Tag Archives: Story

कहानी- विराम (Short Story- Viram)

कौशल को भी धक्का लगा था. जैसे-तैसे उन्होंने विहान को जगाया. घर का माहौल तनाव से भर गया. पूरे घर में सन्नाटा-सा छा गया. हर किसी के मन में यही सवाल उठ रहा था कि आख़िर ग़लती कहां हुई? विहान को अपराधबोध व पश्‍चाताप हो रहा था. वो अपने व्यवहार का आत्मविश्‍लेषण करने लगा, तब उसे एहसास हुआ कि मम्मी ने उसे सही राह दिखाने की कितनी कोशिश की, पर पापा के शह के कारण वह बिगड़ता चला गया.

 Kahani

लंबी स्याह रात… किले के प्राचीरों से ऊंची और न ख़त्म होनेवाली चढ़ाई… कहीं कोई ओर-छोर दिखाई ही नहीं देता है. क्या हो रहा है उसकी ज़िंदगी में? आख़िर ठहराव क्यों नहीं आ रहा है? समुद्र में लहरें मानो लगातार उठा-पटक कर रही हैं. उसे जिस शांत नदी की तलाश थी, वह तो जैसे किसी रेगिस्तानी रेत में जाकर कहीं समा गई है.

रात-दिन, बरस-दर-बरस, निरुद्देश्य से यूं ही सरकते जा रहे हैं. यह कहना कितना आसान है कि जीवन है, तो उम्मीद है… बस, आगे बढ़ते जाओ. ‘कर्म किए जा, फल की चिंता मत कर,’ गीता का यह ज्ञान सुनने में और दूसरों को देने में बहुत अच्छा लगता है, पर स्वयं इस पर अमल करना कितना कठिन कार्य है, यह तो वही जानता है, जो दूसरों की सलाह का पात्र बनता है. सच में सलाह देना कितना आसान काम है… कुछ शब्द ही तो मुंह से निकालने पड़ते हैं. वे भी ऐसे शब्द, जो सुनने और कहने दोनों में ही बहुत कर्णप्रिय लगते हैं. ‘आज नहीं तो कल सब ठीक हो जाएगा.’ ‘जैसे अच्छा व़क्त नहीं रहा, वैसे बुरा भी नहीं रहेगा.’ ‘पतझड़ के बाद ही वसंत आता है.’ ‘बी पॉज़ीटिव’. किसी की तकलीफ़ को देख सांत्वना देना मानो हर कोई अपना फ़र्ज़ समझता है.

उसे भी ऐसे सलाहकार बहुत मिले. उसकी ज़िंदगी में आनेवाले उतार-चढ़ाव से उसे कोई निकाल तो नहीं पाया, पर सांत्वना देने में किसी ने कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन क्या सच में ऐसे आदर्श वाक्यों से अशांत व्यक्ति शांत हो पाता है? उसके मन को राहत मिल पाती है? जिसके घाव रिस रहे हों, उसे तो शायद ऐसी सीखें ज़्यादा कचोटती होंगी और अंदर ही अंदर अवश्य ही झल्लाता होगा कि ‘जाके पैर न फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई.’ अपने दर्द को ख़ुद ही महसूस किया जा सकता है, दूसरा केवल ऊपरी पीड़ा देख पाता है, भीतर चल रहे झंझावात को वह कैसे महसूस कर सकता है? जैसे उसके भीतर चलता रहता था विहान को लेकर. हर समय उसे ही लेकर वह फ़िक़्रमंद रहती. बस, वह ख़ुश रहे, उसका करियर बन जाए और वह सेटल हो जाए. इसके अलावा और उसने क्या चाहा था? लेकिन स़िर्फ हार ही मिली उसे. तो क्या उसकी चाहत कुछ ज़्यादा ही बड़ी थी? क्या उसने कुछ ज़्यादा ही अपेक्षा रख ली थी अपनी ज़िंदगी से?

क्या वास्तव में समय के साथ सब ठीक हो जाता है? क्या व़क्त घावों पर मलहम लगाने का काम करता है? होता ही होगा, तभी तो सब एक ही बात कहते हैं. उसके मन के घोड़े बेलगाम भागे जा रहे थे. ज़िंदगी जब मशीन-सी हो जाती है, तब सब नीरस लगने लगता है. फिर न वसंत के आगमन का एहसास होता है और न ही पक्षियों का मीठा कलरव लुभाता है. प्रकृति के अनूठे सौंदर्य से भी मन अभिभूत नहीं होता. बहती नदी का रिदम भी तब आकर्षित नहीं करता है. बस, ज़िंदगी मशीनी हो जाती है और हम दिन-रात बिना सोचे-समझे, बिना अपने उद्देश्य का अवलोकन किए, बिना अपने लक्ष्यों पर फोकस किए दौड़ते चले जाते हैं.

बुआ ठीक ही कहा करती थीं कि चाहे शरीर हो या मन, उनकी सही तरह से देखभाल न करो, तो ज़ंग लग जाता है. बिल्कुल मशीन की तरह. और वह तो बिना रुके चली जा रही है. अगर तार्किक ढंग से देखा जाए, तो उसके शरीर में ज़ंग नहीं लगना चाहिए, क्योंकि ज़ंग तो रुकने पर लगता है यानी कि इस तर्क के सामने भी उसकी ज़िंदगी के समीकरण उलटकर रह गए हैं. वह रुक नहीं पा रही है, इसलिए ज़ंग लग रहा है. आख़िर विराम तो चाहिए ही…

यह भी पढ़ेबढ़ते बच्चे बिगड़ते रिश्ते (How Parent-Child Relations Have Changed)

विडंबना तो यह है कि विराम न लेने के बावजूद उसे कहा जाता है कि ‘आख़िर तुम करती ही क्या हो? तुम्हारा कॉन्ट्रीब्यूशन है ही क्या? सारे दिन घर पर ही तो रहती हो. बाहर निकलो, तो पता चलेगा कि कितनी थकावट होती है.’

यह सुनकर लगता है, मानो किसी ने उसके कानों में पिघला हुआ सीसा उड़ेल दिया है. जिस इंसान को उसने बग़ैर अपने बारे में सोचे अपनी ज़िंदगी के 23 साल समर्पित कर दिए हों, उसके मुंह से यह सब सुन उसे लगता कि जैसे वह छली गई है. उसका सारा विश्‍वास-प्यार, सच कहा जाए तो सारा गुमान धराशायी हो जाता. इस इंसान के साथ सात फेरे लेकर जब उसने अपनी एक नई दुनिया बसाई थी, तो उसी पल उस पर आंख मूंदकर विश्‍वास कर लिया था. वह जैसा-जैसा कहता गया, वह करती गई. सवाल उसके मन में उठते थे, बहुत बार विरोध करने की इच्छा भी बलवती हुई, लेकिन तब तक उनके बीच विहान आ गया.

पति कौशल से दो बोल प्यार के सुनने को तरसते उसके कान और कुछ सम्मान की आशा में हर बार सपने संजोती उसकी उम्मीदें जब लगातार उसे धोखा देने लगीं, तो उसका केंद्रबिंदु बन गया उसका बेटा विहान. बस, इसी कोशिश में वह कौशल का टॉर्चर और ब्लैकमेलिंग एटीट्यूड सहती रही कि उसे विहान को एक अच्छा इंसान बनाना है. उसे कौशल की स्वार्थी सोच और पैसे को ही सबसे बड़ा रिश्ता मानने के अहंकार से दूर रखने की एक ज़िद-सी आ गई.

“तुझे अपने पापा जैसा नहीं बनना है.” विहान जब छोटा था, तो वह उसे अक्सर कहती. छोटा था, तो विहान उससे ही चिपका रहता, कौशल से बचता, लेकिन कौशल के मेनिपुलेशन से वह उसे कहां बचा पाई थी. कौशल जान गए थे कि उसे बस में करना है, तो विहान को अपनी मुट्ठी में करना होगा, क्योंकि जैसे राजकुमारी की जान तोते में बसती थी, उसकी मां की जान भी उसमें बसती है.

विहान को एक सुखद भविष्य देने के जुनून में वह जाने-अनजाने उसके प्रति कठोर होती गई. डिसिप्लिन में रहने और सिस्टमैटिक बनने का पाठ पढ़ाते-पढ़ाते वह कई बार उसके प्रति बहुत कटु भी हो जाती. बस, यही भय उसे सताता रहता कि कहीं विहान भी अपनेपापा जैसा न बन जाए, जिसे ज़िंदगी में एक सिस्टम को न फॉलो करना और बीवी की बात-बात में खिल्ली उड़ाना आत्मतुष्टि देता हो. जिसके लिए बीवी का मतलब खाना बनानेवाली मेड से ज़्यादा कुछ न हो. जब खाएं, उससे पहले ही सब्ज़ी छौंकी जाए और गर्म-गर्म रोटियां सर्व की जाएं. पहले बनाकर रखने का मतलब है कि तुम आलसी हो, तुम्हें कुछ नहीं आता. जैसे सुपीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स इंसान को भ्रमित जीवन जीने को मजबूर करता है, वैसे ही इंफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स भी इंसान को उलझाए रखता है. फ़र्क़ इतना है कि सुपीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स में इंसान अपने को बेहतर साबित करने के प्रयास में दूसरों को हीन दिखाने की कोशिश में लगा रहता है, जबकि इंफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स में इंसान अपनी हीनता छिपाने के लिए दूसरे को कमतर दिखाने की कोशिश में लगा रहता है.

जब कोई भय जुनून बन जाता है, तो शायद उसका चेहरा ही बदल जाता है. उसका असर नकारात्मक भी हो सकता है. तब यह बात कहां सूझती है, लेकिन उसके साथ ऐसा ही हुआ. वह तो बिना विराम लिए अपने जुनून के साथ आगे बढ़ रही थी. घर-गृहस्थी को संभालते हुए हर संभव कोशिश के साथ कि चलो एक दिन तो सब ठीक हो जाएगा. पर कौशल के इंफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स ने उसे ‘डिवाइड एंड रूल’ करने को उकसाया. वह विहान को सलीके से जीने का पाठ पढ़ाती, उसे व्यवस्थित रहने और पढ़ाई में ध्यान लगाने को कहती, तो दूसरी ओर कौशल विहान से कहता, “मस्त रहा कर. ज़्यादा करीने से चीज़ों को रखकर क्या हो जाएगा. रही बात पढ़ने की, तो अपने को परेशान करने की आवश्यकता नहीं है. कहीं कुछ नहीं बन पाया या नौकरी नहीं मिली, तो भी क्या फ़िक़्र है. मेरा बिज़नेस तो है न, पापा-बेटे मिलकर संभाल लेंगे.”

तब वह चीख पड़ती, “कौशल, वह इंजीनियर बनना चाहता है, उसे बचपन से ही शौक़ है. देखा नहीं कैसे हमेशा पेचकस और बाकी के टूल्स लिए घूमता रहता है. उसे उसके लक्ष्य से भटकाओ नहीं. मैं नहीं चाहती कि वह तुम्हारी तरह बिज़नेस करे. उसे आईआईटी की तैयारी करने दो.”

“तुम कितनी क्रूर हो. बहुत अत्याचार करती हो उस पर. हर समय पढ़ने के लिए कहना क्या अच्छी बात है. जा बेटा, तू कंप्यूटर पर गेम्स खेल जाकर.”

विहान को वह इस तरह समय बर्बाद करने से रोकती, तो पहले तो वह मान जाता था, पर धीरे-धीरे कौशल की शह पाकर वह विद्रोही होने लगा. “क्या प्रॉब्लम है आपकी? हमेशा मेरे पीछे पड़ी रहती हो. चार क़िताबें क्या पढ़ लीं, आप ख़ुद को महान समझने लगी हो. आप बहुत बुरी मां हो. हमेशा डांटती और टोकती रहती हो. पापा कितने अच्छे हैं, कभी कुछ नहीं कहते.” अवाक् रह गई थी वह. बचपन में बच्चे ऐसा कह देते हैं, पर दसवीं में पढ़नेवाला बेटा ऐसा कहे, तो लगता है, जैसे वह मां की ममता को ही ललकार रहा हो. सच में उसकी ज़िंदगी में लगातार बेटे के भविष्य को निखारने और उसे सही मार्गदर्शन देने की चाह में ज़ंग लग गया था.

सही कहा है किसी ने कि आपका सबसे बड़ा दुश्मन वही है, जो आपकी ग़लतियों पर पर्दा डाले, लेकिन यहां तो इसके उलट हो रहा था. विहान तो उसे ही अपना दुश्मन समझने लगा था. कौशल जितनी देर घर में होता, टीवी पर संस्कार या आस्था जैसे चैनल लगाकर बैठा रहता. घंटों वह बाबाओं के प्रवचन सुनता. वह चिढ़ती कि तुम क्यों ये फ़िज़ूल के कार्यक्रम देख समय बर्बाद करते हो. विहान ने जब देखा कि मम्मी ऐसा करने से पापा को मना करती है, तो वह पापा की सोच को जस्टीफाई करने के लिए या शायद अपनी मां को ग़लत साबित करने के लिए ख़ुद भी वही चैनल देखने लगा.

जब वह बारहवीं में पहुंचा, तो कौशल की सोच उस पर पूरी तरह से हावी हो चुकी थी, यहां तक कि वह उससे बात भी नहीं करता था. उसका बनाया खाना तक नहीं खाता, तब कौशल उसे बाहर से खाना खिलाकर लाते, लेकिन डांटा कभी नहीं कि ‘तुम अपनी मम्मी के साथ इतना बुरा व्यवहार क्यों करते हो’ या ‘मां की इज़्ज़त करनी चाहिए.’ वह कौशल से कुछ कहती, तो वह उसे ही गालियां देने लगता. विहान भी जब-तब उसे गालियां देने लगा, तो उसे महसूस हुआ कि सच में निरंतर अपने बेटे के लिए भागती उसकी ज़िंदगी मानो ज़ंग खा गई है. विराम तो लगाना ही होगा, वरना विहान की ज़िंदगी को कोई राह नहीं मिल पाएगी.

यह भी पढ़ेसीखें ग़लतियां स्वीकारना (Accept Your Mistakes)

उसने विहान को कुछ भी कहना या टोकना छोड़ दिया. जब वह उसकी बात नहीं मानता तो यही सही, वही दिल पर पत्थर रखकर उससे विमुख हो जाएगी. पापा की राह चलना चाहता है, तो ठीक है. बची हुई डोर भी हाथ से छूटते ही विहान के तो जैसे पर निकल आए. वह बिल्कुल बेकाबू हो गया. पढ़ाई-लिखाई सब ताक पर रख दी. दोस्तों के साथ घूमना, कंप्यूटर और मोबाइल पर गेम खेलना. पूरी-पूरी रात टीवी पर फिल्में देखना. वह चुपचाप सब देख रही थी. देख रही थी कि कौशल उसे कुछ नहीं कह रहे हैं, बल्कि उसकी मांगों को पूरा कर रहे हैं. कई बार उसे ताना देते, “क्या हुआ, तेरी मां आजकल तुझे कुछ कहती नहीं, लगता है उसका सारा जोश ठंडा पड़ गया है या फिर अनुशासन में रहने का बुख़ार उतर गया है.”

बारहवीं के बोर्ड एक्ज़ाम का पहला पेपर और विहान नौ बजे तक सो रहा था. उसने एक बार उठाया, तो ज़ोर से उसने उसका हाथ झटक दिया. दस बज गए, लेकिन वह पेपर देने ही नहीं गया. उस पल उसे लगा था कि वह हार गई है. सारे सपने चूर-चूर हो गए थे. उसका बेटा कभी ऐसा करेगा, कल्पना से बाहर की बात थी.

कौशल को भी धक्का लगा था. जैसे-तैसे उन्होंने विहान को जगाया. घर का माहौल तनाव से भर गया. पूरे घर में सन्नाटा-सा छा गया. हर किसी के मन में यही सवाल उठ रहा था कि आख़िर ग़लती कहां हुई? विहान को अपराधबोध व पश्‍चाताप हो रहा था. वो अपने व्यवहार का आत्मविश्‍लेषण करने लगा, तब उसे एहसास हुआ कि मम्मी ने उसे सही राह दिखाने की कितनी कोशिश की, पर पापा के शह के कारण वह बिगड़ता चला गया. जब कौशल ने विहान को समझाने की कोशिश की कि उसने अपना पूरा साल ख़राब कर लिया, तो वह उन पर ही ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा.

“पापा, आप ज़िम्मेदार हो इन सबके. मम्मी मुझे समझाती थी, तो आप मुझे कंप्यूटर खेलने के लिए उकसाते थे. ख़ुद कभी ऑर्गेनाइज़्ड नहीं रहे, तो मुझे भी अपने जैसा बना डाला. आप सचमुच बुरे हो और सेल्फिश भी. मम्मी को नीचा दिखाने के चक्कर में आप मेरे जीवन से खेल गए. आई एम सॉरी मम्मी. काश! आप मुझे डांटना न छोड़तीं.”

बिलखते हुए विहान को उसने जब सीने से लगाया, तो लगा कि उसकी ममता तृप्त हो गई है.

“बेटा, एक साल ख़राब होना उतना इम्पॉर्टेंट नहीं है, जितना कि उसकी और अपने जीवन की क़ीमत समझ लेना. मैं तुम्हारे साथ अगर सख़्त व्यवहार करती थी, तो इसलिए क्योंकि तुम्हारी भलाई चाहती थी. सिस्टम को न फॉलो करने से हम अपने लक्ष्य पर फोकस नहीं कर पाते हैं.”

सही ही कहते हैं लोग कि ‘पतझड़ के बाद ही वसंत आता है.’ लेकिन वह भी एक बात कहना चाहती है कि कभी-कभी ज़िंदगी को ज़ंग लगने से बचाने के लिए विराम देना भी आवश्यक है.

Suman Bajpai

     सुमन बाजपेयी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- क्यूटनेस ओवरलोडेड (Short Story- Cuteness Overloaded)

स्मिता ने वीडियो देखने आरंभ किए, तो देखती ही रह गई. मॉल में हिचकिचाती मां को हाथ पकड़कर एस्केलेटर चढ़ाते नीलेश और पल्लवी, मां का विस्फारित नेत्रों से चारों ओर ताकना उसे अंदर तक गुदगुदा गया… यह मेरा धूप में सूखता स्मार्टफोन! चिकनाई हटाने के लिए मां ने डिटर्जेंट से धोकर सुखा दिया था… और यह उदास मां! चार दिनों से अनजाने में हुए इस नुक़सान का मातम मना रही हैं. मैं और पल्लवी समझा-समझाकर थक गए.

Kahaniya

डॉ. स्मिता वैसे भी कोई कॉन्फ्रेंस, सेमिनार आदि नहीं छोड़ती थी. फिर इस बार तो कॉन्फ्रेंस उनके छोटे भाई के शहर में थी. मां से मिलने का यह सुनहरा अवसर वह भला कैसे छोड़ सकती थी? शादी के बाद से ही नीलेश और पल्लवी उसे बुला रहे हैं. पर आजकल हर कोई अपने काम में इतना मसरूफ़ है कि बिना काम कहीं जाने का व़क्त निकाल ही नहीं पाता. तभी तो पति निशांत ने भी साथ चलने से इंकार कर दिया था.

“नहीं बाबा, तुम्हारी गायनाकोलॉजिस्ट मीट में मेरा क्या काम? मैं अपना क्लीनिक ही देखना पसंद करूंगा.”

स्मिता का उत्साह इससे ज़रा भी कम नहीं हो पाया था. ‘मायका’ शब्द मात्र से स्त्रियों में भर जानेवाली ऊर्जा से वह भी अछूती नहीं थी. भाई-भाभी के लिए उपहार ख़रीदने के बाद उसने मां के लिए भी एक सुंदर-सी गरम शॉल ख़रीद ली थी. वज़न में हल्की, आरामदायक हल्के रंग की यह शॉल मां को अवश्य पसंद आएगी. कल्पना में शॉल ओढ़े सैर के लिए निकलती मां का चेहरा आंखों के सामने आया, स्मिता के चेहरे पर स्वतः ही स्मित मुस्कान बिखर गई.

मां तो उसे देखकर ही उल्लासित हुई थीं, छोटे भाई नीलेश और नई भाभी पल्लवी ने भी उसे हाथों हाथ लिया, तो स्मिता का मायके आने का उत्साह द्विगुणित हो गया. नाश्ते में मां ने उसकी मनपसंद बेडमी पूरी बनाकर परोसी, तो स्मिता के मुंह में पानी भर आया. इससे पूर्व कि वह ढेर सारी पूरियां अपनी प्लेट में रख पाती, उसके मोबाइल पर कोई आवश्यक कॉल आ गई. वह मोबाइल लेकर थोड़ा दूर हटकर बतियाने लगी, पर उसकी नज़रें डायनिंग टेबल पर ही जमी थीं. मां उठकर अपने हाथों से नीलेश की प्लेट में पूरियां परोसने लगीं, तो नीलेश ने झटके से प्लेट हटा ली.

“क्या कर रही हो मां? जानती तो हो मैं डायट पर हूं. पल्लवी मेरे लिए दो टोस्ट पर बटर लगा दो.”

“ला, मैं लगा देती हूं. उसे नाश्ता करने दे. उसे भी तो ऑफिस निकलना है.” मां ने अपना नाश्ता छोड़कर उसके लिए टोस्ट पर बटर लगा दिया था. लेकिन ढेर सारा बटर देख नीलेश फिर भड़क उठा था.

“इतना सारा बटर! मां तुम रहने दो. पल्लवी, मैंने तुम्हें लगाने को कहा था.”

“हूं… हां!” सहमी-सी पल्लवी ने अपना दूध का ग्लास रख तुरंत दूसरे टोस्ट पर हल्का-सा बटर लगा दिया था और नीलेश की प्लेट में रख दिया था. तब तक स्मिता भी फोन पर वार्तालाप समाप्त कर डायनिंग टेबल पर आ चुकी थी. सब चुपचाप नाश्ता करते रहे. स्मिता ने चाहा पूरियों की तारीफ़ कर वह वातावरण को हल्का बना दे, पर मां का उतरा चेहरा देखकर उसने चुप रह जाना ही श्रेयस्कर समझा. शाम को जल्दी लौटने का आश्‍वासन देकर तीनों निकल गए थे.

रात का खाना कुक ने ही बनाया था. सबने साथ बैठकर खाया. स्मिता ने खाने की तारीफ़ की, साथ ही मां के हाथ की उड़द दाल, चावलवाली तहरी खाने की इच्छा भी ज़ाहिर की.

“पल्लवी, पता है मां साबूत उड़द और चावल की इतनी खिली-खिली तहरी बनाती हैं कि देखकर ही दिल ख़ुश हो जाता है. उसमें ढेर सारे घी वाला साबूत लाल मिर्च और जीरे का तड़का! उफ़्फ़! मेरे तो अभी से मुंह में पानी आने लगा. मैंने कई बार बनाने का प्रयास किया, पर वो मां वाला स्वाद नहीं ला पाई.” स्मिता पल्लवी को विस्तार से रेसिपी समझाने लगी. फिर अंत में यह और जोड़ दिया, “नीलेश को भी बहुत पसंद हेै यह डिश. क्यों नीलेश?”

“हां बिल्कुल! बनाओ न मां!” मोबाइल पर व्यस्त नीलेश ने संक्षेप में सहमति दे दी थी.

अगले दिन स्मिता को देर से जाना था, इसलिए वह अभी तक सो ही रही थी. कानों में नीलेश के ज़ोर से बोलने का स्वर पड़ा, तो उसकी आंख खुल गई.

यह भी पढ़ेअब बेटे भी हो गए पराए (When People Abandon Their Old Parents)

“यह मेरे पसंदीदा शर्ट का क्या कबाड़ा कर दिया है पल्लवी तुमने? स़फेद को आसमानी कर दिया है. आजकल कौन नील लगाता है?”

पल्लवी सकपकाई-सी खड़ी थी. तभी मां आ गईं, “अरे, तेरे सारे स़फेद कपड़ों पर कल मैंने नील लगाई थी. याद नहीं, तू कितनी गहरी नीलवाले कपड़े पहनता था? पूरे नीले ही करवा लेता था. यह तो मैंने बहुत हल्की लगाई है, ताकि ऑफिस में ख़राब न दिखे.”

नीलेश ने झुंझलाहट में शर्ट पलंग पर फेंक दी थी और पल्लवी से आलमारी में से दूसरी शर्ट देने को कहा. मां निढाल-सी लौट आई थीं. उनकी बेचारगी देख स्मिता की आंखें गीली हो गई थीं. मां का हाथ अपने हाथों में ले वह कहे बिना नहीं रह सकी थी, “क्यों करती हो मां यह सब? जब किसी को आपकी, आपके काम की, आपकी भावनाओं की कद्र ही नहीं है…”

“मैं नहीं करती बेटी! मेरी ममता मुझसे यह सब करवा लेती है. मैं तो उन लोगों की मदद करना चाहती हूं. मेरा आत्मसम्मान मुझे किसी पर बोझ बनकर रहने की इजाज़त नहीं देता. पर क्या करूं? सब उलट-पुलट हो जाता है.”

“नीलेश-पल्लवी भी तुम्हें आराम देना चाहते हैं मां! घर में इतने नौकर-चाकर हैं तो सही. फिर अब तो पल्लवी भी है नीलेश की देखरेख को. आपको क्या ज़रूरत है सबकी फ़िक्र करने की?” स्मिता ने मां को थोथी सांत्वना दी थी. थोथी इसलिए, क्योंकि अपने आश्‍वासनों के प्रति वह स्वयं भी आश्‍वस्त नहीं थी. उसे अपना बचपन और मां-पापा का लाड़-दुलार याद आ रहा था. व़क्त के साथ-साथ रिश्तों के समीकरण इतने उलट-पुलट क्यों जाते हैं? माता-पिता के लिए अपने बच्चों की लापरवाहियों, ग़ैरज़िम्मेदाराना हरकतों को माफ़ या नज़रअंदाज़ करना कितना आसान होता है. नाराज़ या क्रोधित होने की बजाय वे उसमें भी बच्चों की मासूमियत खोज लेते हैं. लेकिन बड़े होने पर वे ही बच्चे बुज़ुर्ग माता-पिता की अज्ञानतावश की गई ग़लतियों पर खीझ जाते हैं, ग़ुस्सा करने लगते हैं. हमारी सहनशीलता इतनी कम क्यों हो गई है? यदि बुढ़ापा बचपन का पुनरागमन है, तो बुढ़ापे की नादानियों में हमें मासूमियत नज़र क्यों नहीं आती? जो कुछ उनके लिए इतना सहज, सरल था हमारे लिए इतना मुश्किल क्यों है?

बे्रकफास्ट टेबल पर नीलेश ने बताया कि रात के खाने पर उसने अपने कुछ विदेशी क्लाइंट्स को आमंत्रित किया है. उनके लिए सी फूड, मैक्सिकन आदि बाहर से आ जाएगा.

