Story

“ऐसी बातें ना बोल यमुना. तू क्यों भूल रही है बड़े-बड़े लखपतियों की छोरियां भी जब शादी के मंडप में बैठती हैं ना, उसके पहले ही क़रार हो जाता है. लाखों के सौदे होते हैं, यही रीत है.”
“होते होंगे लाखों के सौदे, उन छोरियों के मन में भी दहेज लेकर जाने की चाह रहती होगी. मैं वैसी नहीं हूं माई. वैसे भी मुझे भिखारी लड़के से ब्याह नहीं रचाना.”
“अरी यमुना दहेज तो उसके माई-बाप मांग रहे हैं. लड़के को काहे कोस रही है.”
“अच्छा मतलब वह अपने लड़के को बेच रहे हैं, डेढ़ लाख रुपए में. उन्हें कह दो हमें यह सौदा मंज़ूर नहीं.”

कड़कड़ाती धूप में मेहनत करती यमुना पसीने से तरबतर हो रही थी. तभी खाना खाने की छुट्टी हुई. इतने शरीर तोड़ परिश्रम के बाद उसे ज़ोरों की भूख लगी थी. आज माई ने क्या साग भेजा होगा, सोचते हुए उसने अपना खाने का डिब्बा खोला. वह देखकर हैरान रह गई कि डिब्बे में प्याज़ और सूखी रोटी के सिवाय और कुछ भी नहीं था. यमुना ग़ुस्से में लाल हो रही थी. उसने डिब्बे को वैसे ही वापस बंद कर दिया. तभी उसके बगल में खाना खा रही पार्वती ने पास में खड़े लार टपकाते कुत्ते को देखकर उसके आगे एक सूखी रोटी फेंक दी. कुत्ता भी रोटी देख उसे सूंघ कर अलग हो गया. उसे शायद बिस्किट की तमन्ना थी, जो इस वक़्त उसके नसीब में नहीं थे. यमुना की भूख और ग़ुस्सा दोनों ही अपनी चरम सीमा पर थे. वह उठी और वापस काम पर जाने लगी.
तभी पार्वती ने पूछा, “क्या हुआ यमुना खाना क्यों नहीं खा रही है? अरी बोल ना क्या हुआ?”
“सूखे टिक्कड़ भेजे हैं माई ने, कैसे खाऊं? सूखे टिक्कड़ को देखकर तो वह कुत्ता भी भाग गया, फिर भला मैं कैसे खाऊं?”
“अरी आ जा मेरे पास चटनी और थोड़ी साग भी है, खाएगी?”
“नहीं पारो तू खा ले मेरा पेट भरा है, जाती हूं काम पर.”
कड़ी धूप में पसीना बहता रहा, यमुना काम करती रही. सूरज को भी मानो उस पर दया आ गई, तो वह भी धीरे-धीरे अपने तापमान पर नियंत्रण करके ढलने लगा. शाम होने आई अपनी दहाड़ी पूरी करके यमुना जब शाम को घर पहुंची, तो उसकी माई ने पूछा, “यमुना, बड़ी थकी-थकी लग रही है? क्या बात है आज काम ज़्यादा पड़ गया क्या?”
यमुना ने ग़ुस्से में जवाब नहीं दिया.
उसकी माई ने अधिक ध्यान ना देते हुए उसका डिब्बा धोने के लिए उठाया और बाहर चली गई. डिब्बा खोलते ही उसने देखा, खाना तो जस का तस रखा है. वह वापस आई और यमुना से पूछा, “यमुना, खाना क्यों नहीं खाया? इसीलिए ऐसी लग रही है. मुंह उतर गया है. क्या हुआ है तुझको?”
“क्या खाती माई, सूखी रोटियां? साग क्यों नहीं बनाई? इतना तो कमा कर लाती हूं, खाने के लिए तो पैसा कम नहीं पड़ सकता.”
“यमुना अब से तो ऐसा ही खाना मिलेगा.“
“यह क्या कह रही हो मांई? क्यों ऐसा खाना मिलेगा? एक ही दिन में महंगाई इतनी बढ़ गई कि साग लेने के लिए भी पैसा नहीं है?”
“अरी नाराज़ी ना दिखा, तेरे बापू ने तेरा ब्याह तय कर दिया है. बहुत अच्छा लड़का है. कमाता भी ठीक-ठाक है। दहेज में उसके मांई-बाप डेढ़ लाख रुपया मांग रहे हैं, देना तो पड़ेगा. कौड़ी-कौड़ी बचाएंगे तभी तो इकट्ठा होगा ना. छह-सात महीने का समय है हमारे पास. तब तक हमें उतना पैसा जोड़ना पड़ेगा. साहूकार के पास से थोड़ा कर्ज़ा ले लेंगे.”
“यह क्या कह रही हो माई, इतना सारा दहेज मांग रहा है और तुम कह रही हो अच्छा लड़का है? उसे लड़की भी चाहिए और साथ में पैसा भी? मना कर दो, मैं ऐसे लड़के के साथ ब्याह हरगिज़ नहीं करूंगी, जिसकी नीयत में दहेज की दौलत हो. उसके बाजू में ताक़त नहीं है क्या अपनी जोरू को कमाकर खिलाने की?”

यह भी पढ़ें: शादी तय करते समय न करें झूठ बोलने की गलती, वरना आ सकती है मैरिड लाइफ में प्रॉब्लम (Don’t Make Mistakes Of Telling Lies Before Marriage, It Will Destroy Your Marriage)


बापू बिस्तर पर हैं, तुमसे काम होता नहीं. तुम दोनों का क्या होगा? कर्ज़ का ब्याज भरते-भरते ज़िन्दगी बीत जाएगी. ये साहूकार भी कम लालची नहीं होते. हम जैसों को कर्ज़ा देकर ही अपना घर चलाते हैं. कामकाज होता नहीं है उनसे. गरीबों की मेहनत का खून चूस-चूस कर ही पलते हैं ये. दहेज लेने वाले भी इन्हीं के भाई-बंधु होते हैं. जो अभी पैसा मांग रहे हैं, क्या वह बाद में मुझे तुम्हारे लिए कुछ भी करने देंगे? नहीं माई नहीं, मुझे ब्याह करना ही नहीं है.”
“अरी पगली है क्या तू? दहेज के बिना रिश्ते नहीं होते. तूने अभी दुनिया देखी ही कहां है. ब्याह तो सभी को करना पड़ता है. बेटी को घर के खूंटे से बांध कर तो नहीं रख सकते ना? तू हमारी चिंता ना कर, मैं जैसे-तैसे दो जून की रोटी का जुगाड़ तो कर ही लूंगी.”
“मैंने कह दिया ना माई, ऐसे लालची परिवार में मैं रिश्ता कभी नहीं करूंगी.”
“ऐसी बातें ना बोल यमुना. तू क्यों भूल रही है बड़े-बड़े लखपतियों की छोरियां भी जब शादी के मंडप में बैठती हैं ना, उसके पहले ही क़रार हो जाता है. लाखों के सौदे होते हैं, यही रीत है.”
“होते होंगे लाखों के सौदे, उन छोरियों के मन में भी दहेज लेकर जाने की चाह रहती होगी. मैं वैसी नहीं हूं माई. वैसे भी मुझे भिखारी लड़के से ब्याह नहीं रचाना.”
“अरी यमुना दहेज तो उसके माई-बाप मांग रहे हैं. लड़के को काहे कोस रही है.”
“अच्छा मतलब वह अपने लड़के को बेच रहे हैं, डेढ़ लाख रुपए में. उन्हें कह दो हमें यह सौदा मंज़ूर नहीं.”
माई ने यमुना को हर तरह से समझाने की कोशिश की, किंतु यमुना की ना हां मैं ना बदली.
यमुना ने कहा, “माई कल से साग बनाना मत भूलना.”
“ठीक है.” कहकर माई अपना काम करने लगी.
वह हर रोज़ थोड़ा-सा साग बनाकर यमुना के डिब्बे में रख देती और बाकी कच्चा उठाकर गीले कपड़े में रखकर छुपा देती. माई और बापू तो अभी भी यमुना की चोरी से सूखी रोटी, प्याज़ के साथ खा कर पानी पी लेते. यमुना को एक दिन तबीयत ख़राब लग रही थी, इसलिए वह खाने की छुट्टी में मालिक को बोल कर घर आ गई. उसने सोचा आज माई-बापू के साथ घर पर ही खाना खाऊंगी, पर घर में घुसते ही उसने देखा माई और बापू प्याज़ और नमक के साथ रोटी खा रहे थे. यह देखकर यमुना की आंखें आंसुओं से भीग गईं और वह उन दोनों के सामने आकर घुटनों के बल बैठ गई.
माई और बापू उसे देखकर हैरान रह गए. माई ने कहा, “अरे यमुना, तू इस वक़्त?”
यमुना की आंखों से आंसू टपक कर उनकी थाली में जा गिरा. यमुना कुछ भी बोल नहीं पा रही थी, लेकिन उसकी आंखें सब कुछ बोल रही थीं. उसके आँसू देख कर माई और बापू के आंसू भी बह निकले.
बापू ने कुछ बोलने के लिए मुंह खोला, तो यमुना ने उनके मुंह पर अपनी उंगली रख दी और अपने घुटनों को नीचे कर पालथी मार कर उनके पास बैठ गई. यमुना ने अपना डिब्बा खोला और उसमें से साग निकाल कर अपने हाथों से उन्हें पूरा खाना खिलाया. इस समय कोई किसी से कुछ नहीं कह पा रहा था.
यमुना के मन में केवल यही विचार आ रहा था कि उसका यह फ़ैसला कितना सही था कि वह दहेज देकर ब्याह नहीं करेगी, वरना उसके माई-बापू को शायद जीवनभर नमक के साथ ही रोटी खाना पड़ती. उसके बाद उसने माई से कहा, “माई दो-दो पैसे बचाकर साग के बिना रोटी खाकर आप डेढ़ लाख कभी इकट्ठे ना कर पाओगी, बस मेरा दिल दुखाओगी. तुम्हें मेरी क़सम आज के बाद फिर कभी ऐसा किया तो.”
“ठीक है यमुना तू जीती और मैं हारी.”
उसके बाद भी यमुना के लिए कई रिश्ते आते रहे, लेकिन हर जगह बात दहेज पर आकर अटक जाती. यमुना अपनी ज़िद पर अड़ी ही रही.

यह भी पढ़ें: महिलाओं के हक़ में हुए फैसले और योजनाएं (Government decisions and policies in favor of women)


वह अपनी माई से हमेशा एक ही बात कहती थी, “माई दहेज मांगने वालों के लिए मेरे मन में केवल दो ही बातें आती हैं. एक तो यह कि वे लालची हैं और उनका लालच कभी भी ख़त्म नहीं होगा और दूसरी ये कि वे भिखारी हैं अपने दम पर कमाने की शायद उनकी औकात ही नहीं है. माई उनके लिए मेरे मन में मान-सम्मान कभी नहीं आता. तुम ही बोलो माई ऐसे परिवार या ऐसे लड़के से रिश्ता में क्यों जोड़ू, जिसका मैं आदर ही ना कर पाऊं. मुझे मेरे बापू और माई की थाली में सूखी रोटी और प्याज़ नहीं, रोटी के साथ साग, चटनी और अचार भी चाहिए. मैं तो ऐसे लड़के से ब्याह करुगी, जो बिना दहेज लिए मुझसे विवाह करे और मुझे मेरे माई-बापू के लिए रोटी के साथ साग का भी जुगाड़ करने दे, वही होगा मेरा पति.”

– रत्ना पांडे

अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES

डाउनलोड करें हमारा मोबाइल एप्लीकेशन https://merisaheli1.page.link/pb5Z और रु. 999 में हमारे सब्सक्रिप्शन प्लान का लाभ उठाएं व पाएं रु. 2600 का फ्री गिफ्ट.

एक दिन मौक़ा देखकर उसने पार्वती से कहा, “पार्वती, तुम इतनी छोटी बच्ची को बार-बार बड़ी क्यों बोलती हो? वह तो ख़ुद ही छोटी बच्ची है, वह कैसे संभालेगी अपने भाई को? तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए.”

पार्वती के दो बच्चे हैं, बेटी गीता और बेटा रवि. दोनों ही छोटे और नासमझ. बच्चे छोटे होने की वजह से वह उन्हें भी अपने साथ काम पर ले जाती थी. काम शुरू करने से पहले वह अपनी बेटी गीता को कहती, “जा बेटा, अपने छोटे भाई को संभाल, उसे रोने मत देना.”
मां की बात सुनकर गीता अपने भाई को अच्छे से संभालती थी. जब भी गीता के हाथ में कोई छोटी-मोटी वस्तु रवि को दिखाई दे जाती, तो वह हमेशा उस चीज़ को छीनने की कोशिश करने लगता. यह देखकर पार्वती गीता से कहती, “बेटा दे दे तू बड़ी है ना…”
सुनते ही गीता वह चीज़ थोड़ा उदास होते हुए रवि को दे देती थी.
मालती अभी-अभी कुछ हफ़्तों पहले ही कपूर परिवार में ब्याह कर आई थी. वह रोज़ यह सब देखती रहती, लेकिन कुछ कह नहीं पाती. घर में उसकी सास और जेठानी तो पहले से ही हैं. यह सब देखकर वह कभी परेशान नहीं होते और पार्वती को कभी कुछ कहते भी नहीं थे. किंतु मालती यह देखकर हर रोज़ परेशान हो जाती थी.
एक दिन मौक़ा देखकर उसने पार्वती से कहा, “पार्वती, तुम इतनी छोटी बच्ची को बार-बार बड़ी क्यों बोलती हो? वह तो ख़ुद ही छोटी बच्ची है, वह कैसे संभालेगी अपने भाई को? तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए.”

