगता है, उन्हें मेरे व्यवहार से बहुत ठेस लगी है. मैं उनसे माफ़ी मांगना चाहती हूं. अभी फ़ोन करती हूं.”

स्वाति ने मोबाइल लगाया. लेकिन उधर से फ़ोन काट दिया गया. स्वाति बहुत निराश-हताश हो गई. इस बीच उसके पेट में हल्का-हल्का दर्द होने लगा. वह पेट पकड़कर बिस्तर पर लेट गई.

“मम्मीजी, बहुत दर्द हो रहा है.”

“हाय राम! लगता है लेबर पेन शुरू हो गए हैं. सुशांत को कैसे बुलाऊं?” घबराहट के मारे रमाजी के हाथ-पांव फूलने लगे थे.

“परेशान मत होइए मम्मीजी, मैं मैसेज भेजती हूं.” अभ्यस्त उंगलियों ने खटाखट मैसेज टाइप कर भेज दिया. “सॉरी! कम सून. नॉट फीलिंग वेल.”

“देखना मम्मीजी, वे दस मिनट में दौड़े चले आएंगे. हमारे परस्पर विश्‍वास की डोर इतनी भी कमज़ोर नहीं है.”

सुशांत स्वाति के विश्‍वास पर ख़रा उतरा. दस मिनट में ही वह भागता हुआ अंदर घुसा.

“स्वाति, स्वाति… तुम ठीक तो हो?”

“लगता है स्वाति को दर्द शुरू हो गया है. उसे अस्पताल ले जाना होगा. तुम उसे धीरे-धीरे कार तक ले जाओ. मैं बाकी सामान लेकर आती हूं.”

रमाजी और सुशांत ऑपरेशन थिएटर के बाहर चहलक़दमी कर रहे थे. उत्सुकता और बेचैनी का वह समय भी आख़िर बीत ही गया. लेडी डॉक्टर ने बाहर आकर नवजात शिशु के आगमन की बधाई दी. स्वाति को बच्चे के संग वॉर्ड में श़िफ़्ट कर दिया गया था. पोते को गोद में लेकर रमाजी खिल उठीं.

“देख सुशांत, बिल्कुल तेरे पापा पर गया है.”

सुशांत ने पापा को फ़ोन लगाया और ख़ुशख़बरी सुनाई.

“मैंने मोबाइल का स्पीकर ऑन कर दिया है. मैं अपने पोते की आवाज़ सुनना चाहता हूं.” स्पीकर पर बच्चे के रोने की आवाज़ गूंज उठी.

“अपने दादा को पुकार रहा है.” रमाजी का स्वर सुनाई दिया.

“पापाजी, मैं ठीक हूं. जल्दी आइए, हम आपका इंतज़ार कर रहे हैं.” यह स्वाति का स्वर था.

“और सीक्वल-2 का भी.” हंसी के साथ अंतिम पुछल्ला जोड़ते हुए सुशांत ने बात ख़त्म की.

Anil Mathur

     अनिल माथुर

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कहानी- फ़ैसला (Short Story- Faisla)

ऐसा नहीं था कि मैं अपने परिवार से प्यार नहीं करता था, लेकिन अपने प्यार को जताना मुझे कभी आया ही नहीं. आज झील ने, मेरे अपने ख़ून ने मुझे इस बात का एहसास दिलाया कि हर रिश्ते में प्यार का इज़हार कितना ज़रूरी होता है. पता नहीं ऐसा क्यों था, मैं जिन्हें बेहद प्यार करता था, वे ही मेरे प्यार को तरसते रहे.

Short Story

मेरी पत्नी का देहांत हुए आज बीस दिन हो गए. लोग सच ही कहते हैं, एक पत्नी ही होती है, जो पति की ज़्यादतियों को बर्दाश्त करती है. ईश्‍वर ने औरत को इतनी ज़्यादा सहनशक्ति दे रखी है, जिसकी कोई सीमा नहीं है, इसलिए उसकी तुलना धरती से की गयी है. अपनी मां की बीमारी की ख़बर सुनकर मेरा बेटा बहू के साथ अपनी मां को देखने आया, लेकिन मेरी पत्नी की सांस शायद उसकी एक झलक के लिए ही रुकी हुई थी. जैसे ही झील अपनी मां को पुकारता हुआ उसके कमरे में पहुंचा, उसकी मां ने उसके चेहरे को अपने कमज़ोर हाथों से थामा और हल्की-सी मुस्कान के साथ हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं. झील तो जैसे अपनी मां की मौत से पागल-सा हो गया. उसकी मां ही उसके लिए सब कुछ थी. कुल मिलाकर झील के लिए सारी दुनिया मां तक ही सिमटकर रह गयी थी और आज वही उसे छोड़कर जा चुकी थी.

झील के लिए मेरी भूमिका स़िर्फ एक पालक की ही थी, जो आर्थिक रूप से उसका पालन कर रहा था. झील के साथ मैंने कभी उसकी पढ़ाई या उसके भविष्य की योजनाओं के बारे में बातें नहीं कीं. मेरा काम था धन कमाना और उनकी ज़रूरतों को पूरा करना, बस मेरी ज़िम्मेदारी ख़त्म. कितना ग़लत था मैं? क्या पैसे में इतनी शक्ति होती है? यदि होती तो क्या मैं अपनी पत्नी को बचा ना लेता. ऐसा नहीं था कि मैं अपने परिवार से प्यार नहीं करता था, लेकिन अपने प्यार को जताना मुझे कभी आया ही नहीं. आज झील ने, मेरे अपने ख़ून ने मुझे इस बात का एहसास दिलाया कि हर रिश्ते में प्यार का इज़हार कितना ज़रूरी होता है. पता नहीं ऐसा क्यों था, मैं जिन्हें बेहद प्यार करता था, वे ही मेरे प्यार को तरसते रहे. मेरी पत्नी हर तरह से मेरा ख़याल रखती. उसकी हरदम यही कोशिश रहती कि मुझे किसी प्रकार की शिकायत ना हो. उसके इस समर्पण में प्यार के साथ-साथ एक प्रकार का डर भी शामिल रहता था, क्योंकि मैं बहुत ग़ुस्सैल प्रवृत्ति का इंसान था. किस बात पर नाराज़ हो जाऊं, कोई जान नहीं सकता था. मैंने बिना वजह कई बार अपनी पत्नी पर हाथ भी उठाया. मुझे याद है एक बार मेरी पत्नी ने कहा था, “ये सच है कि कमज़ोर ही मार खाता है, लेकिन मारनेवाला उससे भी ज़्यादा कमज़ोर होता है.” उसकी गूढ़ बातों का रहस्य समझकर भी मैं नासमझी दिखाता था, क्योंकि मैं जानता था कि वो बिल्कुल सच कह रही है.

आज मुझे मेरे बेटे ने ये एहसास दिला दिया कि ना मैं एक अच्छा बेटा था, ना अच्छा पति और ना ही अच्छा पिता और इन सब बातों का सारांश ये है कि मैं अच्छा इंसान ही नहीं रहा.

मेरी पत्नी की तेरहवीं के दूसरे दिन सारे मेहमान चले गए. घर में हम स़िर्फ तीन प्राणी ही रह गए. मेरा बेटा, बहू और मैं. बहू तो मुझसे बात कर लेती थी, लेकिन झील तो जिस कमरे में मैं रहता था, वहां से उठकर चला जाता. उसे देखकर ऐसा लगता जैसे अपनी मां की मौत का ज़िम्मेदार वो मुझे ही समझता हो. कुछ ही दिन बीते थे कि बहू ने बताया कि वे लोग वापस जा रहे हैं, शायद झील इस घर में मां के बगैर रहना ही नहीं चाहता था. मुझसे तो बात करता नहीं था, बहू के द्वारा कहलवा दिया कि कल रात की ट्रेन से वे जा रहे हैं. मैंने सोचा, अभी तो इनके जाने में पूरा एक दिन का समय बाकी है. रात को खाने के बाद बहू को समझा दूंगा कि कुछ दिन और रुक जाओ. रात के खाने पर झील नहीं दिखा. बहू ने बताया कि वो अपने दोस्त के यहां गए हैं.

मैंने उस समय कुछ नहीं कहा. जानता था सोने के पहले बहू दवाई देने के बहाने आएगी तभी कह दूंगा. लगभग दस मिनट बाद दरवाज़े पर दस्तक हुई. मैं समझ गया झील आ गया होगा. मैंने हमेशा अपने बेटे से दूरी बनाई रखी. वो तरसता रहा मुझसे बात करने के लिए, लेकिन मेरे ग़ुस्सैल चेहरे को देखकर उसकी कभी भी हिम्मत ही नहीं हुई और आज ऐसा व़क़्त आया है कि मेरी इच्छा हो रही है कि झील थोड़ी देर मेरे पास बैठे तो वो मुझ से दूर भाग रहा है, लेकिन अपने इस अकेलेपन का ज़िम्मेदार मैं ख़ुद था.

थोड़ी देर बाद बहू दवाई लेकर कमरे में आई. मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने एक लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ यह कहते हुए बढ़ाया कि ‘पापा झील ने आपके लिए दिया है. बहू के जाते ही मैंने पत्र खोला. पिता बनने के बाद ये पहली बार हुआ था कि झील ने मेरे लिए कुछ लिखा था. मैंने भीगी पलकों को पोंछा, जो न जाने क्यों बरसने पर तुली थीं. पत्र की हेडिंग पढ़कर ही दिल में एक टीस हुई. झील अपनी मम्मी के लिए हमेशा ‘डियर मम्मी’ या ‘मेरी स्वीट मम्मी’ इस तरह का संबोधन देता था. लेकिन मेरे लिए उसने लिखा था.

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आदरणीय पापा,

प्रणाम!

पता नहीं क्यों आपके लिए पत्र लिख रहा हूं ये जानते हुए कि आपके पत्थर दिल पर कुछ असर नहीं होगा. फिर भी मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं. पापा अब शायद मैं यहां कभी नहीं आऊंगा, क्योंकि मम्मी की वजह से ही मैं यहां आता था, जब वो ही नहीं रहीं तो… पापा इंसान को हमेशा ये क्यों लगता है कि वो हमेशा शक्तिशाली रहेगा, कभी किसी का सहारा नहीं लेगा. क्या ये सच है पापा, क्योंकि ये आपके ही शब्द हैं. पापा आप हमेशा स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझते थे. आपने कभी किसी को इ़ज़्ज़त नहीं दी. कभी किसी के साथ कोमलता से पेश नहीं आये. मैंने सुना था एक पुरुष यदि अच्छा पति साबित नहीं होता, तो वो एक क़ामयाब पिता होता है. लेकिन आपने तो कोई भी भूमिका ईमानदारी से नहीं निभाई. पापा आपने मम्मी को भी वो सम्मान नहीं दिया, जिसकी वो हक़दार थीं. जबकि उन्होंने हमेशा आपकी ख़ुशियों का ख़याल रखा. आपके बदलने की आस लगाए वो इस दुनिया से चली गयीं. मैंने कई बार मम्मी को आपके व्यवहार से दुखी होकर रोते देखा है. मैंने कभी उन्हें खुलकर हंसते नहीं देखा. उनकी हर हरकत, हर ख़ुशी में मैंने आपका दबाव महसूस किया है. पता नहीं वो आपको किस तरह बर्दाश्त कर रही थीं. आपका डर उन पर इस तरह हावी रहता था कि आपकी गैरमौजूदगी में भी आपके वजूद का एहसास उनके साथ होता था और वो हमेशा डरी-सहमी रहती थीं. मुझे याद है एक बार मैंने नासमझी में कह दिया था, “मम्मी आपको दूसरे पापा नहीं मिले जो आपने इन्हें हमारा पापा बना दिया.” आज मुझे इस बात का एहसास होता है कि ये बात कर मैंने मम्मी का दिल दुखाया था, लेकिन मम्मी हंस दी थीं. शायद मेरी उम्र ही ऐसी थी कि थप्पड़ नहीं मार सकती थीं. उन्होंने हंसकर कहा था, “यदि ये तुम्हारे पापा न होते तो मुझे तुम्हारे जैसा प्यारा बेटा कैसे मिलता.” जब मैं समझदार हुआ, रिश्तों को समझने लगा, तब समझा कि प्यार में वो शक्ति होती है, जो हर ग़म को सहने की ताक़त देती है और कुछ इसी तरह का प्यार मम्मी आपसे करती थीं. पापा मैं जानता हूं आपको मम्मी की कमी का एहसास हो रहा होगा. वो इसलिए नहीं कि आप उनसे प्यार करते थे, बल्कि इसलिए कि आपके हाथों में जो डोर रह गयी, उसकी कठपुतली ही नहीं रही, जिस पर आप हुकूमत चला सकें.

पापा, मम्मी की ख़ातिर मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूं, कल हम लोग जा रहे हैं. यहां ऐसा कोई नहीं, जो आपकी देखभाल कर सके. इसलिए मैं चाहता हूं आप हमारे साथ चलें. यहां आपको अकेले छोड़ दूंगा, तो मम्मी की आत्मा मुझे कभी माफ़ नहीं करेगी. पापा ऐसा कहना तो ग़लत होगा कि मैं आपसे प्यार नहीं करता. हां, ये बात अलग है कि आपके कठोर व्यवहार में मेरा प्यार कहीं दब गया है, फिर भी कहता हूं पापा मुझे आपसे प्यार है और इसी प्यार का सहारा का वास्ता देकर कहता हूं कि आप हमारे साथ चलें.

आपका बेटा,

झील

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आज मेरे बेटे ने मुझे यह एहसास दिला ही दिया कि मैंने अपनी ज़िंदगी की कितनी अनमोल घड़ियों को यूं ही गंवा दिया. काश! मैं अपने बेटे को बता सकता कि मैं उससे और उसकी मम्मी से कितना प्यार करता हूं. आज मैंने यह निश्‍चय किया कि जो कुछ गंवा बैठा हूं, उसे तो ला नहीं सकता, पर जितना बचा है उसे तो संभाल ही सकता हूं. आज मैंने ऐसा फ़ैसला किया, जिसका इंतज़ार मेरी पत्नी को हमेशा रहा था. मेरे फैसले से मेरा मन इतना शांत हुआ कि मुझे पहली बार बहुत मीठी नींद आई. आज की सुबह लिए एक नया एहसास लाई थी. नाश्ते की टेबल पर झील नहीं दिखा. बहू ने बताया देर तक जागे हैं, इसलिए अब तक नहीं उठे. मैंने नाश्ता ख़त्म किया और अपने कमरे में आ गया. झील की मम्मी की तस्वीर के आगे जाकर पहले तो क्षमा मांगी, फिर धीरे से उससे वो कहा, जो वो सुनना चाहती थी. न जाने ऐसा क्यों लगा जैसे वो तस्वीर में भी मुस्कुरा रही है. बाहर आकर मैं लॉन में बैठा ही था कि अचानक मुझे एहसास हुआ कि मेरे ठीक पीछे कोई ख़ड़ा है. पलटकर देखा तो झील खड़ा था और थोड़ी ही दूर पर बहू खड़ी थी. मैं वापस मुड़ा और बिना पीछे देखे ही बहू को संबोधित करते हुए कहा, “मेरा सामान पैक कर लो, मैं भी चलूंगा.” मैं बगैर देखे ही दोनों की प्रतिक्रिया का अनुमान लगा सकता था. शायद बहू चली गयी थी.