“पल्लवी, तुम थोड़ा ड्रिंक्स, क्रॉकरी, सजावट आदि देख लेना. मैं शायद उन लोगों के साथ ही घर पहुंचूं. दीदी, आप भी हमें जॉइन करेंगी न?”

“अं… टाइम पर आ गई, तो मिल लूंगी सबसे. थोड़ा-बहुत साथ खा भी लूंगी, पर वैसे मुझे यह सब ज़्यादा पसंद नहीं है. मां, आपके लिए जो बनेगा, मैं तो वही खाऊंगी.”

नीलेश पल्लवी को और भी निर्देश देता रहा. नाश्ता समाप्त कर उठने तक पार्टी की समस्त रूपरेखा तैयार हो चुकी थी. स्मिता ने कहा, वह जल्दी लौटने का प्रयास करेगी, ताकि पल्लवी की मदद कर सके. किंतु लौटते-लौटते उसे देर हो गई थी. घर पहुंचकर पता चला कि पल्लवी ख़ुद भी थोड़ी देर पहले ही लौटी है. ऑफिस में कुछ काम आ गया था.

“पर तैयारी तो सब हो गई दिखती है?” चकित-सी स्मिता ने सब ओर नज़रें दौड़ाते हुए हैरानी ज़ाहिर की, तो कृतज्ञता से अभिभूत पल्लवी ने रहस्योद्घाटन किया.

“यह सब मम्मीजी ने करवाया है. मैं तो देर हो जाने के कारण ख़ुद घबराई-सी घर पहुंची थी, पर यहां आकर देखा, तो सब तैयार मिला.”

“सब मेरे सामने ही तो तय हुआ था. तुम्हें आते नहीं देखा, तो मैंने सोचा मैं ही करवा लूं, वरना नीलेश आते ही तुम पर सवार हो जाएगा. बचपन से ही थोड़ा अधीर है वह! तुम उसकी बातों का बुरा मत माना करो… हां, कुछ कमी रह गई हो, तो तुम ठीक कर लो.”

“कोई कमी नहीं है मम्मीजी. सब एकदम परफेक्ट है! इतना अच्छा तो मैं भी नहीं कर सकती थी.” पल्लवी ने भूरि-भूरि प्रशंसा की, तो मां एकदम बच्चों की तरह उत्साहित हो उठीं.

“तुम लोग अब तैयार हो जाओ. नीलेश मेहमानों को लेकर आता ही होगा.”

जैसी कि उम्मीद थी, पार्टी बहुत अच्छी रही. सबके कहने पर मां एक बार बैठक में आकर मेहमानों से मिल लीं. बाकी समय वे अंदर ही व्यवस्था देखती रहीं. मेहमानों को विदा कर जब तीनों घर में प्रविष्ट हुए, तो देसी घी के तड़के की सुगंध से घर महक रहा था.

“वॉव, लगता है मेरी पसंदीदा तहरी बनी है.” स्मिता सुगंध का आनंद लेती हुई डायनिंग टेबल तक पहुंच गई. उसका अनुमान सही था. गरमागरम तहरी सजाए मां उसी का इंतज़ार कर रही थीं.

“तुमने तो खा लिया होता मां. तुम क्यों भूखी रहीं? मैंने तो मेहमानों के संग थोड़ा खा लिया था.” कहते हुए स्मिता ने प्लेट में तहरी परोसकर पहला चम्मच मां के मुंह में और दूसरा चम्मच अपने मुंह में रख लिया.

यह भी पढ़ेघर को मकां बनाते चले गए… रिश्ते छूटते चले गए… (Home And Family- How To Move From Conflict To Harmony)

“वाह, कब से इस स्वाद के लिए तरस रही थी. नीलेश, आ चख. तुझे भी तो यह बहुत पसंद है.” स्मिता ने आग्रह किया, तो नीलश ने एक चम्मच भरकर उसी प्लेट से खाना आरंभ कर दिया. एक, दो, तीन… नीलेश को गपागप खाते देख स्मिता चिल्ला पड़ी.

“तू अलग ही ले ले भाई.”

नीलेश सचमुच अलग प्लेट भरकर खाने बैठ गया.

“आपने अभी तो भरपेट खाना खाया था.” पल्लवी के मुंह से बेसाख़्ता निकल गया.

“लो, तुम भी टेस्ट करो. इसके लिए तो मैं बचपन में भी पेट में अलग जगह रखता था.” नीलेश को स्पीड से खाता देख पल्लवी के मन का डर ज़ुबां पर आ गया.

“आप लोगों को कम न पड़ जाए. और कुछ बना दूं?”

“अरे, तू अपने लिए परोस ना. मैंने बहुत सारी बनाई है. कम होगी, तो मैं बना दूंगी.” मां ने पल्लवी को जबरन साथ खाने बैठा लिया.

“मां, याद है बचपन में एक बार नीलेश सारी तहरी चट कर गया था. तुम दोबारा बनाने उठीं, तो वह तुम्हारी मदद के लिए रसोई में आ गया था और फिर जल्दबाज़ी में दाल-चावल के डिब्बे ही उलट डाले थे.”

“यह नटखट तो हमेशा ऐसे ही काम बढ़ाता था. मेरा किशन कन्हैया!” मां ने लाड़ से बेटे को देखा. “जाले उतारने में मदद करने आता, तो एकाध बल्ब या ट्यूबलाइट फूटना तय था. एक बार तो टीवी स्क्रीन ही तोड़ डाली थी.” मां ख़ूब रस ले-लेकर बता रही थीं.

“क्या? फिर तो ख़ूब मार पड़ी होगी इन्हें?” पल्लवी बोल पड़ी.

“नहीं. मारता तो कोई भी नहीं था. पापा ने डांटा अवश्य था और मां ने तो हमेशा की तरह प्यार से समझा भर दिया था.” कहने के बाद अपने ही शब्दों पर ग़ौर करता नीलेश कुछ सोचने लगा था.

“एक बार तो इसने मां की महंगी सिल्क साड़ी पानी में डुबोकर सत्यानाश कर डाली थी.” स्मिता ने याद दिलाया.

“दरअसल, पार्टी में मैं इसे गोद में बिठाकर खाना खिला रही थी. इससे मेरी साड़ी पर कुछ गिर गया. घर लौटकर मैंने साड़ी उतारकर ड्राइक्लीन के लिए रख दी. इसने चुपके से उसे पानी में भिगो दिया. पूरी साड़ी ही गई. बेचारा मासूम नेकी करना चाहता और नुक़सान हो जाता.”

“काहे का मासूम! बदमाश था.” स्मिता बोली.

“तू बड़ी दूध की धुली थी! रोज़ रसोई में रोटी बनाने के लिए खिलौने के चौका-बेलन लेकर आ जाती और मेरा दिमाग़ खाती.”

मां ने याद दिलाया.

“और क्या? एक बोरी आटा, तो बिगाड़ा ही होगा इसने!” नीलेश कहां चूकनेवाला था.

“किसी ने कुछ नहीं बिगाड़ा. उन छोटे-छोटे शरारती पलों ने तो रिश्तों को जोड़ने का काम किया. अपनत्व जगाकर प्यार के तंतुओं को जोड़े रखा. समय की आड़ में जब रिश्तों के महल ढहने लगते हैं, तब अपनत्वभरे उन पलों की स्मृति ही हमारा संबल बन जाती है.” भावनाओं में बहती मां उन पलों को याद कर एकाएक बहुत प्रसन्न और संतुष्ट नज़र आने लगी थीं.

दो दिनों के अल्प प्रवास में स्मिता के लिए ये सबसे यादगार सुकूनमय पल थे और सबसे भव्य दावत भी.

अपने शहर लौटकर, तो वह फिर आपाधापीभरी ज़िंदगी में व्यस्त हो गई थी. नीलेश का नाराज़गी भरा फोन आया, तो वह चौंकी, “आपको कुछ वीडियोज़ भेजे थे. तब से आपके कमेंट का इंतज़ार कर रहा हूं.”

“ओह, देखती हूं.” स्मिता ने वीडियो देखने आरंभ किए, तो देखती ही रह गई. मॉल में हिचकिचाती मां को हाथ पकड़कर एस्केलेटर चढ़ाते नीलेश और पल्लवी, मां का विस्फारित नेत्रों से चारों ओर ताकना उसे अंदर तक गुदगुदा गया… यह मेरा धूप में सूखता स्मार्टफोन! चिकनाई हटाने के लिए मां ने डिटर्जेंट से धोकर सुखा दिया था… और यह उदास मां! चार दिनों से अनजाने में हुए इस नुक़सान का मातम मना रही हैं. मैं और पल्लवी समझा-समझाकर थक गए.

‘ओह! बेचारी भोली मां.’ स्मिता बुदबुदा उठी. एक अन्य वीडियो में मां बेहद डरते हुए फुट मसाजर पर पांव रखे हुए थीं. नीलेश और पल्लवी ने एक-एक पांव जबरन पकड़ रखा था. थोड़ी देर में वे रिलैक्स होती नज़र आईं, तो स्मिता के होंठों पर मुस्कुराहट और आंखों में नमी तैर गई. उसके लिए समय थम-सा गया था. इससे पूर्व कि उसका अधीर भाई उसे दोबारा कमेंट के लिए कॉल करे, स्मिता की उंगलियां मोबाइल पर थिरकने लगी थीं.

‘क्यूटनेस ओवरलोडेड…’

इतने क्यूट कमेंट ने नीलेश की आंखें नम कर दी थीं.

Sangeeta Mathur

संगीता माथुर

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- टूटे खिलौने (Short Story- Toote Khilone)

इतना सुनते ही उसका हाथ फिसला और वायलिन का तार टूट गया. उसके बाद वायलिन बजना बंद हो गया. ऐसी कितनी ही घटनाएं भरी पड़ी हैं ज़िंदगी के सुरों के बिखरने की, फिर भी वह सही सलामत है. भला खिलौनों के टूटने से कहीं आदमी टूटता है. खिलौने तो बस जज़्बात भर होते हैं और आदमी को जीने के लिए भावनाओं से अधिक ज़रूरत प्रैक्टिकल बनने की होती है. ज़ज़्बात का बिखरना भी कहीं दिखाई देता है? वह तो एक अंदरूनी प्रक्रिया है.

Kahani

उसने कुर्सी का हत्था पकड़कर ख़ुद को संभाला. ऐसे लग रहा था कि चक्कर खाकर गिर पड़ेगा. आंखों के आगे अंधेरा छा रहा था. तभी भीतर से ज़ोर का अट्टहास सुनाई पड़ा, जैसे कोई कह रहा हो- बस, लड़ चुके अपने आप से? वह जवाब देना चाहता था उन बहुत से सवालों का, जो सालों से उसे घेरे हुए थे, लेकिन उसे लगा कहने के लिए व़क़्त कम है. फिर वह कहे किससे? काश! कोई उसकी बात भी सुनता.

दर्द बढ़ रहा था कि तभी लगा कोई उससे कह रहा हो- बस, इतनी जल्दी हार मान गए. उसने आंखें फैलाकर और भीतर झांकने की कोशिश की, अरे यह तो उसके खिलौने की सेना के टैंक का सिपाही था. दर्द में भी वह मुस्कुरा दिया. ‘हां दोस्त, तुम्हें तो मैं बचपन से जानता हूं और सचमुच तुम बहुत बहादुर हो.’ सिपाही बोला, ‘तुम्हें याद है मेरे हाथ टूटे हुए हैं और फिर भी मैंने हार नहीं मानी, जबकि तुम हो कि सब कुछ सही सलामत होते हुए भी टूट रहे हो. देखो, शरीर से टूटा आदमी नहीं हारता. हां, जिस दिन तुम दिल से टूट जाओगे, उस दिन सचमुच हार जाओगे. यह हार ज़िंदगी के जंग की हार होगी. उठो, तुम्हें अपनी बात कहने और अपना पक्ष रखने के लिए अभी और जीना है.’ उसे लगा दिल का दर्द कम हो रहा है. कोई है जो उसे कह रहा है ज़िंदगी में इतनी जल्दी हार नहीं मानते. उसकी आंखों से झर-झर आंसू बह निकले.

उसने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई, गहरा अंधेरा था. बस बरामदे में नाइट बल्ब टिमटिमा रहा था. उसे अपना खिलौनेवाला सिपाही याद आया. बहुत प्यार करता था वह अपने इस सिपाही से. हर समय हाथ में दबाए पूरे घर में दौड़ता रहता और रात में सोता तो सिरहाने रखकर. उसे लगता जब तक यह सिपाही उसके साथ है, तब तक कोई उसे नहीं हरा सकता.

एक दिन छोटे भाई ने खेल-खेल में सिपाही को दीवार पर दे मारा. सिपाही के हाथ टूट गए. भाई जीतना चाहता था और सिपाही की बांह तोड़कर वह ख़ुद को विजयी समझ रहा था. तब उसने रोते हुए भाई की शिकायत पापा से की तो वे बोले, ‘आपस में समझ लो. छोटा भाई है. उसे उत्पात करने का अधिकार है. हां, तुम बड़े हो, उसे क्षमा कर दो.’ भाई को रोते देख वह बोला, ‘भैया, आप भी मेरा खिलौना तोड़ दो, बात बराबर हो जाएगी.’ और वह बोला, ‘कोई बात नहीं भाई, मैं इसके हाथ जोड़ दूंगा, पर तुम्हारा खिलौना नहीं तोड़ूंगा. भला तुम्हारे खिलौने तोड़ने से मेरे सिपाही का हाथ थोड़ी जुड़ जाएगा. तुमने अपने कोर्स की क़िताब में वह कहानी नहीं पढ़ी, जिसमें राजा ने तीर से घायल हंस उस राजकुमार को दिया, जिसने उसे चोट लगने पर बचाया था. उसे नहीं, जिसने उसे तीर मारकर धरती पर गिराया था. जानते हो क्यों? क्योंकि मारनेवाले से बचानेवाले का अधिकार ज़्यादा होता है.’ आह! फिर एक टीस उठी. बड़े होने पर भाई को मकान चाहिए था और उसने रिश्तों को खिलौने की तरह ही तोड़ दिया. अजीब-सी बात है… उसके साथ वह तो सदैव ही सही रास्ते पर चलता है, नीति का ध्यान रखता है और सब के सब उसी से नाराज़ हो जाते हैं. और एक दिन दिल की दीवार पर भावनाओं का ख़ून बिखर जाता है. वह सिर से पांव तक लहूलुहान हो उठता है और फिर ऐसे ही कभी कोई सिपाही, तो कभी वायलिन उसे जीने की ताक़त दे देता है.

यह भी पढ़ेनवरात्रि 2019: जानें शरद नवरात्रि कलश/घट स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजन विधि (Shardiya Navratri 2019: Date-Time-Kalash Sthapana Muhurat-Puja Vidhi-Colours)

वायलिन का ध्यान आते ही एक पुरानी बात याद करके उसे हंसी आ गई. उस दिन वह ख़ुशी बांटने के लिए घर में वायलिन बजा रहा था कि भीतर से आवाज़ आई, ‘प्लीज़, यह बाजा मत बजाया करो. तुम्हें भले ही इसके सुरों से ख़ुशी मिलती हो, पर आस-पड़ोस से लेकर घर के सभी सदस्य तुम्हारे इस वायलिन के बजने से डिस्टर्ब हो जाते हैं.’ इतना सुनते ही उसका हाथ फिसला और वायलिन का तार टूट गया. उसके बाद वायलिन बजना बंद हो गया. ऐसी कितनी ही घटनाएं भरी पड़ी हैं ज़िंदगी के सुरों के बिखरने की, फिर भी वह सही सलामत है. भला खिलौनों के टूटने से कहीं आदमी टूटता है. खिलौने तो बस जज़्बात भर होते हैं और आदमी को जीने के लिए भावनाओं से अधिक ज़रूरत प्रैक्टिकल बनने की होती है. ज़ज़्बात का बिखरना भी कहीं दिखाई देता है? वह तो एक अंदरूनी प्रक्रिया है.

उसने फ्रिज से पानी की बॉटल निकाली और ग्लास में पानी डाल पीने लगा. जैसे-जैसे पानी की घूंट गले के नीचे उतरती, उसे लगता तबियत बेहतर हो रही है. यह क्या है? कौन है? जो उसे अकेले में तंग करता है, उसके अपने ही विचार तो उसे मथ डालते हैं.

उसे लगा इस बार उसे शतरंज के मोहरे चुनौती दे रहे हैं. ज़िंदगी इतनी सरल होती तो आज साठ पार करने के बाद सभी ज़िम्मेदारियों को पूरा कर वह इतना बेचैन न होता. उसे लगा चौसर पर बिछा काला बादशाह हंस रहा है- देखो, तुम्हें स़फेद मोहरे से खेल रहे अपने ही लोगों को मात देनी है. तुम्हें अपने पैदल लड़ाने हैं, घोड़े और ऊंट कटाने हैं और हर हाल में मुझे बचाना है.

वह चौंका. यह खिलौने का बादशाह उसके दिल में बैठकर कैसा क़िरदार निभा रहा है. नहीं, असली ज़िंदगी कोई शतरंज की बिसात नहीं है जिस पर रिश्ते दांव पर लगा दिए जाएं. वह क्यों अहंकार के बादशाह को बचाने के लिए अपने हाथी-घोड़े बलिदान कर देता है?

इससे पहले कि वह कुछ और सोचता, भावनात्मक दौरा आगे बढ़ता तभी फ़ोन की घंटी बज उठी. इतनी रात गए कौन फ़ोन कर रहा है. उसका दिल धकड़ने लगा. कहीं यह भी कोई भ्रम न हो? अपने आप से बातचीत का ही हिस्सा. मगर नहीं फ़ोन की घंटी लगातार बज रही थी और उसके जगे होने का एहसास करा रही थी.

वह उठा. उसने रिसीवर उठाया और धीरे से बोला, “हैलो…”

उधर से आवाज़ आई, “हैलो पापा, आप सो तो नहीं रहे थे. हैप्पी बर्थडे पापा.”

“कौन? कौन बेटा अरूप तुम…” उसकी आंखों से झर-झर आंसू बह निकले. “कैसे हो बेटा? पूरे तीन साल बाद तुम्हारी आवाज़ सुन रहा हूं.”

“मैं ठीक हूं पापा. पहले सोचा रात में फ़ोन करूं कि न करूं, फिर दिल नहीं माना.”

“बेटा, कब से तरस रहा था तुम्हारी आवाज़ सुनने को.”

“तो पापा फ़ोन क्यों नहीं किया?”

“बेटा, तुमने भी तो फ़ोन नहीं किया मुझे.”

“ओह, पापा आप मुझसे नाराज़ थे और मैं डर रहा था.”

“बेटा, मैं नाराज़ था तो क्या? तुम माफ़ी मांग लेते या मुझे मना लेते.”

“पापा, मैं आपको बचपन से जानता हूं.  आप अपनी जगह सही होते हैं.”

“बेटा, जब मैं सही हूं, तो तुम मेरी बात मान क्यों नहीं लेते?”

अरूप बोला, “पापा, बस यही डर तो सबको आपसे बात करने से रोक देता है. पापा, आप इतने ज़िद्दी क्यों हैं?”

अरूप को लगा उधर से रोने की आवाज़ आ रही है. “बेटा, मैं क्या करूं? अब इस उम्र में ख़ुद को बदल तो नहीं सकता. मैं सही हूं इतना तो जानता हूं, पर आज पता लगा कि मैं ज़िद्दी भी हूं. ज़िद्दी हूं तभी तो अकेला हूं.”

यह भी पढ़ेसीखें ख़ुश रहने के 10 मंत्र (10 Tips To Stay Happy)

तभी अरूप बोला, “पापा प्लीज़, आप रोइए मत. आप तो बहुत मज़बूत हैं और मैं आज आपका दिल नहीं दुखाना चाहता. आई एम सॉरी पापा. लीजिए, मम्मी से बात करिए.”

“हैलो शेखर, ओ शेखर मेरी भी सुनोगे कि बस अकेले ही रोते रहोगे.”

“हां बोलो, तुम्हारी बात नहीं सुनूंगा तो किसकी सुनूंगा.”

“शेखर, मैंने बहू देखी है बहुत सुंदर और सुशील है. देखो, अरूप तुम्हारा बेटा है और उसका अपनी ज़िंदगी के बारे में ़फैसला लेने का कुछ हक़ तो बनता है.”

“बात उसकी पसंद की नहीं है, तुम तो जानती हो मैं उसे कितना प्यार करता हूं. क्या वह मेरी एक बात नहीं मान सकता था. भारतीय रीति से किसी हिंदुस्तानी लड़की से शादी कर लेता. अपने देश में क्या लड़कियों की कमी है.”

“शेखर, एक बार बहू को देख तो लो, मेरा तो दिल जीत लिया उसने. सुनो, अरूप का इंडिया आने का मन कर रहा है और बहू भी आना चाहती है. उसके पापा अमेरिकन हैं, पर उसकी मां केरल की है और पूरे भारतीय संस्कारवाली. उसके मामा भारत में रहते हैं और दोनों पूरे रीति-रिवाज़ से शादी करना चाहते हैं.”

उसे कुछ अच्छा महसूस हुआ. “ठीक है, जैसा तुम लोग चाहो.”

अरूप बोला, “पापा प्लीज़, मुझे माफ़ कर दो.”

शेखर बोला, “बेटा, मुझसे अलग होकर तुम देश से दूर हो, दिल से नहीं.”

“पापा, मैं आ रहा हूं.”

अरूप को लगा अब पापा कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं. वह धीरे-से बोला, “पापा, अपना ख़याल रखना.”

उसके शरीर की तनी हुई नसें ढीली पड़ चुकी थीं और अपने आपसे वार्तालाप का स्वर कुछ स्पष्ट हो रहा था. इस समय उसे अपना वायलिन बेतरह याद आ रहा था. उसने आलमारी के ऊपर नज़र डाली. वायलिन वहीं था, कुछ धूल जम गई थी. उसने हिम्मत कर उसे उठा लिया. एक टूटा हुआ तार जैसे कुछ कह रहा हो. उसने बेस से तार ढीला किया और टूटे तार को जोड़ जैसे ही हाथ फेरा वायलिन से सुर फूट पड़े. उसका चेहरा मुस्कुरा उठा. एक, दो, तीन और वह धीरे-धीरे वायलिन के सुर साधने लगा. चेहरे से तनाव के बादल छंट रहे थे.

इससे पहले कि वह उन सुरों में खो जाता, फ़ोन फिर बज उठा.

इस बार वह शांत था, कोई बेचैनी नहीं और न ही रात का एहसास.

उसने आराम से फ़ोन उठाया. आज उसका बर्थडे है और ज़रूर यह भी किसी बहुत अपने की ही आवाज़ थी. “भैया, जन्मदिन की बधाई.”

“कैसे हो सुधीर? बड़े सालों बाद तुम्हें भैया याद आए.”

“भैया, क्या करूं? अपनी ग़लती का जितना एहसास होता, उतना ही मैं संकोच के मारे तुम से बात नहीं कर पाता.”

“क्या सुधीर, कहीं अपनों से बात करने में भी संकोच होता है. आज पांच साल बाद बात  भी कर रहा है, तो बड़े भाई को रुलाने के लिए.”

“भैया, मुझे घर पर कब्ज़ा करके कुछ भी हासिल नहीं हुआ. मैंने थोड़े-से ज़मीन के लिए जीते-जागते अपने लोगों को खो दिया. इसका एहसास मुझे तब हुआ, जब शादी के बाद पिंकी बेटी ने कहा कि पापा, यह घर मेरा नहीं है और मेरा मायका ताऊजी के घर में है. मैं इस घर में तभी क़दम रखूंगी जब आप ताऊजी को यहां लेकर आओगे. भैया, मुझे यह घर काटने को दौड़ता है. सच है भैया, ईंट और गारे से तो मकान बनता है, घर तो घरवालों से बनता है. भैया, आप यहां आ जाओ या फिर मुझे अपने पास बुला लो. रहना ही तो है, कहीं भी रह लूंगा. दीवारें हमारे जाने के बाद भी यहीं खड़ी रहेंगी. हां, दिल के बीच की दीवारें गिर गईं तो जीवन जीना आसान हो जाएगा. वह लगातार बोलता ही जा रहा था.

“भैया, तुम्हें याद है, जब हम बालू के टीले में घरौंदा बनाते थे तो एक तरफ़ से तुम अपना दरवाज़ा बनाते और दूसरे तरफ़ से मैं अपना और  फिर जब हम अपने-अपने दरवाज़े में हाथ डालते, तो हमारे हाथ उस घरौंदे  में एक-दूसरे को पकड़ लेते और हम कहते, हमारे दरवाज़े अलग हो सकते हैं, पर घर नहीं.”

“सुधीर, अब तू भी मुझे रुलाएगा क्या? अभी अरू का फ़ोन आया था, वह आ

रहा है.”

“क्या कह रहे हो भैया? अरू आ रहा है? मेरी तो आंखें ही तरस गई थीं उसे

देखने को.”

“हां सुधीर, अरू आ रहा है और बहू भी पसंद कर ली है उसने. उसकी शादी यहीं करनी है बड़ी धूमधाम से और सुनो, पिंकी बेटी को मेरे पास भेज देना. कह देना तुम्हारे ताऊजी और मुझमें कोई मतभेद नहीं है. अब बचे ही कितने दिन हैं हमारी ज़िंदगी के, जो गिले-शिकवे लेकर ऊपर जाएं.”

“ऐसा मत कहो भैया, भगवान तुम्हें लंबी उम्र दें.”

“सुधीर, देर मत करना, कल सुबह ही आ जाओ, सारी तैयारी तुम्हें ही करनी है.”

इस बार शेखर को लगा कि सुधीर रो रहा हैै. “क्या हुआ सुधीर? तू रो क्यों

रहा है?”

“भैया, यह सोचकर कि तुम्हें कितना ग़लत समझ बैठा? मुझे पता होता कि तुम इतनी आसानी से मुझे माफ़ कर दोगे, तो भला मैं माफ़ी मांगने में इतने साल क्यों लगाता?”

“सुधीर, इतनी उम्र बीत जाने पर भी अपने भाई को नहीं समझ पाए. अब तुम भी अरूप की तरह यह मत कह देना कि भैया, तुम ज़िद्दी हो.” दोनों भाई हंस पड़े.

“और सुनो सुधीर, कल आना तो हीरा हलवाई की बालुशाही ज़रूर लाना. मुद्दत हो गई मुझे ऐसी बालुशाही खाए.” इसके बाद अगर फ़ोन हाथ में रहता भी तो बात नहीं हो पाती.

फ़ोन रखते ही शेखर को लगा, कहीं ऐसा न हो ख़ुशी से हार्ट फेल हो जाए.