यह भी पढ़ें: बेटी की शादी का ख़र्च बड़ा हो या पढ़ाई का? (Invest More In Your Daughter’s Education Rather Than Her Wedding)


मालती की बात सुनकर पार्वती ने कहा, “क्या करूं मालती मैडम, चार-पांच घरों में कचरा, बर्तन और पोछा करती हूं, तब जाकर दो टाइम की रोटी का जुगाड़ होता है. पति दारु पीता है. थोड़ा-बहुत जो भी कमाता है, ख़ुद ही ख़त्म कर देता है. मैं किसी तरह से घर चलाती हूं. घर में और कोई नहीं, क्या करूं मैडम मजबूरी है. हम लोगों के बच्चे जल्दी बड़े हो जाते हैं. वक़्त और हालात उन्हें सब सिखा देता है. आज गीता की वजह से ही मैं काम कर पाती हूं, वरना इतना छोटा बच्चा है उसे संभालते हुए काम करना मुश्किल है. अब यदि मैं काम नहीं करूंगी, तो यह दोनों तो भूखे ही मर जाएंगे.”
पार्वती की बातों की सच्चाई सुनकर मालती निराश हो गई. वह उसे आगे कुछ भी नहीं कह पाई. मालती अब रोज़ ही दोनों बच्चों को कुछ ना कुछ खाने के लिए अवश्य ही देने लगी.
आज मालती की जेठानी सरोज ने उससे कहा, “मालती, कल अपने घर पर किटी पार्टी है. मां और मैं दोनों ही उसमें शामिल हैं. अगली बार जब शुरू होगी, तब तुम्हें भी शामिल कर लेंगे. इस बार तुम तुम्हारे हाथ का कोई भी एक व्यंजन ज़रूर बनाना. हमारी सब दोस्त कह रही थीं कि अगली बार तो नई बहू के हाथ का कुछ व्यंजन खाने को मिलेगा.”
मालती ने कहा, “क्यों नहीं जीजी, आप जो भी कहेंगी, मैं ज़रूर ही बनाऊंगी. मैंने कभी किटी पार्टी में भाग नहीं लिया, इसलिए उसमें शामिल होने में मेरी दिलचस्पी बिल्कुल भी नहीं है.”
“अरे मालती बहुत आनंद आता है, तुम देखना तो सही, कितनी मस्ती, कितने गेम होते हैं. हम लोग जीतने वाले को गिफ़्ट भी देते हैं.”
मालती ने मुस्कुरा कर कहा, “ठीक है जीजी.”
रात से ही किटी पार्टी की तैयारियां शुरू हो गईं. क्या बनाना है, कौन से गेम्स रखना है, क्या पहनना है… सरोज और श्यामा बहुत ही ख़ुश थे.
दूसरे दिन मालती की सास श्यामा और सरोज फटाफट सुबह का काम निपटा कर पार्टी के लिए तैयार होने ब्यूटी पार्लर चले गए. सरोज अपने दोनों बच्चों को मालती के पास ही छोड़ गई थी.
दोपहर तीन बजे से पार्टी के लिए सरोज के दोस्तों का आना शुरू हो गया. मालती ने सबके लिए दही वड़े बनाए थे. सभी के आने के बाद गेम शुरू हुए. बहुत हो हल्ला, बहुत मस्ती चल रही थी. मालती रसोईघर में व्यस्त थी.

यह भी पढ़ें: बच्चों के रोग: बच्चों को होने वाली आम बीमारियों के 72 घरेलू उपाय (72 Home Remedies For Common Kids’ Ailments)


सरोज के दोनों बच्चे लगभग पार्वती के बच्चों की उम्र के थे. दोनों बच्चे अनाया और आदित्य साथ में खेल रहे थे. तभी किसी खिलौने को लेकर दोनों बच्चे झगड़ा करने लगे. तब सरोज ने आकर कहा, “अनाया, तुम बड़ी हो ना, दे दो भाई को, वह कितना छोटा है तुमसे. जाओ उसे चुप कराओ और खेलो उसके साथ.” किसी को भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, शायद उनके लिए यह एक आम बात थी. किंतु मालती इस घटना से विचलित हो गई. अनाया भी रो रही थी,-किंतु सरोज को मानो उसका रोना दिखा ही नहीं.
मालती ने यह सुना, तो तुरंत ही अनाया को गोदी में उठाकर उसे चुप कराया और आदित्य को भी चुप करा कर अंदर ले गई.
आज मालती हैरान थी कि पार्वती तो मजबूर है, किन्तु यहां तो ख़ुद के स्वार्थ के लिए ऐसा हो रहा है. ऐसी किटी पार्टी किस काम की जहां अपने मनोरंजन के लिए चार साल की बच्ची को बड़ा कहकर, छोटे बच्चे को संभालने का काम सौंप दिया जाता है.
आज मालती को अपना बचपन याद आ गया. पांच भाई बहन एक के बाद एक और सबसे बड़ी वह स्वयं, जिसने बचपन को कभी जाना-पहचाना ही नहीं. उसे लगता था, मानो वह बड़ी ही पैदा हुई थी. मालती सोच रही थी, ऐसी न जाने कितनी गीता और अनाया अपना बचपन “तुम बड़ी हो…” सुनकर गुज़ार रही हैं.

रत्ना पांडे

अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES

डाउनलोड करें हमारा मोबाइल एप्लीकेशन https://merisaheli1.page.link/pb5Z और रु. 999 में हमारे सब्सक्रिप्शन प्लान का लाभ उठाएं व पाएं रु. 2600 का फ्री गिफ्ट.

“मेरे पति स़िर्फ मेरे प्रति पूर्ण समर्पित हैं, ये ख़्याल मुझे आभासी ख़ुशी देता है, मेरे होंठों पर मुस्कान लाता है. लोग जो मेरे प्रति ईर्ष्या महसूस करते हैं, क्या ये सब सुशांत से अलग होने पर संभव होगा. सब मेरे प्रति दया भाव रखना शुरू कर देंगे या फिर क्या पता, कोई फ़ायदा उठाने की सोचे.”

Hindi Kahani

मनस्वी, कितना सुंदर मौसम है, बेकार ही ऑफिस आ गई. सुशांत ने कितना कहा कि मत जाओ. आज इस भीगे मौसम का मज़ा लेंगे, पर हाय री क़िस्मत.”

सुकन्या के अंदाज़ पर मनस्वी फीकी मुस्कान के साथ सुबह-सुबह अपने पति के साथ हुई नोंकझोंक में खो गई.

ज़रा-सी बात और पतिदेव झुंझला पड़े. क्या करे वह अगर बरसात के दिनों में उनके अंडरवियर और बनियान नहीं सूखे तो.

कितना भी ड्रायर चला लो, पंखे में भी डाल लो, नमी तो रह ही जाती है. इसमें बेवजह उखड़ जाने की क्या ज़रूरत थी. शाम को तो बरसात में चहक-चहककर पकौड़े और चाय की मांग हो रही थी, तब तो बरसात बड़ी अच्छी लगी. मोहम्मद रफ़ी के गाने भी ज़ुबां पर चढ़ गए, पर सुबह होते ही?

“अरे! कहां खोई हुई है.” सुकन्या की बात पर लंबी सिसकारी लेते मनस्वी बोली, “तेरी बातों में खोई हूं और कहां? काश! हमारे पति भी तेरे सुशांत जैसे रूमानी होते, तो क्या बात होती. सच बता सुकन्या, कौन-सा जादू चलाया है तूने, जो सुशांत जी तुझ पर लट्टू रहते हैं.”

यह सुनकर सुकन्या मुस्कुराई, “कवि हैं पति मेरे. उनकी पेन की नोंक मुझ पर घूमकर नित नए विषय उठा लेती है. उनके रोमांटिक स्वभाव की सीधी वजह मैं ही हूं, और क्या.”

उसके सांवले-सलोने चेहरे पर चमक उभरी, फिर वह कहीं खो-सी गई. वह अक्सर ऐसे ही जब-तब खो जाती है.

कंप्यूटर बैकलॉग करते सुकन्या को धौल जमाती हुई वह बोली, “तू और तेरा कवि पति, ये ऑफिस है मैडम, यहां खोना मना है.”

“अरे! इसमें खोने जैसा क्या है, मेरे सुशांत हैं ही ऐसे. इन बरसाती बूंदों में उनके साथ के सामने अपनी नौकरी को चुनकर पाप किया है. इन मस्त नज़ारों में मेरा साथ पाकर वह जाने क्या-क्या लिख जाते मुझ पर…”

सुकन्या मादक अंगड़ाई लेते हुए बोली, तो मनस्वी उसे देखती रह गई. सांवला रंग, बोलती-सी मुस्कुराती मोटी-मोटी आंखें, शरीर दुहरा, गले में एक चकत्ता, जो शायद जन्मजात ही था. ऐसा कुछ भी नहीं था उसमें, जो किसी को बांधे रख सके. फिर भी पति की उस पर अतिशय आसक्ति दर्शाती थी कि बाह्य सुंदरता पर आंतरिक सौंदर्य हावी पड़ता है.

“ऐ, ऐसे क्या देख रही है. बोल न, आधी छुट्टी लेकर चली जाऊं.” वह शरारत से एक बार फिर बोली, तो मनस्वी माथा पकड़कर स्वांग जनित स्नेह से बोल पड़ी, “हे भगवान! तू और तेरा कविराज रांझा. अब चल, कैंटीन में चाय पीकर मौसम का लुत्फ़ उठाएंगे. यहां ऑफिस में भी बरसात का मज़ा कुछ कम नहीं.”

वह शायद कुछ ज़ोर से बोल पड़ी थी. तभी आसपास के लोग भी मुस्कुरा पड़े.

ये कोई आज की बात नहीं थी. ऑफिस में अक्सर ये चर्चा होती है कि सुकन्या जाने कौन-सी कलम-दवात से क़िस्मत लिखवा कर आई है, जो उसे इतना प्यार करनेवाला पति मिला है. प्रेम से लबरेज़ दांपत्य का किसी को उदाहरण देना होता, तो हमेशा सुकन्या का उदाहरण दिया जाता.

वह स्वयं भी तो अपने प्रेमिल क्षणों को बांटने से नहीं चूकती. रोज़ ही कोई न कोई रोमांटिक क़िस्सा उसके हिस्से रहता.

मसलन- कल रात  सुशांत ने चांदनी रात में मधुर वार्तालाप के बीच ये पंक्तियां उसको नज़र कीं. कल शाम साथ-साथ खाना बनाया. ये साड़ी सुशांत ने दी है. ये अंगूठी उन्होंने देते हुए ये कहा- वो कहा… उफ़्फ़! कितना कुछ था उसके पास कहने को. रोज़ एक नया प्रसंग होता सुनाने को. वह कम पड़ता, तो उसकी लिखी रूमानी ग़ज़लों और मतलों को सुनाते हुए ऐसे भाव देती जैसे उन भाव भरी इबारतों का पेटेंट करवाकर आई हो.

अपने रूमानी दाम्पत्य की क़िस्सागोई करती और सबके होंठों पर मुस्कान की रेखा घिर आती. उसकी कजरारी स्वप्नीली आंखें पति के प्यार से लबलबातीं, तो लोगबाग   जल-भुनकर ख़ाक हो जाते, पर मनस्वी  उसकी सबसे अच्छी श्रोता थी. कभी-कभी उसे भय भी लगता कि सुकन्या-सुशांत के प्रेम को कहीं किसी की नज़र न लग जाए.

यह भी पढ़े: क्या करें जब पति को हो जाए किसी से प्यार? (Is Your Husband Having An Affair?)

ऑफिस से शाम को मनस्वी उस दिन  घर पहुंची, तो पतिदेव ने उसके लिए चाय बनाकर रखी थी. पतिदेव के हाथों  की चाय और मिज़ाजपुर्सी से सुबह की झड़प से उपजी तल्खी गायब हो गई, तो एकबारगी मनस्वी को ग्लानि हो आई.

क्या हुआ जो विजय सुशांत जैसा भावुक कवि हृदय नहीं रखते, पर जैसे भी हैं,  केयरिंग है. उसकी जगह और कोई भी होता, तो ऑफिस जाने की हड़बड़ी में नम बनियान देख चिड़चिड़ा जाता. जाने-अनजाने विजय और सुशांत की तुलना कर बैठने पर मन अपराधबोध से भर उठा.

क़रीब 10 दिन बीतते न बीतते सुकन्या एक बार फिर दफ़्तर से नदारद हुई. फोन किया, तो पता चला मैडमजी माउंटआबू  की ख़ुशनुमा वादियों में हैं. उसकी प्रफुल्लित आवाज़ उसकी ख़ुशी ज़ाहिर कर रही थी.

