Story

लोगों की नज़र में वो देवता थे, पर नेहा की नज़र में वो बेचारा भला आदमी, जिसका सब लाभ उठाया करते हैं. ‘शादी के बाद कुछ समय तक तो उस प्यार का स्वाद चखने को मिलता ही है, जो सागर के उस ज्वार की तरह होता है, जो तन-मन और आत्मा तक को भिगो देता है. जो उन्माद की तरह चढ़ता है, तो धरती अंतरिक्ष लगने लगती है…’ सखियों के कहे ये वाक्य सिम्मी के दिल में कील की तरह चुभते रहते.

लंबा कद, स्वर्णाभा लिए गौर वर्ण और तराशे हुए नैन-नक्श, उस पर गीत-संगीत, पाक कला, सिंगार कला और अन्य घरेलू कार्यों में अद्भुत कौशल. लगता था, ईश्‍वर ने बड़ी फुर्सत से उसमें रूप-गुण भरे थे. सिम्मी बड़ी-बूढ़ी औरतों और सखियों से सुनते-सुनते ख़ुद भी यक़ीन करने लगी थी कि उसे तो कोई परियों का राजकुमार मांगकर ले जाएगा.
ब्याहकर अपने घर आई, तो अविचल में अपने रूप के सम्मोहन में मंत्र-मुग्ध ख़ुद पर जान छिड़कनेवाले सपनों के राजकुमार जैसा कुछ भी न पाया. उसमें जितनी पिपासा थी, अविचल में उतनी ही निर्लिप्तता. वो अल्हड़ कैशोर्य की उन्मुक्त उमंगों की जीवंतता थी, तो अविचल अपने माता-पिता के देहांत के बाद छोटी आयु से ही परिवार की ज़िम्मेदारियां सम्हालते हुए एक धीर-गंभीर सांचे में ढली शालीनता और कर्त्तव्यनिष्ठा की प्रतिमूर्ति.
तीन बहनों की शादी करने और भाई को हॉस्टल में डालने के बाद उन्होंने शादी की थी. अविचल गणित की ट्यूशंस पढ़ाते थे. एक घंटा वे ग़रीब बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाने के लिए भी देते थे. बहुत-से रिश्तेदार शहर में रहते थे. किसी को कोई भी काम हो, अविचल कभी मना नहीं करते थे. और तो और, दूधवाले का बेटा बीमार हो या सब्ज़ीवाले के बेटे का स्कूल में प्रवेश कराना हो, अविचल हमेशा तत्पर रहते.
लोगों की नज़र में वो देवता थे, पर नेहा की नज़र में वो बेचारा भला आदमी, जिसका सब लाभ उठाया करते हैं. ‘शादी के बाद कुछ समय तक तो उस प्यार का स्वाद चखने को मिलता ही है, जो सागर के उस ज्वार की तरह होता है, जो तन-मन और आत्मा तक को भिगो देता है. जो उन्माद की तरह चढ़ता है, तो धरती अंतरिक्ष लगने लगती है…’ सखियों के कहे ये वाक्य सिम्मी के दिल में कील की तरह चुभते रहते.
उस प्यार की प्यास में वो ख़ूब मन लगाकर तैयार होती कि कभी तो उसका अद्वितीय रूप अविचल की ज़ुबान को प्रशंसा करने को विवश कर दे. अक्सर रात में कोई रोमांटिक गीत लगाकर उस पर थिरकने लगती या कोई गीत गुनगुनाने लगती कि कभी तो उन गुणों की तारीफ़ में चंद शब्द सुनने को मिल जाएं, जिनके कारण लोग उसकी तुलना अप्सराओं से किया करते थे, पर सब बेकार.
अविचल मुस्कुराते हुए उसे देख-सुन तो लेते, पर कभी तारीफ़ के दो शब्द उनके मुंह से न निकले. पहली बार मायके गई, तो दीदियों ने सलाह दी लज़ीज़ व्यंजनों की चाभी से दिल का ताला खोलने की कोशिश कर.
लौटकर आई, तो वो चाची गांव वापस जा चुकी थीं, जो पहले खाना बनाया करती थीं. उसका रसोई में प्रवेश कराया गया, तो अवसर भी मिल गया पेट के रास्ते दिल में घुसने का. फिर क्या था, लज़ीज़ व्यंजनों से मेज़ सजा डाली, पर खाना चखकर अविचल की आंखों में आंसू आ गए.
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“मैं ये खाना खा नहीं सकूंगा. तुम्हें शायद चाची ने बताया नहीं कि मैं मिर्ची बिल्कुल नहीं खा पाता. तुम मेरे लिए दूध ला दो, मैं उसमें रोटी भिगोकर खा लूंगा.”
दूध लेकर आई, तो अविचल उसकी प्लेट लगा चुके थे. उसे पकड़ाते हुए बोले, “तुम भी मेरे कारण इतने दिनों से ऐसा खाना क्यों खाती रहीं? अब से अपने लिए ढंग से अपनी पसंद का बना लिया करो.”
सिम्मी को काटो तो ख़ून नहीं. उसके सामने उसके पति बड़ी निर्लिप्तता से दूध-रोटी खा रहे थे और उसकी थाली यूं सजाई थी कि खाना न निगलते बन रहा था, न उगलते. यही हाल पलकों में छलक आए आंसुओं का भी था.
जीवन ऐसे गुज़रने लगा था, जैसे घड़ी की सुइयां एक परिधि के अंदर चक्कर काटती रहती हैं. अर्थहीन, रसहीन, नवीनताविहीन. शादी की वर्षगांठ आई, तो इसी बहाने सिम्मी ने दिल की बहुत-सी गांठें खोलने की ठान ली.
उसने ख़ूब सुंदर क्रॉकरी में कैंडल लाइट डिनर अविचल के मनपसंद खाने से सजाया. एक स्वेटर तो बुनकर तैयार ही कर लिया था. बहुत सुंदर-सा कार्ड भी ले आई. बहुत ही रोमांटिक अंदाज़ में कार्ड पेश किया, तो अविचल ने चौंककर कार्ड हाथ में लेकर सीधी तरफ़ से देखने से पहले ही उलटकर उसका दाम देखा और बोले, “सौ रुपए का कार्ड! इतने रुपए कैसे बरबाद कर सकीं तुम इस फ़ालतू की चीज़ में? हां, स्वेटर बनाकर अच्छा किया. घर के बने स्वेटर में बहुत बचत होती है, पर मेरे पास तो अभी दो हैं. काम चल रहा है. इसे पंकज को दे देना. वैसे भी हॉस्टल में रहनेवाले बच्चों को सुंदर चीज़ें पहनने का बड़ा शौक़ होता है.”
सिम्मी की पलकें छलक उठीं. उसने सोचा, ‘अब मैं सबके लिए बुनूंगी, पर इनके लिए कभी नहीं.’ इस आदमी के सीने में दिल की जगह एक पत्थर रखा हुआ है. इसमें जगह बनाने की कोशिश ही व्यर्थ है.
वो सपनीला प्यार, अविचल के दिल में, उसकी ज़ुबां पर, उसकी आंखों में अपने लिए पिपासा, अपना महत्व या अपने बिना न जी सकने की लाचारगी देखने-सुनने की चाह एक कसक थी. ये चाह पहले निराशा, फिर आक्रोश, फिर कटुक्तियों में बदलती जा रही थी. अंतस में कैद ऊर्जा खीझ और चिड़चिड़ेपन के रूप में बाहर आने लगी थी कि किसी नवागत के स्पंदन ने तन-मन को पुलक से भर दिया.
डॉक्टर ने उसकी रिपोर्ट्स देखकर उसे एनीमिक बताते हुए खानपान की एक लंबी सूची पकड़ाई, तो अविचल ने ये ज़िम्मेदारी ख़ुद पर ले ली. वे नियम से फल, सब्ज़ी, दूध आदि लाते, दही जमाते और उसे हर चीज़ ज़बर्दस्ती खिलाते.
रसोई में जाते ही सिम्मी को उबकाई आने लगती थी, तो अविचल ने कह दिया कि वो केवल इतनी मेहनत कर ले कि ख़ुद ठीक से खा सके, इसीलिए वो बस एक चटपटी सब्ज़ी और रोटियां किसी तरह बना लेती. अविचल के लिए अलग से सादी सब्ज़ियां बन ही नहीं पाती थीं.
वे कुछ कहते भी नहीं थे. सलाद तो ख़ुद ही बना लेते थे. दूध-रोटी, दाल-रोटी या नमकीन चावल खा लेते, पर सिम्मी को पूरा खाना अपने सामने ऐसे सख़्ती से खिलाते, जैसे वो उनकी विद्यार्थी हो. अगर थोड़े प्यार से खाने के लिए कहते, तो यही लम्हे कितने रोमांटिक हो सकते थे. सोचकर सिम्मी अक्सर इस पाषाण हृदय के सपाट अंदाज़ पर कुढ़ जाती.

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समय के चक्र ने सिम्मी की गोद में बेटे का उपहार डाला. उसके आगमन और मुंडन के उत्सव बहुत सादगी के साथ सम्पन्न हुए. न कोई पार्टी, न धूम-धड़ाका. अविचल की सारी बहनें आतीं और मिलकर घर में ही खाना बनाकर रिश्तेदारों को दावत दे दी जाती.
अपने लिए किसी मनोरंजन पर ख़र्च न करने की टीस तो सिम्मी बर्दाश्त कर जाती, पर बेटे के लिए पार्टी न होने की तिलमिलाहट अक्सर व्यंग्य बनकर ज़ुबां पर आ जाती. कुछ बच्चे की व्यस्तता और कुछ अविचल के स्थित प्रज्ञ साधुओं के से रवैये से पनपी खीझ ने सिम्मी को इतना आलसी बना दिया था कि उसने खानपान के रवैये को ऐसे ही चलने दिया.
ननदें आती-जाती रहती थीं. उन्होंने भाई की ऐसी उपेक्षा देखी, तो ऐसी बहुत-सी सादी साग-सब्ज़ियों, सलाद और सूप आदि की विधियां बताईं, जो अविचल को बहुत पसंद थे, पर इतना समय लगाकर बननेवाले इतने स्वादहीन पकवानों को काटने-बनाने में सिम्मी की बिल्कुल दिलचस्पी न थी.
वो सोचती ऐसे पत्थर दिल के लिए मेहनत करने का क्या फ़ायदा, जिसे कभी जीवन में न कुछ अच्छा लगा, न बुरा. कुछ अच्छा बना दो, तो तारीफ़ ही कब करते हैं और न बनाने पर शिकायत ही कब की है? जाने कोई एहसास है भी उनके भीतर या…
सिम्मी के मायके में एक शादी का अवसर था. अविचल का कहना था कि बढ़ते बच्चों के लिए महंगे सामान ख़रीदना पैसों की बर्बादी है, इसलिए उसके बेटे के पास ननदों के लाए पुराने कपड़े और सामान ही थे. उन सामानों में बेटे को लेकर मायके जाना सिम्मी को गंवारा न था. वो जब भी मायके जाती थी, तो चलते समय मां बिदाई में जो रुपए दिया करती थीं, वो बड़े जतन से जमा किए थे उसने.
पहली बार बिना अविचल से पूछे ख़ुद जाकर अपने मनपसंद सामान ले आई. अविचल ने देखा, तो परेशान हो गए, “अभी से इतने महंगे सामानों की आदत डालोगी, तो बेटे की फ़रमाइशें बढ़ती जाएंगी. बहनों की शादी में थोड़ा कर्ज़ लिया है, वो चुकाना होता है, फिर पंकज की फीस और बहनों के यहां लेन-देन भी बना रहता है. जब तक कर्ज़ चुकेगा, इसके स्कूल में दाख़िला दिलाने का समय आ जाएगा, उसके लिए भी तो जोड़ना है.”
हालांकि अविचल ने समझाने के अंदाज़ में ये शब्द बड़ी कोमलता से बोले थे, पर आज बात उसके बच्चे की थी, इसलिए सिम्मी के मन में भरा ग़ुस्सा बांध तोड़कर बह निकला, “कब तक यूं ही घुट-घुटकर जीना होगा मुझे?…
कितनी छोटी उम्र से मम्मी मुझे पॉकेटमनी देती थीं. शादी के बाद तो वो भी नसीब नहीं. मैं कभी आपसे कुछ मांगती नहीं, क्योंकि जानती हूं कि आपके पास है नहीं, पर मेरे कुछ देने से भी आपको चिढ़ है. मेरा हर ख़र्च इसीलिए ग़लत है न, क्योंकि मैं कमाती नहीं हूं? कमाना चाहती हूं मैं भी, लेकिन उसके लिए…” जाने कितनी देर वो गुबार निकलता रहा और अविचल हमेशा की तरह चुपचाप सुनते रहे.
दूसरे दिन उसके हाथ में हज़ार रुपए देकर बोले, “मेरी कमाई पर तुम्हारा अधिकार मुझसे कम नहीं है, लेकिन क्या करूं बहुत से फर्ज़ हैं, जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, लेकिन ये तुम्हारी समस्या का अच्छा समाधान है, जो तुमने कल सुझाया. मैं हर महीने तुम्हें पॉकेटमनी दिया करूंगा. ये रुपए स़िर्फ तुम्हारे होंगे. इनसे जो चाहो, ख़रीद लिया करना.”
उसी दिन रात के दस बजे किसी ने दरवाज़ा खटखटाया. खोला तो एक विद्यार्थी था. सिम्मी को याद आया कि ये बच्चा पहले आया था, तब अविचल ने ये कहकर मना कर दिया था कि अब उनके पास समय नहीं है, तो क्या इस पॉकेटमनी के लिए… सिम्मी के मन में टीस उठी, पर जल्द ही उसने ये विचार ये सोचकर झटक दिया कि ऐसे भी इस पाषाण हृदय को कौन-सा मनोरंजन या आराम करना होता है.

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समय का पहिया अपनी गति से चल रहा था कि एक दिन कार्यालय से लौटते समय एक ट्रक ने अविचल के स्कूटर को टक्कर मार दी.
अस्पताल में आईसीयू में अविचल की हालत देखकर सिम्मी स्तब्ध रह गई. उसके तो हाथ-पैर-दिमाग़ सबने काम करना बंद कर दिया था. रिश्तेदारों और देवर-ननदों की सांत्वना उसके आंसुओं की नदी में टिक ही नहीं पा रही थी. बेटा कहां है, अविचल के लिए डॉक्टर क्या कह रहे हैं, कौन-सी दवाइयां लानी हैं, उसे कुछ होश नहीं था. होश तो तब सम्हला, जब डॉक्टर ने उन्हें ख़तरे से बाहर बताया. तब ध्यान दिया कि क़रीब पिछले एक माह से बच्चा और अस्पताल की ज़िम्मेदारियां उसके ननद-देवर और रिश्तेदार मिलकर सम्हाल रहे हैं. अभी दो माह अविचल को फ्रैक्चर के कारण बिस्तर पर रहना था. ये सब बंदोबस्त कैसे हुआ, आगे कैसे क्या होना था, सिम्मी को कुछ पता नहीं था.
घर पहुंचकर पहले दिन अकेले पड़ी, तो दिल को मज़बूत बनाकर अविचल को नित्यकर्म कराने के लिए ख़ुद को मज़बूत बना ही रही थी कि अविचल के विद्यार्थी आ गए, “मैम! हमारे होते आपको परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. सर हमारे लिए देवता हैं और उनकी सेवा हमारा सौभाग्य.”
उनके जाते ही फिर डोरबेल बजी. सब्ज़ीवाला, दूधवाला और राशनवाला खड़े थे. “साहब ने फोन करके कहा कि आपकी सामान लेने जाने की आदत नहीं है. हम उनके ठीक होने तक घर पर सामान दे जाया करेंगे, ताकि आपको द़िक्क़त न हो. आप बिल्कुल चिंता न करें. उनके ठीक होने तक सामान घर पर आ जाया करेगा.”
अविचल को इतनी तकलीफ़ में भी उसका इतना ख़्याल है, सोचकर सिम्मी पुलक उठी. सामान लेकर रखा और अविचल के सिरहाने बैठकर उनके बालों में उंगलियां फेरते हुए उनके सही सलामत होने के सुखद एहसास को ठीक से जीने लगी. संतुष्टि की भावुकता में उसकी आंखों में आंसू छलछला आए थे, तभी वे बोले, “तुम मुझे फल और साग-सब्ज़ी धोकर दे दो. मैं बैठे-बैठे छील-काट देता हूं.” अबकी सिम्मी का दिल खीझने की बजाय कसक उठा. ऐसी तबीयत में भी अविचल को… उसका स्वर भीग गया, “नहीं, आप केवल आराम कीजिए, मैं…” मगर अविचल ने उसकी बात काट दी, “अरे! एक माह से आराम ही तो कर रहा हूं और तुमने इस एक माह में फल, सलाद, दूध, दही वगैरह तो कुछ खाया-पीया नहीं होगा. बच्चों की तरह खिलाना पड़ता है तुम्हें भी. मुझे डर है कि कहीं फिर से एनीमिक न हो जाओ.” मैंने कहा, “ना, मैं कर लूंगी, आप…” सिम्मी के स्वर में ग्लानि थी, पर अविचल ने बात फिर काट दी, “नहीं, तुम एक-दो दिन कर भी लो, फिर नहीं करोगी. मैं जानता हूं कि तुम्हारी इन चीज़ों में मेहनत करने की बिल्कुल आदत नहीं है.”
“मेरी आदत ख़राब है, तो आप मुझ पर ग़ुस्सा कीजिए, मेरी आदत बदलिए, ख़ुद को सज़ा क्यों देते हैं? मैं बहुत बुरी हूं न?…” आत्मग्लानि से उसका कंठ अवरुद्ध होने लगा था…
मगर अविचल का स्वर अब भी सपाट था, “नहीं सिम्मी, शादी जिस उम्र में होती है, उस उम्र तक जो संस्कार बन जाते हैं, उन्हें बदला नहीं जा सकता, केवल अपनी मेहनत से अपने साथी की कमी को पूरा किया जा सकता है. और कौन कहता है कि तुम बुरी हो. तुममें अच्छी आदतों की भी कमी नहीं है. तुमने इतने ख़ूबसूरत स्वेटर बुने हैं सबके लिए. घर को इतना सजाकर रखती हो, परिवार के हर कार्यक्रम में तुम्हारे गीत-संगीत रौनक़ भर देते हैं, तुम हंसमुख हो… अब किसी भी इंसान में केवल अच्छाइयां तो नहीं हो सकतीं न? और हां, ये लो तुम्हारा दो महीनों का पॉकेटमनी.” कहते हुए अविचल ने दो हज़ार रुपए सिम्मी की ओर बढ़ाए, तो अपने आंसुओं को पलकों में रोकना उसके लिए असंभव हो गया, “आपने मेरी तारीफ़ की, यही बहुत है मेरे लिए, मुझे ये रुपए नहीं चाहिए. आप सलामत हैं, मुझे और कुछ नहीं चाहिए, आपके इलाज में कोई कमी न पड़े, भगवान से बस यही प्रार्थना है.”
“उसकी चिंता तुम मत करो. मेरी कोई बंधी नौकरी तो है नहीं, इसीलिए मैंने अपना बीमा कराया हुआ है, ताकि यदि मैं मर जाऊं, तो भी तुम्हें जीवनयापन में कोई तकलीफ़ न हो. मेरे इलाज का ख़र्च भी बीमा राशि से निकलता रहेगा.”
“अब बस भी कीजिए. ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं?” कहते-कहते वो अविचल से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ी, “आप सचमुच महान हैं, मगर मैं भी इतनी बुरी नहीं. बहुत प्यार करती हूं आपसे. अगर आपको कुछ हो गया, तो मैं पैसों का क्या करूंगी? मैं आपके बिना नहीं जी सकती! मैं…”
“नहीं सिम्मी, ऐसा नहीं होता. पंद्रह साल की उम्र में जब मैंने अपने माता-पिता को खोया, तो मैं भी यही सोचता था, पर जल्द ही पता चला कि मरनेवालों के साथ मरा नहीं जाता. मन हर हाल में जीना चाहता है. उनके प्यार की कमी के दुख से कहीं विकराल थीं जीवनयापन की व्यावहारिक समस्याएं. अगर रिश्तेदारों ने मेरी नौकरी लगने तक हमें सहारा न दिया होता, तो भीख मांगने की नौबत आ जाती. और यदि मैंने ख़ुद को एक सख़्त और अनुशासित कवच में बंद न किया होता, तो मेरे भाई-बहन एक अच्छे इंसान के सांचे में न ढलते. जिन गुरुजी ने हम सबको मुफ़्त में पढ़ाया, उन्होंने ही साधनहीन ज़रूरतमंदों को मुफ़्त में पढ़ाने का वचन लिया था. लोग जिसे मेरी महानता समझते हैं, वो तो बस मेरी इस समाज को कृतज्ञता ज्ञापित करने की कोशिश भर है.”

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अविचल का स्वर तो अभी भी उनकी आदत के मुताबिक़ सपाट ही था, पर सिम्मी को चुप कराने के लिए उन्होंने अपनी बांहों का घेरा उसके गिर्द कस दिया था और उसके बालों में उंगलियां फेरे जा रहे थे. सिम्मी को लग रहा था, उसके रोम-रोम में अमृत घुलता जा रहा हो. कितनी नासमझ थी वो, जो उस उन्माद या ज्वार को प्यार समझती थी, जो जितनी तेज़ी से चढ़ता है, उतनी ही तेज़ी से उतरकर अपने पीछे कुंठा की गंदगी छोड़ जाता है, जबकि प्यार तो वो पारस मणि है, जो अपने संपर्क में आनेवाले लोहे को भी कंचन बना देता है. अविचल के दिल में रखी प्यार की इस पारस मणि से उनके संपर्क में आनेवाला हर व्यक्ति कंचन हो चुका था. पिछले एक माह से ये कंचन ही तो सब कुछ कर रहे थे, लेकिन वो जो उनके सबसे नज़दीक थी, वही इतने सालों से उसे पत्थर समझती रही. कभी प्रशंसा और महत्व की पिपासा रूपी मैल के आवरण को उतारकर इसे छूने की कोशिश ही नहीं की. आज खीझ और आक्रोश के मैल का आवरण हटा, तो उसके मन का लोहा भी प्यार के इस पारस का स्पर्श पाकर कंचन बन गया था.

भावना प्रकाश

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सोशल डिस्टेंसिंग करानेवाले कोरोना वायरस के जाने के बाद क्या सबके दिल मिल पाएंगे? क्या बच्चों में बाहर निकलने की, एक-दूसरे से मिलने-जुलने की नैसर्गिक उत्कंठा जागेगी?
दिनभर स्क्रीन में सिर दिए लोगों को आसपास सूखती रिश्तों की बेलों में अपने समय की खाद देकर हरियाने की इच्छा जागेगी. आज की चिंता क्या पर्यावरण के प्रति चिंतन में तब्दील होगी…