मैंने पलटकर देखा, झील मेरी तरफ़ ही देख रहा है. बरबस ही मेरी बांहें फैलीं और झील एक अबोध बच्चे की तरह मुझसे लिपट गया व फूट-फूट कर रोने लगा. मेरी आंखों से भी आंसुओं की धार बह निकली. हम दोनों के आसुओं ने हमारे बीच की सारी दूरियां मिटा दीं. मैंने झील की तरफ़ देखा तो ऐसा लगा कि यही तो मेरी सच्ची पूंजी है. हम दोनों ने ख़ामोश रहकर भी एक-दूसरे से सब कुछ कह दिया. शाम को घर से निकलते हुए ऐसा लगा जैसे झील की मम्मी की आत्मा भी हमारे साथ है और होती भी क्यों ना, आज उसकी आत्मा जो ख़ुश थी.

– मीना राज तांडिया

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कहानी- गृहस्थी (Short Story- Grihasthi)

उन्हें सोमेश बाबू को यूं स्त्रियों की भांति गृहस्थी चलाते देख काफ़ी आश्‍चर्य होता था. अक्सर मज़ाक में पूछ बैठते, “यार सोम, तुम ऐसे औरतोंवाले काम इतनी आसानी से कैसे कर लेते हो? तुम्हें बोरियत नहीं होती क्या?”

सोमेश बाबू हंसकर कहते, “सच पूछो तो मुझे बड़ा मज़ा आता है. अपनी इच्छानुकूल भोजन बनाकर खाने से जो परम संतुष्टि मिलती है, उसे तुम नहीं समझोगे.”

Short Story in Hindi

आज भी सोमेश बाबू ने दो-चार निवाले खाकर थाली सरका दी. उनकी पत्नी नीलम देवी के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं.

आख़िर इनको हो क्या गया है? आज पांच दिन हो गए इनको बेतिया आए, लेकिन रोज़ खाते समय यही बेरुखी दिखा रहे हैं.

जब से बड़े बेटे सतीश की शादी हुई है, खाना उसकी पत्नी ममता ही बनाती है. बेचारी काफ़ी अच्छा खाना बनाती है. जो भी खाता है, उसकी तारीफ़ करता है. नीलम देवी सोचती रहीं कि अगर यह मान भी लिया जाए कि इनको बहू के हाथ के खाने का स्वाद रास न आता हो, लेकिन आज तो नीलम ने ख़ुद रसोई में जाकर अपना मनपसंद भोजन तैयार किया था, फिर भी इन्होंने नहीं खाया. कहीं इनकी तबियत तो गड़बड़ा नहीं गयी.

सोमेश बाबू चारपाई पर लेटे हुए थे. नीलम देवी ने प्यार से उनका माथा सहलाया.

“क्यों जी, आपकी तबियत ठीक नहीं है क्या? जब से आप आए हैं, खाना ठीक से नहीं खा रहे हैं.”

“नहीं, तबियत तो ठीक है. बस ऐसे ही खाने की इच्छा नहीं हो रही है. खैर, मैं कुछ देर सोना चाहता हूं. तुम भी जाकर आराम करो.”

सोमेश बाबू आंखें बंद कर जागते रहे. अपनी विगत ज़िन्दगी के बारे में सोचते रहे. आज से पैंतीस साल पहले उनकी नियुक्ति रेलवे में बुकिंग क्लर्क के पद पर मुजफ्फरपुर में हुई थी. उसी समय उनकी नई-नई शादी भी हुई थी.

बेतिया में उनका पुश्तैनी मकान था और वे अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे. मजबूरी में सोमेश बाबू को मुजफ्फरपुर में रेलवे क्वार्टर में अकेले रहना पड़ता था, क्योंकि उनके माता-पिता अपना घर छोड़कर नहीं जाना चाहते थे. बेचारी नई-नवेली उनकी पत्नी को लोक-लाज के कारण सास-ससुर की सेवा के लिए उनके साथ ही रहना पड़ता था.

तब आज का ज़माना तो था नहीं कि आज शादी हुई और कल माता-पिता की मर्ज़ी की परवाह किए बिना ही लड़का अपनी पत्नी को साथ लेकर चला जाए. शुरू-शुरू में सोमेश बाबू को अकेलापन काटने को दौड़ता, जब ड्यूटी से थके-हारे क्वार्टर में आते तो मन में एक हूक-सी उठती.

काश! मेरी पत्नी मेरे साथ रह पाती, मेरे लिए चाय-नाश्ता बनाकर रखती, मुस्कुराकर स्वागत करती.

लेकिन मन की इच्छा मन में ही दबकर रह जाती थी. शुरू-शुरू में वे जल्दी-जल्दी घर जाते थे. धीरे-धीरे समय बीतता रहा. नीलम देवी को दो लड़के और एक लड़की हुई. माता-पिता तो अपनी उम्र पूरी कर बारी-बारी से दुनिया से चले गए, लेकिन अब बच्चों की पढ़ाई की समस्या मुंह फाड़कर खड़ी हो गई.

घर को तो किराए पर देकर भी जाया जा सकता था, लेकिन सोमेश बाबू का हर दो-तीन साल पर स्थानांतरण होता रहता था. ऐसे में तीन-तीन बच्चों की पढ़ाई सुचारू रूप से नहीं चल पाती, इसलिए मजबूरी में नीलम देवी बेतिया में ही रहकर बच्चों को पढ़ाती रहीं.

समय के साथ सोमेश बाबू ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया. अब उन्हें अकेले रहना नहीं खलता था. ड्यूटी से वापस आकर अपने लिए वे स्पेशल कड़क चाय का प्याला तैयार करते और इत्मीनान से अख़बार के साथ चाय की चुस्की लेते. फिर थैला लेकर बाज़ार निकल जाते. चुन-चुन कर ताज़ी सब्ज़ियां लाते, उन्हें साफ़ करते, बड़े मनोयोग से खाना तैयार करते और खा-पीकर संतुष्टि की नींद सो जाते.

धीरे-धीरे उन्होंने गृहस्थी का पूरा साजो-सामान इकट्ठा कर लिया था. सोमेश बाबू खाना बहुत लाजवाब बनाते थे. चिकन और मटन तो इतना अच्छा बनाते कि उनके मित्रों की लार टपक पड़ती.

उनके एक मित्र थे राकेश सहाय. वो बेचारे एक ग्लास पानी भी ख़ुद से लेकर नहीं पीते थे, इसलिए दोनों बच्चों को हॉस्टल में डाल दिया था और पत्नी को हमेशा साथ ही रखते थे. उन्हें सोमेश बाबू को यूं स्त्रियों की भांति गृहस्थी चलाते देख काफ़ी आश्‍चर्य होता था. अक्सर मज़ाक में पूछ बैठते, “यार सोम, तुम ऐसे औरतोंवाले काम इतनी आसानी से कैसे कर लेते हो? तुम्हें बोरियत नहीं होती क्या?”

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सोमेश बाबू हंस कर कहते, “सच पूछो तो मुझे बड़ा मज़ा आता है. अपनी इच्छानुकूल भोजन बनाकर खाने से जो परम संतुष्टि मिलती है, उसे तुम नहीं समझोगे.”

अब तो सोमेश बाबू को अपने हाथ से बनाए भोजन की ऐसी आदत पड़ गई थी कि छुट्टियों में घर जाने पर पत्नी और बेटी के हाथ का बना खाना बेस्वाद लगता था. लेकिन ‘दो-चार दिनों की बात है’, सोचकर किसी तरह काम चला लेते.

जब से बच्चे बड़े हो गए थे, कभी-कभार नीलम देवी छुट्टियों में उनके पास आकर रहना चाहती, तो उनके रवैये से जल्दी ही उकता कर चली जातीं. शुरू-शुरू में तो बेचारी ने बड़े चाव से पति की गृहस्थी को संवारना चाहा. लेकिन जैसे ही वह कोई काम करना चाहती, सोमेश बाबू लपककर पहुंच जाते और पत्नी पर न्योछावर होने लगते, “तुम यहां तो आराम कर लो, वहां तो दिनभर खटती रहती हो, कम-से-कम बन्दे को यहां तो अपनी सेवा का मौक़ा दो.” नाटकीय अंदाज़ में हंसकर सोमेश बाबू पत्नी के हाथ का काम छीनकर ख़ुद करने लगते.

बेचारी लाचारी से अपने पति को काम करते देखती रहती. एक भारतीय संस्कारों में पली औरत के लिए यह कितने शर्म की बात है कि वह भली-चंगी बैठी रहे और उसका पति गृहस्थी के काम करे. यहां तक कि सोमेश बाबू उनका खाना तक परोस देते. तंग आकर पत्नी ने उनके पास आना ही बन्द कर दिया.

इसी बीच बिटिया की शादी कर दी और फिर जैसे ही बड़े बेटे सतीश की नौकरी बैंक में लगी, उसकी भी शादी कर दी. छोटा बेटा नीतेश मेडिकल के अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहा था.

अब सोमेश बाबू के रिटायरमेंट में दो साल और बचे थे. आजकल वे गोरखपुर में बड़े बाबू के पद पर कार्यरत थे. उनके ज़िम्मेदारीपूर्ण दायित्व निर्वाह को देखते हुए उनके उच्चाधिकारियों ने उनकी तऱक़्क़ी के साथ बेतिया में डिप्टेशन कर दिया, ताकि नौकरी के अंतिम वर्ष वे परिवार के साथ रह सकें.

सोमेश बाबू को बहुत आश्‍चर्य हुआ, उन्होंने तो इसके लिए कभी कोई सिफ़ारिश नहीं की थी. बेचारे बड़े कशमकश में थे. उन्हें अकेले रहने की ऐसी आदत पड़ चुकी थी कि परिवार के साथ रहना उन्हें अपनी स्वतंत्रता का हनन लगता था. लेकिन अगर इंकार कर देते तो लोगों को आश्‍चर्य होता कि लोग परिवार के साथ रहने के लिए क्या-क्या तिकड़म नहीं भिड़ाते और वे कैसे आदमी हैं, जो ऐसा मौक़ा गवा रहे हैं. लिहाज़ा उन्होंने बड़े बेमन से बेतिया रेलवे स्टेशन का कार्यभार संभाल लिया.

लेकिन आज पांच दिन हो गए उन्हें घर आए और जबसे आए थे भरपेट खा नहीं सके थे. बेचारे अपनी मन:स्थिति का बयान भी किसी से नहीं कर सकते थे. अगर बात स़िर्फ पत्नी की होती, तो वे किसी बहाने उसे दरकिनार कर रसोई ख़ुद संभाल सकते थे, लेकिन सवाल तो बहू का था, उसके रहते तो यह कभी संभव न था. बेटे की पोस्टिंग इसी जगह थी, इसलिए बेटे-बहू को यहीं रहना था. उन्हें रह-रहकर अपनी स्वच्छंद जीवनचर्या याद आ रही थी, जहां वे अपने ढंग से जीते थे.

“उठिए न, चाय पी लीजिए,” पत्नी की आवाज़ से उनकी विचारधारा टूटी. आंखें खोलकर चाय का कप थाम लिया, अपनी बनाई स्पेशल चाय के सामने तो यह चाय बिल्कुल बेकार लगी. सोमेश बाबू घबरा गए.

‘बाप रे, दो साल में तो मैं घुटघुट कर मर जाऊंगा.’

मन के किसी कोने से आवाज़ आई, ‘रिटायरमेंट के बाद क्या करोगे?’

इसका भी हल उन्होंने निकाल लिया, ‘रिटायरमेंट के बाद मिले पैसों से गोरखपुर में ही कोई छोटा-सा बना-बनाया घर ख़रीद लूंगा कि मेरे स्वास्थ्य के लिए यही जगह अनुकूल है और उसमें अकेले पत्नी के साथ रहूंगा. पत्नी से उतनी प्रॉब्लम थोड़े ही होगी, जितनी बेटा-बहू और पूरे परिवार के बीच रहने पर है. पेंशन से दोनों जनों का आराम से गुज़ारा हो जाएगा.’

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फ़िलहाल इस समस्या का समाधान उन्होंने इस प्रकार किया- अपने परिवारवालों से चुपचाप उन्होंने यह बहाना करते हुए अपने उच्चाधिकारियों के पास आवेदन कर दिया कि उम्र अधिक हो जाने के कारण उन्हें नई जगह पर नए पद  का कार्यभार संभालने में काफ़ी मुश्किल हो रही है. इसलिए उन्हें गोरखपुर में ही बड़ा बाबू के पद पर वापस भेज दिया जाए, जिसका उन्हें तीन वर्षों का अनुभव है.

दो दिनों के बाद ही उन्हें गोरखपुर वापस भेज दिया गया. उनका डिप्टेशन समाप्त कर दिया गया. नीलम देवी उनके बुढ़ापे को देखते हुए उनके फिर से अकेले रहने की बात पर काफ़ी चिंतित हुईं.

सोमेश बाबू ने अपने अंदर की ख़ुशी को दबाकर ऊपरी अफ़सोस ज़ाहिर किया, “मैंने भी सोचा था कि अब चैन से घर-परिवार के साथ रहूंगा, लेकिन नौकरी करनी है

तो अफ़सरों का हुक्म तो बजाना ही पड़ेगा.”

नीलम देवी ने रास्ता निकाला, “अगर आप चाहें तो अब मैं आपके साथ रह सकती हूं. बिटिया भी ससुराल चली गई और घर संभालने के लिए सुघड़ बहू भी आ गई है.”

सोमेश बाबू घबरा गए, “अरे, नहीं-नहीं, तुम इतनी चिंता क्यों करती हो, तुमने तो अपनी सारी ज़िंदगी घर-गृहस्थी और बच्चों में खपा दी. अब तुम्हें आराम की ज़रूरत है. तुम कुछ दिन चैन से बहू की सेवा का आनंद उठाओ.”

पत्नी को उनकी बात रास नहीं आई. “मैं यहां सेवा का आनंद उठाऊं और आप वहां बुढ़ापे में अकेले बनाएं-खाएं.”

सोमेश बाबू ने हंसकर कहा, “मेरा क्या है, एक पेट के लिए थोड़ा-बहुत बना ही लूंगा. अब दो साल की ही तो बात है, फिर तो सब साथ ही रहेंगे.”

दरअसल, सोमेश बाबू अपनी गृहस्थी में किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त करना नहीं चाहते थे. पत्नी को हैरान-परेशान छोड़कर वे पूरे उत्साह से अपने वापस जाने की तैयारी करने लगे.

Neeta varma

    नीता वर्मा

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कहानी- परिवर्तन (Short Story- Parivartan)

“बच्चों को हमेशा बड़ों की तरह टोकोगी, तो वो तुमसे दूर होते जाएंगे. ये उम्र तो उन्हें अपना दोस्त बनाने की है, तभी वे अपनी बातें और समस्याएं तुमसे शेयर करेंगे, वरना बात-बात पर टोके जाने के डर से वे तुम्हें कुछ नहीं बताएंगे. बच्चों का उचित मार्गदर्शन करो, पर इतनी दख़लअंदाज़ी भी मत करो कि वे तुम्हें अपना सबसे बड़ा आलोचक मानकर दूर हो जाएं. परिपक्व होते बच्चों की सोच और तौर-तरीक़ों में परिवर्तन तो आएगा ही और ये अनवरत् चलता भी रहेगा.”

Hindi Short Story

“मम्मी, आख़िर आपको हो क्या गया है? ज़रा-ज़रा-सी बात का बतंगड़ बना देती हो.” अविका भुनभुनाती हुई अपने कमरे में चली गई और ज्ञान गहरी सांस लेकर अख़बार बगल में रखकर टहलने चले गए. विशाल अपनी गर्दन यूं हिलाते चला गया, मानो कह रहा हो कि मम्मी आपसे तो बात करना ही बेकार है. तृप्ति अकेली बैठी सोचती रही कि आख़िर छोटी-सी बात को इतना तूल उसने दिया ही क्यों? अच्छे-ख़ासे बैठे सब हंस-बोल रहे थे.