“क्या करूं मनु, सुशांत ने एकदम से प्रोग्राम बना लिया. क्या करती आना ही पड़ा, पर सच कहूं, बड़ा मज़ा आ रहा है. इतना  ख़ूबसूरत मौसम है कि क्या कहूं… मेरे कमरे के ठीक सामने पहाड़ियां हैं, जिन्हें बादलों ने ऐसे ढंका है कि…”

“सुन मुझे थोड़ा काम है.” मनस्वी ने स्वर भरसक संभाला, कहीं ईर्ष्या ज़ाहिर न हो जाए, पर सुकन्या अपनी दुनिया में मस्त बोल रही थी,

“मनु, अपने रोज़मर्रा के जीवन की रेलमपेल से छुटकारा पाना ज़रूरी है. जो पल हमने यहां जीए हैं, बस वही ज़िंदगी है. जानती हूं तेरा समय ख़राब कर रही हूं, पर क्या करूं, तुझसे अपनी ख़ुशी बांटती हूं, तो ख़ुुशी और बढ़ जाती है…”

“अरे, नहीं सुकन्या इतना भी बिज़ी नहीं हूं. तुम्हारे जीवन में ख़ुशियों के पल यूं ही आते रहें और क्या चाहिए. और हां, अब की बार आना तो असली ख़ुशी लेकर आना, मतलब दो से तीन की तैयारी करके आना…” यह सुनकर वह ज़ोर से हंस दी, फिर ‘अच्छा रखती हूं’ कहकर उसने फोन काट दिया.

हो न हो, इस बार सुकन्या ज़रूर ख़ुशख़बरी लेकर आएगी. मनस्वी सोच के घोड़े दौड़ा रही थी. एक हफ़्ते बाद सुकन्या का फिर फोन आया, “मनस्वी मेरी दो दिन की छुट्टी बढ़वाने की अर्ज़ी दे देना यार. मैं गिर पड़ी. सुशांत ट्रेकिंग पर ले गए थे, रस्सी हाथ से छूट गई. वो तो इन्होंने मुझे संभाल लिया, वरना जाने क्या होता. चेहरे और हाथ में चोट आई है, दो-चार दिन बाद ऑफिस जॉइन करूंगी. बॉस को बता देना…” इस ख़बर के बाद दो दिन बाद दाएं हाथ में क्रेप बैंडेज बांधे आई, तो उसकी दशा देख मनस्वी चौंक पड़ी. चेहरे के दाईं तरफ़ कालापन देख वह घबरा गई. सुकन्या सबको हैरान-परेशान देखकर चिर-परिचित अंदाज़ में बोली, “अरे, बस पूछ मत, ये सुशांत हैं न… आज यहां चलेंगे, कल वहां… डिनर, ट्रेकिंग-बोटिंग… बस पूछ मत मनस्वी… ख़ूब मज़े किए. ट्रेकिंग में गिर पड़ी. सुशांत से अपनी जी भरकर सेवा करवाई है.

सुकन्या अभी भी ख़ुश थी. और क्यों न होती. सच है, दुख-तकलीफ़ में पति का प्यारभरा स्पर्श कितना सुखद लगता है. पति का साथ-दुलार बड़े से बड़े घाव का मरहम बन जाता है. सुकन्या का मुस्कुराता चेहरा देखकर मनस्वी को तीन दिन पहले पैर में लगी वो  मोच याद आई, जिसे कितनी लापरवाही से विजय ने अनदेखा कर दिया. बाद में केमिस्ट को फोन पर पूछकर पेनकिलर मंगवाकर दे दी.

“ऐ कहां खो गई?” सुकन्या के कहने पर मनस्वी उसके चेहरे को ध्यान से देखने लगी. सांवले चेहरे पर चोट का कालापन घुल-मिल गया था. कुछ ऐसे ही सुकन्या का दर्द पति के प्रेम में घुल-मिल गया होगा. शारीरिक पीड़ा दांपत्य प्रेम में घुलकर विलुप्त-सी लगी.

मनस्वी सरसरी नज़र डालते हुए बोली,  “कुछ नहीं, तू अपना हाल बता. तेरे पास माउंटआबू की ढेर सारी बातें होंगी. तू सुना, सच कहूं, तो तेरी बातों से हमारे हृदय के सोये तार भी झनझना उठते हैं.”

और समय होता, तो सुकन्या शुरू हो जाती, पर आज वह कराह उठी, शायद दर्द था. बैलेंस चार्टशीट में पिछले दिनों का लेखा-जोखा भरने के प्रयास में वह खो-सी गई.

“तू कुछ ठीक नहीं लग रही.  कुछ दिन और आराम क्यों नहीं कर लेती.” मनस्वी के कहने पर वह मुस्कुराने की कोशिश करती कहने लगी. “नहीं यार, बहुत काम पेंडिंग है… करना तो है ही…” कहते हुए वह सिसकारकर अपने चोटिल हाथ को सहलाने लगी.

“हाथ में दर्द है ना, ला मैं तेरी मदद करती हूं.” मनस्वी के कहने पर वह “तू बस डाटा डिक्टेट कर दे…” कहते हुए कुछ देर आंखें मूंदे बैठी रही, फिर लंबी और गहरी सांस लेकर काम शुरू किया.

इस बात को महीना भी नहीं बीता था कि वह फिर अनुपस्थित हुई, पर इस बार बॉस के साथ पूरा स्टाफ उससे नाराज़ था, क्योंकि वार्षिक क्लोज़िंग में ऐसे ही काम की अधिकता थी, उसके हिस्से का भार भी सबके सिर पर पड़ गया.

बॉस ने भी आर-पार बात करने का मन बना लिया, आख़िरकार प्रोफेशनलिज़्म भी कुछ होता है. ज़रा-ज़रा-सी बात पर यहां देखना न वहां, पति के पीछे आंखें मूंदें चल पड़ना सही नहीं था. बॉस उसके लिए चार्टशीट बना रहे हैं.

मनस्वी उसके लिए परेशान थी और कुछ हद तक नाराज़ भी. पर जो भी हो, उसकी नौकरी बचाना ज़रूरी था. फोन से संपर्क नहीं हो पाया, तो एक बार उसके घर जाने के लिए मन यह सोचकर बनाया कि शायद अड़ोस-पड़ोस में कोई कुछ जानता हो. कोई हो, जो बता सके कि वह कहां गई है. स्क्वायर मॉलवाली रोड पर पहुंचकर एकता अपार्टमेंट का पता किया. गेट पर सुकन्या सुशांत मीणा तीसरे माले में रहते हैं, यह आसानी से पता चल गया. पांच मिनट के भीतर ही वह तीसरे माले पर पहुंच गई. सुशांत मीणा के नाम की नेमप्लेट देखी, तो वह हैरान रह गई. घर खुला था. बाहर कई चप्पलें रखी थीं. एकबारगी मन किसी आशंका से धड़का, पर अंदर से आती हंसी-खिलखिलाहट की आवाज़ से आशंका निर्मूल सिद्ध हुई. दरवाज़ा खटखटाना नहीं पड़ा, बैठक में ही नीचे कई लोग बैठे दिखे. सुशांत को वह तस्वीर में देख चुकी थी, सो पहचानने में उसे कोई परेशानी नहीं हुई.

यह भी पढ़ेलघु उद्योग- जानें सोप मेकिंग बिज़नेस की एबीसी… (Small Scale Industry- Learn The Basics Of Soap Making)

‘जी कहिये?’ के कर्कश स्वर के साथ सुशांत खड़ा अजीब ढंग से घूर रहा था.

“सुकन्या…” उसके मुंह से निकला, तो “वह किचन में देखो…” कहते हुए वह वहां बैठे लोगों के बीच बैठ गया. उसका उपेक्षाभरा अभद्र व्यवहार देखकर मनस्वी विस्मित थी. बैठक में काव्य गोष्ठी चल रही थी. रसोई से सुकन्या चाय के कप लेकर निकलती दिखी. मनस्वी को देख वह हकबकाकर पास आई और सामने बने कमरे में ले गई.

खिसियाई-सी मुस्कराहट लाते बोली, “आज काव्य गोष्ठी है. सुशांत के ख़ास लोग आए हैं, सो ऑफिस नहीं आ पाई, पर तू यहां क्यों चली आई? ”

उसके लापरवाहीभरे प्रश्‍न पर ग़ुस्से से ज़्यादा उसे उस पर दया आई. वह पागल थी या इतनी भोली कि यह भी न समझ सकी कि उसके ग़ैरज़िम्मेदाराना रवैये से नाख़ुश बॉस उसे इस्तीफ़ा पकड़ाकर बाहर का रास्ता दिखा सकता है.

सुकन्या भरसक सामान्य दिखने का प्रयास कर रही थी, पर मनस्वी की आंखें बैठक के उस असामान्य दृश्य पर टिकी थीं, जहां  छह-सात  स्त्रियां और लगभग इतने ही पुरुष  गद्दे-मसनद के साथ बैठे काव्य पाठ के नाम पर हंसी-ठठ्ठा अधिक कर रहे थे.

एक महिला सुशांत से सटी बैठी हंस-हंसकर उस पर गिर पड़ रही थी. सस्ता-सा माहौल देखकर मनस्वी से और बैठा नहीं गया. वह तो सोचकर आई थी कि शायद इस बार फिर सुकन्या अपने सपने के राजकुमार के साथ कहीं सैर पर निकली होगी या कहीं बीमार न पड़ गई हो. पर यहां तो दोनों स्थितियों से इतर कुछ और ही दिखा.

“तू ऐसे एकदम से कैसे चली आई?” सुकन्या के पूछने पर सख़्त लहज़े में मनस्वी बोली, “तेरा फोन नहीं लग रहा था, क्या करती. अपनी नौकरी बचाना चाहती है, तो कल आ जाना. मैं चलती हूं. तू इनकी मिज़ाजपुर्सी कर…” सुकन्या की झुकी गर्दन और झुक गई जब एक महिला का इठलाया-सा स्वर आया, “सुशांतजी, काव्य में ऐसा रसिकभाव, जो मन को सहज उद्वेलित कर दे… सूखे उपवन में मलय सुगंध उठा दे… ऐसा मर्मस्पर्शी भाव कहां से आता है आपकी कविताओं में.”

यह सुनकर सुशांत बोला, “अजी, आप जैसी सखी हों इस सखा की, तो कामदेव उतर ही आते हैं वाणी में. अब घरवाली की मुटियाई कमर और काले रंग पर तो कुछ लिख नहीं सकते. उनको देखकर तो आते विचार भाग जाएं.”

यह सुनकर सुशांत से लगभग चिपकी औरत हंसकर उस पर लदती हुई, ‘अजी, अब ऐसा भी न बोलिए’ कहकर हंस दी. बेशर्मी भरी हंसी के बीच सुशांत की वासनायुक्त लोलुप आंखें एक-दो से मिलती साफ़ दिखीं.

सुकन्या मनस्वी को खींचकर बाहर ले आई. आंखों में आंसू उतर आए, तो कमज़ोर शब्दों में बोली, “वह रीमा है, क्या करूं. जब घर आती है, तो ऑफिस आने को जी नहीं करता. डरती हूं.” अनपेक्षित माहौल और उसकी दशा देख मनस्वी ‘चलती हूं कल बात करेंगे’ बोलकर भारी मन से बाहर निकल आई.

काव्य गोष्ठी का दृश्य याद कर मन वितृष्णा से भर उठा. क्या सोचा था उसने सुशांत के बारे में और वह क्या निकला.

रातभर सुकन्या की कही बातों और देखे गए दृश्य को जोड़ती रही, पर कोई साम्यता नहीं दिखी. दूसरे दिन बॉस के ऑफिस से बाहर निकलती सुकन्या को उसने पकड़ लिया. वह भी शायद बहुत कुछ भीतर भरे थी, इसीलिए मनस्वी के देखने मात्र से उसके आंसू ढुलकने आरंभ हो गए. जो बताया, वह उस पर विश्‍वास न करती, पर कल का देखा दृश्य उसकी बातों का सत्यापन कर रहा था. वह हिचक-हिचककर बोल रही थी, “सुशांत का कवि होना मेरे जीवन में नासूर है. क्या कहूं, इतनी औरतों से मित्रता है, कोई भाई, तो कोई यार मानती है. सुशांत तो वैसे ही दिलफेंक रहे हैं. कवि होने से महिला मित्रों के संग-साथ… यारी-दोस्ती, रूप-सौंदर्य की बातें करने का लायसेंस मिल गया है. कोई  यकीन नहीं कर सकता है कि बाहर की स्त्रियों को आभार आदरणीय माननीय जैसे शब्दों से संबोधित करनेवाले सुशांत वास्तव में काम वासना के कीचड़ से लथपथ हैं. घिन आती है मुझे कभी-कभी अपने आप से कि मैं ऐसे आदमी के संसर्ग में हूं. सच कहूं, तो बाहर स्त्री पर आदर-सम्मान पर ग्रंथ लिखनेवाले सुशांत अपनी पत्नी को अपने घर में अपनी जूती समझते हैं.

कभी नेहा, तो कभी तूलिका… कल्पना-चंद्रिका… हे ईश्‍वर किस-किस का नाम लूं… आजकल रीमा नाम की औरत से उनके संबंध हैं. मैं सब कुछ जानकर भी चुप हूं.  माउंट आबू इनकी काव्य गोष्ठी में गई थी. रीमा को लेकर विवाद हुआ, तो ये तैश में आ गए. मुझे धक्का दिया और नतीजा टूटा हाथ लेकर मैं यहां आई. कविता और औरतों का इन्हें नशा है.”

“तूने यह सब पहले क्यों नहीं कहा? क्यों जताती रही कि तुम आदर्श दंपत्ति हो?”

उत्तेजना से मनस्वी बोली, तो वह फूट-फूटकर रो पड़ी. कुछ संभली तो कहने लगी, “पागल हूं न, क्या करूं. जो नहीं मिला, उसे कल्पना में ही जी लेती थी. यथार्थ में तो कवि की पत्नी होने की प्रताड़ना मिली है, सो सह रही हूं. सत्य की कठोर भूमि पर चलते-चलते पांव में छाले पड़ जाते, तो कुछ देर मिथ्या झूठे रूमानी मधुर दाम्पत्यिक क़िस्सों के सलोने झूले में सुस्ता लेती.”