“हे भगवान्… कमरे का क्या हाल किया है तुम दोनों ने…”
शारदा ने कमरे छोटे-से कमरे को हैरानी से देखा. लैपटॉप से डाटा केबल द्वारा टीवी कनेक्ट करके एकलव्य और काव्या बिस्तर में बैठे कार्टून देख रहे थे… कुछ देर उनके पास बैठकर शारदा भी अजीब-सी आवाज़ निकालते कार्टून करेक्टर को देखने लगी. फिर कुछ ऊब से भरकर वह उठकर चली आई और बालकनी में बैठ गई. उन्हें अकेले बालकनी में बैठे देख बहू कविता ने उन्हें टोका, “क्या हुआ मां, आप यहां बालकनी में अकेले क्यों बैठी है…”
“क्या करूं, सुबह से कभी टीवी, तो कभी नेट पर कार्टून ही चल रहा है.“
“कार्टून नहीं एनीमेटेड मूवी है मां…”
“जो भी हो… सिरदर्द होने लगा है. दिनभर ये लैपटॉप नहीं, तो टीवी खोले बैठे रहते है… उनसे फुर्सत मिलती नहीं और जो मिल जाए, तो हाथों में मोबाइल आ जाता है… कुछ किताबे वगैरह दो बहू…”
“हां मम्मीजी, बेचारे अब करे भी तो क्या… इस कोरोना ने तो अच्छी-खासी मुसीबत कर दी. ईश्वर जाने कब स्कूल खुलेंगे…”
“मम्मी कोरोना को मुसीबत तो मत बोलो…”
काव्या की आवाज़ पर शारदा और कविता दोनों ने चौंककर काव्या को देखा, जो एकलव्य के साथ वॉशबेसिन में हाथ धोने आई थी…
काव्या की बात सुनकर कविता कुछ ग़ुस्से से बोली, “क्यों! कोरोना को मुसीबत क्यों न बोले?”
“अरे मम्मी, कोरोना की वजह से लग रहा है गर्मी की छुट्टियां हो गईं..” काव्या ने हंसते हुए कहा, तो कविता गंभीर हो गई.
“अरे! ऐसे नहीं बोलते काव्या… कोरोना की वजह से देखो कैसे हमारी आर्थिक व्यवस्था डांवाडोल हो रही है. इस वायरस का अब तक कोई इलाज नहीं निकला है. कितने लोग डरे हुए हैं. कितने लोग इसकी चपेट में आ गए है… और कितनों ने तो अपनी जान…”
“ओहो मम्मा, मज़ाक किया था और आप सीरियस हो गई… चलो सॉरी..” कविता के गले में गलबहियां डालते हुए काव्या उनकी मनुहार करती बोली, “छुट्टियां हो गई. पढ़ाई से फुर्सत मिल गई, इसलिए कह दिया.”
“ये मज़ाक का समय नहीं है समझी.” कविता ने डांटा, तो शारदा भी बड़बड़ा उठी…
“और क्या, आग लगे ऐसी छुट्टियों को. इस मुए कोरोना की वजह से पूरी दुनिया की जान सांसत में है और तू उसी को भला हुआ कह रही है. ऐसी छुट्टियों का क्या फ़ायदा, जिसमें न बाहर निकल पाए और न किसी को घर पर बुला पाए. न किसी से मेलजोल, न बातचीत… घूमना-फिरना सब बंद. सब अपने-अपने घरों में कैद कितने परेशान हैं…”
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“परेशानी कैसी दादी… टीवी, नेट सब तो खुला है न…” एकलव्य ने सहसा मोर्चा संभाल लिया…
“हम दोस्तों से जुड़े हैं. वाट्सअप और फोन से हमारी गप्पबाजी हो जाती है. मम्मी आजकल बढ़िया-बढ़िया खाना बना रही है… चिल दादी…” कहते हुए एकलव्य काव्या के साथ चला गया तो कविता शारदाजी से बोली, “मांजी रहने दीजिए, इनकी बात को इतना सीरियसली न लीजिए. वैसे देखा जाए, तो आज की जनरेशन का कूल रवैया हमारे लिए ठीक ही है… आज पूरे विश्‍व में इतनी भीषण विभीषिका आन पड़ी है, देश में घर में ही रहने का आह्वान किया जा रहा है. लोगों से दूर रहने को कहा जा रहा है. ऐसे में ये बिना शिकायत घर पर मज़े से बैठे है… ये कम है क्या…”
शारदाजी चुपचाप बहू की बातें सुनती रहीं…
“जानती हो मां, आज अख़बार में निकला है कि आपदा प्रबंधन में कोरोना वायरस को भी शामिल किया जा रहा है… और हां अब से विज्ञान के छात्र विभिन्न तरह के फ़्लू और बीमारियों के साथ कोरोना वायरस के बारे में भी पढ़ेंगे…”
“हां भई, परिवर्तन के इस युग में नई-नई चीज़ें पाठयक्रम में शामिल होंगी… जानती हो, जब मैंने उस जमाने में पर्यावरण का विषय लिया, तो लोग हंसते थे कि इसका क्या स्कोप है. आज देखो, पर्यावरण हमारी आवश्यकता बन गई… इसी तरह आज इस वायरस को लेकर जो बेचैनी की स्थिति बनी है, उसमे जागरूकता ज़रूरी है…”
अपनी शिक्षित सास की समझदारी भरी बातों से प्रभावित कविता देर तक उनसे वार्तालाप करती रही… फिर रसोई में चली गई. कविता के जाने के बाद शारदा ने अपनी नज़रे बालकनी से नीचे दिखनेवाले पार्क में गड़ा ली… पार्क में फैले सन्नाटे को देख मन अनमना-सा हो गया.
कोरोना के चक्कर में बाज़ार-मॉल सब बंद है… घर पर ऑनलाइन सामान आ जाता है. आगे की स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राशन इकट्ठा कर लिया गया है, सो सब निश्चिन्त है. स्कूल बंद है, पर बच्चे ख़ुश है… लोगो से मिलने-जुलने पर लगी रोक का भी किसी को ख़ास मलाल नहीं, क्योंकि बहुत पहले से ही सबने ख़ुद को वाट्सअप-फेसबुक के ज़रिए ख़ुद को बाहरी दुनिया से जोड़ लिया है… वैसे ही रिश्तों में दूरियों का एहसास होता था, अब तो दूरियां जीवनरक्षक है.
उन्हें एकलव्य की भी चिंता हो रही है. पहले ही उसका वज़न इतना बढ़ा हुआ है… अब तो दिनभर लैपटॉप या टीवी स्क्रीन के सामने बैठे खाना खाते रहना मजबूरी ही बन गई है… ये अलग बात है कि इस मजबूरी पर वो ख़ुश है, पर उन्हें बेचैनी है. सामान्य स्थिति में डांट-फटकार कर उसे घर से बाहर खेलने साइकिल चलाने भेजा जाता था. आज वो भी बंद है… हैरानी होती है कि आज के बच्चों को बाहर खेलने भेजना भी टास्क है.
यक़ीनन इसकी वजह वो ‘यंत्र’ है जिस पर दिनभर बिना थके लोगो की उंगलियां थिरकती है. वो ऊब रही है, क्योंकि लाख चाहने के बाद भी वो स्मार्टफोन से दोस्ती नहीं कर पाई. यश ने कितनी बार उनसे कहा, “मां, स्मार्टफोन की आदत डाल लो. समय का पता ही नहीं चलेगा.” स्मार्टफोन लाकर भी दिया, पर उन्हें कभी भी स्मार्टफोन पर मुंह गाड़े लोग अच्छे नहीं लगे शायद इसी वजह से उन्होंने इस आदत को नहीं अपनाया… इसीलिए आज वो उकताहट महसूस कर रही है… घर में क़ैद ऊब रही है, पर ये क़ैद इन बच्चों को महसूस नहीं होती. पार्क में न जाने का उन्हें कोई मलाल नहीं… फ्रेंड्स से आमने-सामने न मिलने की कोई शिकायत नहीं… ऐसे में उसे बच्चों के व्यवहार से कविता की तरह संतुष्ट होना चाहिए, पर मन बेचैन है.
रात का खाना बच्चों ने अपने-अपने कमरे में स्क्रीन ताकते हुए खाया.. वो भी खाना खाकर अपने कमरे में आकर लेट गईं… घर की दिनचर्या बिगड़ गई थी, ऐसा लग रहा था मानो काव्या और एकलव्य की गर्मियों की छुट्टियां चल रही हो. सहसा उन्हें बीते ज़माने की गर्मियों की छुट्टियां याद आई… यश काव्या की उम्र का ही था… गर्मियों की दोपहर को चोरी-छिपे खेलने भाग जाता था… गर्मी-सर्दी सब खेल पर भारी थी… सातवीं कक्षा में उसका वार्षिक परीक्षा का हिन्दी का पर्चा याद आया… चार बजे शाम का निकला यश सात बजे खेलकर आया, तो वह कितना ग़ुस्सा हुई थी.. “ऐसा करो, अब तुम खेलते ही रहो… कोई ज़रूरत नहीं है इम्तहान देने की, मूंगफली का ठेला लगाना बड़े होकर.” उसकी फटकार वह सिर झुकाए सुनता रहा.
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शारदाजी ये सोचकर मुस्कुरा उठीं कि यश को खेलने की एवज में उससे कितनी बार दूध-फल-सब्जी बिकवाई… कभी-कभी तो रिक्शा भी चलवाया. उसके मन-मस्तिष्क में कूटकूटकर भर दिया था, जो ढंग से पढ़ाई नहीं करते, ज़्यादा खेलते है, वो यही काम करते है. कितनी ग़लत थी वह… आज पछतावा होता है कि नाहक ही उसे खेलने के लिए डांटा. आउटडोर खेल के महत्व को उस वक़्त नकारा, जबकि आज चाहती है कि बच्चे खेले… खेलते भी है, पर मैदान में नहीं स्क्रीन पर… घर बैठे ही. वैसे ही आजकल खुले में खेलने को ठेलना पड़ता था. अब कोरोना के चलते वो भी नहीं हो सकता. अब बच्चों की मौज है… उन्हें कोई शिकायत नहीं, काश! वो शिकायत करते. यश की तरह… यश की खिलंदड़ी प्रवृत्ति को लेकर वह हमेशा चिंतित रही. आज उसके बच्चे खेलने नहीं जाते तो चिंतित है.
विचारों में घिरे-घिरे झपकी आई कि तभी काव्या और एकलव्य के चीखने से ही हड़बड़ाकर उठ बैठी… उनके कमरे में जाकर देखा, तो काव्या ख़ुशी से नाच रही थी… एकलव्य भी बहुत ख़ुश था. यश और कविता के मुख पर मंद-मंद मुस्कान थी… यश बोला, “मां, इनके इम्तहान कैंसिल हो गए…”
“मतलब…”
“मतलब अब बिना इम्तहान के ही ये दूसरी कक्षा में चले जाएंगे.”
“अरे ऐसे कैसे…”
“सब कोरोना की वजह से दादी, अभी-अभी स्कूल से मेल आया है, क्लास आठ तक सब बच्चे बिना इम्तहान के ही पहले के ग्रेड के आधार पर प्रमोट हो जाएंगे… हुर्रे मैं क्लास नाइंथ में आ गई…” वो उत्साहित थी.
“और मैं क्लास सेवन्थ में…”
“हां वो भी बिना मैथ्स का एग्ज़ाम दिए हुए…” काव्य ने एकलव्य को छेड़ा.
एकलव्य का हाथ मैथ्स में तंग है. सब जानते थे, इसलिए सब हंस पड़े.
इम्तहान नहीं होंगे, उसे सेलीब्रेट करने के लिए रात देर तक अंग्रेज़ी पिक्चर देखी गई…
शारदा अपने कमरे में आकर सो गई… सुबह आंख खुली, तो देखा सूरज की धूप पर्दों से भीतर आने लगी थी. आज कविता ने चाय के लिए आवाज़ नहीं लगाई, यह देखने के लिए वह उठी, तो देखा बेटे-बहू का कमरा बंद था.
आज न शनिवार था, न इतवार, न ही कोई तीज-त्यौहार फिर छुट्टी..? वो सोच ही रही थी कि तभी दरवाज़ा खुला… कविता कमरे से निकली, शारदा को देख बोली, “आज इन्हें ऑफिस नहीं जाना है, इसलिए देर से उठे. आप बालकनी में बैठो चाय वहीं लाते है.” सुबह और शाम की चाय अक्सर तीनों साथ ही पीते है. शारदा बालकनी में आकर बैठ गई… यश भी अख़बार लेकर बालकनी में पास ही आकर बैठ गया, तो शारदा ने पूछा “आज काहे की छुट्टी..”
“मां, कोरोना के चलते हमारी भी छुट्टी हो गई… आज सुबह मेल देखा, तो पता चला. हमें आदेश मिला है कि घर से काम करने के लिए…”
“ओह!..” कहकर वह मौन हुई, तो यश बोला, “पता नहीं ये कब तक चलेगा… घर से कैसे काम होगा.” यश के चेहरे पर कुछ उलझन देखकर शारदा ने परिहास किया, “क्यों तुम्हारे बच्चे बिना इम्तहान दिए दूसरी कक्षा में प्रवेश कर सकते है, तो क्या तुम घर से काम नहीं कर सकते…” यश हंसते हुए कहने लगा, “सच कहती हो मां… मुझे तो जलन हो रही है इनसे, बताओ, बिना इम्तहान के दूसरी क्लास में चले जाएंगे… “
शारदा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, तो यश बोला, “याद है मां, एक बार जब मुझे चिकनपाक्स हुआ था, तो भी मुझे इम्तहान देने पड़े थे वो भी अकेले…”
“अरे बाप रे! कैसे भूल सकती हूं. पहला पर्चा देकर घर आया और बस… ऐसे दाने निकले कि निकलते ही चले गए. सब बच्चों की छुट्टियां हुई, तब तूने इम्तहान दिए…”
“वही तो…” यश सिर हिलाते हुए कुछ अफ़सोस से बोला.
“बिना पढ़े मुझे तो नहीं मिली दूसरी क्लास… बीमारी में भी तुम मुझे कितना पढ़ाती थी. तुम पढ़कर सुनाती और मैं लेटा-लेटा सुनता रहता… जब तबीयत ठीक हुई, तब टीचर ने सारे एग्ज़ाम लिए. आज इन्हें देखो, मस्त सो रहे है दोनों.”
यश ने मां का हाथ थामकर कहा, “वक़्त कितना बदल गया है. मुझे याद है जब मुझे चिकनपाक्स हुआ था, तब मैं भी इनकी तरह क़ैद था घर में… छुआछूत वाली बीमारी के चलते न किसी से मिलना-जुलना, न किसी के साथ खेलना… बड़ा बुरा लगता था.”
“हां, बड़ा परेशान किया तूने उन पंद्रह दिन…”
“हैं अम्मा… ये परेशान करते थे क्या…” सहसा चाय की ट्रे लिए कविता आई और वह भी बातचीत में शामिल हो गई. शारदा यश के बचपन का प्रसंग साझा करने लगी.
“और क्या… एक दिन चोरी से निकल गया था बगीचे में… आम का पेड़ लगा था उस पर चढा बैठा था…” यश को वो प्रसंग याद आया और ख़ूब हंसा… “पता है कविता, मैं आम के पेड़ में चढा हुआ था अम्मा ने कहा एक बार तेरा चिकनपाक्स ठीक हो जाए, फिर बताती हूं.. मैं कितना डर गया था. लगा कि ठीक होऊं ही न….”
यह सुनते ही शारदा ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बड़ी ज्यादतियां की है तुझ पर…”
“कैसी बात कर रही हो मां… मैं था भी तो कितना शैतान कि मौक़ा मिलते ही बाहर भागने की सोचता… कभी क्रिकेट खेलता.. तो कभी फुटबॉल… कभी यूं ही पेड़ों में चढ़कर मस्ती करते…”
“जो आज जैसी सुविधाएं होती तो शायद तू बाहर निकलने को न छटपटाता…”
“अच्छा है जो आज जैसी सुविधाएं नहीं है. कम-से-कम हमने अपना बचपन तो जिया… सुविधाएं होती, तो शायद बचपन के क़िस्से नहीं होते… मां ये बच्चे अपने बचपन के कौन-से क़िस्से याद करेंगे.”
यश के मुंह से निकला, तो शारदा का मन भीग-सा गया. सहसा चुप्पी छा गई… तो कविता बोली, “कोरोना वायरस की वजह से हुई छुट्टियां और बिना इम्तहान दिए नई क्लास में प्रमोट होने जैसे क़िस्से याद करेंगे…”
हंसते हुए शारदा ने कविता से पूछा, “वो दोनों अभी उठे नहीं है क्या…”
“रात ढाई बजे तक चली है पिक्चर. इतनी जल्दी थोड़ी न उठनेवाले…”
“ठीक है सोने दे… उठकर करेंगे भी क्या, वही टीवी, नेट-गेम्स और स्मार्टफोन…” शारदा के कहने पर यश ने कहा, “अभी ये लोग सो रहे है… आओ, न्यूज सुन लेते है… देखे कोरोना वायरस का क्या स्टेटस है…”
“सच में बड़ा डर लग रहा है…” कविता ने कहा, तो यश बोला, “डरना नहीं है, वायरस से लड़ना है… अपने देश ने काबिलेतारीफ इंतज़ाम किए है. डब्ल्यूएचओ ने भी तारीफ़ की है, ये बड़ी बात है. आगे हमें ही सावधानियां रखनी है.” यश और कविता समाचार देखने चले गए..
शारदा सोचने लगी- कोरोना वायरस को भगाने के लिए जागरूक होना अतिआवश्यक है… सभी लोंगो के प्रयास से कोरोना देश-दुनिया से चला ही जाएगा… सैल्यूट है डॉक्टर को… सुरक्षाकर्मियों को और मीडियावालों को, जिनके काम घर से नहीं हैं.
इस वायरस से तो कभी-न-कभी छूटेंगे, पर उस वायरस का क्या… जिसने सबको दबोचा है और किसी को उसकी पकड़ में होने का अंदाज़ा भी नहीं है…
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मुआ इंटरनेट नाम का वायरस ज़रूरत के नाम पर घर-घर में प्रवेश कर चुका है. उसको दूर करने के इंतज़ाम कब होंगे. काश! समय रहते इसके प्रति भी जागरूकता आए, तो क्या बात हो… शायद बच्चों का बचपन बचपन जैसा बीते…
शारदा का मन बेचैन हो उठा. कुछ यक्ष प्रश्न उसके मन उद्वेलित करने लगे.
सोशल डिस्टेंसिंग करानेवाले कोरोना वायरस के जाने के बाद क्या सबके दिल मिल पाएंगे? क्या बच्चों में बाहर निकलने की, एक-दूसरे से मिलने-जुलने की नैसर्गिक उत्कंठा जागेगी?
दिनभर स्क्रीन में सिर दिए लोगों को आसपास सूखती रिश्तों की बेलों में अपने समय की खाद देकर हरियाने की इच्छा जागेगी. आज की चिंता क्या पर्यावरण के प्रति चिंतन में तब्दील होगी…
एक प्रश्न जो सबसे ज़्यादा उसे कचोट रहा था कि सब घर पर संतुष्ट है. वर्तमान की मांग होने पर भी आज ये संतुष्टि उसके मन को क्यों चुभ रही है?
“अरे मां, आप किस सोच में डूबी हैं…” कविता का स्वर उन्हें सोच-विचार घेरे से बाहर ले आया. भविष्य के गर्भ में छिपे उत्तर तो वर्तमान के प्रयासों और नीयत के द्वारा निर्धारित किए जाने हैं, ये सोचकर शारदा ने गहरी सांस भरी और उठ खड़ी हुईं…

मीनू त्रिपाठी

स्वयं के साथ बिताया हुआ यह एकांत मुझे बहुत प्रिय था, परंतु उस रात मैं अकेली कहां थी. वह भी तो था. हां, यह बात मुझे ज्ञात तब हुई, जब उसने मुझे पीछे से आवाज़ दी थी.
“आरोहीजी सुनिए…”
मैं ठिठक गई. एक आर्द्र पुरुष कंठ की आवाज़ ने मेरे कदमों पर विराम लगा दिया था.
स्वर की दिशा में मैं मुड़ गई थी. जानती हूं आप सभी को मेरा यह निर्णय मूर्खतापूर्ण लग रहा होगा, परंतु उस समय मुझे वही सही लगा था.

वेदना में एक शक्ति होती है, जो दृष्टि देती है अगोचर के सदृश्य पहुंच जाने की. आप इसे मेरी शेखी समझ सकते हैं, किंतु घनीभूत वेदना के इन पलों में ही मुझे उस रात के पीछे की कई रातों को शब्दबद्ध कर पाने का साहस आया था.
संभव है आप जानना चाहेंगे कि वह रात कैसी थी? किंतु कुछ निजी बातों का वर्णन नहीं होता और न उन बातों का इस बात से कोई प्रयोजन है. आपके लिए उसका यही महत्व हो सकता है कि वह रात मुझे उपलब्ध कैसे हुई? ऐसा क्या हुआ था मेरे पूर्वकालिक जीवन में, जो उस रात अपहरणकर्ताओं की तरह आकर पुलिस मुझे बंदी बनाकर ले गई थी.
मेरी स्थिति मानो भावानुभावों के घेरे से बाहर निकलकर अन्य व्यक्तियों और समाज के लिए समस्या के रूप में बाहर आई थी, परंतु मैं असाधारण रूप से स्थितप्रज्ञ थी. पौ फटने तक बहुत-से सूत्र समाज के हाथ आए थे, जो मेरे असामाजिक और चरित्रहीन होने को प्रमाणित करते थे.
अक्सर समाज ऐसी महिलाओं को अपनाने से इंकार कर देता है, जो अपनी इज़्ज़त की रक्षा नहीं कर पातीं अथवा शादी से पहले किसी के साथ संबंध बनाती हैं. मैं सोचती हूं, तो लगता है कि बंदिशों का जाल स्त्री के लिए ही कुछ इस तरह बुना गया है कि बंदिशें ख़ुद की मर्ज़ी से तोड़े अथवा किसी और के अत्याचार से, बदनाम स्त्री ही होती है.
मैं अब उस दिन का प्रत्यावलोकन करती हूं, तो पाती हूं कि उस दिन की सहर भी सामान्य ही थी. मेरे पति श्री अरविंद सिंह अपने कार्यालय जाने की तैयारी में व्यस्त थे. मैं, जैसा कि हर कामकाजी स्त्री करती है, कार्यालय जाने से पहले घर के सारे काम समाप्त करने में लगी थी.

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यह समाज और उसका परिवार स्त्री के ऊपर पंच बने बैठे रहते हैं. उसे जैसे भूल करने का अधिकार ही प्राप्त नहीं है. एक पुरुष अपने कार्यालय का काम करने में ही थक जाता है, वहीं स्त्री घर और बाहर के मध्य सामंजस्य स्थापित करते हुए भी आलोचनाओं का शिकार होती रहती है.
सेवानिवृति के बाद सास-ससुर हमारे साथ हैदराबाद रहने आ गए थे. मैं हैदराबाद के एक प्रख्यात स्कूल में शास्त्रीय संगीत पढ़ाती थी. एक अध्यापिका के रूप में भले ही मुझे प्रशंसा मिले अथवा एक गायिका के रूप में प्रशस्तिपत्र प्राप्त हो, लेकिन एक गृहिणी के रूप में मैं पराजित थी. ऐसा मेरी सास और पति का मत था. वैसे भी शादी के आठ साल के बाद भी मेरा मां न बन पाना मेरी विफलताओं में से एक था. समाज हर अवस्था में स्त्री को ही कठघरे में खड़ा करता है, पुरुष तो सदा से ही स्वतंत्र है. वैसे भी जो स्त्री मां न बन पाए, समाज के लिए उसकी अन्य सभी उपलब्धियां कोई मायने नहीं रखतीं थीं.
नाट्य अकादमी में उस शाम मेरी प्रस्तुति थी. संगीत प्रेमियों के बीच कुछ मेरे भी मित्र उपस्थित थे. मेरे माता-पिता सुदूर ग्वालियर से आ नहीं सकते थे और मेरे ससुरालवालों के पास समय बर्बाद करने हेतु समय नहीं था, परंतु मैं मुदित थी आनेवाले समय से अनभिज्ञ.
प्रस्तुति के पश्‍चात् घर लौटने की कोई शीघ्रता तो नहीं थी, किंतु लौटना तो था ही. मैं घर से कुछ ही दूरी पर टैक्सी से उतर गई थी. मुझे यहां से घर तक पैदल जाना पसंद था. स्वयं के साथ बिताया हुआ यह एकांत मुझे बहुत प्रिय था, परंतु उस रात मैं अकेली कहां थी. वह भी तो था. हां, यह बात मुझे ज्ञात तब हुई, जब उसने मुझे पीछे से आवाज़ दी थी.
“आरोहीजी सुनिए…”

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मैं ठिठक गई. एक आर्द्र पुरुष कंठ की आवाज़ ने मेरे कदमों पर विराम लगा दिया था.
स्वर की दिशा में मैं मुड़ गई थी. जानती हूं आप सभी को मेरा यह निर्णय मूर्खतापूर्ण लग रहा होगा, परंतु उस समय मुझे वही सही लगा था.
सामने वह खड़ा था. मध्यम कदकाठी, गेहुंआ रंग और चेहरे पर बिखरे बेतरतीब बाल. उस चेहरे की जिस बात ने मुझे सम्मोहित कर लिया था, वह थी उसकी
बाल सुलभ मुस्कान और छोटी किंतु गहरी आंखें. उसका चेहरा परिचित अवश्य था, किंतु हमारी कोई घनिष्ठता नहीं थी. नाट्य कला में कई बार संलिप्त मुलाक़ातें हुई थीं. वह सितार वादक था. आयु में मुझसे सात-आठ वर्ष छोटा भी था. अत: हमारा मित्र वर्ग भी भिन्न था. हां, कई मौक़ों पर हमने एक साथ प्रस्तुति अवश्य दी थी. इतनी कम उम्र में संगीत को लेकर उसकी संजीदगी की मैंने एक-दो बार प्रशंसा भी की थी. हमारा परिचय मात्र इतना ही था.
कहना नहीं होगा कि कमरे की सज्जा मुझे पसंद आई थी. मेरे अंदरूनी उत्साह को मैंने तनिक भी छिपाया नहीं था.
“शशि, तुम्हारा यह कमरा, मकान तो नहीं लगता.”
“फिर?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा था.
“घर लगता है, यहां की नीरवता में सुंदरता है.”
शशि की दोनों आंखों में चमक थी. मेरे लिए इस चमक का अर्थ अंजाना नहीं था.
संभवत: पहले तो मुझे उसका नाम याद ही नहीं आया था. फ़िर उसने ही याद दिलाया था.
“मैं शशि!” उसकी वाणी में उत्साह का पुट था, जिसे मैंने नज़रअंदाज़ कर दिया था. यहां पर यह कहना कोई अतिश्योक्तिनहीं होगी कि अप्रत्याशित रूप से मैं भी आवेश में आ गई थी, किंतु मैंने अपने उत्साह को संजीदगी का नक़ाब पहना दिया था.
“क्या बात है, आप यहां?”
“मैं सामनेवाली इमारत में रहता हूं.”
“हम्म्…” इतना भर कह मैं जाने के लिए मुड़ी ही थी कि उसकी आवाज़ ने पुनः मेरे कदमों को रोक लिया था.
“संभवतः आप हाईटेक सिटी के पास रहती हैं?” मेरी उदासीनता ने उसके उत्साह को लेशमात्र भी कम नहीं किया था.
“जान पड़ता है आपको मेरे बारे में काफ़ी जानकारी है?”
“जी, आपको प्रतिदिन आता-जाता देखता हूं.” इस बार उसकी वाणी तनिक झिझकी थी.
“क्या आप मेरा पीछा करते रहते हैं?” अपनी वाणी को सख़्त कर मैंने पूछा था.
कुछ समय के लिए उसके चेहरे का रंग अवश्य उड़ गया था, परंतु शीघ्र ही अपनी वाणी को संतुलित कर पुनः बोला था.
“पीछा तो नहीं, परंतु आपका अनुसरण अवश्य करता हूं. आपके स्वर और विशेषत: आपकी लिखी हुई रचनाओं का अनुगामी हूं.”
उसकी वाणी की मधुरता में लेशमात्र भी बनावट नहीं थी. उसकी साफ़गोई ने मुझे भी सहज कर दिया था.
“धन्यवाद! मेरी रचनाएं पढ़ी हैं तुमने?” मैं स्वयं अचंभित थी कि कितनी जल्दी मैंने आप से तुम तक का सफ़र तय कर लिया था. इस बात का अनुभव उसे भी हो गया था.

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“पढ़ा, कई-कई दफ़ा पढ़ा. यहां आपसे माफ़ी चाहूंगा कि आपसे बिना अनुमति लिए उनमें से कइयों को सुरबद्ध करने की धृष्टता भी की है.”
“क्या सच में! कभी समय हो, तो सुनना चाहूंगी.”
अस्पष्ट अंधेरे में खड़े लैंप पोस्ट की मंद रोशनी में भी उसने मेरे नेत्रों की तरलता में मिश्रित उत्साह को देख लिया था.
“कभी क्यों? आज ही क्यों नहीं? वैसे भी आप कुछ समय पश्‍चात् ही जा पाएंगी.”
“ऐसा क्यों?” मेरा संदेह मिश्रित स्वर सुन वह पुनः सकुचा गया था.
“आगे भीड़ ने मार्ग बंद किया हुआ है.”
“क्यों? कोई दुर्घटना हुई है क्या?”
वह कुछ कहता कि सामने से पुलिस की गाड़ी और एंबुलेंस आती दिखाई दी थीं. दोनों गाड़ियों के निकल जाने के बाद वह मेरे निकट आ गया था.
“कुछ लोगों ने सरेआम एक लड़के और उसकी पत्नी को गोली मार दी है.”
“हे भगवान! क्यों भला?”
“ठीक-ठीक कारण तो ज्ञात नहीं, परंतु कुछ लोग बता रहे थे कि दोनों ने घरवालों के विरुद्ध अंतर्जातीय विवाह किया था.”
“यह उन्माद और कितने निर्दोष प्राणों की बलि लेगा?” मेरे स्वर की निराशा को उसने भांप लिया था.
“हम तो मात्र उम्मीद कर सकते हैं.”
चंद सेकंड तक एक मौन हमारे मध्य पसरा रहा. फिर उसने ही मौन-भंग किया था.
“शीघ्र घर पहुंचने की आपकी व्यग्रता को मैं समझ सकता हूं. घर पर सब आपके लिए परेशान भी होंगे, किंतु मेरे विचार में इन हालात में अभी आपका जाना ठीक नहीं होगा.”
घर! उस फ्लैट को, जहां मेरे पति और सास-ससुर रहते थे. उसे और चाहे कुछ भी कहो, लेकिन मेरा घर तो नहीं कह सकते थे. मुझे इस बात का आभास था कि परेशान वे मेरे लिए नहीं, बल्कि रात्रि भोजन में हो रहे विलंब हेतु हो रहे होंगे. उस स्थान से चंद कदमों का ही तो फ़ासला था, परंतु मेरे कदम शशि के घर की तरफ़ मुड़ गए थे.

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काफ़ी बड़ा और हवादार कमरा था. पश्‍चिम की तरफ़ एक छोटी-सी बालकनी थी. कमरे की सजावट गृहस्वामी के संगीत के प्रति प्रेम को प्रदर्शित कर रही थी. एक कोने में सितार था, तो दूसरे कोने में गिटार भी रखा था, जो उसके पाश्‍चात्य संगीत के प्रति रुझान को भी साबित कर रहा था. सामने की दीवार के बीचोंबीच एक स्त्री की आदमकद पेंटिंग लगी हुई थी, जो कुछ गा रही थी. चित्र में एक छोटी-सी खिड़की के बाहर उदय होता हुआ सूर्य भी दिख रहा था, जो यह प्रदर्शित करता था कि वह स्त्री प्रभाती गा रही थी. प्रभाती यानी सुबह के समय गाया जानेवाला राग.
कहना नहीं होगा कि कमरे की सज्जा मुझे पसंद आई थी. मेरे अंदरूनी उत्साह को मैंने तनिक भी छिपाया नहीं था.
“शशि, तुम्हारा यह कमरा, मकान तो नहीं लगता.”
“फिर?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा था.
“घर लगता है, यहां की नीरवता में सुंदरता है.”
शशि की दोनों आंखों में चमक थी. मेरे लिए इस चमक का अर्थ अंजाना नहीं था. मैंने इसके पहले भी यह चमक देखी थी. कई वर्षों पहले अपनी आंखों में. उन आंखों की चमक का सामना कर पाने में मैं असमर्थ हो गई थी, इसलिए बातों का रुख दूसरी तरफ़ करने की चेष्टा की थी.
“चलो चाय पिलाओ और गाना सुनाओ.”
“आपकी आज्ञा को ठुकरा नहीं सकता, परंतु यदि आप साथ दें, तो आनंद आ जाएगा.”
“तुम शुरू तो करो…”
शशि ने इंडक्शन कुकर पर केतली चढ़ाई और भरी आवाज़ में गाना शुरू किया-
तेरी यादों की ख़ुशबू से भीगा मेरा तकिया
आज भी तेरी सांसों की राह तकता है
तू जो सपने टांग आई थी मेरे कमरे की खूंटी पर
आज भी हर आहट पर हिलता है.
वो तू ही थी या कोई और थी
आज भी क्या वह तुझमें ज़िंदा है… आ… आ…
मैं मंत्रमुग्ध होकर अपनी रचना को उसके मुख से सुन रही थी. स्वयं के लिखे शब्द जैसे अपरिचित बन उससे मित्रता निभा रहे थे. उसके सुरों ने जैसे मेरे शब्दों को रूह प्रदान कर दी थी. मुझे यूं निहारता देखकर वह रुक गया था.