वह सोचने लगा- जब मिट्टी के टूटे और बेजान ख़िलौने फिर से जुड़ सकते हैं, तो हमारे टूटे रिश्ते, जिनमें एक-दूसरे की भावनाओं को समझने की ताक़त है, वे दुबारा क्यों नहीं जुड़ सकते? सचमुच उसे लगा, टूटे रिश्तों को जोड़कर वह ज़िंदगी की जंग जीत गया है.

– मनोहर

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- अचीवमेंट (Short Story- Achievement)

रमा को आज दिन की पार्टी की कुछ बातें याद आ रही थीं. मां की सहेलियों ने जब उमा दी और उससे पूछा था कि क्या कर रही हो आजकल, तो उमा दी ने गर्वभरे स्वर में अपने कामकाजी होने के बारे में बताया था. उसके ‘हाउसवाइफ हूं’ कहने पर मां ने जैसे शर्मिंदा होते हुए कहा था, “इसने नहीं किया कुछ. बस, घर पर आराम किया है.”

Kahaniya

रात के ग्यारह बज रहे थे. रमा ने सोने से पहले मां के कमरे में झांका, वे बेड पर लेटीं उमा दी से बात कर रही थीं. अपने से आठ वर्ष बड़ी उमा दी और मां को ‘गुडनाइट’ बोलने के लिए वह अंदर आ गई, ‘गुडनाइट’ कहते हुए पूछा, “मां, थक गई हैं क्या?”

“नहीं-नहीं, बिल्कुल नहीं. आज का दिन तो बहुत अच्छा रहा. बहुत मज़ा आया, उमा दी भी अभी यही कह रही थीं. नींद ना आ रही है तो आओ, बैठो.”

“नहीं मां, नींद तो आ रही है. अब कल सुबह बात करेंगे.” कहकर रमा दूसरे कमरे में सोने आ गई, उमा दी भी अभी उसके पास सोने वाली हैं, रमा कई बातें सोचने लगी. आज मां का पचहत्तरवां जन्मदिन था. वह मुंबई से, उमा दी दिल्ली से मेरठ पहुंची हैं. अनिल भैया जो रमा से पांच साल बड़े हैं, उनसे फोन पर बात कर रमा और उमा दी ने एक सरप्राइज़ पार्टी रखी थी. रमा कल रात उमा दी के पास दिल्ली पहुंच गई थी. आज सुबह-सुबह मेरठ आकर मां को सरप्राइज़ दिया है. मां टीचर थीं, अब रिटायर्ड हैं. उमा दी भी एक अच्छी कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत हैं. रमा हाउसवाइफ है, दोपहर में मां की ख़ास सहेलियों को एक होटल में लंच पर आमंत्रित किया गया था. मां बहुत ख़ुश थीं. उन्हें देखकर उमा दी, अनिल भैया और रमा भी ख़ुश हो रहे थे. पिता का स्वर्गवास तो सालों पहले हो गया था. मां को ख़ुश रखने के लिए तीनों यथासंभव कोशिश करते थे.

जब भी रमा मेरठ आती है, मन में एक उदासी घिरी रहती है. यह उदासी वह कभी किसी से शेयर नहीं कर पाई. हां, अनजाने में ही अनिल भैया उसका साथ देते रहे हैं. रेखा भाभी और भतीजी काव्या से भी उसका मन ख़ुश रहता है, पर मां और दी! पता नहीं जान-बूझकर या अनजाने में वे दोनों रमा का दिल सालों से दुखाती रही हैं. अगर अनजाने में, तो दोनों की इतनी कम उम्र तो है नहीं कि वे किसी को दिल दुखानेवाली बातें कहें और उन्हें महसूस न हो और अगर जान-बूझकर, तो यह कितना कटु सत्य है कि आपके अपने ही आपका मन सबसे ज़्यादा आहत करते हैं. अगर बाहरवाले आपके मन को कष्ट पहुंचाते हैं, तो आप उनसे अपने संबंध सीमित कर एक किनारा कर सकते हैं, पर इन सबसे क़रीबी रिश्तों का क्या किया जाए, जिन्हें आपकी आंतरिक पीड़ा का एहसास नहीं होता.

अभी भी उसका मन तो था कि मां और बहन के साथ बहुत-सी बातें करे. दो दिन बाद चली ही जाएगी, पर बातों का अंत क्या होता है इसका जो अनुभव उसे था, उसे देखते हुए उसने अकेले लेटना ही ठीक समझा.

मुंबई में रमा अपने पति विपिन और बच्चों तन्मय व तन्वी के साथ अपनी गृहस्थी में बहुत ख़ुश और संतुष्ट थी. सुशिक्षित होने के बावजूद रमा ने घर और बच्चों की उचित देख-रेख को ही प्राथमिकता देते हुए कभी कोई नौकरी करने के बारे में नहीं सोचा था. इसके पीछे भी उसके अपने कुछ तीखे-कटु अनुभव थे. विपिन और बच्चों ने उसे हमेशा प्यार और आदर दिया था. उसे कभी अपने हाउसवाइफ होने पर दुख नहीं था, पर वह जब भी मां और उमा दी से मिलती, तो दोनों ही उस पर वर्किंग वुमन न होने का ताना कसतीं. मां का तो हमेशा यही कहना होता था, “तुझे इतना पढ़ाया-लिखाया, तूने कुछ नहीं किया. अगर तुझे घर-गृहस्थी में ही जीवन ख़राब करना था, तो बता देती. मैं क्यों इतना पढ़ाती-लिखाती.” उमा दी ने भी हमेशा ऐसी बातें ही की थीं. “भई, हाउसवाइफ के रंग-ढंग तो मैं अपनी पड़ोसनों के रोज़ ही देखती हूं, कोई काम नहीं होता उन्हें, बस गेट पर खड़े होकर गप्पे लड़वा लो. मैं तो पूरा दिन घर पर रहने की सोच भी नहीं सकती.” मां और बहन की ऐसी बातें रमा के दिल पर गहरा प्रहार-सा कर जातीं, लगता क्या सचमुच जीवन में उसने कुछ नहीं किया? भैया ने हमेशा उसकी उदार मन से प्रशंसा की थी. पता नहीं कितनी ही बातें उसे अक्सर याद आती रहती थीं, जब मां और उमा दी ने उसका मज़ाक उड़ाया था. उमा दी सोने आईं, तो रमा ने अपनी आंखें यूं ही बंद कर लीं. दिन की बहुत-सी बातें याद आ गई थीं, तो अब बात करने का मन ही नहीं हो रहा था. उमा दी भी उसे सोया समझ चुपचाप सो गई थीं.

यह भी पढ़े10 होम बिजनेस आइडियाज़: अपने बिजनेस से घर बैठे पैसे कमाएं (10 Home Business Ideas: Make Money Working From Home)

रमा को आज दिन की पार्टी की कुछ बातें याद आ रही थीं. मां की सहेलियों ने जब उमा दी और उससे पूछा था कि क्या कर रही हो आजकल, तो उमा दी ने गर्वभरे स्वर में अपने कामकाजी होने के बारे में बताया था. उसके ‘हाउसवाइफ हूं’ कहने पर मां ने जैसे शर्मिंदा होते हुए कहा था, “इसने नहीं किया कुछ. बस, घर पर आराम किया है.” छलछलाई आंखों को बड़ी मुश्किल से रोका था रमा ने. मन अंदर तक कड़वाहट से भर गया था. उसके सब्र का पैमाना अब छलकने लगा था, पर हमेशा की तरह इन कटाक्षों का जवाब देने से उसने ख़ुद को रोक ही लिया था. फिर कितने ही विचारों के आरोह-अवरोह में डूबते-उतराते उसकी आंख लग गई थी.

अगला दिन भी घर में कब बीत गया, पता ही नहीं चला. फिर अगली सुबह उमा दी और रमा साथ ही निकलनेवाली थीं. प्रोग्राम यही था कि उमा दी रमा को एयरपोर्ट छोड़कर अपने घर चली जाएंगी. दोनों पैकिंग कर रही थीं, तभी मां वहीं पास आकर बैठ गईं. कुछ इधर-उधर की बातों के बाद बोलीं, “रमा, तुम थोड़ा रुक जातीं.”

“नहीं मां, विपिन और बच्चों को परेशानी होती है. बच्चों की परीक्षाएं भी शुरू होनेवाली हैं. मेरा वहां रहना अभी ज़रूरी है.” उमा दी ने कहा, “अरे, सब मैनेज कर लेते हैं. मैं भी तो छुट्टियों में यहां आती रहती हूं वहां सबको छोड़कर. एक तो पता नहीं घर में रहनेवाली लेडीज़ को यह क्यों लगता है कि उनके कहीं जाने से कोई काम रुकता है. मुझे देखो, मैं तो ऑफिस से भी छुट्टी लेकर यहां आई हूं. घर के काम क्या चीज़ हैं. क्या तुम सचमुच घर-गृहस्थी के अलावा कुछ नहीं सोचती रमा?” अपमान का एक घूंट जैसे रमा के गले में अटक-सा गया. मां भी शुरू हो गईं, “इसने यही तो किया है हमेशा, इसी में तो रच-बस गई है. वैेसे रमा, परसों पार्टी में जब सब अपने बारे में, अपनी बेटी-बहू के अचीवमेंट्स के बारे में बता रही थीं, तुम्हें मन में दुख तो होता होगा न कि सारी पढ़ाई-लिखाई ख़राब कर दी.”

आज रमा को जैसे स्वाभिमान ने झिंझोड़ दिया, पलभर में ही उसके दिल से सारा लिहाज़, सारी झिझक, संकोच ख़त्म हो गया. वह बेहद गंभीर स्वर में कहने लगी, “मां, मेरे दिल में कामकाजी महिलाओं के लिए बहुत सम्मान है. वे घर-गृहस्थी के साथ ऑफिस की ज़िम्मेदारियां भी संभालती हैं, पर आप लोग मेरे जीवन को, घर-गृहस्थी संभालने की मेरी चॉइस को इतना तुच्छ क्यों समझती हैं? मैंने सचमुच कुछ नहीं किया होगा, ऐसा आपको लगता है, मैं ऐसा नहीं समझती. मेरा अचीवमेंट मुझे हज़ारों, लाखों रुपए नहीं देता, पर जो देता है वह अमूल्य है. मैंने अपने बच्चों को बचपन की, अपने स्नेह की, अपने रात-दिन के लाड़-प्यार की मधुर यादें दी हैं, जो दुर्भाग्यवश मेरे पास नहीं हैं. आपके आत्मनिर्भर होने के दंभी स्वभाव ने दिन-रात आहत किया है मुझे. आपको याद है मेरी सहेली विभा, उसकी मम्मी बेहद सरल, आम-सी गृहिणी थीं. मैं जब भी कभी स्कूल से उसके साथ उसके घर जाती थी, तो सरिता आंटी हम दोनों को कितने स्नेह से बिठाकर खाना खिलाती थीं. मैं कभी उन्हें भूल नहीं पाई और जब कभी वह मेरे साथ हमारे घर आती थी, तो आपका कहना होता था, “मैं तो काम करके आई हूं, यह दोस्ती ख़ुद ही निभाओ. ख़ुद बनाओ और खिलाओ. मैं कोई हाउसवाइफ हूं, जो किचन में ही घुसी रहूं.”

मां, मैंने आपको कभी घर के किसी काम में रुचि लेते नहीं देखा, आपको बाहर रहना ही अच्छा लगता था. चाहे स्कूल हो या छुट्टियां हों, मेरा बचपन कितना अकेला और उदास रहा है, आपको क्या पता. आपके घर से बाहर रहने के शौक़ में मैंने क्या-क्या सहा है, आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकतीं. मुझे ख़ुद ही नहीं पता, आधुनिक, शिक्षित माहौल में रहने के बावजूद अल्प शिक्षिता, सरल, स्नेही सरिता आंटी कब मेरी आदर्श बनती गईं. मैंने अपने बच्चों को वही स्नेह व सुरक्षा देने का प्रयत्न किया है, जो मुझे विभा के घर जाकर महसूस होता था. मैं इस बात को भी खुले दिल से स्वीकार करती हूं कि पिताजी के न रहने पर आपने ही घर संभाला है, पर मां, आत्मनिर्भर होने का इतना दंभ! इतना घमंड कि आप मेरे हर काम को हेय दृष्टि से देखती आई हैं. यहां तक कि आप मेरे पास मुंबई आने पर मेरे साफ़-सफ़ाई और घर को व्यवस्थित रखने के शौक़ का मज़ाक उड़ाती हैं, क्यों? मां, हम अपनी मां, बहन, बेटी की बात छोड़ भी दें, तो एक औरत होने के नाते आप दूसरी औरत के किसी काम को, उसकी लगन को, उसकी मेहनत को क्यों कोमल, स्नेही, उदार मन से स्वीकार नहीं सकतीं?

यह भी पढ़ेमुफ़्त के सलाहकारों से रहें सावधान (Stay Away From Free And Unwanted Advises)

मैं अपना अचीवमेंट आप जैसे लोगों को समझा भी नहीं पाऊंगी. बस, मेरे बच्चे कभी यह बात नहीं कहेंगे कि उनका बचपन उदास, अकेले, आहत व उपेक्षित बीता है. इस बात की गारंटी देती हूं मैं और यही गारंटी मेरा अचीवमेंट है मां.” कहते-कहते रमा अपने सिर पर स्नेहिल स्पर्श से चौंकी, पता नहीं कब से पीछे खड़े अनिल भैया ने अपना हाथ उसके सिर पर रखा था. उसकी नज़रें भैया से मिलीं, तो उनकी आंखों में जो कुछ उसे दिखा, भीगी आंखों के साथ मुस्कुरा दी रमा. मां और उमा दी अवाक् बैठी थीं, रमा ने कहा, “मां, दी, मेरी बातों से आपको दुख पहुंचा हो, तो आई एम सॉरी. आज ख़ुद को रोक नहीं पाई.” रमा ने अपना बैग बंद कर सामने रखे ड्रेसिंग टेबल में स्वयं को देखा, अपना ही चेहरा आज शांत और ख़ुश लगा. मन पंख-सा हल्का हो गया था. सालों का गुबार निकलने के बाद अब बहुत शांत था मन.

Poonam Ahmed

पूनम अहमद

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- तुम्हारी मां (Short Story- Tumhari Maa)

विरह के बाद का प्रेम और तीव्र होता है. आज यह कहने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं कि वे दस दिन मेरे जीवन के अत्यधिक सुंदर दिन थे. प्रेम वह शब्द है, जिसकी व्याख्या असंभव है, पर इसमें जीवन छुपा है. जीने की चाह छुपी है.

Kahani

कहीं पढ़ा था मैंने कि जिस क्षण एक शिशु पैदा होता है, उसी क्षण मां का भी जन्म होता है. उसका अस्तित्व पहले से कभी विद्यमान नहीं होता. एक औरत अवश्य होती है, लेकिन एक मां, कभी नहीं. एक मां कुछ ऐसी है, जो पूर्णतया नई है. यह शब्द मेरे नहीं हैं, किंतु सत्य हैं.

स्वयं को एक नूतन संरचना प्रदानकर मैं, एक कन्या से पहले पत्नी और फिर मां बनी. इस जीवन में अनगिनत भूमिकाओं को निभाते हुए मैंने अपने हर कर्त्तव्य का पालन पूरी ईमानदारी से किया. मैं शिशु से बालिका बनी, फिर किशोरी, फिर युवती, फिर औरत और फिर मां. इस जीवन के हर वसंत और हर पतझड़ को मैंने भी वैसे ही जीया है, जैसे कि तुम जी रहे हो और आगे भी जिओगे. फिर मेरी इच्छाएं और ज़रूरतें तुमसे भिन्न कैसे हो सकती हैं? मैं भी हाड़-मांस से कृत एक इंसान हूं, ठीक तुम्हारे समान. मुझे पारलौकिक अथवा देवी परिभाषित कर दंडित क्यों कर रहे हो?

तुम्हें याद है कक्षा नौ में तुम में चिड़चिड़ापन आ गया था. दिनभर कमरे में गुमसुम बैठे रहते थे. तुम्हारी नानी, जिसे पढ़ाई का तनाव समझ रही थीं, मैं जानती थी कि वह पहले प्रेम की आहट थी. उस प्रथम पीड़ा को हमने साथ ही झेला था और शीघ्र ही तुम उस दौर से निकल आए थे.

किंतु जब मैं इस उम्र में थी, मेरे पास न प्रेम को समझ पाने की परिपक्वता थी और न दिल टूट पाने के बाद का संबल. उन दिनों हम ऐसी बातें न अपने

माता-पिता से कहने की हिम्मत कर पाते थे और न वे समझने की. इसलिए जब कक्षा आठ में ज्ञान हमारी स्कूल में पढ़ने आया, तो प्रारंभ में अपने भीतर के उन्माद को मैं समझ ही नहीं पाई थी.

यह भी पढ़ेपैरेंटिंग स्टाइल से जानें बच्चों की पर्सनैलिटी (Effects Of Parenting Style On Child’s Personality)

कक्षा आठ से बारहवीं तक हम साथ ही पढ़े, किंतु मात्र मुस्कुराहटों के हमारे मध्य कोई संवाद नहीं हुआ. फेयरवेल पार्टी में भी हम, मात्र फिर मिलेंगे के अतिरिक्त एक-दूसरे से कुछ कह नहीं पाए थे. परंतु हां, जब उसके शहर से बाहर चले जाने की ख़बर मुझे मिली थी, तो कई महीनों तक मेरे आंसू नहीं थमे थे. उसके बाद समय के साथ ज़िंदगी आगे बढ़ गई और मैंने एक विद्यार्थी की भूमिका का अच्छा निर्वाहन करते हुए एक बैंक में नौकरी प्राप्त कर ली थी.

प्रेम फिर दुबारा मेरे जीवन में नहीं आया. संभवतः तुम यह जानकर दुखी होगे, किंतु सत्य यही है. तुम्हारे पिता से विवाह एक समझौता था और संपूर्ण जीवन मैंने उस समझौते को ही निभाया था. ऐसा नहीं है कि प्रेम दुबारा नहीं हो सकता, किंतु यह भी तय है कि प्रेम किया नहीं जा सकता.

मेरे माता-पिता ने जतिनजी का चुनाव मेरे लिए किया था. एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए पुत्री का विवाह किसी युद्ध जीतने जैसा ही है और जब पुत्रियों की संख्या चार हो, तो बिना शर्त विवाह के लिए तैयार हो जानेवाला पुरुष देवतातुल्य हो जाता है. मेरी नौकरी और मेरी योग्यता का मूल्य मात्र यह था कि जतिनजी और उनका परिवार इस अतिरिक्त आय के घर आने से प्रसन्न थे. जिस रिश्ते की जड़ में ही स्वार्थ की खाद हो, वहां प्रेम का अंकुर कैसे पनप सकता था?

किंतु मेरी इस कृत्रिम बगिया में भी फूल खिला, जब तुमने जन्म लिया था. जब मैं अपनी नौकरी और तुम में व्यस्त थी, तभी जतिनजी के फेफड़ों में उस घातक रोग का प्रवेश हुआ. फिर आरंभ हुआ था मेरा वास्तविक संघर्ष. घर, ऑफिस और हॉस्पिटल के मध्य सामंजस्य स्थापित करने में मैं पराजित तो नहीं हुई थी, किंतु एक अंतहीन पीड़ा का अनुभव अवश्य कर रही थी. इस पीड़ा चक्रव्यूह में मुझे सहारा देने, वह पुनः मेरे जीवन में आ गया था. नियति का खेल ही था कि ज्ञान ही वह कैंसर स्पेशलिस्ट था, जिसका मुझे एक महीने से इंतज़ार था.

समय और परिस्थिति हमें निकट लाती चली गई. जतिनजी की बीमारी का कारण उनके परिवारवाले मुझे मानकर लगातार प्रताड़ित करते थे. पति की बीमारी, उनके परिवारवालों के आक्षेप, नन्हे से तुम और ऑफिस की ज़िम्मेदारियां… यह सभी निभाते हुए मैं कई बार टूटी थी, किंतु ज्ञान मेरा अवलंब बन मुझे पुनः जोड़ देता था.

न उसने कभी कुछ कहा और न मैंने कुछ पूछा, हमारी भावनाओं को शब्दों की आवश्यकता ही नहीं थी. जतिनजी की मृत्यु के बाद घटनाक्रम शीघ्रता से बदलता चला गया था. उनके परिवारवालों के व्यवहार से तो मैं अवगत थी ही, अब उनका एक पैशाचिक रूप भी मेरे सम्मुख आ गया था. जतिनजी द्वारा बनाए गए मकान को हथियाने के लिए उन्होंने छल और बल दोनों का उपयोग किया. उस समय यदि ज्ञान और मेरी नौकरी का संबल नहीं होता, तो संभवतः मैं वह युद्ध हार ही जाती.

इस दौरान मैं और ज्ञान अधिक क़रीब आ गए थे. वह हमारे रिश्ते को नाम देने के लिए व्यग्र था. एक युद्ध जतिन के परिवार के साथ कोर्ट में चल रहा था और एक युद्ध मेरे भीतर.

यह भी पढ़ेप्लास्टिक पॉल्यूशन: कैसे बचाएं ख़ुद को? (Plastic Pollution: Causes, Effects And Solutions)

अंततः मैं केस जीत गई थी. केस जीतने की ख़ुशी में उसने मुझसे एक पार्टी का आग्रह किया था. मैं जानती थी, दूसरे केस की सुनवाई का समय आ गया था. हम दोनों होटल मानसिंह के डाइनिंग एरिया में आमने-सामने बैठे थे और ज्ञान के वे शब्द मेरे कानों में संगीत की स्वर लहरियों की तरह पड़े थे.

“थाम लो ये हाथ मेरा कि अब विरह की इस पीड़ा को आराम मिले… भटकते हुए इस बादल को उसका मुट्ठीभर आसमान मिले…”

उस समय तो मैं मात्र मुस्कुराहट ही भेंट स्वरूप दे पाई थी, किंतु घर लौटकर मैंने अपना फैसला ज्ञान को सुना दिया था.

जब मैं घर पहुंची थी, तुम सो चुके थे. तुम्हारा ख़्याल रखने के लिए जिस आया को मैंने रखा था, उसने बताया था कि तुम सोने से पहले बार-बार मुझे पुकार रहे थे. आज पहली बार तुम बिना मेरी लोरी के सोए थे. तुम्हारे पास लेटकर जब मैं तुम्हारे बालों को सहला रही थी, तो तुम्हारे गालों पर आंसुओं की एक रेखा ठहरी हुई मिली. आत्मग्लानि से मेरा मन रो उठा था. ज्ञान के कुछ पल के सानिध्य ने मुझे मेरे बच्चे के प्रति बेपरवाह कर दिया था, तो उसके मेरे जीवन में आ जाने पर कहीं मैं अपने बच्चे को पूरी तरह से उपेक्षित न कर दूं. मैं जानती थी कि ऐसा सोचना अतिशयोक्ति थी, किंतु मैंने चुनाव कर लिया था. एक मां ने एक प्रेमिका को पराजित कर दिया था. मेरी इच्छा का सम्मान करते हुए एक बार पुनः वह मेरे जीवन से चला गया था.

समय दौड़ता रहा और तुम प्रगति के पथ पर बढ़ते गए. इतना आगे बढ़ गए कि मां कहीं पीछे छूट गई. साल में एक बार जर्मनी से आते हो और पूरे महीने इस देश की बुराइयां मुझे गिनाते रहते हो. 25 वर्ष की छोटी-सी आयु में जो सफलता तुमने हासिल की है, सभी उसकी मिसालें देते हैं. प्रसन्न मैं भी हूं और अकेली भी हूं.

तुम्हारे एक फोन के लिए घंटों इंतज़ार करती हूं. तुम्हें याद है, तुम पहले कितनी बातें किया करते थे. जब तक सारी बात मुझे बता न दो, तुम्हें नींद नहीं आती थी. मैं तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त थी, किंतु अब तुम्हारे पास मुझसे शेयर करने लायक कुछ भी नहीं था. मैं अपने दोस्त को मिस करती थी. तुम्हें याद तो होगा कि एक शाम मैंने तुम्हें फोन किया था. असमय फोन करने के लिए तुम नाराज़ भी हुए थे. मैंने तुम्हें अपने प्रमोशन के बारे में बताने के लिए फोन किया था, किंतु तुम अपने दोस्तों के साथ इतने बिज़ी थे कि अपनी मां को ठीक से बधाई भी नहीं दे पाए और जब अगले दिन मैंने शिकायत की, तो तुम कैसे भड़क गए थे, “मां! आप यह बार-बार फोन की बात मत किया करो. कितनी बात करूं आपसे? आप जॉब से छुट्टी लेकर बाहर क्यों नहीं जातीं. बाहर जाओ, दुनिया घूमो. कितना कुछ है देखने और करने को. अब आप वे सभी ख़्वाहिशें पूरी कर सकती हैं, जो कभी अधूरी रह गई थीं और प्लीज़ उम्र की बात न करें. 48 वर्ष की आयु में अपनेआप को आप बूढ़ी कह रही हैं, यहां 90 वर्ष के बुज़ुर्ग दुनिया घूम रहे हैं.”

तुम्हारी इस बात से प्रेरित होकर मैंने तुम्हारे पास जर्मनी आने की इच्छा ज़ाहिर की, तो कितनी निर्ममता से तुमने मना कर दिया था.

“आप इतनी दूर अकेली ट्रैवल नहीं कर पाओगी. मै अंडमान के हेवलॉक आइलैंड की बुकिंग करा देता हूं. समंदर के पास के रिसॉर्ट की बुकिंग करा रहा हूं. चाहो तो रात में भी वहां बैठ पाओगी. आपको तो वैसे भी समंदर के पास बैठना बहुत पसंद है.”

जो मां अकेली इस संसार में तुम्हारी ढाल बनकर रही, तुम उस मां को एक सफ़र का डर दिखा रहे थे, किंतु मैं चली गई थी. सागर के प्रति मेरा लगाव तुम्हें याद था और मेरे लिए यह बहुत था. तब कहां जानती थी कि चतुर नियति मुझे पुनः छलने को तैयार बैठी है.

सागर के किनारे स्थित वह रिसॉर्ट वाकई में सुंदर और सुरक्षित था. रात के खाने के बाद सागर के पास पड़ी हुई कुर्सियों में से एक पर बैठकर मैं लहरों के शोर का आनंद लेने लगी थी. तभी ऐसा लगा, जैसे एक आकृति मेरे निकट आकर सहसा थम गई हो. रात की नीरवता में सागर के शोर के मध्य एक अनजान के सानिध्य से मैं घबरा गई थी, किंतु उस स्वर की कोमलता ने मुझे बांध लिया था. उस कंठ को न पहचान पाऊं, मैं इतनी मूर्ख नहीं थी. वह ज्ञान ही था.