अविका और विशाल अपने कॉलेज के दोस्तों के अजीबो-ग़रीब क़िस्से सुनाने लगे कि कैसे अविका की सहेली ने अपने बॉयफ्रेंड को बेवकूफ़ बनाकर उससे सभी को पार्टी दिलवाई और ख़र्चा करवाया. तृप्ति अच्छी-ख़ासी बैठी क़िस्सा सुन रही थी कि अचानक आज की पीढ़ी पर कटाक्ष और उनके तौर-तरीक़ों पर अपनी आपत्ति ज़ाहिर करने लगी. मज़ाक-मज़ाक में बात बढ़ गई और तृप्ति अपनी नैतिकता भरी बातों का बोझ उन पर डालने लगी.

तृप्ति देर तक बैठी सोचती रही कि आख़िर क्यों वो रोज़ अपने बच्चों से यूं उलझ पड़ती है? पर क्या करे वह भी, बड़े होते बच्चों की ग़लत बातों का समर्थन तो नहीं कर सकती? पहले बच्चे अपनी हर बात उसे बताते थे और वो भी कितने प्यार से उन्हें समझा देती थी, पर अब पता नहीं उसका धैर्य कहां चला गया है? हर समय अविका और विशाल की चिंता होती है. उम्र भी ऐसी है, कहीं कोई ऊंच-नीच हो गई तो कौन ज़िम्मेदार होगा?

शाम को डिनर टेबल पर भी सब चुपचाप खाना खा रहे थे. सबकी चुप्पी उसे अखर रही थी. तभी फ़ोन की घनघनाहट ने शांति भंग कर दी. अविका फ़ोन पर चहक रही थी. “अरे, वाह नानी! बड़ा मज़ा आएगा, मेरे जन्मदिन पर आप आ रही हैं. अभी सबको बताती हूं. मम्मी-पापा नानी आ रही हैं परसों.” तृप्ति ने अविका से रिसीवर ले लिया और अपनी मां से बतियाने लगी.

माहौल बदल चुका था. अविका तथा विशाल नानी के आने की तैयारी में लग चुके थे. “नानी मेरे कमरे में सोएगी.”

“नहीं-नहीं मेरे.”

“अच्छा! चल तू अपना बिस्तर नीचे लगा लेना.” अविका विशाल से कह रही थी. तृप्ति की आंखों में नींद नहीं थी. कितना अच्छा लगेगा! मां के आने की ख़बर से वह एक अजीब से सुकून से घिर गई. दूसरे दिन भोर में ही आंखें स्वतः खुल गईं. शरीर में स्फूर्ति थी, वरना और दिन होता, तो शारीरिक शिथिलता उसके चेहरे पर बनी रहती. विश्‍वास नहीं होता कि जब बच्चे छोटे थे, तो वो कैसे उनकी अलग-अलग फ़रमाइश पर थिरकती रहती थी. दोनों की अलग-अलग पसंद के टिफिन, ज्ञान का हमेशा सादा नाश्ता, तीन फ़रमाइशों पर रसोई में काम होता था. बड़े होते बच्चों के साथ, धीरे-धीरे थकान कब सिर उठाने लगी, उसे पता ही न चला.

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अविका कभी-कभी मदद करने की कोशिश भी करती, तो उसके काम करने का रवैया तृप्ति को पसंद नहीं आता. उसकी टोका-टोकी से आहत अविका रसोई से बाहर आ जाती और तृप्ति झुंझलाती हुई किसी तरह काम निपटाती, लेकिन आज मां के आने की ख़बर ने मानो शरीर में ऊर्जा का संचार कर दिया हो. घर की नए सिरे से चाक-चौबंद व्यवस्था हो चुकी थी. मां को क्या-क्या पसंद है, इसकी सूची मन-ही-मन बन चुकी थी. मम्मी का मूड अच्छा देख अविका पूछ बैठी, “मम्मी, इस बार मैं अपना बर्थडे बाहर सेलिब्रेट कर लूं.”

“नहीं अविका, हम घर में ही करेंगे. प्लीज़, अपनी ज़रा ढंग की सहेलियों को बुलाना. इस बार नानी भी होंगी, तो थोड़ा ध्यान रखना.”

“मम्मी, मेरी सभी सहेलियां ढंग की ही हैं. आपको ही पता नहीं क्यों उनसे प्रॉब्लम होती है?” कहती हुई अविका वहां से चली गई. दूसरे दिन का नज़ारा रोज़ से अलग था. नानी के घर आने से घर में रौनक थी. दोनों बच्चे उन्हें घेरे बैठे थे.

“नानी, ये देखो हम लोग पिकनिक पर गए थे. ये मेरी सहेली नताशा कितनी स्मार्ट है न!”

“अरे, मुझे तो सबसे ज़ोरदार मेरी पोती लग रही है, पर ये बता तू यह पहन के क्या गई है पिकनिक पर, सलवार-सूट? तुझ पर तो जींस जंचती है.” सुनकर अविका ने कटाक्ष भरे नज़रों से अपनी मम्मी को देखा. उसे याद आया उस दिन उसने जींस के ऊपर कसा हुआ टॉप पहना, तो तृप्ति ने उसके ड्रेस सेंस को लेकर कितना भाषण दिया था. आहत अविका ने ग़ुस्से में सलवार-कुर्ता पहना और पिकनिक पर चली गई.

तभी तृप्ति ने पूछा, “मां, आज डिनर में क्या बनाऊं?” अविका और विशाल तुरंत बोल पड़े, “नूडल्स.” तो तृप्ति ने आंखें तरेर दीं.

“ठीक तो है तृप्ति, आज दोपहर का खाना इतनी देर से खाया है. ज़्यादा भूख भी नहीं. ऐसा कर नूडल्स बना ले. थोड़ी-थोड़ी सब खा लेंगे और गप्पे मारेंगे.”

“नानी, नूडल्स?” बच्चे आश्‍चर्य से बोल उठे, तो शारदाजी हंस पड़ीं. “तुम्हारे नाना को बहुत पसंद है. ह़फ़्ते में एक दिन तो ज़रूर बनाती हूं मैं.”

“क्या मां, आप भी…!”

“और क्या, नूडल्स के विज्ञापन में पता नहीं क्यों स़िर्फ बच्चे दिखाते हैं.” अविका व विशाल हंस पड़े. उन्हें ख़ूब मज़ा आया शारदाजी की बातों में.

“अविका, किसे-किसे बुला रही है अपने जन्मदिन पर?” अविका कुछ कहती इससे पहले तृप्ति मां से पूछ बैठी,“क्या-क्या बनाऊं उस दिन?”

“तृप्ति घर में इतना झंझट क्यों कर रही हो. होटल वगैरह में कर लो. व्यर्थ की भागदौड़ से बच जाओगी.” सुनते ही अविका उछल पड़ी. शारदाजी ने जन्मदिन की ज़िम्मेदारी विशाल और अविका को एक निश्‍चित बजट के साथ सौंप दी, जिसे दोनों ने बख़ूबी निभाया.

शाम को तृप्ति ने मां की दी हुई नीली साड़ी बड़े मनोयोग से पहनी, तो सभी ने दिल खोलकर तारीफ़ की. सभी ख़ुश थे. अविका का जन्मदिन ख़ुशी-ख़ुशी निपट गया. शारदाजी उसके सभी दोस्तों से गर्मजोशी से मिलीं. आज तृप्ति को भी कहीं कोई कमी नज़र नहीं आई. कितनी प्यारी तो हैं इसकी सहेलियां. वो सोचने लगी. इसी तरह हंसी-ख़ुशी एक ह़फ़्ता कैसे बीत गया कुछ पता ही नहीं चला. शारदाजी के वापस जाने को दो दिन ही शेष रह गए थे. मां के जाने की कसक तृप्ति के चेहरे पर झलकने लगी थी. इन दिनों बेटी के भीतर पलती कशमकश को शारदाजी की अनुभवी आंखों ने पढ़ लिया था. ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबी बेटी की शंका-आशंकाओं को वह भांप गई थीं.

आख़िर इन बेचैनी भरे दिनों से वो भी तो दो-चार हुई थीं. जब तृप्ति तेज़ी से बढ़ रही थी और बेटा तरुण अपने करियर के जद्दोज़ेहद में लगा था, उस समय शारदाजी भी तो शारीरिक व मानसिक परिवर्तन की प्रक्रिया से गुज़र रही थीं. उम्र का यह दौर कितना मुश्किल होता है. आज तृप्ति उसी उम्र के दौर में है. उसकी शारीरिक थकान और मानसिक उद्वेलन का आकलन वो मां होने के नाते भली-भांति कर सकती हैं.

दूसरे दिन शारदाजी ने अविका के हाथों का बना खाना खाने की इच्छा ज़ाहिर की. अविका उत्साहित थी, लेकिन तृप्ति परेशान-सी नज़र आने लगी, तो मां ने प्यार से उसका हाथ पकड़कर अपने पास बिठा लिया. “क्यों चिंता करती है? वो कर लेगी सब.” “मम्मी, सच में मैं सब अच्छे से करूंगी और आपकी रसोई भी साफ़ रखूंगी. आप बस मेरा काम होने तक आना मत.”

“तृप्ति, उस पर भरोसा करो. आज ये जो भी और जैसा भी बनाएगी, हम सब खाएंगे और तारीफ़ भी करेंगे. क्यों अविका?” दुविधा में पड़ी तृप्ति मां के पास बैठ गई. तभी शारदाजी के स्नेहभरे स्पर्श ने उसे अंदर तक भिगो दिया. “मेरी बिटिया, कुछ परेशान और थकी-थकी-सी लगती है.” मां की बात पर तृप्ति हंसते हुए बोली, “तुम्हारी बेटी अब बड़ी हो गई है.” धीरे-धीरे तृप्ति अंतर्मन की गहराइयों में दबी अपनी आशंकाओं को मां के साथ साझा करने लगी. बातों बातों में तृप्ति ने अपने मन की बात बताई. “मां, अविका और विशाल की चिंता लगी रहती है. ज़माना कितना बदल गया है. उनकी सोच हमेशा सकारात्मक दिशा में बढ़े, बस, इतना ही चाहती हूं.”

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“देख तृप्ति, हर पुरानी पीढ़ी आनेवाले नए युग के तेज़ ऱफ़्तार से आशंकित रहती है और नई पीढ़ी के क़दम उस ऱफ़्तार के साथ तालमेल बिठा ही लेते हैं. इसमें कुछ नया नहीं है. उम्र के इस दौर से सब गुज़रते हैं. तेरा बात-बात पर बेवजह चिंता करना, झुंझलाना अपनी समझ पर बच्चों का यूं अतिक्रमण करना, तुझे कितना परेशान कर देता होगा, ये समझती हूं मैं, पर देख अब बच्चे छोटे नहीं रह गए. बड़े हो रहे हैं. उनका अपना अनुभव और समझ उनमें पनपने दे.

जहां तक मैंने देखा है, दोनों समझदार हैं. अब उन पर ज़बरदस्ती अपनी मर्ज़ी थोपना ठीक नहीं है. बच्चों को हमेशा बड़ों की तरह टोकोगी, तो वो तुमसे दूर होते जाएंगे. ये उम्र तो उन्हें अपना दोस्त बनाने की है, तभी वे अपनी बातें और समस्याएं तुमसे शेयर करेंगे, वरना बात-बात पर टोके जाने के डर से वे तुम्हें कुछ नहीं बताएंगे. बच्चों का उचित मार्गदर्शन करो, पर इतनी दख़लअंदाज़ी भी मत करो कि वे तुम्हें अपना सबसे बड़ा आलोचक मानकर दूर हो जाएं. परिपक्व होते बच्चों की सोच और तौर-तरीक़ों में परिवर्तन तो आएगा ही और ये अनवरत् चलता भी रहेगा.

तुम्हीं सोचो उम्र के साथ-साथ तुम्हारी सोच में भी कितना परिवर्तन आ चुका है. अपने और बच्चों के बीच अविश्‍वास की दीवार तोड़ो. उनकी बात शांतिपूर्वक सुनो और अपना फैसला तुरंत मत सुनाओ. तुम्हारे बच्चे उम्र की उस दहलीज़ पर हैं, जिसमें वे अपने लिए कुछ आज़ादी चाहते हैं. उन्हें अभिव्यक्ति का अवसर दो. अपने ऊपर चढ़ा बड़प्पन का लबादा उतारकर उनके साथ कभी-कभी ठहाके भी लगाओ. तुम्हारा बचपना जब बाहर आएगा, तो वे दोस्तों की तरह तुम्हारे क़रीब आएंगे.” वातावरण गंभीर हो गया था कि तभी मां विषय को बदलने के अंदाज़ में पूछ बैठीं, “अब ज़रा ये बताओ कि अपने शरीर का क्या हाल कर डाला है. कितना वज़न बढ़ गया है मालूम भी है तुम्हें.” झेंपती हुई तृप्ति बोली, “मां, उम्र के साथ थोड़ा परिवर्तन तो आएगा ही.”

“देखो बिटिया, स्त्री का शरीर तो बना ही परिवर्तन के लिए है, पर जितना अपने मन और तन को नियमों से बांधोगी, उतनी ही आसानी से इस बदलाव को स्वीकार कर पाओगी. मैं और तुम्हारे पापा अभी भी कुछ दूर तक सैर को ज़रूर जाते हैं, तो तुम भी प्राणायाम और कुछ नियमित व्यायाम ज़रूर करो. अगर दिनभर का कुछ समय अपने लिए नहीं निकाला, तो क्या फ़ायदा. रचनात्मक कार्यों में स्वयं को व्यस्त रखो. बच्चों को सिखाने की चिंता के साथ ख़ुद भी कुछ नया करने का ज़ज़्बा पैदा करो, तब देखो तुम्हारा नज़रिया कैसे बदलता है. परिस्थितियों को विषम हम बना देते हैं, जबकि वो इतनी जटिल नहीं होती हैं. जिस दिन तुम्हारे सोचने-विचारने का नज़रिया बदला, समझो आधी कठिनाइयां टल गईं. इस समय ज्ञान को भी उसके हिस्से का समय दो.” मां की बातें उसके मन की गांठों को एक-एक कर सुलझाती गईं. अपनी ओर कृतज्ञता से देखती तृप्ति को मां ने गले लगा लिया. तभी अविका ने ऐलान कर दिया कि खाना तैयार है.

तृप्ति तेज़ क़दमों से रसोई की ओर चल दी, वहां पहुंचकर आश्‍चर्यचकित रह गई. कितना कुछ बनाया था अविका ने. ज्ञान और विशाल पहले से ही वहां मौजूद थे. साफ़-सुथरी रसोई देखकर लगा ही नहीं कि यहां अविका ने खाना बनाया है. संशय में पड़ी तृप्ति ने ज्यों ही कौर मुंह में डाला, तो उसकी नज़र अविका पर पड़ी, जो उत्सुक निगाहों से मां के चेहरे के हाव-भाव पढ़ रही थी. तृप्ति ने इशारे से उसे बुलाया, फिर प्यार से अपनी बांहों में भरकर ढेर सारी अनकही प्रशंसा उसे पारितोषिक के रूप में दे दी.

शारदाजी तो पहले ही अपनी नातिन के प्रति आश्‍वस्त थीं. इधर ज्ञान और विशाल तारीफ़ों के पुल बांध रहे थे. तृप्ति के चेहरे की ख़ुशी प्रशंसा, भरोसा और विस्मय के मिले-जुले भाव अविका को उल्लास से भर गए. तृप्ति आह्लादित थी. आज उसे अविका का एक अलग रूप दिखा या शायद उसके स्वयं के बदले नज़रिए से बहुत कुछ परिवर्तित हो गया था.

