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कहानी- सफ़र (Short Story- Safar)

 

“अपने से कमतर ओहदे और वेतनवाले जीवनसाथी के साथ हंसते-खेलते पूरी ज़िंदगी जी जा सकती है, लेकिन ऐसी कमतर सोचवाले इंसान के साथ एक-एक पल गुज़ारना भारी पड़ जाता है. इसलिए जब मेरे सम्मुख यह प्रस्ताव आया, तो मैंने बिना एक पल गंवाए तुरंत स्वीकार कर लिया.”

Hindi Kahani

इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे की चकाचौंध देखते ही बन रही थी. मुझे ऑस्ट्रेलिया की फ्लाइट पकड़नी थी, पर इसके लिए अभी ढेर सारी औपचारिकताएं पूरी करनी थीं. घरेलू उड़ानें तो मैं कुछ भर चुका था, पर अंतर्राष्ट्रीय उड़ान का यह मेरा पहला अवसर था. किस काउंटर पर जाना है, क्या करना है… सोच ही रहा था कि मेरी नज़रें इन्क्वॉयरी काउंटर पर जा टिकीं. वहां एक आधुनिका को बैठे  देखकर मेरा आत्मविश्‍वास थोड़ा डगमगाने लगा. जो-जो प्रश्‍न पूछने थे, उनका मन ही मन अंग्रेज़ी में अनुवाद करने लगा. तसल्ली हो जाने पर मैंने क़दम उधर बढ़ाए ही थे कि दूर से मोबाइल पर बतियाती एक बाला को इधर आता देखकर मेरे क़दम ठिठक गए. यह तो स्वाति है, पहचानते ही मैंने तुरंत मुंह घुमा लिया.

ऊंची हील की सैंडल खटखटाती सधे क़दमों से आगे बढ़ती स्वाति ने मुझे नहीं देखा था. वह दनदनाती सीधे इन्क्वॉयरी काउंटर पर पहुंच गई थी. मोबाइल बंद कर उसने फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी में उसी फ्लाइट के बारे में पूछना आरंभ कर दिया, जिसकी जानकारी मैं जुटाना चाह रहा था. मैं तुरंत उधर लपक लिया और ध्यान से सारी बातें सुनने लगा. स्वाति का ध्यान अब भी मेरी ओर नहीं था. वह अपने डॉक्यूमेंट्स चेक कराती एक के बाद एक सवाल दागे जा रही थी. यही फ़र्क़ होता है अंग्रेज़ी में ही सोचकर बोलनेवालों और मुझ जैसों में. एयरकंडीशन हॉल में भी मुझे पसीने आ रहे थे. सारी जानकारी जुटाकर स्वाति मुड़ी, तो मुझे खड़ा देखकर बुरी तरह चौंक उठी.

“राहुल, तुम यहां क्या कर रहे हो?”

“म… मैं भी इसी फ्लाइट से ऑस्ट्रेलिया जा रहा हूं.”

“तो यहां क्यों खड़े हो? कुछ समस्या है? नहीं तो फिर आओ.”

“हं…हां.” मैं स्वाति के साथ हो लिया था. उसके साथ चलने में ही समझदारी है. कहीं कोई समस्या हुई, कुछ पूछना हुआ, तो यह संभाल लेगी. हर काउंटर पर चतुराई से लेडीज़ फर्स्ट की सभ्यता निभाते हुए मैं स्वाति को आगे करता रहा. औपचारिकताएं पूरी करते हमारा औपचारिक वार्तालाप भी चलता रहा. पता चला वह भी अपनी कंपनी के किसी प्रोजेक्ट के तहत ऑस्ट्रेलिया जा रही थी. वह पहले से भी ज़्यादा चुस्त, स्मार्ट और आत्मविश्‍वास से भरपूर नज़र आ रही थी. कोई भी लड़का उसे जीवनसंगिनी के रूप में पाकर ख़ुद को धन्य समझेगा. यह मैं क्या सोचने लगा.

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यदि ऐसा है तो फिर मैंने उसे क्यों ठुकरा दिया था? मेरी अंतरात्मा ने मुझसे अचानक सवाल किया, तो मैं बगलें झांकने लगा. मेरे मन का चोर, जिसे मैंने आज तक सबसे, यहां तक कि अपने घरवालों तक से छुपाकर रखा था, आज खुलकर सामने आकर मुझे ललकार रहा था. मैं जितना घबराकर उससे नज़रें चुराने का प्रयास करता, वह उतना ही सामने आकर मुझे ललकारने लगता. ख़ुद को उससे बचाने में सर्वथा असमर्थ पाकर अंततः मैंने उसके सम्मुख आत्मसमर्पण कर दिया. बह जाने दिया मन को अतीत के झंझावात के साथ.

हम दोनों के परिवार एक-दूसरे से परिचित थे. न केवल परिचित, वरन् मैत्री संबंध भी थे उनमें. इंजीनियरिंग की कोचिंग के दौरान मुझे स्वाति को और भी नज़दीक से जानने-पहचानने का मौक़ा मिला. मैं पढ़ने में अच्छा था, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वाति मुझसे बेहतर थी. मैं अंतर्मुखी और झेंपू था. टीचर द्वारा पूछे सारे सवालों के जवाब मुझे आते तो थे, पर मैं कभी हाथ ऊपर नहीं कर पाता था. यदि कभी टीचर की पकड़ में आ भी जाता, तो जवाब देते वक़्त कहीं न कहीं लड़खड़ा जाता था. हालांकि लिखित टेस्ट के परिणामों में मैं अव्वल विद्यार्थियों में शुमार था. दूसरी ओर स्वाति अपने बहिर्मुखी व्यक्तित्व के कारण टीचर्स की पहली पसंद थी. अक्सर टीचर्स मुझे उसका उदाहरण देते हुए उसकी तरह आत्मविश्‍वासी और स्मार्ट होने की सीख देते, लेकिन इससे मैं और अधिक हीनभावना से घिर जाता. उससे नज़रें चुराता फिरता.

यदि किसी दिन उसका परिवार हमारे घर भोजन पर आमंत्रित होता या हमें वहां जाना होता, तो मैं पहले ही पढ़ाई का बहाना बनाकर अपने किसी दोस्त के यहां खिसक लेता. स्वाति मेरे बारे में क्या सोचती थी मुझे नहीं मालूम, पर जहां तक मैं समझता था उसे मेरी सोच की कभी परवाह नहीं रही. वह अपने में मस्त रहनेवाली बिंदास लड़की थी. वैसे भी उसके आगे-पीछे घूमनेवालों की कमी नहीं थी. उसे कहां ़फुर्सत थी यह देखने की कि कौन उसके लिए क्या सोचता है?

हम दोनों को ही अलग-अलग अच्छे कॉलेजों में प्रवेश मिल गया था. अपने-अपने परिवारों से दूर हमें पता ही नहीं था कि हमारे परिवार मिलकर क्या खिचड़ी पका रहे हैं? कैंपस इंटरव्यू देकर छुट्टियों में मैं जब घर पहुंचा, तो पता चला कि घर में मेरी स्वाति से शादी की चर्चा ज़ोरों पर है. मैं यह जानकर भौचक्का-सा रह गया और मौक़ा पाते ही मम्मी पर बरस पड़ा, “किससे पूछकर किया जा रहा है यह सब?”

“इसमें पूछना कैसा बेटा? तू और स्वाति साथ-साथ पढ़े हो. दोनों ने इंजीनियरिंग कर ली है. अब दोनों की नौकरी भी लग गई है. तुम्हें तो पता होगा उसका एक नामी कंपनी में सिलेक्शन हुआ है. फोन पर बात होती रहती होगी न तुम्हारी?”

“नहीं, काफ़ी समय से हमारी बात नहीं हुई है और न ही मुझे यह पता था कि उसका किस कंपनी में रिक्रूटमेंट हुआ है?”

“चलो कोई बात नहीं. अब बात कर लेना. तुम्हें तो ख़ुश होना चाहिए कि घर बैठे इतनी सुंदर, पढ़ी-लिखी, कमाऊ और सुशील लड़की मिल रही है.”

मेरे ग़ुस्से को देखकर मां का स्वर कुछ मंद अवश्य पड़ गया था, पर उत्साह तनिक भी कम नहीं हुआ था. मैं उनकी बातों से मन ही मन और भी भड़क उठा था. क्या समझते हैं ये लोग… कि इस रिश्ते से मुझे ख़ुद को कृतज्ञ समझना चाहिए. स्वाति और उसके घरवालों के सामने दंडवत् हो जाना चाहिए कि अपनी प्रतिभाशाली कन्या के लिए मेरा वरण कर आपने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है. मैं आजीवन आपका आभारी रहूंगा.

प्रत्यक्ष में मैं चिल्ला उठा था, “मुझे यह रिश्ता मंज़ूर नहीं है.”

“क्यों? क्या ख़राबी है इस रिश्ते में? या तुझे कोई और पसंद आ गई है?” पापा ने तल्ख़ी से पूछा था. घर में पापा के दबदबे से आतंकित एकबारगी तो मैं सहम उठा था. पर फिर भविष्य की कल्पना कर मैं भी तल्ख़ हो उठा था.

“मैं यह शादी नहीं करूंगा. यह मेरा अंतिम ़फैसला है और इसके लिए मुझे किसी को कोई सफ़ाई देने की आवश्यकता नहीं है.” मेरे निर्णय से सबके चेहरे बुझ गए थे. मुझे दुख तो हुआ था, पर अपने निर्णय से मैं संतुष्ट था. जिस लड़की के सामने पड़ते ही मेरा आत्मविश्‍वास डगमगाने लगता है, ज़ुबान लड़खड़ाने लगती है, उसके साथ ज़िंदगीभर…? नहीं! बचपन से पितृसत्तात्मक परिवार और उसमें पुरुष की महत्ता देखते हुए मैं ख़ुद को भी अपने भावी परिवार के एकछत्र मुखिया के रूप में देखने लगा था, जिसकी आज्ञा को शिरोधार्य करना परिवार के बाकी सदस्य अपना कर्त्तव्य समझें. पत्नी के रूप में मुझे अपने से श्रेष्ठतर तो क्या बराबर की लड़की भी गवारा नहीं थी. और यहां… मैं अगले ही दिन हॉस्टल रवाना हो गया, यह कहकर कि फाइनल परीक्षा की तैयारी वहां रहकर अच्छे-से कर सकूंगा. मेरे तेवर देखकर घरवालों ने भी अपने क़दम पीछे खींच लिए थे और इस तरह वह क़िस्सा वहीं समाप्त हो गया था.

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विमान के गेट पर खड़ी एयर होस्टेस ने मुस्कुराकर हमारा अभिवादन किया, तो मैं वर्तमान में लौटा. अपने-अपने बैग ऊपर रख हम पास-पास की सीटों पर जम गए. स्वाति ने बैठने के साथ ही सामने से तकिया निकालकर पीछे लगा लिया था. अपना टीवी ऑन कर लिया था और आर्मरेस्ट से हेडफोन निकालकर सेट करने लगी थी. ऊपर से कोई बटन दबाकर पानी भी ऑर्डर कर दिया था. “तुम्हें चाहिए?” उसने मुस्कुराते हुए पानी की बॉटल मेरी ओर बढ़ा दी थी, जिसे मैंने भी मुस्कुराकर ‘थैंक्स’ कहते हुए थाम लिया. मुझ पर एक बार फिर से उसकी स्मार्टनेस का नशा छाने लगा था. ऐसी स्मार्ट लड़की का दोस्त होने पर गर्व किया जा सकता है, पर पति के रूप में…?

“तुम तो बाहर जाती रहती होगी?” उसकी स्मार्ट गतिविधियों से मैंने अंदाज़ा लगाया था.

“नहीं, पहली बार विदेश जा रही हूं.”

“हं… अ… ओह, म… मेरा भी फर्स्ट टाइम है.” मेरा आत्मविश्‍वास फिर से लड़खड़ाने लगा था. अवचेतन में एक आवाज़ गूंजी. इस लड़की को तो मैं जीवनसंगिनी के तौर पर नकार चुका हूं. हीनभावना तो इसमें होनी चाहिए. मैं क्यों दबा जा रहा हूं? मुझे एक नया डर सताने लगा था. इतनी लंबी यात्रा है, तो बातों का सिलसिला भी लंबा ही चलेगा. यदि कहीं स्वाति ने बातों ही बातों में मेरे इंकार की वजह जाननी चाही तो? तो मैं क्या जवाब दूंगा? यदि उस पर मेरी हीनभावना का राज़ खुल गया तो? तो क्या बच्चू, बची-खुची इज़्ज़त भी जाती रहेगी. नहीं, मुझे संभलकर रहना होगा. मैंने भी स्वाति की तरह अपनी सीट पुशबैक करके तकिया लगाया और अपनी टीवी पर प्रोग्राम सेट करने लगा. स्वाति किनारेवाली सीट पर थी, इसलिए अंदर आते लोग उसे साफ़ नज़र आ रहे थे. एक लड़की को आते देख वह ख़ुशी से सीट से उठ खड़ी हुई और उसके गले लग गई.

“तनु दीदी आप? विश्‍वास नहीं हो रहा है. अनु कैसी है? उससे तो बस फेसबुक पर ही मुलाक़ात होती है.”

आगंतुका की सीट हमारे पीछे ही थी. वह अपना सामान व्यवस्थित करने में व्यस्त हो गई. सीट पर बैठते ही उनका वार्तालाप आरंभ हो गया था, जो विमान के उड़ान भरने के बाद भी ज़ारी रहा. इस प्रयास में स्वाति को बार-बार मुझे ठेलकर अपनी गर्दन पीछे करनी पड़ रही थी और उन आगंतुका को भी बार-बार आगे झुकना पड़ रहा था. जब सीट बेल्ट खोलने का संकेत हुआ, तो वह आगंतुका मुंह आगे करके अंग्रेज़ी में फुसफुसाई, “मैं आगे आ जाऊं क्या? ऐसे तो हमारी गर्दन दुखने लग जाएगी. तेरे पासवाले को पीछे आने के लिए बोल ना? मेरे पास तो कपल बैठा है, उन्हें नहीं कह सकती.”

ज़ाहिर है, मुझे ही सुनाने के लिए कहा गया था. मैं तुरंत अपनी सीट छोड़ उठ खड़ा हुआ और पीछे जाने लगा. स्वाति, “अरे रहने दो…” करती ही रह गई, पर मैं पीछे जाकर ही माना. आख़िर मुझे भी तो दर्शाना था कि मैं एक सभ्य पुरुष हूं. अब मुझे एक तसल्ली और थी कि स्वाति को कोई सफ़ाई नहीं देनी पड़ेगी. हालांकि उसकी ओर से ऐसा कोई सवाल किए जाने की कोई गुंजाइश मुझे अभी तक नज़र नहीं आई थी. वह हमेशा की ही तरह अपने में मस्त और आत्मविश्‍वास से लबरेज़ नज़र आ रही थी. कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे इंकार से वह ख़ुश ही हुई हो कि चलो अच्छा हुआ एक दब्बू के पल्ले पड़ने से बच गई, वरना घरवालों ने तो सूली पर चढ़ाने की पूरी तैयारी कर ली थी. उत्सुकतावश मैंने अपने कान उनकी बातचीत पर केंद्रित कर लिए.

सहेली अनु का हाल जानने के बाद स्वाति अब अपने जीजू का हाल पूछने लगी थी. “आपको तो आख़िरी बार आपकी शादी में ही देखा था. जंच रही थीं आप! सालभर की पोस्टिंग पर जा रही हैं आप ऑस्ट्रेलिया. जीजू तो बेचारे एकदम उदास हो गए होंगे न?”

तनु दीदी… हां, यही नाम था स्वाति की सहेली की दीदी का, उनका चेहरा उतर गया था. ‘कुछ कहना मुश्किल है अभी.’

“सब ठीक तो है न दीदी?” स्वाति को झटका-सा लगा था.

“कुछ भी ठीक नहीं है स्वाति. तुझसे कुछ नहीं छुपाऊंगी. अनु की तरह ही छोटी बहन मानती हूं तुझे. मैं और करन एक ही घर में दो अलग-अलग कमरे में अजनबी की तरह रह रहे हैं.”

“क्या? पर क्यों?”

“पुरुषोचित दंभ.”

“यह क्या होता है?” स्वाति चौंक गई थी, पर मेरे कान और भी सतर्क हो उठे थे.

“जब हमारा रिश्ता तय हुआ था, तब हम अलग-अलग कंपनियों में कार्यरत थे. करन ने 3 साल का बॉन्ड भरकर कंपनी जॉइन की थी. उसका पैकेज मुझसे ज़्यादा था. करन देहाती परिवेश से थे व मैं महानगरीय परिवेश से. लेकिन वे इतने मासूम थे और मुझे इतना प्यार करते थे, इतना सपोर्ट करते थे कि मैं ख़ुद को दुनिया की सबसे भाग्यशाली पत्नी समझती थी. दो साल बाद मेरा दूसरी कंपनी में सिलेक्शन हो गया. मेरा पैकेज व ओहदा बढ़ गया. मैं बहुत ख़ुश थी व सोच रही थी कि करन भी मेरी ख़ुशी व तरक़्क़ी में बहुत ख़ुश होंगे. ऊपर से वे थे भी, पर अंदर से ऐसा बिल्कुल नहीं था.”

“क्यों? वे तो आपसे इतना प्यार करते थे? उनकी तरक़्की होती, तो आप भी तो ख़ुश होतीं न?”

“सौ फ़ीसदी, पर हमारे भारतीय समाज की यही तो विडंबना है. यहां पुरुष लैंगिक समानता की बात कर प्रगतिवादी होने का ढोंग तो करते हैं, पर हक़ीक़त में स्त्री को उच्चतर तो क्या, समकक्ष भी नहीं कर पाते.”

मुझे लगा किसी ने मेरे गाल पर भरपूर तमाचा जड़ दिया है. मेरी भावनाओं से सर्वथा अनजान उनका वार्तालाप जारी था.

“जीजू ने कुछ कहा आपसे?”

“हर चीज़ कहने से ही नहीं समझी जाती. महसूस भी तो होती है. पहले घर, घर के काम हमारे थे. अब वे स़िर्फ मेरे हैं. करन का रवैया कुछ ऐसा हो गया है कि मर्ज़ी हुई, तो मदद करके एहसान-सा जता दिया, वरना मेरी तो ज़िम्मेदारी है ही. मैं देर से लौटती, तो उनकी नज़रें मुझे ऐसे भेदतीं, मानो मैं कोई गुनाह करके लौटी हूं. फिर पता चला वे वक़्त-बेवक़्त मेरे ऑफिस फोन करके जानकारी जुटाते थे कि मैं कहां हूं, किसके साथ हूं? मेरे लिए घर-ऑफिस दोनों जगह का वातावरण दमघोंटू हो गया था. तब मैंने अपने घर को बचाना ज़्यादा ज़रूरी समझते हुए करन के ही ऑफिस में कम पैकेज पर नौकरी जॉइन कर ली. उसकी आंखों के सामने रहूंगी, तो वह शक़ भी नहीं करेगा और उससे कम कमाऊंगी, तो उसका पुरुषोचित दंभ भी संतुष्ट रहेगा. लेकिन यह मेरी बहुत बड़ी भूल थी. घर में हमारे रिश्ते में इतनी बड़ी खाई आ चुकी थी और ऑफिस में हम दिखावा करते थे कि हमारे मध्य दरार तक नहीं है.

कभी-कभी तो बड़ी खिसियानी-सी स्थिति पैदा हो जाती थी. जैसे वेलेंटाइन डे पर वहीं कार्यरत विवाहित जोड़ों को कहा गया कि वे अपने प्यार का इज़हार करें. करन ने मेरे लिए सकुचाते हुए गाना गाया. लोग समझ रहे थे कि वे शरमा रहे हैं, पर मैं महसूस कर सकती थी कि उन शब्दों का एक भी तार दिल से जुड़ा नहीं रह गया था.

स्वाति, अपने से कमतर ओहदे और वेतनवाले जीवनसाथी के साथ हंसते-खेलते पूरी ज़िंदगी जी जा सकती है, लेकिन ऐसी कमतर सोचवाले इंसान के साथ एक-एक पल गुज़ारना भारी पड़ जाता है. इसलिए जब मेरे सम्मुख यह प्रस्ताव आया, तो मैंने बिना एक पल गंवाए तुरंत स्वीकार कर लिया.”

“आपको क्या लगता है कि आपके इस क़दम से जीजू को अपनी ग़लती का एहसास होगा?”

“नहीं जानती. पर कई बार पास रहते हुए भी दिलों में मीलों का फासला बना रहता है, जबकि मीलों का फासला दिलों को पास ले आता है.”

“भगवान करे ऐसा ही हो.”

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हमारा गंतव्य आ चुका था. दोनों अपने-अपने बैग लेकर निकल चुकी थीं. स्वाति को शायद मेरा ध्यान ही नहीं रहा था. या शायद उसने मुझसे विदा लेना ज़रूरी नहीं समझा था. मुझमें इतना भी साहस शेष नहीं था कि आगे बढ़कर उससे माफ़ी मांग लेता. ग्लानिबोध से मेरे क़दम मानो भारी हो गए थे. अन्य यात्रियों के लिए यह कुछ घंटों का हवाई सफ़र मात्र होगा, मेरे लिए तो अर्श से फ़र्श तक का सफ़र था.

Sangeeta Mathur

  संगीता माथुर

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कहानी- ऊंचा क़द (Short Story- Uncha Qad)

उसे देख मुझे एहसास हो रहा था कि इंसानियत और बड़प्पन हैसियत की मोहताज नहीं होती. वह तो दिल में होती है. अचानक मुझे एहसास हुआ, मेरे और रमाशंकर के बीच आज भी प्रतिस्पर्धा जारी है. इंसानियत की प्रतिस्पर्धा, जिसमें आज भी वह मुझसे बाज़ी मार ले गया था. पद भले ही मेरा बड़ा था, किंतु रमाशंकर का क़द मुझसे बहुत ऊंचा था.

Kahaniya

चार महीने बीत चुके थे, बल्कि 10 दिन ऊपर हो गए थे, किंतु बड़े भइया की ओर से अभी तक कोई ख़बर नहीं आई थी कि वह पापा को लेने कब आएंगे. यह कोई पहली बार नहीं था कि बड़े भइया ने ऐसा किया हो. हर बार उनका ऐसा ही रवैया रहता है. जब भी पापा को रखने की उनकी बारी आती है, वह समस्याओं से गुज़रने लगते हैं. कभी भाभी की तबीयत ख़राब हो जाती है, कभी ऑफिस का काम बढ़ जाता है और उनकी छुट्टी कैंसिल हो जाती है. विवश होकर मुझे ही पापा को छोड़ने मुंबई जाना पड़ता है. हमेशा की तरह इस बार भी पापा की जाने की इच्छा नहीं थी, किंतु मैंने इस ओर ध्यान नहीं दिया और उनका व अपना मुंबई का रिज़र्वेशन करवा लिया.

दिल्ली-मुंबई राजधानी एक्सप्रेस अपने टाइम पर थी. सेकंड एसी की निचली बर्थ पर पापा को बैठाकर सामने की बर्थ पर मैं भी बैठ गया. साथवाली सीट पर एक सज्जन पहले से विराजमान थे. बाकी बर्थ खाली थीं. कुछ ही देर में ट्रेन चल पड़ी. अपनी जेब से मोबाइल निकाल मैं देख रहा था, तभी कानों से पापा का स्वर टकराया, “मुन्ना, कुछ दिन तो तू भी रहेगा न मुंबई में. मेरा दिल लगा रहेगा और प्रतीक को भी अच्छा लगेगा.”

पापा के स्वर की आर्द्रता पर तो मेरा ध्यान गया नहीं, मन-ही-मन मैं खीझ उठा. कितनी बार समझाया है पापा को कि मुझे ‘मुन्ना’ न कहा करें. ‘रजत’ पुकारा करें. अब मैं इतनी ऊंची पोस्ट पर आसीन एक प्रशासनिक अधिकारी हूं. समाज में मेरा एक अलग रुतबा है. ऊंचा क़द है, मान-सम्मान है. बगल की सीट पर बैठा व्यक्ति मुन्ना शब्द सुनकर मुझे एक सामान्य-सा व्यक्ति समझ रहा होगा. मैं तनिक ज़ोर से बोला, “पापा, परसों मेरी गर्वनर के साथ मीटिंग है. मैं मुंबई में कैसे रुक सकता हूं?” पापा के चेहरे पर निराशा की बदलियां छा गईं. मैं उनसे कुछ कहता, तभी मेरा मोबाइल बज उठा. रितु का फोन था. भर्राए स्वर में वह कह रही थी, “पापा ठीक से बैठ गए न.”

“हां हां बैठ गए हैं. गाड़ी भी चल पड़ी है.”  “देखो, पापा का ख़्याल रखना. रात में मेडिसिन दे देना. भाभी को भी सब अच्छी तरह समझाकर आना. पापा को वहां कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए.”

“नहीं होगी.” मैंने फोन काट दिया. “रितु का फोन था न. मेरी चिंता कर रही होगी.”

पापा के चेहरे पर वात्सल्य उमड़ आया था. रात में खाना खाकर पापा सो गए. थोड़ी देर में गाड़ी कोटा स्टेशन पर रुकी और यात्रियों के शोरगुल से हड़कंप-सा मच गया. तभी कंपार्टमेंट का दरवाज़ा खोलकर जो व्यक्ति अंदर आया, उसे देख मुझे बेहद आश्‍चर्य हुआ. मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि रमाशंकर से इस तरह ट्रेन में मुलाक़ात होगी.

