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कहानी- एक कप चाय (Short Story- Ek Cup Chai)

Short Story in Hindi

ख़ुशी से सुधीरजी की आंखें नम हो आई थीं. काश! उन्होंने चाय का निमंत्रण पहले स्वीकार कर लिया होता. सही कहा गया है कि बांटने से सुख बढ़ता है और दुख घटता है. इसलिए जब कोई आपको एक कप चाय के लिए आमंत्रित करता है, तो इसका तात्पर्य है कि वह आपके साथ ज़िंदगी के वो पल बांटना चाहता है, जो अभी तक अनकहे, अनसुने हैं. वह कुछ आपकी सुनना, तो कुछ अपनी सुनाना चाहता है.

हमेशा की तरह पत्नी के संग शहर की सबसे पॉश कॉलोनी में वॉक करते सुधीरजी स्वयं को किसी शहंशाह से कम नहीं समझ रहे थे. सवेरे और शाम की नियमित सैर उनका बरसों से चला आ रहा नियम था. तबीयत ठीक हो या न हो, इच्छा हो या न हो, शाम की सैर में तो साधनाजी को भी उनका साथ देना ही पड़ता था.

“समय रहते इस कॉलोनी में फ्लैट बुक करवाकर हमने कितनी समझदारी का काम किया न! देखो अब एक भी मकान खाली नहीं बचा है यहां. और सारे के सारे कितने प्रतिष्ठित लोग रहते हैं! मुझे तो लगता है कि शहर के सारे बड़े अफसर, बिज़नेसमैन यहीं आकर बस गए हैं. जिस इलाके में लोग किराए पर रहना अफोर्ड नहीं कर सकते, हमने अपना फ्लैट लिया है.”

“तो आप किसी से कम हैं क्या? रिटायर्ड चीफ इंजीनियर हैं.” साधनाजी ने पति की प्रशंसा की, तो सुधीरजी और भी फूलकर कुप्पा हो गए. सामने से आते किसी शख़्स ने उन्हें झुककर नमस्कार किया, तो सुधीरजी ठिठके. चेहरा काफ़ी परिचित-सा था.

“नमस्ते सर, नमस्ते मैडम! मैं प्रकाश! आप ही के ऑफिस में सुपरवाइज़र था.”

“ओह हां, अब पहचान लिया. कैसे हो? इधर केैसे आना हुआ?”

“जी मैं यहींं रहता हूं. इधर सी विंग में. मकान नंबर 212. रिटायर होने के बाद पिछले महीने यहां शिफ्ट हो गया था.”

“ओह, अच्छा! कौन हैं आपके मकान मालिक?”

“जी, अपना ही है.” प्रकाशजी ने नम्रता से कहा.

सुधीरजी के अहम् को हल्की ठेस लगी.

“टू बीएचके होगा?”

“नहीं सर, थ्री बीएचके है. अब इतना तो बड़ा चाहिए ही. कल को बेटे की भी शादी होगी. उसके बच्चे होंगे. गांव से मां को भी लाने की सोच रहा हूं. चलिए न सर, यहीं दूसरे माले पर ही है. एक कप चाय हो जाए. मिसेज़ को भी मैडम से मिलकर अच्छा लगेगा.”

“फिर कभी आएंगे. अभी तो आपकी मैडम को कुछ शॉपिंग करनी है.”

“ठीक है सर! समय निकालकर आइएगा ज़रूर चाय पीने.” प्रकाशजी विनम्रता से फिर झुक गए थे.

उनका अधीनस्थ उन्हीं के जितने बड़े मकान में इतनी पॉश कॉलोनी में रहता है. यह बात उन्हें हज़म नहीं हो रही थी.

“आपके दोस्त के यहां चल लेते न चाय पीने. कितने आग्रह से बुला रहे थे.” साधनाजी ने सरल हृदय से मन की बात रख दी. वैसे भी यहां आए इतना व़क्त हो गया. अभी तक किसी से ज़्यादा जान-पहचान नहीं हुई है.”

“वो दोस्त नहीं है मेरा. सुना नहीं क्या कहा उसने? मेरे ऑफिस में मेरा अधीनस्थ था वह! मुझे तो ताज्जुब हो रहा है कि इतनी महंगी कॉलोनी में उसने इतना महंगा फ्लैट ख़रीदा कैसे?” सुधीरजी मन ही मन उधेड़बुन में लगे हुए थे. 

“इतनी सैलरी तो नहीं थी इसकी. था भी ईमानदार! तो ऊपर की कमाई भी क्या रही होगी? लोन भी आख़िर कितना लिया होगा? किश्तें चुकाना कोई आसान काम थोड़े ही है?”

इस घटना के लगभग 10-12 दिन बाद सुधीरजी फिर प्रकाशजी से टकरा गए थे. बैंक से घर लौटने के लिए उन्होंने शेयरिंग कैब बुक करवाई थी. आधे रास्ते में जब प्रकाशजी उसमें सवार होने लगे, तो वे चौंके. दोनों का गंतव्य एक होने से साथ तो बैठे रहना ही था और साथ बैठे थे, तो वार्तालाप भी होनी ही थी.

“उस दिन ज़्यादा कुछ बात हो नहीं पाई.आपको तो एक-दो साल हो गए होंगे इधर शिफ्ट हुए?”

“हां, रिटायरमेंट के बाद से ही यहां हूं. बेटी का कॉलेज भी यहां से पास है.”

“अच्छा क्या कर रही है बिटिया?”

“इंजीनियरिंग फाइनल ईयर में है.”

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“बहुत बढ़िया. मेरे बेटे ने भी इंजीनियरिंग की है. मुंबई में एक एमएनसी में नौकरी कर रहा है. उसी ने ज़िद करके यह फ्लैट दिलाया है. कहता है, घर कोई बार-बार थोड़े ही न ख़रीदा जाता है. मैं भरूंगा लोन की किश्तें! सर, मुझे लगता है मैंने और निर्मला ने पिछले जन्म में ज़रूर कोई पुण्य कर्म किए होंगे, जो ऐसा लायक बेटा मिला. अब तो बस कोई उसके योग्य लड़की मिल जाए, तो बहू बनाकर घर ले आएं.”

“एक बार बेटे से पूछ तो लो, शायद कोई पसंद कर रखी हो. हो सकता है उसके साथ लिव इन में भी रह रहा हो. मुंबई में तो यह सब आम है. तुम गए हो उसके पास कभी मुंबई?”

“नहीं सर, वही आ जाता है सप्ताह, दस दिन में संभालने. पुणे से मुंबई दूर ही कितना है? जब भी आता है, कुछ न कुछ सुख-सुविधा के सामान से घर भर जाता है. हम कहते हैं, हमें यह सब नहीं चाहिए. तू तो बस बहू ले आ. तो कहता है यह मेरा काम नहीं है. यह तो आपकी ज़िम्मेदारी है.” ख़ुशी और भावनाओं से आह्लादित प्रकाशजी और भी बहुत कुछ बताना चाह रहे थे, पर उनका गंतव्य आ गया था. कैब ड्राइवर उतरने का इशारा कर रहा था.

“घर चलिए न सर, चाय पीकर चले जाइएगा. पास ही तो है. कहेंगे, तो मैं छोड़ दूंगा.” प्रकाशजी ने प्रेम से आग्रह किया.

“अरे नहीं, उसकी ज़रूरत नहीं है. फिर कभी फुर्सत से आऊंगा. अभी तो घर पर साधना भी इंतज़ार कर रही होगी.”

“भाभीजी को लेकर आइए सर कभी चाय पर. हमें बहुत प्रसन्नता होगी. मैं तो कहता हूं आज शाम को ही आ जाइए.”

“नहीं नहीं, मैं बता दूंगा. चलो भैया.” सुधीरजी ने ड्राइवर को चलने को कहा, तो प्रकाशजी ने हाथ जोड़ दिए. घर पहुंचकर पत्नी को यह बताते हुए कि प्रकाशजी ने मकान अपने बेटे के बलबूते पर ख़रीदा है. सुधीरजी काफ़ी तसल्ली महसूस कर रहे थे.

“अरे मैं आपको बताना ही भूल गई थी. अपनी वाणी की एक सहेली उनके बिल्कुल बगलवाले फ्लैट में ही रहती है. वहीं

आते-जाते उसकी दो-तीन बार प्रकाशजी और उनकी पत्नी से मुलाक़ात हुई है. कह रही थी अंकल-आंटी उस पर बेटी-सा प्यार रखते हैं. न हो तो आप ही उन्हें सपत्नी चाय पर बुला लीजिए. हर बार वे ही आपको निमंत्रण देते हैं.”

“तो मैं कौन-सा चला गया? ख़ैर देखते हैं.”

साधनाजी खाना लगाने में व्यस्त हो गईं, तो सुधीरजी एक बार फिर प्रकाशजी के बारे में सोचने लगे. ‘आदमी भला लगता है. ऑफिस में तो बस काम से काम रखते थे. कभी किसी के घर-परिवार के बारे में जानने का तो मौक़ा ही नहीं मिला. आज भी बेटे के बारे में बताते-बताते कैसे भावनाओं में बह गया था. काफ़ी कुछ कहना चाह रहा था कि घर आ गया. चलो अगली बार उसका चाय का निमंत्रण स्वीकार कर लूंगा.’ सुधीरजी शांत मन से खाना खाने बैठ गए थे.

इसके बाद कुछ ऐसा व्यस्त घटनाक्रम चला कि सुधीरजी के पास प्रकाशजी तो क्या किसी से मिलने-बतियाने का समय शेष न रहा. यहां तक कि उनकी सुबह-शाम की सैर भी छूट गई. पत्नी की थकावट और बेचैनी जिसे वे उम्र का तकाज़ा समझ रहे थे जांच के एक लंबे सिलसिले के बाद कैंसर निकली. बीमारी अभी आरंभिक अवस्था में ही थी और उपचार से ठीक हो जाने की उम्मीद थी. किंतु साधनाजी ने तो जीने की आस ही छोड़ दी थी. हर व़क्त नकारात्मक और निराशावादी विचार उन्हें घेरे रहते. बाप-बेटी ने उन्हें बहुत मुश्किल से सर्जरी और फिर कीमो थेरेपी के लिए तैयार किया था. इलाज के लंबे बोझिल पलों के बीच एक ही सकारात्मक और ख़ुशी की ख़बर आई थी कि वाणी का कैंपस प्लेसमेंट में चयन हो गया था. मुंबई की एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कंपनी में उसे अच्छे पैकेज पर नौकरी मिल गई थी. हालांकि वाणी का अभी नौकरी करने का कोई इरादा नहीं था. वह तो आगे एमबीए करना चाहती थी, पर इधर मम्मी के इलाज के दौरान हो रहे अतिशय ख़र्च ने उसे अपना निर्णय बदलने पर मजबूर कर दिया. वह नौकरी जॉइन कर पापा का सहारा बनना चाहती थी.

“पर बेटी, तेरी आगे की पढ़ाई का सपना?” सुधीरजी का स्वर भर्रा गया था. हमेशा पत्नी और बेटी का संबल बने रहने वाले सुधीरजी ख़ुद को बेहद असहाय महसूस कर रहे थे.

“मैं नौकरी के साथ-साथ तैयारी भी करती रहूंगी.” वाणी अपने निश्‍चय पर दृढ़ थी.

“पढ़ाई, नौकरी सब छोड़िए. मेरे जीते जी आप इसकी शादी कर दीजिए.” साधनाजी बीच में ही बोल पड़ी थीं. वातावरण बहुत भारी हो गया था. अंततः यह तय किया गया कि वाणी फ़िलहाल नौकरी जॉइन करने चली जाएगी. वह परीक्षा की तैयारी भी करती रहेगी, पर इस दरमियान कोई सुयोग्य वर मिल गया, तो उसके हाथ पीले कर दिए जाएंगे. सुधीरजी के कंधों पर यकायक ही ज़िम्मेदारियों का बोझ बढ़ गया था.

साधनाजी शनै: शनै: ठीक हो रही थीं. तबीयत पूछने आनेवालों और नाते-रिश्तेदारों से वे बेटी के लिए सुयोग्य वर बताने का आग्रह करतीं. सुधीरजी ने भी अपने स्तर पर वैवाहिक विज्ञापन आदि देखने आरंभ कर दिए थे. वाणी को अगले सप्ताह मुंबई जॉइन करने जाना था. तय हुआ कि उसकी अनुपस्थिति में आभा मौसी कुछ दिन मां के पास रहने आ जाएंगी.

सब कुछ ठीक हो रहा था, पर इस कुछ महीनों के घटनाक्रम ने सुधीरजी को हिलाकर रख दिया था. ज़िंदगी कभी इस तरह करवट ले बैठेगी, उन्हें सपने में भी गुमान नहीं था. साधनाजी के स्वास्थ्य में धीरे-धीरे सुधार हो रहा था, पर शारीरिक कमज़ोरी इतनी ज़्यादा थी कि डॉक्टर ने उन्हें किसी भी तरह के तनाव और श्रम से दूर रहने की सख़्त हिदायत दे दी थी.

वाणी तय कार्यक्रमानुसार मुंबई चली गई, तो आभा बहन के पास रहने आ गई. बहन के साथ-साथ घर की व्यवस्था भी बाई के सहयोग से उन्होंने संभाल ली. अब तो अस्पताल भी कभी-कभी ही चेकअप के लिए जाना होता था. बाज़ार से ज़रूरी सामान भी फोन करने पर आ जाता था. बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य और व्यवस्थित चल रहा था, पर ऊपर से सामान्य दिखनेवाले सुधीरजी अंदर से इतना टूट चुके थे कि एक कंधे का सहारा भी यदि मिल जाता, तो उसके सहारे भरभराकर ढह जाते.

पहले सब कुछ पत्नी को कहकर हल्के हो जानेवाले सुधीरजी अंदर ही अंदर भरते जा रहे थे. ज़िंदगी के इस मोड़ पर अकेले रह जाने का ख़तरा हर व़क्त सिर पर मंडराता प्रतीत होता. कहां तो वे सोचते थे कि उनके ऊंचे ओहदे और बेटी की उच्च शिक्षा के कारण लड़कों की लाइन लग जाएगी और कहां वे उसके लिए एक अदद सुयोग्य वर नहीं जुटा पा रहे थे. उस पर हर व़क्त बीमार पत्नी के सामने ख़ुश, मज़बूत बने रहने का नाटक.

“सब ठीक हो जाएगा. तुम बस चिंता करना छोड़ दो. डॉक्टर ने कहा है अगले सप्ताह से तुम्हारी फिज़ियोथेरेपी आरंभ कर देंगे. उससे तुम बहुत जल्द पहले की तरह घूमने-फिरने लगोगी. बस, तुम अच्छे से खाया-पीया करो और ख़ुश रहा करो.”

“हां दीदी, जीजाजी ठीक कहते हैं. देखो, इतने दिनों में कैसी सूरत हो गई है, वरना कितनी अच्छी लगती थीं! लोग वाणी की बड़ी बहन कहते थे.” आभा उठकर पुराने एलबम उठा लाई. दोनों बहनें एलबम देखने में खो गईं. सुधीरजी को अकेले गुमसुम बैठे देखा, तो साधनाजी बोल उठीं, आप नीचे वॉक कर आइए न! मेरे पास आभा है. कितना व़क्त हो गया आपको सैर पर गए हुए?”

“हं हां! आदत ही छूट गई. ठीक है, मैं घूमकर आता हूं. लौटते में तुम्हारी दवा भी लेता आऊंगा.” सुधीरजी जूते पहनकर सैर पर निकल पड़े थे. सी विंग के सामने से गुज़रे, तो अचानक प्रकाशजी का ख़्याल आ गया. मन में उनसे बतियाने, उनके सम्मुख अपना सुख-दुख उड़ेलने की हूक-सी उठी, पर अपने विगत के व्यवहार का ख़्याल आया, तो क़दम स्वतः ही आगे बढ़ गए. तभी पीछे से ‘भाईसाहब’ की पुकार सुन उनके बढ़ते क़दम ठिठक गए. एक महिला हाथ में थैला उठाए उन्हीं की ओर आ रही थी. पीछे-पीछे घिसटते से प्रकाशजी भी थे. वे काफ़ी कमज़ोर और थके-थके से लग रहे थे.

“अरे क्या हो गया आपको? तबीयत तो ठीक है न?”

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“कहां भाईसाहब! मांजी के जाने के बाद ये तो संभल ही नहीं पा रहे हैं. मैं तो समझा समझाकर थक गई. मांजी से बहुत जुड़ाव था इनका!”

“ओह, कब हुआ यह सब?”

“पूरे 20 दिन होने को आए हैं. न तो वापस काम पर जाना आरंभ किया है, न और कहीं. आज बड़ी मुश्किल से साथ ले जाकर घर का ज़रूरी सामान लेकर आई हूं. आप ही समझाइए इन्हें ऐसे कैसे चलेगा? जाना तो एक दिन सभी को है.” निर्मलाजी ने बिना रुके एक ही बार में मन की व्यथा बयां कर दी थी.

“मुझे तो कुछ पता ही नहीं चला. दरअसल मैं स्वयं भी कुछ व्यक्तिगत परेशानियों में उलझा हुआ था…”

“अरे, ये सब सुनाने के लिए थोड़े ही न रुकवाया था इन्हें. तुम भी न! आइए सर, घर चलिए. चाय पीते हुए इत्मीनान से बातें करेंगे.”

“हां हां!” प्रकाशजी तुरंत साथ हो लिए थे. मानो निमंत्रण के इंतज़ार में ही बैठे थे.

“आप कुछ परेशानियों की बात कर रहे थे. क्या हो गया? दरअसल गांव से मां को लाने के बाद उनके इलाज में इतना उलझा रहा कि आसपास से बेख़बर ही हो गया और फिर भी उन्हें बचा न सका.” चाय की गरम प्याली के साथ वार्तालाप का लंबा सिलसिला चल निकला. दोनों के पास एक-दूसरे को बताने के लिए बहुत कुछ था. सुधीरजी ने बेटी की मुंबई में नौकरी, उसके लिए उपयुक्त वर की खोज, पत्नी की बीमारी आदि के बारे में खुलकर बताया. तभी गरम पकौड़ों की प्लेट लिए शिल्पी भीतर प्रविष्ट हुई.

“मेरी भतीजी शिल्पी! पास ही नारायणा अस्पताल में फिज़ियोथेरेपिस्ट है.”

“अच्छा! डॉक्टर ने साधना को भी फिज़ियोथेरेपी के लिए बोला है. मैं आपको रिपोर्ट्स दिखाऊंगा. आप प्लीज़ उन्हें घर आकर करवा दीजिए.”

शिल्पी के हां करते ही सुधीरजी ने राहत की सांस ली.

“एक मसला तो हल हुआ. प्रकाश, तुमने कोई नौकरी जॉइन की है?”

“पास ही एक प्राइवेट फमर्र् है. अच्छा व़क्त निकल जाता है. चार पैसे मिलते हैं सो अलग. आप करना चाहेंगे सर?”

“सर कहकर शर्मिंदा न करो. अब हम दो सेवानिवृत दोस्त हैं. वैसे बात करना वहां, मेरे लायक कुछ काम हो तो!”

“जी! एक और बात भी कब से कहना चाह रहा था. छोटा मुंह बड़ी बात होगी. पर आज अवसर मिला है, तो कहे देता हूं. हम दोनों को ही आपकी बेटी वाणी अपने बेटे के लिए बहुत पसंद है.”

ख़ुशी से सुधीरजी की आंखें नम हो आई थीं. काश! उन्होंने चाय का निमंत्रण पहले स्वीकार लिया होता. सही कहा गया है कि बांटने से सुख बढ़ता है और दुख घटता है. इसीलिए जब कोई आपको एक कप चाय के लिए आमंत्रित करता है, तो इसका तात्पर्य है कि वह आपके साथ ज़िंदगी के वे पल बांटना चाहता है, जो अभी तक अनकहे, अनसुने हैं. वह कुछ आपकी सुनना, तो कुछ अपनी सुनाना चाहता है.

लौटते में उनका मन फूल-सा हल्का था. एक कप चाय के साथ वे चीनी-सी मीठी यादें और चायपत्ती-सी कड़वी दुखभरी बातें, जो शेयर कर आए थे.

 

Anil Mathur

     अनिल माथुर

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कहानी- खूंटे से बंधी (Short Story- Khute Se Bandhi)

Hindi Short Stories

कितना अजब है न हमारे समाज में विवाह संबंध तय करने का तरीक़ा! लड़की को एक बार लड़के से मिलवाकर हुकुम हो जाता है कि तुम्हें अब उम्रभर इसी व्यक्ति से प्यार करना है. वह क्रूर हो, तुम्हारी परवाह न करे, तो भी उसकी लंबी उम्र की दुआ मांगनी है. उसके लिए व्रत-उपवास रखने हैं.

एक ही जीवन में कितने रंग बदल लेती है यह ज़िंदगी! कभी अरुणोदय का नव उल्लास लिए सामने आ खड़ी होती है, तो कभी थकी-हारी अस्पताल की ओर क़दम बढ़ाती संध्या-सी. सांझ गहराकर काली रात बन जाए चाहे, परंतु एक विश्‍वास अडिग रहता है कि अंधियारा छंट ही जाएगा, अरुणोदय फिर होगा. पर मेरे जीवन में तो नव अरुणोदय की कोई गुंजाइश ही नहीं बची है. दंड भोग रही हूं बिना अपराध किए. नहीं! अपराध तो किया था मैंने, अपनी ख़ुशियों के ख़्वाब देखकर. स़िर्फ देखे ही नहीं थे ये ख़्वाब, उन्हें पूरा करने की उम्मीद भी की थी.

मैंने भी आपको किस बेकार के दर्शन में उलझा दिया. चलो शुरू से ही बताती हूं. पिता सरकारी नौकरी में थे, तो उनका अक्सर तबादला होता रहता था. स्कूल तक तो चल गया, पर कॉलेज के लिए उन्होंने मुझे चंडीगढ़ के एक होस्टल में डाल दिया. होस्टल के तीन वर्ष मेरी रूम पार्टनर रही गौरी से मेरी ख़ूब पटती थी और बीए करने के बाद हमने एक संग बीएड करने का फैसला लिया. यहां होस्टल तो था नहीं, सो एक कमरा किराए पर ले लिया. मां ने कहा, “हर रोज़ बाहर खाने से अच्छा है दोनों मिल-जुलकर बना लिया करो. इसी बहाने सीख भी जाओगी.” गौरी की मम्मी ने भी इसी बात का अनुमोदन किया. गौरी को रसोई का बिल्कुल शौक़ नहीं था, सो वह काट-पीटकर देती और मैं बना देती. शुरू में तो कुछ दिक़्क़तें आईं. कभी दाल में नमक ज़्यादा हो जाता, तो कभी चावल कच्चे रह जाते, लेकिन मज़ा आ रहा था. मैं व्यंजन सीखने की किताबें भी ख़रीद लाई. नए-नए प्रयोग करने लगी.

गौरी के बड़े भाई कपिल चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में व्याख्याता बनकर आ गए और छुट्टी के दिन बहन से मिलने आते, तो हम उन्हें भोजन के लिए रोक लेते. घर का बना भोजन उन्हें भी अच्छा लगता था और मेरी पाक कला की तारीफ़ हो जाती. पहले तो मैं सकुचा जाती थी, प1314र धीरे-धीरे मेरी झिझक दूर होने लगी. हमारी बातें अक्सर किताबों को लेकर ही होतीं. उन्हें पढ़ने-पढ़ाने, दोनों का ही बहुत चाव था. हम दोनों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते. हमें कोर्स के इतर भी पढ़ने की प्रेरणा देते. नई किताबें लाकर देते. उन दिनों लड़कियों पर बहुत प्रतिबंध थे और वह हमारे अनेक काम कर आते. कोई अच्छी मूवी लगने पर वह भी दिखा लाते. उनके साथ हम स्वयं को बहुत सुरक्षित महसूस करतीं.

मेरे साथ उनकी मैत्री बढ़ रही थी, मज़बूत हो रही थी. हमारा अलग-अलग प्रांतों से होना इसमें आड़े नहीं आ रहा था. कपिल में उद्वेग और उन्माद नहीं, सच्चाई और निश्‍चय था. गौरी गवाह थी हमारी मैत्री की, सहमत और ख़ुश भी. मैं आश्‍वस्त थी अपने भविष्य के प्रति. मुझे विश्‍वास था मां-पापा को मैं मना लूंगी.

परीक्षा देकर घर लौटी, तो कपिल के संग मेरी मैत्री की ख़बर मुझसे पहले वहां पहुंच चुकी थी. पापा बहुत क्रोध में थे. पापा की तबादलेवाली नौकरी के कारण दादाजी सदैव चाचाजी के घर एक ही स्थान पर रहना पसंद करते आए थे, पर इन दिनों वह भी हमारे घर आए हुए थे. इन लोगों ने मेरे लिए चार-पांच लड़के पहले से ही छांट रखे थे. हफ़्ता-दस दिन में मिलना-मिलाना कर जिस लड़के ने ‘हां’ की, उसी से रिश्ता तय कर दिया गया और दो महीने बाद की विवाह की तारीख़ भी पक्की कर दी गई. उसके लंबे समय बाद तक कोई शुभ मुहूर्त नहीं था.

मैंने मां को कपिल की पूरी बात बता दी थी. यह भी कहा कि एक बार पापा उससे मिल लें. उन्हें मंज़ूर नहीं होगा, तो मैं हठ नहीं करूंगी. मां तो राज़ी हो गईं, पर दादाजी की उपस्थिति के कारण उनकी एक न चली. हम जैन और वह अग्रवाल. यहीं कपिल का सबसे बड़ा अपराध हो गया. विभिन्न धर्म का होना ही एकमात्र अड़चन नहीं होती विवाह संबंध स्थापित करने के लिए. और भी बहुत सारे व्यवधान खड़े किए जा सकते हैं और दादाजी की दबी चेतावनी के अनुसार तो ‘मेरा स्वयं अपने लिए वर ढूंढ़ लेना मेरे दुश्‍चरित्र होने का प्रमाण था’ और यथाशीघ्र मुझे विवाह बंधन में बांधना उसका एकमात्र उपाय. दादाजी के आगे मां का वजूद न के बराबर रह जाता. मेरे कारण उन्हें बहुत कुछ सुनना पड़ा था. सारा कुसूर ही दरअसल उनके सिर पर मढ़ दिया गया… लड़की को वश में न रखने का.