Minu tripathi

      मीनू त्रिपाठी

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कहानी- अनकही (Short Story- Ankahi)

नलिन की मृत्यु के दौरान जो हर रोज़ उसके घर जाने का क्रम चला, तो मैंने उसे आगे भी बरक़रार रखा. उस घर में नलिन की उपस्थिति महसूस करती थी मैं. कभी वासवी की बातों में, तो कभी उसकी बेटी कनुप्रिया की आंखों में. कनु ने बहुत कुछ पाया था अपने पापा से.

Hindi Short Story

नए शहर के कॉलेज में जाकर पढ़ने और हॉस्टल में रहने की सोचकर ही घबराहट हो रही थी. मेरे पास कोई विकल्प भी तो नहीं था. पापा की तबादलेवाली नौकरी थी और जिस छोटे-से शहर में तब हम रहते थे, वहां आधुनिक जीवनशैली के सभी संभव साधन, मसलन- क्लब, सिनेमाघर, अस्पताल आदि होते हुए भी ढंग का कोई कॉलेज नहीं था. एक था भी तो गुजराती मीडियम का. अत: मुझे जयपुर के कॉलेज में प्रवेश दिला दिया गया. “चिंता किस बात की, अपना नलिन भी तो वहीं पढ़ रहा है.” पापा ने समझाया.

नलिन के और मेरे पापा कॉलेज के दिनों के मित्र थे. बाद में भी हम दोनों परिवार मिलते रहे. हम शिमला गए, तो उन्हीं के घर रुके. वो मुंबई घूमने आए, तो हमारे घर. नलिन की बहन मुझसे वर्षभर छोटी थी. यूं ही पारिवारिक मित्रता हो गई थी. मम्मी-पापा को तो तसल्ली हो गई कि मेरा सहारा भी निश्‍चय ही तिनके से कहीं अधिक था.

शांत स्वभाव और कर्त्तव्यनिष्ठ, मेरे अनुसार तो यही नलिन का परिचय होना चाहिए. हर रविवार को वह मेरी खोज-ख़बर लेने आता. हमारे घर में सदैव उसके गुणों के चर्चे होते रहते थे, परंतु अब जो भाव मेरे मन में जन्म ले रहे थे, वह पूर्णत: भिन्न थे. दिल कुछ और भी चाहने लगा था. मन करता वह स़िर्फ काम की ही बात न करे और भी कुछ कहे. मन करता कि वह जाने की जल्दी न करे, कुछ देर और रुका रहे. मतलब यह कि अच्छा तो वह मुझे पहले भी लगता था, लेकिन यौवन की दहलीज़ पर पहुंचकर उसके प्रति जो आकर्षण जगा था, वह पहले से बहुत अलग था. पहल करने की हिम्मत नहीं पड़ी. विश्‍वास था कि एक दिन वह भी तो पहचानेगा मेरे अनुराग को.

हॉस्टल लाइफ ने मुझे एक और अनमोल तोहफ़ा दिया था- मेरे कमरे की साथिन वासवी के रूप में. हमारे विषय अलग थे, परंतु कॉलेज के बाद का पूरा समय हम साथ ही बिताते. पढ़ाई पूरी करके मौज-मस्ती करते, घूमने और पिक्चर जाते. प्राय: नलिन को भी बुला लेती थी मैं. वासवी बहुत अच्छा गाती थी और जब कभी कॉलेज के फंक्शन में उसका गायन होता, तब तो नलिन को आमंत्रित करने का बहाना मिल जाता.

तीन वर्ष कैसे निकल गए, पता ही नहीं चला. नए शहर में अकेले रहने की घबराहटवाली बात अब पुरानी हो चुकी थी. यह जीवन छूटनेवाला है. अब तो यही मलाल था. नलिन का कोर्स तो हमसे भी दो महीने पहले ख़त्म हो गया था और उसके लौटने का दिन भी नज़दीक आ गया था.

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कैसे भूल सकती हूं वह शाम. हमेशा की तरह उसने हमारे हॉस्टल पहुंचकर मुझे रिसेप्शन पर बुलवा भेजा. इधर-उधर की बातें करने के बाद उसने एक बड़े से लिफ़ा़फे में से हल्के गुलाबी रंग का एक ग्रीटिंग कार्ड निकाला, गुलाब के रंग-बिरंगे फूलों से चित्रित. मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा. जिस पल का मुझे इंतज़ार था, वह पल आ गया था. कानों के साथ-साथ पूरा तन उसकी बात सुनने को प्रतीक्षारत था. जब उसने कहा, “तुम इतनी अच्छी शेर-ओ-शायरी जानती हो, कविताएं पढ़ती हो, इस कार्ड पर कुछ ऐसी पंक्तियां लिख दो न कि वासवी पढ़ते ही मुग्ध हो जाए. तुम्हें हमारी इतनी पुरानी दोस्ती का वास्ता…” वह बोले ही चला जा रहा था. मनुहार कर रहा था शायद. किंतु उसके शब्द मेरे भीतर नहीं घुस पा रहे थे, पर मन के सोचने का तरीक़ा अलग होता है और बुद्धि का अलग. मेरे मस्तिष्क ने फौरन मेरे मन को वश में किया और मैंने उससे ग्रीटिंग कार्ड लेते हुए कहा, “ठीक है, मैं अच्छी तरह सोचकर कल तक लिख दूंगी.” और लौट आई अपने कमरे में. मोहब्बत मांगी या छीनी नहीं जा सकती, उस पर हक़ नहीं जताया जा सकता, यह जानती थी मैं.

मैंने उस कार्ड पर जो लिखकर दिया, वह मेरे ही दिल से निकली आवाज़ थी. जब भी नलिन का ख़्याल आता, यही पंक्तियां आतीं मन में. जब वह ही मेरा नहीं रहा, तो उन पंक्तियों का क्या करती मैं. अत: वही उस कार्ड पर लिख दीं, बस नाम बदल गए थे ‘नलिन की ओर से- वासवी को.’

कार्ड पाकर बहुत ख़ुश हुई थी वासवी. कितनी बार तो वह कार्ड उसने मुझे दिखाया, कितनी ही बार वह पंक्तियां पढ़कर सुनाई. मैं उसकी ख़ुशी में ख़ुश दिखने को मजबूर थी. अच्छी बात यह थी कि अपने उत्साह में उसे मेरी उदासी दिखी ही नहीं.

पढ़ाई पूरी हुई. हॉस्टल छूटा और संगी-साथी भी. मां तो मेरे विवाह के लिए उतावली थीं, “पढ़ाई तो पूरी हो गई है. पापा की अवकाश प्राप्ति से पहले विवाह हो जाए, तो अच्छा है.”  मैं चुप रही. मना क्यों करती? किसका इंतज़ार करना था मुझे? न कोई उमंग थी, न कोई सपने. लड़कियों के लिए नौकरी का प्रचलन तब नहीं था. भारत में तो वैसे भी लड़की के जीवन की राह उसके बड़े ही चुनते हैं, जिस पर आंख मूंदकर बस चलना होता है उसे. फ़र्क़ यह था कि मैंने भी नादानी में कुछ सपने बुन लिए थे.

परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि नलिन और वासवी के विवाह से पहले ही मेरा विवाह हो गया. ख़ैर, मैं उनके विवाह में गई थी. अधिक समय वासवी के संग ही बिताया और नलिन के लिए ख़ुशियों की ढेर सारी दुआएं मांगीं सच्चे मन से, पर उससे मिलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. समय आगे बढ़ता रहा. मेरा बेटा हुआ और उसे पालने में पूरी तरह से व्यस्त हो गई मैं. पारिवारिक मित्रता होने के कारण शादी-ब्याह में या फिर अन्य अवसरों पर नलिन-वासवी से भेंट हो जाती, पर भीड़भाड़ में नलिन से दूरी बनाए रखना आसान नहीं होता. एक ही शहर में रहने के कारण एकदम कटकर रहना तो संभव नहीं था, परंतु उनके घर कम ही जाती मैं. इस बीच उनकी एक बेटी हुई, नाम रखा- कनुप्रिया.

हम सब अपनी-अपनी तरह से व्यस्त रहे और बच्चे बड़े होते रहे. मेरा बेटा इंद्रनील 20 का हो गया और कनु 18 की. एक दिन दोपहर को ख़बर मिली कि ‘नलिन का देहांत हो गया है’ विश्‍वास करनेवाली बात नहीं थी और मन विश्‍वास करने को तैयार भी नहीं था, पर बम-विस्फोट पूर्व सूचना देकर होते हैं क्या? नलिन के विवाह से उतना नहीं टूटी थी मैं, जितना कि इस बात से. अभी 45 का भी नहीं हुआ था नलिन. व्यस्तता के बीच नलिन को पता ही नहीं चला कि उसके भीतर कोई रोग पनप रहा है. प्रात: उठा तो उसे ज़ोर का चक्कर आया. वह फिर से बिस्तर पर बैठ गया. वासवी ने पानी लाकर पिलाया, तो थोड़ा बेहतर महसूस किया उसने. वासवी चाय बनाने चली गई, तभी नलिन को लगा कि उसका दम घुट रहा है और वह बाहर लॉन में निकल आया, ताज़ी हवा की तलाश में. पर शायद उसे एक बार फिर चक्कर आ गया और वह वहीं गिर गया. पड़ोसी ने देखा और भागा आया. चेहरे पर पानी के छींटें मारा, वासवी को बाहर बुलाया. फ़ौरन अस्पताल ले गए. डॉक्टरों ने सब प्रकार से प्रयत्न करके देख लिया, परंतु वह नलिन को बचा नहीं सके. उसका दिल ही उसे धोखा दे गया था.

नलिन से चाहे मैंने दूरी बनाए रखी थी, पर वासवी से मैंने दोस्ती कायम रखी. घर नहीं भी जाती, तो टेलीफोन पर बात कर लेती थी. नलिन की मृत्यु के दौरान जो हर रोज़ उसके घर जाने का क्रम चला, तो मैंने उसे आगे भी बरक़रार रखा. उस घर में नलिन की उपस्थिति महसूस करती थी मैं. कभी वासवी की बातों में, तो कभी उसकी बेटी कनुप्रिया की आंखों में. कनु ने बहुत कुछ पाया था अपने पापा से. हंसती तो बिल्कुल वैसे ही थी, चलने का ढंग भी बिल्कुल वैसा था. धीरे-धीरे मेरा उस पर मोह बढ़ रहा था.

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पति से मुझे कोई शिकायत नहीं थी. दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर थे वह. अति गंभीर और ख़ामोश. पीएचडी कर रखी थी और अपने विषय में पूर्ण पारंगत थे. उनके चिंतन का क्षेत्र ब्रह्मांड की उत्पत्ति और ऐसे ही अन्य गूढ़ रहस्य थे, जो मेरी समझ के बाहर थे. उन्हें देखकर लगता था, जैसे विश्‍वभर की समस्याओं का हल उन्हें ही तलाशना है. अत: रोज़मर्रा की घर-गृहस्थी की बातों में न उनकी रुचि थी, न ही इतना समय. घर की व्यवस्था से एकदम निर्लिप्त रहते वह. कुछ भी पूछने पर यही कहते, “तुम्हें जो ठीक लगे, वही कर लो.”

बेटा इंद्रनील दूर शहर में पढ़ रहा था और कोर्स के अंतिम वर्ष में कैंपस सिलेक्शन में अपनी मनपसंद नौकरी भी पा चुका था.

नलिन को गए छह वर्ष बीत गए. इस बीच मैं और वासवी एक बार फिर से बहुत क़रीब आ चुके थे. नलिन के पिता का देहांत पहले ही हो चुका था और मां नलिन के जाने से पूरी तरह से टूट गई थीं. मानसिक और शारीरिक दोनों ही रूप से. वासवी उनकी अच्छी देखभाल कर रही थी. नलिन की पेंशन आती थी. अत: उस तरफ़ से चिंता की कोई बात नहीं थी. देखने में तो सब ठीक ही था. पर जो बात नहीं पता थी वह यह कि एक नन्हीं-सी चिंगारी वासवी के भीतर सुलग रही थी. उसका शरीर खोखला कर रही थी. वासवी कुछ और काम से डॉक्टर के पास गई और चेकअप करने पर पता चला कि लिवर के कैंसर ने उसे पूरी तरह अपनी गिरफ़्त में ले लिया है. ऑपरेशन हुआ और इलाज भी शुरू किया गया, पर डॉक्टरों ने अधिक उम्मीद नहीं दिलाई. विदेश में रहती नलिन की बहन आकर मां को अपने साथ ले गई. वासवी की देखभाल की ज़िम्मेदारी मैंने संभाल ली. कनु तो थी ही. मृत्यु को सामने देख वासवी को अपनी बेटी की बहुत चिंता सता रही थी. कौन देखेगा उसे? बुआ के पास भेजने से पढ़ाई का नुक़सान होगा. कनु मुझे शुरू से ही पसंद थी. मैंने अपने बेटे के मन की बात जानने के लिए उसे टेलीफोन किया. कनु को वह बचपन से ही जानता था. इन दोनों की आपस में बनती भी ख़ूब थी. उसकी रज़ामंदी जान मैंने वासवी से इन दोनों के रिश्ते की बात की. यह भी तय हुआ कि बाकी पढ़ाई वह हमारे ही घर में रहकर पूरी कर सकती है. वासवी को इस बात से बहुत तसल्ली मिली, पर जब उसने बेटी से बात की, तो वह रोने लगी. मां की मृत्यु अवश्यंभावी जान दुख तो होना ही था.

और एक दिन वासवी भी हमें छोड़कर चली गई. सब संस्कार पूरे होने के बाद मैं कनुप्रिया को अपने घर ले आई.

मुझे छोटे बच्चों का साथ प्रारंभ से ही अच्छा लगता रहा है. बेटे इंद्रनील के बड़े होने पर मैने घर में क्रैश खोल लिया था. कामकाजी स्त्रियों के बच्चे दिनभर मेरे पास रहते और ऐसे ख़ुश रहते कि शाम को घर लौटना ही नहीं चाहते थे. कनु भी कॉलेज से आने के बाद बच्चों के साथ लगी रहती. उसका भी मन लग जाता और वह भी मेरी नज़रों के सामने रहती.

मैं कनु को प्रसन्न रखने का बहुत प्रयत्न करती, पर देखती कि वह हमेशा उदास रहती थी. उन दिनों मोबाइल नया-नया ही चलन में आया था और कनु ने अपनी मां की बीमारी के दौरान ही ख़रीदा था, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उसे फ़ौरन बुलाया जा सके. अब मैं देखती कि कनु अपने मोबाइल पर हर रोज़ एक नियत समय पर किसी से बहुत धीमे स्वर में लंबी-लंबी बात करती. और जाने क्यों मुझे लगता कि मोबाइल की इस लंबी बातचीत के बाद वह अधिक उदास हो जाती थी, किसी खोल में सिमट जाती जैसे. पिता की कमी और मां को खोने का ग़म तो मैं भी समझती थी, पर कुछ और भी था जो मेरी पकड़ में नहीं आ रहा था.