एक समय रमाशंकर मेरा पड़ोसी और सहपाठी था. हम दोनों के बीच मित्रता कम और नंबरों को लेकर प्रतिस्पर्धा अधिक रहती थी. हम दोनों ही मेहनती और बुद्धिमान थे, किंतु न जाने क्या बात थी कि मैं चाहे कितना भी परिश्रम क्यों न कर लूं, बाज़ी सदैव रमाशंकर के हाथ लगती थी. शायद मेरी ही एकाग्रता में कमी थी. कुछ समय पश्‍चात् पापा ने शहर के पॉश एरिया में मकान बनवा लिया. मैंने कॉलेज चेंज कर लिया और इस तरह रमाशंकर और मेरा साथ छूट गया.

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दो माह पूर्व एक सुबह मैं अपने ऑफिस पहुंचा. कॉरिडोर में मुझसे मिलने के लिए काफ़ी लोग बैठे हुए थे. बिना उनकी ओर नज़र उठाए मैं अपने केबिन की ओर बढ़ रहा था. यकायक एक व्यक्ति मेरे सम्मुख आया और प्रसन्नता के अतिरेक में मेरे गले लग गया, “रजत यार, तू कितना बड़ा आदमी बन गया. पहचाना मुझे? मैं रमाशंकर.” मैं सकपका गया. फीकी-सी मुस्कुराहट मेरे चेहरे पर आकर विलुप्त हो गई. इतने लोगों के सम्मुख़ उसका अनौपचारिक व्यवहार मुझे ख़ल रहा था. वह भी शायद मेरे मनोभावों को ताड़ गया था, तभी तो एक लंबी प्रतीक्षा के उपरांत जब वह मेरे केबिन में दाख़िल हुआ, तो समझ चुका था कि वह अपने सहपाठी से नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक अधिकारी से मिल रहा था. उसका मुझे ‘सर’ कहना मेरे अहं को संतुष्ट कर गया. यह जानकर कि वह बिजली विभाग में महज़ एक क्लर्क है, जो मेरे समक्ष अपना तबादला रुकवाने की गुज़ारिश लेकर आया है, मेरा सीना अभिमान से चौड़ा हो गया. कॉलेज के प्रिंसिपल और टीचर्स तो क्या, मेरे सभी कलीग्स भी यही कहते थे कि एक दिन रमाशंकर बहुत बड़ा आदमी बनेगा. हुंह, आज मैं कहां से कहां पहुंच गया और वह…

पिछली स्मृतियों को पीछे धकेल मैं वर्तमान में पहुंचा तो देखा, रमाशंकर ने अपनी वृद्ध मां को साइड की सीट पर लिटा दिया और स्वयं उनके क़रीब बैठ गया. एक उड़ती सी नज़र उस पर डाल मैंने अख़बार पर आंखें गड़ा दीं. तभी रमाशंकर बोला, “नमस्ते सर, मैंने तो देखा ही नहीं कि आप बैठे हैं.”  मैंने नम्र स्वर में पूछा, “कैसे हो रमाशंकर?”

“ठीक हूं सर.”

“कोटा कैसे आना हुआ?”

“छोटी बुआ की बेटी की शादी में आया था. अब मुंबई जा रहा हूं. शायद आपको याद हो, मेरा एक छोटा भाई था.”

“छोटा भाई, हां याद आया, क्या नाम था उसका?” मैंने स्मृति पर ज़ोर डालने का उपक्रम किया जबकि मुझे अच्छी तरह याद था कि उसका नाम देवेश था.

“सर, आप इतने ऊंचे पद पर हैं. आए दिन हज़ारों लोगों से मिलते हैं. आपको कहां याद होगा? देवेश नाम है उसका सर.”

पता नहीं उसने मुझ पर व्यंग्य किया था या साधारण रूप से कहा था, फिर भी मेरी गर्दन कुछ तन-सी गई.  उस पर एहसान-सा लादते हुए मैं बोला,“देखो रमाशंकर, यह मेरा ऑफिस नहीं है, इसलिए सर कहना बंद करो और मुझे मेरे नाम से पुकारो. हां तो तुम क्या बता रहे थे, देवेश मुंबई में है?”

“हां रजत, उसने वहां मकान ख़रीदा है. दो दिन पश्‍चात् उसका गृह प्रवेश है.

चार-पांच दिन वहां रहकर मैं और अम्मा दिल्ली लौट आएंगे.”

“इस उम्र में इन्हें इतना घुमा रहे हो?”  “अम्मा की आने की बहुत इच्छा थी. इंसान की उम्र भले ही बढ़ जाए, इच्छाएं तो नहीं मरतीं न.”

“हां, यह तो है. पिताजी कैसे हैं?”

“पिताजी का दो वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो गया था. अम्मा यह दुख झेल नहीं पाईं और उन्हें हार्टअटैक आ गया था, बस तभी से वह बीमार रहती हैं. अब तो अल्ज़ाइमर भी बढ़ गया है.”

“तब तो उन्हें संभालना मुश्किल होता होगा. क्या करते हो? छह-छह महीने दोनों भाई रखते होंगे.” ऐसा पूछकर मैं शायद अपने मन को तसल्ली दे रहा था. आशा के विपरीत रमाशंकर बोला,  “नहीं-नहीं, मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता. अम्मा शुरू से दिल्ली में रही हैं. उनका कहीं और मन लगना मुश्किल है. मैं नहीं चाहता, इस उम्र में उनकी स्थिति पेंडुलम जैसी हो जाए. कभी इधर, तो कभी उधर. कितनी पीड़ा होगी उन्हें यह देखकर कि पिताजी के जाते ही उनका कोई घर ही नहीं रहा. वह हम पर बोझ हैं.”

मैं मुस्कुराया, “रमाशंकर, इंसान को थोड़ा व्यावहारिक भी होना चाहिए. जीवन में स़िर्फ भावुकता से काम नहीं चलता है. अक्सर इंसान दायित्व उठाते-उठाते थक जाता है और तब ये विचार मन को उद्वेलित करने लगते हैं कि अकेले हम ही क्यों मां-बाप की सेवा करें, दूसरा क्यों न करे.”

“पता नहीं रजत, मैं ज़रा पुराने विचारों का इंसान हूं. मेरा तो यह मानना है कि हर इंसान की करनी उसके साथ है. कोई भी काम मुश्क़िल तभी लगता है, जब उसे बोझ समझकर किया जाए. मां-बाप क्या कभी अपने बच्चों को बोझ समझते हैं? आधे-अधूरे कर्त्तव्यों में कभी आस्था नहीं होती रजत, मात्र औपचारिकता होती है और सबसे बड़ी बात जाने-अनजाने हमारे कर्म ही तो संस्कार बनकर हमारे बच्चों के द्वारा हमारे सम्मुख आते हैं. समय रहते यह छोटी-सी बात इंसान की समझ में आ जाए, तो उसका बुढ़ापा भी संवर जाए.”

मुझे ऐसा लगा, मानो रमाशंकर ने मेरे मुख पर तमाचा जड़ दिया हो. मैं नि:शब्द, मौन सोने का उपक्रम करने लगा, किंतु नींद मेरी आंखों से अब कोसों दूर हो चुकी थी. रमाशंकर की बातें मेरे दिलोदिमाग़ में हथौड़े बरसा रही थीं. इतने वर्षों से संचित किया हुआ अभिमान पलभर में चूर-चूर हो गया था. प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी के लिए इतनी मोटी-मोटी किताबें पढ़ता रहा, किंतु पापा के मन की संवेदनाओं को, उनके हृदय की पीड़ा को नहीं पढ़ सका. क्या इतना बड़ा मुक़ाम मैंने स़िर्फ अपनी मेहनत के बल पर पाया है. नहीं, इसके पीछे पापा-मम्मी की वर्षों की तपस्या निहित है.

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आख़िर उन्होंने ही तो मेरी आंखों को सपने देखने सिखाए. जीवन में कुछ कर दिखाने की प्रेरणा दी. रात्रि में जब मैं देर तक पढ़ता था, तो पापा भी मेरे साथ जागते थे कि कहीं मुझे नींद न आ जाए. मेरे इस लक्ष्य को हासिल करने में पापा हर क़दम पर मेरे साथ रहे और आज जब पापा को मेरे साथ की ज़रूरत है, तो मैं व्यावहारिकता का सहारा ले रहा हूं. दो वर्ष पूर्व की स्मृति मन पर दस्तक दे रही थी. सीवियर हार्टअटैक आने के बाद मम्मी बीमार रहने लगी थीं.

एक शाम ऑफिस से लौटकर मैं पापा-मम्मी के बेडरूम में जा रहा था, तभी अंदर से आती आवाज़ से मेरे पांव ठिठक गए. मम्मी पापा से कह रही थीं, “इस दुनिया में जो आया है, वह जाएगा भी. कोई पहले, तो कोई बाद में. इतने इंटैलेक्चुअल होते हुए भी आप इस सच्चाई से मुंह मोड़ना चाह रहे हैं.”

“मैं क्या करूं पूजा? तुम्हारे बिना अपने अस्तित्व की कल्पना भी मेरे लिए कठिन है. कभी सोचा है तुमने कि तुम्हारे बाद मेरा क्या होगा?” पापा का कंठ अवरुद्ध हो गया था, किंतु मम्मी तनिक भी विचलित नहीं हुईं और शांत स्वर में बोलीं थीं, “आपकी तरफ़ से तो मैं पूरी तरह से निश्‍चिंत हूं. रजत और रितु आपका बहुत ख़्याल रखेंगे, यह एक मां के अंतर्मन की आवाज़ है, उसका विश्‍वास है जो कभी ग़लत नहीं हो सकता.”

इस घटना के पांच दिन बाद ही मम्मी चली गईं थीं. कितने टूट गए थे पापा. बिल्कुल अकेले पड़ गए थे. उनके अकेलेपन की पीड़ा को मुझसे अधिक मेरी पत्नी रितु ने समझा. यूं भी वह पापा के दोस्त की बेटी थी और बचपन से पापा से दिल से जुड़ी हुई थी. उसने कभी नहीं चाहा, पापा को अपने से दूर करना, किंतु मेरा मानना था कि कोरी भावुकता में लिए गए फैसले अक्सर ग़लत साबित होते हैं. इंसान को प्रैक्टिकल अप्रोच से काम लेना चाहिए. अकेले मैं ही क्यों पापा का दायित्व उठाऊं? दोनों बड़े भाई क्यों न उठाएं? जबकि पापा ने तीनों को बराबर का स्नेह दिया, पढ़ाया, लिखाया, तो दायित्व भी तीनों का बराबर है. छह माह बाद मम्मी की बरसी पर यह जानते हुए भी कि दोनों बड़े भाई पापा को अपने साथ रखना नहीं चाहते, मैंने यह फैसला किया था कि हम तीनों बेटे चार-चार माह पापा को रखेंगे. पापा को जब इस बात का पता चला, तो कितनी बेबसी उभर आई थी उनके चेहरे पर. चेहरे की झुर्रियां और गहरा गई थीं. उम्र मानो 10 वर्ष आगे सरक गई थी. सारी उम्र पापा की दिल्ली में गुज़री थी. सभी दोस्त और रिश्तेदार यहीं पर थे, जिनके सहारे उनका व़क्त कुछ अच्छा बीत सकता था, किंतु… सोचते-सोचते मैंने एक गहरी सांस ली.

आंखों से बह रहे पश्‍चाताप के आंसू पूरी रात मेरा तकिया भिगोते रहे. उफ्… यह क्या कर दिया मैंने. पापा को तो असहनीय पीड़ा पहुंचाई ही, मम्मी के विश्‍वास को भी खंडित कर दिया. आज वह जहां कहीं भी होंगी, पापा की स्थिति पर उनकी आत्मा कलप रही होगी. क्या वह कभी मुझे क्षमा कर पाएंगी? रात में कई बार अम्मा का रमाशंकर को आवाज़ देना और हर बार उसका चेहरे पर बिना शिकन लाए उठना, मुझे आत्मविश्‍लेषण के लिए बाध्य कर रहा था. उसे देख मुझे एहसास हो रहा था कि इंसानियत और बड़प्पन हैसियत की मोहताज नहीं होती. वह तो दिल में होती है. अचानक मुझे एहसास हुआ, मेरे और रमाशंकर के बीच आज भी प्रतिस्पर्धा जारी है. इंसानियत की प्रतिस्पर्धा, जिसमें आज भी वह मुझसे बाज़ी मार ले गया था. पद भले ही मेरा बड़ा था, किंतु रमाशंकर का क़द मुझसे बहुत ऊंचा था.

गाड़ी मुंबई सेंट्रल पर रुकी, तो मैं रमाशंकर के क़रीब पहुंचा. उसके दोनों हाथ थाम मैं भावुक स्वर में बोला, “रमाशंकर मेरे दोस्त, चलता हूं. यह सफ़र सारी ज़िंदगी मुझे याद रहेगा.” कहने के साथ ही मैंने उसे गले लगा लिया.

आश्‍चर्यमिश्रित ख़ुशी से वह मुझे देख रहा था. मैं बोला, “वादा करो, अपनी फैमिली को लेकर मेरे घर अवश्य आओगे.”

“आऊंगा क्यों नहीं, आखिऱ इतने वर्षों बाद मुझे मेरा दोस्त मिला है.” ख़ुशी से उसकी आवाज़ कांप रही थी. अटैची उठाए पापा के साथ मैं नीचे उतर गया. स्टेशन के बाहर मैंने टैक्सी पकड़ी और ड्राइवर से एयरपोर्ट चलने को कहा. पापा हैरत से बोले, “एयरपोर्ट क्यों?” भावुक होकर मैं पापा के गले लग गया और रुंधे कंठ से बोला, “पापा, मुझे माफ़ कर दीजिए. हम वापिस दिल्ली जा रहे हैं. अब आप हमेशा वहीं अपने घर में रहेंगे.” पापा की आंखें नम हो उठीं और चेहरा खुशी से खिल उठा.

“जुग जुग जिओ मेरे बच्चे.” वह बुदबुदाए. कुछ पल के लिए उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं, फिर चेहरा उठाकर आकाश की ओर देखा. मुझे ऐसा लगा मानो वह मम्मी से कह रहे हों, देर से ही सही, तुम्हारा विश्‍वास सही निकला.

renu mandal

      रेनू मंडल

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कहानी- प्यार का सच (Short Story- Pyar Ka Sach)

एक बार फिर मेरा मन झूठे सपनों के पीछे भागने लगा था. कुछ दिनों बाद ही बीपीएससी का रिज़ल्ट भी आ गया था. मैंने परीक्षा पास कर ली थी. एक बार फिर मैं पटना में थी. मैं तुमसे मिलने तुम्हारे ऑफिस चली गई थी. तुमने जल्द ही मुझे अंदर बुला लिया था. मैं तुम्हारे सामने बैठी थी, पर न जाने क्यूं अपनत्व का कोई एहसास आज मुझे महसूस नहीं हो रहा था.

Kahani

निरंतर भागता वक़्त भले ही आदमी के जीवन में उसके आचार-विचार और हालात सब बदल देता है, फिर भी व़क्त के शोकेस में आदमी के जीवन के कुछ लम्हे ज्यों के त्यों दिल के हिमखंड के नीचे अछूते पड़े रह जाते हैं, जिसे ताउम्र न व़क्त बदल पाता है, न आदमी ख़ुद मिटा पाता है. एक लंबा समय गुज़र जाने के बाद भी मैं क्या उस लिखे को चाहकर भी मिटा पाई हूं, जिसे कभी व़क्त ने मेरे अतीत के पन्नों पर लिखा था.

आज कितने दिनों बाद मैं घर में अकेली थी. वह भी छुट्टी के दिन. सासू मां मेरे बेटे विनायक और पति नवीनजी के साथ एक रिश्तेदार के घर गई थीं. फुर्सत के पल पाकर मैं सोना चाहती थी, पर एकाकी पल पाकर अतीत के पन्नों की फड़फड़ाहट कुछ ज़्यादा ही बढ़ने लगी थी. न चाहते हुए भी तुम्हारी बहुत याद आ रही थी, साथ ही वे अनकहे प्रश्‍न भी सामने आ खड़े हुए थे, जिनके उत्तर तुमसे पूछने थे, पर उत्तर मैंने ख़ुद ही ढूंढ़ लिए थे.

मैं मानती हूं कि जीवन में हम दोनों इतने आगे निकल आए हैं कि अब उन प्रश्‍नों के कोई मायने नहीं रह गए हैं, फिर भी मुझे लगता है कि कभी हम दोनों ने एक-दूसरे को टूटकर चाहा था. मेरे भविष्य की एक-एक योजना के तुम केंद्रबिंदु हुआ करते थे, फिर चुपचाप मेरे जीवन से पलायन कर मेरे जीवन में शून्यता और रिक्तता भर क्यूं मेरे जीवन को नीरस और बेज़ार बना दिया? बिना किसी अपराध के ठुकराकर, जो मेरा अपमान किया था, उसकी कचोट आज भी मुझे महसूस होती है.

भले ही हम दोनों ने कभी एक-दूसरे को ‘आई लव यू’ नहीं कहा था, फिर भी उस कच्ची उम्र में भी हम दोनों जानते थे कि हमारा प्यार शब्दों का मोहताज नहीं था. बिना बोले ही तुमने मुझे अपने प्यार का एहसास इतनी गहराई से करवाया था कि मैं तुम्हारे अलावा किसी और से शादी करने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी. कॉलेज में फर्स्ट ईयर से ही हम दोनों ज़िंदगी की धूप-छांव में साथ रहे. एक दिन भी तुम मुझे कॉलेज में नहीं देख पाते, तो मेरे घर के आसपास मंडराने लगते. सबकी नज़रों से छुपाकर दिए गए तुम्हारे एक-एक फूल को मैं भी कितने जतन से किताबों में छुपाकर रखती थी. फूलों का पूरा एक हरबेरियम ही तैयार हो गया था. आज भी वह हरबेरियम पटना में मेरे पढ़ने की आलमारी में रखा हुआ है, जो हमारे प्यार का गवाह है.

ग्रेजुएशन में तुम पूरी यूनिवर्सिटी में फर्स्ट आए थे. तुम्हारी अलमस्त और बे़िफ़क्र ज़िंदगी में नौकरी की फ़िक्र भी मेरे ही कारण समा गई थी. इस फ़िक्र ने तुम्हें पूरी तरह विकल और बेचैन कर रखा था, जो तुम्हारे चेहरे से स्पष्ट दिखता था, जिसे महसूस कर मैंने एक फिल्मी डायलॉग मारा था.

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“चिंता क्यूं करते हो, सच्चा प्यार करनेवालों को मिलाने में सारी कायनात जुट जाती है.”

“चिंता कैसे ना करूं? कोई अच्छी नौकरी नहीं मिली, तो तुम्हारे सारे फिल्मी डायलॉग धरे के धरे रह जाएंगे. तुम्हारे पिताजी ख़ुद इतनी ब़ड़ी पोस्ट पर हैं, मुझ जैसे साधारण परिवार के लड़के को क्या देखकर तुम्हारा हाथ सौंपेंगे? तुम्हारे घर की शानो-शौक़त भी तो कम नहीं है, जिसे देखकर मुझे दूर से ही घबराहट होने लगती है. तुम्हें पाने के लिए मुझे कम-से-कम एक उच्च पद तो प्राप्त करना ही होगा.”

फिर तुमने एमएसी की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दिल्ली के एक कोचिंग सेंटर में दाख़िला लेने का फैसला कर लिया था. मेरे मना करने पर भी नहीं माने थे. तुमने कहा था, “अगर सम्मान से समाज में जीना है, तुम्हारा प्यार पाना है, तो मुझे दिल्ली जाना ही होगा. फिर शान से लौटकर तुम्हारे जीवन में आऊंगा. यह वादा है मेरा. इंतज़ार करना मेरा.”

तुम्हारे इसी आत्मविश्‍वास ने मुझे तुम्हारा इंतज़ार करने का हौसला दिया था. एमएसी करने के बाद दूसरे कोर्स करने के बहाने मैं अपनी शादी टालती रही. पूरे चार वर्ष गुज़र गए, पर तुमने मेरी कोई सुध नहीं ली. पापा जल्द-से-जल्द मेरी शादी कर अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त होना चाहते थे. मैं पल-पल तुम्हारे संदेश का इंतज़ार कर रही थी. तुम्हारे आने का इंतज़ार कर रही थी, पर न तुम आए और न तुम्हारा कोई संदेश आया था. मेरा धैर्य समाप्त होने लगा था. तुम्हारी परवाह करते-करते मैं अपने परिवार के प्रति बेपरवाह भी तो नहीं हो सकती थी. पूरे पांच बरसों तक अपना विवाह टालती रही थी. अब पापा के सामने दलीलें देना बंद कर मैं ख़ामोश हो गई थी. एक के मान के लिए सबका अपमान नहीं कर सकती थी मैं. तुम्हारे विषय में कहां पता करती. तुम्हारा घर भी तो शहर के अंतिम छोर पर था, जिसका सही पता भी मेरे पास नहीं था.

पापा से भी कैसे तुम्हारे विषय में बात करती. तुमने कोई आधार ही नहीं छोड़ा था. साथ में एक झिझक भी थी, नारी सुलभ लज्जा और पारिवारिक संस्कार, जिसने मेरे होंठ सी रखे थे. मुझे पापा की इच्छा के सामने झुकना ही पड़ा था. तुमने भले ही मुझे रुसवा कर अपमानित किया था, पर मैं अपने आचरण से पापा को अपमानित और दुखी नहीं कर सकती थी, इसलिए मुझे उनके द्वारा तय की गई शादी को स्वीकारना ही पड़ा.

शादी की रस्में शुरू हो गई थीं. मैं दुल्हन थी, पर न चेहरे पर कोई ख़ुशी थी, न मन में कोई उल्लास. आंखें रो-रोकर फूल गई थीं, जिसे लोग मायका छूटने की व्यथा समझ रहे थे. नियति भी हमारे साथ न जाने कैसे-कैसे खेल खेलती है. शादी में मात्र चार दिन बाकी थे तब नैना, जो कभी हमारी क्लासमेट हुआ करती थी, ने मुझे बताया कि आज ही तुमसे उसकी मुलाक़ात हुई है. तुम एक आईएएस अधिकारी बन गए हो और टे्रनिंग समाप्त कर पटना लौटे हो. अपने पुराने सभी सहपाठियों से मिलना चाहते हो.

यह सब सुनकर मैं स्तब्ध रह गई थी. इतने दिनों बाद ख़बर मिली भी तो तब, जब रस्मों-रिवाज़ के साथ एक नए रिश्ते में बंधने की मेरी सारी तैयारी पूरी हो चुकी थी. दिल चाह रहा था कि अभी भी समय है, सारे बंधन तोड़कर तुम्हारे पास चली आऊं. तभी दिमाग़ ने दिल पर लगाम लगाई. ट्रेनिंग समाप्त होने के बाद तुमने क्यूं ख़बर भेजी? पहले क्यूं नहीं मिलने आए? सच कहूं, तो उस समय घुटन की वेदना असहनीय हो उठी थी. पैर अवश हो गए थे. मैं धम्म् से बिस्तर पर बैठ गई थी. तुम पर इतना बड़ा विश्‍वास कैसे कर लेती. अब तक के तुम्हारे आचरण ने मुझे घुटन, दर्द, अपमान के सिवा कुछ नहीं दिया था. तुमने अगर मुझसे अपने सारे संबंध तोड़ लिए थे, तो साफ़-साफ़ मुझे बताया होता. तुम्हारे प्यार का भ्रम ही टूट जाता. तुम्हारी चुप्पी को हां समझकर अब मैं अपने जन्मदाता के अपमान और कलंक का कारण नहीं बन सकती थी. दोनों कुल को कलंकित नहीं कर सकती थी.

मन की गति भी कितनी विचित्र होती हैं, जिसके बिना जीने की कल्पना तक नहीं की थी, जिसके साथ भविष्य के अनगिनत ताने-बाने बुने थे मैंने, उसी की सारी यादों को रद्दी पेपर की तरह लपेटकर शादी के हवन कुंड में डाल एक अजनबी के साथ कदम-से-कदम मिलाकर सात फेरे ले, पूरी निष्ठा से उसके साथ जीवन में आगे बढ़ गई थी.

ससुराल आकर मैं सामान्य रूप से रस्मों-रिवाज़ और कर्त्तव्यों का पालन सही ढंग से करने की कोशिशें कर रही थी, पर मन था कि तुम्हारे ही सपने देखने लगता. नवीनजी के स्थान पर मन में तुम ही नज़र आते, यह जानते हुए कि जीवन अपनी ही बनाई शर्तों पर चल रहा है. तुम्हारे विषय में सोचना व्यर्थ है. मन को बहलानेवाली बात है.

धीरे-धीरे तीन वर्ष गुज़र गए. इन बरसों में मेरे जीवन में ढ़ेर सारे परिवर्तन आए. वैसे भी शादी के बाद लड़कियों के जीवन की दिशा और दशा दोनों ही बदल जाती है, जो उसे प्रलय को भी झेलने की शक्ति देती है. नए परिवेश में नए लोगों के साथ सामंजस्य  बैठाने की चेष्टा में उसका पूरा व्यक्तित्व ही बदल जाता है, उसमें पहले से भिन्न एक नई आत्मा का प्रवेश हो जाता है, जिसमें उसके जीवन की हर पुरानी बात अतीत की परछाईं मात्र रह जाती है. वैसे भी समय की गति इतनी तेज़ होती है कि जीवन के हर विनाशकारी तत्वों को अपने साथ बहा ले जाती है, तब होती है एक नए सृजन की शुरुआत. एक नई दुनिया का आवाहन. मैं भी एक नए सृजन में व्यस्त हो गई थी.