मध्यरात्रि तक हमारी ख़ामोशियां संवाद करती रहीं. मैं चलने को हुई, तो उसने इशारे से रुकने को कहा और बोला, “दिल की आख़िरी गली में तुम्हारे आने, फिर लौट जाने के क्रम में, तुम्हारे कदमों के जो निशान बने थे, वो आज भी, साफ़, सुंदर और सुरक्षित हैं.”

विरह के बाद का प्रेम और तीव्र होता है. आज यह कहने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं कि वे दस दिन मेरे जीवन के अत्यधिक सुंदर दिन थे. प्रेम वह शब्द है, जिसकी व्याख्या असंभव है, पर इसमें जीवन छुपा है. जीने की चाह छुपी है. कभी डर, तो कभी निडरता है. कभी समर्पण, तो कभी अलगाव है. इस आयु में पुनः प्रेम और उस प्रेम के लिए समाज से लड़ पाने की कल्पना भी हास्यास्पद लगती है, किंतु यदि साथी ज्ञान जैसा हो, तो उसके समर्पण के सम्मुख हर बाधा नतमस्तक हो जाती है.

मैं इस बार उसकी दस्तक पर द्वार खोलकर उस स्नेह का संपूर्ण सम्मान और प्रेम से स्वागत करना चाहती थी. मुझे लगा था कि मेरा सखा, मेरा बेटा अपनी मां को समझेगा, किंतु तुमने न केवल अपनी मां की भावनाओं का अपमान किया, बल्कि उसके त्याग और परवरिश पर भी प्रश्‍न उठाया.

यह भी पढ़ेदोराहे (क्रॉसरोड्स) पर खड़ी ज़िंदगी को कैसे आगे बढ़ाएं? (Are You At A Crossroads In Your Life? The Secret To Dealing With Crossroads In Life)

अधृत! क्या तुम्हें पता है, मैंने तुम्हारा नाम अधृत क्यों रखा? अधृत अर्थात् वह जिसे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है, किंतु जो दूसरों की सहायता के लिए सदा उपस्थित होता है. भगवान विष्णु के सहस्रों नामों में से मैंने तुम्हारे लिए यह नाम इसलिए चुना, क्योंकि मैं चाहती थी तुम में इन गुणों का समावेश हो.

किंतु कल जब फोन पर मैंने अपना निर्णय तुम्हें बताया, तो  तुम्हारे शब्दों में मिश्रित नफ़रत और असहयोग सुनकर मुझे भान हुआ कि मैं संभवतः वास्तविकता में तुम्हारे अंदर किसी भी तरह की भावना प्रवाहित करने में हार गई थी.

अधू! मेरे बच्चे… एक मां के रूप में मैं सदा तुमसे प्रेम करती रहूंगी, किंतु गर्व! गर्व तब करूंगी, जब तुम अपने नाम की सार्थकता को न केवल समझ लोगे, वरन उसे अंगीकार कर लोगे. मैंने तुम्हें एक भ्रूण से शिशु, फिर बालक, बालक से किशोर और किशोर से पुरुष बनते देखा है. आज आशा करती हूं कि शीघ्र ही तुम्हें वह पुरुष बनते हुए देखूं, जो स्वार्थ का चश्मा उतारकर परमार्थ और प्रेम को देख पाए.

मैं निर्णय ले चुकी हूं! इस जीवन में संभवतः पहली बार स्वयं के लिए आगे बढ़ी हूं. यदि मेरा सखा साथ होगा, तो मेरी ख़ुशी बढ़ जाएगी. अगर ऐसा कर पाओ, तो जल्द मिलेंगे, तुम्हारी मां के विवाह में.

  पल्लवी पुंडीर

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- झूले हिंडोले (Short Story- Jhoole Hindole)

अटैचमेंट नाम की चीज़ उमेश में नहीं है. जब से शादी हुई, उसने उसके अंदर एक अलग ही एटीट्यूड देखा है. उमेश को वह क़सूरवार ज़्यादा नहीं मानती, क्योंकि जानती है कि उसकी परिस्थितियों ने उसे ऐसा बना दिया है, पर वह उसे कितनी बार समझा चुकी है कि अब सब कुछ बदल चुका है.

Hindi Kahani

कभी-कभी जब वह बचपन की खट्टी-मीठी यादों का पिटारा खोलकर बैठ जाती, तो उसके मन में जैसे हिलोरें उठने लगतीं. उस समय वह पिटारे में से एक-एक कर भूली-बिसरी स्मृतियों को निकालते हुए इतनी मग्न हो जाती कि आसपास क्या घट रहा है, इसकी सुधबुध ही खो बैठती. उमेश उससे कुछ पूछ रहे होते और वह स्मृतियों के हिंडोले में झूल रही होती. उसे उस समय उमेश की आवाज़ की बजाय बसंती हवा की गुनगुनाहट सुनाई दे रही होती, गौरैयों की चहचहाहट सुनाई दे रही होती, धूप में सूखती अचार-बड़ियां और मां का सेवइयां तोड़ना याद आ रहा होता. भाई का चोटी पकड़कर खींचना और बात न मानने पर जिज्जी का अपने बड़े-बड़े नाख़ूनों को दिखाकर डराना याद आ रहा होता. उन क्षणों में उसे एहसास ही नहीं होता था कि एक मीठी-सी मुस्कान उसके होंठों पर खिल आई है… तंद्रा तब भंग होती, जब उमेश ज़ोर से उसका कंधा झिंझोड़ उसे हिंडोले से नीचे ही गिरा देते.

“पुरानी बातों को अब भी क्यों याद करती रहती हो. जो बीत गया, सो बीत गया, लेकिन तुम हो कि न जाने कौन-से काठ-कबाड़ निकालकर उन्हें दोबारा संजोकर रखती रहती हो. सच में, मुझे तो लगता है कि मैंने किसी पढ़ी-लिखी गंवार से शादी की है.” उमेश भड़क उठते. वह घबराकर अपने पिटारे में ताला लगा देती और उसे मन के भीतर ऐसे लपेटकर रख देती मानो ज़रा-सा भी सुराख रह गया, तो उसकी स्मृतियां उसमें से सरक जाएंगी. वह इतनी सावधानी से कभी अपने ज्वेलरी बॉक्स को भी नहीं संभालती थी, जितना कि यादों के पिटारे को.

“उमेश, ये मेरी वे यादें हैं, जिन्हें मैंने जीया है. ये काठ-कबाड़ नहीं हैं. मैं यह नहीं कहती कि अतीत की परछाइयों के साथ जिओ, पर वे पल जो गुज़र गए हैं, वे ख़ुशियों से भरे थे. वे बातें, वे घटनाएं, जिनके बारे में सोचते ही होंठों पर हंसी थिरक जाए, उनके बारे में अगर कभी-कभार बात कर ली जाए, तो वे ज़िंदगी में रंग भर देती हैं. वैसे भी किससे बात करूं. न ही तुम्हारे पास मेरे लिए व़क्त है और न ही बच्चों के पास. इसी यादों के पिटारे को जब-तब निकालकर कुछ पल ख़ुश हो लेती हूं. ऐसा लगता है कि उन बीते लम्हों के साथ मैं संवाद कर पा रही हूं.” कहते-कहते वह भावुक हो उठती.

“इन भावनाओं के साथ जीने का कोई फ़ायदा नहीं है. बाहर निकलो इन भावनाओं के पिंजरे से हरीतिमा.” उमेश उकताकर उसके पास से उठ जाते. आख़िरकार उस जैसी औरत को झेलना क्या आसान काम था.                                                                                        हर चीज़ को फ़ायदे-नुक़सान से माप-तौलकर देखना उमेश की प्रवृत्ति थी. वह हमेशा जोड़-तोड़ में ही लगा रहता. वह कमाती है, इसलिए वह उसे सह रहा है.

जाने-अनजाने इस बात का एहसास उसे वह बरसों से कराता आ रहा है और कहीं वह उसके सिर का ताज बनने की कोशिश न करे, पैरों की जूती ही बनी रहे, इसलिए यह भी जतलाता है कि उसकी कमाई से उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. वह जब चाहे नौकरी छोड़ सकती है. वह उसे रोटी की कमी नहीं होने देगा.

यह भी पढ़ेपति-पत्नी के रिश्ते में भी ज़रूरी है शिष्टाचार (Etiquette Tips For Happily Married Couples)

हंसने के सिवाय हरीतिमा के पास और कोई विकल्प नहीं है. उमेश के चेहरे पर छाई तिलमिलाहट पर चढ़ी त्योरियां, शायद उसके चेहरे पर हमेशा के लिए फिट हो चुकी थीं और उस समय देखते ही बनती थीं. उसे समझाना बेकार है कि एक पत्नी को पति से रोटी के अतिरिक्त भी कुछ अपेक्षाएं हो सकती हैं. एक पत्नी पति से प्यार और थोड़ा-सा सम्मान चाहती है. कुछ देर उसके पास बैठकर उसके दिल की बातें सुन ले और यह आश्‍वासन दे दे कि मैं तुम्हारे साथ हूं. बस, हरीतिमा ने भी यही चाहा था. उसके पीछे छूटे रिश्तों और स्मृतियों को सहेजे नहीं, लेकिन कम-से-कम मज़ाक भी न उड़ाए. उसका ऐसा चाहना क्या बहुत ज़्यादा एक्सपेक्ट करने के ब्रैकेट में आता है.

उमेश अक्सर कहता है, “तुम्हारी उम्मीदें ज़रूरत से ज़्यादा हैं. आगे बढ़ो और ज़िंदगी को बिंदास होकर जिओ. जैसे चल रहा है चलने दो, उसे बदलने की कोशिश मत करो. क्या हमेशा रिश्तों को जीने की बात करती रहती हो. मुझे देखो सालों बीत गए, कभी जाता हूं भोपाल या ग्वालियर अपने भाई-बहनों से मिलने. एंजॉय करो लाइफ को, बाई हुक और बाई क्रुक.”

उमेश की समय से दो क़दम आगे चलने की ललक उसे कंपा जाती. कई बार उसे प्रतीत होता है कि उमेश ने अपने चारों ओर असंख्य जाले बुन डाले हैं. वैसे ही जैसे मकड़ी के जाले होते हैं, जिसमें कोई फंस जाए, तो निकलना मुश्किल हो जाता है. विडंबना तो यह है कि उमेश ख़ुद ही अपने बुने जालों में निरंतर फंसते जा रहे हैं. “तुमसे बात करने और यहां तक कि पास आने में डर-सा लगने लगा है.” एक दिन हरीतिमा ने न जाने किस धुन में कह दिया था.

सुनते ही उमेश भड़क उठा था, “क्यों? क्या मैं कैक्टस हूं, जिसे छूने से तुम्हारी उंगलियां लहूलुहान हो जाएंगी? समझती क्या हो अपने आपको? हो क्या तुम सिवाय एक सेंटीमेंटल फूल के? जब देखो यादों और रिश्तों में जीती रहती हो. बचपन बीत गया, पर कहती हो वे यादें ठंडी-ठंडी फुहारों की तरह तुम्हें भिगो देती हैं. ठंडी फुहारें… फिल्मी जीवन जीना पसंद करती हो तुम तो…”

अटैचमेंट नाम की चीज़ उमेश में नहीं है. जब से शादी हुई, उसने उसके अंदर एक अलग ही एटीट्यूड देखा है. उमेश को वह क़सूरवार ज़्यादा नहीं मानती, क्योंकि जानती है कि उसकी परिस्थितियों ने उसे ऐसा बना दिया है, पर वह उसे कितनी बार समझा चुकी है कि अब सब कुछ बदल चुका है. उसके जीवन में प्यार और भरोसा करनेवाली उसकी पत्नी है, बच्चे हैं, पर उमेश अब भी अपने में ही सिमटा रहता है. मां-पिता के बचपन में ही गुज़र जाने के बाद उमेश ने जो तकली़फें झेलीं और रिश्तेदारों ने भरोसा तोड़ा, उससे उसके अंदर भरी कड़वाहट अभी तक बाहर नहीं निकली है. सबसे छोटा होने पर भी भाई-बहनों ने उसकी परवाह नहीं की. आख़िर उनकी भी अपनी समस्याएं थीं. संघर्षों से लगातार जूझते रहने के कारण सेंटीमेंट्स तो क्या बचते उमेश में, सहजता भी बाक़ी न रही उसमें.

हरीतिमा और बच्चों का प्यार व भरोसा पाने के बाद भी उमेश के भीतर जमा आक्रोश आज तक बाहर नहीं निकला है. केंचुल से तो उसे ख़ुद ही बाहर निकलना होगा. हरीतिमा के लाख चाहने या प्रयास करने से क्या होगा. उमेश के जो मन में आता है, उसे सुना देते हैं. बच्चे भी उस समय उसके उफ़नते ग़ुस्से के आगे कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पाते थे. जानते थे कि कुछ कहा, तो वे भी उस आग में झुलस जाएंगे. सच है कि वह भावुक है, इसीलिए तो आज भी उन तमाम रिश्तों को निभा पा रही है. वह भी उमेश की तरह हमेशा नुकीले पत्थरों पर कदम रखकर चलती, तो कभी भी रिश्तों की राह तय नहीं कर पाती. पीहर हो या ससुराल, हर रिश्ता उसने संभाला हुआ है. जब बच्चे छोटे थे, तो हर जगह उन्हें अपने साथ ले जाती थी, पर अब वे अपनी व्यस्तताओं के कारण कहीं जा नहीं पाते हैं और अब उनकी उम्र भी ऐसी है कि ज़बर्दस्ती नहीं की जा सकती.

उमेश को दोस्तों का साथ तो पसंद है, पर रिश्तेदारी में आना-जाना नहीं. चाहे अपने ही भाई-बहन के यहां क्यों न जाना हो. कभी फोन पर भी उनसे बात नहीं करता. और उसके चाहे भाई-बहन हों या अन्य रिश्तेदार, यहां तक कि दूर के

मामा-बुआ भी, रिश्तों का सोंधापन अभी भी क़ायम है. कितने महत्वपूर्ण होते हैं ये रिश्ते… उमेश समझते ही नहीं या समझना ही नहीं चाहते. भगवान का शुक्र है कि आज तक उन्हें किसी की ज़रूरत नहीं पड़ी, पर कभी कुछ ऊंच-नीच हो गई, तो ये अपने ही काम आएंगे.      अंकिता और पारित के आपसी प्यार और तक़रार को देखती है, तो सोचती है कि आज एक-दूसरे के बिना न रहनेवाले ये भाई-बहन क्या बड़े होकर अपनी इन खट्टी-मीठी यादों का मज़ाक उड़ाएंगे. क्या ये भी एक दिन अपने इस प्यार और तक़रार को भूल जाएंगे. इनके बीच भी संवेदनहीनता पसर जाएगी और जब अंकिता विवाह कर चली जाएगी, तो अपने भाई के साथ बिताए इन पलों को भूल जाएगी. बचपन की स्मृतियों के हिंडोले में झूलना क्या उसे मूर्खतापूर्ण बात लगेगी या फिर पारित ही अंकिता के नटखटपन, उसे घोड़ा बनाने या राखी पर ज़िद कर मनचाहा उपहार लेना आउटडेटेड होना मानेगा… स्मृतियों पर आख़िर धूल क्यों जमने दी जाती है? क्या ज़रूरत है यह सब तमाशा करने की?

“मैं तो तुम्हारी मम्मी के कितने ही चाचा-फूफा को जानता नहीं. कोई पार्टी की ज़रूरत नहीं है, चलेंगे किसी होटल में डिनर करने बस.” उमेश ने भड़कते हुए कहा.

उनकी शादी की बीसवीं सालगिरह थी और बच्चे ज़िद कर रहे थे कि एक बड़ा-सा आयोजन किया जाए और इसी बात को लेकर उमेश को घोर आपत्ति थी.

यह भी पढ़ेक्या आप भी 2, 11, 20 और 29 को जन्मे हैं, तो आपका रूलिंग नंबर है- 2 (Numerology Number 2: Personality And Characteristics)

“नहीं पापा, इस बार तो आपको मानना ही पड़ेगा. इट्स गोइंग टू बी फन.” पारित अड़ गया था. “हां पापा, कितना समय हो गया है आपके फैमिली मेंबर्स से मिले? फेसबुक और व्हाट्सऐप पर चैट करने से मज़ा नहीं आता है. मिलने का मज़ा तो कुछ अलग ही होता है और आप तो ले जाने से रहे हमें उनके यहां.”

उमेश की त्योरियां चढ़ गईं. चेहरे पर कठोरता और गहरी हो गई. पर इस बार जैसे बच्चे उसके व्यवहार को सहन करने को तैयार नहीं थे. वैसे भी बच्चे उसे ‘बोर इंसान’ कहा करते थे. अचानक पारित ज़ोर से बोला, “आपकी प्रॉब्लम क्या है पापा? आप ख़ुश क्यों नहीं रह सकते? आपकी वजह से घर का माहौल हमेशा बोझिल रहता है. हमें घर में अपने फ्रेंड्स को बुलाने में डर लगता है. इससे तो अच्छा है कि आप हमारा गला घोंट दो.”

सन्नाटा सा छा गया.

“ज़्यादा बकवास करने की ज़रूरत नहीं है.” उमेश चिल्लाया. हालांकि उसकी तनी त्योरियां थोड़ी ढीली पड़ गई थीं. “मैंने कह दिया, तो बस यही फाइनल है और बहस नहीं चाहिए मुझे इस विषय पर.”

“तो ठीक है, मेरा भी फैसला सुन लीजिए पापा, अब मैं आपके साथ नहीं रहूंगा, चला जाऊंगा कहीं भी…”

इतना आक्रोश देखकर उमेश हैरान रह गया. आज तक बच्चों ने कभी उसे उल्टा जवाब नहीं दिया था.

“ऐसा क्यों कह रहे हो तुम बेटा, पर मैं भी क्या करूं? मैं ऐसा बन गया हूं.” उमेश की आवाज़ में कंपन महसूस किया हरीतिमा ने. आंखों में नमी थी.

“जब 10 साल का था, पैरेंट्स गुज़र गए. बड़े भाई-बहन भी बहुत ज़्यादा बड़े नहीं थे. रिश्तेदारों ने सारी प्रॉपर्टी हड़प ली और हम लोगों को अपने-अपने तरी़के से संघर्ष करना पड़ा. 20 साल का था, जब शहर चला आया. जो काम मिला किया.

भाई-बहनों से संपर्क टूट गया और लोगों पर से विश्‍वास तो पहले ही उठ गया था, इसलिए अटैचमेंट जैसी भावना से अपने को दूर कर लिया. बस, कमाने की धुन लग गई, ताकि फिर से रोटी के लिए किसी का मुंह न ताकना पड़े, शायद इसीलिए इतना रूखा हो गया. याद नहीं मैं पिछली बार कब हंसा था.”

“पर पापा, अब तो सब बदल गया है. हम आपके साथ हैं, आपसे प्यार करते हैं. फिर कड़वी यादों को भुला क्यों नहीं देते? मम्मी और हम दोनों तो आपके साथ हंसना चाहते हैं, खुलकर जीना चाहते हैं. क्या बहुत ज़्यादा है आपके लिए, यह सब देना…” पारित और अंकिता उमेश के गले लग गए. पहली बार बिना किसी खौफ़ या हिचक के. हरीतिमा ने प्यारभरी नज़रों से उमेश को देखा, मानो कह रही हो, उमेश जी लो आज के सुखों को.

उस दिन अपने भाई-बहनों, भतीजों और कजिन्स को देखते ही उमेश के चेहरे पर छाई रहनेवाली तिलमिलाहट और ‘मुझे परवाह नहीं’ वाली परत न जाने कहां गायब हो गई थी. शुरू में झिझका, झुंझलाहट भी थी और औपचारिकता का भाव भी. आसान नहीं था उसके लिए सहज बने रहना, पर पारित और अंकिता उसके साथ खड़े रहे. कुछ समय बाद उमेश के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान तैर गई. सब कुछ मानो क्षणिक था.

अपने भाई-बहनों से मिलते ही मानो संवेदनशीलता का कोई झरना बह उठा. आंखें भी नम हो गई थीं. उमेश में भी फीलिंग्स हैं, तो क्या ‘एचीव’ करने की चाह में वे कहीं दफ़न हो गई थीं. अन्य मेहमानों के जाने के बाद देर रात जब वह अपने भाई-बहनों के साथ बैठा, तो यादों के न जाने कितने पिटारे खुल गए.

बीती बातों को याद कर वह इतना हंसा कि वह ही नहीं, बच्चे भी उसे हंसता देख हैरान रह गए. अपने बचपन के सुखद पलों को जीने लगा वह. यहां तक कि रिश्तेदारों के बीच मज़ाक की फुलझड़ियां उसने छोड़ीं. छेड़छाड़ और मस्ती के अनेक अनार जलाए, मानो वह बरसों से दबी अपनी भावनाओं को आज खुलकर बाहर लाना चाहता हो. ऐसा लगा, जैसे वह भी स्मृतियों के हिंडोले में झूलने का आनंद ले रहा है.

धरती की तपिश जब बारिश की तेज़ बौछारों से बाहर आती है, तो पहले एक गरम एहसास से भर देती है, जो बहुत असहज कर देता है, पर फिर हर तरफ़ मिट्टी की सोंधी सुगंध फैल जाती है. उमेश ने भी जैसे उसी सुगंध को महसूस कर लिया था. कब सुबह हुई, पता ही नहीं चला. स्मृतियों पर जमी धूल कब की साफ़ हो चुकी थी.

“हरीतिमा, क्यों न कुछ दिनों के लिए कहीं घूम आएं. बच्चे तो अब अकेले रह सकते हैं. कितना व़क्त हो गया है, तुम्हारे साथ अकेले समय बिताए. एक बार फिर से हमें एक-दूसरे को जानने का मौक़ा मिल जाएगा.” उमेश ने उसका हाथ थामते हुए कहा. उसने हैरानी से उमेश को देखा. न चेहरे पर तिलमिलाहट थी, न ही त्योरियां चढ़ी हुई थीं. आंखों में प्यार और छुअन में सम्मान का एहसास हुआ उसे. जिस संवेदनहीनता ने उनके रिश्ते में दरार और शुष्कता ला दी थी, उसकी जगह उस कोमलता ने ले ली थी, जो रिश्ते को पैनेपन और कंटीला होने से बचाती है. हरीतिमा ने सहमति से सिर हिला दिया.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- नॉमिनी (Short Story- Nominee)

“मैंने पुनीत और नूपुर को आड़े हाथों लिया कि उनके पापा को कितना दुख होगा कि उनकी वजह से नूपुर का प्रमोशन रुक गया. ये बच्चे कुछ समझते ही नहीं हैं.” मैं भावविभोर निर्निमेष नेत्रों से जीजी को देखे जा रही थी. “… वैसे नासमझ तो मैं भी कुछ कम नहीं थी. अपने ही दुख में डूबी रही. यह समझने का प्रयास ही नहीं किया कि मैंने अपना पति खोया है, तो बच्चों ने भी तो अपने स्नेहिल पिता को खोया है.”

 Kahani

एक महीने के विदेश प्रवास से लौटते ही मन जल्द से जल्द सविता जीजी से मिलने को व्याकुल हो उठा. रात को सोते समय निश्‍चय किया कि सवेरे जल्दी सभी काम निबटाकर टैक्सी से निकल जाऊंगी. पूरा दिन जीजी के साथ ही बिताऊंगी. जाने कैसी होंगी जीजी अब? चार महीने होने को आ रहे हैं. जीजाजी के जाने का ग़म भुला पाई होंगी या नहीं? ‘हे ईश्‍वर, जीजी को इस आकस्मिक विपदा को सहने की शक्ति दो…’ मेरे होंठ अपनी इन दिनों की नित्य की प्रार्थना में बुदबुदा उठे थे. क्लांत शरीर बिस्तर पर आराम कर रहा था. पर व्याकुल मन फड़फड़ाता विगत के घटनाक्रम में विचरण करने निकल पड़ा था.

जीजाजी के अचानक हृदयाघात से गुज़र जाने के बाद जीजी को संभालना हम सब परिवारजनों के लिए बहुत मुश्किल होता जा रहा था. दोनों की 52 वर्षों की राधाकृष्ण सी जोड़ी को जब हम नहीं भूल पा रहे थे, तो जीजी से उम्मीद करना व्यर्थ था. उनके शोक का सचमुच कोई पारावार न था. उनकी तो पूरी दिनचर्या ही जीजाजी के इर्दगिर्द घूमती थी. साथ उठना-बैठना,

खाना-पीना, सोना, बतियाना, घूमना, योग करना, पूजा करना, बाज़ार जाना आदि सब कुछ साथ साथ… ज़ाहिर था क़दम-क़दम पर,

मिनट-मिनट पर वे उन्हें मिस कर रही थीं. 15 दिन बीतते-बीतते घर रिश्तेदारों से खाली हो गया और महीना होते-होते तो लोगों की आवाजाही भी बंद हो गई थी. मैं चूंकि इसी शहर में हूं, तो बहू नूपुर ने मुझसे रोज़ आ जाने का आग्रह किया था.

‘मौसीजी, आपको तकलीफ़ तो होगी, पर नित्य कुछ घंटे आप मम्मीजी के पास बैठी रहेंगी, तो उन्हें अच्छा लगेगा. अभी अकेले उनका दिल घबरा जाएगा. वैसे भी कल से मुझे स्कूल रिजॉइन करना है.” नूपुर की चिंता वाजिब थी. मैं लगभग रोज़ ही जीजी से मिलने पहुंच जाती थी. जिस दिन नहीं जा पाती थी, फोन पर लंबी बातचीत कर लेती थी. जीजाजी के संग बिताए सुख-दुख के दिन स्मरण करते हुए नित्य ही हम बहनों की आंखें नम हो जाया करती थीं.

“बहुत ज़िंदादिल थे तेरे जीजाजी! समय का लंबे से लंबा अंतराल भी मेरे दिलोदिमाग़ से उनकी स्मृतियों को धूमिल नहीं कर पाएगा. उनके रहते हर दिन उत्सव था. बच्चे-बड़े सबके अज़ीज़ थे वे! विभू को चाहे होमवर्क करना हो, चाहे शतरंज खेलना हो, उसे दादाजी ही साथ चाहिए होते थे. आए दिन पार्टी करते रहते थे वे. आज बेटे को इंक्रीमेंट मिला है सब होटल चलेंगे, बहू की बीएड हो गई है सबको मेरी ओर से डिनर, मेरी पेंशन बढ़ी है सब घूमने चलेंगे, विभू के 90 प्रतिशत अंक आए हैं उसके सब दोस्तों को पार्टी… खाने-खिलाने का इतना शौक! मैं कभी टोक भी देती, तो चुटकियों में मेरी आशंकाओं को निर्मूल साबित कर देते, “सविता, ज़िंदगी का क्या भरोसा? सब यहीं छोड़कर जाना है. जीते जी जितना अपने हाथों से दे जाएं, ख़र्च कर जाएं अच्छा है.”… और अब देखो, घर भर में सन्नाटा पसरा है. दिवाली जैसा बड़ा त्योहार भी कब आया और कब चुपके से निकल गया पता ही नहीं लगा. वे थे तो हर दिन दिवाली थी, उत्सव था. इस घर से वे अकेले विदा नहीं हुए हैं कविता, मुझे तो लगता है इस घर की ख़ुशियां भी उनके साथ हमेशा-हमेशा के लिए विदा हो गई हैं. मेरी तो जीने की चाह ही ख़त्म हो गई है.” जीजी की सुबकियां रूदन में तब्दील हो जातीं, तो मैं उन्हें ढांढ़स बंधाने लगती.