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उस दिन कनुप्रिया का जन्मदिन था और मैंने पूरा भोजन उसी की पसंद का बनाया था. कनु की छुट्टी थी. अत: शाम को उसे लेकर कहीं घूमने जाने या मूवी देखने की भी योजना थी मेरी. पर शाम होने से पहले ही एक युवक लाल गुलाबों का गुलदस्ता लिए आन खड़ा हुआ. दरवाज़ा मैंने ही खोला था. झिझकते हुए उसने पूछा, “कनु है, कनुप्रिया?” मैं उसे अंदर ले आई. मुझे उसका चेहरा कुछ

जाना-पहचाना-सा लगा. बाद में याद आया कि वासवी के दाह-संस्कारवाले दिन देखा था उसे. उसने कनु को फूल देते हुए जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं और मुझसे कहा, “आंटी, क्या मैं कनु को डिनर पर बाहर ले जा सकता हूं?” कनु के चेहरे पर लालिमा थी, चेहरे पर ख़ुशी. ऐसी ख़ुशी, जो मैंने एक लंबे अरसे के बाद उसके चेहरे पर देखी थी. मैंने उस युवक- अनुराग को कॉफी पीकर जाने का निमंत्रण दिया. जानती थी कि उसका रुकने का मन नहीं है, किंतु मैं बिना तसल्ली किए कनु को उसके साथ कैसे भेज देती? उसकी मां होने की ज़िम्मेदारी भी मुझे निभानी थी. कनु को कॉफी बनाने का इशारा कर मैं अनुराग से बातें करने लगी.

अनुराग सीए पूरा करके नौकरी कर रहा था. इन दोनों का दो वर्ष पुराना परिचय था. निश्‍चय ही परिचय से बढ़कर था. कनु का जन्मदिन याद रखना और साथ में सेलिब्रेट करने की इच्छा रखना कुछ और ही संदेशा दे रहा था. ‘समय पर लौट आना’ कहकर मैंने उन्हें जाने की अनुमति दे दी. यद्यपि कनु ने जाते हुए कहा कि मौसी, यदि थोड़ी देर हो जाए, तो चिंता मत करना. जब तक वह लौटकर नहीं आए, मेरा ध्यान उधर ही लगा रहा. 10 बजे के बाद से तो मैं खिड़की से बाहर झांकती खड़ी रही.

11 से थोड़ा पहले आए वे. कार के रुकने के बाद भी वे देर तक उसके अंदर बैठे रहे. बाहर निकलकर उसने कनु का हल्का-सा आलिंगन लिया और जब तक वह बाहर के गेट से घर के दरवाज़े तक नहीं पहुंच गई, वहीं खड़ा उसे निहारता रहा. रास्ते में पड़ी किसी चीज़ से टकराकर वह थोड़ा डगमगाई, तो भागकर वह कनु के पास पहुंचा.

एक-दो दिन बाद मैंने अनुराग की बात छेड़ी, तो कनु के आंसू टपकने लगे. अपने प्यार को स्वीकार किया उसने. मां को अभी बताया नहीं था. अनुराग की नौकरी लग जाने का इंतज़ार कर रही थी. अब समझ आया कि जब मैंने वासवी के समक्ष कनु को अपनी बहू बनाने का प्रस्ताव रखा, तो वह क्यों रोई थी? स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह इंकार करती, मन की बात कहती. पर मैं उसकी मजबूरी का फ़ायदा नहीं उठाऊंगी, मैंने तय किया. मुझसे बेहतर कौन समझेगा प्यार को खोने का दर्द? प्यार को खोकर ज़िंदगी तो निकल ही जाती है, पर हज़ार नेमतें पा लेने के पश्‍चात् भी एक बेनाम-सा दर्द, कुछ अनकही-सी कमी रह ही जाती है जीवनभर के लिए.

मैंने अनुराग के बारे में जांच-पड़ताल की और पूरी तसल्ली करके उन दोनों का विवाह कर दिया.

मैं कनुप्रिया में तुम्हारा अक्स देखती थी नलिन, इसलिए उसे ही अपने घर लाना चाहती थी शायद. आज लग रहा है, जैसे एक बार फिर से तुम्हें खो दिया है मैंने.

पर फिर भी आज संतुष्ट हूं मैं, बहुत संतुष्ट.

usha vadhava

        उषा वधवा

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कहानी- छलावा (Short Story- Chhalava)

सौम्या के मन में बार-बार यह विचार आ रहा था कि हम भारतीय विदेश के प्रति इतने आकर्षित क्यों हैं? विदेश में यदि आय अच्छी है तो ख़र्चे भी उसी हिसाब से होते हैं. ये किस छलावे में जी रहे हैं हम? जब उसकी सहेलियां उसके भाग्य को सराह रही थीं, तो वह उन्हें समझाना चाहती थी कि मुझ से ज़्यादा ख़ुशनसीब तुम लोग हो, जो अपने देश में, अपनों के बीच रहकर ज़िंदगी जीने का मज़ा लूट रही हो. लेकिन इस भ्रम को तोड़ना आसान नहीं था.

Short Story in Hindi

सौम्या दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरी, तो मौसम बहुत ही ख़ुशगवार था. हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी. उसने एक गहरी सांस लेकर मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू को आत्मसात् किया और व्याकुलता से दर्शक दीर्घा में दृष्टि दौड़ाई.

आज पूरे सात महीने बाद सौम्या भारत लौटी है. विवाह के 15 दिन बाद ही सौम्या और दीपक अमेरिका चले गए थे. सौम्या ने देखा सामने से मां, पिताजी, बहन नेहा और भाई सौरभ आ रहे हैं और वह चहककर उनके गले लग गई. सौरभ और नेहा तो ख़ुशी के मारे पागल हुए जा रहे थे. मां उसे प्यार से ऊपर से नीचे तक निहार रही थी. पिताजी ने अपना हाथ उसके सिर पर रखा, तो उसे उनके चेहरे पर गर्व के भाव स्पष्ट दिखाई दिए कि आज मेरी बेटी विदेश से आई है. आख़िर मैंने अपनी बेटी के लिए एनआरआई दूल्हा ढूंढ़ ही लिया.

रास्तेभर नेहा और सौरभ सौम्या से अमेरिका और अपने जीजाजी के विषय में पूछते रहे. सौम्या भी यादों में खो गई. जब उसने पहली बार अमेरिका की धरती पर क़दम रखा, तब वहां की चमकती सड़कें और गगनचुंबी इमारतें देखकर उसे लगा, उसका जीवन सफल हो गया. उसका बरसों का सपना कितनी आसानी से पूरा हो गया. दीपक भी आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक और सीधे-सादे इंसान हैं. विदेश में रहकर भी बिल्कुल भारतीय.

गाड़ी रुकते ही सौम्या वर्तमान में लौट आई. घर आ गया था. उसका अपना घर, जहां उसने अपना बचपन जिया. वह घूम-घूमकर पूरा घर देख रही थी. सब कुछ वैसा ही था, कुछ भी नहीं बदला था. नेहा और सौरभ उसके लाए उपहार देखकर ख़ुश हो रहे थे, तभी नेहा ने चहककर पूछा, “दीदी, ये सब तुम्हारी पसंद है या जीजू की.” उसने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया, “दोनों की.” अब नेहा को वह कैसे बताती कि इन उपहारों को ख़रीदने के लिए उसने कैसे महीने के बजट में कमी करके पैसे बचाए और कितने ही सेल काउंटर्स पर घूमी है.

फ्रेश होकर जब सौम्या नाश्ते के लिए बैठी तो डायनिंग टेबल पर अपनी पसंद की ढेर सारी डिशेज़ देख, हंसकर मां से बोली, “ये क्या मम्मी, मैं एक दिन के लिए नहीं, एक महीने के लिए आयी हूं. आपने तो आज ही सब कुछ बना दिया.” मां ने लाड़ जताते हुए कहा, “खा ले बेटा, अमेरिका में तुझे ये सब कहां मिलता होगा.” तभी नेहा बोली, “दीदी, मेरी सहेली बता रही थी कि अमेरिका में रोटियां भी पैक्ड मिलती हैं. बस, घर लाओ, गर्म करो और खा लो. वाह! क्या ऐश है.” नेहा के बोलने के अंदाज़ पर सब हंस पड़े.

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सौम्या को अपनी अमेरिका की डायनिंग टेबल याद आ गई. दीपक ने उसे बताया था कि साधारण-सा खाना भी अमेरिका में काफ़ी महंगा पड़ता है. वे कहीं भी जाते या ख़र्च करते, तो दीपक भारतीय मुद्रा (रुपए) में उसका मूल्य निकालकर सौम्या को ज़रूर बताते. शुरू-शुरू में उसे ये सब जानकारी बढ़ानेवाला लगा, पर बाद में उसे को़फ़्त-सी होने लगी. वह कुछ भी अपनी पसंद का ले आती, तो दीपक उसे फिज़ूलख़र्ची पर अच्छा-ख़ासा भाषण दे डालते. वह दीपक को भी ग़लत नहीं कह सकती. अपने पूरे परिवार में दीपक ही एकमात्र विदेश में हैं. उनकी आय का एक बड़ा हिस्सा, तो मुंबई में लिए बंगले का लोन चुकाने में चला जाता है. छोटे भाई की पढ़ाई का ख़र्च, चचेरी-ममेरी बहनों की फ़रमाइशें, सभी को पूरा करना दीपक अपना फ़र्ज़ समझते हैं.

रोज़ किसी न किसी बहाने से सौम्या को सुनने को मिल जाता था कि वह विदेश में घूमने-फिरने, मौज-मस्ती करने नहीं आए हैं. उनके माता-पिता ने उन्हें पढ़ा-लिखाकर विदेश भेजने के लिए बहुत मेहनत की है. अतः अब उनका फ़र्ज़ बनता है कि वे सभी का ख़याल रखें. सौम्या मन ही मन सोचती कि वह और उसके माता-पिता कुछ नहीं? क्या उनके कोई ख़्वाब नहीं हैं?

नाश्ते के बाद सौम्या अपने कमरे में आ गई और पुरानी यादों में खो गई. उसे वह दिन याद आ गया, जब उसने बारहवीं में 92% नंबर प्राप्त किए थे और वह मेडिकल में दाख़िला लेना चाहती थी. पापा ने उसे प्यार से अपने पास बैठाकर समझाया था कि मेडिकल में दाख़िला लेने की ज़िद्द वह छोड़ दे, क्योंकि अपनी ईमानदारी की नौकरी में वह उसके नाम आठ-दस लाख रुपया ही जमा कर पाए हैं. यदि वह उन रुपयों को उसकी पढ़ाई में लगा देंगे, तो उसका विवाह किसी अच्छे घर में धूमधाम से कैसे कर पाएंगे और फिर नेहा और सौरभ भी तो हैं.

पापा बड़े प्यार से बोले थे, “तेरे रूप और गुण पर ही अच्छा परिवार फ़िदा हो जाएगा, इसलिए तू बी.एससी. में दाख़िला ले ले.” सौम्या ने ख़ुशी-ख़ुशी बी.एससी. में दाख़िला ले लिया और अच्छे परिवार की बहू बनने का सपना देखने लगी. फ़ाइनल इयर में आते ही उसका रिश्ता दीपक से तय हो गया. लड़के की विदेश में नौकरी, मुंबई में अपना बड़ा आलीशान बंगला, छोटा परिवार और क्या चाहिए था. सहेलियां उसके भाग्य को सराह रही थीं और वह स्वयं आकाश में उड़ रही थी. पर आज वह सोच रही थी कि क्या उसका निर्णय सही था?

सौम्या के भारत आने से क़रीब एक महीने पहले की बात है. उसने दीपक के आर्थिक बोझ और अपनी दिनभर की बोरियत से बचने के लिए दीपक से कहा कि वह उसके लिए भी कोई नौकरी की तलाश करे तो दीपक पहले तो चौंके फिर हंस पड़े, “बी.एससी. पास को भला कौन नौकरी देगा?”

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फिर दीपक गंभीर होकर बोले, “तुम्हें नौकरी की क्या ज़रूरत है? मैं इतना तो कमा ही लेता हूं कि हमारा गुज़ारा हो जाए. फिर 1-2 साल में बच्चा हो जाएगा, उसकी और घर की देखभाल कौन करेगा?” दीपक ने लगभग ऐलान करते हुए कहा, “मैं अपने बच्चे की परवरिश में कोई कमी नहीं करना चाहता. इसीलिए तो मैंने एक साधारण, घरेलू लड़की से शादी की है. मेरे लिए तो एक से बढ़कर एक प्रो़फेशनल लड़कियों के रिश्ते आए थे. मैंने सोचा था कि न होगा बांस और न बजेगी बांसुरी.” दीपक के शब्द उसके कानों में गर्म सीसे की तरह उतरते चले गए. इसका मतलब दीपक उसके रूप और गुण पर फ़िदा नहीं हुए थे. उन्हें चाहिए थी, बस एक घरेलू लड़की, जो उनके घर और बच्चे की देखभाल कर सके. उस दिन से सौम्या मन ही मन छटपटाती रहती. उसे लगता कि वह ऐसे पिंजरे में कैद हो गई है, जहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है.

अपनी सहेलियों की खिलखिलाहट से सौम्या वर्तमान में लौट आयी. सौम्या की सारी सहेलियां उससे मिलने आयी थीं और सौम्या भी उनसे अपने मन की बातें करने को आतुर थी. लेकिन थोड़ी देर बाद ही सौम्या को महसूस हुआ कि उसकी सहेलियां उसके बारे में कम, अमेरिका के बारे में, वहां के रहन-सहन के विषय में जानने को ज़्यादा उत्सुक हैं. सौम्या के मन में बार-बार यह विचार आ रहा था कि हम भारतीय विदेश के प्रति इतने आकर्षित क्यों हैं? विदेश में यदि आय अच्छी है, तो ख़र्चे भी उसी हिसाब से होते हैं. ये किस छलावे में जी रहे हैं हम? जब उसकी सहेलियां उसके भाग्य को सराह रही थीं तो वह उन्हें समझाना चाहती थी कि मुझ से ज़्यादा ख़ुशनसीब तुम लोग हो, जो अपने देश में अपनों के बीच रहकर ज़िंदगी जीने का मज़ा लूट रही हो. लेकिन इस भ्रम को तोड़ना आसान नहीं था, इसलिए वह चुपचाप मुस्कुराती रही.

सहेलियों को विदा करने के बाद जब सौम्या कमरे में आयी, तो देखा मां, पिताजी और नेहा किसी गंभीर विषय पर बातचीत में मग्न हैं. उसे देखते ही पिताजी बोल पड़े, “आ गई मेरी बिटिया, अब तू ही नेहा को समझा. मेरी बात तो इसे समझ ही नहीं आ रही. इंजीनियरिंग में दाख़िला लेने की ज़िद्द कर रही है. यदि इतने पैसे इसकी पढ़ाई में लगा दिए तो इसकी शादी के लिए पैसे कहां से लाऊंगा?” सौम्या कुछ क्षण चुप रही. फिर हिम्मत जुटाकर बोली, “नहीं पिताजी, नेहा से उसके सपने मत छीनिए. पैसा उसकी पढ़ाई में लगाइए. यदि नेहा किसी क़ाबिल बन गई, तो आपको उसकी शादी की चिंता नहीं करनी पड़ेगी, वह अपनी क़ाबीलियत के बल पर अपने लिए वर तलाश कर लेगी. मत काटिए नेहा के पंख. उड़ लेने दीजिए उसे खुले आसमान में.” पिताजी अवाक् से सौम्या का मुंह देख रहे थे, उसके मन की व्यथा को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे. नेहा दौड़कर सौम्या के गले लग गई. “मेरी प्यारी दीदी, आप कितनी अच्छी हो.”