अब मुझे क्या फ़र्क़ पड़ना था कि मेरा रिश्ता किससे तय हुआ है. पापा ने अपने हिसाब से तो सब जांच-पड़ताल कर ही ली होगी. फ़र्क़ बस यह है कि ऐसी जांच-पड़ताल में दूल्हे की शिक्षा, खानदान, रंग-रूप ही देखे जाते हैं. पूरी उम्र साथ रहने के लिए एक-दूसरे के विचार, पसंद-नापसंद जैसी बातों को अहमियत नहीं दी जाती. सो विवाह हो गया. मेरी मोहब्बत निःशब्द छटपटाती रह गई.

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चंडीगढ़ के अपने अध्याय को मैंने अपनी यादों से पूरी तरह से मिटा दिया.  मुश्किल यह है कि जीवन किसी कंप्यूटर पर लिखी इबारत नहीं कि डिलीट पर हाथ रखते ही सब साफ़ हो जाए. बहुत गहरे पैठे होते हैं हमारे जज़्बात. पक्की स्याही से लिखे हुए. उसे मिटाने की कोशिश में जो निशान छूट जाता है, कुछ उसी तरह अधूरी रह गई कामनाएं भी गहरे घाव छोड़ जाती हैं मन पर, जिन्हें समय भी भरने में विफल रह जाता है. उम्र भर टीसते हैं, दर्द करते हैं ये घाव.

कितना अजब है न हमारे समाज में विवाह संबंध तय करने का तरीक़ा! लड़की को एक बार लड़के से मिलवाकर हुकुम हो जाता है कि तुम्हें अब उम्रभर इसी व्यक्ति से प्यार करना है. वह क्रूर हो, तुम्हारी परवाह न करे, तो भी उसकी लंबी उम्र की दुआ मांगनी है. उसके लिए व्रत-उपवास रखने हैं. मुस्कुराकर अपने सब कर्त्तव्य निभाने हैं. रमण नहीं चाहते थे कि मैं नौकरी करूं, तो मैंने नौकरी का विचार छोड़ दिया, पर उनकी हर ख़ुशी का ख़्याल रखने पर भी तो रमण को मेरे

दुख-दर्द से कोई सरोकार नहीं था. पहला गर्भ मिसकैरेज हो गया. स्थिति गंभीर थी, मुझे अस्पताल छोड़कर रमण काम पर चले गए… “डॉक्टर तुम्हारा इलाज करेंगे, मुझे बैठकर क्या करना है.”

अगले वर्ष जब बिटिया हुई, तो पांच दिन मैं रही अस्पताल में. साफ़ कह दिया, “मैं रोज़-रोज़ नहीं आऊंगा. यहीं किसी आया का इंतज़ाम कर लेना.” सास नहीं थी, पर मां तो आने को तैयार थीं, उन्हें भी मना कर दिया. बिटिया एक माह की हुई, तो मित्रों संग घूमने जाने का कार्यक्रम बना डाला. बहाना था, “रात को ठीक से सोने नहीं देती तुम्हारी बेटी.”

ईश्‍वर ने स्त्री को दिल और दिमाग़ क्यों दे दिए? न दर्द महसूस होता, न दुख होता उसे.

मेरे सुख-दुख से बेख़बर समय चक्र चलता रहा. बिटिया पांच वर्ष की होने को आई कि एक सांझ चार बजे के लगभग टेलीफ़ोन बजा. कपिल की आवाज़, “तुम्हारे शहर आया हुआ हूं. तुमसे मिलना चाहता हूं एक बार.” वर्षों से मृतप्राय पड़ा दिल धड़कने लगा, अचानक… ज़ोर-ज़ोर से.

सवाल यह नहीं था कि मेरे मना करने से वह मानेगा कि नहीं? सवाल यह था कि मैं स्वयं को कपिल से मिलने से रोक सकती थी क्या? सो मैंने उसे अगले दिन सुबह ग्यारह बजे आने को कह दिया.

कितना बदल चुके थे कपिल! बाहर कहीं देखती, तो पहचान भी न पाती शायद. उत्साहविहीन, थके-हारे-से. छह वर्ष में दस वर्ष बुढ़ा गए से.

धीरे से पूछा, “कैसी हो?” मुझे नहीं लगता उन्होंने उत्तर पाने के लिए प्रश्‍न किया था. कुछ पल ख़ामोश रहे, इधर-उधर नज़र घुमाई. धीमे से कहा, “तुमने ठीक ही निर्णय लिया अनुभा. कॉलेज का एक प्रोफेसर तुम्हारे लिए ये सारे ऐशो-आराम कहां से जुटा पाता. दुख बस यही है कि तुमने मुझे समय काटने का माध्यम बनाया, जिसे मैं तुम्हारा प्यार समझ बैठा और वास्तव में प्यार करने लगा तुम्हें.”

कपिल के प्यार की सच्चाई पर न मुझे तब संदेह था, न आज ही है, पर उन्होंने मेरे प्यार को खिलवाड़ कैसे मान लिया? क्यों नहीं समझ पाए मेरी मजबूरी को? बिना मेरा पक्ष जाने मुझे दोषी करार दिया. नहीं जानते थे क्या कपिल कि लड़कियों के विवाह में घर के बड़ों का निर्णय ही अंतिम रहता है? शहरों के कुछ अपवादों को छोड़कर, आज भी.

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परंतु उनका क्रोध भी तो यही दर्शा रहा था कि उनके मन में आज भी मेरे लिए विशेष स्थान है. नहीं चाहती थी कि यह संदेह उम्रभर बना रहे. नाश्ते का प्रबंध तो मैंने पहले ही कर रखा था. फ़टाफ़ट चाय भी बना लाई, ताकि इत्मीनान से बैठकर बातें कर सकूं.

“मेरा पक्ष जाने बग़ैर ही आपने मुझे दोषी करार दिया कपिल और मैं यह माने बैठी थी कि आपने ज़रूर मेरी मजबूरी समझी होगी. गौरी ने भी मुझसे नाता तोड़ लिया. एक बार तो पूछ लिया होता कि ऐसा क्यों हुआ आख़िर!”

उनके चेहरे पर उदासी एवं पश्‍चाताप की एक मिली-जुली-सी लहर गुज़र गई.

“चंडीगढ़ से लौटी, तो घर का माहौल बदला हुआ था. पापा और दादू दोनों ही क्रोध में थे. मां की सहानुभूति मेरे साथ थी और दादाजी वहां न होते, तो पापा को मनाना उतना कठिन न होता. परंतु दादाजी के सामने बोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी. मां की आंखों में जब-तब आंसू आ जाते, जिन्हें वह ‘आंख में कुछ पड़ गया है’ कहकर मुझे भरमाने का असफल प्रयत्न करती रहतीं. भाई के स्कूल का अंतिम वर्ष था. उसकी पढ़ाई में हर्जा हो रहा था. उस पर मेरे दुर्भाग्य से पड़ोस की एक लड़की अपने सहकर्मी के संग भाग गई. बाद में पता चला कि वह पुरुष तो पहले से ही विवाहित था. आस-पड़ोस का माहौल गर्म था और मुझे बिना लड़े ही हार स्वीकार कर लेनी पड़ी.

क्यों हमारे सामाजिक कर्णधारों ने स्त्री की स्थिति इतनी निर्बल बना दी. किसी गाय की तरह एक खूंटे से खोलकर दूसरे से बांध दो. गाय को कोई पूछता है भला कि तुम्हें

कौन-से घर जाना है? शहरों में स्थिति कुछ बदल रही है, पर अभी सदियां लगेंगी स्त्री को अपनी इच्छानुसार जी पाने में.”

जाते समय कपिल ने मेरा हाथ लेकर अपने माथे से लगा लिया. बोला कुछ नहीं, बस, नज़रभर देखा और उस नज़र ने स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने मुझे माफ़ कर दिया है. न ही मैं उनके बारे में कुछ पूछ पाई, न ही फिर मिलने की बात हुई. मैं इतने में ही संतुष्ट थी कि मैंने उनकी ग़लतफ़हमी दूर कर दी है.

सामाजिक व्यवस्था को कुबूल कर उसी में रच-बस गई थी मैं. बचपन में बेजान गुड़ियों के संग खेलती थी, अब तो जीती-जागती गुड़िया थी मेरे पास. मैंने दूसरों द्वारा खींची लीक पर चलकर जीवन जिया था. अपनी बेटी को इस क़ाबिल बनाऊंगी कि वह अपनी लीक ख़ुद तय करे.

दस वर्ष और बीत गए इस बात को कि एक हादसा हो गया. रमण की मृत्यु हो गई. मित्रों के संग पहाड़ों पर घूमने निकले थे कि नदी के पुल से गुज़रते वक़्त रेल पटरी से उतर गई और रेलिंग तोड़ती नदी में गिरने लगी. बहुत-सी बोगियां हवा में लटकती रह गईं. कुछ सवारियां बचा ली गईं, परंतु मरनेवालों की संख्या अधिक थी और उनमें एक नाम रमण का भी था. शायद मुझे मेरे अपराध का ही दंड मिला था. शायद मैं उस तरह का समर्पण नहीं कर पाई थी, जितना उन्हें अधिकार था.

मैंने घर में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया. पढ़ाने का शौक़ तो मुझे था ही. बिटिया स्कूल पास कर कॉलेज आ गई थी, आत्मविश्‍वास से भरपूर. अब वह मेरी बेटी नहीं, मेरी सहेली बन गई थी. रमण ने तो कभी अपना सुख-दुख बांटने के क़ाबिल नहीं समझा था मुझे, पर बिटिया कॉलेज से लौटती, तो बैठकर दिनभर के क़िस्से सुनाती. लड़कों से मिलनेवाले कॉम्पलीमेंट तक बताती. मुझे तसल्ली थी कि मैं सब जानती हूं उसके बारे में. पर वह कुछ नहीं जानती थी मेरे बारे में. मैंने उसे बताया ही कब था?

अपनी नानी से उसकी ख़ूब पटती थी. जब तक पति जीवित थे, तो वह केवल

तीज-त्योहार देने ही आती थीं हमारे घर. पर अब यदा-कदा आकर हमारे पास रह भी जातीं. हमारा मन भी लगा रहता. बिटिया ने सहसा अपनी सखी निशा के घर चंडीगढ़ जाने का कार्यक्रम बना लिया, तो नानी को मेरे पास रुकने के लिए बोल गई. चार दिन बाद लौटी, तो उसके संग मेरी बिछुड़ी सखी गौरी! मैं आश्‍चर्यचकित. गले मिली, तो मेरी अश्रुधारा ही बह निकली. आंसू गौरी से मिलने की ख़ुशी के थे अथवा नसीब पलट जाने के ग़म में, कह नहीं सकती. मैंने बिटिया से पूछा, “तुम तो निशा से मिलने गई थी, यह कहां मिल गई तुम्हें?” तो बड़े चैन से बैठते हुए बोली, “इन्हीं भाई-बहन को खोजने तो गई थी मैं चंडीगढ़, निशा की मदद से.”

मैं एकदम से सब के सामने पूछ नहीं पाई कि ‘तो फिर भाई कहां है?’

मां से ही पता चली थी उसे पूरी बात. उम्र का अंतर भूल दोनों सहेलियों-सी ही बतियाती रहतीं. उस दिन हम सब देर तक बैठे बात करते रहे. कपिल का जब भी नाम आता, गौरी भेदती नज़र से मेरी ओर देखती. क्या पढ़ना चाहती थी वह मेरे चेहरे पर? उम्र गुज़ार दी मन मारकर जीते हुए. अभी भी मेरे चेहरे पर कोई भाव उभरता था क्या? पर फिर भी मैं मन का चोर छुपाने इधर-उधर देखने लगती.

रात को गौरी को मेरे कमरे में ही सोना था. एकांत पाते ही मैंने उससे कपिल के बारे में पूछा. मेरे मन में तो कपिल के लिए सदैव दुआएं ही निकली थीं. वह स्वस्थ और प्रसन्न रहे यही चाहती थी मैं. यह सोचा भी नहीं था जो गौरी ने बताया, “कुछ माह पूर्व उसे डॉक्टरों ने कोलन कैंसर बताया था. ऑपरेशन तो हो चुका है और ठीक होने की पूरी संभावना है, किंतु इलाज अभी लंबा चलना है. मैं अपनी तरफ़ से पूरी देखभाल कर रही हूं, परंतु स्कूल जाते बच्चे, बीमार सास-ससुर और पति. चाहकर भी तो दिन में एक ही चक्कर लगा पाती हूं. एक केयरटेकर रखा हुआ है, वही देखभाल कर रहा है.”

“…पर उनके अपने परिवार के लोग? पत्नी, बच्चे?” मैंने बीच में ही टोकते हुए पूछा.

“अरी पगली! उसने विवाह ही कब किया कि आज उसे देखनेवाला कोई होता. बहुत कोशिश की मम्मी-पापा ने, आख़िरी दम तक, पर भैया माने ही नहीं. न ही कभी कारण बताया. कारण तो बस मैं ही जानती थी…”

मैंने उसी क्षण एक निर्णय लिया और अपना सामान अटैचीकेस में डालने लगी. गौरी को सुबह पहली बस से जाना था और उसके साथ मुझे भी.

Usha Vadwa

      उषा वधवा

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कहानी- मेकअप (Short Story- Makeup)

Kahani

मेकअप की पारंगतता इसी में है कि दोष छुप जाएं और गुण उभरकर आएं. चेहरे पर मेकअप की कला से एक स्त्री किसी को भी कुछ समय के लिए दीवाना बना सकती है. पर ग़लतियों और कमज़ोरियों पर मेकअप करके उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए अपना बना सकती है. पति-पत्नी के संबंध मधुर बनाए रखने में तो यह गुर विशेष काम आता है.

बेटी के संग बातचीत में तल्लीन वसुधाजी का ध्यान दीवारघड़ी की ओर गया, तो वे चौंकीं, “उठ, अब थोड़ा बाल वगैरह ठीक कर ले.”

“क्यों?” मां का मंतव्य समझकर श्रुति का मूड उखड़ गया था.

“अरे क्यों क्या? प्रेज़ेंटेबल बने रहने का ज़माना है. देख मैं भी तैयार होती हूं.” कहते हुए वसुधाजी उठकर अपने कपड़े-बाल आदि ठीक करने लगीं.

“रहने दो. आपको ज़रूरत नहीं है बनने-संवरने की. भगवान ने आपको खुले हाथों से रंग और रूप दिया है. मेकअप की परतें चढ़ाने की आवश्यकता तो मुझे है.” श्रुति बुझे मन से दर्पण के सामने जाकर बाल संवारने लगी थी.

“लो, भगवान ने इतनी सांवली सूरत मोहिनी मूरत बनाया है, फिर भी रोना रोए जा रही है. अरे, आजकल तो ज़माना ही डस्की ब्यूटी का है. हीरोइन्स को देखा नहीं?” अपने प्रयास में वसुधाजी सफल रहीं. श्रुति के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई थी. वसुधाजी उत्साहित हो उठीं.

“और किसने कहा कि मुझे मेकअप की आवश्यकता नहीं है? मैं तो बचपन से ही मेकअप करती आ रही हूं. अरे, मेकअप तो हम स्त्रियों का जन्मसिद्ध अधिकार है. बल्कि जन्मसिद्ध स्वभाव कहना अधिक उपयुक्त होगा.”

श्रुति के चेहरे पर नासमझी के भाव देख वे आगे बोलीं, “औरतें स़िर्फ चेहरे पर मेकअप नहीं करतीं, बल्कि घर, परिवार, पति, बच्चे सभी की ग़लतियों और कमज़ोरियों पर मेकअप करती रहती हैं. जब मैं छोटी थी, तो अक्सर छोटे भाई की ग़लतियों पर मेकअप करती थी. वह बहुत शैतान था. उससे दादाजी का चश्मा टूट गया, तो वह खेलने के बाद घर लौटने को राज़ी ही नहीं हुआ. मैं उसे समझा-बुझाकर घर लाई. झूठ बोला कि चश्मा मुझसे टूट गया. हालांकि किसी को विश्‍वास नहीं हुआ, पर हल्की डांट-डपट के बाद मामला शांत हो गया. मुझे संतोष था कि मैंने भाई को बचा लिया.”

“ऐसा तो मैंने भी किया है. आपको याद है गुल्लू का बर्थडे था. हम मॉल गए थे. वहां गुल्लू को 6000 के जूते पसंद आ गए थे. आपने दिलाने से इंकार कर दिया था..”

“हां… हां! बाद में वो तेरे साथ जाकर सस्ते वाले जूते लेकर आया था.” वसुधाजी को याद आ गया.

“नहीं, वे 6000 वाले ही थे. मैंने अपने स्कॉलरशिप के पैसे उसमें जोड़कर दिलवाए थे.”

“क्या? ख़ैर छोड़ो! मैं यही तो कह रही हूं कि मेकअप करना स्त्रियों का जन्मजात स्वभाव है… मैं पढ़ाई में आरंभ से ही अच्छी थी और तेरे मीकू मामा बस ठीकठाक. अच्छे नंबर आने के कारण मुझे बाहर के अच्छे कॉलेजों में प्रवेश मिल रहा था. लेकिन वहां की पढ़ाई महंगी थी. मां-पापा को बेटी को दूसरे शहर भेजने की हिचकिचाहट भी थी. बेटे को डोनेशन से प्रवेश दिलाना होगा. इस संभावना के मद्देनज़र पैसे भी जमा करने थे, इसलिए मुझे अपने ही शहर के सामान्य कॉलेज में प्रवेश दिलवा दिया गया. मैंने उनकी मजबूरी समझी और यह कहकर कि मुझे तो वैसे ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करनी है, उनकी मजबूरी को सबसे ढांपे रखा.

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यही नहीं, प्रतियोगी परीक्षा में सफल होकर उनकी इज्ज़त बढ़ाई भी. उस व़क्त उनके चेहरे पर शर्मिंदगी, कृतज्ञता और गर्व के मिले-जुले भाव देख मुझे एहसास हुआ कि ये सब मैं उन्हें खरी-खोटी सुनाकर नहीं पा सकती थी. उनकी ग़लती या मजबूरी पर मेकअप करके मैं उनकी नज़रों में ऊंचा उठ गई थी. जब शादी होकर ससुराल आई, तो दोनों घरों के आर्थिक स्तर में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ पाया, पर मैंने कभी मायके की तंगी ज़ाहिर नहीं होने दी. विभिन्न अवसरों पर मायके से आनेवाले उपहार, मिठाई आदि मैं अपने स्तर पर ही ससुराल भिजवाती रही. इस तरह दोनों परिवारों में स्नेह-सौहार्द बना रहा. वे जब भी कहीं परस्पर मिलते, आत्मीयता से मिलते. बेटी, कोई भी संबंध तोड़ने में एक सेकंड लगता है, पर जोड़ने में बरसों लग जाते हैं. फिर मेरी गोद में तू आ गई. एक तो दोनों परिवारों की बेटे की अपेक्षा, फिर तेरा दबा रूप-रंग! सच कहूं एकबारगी तो मेरा भी जी धक से रह गया था, पर फिर सोचा अपनी कोखजायी संतान का यदि मैं ही आदर नहीं करूंगी, तो दूसरा कौन करेगा? बस, ऐसा सोचना था कि छाती से ममता का सोता-सा फूट पड़ा. मैंने तुझे सीने से लगाकर ख़ूब ख़ुशी और संतोष ज़ाहिर किया. मेरी प्रसन्नता देख औरों के चेहरों पर भी मुस्कान आ गई और सबने तुझे सीने से लगा लिया था. तेरे लालन-पालन में मैंने अतिरिक्त सतर्कता बरती. चुन-चुनकर तेरे लिए खिलते रंग के आकर्षक परिधान ख़रीदकर लाती. तुझे अच्छा खिलाती-पिलाती. शहर के सबसे महंगे कॉन्वेंट स्कूल में तुझे दाख़िला दिलवाया. यदि कोई दबे स्वर में भी कह देता कि काश बेटी रंग-रूप में मां पर गई होती, तो मैं तिलमिला उठती थी.”

“यह तो मुझसे कहीं ज़्यादा स्मार्ट और आकर्षक है. बिल्कुल मॉडल जेैसे तीखे नैन-नक्श हैं. उस पर इतना तेज़ दिमाग़! इसके लिए तो लड़कों की लाइन लग जाएगी. और देख वही हुआ. अपने सहपाठी आकाश को तू इतना भा गई कि उसने ख़ुद आगे बढ़कर तेरा हाथ मांग लिया.” वसुधाजी ने गर्व से बेटी की ओर ताका, तो पाया उनकी बातें सुनते हुए वह कहीं खो-सी गई है. शायद आकाश के साथ अपने कॉलेेज के दिन याद कर रही है. काश दोनों के बीच सब कुछ पहले जैसा ही हो. जिस आशंका के मारे वे भागी-भागी यहां चली आई हैं, वह निर्मूल निकले. पिछले कुछ समय से वसुधाजी महसूस कर रही थीं कि फोन पर वार्ता के दौरान श्रुति उखड़ी-उखड़ी रहने लगी थी. किसी बात का ढंग से जवाब नहीं देती थी. ज़्यादा कुरेदो, तो झुंझला जाती थी. उन्होंने आकाश से अलग से बात करने की सोची, पर कर नहीं पाईं. मन में धंसा संदेह का कांटा जब गहरी टीस देने लगा, तो आख़िरकार एक दिन वे उनके पास आ ही पहुंचीं. दोनों ही उन्हें अचानक आया देख चौंक उठे थे.

“अर्चना डिलीवरी के लिए मायके गई हुई है. उसके लौटने पर बच्चे का काम बढ़ जाएगा. तब मेरा निकलना संभव नहीं हो पाएगा, इसलिए सोचा तुम लोगों के पास अभी रह आऊं.”

“अच्छा किया आपने.” कहकर आकाश तो निकल लिया था. पर श्रुति आश्‍वस्त नहीं हो पा रही थी.

“भैया के खाने का क्या होगा?”

“वह ऑफिस मेस में खा लेेगा. तू उसकी चिंता छोड़. यह तूने अपना और घर का क्या हाल बना रखा है? सब ठीक तो है?”

“हं..हां, ठीक है. मुझे क्या हुआ है?” श्रुति हड़बड़ा गई थी.

“नहीं, फोन पर भी तू खुलकर बात नहीं करती. मुझे लगा कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है.”

“क्या मां कुछ भी सोच लेती हो? बस थोड़ा ऑफिस में वर्कलोड ज़्यादा हो जाता है, तो चिड़चिड़ापन आ जाता है.” श्रुति नज़रें चुराने लगी, तो वसुधाजी ने वार्ता को वहीं विराम दे दिया था. वे तो भूल ही गई थीं कि श्रुति भी तो एक स्त्री है. मेकअप का स्वाभाविक गुण तो उसमें भी होगा. मेकअप की परतों के पीछे छुपे सच को जानने, सुलझाने के लिए उन्हें धैर्य रखना होगा.

श्रुति भी समझ रही थी कि मां को उसके दर्द का अंदेशा हो गया है, पर वह ख़ुद आगे होकर मां को कैसे बताए कि उसके और आकाश के बीच इन तीन सालों में काफ़ी कुछ बदल गया है. आकाश अब लगभग रोज़ ही ऑफिस से देरी से लौटने लगा है. न उसे पहले जितना व़क्त देता है, न प्यार. श्रुति को तो यह भी आशंका है कि वह किसी और लड़की के चक्कर में तो नहीं है. मां की ज़िंदगी में वैसे ही कितनी परेशानियां हैं. एक तो पापा का असामयिक देहावसान, फिर भाभी का व्यवहार भी उनके प्रति कुछ ख़ास अच्छा नहीं है. हालांकि मां ने कभी कुछ नहीं बताया. वे तो हर व़क्त भाभी के व्यवहार पर लीपापोती करती रहती हैं, ताकि श्रुति परेशान न हो. पर वह सब समझती है. नहीं, वह मां पर और चिंता का बोझ नहीं लादेगी. अपनी समस्या वह आप ही सुलझा लेगी. वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर स्वाभिमानी स्त्री है. जल्द ही वह आकाश से दो टूक बात कर अलग हो जाएगी. वह तो मां के अचानक आ जाने से उसकी योजना धरी रह गई थी. मां के सम्मुख अब तो वह आकाश के साथ भी अच्छे से पेश आने लगी थी.

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वसुधाजी को आए 10 दिन होने को थे. श्रुति ने ग़ौर किया कि आकाश न केवल व़क्त पर घर आने लगा था, वरन उससे हंस-हंसकर बातें भी करने लगा था. काम में भी हाथ बंटाने लगा था. काश मां कुछ दिन और रुक जाएं. काश मां कभी जाएं ही नहीं. यह भ्रम हमेशा बना ही रहे कि आकाश अब भी मुझसे प्यार करता है… नहीं, अब मां चली जाएं, ताकि वह इस मरीचिका से बाहर आकर आकाश से अलग होने के अपने निर्णय को क्रियान्वित कर सके. वसुधाजी बेटी के चेहरे पर आते उतार-चढ़ावों को ग़ौर से देख रही थीं. पर नारीजनित मेकअप की परतें इतनी गहरी थीं कि मन के सही-सही भाव का कयास लगाना दुश्कर प्रतीत हो रहा था.

डोरबेल बजी, तो दोनों की तंद्रा भंग हुई. श्रुति ने जल्दी-जल्दी चेहरे के मेकअप को अंतिम टच दिया और जाकर दरवाज़ा खोल दिया. आकाश की प्रशंसा भरी नज़रें श्रुति के चेहरे पर जम-सी गई थीं. नवयौवना की तरह शरमाकर झेंपते हुए श्रुति ने अंदर आने के लिए रास्ता दे दिया. अपने व्यवहार पर वह ख़ुद अचंभित थी.

“आज चाय-नाश्ता मैं तैयार करती हूं.” कहते हुए वसुधाजी रसोई में चली गई थीं.

“मैं फ्रेश होकर आता हूं, तब तक तुम भी चेंज कर लो. मूवी देखने चल रहे हैं. डिनर भी बाहर ही करेंगे.” श्रुति के जवाब की प्रतीक्षा किए बिना आकाश बाथरूम में घुस गया, तो श्रुति के पास चेंज करने के अलावा कोई विकल्प शेष न रहा. वसुधाजी चाय-नाश्ता लेकर लौटीं, तो श्रुति को दूसरी ड्रेस में तैयार देख बोल उठीं, “अरे, आज कहीं बाहर जाने की तैयारी है?”