यह भी पढ़ेरिश्तों में मिठास बनाए रखने के 50 मंत्र (50 Secrets For Happier Family Life)

“ऐसे नहीं कहते जीजी. आपको अपने लिए, इन बच्चों के लिए जीना होगा. देखो न सब कितने चुप-चुप रहने लगे हैं. हर व़क्त हंसता-चहकता घर कितना वीरान हो गया है. आपको ख़ुद को, बच्चों को सबको संभालना होगा. जीजाजी के न रहने से आपकी ज़िम्मेदारी तो और बढ़ गई है. जो चीज़ हमारे वश में नहीं, उसका क्या किया जा सकता है?”

नूपुर इस बीच ज़बरन कभी चाय-नाश्ता, तो कभी खाना रख जाती. साथ ही मुझे इशारा कर जाती कि मैं किसी तरह वो सब जीजी को खिला दूं. इस बीच यदि स्कूल से या खेलकर हंसता-कूदता लौटा विभू हमारे सामने पड़ जाता, तो एकदम चुप हो जाता. चुपचाप मेरे चरण स्पर्श कर वह अंदर घुस जाता और फिर पूरा समय सामने आने से कतराता रहता. भांजे पुनीत से आमना-सामना होता, तो वह भी औपचारिक कुशलक्षेम पूछ इधर-उधर हो जाता. मेरा दिल रो उठता. इस घर की ख़ुशियों को सचमुच जाने किसकी नज़र लग गई है.

इस बीच बेटी श्रुति की प्रसूति के लिए विदेश जाना पड़ गया, तो मैं जाने की तैयारी के कारण कुछ दिनों तक जीजी के पास जा ही नहीं पाई, पर फोन पर बात बराबर कर लेती थी.

“रात में नींद बराबर आई जीजी?… पाठ कर लिया? हां, तैयारी चल रही है. आप भी मेरे साथ थोड़े दिन श्रुति के पास चले चलो. आपको चेंज हो जाएगा और मुझे भी मदद रहेगी. आप हां करो, तो आज ही टिकट का बोल दूं.”

“अरे नहीं, कहां आऊं-जाऊं? अभी तो रोज़ ही मुझे यहां कई पेपर साइन करने पड़ रहे हैं. बैंक अकाउंट में नॉमिनी, पेंशन में नॉमिनी, यहां नॉमिनी, वहां नॉमिनी… सुबह-शाम नॉमिनी-नॉमिनी सुनकर कान पक गए हैं मेरे!” उनकी झुंझलाहट भांप एक पल को तो मैं भी फोन पर मूक रह गई थी. फिर मैंने समझाया था, “ये सब काग़ज़ी औपचारिकताएं, तो पूरी करनी ही पड़ेंगी जीजी. वो भी समय रहते. सब आपके भले के लिए ही तो कर रहे हैं. अच्छा कोशिश करूंगी जाने से पूर्व एक बार आपसे मिलकर जाऊं. नहीं तो आते ही मैं भागी चली आऊंगी आपके पास. तब तक अपना ख़्याल रखना और हां, ज़्यादा चिंता मत करना. ज़्यादा-से-ज़्यादा व्यस्त और ख़ुश रहने की कोशिश करना. आप ख़ुश रहोगी, तो ही पुनीत, नूपुर और विभू भी ख़ुश रह पाएंगे, वरना देखो, आपके साथ-साथ उनके भी कैसे चेहरे निकल आए हैं?” अपनी ओर से भरपूर समझाइश के बाद भी मैं जीजी को लेकर आश्‍वस्त नहीं रह सकी थी. इसलिए लौटने के बाद से ही जल्द-से-जल्द जीजी से मिलने को व्याकुल हुई जा रही थी. रात किसी तरह आंखों में कटी.

सवेरे तैयार होते ही निकल पड़ी. जीजी से मिलने की इतनी उत्सुकता थी कि 25 मिनट का रास्ता भी एक युग के समान लग रहा था. एक फल विक्रेता दिखा, तो मैंने टैक्सी रुकवाकर जीजी की पसंद की स्ट्रॉबेरीज़, लीची व शहतूत रखवा लिए. विदेश से लाई चॉकलेट्स मैंने विभू के लिए पहले ही बैग में रख ली थीं.

जीजी के घर के बाहर टैक्सी रुकी, तो जीजी को विभू के साथ बाहर गार्डन में ही बैठे देख मैं सुखद आश्‍चर्य से भर गई. कहां तो मैं जाने से पहले जीजी की मिन्नतें करती थक जाती थी कि चलो न जीजी, थोड़ी देर बाहर बगीचे में बैठते हैं.

“नहीं री, मुझसे नहीं जाया जाएगा. तेरे जीजाजी को बाहर बगीचे में बैठना बहुत पसंद था. हम दोनों समय की चाय वहीं बैठकर पीते थे. साथ अख़बार पढ़ते, पाठ करते, फल खाते, दुनिया जहान की बातें करते. समय कैसे निकल जाता था, पता ही नहीं चलता था.”

“कविता दादी आ गईं.” विभू का चहकता स्वर कानों में पड़ा, तो मेरी चेतना लौटी. टैक्सीवाला पेमेंट के लिए खड़ा था. उसे पैसे देकर, बैग और फलों की डलिया झुलाती मैं गेट में प्रविष्ट हुई और सामान रख जीजी के गले लग गई. रोकते-रोकते भी मूक आंखों ने नि:शब्द आंसू बहा ही दिए, जिन्हें जीजी से अलग होने से पूर्व ही मैंने चतुराई से पोंछ लिया. हालांकि धुली-धुली आंखें अभी भी दिल की चुगली कर रही थीं.

वातावरण को सहज बनाने के लिए मैंने बैग से विभू के लिए लाई चॉकलेट्स निकालीं, तो वह ख़ुशी से मेरे कदमों में झुक गया. उसे ऊपर उठाते मेरी नज़र सामने बिछी शतरंज की बिसात पर पड़ी. “अरे, यह कौन खेल रहा था?”

“मैं और दादी. कविता दादी, आपको मालूम हेै दादी बहुत अच्छा चेस खेलती हैं! दादा से भी अच्छा!” विभू उत्साहित था.

“तू तो दुनिया में बाद में आया रे. पहले मैं और तेरे दादा ही खेला करते थे. मैं स्कूल में ज़िला स्तर पर खेल चुकी हूं. क्यों कविता याद है तुझे?”

“अरे वाह! अब तो मैं आपके साथ

पूरे-पूरे दिन प्रैक्टिस करूंगा और देखना, टूर्नामेंट भी मैं ही जीतूंगा.”

“चल अब अंदर जाकर पहले होमवर्क कर! फिर और खेलेंगे… और हां, रसोई में राधा दीदी से कहना दो कप कड़क मसालेदार अदरकवाली चाय बनाकर दे दे और साथ में पुदीनेवाली मठरी भी.”

“वो दादा की पसंदवाली? जो मम्मी बनाकर गई हैं?”

यह भी पढ़ेक्यों पुरुषों के मुक़ाबले महिला ऑर्गन डोनर्स की संख्या है ज़्यादा? (Why Do More Women Donate Organs Than Men?)

“हां… हां वही.”

मैं हैरानी से सब देख-सुन रही थी.

“यह सब चल क्या रहा है?”

“अरे, कुछ नहीं. विभू के स्कूल में चेस टूर्नामेंट शुरू हो रहे हैं. इसने तो यह सोचकर नाम ही नहीं लिखवाया था कि दादा के बगैर प्रैक्टिस किसके साथ करेगा? मुझे पता चला, तो मुझे बहुत बुरा लगा. ज़रा सोच, जब मुझे इतना दुख हुआ, तो इसके दादा को कितना दुख हुआ होगा. मैंने पुनीत से कहकर न केवल इसका नाम डलवाया, वरन् अब सुबह-शाम इसके साथ खेलकर इसे प्रैक्टिस भी करवा रही हूं.”

“बहुत अच्छा किया जीजी आपने.”

तभी एक लड़की गरमागरम चाय और मठरी रख गई.

“यह कौन है? नूपुर अभी स्कूल से लौटी नहीं क्या?”

“नूपुर तो 15 दिन की ट्रेनिंग के लिए दिल्ली गई है. इस लड़की को पीछे खाना आदि बनाने के लिए रख गई है. मैंने तो कहा था मैं ही बना लूंगी. तीन लोगों के खाने में क्या तो है? पर वह मानी नहीं. सारा काम उसे समझाकर गई है. ढेर सारा सूखा नाश्ता बनाकर रख गई है सो अलग.”

“वैसे काहे की ट्रेनिंग है?” पूछते हुए मैंने एक मठरी तोड़कर मुंह में रख ली थी.

“अरे वाह, मठरी तो बड़ी स्वादिष्ट बनी है!”

“तेरे जीजाजी की पसंद की है. चाय के साथ वे ये ही खाना पसंद करते थे. नूपुर उनके लिए बनाकर रखती थी.”

जीजी कहीं भावुक न हो जाए, यह सोचकर मैंने तुरंत फिर ट्रेनिंग का पूछ लिया.

“कोई ज़रूरी टीचर्स ट्रेनिंग है, जिसे करने पर ही आगे प्रमोशन मिलेगा. तू तो जानती है, तेरे जीजाजी कितने प्रगतिशील विचारों के थे. उनके अनुसार, हर लड़की को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहिए. शादी के बाद नूपुर ने उन्हीं के कहने से बीएड किया और फिर नौकरी भी करने लगी. नूपुर ने तो यह सोचकर कि इस समय मुझे अकेला छोड़ना उचित नहीं होगा, ट्रेनिंग के लिए मना कर दिया था. मुझे किसी ने बताया भी नहीं. वो तो एक दिन सुलेखा भाभी आई थीं. उन्होंने बातों-बातों में बताया कि उनकी बहू, जो नूपुर के साथ है ट्रेनिंग पर जानेवाली है और फिर उसका प्रमोशन भी हो जाएगा. तब मैंने पुनीत और नूपुर को आड़े हाथों लिया कि उनके पापा को कितना दुख होगा कि उनकी वजह से नूपुर का प्रमोशन रुक गया. ये बच्चे कुछ समझते ही नहीं हैं.”

मैं भावविभोर निर्निमेष नेत्रों से जीजी को देखे जा रही थी.

“… वैसे नासमझ तो मैं भी कुछ कम नहीं थी. अपने ही दुख में डूबी रही. यह समझने का प्रयास ही नहीं किया कि मैंने अपना पति खोया है, तो बच्चों ने भी तो अपने स्नेहिल पिता को खोया है. विभू ने सखा समान आत्मीय दादा खोया है. बांटने से दुख घट जाता है और सुख बढ़ जाता है. बच्चे मेरा संबल बनेंगे और मैं उनका, तो ज़िंदगी का सफ़र आसान हो जाएगा.” चाय का अंतिम घूंट भर जीजी ने कप रखा. फिर नज़रें उठाईं, तो उनकी आंखें अचानक चमक उठीं. वे तुरंत उठकर कुछ दूर रखे गमले के पास पहुंच गईं.

“यह बटन रोज़ का पौधा तेरे जीजाजी को अत्यंत प्रिय था. देख, कितने सुंदर-सुंदर नन्हें-नन्हें गुलाब खिले हैं इसमें! जिस दिन इसमें झुंड के झुंड बटन रोज़ खिलते थे, तेरे जीजाजी के चेहरे की चमक और बातों की खनक देखने लायक होती थी… अब तो उनकी बगिया को हरा-भरा रखना ही मेरी एकमात्र आकांक्षा और ज़िम्मेदारी है.” जीजी ने फुर्ती से पास पड़ी खुरपी उठाई और तत्परता से पौधे में खुरपी चलाने लग गईं.

मैं आत्मविस्मृत-सी गर्व से जीजी को निहार रही थी. जीजी काग़ज़ों में ही नहीं असल ज़िंदगी में भी सच्चे अर्थों में जीजाजी की नॉमिनी बन गई थीं.

Anil Mathur

    अनिल माथुर

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- ग़लत फैसला (Short Story- Galat Faisla)

“तुमने अगर एक ग़लत फैसला लिया, तो मैं उस वजह से तुम्हारा साथ नहीं छोड़ सकता. साथ निभाने का वादा किया है, उसे निभाना भी जानता हूं. पर…” आंसुओं से भीगे चेहरे पर छाए ग्लानि के भाव देख मानव ने प्यार से उसके कंधे को थपथपाया.

Kahaniya

फैसला तो दोनों ने ही मिलकर किया था… बिना किसी बाध्यता के, ख़ुशी से… सोच-समझकर, फिर ऐसा क्यों हुआ? वह तो यह भी नहीं कह सकती कि उसके साथ धोखा हुआ था, क्योंकि धोखा देने की शुरुआत तो उसने ही की थी. तो क्या जो हुआ, वह ठीक हुआ? वह यही डिज़र्व करती थी. उसे उम्मीद नहीं थी कि नीलेश उसके साथ ऐसा करेगा. ज़िंदगीभर साथ देने का वादा करनेवाला, प्यार के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहनेवाला नीलेश शायद तब घबरा गया, जब सचमुच कुछ करके दिखाने का व़क्त आया.

कैसी विडंबना है कि इतने लंबे समय से दोस्ती का हाथ थामे रखनेवाला नीलेश उसका उन स्थितियों में साथ छोड़ गया, जब वह ख़ुद अपने ही हाथों से अपनी गृहस्थी उजाड़ चुकी थी. जब वह ख़ुद ही अपने हाथों से विश्‍वास के सारे बंधनों व प्रेम के धागों को तोड़ चुकी थी. यह सच है कि वह नीलेश से प्यार करती है बरसों से यानी अपनी शादी से पहले से. इसे लव एट फर्स्ट साइट कहा जा सकता है. उस उम्र में जब सतरंगी ख़्वाब आंखों में पल रहे होते हैं और मन में एक राजकुमार की छवि अंकित होती है… दिल किसी को देखने भर से धड़कने लगता है और होंठ सूखने लगते हैं, तभी उसने नीलेश को देखा था. उसकी आंखों की चुंबकीय जुंबिश और हंसने के साथ ही खिलते असंख्य चटकीले रंगों में वह उसी पल खो गई थी. पढ़ाई पूरी कर नौकरी की तलाश में थी वह.

अचानक या संयोग कहें, उसे प्यार हो गया था. फिर उनकी कुछ मुलाक़ातें हुईं. कभी मेट्रो में, कभी किसी ऑफिस में, कभी मार्केट में, तो कभी रास्ते में. वह भी नौकरी की तलाश में था. हालांकि वह एक जगह नौकरी कर रहा था, पर किसी बड़ी कंपनी में नौकरी करना चाहता था. वैसे वह ख़ुद का बिज़नेस करना चाहता था. बहुत ही महत्वाकांक्षी था वह. ऊंचे सपने व ऊंचाई तक पहुंचने की चाह उसे उकसाती रहती, इसीलिए वह किसी बड़ी कंपनी में किसी बड़े पद को पाने की कोशिश में लगा था. दूसरों को इम्प्रेस करने की क़ाबीलियत तो थी ही उसमें.

आपस में बातें करते, साथ व़क्त गुज़ारते दोनों को ही महसूस होने लगा कि वे एक-दूसरे के साथ ख़ुशी महसूस करते हैं. उनकी सोच, पसंद और ज़िंदगी के प्रति नज़रिया भी काफ़ी एक-सा था. बस, वह महत्वाकांक्षी नहीं थी. बहुत आसानी से संतुष्ट हो जाती थी. इसी बात पर दोनों में कभी-कभी विचारों का टकराव हो जाता था, अन्यथा दोनों को ही साथ रहना अच्छा लगता था. किसी का साथ अच्छा लगे, तो पूरी ज़िंदगी उसी के साथ गुज़ारने का ख़्याल मन में सहज ही पलने लगता है. उसके मन में यह ख़्याल नीलेश से पहले आया था.

वह उससे कुछ ज़्यादा ही प्रैक्टिकल था. वह पहले अच्छे से सेटल होकर फिर प्यार के बारे में सोचना चाहता था. “मुझे तुम अच्छी लगती हो मयूरी. बहुत अच्छी, पर प्यार करता हूं यह बात अभी पूरे विश्‍वास से नहीं कह सकता हूं. तुम्हारे साथ समय बिताना चाहता हूं. तुमसे मिलने का मन करता है, पर यह प्यार है, यह बात जब मेरा मन स्वीकार कर लेगा, तब पलभर नहीं लगाऊंगा तुम्हें कहने में.”

यह भी पढ़े: कृष्ण जन्माष्टमी 2019: इस बार दो दिन मनाई जाएगी कृष्ण जन्माष्टमी, जानें श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का महत्व-शुभ मूहुर्त-पूजा विधि-आरती (Krishna Janmashtami 2019: Date, Time, Puja Vidhi, Aarti)         

“कमिटमेंट करने से डरते हो?” चिढ़ते हुए बोली थी मयूरी. बिंदास तो वह शुरू से ही थी, इसलिए बोलने में हिचकती नहीं थी.

“तुम अच्छे से जानते हो नीलेश. मैं, यदि या लेकिन में यक़ीन नहीं करती हूं. हां या ना, बस यही दो चीज़ें मायने रखती हैं मेरे लिए. इसीलिए ़फैसला लेने में मुझे देर नहीं लगती. तुम तो प्यार को स्वीकारने में भी अगर-मगर कर रहे हो.”

“ऐसा नहीं है मयूरी. बस, थोड़ा व़क्त दो मुझे. कम से कम इतना कि मेरे पास इतना पैसा हो कि हम एक आलीशान ज़िंदगी जी सकें. सारी सुख-सुविधाएं हों हमारे पास. एक बड़ा-सा बंगला, कार, नौकर-चाकर…”

“यानी लंबे समय तक कमिटमेंट न करने का इरादा है तुम्हारा. नीलेश, मुझे बहुत ज़्यादा की ख़्वाहिश नहीं है. हम दोनों अभी जो कमाते हैं, वह काफ़ी है. फिर धीरे-धीरे मेहनत करके तऱक्क़ी कर लेंगे. लेकिन तुम्हारी प्लानिंग के हिसाब से चले, तो पांच-छह साल लग जाएंगे और तब तक तुम्हें क्या लगता है मेरे घरवाले मेरी शादी के लिए रुकेंगे. वे तो अभी से शोर मचा रहे हैं.”

“मुझसे प्यार करने का दावा करती हो, तो क्या मेरा इंतज़ार नहीं कर सकती?” इमोशनल ब्लैकमेल करने लगा था नीलेश.

“कर सकती हूं, पर अभी तक तुमने प्यार स्वीकारा नहीं है नीलेश. किस भरोसे पर मैं तुम्हारा इंतज़ार करूं? किस यक़ीन पर मैं अपने घरवालों को यह विश्‍वास दिलाऊं कि तुम बीच राह में मेरा साथ नहीं छोड़ोगे.” बहुत लंबी बहस चली थी तब उनके बीच… शायद तब मयूरी के अंदर के वे एहसास भी चटके थे, जो उसने नीलेश के इर्दगिर्द बुने थे. वही तो प्यार करती है नीलेश से! नीलेश ने तो कभी ऐसा नहीं माना. हो सकता है कि वह कुछ पल का साथ ही निभाना चाहता हो.

वैसे भी उसकी महत्वाकांक्षाएं उसे जब-तब डराती रहती थीं. घर में उसकी शादी की बात चलने लगी थी. वही कोई न कोई बहाना बनाकर टालती जाती यह सोचकर या यही मानकर कि नीलेश कुछ दिनों बाद अपने आप हक़ीक़त से रू-ब-रू हो जाएगा और ऊंचे सपनों की उड़ान को विराम दे उसे अपना लेगा. घरवालों से वह लड़ाई कर सकती थी, पर नीलेश को खोने को वह तैयार नहीं थी.

कई बार उसका दिल करता कि उससे कहे कि प्यार करते हो, तो इस एहसास को दबाकर मत रखो. झलकने दो इसे अपने चेहरे पर, लेकिन कह नहीं पाती थी. असल में तो होता यह है कि जब कोई व्यक्ति हमें अच्छा लगने लगता है, तब हम उसकी हर

अच्छी-बुरी बात को भी पसंद करने लगते हैं और विश्‍वास करना इसी पसंद करनेवाली भावना का अगला पड़ाव होता है. लेकिन नीलेश बहुत बार उसकी भावनाएं आहत कर चुका था. उसके मन में आए अविश्‍वास का भान शायद नीलेश को हो गया था.

“किसी से प्यार करो, पर विश्‍वास नहीं… क्या यह संभव है?” एक दिन कह ही दिया था नीलेश ने उससे. वह कांप उठी थी. उसे खोने का डर मयूरी को कंपा गया था. कहीं नीलेश रूठ न जाए. वह कैसे जी पाएगी उसके बिना? “नीलेश, मेरा रिश्ता तय किया जा रहा है. मानव बहुत ही सुलझे हुए इंसान हैं. आईएएस ऑफिसर हैं. मिली थी मैं उनसे. समझ में नहीं आ रहा कि किस आधार पर उन्हें रिजेक्ट करूं? सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी कोई डिमांड भी नहीं है. पापा एक सरकारी अफ़सर हैं. दहेज नहीं दे सकते.” नीलेश के कंधे पर सिर रखकर फफक उठी थी मयूरी. “तो हां कर दो.” नीलेश ने कठोरता से कहा था, तो वह चौंक पड़ी थी.

यह भी पढ़ेरिश्तों में ज़रूरी है टाइम इंवेस्टमेंट (Time Investment Is Most Important For Successful Relationships)

“मेरा मतलब है कि फैसला तुम्हें करना है. मैं तुम पर किसी तरह का दबाव नहीं डालना चाहता. मुझे तो अपने सपनों को पूरा करने में अभी समय लगेगा.”

“और मेरे सपनों का क्या होगा, जो मैंने तुम्हें लेकर देखे हैं?”

“बी प्रैक्टिकल मयूरी. मैं तो कहता हूं कि तुम मानव से शादी कर लो.” हैरान रह गई थी मयूरी. टूट ही गई थी. नीलेश उसके प्यार का इस तरह अपमान करेगा, उसने कभी सोचा नहीं था. उसके प्यार को सीने में दबा उसने मानव से शादी कर ली. इतने अच्छे व नेक दिल पति को पाकर भी वह नीलेश को भूल नहीं पाई थी. बार-बार उसे यही बात कचोटती रहती कि आख़िर नीलेश ने उसे किसी और का कैसे हो जाने दिया. मानव के साथ वह पत्नी धर्म तो निभा रही थी, पर प्यार नहीं कर पा रही थी उसे. नीलेश से धोखा खाने के बाद भी…

शादी को छह महीने हो चुके थे. एक दिन ऑफिस में अपने सामने नीलेश को खड़ा देख सकपका गई थी वह. बढ़ी हुई दाढ़ी, उलझे हुए बाल और हमेशा सलीके से तैयार होनेवाला नीलेश आज अलग ही लग रहा था. लापरवाह ढंग से कपड़े पहने हुए था. चेहरा एकदम बुझा हुआ था. पता लगा कि बेरोज़गार है आजकल.

“तुमसे दूर हो जाने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं. वापस लौट आओ मेरी ज़िंदगी में मयूरी.” सुनकर जहां उसे अच्छा लगा था, वहीं एकबारगी फिर से चौंक गई थी. मज़ाक कर रहा है क्या नीलेश. पहले कहा शादी कर लो और अब चाहता है वह लौट आए. “यह असंभव है.”

“कुछ भी असंभव नहीं. मैंने सब सोच लिया है. दो दिन बाद हम हमेशा के लिए यह शहर छोड़कर चले जाएंगे.” हमेशा से प्रैक्टिकल अप्रोच रखनेवाला नीलेश आज कैसी बातें कर रहा है.

“कहां जाएंगे, कहां रहेंगे? मेरी नौकरी का क्या होगा? फिर तुम बेरोज़गार हो. मैं शादीशुदा हूं. मानव से क्या कहूंगी? समाज क्या कहेगा? अब बहुत देर हो चुकी है नीलेश.”

“फिर भी परसों रेलवे स्टेशन पर मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगा. तुम मुझसे प्यार करती हो, इसलिए तुम आओगी, मैं जानता हूं.”

मानव के नाम एक ख़त लिख वह चली आई थी. फिर एक बार धोखा दिया था नीलेश ने उसे. कमिटमेंट करे ऐसी फ़ितरत उसमें थी ही कहां. क्या करे वह…? किस मुंह से वापस जाए. खड़ी रही वह रेलवे स्टेशन पर. बेबस व अपने को कोसते हुए ग्लानि में डूबी हुई.

ट्रेनें आती-जाती रहीं. प्लेटफॉर्म खाली होता, भर जाता. भीड़ और शोर के बावजूद वह ख़ुद को नितांत अकेला महसूस कर रही थी.            तभी सामने से मानव को आते देखा, तो अपनी आंखों पर विश्‍वास नहीं हुआ.

“घर वापस चलो.” अधिकार से हाथ थामते हुए मानव बोले. नज़रें झुक गई थीं मयूरी की. शरीर कांप रहा था. कैसे जा सकती है वह घर वापस…

“तुमने अगर एक ग़लत फैसला लिया, तो मैं उस वजह से तुम्हारा साथ नहीं छोड़ सकता. साथ निभाने का वादा किया है, उसे निभाना भी जानता हूं. पर…” आंसुओं से भीगे चेहरे पर छाए ग्लानि के भाव देख मानव ने प्यार से उसके कंधे को थपथपाया.

“नीलेश एक छलावा था मयूरी. असल में जब उसने तुम्हें धोखा दिया था, तभी से तुम्हारे अंदर उसके लिए अंकुरित प्यार के पौधे कुम्हला गए थे. बस, उसके द्वारा ठुकराए जाने की पीड़ा लिए जीए जा रही हो और वही पीड़ा तुम्हें आज यहां खींच लाई. कुछ नहीं सोचा सिवाय इसके कि उसने तुम्हारे प्यार को क़बूल कर लिया. लेकिन वह कायर तुम्हारे प्यार के क़ाबिल है ही नहीं.”

“मैं तुम्हारे क़ाबिल भी तो नहीं. तुम्हारे जैसे अच्छे इंसान को मैंने भी तो धोखा दिया है.”