इन गुज़रे बरसों में  मेरे तमाम अनसुलझे-अनकहे सवालों के जवाब भले ही नहीं मिले, पर एक परिवर्तन ज़रूर मेरे अंदर आया. मैं नवीनजी से धीरे-धीरे बहुत प्यार करने लगी. जब मेरे अंदर किसी नए मेहमान के आने का आगाज़ हुआ, अपने अंदर उसके दिल की धड़कनें सुनाई देने लगीं, सारी विनाशकारी सोच समाप्त हो गई. उसके आने के उत्साह से ख़ुद-ब-ख़ुद तुम्हारी यादों पर धूल जमने लगी. मेरा जुड़ाव इस घर में रहनेवाले लोगों से हो गया. इस घर के हर सुख-दुख से मैं इस कदर जुड़ गई थी कि यहां की हर वस्तु मेरी अपनी हो गई थी. यहां से जितना अपनापन बढ़ रहा था, तुमसे उतना ही परायापन बढ़ने लगा. सच कहूं तो तुमसे मोहभंग हो गया.

नवीनजी भी मुझे बहुत प्यार करने लगे थे. भरपूर मान-सम्मान देते थे. मैं ख़ुश थी कि वह मेरे माता-पिता की कसौटी पर भी खरे उतरे थे, इसलिए मेरे मायकेवाले भी मेरा सुख देखकर सुखी थे. बस, एक ही बात मन में हमेशा उमड़ती-घुमड़ती रहती थी कि एक बार तुमसे आमने-सामने आकर अपने अनसुलझे प्रश्‍नों के उत्तर पूछूं.

पूछूं तुमसे कि मुझे यूं रुसवा करने का कारण क्या था? वह मौक़ा भी मुझे मिल ही गया था, जब मैं बीपीएससी की लिखित परीक्षा पास कर इंटरव्यू देने पटना गई थी. इंटरव्यू बोर्ड में तुम भी थे. पहले से ही मैं काफ़ी नर्वस थी. सामने तुम्हें बैठे देख मेरा मन और भी घबरा गया था, पर तुम पहले की तरह ही संकुचित और ख़ामोश बैठे मुझे देख रहे थे. जब प्रश्‍न पूछने की तुम्हारी बारी आई, तो बहुत ही अपनत्वभरे व्यवहार से तुमने मुझसे प्रश्‍न पूछे थे. एक बार तो मुझे यह भी लगा कि तुम मेरी सहायता करना चाह रहे हो, फिर तो मैं ज़्यादा देर तक तुमसे नाराज़ नहीं रह पाई थी. मुझे तुम्हारा वहां होना अच्छा लगने लगा.

इंटरव्यू के बाद जब मैं बाहर निकलकर कैंपस में बने बेंच पर आकर बैठी, तो दिल की धड़कनों पर काबू रखना मुश्किल हो रहा था. अभी जो आत्मीयता इंटरव्यू के दौरान महसूस हुई थी, वह बरसों पहले हम दोनों के बीच की आत्मीयता की याद दिला गई. अभी मैं उलझन में ही थी कि तुम्हारा ड्राइवर आकर मुझसे बोला था, “मुझे साहब ने भेजा है, चलिए आपको घर छोड़ दूं.”

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दूर खड़े तुम मुस्कुरा रहे थे, तब मुझे लगा था कि मैं ग़लत नहीं थी. तुम अब भी मुझे प्यार करते हो. मेरा साथ चाहते हो. मुझे ख़ुद को ख़ास होने का आभास होने लगा था. उतनी ही शिद्दत से तुम्हारे प्यार को खो देने का मलाल भी हुआ था. एक चुंबकीय शक्ति मुझे तुम्हारी ओर खींचने लगी थी. मेरी बरसों की शांति भंग हो गई थी.

एक बार फिर मेरा मन झूठे सपनों के पीछे भागने लगा था. कुछ दिनों बाद ही बीपीएससी का रिज़ल्ट भी आ गया था. मैंने परीक्षा पास कर ली थी. एक बार फिर मैं पटना में थी. मैं तुमसे मिलने तुम्हारे ऑफिस चली गई थी. तुमने जल्द ही मुझे अंदर बुला लिया था. मैं तुम्हारे सामने बैठी थी, पर न जाने क्यूं अपनत्व का कोई एहसास आज मुझे महसूस नहीं हो रहा था. आईएएस ऑफिसर बन जाने की शालीनता तुम्हारे चेहरे से झलक रही थी. तुम पहले से काफ़ी स्मार्ट नज़र आ रहे थे. मुझे देख बेचैनी से पहलू बदलते हुए तुमने कहा था, “तुम्हारा बीपीएसी में सिलेक्शन हो गया, यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई. तुम्हें मेरी हार्दिक बधाई. तुम जॉइन करने की तैयारी करो, मुझे एक काम से जाना है.”

तुम उठ गए थे. मैं भी तुम्हारे साथ बाहर आ गई थी. मैं घर लौट आई थी. मुझे आभास हो गया था कि इधर कुछ दिनों से जो मैं सोच रही थी, वह मेरा भ्रम मात्र था. समय के साथ अब तुम्हारी सोच शायद बदल गई थी. कम उम्र का प्यार, तुम्हारी नज़रों में अब शायद बचपना था, जिसमें कोई गहराई नहीं थी. अब तुम्हारी सोच परिपक्व हो गई थी, इसलिए तुम्हारा मुझे आज की तरह छोड़कर चले जाना ही सत्य था, बाकी सब नज़रों का धोखा. बदलते परिवेश में तरुणाई का बचपनवाला प्यार, तुम्हारी नज़रों में शायद नासमझी और पागलपन साबित हुआ था, इसलिए निरस्त हो गया. तभी सब कुछ तुमने आसानी से भुला दिया.

घर आई तो प्रभु दौड़कर मुझसे लिपट गया. उसकी आवाज़ से मेरे मन के सोए हुए तार झंकृत हो गए. उसे सीने से लगाकर मैं रो पड़ी थी. रोने का कारण नहीं समझने पर भी नवीनजी ने आगे बढ़कर मुझे संभाल लिया था. मैंने अपना सिर नवीनजी के सीने पर टिका दिया था. लंबे झंझावातों के बाद एक गहरी शांति का अनुभव हुआ. मुझे अपने सारे प्रश्‍नों के उत्तर जैसे मिल गए थे. अब यही सत्य था. यही मेरी दुनिया थी. यही मेरा प्यार था. बाकी सब मिथ्या था, भ्रम मात्र तभी कॉलबेल की आवाज़ से मेरी तंद्रा भंग हो गई. अतीत के पन्ने ख़ुद-ब-ख़ुद सिमटकर बंद हो गए. मन यथार्थ को टटोलता उससे जुड़ने लगा था. शायद घर के लोग वापस आ गए थे.

 

Rita kumari

   रीता कुमारी

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कहानी- मूल्यांकन (Short Story- Mulyankan)

अपने जीवन में मैंने कई बुज़ुर्गों को उपेक्षित जीवन जीते देखा है. जब घर बनवाया, तभी सोच लिया था कि पापाजी को सबसे बड़ा, सुंदर और आरामदायक कमरा देंगे, पर इस चक्कर में हमने पापाजी को कमरे से ही बांध दिया. साथ ही अकेलेपन से भी.

Kahani

“मम्मीजी, नेहा दीदी का फोन है.” स्वरा की आवाज़ पर नलिनी ने फोन हाथ में लिया. ‘हेलो’ कहते ही नेहा की घबराई-सी आवाज़ आई, “मम्मी, एक प्रॉब्लम हो गई है.  मां बाथरूम में गिर गई हैं. उनके बाएं हाथ में फ्रैक्चर आया  है.”

“अरे! कैसे… कहां… कब… अभी कैसी हैं? कोई है उनके पास…” नेहा की ‘मां’ यानी सास के गिरने की ख़बर सुनकर नलिनी ने एक साथ कई सवाल पूछ डाले, तो प्रत्युत्तर में नेहा रोनी आवाज़ में बोली, “वो इंदौर में ही हैं. आज रात उन्हें अहमदाबाद के लिए चलना था. उन्हें हाथ में फ्रैक्चर हुआ है. अब कैसे आएंगी. मम्मी, अब मेरा क्या होगा… दो हफ़्ते बाद सलिल को कनाडा जाना है और अगले हफ़्ते मेरी डिलीवरी है. मम्मी, आप आ पाओगी क्या?”

नेहा के पूछने पर नलिनी एकदम से कोई जवाब नहीं दे पाई. एक महीने पहले ही बेटे का ब्याह किया है. नई-नवेली बहू को देखते हुए ही प्रोग्राम तय हुआ था कि डिलीवरी के समय नेहा की सास अहमदाबाद आ जाएंगी और एक-डेढ़ महीना रुककर वापस आएंगी, तब वह जाएगी. ऐसे कम से कम ढाई-तीन महीने तक नेहा और उसके बच्चे की सार-संभाल हो जाएगी.

“तू घबरा मत, देखते हैं क्या हो सकता है.” नेहा को तसल्ली देकर नलिनी ने फोन रखा और प्रेग्नेंट बेटी की चिंता में कुछ देर यूं ही बैठी रही. परिस्थिति वाकई विकट थी. समधनजी के हाथ में फ्रैक्चर होने से उनके साथ-साथ सबके लिए मुश्किलें बढ़ गईं.

क्या-कैसे होगा इस चिंता से उन्हें बहू स्वरा ने उबारते हुए कहा,  “मम्मीजी आप दीदी के पास अहमदाबाद चली जाइए.  मैं यहां सब संभाल लूंगी.”

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नलिनी के हिचकने पर उसके ससुर भी  बोले, “इतना सोचनेवाली कौन-सी बात है. नील तो है यहां… अब तो स्वरा भी है. तुम और उपेन्द्र तुरंत निकलो.”

“पर पापाजी, आप कैसे रहेंगे? आपकी देखभाल, परहेज़ी खाना…”

“सब हो जाएगा, मेरे बहू-बेटे नहीं होंगे तो क्या, तुम्हारे बेटा-बहू तो हैं ना.”

“अरे पापाजी, नील को तो ऑफिस से ़फुर्सत नहीं है और इसे आए अभी महीनाभर ही हुआ है. इनके भरोसे कैसे…” नलिनी हिचकिचाई, तो 80 बरस के बूढ़े ससुरजी हंसते हुए बोले, “मैं कोई छोटा बच्चा हूं, जो अपनी देखभाल न कर पाऊं… और न स्वरा बच्ची है, जो घर न संभाल पाए. तुम्हारी शादी हुई थी, तब तुमने 20 बरस की उम्र में सब संभाल लिया था. और तुम्हारी सास तो 16 बरस की ही थी, जब ब्याहकर आई थी. अरे, स्वरा कैसे नहीं संभालेगी घर… क्यों स्वरा, संभालेगी न?”

“हां जी, दादाजी…” क्या कहती स्वरा और क्या कहती नलिनी अपने ससुर को कि तब के और आज के ज़माने में बहुत फ़र्क़ है. नलिनी का सिर अपने ससुर के सामने श्रद्धा से झुक गया.

विपरीत परिस्थितियों के चलते ‘मैं ख़ुद को संभाल लूंगा.’ कहकर उसका मनोबल बढ़ा रहे हैं, जबकि वह जानती है कि पापाजी  को बाथरूम तक जाना भारी पड़ता है. पापाजी और घर की ज़िम्मेदारी स्वरा के भरोसे  छोड़ने में उन्हें डर ही लग रहा था. आजकल की लड़कियां क्या जानें घर की सार-संभाल… पर पापाजी और परिस्थितियों के आगे वह विवश थी.

यूं तो स्वरा एक महीने से घर में है, पर अधिकतर समय तो मायके-हनीमून और घूमने-फिरने में ही निकल गया. वह स्वयं बेटे की शादी के बाद बड़े प्रयास से घर की व्यवस्था पुरानी पटरी पर लौटा पाई थी. अब यूं अचानक घर छोड़-छाड़कर अहमदाबाद के लिए निकलने को मन नहीं मान रहा था, पर मौ़के की नज़ाकत समझते हुए घर की व्यवस्था-पापाजी के परहेज़ों और दवाइयों के बारे में  नील-स्वरा को समझाकर वह और उपेन्द्र तुरंत हवाई जहाज से अहमदाबाद के लिए निकल गए. नौवें महीने के आख़िरी हफ़्ते में कब डिलीवरी हो जाए, कुछ पता नहीं.

मम्मी-पापा को देखकर नेहा का सारा तनाव छूमंतर हो गया. उनके पहुंचने के चार दिन बाद ही उसने पुत्री को जन्म दिया. कुछ दिनों बाद दामाद सलिल कनाडा चले गए. नलिनी ने घर की सारी व्यवस्था संभाल ली और उपेन्द्र ने बाहर की. नेहा और नन्हीं परी के बीच समय कैसे निकलता, कुछ पता ही नहीं चलता. भोपाल फोन करने पर पापाजी- ‘यहां की चिंता मत करो सब ठीक है’ कहकर तसल्ली दे देते.

40 दिन बाद नेहा ने नलिनी से कहा, “मम्मी, अगले हफ़्ते सलिल आ जाएंगे. मैं भी चलने-फिरने लगी हूं. आप चाहो, तो भोपाल चली जाओ.” यह सुनकर नलिनी ने राहत की सांस ली. मन तो घर में अटका ही था, सो नेहा के कहने पर दो दिन और रुककर नलिनी ने वापसी का टिकट करवा लिया. साथ ही उपेन्द्र और नेहा को कह दिया कि उनके भोपाल पहुंचने की ख़बर पापाजी, नील-स्वरा को कतई न दें. सरप्राइज़ का मज़ा रहेगा.

सरप्राइज़ की बात सुनकर नेहा ख़ुशी-ख़ुशी मान गई, पर उपेन्द्र पहुंचने की सूचना न देने से कुछ असहज थे.

रास्ते में ट्रेन में उन्होंने इस बाबत नलिनी से बात की, तो वह बोली, “पहली बार स्वरा के भरोसे पापाजी और घर की ज़िम्मेदारी छोड़ी है. पापाजी-नील तो सीधे-सादे हैं, जब भी फोन किया ‘सब ठीक है, चिंता मत करो’ कहते रहे. अचानक पहुंचने पर स्वरा का असली मूल्यांकन हो पाएगा कि वो घर संभालने में कितनी सक्षम और घरवालों के प्रति कितनी संवेदनशील है.

यह सुनकर उपेन्द्र अवाक रह गए. नलिनी के फोन न करने के पीछे छिपी मानसिकता का उन्हें ज़रा भी भान नहीं था. वो तो समझे बैठे थे कि नलिनी अचानक पहुंचकर उन्हें सुखद आश्‍चर्य में डुबोने का मंतव्य रखती है.

बिना किसी को सूचित किए उपेन्द्र और नलिनी घर पहुंचे, तो ख़ुद सरप्राइज़ हो गए, जब घर में ताला लगा देखा. बाहर का गेट किराएदार ने खोला और बताया कि सब लोग सुबह से ही बाहर हैं. घर के बरामदे में उन्हें बैठाकर वह चाभी लेने चला गया. आसपास नज़र दौड़ाते नलिनी-उपेन्द्र बेतरह चौंके, जब उन्होंने पापाजी के कमरे की बेंत की आरामकुर्सी और मेज़ बरामदे में रखी देखी.

किराएदार से चाभी लेकर ताला खोला, तो सकते में आ गए. पापाजी के कमरे में परदे और पेंटिग्स के अलावा कुछ नहीं था. दीवान-आलमारी सब बरामदे से लगे छोटे-से गेस्टरूम में आ चुके थे. कमरे का हुलिया देखकर नलिनी को बहुत ग़ुस्सा आया. कितने सुरुचिपूर्ण ढंग से पापाजी का कमरा सजाया गया था. सुंदर परदे, पेंटिंग्स, केन की कुर्सियां, जिसमें मखमल की गद्दी लगी हुई थी. अख़बार रखने के लिए तिपाई… एक छोटा टीवी… सारी सुविधा से संपन्न बुज़ुर्ग आज उसकी अनुपस्थिति में गेस्टरूम में पहुंच गए थे.

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“कल की आई लड़की की हिम्मत देखो उपेन्द्र, पापाजी का ये हाल किया, तो हमारा क्या हाल करेगी बुढ़ापे में.” आवेश में बड़बड़ाती हुई नलिनी पूरे घर में घूम आई थी. बाकी घर का हुलिया ठीक-ठाक ही था… नील के ऊपर भी उसे बहुत क्रोध आया.

उसी समय नलिनी से मिलने बगलवाली पड़ोसन आ गई. नलिनी को देखकर वह बोली, “तुम्हें ऑटो से उतरते देखा तो चली आई. अच्छा हुआ तुम आ गई. तुम नहीं थी, तो तुम्हारे ससुर का तो बड़ा बुरा हाल था.

एक-दो बार आई मिलने तभी जाना कि तुम्हारी नई-नवेली बहू ने उन्हें अपने कमरे से बेदख़ल कर दिया है. मैं तो अक्सर उन्हें बरामदे या लॉन में भटकते देखती थी. अब हम लोग तो उसे कुछ कह नहीं सकते, वैसे भी आजकल की लड़कियां किसकी सुनती हैं. कहीं पलटकर मुझे कुछ कह देती तो भई, मैं तो न सह पाती. बस, तुम्हारे ससुर को देखकर बुरा लगता था. तुम लोगों ने उन्हें इतने आदर से रखा, पर तुम्हारी बहू ने तो…” वह बोल ही रही थी कि पापाजी की रौबदार आवाज़ आई, “बेटाजी, आप मेरे लिए इतना परेशान थीं, यह जानकर बड़ा अच्छा लगा, पर अपनी परेशानी मुझसे साझा कर लेतीं, तो ज़्यादा अच्छा होता.”

यह सुनकर पड़ोसन हकबका गई और नलिनी सिर पर आंचल रखकर ससुरजी के पांव छूने लगी.

“आप कहां गए थे पापा? और अकेले कहां से आ रहे हैं?”

“अकेला नहीं हूं स्वरा है बाहर. कोई जाननेवाला मिल गया है, उससे बात करने लगी है. पर ये बताओ, तुम लोग आनेवाले हो, ये किसी को बताया क्यों नहीं?” पापाजी ने पूछा तो उपेन्द्र बगले झांकते हुए बोले, “नलिनी आप लोगों को सरप्राइज़ देना चाहती थी.”

उपेन्द्र की बात सुनकर पापाजी कुर्सी से अपनी छड़ी टिकाते बोले, “सरप्राइज़ तो हम अच्छे से हो गए, पर जान जाते तुम लोग आनेवाले हो, तो डॉक्टर का अपॉइंटमेंट न लेते. घर पर ही मिलते.”

“सब ठीक तो है पापा…?” उपेन्द्र ने चिंता से पूछा, तो वह बोले, “सब ठीक है भई, डायबिटीज़ कंट्रोल में है.”

“पापाजी आप यहां कैसे आ गए? मतलब, इस छोटे से गेस्टरूम में.” नलिनी के पूछने पर वह बोले, “अरे, अभी इन्होंने तो बताया कि तुम्हारी बहू ने मुझे यहां भेज दिया और हां बेटाजी…” अब पापाजी पड़ोसन से मुखातिब थे, “तुम जो अभी मेरी बहू के कान भर रही थी कि मुझे मेरे कमरे से बेदख़ल कर दिया गया, तो सोचो, ऐसी हालत में तो मैं यहां दुखी-ग़मगीन-सा दिखता… और बेटे-बहू की नाक में दम न कर देता कि जल्दी आओ…”

“सॉरी अंकलजी, मैंने जो महसूस किया, सो कह दिया नलिनी से.”

“द़िक्क़त यही है, हम जो महसूस करते हैं, वो सही पात्र से नहीं कहते. तुमने जो महसूस किया, उसकी चर्चा मुझसे कर लेती तो ठीक रहता. अब देखो, जैसे मैं अपने बेटे-बहू से नहीं कह पाया कि मेरे बड़े से कमरे में मुझे अकेलापन लगता है.

नलिनी-उपेन्द्र ने इस घर का सबसे अच्छा कमरा मुझे दिया. इतने प्यार से सजाया-संवारा, पर सच कहूं तो कमरे से बरामदे और लॉन के बीच की दूरी के चलते आलसवश टहलना छूट गया.”

“अरे, तो ये बात पहले क्यों नहीं कही पापाजी?”

नलिनी के कहने पर पापाजी भावुक होकर बोले, “संकोचवश न कह पाया. कैसे कहता बेटी, जिस कमरे के परदे के सेलेक्शन के लिए तुम दस दुकानें घूमी हो, जिसके डेकोर के लिए तुम घंटों नेट के सामने बैठी हो, उस कमरे के लिए कैसे कह देता कि मुझे यहां नहीं रहना है. तू तो मेरी प्यारी बहू है, पर तेरी बहू तो मेरी मां बन गई. वह तो सीधे ही बोली, ‘दादाजी, आप दिनभर कमरे में क्यों बैठे रहते हैं. आलस छोड़िए, बैठे-बैठे घुटने और ख़राब हो जाएंगे.’ उसने मेरे कमरे से

कुर्सी-मेज़ निकलवाकर बरामदे में डलवा दिया. मैंने कहा कि लेटने के लिए कमरे तक जाना भारी पड़ता है, तो यह सुनकर तुम्हारी बहू बोली, ‘दादाजी जब तक सर्दी है, तब तक के लिए गेस्टरूम में शिफ्ट हो जाएं.’ मुझे भी सही लगा. आराम करने की तलब होने पर बरामदे और लॉन से गेस्टरूम आना सुविधाजनक था. गेस्टरूम से लॉन-बरामदा सब दिखता है. जब मन करता है बरामदे में टहल लेता हूं… जब इच्छा हो, लॉन में पेड़-पौधे, फूल-पत्तियां देख लेता हूं… किराएदार के बच्चे खेलते हैं, तो उनकी आवाज़ मन में ऊर्जा भर देती है. किराएदार के बच्चे नीचे खेलने आते हैं, तो दो बातें उनसे भी कर लेता हूं… छोटावाला तो रोज़ नियम से शाम छह बजे लूडो ले आता है. बुरा न मानना बेटी, ये कमरा छोटा ज़रूर है, पर इसमें पूर्णता का एहसास है. चलने-फिरने  में गिरने का डर नहीं रहता  है. आसपास खिड़की-दरवाज़े, मेज़-कुर्सी का सहारा है. छड़ी की ज़रूरत नहीं.”

“अरे वाह! मम्मीजी आ गईं…” सहसा स्वरा का प्रफुल्लित स्वर गूंजा. पैर छूते हुए वह चहकी, “अरे, बताया नहीं कि आप आ रहे हैं. पता होता तो आज हम हॉस्पिटल न जाते.”

नलिनी चुप रही, तो पापाजी बोले, “तुम्हारी मम्मी तुम्हें सरप्राइज़ देना चाहती थीं.”

स्वरा चहकते हुए बोली, “आज सरप्राइज़ का दिन है क्या…? मम्मीजी पता है दादाजी की सारी रिपोर्ट्स नॉर्मल आई हैं.”

“देख लो, मेरी सैर रंग लाई.”

पापाजी के कहने पर स्वरा बोली, “मम्मीजी, बड़े जोड़-तोड़ किए दादाजी को टहलाने के लिए… रोज़ हम कहते टहलने को, तो दादाजी आज-कल कहकर टाल देते और अपने कमरे में बंद रजाई ओढ़े ठिठुरते रहते थे. बस, एक दिन इलाज निकाला पापाजी की रजाई और दीवान कमरे से हटाकर यहां डाल दी. अब प्यासे को कुएं के पास तो जाना ही था. इस कमरे के पास बरामदा होने से इनका अड्डा यहीं जमने लगा है. बरामदे और लॉन की पूरी धूप वसूलते हैं.” स्वरा हंस रही थी, पापाजी मुस्करा रहे थे, पर नलिनी मौन थी. उसे गंभीर देखकर स्वरा की हंसी थम गई.

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वह कान पकड़ते हुए बोली, “सॉरी मम्मी, नील ने पहले ही कहा था कि मेरी हरकत पर मुझे ख़ूब डांट पड़नेवाली है. सोचा था जब आप आएंगी, तब तक जनवरी की कड़ाके की सर्दी निकल जाएगी. आपके आने से पहले सारी व्यवस्था पहले जैसी कर दूंगी. पर आप तो बिना बताए आ गईं और मेरी ख़ुराफ़ात पकड़ी गई.”

यह सुनकर नलिनी गंभीरता से बोली, “बताकर आती, तो मूल्यांकन कैसे करती.”

“किस बात का?” स्वरा ने अचरज से पूछा, तो नलिनी बोली, “सिक्के के दूसरे पहलू का मूल्यांकन… सिक्के का एक पहलू सही तस्वीर नहीं दिखाता है ये आज जान लिया. अपने जीवन में मैंने कई बुज़ुर्गों को उपेक्षित जीवन जीते देखा है. जब घर बनवाया, तभी सोच लिया था कि पापाजी को सबसे बड़ा, सुंदर और आरामदायक कमरा देंगे, पर इस चक्कर में हमने पापाजी को कमरे से ही बांध दिया. साथ ही अकेलेपन से भी. इसका तोड़ निकालना पड़ेगा. सर्दी तक तो यहां ठीक है,  पर गर्मियों में पुराने कमरे में रहेंगे पापाजी. पापाजी के पुराने कमरे में लाइब्रेरी शिफ्ट करके एक छोटा-सा सोफा और क्वीन साइज़ बेड लगा देंगे. आने-जानेवाले पापाजी के कमरे में बैठेंगे, ताकि वहां रौनक़ भी रहे और बड़ा कमरा छोटा भी लगे और पापाजी का दिल भी लगा रहे.”

“अरे वाह! मम्मीजी, ये तो और भी बढ़िया आइडिया है. वैसे दादाजी दिन में यहां और रात को वहां सो सकते हैं.”

“ये लो जी, एक और आइडिया.” उपेन्द्र हंसकर बोले, तो पापाजी बनावटी दुख के साथ कहने लगे, “इसका मतलब है कि मुझे दोनों कमरों की देखभाल करनी होगी.”