यह भी पढ़ेमहिलाएं बन रही हैं घर की मुख्य कमाऊ सदस्य (Women Are Becoming Family Breadwinners)

“मत सह. अपनी नौकरी संभाल और ख़ुद को संभाल. जो नहीं मिला, उसके पीछे मृगतृष्णा-सी मत भाग.”

“कहना आसान है, पर सहना तो पड़ेगा ही अपने बूढ़े माता-पिता के लिए, जिन्होंने बड़ी मुश्किल से मेरे साधारण रंग-रूप के चलते बड़े श्रम से सुशांत को ढूंढ़ा है.”

“तो क्या, जब तक माता-पिता हैं, तू सहेगी?”

“हां, और तब तक ही क्यों, शायद हमेशा के लिए सुशांत मेरा हो जाए… हो सकता है हम दो से तीन हो जाएं. मेरी तरफ़ से प्रयास जारी है, शायद आनेवाला अपनी क़िस्मत के साथ मेरी क़िस्मत भी लेकर आए.”

“तू पागल है, मृगतृष्णा में जी रही है. चल अभी, सुशांत का असली चेहरा सबके सामने ला.”

“नहीं-नहीं, ऐसा मत बोल, तू किसी को कुछ नहीं बताएगी. जो तिलिस्म मैंने अपने रिश्ते का बनाया है, सबके सामने उसे टूटते मैं नहीं देख सकती. सब मुझ पर हंसेंगे. मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी. मनस्वी तुझे मेरी  क़सम, जो किसी से कुछ कहा.”

“हे भगवान, तू इन हालात में भी किसी तीसरे के बारे में सोच सकती है. मुस्कुरा और हंस सकती है, ये सब मेरी कल्पना से परे है.”

“मेरे पति स़िर्फ मेरे प्रति पूर्ण समर्पित हैं, ये ख़्याल मुझे आभासी ख़ुशी देता है, मेरे होंठों पर मुस्कान लाता है. लोग जो मेरे प्रति ईर्ष्या महसूस करते हैं, क्या ये सब सुशांत से अलग होने पर संभव होगा? सब मेरे प्रति दया भाव रखना शुरू कर देंगे. या फिर क्या पता, कोई फ़ायदा उठाने की सोचे. बेचारी का तमगा लगाकर मैं नहीं घूम सकती. मेरी क़सम खा मनस्वी कभी किसी को कुछ नहीं बताएगी.” सुकन्या हाथ जोड़े प्रार्थना कर रही थी. मनस्वी वहां और ठहर नहीं पाई.

कौन कह सकता था कि वह आज के ज़माने की अपने पैरों पर खड़ी आधुनिक महिला की बात सुन रही थी, जो छलावे के बुलबुले के संग खेलकर अपना मन बहला रही थी. बुलबुला फूट चुका था. वह और ताक़त से फूंककर बुलबुला बनाने में जुटी थी.

जब तीन दिन बाद अख़बार में सुशांत की तस्वीर छपी थी. ‘नारी गौरव’ की रक्षा हेतु पढ़े काव्य पाठ में उनकी कविता सर्वश्रेष्ठ कविता के रूप में चुनी गयी थी. ऑफिस में फुसफुसाहट थी, कितनी क़िस्मतवाली है न सुकन्या, कितनी सुंदर कविता है दोहरी ज़िम्मेदारी निभाती नारी का क्या सुंदर वर्णन हुआ है. मन से श्रद्धानत होते हुए पत्नी पर क्या ख़ूब लिखा है. ‘सुकन्या, लगता है तू शब्द दर शब्द कविता में ढल गई है.’… ‘यू आर सो लकी, पति कितना सोचते हैं…’

कोई कह रहा था, तो किसी ने कहा ‘भई, भावुक कवि… पति शब्दों और भावनाओं की कमी कहां.’ मनस्वी का जी चाहा अपने कान बंदकर ज़ोर से चीखे. नहीं, ये पंक्तियां सुकन्या के लिए नहीं हैं.  वह संस्कारविहीन इंसान कहलाने लायक नहीं है. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उसने सिर उठाया, तो सुकन्या के चेहरे पर एक अभूतपूर्व चमक देखी.

“तो आज जलेबी-समोसा सुकन्या मैडम की तरफ़ से.”

“हां-हां, क्यों नहीं.” सुकन्या प्रफुल्लित-सी कह रही थी.

सुकन्या के चेहरे का ओज उगते सूरज-सी लाली दे रहा था, सब भ्रमित थे, पर वो जानती थी, अंधेरा होनेवाला है. वह उसके चेहरे को ध्यान से देख रही थी और सुकन्या सतर्क-सी उसे सावधान कर रही थी, कहीं उसके चेहरे पर हंसी की रेखा धूमिल न हो.

Minu tripathi

       मीनू त्रिपाठी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

यह सब कहते हुए अनिरूद्ध का कंठ भर आया. उसके लफ़्ज़ों से उसके भावों का कोई मेल नहीं था. वह कह कुछ रहा था और उसके चेहरे के भाव कुछ और ही बयां कर रहे थे. इस बात से एस्टेट एजेंट बजाज पूर्ण रूप से अनभिज्ञ था, साथ ही साथ वहां खड़ी अनिरूद्ध की पत्नी नुपुर भी अपने पति के मनोभाव से बेख़बर थी. नुपुर को यह पता भी नहीं था कि उस मकान से जुड़े अपने बचपन की क‌ई सुनहरी और ख़ुशनुमा यादों का बक्सा अनिरूद्ध ने अपने दिल में सहेजकर रखा है.

अनिरूद्ध अभी ऑफिस जाने की तैयारी कर ही रहा था, तभी एक अंजान नंबर से उसके मोबाइल पर कॉल आया. अनिरूद्ध के फोन उठाते ही उधर से उस व्यक्ति ने कहा, “नमस्ते अवस्थीजी मैं रायपुर से एस्टेट एजेंट बजाज बोल रहा हूं. आपका पांच मिनट समय चाहिए.”
एस्टेट एजेंट सुनते ही अनिरूद्ध थोड़ा अपनी गतिविधियों पर विराम लगाते हुए बोला, “हां कहिए मिस्टर बजाज कैसे याद किया.”
“अवस्थीजी मैंने सुना है कि आप अपना रायपुरवाला मकान बेचना चाहते हैं.” एस्टेट एजेंट बजाज ने बगैर कोई औपचारिकता या भूमिका बांधे सीधे मुद्दे पर बात करना प्रारंभ कर दिया.
“हां, उसे निकालना तो चाहते हैं. क्या आपके पास ऐसा कोई बंदा है, जो उस मकान का सही दाम दे सके.” अनिरूद्ध ने शायद मकान की क़ीमत जानने की मंशा से कहा.
“अरे अवस्थीजी ख़रीददार तो लाइन में खड़े हैं, मौक़े की जगह है, मकान तो हाथोंहाथ बिक जाएगा और आपको मुंहमांगी अच्छी-खासी मोटी रकम भी मिल जाएगी. बस आप हामी तो भरिए.” बजाज की आवाज में एक खनक थी मानो उसके और अनिरूद्ध के बीच जैसे मकान का सौदा पक्का हो गया हो.
“मिस्टर बजाज मुझे वह मकान तो बेचना ही हैं. अब यहां भोपाल में बैठकर तो उस मकान की देखभाल संभव नहीं है और ना ही उसे किराए से देकर मैं अपना सिरदर्द बढ़ाना चाहता हूं. मेरी तरफ़ से सौदा पक्का ही समझिए बस रेट सही मिलना चाहिए.”

डाउनलोड करें हमारा मोबाइल एप्लीकेशन https://merisaheli1.page.link/pb5Z और रु. 999 में हमारे सब्सक्रिप्शन प्लान का लाभ उठाएं व पाएं रु. 2600 का फ्री गिफ्ट.


यह सब कहते हुए अनिरूद्ध का कंठ भर आया. उसके लफ़्ज़ों से उसके भावों का कोई मेल नहीं था. वह कह कुछ रहा था और उसके चेहरे के भाव कुछ और ही बयां कर रहे थे. इस बात से एस्टेट एजेंट बजाज पूर्ण रूप से अनभिज्ञ था, साथ ही साथ वहां खड़ी अनिरूद्ध की पत्नी नुपुर भी अपने पति के मनोभाव से बेख़बर थी. नुपुर को यह पता भी नहीं था कि उस मकान से जुड़े अपने बचपन की क‌ई सुनहरी और ख़ुशनुमा यादों का बक्सा अनिरूद्ध ने अपने दिल में सहेजकर रखा है. नुपुर का पूरा ध्यान तो केवल मकान और उसके बेचने की बातों पर ही केन्द्रित था.
“अच्छा तो फिर ठीक है. मिल-बैठकर लेन-देन की सारी बातें और ज़रूरी काग़ज़ी कार्यवाही पूरी कर लेते हैं.” बजाज ने बगैर विलंब किए फौरन कहा.
“हां, मैं आता हूं दो दिन बाद रायपुर, आप डील फाइनल ही समझिए.” ऐसा कहकर अनिरूद्ध ने फोन रख दिया और अपने ऑफिस के लिए निकल गया.
सारे रास्ते अनिरूद्ध को बस रायपुर के मकान में गुज़ारें अपने बचपन की कुछ छोटे-छोटे दृश्यों की झलकियां स्मरण होने लगी थी. ऑफिस पहुंचकर भी उसका पूरा ध्यान रायपुर के मकान पर ही रहा. अनिरूद्ध को एक-एक कर सब याद आने लगा, उसके कानों में अपनी महरुम नानी की आवाज़ सुनाई पड़ने लगी, जो उसे प्यार से अनु… अनु… पुकारा करती थी. अनिरूद्ध स्वयं को उस घर के आंगन में खिलखिलाता-दौड़ता हुआ देख रहा था और अपनी नानी को अपने पीछे उसे पकड़ने को भागती हुई. मां को विशाखा मामी के संग सब्ज़ियां साफ़ करती और हंसती हुई. यह सारे दृश्य चलचित्र की भांति अनिरूद्ध की आंखों के समक्ष दृष्टांत हो रहे थे.


यह भी पढ़ें: रिश्तेदारों से क्यों कतराने लगे हैं बच्चे?
(Parenting: Why Do Children Move Away From Relatives?)

अनिरूद्ध अब भी नहीं भूला जब वह बचपन में अपनी मां मुक्ता के संग अपने ननिहाल रायपुर जाया करता था. आसपास की औरतें उसकी बलाइयां लेती नहीं थकती थीं. कहने को विशाखा मामी, जो पड़ोस में रहती थी, मां की मुंहबोली भाभी और उसकी मामी थी, लेकिन उनका निश्छल प्रेम, लाड़-प्यार और दुलार किसी अपनों से कम नहीं था. यहां आकर अनिरूद्ध को एक और बात समझ नहीं आती थी कि वह अवस्थीजी के बेटे से मुक्कू का बेटा कैसे बन जाता है. धीरे-धीरे जब वह और थोड़ा बड़ा हुआ, तो उसे समझ आने लगा कि ननिहाल ही एक मात्र ऐसा स्थान है, जहां किसी भी बच्चे को उसकी मां के नाम से जाना जाता है, वरना दुनिया के किसी भी कोने में हर बच्चा अपने पिता के नाम से ही पहचाना जाता है.
आज भी अनिरूद्ध अपनी नानी की लोरिया, स्नेह व स्पर्श आंखें बंद करके महसूस कर सकता था. अनिरूद्ध की मां अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी, जिसकी वजह से उसकी नानी ने अपने जीते जी अपनी सारी संपत्ति, वैसे तो नानी के पास ज़्यादा कुछ था नहीं, लेकिन जो कुछ भी था उन्होंने सब अपने घर के साथ अनिरूद्ध के नाम कर दिया था. जब तक नानी जीवित रही अनिरूद्ध अपनी मां के संग रायपुर जाया करता था, किन्तु नानी के आंखें मूंदते ही मां का रायपुर जाना बंद हो गया और अनिरूद्ध का भी. समय बीतता गया और फिर एक दिन मां और पापा ने भी जीवन का डोर छोड़ दिया. इन्हीं सब ख़्यालों में खोया अनिरूद्ध का पूरा दिन निकल गया.
दूसरे दिन भी अनिरूद्ध अपने विचारों के भंवर जाल में कुछ इसी तरह से ही फंसा रहा और यूं ही दो दिन बीत गए. दो दिनों के पश्चात जब अनिरूद्ध एस्टेट एजेंट मिस्टर बजाज से मिलकर अपनी नानी के घर का सौदा करने रायपुर पहुंचा और जैसे ही वह रेलवे स्टेशन से बाहर निकला, लोगों की भीड़ ने उसका ध्यान बरबस ही अपनी ओर खींच लिया. आख़िर मामला क्या है यह जानने के लिए अनिरूद्ध उत्सुकतावश भीड़ की ओर बढ़ गया. भीड़ के क़रीब पहुंच कर उसने देखा एक अर्धमूर्छित महिला मैले-कुचैले चिथड़े में लिपटी स्वल्पाहार की दुकान के सामने से हटने का नाम नहीं ले रही है. दुकानदार और वहां पर मौजूद लोग उसे वहां से खदेड़ने का प्रयास कर रहे हैं.
उस महिला को देख कर ऐसा लग रहा था कि शायद वह कोई भिखारिन है और भूखी भी है, जो संभवतः क‌ई दिनों से कुछ खाई भी नहीं है शायद, इसलिए वह उस दुकान के सामने से हट भी नहीं रही थी. अनिरूद्ध ने जब उस महिला को गौर से देखा, तो वह सन्न रह गया. उसकी आंखें झिलमिला गई. उसे पहचानना मुश्किल था, लेकिन अनिरूद्ध के स्मृति पटल में इस महिला की अमिट छवि आज भी सजीव थी, यह महिला कोई और नहीं विशाखा मामी थी. उनकी इस दुर्दशा पर अनिरूद्ध हैरान था. उसने मिस्टर बजाज से मिलना स्थगित कर दिया.
अनिरूद्ध ने फिर विशाखा मामी को वहीं सामने की दुकान से खाने का कुछ सामान लेकर खिलाया और सीधे उन्हें लेकर स्थानीय हॉस्पिटल पहुंचा, क्योंकि विशाखा मामी की हालत काफ़ी ख़राब थी और वह अनिरूद्ध को पहचान भी नहीं रही थी. डॉक्टर ने बताया की उनकी यह हालत सदमे की वजह से है, जो समय के साथ ठीक हो जाएगा, लेकिन कम से कम पंद्रह दिनों के लिए उन्हें हॉस्पिटल में रखना होगा.


यह भी पढ़ें: स्पिरिचुअल पैरेंटिंग: आज के मॉडर्न पैरेंट्स ऐसे बना सकते हैं अपने बच्चों को उत्तम संतान (How Modern Parents Can Connect With The Concept Of Spiritual Parenting)

विशाखा मामी को हॉस्पिटल में भर्ती कराने के उपरांत जब अनिरूद्ध ने उनके इस दुर्दशा का कारण मालूम किया, तो पता चला कि उनके दोनों बेटों ने उनका घर बेच दिया है और रुपयों को आपस में बांट, उन्हें यहां अकेला छोड़कर भाग गए हैं. तब से विशाखाजी बेसहारा यहां-वहां भटक रही हैं.
मुंहबोली ही सही पर विशाखाजी अनिरूद्ध की मामी थी, जिन्होंने उसे अपनों से बढ़कर स्नेह दिया था. अनिरूद्ध उन्हें इस तरह बेसहारा अकेला छोड़ कर नहीं जा सकता था, इसलिए उसने मिस्टर बजाज से मिलकर यह निर्णय लिया कि वह अपने नानी का घर नहीं बेचेगा, बल्कि उसे एक न‌ए घर का स्वरूप देगा और उस घर का नाम होगा ‘रैनबसेरा’ जिसमें विशाखाजी की तरह बेबस, बेसहारा और अपनों से ठुकराए लोग उसमें आसरा पा सकेंगे.
पंद्रह दिनों बाद जब अनिरूद्ध हॉस्पिटल पहुंचा और उसने विशाखाजी को रैनबसेरा के बारे में बताया, तो वह बहुत प्रसन्न हुईं, लेकिन जब अनिरूद्ध ने उन्हें अपने संग भोपाल चलने का आग्रह किया, तो उन्होंने यह कहकर इंकार कर दिया, “अनु बेटा, मुझे यही रैनबसेरा में ही रहने दे. मैं यही रहना चाहती हूं. यहां रह कर मैं अपने जैसे लोगों का दर्द बांटना चाहती हूं.”
विशाखाजी का मान रखते हुए अनिरूद्ध उनकी बात मान गया और अपनी नानी का मकान जो अब बेबस, बेसहारा लोगों का रैनबसेरा था की बागडोर अपनी मामी विशाखाजी को देकर प्रसन्नचित्त मन से भोपाल लौट आया.

प्रेमलता यदु

अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES

अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ानेवाले हिंदी के अध्यापक बुद्धिलाल जी क्लॉस में छात्रों को शिक्षा दे रहे हैं- हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, आओ इसे विश्वभाषा बनाएं. रमेश, गेट आउट फ्रॉम द क्लास. नींद आ रही है, सुबह ब्रेकफास्ट नहीं लिया था क्या. यू आर फायर्ड फ्रॉम द क्लॉस.. नॉनसेंस!.. (अंग्रेज़ी बेताल बनकर हिंदी की पीठ पर सवार है)







अपने देश की राष्ट्रभाषा हिंदी है, इसका पता दो दिन पहले मुझे तब लगा, जब मै अपने बैंक गया था. आत्मनिर्भर होने के एक कुपोषित प्रयास में मुझे अकाउंट से तीन सौ रुपया निकालना था. बैंक के गेट पर ही मुझे पता चल गया कि देश की राष्ट्रभाषा हिंदी है. गेट पर एक बैनर लगा था- हिंदी में काम करना बहुत आसान! हिंदी में खाते का संचालन बहुत आसान है! हिंदी अपनाएं ! हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है!

      अंदर सारा काम अंग्रेज़ी में चल रहा था. मैंने मैडम को विदड्रॉल फॉर्म देते हुए कहा, “सो सॉरी, मैंने अंग्रेज़ी में भर दिया है!” उन्होंने घबरा कर विदड्रॉल फॉर्म को उलट-पलट कर देखा, फिर मुस्कुराकर बोली, “थैंक्स गॉड! मैंने समझा हिंदी में हैै. दरअसल वो क्या है कि माई हिंदी इज सो वीक.”

“लेकिन बैंक तो हिंदी पखवाड़ा मना रहा है?”

 “तो क्या हुआ. सिगरेट के पैकेट पर भी लिखा होता है-स्मोकिंग इज़ इंजरस टू हेल्थ.. लेकिन लोग पीते है ना.” 

लॉजिक समझ में आ चुका था. सरकारी बाबू लोग अंग्रेज़ी को सिगरेट समझ कर पी रहे थे, जिगर मा बड़ी आग है… ये आग भी नासपीटी इंसान का पीछा नहीं छोड़ती. शादी से पहले इश्क़ के आग में जिगर जलता है और शादी के बाद ज़िंदगीभर धुंआ देता रहता है. अमीर की आंख हो या गरीब की आंत, हर जगह आग का असर है. सबसे ज़्यादा सुशील, सहृदय और सज्जन समझा जानेवाला साहित्यकार भी आग लिए बैठा है. लेखक को इस हक़ीक़त का पता था, तभी उसने गाना लिखा था- बीड़ी जलइले जिगर से पिया, जिगर मा बड़ी आग है… आजकल जिगर की इस आग को थूकने की बेहतरीन जगह है- सोशल मीडिया (कुछ ने तो बाकायदा सोशल मीडिया को टाॅयलेट ही समझ लिया है, कुछ भी कर देते हैं) साहित्यकार और सरकारी संस्थान न हों, तो कभी न पता चले कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है. वो बैनर न लगाएं, तो हमें कभी पता न चले कि अंग्रेज़ी द्वारा सज़ा काट रही हिंदी को पैरोल पर बाहर लाने का महीना आ गया है.

         अंग्रेज़ी अजगर की तरह हिंदी को धीरे-धीरे निगल रही है और सरकार राष्ट्रभाषा के लिए साल का एक महीना (सितंबर) देकर आश्वस्त है. देश में शायद ही कोई एक विभाग होगा, जिसका सारा काम अंग्रेज़ी के बगैर हो रहा हो, मगर ऐसे हज़ारों महकमे हैं, जो हिंदी के बगैर डकार मार रहे हैं. सितंबर आते ही ऐसे संस्थान विभाग को आदेश जारी करते हैं- बिल्डिंग के आगे-पीछे ‘हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है’ का बैनर लगवा दो. एक महीने की तो बात है. हंसते-हंसते कट जाए रस्ते, यू नो…

      सितंबर की बयार आते ही मरणासन्न हिंदी साहित्यकार का ऑक्सीजन लेवल नॉर्मल हो जाता है. कवि कोरोना पर लिखी अपनी नई कविता गुनगुनाने लगता है- तुम पास आए, कवि सम्मेलन गंवाए, अब तो मेरा दिल, हंसता न रोता है.. आटे का कनस्तर देख कुछ कुछ होता है…

मुहल्ले का एक और कवि छत पर खड़ा अपनी नई कविता का ताना-बाना बुन ही रहा था कि सामने की छत पर सूख रहे कपड़ों को उतारने के लिए एक युवती नज़र आई. बस उसकी कविता की दिशा और दशा संक्रमित हो गई. अब थीम में कोरोना भी था और कामिनी भी. इस सिचुएशन में निकली कविता में दोनों का छायावाद टपक रहा था- कहां चल दिए इधर तो आओ, पहली डोज का मारा हूं मैं, अगली डोज भी देकर जाओ…

      अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ानेवाले हिंदी के अध्यापक बुद्धिलाल जी क्लॉस में छात्रों को शिक्षा दे रहे हैं- हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, आओ इसे विश्वभाषा बनाएं. रमेश, गेट आउट फ्रॉम द क्लास. नींद आ रही है, सुबह ब्रेकफास्ट नहीं लिया था क्या. यू आर फायर्ड फ्रॉम द क्लॉस.. नॉनसेंस!.. (अंग्रेज़ी बेताल बनकर हिंदी की पीठ पर सवार है)

           राष्ट्रभाषा हिंदी का ज़िक्र चल रहा है. सरकारी प्रतिष्ठान जिस हिंदी के प्रचार प्रसार की मलाई सालों साल चाटते हैं, उन में ज़्यादातर परिवारों के बच्चे अंग्रेज़ी मीडियम स्कूल में पढ़ते हैं. हिंदी को व्यापक पैमाने पर रोटी-रोज़ी का विकल्प बनाने की कंक्रीट योजना का अभाव है. लिहाज़ा हिंदीभाषी ही सबसे ज़्यादा पीड़ित हैं. सरकारी प्रतिष्ठान सितंबर में हिंदी पखवाड़ा मना कर बैनर वापस आलमारी में रख देते हैं. अगले साल सितंबर में वृद्धाश्रम से दुबारा लाएंगे.

     ऐ हिंदी! पंद्रह दिन बहुत हैं, ग्यारह महीने सब्र कर. अगले बरस तेरी चूनर को धानी कर देंगे…





     – सुलतान भारती






Satire Story

Photo Courtesy: Freepik

“अरे, नहीं मैडम क्यों चलें, आप तो यहां पर आराम से बैठो और अब कुछ देर में आपके शैक्षणिक योगदान पर आपका सम्मान होगा उसके बाद ही वापस चलेंगे.”
“पर वो..?” अभी तक घबरा रही थीं, बोलीं, “पर स्कूल में मीडिया.”

उनका कितना पुराना सपना सच हो गया था. आमंत्रण पत्र देखकर वो फूली न समा रहीं थीं. उनको शिक्षा-दीक्षा संस्थान ने एक वक्तव्य के लिए सादर आमंत्रित किया था. वो जानती थीं कि यहां से पूरी दुनिया मे समाचार जाएगा और उनका नाम होगा. तो वो नियत दिन, समय पर पहुंच गईं.
शहर के उस प्रतिष्ठित शैक्षिक मंच पर अपने गंभीर विचार रखकर प्राचार्या अपनी सीट पर बैठी ही थीं कि उनके स्टाफ से किसी ने पास आकर कान में कुछ कहा और वो सुनते ही एकदम विचलित हो गईं और उसके बाद वो माफी मांगकर कार्यक्रम स्थल से जल्दी बाहर आ गईं.
घबराते हुए वे बोलीं, “अरे, ये कैसे हो गया स्कूल में. मीडिया तक पहुंच गया. चतुर्थ श्रेणी तथा शिक्षकों मे इतनी बहस हो गई. उफ, ये क्या हुआ, चलो, अब तुरंत स्कूल चलो?”
“अरे, नहीं मैडम क्यों चलें, आप तो यहां पर आराम से बैठो और अब कुछ देर में आपके शैक्षणिक योगदान पर आपका सम्मान होगा उसके बाद ही वापस चलेंगे.”

यह भी पढ़ें: 10 बुरी आदतें बिगाड़ सकती हैं आपका करियर (10 Negative Work Habits That Can Ruin Your Career)

“पर वो..?” अभी तक घबरा रही थीं, बोलीं, “पर स्कूल में मीडिया.”
“अरे, मैम वो तो प्रयोगशाला में तीन शिक्षकों को कई बार मांगने पर भी पीने का पानी नहीं पहुंचाया गया और इसी बात पर झड़प हो गई.”
“आप आराम से बैठो. आप पर कोई आंच नहीं आएगी. मैंने स्कूल के प्रबंधन दल में सबको सूचना दे दी है.”
वो जैसे तनावमुक्त ही हो गईं.
“अच्छा! ओह तो ये मामला है, चलो जाने दो मैं भीतर जा रही हूं. विचारों का आदान-प्रदान चल रहा है.” यह कहकर वो पुनः अपनी कुर्सी पर विराजमान हो गईं.


अब कुछ देर बाद उनका नाम पुकारा जाने वाला था. यह सम्मान दर्जनों चैनल दिखानेवाले हैं. यह विचार उन्हें रोमांचित कर रहा था.
अब वो अपने आप से कहने लगीं कि ‘मैं तो बेकार ही घबरा गई थी…’ दरअसल, उन्हें लगा कि कहीं उनकी पोल न खुल गई हो कि वो चतुर्थ श्रेणी स्टाफ से निजी काम कराती हैं, जैसे- सिलिंडर लाना, कपड़े ड्राइक्लीन कराना, राशन की खरीद आदि. पर अब वो बिलकुल चिंतामुक्त थीं.

– पूनम पांडे


यह भी पढ़ें: उत्तम संतान के लिए माता-पिता करें इन मंत्रों का जाप (Chanting Of These Mantras Can Make Your Child Intelligent And Spiritual)

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

एक व्यक्ति नदी में नहा रहा था कि उसने एक बिच्छू को नदी में डूबते देखा. बिच्छू को बचाने के लिए उसने फ़ौरन बिच्छू के नीचे अपनी हथेली रख दी और उसे किनारे पर ले जाने लगा कि बिच्छू ने उसे ज़ोर का डंक मारा और इस झटके से फिर पानी में जा गिरा.
व्यक्ति ने उसे एक बार फिर उठाकर बचाने का प्रयत्न किया और बिच्छू ने एक बार फिर डंक मारा.
नदी किनारे खड़ा एक अन्य व्यक्ति यह सब देख रहा था. दो-तीन बार जब ऐसा हो चुका, तो उसने पहले व्यक्ति से कहा, “जब वह तुम्हें बार-बार काट रहा है, तो तुम क्यों उसे बचाने पर तुले हो?”


यह भी पढ़ें: विचारों से आती है ख़ूबसूरती (Vicharon Se Aati Hai KHoobsurati)

इस पर पहले वाले व्यक्ति ने उत्तर दिया, “जब वह बिच्छू होकर अपना कर्म नहीं छोड़ रहा, तो मैं मनुष्य होकर अपना धर्म कैसे छोड़ दूं? उसका कर्म है ‘काटना’ वह अपने बचाव के लिए काटता है. मनुष्य होने के नाते मेरा धर्म है ईश्वर द्वारा बनाए अन्य प्राणियों की रक्षा करना.”
यह कहकर उसने किनारे पड़ी पेड़ की एक डंडी उठाई और उसके सहारे बिच्छू को उठाकर किनारे पर रख दिया.

Kahaniya

Usha Wadva
उषा वधवा

Photo Courtesy: Freepik

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

सब्जेक्ट और माइंड दोनों सेट हैं. इसके बाद तो बुद्धि या विवेक को पास भी नहीं फटकने देते. अब योद्धा अपना ज्ञान उड़ेलता है, जिसे फौरन पंद्रह सौ लाइक और ९९९ कमेंट से बघार दिया जाता है (इतने योद्धा हर वक़्त कुरुक्षेत्र में मौजूद रहते हैं). इतना बुद्धि वैभव आते ही पैदल योद्धा ख़ुद को ऐरावत पर बैठा महसूस करता है.

अगर आप का मन लड़ने के लिए उतावला है और लॉकडाउन के चलते आप बाहर नहीं निकल पा रहे हैं, तो कोई बात नही. घर में फोन है ना. स्मार्ट फोन है जहां, हल्दी घाटी है वहां… योद्धा ही योद्धा… एक बार (फेसबुक में) घुस तो लें. सोशल मीडिया पर एक से एक महारथी चक्रव्यूह उठाए खडे हैं. बस उनके पोस्ट में एक बार नत्थी हो जाइए, फिर तो आपका शुद्धिकरण करके दम लेंगे. फेसबुक पर अनगिनत अक्षोहिणी सेनाएं (ग्रुप) मौजूद हैं, किसी में भी नत्थी हो जाइए. ऐसी पैदल सेना है, जिसमें ज़्यादातर अक्ल से पैदल हैं. ऐसे धर्म योद्धा हैं, जिनकी अक्ल ऑड-इवन के हिसाब से चलती है.
आजकल अनुकूल बयार पाकर इनके संस्कार का ऑक्सीजन लेवल सौ से ऊपर जा रहा है. संप्रदाय विशेष के बारे में इतनी रिसर्च पूर्ण जानकारी फेस बुक पर उड़लेते हैं कि इतिहासकार गश खाकर गिर जाए. यहां पर अपील, साक्ष्य, तर्क या प्रमाण का कोई विकल्प नहीं है. अब अगर विरोधी खेमें के किसी बुद्धिजीवी के ज्ञान में उबाल आ गया और उसने साक्ष्य मांग लिया तो बस… इस अक्षम्य अपराध के एवज में सैकड़ों ततैया बुद्धि वैभव लेकर टूट पड़ते हैं और आपत्ति दर्ज़ करानेवाले को अंतत: देशद्रोही साबित कर दिया जाता है.
सोशल मीडिया के कुछ विद्वान तो व्हाट्स ऐप और फेसबुक को सार्वजनिक शौचालय समझ बैठे है. बहस करो तो अक्ल का लोटा फेंक कर मारते हैं. घमासान जारी है, कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं. इस देवासुर संग्राम में बहुधा बुद्धिजीवी ही परास्त और अपमानित होता है. अनन्त योद्धा हैं और ब्रह्मांड तक फैला युद्धक्षेत्र. अक्ल के घोड़े दौड़ रहे हैं और घुड़सवार ख़ुद अक्ल से पैदल है. यहां युद्धविराम मना है. पूरी-पूरी रात योद्धा इतिहास खोदते रहते हैं. सुबह को जब दुनिया जाग कर काम में लगी होती है, तो ये योद्धा नींद में चरित्र निर्माण का अगला अध्याय ढूंढ़ रहे होते हैं. जागते ही सोशल मीडिया अकाउंट चेक करते हैं कि कहीं कोई हिरण्यकश्यप नत्थी हुआ या सारा अकाउंट अभी भी सात्विक है.
सब्जेक्ट और माइंड दोनों सेट हैं. इसके बाद तो बुद्धि या विवेक को पास भी नहीं फटकने देते. अब योद्धा अपना ज्ञान उड़ेलता है, जिसे फौरन पंद्रह सौ लाइक और ९९९ कमेंट से बघार दिया जाता है (इतने योद्धा हर वक़्त कुरुक्षेत्र में मौजूद रहते हैं). इतना बुद्धि वैभव आते ही पैदल योद्धा ख़ुद को ऐरावत पर बैठा महसूस करता है. कॉमेंट की सूक्ष्म जांच में विरोधी खेमे का देशद्रोही बरामद होते ही पांडव सेना जय श्री राम के उदगार के साथ दिन का पहला यलगार शुरू कर देती है. यहीं से संस्कार का माॅनसून शूरू हो जाता है.
ये विद्वता का निर्द्वंद मैराथन है, जहां प्रतिद्वंदी की टांग खींचने और गाली देने पर कोई पाबंदी नहीं है. सुविधा ये है कि प्रतिद्वंदी फेसबुक पर है फेस टू फेस नहीं. यह बेलगाम प्रतिभा का ऐसा अभयारण्य है, जहां द्रोण और एकलव्य दोनों का विवेक धर्म से संक्रमित है (एकलव्य की दलित विनम्रता ने उसे क्या दिया सिर्फ़ विकलांगता) महाभारत काल में कौरव खेमें में मीडिया की सुविधा के नाम पर सिर्फ़ संजय उपलब्ध थे. उनके पोस्ट का बेनिफिट सिर्फ़ दृष्टिहीन धृतराष्ट्र को था. संजय के ज्ञान को चुनौती गांधारी भी नहीं दे सकती थी, उसने ख़ुद ही आंख पर पट्टी बांध ली थी.
अब दोबारा सोशल मीडिया पर द्वापर लौट आया है. दिव्य ज्ञान से लैस तमाम संजय ज्ञानोपदेश में लगे हैं. धृतराष्ट्र झुंड के झुंड लाइक और कमेंट कर रहे हैं. ऐसे में अगर किसी ने बीच में पांडव बनने का प्रयास किया, तो उसके लिए लाक्षागृह तैयार है.
पिछले पखवाड़े फेसबुक पर हमारे दो मित्र इसी खाड़ी युद्ध में उलझ गए. पत्रकारिता और समाज सेवा को समर्पित दोनों महामानव सोशल मीडिया पर गुथ गए. कोई ग़लती मानने को राजी नहीं. दोनों अपने-अपने बायोडाटा से एक-दूसरे को दो दिन तक धमकाते रहे, पर शिमला समझैता हो न सका. कुछ बुद्धिजीवियों ने सुलह वाली पोस्ट डाली, तो कुछ ने पेट्रोल उड़ेला. तीसरे दिन दोनों फोन पर भिड़ गए. अब दो बुद्धिजीवी लंबे वक़्त के लिए विरोधी हो चुके हैं और ये सब हुआ दिल्ली में अगले साल होनेवाले नगर निगम चुनाव के ऊपर. इसी को कहते हैं- सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम लट्ठा… योद्धा तैयार हैं…
कोरोना ने हाय राम बडा दुख दीन्हा. काम धाम कुछ है नहीं. समय बिताने के लिए सोशल मीडिया पर जाता हूं, तो वहां फेसबुक वॉल पर ततैया छितराए बैठे हैं. कुछ मित्र सिर्फ़ इसलिए नाराज़ हैं कि मैं उनकी अद्वितीय रचनाओं पर मनभावन कमेंट नहीं करता. कई महामानव ऐसे हैं, जिन्हें सिर्फ़ नारियों की पोस्ट में विद्वता का छायावाद नज़र आता है. कुछ मित्रों ने अकारण ख़ुद को वरिष्ठ साहित्यकार मान लिया है और अपना लोहा मनवाने के लिए रोज़ पोस्ट का अश्वमेध यज्ञवाला घोड़ा छोड़ते हैं. समझदार और सहिष्णु लोग लाइक करके मुख्यधारा में बने रहते हैं. तर्क और विवेकवाले विरोध करते हैं और अगली सुबह मित्र सूची से सस्पेंड कर दिए जाते हैं. चलो रे डोली उठाओ कहांर… सोशल मीडिया तू ना गई मेरे मन से…

सुलतान भारती


यह भी पढ़ें: व्यंग्य- डाॅगी कल्चर (Satire Story- Doggy Culture)

गांव के कुत्ते और शहर के डॉगी में वही फ़र्क होता है, जो खिचड़ी और पिज़्ज़ा में होता है. कुत्ता ऊपरवाले के भरोसे जीता है, इसलिए किसी कुत्ते को कोरोना नहीं होता. डॉगी को पूरे साल घर में रहने की क़ीमत चुकानी पड़ती है. कुत्ता हर संदिग्ध पर भौंकता है, जबकि डॉगी चोर और मालिक की सास के अलावा हर किसी पर भौंकता है.

माफ़ करना मै किसी का अपमान नहीं कर रहा हूं (मैं कुत्तों का बहुत सम्मान करता हूं). मैं कुत्तों के मामले में दख़ल नहीं देता. कुत्ते इंसान के मुआमलों में बिल्कुल दख़ल नहीं देते. लेकिन दोनों की फिजिक और फ़ितरत में भी बहुत फ़र्क है (आदमी कुत्ते जैसा वफ़ादार नहीं होता). लोग कहते हैं- तुख्म तासीर सोहबते असर! मगर कुत्ता पाल कर भी इंसान के अंदर कुत्तेवाली वफ़ादारी नहीं आती. चचा डार्विन से पूछना था कि जब बंदर अपनी पूंछ खोकर इंसान हो रहे थे, तो कुत्ते कहां सोए हुए थे? या फिर इंसान होना कुत्ते अपना अपमान समझ रहे थे.
कुत्तों से मेरा बहुत पुराना याराना रहा है. दस साल की उम्र में मुझे मेरे ही पालतू कुत्ते ने काट खाया था (मगर तब कुत्ता तो क्या नेता के काटने पर भी रेबीज़ का ख़तरा नहीं था). मुझे आज भी याद है कि कुत्ते ने मुझे क्यों काटा था. झब्बू एक खुद्दार कुत्ता था, जो अपने सिर पर किसी का पैर रखना बर्दाश्त नहीं करता था और उस दिन मैंने यही अपराध किया था. झब्बू ने मेरे दाएं पैर में काट खाया था. तब टेटनस और रेबीज़ दोनों का एक ही इलाज था, आग में तपी हुई हंसिया से घाव को दागना (इस इलाज़ के बाद टिटनस और रेबीज़ उस गांव की तरफ़ झांकते भी नहीं थे). ये दिव्य हंसिया ऑल इन वन हुआ करती थी, फसल और टिटनस के अलावा नवजात शिशुओं की गर्भनाल काटने में काम आती थी.
मुझे आज भी याद है कि जब गर्म दहकती से मेरा इलाज़ हो रहा था, तो मेरे कुत्ते की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. वो ख़ुशी से अपनी पूंछ दाएं-बाएं हिला रहा था. दूसरी बार कुत्ते ने मझे पच्चीस साल की उम्र में तब काटा, जब मैं दिल्ली में था. उस दिन कुछ आवारा कुत्ते सड़क किनारे भौं-भौं कर आपस में डिस्कस कर रहे थे. ऐसी सिचुएशन में समझदार और संस्कारी लोग कुत्तों के मुंह नहीं लगते. मगर मैं गांव का अक्खड़ खामखाह उनकी पंचायत में सरपंच बनने चला गया. उन्होंने मुझे दौड़ा लिया. छे कुत्ते अकेला मै. एक कुत्ते ने दौड़कर पैंट का पाएंचा फाड़ा और पिंडली में काट खाया, मगर इस बार भी मैंने रेबीज़ का इंजेक्शन नहीं लगवाया (आदमी हूं, मुझे दिल्ली के प्रदूषण और अपने ज़हर पर भरोसा था).

Kahaniya


कुत्तों के काटने की दोनों घटनाएं सच हैं. मैंने कुत्तों पर बड़ी रिसर्च की है. हम इंसान गहन छानबीन के बाद भी किसी इंसान की पूरी फ़ितरत नहीं जान पाते. कुत्ते इंसान को सूंघकर ही उसका बायोडाटा जान लेते हैं. आपने कई बार देखा होगा कि स्मैकिए और पुलिसवालों को देखते ही कुत्ते भौंकने लगते है. वहीं पत्नी पीड़ित पति, रिटायर्ड मास्टर और हिंदी के लेखकों को देखते ही कुत्ते पूंछ हिलाने लगते हैं, गोया दिलासा दे रहे हों- रूक जाना नहीं तुम कहीं हार के बाबाजी- हम होंगे कामयाब एक दिन…
गांव के कुत्ते और शहर के डॉगी में वही फ़र्क होता है, जो खिचड़ी और पिज़्ज़ा में होता है. कुत्ता ऊपरवाले के भरोसे जीता है, इसलिए किसी कुत्ते को कोरोना नहीं होता. डॉगी को पूरे साल घर में रहने की क़ीमत चुकानी पड़ती है. कुत्ता हर संदिग्ध पर भौंकता है, जबकि डॉगी चोर और मालिक की सास के अलावा हर किसी पर भौंकता है. डॉगी को सबसे ज़्यादा एलर्जी इलाके के कुत्तों से होती है, जो उसे खुले में रगड़कर सबक देने की घात में होते हैं. कुत्ते जेब नहीं काटते और भूखे होने पर भी चोरी नहीं करते. कुत्ते और भिखारी में आदमी से ज़्यादा पेशेंस होता है.

Kahaniya


१८ साल दिल्ली के गोल मार्केट में रहा. यहां मुझे एक जीनियस कुत्ता मिला, जिसे कॉलोनी के चौकीदार ने पाला हुआ था. वो जब भी मुझे देखता, दोस्ताना तरीक़े से पूंछ भी हिलाता और हल्के-हल्के गुर्राता भी. उसके दोहरे चरित्र से मैं चार साल कन्फ्यूज़ रहा. चौकीदार अक्सर रात में दारू पीकर कुत्ते को समझाता, “देख, कभी दारू मत पीना. इसे पीनेवाला बहुत दिनों तक बीबी के लायक नहीं रहता.” कुत्ता पूरी गंभीरता से पूंछ हिलाकर चौकीदार का समर्थन कर रहा था. पी लेने के बाद चौकीदार अपने कुत्ते पर रौब भी मारता था. एक दिन डेढ़ बजे रात को जब मैं एक लेख कंप्लीट कर रहा था, तो फ्लैट के नीचे नशे में चूर चौकीदार कुत्ते पर रौब मार रहा था, “पता है, परसों रात में मेरे सामने शेर आ गया. मैंने उसका कान पकड़ कर ऐंठ दिया था. वो पें पें… करता भाग गया. डरपोक कहीं का.” जवाब में कुत्ता ज़ोर से भौंका, गोया कह रहा हो, ‘साले नशेड़ी, वो मेरा कान था. अभी तक ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है!’
कई सालों से मुझे ऐसा लगता है गोया मैं कुत्तों की भाषा समझता हूं. इस दिव्य विशेषता के बारे में मैंने किसी दोस्त को इस डर से नहीं बताया कि लोग मिलना-जुलना बंद कर देंगे. शाहीन बाग में नॉनवेज होटल और ढाबे बहुत हैं. यहां के कुत्ते भी आत्मनिर्भर नज़र आते हैं. एक दिन घर के नीचे बैठे एक दीन-हीन कुत्ते को मैं रोटी देने गया. कुत्ते ने मेरा मन रखने के लिए रोटी को सूंघा और मुझे देखकर गुर्राया. मैं समझ गया, वह कह रहा था, “खुद चिकन गटक कर आया है और मुझे नीट रोटी दे रहा है. मैं आज भी फेंकी हुई रोटी (बोटी के बगैर) नहीं उठाता…”
मैं घबरा कर वापस आ गया.

सुलतान भारती

Kahaniya

Photo Courtesy: Freepik


यह भी पढ़ें: व्यंग्य- डाॅगी कल्चर (Satire Story- Doggy Culture)

एक गांव में एक मेहनती और साधारण व्यापारी रहता था. उसके पास एक गधा था. व्यापारी अपने गधे से बहुत प्यार करता था और गधा भी अपने मालिक से प्यार करता था. व्यापारी काफ़ी दयालु और अच्छा इंसान था. लेकिन उसका गधा बेहद आलसी और कामचोर था. उसे सिर्फ खाना और आराम पंसद था. वो व्यापारी रोज़ सुबह अपना सामान गधे पर रखकर बाज़ार ले जाता और शाम को बचा हुआ सामान वापस ले आता, लेकिन गधे को काम करना बिल्कुल पसंद नहीं था.

वो व्यापारी हमेशा अलग-अलग चीज़ें बाज़ार में बेचने के लिए ले जाता था. एक दिन व्यापारी को पता चला कि बाज़ार में नमक की बहुत ज़्यादा मांग है और फ़िलहाल नमक का व्यापार करने में अधिक फायदा है, तो व्यापारी ने निर्णय लिया कि अब वो नमक ही बेचेगा.

Panchatantra Tales
Photo Credit: YouTube

व्यापारी ने अगले दिन गधे की पीठ पर नमक की बोरियां लादी और बाज़ार की तरफ चल पड़ा. नमक की बोरियां बहुत भारी थीं, जिससे गधे को चलने में परेशानी हो रही थी, लेकिन किसी तरह गधा नमक की बोरियां लेकर आधे रास्ते तक आ गया.

बाज़ार जाने के रास्ते में ही बीच में एक नदी पड़ती थी, जिस पर पुल बना हुआ था, गधा जैसे ही नदी पार करने के लिए उस पुल पर चढ़ा तो लड़खड़ाकर सीधे नदी में जा गिरा. व्यापारी बहुत घबरा गया और उसने जल्दी से गधे को नदी से किसी तरह बाहर निकाला. जब गधा नदी से बाहर आया, तो उसे महसूस हुआ कि पीठ पर लदी बोरियां हल्की हो गई हैं. क्योंकि उन बोरियों में से ज्यादातर नमक पानी में घुल चुका था.

Panchatantra Ki Kahani
Photo Credit: YouTube

आलसी गधे को अब अपना वज़न कम करने की तरकीब सूझ गई. वह अब रोज़ नदी में जानबूझकर गिरने लगा. जिससे नमक नदी के पानी में घुल जाता और बोरियों का भार हल्का हो जाता. लेकिन गधे की इस हरकत से व्यापारी को नुकसान उठाना पड़ रहा था. व्यापारी गधे की इस चालाकी को समझ गया. व्यापारी ने सोचा कि इस गधे को सबक़ सिखाना ही पड़ेगा.

व्यापारी ने एक तरकीब निकाली और अगले दिन गधे पर रूई की बोरियां लाद दीं और बाज़ार की तरफ चलने लगा. जब गधा पुल पर पहुंचा, तो वह फिर से जानबूझकर पानी में गिर गया, लेकिन पानी में गिरने के कारण रूई में पानी भर गया और बोरियों का वज़न पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गया था. पीठ पर लदे वज़न के कारण गधे को बहुत ज़्यादा परेशानी होने लगी. अगले दो-तीन दिनों तक गधा जब भी पानी में गिरता तो उसपर लादा हुआ वज़न दोगुना हो जाता. आखिरकार गधे ने हार मान ली और अब वो चुपचाप बिना पानी में गिरे ही पुल पार करने लगा.

Panchatantra Ki Kahani
Photo Credit: YouTube

उसके बाद से व्यापारी जब गधे को लेकर बाज़ार जाने लगा तो गधा चुपचाल बिना नदी में गिरे पुल पार कर लेता. इतना ही नहीं, उसके बाद से गधे ने कभी भी वज़न लादने में आलस नहीं दिखाया. गधे का आलसीपन ख़त्म हो गया था और धीरे-धीरे व्यापारी के सारे नुकसान की भी भरपाई होने लगी.

सीख: इस कहानी से सीख मिलती है कि कभी भी अपने काम से जी नहीं चुराना चाहिए. कर्तव्य का पालन करने में आलस नही करना चाहिए. साथ ही व्यापारी की तरह समझ और सूझ-बूझ से यह सबक़ मिलता है कि अपनी बुद्धि और सूझबूझ से किसी भी काम को आसानी से किया जा सकता है और विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बनाया जा सकता है.

यह भी पढ़ें: अकबर-बीरबल की कहानी: जादुई गधा! 

तुम समझती क्यूं नहीं, मैं आधुनिक युग के डाॅगी कल्चर की बातें कर रहा हूं. जहां यह डाॅगी भी घर के फैमिली मेंबर की तरह रहते हैं. जो अपने यहां के सर्वहारा कुत्तों की तरह होमलेस नहीं होते हैं. यहां के डाॅगी हमारे यहां के देसी कुत्तों की तरह बदतमीज़ और बददिमाग़ भी नहीं होते कि किसी को नए फैशन के या अलग डिज़ाइन के कपड़ों में भी देख लें, तो भौंक-भौंक कर उसका हाल बेहाल कर दें.

सिंगापुर के सन्टोसा के समुद्रतट पर शर्माजी अपनी पत्नी के साथ पहुंचे, तो वहां छुट्टी का दिन होने के कारण अच्छी-ख़ासी भीड़ थी. सिंगापुर में रहनेवाले यूरोपियन और विदेशी लोग अपने-अपने परिवार, जिसमें कुत्ते भी शामिल थे, सब एक साथ मिलजुल कर स्नान कर रहे थे. शर्माजी वहीं बैठ पानी में स्नान करती बालाओं के साथ, स्नान करते कुत्ते को देखने में ऐसे व्यस्त थे कि होश ही नहीं रहा कि उनकी नज़रों की हरकतें, बगल में बैठी पत्नी के दिमाग़ पर कुछ ऐसा असर डाल रहा था कि वह कभी भी करारी चोट कर सकती थी. पत्नी के मूड का पता चलते ही उनका तनावरहीत दृश्याअवलोकन, तनावपूर्ण हो गया. वह पत्नी की तरफ़ देखकर सूखी हंसी हंसते हुए बोले, ‘‘कैसे ऊन के गोले जैसे मुलायम बालोंवाले डॅागी यहां स्नान कर रहे हैं. जितने ही प्यारे-प्यारे डाॅगी है, उतने ही प्यार और अदा से उनकी मालकिन, उन्हे मुलायम तौलिया से सुखा भी रही है. जानवरों के प्रति अद्भूत प्रेम का ऐसा अनूठा उदाहरण देख मन तृप्त हो गया.’’
“वो तो मैं देख ही रही हूं कि किस कदर ऊन का गोला बनने को बेहाल हो. ऐसा प्यार तो कभी पटना में जानवरों के प्रति दिखा नहीं. घर आए चूहें, बिल्लियों और कुत्ते के पीछे लट्ठ लेकर ऐसे पड़े रहते हो, जैसे आंतकवादियों के पीछे हमारे देश के जवान लगे रहते हैं. अगर ग़लती से भी कोई जानवर तुम्हारे आसपास आ जाए, तो उसकी खैर नहीं. फिर यहां आकर अचानक यह पशु प्रेम कहां से उमड़ा? कही फिरंगी बालाओं का रंग तो नहीं चढ़ गया?’’
‘‘तुम महिलाओं की भी ग़ज़ब फ़ितरत होती है. किसी महिला पात्र के पक्ष में पति के मुंह से दो शब्द निकले नहीं कि उसका चरित्र ही संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर देती हो. तुम समझती क्यूं नहीं, मैं आधुनिक युग के डाॅगी कल्चर की बातें कर रहा हूं. जहां यह डाॅगी भी घर के फैमिली मेंबर की तरह रहते हैं. जो अपने यहां के सर्वहारा कुत्तों की तरह होमलेस नहीं होते हैं. यहां के डाॅगी हमारे यहां के देसी कुत्तों की तरह बदतमीज़ और बददिमाग़ भी नहीं होते कि किसी को नए फैशन के या अलग डिज़ाइन के कपड़ों में भी देख लें, तो भौंक-भौंक कर उसका हाल बेहाल कर दें. जिनका जीवन ही बिल्लियों और गिलहरियों पर भौंकने और एक अदद टाट के टुकड़े पर गुज़र जाती है, उनकी तुलना तुम इन विदेशी नस्ल के डाॅगी से कर रही हो.

Satire Story

इनका जीवन ही एसी में सोने और कार में घूमने से शुरू होता है. देख ही रही हो न, इन्हें कितने प्यारे-प्यारे नामों से बुलाया जा रहा है. कुछ डाॅगी ने तो कपड़े भी पहन रखे हैं और बच्चों की तरह. कई इन सुंदरियों के गोद में चिपके हुए हैं, तो कई कंधों पर लटके हुए हैं.”
‘‘इन चोंचलों से क्या होता है. कुत्ता तो कुता ही रहेगा, चाहे किसी देश का हो. यहां की फिरंगी बालाएं ख़ुद कपड़े पहनने से तो रहीं, कुत्ते को ही पहनाकर ख़ुश हो लेती हैं, यही बहुत है. जहां तक बच्चों का सवाल है, इनकी फ़ितरत ही नहीं होती है अपने बच्चे को गोद में बैठाने की, पर पशु प्रेम के नाम पर कुत्ते को ज़रूर गोद में बैठाएंगी.’’

यह भी पढ़ें: व्यंग्य- शादी का एल्बम (Satire Story- Shadi Ka Albam)

‘‘तुम्हे समझाना बेकार है. तुम्हे इन डॅागियों की जानकारी ही नहीं हैं, वरना इतने प्यारे-प्यारे नामों वाले इन डाॅगियों को कम से कम कुत्ता कहकर अपमानित नहीं करती.”
अब उनकी पत्नी का संयम जवाब देने लगा था, “अब लो सुनो इनकी बात… कुत्ता को कुता न कहूं, तो और क्या कहूं जी! जहां तक मेरी जानकारियों का सवाल है, उसे तो तुम चुनौती दो ही मत. क्योंकि तुम्हे शायद पता नहीं, जितना कुत्ता यहां बालाओं की गोद में नज़र आ रहा है, उससे दोगुने कुत्ते तो मेरे नाना आदित्य बाबू के घर के दरवाज़े पर बैठे नज़र आते थे.’’
‘‘भला वो क्यों? क्या तुम्हारे नानाजी, कुत्तों का व्यापार करते थे?’’
‘‘चुप करो, यह उनका पशु प्रेम था. वह आसपास रहने वाले उन सर्वहारा कुत्तों को बचाने के लिए बहुत काम करते थे. यहां तक की उनके लिए लंगर चलवाते थे, ताकि उन्हे घूरे पर अपना भोजन खोजना ना पड़े. उनके घर से पचास-पचास कोस तक लोग उनके कुत्ता प्रेम की चर्चा करते थे.’’
‘‘तब तो लोग अपने बच्चों को यह भी कहते होंगे कि सो जा, नहीं तो आदित्य बाबू के कुत्तें भौंकने लगेंगे.’’
‘‘जी नहीं ऐसा कुछ नहीं कहते थे. वह शुरू से ही बेज़ुबानों की देखभाल करते थे, इसलिए लोग उनका सम्मान करते थे. तुम मेरा मज़ाक उड़ाने की कोशिश मत करो, क्योंकि तुम्हारी अपनी ही सारी जानकारियां आधी-अधूरी है.’’
‘‘और तुम्हारी जानकारियां सिर्फ़ उन लावारिस और सर्वहारा देसी कुत्तों तक सीमित है.”
‘‘ख़बरदार जो मेरे नानाजी के कुत्तों को तुमने लावरिस और सर्वहारा कहा. तुम्हे पता भी है मेरे नानाजी जिस किसी भी कुत्ते को घर में पालते थे, वे सभी काफ़ी बढ़िया नस्ल के कुत्ते होते थे. पूरी तरह उच्चवर्गीय. उनकी धीमी गुर्राहट और सधी चाल में उच्चवर्गीय रोब देख, लोगो के पसीने छूट जाते थे. उनकी एक ख़ासियत और होती थी कि जैसा उनके पालनहार का स्वभाव होता, वही स्वभाव वे कुत्ते भी अपना लेते थे. वहां एक-दो कुत्ते नहीं थे. घर के ज़्यादातर सदस्यों ने अपनी-अपनी पसंद के हिसाब से अपने लिए कुत्ते पाल रखे थे.”
‘‘फिर भी तुम्हे मेरी जानकारियों पर संदेह है, तो तुम्हे बता दूं कि नानाजी ने ख़ास अपने लिए एक कुत्ता पाल रखा था शेरू. उसे उन्होंने नेपाल से मंगवाया था. उसकी शक्ल-सूरत तो नाम के अनुकूल ही था, पर स्वभाव पूरी तरह नानाजी पर था. नानाजी की तरह ही धीर-गंभीर शांत और कम बोलनेवाला. जब घर के बाहर आहाते में, घर के सारे कुत्ते, दुश्मन की आशंका पा, अपनी पूरी ताकत लगा भौंकते रहते, शेरू बरामदे में खड़ा-खड़ा सब का निरीक्षण करते रहता. फिर दो-चार बार भौंक कर उन्हे भौंकते रहने की प्रेरणा दे, वापस आकर नानाजी के आराम कुर्सी के नीचे बैठ जाता.”
‘‘उसका यह रवैया, छोटे नानाजी के कुत्ते बहादुर को पूरी तरह नापसंद होता. मौक़ा मिलते ही वह शेरू पर झपट पड़ता. छोटे नानाजी नानाजी के भाई लगते थे और उनके बिज़नेस में हाथ बंटाते थे. जितने वह ख़ुद ईर्ष्यालु और झगड़ालू थे, उनका बहादूर भी उनसे ज़रा सा भी उन्नीस नहीं था. घर के सभी कुत्तों पर अपना रोब बनाए रखने के लिए बात-बेबात दूसरे कुत्तों पर गुर्राता रहता था. अजनबियों पर भौंकता, तो बहुत तेजी से था, पर जैसे ही कुछ मार कुटाई की आशंका होती सभी कुत्तों को आगे कर ख़ुद पीछे जाकर दुबक जाता. पर वैसे दिनभर घर के दूसरे कुतों से लड़ते-झगड़ते रहता था. ख़ासकर मौसी के कुत्ता पप्पी से खार खाए रहता. मौसी का कुत्ता पप्पी, मौसी का लाडला तो था ही उनकी ही तरह पूरे ठाठ-बाट से रहता भी था.

मौसी उसके लिए तरह-तरह के बिस्किट लातीं और घर पर भी उसके लिए उसकी पसंद का मांसहारी भोजन बनवाती, जो सिर्फ़ उसे ही खाने को मिलता. उसके शैम्पू, साबुन सब दूसरे कुत्तों से अलग होते. उसकी प्यारी-सी सूरत देख, सभी उसे प्यार से सहलाते रहते. जिससे घर के दूसरे कुत्ते उससे खार खाए रहते. जब भी वह अकेला मिलता, उसे काट खाते, ख़ासकर बहादुर हमेशा उसके पीछे लगा रहता. शायद उसे लगता एक ही वर्ग का होकर यह हमें ठसक दिखाता है. हम लोंगो से ज़्यादा सुविधा मिल जाने से यह पाखंडी, तरह-तरह के ढोंग कर घर के सभी लोगों का प्यार पाता है. इसलिए बहादुर हर समय तना रहता और मौक़ा मिलते ही काट खाता. इतना ही नहीं पड़ोस का पप्पू भी मौक़ा मिलते ही पप्पी को मारता-पिटता रहता, क्योकि उसके नाम से मिलता-जुलता नाम होने के कारण सब उसे चिढ़ाते रहते.’’
“नानी ने भी एक कुत्ता पाल रखा था, जिसका नाम उन्होने सुलतान रखा था. लेकिन सुलतानों वाली कोई बात उसमें नहीं थी. वह नानी मां की तरह ही सरल था और हमेशा काम में व्यस्त रहता. कभी वह मासी के बेटा के साथ गेंद खेलता, तो कभी मामा के बेटी के साथ खेलता.कभी बहादुर का ग़ुस्सा शांत करने के लिए अपनी रोटी भी उसे दे देता. पूरी तरह नानी की तरह सब का ख़्याल रखता.’’

यह भी पढ़ें: व्यंग्य- अच्छी रचना का इंतज़ार (Satire Story- Achchi Rachna Ka Intezaar)

पत्नी से उलझकर शर्माजी ने ख़ुद अपनी शामत बुला ली थी. उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि पत्नी को कैसे चुप करवाएं. वह साष्टांग दंडवत करते हुए बोले, ‘‘बस बस… अब बस भी करो. मैं मान गया, तुम महान हो और महान ही बनी रहो. मुझे अपनी लघुता स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है, इसलिए अब अपनी नानी घर की कहानी बंद करो. आज से और अभी से मैं प्रण करता हूं कि कभी भूल कर भी तुम्हे चुनौती नहीं दूंगा.”
तब कहीं जाकर कुत्तों की कहानी बंद हुई और वह सेन्टोसा के दूसरे समुद्री तटों का अवलोकन कर पाएं.

Rita kumari
रीता कुमारी
Kahaniya

पीने को मयस्सर है मेरे देश में सब कुछ
वो सब्र हो या खून ये क़िस्मत की बात है…
आंदोलन के बगैर आज़ादी भी कहां हासिल होती. आंदोलन इंसान के ज़िंदा और चेतन होने की निशानी है. आंदोलन व्यवस्था को निरंकुश और विषाक्त होने से रोकता है (बशर्ते आंदोलन सकारात्मक और जनहित में हो).

अनवरत खोज हो रही है, सियासत के महारथी अब साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं. इसी परंपरा में बिल्कुल ताज़ा-ताज़ा एक शब्द साहित्य में लॉन्च हुआ है- आंदोलन जीवी! पता नहीं ये शब्द कितने जीबी का है, पर इस शब्द के अवतार लेते ही देवासुर संग्राम जैसी सिचुएशन बन गई है. दोनों तरफ़ से कथित बुद्धिजीवी नए-नए शब्द मिसाइल टेस्ट कर रहे हैं. एक पक्ष ये साबित करने में एडी चोटी का ज़ोर लगा रहा है कि उनके श्रीमुख से जो देववाणी निकल चुकी उसे ही सत्यम शिवम सुंदरम मान लिया जाए, वरना आस्था में तर्क का अर्थ बगावत समझा जाएगा. इस नए शब्द को आज से हिंदी शब्दकोश में शामिल कर उसका कुपोषण दूर किया जाए. आगे और भी क्रांतिकारी खोज के लिए तैयार रहें.
लेकिन विरोधियों ने इस शब्द को लेकर बवाला मचा दिया. सोशल मीडिया पर तमाम वैज्ञानिक उतर आए और नए-नए जीवी की ख़ोज शुरु हो गई. जैविक हथियारों के इस्तेमाल पर हालांकि रोक लगी है, फिर भी रोज़ सोशल मीडिया पर बुद्धिजीवी हैं कि मानते नहीं. रोज़ाना कुछ नई खोज लाॅन्च कर दी जाती हैं. तुम एक जीवी दोगे, वो दस लाख देगा के तर्ज़ पर जीवी भंडार में वृद्धि हो रही है. इस श्रृंखला में अब तक लुकमा जीवी, भाषण जीवी, नफ़रत जीवी, ईवीएम जीवी जैसे शब्द आ चुके हैं और हर दिन फेस बुक उर्वर और साहित्य गौरवांवित होता जा रहा है. वैलेंटाइन डे के अगले दिन हमारे एक विद्वान मित्र ने एक ग़ज़ब की पोस्ट फेस बुक पर डाली. कल वो प्रेम जीवी लगीं और आज ज़ुल्म जीवी… (पता नही उनकी धर्मपत्नी ने ये पोस्ट देखी या नहीं).
मुझे अभी तक सिर्फ़ दो तरह के जीवी की जानकारी थी, एक बुद्धिजीवी दूसरा परजीवी (वैसे ईमानदारी से देखा जाए, तो हर बुद्धिजीवी एक सफल परजीवी होता है) बुज़ुर्गो ने कहा भी है- मूर्खों के मुहल्ले में अक्लमंद भूखा नहीं रहता… (फौरन परजीवी बन जाता है) इस तरह देखा जाए, तो मच्छर जैसे बदनाम परजीवी की औकात बुद्धिजीवी के सामने कुछ भी नहीं है. मच्छर का शिकार बहुत कम मरता है और बुद्धिजीवी का शिकार बहुत कम बचता है. परजीवी के खून पीने की घोर निंदा होती है, जबकि बुद्धिजीवी प्रशंसित होता है. पीने की इस नियति पर मुझे अपना ही एक शेर याद आ जाता है-
पीने को मयस्सर है मेरे देश में सब कुछ
वो सब्र हो या खून ये क़िस्मत की बात है
आंदोलन के बगैर आज़ादी भी कहां हासिल होती. आंदोलन इंसान के ज़िंदा और चेतन होने की निशानी है. आंदोलन व्यवस्था को निरंकुश और विषाक्त होने से रोकता है (बशर्ते आंदोलन सकारात्मक और जनहित में हो). आंदोलन जीवी वो होते हैं, जो किराए पर आते हों. अपना खेत-खलियान छोड़कर परिवार के साथ सड़क पर रात काटनेवाले आंदोलन जीवी नहीं, बल्कि जीवित आंदोलन होते हैं. इस आंदोलन से कौन अल्प जीवी बनेगा और कौन दीर्घ जीवी इसकी भविष्यवाणी कोई नहीं कर सकता. विलुप्तप्राय और मरणासन्न विपक्ष पर आराेप है कि वो किसानों को बरगला रहा है. ‘बरगलानेवाला आरोप उस विपक्ष पर है, जो ख़ुद गरीबी रेखा से नीचे खड़ा मुश्किल से अपना पाजामा संभाल रहा है. उसके पिंजरे के बचे-खुचे तोते कब नज़रें फेर कर उड़ जाएं- कोई भरोसा नहीं.
आंदोलन और जीवी की जंग में पानीपत का मैदान बनी दिल्ली बेहाल है! अंदर कोरोना और केजरीवाल, बाहर कील और कांटो से घिरा किसान. हाहाकार में पता लगाना मुश्किल है कि कौन किससे लड़ रहा है. न्यूज़ देख कर जनता कंफ्यूजन का शिकार है. ऊपर से मीडिया की भूमिका ने नरो वा कुंजरो… का भ्रम बना रखा है. खुले मैदान में परजीवी मच्छर किसानों की नींद का जायज़ा ले रहे हैं. संभावनाओं के घने कुहरेे में देश को विश्व गुरू होने की सलाह दी जा रही है. सोशल मीडिया पर ज्ञान की गंगा उतारी जा रही है.

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

Sultan Bharti
सुलतान भारती
Rang Tarang

यह भी पढ़ें: व्यंग्य- शादी का एल्बम (Satire Story- Shadi Ka Albam)

×