“इसे धोखा नहीं, भूल कहते हैं. और आप जिसे प्यार करते हैं, उसकी भूलें माफ़ भी तो कर देते हैं. चलो घर चलते हैं.” मानव ने मज़बूती से मयूरी का हाथ थाम लिया. मयूरी ने उस स्पर्श में विश्‍वास की मज़बूती को महसूस किया.

Suman Bajpai

  सुमन बाजपेयी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- सफ़र (Short Story- Safar)

 

“अपने से कमतर ओहदे और वेतनवाले जीवनसाथी के साथ हंसते-खेलते पूरी ज़िंदगी जी जा सकती है, लेकिन ऐसी कमतर सोचवाले इंसान के साथ एक-एक पल गुज़ारना भारी पड़ जाता है. इसलिए जब मेरे सम्मुख यह प्रस्ताव आया, तो मैंने बिना एक पल गंवाए तुरंत स्वीकार कर लिया.”

Hindi Kahani

इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे की चकाचौंध देखते ही बन रही थी. मुझे ऑस्ट्रेलिया की फ्लाइट पकड़नी थी, पर इसके लिए अभी ढेर सारी औपचारिकताएं पूरी करनी थीं. घरेलू उड़ानें तो मैं कुछ भर चुका था, पर अंतर्राष्ट्रीय उड़ान का यह मेरा पहला अवसर था. किस काउंटर पर जाना है, क्या करना है… सोच ही रहा था कि मेरी नज़रें इन्क्वॉयरी काउंटर पर जा टिकीं. वहां एक आधुनिका को बैठे  देखकर मेरा आत्मविश्‍वास थोड़ा डगमगाने लगा. जो-जो प्रश्‍न पूछने थे, उनका मन ही मन अंग्रेज़ी में अनुवाद करने लगा. तसल्ली हो जाने पर मैंने क़दम उधर बढ़ाए ही थे कि दूर से मोबाइल पर बतियाती एक बाला को इधर आता देखकर मेरे क़दम ठिठक गए. यह तो स्वाति है, पहचानते ही मैंने तुरंत मुंह घुमा लिया.

ऊंची हील की सैंडल खटखटाती सधे क़दमों से आगे बढ़ती स्वाति ने मुझे नहीं देखा था. वह दनदनाती सीधे इन्क्वॉयरी काउंटर पर पहुंच गई थी. मोबाइल बंद कर उसने फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी में उसी फ्लाइट के बारे में पूछना आरंभ कर दिया, जिसकी जानकारी मैं जुटाना चाह रहा था. मैं तुरंत उधर लपक लिया और ध्यान से सारी बातें सुनने लगा. स्वाति का ध्यान अब भी मेरी ओर नहीं था. वह अपने डॉक्यूमेंट्स चेक कराती एक के बाद एक सवाल दागे जा रही थी. यही फ़र्क़ होता है अंग्रेज़ी में ही सोचकर बोलनेवालों और मुझ जैसों में. एयरकंडीशन हॉल में भी मुझे पसीने आ रहे थे. सारी जानकारी जुटाकर स्वाति मुड़ी, तो मुझे खड़ा देखकर बुरी तरह चौंक उठी.

“राहुल, तुम यहां क्या कर रहे हो?”

“म… मैं भी इसी फ्लाइट से ऑस्ट्रेलिया जा रहा हूं.”

“तो यहां क्यों खड़े हो? कुछ समस्या है? नहीं तो फिर आओ.”

“हं…हां.” मैं स्वाति के साथ हो लिया था. उसके साथ चलने में ही समझदारी है. कहीं कोई समस्या हुई, कुछ पूछना हुआ, तो यह संभाल लेगी. हर काउंटर पर चतुराई से लेडीज़ फर्स्ट की सभ्यता निभाते हुए मैं स्वाति को आगे करता रहा. औपचारिकताएं पूरी करते हमारा औपचारिक वार्तालाप भी चलता रहा. पता चला वह भी अपनी कंपनी के किसी प्रोजेक्ट के तहत ऑस्ट्रेलिया जा रही थी. वह पहले से भी ज़्यादा चुस्त, स्मार्ट और आत्मविश्‍वास से भरपूर नज़र आ रही थी. कोई भी लड़का उसे जीवनसंगिनी के रूप में पाकर ख़ुद को धन्य समझेगा. यह मैं क्या सोचने लगा.

यह भी पढ़ेपुरुषों की चाहत- वर्किंग वुमन या हाउसवाइफ? (What Indian Men Prefer Working Women Or Housewife?)

यदि ऐसा है तो फिर मैंने उसे क्यों ठुकरा दिया था? मेरी अंतरात्मा ने मुझसे अचानक सवाल किया, तो मैं बगलें झांकने लगा. मेरे मन का चोर, जिसे मैंने आज तक सबसे, यहां तक कि अपने घरवालों तक से छुपाकर रखा था, आज खुलकर सामने आकर मुझे ललकार रहा था. मैं जितना घबराकर उससे नज़रें चुराने का प्रयास करता, वह उतना ही सामने आकर मुझे ललकारने लगता. ख़ुद को उससे बचाने में सर्वथा असमर्थ पाकर अंततः मैंने उसके सम्मुख आत्मसमर्पण कर दिया. बह जाने दिया मन को अतीत के झंझावात के साथ.

हम दोनों के परिवार एक-दूसरे से परिचित थे. न केवल परिचित, वरन् मैत्री संबंध भी थे उनमें. इंजीनियरिंग की कोचिंग के दौरान मुझे स्वाति को और भी नज़दीक से जानने-पहचानने का मौक़ा मिला. मैं पढ़ने में अच्छा था, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वाति मुझसे बेहतर थी. मैं अंतर्मुखी और झेंपू था. टीचर द्वारा पूछे सारे सवालों के जवाब मुझे आते तो थे, पर मैं कभी हाथ ऊपर नहीं कर पाता था. यदि कभी टीचर की पकड़ में आ भी जाता, तो जवाब देते वक़्त कहीं न कहीं लड़खड़ा जाता था. हालांकि लिखित टेस्ट के परिणामों में मैं अव्वल विद्यार्थियों में शुमार था. दूसरी ओर स्वाति अपने बहिर्मुखी व्यक्तित्व के कारण टीचर्स की पहली पसंद थी. अक्सर टीचर्स मुझे उसका उदाहरण देते हुए उसकी तरह आत्मविश्‍वासी और स्मार्ट होने की सीख देते, लेकिन इससे मैं और अधिक हीनभावना से घिर जाता. उससे नज़रें चुराता फिरता.

यदि किसी दिन उसका परिवार हमारे घर भोजन पर आमंत्रित होता या हमें वहां जाना होता, तो मैं पहले ही पढ़ाई का बहाना बनाकर अपने किसी दोस्त के यहां खिसक लेता. स्वाति मेरे बारे में क्या सोचती थी मुझे नहीं मालूम, पर जहां तक मैं समझता था उसे मेरी सोच की कभी परवाह नहीं रही. वह अपने में मस्त रहनेवाली बिंदास लड़की थी. वैसे भी उसके आगे-पीछे घूमनेवालों की कमी नहीं थी. उसे कहां ़फुर्सत थी यह देखने की कि कौन उसके लिए क्या सोचता है?

हम दोनों को ही अलग-अलग अच्छे कॉलेजों में प्रवेश मिल गया था. अपने-अपने परिवारों से दूर हमें पता ही नहीं था कि हमारे परिवार मिलकर क्या खिचड़ी पका रहे हैं? कैंपस इंटरव्यू देकर छुट्टियों में मैं जब घर पहुंचा, तो पता चला कि घर में मेरी स्वाति से शादी की चर्चा ज़ोरों पर है. मैं यह जानकर भौचक्का-सा रह गया और मौक़ा पाते ही मम्मी पर बरस पड़ा, “किससे पूछकर किया जा रहा है यह सब?”

“इसमें पूछना कैसा बेटा? तू और स्वाति साथ-साथ पढ़े हो. दोनों ने इंजीनियरिंग कर ली है. अब दोनों की नौकरी भी लग गई है. तुम्हें तो पता होगा उसका एक नामी कंपनी में सिलेक्शन हुआ है. फोन पर बात होती रहती होगी न तुम्हारी?”

“नहीं, काफ़ी समय से हमारी बात नहीं हुई है और न ही मुझे यह पता था कि उसका किस कंपनी में रिक्रूटमेंट हुआ है?”

“चलो कोई बात नहीं. अब बात कर लेना. तुम्हें तो ख़ुश होना चाहिए कि घर बैठे इतनी सुंदर, पढ़ी-लिखी, कमाऊ और सुशील लड़की मिल रही है.”

मेरे ग़ुस्से को देखकर मां का स्वर कुछ मंद अवश्य पड़ गया था, पर उत्साह तनिक भी कम नहीं हुआ था. मैं उनकी बातों से मन ही मन और भी भड़क उठा था. क्या समझते हैं ये लोग… कि इस रिश्ते से मुझे ख़ुद को कृतज्ञ समझना चाहिए. स्वाति और उसके घरवालों के सामने दंडवत् हो जाना चाहिए कि अपनी प्रतिभाशाली कन्या के लिए मेरा वरण कर आपने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है. मैं आजीवन आपका आभारी रहूंगा.

प्रत्यक्ष में मैं चिल्ला उठा था, “मुझे यह रिश्ता मंज़ूर नहीं है.”

“क्यों? क्या ख़राबी है इस रिश्ते में? या तुझे कोई और पसंद आ गई है?” पापा ने तल्ख़ी से पूछा था. घर में पापा के दबदबे से आतंकित एकबारगी तो मैं सहम उठा था. पर फिर भविष्य की कल्पना कर मैं भी तल्ख़ हो उठा था.

“मैं यह शादी नहीं करूंगा. यह मेरा अंतिम ़फैसला है और इसके लिए मुझे किसी को कोई सफ़ाई देने की आवश्यकता नहीं है.” मेरे निर्णय से सबके चेहरे बुझ गए थे. मुझे दुख तो हुआ था, पर अपने निर्णय से मैं संतुष्ट था. जिस लड़की के सामने पड़ते ही मेरा आत्मविश्‍वास डगमगाने लगता है, ज़ुबान लड़खड़ाने लगती है, उसके साथ ज़िंदगीभर…? नहीं! बचपन से पितृसत्तात्मक परिवार और उसमें पुरुष की महत्ता देखते हुए मैं ख़ुद को भी अपने भावी परिवार के एकछत्र मुखिया के रूप में देखने लगा था, जिसकी आज्ञा को शिरोधार्य करना परिवार के बाकी सदस्य अपना कर्त्तव्य समझें. पत्नी के रूप में मुझे अपने से श्रेष्ठतर तो क्या बराबर की लड़की भी गवारा नहीं थी. और यहां… मैं अगले ही दिन हॉस्टल रवाना हो गया, यह कहकर कि फाइनल परीक्षा की तैयारी वहां रहकर अच्छे-से कर सकूंगा. मेरे तेवर देखकर घरवालों ने भी अपने क़दम पीछे खींच लिए थे और इस तरह वह क़िस्सा वहीं समाप्त हो गया था.

यह भी पढ़ेख़ुद पर भरोसा रखें (Trust YourSelf)

विमान के गेट पर खड़ी एयर होस्टेस ने मुस्कुराकर हमारा अभिवादन किया, तो मैं वर्तमान में लौटा. अपने-अपने बैग ऊपर रख हम पास-पास की सीटों पर जम गए. स्वाति ने बैठने के साथ ही सामने से तकिया निकालकर पीछे लगा लिया था. अपना टीवी ऑन कर लिया था और आर्मरेस्ट से हेडफोन निकालकर सेट करने लगी थी. ऊपर से कोई बटन दबाकर पानी भी ऑर्डर कर दिया था. “तुम्हें चाहिए?” उसने मुस्कुराते हुए पानी की बॉटल मेरी ओर बढ़ा दी थी, जिसे मैंने भी मुस्कुराकर ‘थैंक्स’ कहते हुए थाम लिया. मुझ पर एक बार फिर से उसकी स्मार्टनेस का नशा छाने लगा था. ऐसी स्मार्ट लड़की का दोस्त होने पर गर्व किया जा सकता है, पर पति के रूप में…?

“तुम तो बाहर जाती रहती होगी?” उसकी स्मार्ट गतिविधियों से मैंने अंदाज़ा लगाया था.

“नहीं, पहली बार विदेश जा रही हूं.”

“हं… अ… ओह, म… मेरा भी फर्स्ट टाइम है.” मेरा आत्मविश्‍वास फिर से लड़खड़ाने लगा था. अवचेतन में एक आवाज़ गूंजी. इस लड़की को तो मैं जीवनसंगिनी के तौर पर नकार चुका हूं. हीनभावना तो इसमें होनी चाहिए. मैं क्यों दबा जा रहा हूं? मुझे एक नया डर सताने लगा था. इतनी लंबी यात्रा है, तो बातों का सिलसिला भी लंबा ही चलेगा. यदि कहीं स्वाति ने बातों ही बातों में मेरे इंकार की वजह जाननी चाही तो? तो मैं क्या जवाब दूंगा? यदि उस पर मेरी हीनभावना का राज़ खुल गया तो? तो क्या बच्चू, बची-खुची इज़्ज़त भी जाती रहेगी. नहीं, मुझे संभलकर रहना होगा. मैंने भी स्वाति की तरह अपनी सीट पुशबैक करके तकिया लगाया और अपनी टीवी पर प्रोग्राम सेट करने लगा. स्वाति किनारेवाली सीट पर थी, इसलिए अंदर आते लोग उसे साफ़ नज़र आ रहे थे. एक लड़की को आते देख वह ख़ुशी से सीट से उठ खड़ी हुई और उसके गले लग गई.

“तनु दीदी आप? विश्‍वास नहीं हो रहा है. अनु कैसी है? उससे तो बस फेसबुक पर ही मुलाक़ात होती है.”

आगंतुका की सीट हमारे पीछे ही थी. वह अपना सामान व्यवस्थित करने में व्यस्त हो गई. सीट पर बैठते ही उनका वार्तालाप आरंभ हो गया था, जो विमान के उड़ान भरने के बाद भी ज़ारी रहा. इस प्रयास में स्वाति को बार-बार मुझे ठेलकर अपनी गर्दन पीछे करनी पड़ रही थी और उन आगंतुका को भी बार-बार आगे झुकना पड़ रहा था. जब सीट बेल्ट खोलने का संकेत हुआ, तो वह आगंतुका मुंह आगे करके अंग्रेज़ी में फुसफुसाई, “मैं आगे आ जाऊं क्या? ऐसे तो हमारी गर्दन दुखने लग जाएगी. तेरे पासवाले को पीछे आने के लिए बोल ना? मेरे पास तो कपल बैठा है, उन्हें नहीं कह सकती.”

ज़ाहिर है, मुझे ही सुनाने के लिए कहा गया था. मैं तुरंत अपनी सीट छोड़ उठ खड़ा हुआ और पीछे जाने लगा. स्वाति, “अरे रहने दो…” करती ही रह गई, पर मैं पीछे जाकर ही माना. आख़िर मुझे भी तो दर्शाना था कि मैं एक सभ्य पुरुष हूं. अब मुझे एक तसल्ली और थी कि स्वाति को कोई सफ़ाई नहीं देनी पड़ेगी. हालांकि उसकी ओर से ऐसा कोई सवाल किए जाने की कोई गुंजाइश मुझे अभी तक नज़र नहीं आई थी. वह हमेशा की ही तरह अपने में मस्त और आत्मविश्‍वास से लबरेज़ नज़र आ रही थी. कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे इंकार से वह ख़ुश ही हुई हो कि चलो अच्छा हुआ एक दब्बू के पल्ले पड़ने से बच गई, वरना घरवालों ने तो सूली पर चढ़ाने की पूरी तैयारी कर ली थी. उत्सुकतावश मैंने अपने कान उनकी बातचीत पर केंद्रित कर लिए.

सहेली अनु का हाल जानने के बाद स्वाति अब अपने जीजू का हाल पूछने लगी थी. “आपको तो आख़िरी बार आपकी शादी में ही देखा था. जंच रही थीं आप! सालभर की पोस्टिंग पर जा रही हैं आप ऑस्ट्रेलिया. जीजू तो बेचारे एकदम उदास हो गए होंगे न?”

तनु दीदी… हां, यही नाम था स्वाति की सहेली की दीदी का, उनका चेहरा उतर गया था. ‘कुछ कहना मुश्किल है अभी.’

“सब ठीक तो है न दीदी?” स्वाति को झटका-सा लगा था.

“कुछ भी ठीक नहीं है स्वाति. तुझसे कुछ नहीं छुपाऊंगी. अनु की तरह ही छोटी बहन मानती हूं तुझे. मैं और करन एक ही घर में दो अलग-अलग कमरे में अजनबी की तरह रह रहे हैं.”

“क्या? पर क्यों?”

“पुरुषोचित दंभ.”

“यह क्या होता है?” स्वाति चौंक गई थी, पर मेरे कान और भी सतर्क हो उठे थे.

“जब हमारा रिश्ता तय हुआ था, तब हम अलग-अलग कंपनियों में कार्यरत थे. करन ने 3 साल का बॉन्ड भरकर कंपनी जॉइन की थी. उसका पैकेज मुझसे ज़्यादा था. करन देहाती परिवेश से थे व मैं महानगरीय परिवेश से. लेकिन वे इतने मासूम थे और मुझे इतना प्यार करते थे, इतना सपोर्ट करते थे कि मैं ख़ुद को दुनिया की सबसे भाग्यशाली पत्नी समझती थी. दो साल बाद मेरा दूसरी कंपनी में सिलेक्शन हो गया. मेरा पैकेज व ओहदा बढ़ गया. मैं बहुत ख़ुश थी व सोच रही थी कि करन भी मेरी ख़ुशी व तरक़्क़ी में बहुत ख़ुश होंगे. ऊपर से वे थे भी, पर अंदर से ऐसा बिल्कुल नहीं था.”

“क्यों? वे तो आपसे इतना प्यार करते थे? उनकी तरक़्की होती, तो आप भी तो ख़ुश होतीं न?”

“सौ फ़ीसदी, पर हमारे भारतीय समाज की यही तो विडंबना है. यहां पुरुष लैंगिक समानता की बात कर प्रगतिवादी होने का ढोंग तो करते हैं, पर हक़ीक़त में स्त्री को उच्चतर तो क्या, समकक्ष भी नहीं कर पाते.”

मुझे लगा किसी ने मेरे गाल पर भरपूर तमाचा जड़ दिया है. मेरी भावनाओं से सर्वथा अनजान उनका वार्तालाप जारी था.

“जीजू ने कुछ कहा आपसे?”

“हर चीज़ कहने से ही नहीं समझी जाती. महसूस भी तो होती है. पहले घर, घर के काम हमारे थे. अब वे स़िर्फ मेरे हैं. करन का रवैया कुछ ऐसा हो गया है कि मर्ज़ी हुई, तो मदद करके एहसान-सा जता दिया, वरना मेरी तो ज़िम्मेदारी है ही. मैं देर से लौटती, तो उनकी नज़रें मुझे ऐसे भेदतीं, मानो मैं कोई गुनाह करके लौटी हूं. फिर पता चला वे वक़्त-बेवक़्त मेरे ऑफिस फोन करके जानकारी जुटाते थे कि मैं कहां हूं, किसके साथ हूं? मेरे लिए घर-ऑफिस दोनों जगह का वातावरण दमघोंटू हो गया था. तब मैंने अपने घर को बचाना ज़्यादा ज़रूरी समझते हुए करन के ही ऑफिस में कम पैकेज पर नौकरी जॉइन कर ली. उसकी आंखों के सामने रहूंगी, तो वह शक़ भी नहीं करेगा और उससे कम कमाऊंगी, तो उसका पुरुषोचित दंभ भी संतुष्ट रहेगा. लेकिन यह मेरी बहुत बड़ी भूल थी. घर में हमारे रिश्ते में इतनी बड़ी खाई आ चुकी थी और ऑफिस में हम दिखावा करते थे कि हमारे मध्य दरार तक नहीं है.

कभी-कभी तो बड़ी खिसियानी-सी स्थिति पैदा हो जाती थी. जैसे वेलेंटाइन डे पर वहीं कार्यरत विवाहित जोड़ों को कहा गया कि वे अपने प्यार का इज़हार करें. करन ने मेरे लिए सकुचाते हुए गाना गाया. लोग समझ रहे थे कि वे शरमा रहे हैं, पर मैं महसूस कर सकती थी कि उन शब्दों का एक भी तार दिल से जुड़ा नहीं रह गया था.

स्वाति, अपने से कमतर ओहदे और वेतनवाले जीवनसाथी के साथ हंसते-खेलते पूरी ज़िंदगी जी जा सकती है, लेकिन ऐसी कमतर सोचवाले इंसान के साथ एक-एक पल गुज़ारना भारी पड़ जाता है. इसलिए जब मेरे सम्मुख यह प्रस्ताव आया, तो मैंने बिना एक पल गंवाए तुरंत स्वीकार कर लिया.”

“आपको क्या लगता है कि आपके इस क़दम से जीजू को अपनी ग़लती का एहसास होगा?”

“नहीं जानती. पर कई बार पास रहते हुए भी दिलों में मीलों का फासला बना रहता है, जबकि मीलों का फासला दिलों को पास ले आता है.”

“भगवान करे ऐसा ही हो.”

यह भी पढ़े7 वजहें जब एक स्त्री को दूसरी स्त्री की ज़रूरत होती है (7 Reasons When A Woman Needs Woman)

हमारा गंतव्य आ चुका था. दोनों अपने-अपने बैग लेकर निकल चुकी थीं. स्वाति को शायद मेरा ध्यान ही नहीं रहा था. या शायद उसने मुझसे विदा लेना ज़रूरी नहीं समझा था. मुझमें इतना भी साहस शेष नहीं था कि आगे बढ़कर उससे माफ़ी मांग लेता. ग्लानिबोध से मेरे क़दम मानो भारी हो गए थे. अन्य यात्रियों के लिए यह कुछ घंटों का हवाई सफ़र मात्र होगा, मेरे लिए तो अर्श से फ़र्श तक का सफ़र था.

Sangeeta Mathur

  संगीता माथुर

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- ऊंचा क़द (Short Story- Uncha Qad)

उसे देख मुझे एहसास हो रहा था कि इंसानियत और बड़प्पन हैसियत की मोहताज नहीं होती. वह तो दिल में होती है. अचानक मुझे एहसास हुआ, मेरे और रमाशंकर के बीच आज भी प्रतिस्पर्धा जारी है. इंसानियत की प्रतिस्पर्धा, जिसमें आज भी वह मुझसे बाज़ी मार ले गया था. पद भले ही मेरा बड़ा था, किंतु रमाशंकर का क़द मुझसे बहुत ऊंचा था.

Kahaniya

चार महीने बीत चुके थे, बल्कि 10 दिन ऊपर हो गए थे, किंतु बड़े भइया की ओर से अभी तक कोई ख़बर नहीं आई थी कि वह पापा को लेने कब आएंगे. यह कोई पहली बार नहीं था कि बड़े भइया ने ऐसा किया हो. हर बार उनका ऐसा ही रवैया रहता है. जब भी पापा को रखने की उनकी बारी आती है, वह समस्याओं से गुज़रने लगते हैं. कभी भाभी की तबीयत ख़राब हो जाती है, कभी ऑफिस का काम बढ़ जाता है और उनकी छुट्टी कैंसिल हो जाती है. विवश होकर मुझे ही पापा को छोड़ने मुंबई जाना पड़ता है. हमेशा की तरह इस बार भी पापा की जाने की इच्छा नहीं थी, किंतु मैंने इस ओर ध्यान नहीं दिया और उनका व अपना मुंबई का रिज़र्वेशन करवा लिया.

दिल्ली-मुंबई राजधानी एक्सप्रेस अपने टाइम पर थी. सेकंड एसी की निचली बर्थ पर पापा को बैठाकर सामने की बर्थ पर मैं भी बैठ गया. साथवाली सीट पर एक सज्जन पहले से विराजमान थे. बाकी बर्थ खाली थीं. कुछ ही देर में ट्रेन चल पड़ी. अपनी जेब से मोबाइल निकाल मैं देख रहा था, तभी कानों से पापा का स्वर टकराया, “मुन्ना, कुछ दिन तो तू भी रहेगा न मुंबई में. मेरा दिल लगा रहेगा और प्रतीक को भी अच्छा लगेगा.”

पापा के स्वर की आर्द्रता पर तो मेरा ध्यान गया नहीं, मन-ही-मन मैं खीझ उठा. कितनी बार समझाया है पापा को कि मुझे ‘मुन्ना’ न कहा करें. ‘रजत’ पुकारा करें. अब मैं इतनी ऊंची पोस्ट पर आसीन एक प्रशासनिक अधिकारी हूं. समाज में मेरा एक अलग रुतबा है. ऊंचा क़द है, मान-सम्मान है. बगल की सीट पर बैठा व्यक्ति मुन्ना शब्द सुनकर मुझे एक सामान्य-सा व्यक्ति समझ रहा होगा. मैं तनिक ज़ोर से बोला, “पापा, परसों मेरी गर्वनर के साथ मीटिंग है. मैं मुंबई में कैसे रुक सकता हूं?” पापा के चेहरे पर निराशा की बदलियां छा गईं. मैं उनसे कुछ कहता, तभी मेरा मोबाइल बज उठा. रितु का फोन था. भर्राए स्वर में वह कह रही थी, “पापा ठीक से बैठ गए न.”

“हां हां बैठ गए हैं. गाड़ी भी चल पड़ी है.”  “देखो, पापा का ख़्याल रखना. रात में मेडिसिन दे देना. भाभी को भी सब अच्छी तरह समझाकर आना. पापा को वहां कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए.”

“नहीं होगी.” मैंने फोन काट दिया. “रितु का फोन था न. मेरी चिंता कर रही होगी.”

पापा के चेहरे पर वात्सल्य उमड़ आया था. रात में खाना खाकर पापा सो गए. थोड़ी देर में गाड़ी कोटा स्टेशन पर रुकी और यात्रियों के शोरगुल से हड़कंप-सा मच गया. तभी कंपार्टमेंट का दरवाज़ा खोलकर जो व्यक्ति अंदर आया, उसे देख मुझे बेहद आश्‍चर्य हुआ. मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि रमाशंकर से इस तरह ट्रेन में मुलाक़ात होगी.

एक समय रमाशंकर मेरा पड़ोसी और सहपाठी था. हम दोनों के बीच मित्रता कम और नंबरों को लेकर प्रतिस्पर्धा अधिक रहती थी. हम दोनों ही मेहनती और बुद्धिमान थे, किंतु न जाने क्या बात थी कि मैं चाहे कितना भी परिश्रम क्यों न कर लूं, बाज़ी सदैव रमाशंकर के हाथ लगती थी. शायद मेरी ही एकाग्रता में कमी थी. कुछ समय पश्‍चात् पापा ने शहर के पॉश एरिया में मकान बनवा लिया. मैंने कॉलेज चेंज कर लिया और इस तरह रमाशंकर और मेरा साथ छूट गया.