स्वरा हंसकर बोली, “और नहीं तो क्या. इसी बहाने आपका एक कमरे से दूसरे तक चलना-फिरना तो होगा. कम से कम ये तो नहीं कहेंगे, हाय मेरा घुटना जाम हो गया.” अपनी नकल करती स्वरा को देख पापाजी मुस्कुराकर बोले, “नलिनी, तेरी बहू बहुत शरारती है.”

यह सुनकर नलिनी तपाक से बोली, “मेरी बहू नहीं पापाजी, आपकी मां…” सब हंसने लगे.

इस बीच किराएदार के बच्चों की गेंद बरामदे में आ गई, जो पापाजी दो कदम चलने से कतराते थे, वह बच्चों की गेंद उठाने के लिए लॉन की ओर बढ़ रहे थे. नलिनी-उपेन्द्र के लिए यह दृश्य सुखद था.

“आंटीजी, आप चाय पियेंगी?” स्वरा ने पड़ोसन से पूछा, तो वह ‘घर में काम बहुत है’ कहते हुए उठ गई. शायद उन्हें भी सिक्के के दूसरे पहलू का भान हो गया था. जाती हुई पड़ोसन को नलिनी ने नहीं रोका, उसका ध्यान तो पापाजी की ओर था… जो खिलखिलाते चेहरे के साथ गेंद बच्चों की ओर उछाल रहे थे.

Minu tripathi

     मीनू त्रिपाठी

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कहानी- सपनों के पार (Short Story- Sapnon Ke Paar)

“तुम्हें समझाया था इन रियालिटी शोज़ के चक्कर में मत पड़ो, यहां पर असफल होने के बाद युवा तो युवा, छोटे-छोटे बच्चे भी कई बार तनाव व डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं. सैकड़ों-हज़ारों में कोई ख़ुशक़िस्मत ही होता है, जिसे अपने परिश्रम व कला का सम्मान मिलता है.”

Kahaniya

मौक़ा था शादी के स्वागत समारोह का. चूंकि शादी रमन के दोस्त के बेटे की थी, अतः परिवार सहित जाना आवश्यक था. तनुजा ने अपनी पांच वर्षीया बेटी को स़फेद झालरों से सजी लंबी स्कर्ट पहनाई, जिसमें वह बेहद आकर्षक लग रही थी. जब वे आयोजन स्थल पर पहुंचे, तब पार्टी पूरे शबाब पर थी. परिचितों व मित्रों को मिलने के बाद वे वर-वधू को आशीर्वाद देने स्टेज पर पहुंचे.

स्टेज के क़रीब ही डांसिंग फ्लोर पर काफ़ी बच्चे थिरक रहे थे. डीजे पर तेज़ आवाज़ में ऐसे गीत बज रहे थे, जो थिरकने के लिए आमंत्रित करते हैं. स्टेज पर उतरते ही सिया बोली, “मम्मी, मुझे भी डांस करना है.” रमन तो दोस्तों के साथ बातचीत में मसरूफ़ हो गए, लेकिन तनुजा वहीं कतार में रखी कुर्सी पर बैठ गई. उसने सिया को बच्चों के साथ डांस करने की इजाज़त दे दी. सिया पूरी मस्ती व आनंद के साथ अन्य बच्चों के साथ थिरक रही थी. व्हाइट ड्रेस में वह परी-सी लग रही थी. तनुजा के चेहरे पर गर्व मिश्रित ख़ुशी नज़र आने लगी.

“यह आपकी बेटी है?” आवाज़ सुनकर तनुजा ने पलटकर देखा, पिछली सीट पर बैठी महिला उससे ही पूछ रही थी.

“जी हां, यह हमारी बेटी सिया है.” तनुजा ने विनम्रता से जवाब दिया.

“आपकी बेटी बड़ा अच्छा डांस कर रही है. क्या वो डांस क्लास जाती है?”

“नहीं, वो तो टीवी पर ही डांस देख-देखकर करती रहती है.”

“आपकी बेटी में काफ़ी टैलेंट है. आजकल तो टीवी पर बच्चों के लिए कितने ही रियालिटी टैलेंट शोज़ चल रहे हैं. डांस और सिंगिंग में तो बच्चे कमाल ही कर रहे हैं. तो क्यों नहीं आप भी अपनी बेटी के लिए कोशिश करतीं? फिर इन शोज़ में इनाम में बड़ी रक़म मिलने के साथ-साथ लोकप्रियता, पहचान भी मिलती है. क्या आप वे प्रोग्राम देखती हैं?” उस महिला ने पूछा.

“कभी-कभी ही देखते हैं, पर उसमें हिस्सा लेने के लिए क्या करना पड़ता है? हमें तो कुछ भी पता नहीं. सच कहूं, तो हमने कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया…” तनुजा कुछ सकुचाते हुए बोली.

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“आप नियमित प्रोग्राम देखते रहिए. बीच-बीच में सूचनाएं दी जाती हैं कि ऑडीशन कब और कहां होगा. नियम-शर्तों के बारे में भी बताया जाता है.” वह महिला शायद काफ़ी जानकारी रखती थी. तनुजा ने स्वीकृति में सिर हिला दिया.

बात आई-गई हो गई. उस दिन तनुजा टीवी पर कोई सीरियल देख रही थी. ब्रेक में उसने चैनल बदला, तो वहां बच्चों के डांस का प्रोग्राम चल रहा था. छोटे-छोटे बच्चे बेहद आकर्षक डांस कर रहे थे. तभी सूचना दी गई कि अगले प्रोग्राम के लिए जल्दी ही ऑडीशन लिया जाएगा तथा संपर्क के लिए फ़ोन नंबर भी बताए गए. तनुजा ने तुरंत नंबर नोट कर लिया. अगले दिन उसने फ़ोन नंबर मिलाया, तो बताया गया कि दो महीने बाद ऑडीशन है, जिसमें बच्चों को अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन करना होगा. अगर बच्चा इस टेस्ट में सफल हो गया, तो ही उसे कार्यक्रम में हिस्सा लेने का अवसर मिलेगा. इसमें 5 से 10 वर्ष की उम्र तक के बच्चे ही हिस्सा ले सकते हैं.

शाम को बड़े उत्साह के साथ तनुजा ने पूरी जानकारी रमन को दी. रमन ने केवल इतना कहा, “सिया को स्पर्धा के हिसाब से नृत्य में पारंगत करना, ऑडीशन के लिए दूसरे शहर जाना, सबके सामने सिया का प्रदर्शन कैसा होगा, यह सब देखना-संभालना, साथ ही उसकी पढ़ाई में भी अड़चन न आए… यदि ये सब तुम संभाल सकती हो, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है.”

तनुजा उत्साहित-सी बोली, “आपकी बेटी में काफ़ी टैलेंट है. मैं सब संभाल लूंगी.”

चूंकि समय बहुत अधिक नहीं था, सो अगले दिन से ही बढ़िया डांस क्लास की खोज शुरू हो गई. 3-4 दिनों के बाद आख़िर एक क्लास तनुजा को पसंद आ गई. शुरू के 2-4 दिन वह स्वयं उसे छोड़ने आई तथा दो घंटे वहीं बैठकर सब देखती रही. डांस टीचर बड़े प्रेम से बच्चों को डांस सिखा रहे थे. तनुजा उनके व्यवहार से काफ़ी संतुष्ट हुई. स्कूल से घर लौटकर सिया खाना खाती, स्कूल की बातें मम्मी को बताती. इतने में रिक्शा आ जाता. दो घंटे की डांस क्लास के बाद वह शाम छह बजे लौटती. फिर होमवर्क करने का वक़्त हो जाता. कुछ देर टीवी के प्रोग्राम देखने के बाद सोने का वक़्त हो जाता, क्योंकि सुबह 7 बजे स्कूल जाने के लिए जागना पड़ता था और 8 बजे स्कूल बस आ जाती थी.

जैसे-जैसे ऑडीशन का समय नज़दीक आ रहा था, तनुजा का उत्साह व तनाव भी उसी रफ़्तार से बढ़ रहे थे. जहां एक ओर बेटी का डांस देख संतुष्टि व विश्‍वास था कि उसका चयन हो जाएगा, वहीं दूसरी ओर तनाव भी कम नहीं था, पता नहीं कितने और बच्चे होंगे? सिलेक्टर कैसे होंगे? सिया वहां डरकर नर्वस तो

नहीं हो जाएगी? ऐसे अनेक सवाल उसके ज़ेहन में उपजकर उसे तनावग्रस्त कर देते.

ऑडीशन के लिए सिया के साथ तनुजा व रमन भी गए. तनुजा पता नहीं अकेले इन परिस्थितियों से निबट पाएगी या नहीं, यही सोच रमन भी साथ चले गए. ऑडीशन के लिए सैकड़ों बच्चे आए थे. बड़े शहरों के अतिरिक्त छोटे-छोटे कस्बों तक के बच्चे बड़े उत्साह के साथ आपस में बतिया रहे थे. बच्चों के अभिभावक जहां उत्साहित थे, वहीं तनावग्रस्त भी थे. हरेक के मन में अव्यक्त भय व आशंका थी कि उनके बच्चे का चयन न हुआ तो?

इतनी भीड़भाड़ देखकर तनुजा भी हतोत्साहित हो रही थी, पर रमन उसे तसल्ली देते रहे, “इतना टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं है. यदि सिया का चयन हो गया, तो बहुत अच्छा है. लेकिन न भी हुआ, तो कोई बात नहीं. आख़िर यहां ढेरों बच्चे आए हैं, चयन तो गिने-चुनों का ही होगा न! इसी बहाने सिया ने कम से कम डांस में अच्छी प्रगति तो कर ली है. कला और गुण ज़िंदगी में हमेशा काम आते हैं…” लेकिन तनुजा का तनाव कम नहीं हुआ, बेशक वह ऊपरी तौर पर सहज दिखने का प्रयास करती रही.

ऑडीशन के 2 दिन बाद परिणाम घोषित किए गए. सिया का चयन हो गया था. रमन व तनुजा बेहद ख़ुश थे. तनुजा को यूं महसूस हो रहा था, मानो बहुत बड़ी जंग जीत ली हो, जबकि असली जंग तो अब शुरू होनी थी. वापस घर लौटकर उसने पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों सभी को बताया कि जल्दी ही उनकी बेटी टीवी के डांस रियालिटी शो में दिखेगी. रिकॉर्डिंग में लगभग महीनेभर का समय बाकी था. बीस बच्चों का चयन किया गया था, जिनमें से विजेता को बड़ी नकद राशि के अलावा प्रायोजकों द्वारा महंगे उपहार भी दिए जाने थे.

तनुजा के दिलों-दिमाग़ में अब हर समय यही विचार उठते रहते कि क्या उसकी बेटी विजेता बन पाएगी? अक्सर इसी से जुड़े विचारों में वो खोई रहती. स्वयं की सोच पर हंसी भी आती कि कितनी नादान है वह. जागती आंखों से सपने देखने लगी है.

धीरे-धीरे यह सोच उसके स्वभाव का हिस्सा बनने लगी. उसका पूरा ध्यान केवल सिया को डांस रियालिटी शो में विजेता देखने पर केंद्रित होने लगा. उसने सिया की डांस क्लास का समय बढ़ा दिया. तीन घंटों की प्रैक्टिस के बाद थकी-हारी बेटी होमवर्क करते-करते सोने लगती, तो तनुजा जबरन उठाकर बिठाती. कभी-कभी होमवर्क आधा-अधूरा ही हो पाता, स्कूल से शिकायत आती, तो तनुजा टीचर से कहती, “यदि सिया डांस कॉम्पिटिशन में विजेता बन गई, तो आपके स्कूल का नाम भी तो रोशन होगा. कुछ दिनों के लिए अगर वह ठीक से होमवर्क नहीं कर पाती, तो क्या हुआ, उतनी छूट तो आपको देनी चाहिए, बाकी परीक्षा के वक़्त उसकी पढ़ाई मैं देख लूंगी…” टीचर हैरानी से उसका मुंह देखती रह गई. फिर कहा, “डांस शो में हिस्सा लेना आपका निजी फैसला है, स्कूल की तरफ़ से तो हमने नहीं भेजा है. अतः अनुशासन के नाते बच्चे की पढ़ाई भी नियमित रूप से होनी चाहिए. यदि वह पढ़ाई में पिछड़ गई, तो इसकी ज़िम्मेदारी आपकी ही होगी.” तनुजा कुछ जवाब न दे सकी, लेकिन सिया की पढ़ाई के विषय में उसका व्यवहार पूर्ववत् ही बना रहा.

आख़िर डांस रियालिटी शो की तारीख़ की सूचना आ गई. पहले राउंड की शूटिंग दो दिनों में पूरी हुई. कुल 20 बच्चों में से 10 का चयन किया गया, जिसमें सिया भी शामिल थी. तनुजा बेहद ख़ुश थी. उसे लगने लगा था कि सिया अवश्य विजेता बनेगी. वहां उपस्थित काफ़ी लोगों ने सिया के डांस की प्रशंसा की थी. अगले पांच राउंड में एक-एक बच्चे को स्पर्धा से बाहर किया जाना था. दूसरे राउंड में भी सिया ने काफ़ी अच्छा डांस किया, तो वह तीसरे राउंड के लिए चुन ली गई. अगला राउंड सेमी-फ़ाइनल था.

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तनुजा दिन-रात सिया के पीछे पड़ी रहती, “अच्छी प्रैक्टिस करो, तुम्हें सेमी-फ़ाइनल में पहुंचना ही है, तभी तो फ़ाइनल में पहुंच पाओगी. आख़िर तुमको विजेता बनना है. कितने सारे रुपए इनाम में मिलेंगे. कितने सारे गिफ़्ट मिलेंगे. सब लोग तुमसे आकर मिलेंगे. तुम्हारा सत्कार करेंगे. शहर में भी तुम्हारा नाम होगा, अख़बारों में तुम्हारी फ़ोटो, ख़बर छपेगी. कितना नाम होगा तुम्हारा और साथ-साथ हमारा भी. तुम्हें बस इतना याद रखना है कि यह कॉम्पिटिशन जीतना ही है.”

अत्यधिक प्रैक्टिस के कारण सिया बहुत थक गई थी. अगले दिन सेमी-फ़ाइनल के लिए चयन होना था. थकान व तनाव के कारण सिया कुछ डरी-सहमी हुई थी. जब उसकी बारी आई, तो अच्छा डांस करते हुए भी वह 2-3 स्टेप्स भूल गई, जिसके कारण कॉम्पिटिशन से बाहर कर दी गई. वह नन्हीं जान उस समय फूट-फूटकर रो पड़ी. आयोजकों के दिलासा देने पर सुबकते हुए बोली, “मम्मी ने कहा था कि इस कॉम्पिटिशन में तुमको विनर बनना है. अब वो नाराज़ होंगी, मुझे डांटेंगी…”

दर्शकों के बीच बैठी तनुजा की आंखों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी. वह हिसाब लगा रही थी कि कितना ख़चर्र् सिया की डांस क्लास के लिए हुआ, कपड़ों पर हुआ, प्रोग्राम के लिए आने-जाने पर हुआ और मिला क्या? सारे सपने चकनाचूर हो गए. अब वह पड़ोसियों व रिश्तेदारों को क्या मुंह दिखाएगी? इस पर कितना ख़र्च किया. पढ़ाई में भी वह पीछे रह गई. पता नहीं अगले महीने होनेवाली वार्षिक परीक्षा में पास भी हो पाएगी या नहीं. उसकी टीचर भी नाराज़ थी, पता नहीं क्या होगा?

रमन भी नाराज़ होकर कहेंगे, “तुम्हें समझाया था इन रियालिटी शोज़ के चक्कर में मत पड़ो, यहां पर असफल होने के बाद युवा तो युवा, छोटे-छोटे बच्चे भी कई बार तनाव व डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं. सैकड़ों-हज़ारों में कोई ख़ुशक़िस्मत ही होता है, जिसे अपने परिश्रम व कला का सम्मान मिलता है. हमारे जैसे मध्यमवर्गीय लोगों के लिए अपनी आवश्यकताओं को दरकिनार कर ऐसी स्पर्धाओं के पीछे भागने का कोई औचित्य ही नहीं है. इन प्रोग्रामों के पीछे की सच्चाई बड़ी कड़वी होती है. इनकी चकाचौंध से सभी आकर्षित होते हैं, लेकिन वास्तविकता के बारे में कोई नहीं जानता.”

घर लौटने पर उसने अपना तनाव, डिप्रेशन व ग़ुस्सा सब कुछ सिया पर उतार दिया, “यह किसी काम की नहीं. इस पर कितना पैसा ख़र्च किया, कितनी मेहनत की. सोचा था कुछ कर दिखाएगी, तो इसका भी नाम होगा और हमारी भी इ़ज़्ज़त बढ़ेगी. पर सब बेकार हो गया.

अब सब लोग कितना मज़ाक उड़ाएंगे कि सेमी फ़ाइनल तक भी नहीं पहुंच पाई…”

रमन ने समझाया, “तनुजा, अब जाने भी दो. जो हो गया, सो हो गया, सिया ने अपनी तरफ़ से तो पूरी कोशिश की, जजों को पसंद नहीं आया तो वह क्या कर सकती है?”

तनुजा फिर भड़क उठी, “ये जज भी बेईमान होते हैं. पक्षपात करते हैं. डांस के बाद तो तारी़फें कर रहे थे, फिर नंबर कम क्यों दिए? ज़रूर अपनी पहचानवालों को आगे किया होगा… मैं ही बेवकूफ़ थी, जो पार्टी में उस महिला की बातों में आ गई और इस डांस शो के लिए इतने पापड़ बेले. अब तो टीवी पर इनके प्रोग्राम को भी नहीं देखूंगी, लोगों को बेवकूफ़ बनाते हैं…” तनुजा गहरे अवसाद में चली गई थी. सिया तो हंसना-खेलना ही भूल गई थी, हर समय डरी-सहमी रहती. परेशान होकर रमन दोनों को डॉक्टर के पास ले गया. दोनों को ही डॉक्टर ने आराम की सलाह दी व कुछ दवाइयां भी दीं. सिया तो धीरे-धीरे नॉर्मल होने लगी, लेकिन डॉक्टर का कहना था कि तनुजा को ठीक होने में वक़्त लगेगा. उसे दवा भी लेनी होगी और मानसिक रूप से आराम भी करना पड़ेगा.

Narendra Kaur Chhabra

नरेंद्र कौर छाबड़ा

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कहानी- बु़ढ़ापे का जन्मदिन (Short Story- Budhape Ka Janamdin)

 

“बहुत अच्छी बात है आंटी. हम यही तो चाहते हैं कि आप लोग जीवन के हर पल का आनंद लें.” सभी महिलाएं चली गईं, रमाजी ने अंजना और सुधा को गले लगा लिया और बोलीं, “बु़ढ़ापे का जन्मदिन इतना बढ़िया रहेगा, मैंने तो कभी सोचा ही न था.” वहीं खड़े केशवजी, महेश और विनय सहित सब उनकी बात पर ज़ोर से हंस पड़े.

 Kahani

महेश के ऑफिस से आने पर कंगना उत्साहपूर्वक कहने लगी, “अच्छा है, कल शनिवार है, सुबह ही चलकर मां को सरप्राइज़ देंगे. महेश ने भी ख़ुश होकर कहा, “हां, हमेशा मां ने ही हमारा जन्मदिन ख़ूब उत्साह से मनाया है. अब हमारी बारी है.”

“महेश, क्यों न इस बार कुछ अलग करें. हमेशा फोन पर बधाई देकर या मां के लिए एक साड़ी ले जाकर दे देते हैं, बस हो जाता है मां का बर्थडे. दो दिन की छुट्टी है, चलो न, मां के लिए कुछ नया करते हैं.”

“ठीक है, सोचो कुछ.” महेश ने कहा, “ऐसा करो, सुधा दीदी से भी बात कर लो.”

“हां, यह ठीक रहेगा.” सुधा महेश से तीन साल बड़ी थी. अंजना ने तुरंत सुधा को फोन किया. अपनी इच्छा बताई, सुधा भी फ़ौरन तैयार हो गई. बोली, “बताओ, क्या करना है?”

“दीदी, पहले तो सब एक साथ मां के पास पहुंचते हैं. फिर उसके बाद कुछ प्लानिंग करते हैं. सरप्राइज़ पार्टी रखते हैं, बड़ा मज़ा आएगा.”

“हां, ठीक हैं, मिलते हैं कल सुबह.”

रमाजी का जन्मदिन था, बहू अंजना प्रोग्राम बनाने में जुट गई थी. रमाजी अपने पति केशवजी के साथ मेरठ में रहती थीं. महेश की गुड़गांव में पोस्टिंग थी. वह इंजीनियर था. सुधा अपने पति विनय और दो बच्चे समृद्धि और सार्थक के साथ पानीपत में रहती थी. अंजना ने रमाजी को फोन किया.

“मां, कैसी हैं आप, क्या हो रहा है?”

“कुछ नहीं, तुम लोग सुनाओ कैसे हो?

“हम सब ठीक हैं मां, पापा कहां हैं? उनका फोन नहीं लग रहा है.”

“यही हैं, बात करवाऊं?”

“हां मां,” अंजना ने केशवजी से कहा, “पापा, मां को मत बताना. कल सुबह हम सब पहुंच रहे हैं. कल पार्टी करेंगे. मां की फ्रेंड्स को भी बुलाएंगे.” केशवजी हां, हूं में बातें करते रहे.

रमाजी साथ ही बैठी थीं. अपनी तरफ़ से कुछ ख़ास बात वे कर नहीं पाए.

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सभी लोग शनिवार की सुबह दस बजे पहुंच गए. सबको देखकर रमाजी बहुत ख़ुश हुईं. बर्थडे की बधाइयां पाकर बोलीं, “तुम लोग इस उम्र में मुझे सरप्राइज़ दे रहे हो?” ख़ूब हंसी-मज़ाक हुआ. फिर रमाजी ने कहा, “चलो, एक सरप्राइज़ मैं भी दे देती हूं. तुम सब अच्छे समय पर आए. मैंने भी आज अपनी सहेलियों को बुलाया है.”

सबको झटका-सा लगा. बोले, “अरे, बर्थडे की पार्टी?”

“नहीं भई, घर पर ही चार बजे भजन-कीर्तन रखा है.” एक और झटका लगा सबको.

अंजना ने कहा, “भजन-कीर्तन? आज जन्मदिन पर?”

“और क्या, बुढ़ापे का जन्मदिन है, कीर्तन ही हो सकता है, छप्पन साल की हो गई मैं आज.”

सबके चेहरे लटक गए. एक मायूसी-सी छा गई. सबने ठंडी सांस भरी और चुपचाप बैठ गए. केशवजी ने कहा, “तुमने तो मुझे भी नहीं बताया?”

“आपको कौन-सा इन कीर्तनों में रुचि है? बताकर भी क्या होता. हमेशा ग़ायब हो जाते हो कीर्तन के समय. रिटायर होनेवाले हो, यह नहीं कि ईश्‍वर में कुछ ध्यान लगाएं.”

रमाजी को हमेशा की तरह शुरू होते देख केशवजी ने कहा, “नहीं भई, आज ग़ायब नहीं होऊंगा, बच्चे आए हैं और तुम्हारा जन्मदिन भी है.” सब मुस्कुराए. अंजना ने कहा, “पापा, आप मां के लिए क्या गिफ्ट लाए?” केशवजी अंदर गए और साड़ी लाकर रमाजी को दी. इस उम्र में भी शर्मीली आभा छा गई रमाजी के चेहरे पर. अंजना और सुधा ने भी अपनी लाई हुई साड़ियां और शॉल उन्हें दीं.

रमाजी बहुत ख़ुश हुईं. फिर सब किचन में लग गईं. दोपहर में जब रमाजी थोड़ी देर आराम करने लेटीं, तब एक कमरे में सब एक साथ बैठ गए. अंजना ने धीमे स्वर में कहा,

“मेरा तो सारा प्रोग्राम चौपट कर दिया मां के कीर्तन ने. सोचा था मां की सहेलियों को बुलाएंगे और पार्टी करेंगे, पर कैसे कुछ अलग करें अब?” फिर अचानक कहा, “क्यों न इस कीर्तन को ही पार्टी में बदल दें?”

सुधा ने कहा, “वो कैसे?”

समृद्धि और सार्थक बोले, “हां मामीजी, कुछ तो इंट्रेस्टिंग सोचिए. हम लोग कुछ गेम्स और बढ़िया स्नैक्स का इंतज़ाम करते हैं.”

सुधा ने कहा, “इतनी जल्दी कैसे होगा सब?”

महेश और विनय ने कहा, “इसकी चिंता मत करो. हम तीनों बाज़ार से सब तैयार स्नैक्स ले आएंगे, क्यों पापा?”

“हां, ठीक है, पर तुम्हारी मां की कोई सहेली डायबिटीज़ की मरीज़ है, तो किसी को आर्थराइटिस है. वो कहां खाएंगी या खेलेंगी.”

अंजना ने बहुत उत्साहित स्वर में कहा, “अब आप लोग सब मुझ पर छोड़ दीजिए.”

सुधा ने कहा, “अरे, कुछ बताओ तो, क्या सोचा है?”

“दीदी, आप देखती जाओ बस.”

तीन बजे से रमाजी कीर्तन में आनेवाली अपनी सहेलियों के बैठने की व्यवस्था में लग गईं. सब उनका हाथ बंटा रहे थे. रमाजी ने केशवजी की लाई हुई साड़ी ही पहनी, जिसमें वे बहुत अच्छी लग रही थीं. केशवजी, महेश और विनय चुपचाप अंजना की दी हुई लिस्ट लेकर बाज़ार निकल गए. रमाजी ने कहा, “देखा, फिर ग़ायब हो गए कीर्तन के समय.” अंजना और सुधा को हंसी आ गई.

धीरे-धीरे उनकी सब सहेलियां आती गईं और कीर्तन शुरू हो गया. दो-तीन सहेलियों के साथ उनकी बहुएं भी थीं, जो अंजना की हमउम्र थीं. अंजना और सुधा सबकी आवभगत में लग गईं. उनकी किसी भी सहेली को नहीं पता था कि आज रमाजी का जन्मदिन है. डेढ़ घंटा कीर्तन चला. सब प्रसाद लेकर उठने की तैयारी करने लगीं, तो अंजना ने कहा, “आप सबको बताना चाहती हूं कि आज मां का जन्मदिन है. भजन-कीर्तन तो हो गया, पर अब और भी कुछ प्रोग्राम है आप लोगों के लिए.”

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सब चौंकीं, फिर हंस पड़ी और ‘हैप्पी बर्थडे’ की आवाज़ों से ड्रॉइंगरूम गूंज उठा. रमाजी शरमाई-सी बहू-बेटी को स्नेह भरी नज़रों से घूर रही थीं. इतने में केशवजी बच्चों के साथ सामान से लदे-फदे पहुंच गए. रमाजी हैरान-सी उन्हें देखती रहीं. कई तरह की मिठाइयां, स्वादिष्ट स्नैक्स से प्लेटे सज गईं. केक लाते हुए अंजना ने कहा, “आइए मां, पहले केक काटिए.”

रमाजी ने कहा, “केक? मैं?” इस प्रोग्राम पर उनकी सहेलियां हैरान थीं और बहुएं तो बहुत ख़ुश थीं. सासू मांओं के साथ मजबूरी में कीर्तन में आने के बाद कुछ तो मनोरंजन हुआ. केक काटा गया. खाना-पीना हुआ, फिर अंजना बोली, “अब कुछ गेम्स भी खेलेंगे.”

उर्मिलाजी बोलीं, “अरे, ये कोई उम्र है गेम खेलने की? क्या बात करती हो बहू!”

“नहीं आंटी, भागना-दौड़ना नहीं है. बैठे-बैठे ही खेलना है.”

“क्या खेलना है?”

“आंटी, अंताक्षरी.” आशा की बहू सुमन बहुत ख़ुश हो गई, बोली, “मां, खेलो न, मज़ा आएगा.” अंजना ने सबको गोल घेरा बनाकर बैठा दिया. केशवजी, महेश और विनय नाश्ता-पानी के बाद बाहर टहलने चले गए, जिससे सब महिलाएं फ्री होकर खेलें. उन्हें कोई संकोच न हो. अंताक्षरी शुरू हुई, तो सब धीरे-धीरे अपनी उम्र के खोल से बाहर निकल आईं. फिर तो सुर-ताल को ताक पर रख हर कोई अपने-अपने राग अलापने लगा और पुराने हिंदी गानों का एक अलग ही ख़ूबसूरत समां बंध गया. समृद्धि और सार्थक ने तो वे गाने कभी सुने ही नहीं थे, लेकिन नानी को ख़ुश देखकर वे भी ख़ुश थे. तनु इधर-उधर बीच में घूमती रही.

अंताक्षरी में आख़िर तक राधाजी डटी रहीं. अंजना ने उन्हें एक गिफ्ट दिया फिर कहा, “अब हाउजी गेम खेलेंगे.” कुछ ने उत्साहित होकर कहा, “हां, हां बिल्कुल,” कुछ ने कहा कि उन्हें खेलना नहीं आता, तो अंजना और सुधा ने जल्दी से सबको समझा दिया, सब ख़ुश थीं और बिना भागदौड़ के यह खेल भी हो जाएगा. सब मन से खेलीं. लाइन और हाउस होने पर सबको छोटे-मोटे गिफ्ट्स भी मिलते रहे. सब पूरे जोश में थीं. सात बज चुके थे. समय का किसी को होश नहीं था. जब घरों से फोन पर फोन आने शुरू हुए, तो सबको जाने की सुध आई.

जब सब जाने लगीं, तो अंजना ने सबको गिफ्ट का छोटा पैकेट दिया. सबने अंजना और सुधा को ढेरों आशीर्वाद दिए. रमाजी बहुत ख़ुश थीं आज. जाते-जाते उर्मिलाजी ने कुछ झिझकते हुए कहा, “अगले महीने 10 तारीख़ को मेरे घर कीर्तन रख लेंगे.” रमाजी ने कहा, “कुछ ख़ास है क्या?” उर्मिलाजी शरमाते हुए बोलीं, “वो मेरा जन्मदिन है न. ऐसे ही कुछ अलग ढंग से कर लेंगे.” सभी ज़ोर से हंस पड़े, तो वे सकुचा गईं. अंजना ने कहा, “बहुत अच्छी बात है आंटी. हम यही तो चाहते हैं कि आप लोग जीवन के हर पल का आनंद लें.” सब चली गईं, रमाजी ने अंजना और सुधा को गले लगा लिया और बोलीं, “बु़ढ़ापे का जन्मदिन इतना बढ़िया रहेगा, मैंने तो कभी सोचा ही न था.” वहीं खड़े केशवजी, महेश और विनय सहित सब उनकी बात पर ज़ोर से हंस पड़े.

पूनम अहमद

पूनम अहमद

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कहानी- छुट्टी के दिन (Short Story- Chhutti Ke Din)

Hindi Short Story

बचपन की यही फांस तुषार के मन में कुछ इस तरह चुभी कि शायद उसने बचपन में ही प्रण कर लिया था कि बड़ा होकर वह अपने बच्चों की इच्छाओं की अवहेलना नहीं करेगा, फिर चाहे उसे छुट्टी के दिन घर में रहकर आराम करने को मिले या न मिले.

Hindi Short Story

मामला बड़ा भी था और छोटा भी. देवेन्द्रजी की दृष्टि में तो यह कोई ऐसा मामला था ही नहीं, जिस पर ध्यान देने का कष्ट करते. लेकिन उनके बेटे तुषार के लिए यह जीवन का अहम् प्रश्‍न था और सुधाजी के लिए यह एक ऐसी विडम्बना थी, जिसे जीते हुए उन्होंने सालों व्यतीत कर दिए. वे पिछले कई सप्ताह से महसूस कर रही थीं कि जब से उनके पति देवेन्द्रजी नौकरी से रिटायर हुए हैं, तब से घर का माहौल उखड़ा-उखड़ा-सा रहता है. एक अनजाना-सा तनाव घर के समूचे वातावरण पर छाया रहता है. और छुट्टी के दिन तो ये तनाव और भी बढ़ जाता है.

आज भी छुट्टी का दिन था. सुधाजी आज सुबह से मन-ही-मन प्रार्थना कर रही थीं कि कम-से-कम आज तो घर में शांति बनी रहे, लेकिन उनके इस प्रकार प्रार्थना करने से अगर कुछ होना होता, तो बहुत पहले हो चुका होता.

सुधाजी की आकांक्षा के विपरीत पिता-पुत्र में आज फिर झड़प हो गई.

हुआ यूं कि देवेन्द्रजी सुबह का नाश्ता करके अपनी आरामकुर्सी पर अभी बैठे ही थे कि उनका नन्हा पोता पराग उचकता हुआ आया और उनके गले लग गया. वे भावविभोर हो उठे. उन्होंने हुलसते हुए पूछा, “आज हमारा पराग सुबह-सवेरे अपने दादाजी से इतना लाड़ क्यों कर रहा है?’’ इस पर पराग ने उत्साह से भरकर जवाब दिया कि वह मम्मी-पापा के साथ चिड़ियाघर जानेवाला है. वह वहां बड़े-बड़े भालू देखेगा, शेर देखेगा और बहुत सारे जानवर देखेगा. पराग की बात सुन कर देवेन्द्रजी का मन ख़राब हो गया. उस पल उनके मन में बस एक ही विचार आया कि छुट्टी का दिन आया नहीं कि लाट साहब चले घूमने. श्रीमानजी से ये नहीं होता कि कम-से-कम छुट्टी के दिन तो घर बैठें और अपने बूढ़े बाप से कुछ बोले-बतियाएं.

लगभग हर छुट्टी के दिन यही होता. पराग या उसकी बहन पल्लवी अपने पिता तुषार से कहीं घूमने चलने की ज़िद करते और तुषार उनकी बात तुरन्त मान लेता. देवेन्द्रजी जब तुषार से कहते कि सप्ताह में छह दिन तो तुम और बच्चे दिनभर घर से बाहर रहते ही हो, अब कम-से-कम एक दिन तो घर में रह लिया करो. इस पर तुषार उत्तर देता कि यह एक दिन ही तो मिलता है बच्चों की इच्छा पूरी करने के लिए. देवेन्द्रजी यदि और कुछ कहते तो तुषार पटाक्षेप करने के अंदाज़ में जवाब देता, “पापा, आप नहीं समझेंगे.”

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इस पर देवेन्द्रजी भी तुनककर कहते, “हां-हां बेटा, मैं भला कैसे समझूंगा? मैं तो जैसे कभी बाप रहा ही नहीं और मैंने तो जैसे तुम लोगों की कोई इच्छा कभी पूरी की ही नहीं.”

तुषार झल्लाकर कह उठता, “प्लीज़ पापा, आप हमारा मूड ख़राब मत कीजिए.” तब सुधाजी को हस्तक्षेप करना पड़ता. वे देवेन्द्रजी को समझातीं कि यदि तुषार अपने बच्चों को घुमाना-फिराना चाहता है, तो वे क्यों परेशान होते हैं? लेकिन कुनमुनाते हुए वे कह उठते कि अब तुषार के लिए अपने बीवी-बच्चे ही सब कुछ हो गए और ये बूढ़ा बाप कुछ नहीं रहा? उनका यह कटाक्ष सुनकर सुधाजी की इच्छा होती कि वे उन्हें याद दिलाएं कि किसी समय उनके लिए छुट्टी के दिन का आराम ही सब कुछ होता था और बच्चों की इच्छाएं कोई अहमियत नहीं रखती थीं. जब कभी तुषार, तनय या तन्वी उनसे कहीं घूमने चलने का आग्रह करते, तो वे बिगड़ कर कहते कि ये एक ही दिन तो मिलता है आराम करने के लिए, मैं कहीं नहीं जाऊंगा. यदि तुम लोगों को जाना ही हो, तो अपनी मां के साथ चले जाओ. सवाल एक दिन की छुट्टी का नहीं रहता, दो-तीन दिन की छुट्टियों में भी उनका यही बहाना रहता. देवेन्द्रजी को कभी इस बात का ख़याल नहीं आता कि वे ज़रूर द़फ़्तर के कारण सप्ताह में छह दिन घर से बाहर रहते हैं, लेकिन सुधाजी को तो यही छह दिन घर में कैद रह कर बिताने पड़ते हैं. ज़्यादा होता तो वे सुधाजी से कह देते, “अकेली घूम आया करो.”

अकेले घूमना तो पुरुष भी पसन्द नहीं करते हैं, फिर पागलों जैसी वे अकेली कहां घूमतीं?

जब तक तीनों बच्चे स्कूल जाने लायक नहीं हुए, तब तक सुधाजी और बच्चे छुट्टियों में घर पर ही रहते थे. जब बच्चों ने स्कूल जाना शुरू किया और उन्हें जब अपने सहपाठियों से विभिन्न स्थानों के बारे में रोचक बातें सुनने को मिलतीं, तो उनका मन भी ऐसे स्थानों पर जाने के लिए उत्सुक हो उठता. सुधाजी भी सोचतीं कि बाहर नहीं तो कम-से-कम शहर और उसके आस-पास के दर्शनीय स्थल तो बच्चों को दिखाए ही जा सकते हैं. किन्तु देवेन्द्रजी के पास वही एक उत्तर रहता कि मैं अपनी छुट्टी ख़राब नहीं कर सकता, तुम लोगों को जाना हो तो जाओ.

देवेन्द्रजी की बात सुनकर तुषार सहित तीनों बच्चे उदास हो जाते. तब सुधाजी तीनों बच्चों को लेकर निकल पड़तीं. बचपन की यही फांस तुषार के मन में कुछ इस तरह चुभी कि शायद उसने बचपन में ही प्रण कर लिया था कि बड़ा होकर वह अपने बच्चों की इच्छाओं की अवहेलना कभी नहीं करेगा, फिर चाहे उसे छुट्टी के दिन घर में रहकर आराम करने को मिले या न मिले. मां ने भले ही साथ दिया, लेकिन छुट्टियों में घूमते-फिरते समय अपने पिता की अनुपस्थिति उसके दिल को हमेशा सालती रही. आज यह बात उसने देवेन्द्रजी से लगभग कह डाली. तभी से वे बहुत उदास थे.

सुधाजी तुषार के मन की इस फांस को जानती थीं, किन्तु उन्हें लगता कि वे इस बारे में देवेन्द्रजी से कुछ बोलेंगी, तो उन्हें बुरा लग जाएगा. मगर आज देवेन्द्रजी के चेहरे की उदासी इतनी गहरी थी कि उन्होंने उसके बारे में उनसे खुलकर बात करने का फैसला कर लिया. वे जैसे ही देवेन्द्रजी के निकट पहुंचीं, वे आहत स्वर में बोल उठे, “अपने बच्चों के लालन-पालन में मैंने कहां कमी रखी सुधा?”

इस पर वे बोलीं, “अपने बच्चों के लालन-पालन में आपने कोई कमी नहीं रखी, लेकिन उनकी बालसुलभ इच्छाओं की अनदेखी अवश्य हुई. आपको तो गर्व होना चाहिए कि हमारा बेटा तुषार हमारी ग़लती को दोहरा नहीं रहा है.”

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देवेन्द्रजी एक पल को चुप रहे, फिर उन्होंने सुधाजी की बात स्वीकार करते हुए कहा, “तुम ठीक कहती हो, लेकिन ये ग़लती हम दोनों की नहीं, स़िर्फ मेरी थी और आज मुझे अपनी उस ग़लती का एहसास हो रहा है, जिसने मुझे आज अकेलेपन के दरवाज़े पर ला खड़ा किया है.”

इस पर सुधाजी मुस्कुराती हुई बोल उठीं, “लीजिए, ये आपकी दूसरी भूल होगी जो आप सोचेंगे कि आप अकेले हैं. अरे, मैं आपके साथ हूं, बच्चे आपके साथ हैं. बस, ज़रूरत है तो इतनी कि अब आप भी हम सबके साथ हो लीजिए.”

सुधाजी की बात सुनकर देवेन्द्रजी ने पलभर विचार किया और फिर बोल उठे, “तुम ठीक कहती हो सुधा. जाओ तुषार से कह दो कि हम भी चिड़ियाघर देखने चलेंगे.”

पता नहीं कैसे नन्हें पराग ने यह बात सुन ली और वह ख़ुशी से चिल्लाने लगा, “हुर्रे… दादाजी साथ चलेंगे, दादाजी साथ चलेंगे.”

ये सब देख-सुनकर सुधाजी ने चैन की सांस ली और बोलीं, “चलो, देर से ही सही इन्होंने सच को स्वीकारा तो!”

यही जीवन का यथार्थ है, कई बार जिन बातों को हम अपने जीवन में महत्वहीन समझकर अनदेखा करते चले जाते हैं, वही बातें हमारे ही जीवन में हमें महत्वहीन बनाने का षड्यंत्र रचती रहती हैं और हमें पता भी नहीं चलता. वे अब आश्‍वस्त थीं कि अब किसी भी तनाव या टकराव के बादल उनके घर पर नहीं छाएंगे और पिता-पुत्र भी आपस में मिलजुल कर प्यार से रहेंगे.

– डॉ. सुश्री शरद सिंह

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कहानी- परख (Short Story- Parakh)

अंकी की परख क्षमता पर उसे हमेशा संदेह रहा है. उसके लिए गए फैसले को वह अजीबो-ग़रीब और दुनिया से अलग मानकर टोकती थी. आज अंकी की दूरदर्शिता और परख ने, मंज़िल पाने के लिए सब कुछ दांव पर लगानेवाले जज़्बे ने वह सब कुछ दिया, जिसकी वह हक़दार थी. जिसके सपने वंदना ने बेटी के लिए देखे थे.

Kahaniya

“वंदना, ओ वंदना, कहां हो भई?” केतन की चहकती आवाज़ को वंदना नज़रअंदाज़ नहीं कर पाई. हाथ में पकड़ा हुआ चाय का पतीला वहीं रखकर भागी आई.

“क्या हुआ?”

“अरे भई, कुछ मीठा बनाओ, तो एक ख़ुशख़बरी सुनाऊं.” वंदना की उत्सुकता से ताकती नज़रों को और इंतज़ार नहीं करवाया केतन ने… हंसकर बोल दिया, “बधाई हो, एनआरआई को अपना दामाद तो नहीं बना पाई, पर हां, बेटी-दामाद ने कनाडा जाने की तैयारी कर ली है.”

“क्या…? मतलब शोभित का सिलेक्शन…” हर्ष से चहकती वंदना की आवाज़ में कंपन था.”

“भई उसके सोशल नेटवर्किंग साइट पर तो कुछ ऐसा ही लिखा है. एक-दो बधाई के कमेंट भी आ गए हैं. क़रीब दस मिनट पहले की पोस्ट है.”

“इसका मतलब है पूरी दुनिया को पता है, स़िर्फ हमें ही नहीं बताया है अंकी ने… कहीं उस दिन की बात से नाराज़ तो नहीं?” वंदना के स्वर में आशंका थी. “केतन ज़रा उससे बात करो फोन पर…” कहते हुए वंदना ने पलटकर केतन को देखा, तो वह फोन कान में लगाए बैठे थे.

“शोभित फोन नहीं उठा रहा है और अंकी का व्यस्त आ रहा है. क्या करें? घर चलें क्या?” “नहीं, अभी कुछ देर इंतज़ार कर लेते हैं.”

“मुझे लगता है कि हम लोगों को अंकी ख़ुद ही बताएगी. इंतज़ार कर लो.” केतन को अभी भी इत्मीनान था. पर वंदना कुछ और ही सोच रही थी… छह महीने पहले अंकी और शोभित घर आए थे, तो खाना खाते वक़्त कैसे अंकी ने यह बोलकर कि शोभित तुम ये जॉब छोड़कर फेलोशिप की तैयारी करो. वंदना की सांस अटका दी थी. अंकी की बात पर वंदना ने नाराज़गी जताते हुए लगभग अंकी को डांट दिया था. “मम्मी, मैंने ही इसे एमएस रिसर्च के लिए टोरेंटो यूनिवर्सिटी जाने का आइडिया दिया है. शोभित को मेरा सुझाव अच्छा लगा है, पर इसके लिए थोड़ा रिस्क तो लेना होगा. अगर ऐसा हुआ, तो उसका और मेरा फ्यूचर सिक्योर हो जाएगा.” वंदना शोभित के सामने बात बढ़ाना नहीं चाहती थी. ख़ुद को भरसक सामान्य दिखाते हुए बोली, “अभी खाना एंजॉय करो, बाद में सोचना.”

“सच मम्मी, मलाई-कोफ्ते बहुत अच्छे बने हैं, बिल्कुल अवॉर्ड-गिविंग हैं.” शोभित की चुहल माहौल में गर्मी नहीं ला पाई. मौक़ा देखते ही वंदना ने अंकी को आड़े हाथों लिया.

“आजकल के बच्चे शादी और करियर जैसी चीज़ों को गंभीरता से नहीं लेते हैं.”

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“ओ मम्मी प्लीज़…! अब इसमें सीरियस होने की क्या बात है. सीरियस होने से क्या काम बन जाएगा? अब शोभित कनाडा जाना चाहता है, तो रिस्क तो उठाना पड़ेगा. ऐसे में मैं हेल्प नहीं करूंगी, तो कौन करेगा? फिर उसके साथ मेरा भी फ़ायदा है. बाद में मैं भी ऐश करूंगी. अभी तो मेरा जॉब है. फाइनेंशियल सिक्योरिटी भी है.”

“बस कर अंकी, दुनिया क्या कहेगी कि अभी-अभी शादी हुई है और नौकरी भी…” “मम्मी, शादी से पहले तो आप बड़ी-बड़ी बातें करती थीं कि अपने पति को सपोर्ट करना, एडजस्ट करना… आपकी जनरेशन की बस यही प्रॉब्लम है कि सलाह पर अमल करो, तो प्रॉब्लम, न करो, तो प्रॉब्लम…” अंकी की बात पर वंदना नाराज़ हो गई थी. फिर कई दिनों तक मां-बेटी में कोई बातचीत नहीं हुई. केतन से अंकी का हालचाल मिलता था.

आख़िर जिसका डर था, वही हुआ. शोभित ने नौकरी छोड़ दी थी. एकाध बार शोभित की मम्मी से बात हुई, तो वो भी संकोच से सफ़ाई दे डालती थीं, “शोभित के पापा की पेंशन से घर आराम से चलता है. फिर जैसे पहले शोभित पढ़ता था, वैसे अभी भी पढ़ रहा है और रही बात अंकी की, तो उसने तो बेटी की कमी पूरी कर दी है.” वंदना सुन तो लेती, पर उसे कोफ़्त होती. रिश्तेदारों के संपर्क में भी कम ही आती. कौन जाने कब कोई पूछ ले… शोभित की नौकरी छूटनेवाली बात. केतन सुनते, तो वंदना की बात सुधारते.

“नौकरी छूटी नहीं है, उसने ख़ुद छोड़ दी है, ताकि जीवन में आगे बढ़ सके.” वंदना की समझ में नहीं आता कि जब विदेश जाने का शौक़ था, तो अच्छा भला एनआरआई लड़का क्यों नकारा अंकी ने, फोन पर ही बात हुई और फिर उससे

मिलने को भी तैयार नहीं हुई. कहने लगी, “लड़के में सुपीरियोरिटी का एहसास है.” अब एनआरआई है, तो यह एहसास तो होगा ही और हमें भी तो गर्व महसूस होगा कि लड़की विदेश में ब्याही है. पर अंकी ने यह कहकर सबको चुप करा दिया कि वो शादी अपने लिए कर रही है, किसी को दिखाने के लिए नहीं… उसके बाद वो इंजीनियर लड़का, उससे मिलकर आई तो बोली, “उसके कोई फ्यूचर प्लान्स नहीं हैं. कुछ कर दिखाने का जोश नहीं है.” जबकि यह लड़का नंदिता बुआ ने देखा था और बताया था कि पुश्तैनी जायदाद काफ़ी है, तो बोली “जब सब कुछ रेडीमेड मिला, तो लाइफ में क्या एडवेंचर होगा. अपनी तरफ़ से उदासीन है, तो मेरी जॉब को क्या महत्व देगा.” न जाने कितने लड़के देखे गए, पर बात न बननी थी, सो न बनी. महीनों घर में शांति बनी रही, फिर आया शोभित का रिश्ता. “मध्यमवर्गीय परिवार का बड़ा साधारण-सा लड़का लगता है. हमारी अंकी इसे क्या पसंद करेगी और सच पूछो, तो मुझे भी इस लड़के में कुछ ख़ास नहीं लगता है. एक ही तो लड़की है अपनी, साधारण परिवार न… न…” पर जोड़ियां ऊपर से ही बन के आती हैं, तभी तो अंकी न केवल शोभित से मिली, बल्कि इस रिश्ते के लिए हां भी कर दी. “अंकी ऐसा क्या है इस लड़के में?”

“मम्मी कुछ तो बात है.”

“पर तुम तो टॉल लड़का चाहती थी न…”

“अरे मम्मी, वो पुरानी बात है. मुझे शोभित की फैमिली अच्छी लगी. उसकी मम्मी समझदार लगीं, बनावटीपन नहीं है उनमें और पापा शोभित से फ्रेंडली हैं. ऐसे में कम्यूनिकेशन गैप नहीं रहेगा. शोभित की एक बात अच्छी लगी कि उसकी कोई स्ट्रॉन्ग पसंद-नापसंद नहीं है. लाइफ के प्रति अप्रोच काफ़ी फ्लेक्सिबल है. ऐसे में एडजस्टमेंट में प्रॉब्लम नहीं होगी.” अंकी की बातें सुनकर वंदना दंग रह गई. आजकल के बच्चों की न जाने कौन-सी फिलॉसफी काम करती है. वंदना ने अंकी को समझाया था. “देख अंकी, परिवार बहुत साधारण है.”

“मम्मी, साधारण परिवार को ख़ास तो उस घर के बच्चे ही बनाते हैं और शोभित के फ्यूचर प्लान बहुत अच्छे हैं.” अंकी की इस बात ने सबको चुप करा दिया. “कॉलबेल की लगातार आती आवाज़ ने वंदना को विचारों के भंवर से खींचा. जब तक वो उठती, केतन ने दरवाज़ा खोल दिया था. अंकी ख़ुशी के मारे वंदना से लिपटी हुई थी. शोभित केतन के पैर छू रहा था. “इतनी बड़ी ख़ुशख़बरी है और हमें पता ही नहीं.” वंदना की बात पर अंकी बोली, “कैसे पता चलेगा, फोन तो आप लोग उठाते नहीं हो. पापा का स्विच ऑफ आ रहा है और आपका फोन बज-बजकर थककर सो गया पर्स की किसी पॉकेट में…” अंकी की बात पर सभी हंस पड़े.

“अरे! सच में दस मिस्ड कॉल्स हैं.” पर्स को टटोलकर फोन निकालती हुई वंदना बोली. ख़ुशी के मारे उसे ही सूझ नहीं रहा था कि घर आए बेटी-दामाद को क्या खिलाए. रसोई की ओर बढ़ती वंदना को अंकी ने रोक लिया. “मम्मी, आप और पापा बस जल्दी से तैयार हो जाओ, आज का डिनर शोभित की तरफ़ से है.” जल्दी-जल्दी तैयार होकर केतन और वंदना उन दोनों के बताए रेस्टोरेंट पर पहुंचे, तो वहां अंकी को जींस और कुर्ती में देखकर वंदना कुछ सकुचा-सी गई. अंकी की सास सुलभा को ध्यान से देखा, तो उसे कोई शिकन नज़र नहीं आई. वंदना को याद आया, अंकी की शादी के एक हफ़्ते बाद वो उससे मिलने गई थी. वहां अंकी को सिर पर लिया दुपट्टा संभालते देख उसे तकलीफ़ हुई, तो वह सहसा बोल पड़ी थी, “अंकी ये पल्लू लेने का रिवाज़ अब पुराना हो गया है. अब इसे बदल डाल और हां अभी से सबकी आदत ऐसी मत डाल कि बाद में तेरे बदलने से कोई क्लेश हो. जैसी है, वैसे ही रहा कर.”