सौम्या आज बहुत हल्का महसूस कर रही थी और उसे पूरा विश्‍वास था कि उसके जीवन से प्रेरणा लेकर स़िर्फ एक नेहा को ही नहीं, वरन् अनेक नेहाओं को सही दिशा मिलेगी. वे विदेश के आकर्षण व मोहजाल से निकल सकेंगी, जो एक छलावे से कम नहीं.

Ritu Dadu

      रीतू दादू

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कहानी- फ्रेम-दर-फ्रेम ज़िंदगी (Short Story- Frame-Dar-Frame Zindagi)

जिस महिला ने हमेशा से ख़ुद को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रखा हो, लोगों के कहने के बाद भी जिसने नौकरी करते रहने को वरीयता दी हो. उसके ख़ुद ही नौकरी छोड़ने का निर्णय नितांत निजी है. पर लोग…? वो तो फिर मुझे फ्रेम में बांधने लगे.

Hindi Short Story

डियर डायरी,

हर बात कहती हूं तुमसे, हर रोज़. बावजूद इसके कुछ न कुछ छूट ही जाता है. आज बिल्कुल अकेली हूं घर पर. निशांत 15 दिनों के टूर पर गए हैं. कीर्ति हॉस्टल में है. मां-पापाजी वापस लौट गए हैं, हर वर्ष की तरह तीन महीने हमारे साथ रहने के बाद. और जानती हो, आज एक बड़ी अलग-सी अनुभूति हुई है. वही बांट रही हूं तुमसे. बात शायद लंबी चले आज. देखो ना, हाथ में बैनर लेकर जीवन से इस बात पर मैंने लड़ाई कभी की ही नहीं कि मैं स्त्री हूं या मुझे कुछ कम मिला है, क्योंकि नारी होने के बेजा स्वांग की सच पूछो तो कभी ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई. हां, नारी होने के सुख को हमेशा, हर चीज़ पर भारी पाया है मैंने. जो भी सीखा अपने अनुभवों से सीखा, प्रयास से सीखा. तुमसे साझा कर-करके सीखा और कभी भी, कहीं भी ख़ुद को कमतर नहीं पाया. इस बात से बहुत ख़ुश भी हूं मैं. बस, आज मलाल हो रहा है, तो इस बात का कि यह ख़्याल पहले क्यों नहीं आया? वरना जीवन थोड़ा और आसान, थोड़ा और आज़ाद-सा हो जाता. थोड़ा बोझमुक्त और बहुत सरल हो जाता.

तुम्हें याद है? जब मैं बड़ी हो रही थी, कुछ 12 बरस से बड़ी रही होऊंगी, पर 13 की नहीं हुई थी. पीरियड्स आना शुरू ही हुए थे. तब रमा चाची ने कहा था मां से, “अब टुन्नो बड़ी हो रही है भाभीजी. हम छोटे शहर में रहते हैं, अब आप इसे फ्रॉक-व्रॉक पहनाना बंद कीजिए. अब तो सूट ही पहनना चाहिए इसे.” और मां ने अगले ही हफ़्ते तक ताईजी की बेटी चंदा दीदी के दो-तीन सूट घर पर ही मेरी फिटिंग के कर दिए और मुझसे उन्हें पहनने को कह दिया. मुझे कोई समस्या तो नहीं हुई, ना ही मैंने इसका विरोध किया. मुझे तो यह बड़े होने जैसी फीलिंग दे रहा था, क्योंकि घर की सभी बड़ी लड़कियों को सूट पहनते ही देखा था. यूं देखा जाए, तो मैं ख़ुश ही थी. हां, थोड़ी असुविधा ज़रूर हुई थी, दुपट्टा संभालते हुए साइकल चलाने में. कभी-कभी दुपट्टे साइकल में फंस जाते थे. मेरा तो नहीं फंसा, पर अर्चना का फंस नहीं गया था? जब मैं उसे अपनी साइकल के कैरियर पर बिठाकर स्कूल जा रही थी. ऐसी गिरी वो साइकल से कि माथा और घुटने छिल गए थे बुरी तरह. कमर में चोट आई सो अलग. आज सोचती हूं तो लगता है, रमा चाची ने आख़िर ऐसी सलाह मां को क्यों दी? उनकी तो ख़ुद भी एक लड़की थी और मां ने उनकी सलाह को क्यों माना? और तो और, मैंने ही क्यों माना? फ्रॉक्स बुरी तो नहीं होतीं? यह पहली थी… क़स्बे की लड़कीवाली फ्रेम.

फिर जब मैं कॉलेज में थी. को-एड कॉलेज था. हम लड़के-लड़कियां आपस में हर विषय पर बहस कर लिया करते थे. साथ-साथ आते-जाते भी थे. कभी-कभी जब सहपाठी लड़के बाज़ार में टकरा जाते थे, तो मैंने कभी उनसे बात करने में कोई झिझक महसूस नहीं की. एक बार यूं ही घर का सामान लेने गई थी और रास्ते में मनोज मिल गया. हम दोनों केमिस्ट्री के नोट्स को लेकर बात करते रहे और बातें कॉलेज की कई और बातों को जोड़ती गईं.

क़रीब-क़रीब घंटाभर सड़क के किनारे अपनी-अपनी स्कूटी को रोककर हम बतियाते रहे. फिर सामान लेकर मैं घर लौट आई. देर शाम को मां कमरे में आईं और पूछा कि मैं रास्ते में आज किससे बात कर रही थी? मैंने उन्हें बताया मनोज मिल गया था, पर ये भी पूछा कि आपसे किसने कहा इस बारे में? तो उन्होंने बताया कि पापा के एक कलीग ने मुझे सड़क पर उससे बात करते देखा, तो पापा से आकर कह गए कि आपकी बेटी एक लड़के से भरी सड़क पर गप्प लड़ा रही थी. पापा घर लौटे, तो उन्होंने मां से इसके बारे में पूछा, इसलिए वे पूछ रही हैं. मेरे जवाब से संतुष्ट मां चली तो गईं, लेकिन दूसरे दिन बातों-बातों में ये संदेश ज़रूर दे दिया कि बेटा, इस तरह सरेराह लड़कों से बात न किया करो. मैंने मां से कहा भी कि मां छुप-छुपकर तो नहीं मिले ना? और रास्ते में मिलने पर पढ़ाई की, कॉलेज की बात ही तो कर रहे थे और वो भी सरेआम? इसमें किसी को क्या दिक़्क़त होनी चाहिए? मां की सूरत थोड़ी उतर गई और मैं चाहते, न चाहते हुए भी बहुत कुछ समझ गई. ये दूसरी थी… छोटे शहर की युवतीवाली फ्रेम.

मैं हमेशा से अच्छी तरह जानती थी कि यूं देखा जाए, तो मैं औसत लुक्सवाली युवती थी, पर आत्मविश्‍वास मेरे व्यक्तित्व को हमेशा से ही कइयों से आगे ला खड़ा करता था. फिर भी कई बार जब-जब, किसी के द्वारा किसी अजीब-सी नई फ्रेम में जड़ी जाती थी मैं, पुरज़ोर विरोध नहीं कर पाती थी. एक बात रोकती थी शायद कि लोग… दूसरे लोग मुझे अच्छा नहीं कहेंगे और शायद तब समझ ही नहीं पाती थी कि फ्रेम में जड़ी जा रही हूं, तो कहती कैसे कि मुझे ऐसी फ्रेम में मत जड़ो, जिसमें मैं पूरी तरह समा ही नहीं सकती, क्योंकि मेरे स्वाभाविक व्यक्तित्व के तो कई आयाम हैं. उन्हें, उन सब को भला किस तरह फ्रेम में ़कैद किया जा सकता है? इसके लिए तो तुम्हें अनगिनत फ्रेम्स लानी होंगी, पर फिर भी कई-कई बातों में कई-कई लोगों ने कई-कई फ्रेम्स में जड़ना चाहा मेरे व्यक्तित्व को. यही सारी बातें तीसरी फ्रेम थीं जैसे… एक बड़ीवाली फ्रेम… एक बड़ी अच्छी लड़कीवाली फ्रेम.

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और वो याद है? शादी की बात चली तो निशांत के पिता के कहने पर निशांत ही हम सबसे मिलने आए थे. तब मैंने नौकरी शुरू की ही थी. एक छोटी-सी फर्म में कमर्शियल मैनेजर की. निशांत से बातचीत हुई, तो उनके सादे-से व्यक्तित्व ने मुझे बहुत प्रभावित किया था. उन्होंने कहा था कि वो चाहते हैं कि महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हों, जब इतना पढ़ा है तो अपनी शिक्षा का उपयोग करें. बस, इसी बात ने तो जैसे मुझे मेरा आकाश दे दिया था. मैंने तो मन बना ही लिया था कि यदि यहां से ‘हां’ हुई, तो मैं ज़रूर अपनी हामी दे दूंगी. जब निशांत के घरवाले मुझे देखने आए थे, तब उनकी मां ने कहा था, “नौकरी तो ठीक है, पर घर को निभाना पहली ज़िम्मेदारी होना चाहिए. घर को इग्नोर करके नौकरी करना तो किसी गृहिणी को शोभा नहीं देता.” तो उनकी बात जैसे सही ही लगी थी. तब तो एहसास नहीं हुआ था, पर आज लगता है ये चौथी फ्रेम थी… अच्छी बहूवाली फ्रेम.

और डायरी, वो भला तुम कैसे भूल सकती हो? मैंने उसे सबसे पहले तो तुमसे ही साझा किया था न? वो हमारी शादी के बाद का मीठा-नमकीन-सा समय? शादी के बाद के प्यार का, पहले प्यार के ख़ुमार का. बड़े से महानगर में हम दोनों का साथ-साथ लगभग भागते हुए ऑफिस के लिए निकलना. शाम घर लौटना. रात के खाने के बाद लंबी-सी वॉक पर जाना और फिर एक-दूसरे की आगोश में सब कुछ भूलकर यूं सो जाना, जैसे दुनिया में हमें इससे ज़्यादा की तो कोई ज़रूरत ही नहीं है. इस बीच भी रिश्तेदारों के घर आने पर उनका हमारे वर्किंग कपल होने की तारीफ़ करने के साथ-साथ यह कहने से भी न चूकना कि यदि तुम काम न कर रही होतीं, तो घर को और ख़ूबसूरत तरी़के से रखा जा सकता था. ये पांचवीं फ्रेम थी… सुघड़ गृहिणीवाली फ्रेम.

फिर जब जॉब के दौरान मैं अपने कलीग्स से बात करती हुई बताती कि मैं अपने घर पर ख़ुद खाना पकाती हूं, कोई मेड नहीं लगा रखी है, तो उनका तपाक से यह कहना कि खाना तो बहुत अच्छा बना है, पर जब तुम दोनों कमा रहे हो, तो मेड क्यों नहीं रख लेते? एक्चुअली, छोटे शहरों में महिलाएं नौकरी के साथ खाना घर पर बना लेती हैं, पर हम तो खाना बनाना ही नहीं जानते और जब इतना कमाते हैं, तो मेड ही क्यों न लगाएं? फिर वीकएंड तो बाहर खाना खाने के लिए ही होते हैं? ये बातें बता रही थीं कि मैं छोटे शहर से आई महिला हूं और बड़े शहर की कामकाजी औरतों में शामिल होने के लिए ये थी छठवीं फ्रेम… शहर की स्मार्ट कामकाजी महिलावाली फ्रेम.

फिर कीर्ति के मेरे जीवन में आने का वो ख़ुशनुमा वक़्त. जब डिलीवरी के लिए ससुराल गई, तो बिल्कुल अनाड़ी थी. पहले बच्चे के दौरान कौन-सी महिला अनाड़ी नहीं होती? पहली बार मां बनती है, पहली बार बच्चा संभालती है और पहली बार उस अनुभव से गुज़रती है, जिसे हमेशा दिव्य करार दिया जाता है. अपने आप में दिव्य है भी मां बनने का अनुभव, पर डायरी, ये भी एक फ्रेम में बांध दिए जाने जैसा अनुभव ही है. अच्छी बातें सब बताते हैं, पर यह कोई नहीं बताता कि बचपन से अब तक जिस तरह ढांप-ओढ़कर मर्यादा में रहना सिखाया जाता है, डिलीवरी के वक़्त डॉक्टर, एनेस्थिसिस्ट और नर्स के आगे आप निपट नंगे हो जाते हो, बिल्कुल नंग-धड़ंग. दर्द में डूबे और असहाय. हां, अपने ही शरीर से निकले एक नन्हे शिशु के लिए यह सब सहना, उसके हमारी गोद में आते ही बहुत कमतर या छोटी-सी घटना जैसा लगता है. पर ये भी एक सच तो है ना? इसके बारे में कुछ न बताकर फिर आपको एक अच्छी मां के फ्रेम में बांध दिया जाता है. बात तो इसके आगे की भी है. डायरी! स्तनपान को यूं तो बड़ा ग्लोरिफाई करके दिखाया जाता है और एक बच्चे के लिए यह आवश्यक भी है. कीर्ति को भी तो मैंने ब्रेस्टफीड कराया ना? वो भी उसके दो साल के होने तक. पर बहुत से हार्मोनल बदलावों से गुज़र रही नई-नई मां को अपने शिशु को स्तनपान कराने के लिए शुरुआत में कितनी गहन पीड़ा से गुज़रना पड़ता है? इसका ज़िक्र कोई नहीं करता, क्यों? और ऐसी अस्त-व्यस्त-सी स्थिति में आपकी साड़ी, दुपट्टा अपनी जगह से हट जाए, तो आने-जानेवाली महिलाएं आपके दर्द को, आपकी रात की पूरी न हुई नींदों को अनदेखा करते हुए यह बताने से नहीं चूकतीं कि भले ही नई मां बनी हो तो क्या, शउर से रहना तो सीखो. ये सातवीं फ्रेम है… चुस्त-दुरुस्त मां वाली फ्रेम.

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जानती हो डायरी, ये फ्रेम्स जैसे ख़त्म ही नहीं होतीं, जिनमें हर महिला को बांध दिया जाता है या बांधने का प्रयास किया जाता है, बड़े हौले-से. और इनके शीशों में उतरने लगता है उसका व्यक्तित्व. कब? उसे भी पता ही नहीं चलता. याद है? जब कीर्ति दो-तीन साल की हुई थी. इन तीन वर्षों तक तो मुझे वर्क फ्रॉम होम दे ही दिया था कंपनी ने. मैं रोज़ाना कीर्ति को नीचे लेकर जाती थी शाम को, दूसरे बच्चों के साथ खिलाने, वहां अमूमन होममेकर्स ही मिलती थीं, अपने बच्चों के साथ. कामकाजी महिलाओं के बच्चे तो उनके दादा-दादी, नाना-नानी या मेड्स के साथ ही नीचे आते थे. एक दिन मैं कुछ बच्चों की मांओं के साथ बात कर रही थी कि अचानक कीर्ति कहीं नज़र नहीं आई. मैं उसे ढूंढ़ने गई, तो पाया कि वो थोड़ी ही दूर पर कुछ दूसरे बच्चों के साथ खेल रही है. वह मेरे साथ आने को तैयार नहीं हुई, तो मैंने वहां खड़ी एक मेड से कीर्ति का ध्यान रखने को कहा और उन महिलाओं का रुख किया, जिनसे मैं बात कर रही थी. वे मुझे आते देख नहीं सकीं और उनकी बातें मुझे सहज सुनाई दे गईं. उनमें से एक महिला दूसरी से पूछ रही थी, “क्या वाकई कीर्ति की मां कुछ काम करती है?” तो दूसरी महिला ने कहा, “कहती तो है, पर सच-झूठ ईश्‍वर जाने.” तीसरी बोली, “जिस तरह अकड़ती है, लगता है काम करती ही होगी.” चौथी ने कहा, “यदि कामकाजी होती, तो हम होममेकर्स के ग्रुप में आकर बात थोड़े ही करती?” मैं उल्टे पांव कीर्ति के पास लौट गई, क्योंकि फिर एक फ्रेम में बांधी जा रही थी… होममेकर/कामकाजीवाली फ्रेम.