यह भी पढ़ेपैरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट: बुज़ुर्ग जानें अपने अधिकार (Parents And Senior Citizens Act: Know Your Rights)

दो माह पूर्व एक सुबह मैं अपने ऑफिस पहुंचा. कॉरिडोर में मुझसे मिलने के लिए काफ़ी लोग बैठे हुए थे. बिना उनकी ओर नज़र उठाए मैं अपने केबिन की ओर बढ़ रहा था. यकायक एक व्यक्ति मेरे सम्मुख आया और प्रसन्नता के अतिरेक में मेरे गले लग गया, “रजत यार, तू कितना बड़ा आदमी बन गया. पहचाना मुझे? मैं रमाशंकर.” मैं सकपका गया. फीकी-सी मुस्कुराहट मेरे चेहरे पर आकर विलुप्त हो गई. इतने लोगों के सम्मुख़ उसका अनौपचारिक व्यवहार मुझे ख़ल रहा था. वह भी शायद मेरे मनोभावों को ताड़ गया था, तभी तो एक लंबी प्रतीक्षा के उपरांत जब वह मेरे केबिन में दाख़िल हुआ, तो समझ चुका था कि वह अपने सहपाठी से नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक अधिकारी से मिल रहा था. उसका मुझे ‘सर’ कहना मेरे अहं को संतुष्ट कर गया. यह जानकर कि वह बिजली विभाग में महज़ एक क्लर्क है, जो मेरे समक्ष अपना तबादला रुकवाने की गुज़ारिश लेकर आया है, मेरा सीना अभिमान से चौड़ा हो गया. कॉलेज के प्रिंसिपल और टीचर्स तो क्या, मेरे सभी कलीग्स भी यही कहते थे कि एक दिन रमाशंकर बहुत बड़ा आदमी बनेगा. हुंह, आज मैं कहां से कहां पहुंच गया और वह…

पिछली स्मृतियों को पीछे धकेल मैं वर्तमान में पहुंचा तो देखा, रमाशंकर ने अपनी वृद्ध मां को साइड की सीट पर लिटा दिया और स्वयं उनके क़रीब बैठ गया. एक उड़ती सी नज़र उस पर डाल मैंने अख़बार पर आंखें गड़ा दीं. तभी रमाशंकर बोला, “नमस्ते सर, मैंने तो देखा ही नहीं कि आप बैठे हैं.”  मैंने नम्र स्वर में पूछा, “कैसे हो रमाशंकर?”

“ठीक हूं सर.”

“कोटा कैसे आना हुआ?”

“छोटी बुआ की बेटी की शादी में आया था. अब मुंबई जा रहा हूं. शायद आपको याद हो, मेरा एक छोटा भाई था.”

“छोटा भाई, हां याद आया, क्या नाम था उसका?” मैंने स्मृति पर ज़ोर डालने का उपक्रम किया जबकि मुझे अच्छी तरह याद था कि उसका नाम देवेश था.

“सर, आप इतने ऊंचे पद पर हैं. आए दिन हज़ारों लोगों से मिलते हैं. आपको कहां याद होगा? देवेश नाम है उसका सर.”

पता नहीं उसने मुझ पर व्यंग्य किया था या साधारण रूप से कहा था, फिर भी मेरी गर्दन कुछ तन-सी गई.  उस पर एहसान-सा लादते हुए मैं बोला,“देखो रमाशंकर, यह मेरा ऑफिस नहीं है, इसलिए सर कहना बंद करो और मुझे मेरे नाम से पुकारो. हां तो तुम क्या बता रहे थे, देवेश मुंबई में है?”

“हां रजत, उसने वहां मकान ख़रीदा है. दो दिन पश्‍चात् उसका गृह प्रवेश है.

चार-पांच दिन वहां रहकर मैं और अम्मा दिल्ली लौट आएंगे.”

“इस उम्र में इन्हें इतना घुमा रहे हो?”  “अम्मा की आने की बहुत इच्छा थी. इंसान की उम्र भले ही बढ़ जाए, इच्छाएं तो नहीं मरतीं न.”

“हां, यह तो है. पिताजी कैसे हैं?”

“पिताजी का दो वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो गया था. अम्मा यह दुख झेल नहीं पाईं और उन्हें हार्टअटैक आ गया था, बस तभी से वह बीमार रहती हैं. अब तो अल्ज़ाइमर भी बढ़ गया है.”

“तब तो उन्हें संभालना मुश्किल होता होगा. क्या करते हो? छह-छह महीने दोनों भाई रखते होंगे.” ऐसा पूछकर मैं शायद अपने मन को तसल्ली दे रहा था. आशा के विपरीत रमाशंकर बोला,  “नहीं-नहीं, मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता. अम्मा शुरू से दिल्ली में रही हैं. उनका कहीं और मन लगना मुश्किल है. मैं नहीं चाहता, इस उम्र में उनकी स्थिति पेंडुलम जैसी हो जाए. कभी इधर, तो कभी उधर. कितनी पीड़ा होगी उन्हें यह देखकर कि पिताजी के जाते ही उनका कोई घर ही नहीं रहा. वह हम पर बोझ हैं.”

मैं मुस्कुराया, “रमाशंकर, इंसान को थोड़ा व्यावहारिक भी होना चाहिए. जीवन में स़िर्फ भावुकता से काम नहीं चलता है. अक्सर इंसान दायित्व उठाते-उठाते थक जाता है और तब ये विचार मन को उद्वेलित करने लगते हैं कि अकेले हम ही क्यों मां-बाप की सेवा करें, दूसरा क्यों न करे.”

“पता नहीं रजत, मैं ज़रा पुराने विचारों का इंसान हूं. मेरा तो यह मानना है कि हर इंसान की करनी उसके साथ है. कोई भी काम मुश्क़िल तभी लगता है, जब उसे बोझ समझकर किया जाए. मां-बाप क्या कभी अपने बच्चों को बोझ समझते हैं? आधे-अधूरे कर्त्तव्यों में कभी आस्था नहीं होती रजत, मात्र औपचारिकता होती है और सबसे बड़ी बात जाने-अनजाने हमारे कर्म ही तो संस्कार बनकर हमारे बच्चों के द्वारा हमारे सम्मुख आते हैं. समय रहते यह छोटी-सी बात इंसान की समझ में आ जाए, तो उसका बुढ़ापा भी संवर जाए.”

मुझे ऐसा लगा, मानो रमाशंकर ने मेरे मुख पर तमाचा जड़ दिया हो. मैं नि:शब्द, मौन सोने का उपक्रम करने लगा, किंतु नींद मेरी आंखों से अब कोसों दूर हो चुकी थी. रमाशंकर की बातें मेरे दिलोदिमाग़ में हथौड़े बरसा रही थीं. इतने वर्षों से संचित किया हुआ अभिमान पलभर में चूर-चूर हो गया था. प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी के लिए इतनी मोटी-मोटी किताबें पढ़ता रहा, किंतु पापा के मन की संवेदनाओं को, उनके हृदय की पीड़ा को नहीं पढ़ सका. क्या इतना बड़ा मुक़ाम मैंने स़िर्फ अपनी मेहनत के बल पर पाया है. नहीं, इसके पीछे पापा-मम्मी की वर्षों की तपस्या निहित है.

यह भी पढ़ेनम्रता ही असली कामयाबी है (Modesty Is The Real Success)

आख़िर उन्होंने ही तो मेरी आंखों को सपने देखने सिखाए. जीवन में कुछ कर दिखाने की प्रेरणा दी. रात्रि में जब मैं देर तक पढ़ता था, तो पापा भी मेरे साथ जागते थे कि कहीं मुझे नींद न आ जाए. मेरे इस लक्ष्य को हासिल करने में पापा हर क़दम पर मेरे साथ रहे और आज जब पापा को मेरे साथ की ज़रूरत है, तो मैं व्यावहारिकता का सहारा ले रहा हूं. दो वर्ष पूर्व की स्मृति मन पर दस्तक दे रही थी. सीवियर हार्टअटैक आने के बाद मम्मी बीमार रहने लगी थीं.

एक शाम ऑफिस से लौटकर मैं पापा-मम्मी के बेडरूम में जा रहा था, तभी अंदर से आती आवाज़ से मेरे पांव ठिठक गए. मम्मी पापा से कह रही थीं, “इस दुनिया में जो आया है, वह जाएगा भी. कोई पहले, तो कोई बाद में. इतने इंटैलेक्चुअल होते हुए भी आप इस सच्चाई से मुंह मोड़ना चाह रहे हैं.”

“मैं क्या करूं पूजा? तुम्हारे बिना अपने अस्तित्व की कल्पना भी मेरे लिए कठिन है. कभी सोचा है तुमने कि तुम्हारे बाद मेरा क्या होगा?” पापा का कंठ अवरुद्ध हो गया था, किंतु मम्मी तनिक भी विचलित नहीं हुईं और शांत स्वर में बोलीं थीं, “आपकी तरफ़ से तो मैं पूरी तरह से निश्‍चिंत हूं. रजत और रितु आपका बहुत ख़्याल रखेंगे, यह एक मां के अंतर्मन की आवाज़ है, उसका विश्‍वास है जो कभी ग़लत नहीं हो सकता.”

इस घटना के पांच दिन बाद ही मम्मी चली गईं थीं. कितने टूट गए थे पापा. बिल्कुल अकेले पड़ गए थे. उनके अकेलेपन की पीड़ा को मुझसे अधिक मेरी पत्नी रितु ने समझा. यूं भी वह पापा के दोस्त की बेटी थी और बचपन से पापा से दिल से जुड़ी हुई थी. उसने कभी नहीं चाहा, पापा को अपने से दूर करना, किंतु मेरा मानना था कि कोरी भावुकता में लिए गए फैसले अक्सर ग़लत साबित होते हैं. इंसान को प्रैक्टिकल अप्रोच से काम लेना चाहिए. अकेले मैं ही क्यों पापा का दायित्व उठाऊं? दोनों बड़े भाई क्यों न उठाएं? जबकि पापा ने तीनों को बराबर का स्नेह दिया, पढ़ाया, लिखाया, तो दायित्व भी तीनों का बराबर है. छह माह बाद मम्मी की बरसी पर यह जानते हुए भी कि दोनों बड़े भाई पापा को अपने साथ रखना नहीं चाहते, मैंने यह फैसला किया था कि हम तीनों बेटे चार-चार माह पापा को रखेंगे. पापा को जब इस बात का पता चला, तो कितनी बेबसी उभर आई थी उनके चेहरे पर. चेहरे की झुर्रियां और गहरा गई थीं. उम्र मानो 10 वर्ष आगे सरक गई थी. सारी उम्र पापा की दिल्ली में गुज़री थी. सभी दोस्त और रिश्तेदार यहीं पर थे, जिनके सहारे उनका व़क्त कुछ अच्छा बीत सकता था, किंतु… सोचते-सोचते मैंने एक गहरी सांस ली.

आंखों से बह रहे पश्‍चाताप के आंसू पूरी रात मेरा तकिया भिगोते रहे. उफ्… यह क्या कर दिया मैंने. पापा को तो असहनीय पीड़ा पहुंचाई ही, मम्मी के विश्‍वास को भी खंडित कर दिया. आज वह जहां कहीं भी होंगी, पापा की स्थिति पर उनकी आत्मा कलप रही होगी. क्या वह कभी मुझे क्षमा कर पाएंगी? रात में कई बार अम्मा का रमाशंकर को आवाज़ देना और हर बार उसका चेहरे पर बिना शिकन लाए उठना, मुझे आत्मविश्‍लेषण के लिए बाध्य कर रहा था. उसे देख मुझे एहसास हो रहा था कि इंसानियत और बड़प्पन हैसियत की मोहताज नहीं होती. वह तो दिल में होती है. अचानक मुझे एहसास हुआ, मेरे और रमाशंकर के बीच आज भी प्रतिस्पर्धा जारी है. इंसानियत की प्रतिस्पर्धा, जिसमें आज भी वह मुझसे बाज़ी मार ले गया था. पद भले ही मेरा बड़ा था, किंतु रमाशंकर का क़द मुझसे बहुत ऊंचा था.

गाड़ी मुंबई सेंट्रल पर रुकी, तो मैं रमाशंकर के क़रीब पहुंचा. उसके दोनों हाथ थाम मैं भावुक स्वर में बोला, “रमाशंकर मेरे दोस्त, चलता हूं. यह सफ़र सारी ज़िंदगी मुझे याद रहेगा.” कहने के साथ ही मैंने उसे गले लगा लिया.

आश्‍चर्यमिश्रित ख़ुशी से वह मुझे देख रहा था. मैं बोला, “वादा करो, अपनी फैमिली को लेकर मेरे घर अवश्य आओगे.”

“आऊंगा क्यों नहीं, आखिऱ इतने वर्षों बाद मुझे मेरा दोस्त मिला है.” ख़ुशी से उसकी आवाज़ कांप रही थी. अटैची उठाए पापा के साथ मैं नीचे उतर गया. स्टेशन के बाहर मैंने टैक्सी पकड़ी और ड्राइवर से एयरपोर्ट चलने को कहा. पापा हैरत से बोले, “एयरपोर्ट क्यों?” भावुक होकर मैं पापा के गले लग गया और रुंधे कंठ से बोला, “पापा, मुझे माफ़ कर दीजिए. हम वापिस दिल्ली जा रहे हैं. अब आप हमेशा वहीं अपने घर में रहेंगे.” पापा की आंखें नम हो उठीं और चेहरा खुशी से खिल उठा.

“जुग जुग जिओ मेरे बच्चे.” वह बुदबुदाए. कुछ पल के लिए उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं, फिर चेहरा उठाकर आकाश की ओर देखा. मुझे ऐसा लगा मानो वह मम्मी से कह रहे हों, देर से ही सही, तुम्हारा विश्‍वास सही निकला.

renu mandal

      रेनू मंडल

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- प्यार का सच (Short Story- Pyar Ka Sach)

एक बार फिर मेरा मन झूठे सपनों के पीछे भागने लगा था. कुछ दिनों बाद ही बीपीएससी का रिज़ल्ट भी आ गया था. मैंने परीक्षा पास कर ली थी. एक बार फिर मैं पटना में थी. मैं तुमसे मिलने तुम्हारे ऑफिस चली गई थी. तुमने जल्द ही मुझे अंदर बुला लिया था. मैं तुम्हारे सामने बैठी थी, पर न जाने क्यूं अपनत्व का कोई एहसास आज मुझे महसूस नहीं हो रहा था.

Kahani

निरंतर भागता वक़्त भले ही आदमी के जीवन में उसके आचार-विचार और हालात सब बदल देता है, फिर भी व़क्त के शोकेस में आदमी के जीवन के कुछ लम्हे ज्यों के त्यों दिल के हिमखंड के नीचे अछूते पड़े रह जाते हैं, जिसे ताउम्र न व़क्त बदल पाता है, न आदमी ख़ुद मिटा पाता है. एक लंबा समय गुज़र जाने के बाद भी मैं क्या उस लिखे को चाहकर भी मिटा पाई हूं, जिसे कभी व़क्त ने मेरे अतीत के पन्नों पर लिखा था.

आज कितने दिनों बाद मैं घर में अकेली थी. वह भी छुट्टी के दिन. सासू मां मेरे बेटे विनायक और पति नवीनजी के साथ एक रिश्तेदार के घर गई थीं. फुर्सत के पल पाकर मैं सोना चाहती थी, पर एकाकी पल पाकर अतीत के पन्नों की फड़फड़ाहट कुछ ज़्यादा ही बढ़ने लगी थी. न चाहते हुए भी तुम्हारी बहुत याद आ रही थी, साथ ही वे अनकहे प्रश्‍न भी सामने आ खड़े हुए थे, जिनके उत्तर तुमसे पूछने थे, पर उत्तर मैंने ख़ुद ही ढूंढ़ लिए थे.

मैं मानती हूं कि जीवन में हम दोनों इतने आगे निकल आए हैं कि अब उन प्रश्‍नों के कोई मायने नहीं रह गए हैं, फिर भी मुझे लगता है कि कभी हम दोनों ने एक-दूसरे को टूटकर चाहा था. मेरे भविष्य की एक-एक योजना के तुम केंद्रबिंदु हुआ करते थे, फिर चुपचाप मेरे जीवन से पलायन कर मेरे जीवन में शून्यता और रिक्तता भर क्यूं मेरे जीवन को नीरस और बेज़ार बना दिया? बिना किसी अपराध के ठुकराकर, जो मेरा अपमान किया था, उसकी कचोट आज भी मुझे महसूस होती है.

भले ही हम दोनों ने कभी एक-दूसरे को ‘आई लव यू’ नहीं कहा था, फिर भी उस कच्ची उम्र में भी हम दोनों जानते थे कि हमारा प्यार शब्दों का मोहताज नहीं था. बिना बोले ही तुमने मुझे अपने प्यार का एहसास इतनी गहराई से करवाया था कि मैं तुम्हारे अलावा किसी और से शादी करने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी. कॉलेज में फर्स्ट ईयर से ही हम दोनों ज़िंदगी की धूप-छांव में साथ रहे. एक दिन भी तुम मुझे कॉलेज में नहीं देख पाते, तो मेरे घर के आसपास मंडराने लगते. सबकी नज़रों से छुपाकर दिए गए तुम्हारे एक-एक फूल को मैं भी कितने जतन से किताबों में छुपाकर रखती थी. फूलों का पूरा एक हरबेरियम ही तैयार हो गया था. आज भी वह हरबेरियम पटना में मेरे पढ़ने की आलमारी में रखा हुआ है, जो हमारे प्यार का गवाह है.

ग्रेजुएशन में तुम पूरी यूनिवर्सिटी में फर्स्ट आए थे. तुम्हारी अलमस्त और बे़िफ़क्र ज़िंदगी में नौकरी की फ़िक्र भी मेरे ही कारण समा गई थी. इस फ़िक्र ने तुम्हें पूरी तरह विकल और बेचैन कर रखा था, जो तुम्हारे चेहरे से स्पष्ट दिखता था, जिसे महसूस कर मैंने एक फिल्मी डायलॉग मारा था.

यह भी पढ़े: प्यार, सेक्स, कमिटमेंट… कितना बदला रिश्ता! (Love, Sex, Commitment- Changing Concepts Of Relationship)

“चिंता क्यूं करते हो, सच्चा प्यार करनेवालों को मिलाने में सारी कायनात जुट जाती है.”

“चिंता कैसे ना करूं? कोई अच्छी नौकरी नहीं मिली, तो तुम्हारे सारे फिल्मी डायलॉग धरे के धरे रह जाएंगे. तुम्हारे पिताजी ख़ुद इतनी ब़ड़ी पोस्ट पर हैं, मुझ जैसे साधारण परिवार के लड़के को क्या देखकर तुम्हारा हाथ सौंपेंगे? तुम्हारे घर की शानो-शौक़त भी तो कम नहीं है, जिसे देखकर मुझे दूर से ही घबराहट होने लगती है. तुम्हें पाने के लिए मुझे कम-से-कम एक उच्च पद तो प्राप्त करना ही होगा.”

फिर तुमने एमएसी की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दिल्ली के एक कोचिंग सेंटर में दाख़िला लेने का फैसला कर लिया था. मेरे मना करने पर भी नहीं माने थे. तुमने कहा था, “अगर सम्मान से समाज में जीना है, तुम्हारा प्यार पाना है, तो मुझे दिल्ली जाना ही होगा. फिर शान से लौटकर तुम्हारे जीवन में आऊंगा. यह वादा है मेरा. इंतज़ार करना मेरा.”

तुम्हारे इसी आत्मविश्‍वास ने मुझे तुम्हारा इंतज़ार करने का हौसला दिया था. एमएसी करने के बाद दूसरे कोर्स करने के बहाने मैं अपनी शादी टालती रही. पूरे चार वर्ष गुज़र गए, पर तुमने मेरी कोई सुध नहीं ली. पापा जल्द-से-जल्द मेरी शादी कर अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त होना चाहते थे. मैं पल-पल तुम्हारे संदेश का इंतज़ार कर रही थी. तुम्हारे आने का इंतज़ार कर रही थी, पर न तुम आए और न तुम्हारा कोई संदेश आया था. मेरा धैर्य समाप्त होने लगा था. तुम्हारी परवाह करते-करते मैं अपने परिवार के प्रति बेपरवाह भी तो नहीं हो सकती थी. पूरे पांच बरसों तक अपना विवाह टालती रही थी. अब पापा के सामने दलीलें देना बंद कर मैं ख़ामोश हो गई थी. एक के मान के लिए सबका अपमान नहीं कर सकती थी मैं. तुम्हारे विषय में कहां पता करती. तुम्हारा घर भी तो शहर के अंतिम छोर पर था, जिसका सही पता भी मेरे पास नहीं था.

पापा से भी कैसे तुम्हारे विषय में बात करती. तुमने कोई आधार ही नहीं छोड़ा था. साथ में एक झिझक भी थी, नारी सुलभ लज्जा और पारिवारिक संस्कार, जिसने मेरे होंठ सी रखे थे. मुझे पापा की इच्छा के सामने झुकना ही पड़ा था. तुमने भले ही मुझे रुसवा कर अपमानित किया था, पर मैं अपने आचरण से पापा को अपमानित और दुखी नहीं कर सकती थी, इसलिए मुझे उनके द्वारा तय की गई शादी को स्वीकारना ही पड़ा.

शादी की रस्में शुरू हो गई थीं. मैं दुल्हन थी, पर न चेहरे पर कोई ख़ुशी थी, न मन में कोई उल्लास. आंखें रो-रोकर फूल गई थीं, जिसे लोग मायका छूटने की व्यथा समझ रहे थे. नियति भी हमारे साथ न जाने कैसे-कैसे खेल खेलती है. शादी में मात्र चार दिन बाकी थे तब नैना, जो कभी हमारी क्लासमेट हुआ करती थी, ने मुझे बताया कि आज ही तुमसे उसकी मुलाक़ात हुई है. तुम एक आईएएस अधिकारी बन गए हो और टे्रनिंग समाप्त कर पटना लौटे हो. अपने पुराने सभी सहपाठियों से मिलना चाहते हो.

यह सब सुनकर मैं स्तब्ध रह गई थी. इतने दिनों बाद ख़बर मिली भी तो तब, जब रस्मों-रिवाज़ के साथ एक नए रिश्ते में बंधने की मेरी सारी तैयारी पूरी हो चुकी थी. दिल चाह रहा था कि अभी भी समय है, सारे बंधन तोड़कर तुम्हारे पास चली आऊं. तभी दिमाग़ ने दिल पर लगाम लगाई. ट्रेनिंग समाप्त होने के बाद तुमने क्यूं ख़बर भेजी? पहले क्यूं नहीं मिलने आए? सच कहूं, तो उस समय घुटन की वेदना असहनीय हो उठी थी. पैर अवश हो गए थे. मैं धम्म् से बिस्तर पर बैठ गई थी. तुम पर इतना बड़ा विश्‍वास कैसे कर लेती. अब तक के तुम्हारे आचरण ने मुझे घुटन, दर्द, अपमान के सिवा कुछ नहीं दिया था. तुमने अगर मुझसे अपने सारे संबंध तोड़ लिए थे, तो साफ़-साफ़ मुझे बताया होता. तुम्हारे प्यार का भ्रम ही टूट जाता. तुम्हारी चुप्पी को हां समझकर अब मैं अपने जन्मदाता के अपमान और कलंक का कारण नहीं बन सकती थी. दोनों कुल को कलंकित नहीं कर सकती थी.

मन की गति भी कितनी विचित्र होती हैं, जिसके बिना जीने की कल्पना तक नहीं की थी, जिसके साथ भविष्य के अनगिनत ताने-बाने बुने थे मैंने, उसी की सारी यादों को रद्दी पेपर की तरह लपेटकर शादी के हवन कुंड में डाल एक अजनबी के साथ कदम-से-कदम मिलाकर सात फेरे ले, पूरी निष्ठा से उसके साथ जीवन में आगे बढ़ गई थी.

ससुराल आकर मैं सामान्य रूप से रस्मों-रिवाज़ और कर्त्तव्यों का पालन सही ढंग से करने की कोशिशें कर रही थी, पर मन था कि तुम्हारे ही सपने देखने लगता. नवीनजी के स्थान पर मन में तुम ही नज़र आते, यह जानते हुए कि जीवन अपनी ही बनाई शर्तों पर चल रहा है. तुम्हारे विषय में सोचना व्यर्थ है. मन को बहलानेवाली बात है.

धीरे-धीरे तीन वर्ष गुज़र गए. इन बरसों में मेरे जीवन में ढ़ेर सारे परिवर्तन आए. वैसे भी शादी के बाद लड़कियों के जीवन की दिशा और दशा दोनों ही बदल जाती है, जो उसे प्रलय को भी झेलने की शक्ति देती है. नए परिवेश में नए लोगों के साथ सामंजस्य  बैठाने की चेष्टा में उसका पूरा व्यक्तित्व ही बदल जाता है, उसमें पहले से भिन्न एक नई आत्मा का प्रवेश हो जाता है, जिसमें उसके जीवन की हर पुरानी बात अतीत की परछाईं मात्र रह जाती है. वैसे भी समय की गति इतनी तेज़ होती है कि जीवन के हर विनाशकारी तत्वों को अपने साथ बहा ले जाती है, तब होती है एक नए सृजन की शुरुआत. एक नई दुनिया का आवाहन. मैं भी एक नए सृजन में व्यस्त हो गई थी.

इन गुज़रे बरसों में  मेरे तमाम अनसुलझे-अनकहे सवालों के जवाब भले ही नहीं मिले, पर एक परिवर्तन ज़रूर मेरे अंदर आया. मैं नवीनजी से धीरे-धीरे बहुत प्यार करने लगी. जब मेरे अंदर किसी नए मेहमान के आने का आगाज़ हुआ, अपने अंदर उसके दिल की धड़कनें सुनाई देने लगीं, सारी विनाशकारी सोच समाप्त हो गई. उसके आने के उत्साह से ख़ुद-ब-ख़ुद तुम्हारी यादों पर धूल जमने लगी. मेरा जुड़ाव इस घर में रहनेवाले लोगों से हो गया. इस घर के हर सुख-दुख से मैं इस कदर जुड़ गई थी कि यहां की हर वस्तु मेरी अपनी हो गई थी. यहां से जितना अपनापन बढ़ रहा था, तुमसे उतना ही परायापन बढ़ने लगा. सच कहूं तो तुमसे मोहभंग हो गया.

नवीनजी भी मुझे बहुत प्यार करने लगे थे. भरपूर मान-सम्मान देते थे. मैं ख़ुश थी कि वह मेरे माता-पिता की कसौटी पर भी खरे उतरे थे, इसलिए मेरे मायकेवाले भी मेरा सुख देखकर सुखी थे. बस, एक ही बात मन में हमेशा उमड़ती-घुमड़ती रहती थी कि एक बार तुमसे आमने-सामने आकर अपने अनसुलझे प्रश्‍नों के उत्तर पूछूं.