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“ओहो  मम्मी, आप  कुछ  समझती  नहीं  हो. घर  पर ताऊजी हैं. अभी नई-नई तो शादी हुई है मेरी… करना पड़ता है मम्मी…”

वंदना को एकबारगी झटका लगा कि क्या हो गया है इस लड़की को. पहले कैसे बोलती थी, “जो मेरी मर्ज़ी होगी, वो पहनूंगी…” ऐसे में अक्सर वंदना उसे एडजस्टमेंट की घुट्टी पिलाकर बोला करती थी और अब…

अंकी अभी बोल रही थी, “थोड़ा एडजस्टमेंट ज़रूरी है न मम्मा… तो देखो ये एडजस्मेंट है.” अपने पल्लू की ओर इशारा करते हुए बोली. “मम्मी, कहां खो गईं आप? शोभित पूछ रहे हैं क्या लेंगी?”

“सुलभाजी, आप बताइए.” वंदना तुरंत मेन्यू कार्ड सुलभा की ओर बढ़ाते बोली, तो उन्होंने भी ये ज़िम्मेदारी अंकी  के ऊपर डालते हुए कहा, “आज तो हम अपनी बहू की पसंद का डिनर लेंगे.”

“ये दोनों मम्मी कुछ भी नहीं बतानेवाली हैं. हमें ही डिसाइड करना पड़ेगा.” डिनर के बाद स्वीट डिश में आइस्क्रीम विद गुलाब जामुन के साथ कुल्फी आई, तो वंदना का मन तरल हो आया. अंकी जानती थी कि वंदना को कुल्फी बहुत पसंद है. वहीं सुलभाजी अपना दुलार अंकी पर यह कहकर बरसा रही थीं कि बड़े दिनों के बाद आइस्क्रीम के साथ गुलाब जामुन खाने को मिला है. खाना खाने के बाद सुलभा और तरुणजी आग्रह करके केतन व वंदना को कॉफी पिलाने के बहाने घर ले आए. रात को चलने का समय आया, तो अंकी ने इसरार करते हुए कहा, “मम्मी, आज आप यहीं रुक जाओ न…” सुलभाजी ने अंकी की तरफ़दारी करते हुए कहा, “वंदनाजी आप रुक जाइए. कुछ दिनों में ये दोनों तो कनाडा चले जाएंगे, ऐसे में हम लोगों को ही एक-दूसरे का साथ निभाना है. रात को ढेर सारी बातों के बीच में सुलभाजी ने बेहिचक कहा, “अंकी जैसी बहू पाकर हमारी बेटी की कमी पूरी हो गई. बड़ी हिम्मत से इसने शोभित को फेलोशिप के लिए कनाडा जाने का रास्ता निकाला है, वरना इसके नौकरी छोड़ने से हम भी बहुत घबराए थे. लोगों से आंख मिलाना मुश्किल था कि बहू तो नौकरी कर रही है और बेटा नौकरी छोड़े बैठा है, पर इन बच्चों का बैठाया गणित सही निकला.” सुलभा भावुक हो गई, तो अंकी ने प्यार से उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया. यह देख वंदना मुस्कुरा पड़ी. वो भी अंकी और शोभित पर भरोसा कहां कर पाई थी.

अगले दिन सुबह चलते समय शोभित ने वंदना और केतन के पांव छुए. अंकी ने वंदना के गले लगते हुए कहा, “अब तो आप ख़ुश हैं न मम्मा?” प्रश्‍न के जवाब में वंदना की आंखें भर आईं, तो अंकी झट से बोली, “अब आप सेंटी मत हो जाओ.” रास्ते भर वंदना चुप रही. अंकी ने जो कहा वो करके दिखाया था. पिछले दिनों वह कितने तनाव में रही थी. घर पर उसे सोच में डूबा देखकर केतन ने मज़ाक किया, “भई डिनर तो बेटी और दामाद ने करवाया, ब्रेकफास्ट बेटी की ससुरालवालों ने, अब दोपहर का खाना बनाओगी या वो भी…” बात अधूरी छोड़कर केतन हंसने लगे, तो वंदना के होंठों पर भी मुस्कान आ गई. रसोई की ओर बढ़ी, तो जैसे कल शाम को छोड़ गई थी, वैसी ही पड़ी थी. कॉलबेल की आवाज़ पर वह

फुर्ती-से दरवाज़े की ओर बढ़ी. सामने कम्मो को देखकर तत्परता से बोली, “जल्दी अंदर आ, तुझे ही याद कर रही थीं.”

“अरे आप बिना बताए कहां चली गई थीं? कल शाम से तीन चक्कर लगा चुकी हूं.”

“कम्मो, दामाद बाबू और अंकी बिटिया कनाडा जा रहे हैं.” कम्मो का खुला मुंह देखकर उसने बात स्पष्ट की, “अरे विदेश…” कम्मो वंदना के चेहरे की ख़ुशी पढ़कर भांप चुकी थी कि कोई बड़ी ख़ुशख़बरी है. बस मौ़के को गंवाना

उसे समझदारी नहीं लगी, झट से बोल उठी, “अंकी दीदी से तो मोबाइल लूंगी.” उसकी इस मांग पर आशा के विपरीत वंदना हंसकर बोली, “अरे, जाने तो दे पहले उन लोगों को…” कम्मो बोल रही थी, “भाभी बड़े भाग से अंकी बिटिया को इतनी भली ससुराल और लड़का मिला.” शोभित से शादी करके अंकी ख़ुश थी, उसे ख़ुश देखकर वंदना और केतन ख़ुश थे. पर अब ऐसा लग रहा है कि शोभित और उसकी फैमिली से बेहतर अंकी के लिए चुनाव नहीं हो सकता था. आज सबके चेहरों पर छाया उल्लास वंदना के जी को भिगो गया था. जिस अंकी पर वो जल्दबाज़ और लापरवाह होने का आरोप लगाती थी, वो तो कहीं ज़्यादा मज़बूत इच्छाशक्ति और सार्थक निर्णय लेनेवाली साबित हुई. अपनी ही बेटी को वो पहचान नहीं पाई. जिन संस्कारों और नियमों की पोटली वह शब्दों के रूप में उसके आंचल से बांधना चाहती थी, उन्हें तो अंकी ने व्यवहार में सहज रूप से ऐसे ढाला कि वो जान ही नहीं पाई. अंकी की परख क्षमता पर उसे हमेशा संदेह रहा है. उसके लिए गए फैसले को वह अजीबो-ग़रीब और दुनिया से अलग मानकर टोकती थी. आज अंकी की दूरदर्शिता और परख ने, मंज़िल पाने के लिए सब कुछ दांव पर लगानेवाले जज़्बे ने वह सब कुछ दिया, जिसकी वह हक़दार थी. जिसके सपने वंदना ने बेटी के लिए देखे थे. आज अंकी उसे सयानी लगी ही थी कि केतन ने आवाज़ देकर

उसे विचारों के भंवर से बाहर निकाल लिया. केतन पूछ रहे थे, “ये ऊनी कपड़े बाहर क्यों निकाले हैं?” वंदना बोल रही थी…

“अंकी के ऊनी कपड़े धूप में डाल देती हूं, वहां का मौसम तो ठंडा होगा. इस लड़की को तो होश भी नहीं है कि वहां कितनी ठंड पड़ती है. जाने कैसे रहेगी वहां…” केतन वंदना की बात को हंसी में उड़ाकर कुछ कहना चाहते थे, पर ये सोचकर चुप रह गए कि अंकी कितनी भी सयानी हो जाए, पर वंदना उस पर लापरवाह होने का आरोप लगाती रहेगी और शायद यही ख़ूबसूरती है मां-बेटी के रिश्ते की. केतन को अपनी तरफ़ मुस्कुराते हुए देखने पर वंदना ने पूछा, “क्या हुआ?” तो केतन ने कुछ नहीं का इशारा करके अख़बार से अपने चेहरे के भाव छिपा लिए.

Meenu tripathi

   मीनू त्रिपाठी

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कहानी- बकेट लिस्ट (Short Story- Bucket List)

सरसरी नज़रों से कॉपी के पन्ने पलटती नीरा को कहीं कुछ अस्वाभाविक-सा लगा, तो उसके हाथ एक पल को थम गए और फिर विपरीत दिशा में पन्ने पलटने लगी. हर बार वास्तविक व्यय अनुमानित व्यय से अधिक? कुछ अनुमानित व्यय बरसों से सूची में बने हुए? पर उन पर कभी व्यय ही नहीं? और फिर यकायक वे व्यय सूची से एकदम विलुप्त हो गए?

Kahaniya

रचित को देर रात की फ्लाइट से यूएस रवाना करने के बाद सवेरे नीरा की आंख देर से खुली. लंबा वीकेंड है, तो सारे पेंडिंग काम निबटा डालती हूं. सारे बिखरे कपड़े, बिस्तर आदि ठिकाने लगाने के बाद उसने अपने लिए कॉफी बनाई और लॉबी में आ बैठी. कॉफी की चुस्कियां भरते-भरते उसकी नज़रें टेबल के नीचे रखे कार्टन पर जा टिकीं.

“ओह! इसका भी तो निबटारा करना है. अभी पगफेरे के समय मायके से लौटते व़क्त वह अपनी बैंकिंग की सारी पुस्तकें इस कार्टन में समेट लाई थी. रचित को यूएस में बहुत अच्छी जॉब मिल जाने से वह शादी के कुछ समय बाद ही जॉइन करने चला गया था. हनीमून के तौर पर नीरा की ऑस्ट्रेलिया टूर की इच्छा भी उसने दिसंबर की छुट्टियों में पूरी करने का वादा किया था. नीरा भी बहुत जल्दी वहां नौकरी तलाश कर उसे जॉइन करनेवाली थी. इसके लिए उसे कुछ जॉब इंटरव्यू और परीक्षाएं आदि देनी थीं, जिनके लिए वह मायके से अपनी सारी किताबें समेट लाई थी. मम्मी ने टोका भी था, “जो चाहिए वे ही ले जा, बेकार क्यों बोझा घसीट रही है?”

“मम्मी, इतना समय कहां है अभी मेरे पास? रचित को रवाना करने के बाद फ्री टाइम में काम की किताबें छांटकर रख लूंगी, बाकी वहीं रद्दी में दे दूंगी.”

कॉफी का मग रखकर नीरा ने कार्टन खींच लिया था और एक-एक किताब निकालकर देखने लगी. “हूं, कुछ तो ये ही काम आ जाएंगी. बाकी नई ऑर्डर कर दूंगी. नोट्स से भी काफ़ी पॉइंट्स कवर हो जाएंगे… अरे, यह कॉपी कैसी है? पापा की बनाई लगती है.”

नीरा को याद आया. वह और उसका छोटा भाई नलिन जब अगली कक्षा में आ जाते थे, तो पापा उनसे पुरानी कॉपी-किताबों की रद्दी छंटवाते थे. उस समय कॉपियों के खाली बचे पेज वे उनसे फड़वाकर अलग करवा लेते थे. “इन सबको सिलकर तुम दोनों के लिए नई रफ कॉपियां बन जाएंगी.”

यह भी पढ़ेबेटी की शादी का ख़र्च बड़ा हो या पढ़ाई का? (Invest More In Your Daughter’s Education Rather Than Her Wedding)

“क्या पापा, अब मैं बड़ी क्लास में आ गई हूं. मैं नहीं लूंगी ऐसी कॉपी. सहेलियां मज़ाक बनाती हैं.”

“अरे! इसमें क्या हो गया? खाली पेज हैं. व्यर्थ क्यों इन्हें रद्दी में देना. कितने पेड़ कटते हैं, तब ये पृष्ठ बनते हैं. किफ़ायत और कंजूसी दो अलग-अलग चीजें हैं.” प्रतिष्ठित प्रशासनिक अधिकारी, लेकिन बेहद ईमानदार और सिद्धांतवादी पापा सादा जीवन और उच्च विचार में विश्‍वास रखते थे.

यादों के अलबम के पृष्ठ पलटती नीरा अनायास ही हाथ में थामी कॉपी के पृष्ठ पलटने लगी. यह तो पापा की हस्तलिपि लगती है. ओह! इसमें तो बरसों पुराने

हिसाब-किताब लिखे हैं. हर माह का अनुमानित व्यय औेर फिर उसके सामने वास्तविक व्यय का क्रमबद्ध विस्तृत ब्योरा. नीरा को हंसी आ गई. पापा भी न, इतना व्यस्त रहते हुए भी जाने कैसे-कैसे बेकार के कामों के लिए व़क्त निकाल लेते हैं. उसे भी तो हमेशा से कहते आ रहे हैं, विशेषकर जब से वह यहां मुंबई आकर नौकरी करने लगी है.

“बेटी, हिसाब-किताब लिखकर रखना बहुत अच्छी आदत है. माना तेरा बहुत बड़ा पैकेज है, पर उस हिसाब से महानगर के ख़र्चे भी तो बड़े हैं. अनुमानित व्यय और वास्तविक व्यय लिखती रहोगी, तो तुम्हें पता रहेगा कि कहां पैसा व्यर्थ ख़र्च हो रहा है और उस पर कैसे लगाम कसनी है? कहां निवेश करना है? कहां कटौती करनी है? बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है और अगर घड़े के पेंदे में मामूली-सा सुराख़ हो जाए, तो ऊपर से कितना ही पानी भरते रहो, एक न एक दिन उसे खाली होना ही है.” पापा समझाते रहते, लेकिन नीरा यह सोचकर कि उससे यह सब नहीं होनेवाला एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देती.

सरसरी नज़रों से कॉपी के पन्ने पलटती नीरा को कहीं कुछ अस्वाभाविक-सा लगा, तो उसके हाथ एक पल को थम गए और फिर विपरीत दिशा में पन्ने पलटने लगी. हर बार वास्तविक व्यय अनुमानित व्यय से अधिक. कुछ अनुमानित व्यय बरसों से सूची में बने हुए, पर उन पर कभी व्यय ही नहीं. और फिर यकायक वे व्यय सूची से एकदम विलुप्त हो गए? पहेली सुलझाने के लिए नीरा कॉपी में घुस-सी गई और थोड़ा-सा विश्‍लेषण करने पर ही कारण सामने आ गया. नीरा सिर थामकर बैठ गई. घूमने-फिरने और शॉपिंग की शौकीन नीरा लाड़ से अधिकार जताते हुए प्रतिवर्ष कम से कम एक बाहर की ट्रिप तो प्लान करवा ही लेती थी. विदेश यात्रा नहीं, तो अपने देश में ही कहीं… नीरा के पास हर तरह की आइटिनररी मौजूद रहती. नीरा के इसी जुनून के सौजन्य से पूरा परिवार स्पेन, पेरिस, दुबई, गोवा, कश्मीर आदि जगह घूम चुका था, लेकिन नीरा की बकेट लिस्ट में कुछ न कुछ जुड़ता ही जाता.

आधुनिक पोशाकों से नीरा की वॉर्डरोब भरी रहती, लेकिन फिर भी उसकी उंगलियां ऑनलाइन नई ड्रेस तलाशने को लालायित रहतीं. पापा को सॉफ्ट टारगेट मान नीरा हमेशा उन्हें ही मनाने का प्रयास करती.

“अभी डिस्काउंट के साथ कार्ड पर कैश बैक भी मिल रहा है. स्कूल फेयरवेल में ड्रेस काम आ जाएगी. मेरा बर्थडे गिफ़्ट भी हो जाएगा.” लेकिन बर्थडे आते-आते दूसरी फ़रमाइश तैयार हो जाती थी. सहमत न होते हुए भी लाडली इकलौती बिटिया का मन रखने के लिए पापा मान जाते थे. मम्मी थोड़ा सख्ती बरतनेे का प्रयास करतीं, तो पापा उन्हें भी मना लेते. “छोड़ो न नैना, कुछ सालों के शौक हैं. ससुराल चली जाएगी, कंधों पर ज़िम्मेदारी का बोझ बढ़ेगा, तो सब पीछे छूटता चला जाएगा. फिर हम करने की स्थिति में हैं.”

“आज हैं, पर कल सेवानिवृति के बाद का भी तो सोचिए. आप हैं भी इतने हार्ड ऑनेस्ट! हमारी ज़िम्मेदारियां सारी अभी ज्यों की त्यों हैं. दोनों बच्चों की पढ़ाई, शादियां, मकान बनाना…” मम्मी अपनी बकेट लिस्ट गिनाने लग जाती थीं.

अतीत को स्मरण करती नीरा थोड़ा असहज हो उठी थी. मन में एक अपराधबोध जन्म लेने लगा. पापा की नसीहतें रह-रहकर याद आ रही थीं.

“अभी तू अकेली जान है. इतना बड़ा पैकेज है. ज़्यादा से ज़्यादा सेव किया कर. भविष्य में तेरे ही काम आएगा.” पापा ने ही उसका पैसा उसके नाम से जगह-जगह निवेश कर दिया था. वह झुंझला जाती थी. “क्या पापा, सैलरी अकांउट में आते ही इधर-उधर ट्रांसफर हो जाती है.”

“फिर भी तेरे हाथ में ख़र्च करने को कितना बचा रहता है. रोज़ पार्टी, मूवी… इन सब पर अब थोड़ा अंकुश लगा बेटी!”

“क्या पापा, आप ही तो कहते हो, उम्र के शौक हैं, उम्र के साथ चले जाएंगे.” नीरा लाड़ से ठुनकने लगती.

“अच्छा सुन, हम लोग इधर एक छोटा-सा प्लॉट ख़रीद रहे हैं. तू कहे, तो तेरी सेविंग से उससे जुड़ता वैसा ही एक प्लॉट तेरे लिए भी ले लें. तुझे यहां बसना तो नहीं है, पर मात्र निवेश के तौर पर सौदा बुरा नहीं है. भविष्य में अच्छी क़ीमत पर बेचकर जहां हो, वहीं फ्लैट ख़रीद लेना.”

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“आप जैसा ठीक समझें.” नीरा ने उबासी लेते हुए सहमति दे दी थी.

सचमुच पापा नहीं देखते-संभालते, तो वह अपनी सारी कमाई घूमने, खाने, शॉपिंग आदि में ही उड़ा चुकी होती. वैसे उड़ा भी रही है.

गहन सोच में डूबी नीरा फिर से कॉपी के पृष्ठ पलटने लगी थी. पापा की बकेट लिस्ट से मां की चूड़ियां गायब होकर ‘नीरा के गहने’ नाम से नया मद जुड़ गया था. अप्रैल 2014 से… हूं, तब वह कॉलेज के अंतिम वर्ष में आ गई थी. मतलब तब से पापा-मम्मी ने उसकी शादी की तैयारियां आरंभ कर दी थीं. इसके बाद की वास्तविक व्यय सूची में नीरा की नथनी, चूड़ियां, बिछुए और सेट आदि जुड़ते चले गए, पर गायब हुई ‘नैना की चूड़ियां’ फिर कहीं नज़र नहीं आईं. इसी तरह

सालभर से बकेट लिस्ट में पड़ा पापा का गरम सूट दुबई ट्रिप की भेंट चढ़ गया था, तो क्या अपनी बकेट लिस्ट भरने के चक्कर में वह अनजाने ही पापा की बकेट लिस्ट खाली करती चली गई? वह इतनी ख़ुदगर्ज़ और नासमझ कैसे हो गई?

पापा-मम्मी को रचित के बारे में बताने के साथ ही उसने अपनी डेस्टिनेशन वेडिंग की आकांक्षा भी ख़ुशी-ख़ुशी जाहिर कर दी थी.

“पर बेटी, हमें इतना बड़ा सरकारी बंगला और अहाता मिला हुआ है. मेहमानों के लिए सर्किट हाउस, गेस्ट हाउस सब आसानी से मिल जाएगा. व्यर्थ हम इतना पैसा क्यूं बहाएं?” मम्मी ने तर्क किया था.

“मम्मी, शादी ज़िंदगी में एक बार होती है. फिर मैं फिल्मी तारिकाओं की तरह विदेश में शादी करने को नहीं कह रही हूं. अपनी सीमाएं पता हैं मुझे. जयपुर से आगे एक नया आइलैंड रिसॉर्ट बना है. ठहरिए! मैं आपको वहां की पिक्स दिखाती हूं.” बेहद उत्साह से नीरा मोबाइल खोलकर वहां की पिक्स दिखाने लगी. अपने उत्साह में उसने पापा-मम्मी के उतरे चेहरे भी नज़रअंदाज़ कर दिए थे, जिन्हें शायद छोटे भाई नलिन ने नोटिस कर लिया था.

“जगह तो बहुत शानदार है दीदी, पर इस पर लाखों ख़र्च करना मुझे बुद्धिमानी का सौदा नहीं लग रहा. इससे तो मेरे दोस्त के पापा के रिसॉर्ट में हम शादी कर सकते हैं. मेहमानों के लिए कमरे, हॉल के साथ-साथ ख़ूब खुला गार्डन स्पेस भी है. अपने घर से ज़्यादा दूर भी नहीं है. बाराती वहां रुक जाएंगे. बाकी अपने रिश्तदारों के लिए घर, सर्किट हाउस आदि के कमरे हो जाएंगे. क्यूं यह कैसा रहेगा?”

पापा-मम्मी को यह प्रस्ताव जहां अपने बजट से थोड़ा ऊपर, तो नीरा को अपने स्तर से थोड़ा नीचे लगा था. पर अंतत: इस पर सहमति बन गई थी.

नीरा को आज महसूस हो रहा था कि नलिन उससे पांच वर्ष छोटा होते हुए भी उससे कहीं अधिक समझदार, व्यवहारिक और ज़मीन से जुड़ा है. पूरी शादी में वह पापा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहा था. हर व़क्त उनके आस-पास बना रहता.पूरी शादी में हर काम के लिए नलिन की ही पुकार मच रही थी. ख़ुद वह भी तो अपने हर काम के लिए उसी पर निर्भर हो गई थी. “नलिन, मेहंदीवाली का क्या हुआ? पार्लर कौन ले जाएगा? मेरी ज्वेलरी व़क्त पर ले आना, मैचिंग सैंडल दिलवा ला…”

अभी-अभी सेकेंड इयर में आया नलिन अपनी उम्र से कितना अधिक परिपक्व और समझदार है. मम्मी-पापा कितना भरोसा करते हैं उस पर. कितने निर्भर हैं उस पर. हर बात में उसकी राय लेते हैं.

भाई की तारीफ़ करता मन अनजाने ही उससे ईर्ष्या पर उतर आया. ‘बेटा जो है… वह तो ठहरी बेटी. पराई अमानत!’

पर अगले ही क्षण अपनी तुच्छ सोच पर नीरा ख़ुद ही शर्मिंदा हो उठी. बेटा-बेटी के बीच सुई की नोंक बराबर भी भेदभाव न रखनेवाले अपने माता-पिता पर वह कैसा घृणित आक्षेप लगा रही है. भाई के बराबर, बल्कि उससे कुछ अधिक ही उससे अधिकार पानेवाली वह कैसी बेटी है, जो कर्तव्य निर्वहन की दौड़ में छोटे भाई से पिछड़ गई.

मोबाइल बजा, तो नीरा की चेतना लौटी. “लो शैतान को याद किया और शैतान हाज़िर! तुझे ही याद कर रही थी.”

“भला क्यों? अब क्या काम बाकी रह गया? ड्राईक्लीनर को आपके कपड़े दे आया हूं समय से ले भी आऊंगा… वैसे मैंने जीजू का समाचार जानने के लिए फोन किया था.”

नलिन के परिहास पर भी नीरा शर्मिंदा हो गई. रचित का समाचार देकर वह स्वर में बड़ी बहनवाला रौब और ज़िम्मेदारी ले आई.

“तूने इंटर्नशिप का फॉर्म भर दिया या नहीं? किसी अच्छी विदेशी यूनिवर्सिटी से करेगा, तो आगे जॉब के अच्छे अवसर मिलेंगे. रचित ने भी यूएस अपने मामा के पास रहकर इंटर्नशिप की थी और आज उसी कंपनी ने इतना अच्छा जॉब ऑफर दिया है.”

“जानता हूं दीदी, पर बहुत महंगा सौदा है. अभी तो शादी के लोन से उबरने में ही पापा-मम्मी को एक लंबा व़क्त लग जाएगा. मैं उन पर एक और लोन का बोझ नहीं डालना चाहता. मैं इंटर्नशिप यहीं से कर लूंगा.

पापा-मम्मी की तबीयत भी आजकल ठीक नहीं रहती. पास रहूंगा, तो उन्हें भी तसल्ली रहेगी और मुझे भी. जॉब की चिंता मत करना. आपका भाई इतना प्रतिभाशाली तो है कि जॉब उसके पास चलकर आएगी.”

“सो तो है. मुझ पर जो गया है. ऑल द बेस्ट!” फोन बंद करते हुए नीरा की आंखें छलछला उठी थीं. छोटे भाई के प्रति कुछ पल पहले जगा ईर्ष्या का भाव जाने कहां तिरोहित हो गया था. मन में रह गया था उसके प्रति ढेर सारा प्यार, सम्मान, अपनापन और इन सबसे ऊपर अपरिमित गर्व. वह कितनी भाग्यशाली है कि उसने इतने सुसंस्कृत परिवार में जन्म लिया.

पापा की कॉपी और अपनी पुस्तकें, नोट्स आदि समेटते नीरा मन ही मन कुछ महत्वपूर्ण निर्णय ले चुकी थी. फिर भी मन में कुछ संशय लिए उसने रचित को फोन लगाया और बहुत देर तक दिल की बातें शेयर करती रही.

“बस, यही सब बताने के लिए इतनी रात गए फोन किया था जान? मुझे बताए बिना भी तुम ये सब करतीं, तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं होती. मैं तब भी इतना ही प्रसन्न होता.”

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‘ओह! आई एम सॉरी. मैं तो भूल ही गई थी कि वहां इस समय इतनी रात होगी, पर सच कहूं, तुमसे बात कर मन बहुत हल्का हो गया है. मुझे अपनी पसंद पर गर्व है. और….और… मैं तुमसे पहले से भी ज़्यादा प्यार करने लगी हूं.” नीरा ने फोन पर ही ताबड़तोड़ चुंबनों की बौछार कर दी थी. फिर वह फुर्ती से उठकर अपनी नई बकेट लिस्ट तैयार करने लगी-

नलिन को यूएस रचित के पास इंटर्नशिप के लिए भेजना… प्रयास करना कि तब तक वह स्वयं भी वहां पहुंच जाए… अपना प्लॉट पापा के नाम कर उन्हें वहां जल्द निर्माण कार्य आरंभ करने के लिए तैयार करना…ऑस्ट्रेलिया टूर पर जाने की बजाय रचित की इच्छानुसार सर्दी की छुट्टियां उसके पैतृक गांव में उसके माता-पिता के संग व्यतीत करना…

 

Sangeeta Mathur

       संगीता माथुर

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कहानी- नेहरू अपार्टमेंट (Short Story- Nehru Apartment)

“अविजीत जीवित होते, तो अपनी मां का ख्याल रखते न! तो उनकी देखभाल कर मैं अविजीत का ही फर्ज़ पूरा कर रही हूं. अविजीत का बहुत साम्य था मम्मी के साथ. बात करने का, हंसने का बिल्कुल वही ढंग है. मम्मी में मैं अविजीत को ही देखती हूं और यूं उससे जुड़ा महसूस करती हूं.”

Kahani

साउथ दिल्ली में नए बने थे- नेहरू अपार्टमेंट्स. बिल्डर ने साथ-साथ के दो प्लॉट ख़रीदकर उस पर बारह फ्लैट्स बना लिए थे एकदम आधुनिक सुविधाओं से लैस. हम जब इस घर में आए, तो आस-पड़ोस बस चुका था.

बिल्डिंग में रहनेवालों का एक-दूसरे के प्रति स्नेह व अपनापन था. आवश्यकता पड़ने पर बच्चों को पड़ोसी के पास छोड़ गृहिणियां अपने ज़रूरी काम निबटा आतीं और महरी के छुट्टी लेने पर पड़ोस की बाई आकर काम कर जाती. बिल्डिंग के आगे बगीचा, गेट पर खड़ा चौकीदार, बच्चे-बड़ों सब को सुरक्षा का एहसास दिलाता. हम दोनों और हमारी डेढ़ वर्षीया बेटी रिया- यही छोटा-सा परिवार था हमारा. सोमेंद्र एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में काम करते थे. रात देर से घर लौटते और अक्सर शहर से बाहर भी जाना पड़ता था.

सब परिवारों का आपसी मेल-मिलाप था, बस, ठीक हमारे ऊपर रहनेवाली मां-बेटी को छोड़कर. चूंकि वे किसी से मिलती-जुलती नहीं थीं, इसलिए लोग उनके बारे में तरह-तरह की बातें बनाते. कोई उन्हें घमंडी बताता, तो कोई नीरस. कुछ लोगों के अनुसार बेटी सुमंगला का विवाह-विच्छेद हो चुका था. हमारा फ्लैट दूसरी मंज़िल पर था और उनका तीसरी पर. सीढ़ियों पर उनके आने-जाने की आहट सुनाई पड़ जाती. मां चार बजे के आसपास लौटती और बेटी छह के बाद. एक-दो बार सीढ़ियों पर मुलाक़ात भी हुई, लेकिन विशेष बातचीत नहीं हुई. हमें इस घर में आए अभी अधिक समय नहीं हुआ था और सबसे उनके बारे में नकारात्मक सुनकर मैं बहुत उत्सुक भी नहीं थी उनसे मैत्री का हाथ बढ़ाने के लिए. अब सोचती हूं, पढ़े-लिखे होने का, सभ्य होने का दंभ भरनेवाले हम मनुष्य, बिना सच को जाने दूसरों के प्रति कितनी ग़लत धारणाएं बना लेते हैं.

रिया ने जब से चलना सीखा है, वह एक जगह टिककर बैठ ही नहीं सकती, विशेषकर शाम के समय नीचे खेलते बच्चों की आवा़ज़ सुनते ही वह नीचे जाने की ज़िद करने लगती है. उस दिन सुबह से ही मुझे तेज़ बुख़ार था और उसे नीचे ले जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. सामने खिलौनों का ढेर लगाकर मैंने उसका मन बहलाने की बहुत कोशिश की, पर वह नीचे जाने के लिए ज़िद किए बैठी थी. इतने में धोबी प्रेस के कप़ड़े ले आया. दरवाज़ा खोलते ही रिया सीढ़ियों की तरफ़ लपकी और नीचे जाने के लिए मचलने लगी.

मैं परेशान खड़ी थी कि क्या करूं कि सुमंगला ऊपर आती दिखी और आकर रिया को पुचकारने लगी. मुझ पर नज़र डालते ही वह समझ गई कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है. जब उसे पता चला कि रिया नीचे जाने के लिए ज़िद कर रही है, तो वो रिया को नीचे जाकर घुमाने के लिए तैयार हो गई. उसने मुझे आश्‍वस्त किया कि वह रिया का पूरा ध्यान रखेगी. मुझे थोड़ी हिचकिचाहट तो हुई, पर और कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. सुमंगला बोली, “रिया के खाने-पीने का बता दो अथवा दे दो मैं ऊपर ले जाती हूं, ताकि तुम थोड़ी देर आराम कर सको.”

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अगले दिन भी वह काम से लौटते हुए घर के यहां रुकी. सीधे दफ़्तर से आई थी, तो मैंने उससे चाय के लिए आग्रह किया. वह चाय पीने के लिए मान गई, पर इस ज़िद पर कि वही बनाएगी. ऊपर जाते समय रिया स्वयं उसके संग हो ली.

मुझे वह अच्छी लगने लगी थी. रंग सांवला ज़रूर था, लेकिन मनमोहक लगता था. छरहरी देह और लंबा क़द. लंबी-सी एक चोटी. चेहरे पर आत्मविश्‍वास के साथ एक नूर था, जो आकर्षित करता था. लेकिन जाने क्यों मुझे उसकी आंखें उदास लगीं. जब वह हंसती, तब भी आंखें जैसे उसकी हंसी में शामिल नहीं होती थीं.

मैं ठीक हो गई, तो उसने मुझे भी ऊपर चलने का निमंत्रण दिया.

रिया तो ऊपर जाकर यूं खेलने लगी जैसे उसका अपना ही घर हो. भीतर से खिलौने उठा लाई, जो सुमंगला ने उसके लिए ला रखे थे. सुमंगला की मम्मी चाय बना लाईं, साथ में घर की बनी नमकीन भी थी. सुमंगला ने बताया कि उसकी मम्मी एक समाजसेवी संस्था के साथ जुड़ी हुई हैं, जो झुग्गी-झोपड़ी में रहनेवाली विधवाओं की देखभाल करती है. मैने ऐसी संस्था के बारे में पहली बार सुना था. अतः उसी के बारे में चर्चा होने लगी.

चाय पीते हुए मेरी नज़र दीवार पर लगी एक बड़ी-सी फोटो पर पड़ी. पायलट की वर्दी में 25-26 साल के एक ख़ूबसूरत नौजवान की तस्वीर पर फूल-माला चढ़ी हुई थी. सुमंगला ने मेरी नज़र देख ली थी, पर वह ख़ामोश रही और मैं भी पहली ही मुलाक़ात में उनका दर्द नहीं कुरेदना चाहती थी.

सुमंगला को रिया से मोह-सा हो गया था. काम से लौटते हुए वह ज़रूर थोड़ी देर रुककर ही ऊपर जाती. बच्चे भी प्यार की भाषा ख़ूब समझते हैं. रिया उसका इंतज़ार करती और उसे देखकर ख़ुश होती. मैं जब भी सुमंगला को रिया के संग खेलते देखती, उसके चेहरे पर छलकते स्नेह को देखती, तो यह जानने की उत्कंठा होती कि उसका तलाक़ हो चुका है अथवा उसने विवाह नहीं किया? चालीस की उम्र तो पार कर चुकी होगी. शादी हुई होती, तो आज उसका अपना परिवार और बच्चे होते. ऐसा भी नहीं लगता था कि उसके लिए अपना करियर इतना महत्वपूर्ण रहा हो कि वह शादी और बच्चों के झमेले में नहीं पड़ना चाहती हो. मेरी जब उससे अच्छी मैत्री हो गई और एक दिन जब रिया उसकी गोदी में सो गई, तो मैंने उससे पूछ ही लिया.

“ज़िंदगी के सब सपने तो पूरे नहीं होते न वसुधा! बस सपनों के टूट जाने पर व्यक्ति स्वयं न टूटे इतनी शक्ति होनी चाहिए.” कहकर वह थोड़ी देर को चुप हो गई.

“एक फौजी पिता के बेटे थे अविजीत. अभी वे स्कूल में ही थे कि उनके पिता कश्मीर में एक आतंकवादी की गोली का शिकार हो गए. मैं और मेरा भाई भी उसी स्कूल में थे. मेरा भाई अविजीत के संग था और मैं उनसे दो वर्ष जूनियर. यूं हम एक-दूसरे को जानने लगे. दोस्ती हुई, जो धीरे-धीरे प्यार में बदलती गई. मेरे पैरेंट्स जानते थे यह बात और अविजीत की मम्मी भी. हम भिन्न प्रांतों से थे, भिन्न भाषी, पर उनमें से किसी को भी इस बात से आपत्ति नहीं थी. अविजीत का सपना एयरफोर्स में पायलट बनने का था, जो उन्होंने पूरा किया. विवाह की जल्दी नहीं थी. मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर लेना चाहती थी और अविजीत भी अपने जॉब में सेटल हो जाना चाहते थे. भैया पढ़ाई के लिए कुछ वर्षों के लिए विदेश जा रहे थे. घर के बड़ों ने सोचा उनके जाने से पहले सगाई कर दी जाए.

अविजीत का विभिन्न जगहों पर आना-जाना लगा ही रहता था, पर टेलिफोन, ईमेल ने तो सब दूरियां ख़त्म कर दी थीं, सो आपसी संपर्क बना ही रहता. लेकिन एक दिन वह सारे संपर्क सूत्र तोड़ गया सदा के लिए, बस सूचना भर मिली. लाश भी बरामद नहीं हो पाई. दुश्मन के क्षेत्र में हुआ था हादसा. आज भी वह ख़बर झूठी लगती है. आज भी लगता है लौट आएंगे वे एक दिन. बुद्धि जानती है कि यह झूठा दिलासा है, पर मन नहीं सुनता उसकी बात.”

कहते-कहते वह फिर ख़ामोश हो गई. मैं भी क्या बोलती?

वह शाम के समय अक्सर आ जाती, पर इस बात का ज़िक्र हमारे बीच दोबारा नहीं छिड़ा. वह रिया से खेल रही होती, तो प्रसन्न होती और मैं वह बात छेड़कर उसका मूड बिगाड़ना नहीं चाहती थी. आज के युग में भी कोई इतना अटूट प्यार कर सकता है, मैं तो इसी बात पर अभिभूत थी. विवाह नहीं हुआ था तो क्या! उसने अपने प्यार की याद से ही वफ़ादारी निभाई थी.

एक दिन सुमंगला ने बताया कि मम्मी के पैर में मोच आ गई है और डॉक्टर ने उन्हें कुछ दिनों के लिए चलने-फिरने को मना किया है, इसलिए वह आजकल घर पर रहती हैं और उनकी देखभाल के लिए कामवाली बाई दिनभर को रुक जाती है. दूसरे दिन सुबह का काम समाप्त कर मैं और रिया उन्हें देखने ऊपर चले गए. वह आरामकुर्सी पर बैठीं कोई पुस्तक पढ़ रही थीं. कुर्सी पर बैठी भी वह चुस्त और स्मार्ट लग रही थीं. गोरा खिला रंग और तीखे नैन-नक्श. हमें देखकर वह बहुत ख़ुश हुईं, “मेरा कुछ समय अच्छा बीत जाएगा.” वे बहुत ख़ुशमिज़ाज और बातूनी थीं. मुझे भी उनसे बात करके अच्छा लगा, सो जब तक उन्हें आराम बताया गया, मैं और रिया सुबह के समय उन्हीं के पास जा बैठते.

दीवार पर लगी तस्वीर पर अक्सर निगाह पड़ जाती. एक दिन मज़ाक के मूड में मैंने उनसे कह ही दिया, “आपकी बेटी की शक्ल आपसे उतनी नहीं मिलती, जितनी उसके मंगेतर से.”

सहसा जैसे उनके चेहरे से किसी ने हंसी पोंछ दी हो. कुछ क्षण रुककर बोलीं, “यह मेरे बेटे की तस्वीर है, न कि होनेवाले दामाद की.”

“और सुमंगला…?”

“उसकी मंगेतर थी.”

“मतलब! सुमंगला आपकी बेटी नहीं है?”

यह भी पढ़ेज़िंदगी रुकती नहीं (Life Doesn’t Stop And Neither Should You)

“मैं तो भूल ही चुकी हूं इस बात को. कितना तो ख्याल रखती है मेरा. मुझे अकेली कहीं नहीं जाने देती. ज़बरदस्ती एक टैक्सी लगा रखी है, जो सुबह दस बजे ले जाती है और चार बजे छोड़ जाती है. अपनी मां को तो वह ‘आई’ कहकर बुलाती थी. मराठी में ‘आई’ ही कहते हैं मां को. सगाई हो जाने के बाद मुझसे मिलने आया करती थी. कुछ दिन न आती, तो मैं ही बुलवा भेजती. इन दोनों के सिवा मेरा था ही कौन? तभी से ‘मम्मी’ कहने लगी है मुझे.

मैंने तो एक लंबी उम्र अकेले ही काटी है. अविजीत के पापा जीवित थे, तो बहुत व्यस्त रहा जीवन. किन्तु अविजीत अभी छोटा ही था कि वे कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा मारे गए. पर तब हिम्मत थी, अविजीत को पालने का एक बड़ा मक़सद था सामने. उम्मीदें ज़िंदा थीं. नौकरी करने की ज़रूरत तो नहीं पड़ी, अच्छी पेंशन मिलती थी, सो मैंने अपना सारा समय समाज सेवा में लगा दिया. परंतु अविजीत के जाने के बाद से बुरी तरह टूट गई मैं. यदि सुमंगला ने सहारा न दिया होता तो…

इस हादसे के बाद उसके अपने पिता को दिल का ज़बरदस्त दौरा पड़ा. अस्पताल की भागदौड़, ऑपरेशन, इन सबके बीच वह मेरा हालचाल लेती रही. सुमंगला का भाई आया था पिता के ऑपरेशन के समय, पर वह कितने दिन रुक सकता था? सुमंगला ने ही संभाला सब… घर भी इतना पास नहीं था और वह ख़ुद भी बुरी तरह से टूट चुकी थी… पर अपना दर्द भूल हम तीन प्राणियों को संभालती रही. वह दिन याद करती हूं, तो ऐसा लगता है जैसे कोई ज़बरदस्त झंझावत ही आया था हमारे जीवन में, जो बहुत कुछ उड़ा कर ले गया अपने साथ. दो वर्ष तक भागदौड़ की, परंतु अपने पापा को न बचा सकी सुमंगला… शायद हम स्त्रियां अपना जो दर्द आंसुओं में बहा देती हैं, पुरुष उसे पी जाते हैं और तभी सहन नहीं कर पाते. आख़िर चोट तो उन्हें भी लगती ही है.

वह मुझे अकेली नहीं छोड़ना चाहती थी. बहुत दिनों से ज़ोर डाल रही थी कि मैं चलकर उनके ही संग रहूं. उधर उसकी मां अकेली पड़ गई थी और इधर मैं. उसकी परेशानी देखकर मैंने वहीं चलकर रहने की हामी भर दी. हम तीनों प्राणी एक साथ रहने लगे. एक-दूसरे को ढांढ़स बंधाते. हमारी ओर से निश्‍चिंत हो सुमंगला ने नौकरी करनी शुरू की. उसकी आई और मैंने बहुत कोशिश की कि वह विवाह करने को राज़ी हो जाए. अच्छी जगह रिश्ता हो सकता था, पर वह नहीं मानी. हमने सोचा नौकरी करेगी, तो स्वयं कोई पसंद आ जाएगा, पर उसने तो जैसे अपने दिल में प्यार के सभी दरवाज़े मज़बूती से बंद कर दिए थे.

लगभग दस वर्ष हम एक साथ रहे, फिर सुमंगला की मां को भी कैंसर हो गया. ऑपरेशन व कीमो थेरेपी सब कुछ करवाया, पर एक तो उम्र, फिर निराशाएं ले ही गईं उन्हें. बहुत मुश्किल हो गया था, इतनी सारी पुरानी यादों के बीच जीना. सुमंगला ने अपना तबादला यहां करवा लिया. मेरे लिए तो जहां रहूं काम है. दूसरों के दुख में हाथ बंटा, उनकी सहायता कर, अपना दुख कम लगने लगता है.” और सुमंगला का नज़रिया सुन तो मैं दंग ही रह गई.

एक दिन जब मैंने उसके त्याग की चर्चा की तो वह बोली, “अविजीत जीवित होते, तो अपनी मां का ख्याल रखते न! तो उनकी देखभाल कर मैं अविजीत का ही फर्ज़ पूरा कर रही हूं. अविजीत का बहुत साम्य था मम्मी के साथ. बात करने का, हंसने का बिल्कुल वही ढंग है. मम्मी में मैं अविजीत को ही देखती हूं और यूं उससे जुड़ा महसूस करती हूं. इन सबने बहुत चाहा कि मैं कहीं और विवाह कर लूं, परंतु अविजीत तो मेरे रोम-रोम में बसे हुए हैं. उन्हें स्वयं से अलग करना संभव है क्या?” सुमंगला के प्यार और समर्पण की भावना को देख मेरी आंखें नम हो गईं.

प्यार जब दैहिक और सांसारिक आवश्यकताओं से ऊपर उठ जाता है, तो उसमें कोई अलौकिक तत्व आ जाता है शायद.

usha vadhava

       उषा वधवा

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कहानी- गति ही जीवन है (Short Story- Gati Hi Jeevan Hai)

यह भागदौड़ उस सन्नाटे से अच्छी है, जो कई बार डरा देता है. पर जीवन की गति अनवरत चलती रहे, तो ही सब सहज व सुगमता से चल पाता है. विराम कुछ पल के लिए तो ठीक है, पर उसके बाद वह खालीपन और निरर्थकता का बोध कराने लगता है. बिज़ी लाइफ तो जीवन का ही एक हिस्सा है, जिससे एक चहल-पहल बनी रहती है. गति ही जीवन है डियर. व्यस्तता में ही ख़ुशी है.

Kahani

उ़फ् कैसा समा था… धूप की किरणें या कहें रोशनी के छोटे-छोटे क़तरे बादलों की कोख से धीरे-धीरे झांक रहे थे. आसमान के विस्तृत फलक पर छितरी स़फेद बादलों की लंबी कतारें, दूर-दूर तक छिटकी हुईं. कहीं-कहीं बादलों की दरारों से झांकता नीला आसमान नज़र आ जाता. कहीं बादलों का एक आसमान-सा झुंड लगता सामने आ जाता, मानो वह आसमान की सैर करने निकला हो.

दूर पहाड़ों की चोटियों पर पड़ती सूरज की रोशनी… पहाड़ों  की परतों की तरह लग रही थी और एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रही थी. एक पहाड़ को पार करता दूसरा पहाड़, एक चोटी दूसरी चोटी को लांघती… सर्पीली चोटियां… ऊबड़-खाबड़… फिर भी ग़ज़ब का समन्वय और संतुलन. पहाड़ों पर लगे पेड़ों की लंबी-लंबी कतारें… रिसॉर्ट की बालकनी पर खड़ी अमला जब इस नज़ारे को निहार रही थी, तो उसे लगा कि जैसे बैगपाइपर बांसुरी बजाता चल रहा है और उसके पीछे-पीछे असंख्य बच्चे या फिर संगीत की कोई धुन… आरोह-अवरोह… उठती-गिरती लय… प्रकृति कितनी दक्ष है, संतुलन बनाना जानती है… लेकिन तभी तक, जब तक इंसान के क्रूर हाथ उस तक न पहुंचें. फिर तो उसकी सुंदरता नैसर्गिक न रहकर, कृत्रिम बन जाती है.

बड़े शहरों में हम पत्थरों को पैरों की ठोकरें मारते रहते हैं और पहाड़ों पर यही पत्थर, बड़ी-बड़ी चट्टानें किसी तिलिस्म से कम नहीं लगती हैं. न कोई आकार, न कोई स्थल का चुनाव, फिर भी यही बड़े-छोटे पत्थर आकर्षित करते हैं. इन्हें छूने, इनके पास बैठने का मन होता है. पहाड़ों से उतरते कटावदार, सीढ़ीनुमा आकार और उनके बीच-बीच में बने घर, झोपड़ीनुमा… कहीं कोई बस्ती नहीं, घर भी यहां बहुत दूर-दूर बने होते हैं. जैसे-जैसे सूरज की किरणें बादलों की कोख से बाहर निकल रही थीं, उजाला बढ़ता जा रहा था और उसके मन की प्रफुल्लता भी. एक उजास-सा मन-प्राण को घेर रहा था.

बालकनी से उठ वह अंदर आ गई. बेड पर यूं ही लेट गई. तीन दिन हो गए थे उसे नारकंडा आए. हिमाचल में स्थित यह स्थान एकदम शांत था. कभी-कभी तो लगता कि हर तरफ़ सन्नाटा ही सन्नाटा पसरा हुआ है. असल में वह ख़ुद ऐसी ही जगह आना चाहती थी, जहां न तो शोर-शराबा हो और न ही कोई डिस्टर्ब करनेवाला. थक गई थी, अपनी रूटीन लाइफ से. ऑफिस में काम करने की तो कोई सीमा ही नहीं थी. एक प्रोजेक्ट ख़त्म होता, तो दूसरा शुरू हो जाता. इतनी बिज़ी लाइफ कि कभी-कभी तो लगता था कि घर केवल सराय मात्र है. जाओ सो जाओ, उठो ऑफिस पहुंच जाओ, न खाने का ठिकाना, न रिलैक्स करने का अवसर. बस, काम ही करते रहो.

बहुत दिनों से उसे लग रहा था कि उसे कहीं बाहर जाना चाहिए. एक लंबी छुट्टी पर… कितनी बार वह अपनी कलीग सौम्या से कह चुकी थी कि चलो कहीं चलते हैं, पर निकलना ही नहीं हो पाता था. वैसे भी छुट्टी मांगना भी किसी जोखिम से कम न था. बड़ी मुश्किल से एक दिन बॉस से लड़-झगड़कर उसने दस दिनों की छुट्टी ली और ख़ुद ही निकल पड़ी सुकून पाने के लिए.

यह भी पढ़ेसर्वगुण संपन्न बनने में खो न दें ज़िंदगी का सुकून (How Multitasking Affects Your Happiness)

“कुछ काम होगा, तो कॉन्टैक्ट करूंगी, तू वहीं से मुझे प्रोजेक्ट में हेल्प कर देना अमला.” सौम्या ने जब उससे कहा, तो उसने तुरंत मना कर दिया. “देख, मैं वहां रिलैक्स करने जा रही हूं, इसलिए कोई काम मत पूछना प्लीज़. मैं ऑफिस का कोई फोन नहीं उठाऊंगी. अरे बाबा, वहां तो चैन से रहने देना मुझे. सारा दिन सोनेवाली हूं मैं. इसलिए रिसॉर्ट बुक किया है. अच्छी बात तो यह है कि इस समय वहां भीड़ भी नहीं होती. इस समय रिसॉर्ट एकदम खाली है. वैसे तुझे बता दूं कि मैं अपने साथ लैपटॉप भी लेकर नहीं जा रही हूं और प्लीज़ यह बात बॉस को मत बताना, वरना वह मेरी छुट्टी कैंसल कर देंगी.”

बस दो दिन से वह आराम ही कर रही थी. कहीं बाहर निकली भी नहीं थी. दरवाज़े पर खटखट हुई, तो वह उठी.

“मैडम, लंच लाया हूं.” वेटर था. खाना खाते-खाते वह टीवी खोलकर बैठ गई. चैनल ही पलटने में व़क्त निकल गया. सब जगह बकवास ही आ रहा था. वैसे भी उसे टीवी देखने की आदत नहीं थी. असल में टाइम ही नहीं मिलता था. कुछ देर नॉवेल पढ़ा, तो नींद आ गई. मोबाइल की घंटी से नींद टूटी. सौम्या थी.                                                                                                                      “तेरा चिलिंग पीरियड ख़त्म हो गया हो, तो वापस आ जा यार, नहीं हैंडल कर पा रही हूं अकेले. बॉस भी बड़बड़ कर रही है.” सौम्या अपनी आदत के अनुसार बिना किसी औपचारिकता के बोली. “इडियट, यह तो पूछ मैं कैसी हूं, क्या कर रही हूं. बस, शुरू हो गई.”