फिर जब मैंने कीर्ति को समझा-बुझाकर क्रैश में रहने को राज़ी किया और फुलटाइम काम पर जाने की शुरुआत की, तो मैं, तुम और निशांत ही जानते हैं डायरी कि पहले के 15 दिनों तक वह मेरे लिए क्रैश के अंदर रोती थी और मैं उसके लिए उतनी ही देर क्रैश के बाहर ज़ार-ज़ार रोती थी. उसके चुप होने पर वह भली-सी क्रैश ओनर मुझे बाहर आकर इशारा कर देती थी कि वह चुप हो गई है और मैं मुरझाया-सा मुंह लेकर घर लौट पड़ती थी. कभी-कभी तो क्रैश ओनर कहती थी कि मुझे बहुत गिल्ट होता है. अंदर कीर्ति रोती है और बाहर आप. कीर्ति को मैं संभाल लूंगी, क्योंकि बच्चों को बहलाना आता है मुझे, पर आपका रोना मैं बर्दाश्त नहीं कर पाती. फिर कीर्ति को क्रैश की आदत लगाकर जैसे ही पहले दिन ऑफिस पहुंची, तो सबसे क्लोज़ कलीग ने ही एक और फ्रेम में बांध दिया. उसने कहा, “अरे, तुमने जॉइन कर लिया, इतनी छोटी-सी बच्ची को छोड़कर?” ये बड़ी निर्दयी फ्रेम थी… एक निर्मोही मां वाली फ्रेम.

और तुम तो जानती हो डायरी, मैं और निशांत एक ही बच्चा चाहते थे. आख़िर ये हमारा ़फैसला था. कीर्ति के इस दुनिया में आने से पहले ही निशांत ने मुझसे कह दिया था, “हमारा आनेवाला बच्चा बेटा हो या बेटी, पर होगा इकलौता ही.” मेरे क्यों? पूछने पर उन्होंने कहा था, “मैं इतना निष्ठुर नहीं हो सकता कि तुम्हें दोबारा लेबर पेन से गुज़रने दूं.” उनका जवाब सुनकर मेरी आंखें भर आई थीं. डायरी, और मैं कसकर लिपट गई थी उनसे. फिर हम पर घर-परिवार, रिश्तेदारों और कलीग्स का दबाव-सा आने लगा. जैसे वही हमारे दूसरे बच्चे को पालेंगे. आश्‍चर्य की बात है डायरी, जब घर-परिवार और रिश्तेदारों से मिलो, तो वे इकलौते बच्चे के बिगड़ने के संदेहों से घिरे और जब कलीग्स से मिलो, तो वे डबल इनकम सिंगल किड के तमगे से नवाज़ते हुए फिर बांधने लगे अलग-अलग फ्रेम्स में. पर इस बार की फ्रेम्स में मैं अकेली नहीं थी, निशांत भी थे. मैंने देखा इस बार फ्रेम में जड़े जाने को लेकर मैं हर बार की तरह सोच में डूबी थी, पर निशांत… उन्होंने ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. शायद इस फ्रेम का कोई दबाव महसूस नहीं किया उन्होंने, क्योंकि शायद वे पुरुष हैं, क्योंकि पुरुषों की कंडीशनिंग अलग तरह की होती है और शायद पहली बार उन्हें कोई किसी तरह की फ्रेम में जड़ने की कोशिश कर रहा था, तो जैसा कि मेरे साथ भी पहली बार हुआ था कि मैंने बिना कुछ महसूस किए सलवार-सूट सहजता से पहन लिया था, वही उनके साथ हुआ. उन्होंने सलवार-सूट पहनने की यानी दूसरा बच्चा करने की हामी तो नहीं भरी, पर सहज बने रहे.

फिर मेरे सामान्य, सहज ढंग से रहने, ज्वेलरी को नापसंद करने, ब्रैंडेड कपड़ों को ख़ास तवज्जो न देने पर मेरे अपने ही क़रीबी रिश्तेदारों का ये कहना कि आप कामकाजी हो, पर कामकाजी लगती तो नहीं हो. एक अलग तरह की फ्रेम थी. और इसी तरह पार्टीज़ में ज़्यादा दिलचस्पी न लेने को देखते हुए कलीग्स ने भी मुझे एक और फ्रेम में जड़ दिया… नीरस महिलावाली फ्रेम. ऐसे ही सास-ससुर के घर आने पर अपनी मर्ज़ी से कुछ महीनों के लिए ऑफिस में सलवार-कमीज़ पहनकर जाने को कलीग्स ने पू बनी पार्वती और आ गईं बहनजीवाली फ्रेम में जड़ दिया.

इस बीच 10 वर्ष तक नौकरी की और अपनी मेहनत से प्रमोशन भी बटोरती गई मैं. लोगों ने इस बीच भी कई फ्रेम्स में जड़ा, जैसे- बुरी बॉस फ्रेम, किस्मतवाली फ्रेम, चाटुकार महिला फ्रेम वगैरह… पर इन्हें इग्नोर करती रही मैं. देखो न डायरी, इन सभी फ्रेम्स को इग्नोर भले ही किया हो, पर मन के किसी कोने में आज भी ये मौजूद हैं, मतलब इनसे अप्रभावित तो नहीं रही न मैं? यही बताना चाहती हूं तुम्हें कि लोगों की अपेक्षाओं पर कान देती, उनके मुताबिक फ्रेम्स में ढलने की कोशिश करती मैं. मैं तो रह ही नहीं पाई, आज लगता है ये.

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तुम कह सकती हो डायरी कि मैं बहुत ज़्यादा संवेदनशील हूं, पर मुझे पता है तुम नहीं कहोगी. तुम तो मेरी अपनी हो ना? तुम मुझे किसी फ्रेम में भला क्यों जड़ोगी? इन सभी बातों से क़तरा-क़तरा मेरा व्यक्तित्व बना है और तुमसे बेहतर कौन जानता है यह? अब आगे की सुनो, तुम्हें याद तो होगा ही कि अभी कीर्ति टीनएज में आने भी न पाई थी कि उसे लेकर मुझे हर ओर से यह सुनाई देने लगा था… लड़की है, बड़ी हो रही है, अकेली बेटी है, बच्चियों को संभालने की उम्र है, एक ही तो बच्ची है, तुम्हें क्या ज़रूरत है इतना कमाने की, नौकरी करने की. इन आरोपों में लापरवाह मां, लालची मां की फ्रेम में जड़ी जा रही थी मैं.

सबसे अच्छी बात यह रही कि निशांत ने कभी मुझे किसी फ्रेम में नहीं जड़ा. बस, यहीं आकर ईश्‍वर की कृतज्ञ रही हूं हमेशा. उम्र बढ़ रही थी, थकान बढ़ रही थी, एक ही जगह काम करते हुए मोनोटोनी बढ़ रही थी और मां हूं, तो कहीं न कहीं इस बात का पूरा इल्म था कि अब कीर्ति बड़ी क्लास में आ रही है. उसे पढ़ने के लिए तो नहीं, पर पढ़ाई के दबाव से जूझने के लिए अपने आसपास मेरी उपस्थिति की दरकार है. अचानक एक दिन मैंने निशांत से कहा, “मैं नौकरी छोड़ना चाहती हूं.” उन्होंने मेरी बातों को सुना, मेरी बातों के वज़न को तौला और कहा, “जैसा तुम चाहो.”

जिस महिला ने हमेशा से ख़ुद को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रखा हो, लोगों के कहने के बाद भी जिसने नौकरी करते रहने को वरीयता दी हो, उसके ख़ुद ही नौकरी छोड़ने का निर्णय नितांत निजी है. पर लोग…? वो तो फिर मुझे फ्रेम में बांधने लगे. अरे, इतने साल नौकरी की है, अब घर कैसे बैठ पाओगी? थोड़े दिन अच्छा लगेगा, इसके बाद पछताओगी. और यहां मुझ पर मढ़ी जा रही थी… ग़लत निर्णय लेनेवाली महिला की फ्रेम.

नौकरी छोड़ने के बाद थोड़ा खालीपन लाज़मी था. इसी खालीपन के बीच ही तो ये सोच नमूदार हो गई. इन सारी बातों को सोचते हुए आज लगा कि मैं इन फ्रेम्स में बंधते-बंधते, फ्रेम-दर-फ्रेम ज़िंदगी जीते-जीते अपने वास्तविक व्यक्तित्व से परे चूं-चूं का मुरब्बा हो चली थी. बहुत-सी फ्रेम्स में बंद चूं-चूं का मुरब्बा. आज सोच लिया है कि अब इन फ्रेम्स से आज़ाद होना है. इस तरह कि अब कभी इनमें कोई भी मुझे जड़ न पाए. और जानती हो डायरी, सबसे मज़ेदार बात क्या है? घर में मौजूद सारे फ्रेम्स को मैंने उठाकर स्टोर में उस जगह रख दिया है, जहां हर माह कबाड़ी को देने के लिए चीज़ें इकट्ठा करती हूं, क्योंकि अब मुझे ये फ्रेम्स कहीं नहीं चाहिए. न दिल में, न दिमाग़ में और ना ही घर में. मैं ख़ुद के और दूसरी महिलाओं के लिए अनंत आकाश चाहती हूं और बस चले तो मैं दुनिया की हर महिला के दिल में बसी ऐसी फ्रेम्स को निकालकर फेंक दूं… आज, अभी और इसी वक़्त. सच! नए आकाश का पंछी तुम्हारी उन्मुक्त-सी शिखा.

 

Shilpa Sharma

शिल्पा शर्मा

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कहानी- आत्मविश्‍वास (Short Story- Atmavishwas)

वहां जाकर उसे पता चला कि वह कुछ लोगों के मुक़ाबले कितनी अच्छी स्थिति में थी. वे औरतें जो जीती-जागती लाशें थीं, निराशा और अवसाद की दलदल में प्रायः डूब ही चुकी थी. तिरस्कृत, बलात्कृत, अवहेलित, बहिष्कृत नारी प्रतिमाएं, संवेदनाहीन, अनुभूति शून्य, उन्हें सहारे की आवश्यकता थी. अकल्पनीय भीषण हादसों का सामना करके पत्थर हो गई थीं वे.

उन्हें देखकर शालिनी जैसे अट्ठाइस बरस की नींद से जाग उठी. उसे महसूस हुआ कि वह यह काम कर सकती है, क्योंकि उनके दुखों की भाषा उसके लिए भी अजनबी नहीं है. ज़ख़्म उनके जैसे गहरे नहीं हैं तो क्या, कांटों की वेदना तो उसने भी अनुभव की है.

Short Story in Hindi

 

“मैं जा रहा हूं. दरवाज़ा बंद कर लेना. अब उठोगी भी कि टुकुर-टुकुर देखती रहोगी.”

शालिनी ने उठकर दरवाज़ा बंद कर लिया. इस तरह के अपमान के घूंट पीने की वह आदी हो गई थी. अब ठीक दस मिनट बाद सामनेवाले घर से शिखाजी निकलेंगी. उन्हें निकलते देखने का मोह वो संवरण नहीं कर पाती. शालिनी ने खिड़की के परदे को ज़रा-सा सरकाया और आंखें सामनेवाले घर पर गड़ा दीं.

क़लफ़वाली कॉटन साड़ी, सौम्य मेकअप, अनुभवी मुखमुद्रा, कंधे पर टंगी पर्स ओझल हो जाती, तो अनायास ही शालिनी कमर में खोंसे पल्लू को मुक्त करके चेहरे का पसीना रगड़-रगड़कर पोंछती.

ये लोग कॉलोनी में नए आए हैं. उस दिन परिचय के लिए घर आए थे. बड़ी असहज हो गई थी शालिनी.

“मैं शिखा गुप्ता.” उस महिला ने शिष्टता से उसे नमस्कार करते हुए पूछा “आपका नाम?” “जी, मैं शालिनी शर्मा.” शालिनी ने अचकचाकर जवाब दिया. बुद्धू, बेवकूफ़, गंवार, मूर्ख, घर में नित्य सुने जाने वाले विभिन्न नामों के कारण अपना असली नाम याद करने में उसे ख़ासी मश़क़्क़त करनी पड़ी.

“शालिनी… शालू मेरी छोटी बहन. हां, अपनी बहन को मैं इसी नाम से बुलाती हूं. तुम्हें मंज़ूर है?”

“जी…” शालिनी बुरी तरह हकला गई. इतने स्नेह से उसे किसी ने कभी बुलाया हो, याद नहीं पड़ता. वह अपलक उसे यूं ताकती रह गई जैसे उस जैसी अयोग्य महिला पर किसी ने आश्‍चर्यजनक रूप से कृपादान किया हो.

शिखाजी हंसमुख और मिलनसार थीं, पर व्यक्तित्व में ज़मीन-आसमान का अंतर शालिनी को उनसे दूर कर देता. फलतः परिचय यहीं तक सीमित रह गया.

शाम को वही उबाऊ क्रम. योगेशजी का ऑफ़िस से आगमन. शालिनी द्वारा चाय-नाश्ता पेश किया जाना, पति का उसमें ढेरों नुक्स निकालना, शालिनी के गंवार पहनावे पर उबलना, शालिनी का गरदन झुका लेना, स्वयं को कोसना, फिर खाना, फिर मीन-मेख और फिर जानलेवा रात.

शालिनी को परे धकेल दिया जाता. जिस तरह डिस्पोज़ेबल कप को इस्तेमाल के बाद तोड़-मरोड़कर फेंका जाता है. शरीर का पोर-पोर टीसने लगता, पर विरोध करना जैसे उसने सीखा ही नहीं था.

जब से ब्याहकर इस घर में आई, अपने लिए यह सुनती रही, “मुंह में ज़ुबान ही नहीं है. बिल्कुल गऊ है.

एक आदर्श बहू के लिए इससे बड़ा कॉम्प्लीमेंट क्या हो सकता है. चार भाई-बहनों में दूसरे क्रमांक की शालिनी को अपने भाई-बहनों से युक्तिपूर्ण और तार्किक संवाद करना तो अच्छी तरह आता था, पर माता-पिता ने बुज़ुर्गों के सामने कम बोलने के संस्कार दिए थे, जिन्हें वह अच्छी तरह निबाह रही थी.

सास की दुलारी बहू पति की आंख की किरकिरी बनी रही. उसकी एक-एक बात उन्हें काट खाने दौड़ती. गुण भी अवगुण नज़र आते.

बढ़ती उम्र की बेटियों ने भी मां को कभी सम्मान नहीं दिया. उनकी और योगेश की ख़ूब घुटती थी. उन तीनों में वह कभी शामिल होने की कोशिश करती तो उसे चावल में कंकर-सा निकाल कर अलग कर दिया जाता.

अब ऐसी भी गई- गुज़री नहीं?थी वह. बी.ए. द्वितीय वर्ष पास थी. परंतु इन कृतघ्न लोगों की चाकरी बजाते-बजाते कहीं की नहीं रही. समाचार कान पर पड़ते हैं, सुनती भी है. इतनी अज्ञानी भी नहीं थी कि समझ भी न पाती. बस चर्चा नहीं कर पाती थी. अपने विचारों को प्रकट करना वह भूल ही गई थी. बरसों पहले ज़ुबान बंद हो गई थी तो खुलती कैसे!

उसकी शादी को अभी तीन-चार दिन ही हुए थे. पति के मित्र ने उन दोनों को खाने पर बुलाया. कुछ और दंपति भी आमंत्रित थे. घर के बुज़ुर्गों से दूर हमउम्र लोगों में उसे बड़ा खुला-खुला सा लग रहा था. तरह-तरह के विषयों पर चर्चा चल रही थी. वह अधिकार से भाग ले रही थी. अच्छी तरह स्वयं को प्रस्तुत कर रही थी. हंसी-मज़ाक, बातचीत में खाना कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला.

“बड़े भाग्यशाली हो यार! बड़ी बुद्धिमती पत्नी मिली है.” एक मित्र ने कहा.

योगेश की पीठ पर धौल जमाते हुए दूसरे मित्र ने मज़ाक किया, “बंदर के गले में मोतियों की माला.” ठहाकों के बीच शालिनी ने देखा कि योगेश के चेहरे की रेखाएं खिंचने लगी हैं. बगैर एक शब्द बोले वे दोनों घर आए.

रात को अकेले में उन्होंने शालिनी को एक थप्पड़ रसीद कर दिया. “बहुत खी-खी कर रही थी वहां. एक से जी नहीं भरता?” लगा, जैसे कानों में किसी ने पिघला सीसा डाल दिया हो.

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उस रात का वह अपमान आज भी वह याद करती है, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. पति का सारा क्रोध उस पर बिजली बनकर टूट पड़ा था. पति-पत्नी के प्रणय की कोमल संवेदनाएं तार-तार हो गई थीं. एक सुंदर अनुभूति को अभिशाप के रूप में झेलने को वह विवश हो गई. पलंग के कोने में गुड़ीमुड़ी पड़ी शालिनी देर तक सिसकती रही. योगेश कब के सो चुके थे.

ज़ुबान तब से लेकर आज तक ख़ामोश है. संवेदनाओं ने बेहोश पड़े रहने में ही खैर समझी थी. मन के विचारों को दस दिशाओं का आकाश देने के बदले उसने उन्हें नियंत्रण के ताले में बंद कर दिया. आत्मा जड़ हो गई थी.

इतने बोझ तले जी सकता है इन्सान? शायद इसीलिए वह एक चेतनाहीन ज़िंदगी जी रही थी.

अपना अस्तित्व शनैःशनैः इसी रूप में उसने स्वीकार कर लिया. स़िर्फ एक ही क्षण उनके स्थिर जीवन में हलचल मचा देता था. सामने से निकलने वाली शिखाजी का दर्शन. ऊर्जा से भरपूर, आनंद से लबरेज़, कल्पना से परे वह नारी व्यक्तित्व.

आज…आज वह उसी के घर की ओर आ रही थी.

‘नमस्ते’ शिखाजी के अभिवादन के प्रत्युत्तर में वह सकुचाकर बोली, “आप तो बड़ी हैं, अभिवादन करके शर्मिंदा मत कीजिए..”

“अच्छा, मैं तुम्हें शालू ही कहूंगी जैसा हमने उस दिन तय किया था.” वह हंसकर बोली, “क्या तुम कभी घर से बाहर नहीं निकलती?”

“ज़रूरत ही नहीं पड़ती. सामान ये ला देते हैं, घर में काम भी बहुत हो जाता है.”

“काम का तो बहाना होता है हम औरतों का! दरअसल हम घर के बाहर निकलना ही नहीं चाहतीं. देखो, तुम्हारी दोनों बेटियों की शादी हो गई. अब घरेलू ज़िम्मेदारियां ख़त्म हो गईं. लेकिन समाज के प्रति भी हमारी ज़िम्मेदारी है या नहीं?”

शालिनी क्या कहती. उस प्रतिभावान गरिमापूर्ण व्यक्तित्व की धनी महिला से उसकी क्या बराबरी? पति के अनुसार तो वह परले दर्ज़े की बेवकूफ़ है, जिसने घरेलू ज़िम्मेदारी भी अच्छी तरह नहीं निभाई, लेकिन वह करती भी क्या? अपने घर की न सही, अपनी रसोई की भी वह रानी होती तो एक बात थी, पर योगेश वहां भी चले आते.

समाज सेवा कहां से होती. घर को अपना नहीं बना सकी, समाज को कैसे बनाती? शिखाजी के प्रस्ताव पर शालिनी मौन ही रही.

ताज्जुब था! ऐसी महिला उसके जैसी नगण्य निहायत घरेलू किस्म की महिला के साथ एकतरफ़ा संबंध बनाए हुए थी.

उस रात बरसों बाद शालिनी ने कोई सपना देखा. उसने देखा, शिखाजी उसका हाथ पकड़े रूई के फाहे जैसे बादलों में सैर करा रही थीं. वह मुक्त थी. निर्द्वंद्व. सिर पर हमेशा लदा रहने वाला हीनता का बोझ न जाने कहां गायब हो गया था.

अगले दिन सुबह ग़लती से उसने चाय में शक्कर ज़्यादा डाल दी. योगेश ने हमेशा की तरह उसे गाली दी. “ज़ाहिल कहीं की! चाय है या चाशनी.”

आज उनकी गाली को वह निर्लिप्त भाव से स्वीकार नहीं कर पा रही थी. अंतर में चिंगारी उठती हुई उसने साफ़ महसूस की. शिखाजी ने उसमें यह कैसा परिवर्तन ला दिया है? जिस मन को मृत समझकर उस पर टनों मिट्टी डाल चुकी थी, उसमें से न जाने कैसे जीवन की धड़कन सुनाई दे रही थी.

उस दिन योगेश घर लौटे तो बड़े चिंतित दिखाई दे रहे थे.

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“क्या हुआ जी?” उसने चाय का प्याला उन्हें पकड़ाते हुए विनम्रता से पूछा. “मुझे ट्रेनिंग के लिए दिल्ली भेजा जा रहा है. दो महीने की ट्रेनिंग है. अब तुम बिल्कुल अकेली यहां कैसे रहोगी?”

शालिनी ख़ुद भी फिक्रमंद हो गई. कभी भी अकेली नहीं रही वह.

“तुम ठहरी परले दर्ज़े की बेवकूफ़! लापरवाही तुम्हारी नस-नस में भरी हुई है. लौटूंगा तो पता नहीं मुझे घर दिखेगा या खंडहर.”

शालिनी क्या जवाब देती! इसका जवाब तो वह ख़ुद भी नहीं जानती थी.

“और हां, बाहर के कामों के लिए एक-दो दोस्तों को बोल दूंगा. वे लोग कर देंगे. ठेलेवाले से सब्ज़ी लेना, पर हिसाब ठीक तरह करना, वरना पकड़ा दोगी उसे सौ का नोट और वापस लेना भूल जाओगी.”

‘जी… जी’ करती रही शालिनी. भीतर ही भीतर वह भी चिंतित हो गई थी. योगेश के जाने के बाद शिखाजी ने उसे हिम्मत बंधाई, फिर उसे डांटकर बोली, “तुम इतना अपमान क्यों सहन करती हो? पत्नी पति को सम्मान देती है, तो पति का भी फ़र्ज़ है कि अपनी पत्नी को सम्मान दे.”

पत्नी को सम्मान? यह कैसी हैरतअंगेज़ बात थी.

“क्या आपके पति आपसे दबते हैं?” शालिनी अटपटा-सा प्रश्‍न पूछ बैठी.

“पागल हो गई हो? हम पति-पत्नी हैं, एक गृहस्थी के बराबर के साझेदार. एक-दूसरे के ग़ुलाम नहीं.”

पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक, साथी मित्र, सहयोगी? ये कैसे अनोखे शब्द हैं. वह तो स़िर्फ इतना जानती है कि पति स्वामी है, तो पत्नी दासी. पति पालनकर्ता है, तो पत्नी पालित. पति आश्रयदाता है, तो पत्नी आश्रित. पति जीवनरस से भरपूर वृक्ष है, तो पत्नी अमरबेल.

शिखाजी हंसकर उसे उलाहना देतीं, “बरसों से घर ही घर में रहकर तुम्हारा दिमाग़ जंग खा गया है. तुम भूल गई हो कि तुम पढ़ी-लिखी हो, सिलाई-बुनाई में माहिर हो, ये गुण कोई कम तो नहीं! कल से तुम मेरे साथ चलोगी.

“कहां?”

“हाफ वे होम, जहां मानसिक रूप से विक्षिप्त महिलाओं को रखा जाता है. ऐसी महिलाएं, जिन्हें उनके परिजन ठीक होने पर भी स्वीकार नहीं करते.”

“लेकिन मैं क्या करूंगी वहां जाकर?’

“तुम उनसे बातें करके उन्हें उनकी अंतर्वेदना से मुक्त करोगी? उन्हें एहसास दिलाओगी कि वे अकेली नहीं हैं. अपना हुनर सिखाओगी. अवसाद के अंधे कुंए

से उन्हें बाहर निकालने की हर संभव कोशिश करोगी.”

“लेकिन मुझे तो यह सब नहीं आता…”

“यह तुम्हारा वहम है, तुमने मुझसे अपनी ज़िंदगी के बारे में विस्तार से बताया तभी तो मुझे पता चला.”

“मुझसे नहीं होगा…”

वह ना-ना करती रही और शिखाजी कब खींचकर उसे ले गईं, उसे स्वयं पता नहीं चला.

वहां जाकर उसे पता चला कि वह कुछ लोगों के मुक़ाबले कितनी अच्छी स्थिति में थी. वे औरतें जो जीती-जागती लाशें थीं, निराशा और अवसाद की दलदल में प्रायः डूब ही चुकी थी. तिरस्कृत, बलात्कृत, अवहेलित, बहिष्कृत नारी प्रतिमाएं, संवेदनाहीन, अनुभूति शून्य, उन्हें सहारे की आवश्यकता थी. अकल्पनीय भीषण हादसों का सामना करके पत्थर हो गई थीं वे.

उन्हें देखकर शालिनी जैसे अट्ठाइस बरस की नींद से जाग उठी. उसे महसूस हुआ कि वह यह काम कर सकती है, क्योंकि उनके दुखों की भाषा उसके लिए भी अजनबी नहीं है. ज़ख़्म उनके जैसे गहरे नहीं हैं तो क्या, कांटों की वेदना तो उसने भी अनुभव की है.

उसके सांत्वना देने के तरी़के से शिखाजी भी अभिभूत हो गईं. अब तो वह रोज़ ही शिखाजी के साथ ‘हाफ वे होम’ जाने लगी.

शिखाजी ने शालिनी का रहन-सहन भी बदल दिया. ज़माने की ऱफ़्तार को समझने का प्रयास करते-करते वह उसी प्रवाह में आगे बढ़ चली थी. चेहरे के आहत, उदास भाव कहीं तिरोहित हो गए थे.

आजकल वह फ़ोन पर योगेश से सधी हुई आवाज़ में बस इतना ही कहती, “व्यर्थ चिंता न करें. अपनी और घर की सुरक्षा ख़ुद करने में वह सक्षम है.”

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घबराई हुई, अचकचाई हुई आवाज़ सुनने के आदी योगेश इस सधी हुई आवाज़ से भौंचक्के रह जाते.

इस दौरान गैस ख़त्म हुई. टेलीफ़ोन, बिजली, पानी का बिल- इस तरह के बीसियों मौ़के आए, जिनके लिए योगेशजी ने अपने ख़ास दोस्तों को कह रखा था. लेकिन ऐसी नौबत ही नहीं आई. शिखाजी के साथ जाकर वह स्वयं ही सारे काम कर आई. उसने देखा व्यर्थ ही वह इन सब कामों को हौआ समझती रही. कुछ भी कठिन नहीं था. शिखाजी कहतीं, “इन मामूली-से लगनेवाले कामों को भी स्वयं करने से आत्मविश्‍वास पैदा होता है. उस दिन ‘हाफ वे होम’ से लौटते हुए शालिनी का मन बेहद उदास था. बार-बार आंखों के सामने उस पंद्रह साल की मासूम बच्ची का चेहरा घूम जाता था. वह अपने नज़दीकी रिश्तेदार की हवस का शिकार हुई थी. अनचाहे गर्भ को ढोती वह लड़की अपने ही माता-पिता द्वारा ठुकराई गई थी. उसका कोई दोष न होते हुए भी उसे सजा दी गई थी. कुसूरवार ने उसके मां-बाप को अपने दृष्कृत्य की मामूली क़ीमत चुका दी थी.

“क्या इन औरतों का समाज में वापस लौटना संभव है? हमारी कोशिशों का सुखद परिणाम निकलेगा या नहीं?” शालिनी चिंतित थी.

“हां शालू, तुम्हें देखकर मैं विश्‍वासपूर्वक कह सकती हूं कि अपने अतीत की ज़्यादतियां भूलकर, वर्तमान की वेदना से उबरकर मुनासिब भविष्य का निर्माण किया जा सकता है.”

शिखाजी कुछ क्षण ख़ामोश रहीं, फिर भावुक होकर गंभीरतापूर्वक बोलीं, “समय कितना भी बदल गया हो, पर आज भी ये औरतें शाप भोग रही हैं. ये अपनों द्वारा छली गई हैं. इनका आत्मसम्मान आहत हो चुका है. इनकी अस्मिता को पैरों तले कुचला गया है. रामचंद्रजी ने अहिल्या को घोर अवसाद से उबारा. हमें भी वही आदर्श अपने सामने रखना है. समाज से बहिष्कृत, जड़ हो चुकी इन औरतों में चेतना जगानी है.”

“शिखाजी! आप सब कुछ कर सकती हैं. आपसे मिलने के पहले मेरी ज़िंदगी में भी कुछ नहीं था. अपने इर्द-गिर्द छाई धुंध को मैं अपनी ज़िंदगी का सच समझ बैठी थी. धुंध के पार का उजाला मेरी दृष्टि से दूर था और आज…”

“आज भी तुम वहीं हो! मैंने स़िर्फ तुमसे तुम्हारा परिचय कराया है. योगेशजी के विशेषणों को ही तुम सच समझ बैठी थी. लेकिन शालू, व्यक्ति जब स्वयं प्रयत्न करता है, तभी अपने अंधेरों से मुक्त हो पाता है. दूसरे उसे सांत्वना दे सकते हैं, लेकिन हिम्मत उसे स्वयं जुटानी पड़ती है. मध्यमवर्गीय परिवारों में कई बार अहंकारी पुरुष अपनी पत्नी के व्यक्तित्व को बौना बनाने में ही अपना पुरुषार्थ समझते हैं? तुम ही सोचो, समाज का आधा हिस्सा ही यदि चेतनाशून्य होगा तो उसके ऊंचा उठने की कल्पना भी कैसे की जा सकती है.”

शिखाजी की बातों में जीवन की सच्चाई थी.

दो महीने बाद योगेश घर लौटे, तो अपनी पत्नी को पहचान नहीं पाए. कहां गए वे लाचारी के भाव? उनके सामने तो एक तेजस्वी नारी खड़ी थी. सलीकेदार पहनावा और चेहरे पर गर्वीली मुस्कुराहट. यह तो उनकी पत्नी नहीं है, “आप जल्दी से नहा-धो लें. खाना तैयार है. एक बजे मुझे किसी काम से बाहर जाना है.”

शालिनी की इस अदा पर योगेश स्तब्ध होकर उसे देखते ही रह गए. उससे कुछ पूछने का भी साहस उनसे न हुआ. ‘पागल, बेवकूफ़, जाहिल, मूर्ख’ आदि उनकी जीभ पर आने के लिए मचलनेवाले शब्द आज पता नहीं कहां चले गए थे.

योगेश को वे खोजने पर भी नहीं मिल रहे थे.

 – स्मिता भूषण

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