श्रुति झेंप गई. बाहर आते आकाश ने जवाब दिया, “आप भी चलिए न मम्मीजी. मूवी के बाद डिनर भी बाहर ही करने का प्लान है.”

“हां मां, चलिए न.” श्रुति ने आग्रह किया.

“नहीं, मैं तो घर पर ही पसंदीदा सीरियल देखूंगी. खाना भी हल्का ही लूंगी दलिया वगैरह. तुम लोग हो आओ.”

श्रुति समझ गई पति-पत्नी को क़रीब लाने का यह मां का एक और मेकअप है, वरना क्या वह नहीं जानती कि मां को मूवी देखना और बाहर खाना कितना पसंद है! आकाश का रोमांटिक मूड और छलकता प्यार भी इशारा कर रहा था कि वह अकेले में कुछ कहना चाहता है. श्रुति ओैर आग्रह किए बिना निकल ली. वसुधाजी के चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ गई. मूवी से लौटते समय आकाश ने एक शोरूम के बाहर कार रोकी तो श्रुति चौंकी.

“अरसा हो गया तुम्हारे लिए कोई तोहफा नहीं लिया. चलो, सुंदर-सी ड्रेस सिलेक्ट करो.”

श्रुति के लिए एक महंगी और ख़ूबसूरत सी डे्रस लेने के बाद आकाश ने वसुधाजी के लिए भी एक साड़ी ख़रीदवाई. श्रुति उसके चेहरे पर आते पश्‍चाताप और कृतज्ञता के मिले-जुले भाव देख प्रभावित थी. रेस्तरां में भी उसने श्रुति की पसंदीदा फिश ऑर्डर की. श्रुति मन ही मन दस दिन पहले की और आज की स्थिति की तुलना कर रही थी. जब वह आकाश को खरी-खरी सुनाकर उससे अलग होने का सोच रही थी. वो तो अचानक मां आ गईं. उसे बिगड़े हुए हालात पर मेकअप करना पड़ा. और सारा परिदृश्य ही बदल गया. श्रुति के कानों में मां के शब्द गूंज रहे थे.

“बेटी, हर लड़की मेकअप का गुर मां के पेट से सीखकर आती है. हम चेहरे का मेकअप परफेक्ट कब मानते हैं, जब वो चेहरे के साथ इतना एकसार हो जाए कि लगे ही नहीं कि मेकअप किया गया है. एक स्त्री को अपने घर, परिवार, दोस्तों की ग़लतियों और कमज़ोरियों पर भी इस तरह मेकअप करना चाहिए कि सामनेवाले को एहसास न हो कि उसे ज़लील किया जा रहा है या उस पर कोई एहसान लादा जा रहा है. मेकअप की पारंगतता इसी में है कि दोष छुप जाएं और गुण उभरकर आएं. चेहरे पर मेकअप की कला से एक स्त्री किसी को भी कुछ समय के लिए दीवाना बना सकती है. पर ग़लतियों और कमज़ोरियों पर मेकअप करके उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए अपना बना सकती है. पति-पत्नी के संबंध मधुर बनाए रखने में तो यह गुर विशेष काम आता है. पति-पत्नी का संबंध दांत और जिह्वा की तरह होता है. एक सख्त और स्थिर है, तो दूसरी कोमल और चपल. पति कभी-कभी पत्नी पर अंकुश लगाता है, पर दांतों की तरह उसे आगोश में छुपाता भी है. दांत के बीच जब कुछ फंस जाता है, तो जिह्वा को झट पता चल जाता है और वह तुरंत उसे निकालने पहुंच जाती है और तब तक प्रयत्नरत और बेचैन रहती है, जब तक वह कचरा निकल नहीं जाता. कैसे भी हालात हों, दोनों अपना काम करते हमेशा साथ बने रहते हैं. मुंह के अंदर क्या चल रहा है, दोनों न चाहें तब तक बाहर किसी को पता भी नहीं चल पाता.”

ख़्यालों में खोई खाना खाती श्रुति को ध्यान ही नहीं रहा कब एक कांटा गले में अटक गया. वह बुरी तरह खांसने लगी. बौखलाया-सा आकाश कभी उसकी पीठ सहला रहा था, तो कभी पानी पिला रहा था. श्रुति के सामान्य होने तक उसकी सांस अटकी ही रही. आसपास के लोग भी उठकर मदद को आ गए थे.

“तुमने तो मुझे डरा ही दिया था. मैं बहुत शर्मिंदा हूं, पिछले कुछ समय से मैं तुम्हारे प्रति काफ़ी लापरवाह हो गया था, पर आज अचानक तुम्हें इस हालत में देखा, तो एक अनजाने डर से सिहर-सा गया. उस नन्हीं बच्ची को देख रही हो?”

अपने ख़्यालों में गुम श्रुति ने ध्यान ही नहीं दिया था कि एक नन्हीं बच्ची अपनी अठखेलियों से जाने कब से लोगों का ध्यान आकृष्ट किए हुए थी.

“… मैं सोच रहा था हमें भी अब एक बच्चा प्लान…”

‘धत्’ शर्म से श्रुति के गाल सुर्ख़ हो उठे थे मानो किसी ने उन पर ढेर सारा रूज़ लगा दिया हो.

Sangeeta Mathur

   संगीता माथुर

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कहानी- सुलझा हुआ आदमी (Short Story- Suljha Hua Aadmi)

“मैं अपनी फीलिंग्स को किसी के साथ शेयर करने को तरस जाती हूं. ऐसा बोरिंग इंसान पल्ले बंधा है कि मेरी ग़ज़ल, कविता व कहानियों की बातें उसके सिर के ऊपर से गुज़र जाती हैं. पता है, शुरू में एक बार मैंने उससे निदा फ़ाज़ली और अमीर कज़लबाश के बारे में पूछा कि इनमें से तुम्हें कौन ज़्यादा पसंद है? पहले तो वह मुझे मुंह बाए देखता रहा, फिर अपनी नासमझी पर पर्दा डालते हुए बोला कि मुझे तो तुम और स़िर्फ तुम पसंद हो…”

Hindi Kahaniya

यदि कोई मुझसे गुलमोहर के पेड़ और उसके फूलों के बारे में बातें करे, तो मैं भी उस पर बातें कर सकता हूं कि यह एक अच्छा, घना और छायादार पेड़ है, गर्मियों में खिलनेवाले इसके सुर्ख लाल और नारंगी फूल बड़े ख़ूबसूरत लगते हैं. तेज़ धूप में इसकी हरी-भरी पत्तियां आंखों को बड़ी भली लगती हैं… बस, इन्हीं दो-तीन वाक्यों को मैं चाहे जितनी बार दोहराऊं, लेकिन इससे ज़्यादा मैं इस विषय पर कुछ नहीं बोल पाऊंगा. पर मुझे ताज्जुब तब होता है, जब आभा और विशाल घंटों इस विषय पर जाने कितनी बातें कर जाते हैं. गुलमोहर से जुड़ी शेर-ओ-शायरी, उसके फूलों को देखकर कैसा महसूस होता है, किसी कवि और शायर ने उस पर क्या-क्या लिखा है वगैरह-वगैरह. यह तो एक मिसाल भर है. ऐसे सैकड़ों विषय होते हैं, जिन पर मेरे जैसा नीरस और आभा के शब्दों में अनरोमांटिक, बोरिंग आदमी कोई प्रतिक्रिया भी ज़ाहिर नहीं कर सकता, जबकि उस पर ये दोनों घंटों बहस करते हैं.

इस बीच बच्चे शाम को दूध-नाश्ते के लिए कई बार किचन में झांक चुके होते हैं. दो-तीन बार अपनी मम्मी के आसपास से भी गुज़रते हैं, लेकिन आभा को इससे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता. वह विशाल के साथ अपनी बतकहियों की उस आसमानी उड़ान पर होती, जहां उसके लिए घर-गृहस्थी, पति-बच्चे सब बौने साबित होते. वैसे भी वह अक्सर मेरी गृहस्थी में अपनी उपस्थिति ‘लिलीपुट्स के देश में गुलीवर’ की तरह ही दर्ज़ कराती.

अपनी मम्मी की महानता से अनभिज्ञ बच्चे भूख से बेहाल हो मेरे पास आते. “भूख लगी है पापा. ये अंकल कब जाएंगे? ममा को तो हमारी फ़िक़्र ही नहीं है.” बारह वर्षीया तनु की आंखों में चिढ़ और आक्रोश का धधकता लावा मेरे अंदर के बंद पड़े ज्वालामुखी को मुंह चिढ़ाने लगता. एक बार ऐसे ही खीझकर तनु ने आभा से कहा था, “मम्मी, आप इन अंकल को आने से मना क्यों नहीं कर देतीं? जब देखो तब चले आते हैं.” तब आभा आगबबूला हो उठी थी. “क्यों? तुम्हें क्या तकलीफ़ हो रही है? इतने सालों तक दमघोंटू माहौल में रहने के बाद एक मुट्ठी आसमान मिला है और वह भी तुम बाप-बेटी से बर्दाश्त नहीं हो रहा है.”

जैसे इसमें मेरी ही कोई साजिश हो, पर मेरे जैसा सुलझा हुआ आदमी ऐसी जुर्रत कर भी कैसे सकता था? वाकई इंसान यदि एक बार अपनी इमेज बना ले और दूसरों की आंखों में अपनी उस पुख़्ता इमेज की प्रशंसा देख ले, तो फिर ज़िंदगीभर अपनी उस छवि की लाश अपने कंधों पर ढोने के लिए मजबूर हो जाता है.

यूं देखा जाए तो आभा का इरादा स़िर्फ मुझे आहत करने का था, बेटी तो बस बहाना थी. लेकिन उसके इस अप्रत्याशित व्यवहार से तनु का चेहरा तमतमा गया था और वह आंखों में आंसू लिए अपने होंठ भींचती अपने कमरे में चली गई. मैंने भी अपनी मुट्ठियां कसी पाईं.

भूख से बेहाल बच्चों के लिए फिर मैं ही उठकर कभी मैगी बनाता, ब्रेड सेंकता, दूध गरम करता. रसोई में खटर-पटर मैं ज़रूरत से ज़्यादा ही करता. बच्चे भी भूख के कारण शोर-शराबा करते. लेकिन बगल के ड्रॉइंगरूम में बतियाती आभा के कानों में लगता विशाल की आवाज़ के अलावा दुनिया की सारी आवाज़ों की नो एंट्री रहती. चाय-कॉफी का शौक़ विशाल को नहीं है, स़िर्फ सिगरेट और रात की शराब ही बहुत है उसके लिए. ड्रॉइंगरूम में फैली सिगरेट की गंध उसके जाने के घंटों बाद तक इधर-उधर भटकती रहती.

शादी के बाद शुरुआती दिनों में मैं भी कभी-कभी शौक़िया सिगरेट पी लिया करता था. लेकिन आभा को उसकी बू से मितली आने लगती, सो मैंने सिगरेट पीना ही छोड़ दिया. मैं उसके लिए कुछ भी कर सकता हूं. पर अब वह कहती है कि सिगरेट पीनेवाले पुरुष कितने डैशिंग लगते हैं. वह शायर ही क्या, जो शराब न पीए.

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हैरानी होती है केमिस्ट्री जैसे नीरस सब्जेक्ट का लेक्चरर होकर विशाल कैसे फूल, पौधे, गीत-ग़ज़ल, भावनाओं से भरी बातें कर लेता है. मैं भी तो केमिस्ट्री पढ़ाता हूं, पर फूलों की ख़ुशबुओं की जगह लैब के तीखे केमिकल्स की कसैली गंध ही मुझ पर हावी रहती.

आभा अक्सर मेरी पकड़ से छिटककर दूर चली जाती थी. “तुम स्वभाव से तो एकदम अनरोमांटिक हो ही, तुम्हारी बॉडी से भी किसी केमिकल फैक्ट्री की तरह ही गैस लीक करती रहती है.”

मैं शर्म से पानी-पानी हो जाता. नहा-धोकर, पऱफ़्यूम और पाउडर से लैस होकर ही मैं बिस्तर पर जाता था. यूनिवर्सिटी का टॉपर, एक परिपक्व और सॉफ़िस्टिकेटेड इंसान पत्नी के इस तरह के कमेंट पर हीनभावना से ग्रस्त हो जाता. ख़ूबसूरत और छुईमुई-सी नाज़ुक पत्नी के इस तरह के व्यवहार से ज़िंदगी में जाने कितनी बार आहत और अपमानित भी हुआ मैं.

कभी शिकायत करने पर वह मुंह बिचकाकर कहती, “तुम्हें कुछ महसूस भी होता है रवि?”

शायद संवेदनाओं की सारी जड़ी-बूटियों को उसने ही पेटेंट करवा लिया है. मानो ‘महसूस करना’ पर स़िर्फ उसी की मोनोपोली है.

कभी अपनी बचपन की सहेलियों से बतियाती, “मैं अपनी फीलिंग्स को किसी के साथ शेयर करने को तरस जाती हूं. ऐसा बोरिंग इंसान पल्ले बंधा है कि मेरी ग़ज़ल, कविता व कहानियों की बातें उसके सिर के ऊपर से गुज़र जाती हैं. पता है, शुरू में एक बार मैंने उससे निदा फ़ाज़ली और अमीर कज़लबाश के बारे में पूछा कि इनमें से तुम्हें कौन ज़्यादा पसंद है? पहले तो वह मुझे मुंह बाए देखता रहा, फिर अपनी नासमझी पर पर्दा डालते हुए बोला कि मुझे तो तुम और स़िर्फ तुम पसंद हो…

“हां, पता है कि वह मुझे बहुत प्यार करता है. लेकिन इससे मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. मेरे लिए तो ज़्यादा इंपॉर्टेंट यह है कि मैं उसे प्यार कर पाती…

“वो तो ठीक है, हज़ारों की शादीशुदा ज़िंदगी ऐसे ही चलती है, बिना प्यार के, एक-दूसरे को ईमानदारी से झेलते हुए, शहीद होते. मेरी ज़िंदगी भी बस ऐसे ही बीत जाएगी…” और वह लंबी आह भरकर फ़ोन रख देती.

मैं यह नहीं कहता कि वह ये सारी बातें तब ज़ोर-ज़ोर से बोलती है, जब मैं बगल के कमरे में रहता हूं. पर मैं तो यह सोचता हूं कि जब वह मेरे सामने इतना कुछ कहती है, तो मेरे पीठ पीछे न जाने क्या-क्या कहती होगी. वैसे उसके मायकेवालों ने हमेशा मेरी तारीफ़ की है और यह भी जताया कि आभा मेरे साथ बहुत सुखी और संतुष्ट है.

फिर भी जैसी है, वह मेरी है और मेरे पास है. मेरे प्यारे बच्चों की मां है. घर को प्यार से सजाती-संवारती, बच्चों को ख़ूब प्यार करती, खाली समय में कविताएं लिखती-पढ़ती मेरी प्यारी आभा.

लेकिन विशाल के आते ही वह किसी दूसरी दुनिया में पहुंच जाती. पांच साल पहले जब केमिस्ट्री डिपार्टमेंट में विशाल की नियुक्ति हुई, तो मुझसे जूनियर होने के नाते वह ‘सर-सर’ कहकर मेरे आगे-पीछे लगा रहता. दुबला-पतला, मासूम-सा विशाल, 27-28 की उम्र का होने के बावजूद कम उम्र का लगता था. बी.एससी. के स्टूडेंट्स उसे घास नहीं डालते, तो रुआंसा होकर मेरे पास आता, “सर, इन लड़कों को समझाइए न. ये मेरे साथ बदतमीज़ी करते हैं.”

वह एजुकेशन मिनिस्टर का भांजा था, इसलिए उससे ज़्यादा क़ाबिल लोगों को पीछे धकेलकर उसे अपॉइंट किया गया था. स्टूडेंट्स कहां चूकनेवाले थे. लेकिन लड़कों के दर्द की वजह एक और भी थी. क्लास की लड़कियों का झुकाव तेज़ी से उसकी तरफ़ बढ़ रहा था, जो उन्हें कतई गवारा न था.

जब वह पहली बार अपनी पत्नी के साथ घर आया था, तो उसके जाने के बाद आभा देर तक पानी पी-पीकर अपने नसीब को कोसती रही, “कितनी सुंदर जोड़ी है, कितना प्यार है दोनों में…” से शुरू होकर “कितनी लकी है जया, जो उसे विशाल जैसा रोमांटिक, ख़ुशमिजाज़ पति मिला है…” पर आकर अटक गई. उसे कैसा पति मिला है, यह तो वह जानती ही थी.

शुरू में दोनों साथ आते थे. वह ‘सर-सर’ कहकर मेरे पास बना रहता. पत्नी को आभा अपने पास बिठाए रखती. फिर पता नहीं कब वह मुझे छोड़ आभा की तरफ़ मुख़ातिब हो गया. धीरे-धीरे पत्नी को भी साथ लाना बंद कर दिया या उसने ही आने से मना कर दिया. कोई तुक भी तो नहीं कि हर दूसरे-तीसरे दिन मुंह उठाकर बिन बुलाए किसी के घर धरना दिया जाए. लेकिन विशाल को शायद आभा का मौन निमंत्रण मिल चुका था. फिर उसमें बीवी या काज़ी किसी का क्या दख़ल?

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घर में प्रवेश करते ही सोफे पर बैठने से पहले वह बड़े अदब और नज़ाकत के साथ एक शेर सुनाता. आभा वाह-वाह करके बैठने का इशारा करती, तो लखनवी अंदाज़ में आदाब करता हुआ तड़ से शेर शुरू कर देता. उसके हर शेर पर आभा झूम उठती.

“पता है विशाल, जब मैं क्लास टेंथ में थी, तो यह मेरे फेवरेट शायर हुआ करते थे.” फिर वह कोई दूसरी ग़ज़ल छेड़ देता.

“पता है विशाल, जब मैं ट्वेल्थ में थी, तो इस शायर की दीवानी थी.”

पहले वह मुझसे इज़ाज़त लेकर सिगरेट पिया करता था. पर अब उसे मेरे वहां होने, न होने से कोई मतलब ही न रहा, फिर वह इज़ाज़त किससे और क्यों ले? सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुए वह कभी शैली का प्रेम-प्रसंग छेड़ बैठता, तो कभी कीट्स का. कभी सीमोन द बोउआर और ज्यां पॉल सार्त्र के प्लेटोनिक लव से अभिभूत होकर ‘लव इज़ इंपॉसिबल’ की व्याख्या करता, तो कभी ‘किसी को मुक़म्मल जहां नहीं मिलता’ का रोना रोता.

इधर उसने फ्रेंच कट दाढ़ी रखनी शुरू कर दी थी. चश्मे के मोटे फ्रेम के पीछे से झांकती भावपूर्ण आंखें, होंठों के बीच दबी सिगरेट इंटलेक्चुअल लुक देने के लिए काफ़ी होते हैं. चार-पांच सालों में उसने यूनिवर्सिटी में भी अच्छा रंग जमा लिया था, ख़ासकर लड़कियों पर.

इन दिनों उसका घर आना भी धीरे-धीरे कम हो रहा था. आभा फ़ोन पर फ़ोन करती. “क्या बात है विशाल? मैं कई दिनों से तुम्हारी राह देख रही हूं. तुम आए ही नहीं… ओह! बिज़ी विदाउट बिज़नेस. तुम जैसे निट्ठलों को क्या काम? फ़ौरन घर आओ. मैंने एक नई क़िताब ख़रीदी है, उसी पर तुमसे बात करनी है…”

फिर भी वह कई दिनों बाद आता और काफ़ी झुंझलाया हुआ. आभा की कोई अदा अब उसे बांध नहीं पा रही थी. इधर यूनिवर्सिटी में भी उसके कई क़िस्से मशहूर होने लगे थे. किसी स्टूडेंट के भाइयों के हाथों पिटाई भी हो चुकी थी उसकी. फिर भी आए दिन किसी न किसी स्टूडेंट के साथ उसका नाम कैंपस में उछलता रहता था. आभा के कानों तक भी ये क़िस्से पहुंचते रहते. उसे अपना तिलस्म टूटता-सा जान पड़ता.

तीसरे पहर यूनिवर्सिटी से लौटा, तो देखा आभा बेड पर औंधे मुंह पड़ी है. आवाज़ देने पर भी नहीं बोली. बच्चे अपने कमरे में थे.

“क्या बात है तनु, आज तुम्हारी मम्मी की तबीयत ख़राब है क्या?”

“हां, शायद उनका मूड बहुत ख़राब है.”

“क्यों? क्या बात हो गई?”

“पापा, आज सुबह जया आंटी अपनी बेबी के साथ आई थीं. उनके हाथ में प्लास्टर और सिर पर भी पट्टी बंधी थी. वे बहुत रो रही थीं. विशाल अंकल ड्रिंक करने के बाद उन्हें बहुत मारते हैं. दो दिन पहले उन्हें सीढ़ियों से धक्का दे दिया था… पापा, विशाल अंकल बहुत गंदे हैं, वे जया आंटी को बहुत टॉर्चर करते हैं. आज आंटी अपनी मम्मी के घर जा रही हैं. अब वे कभी नहीं लौटेंगी. जाने से पहले मम्मी से मिलने आई थीं. मम्मी उनसे कह रही थीं कि अब वे अंकल को कभी घर में घुसने भी नहीं देंगी.”

तनु के चेहरे पर एक सुकून और इत्मीनान की छाया स्पष्ट दिख रही थी. लेकिन उस बेचारी को मम्मी के मूड ऑफ़ होने की असली वजह कहां मालूम?

 

Geeta Singh

       गीता सिह

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कहानी- फ्लैश फॉरवर्ड (Short Story- Flash Forward)

“अरे, बहुत सिंपल चीज़ है ममा. जैसे आप टीवी पर, सिनेमा में  फ्लैशबैक देखती हैं. उसमें अतीत में घटी घटना आंखों के सामने साकार होने लगती है. ऐसा ही कुछ फ्लैश फॉरवर्ड में होता है, जिसमें हम अपने अनुमान के आधार पर भविष्य में कुछ घटित होता देखते हैं और वो सब कुछ एक चलचित्र की तरह हमारी आंखों के सामने चलता रहता है.”

Short Story

रिया बेहद अच्छे मूड में आकर मेरे पास बैठ गई और अपनी दोनों बांहें मेरे गले में डाल दीं. मैं समझ गई कि वह कुछ बात बताने के लिए उत्सुक है.

“ममा, मालूम है मैंने विवेक से शादी के लिए हां क्यों की?”

“तुम्हारी सहेली का भाई है और तुझे पसंद आ गया होगा?”

“वो भाई तो रितु का बचपन से ही है, तब से देखती आ रही हूं, पर मैंने उसे कभी इस एंगल से नहीं देखा था. जबकि रितु तो बात-बात में मुझे कहती रहती थी, ‘तुझे इस होटल का रवा डोसा पसंद है? अरे भैया को भी बहुत पसंद है…’ ‘क्या तुझे ‘रॉकस्टार’ फिल्म अच्छी लगी? अरे, भैया को भी बहुत अच्छी लगी…’ मैं तो उसकी बातों से बुरी तरह खीझ जाती थी. तब वह रोने-जैसा मुंह बनाकर बोलती थी. ‘तुझे लगता है मैं बातें बनाती हूं, लेकिन रिया सच, तुम्हारी क़सम! तुम्हारी और भैया की पसंद वाकई बिल्कुल एक जैसी है. तुम दोनों का स्वभाव भी काफ़ी मिलता है.”

“फिर?”

“मुझे उसकी बातों में रस आने लगा था. वह बात ही इतने मज़ेदार तरी़के से कह रही थी. फिर मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा कि हम दोनों की शादी हो गई. एक दूजे से नहीं, अलग-अलग जगह. हम अपनी-अपनी गृहस्थी में ख़ुश थे. बच्चे हो गए. उनकी भी शादियां हो गईं…”

मैं मुंह बाए सुन रही थी, पर मुझसे रहा नहीं जा रहा था.

“यह फ्लैश फॉरवर्ड क्या बला है?”

“अरे, बहुत सिंपल चीज़ है ममा. जैसे आप टीवी पर, सिनेमा में फ्लैशबैक देखती हैं. उसमें अतीत में घटी घटना आंखों के सामने साकार होने लगती है. ऐसा ही कुछ फ्लैश फॉरवर्ड में होता है, जिसमें हम अपने अनुमान के आधार पर भविष्य में कुछ घटित होता देखते हैं और वो सब कुछ एक चलचित्र की तरह हमारी आंखों के सामने चलता रहता है. हां, तो मैं बता रही थी कि फिर एक दौर ऐसा आया कि हम दोनों ही अकेले हो गए. उसकी पत्नी की मृत्यु हो गई और मेरा पति…”

“क्या?” मैं ज़ोर से चिल्ला उठी.

“घबराओ मत. ये सब मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा था. फिर मैंने अपना पुश्तैनी मकान बेचा और समुद्र किनारे एक फ्लैट में रहने आ गई. वहां एक दिन शाम को पार्क में सैर करते व़क़्त मुझे रितु मिल गई…”

“क्या वह भी विधवा?”

“अरे, नहीं ममा. उसका पति जीवित था. वह अपनी पोती को पार्क में घुमाने लाई थी. कुछ देर सुख-दुख की बातें चलती रहीं. मेरी बात ख़त्म होते ही वह बोल पड़ी. भैया भी बिल्कुल अकेले हो गए हैं. भाभी चल बसी और बच्चे विदेश में सेटल हो गए. वे भी आजकल इसी अपार्टमेंट में रहते हैं. लो, वे आ भी गए. मैंने बताया था न तुझे कि वे भी तेरी तरह शाम की सैर किए बगैर नहीं रह सकते. अब तुम दोनों बातें करो. मैं चलती हूं गुड़िया के दूध का वक़्त हो गया है. मैं विवेक को गौर से देखने लगी. अभी भी काफ़ी तंदुरुस्त और स्मार्ट लग रहे थे. हम रोज़ मिलने लगे और फिर हमने शादी का ़फैसला कर लिया. रितु ने ख़ुशी-ख़ुशी हम दोनों की शादी करवाई, तो मैंने सोचा, जो काम 40 साल बाद करना है, वह आज ही कर लिया जाए.”

मैंने अपना सिर पकड़ लिया. “उ़फ्! यह आज की जनरेशन. क्या सोचती है, क्या बोलती है, क्या करती है, इन्हें कुछ होश नहीं रहता और ऊपर से तुर्रा ये कि हम स्पष्टवादी हैं. साफ़ बोलना पसंद करते हैं. लेकिन हम यदि दो बातें स्पष्ट सुना दें, तो इनका पारा चढ़ जाएगा. सोचकर मैंने मुंह सिल लेना ही बेहतर समझा. बड़ी मुश्किल से तो शादी के लिए राज़ी हुई है.

धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ और देखते ही देखते नाज़ों पली बिटिया पराई हो गई. नाम के अनुरूप ही विवेक बहुत समझदार लड़का साबित हुआ. रिया प्रोफेशनली बहुत साउंड थी, लेकिन घर-गृहस्थी के मामले में थोड़ी कच्ची थी, पर विवेक के प्यार और विश्‍वास ने कभी गृहस्थी की गाड़ी डगमगाने नहीं दी. रिया जिस तरह मुझसे फोन पर खुलकर लंबी-लंबी बातें करती थी, उससे साफ़ ज़ाहिर होता था कि दोनों के बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग थी. स़िर्फ एक बात मुझे खटकती थी. दोनों जब भी दो-चार दिन की छुट्टियां लेकर आते, विवेक अपने शहर अपने घर चल देता और रिया मेरे पास रुक जाती. रितु की शादी के बाद वे लोग अपने पैतृक शहर जाकर बस गए थे.

“तुम कभी अपनी सास के पास छुट्टियां बिताने नहीं जाती रिया? विवेक या उसके माता-पिता कभी कुछ कहते नहीं? और न विवेक ही कभी यहां रुकता है?”

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“यह हम दोनों ने आपस में तय कर रखा है ममा. अब क्या है बड़ी मुश्किल से कितने ही महीनों में दो-चार दिन की छुट्टी मिलती है, तो वह अपने ममा-पापा के पास रहना चाहता है और मैं आपके पास. फिर विवेक की ममा आपकी तरह हाउसवाइफ़ थोड़े ही हैं, वे वर्किंग वुमन हैं. मैं जाऊंगी, तो उन्हें असुविधा होगी. रितु भी अपने ससुराल में है. मेरे न जाने पर मां-बेटे पहले की तरह आराम से अपना व़क़्त गुज़ारते हैं. घूमते हैं, मिलकर पकाते-खाते हैं और गप्पे लड़ाते हैं. मैं दाल-भात में मूसलचंद नहीं बनना चाहती. दूसरे, चार दिन की छुट्टी में भी मैं वहां चली गई, तो फिर आपके पास कब रहूंगी?”

“पर बेटी?”

“हम सभी एक-दूसरे की मजबूरी को समझते हैं और इसलिए कोई इसे अन्यथा नहीं लेता. आप भी इन छोटी-छोटी बातों को लेकर परेशान न हों ममा.” रिया के समझाने पर मैंने सहमति में गर्दन तो हिला दी थी, पर दिल आशंकित ही रहा.

आम कामकाजी महिला की तरह रिया की ज़िंदगी की गाड़ी भी घर और ऑफिस के बीच हिचकोले खाती चलने लगी. कभी बाई नहीं आई, कभी कुक ने छुट्टियां ले लीं, कभी हाथ में चोट लग गई, कभी विवेक से खटपट… इन सब पर ऑफिस में भी बढ़ती ज़िम्मेदारी और तनाव. मैं अपनी ओर से भरसक उसकी समस्या सुलझाने का प्रयास करती, मुश्किलों से जूझने का हौसला भी देती, पर ख़ुद अंदर से टूट जाती. नन्हीं मासूम-सी जान कितने-कितने मोर्चे एक साथ संभालेगी? दिल की बेहद साफ़ और भोली रिया अक्सर ऑफिस में चल रही पॉलिटिक्स से परेशान हो उठती थी. “समझ ही नहीं आता ममा किस पर भरोसा करूं और किस पर नहीं? किसको काम के लिए हां कहूं और किसे साफ़ इंकार कर दूं? लगता है, हर कोई मुझ पर ही हावी हो रहा है.” मैं उसे समझाने का प्रयास करती, “बेटी, ऐसा तो हर ऑफिस में चलता रहता है.”

“आपको क्या पता? आप कब ऑफिस गईं?” वह तुनक उठती.

“नहीं गई. पर तुम्हारे पापा से और दूसरे लोगों से सुनती तो रहती हूं न? सब जगह ये ही ढाक के तीन पात हैं, पर जिनमें प्रतिभा है, जो परिश्रमी हैं, वे हर परिस्थिति से निबट लेते हैं और अधिक निखरकर सामने आते हैं.”

“आप ठीक कहती हैं ममा.” रिया का आत्मविश्‍वास लौट आता, तो मेरा मन भी प्रसन्न हो उठता.

सप्ताहांत में दो छुट्टियों का संयोग देखकर रिया और विवेक ने घर आने का कार्यक्रम बना लिया. सुनकर मेरा मन मयूर नाच उठा और मैं बड़े उत्साह से उनके आने की तैयारियां करने लगी. लेकिन अपनी तैयारियों पर मुझे जल्द ही विराम लगाना पड़ा. रिया को पता चला, तो वह भी उदास हो उठी.

“क्या ममा! मेरी और विवेक की तो छुट्टी भी मंज़ूर हो गई है.”

“तो ऐसा कर इस बार तू भी उसके साथ अपने ससुराल हो आ. बहुत समय से तेरा वहां जाना नहीं हुआ. अब क्या करूं बेटा, तेरी मौसी का ऑपरेशन नहीं होता और वो नहीं बुलाती तो हम इस दौरान कहीं नहीं जाते. अब ऐसे अवसर पर ना भी नहीं कह सकते. ज़रूरत पड़ने पर घरवाले काम नहीं आएंगे, तो और कौन काम आएगा?”

“नहीं, नहीं. आप निश्‍चिंत होकर जाइए. मैं विवेक के संग मेरठ ही हो आती हूं.” रिया का निर्णय सुन मुझे कुछ तसल्ली मिली.

छोटी बहन का ऑपरेशन निबटाकर मैं घर लौटी, तब तक रिया की छुट्टियां समाप्त हो चुकी थीं और वे लोग भी अपने शहर लौट गए थे. मुकुल को ऑफिस रवाना कर मैं सूटकेस, बैग आदि खाली करने लगी. तभी रिया का फोन आ गया. वह ऑफिस जा रही थी. चहकते हुए उसने बताया कि उसका ससुराल का कार्यक्रम बहुत मज़ेदार रहा. “मम्मीजी और पापाजी तो इतने ख़ुश थे ममा कि मैं आपको बता नहीं सकती. उन्होंने भी अपने-अपने ऑफिस से दो-दो दिन की छुट्टी ले ली थी. हम पूरा मेरठ घूमे. मम्मीजी कह रही थीं कि वे तो हमेशा से चाहती थीं कि मैं भी विवेक के साथ छुट्टियों में उनके पास जाऊं. पर मेरी इच्छा न जानकर संकोच के मारे चुप रह जाती थीं. बता रही थीं कि इस बार विवेक भी ख़ूब खिला-खिला लग रहा है, वरना हमेशा तो आकर बस सोया रहता है. कहीं चलने को कहते हैं, तो कहता है सब देखा हुआ तो है. मैं तो यहां थकान उतारने आया हूं. पर इस बार तो उसका घूमने और खाने की फरमाइशों का दौर ही ख़त्म नहीं हो रहा है. यूं लग रहा है, जैसे दो ही दिनों में तुझे सब कुछ दिखा और खिला देना चाहता है. घर में कितनी रौनक़ हो गई है…” रिया की आवाज़ की चहचहाहट बता रही थी कि वह कितनी ख़ुश है. मैं आनंद के सागर में गोते लगाने लगी. उसकी बातें थीं कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

“और पता है ममा, उन्होंने मेरी ऑफिस संबंधी सारी समस्याएं चुटकियों में सुलझा दीं, जिन्हें आप भी नहीं सुलझा सकती थीं, क्योंकि आप वर्किंग नहीं हैं और विवेक भी नहीं सुलझा पाया था, क्योंकि वह वुमन नहीं है.”

मैं अनायास ही मुस्कुरा उठी थी.

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“उन्होंने मुझे घर और ऑफिस में तालमेल के इतने कारगर टिप्स बताए हैं कि मुझे सब कुछ बेहद आसान लगने लगा है. मम्मीजी तो वर्किंग वुमन होते हुुए भी घर को इतना सुव्यवस्थित और साफ़ रखती हैं कि मैं तो दंग रह जाती हूं. नौकर तो वहां भी हैं, पर उनसे काम लेने का भी एक तरीक़ा होता है, ये मुझे अब समझ आया. मैं उनसे विवेक की पसंद की कुछ डिशेज़ भी सीखकर आई हूं. और हां, उन्होंने मुझे एक बेहद ख़ूबसूरत घाघरा-चोली ड्रेस दिलवाई है, वो मैं नवरात्रि में पहनूंगी. मैंने और विवेक ने अब निश्‍चय किया है कि हम दोनों अब अपनी छुट्टियां ख़ुद को बांटकर नहीं, बल्कि छुट्टियों को बांटकर बिताएंगे. अगली छुट्टियों में विवेक भी मेरे साथ आपके पास रहेगा और लौटते समय हम दोनों दो दिन मेरठ रुकेंगे. क्यों ठीक है न ममा? आप तो हमेशा से यही चाहती थीं.”

“पर तू मानती कहां थी? तभी तो हमें जबरन मौसी के यहां जाना पड़ा.”

“जबरन? तो क्या मौसी का ऑपरेशन नहीं था?”

“अरे था. कैटरेक्ट (मोतियाबिंद) का छोटा-सा ऑपरेशन था. दो घंटे में करवाकर घर आ गए थे. उनकी बेटी लीना और दामादजी भी आए हुए थे. इसलिए ज़्यादा कुछ काम था ही नहीं. हम तो ऐसे ही अपनी तसल्ली के लिए चले गए थे.”

“ओह! तो मुझे सबक सिखाने के लिए यह योजना बनाई गई थी.”

“फिर क्या करती? मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा कि तेरे बार-बार अकेले आने से और विवेक के अकेले घर जाने से कोई भी ख़ुश नहीं था. पर तुम दोनों पति-पत्नी के निर्णय के बीच बोलकर कोई बुरा भी नहीं बनना चाहता था. बेटी, विवाह दो इंसानों का नहीं, दो परिवारों का मिलन होता है. दो इंसान निस्संदेह एक-दूसरे के साथ बेहद ख़ुश रह सकते हैं, लेकिन परस्पर जुड़ाव के लिए उसे दूसरे पक्ष से जुड़ी सभी चीज़ों से जुड़ना होता है. जैसे मुझे तुम अत्यंत प्रिय हो, तो तुमसे जुड़ा विवेक, उसके माता-पिता, भाई-बहन आदि स्वतः ही प्रिय लगने लगे. उनसे जुड़ाव तुम्हारे प्रति जुड़ाव बढ़ाएगा, घटाएगा नहीं. क्या तुम्हें नहीं लगता कि ससुराल से लौटने के बाद विवेक तुम्हें और भी ज़्यादा प्यार करने लग गया है?”

“हां ममा, बिल्कुल ऐसा ही है. मैं ख़ुद इस बदलाव पर हैरान हूं, पर तुम्हें कैसे पता चला?”

“अपनी फ्लैश फॉरवर्डवाली रील में मुझे सब कुछ साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है.”

“ओह ममा, आपने तो मेरा तीर मुझ ही पर चलाकर मेरी ज़ुबान पर ताला लगा दिया है.” अपनी पराजय स्वीकारते हुए भी रिया की ख़ुशी छुपाए नहीं छुप रही थी.

Sangeeta Mathur

    संगीता माथुर

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कहानी- अंतिम दर्शन (Short Story- Antim Darshan)

“मां, तुम तो पहेलियां बुझाने लगीं. साफ़-साफ़ कहो ना.” मेरा धैर्य चुकने लगा था.

“देखो बेटा, इस संसार में जो भी आता है उसे एक दिन सबको छोड़कर जाना भी पड़ता है. कोई भी अमर नहीं है. मुझे भी एक दिन यह दुनिया छोड़कर जाना है…..”

“मां, मैं अब भी नहीं समझी तुम क्या कहना चाहती हो.” मैंने बीच में ही कहा.

“वही कहने जा रही हूं. तुम मुझे किस रूप में याद रखना चाहोगी? सदा हंसती- मुस्कुराती, तुमसे बातें करती, लाड़-प्यार करती, सुख-दुख की बातें करती, मार्गदर्शन करती या फिर निर्जीव, जो तुम्हारे बार-बार पुकारने पर भी नहीं बोलती, तुम्हारी बातें नहीं सुनती…”

Story in Hindi

भैया का फ़ोन था, “विनी, मां नहीं रही…”

“क्या..? कब?” कहते-कहते मेरी रुलाई फूट पड़ी. भय से शरीर में कंपन-सा पैदा हो गया. कंठ सूख गया.

“कल दोपहर को उन्होंने प्राण त्याग दिए. शाम को अंतिम संस्कार कर दिया गया है.” भैया के कहते ही मैं चीख पड़ी, “क्या…? अंतिम संस्कार करने के बाद मुझे सूचित कर रहे हो? कल क्यों नहीं बताया? मैं किसी-न-किसी तरह पहुंच ही जाती. मां के अंतिम दर्शन तो कर लेती, पर आपने वह भी नहीं करने दिया.”

“विनी, शव को ज़्यादा देर तक रखा नहीं जा सकता था. डॉक्टरों का कहना था 2-3 घंटे के भीतर दाह संस्कार कर दिया जाए. शरीर में से ख़ून व पानी का रिसाव रुक नहीं रहा था. वैसे पूरे विस्तार से तुम्हारे आने के बाद ही बातें होंगी. तुम अपनी सुविधानुसार आ जाओ तेरहवीं से पहले.” कहकर भैया ने फ़ोन रख दिया.

फ़ोन रखने के बाद मैं निढाल-सी पलंग पर गिर पड़ी. क्रोध से पूरा शरीर कांप रहा था. भैया ने मुझे कल क्यों नहीं बताया? क्या कोई ऐसे भी करता है? बेशक मैं दूर रहती हूं, मां के पास पहुंचने में 20-22 घंटे लग जाते हैं. ट्रेन बदलनी पड़ती है. उस क्षेत्र के लिए सीधी वायु सेवाएं भी उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन दूसरे लोग भी तो शव को अंतिम दर्शन के लिए रखते ही हैं. ब़र्फ पर रखकर कुछ दवाएं, घोल, रासायनिक लेप आदि लगाकर तो 2-3 दिनों तक रखा जा सकता है, पर भैया ने तो अपना काम निबटा दिया. यह नहीं सोचा कि इकलौती बेटी को मां से कितना प्यार-लगाव होता है. अब सारी उम्र मुझे यही ग़म सालता रहेगा कि मैं मां के अंतिम दर्शन नहीं कर सकी.

अगले दिन की टिकट उपलब्ध होने पर पतिदेव के साथ मायके के लिए निकल पड़ी. मेरा उखड़ा मूड व उदास चेहरा देख पति मुझे सांत्वना देते रहे. समझाते रहे कि कोई कारण होगा, इसीलिए भैया ने मुझे देर से सूचना दी. लेकिन मैं तो भैया को लगातार दोषी ठहरा रही थी. भला मां-बाप के निधन की ख़बर भी कोई इतने विलंब से करता है!

पिछले महीने मां से मिलकर आई थी. उनका स्वास्थ्य बिगड़ रहा था. एक किडनी निष्क्रिय हो चुकी थी. दूसरी भी काफ़ी कमज़ोर थी, उस पर सूजन आ गयी थी. आए दिन अस्पतालों, डॉक्टरों के यहां चक्कर लग रहे थे. परिवार में तनाव का माहौल था. पिताजी, भैया-भाभी सभी चिंतित थे. मां की देखभाल में भी किसी तरह की कोई कमी नहीं थी. सभी अपने फर्ज़ को पूरी तरह निभा रहे थे. भाभी मां की सेवा-टहल में कोताही नहीं आने देती थी. इस बात से मुझे सुकून मिला था. उस दिन बातों-बातों में मां ने भी कह दिया था, “औलाद के मामले में मैं बड़ी भाग्यशाली हूं. बेशक दो ही संतानें हैं- एक बेटा और एक बेटी, पर दोनों ही लायक, आज्ञाकारी, प्यार-सम्मान व अपनापन देने वाले हैं. फिर बहू भी वैसी ही मिली है, कभी माथे पर बल नहीं डालती. अपनी ज़िम्मेदारियां बख़ूबी निभा रही है.”

भाभी सचमुच बेहद समझदार, सुघड़ व समझौतावादी प्रवृत्ति की थीं. मुझसे दो वर्ष पहले भैया की शादी हुई थी. भाभी ने हमेशा मुझे बड़ी बहन-सा प्यार व सहयोग दिया. मेरी परेशानियों में साथ दिया, मार्गदर्शन किया. मेरी शादी के व़क़्त तो वे भाग-भाग कर काम करती रही थीं. रिश्तेदारों की खातिरदारी में कोई कसर नहीं रहने दी. सभी रिश्तेदार भाभी की प्रशंसा कर रहे थे. किसी ने तो कह भी दिया था, “जिनके घर में ऐसी समझदार बहू हो, उनका बुढ़ापा तो संवर गया.” शादी के बाद जब भी मैं मायके जाती भाभी मुझे पूरा समय देती. कभी हम फ़िल्म देखने चले जाते, तो कभी शॉपिंग करने. मां संतुष्ट थीं, साथ ही सदा ऊर्जा व उत्साह से भरी रहतीं. कई बार हमारे साथ फ़िल्म देखने या किसी सहेली या रिश्तेदार से मिलने भी चल पड़तीं. मेरी सहेलियां आतीं तो उनके साथ भी ख़ूब बातें करतीं. वे कहतीं, “तू कितनी भाग्यशाली है जो तुझे ऐसी मां मिली है. इतना प्यार करने वाली, सखियों की तरह हंसी-मज़ाक, दुख-सुख में साथ देने वाली, समस्याओं का उचित समाधान सुझाने वाली, हमेशा उत्साह से भरपूर. वरना कई मांएं तो बात-बात पर रोक-टोक, प्रतिबंध, डांट-डपट लगाती हैं.”

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कभी-कभी तो भैया-भाभी, मैं और मां रात को कुछ देर बैठ क़िस्से-कहानियां कहते-सुनते रहते, तो कभी ताश की बाज़ी भी जम जाती. मां कहतीं, “ये सब इकट्ठे मिल बैठने के निमित्त हैं, इसी बहाने कुछ देर सब हंस-बोल लेते हैं, आपस में प्यार व अपनापन बढ़ता है.” पिताजी एकांतप्रिय स्वभाव के थे, वे अंदर अपने कमरे में अख़बार या पुस्तकें पढ़ते रहते.

पिछले साल जब मां स्वस्थ थीं तब मैं दस दिनों के लिए आई थी. रोज़ ही गपशप, घूमना-फिरना, ख़रीदारी चल रही थी. उस दिन रात को बाहर अच्छे होटल में खाना खाने का प्रोग्राम बना. खाना खाकर घर लौटे तो कुछ देर बाद ही मां के पेट में भयंकर दर्द उठा. फौरन डॉक्टर को बुलाया गया. जांच-परीक्षण के बाद डॉक्टर ने बताया कि खाने में शायद कुछ बासी चीज़ खा ली है. दो दिन दवा लेने के बाद मां स्वस्थ हो गयीं. अगले दिन दोपहर के खाने से निबटकर जब हम आराम कर रहे थे, मां अचानक बोलीं, “विनी, तुझसे एक बात कहना चाहती हूं…” मैंने प्रश्‍नवाचक नज़रों से देखते हुए कहा, “हां, कहो न!”

“बहुत सोच-विचार के बाद यह बात कर रही हूं. तुझे अजीब तो लगेगी, लेकिन उसकी गहराई समझने के बाद अर्थ समझ आ जाएगा.”

“मां, तुम तो पहेलियां बुझाने लगीं. साफ़-साफ़ कहो ना.” मेरा धैर्य चुकने लगा था.

“देखो बेटा, इस संसार में जो भी आता है उसे एक दिन सबको छोड़कर जाना भी पड़ता है. कोई भी अमर नहीं है. मुझे भी एक दिन यह दुनिया छोड़कर जाना है…..”

“मां, मैं अब भी नहीं समझी तुम क्या कहना चाहती हो.” मैंने बीच में ही कहा.

“वही कहने जा रही हूं. तुम मुझे किस रूप में याद रखना चाहोगी? सदा हंसती- मुस्कुराती, तुमसे बातें करती, लाड़-प्यार करती, सुख-दुख की बातें करती, मार्गदर्शन करती या फिर निर्जीव, जो तुम्हारे बार-बार पुकारने पर भी नहीं बोलती, तुम्हारी बातें नहीं सुनती… सुन विनी, मैं चाहती हूं मेरे मरने के बाद तू मेरा चेहरा मत देखना. अंतिम दर्शन की परंपरा को ख़त्म कर देना.”

“मां, ये कैसी बातें कर रही हो?” मैं अवाक् थी.

“सही कह रही हूं. मेरे मृत शरीर को देख तू रोएगी, विलाप करेगी, फिर कहेगी…‘मां उठो ना… कुछ तो बोलो… हमें छोड़कर मत जाओ…’ और भी न जाने क्या-क्या, लेकिन मैं तो कुछ भी नहीं कर पाऊंगी ना! फिर मेरे उस निर्जीव चेहरे की पता नहीं कैसी दशा होगी, क्योंकि मृत्यु के बाद कइयों के चेहरे विकृत भी हो जाते हैं. अब तुम्ही बताओ, क्या तुम सारी उम्र उस निर्जीव चेहरे की आकृति याद रखना चाहोगी जो रोने, पुकारने, विलाप करने पर भी हलचल नहीं करता… क्या जीवित अवस्था में कोई मां इतनी निष्ठुर हो सकती है? नहीं ना! फिर क्यों उस चेहरे को स्मृतियों में बसाया जाए जो स्पंदनहीन हो, निष्ठुर हो. उस चेहरे को मधुर स्मृतियों में बसाना चाहिए, जो सदा हंसता, मुस्कुराता, ममता-प्यार लुटाता रहा हो. छोटी-सी परेशानी होने पर भी हिम्मत व संबल प्रदान करता हो, मार्गदर्शन देता हो. इसलिए तुम मेरा मृत चेहरा मत देखना.”

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मैं किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी मां का मुंह देखती रह गई. यह कैसी बात कह दी मां ने और यह ख़याल उनके मन में आया कैसे? मां बहुत पढ़ी-लिखी तो नहीं थीं, लेकिन उन्हें पुस्तकें पढ़ने का बेहद शौक़ था. दोपहर के खाने के  पश्‍चात घंटाभर कुछ-न-कुछ ज़रूर पढ़ती थीं. इनमें कहानियों-क़िस्सों के अलावा बड़े-बड़े लेखकों की कृतियां भी होती थीं. मैंने सोचा, मां ने शायद किसी दार्शनिक की क़िताब में से शायद ऐसे विचार पढ़े होंगे तभी ऐसी बातें कर रही हैं. प्रत्यक्ष में इतना ही कहा, “मां, ऐसी बातें क्यों कर रही हो! अभी तो तुम्हें ख़ूब जीना है. हम सब की ख़ुशियां देखनी हैं, नाती-पोते देखने हैं. फिर अभी तुम एकदम स्वस्थ हो और अभी तुम्हारी उम्र भी कितनी है….?”

“पगली, मौत क्या किसी की उम्र देखकर उसे ले जाती है? फिर आज मैं स्वस्थ हूं, लेकिन कल का क्या भरोसा?” मां के कहते ही मैंने बीच में टोक दिया. “अब ये बातें बंद करो, तुम्हें कुछ नहीं होनेवाला.”

कुछ देर मैं ज़रूर परेशान रही, लेकिन धीरे-धीरे उस बात को भूलने का प्रयास करने लगी. ख़ैर, व़क़्त अपनी गति से चलता रहा. छ: महीने बीत गये और मैं मां की बात पूरी तरह से भूल  चुकी थी.

उस दिन भाभी का फ़ोन आया. कुशलक्षेम आदान-प्रदान के बाद उन्होंने बताया कि मां का एक गुर्दा ख़राब होकर पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है. बेशक यह ख़बर भारी मानसिक तनाव देने वाली थी, लेकिन भाभी ने काफ़ी धीरज बंधाया तथा कहा कि इंसान एक गुर्दे के सहारे भी मज़े से जी सकता है, इसलिए मैं व्यर्थ तनाव न पालूं. लेकिन मेरा मन काफ़ी बेचैन था, अत: मैं दो-चार दिनों के लिए मां से मिलने चली गई. मां शारीरिक रूप से तो अस्वस्थ नहीं लग रही थीं, लेकिन मानसिक रूप से तनावग्रस्त थीं. यह स्वाभाविक भी था. जब मैंने उन्हें बताया कि मेरी सहेली के पिताजी पिछले 25 वर्षों से एक गुर्दे के सहारे सहज जीवन जी रहे हैं, तो वे कुछ आश्‍वस्त हुईं. दो-चार दिनों के बाद मैं लौट आई. तब तक मां अपनी बीमारी को जीवन का एक हिस्सा मानकर सहज होने लगी थीं.

कुछ माह बाद ही मां के दूसरे गुर्दे में सूजन आ गई तो परिवार में चिंता का माहौल बन गया. बेशक यह बात मुझे कुछ विलंब से बताई गई थी, लेकिन फिर भी मैं मां से मिलने चली गई, साथ में पति भी थे. इस बार परिवार के सभी सदस्य तनावग्रस्त थे. संपूर्ण जांच-परीक्षण, दवाओं के बावजूद मां का गुर्दा केवल पचास प्रतिशत कार्य कर रहा था. फलस्वरूप शरीर में दूसरी बाधाएं आने की संभावना बढ़ गई थी. दो-तीन दिन रहकर हम लौट आए थे, लेकिन ध्यान तो उधर ही था. फ़ोन पर लगभग रोज़ाना ही भाभी से बात कर मां के स्वास्थ्य के बारे में पूछ लेती थी. उन्होंने बताया था कि हाल स्थिर है तथा दवाएं चालू हैं.

स्टेशन आ गया था और मैं भी अतीत की गलियों से निकलकर वर्तमान में लौट आई थी. घर पहुंची तो देखा, बरामदे में कुछ लोग बैठे थे. सामने मां की तस्वीर पर ताज़ा फूलों का हार चढ़ा था. अगरबत्ती की महक पूरे वातावरण में फैली हुई थी. तस्वीर में मां मुस्कुरा रही थीं. मैं स्वयं पर नियंत्रण खो बैठी, भाभी के गले लग कर बुक्का फाड़कर रोने लगी. कुछ शांत होने पर भैया से शिकायत की, “आपने मुझे इतना ग़ैर समझ लिया कि दूसरे दिन ख़बर की. मां के अंतिम दर्शन भी नहीं करने दिए. कभी कोई ऐसे भी करता है?”

“विनी, मैं मजबूर था…” भैया ने मेरे सिर पर सांत्वना भरा हाथ रखा. फिर भीतर के कमरे में ले गये जहां मां की वही तस्वीर, जो बाहर रखी थी छोटे आकार में दीवार पर टंगी थी.

“पंद्रह दिन पहले मां का दूसरा गुर्दा भी फेल हो गया था. उन्हें डायलिसिस पर रखा जा रहा था. वे बेहद कमज़ोर हो गई थीं. उनका रंग भी काला पड़ने लगा था. उन्हें पता लग चुका था कि अब वे कुछ ही दिनों की मेहमान हैं. एक दिन वे मुझसे बोलीं, “मैं चाहती हूं कि मेरी मौत के बाद विनी को ख़बर न किया जाए. मेरा मरा मुंह, निर्जीव शरीर देख वह रोए-चीखे व विलाप करेगी और मैं निष्ठुर बनी कुछ नहीं सुन-देख पाऊंगी, यह सोचकर ही मुझे घबराहट व तनाव होने लगता है. अंतिम संस्कार के बाद ही उसे सूचित करना. मैं चाहती हूं, वह मेरा हमेशा हंसता-बोलता व मुस्कुराता चेहरा ही याद रखे. वह बड़ी संवेदनशील है. पता नहीं मौत के बाद मेरे चेहरे, शरीर की क्या दशा होगी. अगर उसने देख लिया तो सदा उसी को याद कर तनावग्रस्त रहेगी. तुम्हें अटपटा ज़रूर लगेगा, लेकिन मेरी यही अंतिम इच्छा है.” और विनी, सचमुच मां के चेहरे की स्थिति इस कदर बिगड़ गई थी कि शव का दो-तीन घंटे के भीतर ही दाह संस्कार करना पड़ा. अब तुम्हीं बताओ मैं क्या करता?” भैया की आंखों में नमी तैर आई थी.

भैया के प्रति शिकायत के जो भाव मेरे मन में पैदा हुए थे, वे तिरोहित होने लगे थे… और मां की दूरदर्शिता के आगे मैं नतमस्तक हो गई थी.

Narendra Kaur Chhabra

नरेंद्र कौर छाबड़ा

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कहानी- स्पृहा (Short Story- Spriha)

एक स्त्री होकर भी दूसरी स्त्री को जो अतीत में इतने दुख सहकर बाहर आई है, उसे प्यार से वंचित रखा जाए? एक अविवाहित, कम उम्र की लड़की अगर उसकी बहू बनकर घर में आए और वह घर में किसी को भी स्नेह व सम्मान ना दे, तो क्या कर लेगी माधवी… क्या इंसान के गुण व स्वभाव को उम्र और सामाजिक स्थिति के पैमानों पर बांटना उचित है? नहीं, कदापि नहीं!

Short Story in Hindi

सिरदर्द होना तो अब आम बात ही थी. यह तो माधवी का आजकल हर महीने का कष्ट बन गया था. पिछले चार महीनों से पीरियड से पहले एक दिन इतना तेज़ सिरदर्द होता है कि पेनकिलर टैबलेट लेने से भी आराम नहीं मिलता. आजकल यह सिरदर्द ही जैसे बताने लगा है कि कल पीरियड होगा.

वैसे स्त्री तन-मन हर स्थिति में स्वयं को संभाल लेना जानती ही है, सो माधवी भी समझ गई कि आज वह कुछ भी कर ले, यह सिरदर्द रात तक रहेगा. फिर कल उसे पीरियड हो जाने पर सिरदर्द भी महीनेभर के लिए गायब रहेगा.

एक दिन माधवी की ख़ास दोस्त नीरजा ने भी उसे बताया था कि मेनोपॉज़ के समय कई तरह के बदलाव होते हैं. उसमें मानसिक व शारीरिक परेशानियां भी होती हैं. वो भी इस स्थिति से गुज़र चुकी है.

पूरा दिन माधवी का ना कुछ खाने का मन करता है, ना कुछ करने का. किसी से बात करने की इच्छा भी नहीं होती. माधवी ने किसी तरह सुबह अपने पति तन्मय और बेटी तन्वी का टिफिन तो बना दिया था, पर ख़ुद ज़रा भी खाने की इच्छा नहीं हुई थी. दोनों ‘आराम कर लो’ कहते हुए ऑफिस चले गए थे. बेटा गौरव ऑफिस की मीटिंग के सिलसिले में कोलकाता गया हुआ है, एक हफ़्ते में आएगा.

दोपहर के दो बज रहे थे, पर माधवी की हिम्मत नहीं हुई कि उठकर किचन तक जाए और अपना खाना ले ले. सिर की नसें फट रही थीं. नाश्ता भी ठीक से नहीं किया था, तो अब पेट खाली था. एसिडिटी हो रही थी. इतने में पास रखा मोबाइल वाइब्रेट होने लगा. उसने फोन साइलेंट पर रखा हुआ था, पर वाइब्रेशन महसूस हुआ. देखा, स्पृहा का फोन था. नहीं, उसे फोन नहीं उठाना है. वही मीठी-मीठी बातें, “मम्मी, आप कैसी हैं? खाना खा लिया है ना… कुछ काम तो नहीं है ना…”

सिर को दुपट्टे में बांधे-बांधे माधवी स्पृहा के बारे में सोचने लगी. उसके बेटे गौरव की गर्लफ्रेंड है स्पृहा. गौरव से पांच साल बड़ी. माधवी को अपने बेटे और इस लड़की की उम्र का यह फ़र्क़ मन ही मन बहुत कचोटता है. उसका मन कई बार झुंझलाहट से भर उठता है और इसका कारण उम्र ही नहीं, स्पृहा का तलाक़शुदा होना भी है.

गौरव को स्पृहा दोस्तों के फंक्शन में मिली थी. गौरव ने बताया है कि स्पृहा घरेलू हिंसा की शिकार भी रही है. इसके पिता की संपत्ति के लालच में इसे ससुराल में ख़ूब मारा-पीटा जाता था. एक दिन वो सब छोड़कर मायके आ गई थी. बहुत लंबे समय डिप्रेशन में रही है. अब थोड़ा सामान्य हुई है.

माधवी जानती है कि गौरव के दिल में स्पृहा के लिए बहुत अधिक प्यार व सहानुभूति है. तन्मय और तन्वी भी स्पृहा को पसंद करते हैं. माधवी ने अपने मुंह से तो कभी कुछ नहीं कहा, पर तलाक़शुदा व उम्र में बड़ी लड़की अपने बेटे के लिए उसे नहीं जंच रही थी. वैसे जब भी स्पृहा घर में आती है, घर चहकने लगता है. वैसे तो माधवी ने अपने बेटे के लिए जैसी लड़की के सपने देखे थे, स्पृहा उन सभी पैमानों पर फिट बैठती है, पर बेटे के लिए उम्र में बड़ी और तलाक़शुदा लड़की के सपने थोड़े ही देखे थे! कौन मां देखती है? देखने में सुंदर, मेहनती, एक्टिव, उच्च शिक्षित, मॉडर्न, बड़ों को सम्मान और छोटों को ख़ूब स्नेह देनेवाली स्पृहा, जब माधवी से बात करती है, तो माधवी भूल जाती है मन की कसक.

स्पृहा की हर बात माधवी मंत्रमुग्ध होकर सुनती है. कितनी ज्ञानभरी बातें करती है. माधवी के पढ़ने के शौक़ को ध्यान में रखते हुए वही तो उन्हें किताबों की दुनिया में ले जाती है. हर बात घर में सबका ध्यान रखते हुए करती है. मजाल है कभी किसी को उसकी कोई बात नागवार गुज़री हो.

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माधवी ने कसमसाकर करवट बदली. भूख तो लगी थी, पर सुबह जो तन्मय और तन्वी के लिए खाना बना था, छोले और आलू गोभी, ज़रा भी खाने का मन नहीं था. बस, खिचड़ी खाने का मन कर रहा है जीरे और हींग से छौंकी गई हल्की-सी सादी पतली खिचड़ी, जैसे मां बनाती थीं.

माधवी की आंखों के कोरों से आंसू ढलक गए. कौन बनाकर देगा अब खिचड़ी? कोई भी तो नहीं… कौन है ऐसा? पिछले महीने भी तो इस सिरदर्द में यही खिचड़ी खाने का मन किया था. सोचा था अगले महीने अपने लिए पहले ही बनाकर रख लेगी, पर कहां अपने लिए अलग से कुछ बनाने की हिम्मत होती है. तबीयत ख़राब होने पर चार चीज़ें तो नहीं बन सकतीं ना. वो वही तो बनाती है, जो सबको खाना होता है.

उसे याद आया कुछ महीने पहले भी सिरदर्द के समय तन्वी घर पर थी. माधवी की खिचड़ी खाने की इच्छा को देखते हुए तन्वी ने कहा था, “मां, खिचड़ी कौन-सी बड़ी चीज़ है. अभी ऑर्डर कर देती हूं. आजकल सब तो मिल जाता है.” माधवी हैरान हुई थी.

“खिचड़ी भी ऑर्डर करोगी अब?”

“हां मां, आज वीकेंड है. मैं तो आराम के मूड में हूं. पापा और गौरव को तो बनाना आता नहीं है. हम अपने लिए कुछ और ऑर्डर कर लेंगे. आपके लिए खिचड़ी, ठीक है?” माधवी ने यूं ही बस सिर हिला दिया था. तीनों के लिए पिज़्ज़ा और उसके लिए खिचड़ी आ गई थी. अच्छी थी, पर मन में कुछ चटक ज़रूर गया था. जब स्पृहा अचानक आ गई थी और बोली थी, “अरे, मुझे फोन क्यों नहीं किया? मैं आकर खिचड़ी बना देती. मां को तो पहले से ही ठीक नहीं लग रहा है, उस पर बाहर की खिचड़ी…” स्पृहा का चेहरा उतर गया था.

तन्वी से कहा था, “मुझे फोन क्यों नहीं किया?”

माधवी ने स्वभाववश बात संभाल ली थी. धीरे-से अकेले में कहा था कि आजकल यह सिरदर्द तो हर महीने पीरियड से एक दिन पहले हो रहा है. यूं ही खिचड़ी खाने का मन हो आता है. बहुत हल्का ही खाने की इच्छा रहती है. कोई बात नहीं, अच्छी थी. खा ली.

माधवी के लिए स्पृहा का इतना चिंता करना भी कुछ ख़ास मायने नहीं रख पाता है. कारण वही कि बेटे के लिए उसी की कोई हमउम्र लड़की होती तो अच्छा रहता. रह-रहकर माधवी का फोन बजता रहा था. हर बार वाइब्रेशन होने पर माधवी ने देखा, स्पृहा ही थी. मन नहीं है बात करने का. नहीं उठाया, पर ऐसी एक नहीं, कई बातें माधवी को लेटे-लेटे याद आ रही थीं, जब स्पृहा ने घर की हर छोटी से छोटी बात की चिंता की थी. कभी माधवी कपड़े सुखाने के लिए बालकनी में होती है, तो चुपचाप उसके हाथ से कपड़े लेकर सुखाने लगती है स्पृहा. कभी किचन में बर्तन पोंछ रही होती है, तो दूसरा कपड़ा लेकर वह भी पोंछने लग जाती है. कभी सबके साथ खा रही होती है, तो बाकी तीनों तो अपनी प्लेट सिंक तक रखकर छुट्टी करते हैं. स्पृहा ही पूरा टेबल साफ़ करवाती है. सब डोंगे, बर्तन वही किचन तक ले जाती है. टेबल साफ़ करती है. कोई और कहां ध्यान देता है इतनी छोटी-छोटी बात पर… माधवी से स्पृहा की एक भी हरकत छुप नहीं पाती है. वह उसे पसंद करती है. प्यार भी करती है, पर उम्र और तलाक़ की बात पर माधवी के मन की सुई अटक जाती है.

वह बस आगे नहीं सोच पाती है. गौरव ने उसे स्पृहा की पूर्व विवाहित जीवन की शारीरिक और मानसिक यंत्रणा के बारे में बताया हुआ है. एक स्त्री होने के नाते उसे पूरी तरह सहानुभूति है स्पृहा के साथ, पर कुछ तो है ना, जो खटकता है माधवी के निश्छल मन को भी.

अचानक डोरबेल बजी. माधवी ने टाइम देखा पौने तीन बज रहे थे. उसने दोपहर से कुछ खाया ही नहीं था अभी तक. दरवाज़ा खोलूं या नहीं… किसी फ्रेंड से मिलने की ना तो इच्छा थी, ना हिम्मत. देखना तो पड़ेगा ही. कहीं कोई कुरियर हो… माधवी बेड से उठी. सिर की नसें जैसे फटने को थीं. आंखें आंसुओं से धुंधला गईं और जैसे ही मुंह से ‘ओह! मां’ निकला रोना आ गया. अब कहां कोई था मायके में… वह अकेली ही तो संतान थी. माता-पिता इस दुनिया से विदा ले ही चुके थे. जाकर दरवाज़ा खोला. मई की गर्मी में पसीने से तरबतर स्पृहा खड़ी थी.

“अरे! तुम? इस समय इतनी धूप में? क्या हुआ? ऑफिस नहीं गई क्या?” तेज़ी से अंदर आते हुए स्पृहा हमेशा की तरह पहले माधवी के गले लगी.

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“आपने फोन नहीं उठाया, तो बड़ी चिंता हुई. व्हाट्सएप पर भी आप सुबह से ऑनलाइन नहीं हैं. पापा, गौरव और तन्वी से भी पूछा, तो उन्होंने बताया कि आज आपको सुबह से सिरदर्द है. मां, आपने कुछ खाया?” माधवी ने ना में सिर हिलाया.

“ओह! मुझे अंदाज़ा था. आपने बताया था ना आपको आजकल भयंकर सिरदर्द हो रहा है.”

फिर अपने बैग से एक टिफिन निकालकर बोली, “यह खाइए आपके लिए खिचड़ी बनाकर लाई हूं.” फिर किचन में जाकर एक प्लेट में खिचड़ी निकाली. फ्रिज से दही भी अपने आप निकाल ली. डाइनिंग टेबल पर रखते हुए बोली, “आइए मां, खिचड़ी  खा लीजिए.”

माधवी चेयर पर बैठकर बोली, “तुमने इतनी तकलीफ़ क्यों की? इतनी गर्मी है बाहर.”

“अरे मां, आपकी चिंता हो रही थी. आजकल आप बहुत लो भी महसूस करती रहती हैं ना.” माधवी की आंखें छलछला उठीं. हद से ज़्यादा सिरदर्द और उस पर स्पृहा का स्नेहिल स्वर सुनकर ही दिल भर आया. स्पृहा किचन में गई और एक कटोरी में तेल गर्म करके ले आई. घर की हर चीज़ कहां है, उसे पता है.

माधवी को स्पृहा के हाथ की खिचड़ी इतनी अच्छी लगी थी कि पेट भरकर खा ली, पर मन नहीं भरा था. मां के हाथ जैसा ही स्वाद था खिचड़ी में. यह लड़की तो सब कुछ जानती है. आजकल यही तो मन होता है कि कोई तकलीफ़ में बस इतना कर दे, पर कहां हो पाता है ये सब. तन्वी से मन ही मन उम्मीद करती है माधवी. बेटी है, पर उसका मन ही नहीं होता किचन में कुछ भी करने का. फिर अपना ख़्याल किसी से कहलवाकर थोड़े ही रखा जाता है, कोई ख़ुद रखे तो बात है.

माधवी प्लेट किचन में रखने जाने लगी, तो स्पृहा ने हाथ से ले ली. उसे उठने ही नहीं दिया. उसके सिर पर हाथ रखते हुए बोली, “बस, आप बैठिए मां, मैं ज़रा सिर में तेल लगा देती हूं. आपको आराम मिलेगा.” माधवी स्पृहा के स्नेह के जादू में घिरी वापस चेयर पर बैठ गई.

स्पृहा ने गुनगुना तेल सिर में लगाना शुरू किया. बालों की जड़ों तक हाथों के दबाव से माधवी को इतना आराम मिला कि उसका मन हुआ कि स्पृहा से लिपटकर रो पड़े. उसने अपनी सिसकियों पर काबू रखने की कोशिश की, पर आंसू गालों पर ढुलक ही आए. माधवी नहीं चाहती थी कि स्पृहा जाने कि वह रो रही है, पर जैसे ही उसने धीरे-से अपने आंसुओं को पोंछने के लिए हाथ उठाया, स्पृहा बोल पड़ी, “क्या मां, आप रो रही हैं?” अब माधवी रो ही पड़ी.

“बहुत दर्द है? अभी आराम हो जाएगा मां.”

जैसे-जैसे माधवी के दिल को एक सुकून पहुंच रहा था. उसका दिल चीख-चीखकर जैसे उसे उलाहना दे रहा था कि वह जिन कारणों से अपने दिल में स्पृहा जैसी लड़की के गुणों को नज़रअंदाज़ कर रही थी, क्या वे कारण इतने बड़े हैं?

क्या एक स्त्री होकर भी दूसरी स्त्री को, जो अतीत में इतने दुख सहकर बाहर आई है, प्यार से वंचित रखना ठीक है? एक अविवाहित, कम उम्र की लड़की अगर उसकी बहू बनकर घर में आए और वह घर में किसी को भी स्नेह व सम्मान ना दे, तो क्या कर लेगी माधवी… क्या इंसान के गुण व स्वभाव को उम्र और सामाजिक स्थिति के पैमानों पर बांटना उचित है? नहीं, कदापि नहीं!

माधवी को लगा जैसे उसके सिर से बड़ा बोझ हट गया है. मन फूल-सा हल्का हुआ, तो इस स्पृहा पर ढेर सारा प्यार आ गया. उसने स्पृहा के तेल लगे हाथ चूम लिए और कहा, “बस कर,  अब बहुत आराम है.”

“सच मां?” ख़ुशी से स्पृहा की आंखें चमक उठीं. बोली, “अब आपके लिए एक कप चाय बना दूं.”

“मैं बना लूंगी. तुम बैठो. तुम भी पीकर जाना.”

“नहीं, मैं ऑफिस भागती हूं, ज़रूरी काम है कहकर निकली हूं ऑफिस से. आज शाम को बहुत ज़रूरी मीटिंग है. आप अपना ध्यान रखना. बस, आपको देखने ही भागकर आई थी. आपकी तबीयत पता चली थी, तो काम में मन नहीं लग रहा था.” कहते-कहते उसने हाथ धोकर अपना बैग उठाया. बाहर की धूप से बचने के लिए स्कार्फ बांधा और हमेशा की तरह उसके गले लगकर ‘बाय मां’ कहकर झटपट सीढ़ियां उतर गई.

माधवी ने दरवाज़ा बंद किया. वह जैसे किसी और ही दुनिया में पहुंच गई थी, जहां उसके हृदय में स्पृहा के लिए स्नेह ही स्नेह था और कुछ भी नहीं. वह मन ही मन स्पृहा को हमेशा के लिए इस घर में लाने के लिए उसके माता-पिता से मिलने को उत्सुक हो उठी थी.

Poonam ahmed

   पूनम अहमद

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कहानी- वैदेही (Short Story- Vaidehi)

Short Story in Hindi

तभी वैदेही ने अपनी मां की आवाज़ सुनी, “हम अपने बेटों के भविष्य की इतनी चिंता क्यों करते हैं कि बेटियों का भविष्य ही बर्बाद हो जाता है? क्या बेटियां हमारी कोखजाई नहीं होतीं? इनका भविष्य भी सुधारना है, यह बात समझने में हम इतनी देर क्यों लगा देते हैं?”

“हमेशा से हम अपने बेटों को अपनी प्रतिछाया समझ उन पर ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही भरोसा करते हैं. हमारा विश्‍वास होता है कि वे हमारे अधूरे कामों को पूरा करेंगे. यहीं पर हम शायद सबसे बड़ी ग़लती करते हैं, जो ल़ड़कों को लड़कियों से अलग समझ उन पर अधिक भरोसा करने लगते हैं.”

वैदेही के जीवन का एकमात्र लक्ष्य था- डॉक्टर बनना. बचपन से ही हॉस्पिटल में स़फेद कोट पहने यहां-वहां आते-जाते और काम करते डॉक्टरों को देख वह बेहद प्रभावित होती थी. तभी से उसने ठान रखा था कि चाहे जितनी मेहनत करनी पड़े, लेकिन बनेगी वह डॉक्टर ही. वैसे भी पढ़ाई में वह शुरू से ही काफ़ी कुशाग्र थी और मेहनत करने से भी पीछे नहीं हटती थी. कभी-कभी तो रात भर उसके कमरे की बत्तियां जलती रहतीं और वह अपनी पढ़ाई पूरी करने में जुटी रहती. उसकी पढ़ाई की इस ऱफ़्तार और अपने स्वास्थ्य के प्रति उसकी बढ़ती लापरवाही को देख

अक्सर उसकी मां समय पर उसे सोने और खाने के लिए डांटती रहती. उसकी बड़ी भाभी भी गाहे-बगाहे जब बिजली का बिल ज़्यादा आता तो उसे कुछ-न-कुछ सुना ही देती, लेकिन उस पर किसी बात का कोई असर न होता.

सभी बातों से बेअसर वैदेही पूरी लगन से पढ़ाई में जुटी रहती और हमेशा अपनी क्लास में प्रथम स्थान प्राप्त करती. बारहवीं की परीक्षा पास करते ही वह मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी में जुट गयी थी. उस कस्बानुमा शहर में जहां लड़कों की पढ़ाई के लिए कोई अच्छी सुविधा नहीं थी, वहां लड़कियों के लिए पढ़ाई-लिखाई और भी चुनौती भरी थी. फिर भी वैदेही स़िर्फ मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में चुनी ही नहीं गई, बल्कि लड़कियों की योग्यता सूची में उसका नाम सबसे ऊपर था.

उसकी सफलता ने स़िर्फ उसे ही नहीं, उसके मम्मी-पापा को भी ख़ुशी से आह्लादित कर दिया था. पहली बार उसकी सफलता से ख़ुश हो उसके पापा सुमंत बाबू ने बढ़कर उसका माथा चूम लिया था और मम्मी तो उसे गले से लगाकर ख़ुशी से रो ही पड़ी थी. हमेशा तानों-उलाहनों की आदी वैदेही मम्मी और पापा के बेशुमार प्यार को देखकर भरपूर उत्साह के साथ अख़बार थामे भागती जा पहुंची थी बड़े भैया के पास.

कहीं जाने के लिए तैयार भैया और भाभी के सामने अख़बार फैलाकर वो उनकी तरफ़ से मिलनेवाले प्रशंसात्मक शब्दों का इंतज़ार करने लगी. लेकिन भैया और भाभी के चेहरे पर बस हल्की-सी मुस्कुराहट फैल कर रह गई थी. जिस प्रशंसा का इंतज़ार उसका दिल कर रहा था, वह करता ही रह गया. जल्द ही भैया का चेहरा सपाट हो गया. न ख़ुशी, न ग़म. अख़बार लौटाते हुए बोले, “ठीक है, इसे रखो. आकर बात करता हूं.” फिर दोनों बाहर चले गए.

देर रात तक वैदेही इंतज़ार करती रही भैया के लौटने का. उसके भैया और भाभी देर रात लौटे भी तो अपने कमरे में जा घुसे और वह ठगी-सी अपने कमरे में खड़ी रह गई. भैया के इस बेरूख़े रूप की तो उसने कल्पना भी न की थी. प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक पद के अवकाश प्राप्त उसके पापा ने उसकी पढ़ाई से लेकर शादी तक की सारी ज़िम्मेदारियां अपने तीनों बेटों को ही सौंप रखी थी, क्योंकि अपनी सारी ज़िंदगी की कमाई तो वे पहले ही अपने तीनों बेटों को पढ़ा-लिखाकर अच्छी नौकरी प्राप्त करने में ख़र्च कर चुके थे.

दूसरे दिन सुबह-सुबह भैया और उसके पापा के बीच बहस हो रही थी.

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“पापा, आप समझ क्यों नहीं रहे हैं? स़िर्फ पचास हज़ार रुपयों की बात नहीं है. अभी नामांकन में इतने पैसे लगेंगे, उसके बाद भी पढ़ाई में लाखों रुपए ख़र्च होंगे. लड़की है- पराया धन. कल को उसकी शादी करनी होगी तो दहेज के लिए भी तो रकम जुटाना होगा. इतने पैसे कहां से आएंगे. आप थोड़ी समझदारी से काम लीजिए. उसका मेडिकल कॉलेज में एडमिशन करवाने के बदले उन्हीं पैसों से उसकी शादी करवाने की सोचिए.”

“कैसी बातें करते हो ज्ञान? वैदेही का दिल टूट जाएगा. उसके सारे सपने बिखर जाएंगे. मेरा तुम तीनों भाइयों से यही अनुरोध है कि उसकी शादी मत करवाना, लेकिन उसे पढ़ाकर डॉक्टर बना दो.”

सुमंत बाबू की आवाज़ गिड़गिड़ाने की हद तक कातर हो आई थी. लेकिन बड़े भैया अपने फैसले पर अड़े रहे.

तब सुमंत बाबू ने तीनों बेटों को एक साथ बुलाकर बातचीत की, पर नतीज़ा वही ढाक के तीन पात रहा. और किसी बात पर तीनों भाइयों की राय शायद ही कभी एक रही हो, लेकिन वैदेही की पढ़ाई को लेकर सभी भाई एकमत थे. फिर सुमंत बाबू ने किसी बेटे के सामने अपनी झोली नहीं फैलाई. स़िर्फ इतना ही बोले, “तुम तीनों भाइयों को पढ़ाने और योग्य बनाने में मैंने अपनी सारी ज़िंदगी की कमाई होम कर दी. अपने बुढ़ापे तक का नहीं सोचा और तुम मिलकर मेरी एकमात्र बची ज़िम्मेदारी को निभाने से कतरा रहे हो. एक बात और जान लो. वैदेही स़िर्फ मेरी ज़िम्मेदारी ही नहीं है, बल्कि तुम सभी की तरह वह भी मेरे वजूद का एक हिस्सा है. आज अपना सुख तलाशते-तलाशते तुम सभी की सोच इतनी छोटी हो गई है कि बिना बंटवारा किए ही तुम सभी के दिल बंट चुके हैं. तुम लोगों की नज़र में स़िर्फ पत्नी और अपने बच्चे ही प्यार के रिश्ते रह गए हैं. जिस बहन के साथ खेलकर-लड़कर बड़े हुए हो, उसके साथ भी कच्चे-धागे से बंधा एक प्यार का रिश्ता ही था, लेकिन बड़ी आसानी से तुम सभी ने उस रिश्ते से किनारा कर लिया.”

फिर थोड़ा रुककर बोले, “ख़ैर, मैं पिता हूं, तुम सभी के लिए बुरा सोच भी नहीं सकता, फिर भी यह तो नहीं भूला जा सकता कि अभी से अपने बच्चों के लिए कई-कई ट्यूशन लगाने वाले मेरे बेटों पर अपनी बहन की पढ़ाई पर ख़र्च होनेवाला बिजली का बिल भी भारी पड़ रहा है. आज से मैं तुम लोगों को उसकी शादी की ज़िम्मेदारी से भी मुक्त करता हूं. जिस दिन वह अपने जीवन का लक्ष्य पा लेगी, उसकी मानसिकता के अनुरूप उसकी शादी भी करवा दूंगा. स़िर्फ खाता-पीता परिवार देखकर उसकी शादी नहीं करवाऊंगा.”

बोलते-बोलते सुमंत बाबू का गला भर्रा गया. उसके बाद कई दिनों तक वे पैसों के इंतज़ाम करने के लिए इधर-उधर भटकते रहे, लेकिन पैसों का इंतज़ाम न हो सका. जैसे-जैसे नामांकन के लिए निर्धारित अंतिम तारीख़ नज़दीक आ रही थी, सुमंत बाबू की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी.

नामांकन भरने की अंतिम तारीख़ से एक दिन पहले तक भी सुमंत बाबू पैसों का इंतज़ाम न कर पाए. वैदेही की पीड़ा असहनीय हो गई थी. वह एकांत में फूट-फूटकर रो पड़ी. बचपन से एक ही तो सपना देखा था उसने. डॉक्टर बनने का और वही सपना यूं हथेली पर आकर फिसल जाएगा, इसकी तो उसने कभी कल्पना भी न की थी. अपनी मनोव्यथा को कम करने के लिए वो बरामदे में आ बैठी थी.

वहीं बरामदे में सुमंत बाबू भी आरामकुर्सी पर अधलेटे से पड़े थे. अपनी असमर्थता और लाचारी ने उन्हें पूरी तरह तोड़ दिया था. जैसे ही घड़ी ने बारह का घंटा बजाया, उनकी बंद आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा. पास ही खाट पर लेटी उसकी मां ने अपना चेहरा आंचल से ढंक रखा था. शायद उन्हें अपनी मजबूरी और आंसुओं को छिपाने के लिए आंचल से अच्छा कुछ और नहीं मिला था.

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तभी वैदेही ने अपनी मां की आवाज़ सुनी, “हम अपने बेटों के भविष्य की इतनी चिंता क्यों करते हैं कि बेटियों का भविष्य ही बर्बाद हो जाता है? क्या बेटियां हमारी कोखजाई नहीं होतीं? इनका भविष्य भी सुधारना है, यह बात समझने में हम इतनी देर क्यों लगा देते हैं?”

“हमेशा से हम अपने बेटों को अपनी प्रतिछाया समझ उन पर ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही भरोसा करते हैं. हमारा विश्‍वास होता है कि वे हमारे अधूरे कामों को पूरा करेंगे. यहीं पर हम शायद सबसे बड़ी ग़लती करते हैं, जो ल़ड़कों को लड़कियों से अलग समझ उन पर अधिक भरोसा करने लगते हैं.

वे भी क्या करें. उनकी ज़रूरत और दिखावे उनकी कमाई से ज़्यादा हो गए हैं. वे भी विवश हैं. यह सोचकर कि कहीं इस आधुनिकता के स्वार्थपूर्ण दौड़ में पिछड़ न जाएं, इसी अंधी दौड़  ने हमारे बच्चों को उत्तरदायित्व शून्य बना दिया है. वे समझते हैं कि हमने जो उनके लिए किया, जो दुख-तकली़फें सही, वह हमारा कर्त्तव्य था, त्याग नहीं. इसलिए वे वैदेही का दायित्व लेने से कतरा रहे हैं. उनकी इसी सोच की वजह से मैंने उन्हें हर उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया है.”

मम्मी एक गहरा निःश्‍वास खींच चुप हो गई थी. मम्मी-पापा के मन का बढ़ता सूनापन और यूं टूट-टूटकर बिखरना वैदेही को असहनीय हो रहा था. वह तड़पकर पापा के पास आ गई.

“पापा, आप क्यों उदास हैं? आपको शायद पता नहीं कि मैंने अपना फैसला बदल दिया है. मुझे डॉक्टर नहीं बनना है, अब मैं प्रशासनिक सेवा में जाऊंगी. मैंने तो इस परीक्षा की तैयारी के लिए कुछ क़िताबें भी ख़रीद ली हैं. स्नातक करने के साथ ही मैं आपको आईएएस अधिकारी बनकर दिखाऊंगी.” उसकी आवाज़ की दृढ़ता ने सुमंत बाबू को चौंका दिया, लेकिन आश्‍वस्त नहीं कर पाई.

अपने वायदे के मुताबिक वैदेही स्नातक करने के बाद दूसरे साल ही प्रतियोगी परीक्षा में सफल हो आईएएस अधिकारी बन गई थी. जिस दिन परीक्षाफल आया था, वह ख़ुद ही अपनी सफलता पर अचंभित रह गई थी. हाथों में परीक्षाफल फड़फड़ा रहा था, लेकिन उसे फिर भी विश्‍वास नहीं हो रहा था कि वह इतनी बड़ी सफलता हासिल कर चुकी है. उसकी सफलता ने स्वयं उसे ही चमत्कृत कर दिया था.

जैसे ही उसने परीक्षाफल पापा के हाथों में पक़ड़ाया, देखते ही उनकी आंखों में गर्व, हैरानी और प्रसन्नता के भाव एक साथ छलक आए थे.

“आज तुमने मेरा सीना गर्व से…” उनके आगे के बोल अवरुद्ध गले और डबडबाई आंखों में डूब कर रह गए थे. सारी ज़िंदगी सर उठाकर जीनेवाले उसके पापा की अपनी ही मजबूरी ने उम्र के तीसरे पड़ाव पर उन्हें काफ़ी कमज़ोर बना दिया था. लेकिन अपने पापा और मम्मी की ख़ुशी देख वैदेही की आत्मा तृप्त हो गई थी.

आज वैदेही को अपने-पराए सभी बधाइयां दे रहे थे. उसके भाई-भाभियां भी काफ़ी ख़ुश थे. पर उससे नज़रें नहीं मिला पा रहे थे. अपनी बहन के प्रति अपना फज़र्र् पूरा न कर पाने का अपराधबोध उन्हें साल रहा था. वहीं सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुंचकर वैदेही के दिल में अब तक भाइयों के प्रति पलता विद्रोह और पराएपन की भावना जाने कहां तिरोहित हो गई थी. अचानक ही उसे सब कुछ अच्छा और अपना लगने लगा था और पिछली सारी बातें भुलाकर पहले की तरह ही वो अपने भाई और भाभियों से आशीर्वाद लेने जा पहुंची थी. वैदेही के इस एक क़दम ने कई वर्षों से बहन-भाइयों के बीच आए फ़ासले को मिटा दिया. वैदेही ने भले ही भाइयों के स्वार्थपरता को भुला दिया, लेकिन उसके बहुत कोशिश करने के बावजूद उसके माता-पिता अपने बेटों को कभी माफ़ नहीं कर पाए थे.

अकस्मात् घर में आई ढेर सारी ख़ुशियों ने घर का माहौल ही बदल दिया था, जिसके बीच यह कोई नहीं जान सका कि वैदेही के जीवन में डॉक्टर बनने की सबसे बड़ी अभिलाषा के राख से उत्पन्न चिंगारी ने भले ही उसे सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुंचा दिया था, लेकिन वह एक बदले की भावना से उत्पन्न संकल्प मात्र था- पैसा, ताक़त, हिम्मत और ऊंचाई प्राप्त करने के लिए.

वैदेही को आज भी सपने आते हैं कि वह मेडिकल प्रवेश परीक्षा दे रही है. कभी देखती मेडिकल कॉलेज जानेवाली बस छूट गई है. जब नींद खुलती, वह मन ही मन संकल्प करती कि इस घर की कोई लड़की, चाहे उसकी बेटी हो या भतीजी वह उनके सपनों को कभी राख नहीं होने देगी, क्योंकि उनके सपनों को संरक्षित करने के  लिए वैदेही ख़ुद समर्थ हो गई थी.

Rita kumari

       रीता कुमारी

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कहानी- सतरंगी अरमानों की उड़ान (Short Story- Satrangi Armano Ki Udan)

Short Story in Hindi

“अलग-अलग भूमिकाओं में अपने को ढालना बांटना नहीं होता, बल्कि अपने वजूद को और मज़बूत बनाना होता है. मुझे ख़ुशी है कि तुमने सुख और संतोष के बीज अपने परिवार में अंकुरित किए हुए हैं. एक बार अपने दिल के दरवाज़े को खोलकर होंठों तक गीतों को आने दो, फिर देखना कैसे वे थिरकेंगे. हमारा प्यार जितना सच है, उतना ही सच तुम्हारा परिवार भी है.”

उसका आना वैसा ही होता था, जैसे गर्मियों में मीठी बयार का बहना, जैसे सर्दियों में खिली चटकती धूप. उसके आने से कमल के पत्ते पर बिछी ओस सचमुच मोती के मानिंद लगने लगती थी. पत्ता-पत्ता, फूल-फूल खिल उठते थे, रसपान करने के लिए भंवरे मंडराने लगते थे और तितलियां अपने रंग-बिरंगे पंखों का आंचल ओढ़े

यहां-वहां इठलाने लगती थीं. सतरंगी अरमानों को उड़ान देती एक गुनगुनाती बहार अपने हवा के झोंकों में प्यारभरी ख़ुशबू भर एक ओढ़नी की तरह शरीर से लिपट जाती थी. वह घंटों, दिनों और कई बार तो महीनों तक उस ख़ुशबू को अपने भीतर महसूस करती थी.

किसी का हरदम साथ बने रहना एक ख़ूबसूरत जज़्बा ज़रूर है, पर साथ न होने पर भी उसके वजूद का हर पल बने रहना उससे भी ख़ूबसूरत एहसास है.

फिर इंतज़ार लंबा नहीं लगता…

फिर तन्हाइयां काटती नहीं हैं…

फिर सन्नाटे में बेचैनी कचोटती नहीं है…

फिर जीवन निष्प्रयोजन नहीं लगता…

ये सब बातें न तो किताबी हैं, न ही मन की कल्पना के जाल से छनकर निकलीं. ये भोगी हुई संवेदनाओं का निचोड़ है.

कहां गईं अब उसकी ये संवेदनाएं. सर्दियों की गुनगुनी धूप हो या बारिश की भीगी फुहारें, गीली घास पर चलना हो या घंटों यूं ही बैठे-बैठे गीत गुनगुनाना… पुराने गानों को सुन एक रूमानियत-सी छा जाती थी. प्रकृति से सारा संपर्क ही टूट गया है. सतरंगी अरमानों की उड़ान अपना आकाश ही ढूंढ़ रही है अब.

डेक पर चिल्लाता तेज़ म्यूजिक, तीन मंज़िला आलीशान कोठी के संगमरमरी फ़र्श और खिड़कियों पर टंगे ख़ास कनाडा से मंगाए परदे, अपनी गरिमा को दर्शाते हुए मानो उसकी भावनाओं का उपहास उड़ाने को तत्पर रहते हैं.

मैं जो मिसेज़ पराग गुप्ता, अनुभव और अरुणिमा की मम्मी, प्रतिष्ठित व अकूत संपत्ति के स्वामी गुप्ता खानदान की बहू के रूप में जानी जाती हूं, उसका अपना नाम तो भूली-बिसरी याद की तरह स़िर्फ शादी के कार्ड पर ही अंकित होकर रह गया है. हीरे के व्यापारियों के विशाल और विदेशी कलाकृतियों से सजे ड्रॉइंगरूम के ग्लास कैबिनेट में क्रिस्टल की बेशक़ीमती क्रॉकरी के बीच सजा वह कार्ड भी गुप्ता खानदान की रईसी व खुले दिल का परिचायक है.

“पूरे 700 रुपए का एक कार्ड बना था. डिज़ाइनर है. कार्ड के साथ पिस्ते की लौज का डिब्बा दिया गया था…” पिछले 10 बरसों से वह यह वाक्य न जाने कितनी बार सुन चुकी है. बस, जब भी वह उस कार्ड में पूर्णिमा वेड्स पराग पढ़ती है, तो अपना नाम ही उसके भीतर एक सिहरन-सी पैदा कर देता है.

उसके नाम को कितने प्यार से लेता था वह. “पूर्णिमा की चांदनी की तरह ही खिली लगती हो तुम हमेशा. जब हंसती हो, तो न जाने कितनी कलियां एक साथ चटक जाती हैं. हर ओर जगमगाहट फैल जाती है, बस, अब जल्दी से मेरी दुनिया में आ जाओ और उसे सतरंगी बना दो. चांदनी के हर रूप को मैं अपने में उतारना चाहता हूं.”

प्यार की उत्कृष्ट ऊंचाइयों को छूने लगती थीं उसकी आंखें और वह लजाकर अपनी पलकें झुका लेती थी. फिर झट से वह उसकी कांपती पलकों को चूम लेता था.

कॉलेज के दिनों में परवान चढ़े उनके प्यार का रंग हर गुज़रते दिन के साथ गहरा होता जा रहा था. बस, अब इंतज़ार था, तो एक हो जाने का. जिस दिन विराट को नौकरी मिली, पूर्णिमा को लगा था कि अब उसके सपनों को सच होने में देर नहीं है. उदास थे, तो बस दोनों इस बात से कि नौकरी उसे दूसरे शहर में मिली थी.

पर एक-दूसरे के वजूद के हरदम बने रहने ने इस दूरी को भी आधारहीन बना दिया. फिर फोन तो था ही दिलों के तार जोड़े रखने के लिए. उस बार जब दो महीने बाद वह लौटा, तो बहुत ख़ुश था. “पूर्णिमा, वहां मैंने सारी व्यवस्था कर ली है. एक छोटा-सा फ्लैट भी किराए पर ले लिया है. अपनी गृहस्थी बसाने का हर सामान एकत्र कर लिया है. आज शाम को मम्मी-पापा के साथ तुम्हारे घर आऊंगा. मेरा इंतज़ार करना.”

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रोम-रोम रोमांचित हो उठा था उसका. ऐसे तैयार हुई मानो आज ही दुल्हन बननेवाली हो. उसके घरवालों को उन दोनों के रिश्ते के बारे में कुछ भी पता न था, पर उसे यक़ीन था कि उसके मम्मी-पापा अपनी इकलौती बेटी की बात नहीं टालेंगे. फिर यहां तो जाति की भी समस्या नहीं थी.फ़र्क था तो केवल हैसियत का, लेकिन उससे क्या… वह निश्‍चिंत थी.

“तुमने इस तरह की कल्पना की भी तो कैसे?” पापा की आवाज़ ड्रॉइंगरूम में गूंजी, तो घबराकर वह बाहर आई.

“रिश्ता बराबरवालों में किया जाता है. प्यार का रंग ज़िम्मेदारियों की पलस्तर चढ़ते ही फीका होने लगता है. घर चलाने की मश़क्क़त जज़्बात पर पैबंद लगा देती है. यही सच है. ख़ुश रहने के लिए जितना ज़रूरी प्यार है, उतना ही पैसा भी.”

“आप पूर्णिमा की इच्छा की तो कद्र करेंगे न?” विराट ने किसी तरह अपने को संयत करते हुए पूछा था.

“बिल्कुल करूंगा, पर अगर उससे उसकी ज़िंदगी बदरंग होगी, तो बाप होने के नाते ढाल बनकर उसके सामने खड़ा भी हो जाऊंगा.”

“पापा, पर… ”

“बस…” पूर्णिमा के विरोध को पलभर में ही झटक दिया गया था.

“मेहमानों को चाय-नाश्ता सर्व कर आदर से विदा करो.”

कितना कहा था उसने विराट को कि वह सबकुछ छोड़कर आने को तैयार है, लेकिन वह उसके पापा की इज़्ज़त को खाक में नहीं मिलाना चाहता था. “मां-बाप चाहे कितनी मनमानी करें, पर उनका कर्ज़ बच्चे कभी नहीं चुका सकते.”

विराट चला गया और उसके बाद से ही न तो कमल के पत्ते पर ओस मोती की तरह दिखी, न ही सतरंगी अरमानों ने उड़ान भरी.

वह मिसेज़ पराग गुप्ता बन गई. पापा की हैसियत और गुप्ता खानदान दोनों की इज़्ज़त व सम्मान का मान रखना उसका दायित्व बन गया. उसकी सुंदरता पराग के लिए गर्व का विषय बन गई. वह जहां जाती, केवल उसके रूप का बखान होता. उसके गुण सास-ससुर के लिए अच्छे संस्कार होने का विषय थे, पर कभी गुणों की चर्चा नहीं होतीबस हीरे की परख जौहरी ही जानता है, के जुमले हवा में तैरते, उसे एहसास कराते कि देखो हीरे के व्यापारियों ने कैसा हीरा ढूंढ़ा है. उसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़नी चाहिए, नहीं तो शोकेस में रखा अच्छा नहीं लगेगा. बच्चों के लिए वह एक स्मार्ट मां थी. सबका प्यार, स्नेह और आदर पा वह भी बहुत ख़ुश थी. क्या सचमुच ख़ुश थी? नाख़ुश होने की वजह कोई थी भी नहीं, पर वह इसलिए ख़ुश थी, क्योंकि दूसरे उससे ऐसी उम्मीद रखते थे कि गुप्ता खानदान की हीरे जैसी बहू हमेशा खिलखिलाते हुए अपनी सुंदरता की चमक उनके घर में बिखेरती रहे और उन्हें हर पल एक गर्व के एहसास से सराबोर रहने दे, वरना वह तो इन सबके बीच भी अपने होने के एहसास को हमेशा तलाशती रहती.

होंठों पर थिरकते व्याकुल गीतों को सुन स्वयं भी चटकती कलियों की तरह खिलखिलाना चाहती. उसकी बंद पलकें उस चुंबन के लिए आकुल हो उठतीं, तो घबरा जाती वह. कितना लंबा इंतज़ार हो गया है इस बार. दस साल बीत गए हैं. इस बीच न तो कभी विराट से मुलाक़ात ही हुई, न ही फोन पर बात. मन तो किया कई बार उसका कि नेट पर चैटिंग कर ले, पर शायद कुछ पल उसके लिए चुरा पाना जैसे मुश्किल ही हो गया था.

हर साल की तरह इस बार भी छुट्टियों में घूमने का प्रोग्राम बन रहा था. “इस बार सिडनी का टूर बनाते हैं.” पराग ने सुझाया तो अनुभव बोला, “नो पापा, न्यूयॉर्क चलिए. लास्ट ईयर हमने वहां कितना एंजॉय किया था.”

“तभी तो इस बार न्यू प्लेस जाएंगे बुद्धू.” अरुणिमा ने अपने छोटे भाई को समझाया.

सिडनी की जगमगाती रातों में, मखमली सड़कों पर से गुज़रते, शॉपिंग करते और होटलों में खाना खाते, अपने परिवार को मौज-मस्ती करते देख पूर्णिमा संतुष्ट थी.

पर सतरंगी उड़ान और गुनगुनाती बहार और उसकी मीठी छुअन की चाह उसका मन बार-बार भटका देती. संडे था उस दिन. बच्चे होटल में ही रहकर गेम्स खेलना चाहते थे और पराग अपने किसी मित्र से मिलने गया था. अकेली ही निकल गई वह सिडनी की सड़कों पर सैर करने. इंडियन फूड सर्व करनेवाले होटल में कॉफी पीने के ख़्याल से घुसी. सोच के पाखी उसके अंतस से निकल यहां-वहां उड़ने लगे.

“कैन यू गेट मी ए कप ऑफ कॉफी एंड सम स्नैक्स.”

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ये आवाज़… अचानक पूर्णिमा को लगा जैसे चटकती धूप के टुकड़े उसकी टेबल पर आ नृत्य कर रहे हैं, उसके वजूद में बसी ख़ुशबू चारों ओर गमकने लगी है. उसकी भावनाएं पायल की रुनझुन की तरह हो गई हैं. छन-छन की मीठी-सी धुन बजने लगी है हर तरफ़. उसने पलटकर देखा. दोनों की नज़रें मिलीं और धड़कनें तेज़ हो गईं.

“पूर्णिमा तुम? तभी सोच रहा था कि आज सिडनी की सुबह इतनी चटकीली कैसे हो गई है.” वही चिर-परिचित अंदाज़, आंखों में प्यार और चेहरे पर मासूम मुस्कान. विराट से इस तरह मुलाक़ात होगी, सोचा तक नहीं था.

“कैसी हो? ”

“अच्छी हूं… और तुम?”

उसके बाद मौन पसर गया दोनों के बीच. मानो दस बरसों के उस अंतराल को दोनों इन क्षणों में अपनी मुट्ठी में ़कैद कर लेना चाहते हों.

“मुझे कभी माफ़ कर पाओगे विराट?”

“तुमसे कोई शिकायत ही नहीं है. वैसे भी दूरियां कभी भी प्यार के रंग को फीका नहीं कर पाती हैं. तुम आज भी मेरे साथ हो. मेरा वजूद तुमसे ही है.”

“लेकिन मैंने अपना वजूद खो दिया है विराट. इस पूर्णिमा ने बस अलग-अलग भूमिकाओं में अपने को बांट रखा है. ख़ुद के लिए कभी कुछ करने को मन ही नहीं करता.” उसकी पलकें थरथरा रही थीं.

“नहीं, तुम ग़लत कह रही हो. अलग-अलग भूमिकाओं में अपने को ढालना बांटना नहीं होता, बल्कि अपने वजूद को और मज़बूत बनाना होता है. मुझे ख़ुशी है कि तुमने सुख और संतोष के बीज अपने परिवार में अंकुरित किए हुए हैं. एक बार अपने दिल के दरवाज़े को खोलकर होंठों तक गीतों को आने दो, फिर देखना कैसे वे थिरकेंगे. हमारा प्यार जितना सच है, उतना ही सच तुम्हारा परिवार भी है. तुम संबंधों को ज़िम्मेदारियों की तरह बख़ूबी निभा रही हो, पर मन के दरवाज़े पूरी तरह खोलकर नहीं.”

शाम हो गई थी. दोनों को ही लौटना था. पर इस बार पूर्णिमा के क़दमों में अपने लिए किसी अलग रास्ते को तलाशने के लिए सबसे कटकर चलने की अकुलाहट नहीं थी. उसका वजूद है… रिश्तों के ओर-छोर में लिपटा… पराग, बच्चे, घर-परिवार… क्या इनके बीच रहकर वह अपने वजूद को पंख नहीं दे सकती…? सभी तो उसे कितना प्यार करते हैं… कार में बैठकर पलकें बंद कीं, तो महसूस हुआ जैसे अब भी हवा में ख़ुशबू तैर रही है, उसके सतरंगी अरमानों को जैसे आसमान मिल गया है.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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कहानी- रिश्तों का दर्द (Short Story- Rishto Ka Dard)

“मैं होती तो शायद यह नहीं करती जो आपने किया.”

“नहीं रति, कभी-कभी अपनों को ही सुखी देखने के लिए अनचाहे, कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं. वह मां ही क्या जो बच्चों के लिए त्याग न कर सके. सम्बन्धों को समाप्त करने या बिगाड़ने से अच्छा है उन्हें बहानों की आड़ में एक सुन्दर मोड़ दे दिया जाए.”

Short Story in Hindi

“अरे, आप इन्दू दी हैं ना. यहां! इस इण्टरव्यू में!! इतने दिनों बाद!” प्रधानाचार्या रति शर्मा कक्ष के दरवाज़े को खोलकर अन्दर प्रवेश करती हुई महिला को देखकर चौंकते हुए बोली. आश्‍चर्य से उनकी आंखें फैल गयी थीं. कॉलेज में वर्षों से रिक्त पड़े पदों को सेवानिवृत्त शिक्षकों से भरने के लिए उन्होंने जो विज्ञापन दिया था, उसी का आज इंटरव्यू चल रहा था. “हां, मैं इन्दू कुलश्रेष्ठ ही हूं.” मुस्कुराते हुए धीमी आवाज़ में उस महिला ने कहा, “आइये… आइये इधर बैठिए.” कहते-कहते रति शर्मा अपनी कुर्सी से लगभग खड़ी हो गई. कॉलेज के मैनेजर डॉ. वर्मा तथा साक्षात्कार समिति के अन्य सदस्यों ने प्रश्‍नसूचक दृष्टि से पहले रति शर्मा, फिर उस नवागंतुका को देखा. सबकी जिज्ञासा के प्रत्युत्तर में रति शर्मा ने कुर्सी पर बैठते हुए उस महिला की ओर संकेत करते हुए कहा, “ये हैं मिसेज इन्दू कुलश्रेष्ठ, इस कॉलेज की भूतपूर्व प्रवक्ता, जो वर्ष 1995 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर यहां से चली गयी थीं. इन्हें स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति देने के लिए न पिछले मैनेजर साहब तैयार थे, न ही भूतपूर्व प्रधानाचार्य डॉ. अस्मित निगम, क्योंकि यह इस कॉलेज की बहुत ही योग्य एवं बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न शिक्षक-शिक्षिका थीं. छात्राएं ही नहीं, हम सब शिक्षिकाएं भी इनका सम्मान करते थे और इनके कॉलेज से जाने के नाम पर ही व्यथित थे. लेकिन यह हम सबको रुलाकर यहां से चली ही गयीं. और आज इतने दिनों बाद फिर इन्हें यहां इस तरह देखकर मैं सचमुच हैरान हूं. सारे कॉलेज का आग्रह व रुदन जिसे न रोक सका, वही आज पुनः इसी कॉलेज में…”

“हां, मैं फिर यहां वापस आ गयी.” छोटा-सा उत्तर दिया उस महिला ने जिसका गला भर आया था और जो आंखों की नमी को छिपाने की पूरी कोशिश कर रही थी. रति शर्मा एकटक उस महिला को कुछ पल देखती रही. फिर डॉ. वर्मा की ओर मुड़कर बोली, “भई मैनेजर साहब, अंग्रेज़ी प्रवक्ता के लिये इन्दू, मेरा मतलब है मिसेज इन्दू कुलश्रेष्ठ से बेहतर अन्य कोई शिक्षिका नहीं हो सकतीं. मेरे विचार से सर्व सहमति से इन्हें ही इस पद के लिये चुन लिया जाए.”

“हां-हां क्यों नहीं, जब यह इस विद्यालय की अध्यापिका रह चुकी हैं तो फिर और कुछ देखने-जानने की ज़रूरत ही क्या है?” डॉ. वर्मा ने अपने अन्य सदस्यों की ओर देखा, जिन्होंने उनकी सहमति में सिर हिला दिये थे. “लेकिन…” अभी वह महिला अपनी बात कह ही नहीं पायी थी कि रति शर्मा बीच में बोल पड़ी- “लेकिन-वेकिन कुछ नहीं, हम आप पर कोई एहसान नहीं कर रहे हैं. आपने जो यश अपनी योग्यता से अर्जित किया है, हम उसका केवल सूद ही आपको दे रहे हैं. इन्दू दी, उन दिनों मैं प्रधानाचार्य नहीं, बल्कि आपसे कनिष्ठ शिक्षिका थी. लेकिन छात्राओं की तरह ही मैं भी आप की ज़बरदस्त फैन थी. आपने इस कॉलेज को जो दिया, उसे मैं भूली नहीं हूं.”

कृतज्ञता की झलक इन्दू की आंखों में तैर रही थी. वह जाने के लिए उठी ही थी कि रति शर्मा ने आग्रह पूर्वक कहा, “हां, एक बात और आज शाम को आप मेरे घर खाने पर आ रही हैं.”

कॉलेज से घर आकर रति शर्मा के मन में इन्दू कुलश्रेष्ठ को लेकर तरह-तरह के विचार उठ रहे थे. इन्दू का पूरा अतीत उसकी आंखों में सजीव हो उठा. इन्दू ने अपने बहनोई राजेश से विवाह किया तो सारा कॉलेज चकित था कि इतनी सुंदर, योग्य, आर्थिक रूप से पूर्णत: आत्मनिर्भर लड़की ने एक विधुर से, जिसका कि एक बेटा भी था, उससे विवाह क्यों किया. लेकिन उसके निकट रहनेवाले जानते थे कि इन्दू को अपनी बहन के बच्चे स्मित से बहुत ही स्नेह था और वह नहीं चाहती थी कि कोई सौतेली मां उसके स्मित से दुर्व्यवहार करे, इसलिए राजेश के माता-पिता की ओर से राजेश की दूसरी शादी इन्दू से किए जाने का प्रस्ताव आते ही अपनी मां की कठोर अनिच्छा के बावजूद उसने हां कर दी थी. विदाई के समय आंसुओं से भीगा मां का चेहरा चूमकर उसने कहा था, “मां, तुम स्मित को छूकर कहो कि मैंने ग़लत किया. तुम मेरे लिए दुखी मत हो, राजेश मेरा ख़याल रखेंगे.” लेकिन शादी के कुछ ही महीने बाद ट्रेन दुर्घटना में राजेश की मृत्यु हो गयी. इन्दू का वैधत्व सारे कॉलेज को रुला गया. दूसरी शादी के कितने ही प्रस्ताव उसके घरवालों के पास आते, लेकिन उसका एक ही उत्तर था कि शादी के बाद कोई भी सौतेला पिता मेरे स्मित को हृदय से अपना नहीं पायेगा.

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इसके बाद इन्दू का जीवन-चक्र स्मित के इर्द-गिर्द ही घूमने लगा. कॉलेज में भी कभी-कभी वह उसे ले आती. सभी उसे प्यार करते और पूछते कि तेरी मम्मा कौन है तो वह मुस्कुराता हुआ अपनी छोटी-छोटी उंगलियां इन्दू की ओर उठा देता. सब हंस पड़ते और इन्दू का चेहरा मातृत्व की गरिमा से खिल उठता.

धीरे-धीरे दिन महीनों में, महीने वर्षों में बदलते गये. स्मित की शिशु सुलभ क्रियाएं बालावस्था की क्रीड़ाओं का रूप लेने लगीं. नर्सरी व के.जी. कक्षाओं को पार करते हुए स्मित विश्‍वविद्यालय के द्वार तक पहुंच गया. इन्दू को बस एक ही धुन थी कि वह स्मित को अच्छी से अच्छी शिक्षा दे, जिससे वह बहुत बड़ा आदमी बन सके. समाज में धन के साथ ज्ञान भी अर्जित करे. इसके लिए उसने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

रति शर्मा को याद आ रहा था कि बीए पास करने के बाद स्मित जब आईएएस की तैयारी कर रहा था तो इन्दू ने कॉलेज से छुट्टी ले ली थी. प्रिंसिपल ने उसके अवकाश प्रार्थना पत्र को देखकर हंस के पूछा था, “अरे भाई, आईएएस में बेटा बैठ रहा है. तुम तो नहीं ना, फिर ये छुट्टी किसलिए?”

“मेरे घर पर रहने से उसकी पढ़ाई और अच्छी तरह से हो सकेगी. उसे अपनी पढ़ाई के आगे खाने-पीने तक की सुध नहीं रहती मैडम.” इन्दू ने प्रत्युत्तर दिया था.

स्मित की परीक्षाएं समाप्त हो गयीं, तो सभी को स्मित के परीक्षा फल का बेसब्री से इंतज़ार था. इन्दू की नज़र तो अख़बारों में ही अटकी रहती. उसकी मनोदशा देखकर स्टाफ रूम में शिक्षिकाएं खुसर-फुसर करतीं. अधिकांश तो स्नेह से कहतीं, लेकिन कुछ ईर्ष्यावश भी कहतीं कि आख़िर इन्दू की तपस्या और स्मित की मेहनत रंग लाई. फिर आईएएस का परीक्षा फल निकला. सूची में स्मित दूसरे नम्बर पर था. उस दिन कॉलेज में इन्दू व स्मित की ही चर्चा सबके मुख पर थी. लोग इन्दू को बधाई दे रहे थे और इन्दू थी कि रोये ही जा रही थी. मारे ख़ुशी के उसके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे.

इसके बाद इन्दू के मुख पर अचानक प्रौढ़ता झलकने लगी. स्मित के ट्रेनिंग पर चले जाने के बाद वह सबसे कहने लगी “अब नौकरी करने का मन नहीं चाहता… बहुत थकान लगती है. सोचती हूं, स्मित के नौकरी ज्वाइन करने के बाद मैं स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लूं.”

“अरे, ऐसी भी क्या जल्दी है?” सभी इन्दू का विरोध करते. सब जानते थे कि इन्दू कॉलेज की सभी क्रियाओं व कार्यक्रमों की धुरी थी. उसके जाने पर उसकी कमी को भर पाना आसान नहीं था. लेकिन स्मित की ज्वाइनिंग के बाद इन्दू ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ही ली. प्रधानाचार्य अस्मिता निगम ने उसे बहुत समझाया था कि सर्विस पूरी किए बिना बीच में सेवा निवृत्ति लेने से उसका आर्थिक रूप से नुक़सान ही है. लेकिन इन्दू को एक ही धुन थी, “अब मुझे पैसों की क्या चिन्ता? फिर स्मित भी तो नहीं चाहता कि मैं नौकरी करूं. वह मुझे बहुत अच्छी तरह खिला-पहना सकता है. बेटे की बात मैं कैसे टाल दूं?”

आख़िर इन्दू कुलश्रेष्ठ ने विद्यालय छोड़ दिया और बेटे के साथ दिल्ली चली गयी. जाने से पहले कॉलेज आयी थी, सभी को बहुत शानदार पार्टी दी थी. रति शर्मा इन्दू से मिलकर बहुत रोयी थी. कुछ महीनों तक इन्दू से पत्र-व्यवहार भी चलता रहा, लेकिन धीरे-धीरे यह सिलसिला भी समाप्त हो गया था. और आज अचानक उसी इन्दू कुलश्रेष्ठ को देखकर रति शर्मा अचंभित थी. मन में उठ रहे हज़ार प्रश्‍न उसे विस्मित कर रहे थे. नौकरी बीच में छोड़ कर जानेवाली इन्दू दी फिर वापस क्यों चली आयी.

अचानक कॉलबेल बज उठी. उसने स्वत: दौड़कर दरवाज़ा खोला तो देखा इन्दू खड़ी थी. रति शर्मा इन्दू से लिपट गयी. कॉलेज में सबके सामने जो संकोच था, वह नौकर-चाकरों के सामने स्थिर न रह सका. मैं बहुत बेचैनी से आपकी प्रतीक्षा कर रही थी. आपसे बहुत-सी बातें पूछने का मन हो रहा था जो सबके सामने न पूछ सकी, इसलिए रात के भोजन के नाम पर आपको बुला लिया. यहां कैसे आयीं? घर कहां है? स्मित का यहां स्थानान्तरण हो गया है क्या…?” आदि तमाम प्रश्‍न रति शर्मा ने एक साथ इन्दू से कर डाले.

“अरे भाई, बैठने भी दोगी या यहीं से सब प्रश्‍न पूछ लोगी.” इन्दू ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा. “हां-हां, आइए, आराम से ड्रॉइंगरूम में बैठकर बातें करते हैं.” कह कर रति इन्दू को अन्दर ले गयी और कॉफी के लिए पास खड़े नौकर से कह दिया. उसके जाते ही रति ने बेचैन होकर कहा, “आख़िर कौन-सी मजबूरी आपको फिर यहां ले आयी दीदी? मैं यही जानने के लिए सबसे ज़्यादा बेचैन हूं.”

“नियति… मेरी नियति मुझे फिर यहां ले आई. मनुष्य की जीवन-डोरी का सूत्रधार तो वह ऊपरवाला ही है न…” इन्दू की आंखों में एक खालीपन था. “देखिये, पहेलियां न बुझाइए, अगर बताने योग्य हो तो खुलकर कहिए, मैं बहुत अधीर हो रही हूं.” रति ने कहा था.

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“तुमसे क्या छिपाना रति… और छिपाने जैसा कुछ है भी नहीं.” इन्दू ने कहना आरम्भ किया, “कॉलेज को तिलांजलि देकर मैं तुम सबको छोड़कर चली गयी. स्मित को लेकर ही मैंने जीवन का ताना-बाना बुना था. तुम तो जानती हो वही मेरा अतीत था, वही वर्तमान और वही मेरा भविष्य भी था. दिल्ली में स्मित के ज्वाइन कर लेने पर उसके लिए रिश्तों की जैसे बाढ़-सी आ गयी थी. एक से एक उच्च अधिकारियों की सुन्दर से सुन्दर लड़कियों के प्रस्ताव आ रहे थे. स्मित के पास तो सबके लिए एक ही जवाब था, “जो मां की पसन्द, वही मेरी पसन्द.” लेकिन स्मित के इस उत्तर ने मेरे ऊपर सुसंस्कृत व सुशील लड़की ढूंढ़कर लाने का दायित्व और बढ़ा दिया था. बहुत सोचने-समझने के बाद एक सुसंस्कृत, शिक्षित परिवार की कन्या से मैंने स्मित का विवाह कर दिया. स्मित की पसन्द मैं जानती थी. उसके लिए रूप से अधिक गुण का महत्व था. बहुत आधुनिक, नाज़-नखरेवाली लड़कियों से वह दूर ही रहता था. मेरा श्रम-साध्य जीवन उसके लिए आदर्श था. वह प्रशासनिक सेवा में था, इसलिए उसकी नौकरी मेरी नौकरी की प्रकृति से बिल्कुल भिन्न थी. फिर भी वह प्राय: कठिन प्रसंगों में मुझसे राय ले लेता.

“स्मित की बहू शुचि के आ जाने पर मैं बहुत हल्कापन महसूस करने लगी थी. घर से लेकर बाज़ार तक के सारे कार्यों में शुचि का मेरे साथ होना मुझे बहुत सुखद लगता. सारा जीवन अकेले ही सब करते-करते मैं थक गयी थी. स्मित भी शुचि को पाकर प्रसन्न था. उसे लगता कि वह उसके विचारों के अनुरूप ही होगी और वह मुझे वैसा ही मान-सम्मान देगी जैसा कि वह स्वयं देता है. वह प्राय: मेरे अतीत की चर्चा शुचि से करता और अपने आईएएस अधिकारी बनने का पूरा श्रेय अपनी लगन व परिश्रम को न देकर मुझे ही देता, जिसे सुनकर मुझे ऐसा लगता जैसे मैं धरती पर नहीं, आकाश पर पांव रखकर चल रही हूं. किन्तु उसका ऐसा मानना और ऐसी सोच ही उसके दाम्पत्य जीवन के सुख का कांटा बन गयी. एक दिन मैं बाहर लॉन में टहल रही थी कि अचानक स्मित के कमरे से ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ आने लगी. मैं पास से गयी तो शुचि स्मित पर नाराज़ हो रही थी, “तुम्हें मां के सिवाय भी कुछ दिखता है? हर बात में मां ही मां रहती हैं. तुम्हारी मां ने त्याग किया तो कौन-सी बड़ी बात है? सभी की मां ऐसा ही करती हैं. लेकिन सब तुम्हारी तरह मां की माला नहीं जपते.” “अच्छा धीमे बोलो, मां सुनेंगी तो उन्हें दुख होगा.” स्मित ने शुचि को डांटते हुए कहा.

“मेरी बला से, सुन ले तो अच्छा ही है.” शुचि का स्वर और ऊंचा हो गया. “कम से कम पीछा तो छोड़ दें.” शुचि के मुंह पर शायद स्मित ने हाथ रख दिया था, इसलिए दबी आवाज़ के सिवाय मुझे कुछ नहीं सुनाई दिया.” इन्दू का चेहरा म्लान हो गया था. मैं फिर कुछ देर के लिए रुककर उन्होंने बातों का क्रम आगे बढ़ाया. “उस दिन के बाद रोज़ किसी न किसी बात पर शुचि स्मित से झगड़ने लगी.

स्मित जितना ही उसे ख़ुश रखने व समझाने की कोशिश करता, वह उतना ही उस पर हावी होने का प्रयास करती. उन दोनों के झगड़े से अनजान बनकर मैंने धीरे-धीरे अपने को समेटना आरम्भ कर दिया. बीमारी का बहाना बनाकर मैं उनके साथ घूमने से बचने लगी. रसोई की सब्ज़ियों से लेकर कपड़ों की ख़रीदारी तक में मैं शुचि की पसन्द को ही महत्व देने लगी. लेकिन इस पर भी वह सामान्य नहीं रहती थी. स्मित सब समझता था. वह मुझे अलग हटते देखकर मन ही मन दुखी था. प्रात: मेरे पास बैठता. सोने से पहले मेरा हाल लेता, दवा आदि देता. कहता तो कुछ नहीं था, लेकिन अन्दर से वह सुखी भी नहीं था, मां और पत्नी को लेकर उसका जीवन उलझ रहा था…”

“आपने शुचि को उसके दुर्व्यवहार के लिए कुछ कहा क्यों नहीं? अध्यापिका होने पर भी क्या आपके पास शब्दों की कमी थी?” रति शर्मा ने बीच में इन्दू से पूछा.

“नहीं, शब्दों की कमी तो मेरे पास कभी नहीं रही, लेकिन जीवन के कुछ ऐसे मार्मिक प्रसंग होते हैं, जहां शब्दों की नहीं भावनाओं की और समझ की आवश्यकता होती है. ईर्ष्या और दुराग्रह का निदान शब्दों से नहीं किया जा सकता. मैंने शुचि को प्यार व स्नेह देने में कोई कसर नहीं रखी थी, फिर उसका मुझसे चिढ़ना, यह ईर्ष्या के अतिरिक्त कुछ नहीं था. वह स्मित के जीवन से मुझे निकाल फेंकना चाहती थी. अतीत को तो वह बदल नहीं सकती थी, लेकिन भविष्य को वह अवश्य बदलना चाहती थी, जिसमें मेरा कोई चिह्न न हो. मैंने जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं, जाने कितने लोगों से मिली हूं, इसलिए किसी के व्यवहार से उसका मन समझ लेना मेरे लिए कोई मुश्किल काम नहीं है. मैं झगड़कर अपना हक़ लेने में विश्‍वास नहीं करती. जानती हूं, इससे सम्बन्धों की खाइयां गहरी ही होती जाती हैं.”

“तो क्या शुचि ने आपको घर से निकाल दिया?” अभी रति की बात पूरी भी नहीं हो पायी थी कि इन्दू ने बीच में ही उसे रोक दिया, “नहीं-नहीं, मैं ऐसी कमज़ोर भी नहीं कि कोई मुझे निकालता और न ही स्मित ऐसा होने देता. लेकिन मुझे ऐसा लगने लगा कि मेरी निरन्तर उपस्थिति स्मित के जीवन को संकटमय अवश्य बना देगी. सम्बन्धों में कटुता न आने देने के लिए मुझे ही मोह त्याग करना पड़ेगा, इसीलिए मैंने अध्यापन से पुन: जुड़ने का प्रस्ताव स्मित के सामने रखा. यह जानकर उसे बहुत दुख हुआ. कहने लगा कि सारा जीवन नौकरी से तुम्हारा मन नहीं भरा मां, जो इस उम्र में मेहनत-मज़दूरी करोगी. लेकिन मैंने यह कहकर अपना तर्क रखा कि मेहनत-मजदूरी नहीं, अध्यापन तो मेरे खालीपन का उपचार है. मेरा जीवन इसी को समर्पित रहा है… यही मेरे सारे दुख-दर्द का मरहम है. स्मित चुपचाप मेरा मुंह देखता रहा. शायद मेरे अन्दर की पीड़ा को वह समझ रहा था.

फिर दूसरे दिन जब रोज़गार कार्यालय के दैनिक पत्र में मैंने इस कॉलेज का विज्ञापन देखा. सेवानिवृत्त शिक्षिकाओं को नियुक्ति देना कुछ अविश्‍वसनीय अवश्य लगा, फिर भी मैंने प्रार्थना पत्र दे दिया और जब इंटरव्यू के लिए पत्र मिला, तो मुझे स्मित से हटकर रहने का ख़ूबसूरत बहाना मिल गया. उसने मुझे बहुत रोका, लेकिन मैं बराबर उससे मिलते रहने का आश्‍वासन देकर चली आई.” इन्दू की आंखों के आंसू थम नहीं रहे थे. रति शर्मा ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “मैं होती तो शायद यह नहीं करती जो आपने किया.”

“नहीं रति, कभी-कभी अपनों को ही सुखी देखने के लिए अनचाहे, कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं. वह मां ही क्या जो बच्चों के लिए त्याग न कर सके. सम्बन्धों को समाप्त करने या बिगाड़ने से अच्छा है उन्हें बहानों की आड़ में एक सुन्दर मोड़ दे दिया जाए.”

इन्दू की दबी हुई रुलाई फूट पड़ी थी और रति शर्मा मूक होकर तपस्विनी मां को दर्द से मोम की तरह पिघलते हुए देख रही थी.

– प्रेमा राय

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कहानी- सम्मोहन (Short Story- Sammohan)

मेरे सवाल को उन्होंने टालने की बहुत कोशिश की, पर फिर हथियार डाल दिए. मुझसे वायदा लिया कि मैं कभी किसी से इस राज़ का खुलासा नहीं करूंगी.
वह मुझे बताने लगीं.
“हम औरतें सहनशील होती हैं. रिश्तों के खोखलेपन और खालीपन को पी जाती हैं. किसी को कुछ नहीं बतातीं, पर मुझसे इनकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी. एक सीमा जब पार होती दिखी, तो मैंने अपने भीतर छिपाए एक राज़ का पर्दाफाश कर दिया.”
“राज़?” मैंने सवाल किया.
“हां राज़.”

Hindi Short Story

यज्ञदत्त शर्मा ‘नवीन’- अब तक वे केवल यज्ञदत्त शर्मा थे. 70 साल की उम्र में ‘नवीन’ उपनाम लगाने की क्या सूझी उन्हें, यह सवाल मेरे मन में उमड़ी उत्सुकता की सारी हदें पार कर गया. यज्ञदत्तजी से सीधा सवाल करना मुझे ठीक नहीं लगा, सो मैंने तारीफ़ का तीर फेंका-
“अरे वाह यज्ञदत्तजी, यह नवीन उपनाम तो बहुत ‘सूट’ करता है आप पर. हमें भी तो हमराज़ बनाइए न? बुढ़ापे में हमारे भी काम आएगा.”
सवाल का असर हुआ. 70 साल का कमान-सा शरीर तीर-सा तन गया. मोटे चश्मे के पीछे मुरझाई-सी दो बूढ़ी आंखों में चमक आ गई, जैसी बच्चों की आंखों में होती है. यज्ञदत्तजी बोले, “मेरा जीवन बदल गया है. मेरे जीवन में नवीनता आ गई है. जब से मैंने बांसुरी बजानी शुरू की है, तब से मेरे परिवार के लोग मेरे पास आकर बैठने लगे हैं. मेरी बांसुरी की आवाज़ से सम्मोहित होने लगे हैं. मेरे बेटे, मेरी बहुएं, मेरे पोते-पोतियां सब मुझे चाहने लगे हैं. इसलिए मैंने अपने नाम के आगे ‘नवीन’ उपनाम लगा दिया है. सच पूछो तो अपनी जवानी के दिनों में यह मेरी दिली इच्छा थी, पर मौक़ा ही नहीं मिला, सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली. जवानी की चाहत बुढ़ापे में पूरी कर ली.”
यज्ञदत्तजी को मैं पिछले 12 सालों से जानती हूं. ह़फ़्ते में दो बार मेरे द़फ़्तर आना उनका नियम-सा बन गया था. द़फ़्तर में आते तो सबसे दो मीठे बोल बोलते, सबसे हाथ मिलाते, हालचाल पूछते, फिर आकर मुझे अपनी राम कहानी सुनाते. पहली बार जब मिले थे तो नौकरी से हाल ही में रिटायर हुए थे. चुस्ती-तंदुरुस्ती बरकरार थी. तब एक शौक़ उनके जीवन का पर्याय बना हुआ था, पेड़ों में आकृतियां तलाशते फिरते थे. पेड़ की शाखों, तनों और जड़ों में आकृतियां ढूंढ़ने का यह शौक़ उनके जीवन की एकमात्र उपलब्धि था.
उनका शयनगार किसी और को पहली नज़र में कबाड़खाना नज़र आ सकता था. पर यज्ञदत्तजी की नज़र में वह उनके जीवन की अमूल्य धरोहर था.
उनकी इस धरोहर में शामिल थी गिरगिट के आकार की एक जड़, शेर की मुखाकृति से मेल खाता एक तना, सांप-सी लहराती एक शाखा, बुढ़ापे के उजाड़ को चिह्नित करता एक झुरमुट, जो किसी पेड़ की जड़ थी, बारहसिंघा का मुंह और ऐसी लगभग 20 आकृतियां.
यज्ञदत्तजी अपनी इस धरोहर को संवारते और तराशते भी रहते थे. आकार और आकृति के अनुरूप अपनी कल्पना से कभी कुछ जोड़ देते, तो कभी कहीं से थोड़ा कुछ काट देते. कई दिनों की अथक मेहनत के बाद तैयार होती थी एक धरोहर. जैसे ही कोई आकृति तैयार होती, सीधे मेरे द़फ़्तर आते, अनुग्रह और आग्रह करने. धरोहर की फ़ोटो खिंचवाते. एक लेख लिखवाते, पत्र-पत्रिका में भेज देते.

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शुरू-शुरू में तो मुझे मज़ा आता था, पर फिर मैं उनसे कतराने लगी. टालने-टरकाने का बहाना ढूंढ़ने लगी. उन्हें टालने-टरकाने का यह पल और उस पल से उपजा हुआ एहसास, कभी-कभी मुझे आत्मग्लानि से भर देता था. मेरे इस व्यवहार से उन्हें पीड़ा भी होती थी, पर अपने जीवन में अपनों से मिली पीड़ा के वह इतने आदी हो चुके थे कि सब कुछ हंसकर झेल जाते थे. मेरा टरकाना उनके अपने घरवालों की दुत्कार से बहुत कम पीड़ादायक था. उन्होंने कई बार अपनों से मिली इस दुत्कार की रामकहानी मुझे सुनाई थी. पकी हुई उम्र के थे, इसलिए रामकहानी सुनाते व़क़्त मन के भीतर उमड़ी आंसुओं की बाढ़ को आंखों के बांध से बांधे रखते थे. क्या मजाल, जो एक बूंद भी छलक जाए. मुझे भी अपनी आंखों के गीलेपन को पीना पड़ता था.
रिटायरमेंट (सेवानिवृत्ति) पर मिला सारा पैसा अपनी पत्नी को देना वे अपने जीवन की पहली और सबसे बड़ी भूल मानते थे. उनकी पत्नी बेटे-बहुओं के मोहपाश में बंधी हुई थी. रिटायरमेंट पर मिला रुपया बेटों को देती रही. बेटों ने दो कमरोंवाले पुराने मकान को चार कमरोंवाले आधुनिक मकान बनाने में सारे रुपए ख़र्च कर दिए. यज्ञदत्तजी के अनुसार उनकी पत्नी सब कुछ लुटा बैठी थीं. वे कई बार इस बात को दोहराते थे. इस वाक्य को कभी-कभी ‘हादसे’ का नाम भी देते थे. अपने दर्द को छुपाने के लिए ज़ोर से हंस भी देते थे.
मकान बन गया, तो सब कुछ बदल गया. मकान का आंगन तो गया ही, अपने भी पराए हो गए. यज्ञदत्त शर्मा के तीन बेटों ने एक-एक कमरा अपने कब्ज़े में ले लिया और चौथे कमरे को ड्रॉइंगरूम बना दिया.
आदमी अपनी हैसियत को छुपाने के लिए अक्सर इस ड्रॉइंगरूम का सहारा लेता है. ख़ूब सजा-धजा के रखा जाता है इसे. ड्रॉईंगरूम में सभी बूढ़ों का प्रवेश वर्जित रहता है. कोई तख़्ती तो नहीं टांगता, पर होता यही है. नए ज़माने की नई सोच.
यज्ञदत्त शर्मा का घर भी नए ज़माने की इस रीति-नीति से कैसे बच सकता था भला? परोक्ष-अपरोक्ष रूप से उनकी बहुओं ने उन्हें जता दिया था कि ड्रॉइंगरूम में उनका प्रवेश वर्जित है. मेहमानों के सामने आने की भी सख़्त मनाही थी.
उनकी जीवनभर की जमा-पूंजी से बने उनके अपने घर में उन्हें मकान का वो हिस्सा दिया गया, जिसे पुराने ज़माने का चौक या वराण्डा कहते थे. अब उसका नामकरण ‘लॉबी’ कर दिया गया है.
चार कमरों के बीच की खुली जगह के दो कोने यज्ञदत्त शर्मा और उनकी बीवी को मिले. एक कोने में यज्ञदत्तजी का पुराना पलंग और कबाड़ जमा था, दूसरे कोने में पत्नी की खाट लगा दी गई. चौक में एक लंबा-सा पर्दा भी था. मेहमानों के आने पर इस पर्दे को खींच दिया जाता था, ताकि ड्रॉइंगरूम का रौब कम न हो जाए.
“यह तो गनीमत है कि सरकार ने एक नियम बना दिया है. पेंशन एकाउण्ट (खाता) ज्वाइंट एकाउण्ट (संयुक्त खाता) नहीं हो सकता, वरना शायद ये दो कोने और दो व़क़्त का खाना भी नसीब न होता.” यज्ञदत्त जी के ये शब्द मेरे कानों में अक्सर गूंजते रहते थे.
उन्होंने एक समझौता किया था. इस समझौते के तहत पेंशन के तीन चौथाई हिस्से के बदले उन्हें रहने-खाने की सुविधाएं मिल रही थीं. बेटों का सुख भी मिल रहा था. इसे ‘नामसुख’ कहते हैं. बाप का नाम बेटे के नाम के साथ जुड़ा रहे तो वह ‘नामसुख’ कहलाता है. कई लोग तड़पते हैं इस ‘नामसुख’ के लिए.
यज्ञदत्तजी ने जब अपने तीनों बेटों का स्कूल में दाखिला करवाया था, तो बहुत गर्व से नाम लिखा था- राजेश यज्ञदत्त शर्मा, विमल यज्ञदत्त शर्मा, कमल यज्ञदत्त शर्मा. उनके रिटायरमेंट तक यही नाम चले. घर में भी और घर के बाहर लगी नेमप्लेट पर भी. नया मकान बना, तो पुरानी नेमप्लेट फेंक दी गई और एक नई तख़्ती टांग दी गई. इस तख़्ती पर लिखा था ‘कमल वाई. शर्मा, विमल वाई. शर्मा तथा राजेश वाई. शर्मा’ मन और एहसासों के साथ नाम भी छोटे हो गए थे.
यूं तो यज्ञदत्तजी का नाम हर तरह से गायब हो गया था, पर उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है. यज्ञदत्त का ‘वाई.’ तो बचा है अभी. इसी वाई को ज़िंदा रखने के लिए दुआएं मांगी जाती हैं, मन्नतें मांगी जाती हैं, एक अदद बेटे की. यज्ञदत्तजी तो ख़ुशनसीब थे, तीन-तीन ‘वाई’ टंगे थे उनके घर के आगे.
ऐसे यज्ञदत्तजी ने अपना शौक़ बदल लिया और अब वे ख़ुश हैं, यह देखकर मुझे आत्मसंतोष मिल रहा था.
यज्ञदत्त शर्मा ‘नवीन’ अपने इस नए शौक़ के सम्मोहन में पूरी तरह बंध गए थे. बेटे-बहुएं, पोते-पोतियां यूं एकदम बदल जाएंगे, उनके अपने जो पराए हो गए थे, फिर अपने हो जाएंगे, मेरे लिए यह बात सच्चाई कम और अजूबा अधिक थी. जीवन के आख़िरी मोड़ पर आकर अचानक ज़िंदगी यूं करवट ले सकती है, इस बात को देखते-समझते हुए भी मुझे इस पर विश्‍वास नहीं हो सका.
इस सम्मोहन की टोह लेना मुझे सबसे ज़रूरी लगने लगा. यज्ञदत्तजी से पूछना बेकार था. वह अपने आपमें इतने मंत्रमुग्ध थे कि उन्हें अब दुनिया के किसी और सुख से कोई सरोकार न था. वह एक बात बार-बार बताते और गद्गद् होते रहते थे. वह कहते- “न जाने क्या जादू हो गया. जब भी बांसुरी बजाता हूं पोता-पोती, बेटे-बहुएं पास आ बैठती हैं. बांसुरी सुनते हैं सभी ध्यान से. सब मुझसे प्यार से बातें भी करने लगे हैं.”
फिर धीरे से बोले, “अब तो ड्रॉइंगरूम में जाने की मनाही भी नहीं.”
मुझे लगा कि यज्ञदत्तजी को टटोलना, उनके सम्मोहन का कारण जानना मकड़ी के जाल के सिरे को तलाशने जैसा है.
मैंने तय कर लिया कि मैं यज्ञदत्त शर्मा ‘नवीन’ की पत्नी से मिलूंगी.
एक दिन मौक़ा तलाश कर मैं उनके घर गई. मेरा सौभाग्य कि मैं उनके घर ऐसे व़क़्त पहुंची, जब घर पर उनकी पत्नी अकेली थीं. उनकी पत्नी से मेरा मिलना तो कम होता था, पर वे जानती थीं कि मैं यज्ञदत्तजी की एकमात्र सच्ची हमदर्द हूं. उनकी पत्नी से थोड़ी देर तक मैंने इधर-उधर की बात की, फिर सीधा सवाल किया.
मेरे सवाल को उन्होंने टालने की बहुत कोशिश की, पर फिर हथियार डाल दिए. मुझसे वायदा लिया कि मैं कभी किसी से इस राज़ का खुलासा नहीं करूंगी.
वह मुझे बताने लगीं.

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“हम औरतें सहनशील होती हैं. रिश्तों के खोखलेपन और खालीपन को पी जाती हैं. किसी को कुछ नहीं बतातीं, पर मुझसे इनकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी. एक सीमा जब पार होती दिखी, तो मैंने अपने भीतर छिपाए एक राज़ का पर्दाफाश कर दिया.”
“राज़?” मैंने सवाल किया.
“हां राज़. जब मैं इस परिवार में आई, तब से मैंने मन ही मन कुछ निर्णय कर लिया था. यह बहुत दरियादिल थे. दिल भी खुला रखते थे, जेब भी. हर महीने पूरी तनख़्वाह मेरे हाथ में रखते थे. फिर जब जितनी ज़रूरत होती, लेते रहते.
हर महीने मैं इनकी तनख़्वाह में से कुछ रुपए बचा लेती थी. ये सारे रुपए आड़े समय में काम आएंगे, यह सोचकर मैं ऐसा करती थी. इसके लिए साल में बारह झूठ बोलने पड़ते थे मुझे.”
“बारह झूठ?” मैंने चौंककर कहा.
“हां बारह झूठ. हर महीने तनख़्वाह में से जो पैसे बचाती थी, उसके बारे में हर महीने एक झूठ बोलना पड़ता था कि सब पैसे ख़त्म हो गए. फिर इनका रिटायरमेंट हुआ. इन्होंने हमेशा की तरह सारी रकम मेरे हाथ में रख दी. हमने मकान बनवाया. मकान का ख़र्चा मैं देती रही. एक हद के बाद मैंने कह दिया कि रकम ख़त्म हो गई.
यूं करते-करते मेरे पास पांच लाख रुपए जमा हो गए. शुरू में ही मैंने पोस्ट ऑफ़िस में खाता खुलवा रखा था. ये सारे पैसे उसमें जमा करवाती रही. ब्याज मिलता रहा. बूंद-बूंद करके घड़ा भर गया.
वह थोड़ी देर चुप हो गईं. गहरी पीड़ा की रेखाएं उनके चेहरे पर उभर आईं.
“फिर?” मैंने सवाल किया.
“फिर क्या? मैं जानती थी बेटे-बहुएं रकम ख़त्म होते ही मुंह फेर लेंगे, पर इतने संगदिल हो जाएंगे, मुझे विश्‍वास न था. जिन बच्चों पर हमने कभी हाथ नहीं उठाया, वे बच्चे अपने पिता पर हाथ उठा लें, यह कड़वा सच मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ. मैंने अपनी पासबुक अपने बेटे-बहुओं के सामने रख दी. एक समझौता किया अपनों के साथ, मैं उन्हें रकम दूंगी, वे लोग मुझे और मेरे पति को माता-पिता का सम्मान देंगे. सम्मान का यही समझौता रिश्तों का सम्मोहन है.
कोई सवाल बाकी न बचा था. मैं उठी और चली आई. घर के बाहर लगी तख़्ती भी बदल गई थी. अब उसमें ‘वाई’ की जगह ‘यज्ञदत्त’ चिपक गया था.

– पूनम रतनानी

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कहानी- आस्था का फल (Short Story- Aastha Ka Phal)

Short Story- Aastha Ka Phal

“ये विज्ञान का दुरुपयोग है, अगर हम इसका इसी प्रकार उपयोग करते रहे तो ये अभिशाप बन कर कहर बन सकता है.” अनु उत्तेजित हो उठी.

क्षितिज बिना कुछ कहे कमरे से बाहर चले गए.

उस दिन के बाद से अनु ने सभी के मिज़ाज में परिवर्तन देखा, ऐसी स्थिति में वह ज़्यादा तनाव में नहीं रहना चाहती थी. अत: उसने कुछ दिनों के लिए मां के यहां जाने का फैसला कर लिया.

मां-पिताजी उसे देख कर बेहद ख़ुश हुए, परन्तु ज्यों-ज्यों उन्हें भी वास्तविकता का पता चला, उन्हें भी ससुराल पक्ष की बात अधिक सही लगी.

अनुभा अपनी पूर्व योजना के अनुसार जब दूसरी बार गर्भवती हुई, तो बहुत प्रसन्न थी. उसकी पुत्री अब तीन वर्ष की हो चुकी थी. अनुभा ने महसूस किया कि अब वह दूसरे बच्चे को जन्म देकर, उसे भी पूरी ज़िम्मेदारी से पाल सकती है और इसके साथ ही उसके इस कर्त्तव्य की इति भी हो जायेगी.

इस शुभ सूचना से घर में सभी के चेहरों पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई. पर सभी के दिल में चाह थी कि इस बार बेटा ही होना चाहिए. सास-ससुर दोनों ने ही बातों-बातों में कह भी दिया कि इस बार तो सारे घर को रौशन करने वाला चिराग़ ही आना चाहिए, फिर वंश बेल भी तो बढ़नी है.

सब कुछ सुनकर अनुभा चुप थी. पहले प्रसव के समय की सब बातें अभी तक उसे याद थीं, बेटी पैदा होने की किसी को ज़्यादा ख़ुशी नहीं हुई थी. बेमन से ही सबने सब रीति-रिवाज़ निबाहे थे.

परन्तु पति क्षितिज के उदार व्यवहार ने इस स्थिति से उबरने में उसकी बड़ी मदद की. प्रत्यक्ष रूप से तो उन्होंने बेटी के जन्म को भी एक सुअवसर के रूप में ही स्वीकार किया.

अनुभा को बेटे व बेटी में कोई अन्तर न लगता था. वह स्वयं इंजीनियर थी. उसके विवाह की बुनियाद शायद उसकी ये डिग्री ही थी. समाज में ऊंची प्रतिष्ठा रखने वाले उसके ससुराल पक्ष के लोग मुंह खोल कर दहेज की मांग तो नहीं कर सके थे, पर इस बात से आश्‍वस्त ज़रूर थे कि इंजीनियर बहू ऊंची नौकरी करेगी तो ख़ुद ही पैसा बरसेगा.

परन्तु यहां भी अनुभा अपने आदर्शों पर अडिग रही. वह वैवाहिक जीवन के साथ-साथ मातृत्व का भी पूरा सुख उठाना चाहती थी, जबकि पहले दिन से ही पति सहित सास-ससुर सभी यही चाहते थे कि जल्दी ही अनुभा अच्छी-सी नौकरी कर ले. कई अच्छी फर्मों से उसके लिए ऑफ़र भी आए, पर उसने नौकरी करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. एक दिन अन्तिम प्रयास करते हुए क्षितिज ने बात छेड़ी.

“अनु, तुम इतनी पढ़ी-लिखी होकर भी इस दिशा में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही हो.”

“हां क्षिति, मैं वैवाहिक जीवन का पूरा आनंद उठाना चाहती हूं. नौकरी करने में अभी मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है.”

क्षितिज हंस पड़ा, “अरे, नौकरी करते-करते आनंद नहीं उठाया जा सकता क्या? ये तुमने बड़ी अजीब-सी बात सोच रखी है.”

“बात अजीब नहीं, सत्य है क्षिति, यदि शुरू से ही हम दोनों अपनी-अपनी नौकरियों में उलझ जायेंगे तो एक-दूसरे को जानने-समझने का अवसर कब मिलेगा. तब हम एक-दूसरे के प्रति ज़िम्मेदारियां समझने के बजाए अपनी-अपनी नौकरियों के प्रति अधिक ज़िम्मेदार रहेंगे. तब प्रेम के बदले हमारे बीच दरारें पड़ सकती हैं, हमारा दांपत्य जीवन प्रभावित हो सकता है.”

“अब तुम्हें कौन समझाए? चलो छोड़ो, मुझे तो तुम्हारे पैसों की ज़रूरत भी नहीं है अनु, बस मैं तो तुम्हारी योग्यता को व्यर्थ में यूं दम तोड़ते नहीं देखना चाहता था.”

“योग्यताएं कभी दम नहीं तोड़ती हैं क्षिति, यदि सही समय और सही उद्देश्य के लिए उनका प्रयोग किया जाए तो लाभप्रद सिद्ध होती हैं.”

“ठीक है बाबा, मैं तो तुम्हें ख़ुश देखना चाहता हूं बस.” क्षितिज कुछ चिढ़ कर बोले.

“बस क्षितिज, मैं आपके मुंह से यही सुनना चाहती थी. जब ज़रूरत होगी, मैं अपनी योग्यता का उपयोग अवश्य करूंगी. पहले नारी जीवन के कर्त्तव्य तो पूरे कर लूं.” अनुभा क्षितिज के गले में बांहें डाल, उसके गले लग गयी. क्षितिज ने भी जबरन मुस्कुराने का प्रयत्न किया.

ये उसके ज़िद्दी निर्णय का पहला झटका उसके सास-ससुर को लगा. उन्हें भी उसने यही कहकर समझाया कि पहले मैं बच्चों को पाल-पोसकर स्वावलम्बी बना दूं, तब अपने बारे में सोचूंगी. अपने स्वार्थ के कारण मैं बच्चों से उनका बचपन नहीं छीनना चाहती हूं, उन्हें अपनी स्नेह छाया में अपने हाथों से पालना चाहती हूं, ताकि माता-पिता के प्रति वे भी अपने कर्त्तव्यों से अनभिज्ञ न रह जाएं.

अनुभा अच्छी तरह जानती थी कि इस बार सबके मन में काफ़ी हलचल चल रही होगी. इस बार बेटी का जन्म सब पर गाज बन कर गिरेगा, पर वह चुपचाप आने वाले पलों का इन्तज़ार कर रही थी.

मौक़ा देख एक दिन उसकी सास ने कहा, “बेटा अनु, तुम ख़ुद ही काफ़ी समझदार हो, यदि बुरा न मानो तो जांच करवा कर पता करवा लो कि इस बार बेटा है या बेटी.”

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अनु ने पहले तो बड़ी तीव्र दृष्टि से उन्हें देखा, लेकिन जल्दी ही स्वर को नम्र बना कर बोली, “मांजी, क्या होगा जांच कराने से, अब तो जो होना है वही होगा. जांच से बदला तो नहीं जा सकता.”

“बदला क्यों नहीं जा सकता बेटा? यदि फिर बेटी हुई तो उसे गिराया भी जा…”

“बस मांजी बस, कुछ समझ भी रही हैं कि आप क्या कह रही हैं, अपने गर्भ में पल रहे जीव की हत्या करा दूं मैं?”

“तुम बेटा मुझे ग़लत मत समझो, मेरा मतलब ये नहीं है.” सास कुछ मीठा बनते हुए बोली.

“आपका मतलब चाहे जो हो मांजी, पर इतना तो आप जानती ही होंगी कि जांच कराना व गर्भ गिराना दोनों ही क़ानूनन अपराध है. क्या आप चाहती हैं कि मैं कोई अपराध करूं?”

मांजी कुछ और बोलतीं, इससे पहले ही वह उठकर अपने कमरे में चली गयी. अनमने मन से वह चादर ओढ़ कर लेट गयी. घरवालों के मन में उपजी इस नयी बात ने उसे परेशान कर दिया था.

तभी क्षितिज ने कमरे में प्रवेश किया. अनु उठकर बैठ गयी और बोली, “क्षिति, तुम मुझे एक बात साफ़-साफ़ बताओ कि तुम भी चाहते हो कि इस बार बेटा ही हो.”

“तुम भी से तुम्हारा क्या मतलब है? अनु, क्या इस बार तुम्हारी यही इच्छा नहीं है?” वह मुस्कुराकर बोला.

“मेरी नहीं, घर में सभी और ख़ासकर मांजी यही चाहती हैं.”

“कुछ बुरा तो नहीं चाहतीं वे. एक लड़की है तो दूसरा लड़का हो जाए, ऐसा चाहने में क्या बुराई है.”

“चाहने में कुछ बुराई नहीं है क्षितिज, लेकिन वे चाहती हैं कि मैं स्कैनिंग द्वारा पता लगा लूं, यदि इस बार भी लड़की हो तो उसे…” कहते-कहते अनु चुप हो गयी.

क्षितिज भी कुछ गंभीर हो उठा, वह टाई की नॉट खोलते हुए बोला, “अनु शायद इसमें भी कोई बुराई नहीं है.”

“ये तुम कह रहे हो क्षिति, कम से कम मुझे तुमसे ये उम्मीद न थी.” अनु आहत-सी हो उठी.

“इसमें उम्मीद की क्या बात है अनु? अब जहां दो के बाद तीसरे बच्चे की गुंजाइश नहीं है, वहां तो ये क़दम उठा ही सकते हैं.”

“पर ये सब क़ानून की दृष्टि में अपराध है, इतना तो आप भी जानते ही होंगे.”

“हां होगा, पर ज़रूरी है कि सब कुछ ढोल बजा कर ही किया जाए, कुछ काम चोरी-छुपे भी होते हैं. हमारे इतने डॉक्टर मित्र हैं, सब कुछ आसानी से हो जाएगा.”

“अच्छा, तो अपराध के ऊपर अपराध, तुमसे मुझे समझदारी की उम्मीद थी क्षितिज, पर तुम सब तो एक ही स्वर में बोल रहे हो.”

“मैं समझदारी की ही बात कर रहा हूं अनु, वंश बेल को बढ़ाने के लिए बेटे की इच्छा करना क्या मूर्खता है? यदि विज्ञान की प्रगति ने हमें ये सुविधा प्रदान की है तो इसका उपयोग करने में क्या हर्ज़ है.” वह कुछ तेज़ स्वर में बोले.

“ये विज्ञान का दुरुपयोग है, अगर हम इसका इसी प्रकार उपयोग करते रहे तो ये अभिशाप बन कर कहर बन सकता है.” अनु उत्तेजित हो उठी.

क्षितिज बिना कुछ कहे कमरे से बाहर चले गए.

उस दिन के बाद से अनु ने सभी के मिज़ाज में परिवर्तन देखा, ऐसी स्थिति में वह ज़्यादा तनाव में नहीं रहना चाहती थी. अत: उसने कुछ दिनों के लिए मां के यहां जाने का फैसला कर लिया.

मां-पिताजी उसे देख कर बेहद ख़ुश हुए, परन्तु ज्यों-ज्यों उन्हें भी वास्तविकता का पता चला, उन्हें भी ससुराल पक्ष की बात अधिक सही लगी, क्योंकि वे स्वयं भी पुत्र रत्न से वंचित थे और यही मानते थे कि लड़की अपनी योग्यता से चाहे आकाश छू ले, पर होती तो पराया धन ही है, बुढ़ापे की लाठी तो बेटा ही होता है.

अनु ने तर्क देते हुए कहा, “मां, बेटा हो तो मुझे भी अपार ख़ुशी होगी, पर बेटी को मार कर पुत्र प्राप्ति का ग़लत तरी़के से यत्न करना कतई ठीक नहीं है.”

मां ने कहा, “अच्छा अनु, तुम्हारी सभी बातें सही हैं, पर पता करने में क्या हर्ज़ है, यदि बेटा हुआ तो कम से कम तुम्हारे ससुराल वाले अभी से ख़ुश हो जायेंगे.”

“मुझे इस विषय में किसी की ख़ुशी या नाराज़गी की परवाह नहीं है मां. इसे तो ईश्‍वर का उपहार समझ स्वीकार करना चाहिए.”

अनुभा ने देखा मां भी गंभीर हो गयी है. उसे लगा जिस परिस्थिति से बच कर वह यहां तनावमुक्त होने आयी थी, उसकी छाया यहां भी विराजमान है.

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अनुभा ने मन ही मन सोचा क्यों न सबका दिल रखने के लिए जांच करवा ही लूं. यदि लड़का हुआ तो सब झंझट ही समाप्त हो जायेगा और यदि लड़की हुई तो कम-से-कम सब अभी से मानसिक रूप से तैयार हो जाएंगे. उस व़क़्त उन लोगों को ज़्यादा मानसिक आघात नहीं लगेगा और मैं भी बाक़ी का समय सुख-चैन से काट सकूंगी.

मां के साथ वह उनकी पारिवारिक डॉक्टर सुधा सेन के पास जांच के लिए गई.

जांच की रिपोर्ट जब उन्होंने फ़ोन पर मां को दी, तो वह उदास-सी हो गयी. उसके चेहरे की रंगत देख अनुभा सब समझ गयी, कुछ न पूछा.

मां फ़ोन रखकर रसोई में चली गयी, वह उसके पीछे गयी और उसके गले में बांहें डाल कर बोली, “अब उदास क्यों हो रही हो मां, सरप्राइज़ में ही आनंद था न.”

“डॉक्टर ने मुझे एक बात और भी बताई है, यदि तुम सहमत हो तो.” मां उसकी बातों पर ध्यान दिए बिना बोली.

“अब और क्या चमत्कार करवाना चाहती हो मां?” वह हंसकर बोली.

“चमत्कार ही जैसी बात है बेटी, डॉ. सुधा ने कहा है कि यदि इस मुसीबत से तुम छुटकारा पाना चाहो तो वह गुप्त रूप से तुम्हारी मदद कर सकती हैं- और इसके बाद जब तुम पुन: गर्भधारण करो तब वह तुम्हें एक ऐसी अचूक दवा देंगी, जिससे सौ फ़ीसदी लड़का ही होता है.”

अनुभा ज़ोर से हंस पड़ी, “मां, यदि ऐसा संभव होता, तो ये समस्या कब की हमारे समाज से ख़त्म हो चुकी होती. मां आख़िर ये दकियानूसी बातें तुम्हें सूझ कैसे रही हैं?”

“बस केवल इसलिए कि ससुराल में तुम्हें सम्मान मिले.” मां ने समझाते हुए कहा.

“मां, मेरे सम्मान की फ़िक्र न करो, बेटा यदि आज सम्मान दिलायेगा तो ज़रूरी नहीं कि वह बुढ़ापे का सहारा भी बने ही.

आज हमारे समाज में वृद्धों की समस्या इन चहेते पुत्रों के कारण ही जिधर देखो मुंह बाए खड़ी है. क्या निहाल कर रहे हैं- वे अपने बूढ़े मां-बाप को.”

अनु के ज़िद्दी स्वभाव को मां जानती थी. अत: वह चुप हो गयी.

अनु ने निश्‍चय किया कि इस बार डिलीवरी के लिए वह मां के पास ही रहेगी. समय बीता और प्रसव का समय भी आ पहुंचा. घर में किसी को कोई ज़्यादा उत्साह नहीं था. मां को केवल एक ही चिन्ता थी कि अनु की डिलीवरी का सब काम राज़ी-ख़ुशी निपट जाए और वह अपने घर जाए.

समय आने पर अनुभा प्रसन्न मन से अस्पताल गई और उसने सबको एक बहुत बड़ा सरप्राइज़ दिया. जब डॉक्टर ने बाहर आकर, मुंह लटकाए बैठे परिवार जनों को बताया कि अनुभा ने एक सुन्दर व स्वस्थ बेटे को जन्म दिया है तो सभी लोग हतप्रभ हो गए. मां तो सोच रही थी कि यदि हम डॉक्टर की सलाह मान लेते तो… और वह सिहर उठी.

थोड़ी देर बाद सभी अनु को देखने कमरे में पहुंचे. वह पहले की ही तरह शान्त चित्त थी. मां से नज़रें मिलीं तो वह मुस्कारा उठी.

”कुदरत के नियमों का उल्लंघन करना इंसान के लिए हितकर नहीं है मां. इंसान से ग़लतियां होती हैं, पर कुदरत सबकी ज़रूरतें पूरी करती है.”

मां की आंखों में ख़ुशी के आंसू भर आए, उन्होंने अनु के सिर पर ममता का हाथ फेर कर अपनी सहमति दी.

“ये तुम्हारी आस्था का ही फल है बेटा, तुमने तो भगवान की इच्छा को ही हृदय से स्वीकार कर लिया था, इसलिए शायद उसने तुम्हारी ज़रूरत को पूरा किया.” पिता ने पुत्री पर गर्व करते हुए कहा.

डॉ. सुधा भी पीछे कोने में खड़ी सोच रही थी कि आख़िर उससे कहां ग़लती हो गई, पर शुक्र है भगवान का कि अनु के दृढ़ निश्‍चय के कारण वह यह पाप करने से बच गई.

पूरा कमरा हंसी के ठहाकों और बधाइयों से गूंज रहा था. अनुभा की ख़ुशी में भी उदासी की झलक थी कि अब तो नारी किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है, फिर उसके जन्म पर ऐसी ख़ुशियां क्यों नहीं मनाई जातीं. शायद जनक को ही पहल करनी होगी तभी ये भेद मिट सकेगा. उसने सबकी ओर से मुंह फेर कर आंखें बंद कर लीं.

– मधु भटनागर

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