“ठीक ही होगी, बता कब वापस आ रही है. तीन दिन बहुत होते हैं. अब आ जा. तत्काल में टिकट बुक करा देती हूं.”

“चुप रह, मैं नहीं आ रही. फोन रख और मुझे आराम करने दे.”

सौम्या की याद तो उसे भी बहुत आ रही थी, लेकिन अभी भी वह कुछ करने के मूड में नहीं थी. फिर क्यों उसका मन कर रहा है कि कुछ तो होना चाहिए… कुछ तो करने को होता. फोन पर भी किससे, कितनी बातें करें. क्या मुसीबत है, अख़बार भी नहीं आता यहां. उसे थोड़ी कुढ़न हुई. रिसॉर्ट भी खाली है, कोई टूरिस्ट होता, तो उनसे ही गप्पे मार लेती. पांच बजे से ही इतना अंधेरा हो जाता है यहां कि अब कहीं बाहर भी घूमने नहीं जाया जा सकता है. कितना बोरिंग है… उसे अपने आप पर ही खीझ हुई. दस दिन वह कैसे काटेगी. अचानक उसे लगा कि इतने रिलैक्सेशन के बावजूद कहीं कुछ मिसिंग है. आख़िर सोए भी तो कितना… वैसे भी थकान उतर

चुकी थी और चूंकि कभी इतने खाली रहने की आदत नहीं थी, इसलिए नींद भी आंख-मिचौली करने लगी थी. लैपटॉप ही ले आती, प्रोजेक्ट का कुछ काम ही कर लेती… अब बस भी करो अमला, काम के बारे में नहीं सोचो… तुम यहां रिलैक्स करने आई हो, उसने ख़ुद को समझाया.

एक अकुलाहट-सी होने लगी… ऐसी बैचेनी उसने पहले कभी महसूस न की थी. न कंप्यूटर, न इंटरनेट, न अख़बार, उ़फ् कैसी तो अजीब-सी फीलिंग हो रही है. भागदौड़, चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट, डेडलाइन पर काम पूरा करने की हड़बड़ी, सब उसे अपनी ओर खींचने लगे. सौम्या के साथ काम को लेकर होनेवाली लड़ाई, बॉस के साथ बहस और ऑफिस गॉसिप वह मिस करने लगी. यहां तक कि काम को लेकर हर समय होनेवाली चिड़चिड़ाहट भी उसे याद आने लगी.                                                                                               अगले दिन वह सुबह-सुबह ही आसपास की जगह देखने चली गई. फिर वहां के एक निवासी ने बताया कि वह ‘हातू पीक’ देखने अवश्य जाए, जो नारकंडा में सबसे ऊंचाई पर स्थित एक जगह है और जहां ‘हातू माता’ का मंदिर है. टैक्सी लेकर वह वहां चल दी.

ठंड ने कोहरे की चादर बिछा रखी थी. मन खिल उठा अमला का वहां पहुंचकर. वहां से हिमालय की चोटियां नज़र आ रही थीं. थोड़ी दूर बने ‘भीम के चूल्हे’ को देख तो वह और ख़ुश हो गई. पांडव अज्ञातवास के दौरान वहां खाना बनाया करते थे. उसने तुरंत सौम्या को फोन किया, “जानती है तू क्या मिस कर रही है? यार, क्या प्राकृतिक नज़ारा है. क्या मौसम है यहां का. अभी भी आ जा तू यहां. दोनों एंजॉय करेंगे. इसके बाद मैं ‘महामाया मंदिर’ और ‘तनी जुब्बार लेक’ देखने जा रही हूं. ढेर सारी फोटो खींची हैं मैंने.”

“यार, वापस आ जा, यहीं एंजॉय कर लेंगे. कितने दिन हो गए पार्टी में गए.” सौम्या शायद आगे कुछ और कहना चाह रही थी, पर उसकी बात काटते हुए अमला ने अपनी बात पूरी कर दी, “रहने दे यार, अभी तो और घूमनेवाली हूं मैं यहां.” अमला बहुत ही एक्साइटेड थी. अगला दिन भी उसने आउटिंग में बिता दिया और अब देखने को कुछ नहीं बचा था, सिवाय नेचर वॉच के. धीरे-धीरे उस खालीपन और रिक्तता में उसे डिप्रेशन होने लगा. बिना कुछ काम के एक भारीपन उसे घेरने लगा, तमाम प्राकृतिक सुंदरता और स्वच्छ मौसम के बावजूद. आख़िर क्यों…? वह तो ख़ुद अपनी मर्ज़ी से आई थी.                                                                                                “यार सौम्या, तू मेरा तत्काल में टिकट बुक करा दे, मैं वापस आ रही हूं.” अमला की परेशानी महसूस करते हुए सौम्या ने पूछा, “सब ठीक तो है ना? क्या हुआ? तुझे कोई मदद चाहिए?”

यह भी पढ़ेक्या है आपकी ख़ुशी का पासवर्ड? (Art Of Living: How To Find Happiness?)

“आकर बताती हूं.” वापस पहुंचकर अमला सीधे ऑफिस गई और बाकी की छुट्टियां कैंसल करा लीं. कॉफी की चुस्कियां लेते हुए वह बोली, “पता है सौम्या, हम व्यस्त ज़िंदगी के इतने आदी हो जाते हैं कि सुकून के पल भी खलते हैं हमें. भागदौड़भरी ज़िंदगी से भागकर वहां गई थी कि कुछ दिन चैन से गुज़ारूंगी, पर दो-तीन दिन बाद ही लगने लगा कि करूं तो क्या करूं… कुछ भी तो नहीं यहां करने को, आख़िर बादलों को, पहाड़ों को, फूलों को और चारों ओर फैली हरियाली को कितना निहार सकते हैं. खाली बैठने की आदत या कहें यूं ही निरर्थक बैठे रहने की आदत कहां रही है अब.”

“तू कुछ ज़्यादा ही सेंटी नहीं हो रही है?” सौम्या ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा.

“थोड़ा सुकून तो सभी को चाहिए लाइफ में. अच्छा हुआ जो तू चली गई. थोड़ा बदलाव तो महसूस हुआ. अब और फुर्ती से काम करेगी. इस बार का प्रोजेक्ट है भी बहुत चैलेंजिंग.”

“तू ठीक कह रही है, पर सच तो यह है कि यह भागदौड़ उस सन्नाटे से अच्छी है, जो कई बार डरा देता है. पर जीवन की गति अनवरत चलती रहे, तो ही सब सहज व सुगमता से चल पाता है. विराम कुछ पल के लिए तो ठीक है, पर उसके बाद वह खालीपन और निरर्थकता का बोध कराने लगता है. बिज़ी लाइफ तो जीवन का ही एक हिस्सा है, जिससे एक चहल-पहल बनी रहती है. गति ही जीवन है डियर. व्यस्तता में ही ख़ुशी है.”

सौम्या के चेहरे पर एक मुस्कान छा गई थी. ऑफिस के चिर-परिचित माहौल में पहुंच अमला को लगा कि चाहे काम के दौरान वह कितनी ही टेंशन में क्यों न रहती हो, चाहे थकान कितनी ही क्यों न हो, लेकिन काम पूरा हो जाने के बाद जो संतुष्टि मिलती थी, उसके सामने तो बाकी सब बातें व्यर्थ ही लगती हैं.

suman bajapaye

     सुमन बाजपेयी

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कहानी- सुनहरा अध्याय (Short Story- Sunhara Adhyay)

“पागल मत बनो काव्या. वह अध्याय कब का समाप्त हो चुका है. मुझे और नलिन को अलग रहते कितने बरस बीत चुके हैं. मैं अपने एकांतवास से ख़ुश हूं.”

“नहीं मम्मी, आपने ख़ुद स्वीकारा है कि गृहस्थी एक लड़की की ज़िंदगी में कितना मायने रखती है. जिस तरह आपको यह एहसास हो रहा है कि आप मेरी ज़िंदगी में पापा की कमी पूरी नहीं कर सकीं, मुझे भी यह एहसास हो रहा है कि मैं आपकी ज़िंदगी की यह कमी पूरी नहीं कर सकी.”

Kahaniya

काव्या को लेकर प्रमिलाजी की चिंता अब वाकई बहुत ज़्यादा बढ़ गई थी. आख़िर यह लड़की अपनी ज़िंदगी की क़िताब में यह सुनहरा अध्याय क्यों नहीं जोड़ना चाहती? जवानी की दहलीज़ को छूती लड़कियों के मां-बाप की रातों की नींद उड़ जाती है, यह सोचकर कि कहीं हमारी लड़की कोई अनुचित क़दम न उठा ले? कहीं वह कोई विजातीय या ऐसा-वैसा लड़का न पसंद कर ले? लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा है. प्रमिलाजी चाहती हैं कि काव्या के जीवन में कोई आए, जिसे लेकर उसके दिल में लड्डू फूटने लगें और वह अपनी बेटी की हंसी-ख़ुशी डोली सजाकर उसे विदा कर अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हों. लेकिन जीवन के पच्चीसवें बसंत में भी फूलों से लदी डालियां, हिलोरें लेता सागर, मदमाती हवा, लड़कों की सीटियां आदि बातें काव्या के लिए कोई मायने नहीं रखती थीं. हद तो तब हो गई जब उसने प्रमिलाजी द्वारा लाए रिश्तों को देखने-सुनने से भी इंकार कर दिया. प्रमिलाजी का पारा उस दिन फट ही पड़ा.

“तुम आख़िर चाहती क्या हो? अरे, लड़कियां इस दिन के लिए लालायित रहती हैं. क्यूं तुम अपनी ज़िंदगी का यह सुनहरा अध्याय आरंभ नहीं करना चाहती?”

“मम्मी, क्या सचमुच शादी एक लड़की की ज़िंदगी का सुनहरा अध्याय होता है?”

“हां, बिल्कुल. विवाह करके, मां बनकर ही एक स्त्री का जीवन पूर्ण होता है. एक पुरुष का संग उसके जीवन में ख़ुशियों के सतरंगी इंद्रधनुष खिला देता है. ज़िंदगी बेहद ख़ूबसूरत और अर्थपूर्ण नज़र आने लगती है. एक बार इस अध्याय के पृष्ठ उलटकर तो देखो!”

“आपने भी तो कभी इस अध्याय के पृष्ठ उल्टे थे मम्मी… क्या हुआ?” काव्या का दबा-सा स्वर उभरा तो प्रमिलाजी मानो आसमान से गिर पड़ीं.

‘मेरी बेटी ने मेरी ही ज़िंदगी को आधार बनाकर शादी के बारे में कितने पूर्वाग्रह पाल रखे हैं और मैं नासमझ-सी उससे सवाल-जवाब कर रही हूं.’ सोचकर प्रमिलाजी का सिर चकराने लगा. पर फिर तुरंत ही उन्होंने अपने आपको संभाला.

“मेरी ज़िंदगी का क़िस्सा अलग था बेटी. तुम उसे अपनी ज़िंदगी से क्यों जोड़ रही हो? जो मेरे साथ हुआ, ज़रूरी नहीं कि तुम्हारे साथ भी वही हो. सारे पुरुष एक जैसे नहीं होते बेटी.” प्रमिलाजी ने बेटी को समझाने का प्रयास किया.

“तो फिर आपने हमेशा दूसरी शादी से इंकार क्यों किया? सारे पुरुष एक से तो नहीं होते?” काव्या भी आज पूरे तर्क-वितर्क पर उतर आई थी.

“काव्या!” प्रमिलाजी का स्वर न चाहते हुए भी थोड़ा तीखा और कटु हो गया था. “यहां बात तुम्हारी शादी की चल रही है. मेरी शादी, मेरे अतीत को इसमें मत घसीटो.”

यह भी पढ़ेबॉडी पर भी दिखते हैं ब्रेकअप के साइड इफेक्ट्स (How Your Body Reacts To A Breakup?)

“मम्मी, कैसी बातें कर रही हैं आप? भला मुझे, आपकी बेटी को आपकी ज़िंदगी से सरोकार नहीं होगा तो और किसे होगा? मां-बाप तो संतान के रोल मॉडल होते हैं. मैंने जब भी आपके वैवाहिक अतीत को टटोलना चाहा, आपने यह कहकर मेरा मुंह बंद कर दिया कि आम कामकाजी दंपतियों की भांति आपके अहम् टकराए और अलगाव हो गया. दोनों ने स्वेच्छा से अलग-अलग रहना मंज़ूर कर लिया. तलाक़ जैसी औपचारिक क़ानूनी प्रक्रिया में उलझना भी आपने आवश्यक नहीं समझा. कल को मेरी ज़िंदगी में भी यही मोड़ आए, इससे पूर्व ही मैं इस राह से किनारा कर लेना चाहती हूं.” एक दुखभरी सांस के साथ काव्या ने अपनी बात समाप्त की. उसे अफ़सोस था कि उसने गड़े मुर्दे उखाड़कर मम्मी के दिल को चोट पहुंचाई. लेकिन संतोष था कि आख़िर वह अपने दिल की समस्त उलझनें, समस्त शंकाएं मम्मी के सम्मुख रखने में क़ामयाब हो ही गई.

बरसों से मन में उमड़ते-घुमड़ते आशंका, संदेह, आक्रोश के बादल अंततः बरस ही गए और पीछे छोड़ गए एक नीर ख़ामोशी. प्रमिलाजी अपने कमरे में चली गईं. दो दिनों तक दोनों के बीच मौन पसरा रहा. सिवाय औपचारिक वार्तालाप के दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई. प्रमिलाजी गहरी सोच में थीं. इतना उन्हें स्पष्ट हो गया था कि काव्या जब तक विवाह संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं होगी, गृहस्थ जीवन में प्रवेश नहीं करेगी. उसका घर कभी नहीं बस पाएगा. अकेलेपन की जिस त्रासदी को वे भोग रही हैं, काव्या भी… नहीं-नहीं! सोचकर ही प्रमिलाजी का कलेजा मुंह को आने लगा. तीसरे दिन ही उन्होंने बेटी से संवाद का सूत्र जोड़ दिया.

“काव्या, मैं समझती थी कि मैंने तुम्हारी ज़िंदगी में मां-बाप दोनों की कमी पूरी कर दी. लेकिन यह मेरी ख़ुशफ़हमी थी. एक टूटा हुआ परिवार संतान के लिए कभी भी ख़ुशी का सबब नहीं बन सकता. तुम्हारा घर बस सके, इसके लिए मुझे अपनी कमज़ोरियां स्वीकार करने में भी कोई गुरेज़ नहीं है. हां, आज मैं स्वीकार करती हूं कि यदि उस व़क़्त मैंने समझौते की दिशा में एक क़दम भी बढ़ाया होता, तो नलिन दो क़दम बढ़ाने में कोई कोताही नहीं करते और मैं तुम्हें यह भी बता देना चाहती हूं कि यदि नलिन ने एक क़दम बढ़ाया होता तो मुझे चार क़दम बढ़ाकर उस बढ़ती दूरी को पाटने में तनिक भी संकोच नहीं होता. लेकिन अहम् का मुद्दा तो यही एक क़दम बनकर रह गया. मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि आज भी अधिकांश टूटते परिवारों की एकमात्र वजह यही पहले क़दम का ईगो है. तुम यदि इस ईगो को दरकिनार कर सकी, तो तुम्हारी गृहस्थी कभी नहीं टूट पाएगी. अब देखो, अपने ईगो को दरकिनार रखते हुए मैंने अपने अतीत की भूल स्वीकार कर ली है. अब तो तुम शादी के लिए तैयार हो ना?” प्रमिलाजी की आशा भरी नज़रें काव्या की ओर उठीं और देर तक वहीं टिकी रहीं, क्योंकि काव्या गहरी सोच में डूब गई थी. काफ़ी देर सोच-विचार के बाद काव्या के होंठ हिले.

“मम्मी, क्या यही स्वीकारोक्ति तुम पापा के सम्मुख भी दोहरा सकती हो?” काव्या का स्वर शांत और संयत था. फिर भी प्रमिलाजी चिल्ला उठीं.

“काव्या!”

“हां मम्मी, क्या तुम पापा के सामने अपनी ग़लती मान सकती हो?”

“मैंने कोई ग़लती नहीं की.” प्रमिलाजी की गर्दन एकदम तन गई थी और वाणी में कठोरता का पुट आ गया था. “मैं तुम्हें स़िर्फ टूटते परिवारों की मिसाल दे रही थी और यह बता रही थी कि यदि दोनों में से एक भी पक्ष अपने ईगो को कुछ देर के लिए नज़रअंदाज़ कर समझौते की दिशा में एक क़दम भी उठाए तो दूसरा पक्ष चार क़दम बढ़ाकर उसका स्वागत करेगा, क्योंकि अधिकांश मामलों में ही दोनों पक्ष अलग नहीं होना चाहते.”

“मैं भी यही कह रही हूं मम्मी. आप और पापा भी अलग होना नहीं चाहते थे. बस, किसी एक के झुकने का इंतज़ार कर रहे थे और शायद आज भी कर रहे हैं.”

“पागल मत बनो काव्या. वह अध्याय कब का समाप्त हो चुका है. मुझे और नलिन को अलग रहते कितने बरस बीत चुके हैं. मैं अपने एकांतवास से ख़ुश हूं.”

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“नहीं मम्मी, आपने ख़ुद स्वीकारा है कि गृहस्थी एक लड़की की ज़िंदगी में कितना मायने रखती है. जिस तरह आपको यह एहसास हो रहा है कि आप मेरी ज़िंदगी में पापा की कमी पूरी नहीं कर सकीं, मुझे भी यह एहसास हो रहा है कि मैं आपकी ज़िंदगी की यह कमी पूरी नहीं कर सकी.” काव्या भावुक होने लगी तो प्रमिलाजी ने मोर्चा संभाल लिया.

“हम मुद्दे से भटक रहे हैं काव्या. हम तुम्हारी शादी की बात कर रहे थे और मैंने तुम्हें विश्‍वास दिला दिया है कि यह ज़िंदगी का बेहद ख़ूबसूरत मोड़ है, जहां संयम और धैर्य बनाए रखने की ज़रूरत है. केवल समझौतावादी प्रवृत्ति से इस मोड़ के ख़ूबसूरत नज़ारों का आनंद लिया जा सकता है.”

“और समझौते का यह प्रयास कभी भी, कहीं भी किया जा सकता है, है ना मम्मी?”

“तुम ज़िद पर उतर आई हो काव्या… मुझे नलिन से मिले बरसों बीत गए हैं. मेरे पास उनका कोई अता-पता नहीं है.”

“पापा कोलकाता में हैं.” प्रमिलाजी को लगा उनके आसपास मानो सैकड़ों बम फट गए हैं.

“तुम्हें अपने पापा का पता मालूम है? मतलब… मतलब तुम उनसे मिलती रही हो? इतना बड़ा धोखा, इतना बड़ा झूठ! मैं तुम्हें अपनी ज़िंदगी, अपना सब कुछ मानकर संतोष करती रही. तुम्हारा घर बसाने के लिए अपने बरसों से पाले अहम् के टुकड़े-टुकड़े कर डाले और तुम…?”

“नहीं मम्मी! आप ग़लत समझ रही हैं. मैं कभी पापा से नहीं मिली. बस इधर-उधर पूछताछ और पत्र-व्यवहार, फ़ोन आदि के बाद बड़ी मुश्किल से उनका पता जुटा पाई हूं. सेवानिवृत्ति के बाद अब नितांत एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे हैं पापा. दरअसल, शादी को लेकर मैं इतने पूर्वाग्रहों से ग्रस्त थी कि एक बार उनसे मिलना चाहती थी. अब पता भी मिला है तो इतनी दूर का, जहां अकेले आपको बताए बगैर मैं नहीं जा सकती. मम्मी हम साथ कोलकाता चलेंगे. मैं देखना चाहती हूं कि कैसे एक क़दम बढ़ाने पर प्रत्युत्तर में चार क़दम का फ़ासला नापा जाता है? बोलो मम्मी, कब चलें?”

“तुम पागल हो गई हो काव्या. मुझे कहीं नहीं जाना.”

“ठीक है. मतलब आप नहीं चाहतीं मेरी ज़िंदगी में शादी जैसा कोई अध्याय जुड़े.”

“ये कैसी बातें कर रही हो?” मां-बेटी में काफ़ी देर तक बहस चलती रही. आख़िरकार हार मानते हुए प्रमिलाजी ने कहा, “ओह काव्या, मैं हार गई तुमसे. ठीक है, चलो जहां भी चलना है.”

ट्रेन का लंबा सफ़र प्रमिलाजी को और भी लंबा लग रहा था. कैसे करेगी वह इतने बरसों बाद नलिन का सामना?… कह देगी कि वह अपनी मर्ज़ी से नहीं आई है. उनकी बेटी खींचकर लाई है, वरना उन्हें कहां ज़रूरत है पति नामक प्राणी की? जहां इतने बरस अकेले गुज़ार लिए, बाकी के और गुज़र जाते. नहीं-नहीं, ‘गुज़ार लिए’ शब्द ठीक नहीं रहेगा. इससे बेचारगी झलकती है. वे अपने आपको कभी बेचारी सिद्ध नहीं होने देंगी… नलिन ने व्यंग्यभरी मुस्कान से ताका या कुछ ताना कसा तो? तो वे उल्टे क़दमों से लौट आएंगी और फिर कभी उस ओर रुख़ नहीं करेंगी. लेकिन इन सबसे काव्या को क्या संदेश जाएगा? यह संवेदनशील लड़की तो हमेशा के लिए शादी से मुंह मोड़ लेगी. ओह, यह मैं क्या कर बैठी? मैं यहां आने के लिए राज़ी ही क्यों हुई?

उधर काव्या के दिमाग़ में भी उथल-पुथल मची हुई थी. यदि आमने-सामने होने पर एक बार फिर दोनों के अहम् टकरा गए, तो उसकी अब तक की सारी जांच-पड़ताल, मीलों का यह कष्टदायी सफ़र, जो शारीरिक से भी ज़्यादा मानसिक रूप से कष्टदायी सिद्ध हो रहा था, सब व्यर्थ चला जाएगा. पर जो भी हो, मम्मी की ज़िंदगी का फैसला किए बिना वह अपनी नई ज़िंदगी की शुरुआत नहीं कर सकती.

गंतव्य तक पहुंचने के लिए मां-बेटी को ज़्यादा मश़क़्क़त नहीं करनी पड़ी. हां, मश़क़्क़त करनी पड़ी, तो बंद दरवाज़े की घंटी बजाने की हिम्मत जुटाने में. कुछ देर दिल थामकर इंतज़ार करने के बाद दरवाज़ा खुला. दरवाज़ा खोलनेवाले शख़्स को देखकर प्रमिलाजी का कलेजा मुंह को आने लगा. यह उनका नलिन है? उनकी कल्पना के यंग, स्मार्ट, हैंडसम नलिन की जगह यह कौन स़फेद बाल, कृशकाय शरीर और झुर्रियोंवाला चेहरा लिए बूढ़ा खड़ा था? मोटे लेंस की ऐनक के पीछे से झांककर पहचानने का प्रयास करता वह कृशकाय थरथराता शरीर जैसे ही ढहने लगा, काव्या ने आगे बढ़कर उसे थाम लिया, “पापा!”

नज़रभर काव्या को देखने और फिर प्रमिला को देख नलिन हर्षातिरेक से बोले, “काव्या? मेरी बच्ची?… यह हमारी बेटी ही है न प्रमिला? ओह… मैं… मैं… सपना तो नहीं देख रहा? मुझे विश्‍वास दिलाओ… कोई मुझे नींद से जगाओ.” नलिन मानो ख़ुशी से बौरा उठे थे. प्रमिलाजी और काव्या ने सहारा देकर उन्हें सोफे पर बैठाया. सबकी डबडबाई आंखें बरसने लगीं. पंद्रह बरसों के वियोग की पीड़ा बहते निःशब्द आंसुओं में कब घुलकर बह गई, किसी को पता ही नहीं लगा. प्रमिलाजी के दिमाग़ में कब से चल रहे संवाद, प्रतिसंवाद, व्यंग्य-प्रतिव्यंग्य, कटुक्तियां जाने कहां तिरोहित हो गई थीं. इस अशक्त, निरीह, व़क़्त के थपेड़ों से घायल इंसान पर वह अब और क्या प्रहार करे? दया, सहानुभूति और अंततः निर्मल प्रेम का सागर उनके हृदय में हिलोरें लेने लगा था. नलिन भी शायद ऐसी ही मनःस्थिति से गुज़र रहे थे. नज़रें चुराती आंखों ने मानो वाक्क्षमता भी चुरा ली थी.

“मैं रसोई देखती हूं और कुछ चाय-पानी का प्रबंध करती हूं.” कहते हुए काव्या खिसक ली. उसका सोचना सही था. एकांत ने दिलों की दूरियां और मीलों के फ़ासले पल में मिटा दिए. जान-बूझकर काफ़ी देर लगाकर जब वह चाय की ट्रे लेकर कमरे में दाख़िल हुई तो नलिन उसे अपलक ताकते रह गए.

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“कितनी बड़ी, समझदार और सुंदर हो गई है हमारी छोटी-सी गुड़िया!” पापा के उद्गार सुन काव्या सकुचा उठी.

“बस, यह अंतिम ज़िम्मेदारी रह गई है मेरी. इसे अच्छा घर-वर देखकर विदा कर दूं…”

“अब यह हमारी ज़िम्मेदारी है.” नलिन ने ‘हमारी’ शब्द पर ज़ोर देते हुए काव्या को अपने पास बैठा लिया और स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरने लगे.

काव्या सोच रही थी, रिश्तों में सद्भाव और मिठास हो, तो ज़िंदगी का हर अध्याय ही सुनहरा है. गृहस्थी बसाने से पूर्व ही वह शनैः शनैः सफल गृहस्थ जीवन के समस्त गुर आत्मसात् करती जा रही थी.

Sangeeta Mathur

     संगीता माथुर

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