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“क्या बात है, संगीत अच्छा नहीं लगा क्या?”
“तुमने मुझे आश्‍चर्यचकित कर दिया. ऐसा लग रहा था, जैसे- मेरी देह को रूह मिल गई हो.”
बड़ी नम्रता से उसने गर्दन झुका ली थी और फिर चाय का कप मेरी तरफ़ बढ़ाता हुआ बोला था.
“जब लोग आपकी इस रचना को पढ़ेंगे, तो प्रथम दृष्टि में उन्हें यह विरह में डूबी हुई रोमानी कविता प्रतीत होगी, परंतु वास्तविकता भिन्न है.”
उसकी आवाज़ में पता नहीं ऐसा क्या था कि मैं मुग्ध होकर उसे अपलक देखती रह गई थी.
“बोलो शशि, अब मौन मत रहो.” मैंने उसका नाम लिया और वह मुझे एकटक देखता रह गया था.
“आरोही, यह एक रोमानी कविता है, जो स्वयं से स्वयं को प्रेम करने को कह रही है.”
यह अलौकिक प्रेम था. मेरी इस कविता को न कोई समझ पाया था और न कभी मैंने समझाने का प्रयत्न ही किया था. यथार्थ में प्रियतम भी मैं थी और प्रेयसी भी मैं. प्रियतम मेरा अतीत था और प्रेयसी मेरा वर्तमान. अतीत मुझे मेरे वास्तविक रूप, मेरे सपनों और मेरी भावनाओं से पुनः समागम कराना चाहता है और मेरा वर्तमान उन्हें मस्तिष्क के किसी अंधे कोने में बंद कर चुका था.
आप कभी दर्पण के सम्मुख मैं के साथ खड़े हुए हैं. कभी मैं को निहारा है. कभी अपनी आंखों से मैं को देखा है. कभी मैं के साथ समय व्यतीत किया है. मेरे साथ उस पल यही सब हो रहा था.
मैं उस क्षण को खोना नहीं चाहती थी, हाथ बढ़ाकर थाम लेना चाहती थी. मैंने वही किया भी था.
उसके होठों से अपना नाम सुनना कानों को मधुरता प्रदान कर रहा था. कब चाय का कप नीचे गिरकर बिखर गया, मुझे पता ही नहीं चला. मैं तो स्वयं को समेटने में व्यस्त थी. आगे बढ़कर मैंने उसके गर्म कपोलों को अपनी ठंडी हथेलियों में भर लिया था.
वह मेरा प्रथम पुरुष स्पर्श अथवा प्रथम परपुरुष स्पर्श नहीं था. इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मेरे अपने पति के अतिरिक्त अन्य पुरुषों से भी संबंध थे, किंतु पुरुष सहकर्मियों के साथ कभी-कभी तो हाथ मिलाने अथवा किसी भी वस्तु के आदान-प्रदान के दौरान आंशिक रूप से स्पर्श तो हो ही जाता था, परंतु आज के इस स्पर्श ने जैसे मुझे वास्तव में छू लिया था. कभी खिलते हुए फूल की पंखुड़ियों को देखा है. जब वे खिल रहे होते हैं, तो अपनी सभी पंखुड़ियों को फैला देते हैं, जैसे सूर्य की किरणों को अपने अंदर समेट लेना चाहते हों.

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मैं भी वही चाहती थी. उसके सीने से लगकर आंखें बंद किए हुए मैंने उसकी गर्माहट का आनंद लिया था. जब उसकी उंगलियां मेरे केशों का स्पर्श करतीं, तो मैं सिहर उठती थी. कमरे में और कोई नहीं. स़िर्फ हम दोनों थे. उसने मुझे और सघनता के साथ जकड़ रखा था. मेरी काया की अभियाचना को मैं आज स्पष्ट सुन पा रही थी. अभी बहुत कुछ कहना शेष था, परंतु इसी बीच वे आ गए थे.
‘ठक-ठक-ठक-ठक…’
दरवाज़े पर हुई तेज़ दस्तक ने हमें पुनः यथार्थ में ला पटका था. द्वार पर पुलिस की एक छोटी टीम खड़ी थी. उन्होंने न कुछ पूछा और न हम कुछ कह पाए. अकारण लगभग घसीटते हुए नीचे गाड़ी में बैठा दिया गया था.
थाने जाने पर ज्ञात हुआ कि शशि के पड़ोसी के बुलाने पर पुलिस आई थी. उनकी धारणा थी कि शशि ने घर में वारांगना बुलाई थी. उस रात मैं दो बातें समझ गई थी.
एक- मिथ्या आरोप लगाकर समाज के सामने किसी को चरित्रहीन सिद्ध करना प्रतिकार पाने का सुगम और द्रुतगामी मार्ग था, दो- मैं इतने सालों से स्वयं को छल रही थी. मैं वह थी ही नहीं, जिसकी भूमिका मैं इतने वर्षों से निभा रही थी. समय हो गया था वास्तविक भूमिका को अंगीकार करने का.
उस रात के बाद मेरी पुलिस के उच्च अधिकारियों से बातचीत हुई.
येन-केन-प्रकारेण मैं और शशि वहां से बाहर आए, किंतु पौ फटने तक सारा चित्र बदल गया था. अर्थ के बहुत सारे सूत्र मेरे हाथ में थे, लेकिन देह जैसे झर गई थी. अतएव मैं अपनी सहेली के घर चली गई थी. पिता के घर नहीं गई थी. कारण आपको स्पष्ट होगा. वहां भी मेरा स्वागत लांछनों से ही होना तय था. इस समय मैं एकांत और शांति चाहती थी.
थककर, किंतु शांति पाकर मैं सो गई थी और संभवतः दो-तीन दिन तक कुछ और नहीं किया था. जब मैं उठी, मैं जाग चुकी थी. मैंने संभवतः इतने वर्षों में पहली बार स्वयं को दर्पण में निहारा था. अपने जीवन के 33 वर्षों का लेखा-जोखा निकला और निर्णय ले लिया था.
कहना न होगा कि मेरे तलाक़ का मार्ग सरल और सहज नहीं था. अवहेलना, लांछन, बहिष्कार, तिरस्कार और अपमान की आंधियों का सामना करना पड़ा था. शशि मेरे साथ था. हर परीक्षा और उपेक्षा हमने साथ ही झेली थी.

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मेरा संघर्ष चलता रहा और मेरे अंधकार के पट पर बिजली की तरह थिरकती हुई एक रेखा- शशि. मेरी अनेक चिंताओं और पीड़ा में पीड़ित शशि, अपनी पीड़ा से अंजान शशि, अपने भविष्य को मेरे वर्तमान पर बलि चढ़ाता हुआ शशि. उसने जैसे मेरे भीतर की शून्यता को विधाता से अपने लिए मांग लिया था.
उसके स्वप्नों से आलिंगनबद्ध मैं, शायद उसकी वास्तविकता को कभी समझ ही नहीं पाती, यदि एक दिन शशि की मां मुझसे मिलने न आतीं तो. आज सोचती हूं, तो लगता है उन्होंने मुझे कुछ भी ग़लत नहीं कहा था. उनके अपशब्दों में भी उनका अपने पुत्र के प्रति प्रेम ही तो था. यदि वे जानकारी नहीं देतीं, तो मैं कहां जान पाती कि शशि को पेरिस से इतना अच्छा ऑफर आया था. यदि वे नहीं बतातीं, तो मैं कहां जान पाती कि मैं ही वह कारण थी, जो शशि को अपने परिवार के प्रति विद्रोही और अपने स्वप्नों के प्रति लापरवाह बना रही थी.
शशि स्वयं को धीरे-धीरे खो रहा था और मुझसे अधिक स्वयं को खोने की पीड़ा का अनुभव किसे था.
मैंने स्वयं को शशि से दूर कर लिया था. आरंभ में उसने मुझसे संपर्क करने का प्रयास किया था, किंतु मेरे प्रमाद ने शीघ्र ही हमारे मध्य एक अबोला कीदीवार बना दी थी. वह चला गया था. जाने से पूर्व न वह मुझसे मिलने आया और न ही मैंने उसे फोन किया. कुछ ही महीनों बाद मैंने भी तेलंगाना के एक छोटे-से शहर में स्थानांतरण ले लिया और यहीं बस गई. कभी-कभी प्रेम की पूर्णता उसके अधूरेपन में ही होती है.
प्रेम! मैं शशि से प्रेम करती थी और आज भी करती हूं, तभी तो उसे जाने दिया. जहां बंधन आ जाता है, प्रेम वहीं समाप्त हो जाता है. साहित्य में, यात्रा में, कला में, जीवन में- सब जगह वही मनमोहक प्रवाह और आरंभ है प्रेम. प्रेम पक्षी के समान उड़ान भरने की स्वतंत्रता देता है, देवता बनाकर उसे इमारत में कैद नहीं करता.

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पिछले पांच वर्षों में मैं उससे मिली नहीं थी और न ही कभी उसका फोन आया था. हालांकि मैं उसकी कुशलता की सूचना अवश्य लेती रहती थी. वह पेरिस में कब तक रहा, फ्रांस के किस शहर को उसने अपना निवास स्थान बनाया, कब-कब वह भारत आया और यहां तक कि कनाडा से लेकर श्रीलंका तक के उसके हर प्रदर्शन की मुझे जानकारी थी, किंतु मैं चतुरा सूचनाओं का स्रोत भांप न सकी थी. जहां मैंने विरह में प्रेम को पूर्ण मान लिया था, वहीं उसने अपने स्वप्नों के साथ मेरे स्वप्नों को जोड़कर प्रेम की संपूूर्णता को अंगीकार कर लिया था.
मैं अब तक यह सोच रही थी कि शशि पर से मेरी यादों का विषम ज्वर उतर गया होगा, किंतु मैं ग़लत सोच बैठी थी. अत: कल जब ईमेल के इस दौर में मेरे घर डाकिया पत्र लेकर आया था, मैं चिहुंक गई थी. सुंदर व गोल लिखावट के साथ ही परिचित मंजुल सुगंध मेरे गले में बांहें डालकर झूल गई थी. पत्र में कोई संबोधन नहीं था और न ही भेजनेवाले का नाम था, किंतु मात्र एक वाक्य से लिखनेवाले ने मेरे मन के तारों को झंकृत कर दिया था…
“… प्रभाती साथ गाने का समय हो गया है, जाग रही हो ना!…”

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पल्लवी पुंडीर
Short Story- Prabhati

“ये सब क्या चल रहा है इनके यहां.” यश ने प्रॉपर्टी एजेंट से पूछा, जो ख़ुद भी सिंगापोरियन चाइनीज़ था.
“नॉट गुड, इस तरह की पूजा ज़्यादातर आत्माओं से कम्युनिकेट करने के लिए की जाती हैं.”
यश और स्वाति की आंखें मिलीं, दोनों की आंखों में हैरतमिश्रित बेचारगी तैर रही थी.

“ये जगह तो स्वर्ग-सी सुंदर है. इतनी सुंदर जगह का तो मुझे कभी सपना भी नहीं आया.” टैक्सी में बैठकर चांगी एयरपोर्ट से जुरोंग की तरफ़ जाती नवविवाहिता स्वाति ने अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हुए यश से कहा.
“ये तो है, इसीलिए तो फ्लाइट में इतनी सारी लाल चूड़ेवालियां अपने पतियों के साथ दिख रही थीं. नॉर्थ इंडिया का पसंदीदा हनीमून डेस्टिनेशन बन गया है सिंगापुर.” यश का इशारा फ्लाइट में साथ यात्रा करनेवाले नवविवाहित जोड़ों की तरफ़ था.
“ओह यश! आई एम सो लकी कि तुम यहां काम करते हो और यहां के स्थायी नागरिक बन चुके हो. मुझे तो क़िस्मत ने हमेशा के लिए इस ख़ूबसूरत हनीमून डेस्टिनेशन में भेज दिया.” स्वाति का रोम-रोम पुलकित हो रहा था.
यश ने उसे कुछ इस अंदाज़ से देखा जैसे कह रहा हो कि तुम नहीं जानती कि जन्नत की हक़ीक़त क्या है, पर प्रत्यक्ष में उसने कुछ नहीं कहा, क्योंकि वह उसके उत्साह को कम नहीं करना चाहता था.
“इस जगह को देखकर ऐसा जान पड़ता है, जैसे प्लास्टिक के बड़े-बड़े बगीचों के बीच में गगनचुंबी इमारतों के मॉडल्स रख दिए गए हों. पूरा का पूरा देश ही किसी फिल्मी सेट-सा प्रतीत होता है. जिधर नज़र जाती है, वह जगह तस्वीर उतारने के लायक़ लगती है.” स्वाति घर से बाहर निकलते ही उमंग-उत्साह के साथ चहकने लगती. कभी वह सेल्फी लेती, तो कभी किसी अच्छी-सी जगह पर खड़ी होकर यश से अपनी तस्वीर निकालने को कहती.
यश भी उसे ज़िंदगी के पूरे मज़े लेने दे रहा था. नवविवाहित जोड़े को इसी तरह स्वप्ननगरी में विचरण करते-करते कब साल बीत गया पता ही न चला. फिर एक दिन यश के मम्मी-डैडी का फोन आया कि वह जल्दी ही उनसे मिलने सिंगापुर आएंगे. ख़बर सुनकर स्वाति ख़ुश हो गई, “मैं तो मम्मी-डैडी को सैंटोसा आइलैंड लेकर जाऊंगी, बर्ड पार्क घुमाऊंगी… और हां, वो जगह तो ज़रूर घुमाने ले जाऊंगी, जहां नेताजी ने आज़ाद हिंद फौज बनाई थी.”
“घुमाने तो उन्हें बाद में ले जाना, पहले उनके रहने का इंतज़ाम तो कर लो. जल्दी से जल्दी हमें दूसरा फ्लैट लेना पड़ेगा. हमारे इस एक बेडरूमवाले फ्लैट में मम्मी-डैडी हमारे साथ कैसे रहेंगे?”
“ओह हां, ये तो मैंने सोचा ही नहीं.” स्वाति जैसे नींद से जागी.
“नहीं सोचा, तो अब सोचना शुरू कर दो. मेरे पास तो ज़्यादा वक़्त नहीं है. तुम कल से ही रियल इस्टेट की वेबसाइट्स पर जाकर अपने हिसाब से किराए का फ्लैट देखना शुरू कर दो.”
जब स्वाति ने रियल इस्टेट वेबसाइट्स को ढूंढ़ना शुरू किया, तो हैरान रह गई, क्योंकि कई किराए के लिए उपलब्ध घरों के विज्ञापनों पर साफ़ लिखा था कि नॉट फॉर इंडियन्स. जब महीनों की खोज के बाद भी कोई मकान मन को न भाया, तो स्वाति ने यश पर ख़ुद का फ्लैट ख़रीदने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया.
“एक न एक दिन तो हमें अपना फ्लैट ख़रीदना ही है, तो क्यों न  बार-बार किराए का घर ढूढ़ने का झंझट अभी से ख़त्म कर दें और अपना ही फ्लैट ख़रीद लें.”
यश को स्वाति की बात मानने में ही समझदारी लगी और किराए के फ्लैट की तलाश अब फ्लैट ख़रीदने की मुहिम में बदल गई. क़िस्मत से बुकिट बटोकफ एरिया में एक कंडोमिनियम जल्दी ही पसंद आ गया. अगले दो महीनों में ख़रीद से संबंधित सभी औपचारिकताएं भी पूरी हो गईं. सिंगापोरियन्स से स्टेटस स्टैंडर्ड के तीसरे मानक को पाने के बाद स्वाति फूली नहीं समा रही थी. कैश, कार और कंडोमिनियम ये ही तीन मानक हैं सिंगापोरियन्स के ख़ुशहाल लाइफस्टाइल के.

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जब यश और स्वाति फाइनल सेटलमेंट के बाद प्रॉपर्टी एजेंट के साथ फ्लैट पर चाबी लेने पहुंचे, तो देखा कि अगले फ्लैट में रहनेवाले अधेड़ चाइनीज़ कपल्स के यहां कुछ अलग तरह का पूजा-पाठ चल रहा था और गृहस्वामी अपने ड्रॉइंगरूम में बने मंदिर के आगे कुछ मंत्र जपता हुआ अपनी पीठ में एक मोटी-सी रस्सी मार रहा था और गृहस्वामिनी एक अजीब-सा सिल्क का गाउन और स्कार्फ पहनकर सिंहासननुमा कुर्सी पर विराजमान थी. वो अपने मुंह से कुछ अजीब-सी आवाज़ें निकाल रही थी. एक और कोई जोड़ा हाथ में बड़ी-बड़ी थालियां, जिनमें कुछ खाद्य पदार्थ और नकली करेंसी थी, लेकर खड़े थे.
“ये सब क्या चल रहा है इनके यहां.” यश ने प्रॉपर्टी एजेंट से पूछा, जो ख़ुद भी सिंगापोरियन चाइनीज़ था.
“नॉट गुड, इस तरह की पूजा ज़्यादातर आत्माओं से कम्युनिकेट करने के लिए की जाती हैं.”
यश और स्वाति की आंखें मिलीं, दोनों की आंखों में हैरतमिश्रित बेचारगी तैर रही थी. अब तक की सारी जमा-पूंजी लगाने और बैंक से अच्छी-ख़ासी रक़म फाइनेंस कराने के बाद में जैसे-तैसे तो ये फ्लैट ख़रीदा गया और शुरुआत हो रही है, तो इस ख़बर के साथ कि अगले फ्लैट में आत्माओं से कम्युनिकेट करनेवाले लोग रहते हैं. लेकिन अब क्या हो सकता था. यश के मम्मी-डैडी के आने का समय क़रीब आता जा रहा था.
फॉल्टी सामान होता, तो रसीद दिखाकर दुकान से पैसे वापस ले आते, पर इस घर का क्या करें, जिसे क़रीब तीन महीने तक सिंगापुर के कोने-कोने में लगभग सौ फ्लैट्स देखने के बाद ख़रीदा गया था. जब से इसे फाइनल किया था, तब से इससे दिल से भी जुड़ गए थे. टॉप क्लास फर्नीचर शोरूम्स में घंटों घूम-घूमकर फ्लैट के इंटीरियर के साथ मैच करनेवाले फर्नीचर्स भी पेशगी देकर फाइनल कर दिए गए थे. उस दिन फ्लैट की चाबी लेकर जाते समय दोनों ख़ामोश थे. नए घर में प्रवेश की ख़ुशी थोड़ी कम हो गई थी.
“मैं जानता हूं स्वाति कि तुम्हारे मन में इस वक़्त क्या चल रहा है.” आख़िरकार यश ने चुप्पी तोड़ी.
“कुछ अजीब-सा महसूस हो रहा है यश. इतने शौक़ से घर लिया और पहुंचने के पहले ही पड़ोस में अजीब चीज़ें देखने को मिल रही हैं.”
“ऐसा कौन-सा आसमान फट गया है स्वाति? वो लोग अपने घर में अपने तरी़के से पूजा कर रहे थे, जैसे हम अपने घर में अपने तरी़के से करते हैं. कोई अपने घर में क्या कर रहा है, इससे हमारा कोई सरोकार नहीं होना चाहिए. वो लोग अपने फ्लैट में रहेंगे और हम लोग अपने में.”
“मगर अपने प्रॉपर्टी एजेंट ने तो उनकी पूजा का कुछ और ही स्पष्टीकरण दिया था. वह भी तो लोकल चाइनीज़ है, उसे इन सब क्रिया-कलापों का अर्थ पता ही होगा. किराए का घर होता, तो भी कोई बात न थी, पर अपने इस आशियाने में तो मैंने और तुमने उम्र बिताने के ख़्वाब देखे हैं.”
“इसके बारे में अधिक सोचने से कोई फ़ायदा नहीं होनेवाला. अब 15 दिन बाद तो हमें अपने इस आशियाने में शिफ्ट होना ही है. पूर्वाग्रह के साथ शुरुआत करोगी, तो कभी ख़ुश नहीं रह पाओगी.”
स्वाति ने सोचा- ‘यश ठीक ही कह रहा है. अपेक्षाकृत ठीक होगा कि वह पूरे उमंग-उत्साह के साथ नए घर में प्रवेश करे. वह सब कुछ भूलकर गृहप्रवेश की तैयारी में लग गई.
एक फ्लोर पर आठ घर बने हुए थे. चार फ्लैट एक तरफ़ और चार उसके दूसरी तरफ़. मगर ये क्या सामनेवाले फ्लैट में रहनेवाली चाइनीज़ बुढ़िया और उसका अविवाहित बेटा यश और स्वाति को देखते ही अपने फ्लैट का दरवाज़ा बंद कर लेते थे. आख़िरी कोने के फ्लैट में रहनेवाले मलेशियन परिवार में पति-पत्नी और तीन टीनएजर बेटियां थीं. मां-बेटी तो
कभी-कभार ग़लती से मुस्कुराकर नए पड़ोसी से ‘हेलो-हाय’ कर लिया करती थीं. लेकिन उस मलेशियन आदमी को तो यश और स्वाति के साथ लिफ्ट में आना-जाना भी पसंद न था. उन्हें लिफ्ट में जाता देखकर वह अपना रास्ता बदलकर दूसरी तरफ़ से सीढ़ियों से जाता-आता था.
जब उनके साइड में रहनेवालों का यह हाल था, तो दूसरी तरफ़ रहनेवालों की तरफ़ देखने की तो यश और स्वाति हिम्मत ही कैसे जुटाते? हां, उनकी तरफ़ के लोगों में उन्हें देखकर कोई वाक़ई ख़ुश होता था, तो वे थे ये अजीब-सी पूजा करनेवाले अधेड़ चाइनीज़ कपल्स- लिमपेंग आंटी और जोसुआ अंकल.
सिंगापुर के फ्लैट्स में मुख्यद्वार पर दो दरवाज़े लगे होते हैं. एक लकड़ी का, जिसे अधिकांश लोग स़िर्फ रात के समय ही बंद करते हैं और दूसरा लोहे की जालीवाला. स्वाति भी दिन के समय दूसरों की तरह स़िर्फ लोहे की जालीवाले दरवाज़े को ही बंद रखती और लकड़ीवाला दरवाज़ा पूरे दिन खुला रहता. ऐसा करने से एक तो कॉरिडोर में आते-जाते लोगों को देखकर अकेलेपन का एहसास न होता, दूसरा खुली हवा के आर-पार का आनंद भी मिलता था. लिमपेंग आंटी और जोसुआ अंकल जब भी कॉरिडोर से गुज़रते, तो दो पल रुककर उसका हालचाल ज़रूर पूछते. साथ ही यश और स्वाति से यह कहना भी नहीं भूलते कि वे यहां परदेस में अपने आपको अकेला न समझें और कोई भी ज़रूरत होने पर उन्हें ज़रूर बताएं.


लिमपेंग आंटी और जोसुआ अंकल बौद्ध धर्म मानने के साथ-साथ शुद्ध शाकाहारी थे. जब लिमपेंग आंटी को पता चला कि यश और स्वाति भी वेजीटेरियन हैं, तो वह अक्सर ही कुछ न कुछ चाइनीज़ वेजीटेरियन फूड बनाकर दे जातीं. चाइनीज़ बहुलवाले देश में वेजीटेरियन पड़ोसी मिलना यश और स्वाति के लिए भी बड़े ही सौभाग्य की बात थी, पर स्वाति की सोच पर तो पूर्वाग्रह की बेड़ियां पड़ चुकी थीं.

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जैसे ही लिमपेंग आंटी ताज़ा, ख़ुशबूदार भोजन स्वाति को पकड़ाकर जातीं, वैसे ही स्वाति पूरा खाना फेंक देती. उसे लगता कि अगर वह लिमपेंग आंटी के घर के भोजन को खाएगी, तो किसी टोने-टोटके का शिकार हो जाएगी. यह सिलसिला पूरे दो साल तक चला और आगे भी चलता रहता अगर परिस्थितियों ने स्वाति को उसकी क्रूरता का बोध न कराया होता.
स्वाति की प्रेग्नेंसी का तीसरा महीना चल रहा था कि उसे चिकन पॉक्स हो गया. डॉक्टर ने पूरी बॉडी पर लोशन लगाने को दिए. तीसरे दिन चिकन पॉक्स के कारण तेज़ बुख़ार भी हो गया. यश का प्रोजेक्ट लाइव जा रहा था, उसे स्वाति की देखभाल के लिए छुट्टियां मिलने की कोई गुंजाइश न थी, बल्कि ऐसे समय में उसका स्वाति से थोड़ा दूर रहना ही ठीक था. अब स्वाति क्या करे और कहां जाए… किससे मदद के लिए गुहार करे?
यश इंडियन रेस्टोरेंट से फोन द्वारा खाने की होम डिलीवरी करा लेता और स्वाति के लिए एक प्लेट उसके कमरे के दरवाज़े पर रखकर चला जाता था. उस शाम जब यश ऑफिस से लौटकर आ रहा था, तो लिफ्ट में उसकी मुलाक़ात लिमपेंग आंटी से हो गई.
“क्या बात है यश, मैंने तीन-चार दिन से स्वाति को नहीं देखा. वो इंडिया चली गई है क्या?” लिमपेंग आंटी की आंखों में बेचैनी थी.
यश से सारी घटना का ब्यौरा मिलते ही वह बिना देरी किए स्वाति की सेवा में हाज़िर हो गईं.
“जब तक स्वाति ठीक नहीं हो जाती, मैं उसके साथ तुम्हारे ही घर में रहूंगी यश.”
“मगर आंटी अगर उसके साथ रहने से आपको भी चिकन पॉक्स हो गया तो…?”
“तो क्या… अगर उसकी जगह मेरी बेटी इन्हीं हालात से गुज़र रही होती, तो क्या मैं उसको छूत के डर के कारण उसके हाल पर छोड़ देती? दूसरी बात कई वर्ष पूर्व मुझे चिकन पॉक्स हो चुका है, अत: अब इसके दोबारा होने की संभावना कम ही है.”
लिमपेंग आंटी की आर्थिक स्थिति बहुत सुदृढ़ न थी. वह और जोसुआ अंकल किसी ग्रॉसरी शॉप में डेली बेसिस पर काम करते थे. लेकिन वे बिना अपनी जीविका की परवाह किए स्वाति की ख़िदमत में लग गईं. स्वाति को शरीर पर हो रहे चिकन पॉक्स के लाल दानों से असहनीय पीड़ा हो रही थी. एक रात दर्द से कराहती हुई वह बाथरूम के लिए उठी, तो अंधेरे में साइड टेबल से टकराकर गिर गई.
कहां है वो… अर्धचेतन अवस्था में भी स्वाति को तीव्र वेदना की अनुभूति हो रही थी और फिर सब कुछ शून्य. फिर कुछ पल का शोर… और उसके चेहरे के आस-पास तैरते कुछ अजनबी, तो कुछ परिचित चेहरे.
जब चेतना वापस आई, तो ख़ुद को एक अस्पताल में पाया. पेट के निचले हिस्से में असहनीय पीड़ा का एहसास होने पर उसने अपना दायां हाथ उधर सहलाने के लिए उठाने की कोशिश की… मगर ये क्या सीधे हाथ की कलाई से तो एक टयूब जुड़ी हुई थी. स्वाति ने जब अपने बाएं हाथ से पेट को छुआ, तो एक खालीपन के एहसास से भरी सिहरन उसके समस्त शरीर को ठंडा कर गई. वह अप्रिय की आशंका से कंपकपा रही थी… पलकों के बांध को तोड़ता हुआ उसका रुदन हिचकियों के बीच करुण विलाप में परिवर्तित हो गया. वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी.
अचानक उसे अपने सिर पर स्नेहमयी स्पर्श महसूस हुआ और वह फफककर रोते हुए बोली, “यश प्लीज़, कह दो कि जो मैं सोच रही हूं, वह सच नहीं है.”
“स्वाति, मैं यश नहीं लिमपेंग हूं… यश यहां से थोड़ी देर पहले ही गया है. वह जाना तो नहीं चाहता था, पर मैंने ही उसे ज़बर्दस्ती घर भेज दिया. आख़िर रातभर का जगा हुआ था, कुछ देर सो लेगा, तो तुम्हारी भी देखभाल अच्छे-से कर पाएगा.”
स्वाति ने गर्दन को घुमाकर देखा, तो पाया कि बेड के साइडवाली कुर्सी पर लिमपेंग आंटी बैठी थीं. नींद न पूरी होने से उनकी आंखें लाल और थकान से शरीर का पोर-पोर मुरझा रहा था. ऐसा लग रहा था कि रातभर जगने के बाद अभी कुछ मिनट पहले ही उनकी आंख लगी थी, पर स्वाति के रोने से वे घबराकर उठ गई थीं.
“मैं यहां क्यों हूं आंटी?”
“मैं कुछ नहीं बता सकती… अभी तुम्हें आराम की सख़्त ज़रूरत है.”

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लिमपेंग आंटी ने अपनी हथेलियों से स्वाति के आंसू पोंछते हुए कहा.
तब तक नर्स राउंड पर आ गई और उसने स्वाति का ब्लडप्रेशर और बुख़ार चेक करने के बाद उसे कुछ दवाइयां खाने को दीं. दवाइयों के असर और संताप से निढाल स्वाति फिर से सो गई. उसको दो दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिलनी थी, पर उसके पहले एक काउंसलिंग सेशन अटेंड करना था. यश ने भी उसके साथ सेशन जॉइन किया.
जब वो दोनों काउंसलिंग के लिए रुके हुए थे, तो लिमपेंग आंटी टैक्सी लेकर यह कहते हुए घर चली गईं कि चलकर तुम लोगों के खाने-पीने का इंतज़ाम करती हूं, स्वाति को तो अभी लंबे समय तक परहेज़ी खाने पर ही रहना होगा. रेस्टोरेंट का खाना उसकी सेहत के लिए ठीक न होगा.
जब यश कार से स्वाति को घर ले जा रहा था, तो उसने स्वाति से कहा, “अगर उस रात आंटी न होतीं, तो न जाने क्या होता… तुम्हारी चीख की आवाज़ से जब आंटी उठीं, तो तुम्हें होश न था, तुम्हें हैवी ब्लीडिंग हो रही थी… तुम्हें अस्पताल में लाने के बाद जब अल्ट्रासाउंड किया गया, तो भ्रूण में कुछ असामान्यता पाई गई और भी कई कॉम्प्लीकेशन थे, इसलिए तुरंत ही तुम्हारा ऑपरेशन करना पड़ा. स्वाति सच में अगर लिमपेंग आंटी न होतीं, तो मैं अकेला इन हालात से कैसे निपटता.”
कुछ रिश्ते अर्थहीन होते हैं और कुछ के अर्थ इतने गूढ़ होते हैं कि उन्हें औसत समझ का व्यक्ति नहीं समझ सकता. अपने आपको बहुत ज़्यादा बुद्धिजीवी और आधुनिक समझनेवाली स्वाति आज ख़ुद पर शर्मिंदा थी. वह स्तब्ध थी कि अपने शोध के लिए जूनियर साइंटिस्ट का अवॉर्ड जीतनेवाली वह असल में कितनी संकीर्ण मानसिकता की थी. किसी ने किसी के बारे में कुछ कहा और उसने बिना किसी तार्किक आधार के उस पर यकीन करके अपनी सोच की बेड़ियों पर एक बड़ा-सा ताला और लगा दिया.
हैरानी की बात थी कि वह काग़ज़ का एक टुकड़ा बर्बाद नहीं करती थी. पर्यावरण संरक्षक की वकालत करते हुए बिजली-पानी, खाना बर्बाद करनेवालों को हज़ारों दलीलें दे डालती थी. फिर कैसे दो साल तक किसी के प्यार के मसालों से महकते भोजन को वहमों की शिकार होकर कूड़े में फेंकती रही?
वे घर पहुंच चुके थे. स्वाति के कमज़ोर शरीर को ऊर्जा की ज़रूरत थी. भूख से उसका हाल बेहाल था. वो अभी कपड़े बदलकर फ्रेश भी न हो पाई थी कि लिमपेंग आंटी हाज़िर हो गईं. एक ट्रे में दो बड़े बाउल में वेजीटेबल सूप के साथ. स्वाति को तेज़ भूख लगी थी, वो दोनों बाउल के सूप तुरंत पी गई.
“लिमपेंग आंटी मेरी आंटी हैं यश. वो ये सूप अपनी बेटी यानी कि मेरे लिए लाई थीं. तुम फोन करके अपने लिए बाहर से खाना ऑर्डर कर लो.” स्वाति ने टिश्यू से अपना मुंह पोंछा और आंटी के गले लग गई. स्नेह के बल से सोच पर पड़ी बेड़ियां टूट चुकी थीं.

रीता कौशल

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शांति सीरियल जो दूरदर्शन के सबसे मशहूर शोज़ में से एक था उसने बहुत से उम्दा कलाकारों को प्लैटफ़ॉर्म दिया था औरघर घर तक उन्हें पहुँचाया था. उनमें से अनूप सोनी से लेकर शांति में लीड रोल प्ले करनेवाली मंदिरा बेदी भी थीं. 

देखने में पारंपरिक, भोली सूरत लेकिन आत्मविश्वासी लड़की की कहानी थी शांति जो हमेशा सच्चाई का साथ देती थी. ख़ुद मंदिरा ने भी यह बात कही थी कि शांति के किरदार ने उन्हें मज़बूत बनाया है और बहुत प्रेरणा भी दी है. शांति काकिरदार लोगों के ज़ेहन में इस कदर छाया कि लोग मंदिरा बेदी को कम और उनके रील के किरदार को ज़्यादा पहचानते थे.

लेकिन आज यह आलम है कि मंदिरा अपनी फ़िटनेस और बोल्डनेस को लेकर सुर्ख़ियाँ बटोरती हैं और लोग हैरान हो जातेहैं कि क्या ये वही शांति है.

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मंदिरा ने फ़िल्ममेकर राज कौशल से शादी की और वो एक बेटे की मां हैं लेकिन जब वो बिकिनी में अपने पिक्स डालती हैंतो हर कोई उनकी फ़िटनेस का क़ायल हो जाता है. हालाँकि बहुत बार उनको ट्रोल भी किया जाता है लेकिन मंदिरा अपनी बिंदास ज़िंदगी से सबको प्रेरित करती हैं.

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उनकी फिटनेस का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बेटे के जन्म के बाद उन्होंने अपना 22 किलो वज़नघटाया था और आज वो लेट फ़ोर्टीस में युवाओं को फिटनेस चैलेंज देती नज़र आती हैं. 

उनके वर्कआउट वीडियोज़ इंस्टाग्राम पे काफ़ी पसंद किए जाते हैं.

मंदिरा ने काफ़ी सीरियल्स में काम किया है और वो दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे में भी शाहरुख़ के साथ नज़र आई थींलेकिन शांति ने उन्हें जो मुक़ाम दिया वो इन सबसे कहीं ऊँचा था

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शांति के बाद उनका बदला हुआ रूप देखने को मिला जब वो क्रिकेट वर्ल्ड कप में टीवी प्रेज़ेंटर बनीं थीं और हर कोई इसबदली हुई मंदिरा के हॉट अवतार को देखकर आहें भरता था.

यह पहला अवसर था जब बोल्ड मंदिरा लोगों के सामने थी और वो सलवार सूट वाली शांति से बिल्कुल अलग थी. 

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इसके बाद मंदिरा का तो ट्रांसफ़ोरमेशन हुआ वो प्रेरणादायक था. 

आप भी देखें 25 साल पहले की शांति से किस तरह अलग है आज की मंदिरा

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सचमुच जीवन में अपने सबसे क़रीबी लोगों के लाइक्स और कमेंट हमें कभी नहीं मिलते और हम सोचते हैं कि ये लोग हमें पसंद नहीं करते, जबकि सच तो यह है कि इन्हें इस बात का एहसास ही नहीं है कि जो हमारे हैं या यह कहें कि जो हमारी ज़िंदगी का हिस्सा हैं, उन्हें क्या लाइक और डिस्लाइक करना. लाइक्स या कमेंट्स तो दूसरे करते हैं, अपने तो बस अपने होते हैं. उनके लिए तो आप, आप हैं, नाम या शोहरत हो न हो, क्या फ़र्क़ पड़ता है. ये लाइक्स-वाइक्स तो बस परछाईं है, जिसे पकड़ा नहीं जा सकता और रिश्ते परछाईं नहीं होते…

वेब पेज खोलते ही ख़ुशी से उसकी आंख छलछला उठी. उसने एक बार फिर से देखा जैसे उसे अपने आप पर ही भरोसा न हो रहा हो, दस हज़ार तीन लाइक्स. उसे समझ में नहीं आया कि वह अपनी ख़ुशी को किस तरह अभिव्यक्त करे. न जाने कब से वह इस दिन का इंतज़ार कर रहा था. वह उठा और कमरे में ही नाचने लगा.
सबसे पहले किसे बताए, किसके साथ शेयर करे अपनी ख़ुशी. सचमुच उसे भीतर से एहसास हुआ आज वह कुछ बन गया है. इंटरनेट पर दस हज़ार लाइक्स का अर्थ था कम से कम उसके पेज को एक लाख से अधिक लोग तो देख ही चुके हैं और न जाने कितने फॉलोअर्स…
पूरे पांच साल से लगा था वह अपनी मेहनत से ख़ुद की पहचान बनाने में. अब लोग उसे सम्मान के साथ देखेंगे. कोई उसका मज़ाक नहीं उड़ाएगा. उसमें हुनर है, यह उसने साबित कर दिया था. उसे भरोसा था अब उसका ख़ूब नाम होगा. उसके पास अपना मनचाहा काम होगा. हो न हो, उसे बड़े-बड़े ऑफर्स मिलेंगे और देखते ही देखते एक दिन वह बड़ा आदमी बन जाएगा. वह ज़िंदगी में उस मुकाम को छूएगा, जिसे आज तक उसके आस-पास कोई न छू सका.
एक ज़बर्दस्त शोर, एक बहुत बड़ा तूफ़ान उठ रहा हो जैसे उसके कमरे में. उसने हेड फोन का स्पीकर थोड़ा और तेज़ किया. नीचे ऑटोमेटेड वॉर्निंग आ गई कि इससे ज़्यादा वॉल्यूम बढ़ाना हानिकारक हो सकता है. सुनने की शक्ति जा सकती है. इस समय उसे किसी चेतावनी की सुध कहां थी. उसने ख़ुद से कहा, वॉर्निंग, हुंह! ज़िंदगी में जिसे देखो, वह बचपन से बस वॉर्निंग ही तो देता है.
‘पढ़ो, नहीं तो फेल हो जाओगे.‘ ‘टॉप करो, नहीं तो कहीं एडमिशन नहीं मिलेगा’, ‘साइंस पढ़ो, नहीं तो कोई फ्यूचर नहीं है’, ‘नौकरी चाहिए तो इंजीनियरिंग कर लो, वरना पूरी ज़िंदगी ऐसे ही भटकते रहोगे.’ ये वॉर्निंग्स ही तो थीं कि वह अपनी ज़िंदगी छोड़कर उधार की ज़िंदगी जी रहा था. पिछले बीस वर्षों से कभी यह कोर्स, तो कभी वह ट्रेनिंग, कभी इस प्रमोशन के पीछे भागो, तो कभी उस टारगेट को पूरा करो. कभी बीस हज़ार का रिवॉर्ड, तो कभी विदेश यात्रा. कभी माता-पिता की चिंता, तो कभी परिवार की. कभी बच्चों के एडमिशन का मामला, तो कभी अपनी दवा-दारू का. ज़िंदगी न हुई, कोल्हू का बैल हो गई, सुबह उठकर जुते, तो शाम तक जैसे सिर उठाने की फुर्सत ही नहीं.
‘राइज़िंग सुपरस्टार’ अपने लिए शायद उसे यही तमगा मिला उस समय.
हा-हा ‘राइज़िंग सुपरस्टार.’ उस फिल्म के कैरेक्टर की तरह ही अब उसकी ज़िंदगी भी कुछ और होगी.

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विचारों की लहरें समंदर में उठ रहे ज्वार-भाटा को मात दे रही थीं. लाइक्स एक छोटी-सी घटना किस तरह किसी की ज़िंदगी बदल सकती है. वह मृदुल उ़र्फ बांके बिहारी उ़र्फ किसी छोटे से शहर से निकला रघुवीर सोच रहा था यह इंटरनेट भी कमाल की चीज़ है, किसी को कहां से कहां पहुंचा देती है. उसने फिर ध्यान से देखा तो उसे अपने अपलोड किए हुए वीडियो सॉन्ग पर बहुत से नामी सिंगर्स के कमेंट भी मिले थे. आह! अगर उसने कॉलेज के समय से ही सिंगिंग को अपना करियर बनाया होता, तो निश्‍चय ही आज वह बड़ा सिंगर होता. कोई ऐसा न था, जो उसके गाने का कायल न हो. क्लास में सर लोग तो फ्री पीरियड में उसका गाना सुनते थे और पूरी क्लास ताली बजाती थी.
तभी उसे लगा साउंड कुछ ज़्यादा ही लाउड है, कमरे में शोर भी बहुत है. उसने इधर-उधर देखा, कहीं कुछ नहीं था.
आस-पास घोर सन्नाटा, वह अकेला ही तो था अपने पूरे घर में. अब यह एक छोटा-सा कमरा ही तो पूरा घर है उसके लिए. ज़िंदगी भी अजीब होती है. कभी भी किसी को सब कुछ नहीं देती. तभी तो कहते हैं, कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं ज़मीं, तो कहीं आसमां नहीं मिलता. वह अपने विचारों की शृंखला को तर्क के महीन धागे में पिरोता जा रहा था. ये बड़े-बड़े अस्पताल जिसमें एक मरीज़ को देखनेभर की फीस ही हज़ार रुपए से कम नहीं है, फिर भी पूरे के पूरे भरे रहते हैं हमेशा. ये काले कोटवाले नामी वकील, जो एक-एक सुनवाई की पांच से दस लाख फीस लेते हैं, इनके पास समय नहीं होता.
ये कौन लोग हैं जिनके पास इतना पैसा है? और जिनके पास इतना पैसा है, जिनके पास इतनी अमीरी है, उन्हें तो कोई तकलीफ़ ही नहीं होनी चाहिए. अगर काले और स़फेद कोटवाले बड़े और अमीर लोगों के घर में आते-जाते हैं, तो भला यह भी कोई अमीरी हुई. अगर पैसे की बात छोड़ दें, तो शांति और सुकून के मामलों में इनसे बड़ा ग़रीब कोई नहीं है. मगर नहीं, अभी यह सब सोचने की ज़रूरत क्या है. अगर आस-पास उसे शोर अधिक महसूस हो रहा है, तो उसका कारण उसके अपने स्पीकर का वॉल्यूम है, क्योंकि खाली कमरे में उसके अलावा और है ही कौन.
उसने स्पीकर का साउंड कम किया. एक बार फिर अपने पेज पर नज़र मारने लगा. ढेर सारी इमोजी बनी हुई थी उसकी पोस्ट पर. न जाने कितने नाम दिखे उसे अपने पेज पर. उसे लगा उसको जाननेवाले सभी दोस्त, सभी दोस्तों के दोस्त और फिर उन दोस्तों के दोस्त… वह हंसा. न जाने कितनी लंबी सीरीज़ बन जाए चिंतन की और इस तरह उनके दोस्त के दोस्त भी उसे जानते हैं. पर इस जाननेवालों की सीरीज़ का कोई अंत है क्या? ऐसे ही सिलसिला चलता रहा, तो एक दिन पूरे इंडिया के लोग, फिर एशिया के और फिर पूरी दुनिया के लोग उसे जान जाएंगे.

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हा-हा कितनी बड़ी भीड़ है इस एक छोटे-से मोबाइल की स्क्रीन पर, जैसे पूरा समंदर ही उतर आया हो इंटरनेट पर. परफॉर्म करने के लिए न स्टेडियम चाहिए, न कोई स्टेज, न ही कोई हॉल, जिसमें देखनेवालों की भीड़ हो. कोई छोटा-मोटा कमरा भी तो नहीं चाहिए आज परफॉर्म करने के लिए. चाहे पार्क में हों, सड़क पर हों या समंदर के किनारे, बस कुछ भी करो और नेट पर लोड कर दो. और इतना सब कुछ करने के लिए बस एक मोबाइल बहुत है. आज हमारे सपनों की दुनिया को सच करने के लिए तीन-चार हज़ार का एक खिलौना चाहिए बस. अपने कमरे में घोर अकेला होते हुए भी उसे अपनी स्क्रीन पर आए लाइक्स देखकर लगा वह बहुत बड़ी भीड़ से घिरा हुआ है. अजीब-सी बात है, आस-पास स़िर्फ और स़िर्फ सन्नाटा पसरा है व दिल में एहसास भीड़ से घिरे होने का पैदा हो रहा है. यही तो आज की ज़िंदगी है, एक शोर है जो कहता है भीड़ है कयामत की और हम अकले हैं. शायद यही आज के जीवन की सच्चाई बन गई है.
यह पॉप्युलैरिटी की दीवानगी, दुनिया में छा जाने का ख़्वाब भी एक अजीब-सी चीज़ है. उसके छोटे-से मोबाइल स्क्रीन पर दो-ढाई घंटे से बस एक पेज खुला था लाइक्स का. वह क़रीब सौ बार रिपीट कर-करके अपनी ही परफॉर्मेंस देख चुका था. उसे न भूख लग रही थी, न प्यास. तभी अचानक उसे अपना गला सूखता हुआ-सा प्रतीत हुआ. उसने फ्रिज से ठंडी बॉटल निकाली और गट-गटकर आधी खाली कर गया.
सच पूछिए तो आज के आदमी की सबसे बड़ी भूख नाम और शोहरत की है. अपनी पहचान बनाने की है. रोटी, कपड़ा और मकान की भूख तो छोटी भूख है, यह तो आज हर आम आदमी किसी न किसी तरह पूरी कर ही रहा है.
यह जो अनलिमिटेड डाटा का मार्केट है, आदमी के दिमाग़ में पैदा हुई इस नाम और शोहरत की भूख को मिटाने के लिए है. ‘नाम और शोहरत’ इसे नापने का कोई पैमाना है क्या?
और फिर शोहरत से बड़ी शोहरत की भूख. हर व़क्त यह ख़्याल कि आह! मुझे कितने लोग जानते हैं, कहीं भी जाऊं, तो बस मुझे पहचाननेवाले लोग मिलें, भीड़ में रहूं तो हाथों हाथ लिया जाऊं, लोग मुझे घेरकर, मेरे बारे में बातें करें, मुझसे मेरी सफलता की कहानी पूछें, मैं किसी दिन स्टेज पर बुलाया जाऊं, मुझे भी सम्मानित किया जाए, मेरे लिए गाड़ियां इंतज़ार करें, लोग फूल-माला लेकर स्वागत-सत्कार करें…
हा-हा… कितने बड़े सपने, कितने बड़े ख़्वाब होते हैं इस छोटी-सी ज़िंदगी के… दस हज़ार, दस लाख, दस करोड़ कोई सीमा ही नहीं है कि हमारी पॉप्युलैरिटी कितनी बढ़ सकती है.
रोटी के भूख की तो फिर भी सीमा है, कोई दो, तो कोई चार खा लेगा… बहुत हुआ तो आठ-दस, पर पॉप्युलैरिटी… यह भूख जो असीमित भूख है… लाइक्स, लाइक्स… शायद आदमी इसी तरह की भूख का मारा है… पांच साल तो बीत गए इस दस हज़ार लाइक्स को पाने में…
उसे अपने भीतर कमज़ोरी-सी महसूस हुई तो एहसास हुआ, मानसिक भूख के मिटने से पेट की भूख नहीं थमती. पर यह क्या, वह तो अपने सपनों में इस कदर खोया था कि उसे व़क्त का पता ही नहीं चला. यहां इस अकेले कमरे में कौन था जो उसे कहता, खाना खा लो, पानी पी लो, सो जाओ.
रात के एक बजे हैं… कोई बात नहीं,  पर यह महानगर तो नहीं है कि पिज़्ज़ा ऑर्डर कर देंगे और डिलीवरी बॉय दे जाएगा. इस छोटी-सी जगह में तो बस इलेक्ट्रिक कैटल से चाय बन सकती है, नूडल्स और कुछ बिस्किट हैं. चाय भी ख़ुद उठकर बनानी पड़ेगी.
वह हंसा… नाम, शोहरत के लिए अपने ख़्वाबों की ज़िंदगी पाने के लिए इतना सेक्रिफाइस तो बनता है. उसके मुंह से गालियां निकलते-निकलते बचीं, इंटरनेट का पेज, पेज पर लाइक्स, लाइक्स पर फ्रेंड रिक्वेस्ट और फिर ढेर सारी फॉलोइंग्स…  कमाल है, भीड़ है कयामत की और हम अकेले हैं.
ये हज़ारों लाइक्स किसी को एक कप चाय भी नहीं दे सकती. हा-हा-हा… लाखों लोगों के जानने के बाद भी मृदुल उ़र्फ बांके बिहारी उ़र्फ रघुवीर जिसका वीडियो एक  लाख लोग देख चुके हैं रात में भूखा है.
उसकी फ्रेंड लिस्ट दस हज़ार से पार है, जिसके पेज पर लाइक्स की बहार है, जिसके फॉलोअर्स चार हज़ार से ज़्यादा हैं… भूखा है, एक छोटे-से कमरे में मैगी खा रहा है. अगर अभी वह पेज पर एक फोटो लगाकर लिख भर दे कि ‘फीलिंग हंग्री’ तो ढेर सारे पिज़्ज़ा और न जाने कितने मील्स के फोटो देखते-देखते उसके पेज पर आ जाएंगे, न जाने कितने दोस्त और फैंस उसे बहुत कुछ ऑफर कर देंगे, बस होगा स़िर्फ इतना कि वह उसे देख तो पाएगा, पर मोबाइल से बाहर निकालकर खा नहीं पाएगा. फोटो को गहराई से सोचें, तो स़िर्फ एक परछाईं भर तो है, दिखती रहेगी, पर पकड़ में कभी नहीं आएगी.

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वह सोचने लगा टु मिनट्स नूडल्स, यह लाइफ, नो… नो… यह लाइक्स भी क्या है… स़िर्फ पानी के बुलबुले या कहें टु मिनट्स नूडल्स की तरह नहीं है क्या? अभी आसमान में थे और अभी नीचे. यह नाम, शोहरत और पहचाने जाने की भूख भी कोई भूख है क्या और इससे भी हमें कुछ हासिल भी हो रहा है. यह शोहरत भी तो किसी आदमी की परछाईं की तरह है, जिसे बस देख सकते हैं, छू नहीं सकते. यह किसी के काम नहीं आ सकती.
आज फुर्सत किसे है किसी के पास कुछ भी देखने-सुनने और पढ़ने की, जिसे देखो, वह बस बोले जा रहा है. दिनभर बस नॉन स्टॉप चपर-चपर फेसबुक पर, ट्विटर पर, व्हाट्सऐप पर, हर व़क्त एक झूठा भ्रम… लाइक्स…
ज़िंदगी जैसे लाइक्स की ग़ुलाम होकर रह गई है. हर दस मिनट में, हर बीप पर हाथ का ख़ुद-ब-ख़ुद मोबाइल पर पहुंच जाना और अपनी पोस्ट को कितने लोगों ने लाइक किया देखना जैसे चौबीस घंटे का शग़ल बन गया है. किसने क्या कमेंट किया उस पर ध्यान टिकाए रखना. कमेंट्स पर हाथ जोड़ना या थैंक्स कहना. अपने थैंक्स को भी दूसरे के देखने के प्रति फॉलो करना. अपने नाम-शोहरत को पॉप्युलैरिटी के पैमाने पर नापना. दोस्तों में इस पॉप्युलैरिटी के सहारे ख़ुद को साबित करने की कोशिश करना. अपने आसपास जो हैं, उन्हें ही अपना न समझना और इंटरनेट पर इकट्ठा नकली इमोजी को असली ज़िंदगी का हिस्सा मान लेना.
यह जो उसके आसपास भीड़ है वह कौन-सी भीड़ है, जो भूख लगने पर उसे एक व़क्त की रोटी नहीं दे सकती, बीमार पड़ने पर डॉक्टर तक नहीं ले जा सकती और कहीं ख़ुदा न खास्ता अपने बाथरूम में गिर पड़े, तो उठा तक नहीं सकती. हां, उसका नाम बहुत है, शोहरत बहुत है, बड़ा आदमी है नेट पर. उसे सब जानते हैं. ज़रा-सा कुछ हो जाए, तो उससे हमदर्दी दिखानेवालों के मैसेज ही इंटरनेट पर रिकॉर्ड तोड़ दें. बीमारी लिखते ही परहेज़ और ठीक होने के लिए क्या करें कि सलाह से पेज भर जाए. और ख़ुदा न खास्ता कुछ हो जाए, तो ओ माई गॉड आरआईपी से पूरा व्हाट्सऐप ग्रुप भर जाए. वह भी कब कितने दिन? बस, एक दिन और जिसके लिए आरआईपी लिखा है, वह देखने के लिए है कहां कि आज कितने उसके चाहनेवाले हैं.  हां, कंधा देने के लिए सड़कपर उतरना हो, तो लोग नहीं मिलेंगे.

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माई गॉड… बिहारी को एक शाम खाना नहीं मिला, तो उसके मन में कैसे-कैसे ख़्याल आ रहे हैं, उसके भीतर का राइज़िंग स्टार कहां गया. कहां गई वह बड़ी-बड़ी आदर्शवादी बातें. दरअसल, वह अच्छी तरह जानता था कि इस लाइक्स और इस तरह फेमस होने से कुछ नहीं होनेवाला है. यह सब बस अपने मन का भ्रम है. सब झूठी दुनिया की झूठी ख़ुशियां हैं. इस तरह अनजान लोगों द्वारा जानने या लाइक कर देने से कुछ नहीं होता.
न ही यह प्रसिद्धि कोई ठोस उपलब्धि है, इस इंटरनेट के समंदर में इस तरह के न जाने कितने खेल चल रहे हैं, जिसमें भटक-भटककर लोग अपना नकली सैटिस्फैक्शन ढूंढ़ रहे हैं.
रात के दो बज चुके थे, भूख अपना एहसास करा रही थी, थकान उस पर हावी थी. उसने कान से हेड फोन निकाल दिया, उसे लगा चक्कर आ जाएगा.
उसकी सांसें डूबती-सी लगीं, आदमी अपने जुनून और महत्वाकांक्षा में क्या से क्या हो जाता है और अपने नाम-शोहरत के पीछे अपना जीवन तक खो देता है. न जाने उसे क्यों लग रहा था कि उसका दिल सिकुड़ता जा रहा है, कहीं उसे कार्डियक अरेस्ट तो नहीं हो रहा? अरे, अरे, ये हो क्या रहा है? सच है, उसने अपना ध्यान ही नहीं रखा था.
इन एक लाख फॉलोअर्स और दस हज़ार लाइक्स का क्या होगा?
इससे पहले कि वह नेट बंद कर देता, उसने देखा बहुत देर से कोई कॉल उसका वेट कर रही है.
वह चौंका, अरे! यह तो उसकी वाइफ और बेटी की कॉल थी. पचास मिस कॉल्स… ओह माई गॉड! वह अपने पेज में, अपने गाने में, अपने स्पीकर में, अपने सपने में इस तरह उलझा था कि उसे अपने सबसे क़रीबी लोगों की कॉल ही नहीं सुनाई दे रही थी. उसने किसी तरह झट-से कॉल बैक की, पहली रिंग पूरी भी नहीं बजी थी कि फोन उठ गया. उधर से जैसे किसी के रोने की आवाज़ आ रही थी, फोन उठते ही आवाज़ जैसे मोबाइल से दूर हो गई. बस,  मोबाइल पर आसुंओं की बौछार हो जैसे… ढेर सारी शिकायतें, ढेर सारी डांट और ढेर सारी फ़रमाइशें. उसे लगा कोई कह रहा हो,  “पापा-पापा… आप ठीक तो हैं ना पापा… पूरी रात हो गई, आप कहां थे पापा. आप फोन क्यों नहीं उठा रहे थे? पापा, मम्मी का बुरा हाल है रो-रोकर, प्लीज़ पापा आप कुछ बोलते क्यों नहीं?”

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यह उसके बेटी की आवाज़ थी. सुनते ही जैसे उसे सुकून मिल गया, जैसे जीवन में सबसे बड़ी दवा यही हो.

“अरे! हां बेटी, मैं… मैं ठीक हूं.” उसकी सांसें नियंत्रित हो रही थीं. उसने बगल में रखे पानी के बॉटल से घूंट-घूंटकर पानी पीया. “बेटी, मैं बिलकुल ठीक हूं. यह शायद नेटवर्क की प्रॉब्लम है, तुम कॉल कर रही होगी, मुझे कोई कॉल नहीं मिली. अभी देखा तो एक साथ इतनी सारी मिस कॉल दिखा रहा था.”
तब तक उधर से आवाज़ आने लगी. बेटी बोली, “लो पापा, मम्मी से बात कर लो.”
अब बस बात क्या होनी थी, पर इस समय वो सारी की सारी डिस्लाइक्स जैसे बहुत ही अच्छी लग रही थीं. उन एक लाख फ्रेंड्स और दस हज़ार लाइक्स से कहीं क़ीमती.
हां, अपने ही लोगों के लाइक्स और कमेंट्स नहीं होते अपने पेज पर, तो क्या वो हमें डिस्लाइक करते हैं?
“अरे! सुन रहे हो या फिर सो गए. पिछले तीन घंटे मेरे कैसे कटे हैं मैं ही जानती हूं. तुम्हारा क्या है, लगे होगे कहीं इधर-उधर. कितनी बार तो कहा है टाइम से खा लिया करो और हां, एक सिम और ले लो, ये नेटवर्क की प्रॉब्लम तो छोटी जगह पर रहेगी ही ना. ये नौकरी भी न जाने तुम्हें कहां-कहां भटका रही है.”
उसकी आंखें भी भर आई थीं, “बस, अब सो जाओ. तुम भी तो जाग रही हो. कितनी रात हो गई है और हां, मैं आ तो रहा हूं इस संडे को.”
“हां प्लीज़, जल्दी आ जाओ. आज तो मैं सचमुच बहुत डर गई थी.” तभी बेटी ने फोन ले लिया, “पापा, आप भी सो जाइए और इतना काम मत किया कीजिए कि हम लोगों को ही भूल जाएं.”
उसे लगा बेटी बड़ी बात कर रही है. ओह! उसने सोचा ही नहीं कि बच्चे देखते ही  देखते बड़े हो जाते हैं और हमें समझाने की स्टेज पर पहुंच जाते हैं. वह बोला, “कैसी बातें कर रही है. कोई अपने बच्चों और परिवार को भी भूलता है क्या. आज नेटवर्क प्रॉब्लम थी बस और कोई बात नहीं है. अब तू भी सो जा और मम्मी का ध्यान रख.” इतना कहकर उसने मोबाइल काट दिया.
सचमुच जीवन में अपने सबसे क़रीबी लोगों के लाइक्स और कमेंट हमें कभी नहीं मिलते और हम सोचते हैं कि ये लोग हमें पसंद नहीं करते, जबकि सच तो यह है कि इन्हें इस बात का एहसास ही नहीं है कि जो हमारे हैं या यह कहें कि जो हमारी ज़िंदगी का हिस्सा हैं, उन्हें क्या लाइक और डिस्लाइक करना. लाइक्स या कमेंट्स तो दूसरे करते हैं, अपने तो बस अपने होते हैं. उनके लिए तो आप, आप हैं, नाम या शोहरत हो न हो, क्या फ़र्क़ पड़ता है.
ये लाइक्स-वाइक्स तो बस परछाईं है, जिसे पकड़ा नहीं जा सकता और रिश्ते परछाईं नहीं होते, वो अपनों के बिना सोते नहीं हैं, खाना-पीना नहीं खाते हैं, चैन से सांस नहीं लेते हैं. हां, किसी पेज पर जाकर इमोजी नहीं बनाते, न ही लाइक्स का थम्स अप दिखाते हैं. वह भीतर तक डर गया. आज अगर बेटी का फोन न आता तो…

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ये जो बढ़ती हुई दिल की धड़कनें थीं, किसी अस्पताल तक भी न पहुंचने देतीं… किसी भी भारी आवेग में सबसे बड़ी दवा अपनों का सहारा ही तो है. उसे लगा अगर उसने यह लाइक्स का चक्कर नहीं छोड़ा, तो कहीं असली ज़िंदगी से डिस्लाइक न हो जाए.

अब वह शांत था, बिल्कुल शांत. उसे अब अपनी ज़िंदगी या अपने भीतर के राइज़िंग स्टार के राइज़ न कर पाने से शिकायतें कम हो रही थीं. वह अपने पारिवारिक रिश्तों की रोशनी में इस लाइक्स की दुनिया के ऊपर से उठ रहे पर्दे को देख पा रहा था. उसे लगा अगर उसने एमसीए करके कम्प्यूटर डाटा एनालिस्ट का जॉब न पकड़ा होता, तो आज न जाने कहां धक्के खा रहा होता. न घर-परिवार होता, न ही प्यारी-सी बेटी. हां, लाइफ में लाइक्स की भरमार होती, पर तब तक पता नहीं वह अपने ही पेज पर ये लाइक्स देख भी पाता या नहीं.

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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मुरली मनोहर श्रीवास्तव

‘‘कपूर साहब, बहुत गंभीर बात है, आपका देहांत अट्ठाइस मई को पांच बजकर दस मिनट पर एक दुर्घटना से हो जाएगा. कोई वसीयत वगैरह करवानी हो तो करवा ले फिर ना…’’
‘‘ओ हितैषी के बच्चे, तू है कौन! छुपके वार करता है. मरद है तो सामने आ.’’ कपूर चीख पड़ा.

‘‘हेलो! कपूर साहब.’’
‘‘हेलो, हां मैं कपूर बोल रहा हू, साहब सुहब दा अता-पता नहीं.’’ (साहब सुहब का तो पता नहीं)
‘‘हेलो जी! मैं आपका हितैषी बोल रहा हूं.’’
‘‘कमाल हो गया भई, इस कलजुग में भी हितैषी बचे हैं. मैं तो यह भूल ही गया था. बादशाहो कहो की (क्या) हुकम है.’’
‘जी, हु़क्म तो कुछ नहीं बस…’
‘‘कपूर साहब, मुझे थोड़ी सीरियस बात करनी है.’’
‘‘पर तुसी हितैषी हो तो सीरियस गलां क्यों करना चांदे ओ?’’ (लेकिन आप तो हितैषी हैं, फिर गंभीर बातें क्यों)
‘‘कपूर साहब, बहुत गंभीर बात है, आपका देहांत अट्ठाइस मई को पांच बज कर दस मिनट पर एक दुर्घटना से हो जाएगा. कोई वसीयत वगैरह करवानी हो तो करवा ले फिर ना…’’
‘‘ओ हितैषी के बच्चे, तू है कौन! छुपके वार करता है. मरद है तो सामने आ.’’ कपूर चीख पड़ा.
कपूर की पत्नी जो पास ही सोफे पर बैठी थी, घबराकर पूछने लगी, ‘‘क्या बात है, कौन था?’’
कपूर गुस्से में थे. कहने लगे, ‘‘कोई बदतमीज़ है साला! कहता है कि कपूर, यानी मैं अट्ठाइस मई को पांच बजकर दस मिनट पर दुर्घटना में मर जाऊंगा. अरे! माना मुझे दिल की बीमारी का वहम हो गया था, मगर अब तो सारे टेस्ट करवा लिए हैं. कोई बीमारी नहीं है.’’
बात आई-गई हो गई. फिर कोई फ़ोन नहीं आया. मगर अट्ठाईस तारीख़ को कपूर की बीवी ने एहतियातन कपूर साहब को घर से बाहर न जाने के लिए राज़ी कर लिया. पहले तो कपूर साहब अकड़े, मगर फिर बीवी की बात मान गए.
बीवी शंकित थीं कि कहीं कुछ अनहोनी ना हो जाए? बृहस्पतिवार के व्रत माता का जगराता और पीर की चादर सब मन्नतें मान चुकी थी. उसने अपने छोटे भाई रमेश को भी बुला लिया था.
वह रसोई में कपूर साहब के मनपसंद पकवान बना रही थी. कपूर साहब व उनका साला रमेश अपनी-अपनी बीयर खोले बैठे थे. हालांकि श्रीमती कपूर ने बीयर पीने से मना किया था, मगर कपूर साहब नहीं माने थे. श्रीमती कपूर बीच-बीच में खाने की चीज़ें नमकीन वगैरा रखने के बहाने कपूर साहब को देख आती थीं. साढ़े तीन बजे सब लोग खाना खाने बैठे. कपूर व रमेश तो चहक रहे थे, मगर श्रीमती कपूर परेशान थीं. रह-रहकर दीवार घड़ी देख लेती थीं. उन्हें घड़ी की सुइयां सरकती नज़र नहीं आ रही थीं.
खाना खाने के बाद सभी लॉबी में आ गए. रमेश ने टीवी खोल दिया था कि अचानक बिजली गुल हो गई. अंधेरा होने पर कपूर ने पूछा कि ‘‘इनवर्टर को क्या हुआ?’’ कपूर साहब इन्वर्टर देखने के लिए उठे तो श्रीमती कपूर ने उन्हें यह कहकर रोक दिया, ‘‘आज आपको बिजली के पास नहीं जाना है.’’ कपूर साहब झुंझलाए. मगर मन मारकर बैठ गए. फिर गर्मी से घबराकर बालकनी में चले गए. श्रीमती कपूर उनके पीछे चली आई थीं.
कपूर साहब को उनकी यह हरकत नागवार लगी थी, मगर वे चुप थे. बालकनी की रेलिंग पर हाथ रखकर झुके ही थे कि चीख मारकर गिर पड़े. श्रीमती कपूर ने देखा कि एक सांप रेलिंग पर दाएं से बाएं सरपट सरक रहा था. इसके साथ ही श्रीमती कपूर की चीख निकल गई. हड़बडाहट में वे जल्दी-जल्दी सीढ़ियां उतरने लगे और पैर फिसल जाने से गिर पड़े. सिर सामने वाली दीवार पर जा लगा .खून का फव्वारा फूट चला. श्रीमती कपूर ने अपनी हाथ घड़ी को देखा. पांच बजकर दस मिनट हुए थे. श्रीमती कपूर के भाई रमेश नौकर को उनके पास खड़ा करके एम्बुलेंस को फ़ोन करने ऊपर आए, तो फ़ोन की घंटी बज रही थी. रमेश ने फ़ोन उठाया और बोले, ‘‘हैलो!’’
‘‘उधर से आवाज आई,’’ ‘‘कपूर साहब सकुशल तो हैं?’’
‘‘नहीं, वे सीढ़ियों से गिर पड़े हैं. आप फ़ोन रखें तो मैं डॉक्टर तथा एम्बुलेंस को बुलाऊं.’’
‘‘अब कुछ नहीं हो सकता. वे मर चुके हैं. मैंने उन्हें पहले ही बता दिया था कि वे आज पांच बजकर दस मिनट पर दुर्घटना में मर जाएंगे.’’ यह कहकर उसने फ़ोन काट दिया.
रमेश हैरान-परेशान चोगा उठाए खड़ा था. फिर उसे याद आया कि उसे टेलीफ़ोन करना है. डॉक्टर को टेलीफ़ोन करके वह सीढ़ियों के पास आया. श्रीमती कपूर होश में आ गईं, मगर कपूर साहब निश्‍चेष्ट पड़े थे. कपूर साहिब को पड़े देखकर दहाड़ मार कर रोती हुई, उनसे लिपटकर सुबकने लगीं. डॉक्टर कपूर साहब का मुआयना करने लगे. पांच-छ: मिनट मुआयना करने के बाद वे बोले, “आई एम सॉरी, ही इज़ नो मोर.”
सुनकर मिसेज कपूर फिर दहाड़ मारकर रोने लगीं. लोग-बाग इकट्ठे हो गए थे. श्रीमती कपूर ने रो-रोकर सबको हितैषीवाला किस्सा सुना दिया. किसी ने बात पत्रकारों तक पहुंचा दी. फिर क्या था, आनन-फानन में ख़बर ने छपकर सारे शहर में तहलका मचा दिया. पुलिस के पास अनेक फ़ोन आए कि उन्हें भी हितैषी ने फ़ोन किया है. शहर में खलबली मच गई. आख़िर यह हितैषी कौन है जो फ़ोन पर मृत्यु की भविष्यवाणी करता है तथा भविष्यवाणियां सच भी हो रही हैं. कुल मिलाकर शहर में लगभग पचास फ़ोन आ चुके थे. कपूर साहब की मौत के बाद दो और व्यक्तियों की मौत का पता लगा.
शहर में अफ़रा-तफ़री का माहौल था. खोजी पत्रकारों ने खोज-खोजकर लोगों को ढू़ंढ निकाला, जिन्हें फ़ोन आए थे. अटकलें लगाई जा रही थीं कि अब किसकी बारी है?
तभी नगर में अफवाह फैली कि प्रसिद्ध उद्योगपति श्री मिन्हास राजधानी के एक बड़े हृदय रोग संस्थान में भरती हो गए हैं. हालांकि उन्हें कोई तकलीफ़ नहीं थी, मगर हितैषी का फ़ोन आया और उसने कहा कि उनकी मृत्यु हृदयगति रुकने से चौबीस जून को सुबह दस बजे हो जाएगी. दहशत व एहतियात के तौर पर उन्होंने हृदय रोग संस्थान के इन्टेंसिव केयर (सघन चिकित्सा कक्ष) में पांच दिन पहले ही कमरा ले लिया था.
डॉक्टरों की एक टीम ने सबसे वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट की अध्यक्षता में उनका पूरा चेकअप करके उन्हें हृदय रोग के कोई लक्षण न होने का प्रमाणपत्र भी ज़ारी कर दिया था, फिर भी श्री मिन्हास ने अस्पताल में रहना ज़रूरी समझा तथा तेईस जून की रात से चार-चार घंटे के लिए एक-एक डॉक्टर को अपनी देखभाल हेतु फ़ीस देकर रख लिया.
मगर सारे किए-कराए पर तब पानी फिर गया, जब चौबीस जून को ठीक दस बजे डॉक्टरों की टीम की मौजूदगी में उनके दिल ने धड़कना बंद कर दिया और उन्हें बचाने की डॉक्टरों की सभी कोशिशें नाकाम हो गईं.
हर तरफ़ बेबसी-बेकसी का माहौल था. किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. कोई कह रहा था कि यह आकाशवाणी हो रही है, मगर आकाशवाणी टेलीफ़ोन से…
आख़िर थक-हारकर पुलिस ने हाथ खड़े कर दिए. केस सीबीआई को सौंप दिया गया. सीबीआई ने शीघ्र ही अपने जासूस चारों ओर फैला दिए. मगर केस का कोई ओर-छोर पता नहीं लग रहा था. टेलीफ़ोन एक्सचेंज ने सभी नम्बरों पर विजिलेंस लगा दी थी. उपभोक्ताओं को बतलाया गया था कि कोई ऐसा फ़ोन आते ही तारे के चिह्न वाला बटन दबाएं, तो एक्सचेंज का कम्प्यूटर चौकस होकर फ़ोन करनेवाले के नम्बर को रिकॉर्ड कर लेगा, मगर कोई सुराग नहीं लगा. एक तो फ़ोन आने कम हो गए थे, दूसरे भविष्यवक्ता चौकन्ना हो गया था. वह पब्लिक बूथ प्रयोग में ला रहा था. पब्लिक बूथों पर पुलिस की निगरानी रखी जाने लगी. मगर नतीज़ा वही-ढाक के तीन पात.
आखिर सीबीआई ने अपने वरिष्ठ सेवानिवृत्त जासूस पं. चन्द्रचूड़ चिन्तामणि पाणिग्रही की सेवाएं लेने का फैसला लिया. श्री चन्द्रचूड़ अनेक जटिल केसों को सुलझा चुके थे. उन्होंने आते ही सारे हालात का जायज़ा लिया. जब कोई सूत्र हाथ नहीं लगा, तो उन्होंने उन दस लोगों को चुन लिया, जिनको सबसे बाद में टेलीफ़ोन आए थे. फिर वे हर किसी के घर जाकर उनसे मिले. लोग भड़के हुए थे. वे कुछ कहने-सुनने को तैयार नहीं थे, मगर चन्द्रचूड़ महोदय ऐसे चिन्तित लोगों से बातचीत करना चाहते थे. उनके काम करने का तरीका जासूसों जैसा न होकर चिकित्सक जैसा था, वह भी मनोचिकित्सक जैसा.
उन्होंने इन दस लोगों को समझाया, “अगर आप सहयोग देंगे, तो हो सकता है कि हम उस व्यक्ति को पकड़ लें. मैं जानता हूं तथा आप सब भी जानते हैं कि मृत्यु अटल सच है, अत: उससे बचना या डरना समझदारी नहीं है?’’
धीरे-धीरे उन्होंने अपने तय किए गए फार्मूले पर काम करना शुरू कर दिया. उन्होंने उन लोगों से फ़ोन आने से दस दिन पहले मिले लोगों की सूची बनाने को कहा. उन लोगों ने वह सूची बना दी थी, मात्र एक व्यक्ति को छोड़कर. वह था लाला घसीटाराम, भविष्यवाणी के मुताबिक उसके मरने में कुल बीस दिन बचे थे, अत: वह बहुत घबराया हुआ तथा गमगीन था. पं. चन्द्रचूड़ अब इस सूची को अपनी खोजी नज़रों से देखने लगे.
उन दस लोगों में सात व्यक्तियों में कुछ समानताएं थीं. एक तो अधिकांश लोग अमीर थे तथा चालीस से पचपन साल की उम्र के थे, दूसरा उनमें से छह व्यक्ति शहर के प्रसिद्ध जिम के सदस्य थे. असल में यह जिम, जिम कम क्लब ज़्यादा था. कुछ लोगों का ख़्याल था कि जिम की आड़ में यह अय्याशी का अड्डा था. इसका नाम भी इसकी बदनामी या शोहरत में इज़ाफ़ा करता था.
इस जिम का नाम था पल्सेटिंग हार्ट जिम. इस जिम के मालिक दो दोस्त थे. मिस्टर परेरा तथा कर्नल सिंह. दोनों अविवाहित थे तथा शहर में सनकी लोगों के सिरमौर कहे जाते थे. कर्नल सिंह जहां रंगीन तबीयत के आदमी थे, वहीं मिस्टर परेरा बेहद शुष्क व्यक्तित्व के स्वामी थे. कर्नल सिंह को ख़ूबसूरत औरतों से घिरे रहना पसंद था, वहीं परेरा औरतों से दूर भागते थे. मिस्टर परेरा यूं शुष्क प्रकृति के व्यक्ति थे, मगर वे हर शाम अपने एक अन्य मित्र डॉ. जोज़फ़ के घर शतरंज खेलने ज़रूर जाते थे तथा क्लब की सदस्यता प्राप्त करनेवाले व्यक्ति की शारीरिक जांच भी इन्हीं डॉ. जोज़फ़ द्वारा की जाती थी. यह जिम अपने अनोखे कार्यक्रमों तथा अजीबो-गरीब नियमों की वजह से भी (कु)ख्यात था.
इसकी सदस्यता हेतु न केवल मोटी फ़ीस वसूली जाती थी, अपितु अनेक शर्तें भी सदस्यों पर लादी जाती थीं. मगर फिर भी इसकी सदस्यता हेतु लंबी वेटिंग लिस्ट हर समय बनी रहती थी. पं. चंद्रचूड़ ने इस क्लब की काफ़ी खोजबीन की, मगर कोई सूत्र हाथ नहीं लगा. शहर के सभी आला अफ़सर भी इसके सदस्य थे तथा शहर के अनेक संभ्रान्त व्यक्ति भी इसके सदस्य थे. अत: उन पर हाथ उठाना संभव नहीं था.
पं. चंद्रचूड़ ने अब तक मर चुके लगभग बीस लोगों की भविष्यवाणी सुनकर मरनेवाले लोगों के बारे में तफतीश आरंभ कर दी. यहां भी कुछ संदिग्ध तथ्य सामने आए. एक तो यह कि मरनेवालों में से पांच व्यक्तियों के बारे में भविष्यवाणी ग़लत निकली थी, कोई उस समय नहीं मरा था, जो समय बतलाया गया. कोई एक दिन या दो दिन पीछे मरा था, तो कोई किसी अन्य तरीके से मरा था. पं. चन्द्रचूड़ ने अपने सहयोगी युवा पुलिस इन्सपेक्टर विनय मराठे को इनकी जांच सौंप दी.
इस कर्मठ अधिकारी ने तीन मामले शीघ्र सुलझा कर दोषी व्यक्तियों को गिऱफ़्तार कर लिया, मगर इन दोषी व्यक्तियों ने कहा कि पुलिस अपनी अकर्मण्यता छुपाने के लिए उन्हें फंसा रही है.
छानबीन किसी नतीज़े पर नहीं पहुंच रही थी. चंद्रचूड़ सिगार पर सिगार फूंक रहे थे. तभी उन्हें एक और सूत्र हाथ लगा कि न केवल धमकी या भविष्यवाणी प्राप्त लोग जिम के सदस्य थे, अपितु मिस्टर मल्होत्रा जिनकी मृत्यु से यह केस उजागर हुआ था, वह भी डॉ. जोज़फ़ से चेकअप करवा चुके थे. अत: अब चन्द्रचूड़ ने अपना ध्यान, इस डॉक्टर पर केन्द्रित किया.
सूचनाओं के अनुसार इस डॉक्टर का नाम था डॉ. गेब्रिल जोज़फ़, वह लगभग पचास साल से इस शहर में प्रैक्टिस कर रहा था. वो काफ़ी भला, सहृदय तथा क़ाबिल डॉक्टर था. कई दिन से डॉक्टर की निगरानी ज़ारी थी, मगर कोई संदिग्ध बात नज़र नहीं आई. डॉक्टर न केवल भले व्यक्ति थे, बल्कि अनेक ग़रीब मरीज़ों का इलाज नि:शुल्क करते थे. उनकी दिनचर्या में सुबह-शाम सैर, व्यायाम, फिर सारा दिन अपने क्लीनिक के काम. क्लीनिक उनकी कोठी के ही अहाते में था. डॉक्टर की आयु सत्तर वर्ष से ऊपर थी, मगर वे अच्छे स्वास्थ्य तथा क़द-काठी की वजह से मात्र पचास-पचपन के लगते थे. उनकी पत्नी तथा तीनों सन्तान इंग्लैंड जाकर रह रहे थे. उनका टेलीफ़ोन टेप किया जाने लगा. हर आने-जाने वाले लोगों पर नज़र रखी जा रही थी. मगर नतीज़ा वही ढाक के तीन पात. इस बीच तीन और लोगों की मृत्यु भविष्यवाणी द्वारा बतलाए समय पर हो चुकी थी. मौत का तरीका भी वही था, जो फ़ोन पर बताया गया था. वे तीनों भी डॉक्टर जोज़फ़ के मरीज़ थे तथा मरने से चालीस-पैंतालीस दिन पहले डॉक्टर से मिले थे.
अब चन्द्रचूड़ ने और देर न करके डॉक्टर से पूछताछ का मन बना लिया. उन्होंने पुलिस के इन्स्पेक्टर जनरल से बात की और एक दिन सादी वर्दी में पुलिस कर्मी, डॉक्टर को चन्द्रचूड़ के पास ले आए. दो दिन लगातार पूछताछ के बाद भी कुछ सूत्र हाथ नहीं लगा. डॉक्टर काफ़ी सभ्य, मृदुभाषी, नेक इन्सान लगे थे चन्द्रचूड़ को, मगर उनकी छठी इन्द्रिय अभी भी शक की सूई डॉक्टर की तरफ़ घुमा रही थी, पर केवल शक के आधार पर डॉक्टर को गिऱफ़्तार करना न केवल कठिन था, अपितु इससे डॉक्टर की जान को ख़तरा भी हो सकता था.
फिर भी चन्द्रचूड़ ने डॉक्टर को शहर से बाहर न जाने की चेतावनी दे दी थी. उनका पासपोर्ट भी रखवा लिया था.
खोजी पत्रकार शिकारी कुत्तों की तरह इस सन्दर्भ में हर ख़बर को सूंघ रहे थे. जाने कैसे, एक सांध्य अख़बार ने डॉक्टर जोज़फ़ से पूछताछ की ख़बर छाप दी थी. बस फिर क्या था, आनन-फानन में यह ख़बर आग की तरह सारे शहर में फैल गई. इससे पहले कि डॉक्टर जोज़फ़ की सुरक्षा का कोई ठोस इंतज़ाम होता, गुस्साए रिश्तेदारों ने तथा दंगाई भीड़ ने डॉक्टर की कोठी को घेर लिया. डॉक्टर ने दरवाज़ा अन्दर से बंद कर लिया तथा पुलिस को सूचित किया. मगर पुलिस के आने से पहले लोगों ने डॉक्टर की कोठी को आग लगा दी थी. डॉक्टर खिड़की खोलकर चिल्ला रहा था, ‘‘मेरी चाबी गुम हो गई है. प्लीज, दरवाज़ा तोड़कर मुझे बाहर निकालो. मैं बेकसूर हूं.’’ गुस्साई भीड़ ने खिड़की पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए.
चन्द्रचूड़ वहां पहुंच गया था. मगर पुलिस अभी तक नहीं पहुंची थी. कोठी पर तैनात मात्र दो सिपाही गुस्साई भीड़ को काबू करने में असमर्थ थे. उसने लोगों को समझाने का प्रयत्न किया. मगर उसकी बात कोई नहीं सुन रहा था. फिर उसने देखा, डॉक्टर ऊपरवाले कमरे में खड़ा अपने सेलफ़ोन पर किसी से बातें कर रहा था. घर को आग ने बुरी तरह जकड़ लिया था और डॉक्टर जोज़फ़ अपने ही घर में जल कर मर गए थे. जैसा ऐसे हालात में होता है. पुलिस ने कुछ लोगों को दंगा फैलाने के अपराध में गिऱफ़्तार कर लिया था और बात यहीं ख़त्म हो गई.
चन्द्रचूड़ उदास से अपने होटल के कमरे में बैठे थे. वे स्वयं को डॉक्टर का हत्यारा समझ रहे थे और केस भी अभी सुलझा कहां था?
छानबीन किसी नतीज़े पर नहीं पहुंच रही थी. चंद्रचूड़ सिगार पर सिगार फूंक रहे थे. तभी उन्हें एक और सूत्र हाथ लगा कि न केवल धमकी या भविष्यवाणी प्राप्त लोग जिम के सदस्य थे, अपितु मिस्टर मल्होत्रा जिनकी मृत्यु से यह केस उजागर हुआ था, वह भी डॉ. जोज़फ़ से चेकअप करवा चुके थे. अत: अब चन्द्रचूड़ ने अपना ध्यान, इस डॉक्टर पर केन्द्रित किया.
सूचनाओं के अनुसार इस डॉक्टर का नाम था डॉ. गेब्रिल जोज़फ़, वह लगभग पचास साल से इस शहर में प्रैक्टिस कर रहा था. वो काफ़ी भला, सहृदय तथा क़ाबिल डॉक्टर था. कई दिन से डॉक्टर की निगरानी ज़ारी थी, मगर कोई संदिग्ध बात नज़र नहीं आई. डॉक्टर न केवल भले व्यक्ति थे, बल्कि अनेक ग़रीब मरीज़ों का इलाज नि:शुल्क करते थे. उनकी दिनचर्या में सुबह-शाम सैर, व्यायाम, फिर सारा दिन अपने क्लीनिक के काम. क्लीनिक उनकी कोठी के ही अहाते में था. डॉक्टर की आयु सत्तर वर्ष से ऊपर थी, मगर वे अच्छे स्वास्थ्य तथा क़द-काठी की वजह से मात्र पचास-पचपन के लगते थे. उनकी पत्नी तथा तीनों सन्तान इंग्लैंड जाकर रह रहे थे. उनका टेलीफ़ोन टेप किया जाने लगा. हर आने-जाने वाले लोगों पर नज़र रखी जा रही थी. मगर नतीज़ा वही ढाक के तीन पात. इस बीच तीन और लोगों की मृत्यु भविष्यवाणी द्वारा बतलाए समय पर हो चुकी थी. मौत का तरीका भी वही था,
जो फ़ोन पर बताया गया था. वे तीनों भी डॉक्टर जोज़फ़ के मरीज़ थे तथा मरने से चालीस-पैंतालीस दिन पहले डॉक्टर से मिले थे.
अब चन्द्रचूड़ ने और देर न करके डॉक्टर से पूछताछ का मन बना लिया. उन्होंने पुलिस के इन्स्पेक्टर जनरल से बात की और एक दिन सादी वर्दी में पुलिस कर्मी, डॉक्टर को चन्द्रचूड़ के पास ले आए. दो दिन लगातार पूछताछ के बाद भी कुछ सूत्र हाथ नहीं लगा. डॉक्टर काफ़ी सभ्य, मृदुभाषी, नेक इन्सान लगे थे चन्द्रचूड़ को, मगर उनकी छठी इन्द्रिय अभी भी शक की सूई डॉक्टर की तरफ़ घुमा रही थी, पर केवल शक के आधार पर डॉक्टर को गिऱफ़्तार करना न केवल कठिन था, अपितु इससे डॉक्टर की जान को ख़तरा भी हो सकता था.
फिर भी चन्द्रचूड़ ने डॉक्टर को शहर से बाहर न जाने की चेतावनी दे दी थी. उनका पासपोर्ट भी रखवा लिया था.
खोजी पत्रकार शिकारी कुत्तों की तरह इस सन्दर्भ में हर ख़बर को सूंघ रहे थे. जाने कैसे, एक सांध्य अख़बार ने डॉक्टर जोज़फ़ से पूछताछ की ख़बर छाप दी थी. बस फिर क्या था, आनन-फानन में यह ख़बर आग की तरह सारे शहर में फैल गई. इससे पहले कि डॉक्टर जोज़फ़ की सुरक्षा का कोई ठोस इंतज़ाम होता, गुस्साए रिश्तेदारों ने तथा दंगाई भीड़ ने डॉक्टर की कोठी को घेर लिया. डॉक्टर ने दरवाज़ा अन्दर से बंद कर लिया तथा पुलिस को सूचित किया. मगर पुलिस के आने से पहले लोगों ने डॉक्टर की कोठी को आग लगा दी थी. डॉक्टर खिड़की खोलकर चिल्ला रहा था, ‘‘मेरी चाबी गुम हो गई है. प्लीज, दरवाज़ा तोड़कर मुझे बाहर निकालो. मैं बेकसूर हूं.’’ गुस्साई भीड़ ने खिड़की पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए.
चन्द्रचूड़ वहां पहुंच गया था. मगर पुलिस अभी तक नहीं पहुंची थी. कोठी पर तैनात मात्र दो सिपाही गुस्साई भीड़ को काबू करने में असमर्थ थे. उसने लोगों को समझाने का प्रयत्न किया. मगर उसकी बात कोई नहीं सुन रहा था. फिर उसने देखा, डॉक्टर ऊपर वाले कमरे में खड़ा अपने सेलफ़ोन पर किसी से बातें कर रहा था. घर को आग ने बुरी तरह जकड़ लिया था और डॉक्टर जोज़फ़ अपने ही घर में जल कर मर गए थे. जैसा ऐसे हालात में होता है. पुलिस ने कुछ लोगों को दंगा फैलाने के अपराध में गिऱफ़्तार कर लिया था और बात यहीं ख़त्म हो गई.
चन्द्रचूड़ उदास से अपने होटल के कमरे में बैठे थे. वे स्वयं को डॉक्टर का हत्यारा समझ रहे थे और केस भी अभी सुलझा कहां था?

– डॉ. श्याम

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Short Story- Antim Bhavishyavani

“अम्मा, आपको याद है… जब विहान छोटा था, तो मुझे चाय पीते देख गर्म कप को पकड़ने की ज़िद करता था. एक बार झुंझलाकर मैंने उसकी नरम हथेली पर चाय का गर्म कप छुआ दिया. उसके बाद वो चाय के कप से दूर ही रहता था. ज़िम्मेदारी के बोझ को समेटे शादी का लड्डू थामना इनके बस का नहीं था, ये मैं जानती थी…”

Kahaniya

”जलपा… ए जलपा कहां हो तुम…?” मायादेवी की आवाज़ सुनकर जलपा झटपट रसोई से बाहर आ गई. पांव छूने झुकी, तो जलपा को आशीर्वाद देने की जगह वह उस पर बरस पड़ी. “ऐसे तो तुम लोग बड़े मॉडर्न बने फिरते हो… अब क्या हो गया, सारी अक्ल ताक पर रखकर बित्ते भर के लड़के की शादी करने चले हो.”

“आप को शादीवाली बात किसने बताई? अभी तो मैंने किसी को बताया ही नहीं है. और मां, बित्ते भर का नहीं रह गया है आपका पोता, मुझसे दो हाथ लंबा हो गया है.” जलपा ने अपनी सास की बात का शांतिपूर्वक जवाब दिया, तो वे अपना सिर पकड़कर बैठ गईं.

“हे भगवान… विहान नहीं बताता, तो क्या तुम लोग शादीवाले दिन बताते कि घर में गुड्डे-गुड़ियों का खेल हो रहा है.”

“मां, आप धूप में चलकर आ रही हो, पहले एक ग्लास ठंडा पानी पी लो.”

“मेरा दिमाग़ इतना गर्म है कि ठंडा होनेवाला नहीं है. कहां है मेरा विहान?…”

“पढ़ रहा है, बाद में मिल लेना.”

“रहने दे, पढ़ाई की इतनी चिंता होती, तो शादी का लड्डू ना थमाती इस उम्र में. क्या हो गया रे जलपा तेरी बुद्धि को…? सत्रह साल के लड़के की शादी… क्यों गड्ढे में ढकेल रही है?”

“मां, तुम भी तो पंद्रह साल की उम्र में ब्याहकर आई थी और बाबूजी भी अट्ठारह के थे. अपना विहान भी अपनी शादी तक अट्ठारह का हो जाएगा.”

“अरे, कुछ अच्छी बातें लेता हमारी पीढ़ी से…

पंद्रह-अट्ठारह की उम्र में शादी करके क्या सुख देखा, क्या दुनिया… कभी सोचा है.”

मायादेवीजी की आवाज़ दर्द में डूब गई थी, मानो अतीत की ओढ़ी ज़िम्मेदारियों का बोझ सहसा कंधों पर महसूस किया हो. “हमारे मां-बाप तो पुराने ज़माने के थे, पर तू ऐसी ज़्यादती कैसे कर सकती है?”

“ज़्यादती कहां अम्मा… उसकी मर्ज़ी से कर रही हूं. अब इतनी भी पुराने विचारों की नहीं हूं. प्यार करता है अपना विहान तनीशा से… शादी हो जाएगी, तो खुलकर एक-दूसरे के साथ घूमेंगे-फिरेंगे और मौज-मस्ती करेंगे. अब ऐसे में थोड़ी ज़िम्मेदारियां बढ़ेंगी, तो उसे निभाना सीखेंगे. अच्छा है जल्दी गृहस्थी बसा लें.” “प्यार…!”

मायादेवी कुछ पल के लिए जड़ खड़ी रहीं, फिर सहसा बोलीं, “हे भगवान! तू कैसी मां है? उसकी कोई उम्र है गृहस्थी और प्यार समझने की. तेरी बुद्धि को क्या हो गया है. अरे, समझा देती उसे प्यार से.

यह भी पढ़ेपरफेक्ट लाइफ पार्टनर की तलाश के स्मार्ट फॉर्मूले (Smart Formulas To Find Out Perfect Life Partner)

ऊंच-नीच के बारे में बताती. अब ये क्या… कि उसकी ग़लती पर तूने शादी का दहला मार दिया. अब तू मेरा दिमाग़ गरम मत कर… मैं पहले अपने विहान से मिलना चाहती हूं.” मायादेवी विहान के कमरे की ओर लपकीं, तो अबकी बार जलपा ने रास्ता नहीं रोका. भीतर गईं, तो विहान क़िताबों में मुंह गड़ाए बैठा था. चेहरा ऐसा पीला, मानो हल्दी मल दी गई हो. हाव-भाव बता रहे थे कि मां और दादी की बातें उसके कानों में पड़ चुकी थीं.

दादी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा, तो वह फफक पड़ा. मायादेवी का कलेजा निचुड़-सा गया था. “हंसता-बोलता मस्त बच्चा ये शादी के पचड़े में कैसे फंस गया?” दादी की बात सुनकर विहान की सिसकियां और बढ़ गई थीं. उसकी हालत देखकर मायादेवी ने उसे गले से लगा लिया.

टूटते-फूटते शब्दों में उसके मुंह से निकला, “दादी, मैं ये शादी नहीं करना चाहता हूं. मैं अभी पढ़ना चाहता हूं… मम्मी मेरा फ्यूचर ख़राब कर देंगी.”

“ना… ना… विहान अब देख मैं तेरे साथ कैसे खड़ी होती हूं. तेरी मम्मी की ज़िद की ऐसी की तैसी…” दुलारती दादी सहसा ठिठकीं, “अच्छा, ये तो बता मम्मी की बेव़कूफ़ी में और कौन-कौन साथ दे रहा है?”

“अमिता आंटी. वो अपनी बेटी की शादी मुझसे कराना चाहती हैं.”

“तेरी अमिता आंटी की बेटी करती क्या है?” “वो पढ़ाई कर रही है, मेरी क्लास में ही है.” “पर वो बेव़कूफ़ कैसे तैयार हो गई?”

“दादी, अब तो वो भी तैयार नहीं है. सच तो ये है कि हम दोनों ही इस जंजाल में नहीं पड़ना चाहते हैं.”

“अब नहीं तैयार हैं का क्या मतलब…? क्या पहले तैयार थे. कहीं प्यारवाली बात…”

“अरे, वही तो एक ग़लती हुई है.” नज़रें चुराते विहान ने धीरे से कहा, तो दादी ने पूरी बात बताने को उकसाया… “दादी, तनीशा  मुझे अच्छी लगती थी. हम दोनों को एक-दूसरे का साथ पसंद था. इस बात को लेकर पहले मम्मी चिढ़ती भी थीं… लेकिन बाद में पता नहीं क्या हुआ, वो अचानक हमारी शादी करने को तैयार हो गईं. आप कुछ करो दादी, इस शादी से बचा लो. अभी तो मम्मी ने किसी को नहीं बताया है, पर कुछ दिनों में जब सबको पता चलेगा तो सोचो… मेरे दोस्त मुझे कितना चिढ़ाएंगे..!” विहान टकटकी लगाए अपनी दादी को देख रहा था, लेकिन मायादेवी तो किसी अंधेरे में छिपे पक्ष को देखने का प्रयास कर रही थीं.

“अरे, अम्मा बड़े मौ़के से आई हो, देखो तो  आपकी होनेवाली बहू आई है…” जलपा की तेज़ आवाज़ से मायादेवी चौंकीं, वहीं विहान का चेहरा और बुझ गया.

“विहान, ओ विहान… कहां हो बेटा, देख तेरे लिए क्या लाई हूं.” अमिता की आवाज़ सुनकर विहान ने अपने कानों में उंगली डाल ली थी. और इधर जलपा ‘मेरी बहू’ कहती हुई बैठक की ओर दौड़ी. अचानक तनीशा की तेज़ आवाज़ आई, “आंटी प्लीज़, अब ये बहू-बहू का नाटक बंद करिए.” अमिता ने तुरंत तनीशा को डांटा, “ये क्या तरीक़ा है अपनी होनेवाली सास से बात करने का…”

“ममा प्लीज़, अब आप लोग एक बात कान खोलकर सुन लीजिए, मैं कोई शादी-वादी नहीं करने जा रही हूं और यही बात बताने मैं आपके साथ आई हूं.”

“तो क्या आप लोगों ने सात जनम तक साथ निभाने की झूठी क़सम खाई थी?”

“भाड़ में गई क़सम… हम दोनों ग़लत थे, तो आप लोगों ने हमारी ग़लती सुधारने की बजाय एक नया हंगामा शुरू कर दिया.”

“बेटा, हम तो तुम्हारे सच्चे प्यार से द्रवित हो गए थे.” जलपा ने भीगे शब्दों में कहा, तो तनीशा और भड़क गई. “आंटी, आप ये फिल्मी डायलॉग मत बोलिए. अट्ठारह का विहान और लगभग उतने साल की मैं… इस उम्र में आप सच्चे प्यार की उम्मीद करती हैं. अरे, कुछ दिन हमने एक-दूसरे की कंपनी को एंजॉय किया था, बस… बच्चे ग़लत हो सकते हैं, ऐसे में आपका फ़र्ज़ था हमें सही-ग़लत समझाना, पर यहां तो आप लोग ख़ुद ही बचपना करने पर उतारू हैं. हमारी शादी… उ़फ्! सोचकर ही अजीब लग रहा है… हमारी पढ़ाई-लिखाई, सपने, करियर, पूरी ज़िंदगी इस प्यार के चक्कर में… मुझे तो प्यार शब्द सुनने से घुटन हो रही है. कोई प्यार-व्यार नहीं है हमें. अच्छी-ख़ासी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर शादी कर लूं मैं… वो भी विहान से?”

“ओ मैडम..! ग़लती आपसे नहीं मुझसे भी हुई है… जिस उम्र में करियर पर फोकस करना था, तुम्हारी वजह से कहीं और चला गया.” दोनों के झगड़े को जहां अमिता और जलपा मुंह बाए देख रही थीं, वहीं मायादेवी ने उन्हें रोका, “बस, चुप हो जाओ तुम लोग,

तुम्हारी इस हालत का ज़िम्मेदार और कोई नहीं तुम ख़ुद हो. फोकस ध्यान से, एकाग्रता, संयम और अनुशासन से आती है, जिसे तुम लोगों ने तोड़ा…” दादी की बात से छाई चुप्पी को विहान ने तोड़ा, “दादी, इससे पहले कि मम्मी और आंटी हमारी जगहंसाई कराएं, इस क़िस्से को यहीं ख़त्म कर दो.”

“इसका मतलब है तुम दोनों दुनियावालों की वजह से अलग होना चाहते हो.”

“नहीं दादी, हम अपने अच्छे फ्यूचर के लिए अलग होना चाहते हैं. अब तो बस आप लोग हमें एग्ज़ाम की तैयारी करने दीजिए. इस चक्कर में वैसे ही बहुत समय बर्बाद हो गया है.” विहान की बात से सहमत तनीशा तुरंत बोली, “अब दस साल तक मुझे मेरे करियर को शेप देने के लिए छोड़ दो. मुझे मेडिकल के लिए तैयारी करनी होगी. सच, बड़ा ख़राब चक्कर है ये प्यार-व्यार…” तनीशा चुप हुई, तो अमिता कुछ सोचते हुए बोली, “जलपा, अगर बच्चों की यही मर्ज़ी है, तो हम कुछ दिन और…” “ओह! नो…! अब आप लोग कोई दूसरा कमिटमेंट मत कर लेना. जीवन के ऐसे डिसीज़न यूं जल्दबाज़ी में नहीं लिए जाते. इनका भी अपना एक समय और समझ होती है, जो उम्र के साथ आती है.” कहती हुई तनीशा अमिता को लगभग खींचती हुई साथ ले गई.

वो घर से क्या गई, विहान के तो ख़ुशी के मारे पंख ही निकल आए. “मैं भगवान के सामने दीया लगाती हूं.” कहती हुई मायादेवी पूजा के कमरे में चली गईं. जलपा आंखें मूंदें सोफे पर धम्म से बैठ गई. सहसा उसके होंठों से एक रहस्यमई, पर स्मित हंसी झलकी… उसके जेहन में तनीशा की बात… ‘जीवन के ऐसे डिसीज़न यूं…’ गूंज रही थी. यही बात तो उसने भी कही थी, पर उस व़क्त तो लगा था जीवन का सार उनके कानों तक पहुंचा ही नहीं था. चार-पांच महीने पहले की ही तो बात है, जब उसने विहान और तनीशा को एक साथ मोटरसाइकिल पर बैठे देखा था. साथ बैठना अजीब नहीं था, अजीब था तनीशा का उससे हद तक चिपककर बैठना. जलपा का मन निचुड़-सा गया था, पर एक दिन बड़े संकोच से अमिता ने कहा कि विहान और तनीशा के बीच कुछ चल रहा है. तनीशा ने विहान को लेकर मुझसे झूठ भी बोलना शुरू कर दिया है. अमिता की बात सुनकर जलपा के पांव तले ज़मीन खिसक गई थी. दबे शब्दों में उसने विहान को समझाया, तो वह भड़क गया. इधर अमिता के प्रति तनीशा के बागी तेवर मुखर हो गए थे. जब दोनों ने मिलकर उनको समझाने की कोशिश की, तो दोनों ने मिलकर घरवालों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था. पढ़ाई-लिखाई ताक पर रखकर एक-दूसरे का साथ निभाने की घोषणा कर दी. उनका जोश दूध के उफान की तरह अपनी उठान पर था कि तभी जलपा ने अचानक दोनों की शादी की पेशकश की, जिसे अमिता ने मंज़ूरी दे दी. विहान और तनीशा के बागी तेवर सहसा मंद पड़ने लगे. यकायक उलझन में पड़े… कुम्हलाने लगे… अब ना तो फोन पर लंबी बातें होतीं, ना ही आपस में मैसेज का आदान-प्रदान होता.

मिलना-जुलना भी लगभग बंद था. दोनों अपने कमरों में क़िताबों में मुंह घुसाए नज़र आते. अब वे एक-दूसरे का नाम सुनकर चिढ़ने लगे थे. अमिता कहती भी थी कि विहान के साथ घूम आओ, तो तनीशा चिढ़ जाती. कमोबेश यही स्थिति विहान की भी थी और आज विस्फोट ही हो गया. एक-दूसरे से रिश्ता तोड़कर वो एक-दूसरे को देखना भी गंवारा नहीं कर रहे थे. विचारों में खोई जलपा की तंद्रा विहान ने भंग की, “मम्मी, मैं आर. के. सर के पास मैथ्स पढ़ने जा रहा हूं. आज से एक्स्ट्रा कोचिंग लूंगा.” कहता हुआ वह तेज़ी से बाहर चला गया. दरवाज़ा बंदकर वो पलटी ही थी कि मायादेवी चाय की ट्रे पकड़े खड़ी थीं. “अच्छा, अब चाय पी ले… इस दिन के लिए बड़ी मेहनत की है तुमने…” वे धीमे से मुस्काईं, तो जलपा ठठाकर हंस पड़ी, “अम्मा, आप ने जान लिया था कि हम…?”

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“अरे, ये बाल धूप की स़फेदी नहीं लिए हैं. सच बताऊं, जब विहान ने शादीवाली बात बताई, तो तू मुझे सिरफिरी लगी. सुशांत से बात की, तो वो भी तेरा समर्थन कर रहा था. तब तो मैंने अपना माथा ठोंक लिया. विहान के दादा एक हफ़्ते के लिए गांव गए थे. मुझसे तो उनके आने तक सब्र भी नहीं हुआ. सो अकेली ही चली आई. यहां जब शादी का कारण पता चला, तो माथा ठनका. विहान से बात करते ही तेरी योजना का अंदाज़ा हुआ. फिर सोचा जैसा चल रहा है, चलने देती हूं.”

“क्या करती अम्मा, विहान इस उम्र में प्यार के चक्कर में पड़ गया. हमारे समझाने, डराने-धमकाने का उलटा असर हुआ. दोनों असुरक्षित महसूस करते हुए एक-दूसरे के और क़रीब आ गए थे. ऐसे में योजना के तहत दोनों को एक-दूसरे के पास ढकेला, तो उनका सारा एडवेंचर धरा का धरा रह गया.”

“बड़ी बदमाश है रे जलपा.” अम्मा लाड़ से बोलीं. हंसते हुए जलपा बोल रही थी, “ये उम्र इंफेचुएशन को प्यार समझने की भूल करती ही है. पर विहान और तनीशा के मामले में प्यार की तीव्रता अधिक थी, सो डर गए.”

“मैं अक्सर सोचती थी कि आज की पीढ़ी क़िताबों पर ज़्यादा निर्भर है, पर मनोवैज्ञानिक तरी़के से हल हुआ मामला क़ाबिले-तारीफ़ है.” मायादेवी की बात सुन जलपा को मानो कुछ याद आया, “अम्मा, आपको याद है… जब विहान छोटा था, तो मुझे चाय पीते देख गर्म कप को पकड़ने की ज़िद करता था. एक बार झुंझलाकर मैंने उसकी नरम हथेली पर चाय का गर्म कप छुआ दिया. उसके बाद वो चाय के कप से दूर ही रहता था. ज़िम्मेदारी के बोझ को समेटे शादी का लड्डू थामना इनके बस का नहीं था ये मैं जानती थी, पर इस योजना में भी ख़तरा कम नहीं था. डर लगा रहता था कि दोनों विवाह के लिए राज़ी ना हो जाएं.”

“ऐसा मुमकिन नहीं. गर्लफ्रेंड को मोटरसाइकिल पर बैठाने से शान बढ़ती है, पर इस उम्र में बीवी को बैठाकर घुमाने की बात, ना… ना… आख़िर विहान को दोस्त-बिरादरी में मुंह दिखाना है या नहीं.”

मायादेवी के कहने के ढंग से जलपा हंस पड़ी थी. सुशांत घर आए, तो आज का सारा क़िस्सा पता चला. वे भी योजना के सफल अंत पर अपनी टिप्पणी दे रहे थे कि आग से खेलने की ज़िद करते बच्चों को आग के पास ले जाना ज़रूरी होता है, ताकि आंच का अंदाज़ा लगाकर आनेवाले ख़तरे को समझें. “जो हुआ सो हुआ… अब इस घर में विहान की पढ़ाई के अलावा और कोई बात नहीं होगी.”

मायादेवी एक हफ़्ता रुककर विहान के पढ़ाई के प्रति समर्पण और एकाग्रता को देख उसे ढेरों शुभकामनाएं देकर वापस चली गई थीं. इसी बीच अलका ने फोन पर बताया कि तनीशा ने विहान के नाम से तौबा कर ली है, वो पूरी तरह से अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर रही है. जो बच्चे कल तक अपने वर्तमान और भविष्य के साथ खेल रहे थे, वो अपने आज और उज्ज्वल कल के प्रति पूरी तरह समर्पित थे और उनका साथ देने के लिए हर पल प्रहरी की तरह खड़े उनके माता-पिता एक बार फिर उन्हें सधे क़दमों से चलते देख सुकून से भरे थे.

Meenu Tripathi

         मीनू त्रिपाठी

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उससे संपर्क करने के बाद ही मैंने जाना कि पुरुष का वासनापूर्ण रूप ही होता है, यह हमारी पूरी पुरुष जाति के लिए अवधारणा है, तो ग़लत है. वापस लौटते समय सुनील का शरीर मुझसे दूर हो गया, साथ आया तो स़िर्फ एक एहसास मानो उसका शरीर नश्‍वर है और एहसास रूपी आत्मा अमर है, जो हर समय मेरे साथ रहेगा. यह एहसास कि कोई मुझे शिद्दत से चाहता है और मुझे ख़ुश देखना चाहता है, काफ़ी है जीने के लिए.

Short Story

जादू-सा असर किया मोबाइल के स्क्रीन पर लिखे सुनील के गाने की एक लाइन ने. उसने बिना कुछ कहे ही सब कुछ कह दिया. वह कुछ भी तो भूला नहीं था. हमारी 15 दिनों की मुलाक़ात में वह गाना ही तो था, जो गुनगुनाते हुए वह अपने सारे ज़ज़्बात व्यक्त कर देता था और मैंने भी उस गाने के अर्थ में स्वयं को तलाशते हुए, शब्दहीन, अपने हाव-भाव से उसका मौन निमंत्रण स्वीकार कर लिया था.

तीस साल बाद अचानक सोशल मीडिया पर उसका नाम और औपचारिकतापूर्ण संदेश- ‘हैलो पूजा! कैसी हो?’ ने तो मेरे मन में पहले ही तूफ़ान पैदा कर दिया था. परिस्थितियों और समय की मोटी चादर के तले दबकर उसका अस्तित्व ही मेरे लिए समाप्त हो चुका था. कहते हैं न कि रख-रखाव न किया जाए, तो महल भी खंडहर बन जाता है, फिर वह अल्हड़ उम्र ही ऐसी थी, जिसमें न कोई भविष्य के सपने होते हैं, न कोई वादे होते हैं. बस, किसी की मूक प्रशंसाभरी आंखों से

साक्षात्कार होने मात्र से इतना ख़ूबसूरत एहसास होता है कि मन रंगीन सपने सजाने लगता है. समय बहुत बलवान है, जो अच्छी-बुरी सभी यादों को भुलाने के लिए मरहम का काम करता है. लेकिन इस नए टेक्नोलॉजी ने तो मेरे अतीत को साक्षात् सामने लाकर खड़ा कर दिया था. शांत समंदर में झंझावात पैदा कर दिया था.

यह मेरे लिए अभिशाप है या वरदान, सोच में पड़ गई थी. वर्तमान परिस्थितियों के कारण इसका अब कोई औचित्य ही दिखाई नहीं दे रहा था. यह मन को उद्वेलित करके बेचैन ही करेगा.

आरंभ में औपचारिकतापूर्ण बातचीत से पता चला कि वह भोपाल में और मैं मुंबई में अपने-अपने परिवार के साथ जीवन बिता रहे हैं. फिर अचानक एक दिन मोबाइल के स्क्रीन पर उस गाने की लाइन पढ़कर मेरे मन की स्थिति बिल्कुल वैसी ही हो गई थी. जैसी उसकी आंखों में पहली बार मूक प्रेम निवेदन देखकर हुई थी. तो क्या वह कुछ भी नहीं भूला अब तक? उसके गाने की लाइन के प्रतिक्रियास्वरूप मैं तीस साल पहले की अव्यक्त भावनाओं में अपने को बहने से रोक नहीं पाई और उनको व्यक्त करने के लिए जवाब देने के लिए मजबूर हो गई.

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मैंने लिखा- ‘तो क्या तुम्हें सब कुछ याद है… परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं, लेकिन हम दोस्त बनकर बातें तो कर सकते हैं. हम दोनों ही अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हैं, इसलिए हमारे रिश्ते के इस नए मोड़ से हमारे अपने परिवारों के प्रति हमारे कर्त्तव्यों का हनन तो होगा नहीं, बल्कि उम्र के इस पड़ाव में जो खालीपन आ गया है, वह भर जाएगा. वैसे भी तुम्हारी भरपाई कभी हो नहीं पाई, वह दिल का कोना सूना ही है…’ मैसेज भेजते ही मुझे अजीब-सी ग्लानि होने लगी. यह मैंने क्या कर डाला! उसने तो स़िर्फ एक गाने की लाइन लिखी थी. उसके पीछे उसका अभिप्राय क्या था, यह जाने बिना ही मैंने क्या कुछ लिख डाला…

इतने वर्षों में उसके व्यक्तित्व में क्या बदलाव आया होगा? कैसी उसकी सोच होगी? क्या सोचेगा वह पढ़कर? एक शादीशुदा महिला भी शादी के बाद परपुरुष से संबंध रखना चाहती है. हां, परपुरुष ही तो था, केवल 15 दिनों की औपचारिक मुलाक़ात और उसके बाद इतने वर्षों का अंतराल किसी आत्मीय रिश्ते की ओर तो इंगित करता नहीं है. वैसे भी पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं की इतनी बेबाक़ी को निर्लज्जता का दर्जा ही दिया जाता है, ख़ासकर उस ज़माने में, जब हम मिले थे. हमारे संस्कार तो यही कहते थे.

काश! कोई ऐसा बटन भी होता, जिसे प्रेस करने से भेजा हुआ संदेश भी डिलीट हो जाता. अपने स्क्रीन पर तो घबराकर तुरंत डिलीट कर ही दिया था. उसका जवाब आने के बाद मेरी आत्मग्लानि और बढ़ गई. उसका जवाब था- ‘मैं आपसे स़िर्फ दोस्ती चाहता हूं, इतना इमोशनल होना ठीक नहीं है…’ मैंने प्रत्युत्तर में लिखा- ‘मुझे थोड़ा समय चाहिए…’

मन बड़ा खिन्न हो गया था. मैं सब कुछ भूल चुकी थी. अपने नीरस वैवाहिक जीवन के साथ समझौता कर चुकी थी. फिर यह सब क्यों? और उम्र के उस पड़ाव पर थी, जब शारीरिक शक्ति क्षीण हो जाती है. बस, स्वस्थ रहने के लिए मानसिक ख़ुशी मिलने के लिए मनुष्य भटकता है और जहां कहीं थोड़ा प्यार मिलता है, वहीं जाना चाहता है अर्थात् अल्हड़ उम्र की और इस उम्र की ज़िम्मेदारी मुक्त मानसिक स्थिति और आवश्यकताओं में विशेष अंतर नहीं होता.

मेरा मानना था कि प्यार कभी दोस्ती में परिवर्तित नहीं हो सकता. दोस्ती और प्यार के बीच सीमा रेखा खींचना असंभव है. मैंने मन ही मन तय कर लिया कि अपनी भावनाओं पर पूरी तरह कंट्रोल रखूंगी और उसके सामने उजागर नहीं होने दूंगी, लेकिन औपचारिक चैटिंग करते हुए मन होता कि थोड़ा तो वह रोमांटिक बात लिखे. उसके हर वाक्य में अपने मनोकूल अर्थ ढूंढ़ती रहती. और कभी-कभी असफल होने पर अतृप्त मन उदास हो जाता और असुरक्षा की भावना से घिर जाती कि पहले की तरह यह रिश्ता अस्थाई तो नहीं है. और यदि निभेगा भी, तो प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण कैसे निभेगा?

मैं चैटिंग से ही संतुष्ट रहना चाहती थी, लेकिन मेरी आवाज़ सुनने के उसके प्रस्ताव के सम्मोहन से ख़ुद को वंचित नहीं रख सकी. फोन करते ही मेरा पहला वाक्य था, “क्या अब तक याद हू मैं तुम्हें?”

“याद उसे किया जाता है, जिसे भुला दिया गया हो. मैं तो तुम्हें कभी भूला ही नहीं. तुम्हारी यादों के साथ जीना सीख लिया था. लगा ही नहीं तुम कभी मुझसे दूर हो…” इस तरह हमारी मूक यादों को उसने और मैंने शब्दों का जामा पहनाया.

समय ने हमारी भावनाओं को रत्तीभर भी नहीं बदला था, लेकिन परिस्थितियों ने हमारी ज़ुबान को संयमित शब्दों का चयन करने की ही अनुमति दी थी, इसलिए शब्दों को संभालकर बोल रही थी, जिससे दोस्ती की परिधि में ही रहूं. कितना मुश्किल था तब, जब उम्र ही ऐसी थी कि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों का ज्ञान अधूरा था और अब अपार ज्ञान होते हुए भी अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है.

बात समाप्त करने के बाद भी एक अधूरी प्यास से मन व्याकुल रहता था. लेकिन मैं उसे खोना नहीं चाहती थी और मन ही मन भगवान पर निर्णय की ज़िम्मेदारी छोड़ दी थी. उससे मिलने में मेरा तो कोई प्रयास था नहीं, यह सब तो ईश्‍वर की ही योजना थी. कहते हैं, जीवन में किसी के मिलने के पीछे भी कोई उद्देश्य होता है, शायद मेरे प्यार के लिए भटकते, वैरागी, निश्छल मन को सहारा देने के लिए ही भगवान ने उसे मुझसे मिलवाया था.

इतना तो मैं विगत 15 दिनों की मुलाक़ात में जान गई थी कि वह हमारे मूक प्रेम के लिए बहुत गंभीर है. लेकिन हमारा सामाजिक रिश्ता ऐसा है, जिसके कारण इसका कोई भविष्य नहीं था. उससे बात करके यह भी पता चल गया कि मेरे लिखे एक पत्र के उनके बड़े भाई के हस्तगत होते ही हमारे पत्र-व्यवहार पर पूर्ण विराम लगा दिया गया था और मैं भी उसके पत्र के न आने के कारण को जाने बिना ही अपनी शादी के पहले उन पत्रों को भूमिगत कर आई और हमेशा के लिए इस रिश्ते को धराशाई कर दिया था. लेकिन बादलों में जिस प्रकार बिजली चमककर अपने अस्तित्व की याद दिलाती है, उसी प्रकार वह भी अपनी धूमिल-सी उपस्थिति मेरे मानस पटल पर कभी-कभी दिखा देता था, फिर बादल छंटने के साथ सब एकसार हो जाता था.

हर दूसरे दिन बातें होने लगीं. उसके लिए समय निश्‍चित किया गया. फोन आने के पहले तो अजीब-सी बेचैनी रहती ही थी, फोन करते समय अजब-सा रोमांच का अनुभव होता था. ऐसी जगह जाकर बात करती थी, जहां कोई नहीं देखे. एक अपराध भावना घेरे रहती. सोचती ऐसा कौन-सा पाप कर रही हूं, जो पति से छिपाकर करना पड़ रहा है. बात ही तो कर रही हूं… यह कैसा रिश्ता है, जो इतना पवित्र होते हुए भी, विवाह के बाद अनैतिक माना जाता है.

हम कृष्ण के राधा के साथ अलौकिक प्रेम की गाथा गाते-गाते नहीं थकते. सारा वृंदावन नगरी राधा के नाम से गूंजता रहता है और लौकिक प्रेम को व्यभिचार मानते हैं. यह कैसी दोहरी मानसिकता है? क्या विवाह के समय लिए गए सात वचन मनुष्य को सब ख़ुशी दे देते हैं, जो इस अनाम रिश्ते से मिलती है? क्या विवाह एक बेड़ी नहीं है? क्या जीने के लिए आर्थिक और शारीरिक सुरक्षा के

साथ-साथ भावनात्मक सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है? जो अधिकतर वैवाहिक जीवन में अस्तित्वहीन है.

पति हमारी भावना न समझे, बावजूद उसके साथ हम घुट-घुटकर जीने पर मजबूर हो जाते हैं. क्या जीवन सांसें पूरी करने का नाम है? यह समाज द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा मानसिक शोषण ही तो है. यह आक्रोश ‘सिलसिला’ मूवी में अमिताभ बच्चन द्वारा बोले गए शब्दों में साफ़ उजागर होता है- ‘दिल कहता है, दुनिया की हर एक रस्म उठा दें, दीवार जो हम दोनों में  है, आज गिरा  दें… क्यों दिल में सुलगते रहें, दुनिया को बता दें… हां, हमको मुहब्बत है…’ यह कैसा रिश्ता है, जो जीवनदायिनी होकर भी असामाजिक कहलाता है.

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जब भी फोन से उससे बात होती थी, मैं तो उसकी बातों के बयार में बहती रहती थी. वही याद दिलाता था कि आज की मुलाक़ात, बस इतनी ही. एक बार उसका फोन निश्‍चित समय पर नहीं आया. मन अजीब आशंकाओं से भर गया कि कहीं उसकी पत्नी ने हमारी बात सुनकर हमारी बातचीत पर पूर्ण विराम तो नहीं लगा दिया? बाद में बात करने से पता लगा कि वह व्यस्त था. इसकी कई बार पुनरावृत्ति होने लगी. मन असुरक्षित रिश्ते के संदेह से घिरने लगा.

फिर धीरे-धीरे बात करने का अंतराल बढ़ने लगा, तो इसका कारण पूछने पर उसने मुझे समझाया. “हमारे रिश्ते में यही ठीक है. बातें तो अंतहीन हैं. मैं चाहता हूं कि हमारी भावनाएं इतनी नॉर्मल हो जाएं कि रिश्ते में बेचैनी ही न रहे.” पहले तो मुझे उसकी बात अटपटी लगी, लेकिन धीरे-धीरे उसके फोन आने का इंतज़ार ही कम होने लगा और जीवन व्यवस्थित-सा हो गया. यह स्थिति ठीक वैसी ही थी, जब प्यार या शादी के आरंभिक दिनों की रूमानियत धीरे-धीरे समाप्त होकर जीवन सामान्य हो जाता है. रिश्ते की तपिश धीरे-धीरे भीषण ग्रीष्म ऋतु में पहली बरसात की सोंधी ख़ुशबू के साथ ठंडक प्रदान करती है. ये बहुत ही सुखद एहसास था, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.

हम दोनों ही जीवन के इस पड़ाव में एक-दूसरे में आए बदलाव को एक बार मिलकर देखना चाहते थे. ‘जहां चाह वहां राह’ वाली कहावत चरितार्थ हुई और एक पारिवारिक समारोह में उसके शहर में अपने पति के साथ जाकर उससे मिलने का मौक़ा मिला. उसके परिवारवाले हमारे इस रिश्ते के बारे में जानते थे, फिर भी उसने मुझे अपने घर आने का निमंत्रण देकर हमारे इस बेनाम रिश्ते पर मुहर लगा दी, तो मुझे सुखद आश्‍चर्य हुआ और यह सोचकर गर्व हुआ कि मैं उसके लिए आज भी विशेष स्थान रखती हूं.

उसने रास्ते में रखे दीये को मंदिर में रखे दीये का स्थान दे दिया था. उसके घर में मुश्किल से एक घंटे की सामूहिक मुलाक़ात में हम तटस्थ रहने का नाटक तो कर रहे थे, लेकिन मूक भाषा का दिल ही दिल में आदान-प्रदान भी चल रहा था. उसकी सुखी गृहस्थी को देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई. इस रिश्ते के इतना सुंदर और सुलझे हुए स्वरूप का पूरा श्रेय उसे जाता है. मैं तो एक समंदर के समान थी, जिसका बांध अचानक खोल देने पर वह निर्बाध गति से बहने के लिए व्याकुल हो गया था. उसके बहाव को कंट्रोल उसी ने किया, क्योंकि अति का परिणाम तबाही ही होता है. उससे संपर्क करने के बाद ही मैंने जाना कि पुरुष का वासनापूर्ण रूप ही होता है, यह हमारी पूरी पुरुष जाति के लिए अवधारणा है, तो ग़लत है.

वापस लौटते समय सुनील का शरीर मुझसे दूर हो गया, साथ आया तो स़िर्फ एक एहसास मानो उसका शरीर नश्‍वर है और एहसास रूपी आत्मा अमर है, जो हर समय मेरे साथ रहेगा. यह एहसास कि कोई मुझे शिद्दत से चाहता है और मुझे ख़ुश देखना चाहता है, काफ़ी है जीने के लिए. शायर साहिर लुधियानवी ने ऐसे रिश्ते को बेहद ख़ूबसूरती से परिभाषित किया है- ‘वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा…’ आज के विकसित टेक्नोलॉजी के संदर्भ में जब संपर्क के इतने साधन हैं, तो स्त्री-पुरुष के रिश्ते में ज़माने की सोच में आए बदलाव के कारण इसकी परिभाषा को परिवर्तित किया जा सकता है. छोड़ना के स्थान पर यदि हम जोड़ना लिखें तो यह रिश्ता सार्थक होगा.

Sudha Kasera

       सुधा कसेरा

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“ओ मां! अपने घर के कामों को, ज़िम्मेदारियों को खटना नहीं कहते और अगर तुम अपनी बेटी के लिए ऐसी सोच रखती हो, तो फिर एक बार ये भी सोचो कि भाभी भी इस घर के लिए तुम्हारे हिसाब से ‘खट’ ही रही हैं. तुम्हारे मन में भाभी के लिए कभी हमदर्दी क्यों नहीं जागती?”

Kahaniya

 

इस बार मायके आई हुई ईरा बहुत ख़ुश और उत्साह से भरी हुई थी. राखी पर तो वह लगभग हर साल मायके आती है और भाई दूज पर अपनी ननदों को अपने घर बुलाती है. इस तरह वो भी ख़ुश, उसके पति और ननदें भी ख़ुश.

राखी का त्योहार उसे बचपन से ही विशेष प्रिय रहा है. छोटी-सी थी जब पिताजी की गोद में चढ़कर राखी ख़रीदने बाज़ार जाती थी और ढेर सारी दुकानें ढूंढ़कर एक बहुत बड़ी-सी रंग-बिरंगी फूल-पत्तियोंवाली राखी ख़रीदती थी. अपना सारा प्यार वह राखी के आकार के साथ भइया की कलाई पर बांध देना चाहती थी. तब यही लगता था कि जितनी बड़ी राखी होगी, भइया को लगेगा कि ईरा उनसे उतना ही अधिक प्यार करती है. गोया राखी न हो, बहन के प्यार का नाप हो. तभी ईरा बाज़ार से सबसे बड़ी राखी छांटकर लाती थी और भइया था कि ‘इत्ती बड़ी राखी’ को देखकर मुंह बिचकाता, “ये क्या उठा लाई है? मेरे सारे दोस्त फिर शाम को मुझ पर हंसते हैं. कोई छोटी राखी नहीं मिली इसे?”

तब मां बहुत समझा-बुझाकर उसे शांत करतीं, “अरे, अभी छोटी है इसलिए. थोड़ी समझदार हो जाएगी, तब थोड़े ही इतनी बड़ी राखी बांधेगी.”

ईरा को अब भी याद है स्पंज के फूलों की परतों पर रंग-बिरंगी पन्नियों और चमकीले सितारे लगे वो पांच रुपयेवाली राखियां. कितना नेह भरा होता था उनमें. दूसरे दिन ईरा भइया के नहाने से पहले वो राखी उनकी कलाई से उतरवा लेती थी और फिर वह राखी उसके निजी ख़ज़ाने में जमा हो जाती थी. सालभर तक वह उसे संभालकर रखती. कभी अपनी कलाई पर बांधकर ख़ुश होती, तो कभी माथे पर रखकर अपने रूप पर ख़ुद ही रीझ जाती, मानो कहीं की महारानी हो.

प्यार के रेशमी धागों में बंधता-लिपटता बचपन फिर सयानेपन की ओर बढ़ चला. भइया उसकी राखी पूरे साल अपने हाथ पर बांधे रखता, तो अब राखी की सुंदरता की जगह उसकी मज़बूती प्रमुख हो गई. लेकिन रिश्ते वैसे ही सुंदर बने रहे, जैसे वो बचपन की राखी सुंदर हुआ करती थी. भाभी के आने के बाद उस राखी में मज़बूती का एक धागा और सुंदरता का एक नग और जुड़ गया.

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और इस बार तो लता बुआ भी आ रही हैं राखी पर, तो सोने पे सुहागा. कितने बरस हो गए बुआ से मिले. बचपन में कितना खेली है वो बुआ की गोद में. मां की तरह ही बुआ ने उसे संभाला था. वो 10 बरस की थी जब बुआ की शादी हो गई थी. कितना रोई थी तब ईरा, तबीयत ख़राब कर ली थी उसने अपनी. बुआ मायके कम ही आती थीं. एक तो वैसे भी मायका मां से होता है और दादी तो ईरा के जन्म के कुछ वर्ष बाद चल बसी थीं.

दादाजी तो और भी पहले चले गए थे. विवाह होते ही मां पर एक मानसिक दबाव हमेशा ही बना रहा था कि बुआ के विवाह की ज़िम्मेदारी एक अनचाहे बोझ की तरह उन्हें ही उठानी है. जैसे-तैसे उन्हें पढ़ा-लिखाकर उनका विवाह करके मानो मां ने चैन की सांस ली और पल्ला झटक लिया. कभी राखी, भाई दूज पर उन्हें बुलाने की बात भी नहीं उठाने देतीं घर में. भइया के विवाह पर बुआ आई थीं कुछ दिनों के लिए बस. लेकिन ईरा को हर छुट्टियों में बुआ बहुत आग्रह से अपने घर

बुलवातीं और उतने ही प्यार से रखतीं. उनके स्वयं के बच्चे हो जाने के बाद भी ईरा के प्रति उनके प्यार में किंचित मात्र फ़र्क़ नहीं आया था.

ईरा जब समझदार हुई, तब से उसे मां का व्यवहार कचोटने लगा. बुआ का क्या कभी मन नहीं करता होगा मायके, अपने जन्म स्थान आने का? अपने बच्चों को मामा के घर भेजने का? ससुराल में जब सब उनसे मायके जाने के बारे में पूछते होंगे, तब कैसा लगता होगा बुआ को. इसलिए उसने इस बार पिताजी पर बहुत दबाव बनाया और ख़ुद भी मां से बहुत आग्रहपूर्वक बुआ को राखी पर बुलाने को राज़ी किया. मां को पता नहीं क्यों हर बार इस बात का डर लगा रहता कि बुआ को बुलाया, तो उन्हें लेना-देना पड़ेगा. पहले ही उनके ब्याह का ख़र्च मां को ही करना पड़ा है और अब तीज-त्योहार पर फिर ख़र्चा. ईरा को मां की छोटी सोच और मानसिकता पर दुख होता, लेकिन कुछ बोल नहीं पाती. मां कैसे रिश्तों को पैसों में तोल पाती हैं, वो भी एक बेटी के उसके मायके के साथ रिश्ते को…

बुआ के आने में अभी एक दिन बाकी था. ईरा ने भाभी को रसोईघर में खाना और मिठाइयां बनवाने में पूरी मदद की, ताकि भाभी पर काम का अतिरिक्त बोझ न पड़े और उनके साथ ईरा समय भी व्यतीत कर ले. दोनों हंसी-मज़ाक और बातें कर रही थीं. मां हर थोड़ी देर बाद किसी-न-किसी बहाने से उसे आवाज़ देकर बुला रही थीं. ईरा समझ गई कि मां नहीं चाहती हैं कि वह रसोई में भाभी की मदद करे. ईरा को कोफ़्त हो आई मां की सोच पर. मां की मंशा समझकर भाभी का भी मुंह उतर गया. पर ईरा ने मां की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और वो भाभी के साथ काम करवाती रही.

दोपहर में खाने वगैरह से फुर्सत पाकर ईरा फिर आराम से मां के पास बैठी.

“तुझे क्या ज़रूरत है खटने की. दो दिन के लिए ही तो आई है. ईशिता कर लेती काम.” मां ने छूटते ही डांट लगाई.

“तो क्या हुआ मां दोनों ने मिलकर किया, तो काम भी जल्दी निबट गया. थोड़ा आराम भाभी भी कर लेंगी. इसी बहाने ननद-भाभी थोड़ी गपशप भी कर लेती हैं.” ईरा बोली.

“अरे, तुझे घर में तो खटना ही पड़ता है और यहां भी…” मां आगे कुछ बोलतीं, इससे पहले ही ईरा बोल पड़ी-

“ओ मां! अपने घर के कामों को, ज़िम्मेदारियों को खटना नहीं कहते और अगर तुम अपनी बेटी के लिए ऐसी सोच रखती हो, तो फिर एक बार ये भी सोचो कि भाभी भी इस घर के लिए तुम्हारे हिसाब से ‘खट’ ही रही हैं. तुम्हारे मन में भाभी के लिए कभी हमदर्दी क्यों नहीं जागती? तुम्हें कभी उनके लिए यह क्यों नहीं लगता कि वह बेचारी भी ‘खट’ रही है इस घर में. बेटियां काम करें, तो मांओं को लगता है कि बेचारी खट रही है, लेकिन बहू कितना भी काम करे, तो सास को वह हमेशा ़फुर्सत में ही बैठी लगती है. कहेंगी- यह तो उसका काम ही है. औरतों में बैठी इस सास और मां के अलग-अलग होने के कारण ही रिश्ते तनावपूर्ण हो जाते हैं. जिस दिन औरत निष्पक्ष रूप से स़िर्फ ‘स्त्री’ होकर ‘स्त्री’ को देखेगी, उस दिन दुनिया की सारी बहुएं, बेटियां, भाभियां और ननदें सुखी हो जाएंगी.”

मां अवाक् होकर सुनती रह गईं. उन्हें ईरा से ऐेसे प्रत्युत्तर की कतई आशा नहीं थी. उस समय उन्होंने चुप रहना ही उचित समझा.

शाम को भी घर के काम निबटाने में ईरा ने भाभी की मदद की और फिर उन्हें साथ लेकर बाज़ार चली गई और सबके लिए ढेर सारे उपहार ख़रीद लाई. मां, बुआ, भाभी के लिए साड़ियां, पापा और भइया के लिए कुर्ता-पायजामा,

रिंकी-ऋषि के लिए कपड़े, खिलौने, मिठाइयां. पिताजी और भाई-भाभी पास ही थे, इसलिए मां उस समय तो कुछ नहीं बोलीं, लेकिन ईरा मां के चेहरे के भाव देखकर समझ गई कि उनको बुआ के लिए भी समान क़ीमत की साड़ी लाना अच्छा नहीं लगा है. लेकिन ईरा इस बार कुछ ठानकर ही मायके आई थी. तीन साल हो गए उसकी शादी को, वह हक़ से अपने मायके आती है, तो बुआ क्यों नहीं?

ईरा आई थी, तो पिताजी बाहर तख़्त पर सो जाते थे और ईरा कमरे में मां के साथ. रात के खाने-पीने से निबटकर थोड़ी देर सबने बैठकर बातें की, फिर सब सोने चले गए. मां और ईरा भी अपने कमरे में आ गईं. आते ही मां ने अंदर से कुंडी लगा दी. फिर उन्होंने अपना लॉकर खोला और एक बड़ी-सी थैली निकालकर पलंग पर बैठ गईं. थैली खोलकर मां ने उसमें से कई छोटे-बड़े डिब्बे-डिब्बियां निकालीं. ईरा को पता था कि इसमें मां का सारा सोने-चांदी का सामान रखा था. मां ने दो जड़ाऊ कंगन बाहर निकाले. ईरा पहचान गई, यह उसकी दादी के कंगन थे. दोनों कंगन मिलाकर कम-से-कम 15 तोले के होंगे.

“मैं चाहती हूं कि अब ये कंगन तू रख ले.” मां ने ईरा के हाथों में कंगन थमाते हुए कहा, “इससे पहले की कोई और इन्हें झपट ले…”

“मगर क्यों मां? ये कंगन तो दादी के हैं न?” ईरा चौंककर बोली.

मगर तब तक मां थैली में दूसरी चीज़ें ढूंढ़ने लगीं और साथ ही मां का बड़बड़ाना भी शुरू हो गया.

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“ब्याह करने के बाद भी चैन नहीं है. उम्रभर इनके तीज-त्योहारों पर भी घर भरते रहो. ब्याह कर दिया भाई ने तब भी पिंड नहीं छूटा. अब भी मुक्ति नहीं है हमें. मां-बाबूजी ख़ुद तो चले गए, लेकिन हमें बांध दिया इस जंजाल में. घर पर बुलाकर इनकी ख़ातिरदारी भी करो और विदा करते समय इनकी ख़ातिर लुट भी जाओ. ये बहनें भी भाई के गले टंगी रहती हैं उम्रभर.”

ईरा को याद आया जब बुआ के यहां जाती थी, तो कितने प्यार से, चाव से कितना कुछ ख़रीदकर देती थीं वो उसे- कपड़े, खिलौने,  लेकिन उनके बेटों के लिए मां ने कभी कुछ नहीं भेजा. न कभी घर बुलाया छुट्टियों में. उन्हें पता ही नहीं कि मामा का घर कैसा होता है? चांदी की मामूली चीज़ देने का भी मां का मन नहीं हुआ, तो आलमारी में उपहार में आई हुईं साड़ियां छांटने लगीं मां बुआ को देने के लिए, लेकिन ईरा का चेहरा अचानक ही मुरझा-सा गया. वह अनायास ही बुआ के साथ अपनी तुलना करने लगी. दोनों ही तो इस घर की बेटियां हैं. आज मां बुआ को लेने-देने पर इतना मन ख़राब कर रही हैं, कल को भाभी भी ईरा के लिए… साड़ियां छांटती मां की नज़र अचानक ईरा पर पड़ी, “अरे, तुझे क्या हुआ? ऐसा मुंह क्यों उतर आया अचानक?”

मां तुम मेरे ही सामने बुआ के प्रति कैसी सोच और कैसी बातें कर रही हो? एक बार भी नहीं सोचा कि जैसे मैं इस घर की बेटी हूं, वो भी इस घर की बेटी हैं. अगर बुआ के प्रति तुम्हारी सोच ऐसी है, तो कल को भइया-भाभी भी मेरे साथ ऐसा ही करेंगे, तो उनकी कोई ग़लती नहीं होगी न? क्योंकि यदि तुम बुआ को कोसती हो, तो भाभी को भी तो पूरा हक़ है मेरे आने को कोसने का, मायके नहीं बुलाने का.” ईरा का गला भर आया, आंखें डबडबा आईं.

“अब तो मुझे भी यहां आने के लिए सोचना पड़ेगा.”

मां हाथ में साड़ी थामे सन्न-सी बैठी रह गईं. ये तो उन्होंने सोचा ही नहीं कि उनकी अपनी बेटी यह बात ख़ुद पर लेकर दुखी हो जाएगी.

“तुम शुरू से ही बुआ के प्रति जैसा व्यवहार कर रही हो, भविष्य में भाभी के मन में भी मेरे प्रति वैसा ही व्यवहार करने का बीज बो रही हो. क्योंकि वो देख रही हैं कि इस घर में ननद का सम्मान और प्रेम कितना और कैसा होता है.” ईरा हाथ के कंगनों की तरफ़ देखते हुए बोली, “ये दादी के पुश्तैनी कंगन हैं, वो चाहतीं तो तुम्हारी तरह ही चुपचाप बुआ को दे सकती थीं, लेकिन उन्होंने घर की बहू पर भरोसा किया और तुम्हारा मान रखा.”

“भाई-बहन का रिश्ता तो वैसे भी रेशम की तरह नाज़ुक होता है और मां बांधने के लिए उसमें पहले ही गांठ लगानी पड़ती है, तो जिस रिश्ते में पहले ही गांठ लगी हो, तो उसमें और खिंचाव क्यों पैदा करना. ये कंगन भाभी ने तुम्हारे पास देखे हुए हैं. कल को उन्होंने इसके बारे में पूछा, तो क्या जवाब दोगी. मायका मां से होता है और उसके बाद भाई-भाभी से. अपने व्यवहार की वजह से मेरा मायका मत छुड़ाओ मां. मैं इस घर का इतिहास दोहराना नहीं चाहती. बुआ को सम्मान दो, तभी तुम्हारी बहू मुझे सम्मान देना सीखेगी. जब बुआ के बच्चों को प्रेम से अपने घर रहने के लिए बुलाओगी, तभी भविष्य में इस घर में मेरे बच्चे भी अधिकार से आकर रह पाएंगे. भगवान के लिए एक ही घर की दो बेटियों के लिए अलग-अलग व्यवहार मत करो.” ईरा ने कंगन वापस मां के हाथों में थमा दिए.

दूसरे दिन सुबह-सवेरे ही बुआ आ गईं. सालों बाद अपना घर देखने की ख़ुशी उनके चेहरे पर सहज दिख रही थी. कितना कुछ लेकर आई थीं सबके लिए. एक-से-एक महंगी वस्तुएं और उन सबसे ऊपर सबके लिए अनमोल व अपार स्नेह. पिताजी भी कितने ख़ुश लग रहे थे.

नहा-धोकर पिताजी और भइया राखी बंधवाने बैठे. राखी बंधवाने के बाद भइया ने ईरा के सर पर स्नेह से हाथ फेरकर उपहार दिया. पिताजी सकुचाए से खड़े रहे. तभी मां ने एक क़ीमती साड़ी पिताजी को दी बुआ को देने के लिए. फिर मां ने दादी के जड़ाऊ कंगन में से एक-एक कंगन बुआ और भाभी को दिए.

“ये मांजी के कंगन हैं. इन पर अब तुम दोनों का हक़ है. ये मांजी के आशीर्वाद स्वरूप उनके बेटे और बेटी दोनों के वंश में रहेंगे.” बुआ की आंखें इस स्नेह से भीग गईं. मां ने उन्हें गले लगा लिया.

ईरा ने ईश्‍वर को प्रणाम किया. ये रेशमी रिश्ते अब प्यार की गांठ में बंधकर हमेशा मज़बूत रहेंगे.

Dr. Vinita Rahurikar

डॉ. विनीता राहुरीकर

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मैं स्तब्ध खड़ी रह गई थी. मेरा बुद्धिजीवी तार्किक मस्तिष्क संज्ञाशून्य हो गया था. तकनीक और विज्ञान हमें चांद-सूरज पर पहुंचा सकता है, पर किसी के दिल तक पहुंचने के लिए तो एक संवेदनशील दिल ही चाहिए.

Hindi Kahani

बेटे पिंटू को फिज़ियोथेरेपी के लिए ले जाते हुए यह मेरा छठा दिन था. खेलते व़क्त गिर जाने के कारण उसके घुटने की सर्जरी हुई थी और अब फिर से अपने पैरों पर खड़े होने के लिए उसे लगभग दो महीने की फिज़ियोथेरेपी की आवश्यकता थी. फिज़ियोथेरेपी सेंटर लगभग पूरे दिन ही खुला रहता था, इसलिए मैं अपनी सुविधानुसार सुबह, दोपहर, शाम- कभी भी उसे लेकर वहां पहुंच जाती थी. कभी नए चेहरे नज़र आते, तो कभी रोज़वाले ही परिचित चेहरे. कुछ स्वयं चलकर आने वाले होते, कुछ को छोड़ने और लेने आनेवाले होते थे, तो कुछ मेरे जैसे भी थे, जो आरंभ से अंत तक पेशेंट के साथ ही बने रहते थे. मैं और पिंटू जल्द ही वहां के माहौल में अभ्यस्त होने लगे थे.

लगभग हर उम्र, धर्म और आर्थिक स्तर के स्त्री-पुरुष वहां आते थे. मैंने गौर किया अधिकांश पुरुष और कुछ महिलाएं तो आते ही अपने-अपने मोबाइल पर व्यस्त हो जाते. वाट्सऐप, फेसबुक, वीडियो गेम या फिर गाने सुनने में थेरेपी के उनके डेढ़-दो घंटे ऐसे ही निकल जाते. मैंने सोच लिया, अब से मैं भी सारे मैसेजेस वहीं देखा और भेजा करूंगी.

उस दिन यही सोचकर मैंने पर्स से मोबाइल निकालने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि पास के बेड पर लेटे एक बुज़ुर्ग सज्जन के सवाल ने मुझे चौंका दिया.

“एक्सीडेंट हुआ था क्या?”

“ज…जी. खेलते व़क्त घुटने का लिगामेंट रप्चर हो गया था. सर्जरी हुई है.” न चाहते हुए भी मेरे चेहरे पर 9 वर्षीय पिंटू के लिए चिंता की लकीरें उभर आई थीं.

“अरे, चिंता मत करो. जिस तरह अच्छा व़क्त जल्दी गुज़र जाता है, उसी तरह बुरा व़क्त भी ज़्यादा दिन नहीं ठहरता. जल्दी ठीक हो जाएगा. इस उम्र में रिकवरी जल्दी होती है. समस्या तो हम जैसों के साथ है.”

“आपको क्या प्रॉब्लम है?”

“फ्रोज़न शोल्डर्स! वैसे तो बुढ़ापा अपने आप में ही एक बीमारी है और उसमें भी कुछ समस्या हो जाए, तो लंबा खिंच जाता है. यहां आ जाता हूं, फिज़ियोथेरेपिस्ट की निगरानी में कुछ व्यायाम कर लेता हूं, मशीन से थोड़ी सिंकाई करवा लेता हूं, तो आराम मिल जाता है.”

“सही है. लोगों से मिलकर, बात करके थोड़ा मन भी बहल जाता होगा.” मैंने उनके समर्थन में सुर मिलाया.

“हां, पर आजकल लोगों के पास मिलने-बतियाने का व़क्त कहां है? देखो, सब के सब अपने-अपने मोबाइल पर व्यस्त हैं. मीलों दूर बैठे व्यक्ति को मैसेज पर मैसेज, फोटोज़ भेजते रहेंगे, पर मजाल है बगल में दर्द से कराहते व्यक्ति की ज़रा-सी सुध ले लें.”

इस बार मैं उनकी हां में हां नहीं मिला सकी. मेरे बुद्धिजीवी मस्तिष्क ने अपना तर्क रख ही दिया. “दर्द से ध्यान हटाने के लिए ही तो हर कोई अपने को मोबाइल में व्यस्त किए हुए है.”

“मतलब?”

“अब देखिए न अंकल, थेरेपी में थोड़ा-बहुत दर्द तो होता ही है. ध्यान गानों में, संदेश भेजने-पढ़ने में, फोटोज़ देखने में लगा रहेगा तो दर्द की अनुभूति कम होगी. मैंने इसीलिए तो पिंटू को हेडफोन लगा दिया है. ख़ुद मैं भी अपना मोबाइल ही चेक करने जा रही थी…”

“कि मैंने तुम्हें बातों में लगाकर तुम्हारा टाइम ख़राब कर दिया.” अंकल ने मेरी बात झटके से समाप्त करते हुए दूसरी ओर मुंह फेर लिया. शायद मैंने उन्हें नाराज़ कर दिया था.

“आह!” उनके मुंह से कराह निकली.

“देखिए, आपका ध्यान दर्द पर गया और दर्द महसूस होने लगा. इतनी देर मुझसे बातें करते हुए आपको दर्द का एहसास ही नहीं हो रहा था. बात स़िर्फ ख़ुद को व्यस्त रखकर दर्द से ध्यान बंटाने की है. देखिए, आपसे बातों-बातों में पिंटू की एक्सरसाइज़ पूरी भी हो गई. न उसे कुछ पता चला, न मुझे, वरना वो यदि दर्द से परेशान होता रहता, तो उसे तड़पता देख मैं दुखी होती रहती.”

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केयरटेकर ने आकर अंकल की मशीन हटाई, तो उनके मुंह से निकल गया, “अरे, हो भी गई. आज तो पता ही नहीं चला.”

केयरटेकर सहित मेरे चेहरे पर भी मुस्कान दौड़ गई. अंकल झेंप गए.

“टेक्नोलॉजी इतनी बुरी भी नहीं है अंकल! हां, अति सर्वत्र वर्जयेत्.”

प्रत्युत्तर में अंकल मुस्कुरा दिए, तो मैं फूलकर कुप्पा हो गई. घर लौटकर मैंने यह बात अपने पति को बताई, तो वे भी मुस्कुराए बिना न रह सके.

“मतलब, वहां भी तुमने अपनी समझदारी का सिक्का जमाना आरंभ कर दिया है. सॉरी नीतू, घर के कामों के साथ-साथ पिंटू को लाने-ले जाने की ज़िम्मेदारी भी तुम्हें संभालनी पड़ रही है. क्या करूं? आजकल ऑफिस में वर्कलोड ज़्यादा होने से लगभग रोज़ ही लौटने में देरी हो जाती है. देखो, शायद अगले महीने थोड़ा फ्री हो जाऊं, तो फिर पिंटू को लाने-ले जाने की ज़िम्मेदारी मैं संभाल लूंगा.”

“अरे नहीं, मुझे कोई परेशानी नहीं है, बल्कि कुछ नया देखने-समझने को मिल रहा है.” मैंने उन्हें अपराधबोध से उबारना चाहा.

“ओहो! तो लेखिका महोदया को यहां भी कहानी का कोई प्लॉट मिल गया लगता है.”

पति ने चुटकी ली, तो मैं मन ही मन इनकी समझ की दाद दिए बिना न रह सकी. वाकई इस एंगल से तो मैंने सोचा ही नहीं था. सेंटर में तो इतने तरह के कैरेक्टर्स मौजूद हैं कि कहानी क्या, पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है. मैं अब और भी जोश के साथ पिंटू को सेंटर ले जाने लगी. पर उन अंकल से फिर बातचीत नहीं हो सकी. एक-दो बार आते-जाते आमना-सामना ज़रूर हो गया था, पर हम मुस्कुराकर आगे बढ़ गए थे. उन्हें जाने की जल्दी थी, तो मुझे आने की. इस बीच मेरा जन्मदिन आया, तो पति ने मुझे उपहारस्वरूप किंडल लाकर दिया.

“इसमें तुम कोई भी क़िताब सॉफ्ट कॉपी के रूप में स्टोर कर कहीं भी पढ़ सकती हो. हैंडल करने में बेहद सुविधाजनक.”

स्मार्टफोन, चश्मे के अलावा अब किंडल भी मेरे हैंडबैग की एक आवश्यक एक्सेसरी हो गई थी. सेंटर में मेरा व़क्त और भी आराम से गुज़रने लगा था. पिंटू के घुटने में भी काफ़ी सुधार था. मुझे किंडल पर व्यस्त देख वह मज़ाक करता.

“ममा, आप अपना लैपटॉप भी साथ ले आया करो. यहीं स्टोरी टाइप कर लिया करो.”

“नहीं, इतना भी नहीं.” मैं मुस्कुरा देती. पर्स में किंडल आ जाने के बाद से मेरी आंखें उन अंकल को और भी बेचैनी से तलाशने लगी थीं. शायद मैं उन्हें उन्नत टेक्नोलॉजी का एक और अजूबा दिखाने के लिए बेक़रार हो रही थी. उनसे उस दिन की मुलाक़ात न जाने क्यों मेरे दिल में बस-सी गई थी, आख़िर मेरी मुराद पूरी हो ही गई. उस दिन पिंटू को फिज़ियोथेरेपिस्ट के हवाले कर मैंने किंडल पर अपना अधूरा नॉवल पढ़ना शुरू ही किया था कि एक परिचित स्वर ने मुझे चौंका दिया. देखा तो अंकल थे.

“अंकल, आप कैसे हैं? कितने दिनों बाद फिर से मुलाक़ात हुई है?”

“हां, बीच में कुछ दिन तो मैं आया ही नहीं था. विदेश से बेटी-दामाद आए हुए थे. उनके और नाती-नातिन के संग दिन कब गुज़र जाता था पता ही नहीं चलता था. भगवान का शुक्र है उस समय कंधों में कोई दर्द नहीं हुआ.”

मैं मुस्कुरा दी. “अंकल दर्द तो हुआ होगा, पर आप बेटी और उसके बच्चों में इतने मगन थे कि आपको दर्द का एहसास ही नहीं हुआ.” अंकल हंसने लगे थे. “तुमसे मैं तर्क में नहीं जीत सकता बेटी. अपनी बेटी को भी मैंने तुम्हारे बारे में बताया था. कहने लगी ठीक ही तो कह रही हैं वे. कब से आपसे कह रही हूं कि इस बटनवाले मोबाइल को छोड़कर स्मार्टफोन ले लीजिए. आपका मन लगा रहेगा और हमें भी तसल्ली रहेगी. वह तो ख़ुद लाने पर उतारू थी, पर मैंने ही मना कर दिया. मेरे भला कौन-से ऐसे यार-दोस्त हैं, जिनसे वाट्सएप पर बातें करूंगा. जो दो-चार हैं, वे मेरे जैसे ही हैं, जो या तो ऐसे ही मिल लेते हैं या फोन पर बातें कर लेते हैं. अपना पुराना लैपटॉप वह पिछले साल आई थी, तब यहीं छोड़ गई थी. उस पर स्काइप पर बात कर लेती है. बाकी सुबह-शाम टीवी देख लेता हूं. मोबाइल में जितने ज़्यादा फंक्शन होंगे, मेरे लिए उसे हैंडल करना उतना ही मुश्किल होगा. शरीर संभल जाए वही बहुत है. और पिंटू बेटा कैसा है? ठीक है? यह तुम्हारे हाथ में क्या है?”

“यह किंडल है अंकल!” मैं उत्साहित हो उठी थी. “मेरे हसबैंड ने मुझे बर्थडे पर गिफ्ट किया है. मुझे पढ़ने-लिखने का बहुत शौक़ है न, तो इसलिए.” मैं उत्साह से उन्हें दिखाने लगी, तो आसपास के कुछ और लोग भी उत्सुकतावश जुट आए.

“यह देखिए. यह मैंने इसमें कुछ क़िताबें मंगवाई हैं. अब ये इसमें सॉफ्ट कॉपी के रूप में उपलब्ध हो गई हैं. मेरा जब जहां मन चाहे खोलकर पढ़ने लग जाती हूं मोबाइल की तरह. यह भी बैटरी से चार्ज होता है. मेरी अपनी लिखी क़िताब भी सॉफ्ट कॉपी के रूप में इसमें उपलब्ध है. आप कभी पढ़ना चाहें तो!”

“वाह, क्या टेक्नोलॉजी है!” आसपास के लोग सराहना करते धीरे-धीरे छितरने लगे, तो मेरा ध्यान अंकल की ओर गया. अंकल किसी गहरी सोच में डूबे हुए थे.

“क्या हुआ अंकल?”

“अं… कुछ नहीं. मैंने तुम्हें बताया था न कि बेटी ने स्मार्टफोन दिलवाने की बात कही थी और मैंने इंकार कर दिया था. तब वह यही, जो तुम्हारे हाथ में है- किंडल, यह भेजने की ज़िद करने लगी. दरअसल, उसने मुझे उसकी मां की डायरी पढ़ते देख लिया था.”

“आपकी पत्नी डायरी लिखती हैं?” मैंने बीच में ही बात काटते हुए प्रश्‍न कर डाला था.“लिखती है नहीं, लिखती थी? दो वर्ष पूर्व वह गुज़र गई.”

“ओह, आई एम सॉरी!”

अंकल, शायद किसी और ही दुनिया में चले गए थे, क्योंकि मेरी प्रतिक्रिया पर भी वे निर्लिप्त बने रहे और पत्नी की स्मृतियों में खोए रहे.

“उसके जीते जी तो कभी उसकी डायरी पढ़ने की आवश्यकता महसूस ही नहीं हुई. बहुत जीवंत व्यक्तित्व की स्वामिनी थी तुम्हारी आंटी. बेहद हंसमुख, बेहद मिलनसार, बेहद धार्मिक… हर किसी को अपना बना लेने का जादू आता था उसे. मैं ज़रा अंतर्मुखी हूं, लेकिन वो हर व़क्त बोलती रहती थी. पर कैंसर के आगे उसकी भी बोलती बंद हो गई.”

“क्या? कैंसर था उन्हें?”

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“ख़ूब लंबा इलाज चला. अपनी जिजीविषा के सहारे वो लंबे समय तक उस भयावह बीमारी से संघर्ष करती रही, पर अंत में थक-हारकर उसने घुटने टेक दिए. उसके दिन-प्रतिदिन टूटने का सफ़र याद करता हूं, तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. तुम उस दिन फिज़ियोथेरेपी के दर्द के व़क्त ध्यान दूसरी ओर लगाने की बात कर रही थी न? तुम्हारी आंटी के कीमोथेरेपी के दर्द के सम्मुख यह दर्द कुछ भी नहीं है. मैं तो उस व़क्त आंखें बंद कर बस उसका ध्यान कर लेता हूं. उसका हंसता-मुस्कुराता जीवंत चेहरा मेरी स्मृति में तैर जाता है और मैं सब भूलकर किसी और ही दुनिया में पहुंच जाता हूं.”

अंकल को भावुक होते देख मैंने उनका ध्यान बंटाना चाहा. “आप उनकी डायरी के बारे में बता रहे थे.”

“हां, उसके जाने के बाद मैंने एक दिन वैसे ही उसकी डायरी खोलकर पढ़ना शुरू किया, तो हैरत से मेरी आंखें चौड़ी हो गई थीं. भावनाओं को इतनी ख़ूबसूरती से शब्दों में पिरोया गया था कि मैं उसकी सशक्त लेखनी की दाद दिए बिना नहीं रह सका. किसी कवयित्री की कविता से कम नहीं है उसकी डायरी. एक-एक शब्द जितनी शिद्दत से काग़ज़ पर उकेरा गया था, पढ़ते व़क्त उतनी ही गहराई से दिल में उतरता चला जाता है. जाने कितनी बार पढ़ चुका हूं, पर मन ही नहीं भरता. दिन में एक बार उसके पन्ने न पलट लूं, तब तक मन को शांति नहीं मिलती. बेटी परिवार सहित आई हुई थी, फिर भी मैं आंख बचाकर, मौक़ा निकालकर एक बार तो डायरी के पन्ने पलट ही लेता था और रवाना होने से एक दिन पहले बस बेटी ने यही देख लिया. मां की डायरी देख, पढ़कर पहले तो वह भी ख़ूब रोई. फिर बोली, “ठीक है पापा, मान लिया स्मार्टफोन आपके काम का नहीं. अब मैं आपके लिए किंडल भेजूंगी. उसमें आप न केवल मम्मी की डायरी, वरन और भी बहुत सारी क़िताबें पढ़ सकेंगे. देखिए, मम्मी की डायरी की क्या हालत हो गई है. एक-एक पन्ना छितरा पड़ा है.”

“वो तो बेटी मैं रोज़ देखता हूं न तो इसलिए…” मैंने सफ़ाई दी थी.

“पर किंडल में यह समस्या नहीं होगी, चाहे आप दिन में 20 बार पढ़ें.”

“हां, बिल्कुल. यह देखिए न आप.” मैंने अपना किंडल उनके हाथ में पकड़ा दिया. वे कुछ देर उसे देखते-परखते रहे. फिर लौटा दिया.

“लेकिन बेटी इसमें वो डायरीवाली बात कहां? उस डायरी के पन्नों के बीच तो मेरे द्वारा तुम्हारी आंटी को दिए सूखे गुलाब हैं. जगह-जगह हल्दी-तेल के निशान हैं. आंसुओं से धुंधलाए अक्षर हैं. उसके पन्नों पर हाथ फेरता हूं, तो लगता है तुम्हारी आंटी को ही स्पर्श कर रहा हूं.”

मैं स्तब्ध खड़ी रह गई थी. मेरा बुद्धिजीवी तार्किक मस्तिष्क संज्ञाशून्य हो गया था. तकनीक और विज्ञान हमें चांद-सूरज पर पहुंचा सकता है, पर किसी के दिल तक पहुंचने के लिए तो एक संवेदनशील दिल ही चाहिए. तभी तो कहा गया है ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि’. शायद इसीलिए अंकल से रू-ब-रू वार्तालाप से मुझे जितना सुकून मिलता है, उतना वाट्सऐप पर पिंटू के लिए मिले गेट वेल सून मैसेजेस से नहीं.

Sangeeta Mathur

    संगीता माथुर

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मैं इधर-उधर बिखरे काग़ज़ात को समेटने लगी. मम्मी के बनाए उन नक्शों में मुझे उनके टूटे हुए ख़्वाबों की किर्चें नज़र आ रही थीं. अधूरे ख़्वाबों को ज़िंदगीभर ढोना सहज नहीं होता. सारी ज़िंदगी मैंने मम्मी के होंठों पर मुस्कान देखी थी, पर आज मुझे उस मुस्कान के पीछे छिपी कसक भी नज़र आ रही थी. आज यदि इतिहास स्वयं को दोहराता है, तो संभव है कल को मेरे मन में भी ऐसी ही वेदना छिपी होगी. मम्मी ने मेरी कशमकश को दूर कर दिया था.

Hindi Kahani

की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्‍चात् काउंसलिंग और अंत में इंटरव्यू सभी में मैंने अभूतपूर्व सफलता अर्जित की और मेरा चयन आईआईएम कॉलेज (अहमदाबाद) में हो गया. मम्मी-पापा बहुत ख़ुश थे. घर में उत्साह का माहौल था. उस दिन सुबह बैंक जाने के लिए मैं घर से निकलने लगी, तो मम्मी बोली, “प्रिया, तुम्हारे अहमदाबाद जाने में 15 दिन बचे हैं, अब अपनी जॉब से रिज़ाइन करके तुम्हें जाने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए.” मम्मी की बात का जवाब दिए बगैर मैं चुपचाप बाहर निकल गई.

मम्मी को कैसे बताऊं मन में चल रही कशमकश के बारे में. मन में विचारों का तूफ़ान उठ रहा था. ज़िंदगी ऐसे दोराहे पर आ खड़ी हुई थी कि कौन-सी राह चुनूं समझ नहीं आ रहा था. कुछ दिन पूर्व तक मेरे जीवन का एक ही उद्देश्य था. आईआईएम कॉलेज से एमबीए करके जीवन में ऊंचा मुक़ाम हासिल करना, पर अब हालात बदल गए थे. अब करियर के साथ-साथ संजय को पाने की चाह भी दिल में घर बना चुकी थी.

संजय की याद आते ही पलकों के रास्ते मन के आंगन में कुछ माह पूर्व की स्मृतियां खिली धूप-सी उतर आईं. कैट की परीक्षा देने के पश्‍चात् मैं घर में खाली बैठी बोर हो रही थी, इसलिए मैंने एक प्राइवेट बैंक में जॉब ढूंढ़ ली. कुछ दिनों बाद वहां मेरी मुलाक़ात संजय से हुई. संजय चार्टेड अकाउंटेंट था. वह बैंक का ऑडिट करने आया करता था. एक शाम उसी सिलसिले में वो बैंक में था. उसकी मदद के लिए मैं और मेरा एक कलीग रुके हुए थे. काम पूरा होने के पश्‍चात् जब मैं बैंक से निकली, शाम के सात बज रहे थे. अंधेरा घिर आया था. मैं सड़क पर ऑटो की प्रतीक्षा में खड़ी थी, तभी संजय की कार समीप आकर रुकी. उसने कार का दरवाज़ा खोलते हुए कहा, “बैठिए, मैं आपको घर छोड़ देता हूं.”

“नहीं नहीं, मैं स्वयं चली जाऊंगी.” मैंने इनकार किया. संजय बोला, “आज आप मेरी वजह से लेट हुई हैं, इसलिए आपको हिफाज़त से घर पहुंचाने की ज़िम्मेदारी भी मेरी है. प्लीज़ बैठिए.” उसके आग्रह को मैं टाल न सकी. रास्ते में वह इधर-उधर की बातें करता रहा. उसने बताया कि उसके पिताजी का पिछले वर्ष स्वर्गवास हो चुका था. घर में बस उसकी मां थी, जो जल्द-से-जल्द उसकी शादी कर देना चाहती थी. लेकिन शादी जैसे गंभीर फैसले पर वह जल्दबाज़ी नहीं करना चाहता था. घर आ चुका था. मैं उसे अंदर लेकर आई.

मम्मी-पापा संजय से मिलकर प्रसन्न हुए.

गरम-गरम कॉफी के दौरान पापा की कई फाइनेंस संबंधी समस्याएं उसने मिनटों में सुलझा दीं.

संजय का ऑफिस बैंक के समीप था, इसलिए अक्सर उसका बैंक में आना-जाना लगा रहता था. धीरे-धीरे हम दोनों के बीच मित्रता होने लगी. हम अक्सर बाहर मिलने लगे. धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा कि संजय मुझे चाहने लगा है. एक दिन कॉफी पीते हुए उसने कहा, “प्रिया, हम दोनों की बहुत-सी बातें एक-दूसरे से मिलती हैं. हम दोनों की पसंद-नापसंद, जीवन के प्रति हमारा नज़रिया सभी कुछ मिलता है. सच पूछो तो मुझे ऐसी ही लड़की की तलाश थी, जो व्यावहारिक, ख़ूबसूरत व समझदार हो. क्या तुम ज़िंदगीभर साथ निभाने के लिए मेरा हाथ थामना पसंद करोगी?” संजय मुझे पसंद था. उसकी इंटेलिजेंसी, लगन, ज़िंदगी में ऊंचाइयां छूने की चाहत, सेंस ऑफ ह्यूमर सभी कुछ मुझे भाता था. मैंने उसे अपनी स्वीकृति दे दी.

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परिधि लांघकर सदियां बन गए. उस अनजानी ख़ुशी को आंचल में समेटे मैं हवा में तैर रही थी कि तभी कैट की परीक्षा का परिणाम आ गया. मैं सफल रही. उसके पश्‍चात् काउंसलिंग व इंटरव्यू के बाद मुझे आईआईएम कॉलेज में एडमिशन मिल गया. मैंने यह ख़बर संजय को सुनाई. बधाई देते हुए वो गंभीर स्वर में बोला, “प्रिया, अब समय आ गया है कि हम अपने संबंधों पर गंभीरतापूर्वक विचार कर लें. इधर मैं तुम्हारे घरवालों से हमारी शादी की बात करने की सोच रहा हूं और तुम अहमदाबाद जाने की सोच रही हो. नहीं प्रिया, अब मैं तुमसे दूर नहीं रह पाऊंगा.”

“यह क्या कह रहे हो तुम?” मैं आश्‍चर्य से बोली, “ज़िंदगी में यह मुक़ाम हासिल करने की मेरी बचपन से तमन्ना थी. इसके लिए मैंने रात-दिन मेहनत की. अब जबकि मंज़िल मेरे सामने है, तो मैं उससे कैसे मुंह मोड़ लूं. स़िर्फ दो साल की तो बात है.”

“दो साल? इतना समय मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूंगा? पहले तुम्हारा जो भी सपना रहा हो, पर अब तुम्हारी प्राथमिकता शादी होनी चाहिए. प्रिया, शादी के बाद भी तुम एमबीए कर सकती हो, आईआईएम कॉलेज से न सही, मुंबई के किसी अच्छे कॉलेज से.”

“लेकिन संजय…”

“प्लीज़ प्रिया, हम दोनों के प्यार की ख़ातिर तुम्हें मेरी बात माननी ही पड़ेगी.” उसी दिन से मेरे मन में कशमकश चल रही थी. मम्मी-पापा से भी मैं बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी. लेकिन परिस्थितियों का सामना तो करना ही था. उस शाम घर पहुंचकर मैंने मम्मी से कहा, “मम्मी, मैं अहमदाबाद नहीं जाऊंगी.”

“क्यों?” मम्मी आश्‍चर्य से बोलीं.

“मैं और संजय एक-दूसरे को चाहते हैं और शादी करना चाहते हैं.”

“प्रिया, मैंने तुमसे संजय के साथ मेलजोल रखने पर इसलिए कभी कुछ नहीं कहा, क्योंकि मैं जानती हूं तुम समझदार हो. भावुकता में बहकर जीवन का इतना बड़ा फैसला करना ग़लत है फिर मैं और तुम्हारे पापा अभी तुम्हारी शादी नहीं करना चाहते. अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है. अभी तुम्हें अपना करियर बनाना है. अपने पैरों पर खड़ा होना है. समय के साथ तुम्हारे अंदर परिपक्वता आएगी और तुम अपने जीवन का सही फैसला कर सकोगी.”

“लेकिन मम्मी, मैं संजय को खोना भी नहीं चाहती.” मम्मी ने गौर से मेरा चेहरा देखा और मुझे अपने बेडरूम में ले गईं. अपनी आलमारी खोल उन्होंने कुछ पेपर्स निकाले और बोलीं, “प्रिया, आज मैं तुमसे अपनी कुछ व्यक्तिगत बातें शेयर करना चाहती हूं. इन पेपर्स को देखो. ये मकान के नक्शे हैं, जो कभी मैंने बनाए थे. प्रिया, मैं मुंबई में आर्किटेक्चर का कोर्स कर रही थी. सेकंड ईयर में थी, जब कॉलेज की तरफ़ से दार्जिलिंग घूमने गई थी. वहीं तुम्हारे पापा मुझे पहली बार मिले. वह भी अपने मित्र के साथ वहां घूमने आए थे और हमारे ही होटल में ठहरे थे. दार्जिलिंग में हम लोग छह दिन रहे और इस दौरान तुम्हारे पापा से मेरी अच्छी जान-पहचान हो गई. वह इंजीनियर थे और मुंबई में उनकी अपनी फैक्टरी थी.

मुंबई आकर हम लोग मिलते रहे. छह माह पश्‍चात् उन्होंने मेरे समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा. प्रिया, मैं अपना चार साल का कोर्स पूरा करना चाहती थी, पर तुम्हारे पापा को भी खोना नहीं चाहती थी. तुम्हारे नाना-नानी ने भी सोचा, इतना अच्छा लड़का मिल रहा है, तो शादी कर दी जाए. मेरी शादी हो गई. तुम्हारे पापा ने मुझसे वादा किया था कि शादी के बाद मेरी पढ़ाई जारी रखवाएंगे. लेकिन ऐसा संभव न हो सका. पहले तुम्हारी दादी बीमार प़ड़ गईं, फिर गृहस्थी में ऐसी उलझी कि आर्किटेक्ट बनना ख़्वाब ही रह गया. दो वर्ष की पढ़ाई तो व्यर्थ गई ही, साथ ही कभी आत्मनिर्भर भी न बन सकी. हां, तुम्हारे पापा से मुझे कभी कोई शिकायत नहीं रही. उन्होंने मुझे हर ख़ुशी, हर सुख दिया, लेकिन फिर भी मेरे मन में हमेशा इस बात का मलाल रहा कि मैं आर्किटेक्ट न बन सकी.

प्रिया, जीवन में कभी-कभी परीक्षा की ऐसी घड़ी आती है, पर तब हमें बहुत सोच-विचार कर दिल से नहीं दिमाग़ से काम लेना चाहिए, क्योंकि भावावेश में किए गए फैसले अक्सर ग़लत साबित होते हैं. अपने अथक परिश्रम को व्यर्थ मत जाने दो. इस समय अपने मन पर काबू रख अपना भविष्य संवार लो. संजय वास्तव में तुम्हारे लिए गंभीर होगा, तो दो साल तुम्हारी प्रतीक्षा अवश्य करेगा.” मम्मी कमरे से बाहर चली गईं.

मैं इधर-उधर बिखरे काग़ज़ात को समेटने लगी. मम्मी के बनाए उन नक्शों में मुझे उनके टूटे हुए ख़्वाबों की किर्चें नज़र आ रही थीं. अधूरे ख़्वाबों को ज़िंदगीभर ढोना सहज नहीं होता.

सारी ज़िंदगी मैंने मम्मी के होंठों पर मुस्कान देखी थी, पर आज मुझे उस मुस्कान के पीछे छिपी कसक भी नज़र आ रही थी. आज यदि इतिहास स्वयं को दोहराता है, तो संभव है कल को मेरे मन में भी ऐसी ही वेदना छिपी होगी. मम्मी ने मेरी कशमकश को दूर कर दिया था. अब मैंने फैसला कर लिया कि मैं अहमदाबाद आगे की पढ़ाई के लिए जाऊंगी. अगले दिन मैंने संजय से कहा, “देखो संजय, मुझे ग़लत मत समझना. आज जो मुझे देश के इतने प्रतिष्ठित कॉलेज से एमबीए करने का अवसर मिला है, उसके पीछे स़िर्फ मेरी मेहनत नहीं है, बल्कि मेरे मम्मी-पापा की तपस्या भी शामिल है. उन्होंने भी मेरे साथ कितनी ही रातें जागकर बिताई हैं. अपनी मेहनत के साथ-साथ मैं उनकी तपस्या को व्यर्थ नहीं जाने दूंगी. मैं एमबीए करने अवश्य जाऊंगी. हो सके तो तुम मेरी प्रतीक्षा करना.”

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दस दिन बाद अहमदाबाद जाते हुए एयरपोर्ट पर मम्मी-पापा मुझे छोड़ने आए थे. मेरी आंखों में आंसू थे. अपने घर से दूर जाने का ग़म तो था ही, साथ ही अपने प्यार को खो देने की टीस भी हृदय में उठ रही थी. हफ़्तेभर से संजय की कोई ख़बर नहीं थी. स्पष्ट था कि वह प्रतीक्षा के लिए तैयार नहीं था, तो क्या मैंने संजय को पहचानने में भूल की थी? क्या उसका प्यार सतही था? उसमें गहराई नहीं थी? मन में उठ रहे सवालों के साथ सामान लिए मैं आगे बढ़ रही थी, तभी कानों में संजय की आवाज़ आई. वह मेरा नाम पुकार रहा था. मैंने मुड़कर पीछे देखा. हाथों में गुलाब का बुके लिए संजय तेज़ी से मेरी ओर बढ़ रहा था. क़रीब आकर वह बोला, “सॉरी प्रिया, इतने दिनों से न तो तुमसे मिला और न फोन किया. दरअसल, मेरा एक छोटा-सा एक्सीडेंट हो गया था.” मैंने कुछ कहना चाहा, तो उसने रोक दिया, “कुछ मत कहो प्रिया. बस सुनो. मैं तुम्हारी दो साल तक प्रतीक्षा करूंगा. मैं तुमसे ही शादी करूंगा.” ख़ुशी से मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. मैंने कृतज्ञतापूर्ण नज़रों से मम्मी की ओर देखा. उनके सही मार्गदर्शन की वजह से ही मुझे ख़ुशी के ये अनमोल पल प्राप्त हुए थे. दिल में पूर्णता का एहसास लिए मैं अपनी मंज़िल की ओर बढ़ गई.

Renu Mandal

     रेनू मंडल

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