पूछूं तुमसे कि मुझे यूं रुसवा करने का कारण क्या था? वह मौक़ा भी मुझे मिल ही गया था, जब मैं बीपीएससी की लिखित परीक्षा पास कर इंटरव्यू देने पटना गई थी. इंटरव्यू बोर्ड में तुम भी थे. पहले से ही मैं काफ़ी नर्वस थी. सामने तुम्हें बैठे देख मेरा मन और भी घबरा गया था, पर तुम पहले की तरह ही संकुचित और ख़ामोश बैठे मुझे देख रहे थे. जब प्रश्‍न पूछने की तुम्हारी बारी आई, तो बहुत ही अपनत्वभरे व्यवहार से तुमने मुझसे प्रश्‍न पूछे थे. एक बार तो मुझे यह भी लगा कि तुम मेरी सहायता करना चाह रहे हो, फिर तो मैं ज़्यादा देर तक तुमसे नाराज़ नहीं रह पाई थी. मुझे तुम्हारा वहां होना अच्छा लगने लगा.

इंटरव्यू के बाद जब मैं बाहर निकलकर कैंपस में बने बेंच पर आकर बैठी, तो दिल की धड़कनों पर काबू रखना मुश्किल हो रहा था. अभी जो आत्मीयता इंटरव्यू के दौरान महसूस हुई थी, वह बरसों पहले हम दोनों के बीच की आत्मीयता की याद दिला गई. अभी मैं उलझन में ही थी कि तुम्हारा ड्राइवर आकर मुझसे बोला था, “मुझे साहब ने भेजा है, चलिए आपको घर छोड़ दूं.”

यह भी पढ़े5 तरह के होते हैं पुरुषः जानें उनकी पर्सनैलिटी की रोचक बातें (5 Types Of Men And Interesting Facts About Their Personality)

दूर खड़े तुम मुस्कुरा रहे थे, तब मुझे लगा था कि मैं ग़लत नहीं थी. तुम अब भी मुझे प्यार करते हो. मेरा साथ चाहते हो. मुझे ख़ुद को ख़ास होने का आभास होने लगा था. उतनी ही शिद्दत से तुम्हारे प्यार को खो देने का मलाल भी हुआ था. एक चुंबकीय शक्ति मुझे तुम्हारी ओर खींचने लगी थी. मेरी बरसों की शांति भंग हो गई थी.

एक बार फिर मेरा मन झूठे सपनों के पीछे भागने लगा था. कुछ दिनों बाद ही बीपीएससी का रिज़ल्ट भी आ गया था. मैंने परीक्षा पास कर ली थी. एक बार फिर मैं पटना में थी. मैं तुमसे मिलने तुम्हारे ऑफिस चली गई थी. तुमने जल्द ही मुझे अंदर बुला लिया था. मैं तुम्हारे सामने बैठी थी, पर न जाने क्यूं अपनत्व का कोई एहसास आज मुझे महसूस नहीं हो रहा था. आईएएस ऑफिसर बन जाने की शालीनता तुम्हारे चेहरे से झलक रही थी. तुम पहले से काफ़ी स्मार्ट नज़र आ रहे थे. मुझे देख बेचैनी से पहलू बदलते हुए तुमने कहा था, “तुम्हारा बीपीएसी में सिलेक्शन हो गया, यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई. तुम्हें मेरी हार्दिक बधाई. तुम जॉइन करने की तैयारी करो, मुझे एक काम से जाना है.”

तुम उठ गए थे. मैं भी तुम्हारे साथ बाहर आ गई थी. मैं घर लौट आई थी. मुझे आभास हो गया था कि इधर कुछ दिनों से जो मैं सोच रही थी, वह मेरा भ्रम मात्र था. समय के साथ अब तुम्हारी सोच शायद बदल गई थी. कम उम्र का प्यार, तुम्हारी नज़रों में अब शायद बचपना था, जिसमें कोई गहराई नहीं थी. अब तुम्हारी सोच परिपक्व हो गई थी, इसलिए तुम्हारा मुझे आज की तरह छोड़कर चले जाना ही सत्य था, बाकी सब नज़रों का धोखा. बदलते परिवेश में तरुणाई का बचपनवाला प्यार, तुम्हारी नज़रों में शायद नासमझी और पागलपन साबित हुआ था, इसलिए निरस्त हो गया. तभी सब कुछ तुमने आसानी से भुला दिया.

घर आई तो प्रभु दौड़कर मुझसे लिपट गया. उसकी आवाज़ से मेरे मन के सोए हुए तार झंकृत हो गए. उसे सीने से लगाकर मैं रो पड़ी थी. रोने का कारण नहीं समझने पर भी नवीनजी ने आगे बढ़कर मुझे संभाल लिया था. मैंने अपना सिर नवीनजी के सीने पर टिका दिया था. लंबे झंझावातों के बाद एक गहरी शांति का अनुभव हुआ. मुझे अपने सारे प्रश्‍नों के उत्तर जैसे मिल गए थे. अब यही सत्य था. यही मेरी दुनिया थी. यही मेरा प्यार था. बाकी सब मिथ्या था, भ्रम मात्र तभी कॉलबेल की आवाज़ से मेरी तंद्रा भंग हो गई. अतीत के पन्ने ख़ुद-ब-ख़ुद सिमटकर बंद हो गए. मन यथार्थ को टटोलता उससे जुड़ने लगा था. शायद घर के लोग वापस आ गए थे.

 

Rita kumari

   रीता कुमारी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- मूल्यांकन (Short Story- Mulyankan)

अपने जीवन में मैंने कई बुज़ुर्गों को उपेक्षित जीवन जीते देखा है. जब घर बनवाया, तभी सोच लिया था कि पापाजी को सबसे बड़ा, सुंदर और आरामदायक कमरा देंगे, पर इस चक्कर में हमने पापाजी को कमरे से ही बांध दिया. साथ ही अकेलेपन से भी.

Kahani

“मम्मीजी, नेहा दीदी का फोन है.” स्वरा की आवाज़ पर नलिनी ने फोन हाथ में लिया. ‘हेलो’ कहते ही नेहा की घबराई-सी आवाज़ आई, “मम्मी, एक प्रॉब्लम हो गई है.  मां बाथरूम में गिर गई हैं. उनके बाएं हाथ में फ्रैक्चर आया  है.”

“अरे! कैसे… कहां… कब… अभी कैसी हैं? कोई है उनके पास…” नेहा की ‘मां’ यानी सास के गिरने की ख़बर सुनकर नलिनी ने एक साथ कई सवाल पूछ डाले, तो प्रत्युत्तर में नेहा रोनी आवाज़ में बोली, “वो इंदौर में ही हैं. आज रात उन्हें अहमदाबाद के लिए चलना था. उन्हें हाथ में फ्रैक्चर हुआ है. अब कैसे आएंगी. मम्मी, अब मेरा क्या होगा… दो हफ़्ते बाद सलिल को कनाडा जाना है और अगले हफ़्ते मेरी डिलीवरी है. मम्मी, आप आ पाओगी क्या?”

नेहा के पूछने पर नलिनी एकदम से कोई जवाब नहीं दे पाई. एक महीने पहले ही बेटे का ब्याह किया है. नई-नवेली बहू को देखते हुए ही प्रोग्राम तय हुआ था कि डिलीवरी के समय नेहा की सास अहमदाबाद आ जाएंगी और एक-डेढ़ महीना रुककर वापस आएंगी, तब वह जाएगी. ऐसे कम से कम ढाई-तीन महीने तक नेहा और उसके बच्चे की सार-संभाल हो जाएगी.

“तू घबरा मत, देखते हैं क्या हो सकता है.” नेहा को तसल्ली देकर नलिनी ने फोन रखा और प्रेग्नेंट बेटी की चिंता में कुछ देर यूं ही बैठी रही. परिस्थिति वाकई विकट थी. समधनजी के हाथ में फ्रैक्चर होने से उनके साथ-साथ सबके लिए मुश्किलें बढ़ गईं.

क्या-कैसे होगा इस चिंता से उन्हें बहू स्वरा ने उबारते हुए कहा,  “मम्मीजी आप दीदी के पास अहमदाबाद चली जाइए.  मैं यहां सब संभाल लूंगी.”

यह भी पढ़ेलघु उद्योग- चॉकलेट मेकिंग- छोटा इन्वेस्टमेंट बड़ा फायदा (Small Scale Industry- Chocolate Making- Small Investment Big Returns)

नलिनी के हिचकने पर उसके ससुर भी  बोले, “इतना सोचनेवाली कौन-सी बात है. नील तो है यहां… अब तो स्वरा भी है. तुम और उपेन्द्र तुरंत निकलो.”

“पर पापाजी, आप कैसे रहेंगे? आपकी देखभाल, परहेज़ी खाना…”

“सब हो जाएगा, मेरे बहू-बेटे नहीं होंगे तो क्या, तुम्हारे बेटा-बहू तो हैं ना.”

“अरे पापाजी, नील को तो ऑफिस से ़फुर्सत नहीं है और इसे आए अभी महीनाभर ही हुआ है. इनके भरोसे कैसे…” नलिनी हिचकिचाई, तो 80 बरस के बूढ़े ससुरजी हंसते हुए बोले, “मैं कोई छोटा बच्चा हूं, जो अपनी देखभाल न कर पाऊं… और न स्वरा बच्ची है, जो घर न संभाल पाए. तुम्हारी शादी हुई थी, तब तुमने 20 बरस की उम्र में सब संभाल लिया था. और तुम्हारी सास तो 16 बरस की ही थी, जब ब्याहकर आई थी. अरे, स्वरा कैसे नहीं संभालेगी घर… क्यों स्वरा, संभालेगी न?”

“हां जी, दादाजी…” क्या कहती स्वरा और क्या कहती नलिनी अपने ससुर को कि तब के और आज के ज़माने में बहुत फ़र्क़ है. नलिनी का सिर अपने ससुर के सामने श्रद्धा से झुक गया.

विपरीत परिस्थितियों के चलते ‘मैं ख़ुद को संभाल लूंगा.’ कहकर उसका मनोबल बढ़ा रहे हैं, जबकि वह जानती है कि पापाजी  को बाथरूम तक जाना भारी पड़ता है. पापाजी और घर की ज़िम्मेदारी स्वरा के भरोसे  छोड़ने में उन्हें डर ही लग रहा था. आजकल की लड़कियां क्या जानें घर की सार-संभाल… पर पापाजी और परिस्थितियों के आगे वह विवश थी.

यूं तो स्वरा एक महीने से घर में है, पर अधिकतर समय तो मायके-हनीमून और घूमने-फिरने में ही निकल गया. वह स्वयं बेटे की शादी के बाद बड़े प्रयास से घर की व्यवस्था पुरानी पटरी पर लौटा पाई थी. अब यूं अचानक घर छोड़-छाड़कर अहमदाबाद के लिए निकलने को मन नहीं मान रहा था, पर मौ़के की नज़ाकत समझते हुए घर की व्यवस्था-पापाजी के परहेज़ों और दवाइयों के बारे में  नील-स्वरा को समझाकर वह और उपेन्द्र तुरंत हवाई जहाज से अहमदाबाद के लिए निकल गए. नौवें महीने के आख़िरी हफ़्ते में कब डिलीवरी हो जाए, कुछ पता नहीं.

मम्मी-पापा को देखकर नेहा का सारा तनाव छूमंतर हो गया. उनके पहुंचने के चार दिन बाद ही उसने पुत्री को जन्म दिया. कुछ दिनों बाद दामाद सलिल कनाडा चले गए. नलिनी ने घर की सारी व्यवस्था संभाल ली और उपेन्द्र ने बाहर की. नेहा और नन्हीं परी के बीच समय कैसे निकलता, कुछ पता ही नहीं चलता. भोपाल फोन करने पर पापाजी- ‘यहां की चिंता मत करो सब ठीक है’ कहकर तसल्ली दे देते.

40 दिन बाद नेहा ने नलिनी से कहा, “मम्मी, अगले हफ़्ते सलिल आ जाएंगे. मैं भी चलने-फिरने लगी हूं. आप चाहो, तो भोपाल चली जाओ.” यह सुनकर नलिनी ने राहत की सांस ली. मन तो घर में अटका ही था, सो नेहा के कहने पर दो दिन और रुककर नलिनी ने वापसी का टिकट करवा लिया. साथ ही उपेन्द्र और नेहा को कह दिया कि उनके भोपाल पहुंचने की ख़बर पापाजी, नील-स्वरा को कतई न दें. सरप्राइज़ का मज़ा रहेगा.

सरप्राइज़ की बात सुनकर नेहा ख़ुशी-ख़ुशी मान गई, पर उपेन्द्र पहुंचने की सूचना न देने से कुछ असहज थे.

रास्ते में ट्रेन में उन्होंने इस बाबत नलिनी से बात की, तो वह बोली, “पहली बार स्वरा के भरोसे पापाजी और घर की ज़िम्मेदारी छोड़ी है. पापाजी-नील तो सीधे-सादे हैं, जब भी फोन किया ‘सब ठीक है, चिंता मत करो’ कहते रहे. अचानक पहुंचने पर स्वरा का असली मूल्यांकन हो पाएगा कि वो घर संभालने में कितनी सक्षम और घरवालों के प्रति कितनी संवेदनशील है.

यह सुनकर उपेन्द्र अवाक रह गए. नलिनी के फोन न करने के पीछे छिपी मानसिकता का उन्हें ज़रा भी भान नहीं था. वो तो समझे बैठे थे कि नलिनी अचानक पहुंचकर उन्हें सुखद आश्‍चर्य में डुबोने का मंतव्य रखती है.

बिना किसी को सूचित किए उपेन्द्र और नलिनी घर पहुंचे, तो ख़ुद सरप्राइज़ हो गए, जब घर में ताला लगा देखा. बाहर का गेट किराएदार ने खोला और बताया कि सब लोग सुबह से ही बाहर हैं. घर के बरामदे में उन्हें बैठाकर वह चाभी लेने चला गया. आसपास नज़र दौड़ाते नलिनी-उपेन्द्र बेतरह चौंके, जब उन्होंने पापाजी के कमरे की बेंत की आरामकुर्सी और मेज़ बरामदे में रखी देखी.

किराएदार से चाभी लेकर ताला खोला, तो सकते में आ गए. पापाजी के कमरे में परदे और पेंटिग्स के अलावा कुछ नहीं था. दीवान-आलमारी सब बरामदे से लगे छोटे-से गेस्टरूम में आ चुके थे. कमरे का हुलिया देखकर नलिनी को बहुत ग़ुस्सा आया. कितने सुरुचिपूर्ण ढंग से पापाजी का कमरा सजाया गया था. सुंदर परदे, पेंटिंग्स, केन की कुर्सियां, जिसमें मखमल की गद्दी लगी हुई थी. अख़बार रखने के लिए तिपाई… एक छोटा टीवी… सारी सुविधा से संपन्न बुज़ुर्ग आज उसकी अनुपस्थिति में गेस्टरूम में पहुंच गए थे.

यह भी पढ़ेदूसरों की ज़िंदगी में झांकना कहीं आपका शौक़ तो नहीं? (Why Do We Love To Gossip?)

“कल की आई लड़की की हिम्मत देखो उपेन्द्र, पापाजी का ये हाल किया, तो हमारा क्या हाल करेगी बुढ़ापे में.” आवेश में बड़बड़ाती हुई नलिनी पूरे घर में घूम आई थी. बाकी घर का हुलिया ठीक-ठाक ही था… नील के ऊपर भी उसे बहुत क्रोध आया.

उसी समय नलिनी से मिलने बगलवाली पड़ोसन आ गई. नलिनी को देखकर वह बोली, “तुम्हें ऑटो से उतरते देखा तो चली आई. अच्छा हुआ तुम आ गई. तुम नहीं थी, तो तुम्हारे ससुर का तो बड़ा बुरा हाल था.

एक-दो बार आई मिलने तभी जाना कि तुम्हारी नई-नवेली बहू ने उन्हें अपने कमरे से बेदख़ल कर दिया है. मैं तो अक्सर उन्हें बरामदे या लॉन में भटकते देखती थी. अब हम लोग तो उसे कुछ कह नहीं सकते, वैसे भी आजकल की लड़कियां किसकी सुनती हैं. कहीं पलटकर मुझे कुछ कह देती तो भई, मैं तो न सह पाती. बस, तुम्हारे ससुर को देखकर बुरा लगता था. तुम लोगों ने उन्हें इतने आदर से रखा, पर तुम्हारी बहू ने तो…” वह बोल ही रही थी कि पापाजी की रौबदार आवाज़ आई, “बेटाजी, आप मेरे लिए इतना परेशान थीं, यह जानकर बड़ा अच्छा लगा, पर अपनी परेशानी मुझसे साझा कर लेतीं, तो ज़्यादा अच्छा होता.”

यह सुनकर पड़ोसन हकबका गई और नलिनी सिर पर आंचल रखकर ससुरजी के पांव छूने लगी.

“आप कहां गए थे पापा? और अकेले कहां से आ रहे हैं?”

“अकेला नहीं हूं स्वरा है बाहर. कोई जाननेवाला मिल गया है, उससे बात करने लगी है. पर ये बताओ, तुम लोग आनेवाले हो, ये किसी को बताया क्यों नहीं?” पापाजी ने पूछा तो उपेन्द्र बगले झांकते हुए बोले, “नलिनी आप लोगों को सरप्राइज़ देना चाहती थी.”

उपेन्द्र की बात सुनकर पापाजी कुर्सी से अपनी छड़ी टिकाते बोले, “सरप्राइज़ तो हम अच्छे से हो गए, पर जान जाते तुम लोग आनेवाले हो, तो डॉक्टर का अपॉइंटमेंट न लेते. घर पर ही मिलते.”

“सब ठीक तो है पापा…?” उपेन्द्र ने चिंता से पूछा, तो वह बोले, “सब ठीक है भई, डायबिटीज़ कंट्रोल में है.”

“पापाजी आप यहां कैसे आ गए? मतलब, इस छोटे से गेस्टरूम में.” नलिनी के पूछने पर वह बोले, “अरे, अभी इन्होंने तो बताया कि तुम्हारी बहू ने मुझे यहां भेज दिया और हां बेटाजी…” अब पापाजी पड़ोसन से मुखातिब थे, “तुम जो अभी मेरी बहू के कान भर रही थी कि मुझे मेरे कमरे से बेदख़ल कर दिया गया, तो सोचो, ऐसी हालत में तो मैं यहां दुखी-ग़मगीन-सा दिखता… और बेटे-बहू की नाक में दम न कर देता कि जल्दी आओ…”

“सॉरी अंकलजी, मैंने जो महसूस किया, सो कह दिया नलिनी से.”

“द़िक्क़त यही है, हम जो महसूस करते हैं, वो सही पात्र से नहीं कहते. तुमने जो महसूस किया, उसकी चर्चा मुझसे कर लेती तो ठीक रहता. अब देखो, जैसे मैं अपने बेटे-बहू से नहीं कह पाया कि मेरे बड़े से कमरे में मुझे अकेलापन लगता है.

नलिनी-उपेन्द्र ने इस घर का सबसे अच्छा कमरा मुझे दिया. इतने प्यार से सजाया-संवारा, पर सच कहूं तो कमरे से बरामदे और लॉन के बीच की दूरी के चलते आलसवश टहलना छूट गया.”

“अरे, तो ये बात पहले क्यों नहीं कही पापाजी?”

नलिनी के कहने पर पापाजी भावुक होकर बोले, “संकोचवश न कह पाया. कैसे कहता बेटी, जिस कमरे के परदे के सेलेक्शन के लिए तुम दस दुकानें घूमी हो, जिसके डेकोर के लिए तुम घंटों नेट के सामने बैठी हो, उस कमरे के लिए कैसे कह देता कि मुझे यहां नहीं रहना है. तू तो मेरी प्यारी बहू है, पर तेरी बहू तो मेरी मां बन गई. वह तो सीधे ही बोली, ‘दादाजी, आप दिनभर कमरे में क्यों बैठे रहते हैं. आलस छोड़िए, बैठे-बैठे घुटने और ख़राब हो जाएंगे.’ उसने मेरे कमरे से

कुर्सी-मेज़ निकलवाकर बरामदे में डलवा दिया. मैंने कहा कि लेटने के लिए कमरे तक जाना भारी पड़ता है, तो यह सुनकर तुम्हारी बहू बोली, ‘दादाजी जब तक सर्दी है, तब तक के लिए गेस्टरूम में शिफ्ट हो जाएं.’ मुझे भी सही लगा. आराम करने की तलब होने पर बरामदे और लॉन से गेस्टरूम आना सुविधाजनक था. गेस्टरूम से लॉन-बरामदा सब दिखता है. जब मन करता है बरामदे में टहल लेता हूं… जब इच्छा हो, लॉन में पेड़-पौधे, फूल-पत्तियां देख लेता हूं… किराएदार के बच्चे खेलते हैं, तो उनकी आवाज़ मन में ऊर्जा भर देती है. किराएदार के बच्चे नीचे खेलने आते हैं, तो दो बातें उनसे भी कर लेता हूं… छोटावाला तो रोज़ नियम से शाम छह बजे लूडो ले आता है. बुरा न मानना बेटी, ये कमरा छोटा ज़रूर है, पर इसमें पूर्णता का एहसास है. चलने-फिरने  में गिरने का डर नहीं रहता  है. आसपास खिड़की-दरवाज़े, मेज़-कुर्सी का सहारा है. छड़ी की ज़रूरत नहीं.”

“अरे वाह! मम्मीजी आ गईं…” सहसा स्वरा का प्रफुल्लित स्वर गूंजा. पैर छूते हुए वह चहकी, “अरे, बताया नहीं कि आप आ रहे हैं. पता होता तो आज हम हॉस्पिटल न जाते.”

नलिनी चुप रही, तो पापाजी बोले, “तुम्हारी मम्मी तुम्हें सरप्राइज़ देना चाहती थीं.”

स्वरा चहकते हुए बोली, “आज सरप्राइज़ का दिन है क्या…? मम्मीजी पता है दादाजी की सारी रिपोर्ट्स नॉर्मल आई हैं.”

“देख लो, मेरी सैर रंग लाई.”

पापाजी के कहने पर स्वरा बोली, “मम्मीजी, बड़े जोड़-तोड़ किए दादाजी को टहलाने के लिए… रोज़ हम कहते टहलने को, तो दादाजी आज-कल कहकर टाल देते और अपने कमरे में बंद रजाई ओढ़े ठिठुरते रहते थे. बस, एक दिन इलाज निकाला पापाजी की रजाई और दीवान कमरे से हटाकर यहां डाल दी. अब प्यासे को कुएं के पास तो जाना ही था. इस कमरे के पास बरामदा होने से इनका अड्डा यहीं जमने लगा है. बरामदे और लॉन की पूरी धूप वसूलते हैं.” स्वरा हंस रही थी, पापाजी मुस्करा रहे थे, पर नलिनी मौन थी. उसे गंभीर देखकर स्वरा की हंसी थम गई.

यह भी पढ़ेअंग्रेज़ी बोलना सीखेंः रोज़ाना काम आनेवाले 40 सामान्य वाक्य अंग्रेज़ी में (40 Useful Sentences In English)

वह कान पकड़ते हुए बोली, “सॉरी मम्मी, नील ने पहले ही कहा था कि मेरी हरकत पर मुझे ख़ूब डांट पड़नेवाली है. सोचा था जब आप आएंगी, तब तक जनवरी की कड़ाके की सर्दी निकल जाएगी. आपके आने से पहले सारी व्यवस्था पहले जैसी कर दूंगी. पर आप तो बिना बताए आ गईं और मेरी ख़ुराफ़ात पकड़ी गई.”

यह सुनकर नलिनी गंभीरता से बोली, “बताकर आती, तो मूल्यांकन कैसे करती.”

“किस बात का?” स्वरा ने अचरज से पूछा, तो नलिनी बोली, “सिक्के के दूसरे पहलू का मूल्यांकन… सिक्के का एक पहलू सही तस्वीर नहीं दिखाता है ये आज जान लिया. अपने जीवन में मैंने कई बुज़ुर्गों को उपेक्षित जीवन जीते देखा है. जब घर बनवाया, तभी सोच लिया था कि पापाजी को सबसे बड़ा, सुंदर और आरामदायक कमरा देंगे, पर इस चक्कर में हमने पापाजी को कमरे से ही बांध दिया. साथ ही अकेलेपन से भी. इसका तोड़ निकालना पड़ेगा. सर्दी तक तो यहां ठीक है,  पर गर्मियों में पुराने कमरे में रहेंगे पापाजी. पापाजी के पुराने कमरे में लाइब्रेरी शिफ्ट करके एक छोटा-सा सोफा और क्वीन साइज़ बेड लगा देंगे. आने-जानेवाले पापाजी के कमरे में बैठेंगे, ताकि वहां रौनक़ भी रहे और बड़ा कमरा छोटा भी लगे और पापाजी का दिल भी लगा रहे.”

“अरे वाह! मम्मीजी, ये तो और भी बढ़िया आइडिया है. वैसे दादाजी दिन में यहां और रात को वहां सो सकते हैं.”

“ये लो जी, एक और आइडिया.” उपेन्द्र हंसकर बोले, तो पापाजी बनावटी दुख के साथ कहने लगे, “इसका मतलब है कि मुझे दोनों कमरों की देखभाल करनी होगी.”

स्वरा हंसकर बोली, “और नहीं तो क्या. इसी बहाने आपका एक कमरे से दूसरे तक चलना-फिरना तो होगा. कम से कम ये तो नहीं कहेंगे, हाय मेरा घुटना जाम हो गया.” अपनी नकल करती स्वरा को देख पापाजी मुस्कुराकर बोले, “नलिनी, तेरी बहू बहुत शरारती है.”

यह सुनकर नलिनी तपाक से बोली, “मेरी बहू नहीं पापाजी, आपकी मां…” सब हंसने लगे.

इस बीच किराएदार के बच्चों की गेंद बरामदे में आ गई, जो पापाजी दो कदम चलने से कतराते थे, वह बच्चों की गेंद उठाने के लिए लॉन की ओर बढ़ रहे थे. नलिनी-उपेन्द्र के लिए यह दृश्य सुखद था.

“आंटीजी, आप चाय पियेंगी?” स्वरा ने पड़ोसन से पूछा, तो वह ‘घर में काम बहुत है’ कहते हुए उठ गई. शायद उन्हें भी सिक्के के दूसरे पहलू का भान हो गया था. जाती हुई पड़ोसन को नलिनी ने नहीं रोका, उसका ध्यान तो पापाजी की ओर था… जो खिलखिलाते चेहरे के साथ गेंद बच्चों की ओर उछाल रहे थे.

Minu tripathi

     मीनू त्रिपाठी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES