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कहानी- ओल्ड इज़ गोल्ड (Short Story- Old Is Gold)  

 

“ओह! कम ऑन. आरती वो नहीं, तो क्या हम गाएंगे? काश! मेरी भी ऐसी इन-लॉ होतीं.” तभी विनीता बोल उठी, “शिल्पी, हमसे नहीं मिलाओगी अपनी इन-लॉ को? हम लोग तो तरसते हैं कोई बुज़ुर्ग साथ रहे. कितना ईज़ी हो जाता है हमारे लिए भी और बच्चों के लिए भी.” इन बातों से शिल्पी हैरान रह गई. वो सोचती थी कि सभी सहेलियों की चाहत न्यूक्लियर फैमिली ही होगी.

Kahani

डोरबेल बजी तो शिल्पी चौंक गई. दिन के तीन बजे कौन हो सकता है? दरवाज़ा खोला, तो हैरान रह गई. “दीप्ति तुम? इस समय?”

दीप्ति अधीरता से बोली, “शिल्पी, तेरी इन-लॉ घर में ही हैं न?”

“हां, वो कहां जाएंगी? मगर…”

“अगर-मगर छोड़, मुझे उनसे ही मिलना है.”

“उनसे?” शिल्पी आश्‍चर्य से बोली.

“हां, तीज आ रही है न! कितने सालों से ऐसे ही रस्म-सी निभाती आ रही हूं. इस बार सोचा उनसे सारे डिटेल पूछ लूं. कितनी गुणी व जानकार हैं. प्लीज़, चल न उनके कमरे में.” दीप्ति तो जैसे घोड़े पर सवार थी. शिल्पी सोच रही थी कि यहां उसकी सास की कितनी कद्र हो रही है, जबकि उसका ख़्याल कुछ और ही था. दीप्ति के जाने के बाद उसे पुरानी बातें याद आने लगीं.

तीन-चार महीने पहले की बात रही होगी. शाम को ऑफिस से लौटकर रवि सोच में डूबा था. शिल्पी बोली, “क्या हुआ, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? ऑफिस की कोई बात तो नहीं?”

“मेरी तबीयत ठीक है. दिन में सतीश का फोन आया था कि मां की तबीयत कुछ ठीक नहीं रहती. आजकल कुछ खाती-पीती भी नहीं. जाने क्या सोचा करती हैं.” रवि के स्वर में चिंता व पीड़ा झलक उठी.

“यह कौन-सी बड़ी समस्या है कि तुम इतने चिंतित हो रहे हो. वो लोग कुछ पैसा चाह रहे होंगे. तुम एक-डेढ़ हज़ार रुपए भेज दो और कह दो वहीं सरकारी अस्पताल में दिखा दें. पैसा मिल जाएगा, तो उन लोगों को रास्ता भी ख़ुद ही सूझेगा.” शिल्पी ने दरियादिली की आड़ में समझदारी दिखाई.

रवि की मां पार्वतीजी फैज़ाबाद में एक गांव में रहती थीं. इकलौता बेटा रवि गुड़गांव में अच्छी पोज़ीशन पर था. लक्ज़री अपार्टमेंट में अपना फ्लैट, महंगी कार आदि सब ख़रीद चुका था. कुछ ही दिन पहले पिताजी का निधन होने पर उसने मां को साथ चलने की बहुत ज़िद की, पर उन्होंने ही मना कर दिया कि यहां तुम्हारे पिताजी की यादें जुड़ी हैं. सारा जीवन यहीं बिता दिया, तो बुढ़ापे के दो-चार साल भी कट जाएंगे. गांव में बड़ा खानदानी मकान था, जिसमें चाचा का भी परिवार संयुक्त रूप से रहता था. इसलिए अकेलेपन या खाना बनाने की भी कोई समस्या नहीं थी. खेती-बाड़ी सम्मिलित थी, जिसे उसका चचेरा भाई सतीश देखता था. उसकी पत्नी पूरे घर की देखभाल के साथ मां को भी खाना व दवा देने की सारी ज़िम्मेदारी ख़ुशी-ख़ुशी निभाती थी.

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“नहीं शिल्पी, इतना आसान नहीं है. मुझे लगता है कि पिताजी के बाद मां एकदम अकेली पड़ गई हैं और इस समय उनको हमारी ज़रूरत है. भले ही वो कुछ न कहें, पर मुझे बस इस बात का डर है कि ज़्यादा अकेलेपन की वजह से मां कहीं डिप्रेशन में न चली जाएं. इसलिए सोचता हूं कुछ दिनों के लिए उनको यहीं ले आऊं. कुछ दिन बाद यदि वो चाहें, तो गांव वापस पहुंचा आऊंगा.” रवि ने कहा.

“ऐसा कैसे हो सकता है?” शिल्पी ने तुरंत तेवर बदले. “यहां इस पॉश सोसायटी में उनको कहां रखेंगे और कुल तीन ही तो कमरे हैं. ड्रॉइंगरूम, हमारा बेडरूम और एक बच्चों का कमरा. कहां रखोगे उनको? जगह भी है? और जब बच्चे छोटे थे सहारे के लिए बुलाया था, तब तो आई नहीं और अब बोझा बनने को तैयार हैं.” कटु स्वर में बड़बड़ाते हुए शिल्पी ने अपने सारे तीर एक साथ छोड़ दिए.

“बात समझो शिल्पी. वे मेरी मां हैं, कोई बोझ नहीं और न ही कोई आउटडेटेड फर्नीचर हैं कि पॉश सोसायटी में उनको लाने में शर्म आए और जगह घर में नहीं दिल में होनी चाहिए. जो जी में आए उल्टा-सीधा मत बोलो. उस समय पिताजी यहां आते नहीं और अपने स्वार्थ के लिए पिताजी को गांव में अकेले छोड़कर मां को बुलाना व्यावहारिक नहीं होगा, यही सोचकर मैंने ही उनसे नहीं कहा था, तो इसमें उनका क्या दोष? और फिर वे अभी भी अपनी इच्छा से तो यहां आ नहीं रही हैं, मैं ही ज़िद करके लाऊंगा. और अगर इकलौता बेटा ही संकट के समय काम नहीं आएगा, तो कब काम आएगा? शिल्पी, परिवार इसीलिए होते हैं. माता-पिता, बेटा-बहू, भाई-बहन- ये सब ऐसे रिश्ते हैं कि इनसे ही हमारी ख़ुशियां बढ़ती हैं और दुख घटते हैं. रही बात जगह की, तो वे बच्चों के कमरे में रह लेंगी.” रवि ने ग़ुस्से पर क़ाबू रखते हुए अपने स्वर में कुछ दृढ़ता लाते हुए कहा.

“जब तुमने सब पहले ही सोच लिया है, तो मुझसे क्यों पूछ रहे हो. जो मर्ज़ी करो.” शिल्पी ग़ुस्से में उठकर चल दी. वो जानती थी कि बच्चे अपनी दादी के साथ ख़ुशी-ख़ुशी एडजस्ट कर लेंगे, क्योंकि उनकी दादी का स्वभाव ही ऐसा था. घर-गृहस्थी की समस्या या सिलाई-बुनाई-कढ़ाई हो, विभिन्न व्यंजन बनाना या घर संभालना उनका कोई सानी न था. रवि समर वेकेशंस में रतन, रुचि व शिल्पी के साथ कुछ दिन अपने गांव ज़रूर जाता, ताकि बच्चों को अपने पूरे परिवार को जानने-समझने का मौक़ा मिले. बच्चों को दादा-दादी का स्नेह से परिपूर्ण स्वभाव, खपरैल वाले मकान, खेत-खलिहान, तालाब, बाग़-बगीचे बहुत अच्छे लगते.

रवि अपनी ज़िद से मां को मनाकर ले ही आया. बच्चों ने उनको अपने कमरे में रखा या दिल में यह तो पता नहीं, पर वे उनको हर समय घेरे रहते. एकल परिवारों में शायद टीवी ही बच्चों के सुख-दुख का साथी होता है, परंतु स्कूल से आकर उनको छोटी-छोटी बातें बतानेवाले बच्चे यह तक भूल गए कि घर में टीवी भी है. रात को दादी के एक ओर रतन, तो दूसरी ओर रुचि लेटकर कहानी सुनते-सुनते सोते, वरना पांच वर्षीया रुचि अक्सर शिल्पी के साथ सोने की ज़िद करती थी.

शिल्पी का मन किचन में अधिक न लगता इसलिए जैसे-तैसे निपटाती, पर पार्वतीजी विभिन्न पौष्टिक व्यंजन बच्चों को मान-मनुहार करके खिलातीं. उनको बच्चों का साथ बहुत भाता, बल्कि वे ख़ुद ही बच्चा बनकर कभी उनके साथ लूडो, कैरम बोर्ड सहित अन्य गेम्स खेलतीं, तो कभी बातें करतीं. बच्चे भी चाहते हैं कि मन की बातें किसी से शेयर करें और इसके लिए बड़े-बुज़ुर्ग सबसे अच्छे साथी होते हैं. बच्चों के आर्ट-क्राफ्ट के होमवर्क शिल्पी के सिरदर्द थे, पर पार्वतीजी मनोयोग से करातीं. कुछ लोगों की स्कूली शिक्षा भले ही कम हो, पर मनोविज्ञान का अद्भुत ज्ञान होता है. पार्वतीजी भी भले ही बच्चों को डांटती-फटकारती न थीं, पर परोक्ष रूप से अनुशासन, संस्कार, सद्गुण, सदाचार आदि विकसित कर रही थीं.

उस दिन किटी का नंबर शिल्पी का था. उसने सासूमां को बच्चों के कमरे में ही रहने की हिदायत दी थी. वो नहीं चाहती थी कि उसकी आउटडेटेड सास दिखें और उसकी रेपुटेशन ख़राब हो. शाम के पांच बजे थे कि एकाएक मधुर स्वर गूंज उठा, “ओम् जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करें…” शिल्पी असहज होने लगी. “यह क्या शिल्पी?” रूपा ने पूछा ही था कि शिल्पी सफ़ाई देने लगी, “सॉरी. वो मेरी मदर इन-लॉ आई हैं. पुराने ख़्यालों की हैं न, इसलिए आरती-भजन गाती हैं.” उसके चेहरे पर झेंप साफ़ दिख रही थी.

तब तक सोनल ठहाका मारकर बोली, “ओह! कम ऑन. आरती वो नहीं, तो क्या हम गाएंगे? काश! मेरी भी ऐसी इन-लॉ होतीं.” तभी विनीता बोल उठी, “शिल्पी, हम से नहीं मिलाओगी अपनी इन-लॉ को? हम लोग तो तरसते हैं कोई बुज़ुर्ग साथ रहे. कितना ईज़ी हो जाता है हमारे लिए भी और बच्चों के लिए भी.” इन बातों से शिल्पी हैरान रह गई. वो सोचती थी कि सभी सहेलियों की चाहत न्यूक्लियर फैमिली ही होगी, क्योंकि सास-ससुर का साथ स्वच्छंद जीवन में बहुत बाधक होता है.

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सबके कहने से मजबूर शिल्पी पार्वतीजी को बुला लाई. कॉटन की सादी साड़ी और सुनहरे फ्रेम के चश्मे में पार्वतीजी का गरिमामय व्यक्तित्व, ममता से भरी आंखें और आत्मीय मुस्कान से अभिभूत सारी सहेलियां उठ खड़ी हुईं. “बैठो-बैठो तुम सब तो मेरी बेटियां हो.” पार्वतीजी की बात से तो वे सब ऐसे खिल उठीं जैसे सूखी लता पर सावन की वर्षा हो. “जी पहले आप बैठिए.” रूपा की बात सुनकर पार्वतीजी बैठ गईं.

“मांजी, आप कितना अच्छा गाती हैं. कुछ सुनाइए न?” दीप्ति की बात पर पार्वतीजी मुस्कुरा दीं. “अरे बेटा, अब वो स्वर नहीं रह गया, फिर भी कभी सुना दूंगी. अरे, अगले हफ़्ते जन्माष्टमी है. उस दिन भजन-संध्या रख लो. तुम सब भजन सुनाना, तो मैं भी सुना दूंगी.” पार्वतीजी की बात पर सब खिल उठीं. पहली बार ऐसा कार्यक्रम बना था. पार्वतीजी की बनाई रंगोली और

जन्माष्टमी की सजावट तो सब देखते ही रह गए. फिर उन्होंने ढोलक बजाते हुए ऐसे भजन गाए कि समां बंध गया. क्या बच्चे, क्या बड़े सभी देर रात तक आनंदित होते रहे.

अब तो पार्वतीजी जैसे सब की सास, बल्कि मां बन गई थीं. शिल्पी की सहेलियां किसी न किसी बहाने उनको घेरे रहतीं. कभी कोई नए-पुराने व्यंजन सीखता, अचार-सॉस की विधि लिखता, तो कोई त्योहारों की कथा पूछता. कितने ही भजन व लोकगीत वे उनसे पूछकर लिख चुकी थीं. बाज़ार के अचार की आदी सहेलियों को पार्वती के बनाए सिंघाड़े के अचार ने तो दीवाना ही कर दिया था, इसलिए सभी उनसे अचार बनाना सीख चुकी थीं.

दीप्ति की बेटी को सिंथसाइ़जर सीखने का बहुत क्रे़ज था, पर आसपास म्यूज़िक टीचर न होने से मायूस थी. पार्वतीजी को पता चला, तो बोलीं, “कोई बात नहीं, मैं सिखा दूंगी. तुम्हारे विदेशी बाजे और हारमोनियम का की-बोर्ड एक ही तो है.” उसके बाद दो-तीन बच्चे जब-तब सिंथसाइ़जर सीखने पहुंच जाते. एक दिन दीप्ति ने कहा, “मांजी, अगर आप घर पर म्यूज़िक क्लासेस शुरू कर दें, तो कितनी इनकम हो जाएगी.” इस पर पार्वतीजी मुस्कुराकर बोलीं, “अरे बेटा, पैसा क्या करूंगी. मेरी इनकम तो तुम बेटियों का प्यार और इन बच्चों का अपनापन है.”

अपने बेटे के घर व परिजनों के बीच रहकर प्रेम की धूप से पार्वतीजी का अवसाद तो कोहरे के समान तिरोहित हो चुका था. स्वास्थ्य भी सुधर गया था. वृद्धावस्था में अपनों का साथ संजीवनी के समान होता है, जो जीवन को उत्साह से भर देता है और जीने के नए-नए बहाने भी दे देता है. बुज़ुर्ग वैसे ही मग्न हो जाते हैं जैसे कि बच्चे खिलौने से होते हैं. शायद बच्चों और बुज़ुर्गों को एक-दूसरे का साथ कुछ अधिक भाता है, जो आजकल दुर्लभ होता जा रहा है.

रवि भी कुछ दिनों से शिल्पी में बदलाव महसूस कर रहा था कि मां के यहां रहने से शिल्पी ख़ुश ही है. इसलिए रात में जान-बूझकर बोला, “मां का स्वास्थ्य तो सुधर ही गया है, तो क्यों न गांव छोड़ आऊं. तुम भी सोचती होगी कि इतने महीने हो गए और स्वस्थ होने के बावजूद बोझ बनी हुई हैं.”

शिल्पी पुरानी बातों को लेकर ग्लानि महसूस करती थी, परंतु कैसे कहती कि उनके आने से ज़िंदगी बदल गई है. इसलिए परोक्ष रूप से बोली, “लेकिन ऐसा न हो कि वहां जाकर फिर बीमार हो जाएं और तुम परेशान हो जाओ. इसलिए कुछ दिन और रह लेने दो.” रवि छेड़ने के लिए बोला, “फिर सोच लो. मैं तो इसलिए कह रहा था कि तुम अपनी सासूमां से परेशान न हो गई हो?”

इस पर शिल्पी बोली, “ऐसा नहीं है. वे दूसरों जैसी नहीं हैं. गुणी व अनुभवी तो हैं ही, अपने व्यवहार से सबको अपना बना लेती हैं. उनकी वैल्यू मुझे अब समझ आई. मेरी सहेलियों में ऐसी मशहूर हो जाएंगी मैंने कभी सोचा भी नहीं था. बच्चे भी कितने बदल गए हैं. टीवी से तो पीछा छूटा ही, घर की बनी डिशेज़ भी खाने लगे हैं. समय पर सोना, होमवर्क करना और क्लास में रैंक भी कितनी अच्छी आई है. दादी ने तो उनको एकदम बदल ही दिया. रवि उन्हें यहीं रहने दो.” शिल्पी के मुंह से सच निकल ही गया.

“ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी. वैसे मुझे लगता है उनको यहां रोकने की वजह कुछ और ही है.” रवि ने कहा, तो शिल्पी हैरानी से पूछने लगी, “ऐसी और क्या वजह हो सकती है?”

“अरे भाई, अब रुचि यहां सोने की ज़िद जो नहीं करती. अब तुमको पूरी फ्रीडम और निश्‍चिंतता जो है.” रवि ने शरारती लहज़े में कहा ही था कि शिल्पी ने शरमाकर नाइट बल्ब ऑफ कर दिया.

Anoop Shrivastav

अनूप श्रीवास्तव

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कहानी- नेमप्लेट (Short Story- Nameplate)

“तुमसे मिलने आता ही कौन है? तुम्हारी जितनी भी सहेलियां हैं, वो सब मुझे जानती हैं. बाकी जो लोग तुम्हें जानते हैं, वो तुम्हें मिसेज़ नमन शर्मा के नाम से जानते हैं. और वैसे भी, तुमसे ज़्यादा मिलनेवाले अमन के आते हैं. मैं सोचता हूं मुझे अमन के नाम का नेमप्लेट लगवा लेना चाहिए…”

Kahani

कितनी देर से कॉलबेल बज रही थी. आरोही अंदर बाथरूम में थी. दौड़कर उसने दरवाज़ा खोला. पोस्टमैन खड़ा था बाहर.

“आरोही शर्मा का घर यही है?” उसने पूछा.

“जी हां, यही है. मैं ही आरोही हूं.”

“अच्छा-अच्छा, नमन शर्मा का नेमप्लेट देखा था बाहर. आप उनकी मिसेज़ होंगी. अगली बार से भेजनेवाले को बोलना पते में नमनजी का नाम अवश्य लिखें. ढूंढ़ने में परेशानी होती है. अब सब उन्हीं को जानते हैं न.”

आज फिर आरोही को काम करते-करते देर हो गई थी. कितना भी जल्दी करो, काम बारह बजे के पहले ख़त्म ही नहीं होता. अभी थोड़ी देर में अमन स्कूल से आ जाएगा. फिर उसे वक़्त मिल ही नहीं पाएगा, अपनी कहानी पूरी करने का.

नमन और आरोही की शादी को पांच साल हो गए थे. उनका चार साल का एक बेटा था ‘अमन’. नमन एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पद पर थे.

आरोही भी काफ़ी पढ़ी-लिखी थी, लेकिन बेटे और घर की ज़िम्मेदारियों की वजह से जॉब नहीं कर पा रही थी. कॉलेज के दिनों से ही उसे लिखना बहुत पसंद था. शादी के बाद जब भी समय मिलता, वो अपनी मन की उधेड़बुन को काग़ज़ पर उतार लेती.

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“मैडम-मैडम.” पोस्टमैन की आवाज़ से आरोही अपनी सोच से बाहर आई.

“मैडम, ख़त पर साहब का नाम होता, तो पूछना नहीं पड़ता न! नेमप्लेट देखकर पहचान लेता. अब बताइए कितने फ्लैटों में पूछना पड़ा तब कहीं…”

“थैंक्यू भइया, आगे से ध्यान रखूंगी.”

कहकर आरोही ने चिट्ठी लेकर दरवाज़ा बंद कर लिया. सोच रही थी आज नमन आएंगे, तो बात करेगी नेमप्लेट के लिए.शाम को नमन ऑफिस से आते ही अमन के साथ खेलने लग गए. रात का खाना निपटाकर, अमन के सो जाने के बाद आरोही ने बात शुरू की.

“नमन, मैं सोच रही थी बाहर मेरे नाम का भी नेम-प्लेट लगवा लें तो… मेरे नाम से ख़त आए या कोई मुझसे मिलने आए, तो द़िक्क़त नहीं होगी. आज मां की चिट्ठी आई थी तो वो…”

थोड़ी देर नमन उसे देखते रहे. फिर हंसने लगे. आरोही को समझ नहीं आ रहा था कि इसमें हंसने की क्या बात है?

आरोही को अपनी तरफ़ सवालिया नज़रों से देखते देख नमन ने अपनी हंसी रोक दी और बोले, “सॉरी आरोही, पर तुम भी खाली बैठे-बैठे क्या सोचती रहती हो? तुमसे मिलने आता ही कौन है? तुम्हारी जितनी भी सहेलियां हैं, वो सब मुझे जानती हैं. बाकी जो लोग तुम्हें जानते हैं, वो तुम्हें मिसेज़ नमन शर्मा के नाम से जानते हैं. और वैसे भी, तुमसे ज़्यादा मिलनेवाले अमन के आते हैं. मैं सोचता हूं मुझे अमन के नाम का नेमप्लेट लगवा लेना चाहिए. चलो अब सो जाओ जानू और मुझे भी सोने दो. बहुत रात हो चुकी है.”

बात चुभनेवाली ज़रूर थी, पर सच थी और ये आरोही भी जानती थी.

देखते-देखते दो साल बीत गए. इन दो सालों में काफ़ी कुछ बदल गया था. नहीं बदली थी, तो आरोही की दिनचर्या. हां, अब उसने घर का काम करने के लिए एक कामवाली लगा ली थी. जो समय बचता, उसमें वह एक कहानी लिखने लगी थी. आज उसकी कहानी पूरी हो चुकी थी.

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समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे? नमन को बताने का मन नहीं था. नमन क्या, उसे ख़ुद अपने ऊपर भरोसा नहीं था. उसने सोचा, छोड़ो ऐसे ही रहने देते हैं.

दोपहर में एक पत्रिका के पन्ने पलटते हुए उसने देखा ‘कहानी प्रतियोगिता’. प्रथम स्थान पाने वाले को 50 हज़ार नक़द इनाम मिलनेवाला था. नाम मिलता सो अलग. जीतनेवाले का साक्षात्कार भी उसी पत्रिका में छपनेवाला था. यही नहीं, जीतनेवाले को एक उपन्यास भी लिखने का मौक़ा दिया जाएगा.

आरोही जानती थी कि उसकी कहानी कुछ ख़ास नहीं थी. फिर भी, उसने उस कहानी को दो साल दिए थे.

अचानक फोन की घंटी बजी. पापा थे फोन पर. उसने इस कहानी के बारे में स़िर्फ उन्हीं को बताया था.

“बेटा एक बार कोशिश तो करो. कोशिश किए बिना हार जाना तो ग़लत है. उससे अच्छा तो कोशिश करके हारना है. इससे कम से कम ये तसल्ली तो रहती है कि मैंने कोशिश की. और क्या पता अगली कोशिश क़ामयाब ही हो जाए.”

आख़िर उसने कहानी पोस्ट कर दी. उस बात को पांच महीने बीत गए थे. आरोही भूल भी चुकी थी कि उसने कोई कहानी भी भेजी थी या फिर भूलने की कोशिश में लगी थी.

रविवार का दिन था. नमन और अमन घर पर ही थे. फोन की घंटी बजी, तो नमन ने फोन उठाया. कोई ज़रूरी बात थी, तभी काफ़ी देर तक फोन पर बात करते रहे.

अगले दिन, सुबह जब आरोही उठी, तो घर एकदम शांत था. नमन और अमन दोनों ही बिस्तर पर नहीं थे. जैसे ही उठकर ड्रॉइंगरूम में आई, तभी ज़ोरदार शोर से उसका स्वागत हुआ. उसका घर उसके दोस्तों से भरा हुआ था.

सब उसे बधाई दे रहे थे. आज आरोही का जन्मदिन था. नमन सबको बड़े गर्व से बता रहे थे कि आरोही की कहानी को प्रथम पुरस्कार मिला है. संपादक कह रहे थे कि कई प्रकाशक कंपनियां चाहती हैं कि वो उनके लिए उपन्यास लिखे, लेकिन आरोही का पहला उपन्यास तो वो ही…”

आरोही सब को धन्यवाद दे रही थी.

पापा-मम्मी, सास-ससुर, भाई-भाभी सबके फोन आ रहे थे. सबके जाने के बाद आरोही नमन की बांहों में समा गई.

“मुझे कल ही पता चल गया था. मुझे माफ़ करना, मैंने तुम्हें नहीं बताया. मैं तुम्हें आज के दिन बताना चाहता था. तुम्हारे गिफ्ट के साथ.” नमन बोले.

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“गिफ्ट, लेकिन नमन आप मुझे बाहर क्यों ले जा रहे हैं?” आरोही ने पूछा.

“मम्मा आओ न प्लीज़.” अमन अपनी मीठी-सी आवाज़ में बोला.

नमन ने आरोही की आंखें बंद कीं और बाहर दरवाज़े के पास आकर खोल दीं.

आरोही ने देखा, नमन शर्मा के नेमप्लेट के बिल्कुल पास एक सुंदर-सा गोल्डन फ्रेमवाला नेमप्लेट लगा हुआ था. उस नेमप्लेट पर लिखा था- आरोही शर्मा (लेखिका). इसे देख आरोही की आंखें नम हो गईं. जन्मदिन का यह अनोखा तोहफ़ा उसके लिए यादगार बन गया.

– पल्लवी

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कहानी- परिवर्तन (Short Story- Parivartan)

‘‘एक साधारण-सी दिखनेवाली स्त्री जिसे अबला कहा जाता है, वो भीतर से कितनी बलशाली है. उसके अंदर सोए स्वाभिमान को यदि जगा दिया जाए, तो वो क्या कर सकती है, इस बात का जीवंत उदाहरण है सामने बैठी मेरी सहेली और व्यवसाय में मेरी सहभागी वृंदा. दुखों से जूझती नारी को मैंने बस सहारा दिया और थोड़ा-सा मार्गदर्शन किया, तो उसने मेरे छोटे से काम को विस्तृत बना दिया. आज मुझे जो सम्मान मिला है, उसकी असली हक़दार वही है, क्योंकि वो स्वयंसिद्धा है.’’

Kahani

धीमे क़दमों से घर की ओर आती वृंदा को देखकर उसके बच्चों में उत्साह जागा और वो दौड़कर उससे लिपट गए. वृद्धा सास ने हाथ का सहारा देकर उसके सिर पर रखी सब्ज़ी की टोकरी उतरवायी, ‘‘ये क्या? आज भी कुछ ज़्यादा बिक्री नहीं हुई?’’ उसके प्रश्‍न में पीड़ा छिपी हुई थी. दाने-दाने को मोहताज होते परिवार की आमदनी का एकमात्र ज़रिया यही था. फटे आंचल से चेहरे पर आयी पसीने की बूंदों को साफ़ करके वृंदा धम्म से बैठ गयी. सारा दिन यहां-वहां सिर पर बोझ लादे पैदल चलती रही. इस आशा से कि शायद आज तो उसे मेहनत का फल मिलेगा, पर हमेशा की तरह आज का दिन भी व्यर्थ गया. बच्चों के पीले पड़ते चेहरे की ओर दृष्टिपात करते ही उसकी आंखों से दर्द आंसुओं के रूप में बहने लगा.

तब सास ने ढांढ़स बंधाया, ‘‘कोई बात नहीं, हो सकता है कल ज़्यादा बिक्री हो जाए. चल सब्ज़ी को गीली बोरी में लपेट दे, ताकि सबेरे तक ताज़ी रहे.’’ पत्नी को निराशा से घिरी देखकर अंदर बिस्तर पर पड़े रोगी पति गोपाल का कलेजा मुंह को आ गया. वो अपने भाग्य को कोसने लगा. यदि दुर्घटना में मेरा अंग भंग न होता, तो मेरे परिवार की ये दुर्दशा न होती. ‘‘सुन, तू कोई दूसरा काम क्यों नहीं कर लेती?’’ उसने पत्नी को सलाह दी.

‘‘दूसरा काम… भूल गए क्या, पहले मेरे साथ क्या हुआ था? मेरी ईमानदारी का मालिकों ने क्या सिला दिया था. उनके घर का सब काम मैं पूरी लगन के साथ किया करती थी, लेकिन नौकर की कोई इ़ज़्ज़त नहीं होती. उनके कमरे से पांच सौ रुपए जो उनके ही बेटे ने चुराए थे, उसकी चोरी का इल्ज़ाम उन्होंने मुझ पर लगाया. रातभर पुलिस थाने में बिठवाया. वो तो मैंने एक पुलिस वाले साहब के घर थोड़े दिन काम किया था, उनकी मेमसाब ने दया दिखायी और मुझे झंझट से छुटकारा दिलवाया. बाद में सारी सच्चाई सामने आ गई, पर उससे मेरा खोया हुआ मान तो वापस नहीं आया. इसलिए तौबा, अब किसी के घर में काम नहीं करूंगी.’’

‘‘सब मेरा ही दोष है. यदि मैं हाथ-पैर से लाचार न होता तो आज ये दिन तो नहीं देखने पड़ते. तुम दर-दर की ठोकरें खा रही हो. मां इस बुढ़ापे में मेरी सेवा कर रही है और हमारे दोनों बच्चों का तो बचपन ही छिन गया. ’’ कहते-कहते गोपाल रो पड़ा.

‘‘सुनिए, दिल छोटा मत कीजिए. जब वो दिन नहीं रहे तो ये दिन भी नहीं रहेंगे. जब तक आप भले-चंगे थे तब तक मैंने सुख भोगा. अब मेरा दायित्व है कि मैं आपका हर तरह से ध्यान रखूं. आख़िर मैं आपकी अर्धांगिनी हूं. जब सुख साथ बांटा है तो दुख में भी साथी बनूंगी.’’ वृंदा ने दिलासा दिया और घर का काम निपटाने चली गयी. रातभर वो सोचती रही कि ऐसा क्या करे, जिससे उसके अपनों का दुख-दर्द कम हो जाए. पति एक प्राइवेट कंपनी में ड्राइवर था. आमदनी ठीक थी, सो गुज़ारा अच्छे से हो जाता था. एक सड़क दुर्घटना में पति की जान तो बच गई, पर दोनों पैर और एक हाथ कट गया. जो कुछ रुपया-ज़ेवर पास में था, वो सारा इलाज में ख़र्च हो गया. पेट भरने के लिए उसे बाहर क़दम रखना पड़ा. सास के पास चांदी की एक जोड़ी पायल बची थी, जिसे बेचकर सब्ज़ी बेचने का काम शुरू किया, पर उसकी माली हालत को देखकर कोई उससे सौदा लेना तो क्या, उसकी ओर देखना भी पसंद नहीं करता था. वो दूर-दूर तक भटकती तब कहीं जाकर दो पैसे कमा पाती, जिससे घर के लोगों को दाल-रोटी नसीब हो पाती. आंखों ही आंखों में सारी रात बीत जाती. बच्चों से घर की हालत छिपी नहीं थी. वो अपनी इच्छाओं का दमन करके अपने माता-पिता को सहयोग दे रहे थे.

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सुबह सूरज के उगते ही वृंदा घर का काम निपटाकर सब्ज़ी टोकरी में सजा निकल पड़ी. आधा दिन बीत गया, पर बोहनी नहीं हुई. मन-ही-मन ईश्‍वर से दया की प्रार्थना कर रही थी कि तभी उसके कानों में शब्द टकराए, ‘‘ऐ भाजीवाली, ज़रा सुन तो, इधर आ.’’ वो मुड़ी, ‘‘अरे जया तू….’’ ‘‘कौन… वृंदा… तू इस हालत में!’’ घर के दरवाज़े पर खड़ी महिला दौड़ती हुई बाहर आयी और अपनी सखी का हाथ पकड़कर अंदर ले गयी. ‘‘ये क्या हाल बना रखा है तूने? बिखरे बाल, फटे हुए कपड़े. क्या हो गया है तुझे?’’ उसने प्रश्‍न किया. ‘‘जब भाग्य ख़राब हो तो ऐसी ही दशा हो जाती है. एक हादसे में ये हाथ-पैरों से लाचार हो गए. जो कुछ पास में था, वो एक-एक करके बाज़ार में बिक गया. घर की गाड़ी पलट गयी. पढ़ी-लिखी तो ़ज़्यादा हूं नहीं, जो कहीं नौकरी कर लेती. नौकरानी का काम करके भी कुछ हाथ नहीं आया तो यही काम शुरू कर दिया. मेरी छोड़, तू बता कैसी गुज़र रही है?’’ वृंदा ने विषय को बदला, ‘‘अपनी आंखों से देख ले कि एक समय काम से जी चुराने वाली तेरी ये सहेली अब क्या कर रही है, चल आ.’’ इतना कहकर वो घर के पिछवाड़े ले गई. वहां का दृश्य देखकर वृंदा की आंखें विस्मय से फैल गईं. छह-सात महिलाएं पापड़ बना रही थीं, कुछ महिलाएं एक ओर बड़ियां बना रही थीं, ‘‘तू ये सब क्या..’’

‘‘हां, घर में रहकर मैं अपना छोटा-सा व्यवसाय चला रही हूं. न बाहर जाने का झंझट और न ही किसी की चाकरी. आत्मसम्मान भी बरकरार. है ना मज़े की बात.’’ जया ने खुलासा किया.

‘‘इसमें तो बहुत ख़र्चा आया होगा.’’ वृंदा दुखी मन से बोली.

जया ने उसके मन के भावों को ताड़ लिया, कहने लगी, ‘‘नहीं रे, ये सब तो सूझ-बूझ से कर लिया. जानती तो है तू. पति की छोटी-सी नौकरी में गृहस्थी का ख़र्च चलाना कितना मुश्किल होता है. नौकरी तो अच्छे-अच्छे डिग्रीवालों को नहीं मिलती तो हमें कहां से मिलेगी. मुझे हाथ का काम आता था सो मैंने इसी को व्यवसाय बना लिया.’’

‘‘काम तो मैं भी करती हूं, पर सब्ज़ी बिकती ही नहीं. अब तो इसे भी बंद करने की नौबत आ गयी है. समझ में नहीं आता कि कौन-सा काम करूं?’’

‘‘पहला काम तो यह कर कि मुझे सब्ज़ी दे.’’ जया ने तुरंत आस-पड़ोस की महिलाओं को बुलाया और सब्ज़ियों को बेचकर वृंदा के हाथ में पैसे रख दिए.

जिसको बेचने के लिए वो दो दिन से पसीना बहा रही थी, उसे जया ने कितनी कुशलता से कुछ ही मिनटों में बेच दिया. ‘‘समय बहुत हो गया है. अब चलती हूं.’’ वृंदा ने जया से विदा ली और घर आ गयी. सास ने जब टोकरी को खाली देखा तो उसके चेहरे पर संतोष छा गया. बच्चों के भी चेहरे खिल गए. शाम को भोजन के बाद उसने पति और सास को जया और उसके कामकाज के बारे में बताया, ‘‘तेरी सहेली तो बड़ी समझदार है. उससे ही कुछ गुर सीख ले, ताकि तेरी परेशानी कम हो और घर का गुज़ारा भी हो सके.’’ सासू मां ने सुझाव दे डाला. ‘‘मांजी, आप ठीक कहती हैं. मैं उससे बात करूंगी.’’ रात्रि में उसको बीता समय याद आने लगा. हर काम को बाद में करने का बहाना करने वाली उसकी सहेली जया को सब आलसी कहकर पुकारते थे और वो भी अपने इस नाम से ख़ुश रहती थी. वहीं दूसरी ओर वृंदा घर-भर की दुलारी थी. मां का रसोई में दौड़कर हाथ बंटाती, छोटे भाई-बहनों को भी बख़ूबी संभालती. मोहल्ले में किसी के घर में भी ज़रूरत होती तो वृंदा मदद करने फौरन पहुंच जाती. उसके हाथ का बना अचार तोे सब चटकारे लेकर खाते. सुबह उठी तो वृंदा को लगा कि उसके जीवन में आया अमावस का अंधेरा छंटने वाला है और सुनहरी किरणें तमस को चीरती हुई उसकी ओर आ रही हैं. अगले दिन दोपहर के समय मन में दृढ़ निश्‍चय कर वो जया के घर पहुंची. ‘‘मुझे ख़ुशी होगी कि मैं तेरे कुछ काम आ सकूं.’’ जया ने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया. ‘‘जया, मैं भी तेरी तरह आत्मसम्मान से जीना चाहती हूं. आत्मनिर्भर बनना चाहती हूं.’’ ‘‘इसमें कोई मुश्किल नहीं है, पर सबसे पहले तो तुझे अपने हुलिए पर ध्यान देना होगा. अरे पहले ये दुनिया चमक-दमक ही देखती है. सामान की पैकिंग यदि अच्छी होगी तो ग्राहक ख़ुद उसकी ओर दौड़ेगा. यदि वो ही ठीक नहीं तो वस्तु कितनी ही अच्छी हो, सब व्यर्थ है.’’

‘‘मेरे पास तो इनके अलावा कपड़े ही नहीं हैं.’’ वृंदा ने अपनी मजबूरी बयान की. ‘‘मैं किसलिए हूं. सहेली क्या बहन नहीं होती. मेरे पास कुछ कपड़े नए रखे हैं, वो तू पहन लेना. किसी भी काम को करने के लिए बहुत ऊंची शिक्षा पाना ज़रूरी नहीं, बस आपके भीतर लगन होनी चाहिए. नारी को स्वयंसिद्धा यूं ही नहीं कहा जाता. उसके भीतर असीमित शक्ति का भंडार होता है. बस उसे जगाने की ज़रूरत है, फिर देख वो कठिनाई को कैसे सरलता में बदल देती है. तुझे भी यही करना है. अपनी क्षमता को पहचान और अपने व्यक्तित्व में थोड़ा बदलाव ला. देखना सफलता तेरे भी क़दम चूमेगी. आज से क्या, बल्कि अभी से तुम मेरे कुटुम्ब की सदस्य हो. हम मिलकर काम करेंगे और जो चार पैसे मिलेंगे, उन्हें आपस में बांट लेंगे.’’

‘‘जया तू तो पूरी की पूरी टीचर बन गई है.’’ वृंदा ने चुटकी ली. दोनों खिलखिलाकर हंस दीं. नए क्षितिज को पाने के लिए वृंदा ने पहली सीढ़ी पर क़दम रख दिया. वो रोज़ आकर काम में हाथ बंटाने लगी.?इससे जुड़कर उसे अपनेपन का एहसास हो रहा था. घर में आय भी बराबर होने लगी. जब उसने निर्माण की प्रक्रिया को भली-भांति समझ लिया तब जया ने उसे लोगों के बीच अपने उत्पाद को बेचने का काम दिया. पहले जो वृंदा फटे कपड़ों, उड़े चेहरा और उलझे बालों में सब्ज़ी बेचने जाया करती थी, वही अब करीने से पहनी हुई साड़ी, सादी-सी चोटी और चेहरे पर आत्मविश्‍वास की चमक से भरपूर बिना किसी हिचक के घर-घर जा रही थी. उसके नए अंदाज़ पर किसी ने उसे फटकार नहीं लगायी, उसका सामान हाथों-हाथ बिकने लगा. अब उसने कुटुम्ब में अचार बनाने का काम भी शुरू कर दिया. अब आमदनी लगातार बढ़ने लगी.

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परिवर्तन चहुं ओर आया. जीवन जो मरुस्थल की भांति बेजान हो गया था, उसको अपनी मेहनत से उपजाऊ भूमि में बदलकर उसमें नए प्राण फूंक दिए. उसके पति गोपाल के लिए उसने एक-एक रुपया जोड़कर कृत्रिम पैरों की व्यवस्था की, बच्चों के नाम स्कूल में लिखवाए. पति ख़ुद को उपेक्षित महसूस न करें, इसके लिए उसने घर बैठे कुछ काम शुरू करवाए. गोपाल ने काग़ज़ से थैली और लिफ़ा़फे बनाने का काम शुरू किया, जिससे उसका मन भी लगने लगा और समय का सदुपयोग भी होने लगा. बच्चे और सास भी इसमें सहायता करने लगे. जो लोग पहले उनकी गरीबी का उपहास करते थे, अब वो उनकी प्रगति से ईर्ष्या कर रहे थे. दिन-महीनों में बीतते चले गए. वृंदा के क़दम विकास के पथ पर निरंतर अग्रसर होते रहे. छोटे से कुटीर उद्योग को उसने बड़े व्यवसाय का रूप दे दिया. जया ने भी अपनी सखी को उसके परिश्रम का फल अपने व्यवसाय में भागीदार बनाकर दिया. वृंदा ने अपने परिवार को फिर से ख़ुशहाल बना दिया… ये सब कमाल उसके व्यक्तित्व में आए परिवर्तन का था. एक दिन जब उनके उद्योग को सरकार की ओर से पुरस्कार मिला, तो जया ने अपनी सफलता का सारा श्रेय वृंदा को दिया, ‘‘एक साधारण-सी दिखनेवाली स्त्री जिसे अबला कहा जाता है, वो भीतर से कितनी बलशाली है. उसके अंदर सोए स्वाभिमान को यदि जगा दिया जाए, तो वो क्या कर सकती है, इस बात का जीवंत उदाहरण है सामने बैठी मेरी सहेली और व्यवसाय में मेरी सहभागी वृंदा. दुखों से जूझती नारी को मैंने बस सहारा दिया और थोड़ा-सा मार्गदर्शन किया, तो उसने मेरे छोटे से काम को विस्तृत बना दिया. आज मुझे जो सम्मान मिला है, उसकी असली हक़दार वही है, क्योंकि वो स्वयंसिद्धा है.’’ सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा और वृंदा की आंखों से ख़ुशी के आंसू छलकने लगे… आज उसने सब कुछ पा लिया था.

– राजेश्‍वरी शुक्ला

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कहानी- अधूरी कहानी (Short Story- Adhuri Kahani)

‘मेरे उस अधूरे प्यार के नाम, जिसे मैंने जीवनभर पूरी संपूर्णता से चाहा’ चित्रलेखा का पूरा वजूद थरथरा गया. आंखें जैसे गंगा-जमुना बन गईं. प्यार का प्रत्युत्तर… इतनी लंबी तपस्या का फल… मिला भी तो कब, जब ज़िंदगी का लंबा सफ़र तय कर लिया. क्यों किया चित्रगुप्त आपने ऐसा? वह फफक पड़ी. क्यों रखा हमारी कहानी को अधूरा..?

 Hindi Kahani

एयरपोर्ट की सभी औपचारिकताओं को पार कर, सामान चेक इन काउंटर पर जमा करवाकर, चित्रलेखा के हाथ में बोर्डिंग पास आ गया. फिर सिक्युरिटी को पार कर वह एयरपोर्ट के वेटिंग लॉज में आकर बैठ गई.

वह चेन्नई जा रही थी बेटी के पास. बेटी आईआईटी इंजीनियर थी और वहां पर जॉब कर रही थी. कुछ दिनों से तबीयत ख़राब होने व उसमें सुधार न होने की वजह से उसे अचानक चेन्नई जाने का प्रोग्राम बनाना पड़ा था. वह जल्द से जल्द बेटी के पास पहुंच जाना चाहती थी. बेटी के पास जल्दी पहुंचने की बेचैनी उसके अंदर उथल-पुथल मचा रही थी. तभी बगल की कुर्सी पर बैठे सज्जन उसकी तरफ़ मुख़ातिब हुए, “अरे तुम? चेन्नई जा रही हो क्या…?” वह बुरी तरह चौंक गई. उस आवाज़ की सनसनाहट दिल के तारों में जलतरंग छेड़ गई थी.

“हां मैं… पर आप कौन..? क्या आप मुझे जानते हैं?” वह उन सज्जन की तरफ़ मुड़कर देखने लगी.

“तुम तो वैसी ही हो अभी भी चित्रलेखा… इसलिए पहचान में आ गई, पर मुझे कैसे पहचानोगी…” वे सिर से हाथ फेरते चेहरे तक ले आए. अब तक वह भी उन्हें पहचान चुकी थी.

“ओह! आप? अचानक मिले न… मिलने की उम्मीद नहीं थी, इसलिए…” चित्रलेखा किंचित शर्मिंदा हो गई.

“लेकिन आप बहुत बदल गए हैं. शादी भी नहीं की, फिर भी सिर के बाल उड़ गए..?”

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इस बार हास्य से उठकर ठहाका मारकर हंस पड़े थे चित्रगुप्त, “यह सिर के बालों का शादी न होने से कनेक्शन समझ में नहीं आया…”

“कनेक्शन तो गहरा है, पर आप नहीं समझेंगे.”

“क्यों?”

“क्योंकि आपने शादी जो नहीं की.” चित्रलेखा खिलखिलाकर हंस पड़ी थी.

“फिर तो तुम्हारे पति भी…?”

“ज़ाहिर है.” दोनों हंस पड़े.

“आपकी नई किताब का ज़िक्र पढ़ा आपकी प्रोफाइल पर… पर उपलब्ध नहीं हो पाई. कैसे मिलेगी?”

“एक सम्मेलन में भाग लेने जा रहा हूं चेन्नई. परसों रात की फ्लाइट है वापसी की, अगर उससे पहले मिल पाओ तो दे जाऊंगा.”

“फोन नंबर बताइए अपना. बेटी का पता भेज देती हूं, जब भी समय मिले आ जाइए. इस बार कॉफी मेरे हाथ की पी लीजिए.”

एक दिन बाद हाथ में किताब लिए उसके दरवाज़े पर हाज़िर थे चित्रगुप्त. वे लगभग 25 साल बाद मिल रहे थे, इसलिए वार्तालाप गति नहीं पकड़ पा रही थी उनके बीच. कॉफी पीते, विचारों में डूबे चित्रगुप्त को देखती हुई चित्रलेखा सोच रही थी कि ज़िंदगी तो बीत ही गई और बीत ही जाएगी तुम्हारे बिना भी, पर तुम्हारे साथ बीतती तो कुछ और बात होती.

छिटपुट बातें कर चित्रगुप्त उठ खड़े हुए, “चलता हूं अब.”

“ठीक है.” वह भी अनमनी-सी उठ खड़ी हुई.

“जाने अब कब मुलाक़ात होगी?” चित्रगुप्त एकाएक बोल पड़े.

“जाने कब?” चित्रलेेखा के होंठ एक मजबूर स्मित हास्य में हल्के से फैले.

प्रत्युत्तर में एक स्मित मुस्कान उसकी तरफ़ उछाल, हाथ जोड़, वे पलटकर चले गए और वह मेज़ पर रखी किताब को हताश-सी घूरती रह गई.

रात का नीरव अंधकार भले ही अकेलापन बढ़ाता हो, पर किसी को याद करने के लिए साथी की तरह होता है. उसकी ज़िंदगी की कहानी की तरह चित्रगुप्त की नई किताब का नाम भी ‘अधूरी कहानी’ था. रात में किताब पढ़ने बैठी, तो ख़ुद अपनी ज़िंदगी की किताब के पन्ने पलटने लगी.

जिस संस्थान से चित्रगुप्त पीएचडी कर रहे थे, वहीं से चंद कदम की दूरी पर स्कूल था, जहां से चित्रलेखा दसवीं की पढ़ाई कर रही थी. पर उसे पता नहीं था कि चित्रगुप्त उसके इतने पास हैं. वह तो उस उम्र से ही उनकी रचनाओं की इतनी दीवानी थी कि उनका लिखा जहां कहीं भी देखती, भूखों की तरह पढ़ती. उसकी अभिन्न सहेली विदिषा के भाई भी चित्रगुप्त के साथ ही पीएचडी कर रहे थे. उसी से चित्रलेखा को चित्रगुप्त के उस संस्थान में होने का पता चला. उस छोटी-सी उम्र में भी वह कभी उनको आते-जाते देख लेती, तो मदहोश हो जाती. लेकिन चित्रगुप्त के लिए दसवीं में पढ़नेवाली चित्रलेखा निहायत ही बच्ची थी.

सहेली विदिषा जब-तब उसे छेड़ देती, “पता नहीं क्या दिखता है तुझे इस काले कलूटे में… नाम भी तो देखो चित्रगुप्त. लगता है जैसे इतिहास के पन्नों से सीधे बाहर निकल आया हो… वैसे तेरा नाम भी चुनकर रखा है अंकल-आंटी ने…”

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“चुप… ख़बरदार, मेरे सांवले-सलोने को काला-कलूटा कहा तोे… टॉल, डार्क एंड हैंडसम कितना शानदार लगता है… और उसके बाल जब उलझे हुए उसके माथे पर गिरे रहते हैं… और वैसे भी मैं तो उसके मन-मस्तिष्क की दीवानी हूं, जिसमें इतने तरह के भाव व विचार आते हैं…”

“देख, देख… वो आ रहा है, तेरा टीडीएस…” एक दिन स्कूल के गेट से बाहर निकलते हुए सामने से आ रहे चित्रगुप्त को देखकर विदिषा चिल्लाई. चित्रगुप्त विदिषा के भाई के दोस्त थे. इसलिए आज उसने चित्रलेखा को धकेलते हुए ले जाकर चित्रगुप्त के सामने खड़ा कर दिया.

“भइया, यह मेरी सहेली चित्रलेखा. आपसे बहुत दिनों से मिलना चाहती थी…”

“मुझसे? कहिए क्यों मिलना चाहती हैं आप मुझसे?“ गंभीर चेहरे पर स्मित हास्य रेखा, विद्वता की चमक से प्रद्वीप्त आंखों से टकराकर, उसकी किशोर निगाहें अनायास ही झुक गईं. नाजुक़ गुलाबी अधर किसी तरह फड़फड़ाए.

“जी आपका ऑटोग्राफ चाहिए था. आपकी सारी रचनाएं पढ़ती हूं मैं…“

बच्चों की बात समझ मंद-मंद मुस्कुराते चित्रगुप्त ने अपना ऑटोग्राफ दे दिया था. लेकिन वह और भी तड़प गई थी. पूरे समय न जाने कितनी बार अपने नाजुक़ अधरों से उनका नाम चूमती रहती. अगले दो सालों में चित्रलेखा ने 12वीं के बाद उसी कॉलेज में दाख़िला ले लिया, जहां से चित्रगुप्त पीएचडी कर रहे थे, लेकिन चित्रगुप्त उसे कभी नज़र नहीं आए. शायद उनकी पीएचडी पूरी हो गई थी. चित्रलेखा तड़पती रह गई थी, ‘न जाने कहां रहते हैं’ पत्रिकाओं में उनकी तस्वीर देखती, दिल से लगा लेती. आंखें भीग जातीं, पर यह कहानी शायद तब ख़त्म हो भी जाती, पर इसे तो ख़त्म होना ही नहीं था, बल्कि अधूरी रहना था.

ग्रैजुएशन के बाद एमबीए कर वह एक एफएमसीजी कंपनी में नियुक्त हो गई. और उस समय ब्रैंड मैनेजर के पद पर पदस्त थी. जब अपने किसी प्रोडक्ट की शिकायत को लेकर, बार-बार उससे मिलने को उतारू ज़िद्दी कस्टमर की ज़िद पर वह अपनी कंपनी की रिसेप्शनिस्ट को एक दिन डांट रही थी.

“अरे, आप मुझसे कैसे किसी को मिलाने की बात कर रही हैं.” चित्रलेखा रिसेप्शनिस्ट मिस रीमा पर झुंझला रही थी. “प्रोडक्ट मैंने नहीं बनाया है, कंपनी ने बनाया है. उन्हें कहो कि जाकर कस्टमर केयर में शिकायत करें.”

“लेकिन मैम, वे तो ज़िद पाले बैठे हैं कि वे आपसे मिलकर ही रहेंगे. बड़े अजीब से इंसान हैं. कुछ-कुछ दार्शनिक टाइप के… कहते हैं, आपके हेयर कलर ने उनके बालों को ख़राब कर, उनकी सामाजिक छवि को नुक़सान पहुंचाया है.”

“ये कैसी शिकायत है. उन्हें उनके पुराने प्रोडक्ट के बदले नया प्रोडक्ट मिल जाएगा.”

“पता नहीं, कहते हैं, नया प्रोडक्ट उनकी बिगड़ी हुई सामाजिक छवि की भरपाई नहीं कर सकता. बाल स्ट्रेट से कुछ-कुछ कर्ली हो गए हैं…” कहते-कहते रीमा हंसने लगी. मुस्कुरा तो चित्रलेखा भी गई.

“मैम, एक बार मिल लीजिए मिस्टर चित्रगुप्त से. कई चक्कर लगा चुके हैं. आज भी यहीं बैठे हैं धरना देकर.”

नाम सुनकर कुछ कसमसा गया चित्रलेखा के अंदर, “ठीक है, भेज दो उन्हें.”

थोड़ी देर बाद आगंतुक उसके सामने था. “कहिए.” लैपटॉप पर नज़रें गड़ाए चित्रलेखा बोली.

“मैडम, आप पलभर के लिए आंखों को थोड़ा विराम देंगी, तो मैं अपनी बात कह सकता हूं.”

जानी-पहचानी आवाज़ कहीं हृदय की गहराइयों से रास्ता टटोलती हुई, सतह पर आकर कानों में रस घोल बैठी. उसने तड़पकर आगंतुक की तरफ़ देखा,

“आप?” उसकी आंखें आश्‍चर्य से फैल गईं.

“हां मैं, पर मैं कौन? क्या आप मुझे जानती हैं?” वह सामने कुर्सी पर बैठते हुए बोले.

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चित्रलेखा जड़ हो गई. भला इन्हें वह 15-16 वर्षीया दो चोटी हिलाती, स्कर्ट पहने लड़की कहां याद होगी. आज वह 25 वर्षीया एमएनसी में कार्यरत युवती है.

“जी मैं, आपकी एक पाठिका. हमेशा पढ़ती हूं आपको. जहां से आपने पढ़ाई और पीएचडी की, वहीं से मैंने भी पढ़ाई की है. विदिषा मेरी फ्रेंड थी. शायद याद होगा आपको. मैंने तब आपका ऑटोग्राफ भी लिया था.”

“अच्छा वो.” आज स्मित हास्य रेखा मुस्कान में बदल गई, “तो वह आप थीं. बहुत बदल गईं हैं आप.” चित्रलेखा अनायास पुलकित हो गई, “याद है आपको?” वे कुछ नहीं बोले.

“पर आप बिल्कुल नहीं बदले… आपकी सारी किताबें पढ़ती हूं. अभी लेटेस्टवाली भी पढ़ ली.”

“कैसे समय निकाल लेती हैं?”

“बस जुनून होता है, तो निकल जाता है, जैसे आप लिखने के लिए निकाल लेते हैं, वैसे मैं स़िर्फ आपकी ही किताबें पढ़ती हूं.”

“अच्छा!” वे खुलकर मुस्कुरा दिए थे.

सांवली रंगत पर दिलकश मुस्कुराहट उसके दिल को थोड़ा और बींध गई.

“शाम को क्या कर रही हैं. अगर अन्यथा न लें, तो अपनी इस अज़ीज़ पाठिका के साथ एक कप कॉफी अवश्य पीना चाहूंगा.”

“लेकिन आपको तो… शायद कुछ शिकायत थी कंपनी के प्रोडक्ट से.”

“शिकायत को रहने दीजिए, शाम की कॉफी साथ पीकर शिकायत दूर कर दीजिए.”

दिल ख़ुशी से झूम उठा उसका, “जी मैं पहुंच जाऊंगी…”

शाम को वह कॉफी हाउस पहुंच गई. चित्रगुप्त जितना अच्छा लिखते थे, उतनी ही विशिष्ट उनकी शख़्सियत, उतने ही महान उनके विचार, उतनी ही उच्च उनकी भावनाएं, पर वह तो कुछ और ही चाहती थी.

उनकी कुछ मुलाक़ातें हुई. घर में उसके विवाह की चर्चा अपने अंतिम चरण पर थी.

“मेरा विवाह होनेवाला है.” कॉफी हाउस में एक दिन कॉफी का घूंट भरते हुए वह बोली.

“अच्छा!” पलभर के लिए चित्रगुप्त चौंके. उसकी आंखों में झांका. जैसे कुछ ढूंढ़ना चाह रहे हों, फिर कप उठा लिया.

“क्या करता है?”

“मेरी तरह एमएनसी में काम करता है. आईआईटियन है…”

“कब है शादी?”

वह अंदर से फट पड़ी. क्या लेखक इतने हृदयहीन होते हैं. सारी संवेदनाएं स़िर्फ रचनाओं में ही दिखती हैं. उनका सारा आदर्शवाद, कोमल भावनाएं, कोरी कल्पनाएं होती हैं, जो उनकी पुस्तकों के नायक-नायिका ही बोलते हैं और उनकी प्रेम कहानियों में वर्णित वे कोमल प्रेम भावनाएं..?

“दिसंबर में.” वह निर्विकार स्वर में बोली.

“मेरी अग्रिम बधाई कबूल करो. शादी में बुलाना मत भूलना…” कहकर वे उठ खड़े हुए.

बहुत कुछ बोलना चाहती थी वह, पर चित्रगुप्त के विराट व्यक्तित्व, कुछ उनका मितभाषी स्वभाव, कुछ उन दोनों के बीच आयु के बड़े अंतराल ने होंठों पर चुप्पी के ताले लगा दिए.

चित्रगुप्त उसकी ज़िंदगी से चले गए और मीरा-सी लगन हृदय में लिए उसका विवाह हो गया. वह उनकी किताबें पढ़ती. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी रचनाएं पढ़ती. अकेले में उनका प्रोफाइल खंगालकर न जाने क्या ढूंढ़ती रहती और उनके प्रेम में हृदय की दीवानगी और बढ़ती रहती.

पति बच्चों या गृहस्थी से प्यार न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता. ये तो सांसों के आरोह-अवरोह हैं. जो हर पल एहसास में समाए रहते हैं, पर इनके साथ प्यार में अचानक कहां डूबते हैं. इनके साथ तो प्यार की शुरुआत होती है और चित्रगुप्त के प्यार में तो वह अचानक आकंठ डूब गई थी और संभलने का मौक़ा तक न मिला था. बहुत चाहा ख़ुद को बहलाना, पर मीरा तो कृष्णमय हो चुकी थी.

दिन-महीने-साल गुज़रते चले गए और फिर आज मिले 25 साल बाद. वह चित्रगुप्त में आते हुए परिवर्तन को देखती रहती थी उनकी फोटो के ज़रिए. बाल गिरते जा रहे थे. चांद दिखने लगा था. सांवली रंगत गहरी होती जा रही थी. विदिषा की बात अक्सर याद आ जाती. ‘आख़िर क्या दिखता है तुझे इस काले कलूटे में’ पर जो उसकी आंखें देखती थीं, वह उसे कहां दिख पाता था.

एकाएक वह स्मृतियों के कारागार से वर्तमान के कठोर धरातल पर आ गिरी, जहां चित्रगुप्त बस अब एक परछाईं की तरह थे. उसने किताब का पहला पन्ना पलटा. लिखा था… ‘मेरे उस अधूरे प्यार के नाम, जिसे मैंने जीवनभर पूरी संपूर्णता से चाहा’ चित्रलेखा का पूरा वजूद थरथरा गया. आंखें जैसे गंगा-जमुना बन गईं. प्यार का प्रत्युत्तर… इतनी लंबी तपस्या का फल… मिला भी तो कब, जब ज़िंदगी का लंबा सफ़र तय कर लिया.

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क्यों किया चित्रगुप्त आपने ऐसा? वह फफक पड़ी. क्यों रखा हमारी कहानी को अधूरा..? क्या कमी थी मेरी तपस्या में कि विश्‍वामित्र की समाधि भंग न कर पाई? अब इस छटपटाहट के साथ बाकी की ज़िंदगी कैसे जीऊंगी?

आंसुओं में डूबी चित्रलेखा ने किताब को दोनों बांहों में भींच छाती से चिपका लिया, जैसे प्रिय को बांहों में समेट लिया हो. आंखें बंदकर जल धाराओं को अविरल बह जाने दिया और महसूस करने लगी जैसे चित्रगुप्त ने अपनी चित्रलेखा को बहुत कोमलता से अपनी बांहों में समेटकर सीने में छिपा लिया हो. ‘काश, एहसास के ये लम्हे कभी ख़त्म न होते… जैसे उनकी कहानी फिर भी ख़त्म नहीं हुई थी, बल्कि अधूरी रह गई थी.

sudha jugaran

    सुधा जुगरान

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कहानी- पंचर का जोड़ (Short Story- Puncture Ka Jod)

Short Story

यही एक पल जब यामिनी सभी बाहरी अदालतों के परे अपने भीतर है और अपनी ही सफ़ाई में कहने को उसके पास कुछ नहीं! इस पल को यहां से ताकती यामिनी ने ख़ुद को कार में इतना अकेला पाया है, जैसे मरीचिका में भटकती कोई हिरणी अब थकने लगी हो.

Short Story

शहर में त्योहार का मतलब है- अतिरिक्त छुट्टी! रक्षाबंधन के दिन, सावन मेला घूमकर लौटते समय कार पंचर हो गई. चार साल की रोली कार की पिछली सीट पर, 12 साल के बड़े भाई आदी से इस होड़ में चिप्स के पैकेट निपटा रही है कि विजेता वही बनेगी. आदी का ध्यान चिप्स से ज़्यादा ईयरफोन लगाए अंग्रेज़ी गाने सुनने में है. अगली सीट पर मम्मी यामिनी सावन मेले से ख़रीदा सात सौ रुपए का जड़ाऊ कंगन सेट निहारने में मुग्ध है. हालात की गंभीरता से परेशान बच्चों के पापा मलय ने कार पास के पेट्रोल पंप की ओर बढ़ा दी.

उनके वहां पहुंचने से ऐन पहले, एक कार पेट्रोल पंप की पंचर की दुकान के आगे आकर रुकी. वहां पहले से ही एक कार का पंचर बन रहा है और अब पिछली दोनों कारें प्रतीक्षा में खड़ी हो गई हैं.

“अरे!” अगली कार के पीछे अपनी कार लगाते मलय को अब सहज चौंकना ही था और मलय को चौंकता देख यामिनी का ध्यान भी सहज ही उस ओर खिंचना ही था. अगली कार से जो युवक उतरा, वो मलय का छोटा भाई प्रखर है. पांच साल पहले, तथाकथित छोटी जाति की लड़की से प्रेम-विवाह करने के कारण उसे संयुक्त परिवार से अलग कर दिया गया था और तब से शायद वो कुल पांच बार भी घर न आया होगा. इस वक़्त कार में पिछली सीट पर उसका साढ़े चार साल का बेटा टीटू और उसकी पत्नी ज्योत्सना बैठी दिख रही है.

पीछे खड़ी कार में से मलय और यामिनी उन्हें चुपचाप देख रहे हैं.

“आदी, बेटा जाओ. जाकर अंकल के चरण स्पर्श करो.”

मलय की आवाज़ गंभीर है, लेकिन ऑनलाइन अंग्रेज़ी गानों के आनंद में लिप्त बेटे ने पिता को सुना ही नहीं. सुन भी लेता तो स्मृति पर ज़ोर डाल समझ रहा होता- कौन अंकल? लेकिन जिसे सचमुच समझ में आया, उसकी प्रतिक्रिया आदेश जितनी ही गंभीर थी. यामिनी ने सर्द आवाज़ में कहा, “आदी नहीं जाएगा.”

“क्यों?”

“क्योंकि चरण स्पर्श करने से पहले चरणों की योग्यता देखी जाती है.”

यह भी पढ़ेअब बेटे भी हो गए पराए (When People Abandon Their Old Parents)

“ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी.”

मलय ने संयमित ढंग से कार का दरवाज़ा खोला. बीवी-बच्चों को कार में बैठा छोड़, कमर पर बेल्ट दुरुस्त करता प्रौढ़ बड़ा भाई अपने छोटे भाई की तरफ़ बढ़ चला, जो शायद अब तक उन्हें देख चुका है, पर न देखने का अभिनय कर रहा है.

यहां से यामिनी देख रही है, प्रखर ने अपने भाईसाहब के पैर छुए हैं और अपने बेटे को बुलाकर उससे भी उनके चरण स्पर्श करवाया. उस कार की अगली सीट पर देवरानी की झलक देखते ही ‘छोटी जात’ यामिनी ने अपना वही सदैव का जुमला बुदबुदाया, जो अपनी इस देवरानी-लड़की का घर में ज़िक्र सुनकर वो हमेशा कहती रही है.

यामिनी वहां हर्गिज़ नहीं जाएगी, लेकिन उसका मन उत्सुकता की सब हदें पार कर चला है- ‘वहां क्या बातें हो रही होंगी?’

उसने आदी को पापा के पास जाने को कहा, पर बेटे ने ईयरफोन के गाने से

स्वर-से-स्वर मिलाकर गाने के आनंद में फिर नहीं सुना.

“आदी, पापा के पास जाओ, अभी!” मां ने कंधा झिंझोड़ा, तो आदी को बेमन से उधर को जाना पड़ा.

यामिनी यहां से देख रही है- मलय ने छोटे भाई के सिर, कंधों, चेहरे पर पिता-सा हाथ फेरा है.

कार की पारदर्शी कांच के पार से दिख रहा है, आदी ने पिता के आदेश पर अपने अपरिचित से चाचा के चरण स्पर्श किए हैं.

इधर यामिनी के चेहरे का रंग और ढंग बदल गया और अब उसका पूरा ध्यान कार की अगली सीट पर है. कुछ ठीक से दिख नहीं रहा यहां पीछे से- कैसे कपड़े पहने होगी वो? सुना है पैंट-टीशर्ट, स्कर्ट-ब्लाउज़, टॉप-कैप्री सब पहनती है. और तो और कभी-कभी तो बाल भी लड़कों की तरह कटवाती है. यामिनी अपनी बंगाली तांत की साड़ी के ओपन पल्ले की पिन छूकर आश्‍वस्त हुई. लंबे बालों की संवरी चोटी को छू-छाकर देखा और पर्स में से छोटा आईना निकालकर अपने भारतीय नारी लुक-मेकअप का सरसरी तौर पर मुआयना किया, जिस पर गर्व करना जैसे उसके गृहिणी जीवन की एक बड़ी उपलब्धि है.

लेकिन अगले ही पल उसका ध्यान फिर कार की अगली सीट पर जा चिपका है- ‘देखो तो, जेठाई का कोई आव-आदर नहीं! लाख दूरी सही, हैं तो हम बड़े ही ना! बड़प्पन तो तब था, जब ख़ुद कार से उतरती और आकर पैर छू लेती, पर छोटी जातवाले क्या जानें ये संस्कार!’

यामिनी ने फिर मन-ही-मन उसे जीभर दुत्कारा. इस समय अम्माजी की बड़ी याद आ रही है. वे होतीं, तो यामिनी अंतत: विजेता की तरह साबित कर पाती.उनकी दुलारी छोटी बहू की ये असलियत! तीन बरस हुए, वे स्वर्ग सिधार गईं और मरते व़क्त भी घर की बड़ी बहू से उस बूढ़ी विधवा मां का यही रिरियाता-सा झगड़ा-रार कायम रहा कि प्रखर के बेटे-बीवी का इस घर में मान-सम्मान से आना-जाना हो जाए. वे कभी-कभार प्रखर के घर गईं भी. एक बार तो तीन दिन रह भी आई थीं और जब लौटीं, तो बड़ी बहू की नज़रें जैसे उनका कत्ल कर रही थीं.

यामिनी अपनी सीट पर शिकनभरी मुद्रा में बैठी लगातार उधर को ही देख रही है. मलय अपने छोटे भाई से बड़े ख़ुश होकर बतिया रहे हैं. कभी कंधा थपथपाते हैं, कभी उसकी बात पर हामी में सिर हिलाते हैं, जैसे बच्चों की उपलब्धियों को बड़े प्रोत्साहन देते हैं. प्रखर भइया अपनेपन और औपचारिकता के बीच गड़बड़ाए लगातार कुछ बोले जा रहे हैं. यामिनी यहां से ग़ौर कर रही है कि कार की अगली सीट पर बैठी स्त्री भी अपनी जगह से हर्गिज़ नहीं हिली है, ठीक वैसे ही जैसे वो!

रोली के चिप्स का पैकेट ख़त्म हुआ, तो वह बड़े भाई-पापा के पास जाने के लिए ज़ोर-ज़ोर से मचलने लगी, “पापा पास जाना! पापा पास जाना है!

आं आं ऽ ऽ!”

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इससे पहले कि मां उसे अपनी सीट पर खींचती और ज़ोर लगाकर या पीट-पाटकर चुप करा लेती, उसकी ऊंची मचलती आवाज़ अगली कार के आगे तक जा पहुंची. सबने इस तरफ़ देखा. पापा के इशारे पर आदी दौड़ा-दौड़ा आया है और बहन को गोद में उठा लिया है.

उसने भी बच्चों को उधर जाने से रोका नहीं. उसे बस अपने सम्पन्न कस्बाई मायके पक्ष के ताने याद आ रहे हैं. मामा के लड़के की शादी में… चाचा के पोते के दष्टोन में… बुआ की बेटी के चलावे-विदाई में, सब अवसरों पर उसके देवर के विजातीय प्रेम-विवाह में रिश्तेदारों की ज़बर्दस्त दिलचस्पी रही है सालों तक और अब भी इक्का-दुक्का कोई सवाल उछलता ही रहता है उस पर.

‘सुनते हैं मैला ढोनेवालों की जात से है यामी की देवरानी!’, ‘क्या बिन्नू, सनाढ्य ब्राह्मणों के यहां सबसे ही नीच जात! तुम्हारे कुल पर तो ऐसा अमिट दाग़ लग गया जैसे चंद्रमा का कलंक.’, ‘उसका बच्चा सरनेम क्या लिखता होगा दीदी?’, ‘बुरा न मानना बिटिया, पर अगर तुम्हारी देवरानी का तुम्हारी रसोई में आना-जाना, खाना-पीना होता हो, तो बता देना… हमारा धरम तो भ्रष्ट न हो.’ गर्वीली

यामिनी लज्जा से मर-मर जाती है.

ज़ेवर, साड़ी, मेकअप, शहरी जीवनशैली और पति की तरक़्क़ी के क़िस्से, सब धूल हो जाते, जब अपनों के बीच वो अपनी देवरानी की प्रतिनिधि की तरह पाती है ख़ुद को- छोटी जात! और ताबूत की आख़िरी कील थीं वे बातें जो कॉलोनी की पार्लरवाली ने उसे बताई थीं. देवरानी दो कॉलोनियां पार कर यहीं आती थी- शायद जानबूझकर ही… बकौल यामिनी की मम्मी के अनुमान के, ज़रूर वो पैतृक मकान में से, अपने पति को हिस्सा लेने के लिए भड़काया करती होगी.

बहरहाल, एक दशक पुरानी परिचित पार्लरवाली उसकी देवरानी की तारीफ़ कर रही थी कि वो अधिक महंगी सेवाएं लेती है पार्लर की, इसीलिए उससे अधिक मेनटेन’है. आवेश में जब यामिनी बता बैठी थी कि कैसे उस छोटी जात की लड़की ने उसके रत्न जैसे देवर को फंसाया, ब्याह से पहले ही गर्भवती होकर, तो पार्लरवाली ने उसकी देवरानी की उसके बारे में राय उसे बता दी थी, क्योंकि अतिरिक्त सेवाएं लेने के लिए उस दिन यामिनी ज़्यादा देर तक पार्लर में रुकी थी.

‘मामूली गृहिणियां वो भी कस्बों-गांवोंवाले बैकग्राउंड कीं, हम शहरी वर्किंग वुमन्स की क्या बराबरी कर सकती हैं? और इस शहर में इंग्लिश मीडियम से एमबीए करनेवालों के सामने कस्बे-देहात के कॉलेज की एमए हिंदी डिग्री भी कोई डिग्री है. वहां पढ़ाई होती ही क्या है, सर्टिफिकेट भर निकाल लेते हैं बस- अनपढ़ ही समझिए.’

यामिनी के कलेजे में बह्मास्त्र उतरता चला जाता है- अनपढ़ ही समझिए.

सबसे आगेवाली कार का पंचर बन चुका और वो जा चुकी है. प्रखर की कार के टायरों की हवा की भी कब की जांच हो चुकी है और अब पंचर बनानेवाला 10-12 साल का लड़का इस कार के पास आकर पंचर जांच रहा है़, पर दोनों भाई जैसे मौक़ा प माहौल सब भूल गए हैं और एक-दूसरे के साथ के इस हर क्षण को

भर-भर के जी रहे हैं. यामिनी यहां से एक दूसरा आश्‍चर्य भी देख रही है. आदी,

रोली और टीटू- वे बच्चे जो पहले कभी नहीं मिले, पल में ऐसे हिल-मिल गए हैं, जैसे साथ-साथ पले-बढ़े हों. कार में ठहरा वक़्त यामिनी से बर्दाश्त नहीं हो रहा. शायद अगली कार की उस सीट पर बुत बनी बैठी देवरानी से भी न हो रहा होगा.

यामिनी ने अपनी खिड़की के कांच को नीचे किया है और पेट्रोल पंप की

चहल-पहल को नज़रभर देखने लगी है. आसमान में ऐसे भरे बादल घुमड़ आए हैं कि बस अब छलके या तब छलके. हवा का दम सधा हुआ है, जैसे अपने बारे में लिए जा रहे किसी अहम् निर्णय को सुनती कोई घरेलू लड़की. पेट्रोल पंप पर दो-तीन लंबी कतारें हैं. छोटी कारों में अकेले बुज़ुर्ग, स्कूटियों पर सवार खिलखिलाती लड़कियां, स्टाइलिश बाइक पर ब्रांडेड चीज़ों से सजे नौजवान, दोनों तरफ़ से रोशनी देती मोमबत्ती-सी कामकाजी, सुपर वुमन मांएं, जिनकी स्कूटियों में आगे अबोध बच्चे खड़े हैं. इन कच्ची माटी भारतीयों को आधुनिकता अपने संग तराश हाथों से गढ़ रही है- महीन पाश्‍चात्य कारीगरी.

यामिनी का ध्यान फिर इधर को लौट आया है. आदी ख़ुश हो-होकर टीटू को अपनी राखियां दिखा रहा है- झिलमिल लाइटवाली राखी, अपने मनपसंद सुपरहीरो वाली राखी, चांदी की राखी… अपनी एक बहन से अपने मन की तीन-चार राखियां हर साल न बंधवा ले, तो आदी मम्मी का सिर चढ़ा दुलारा कैसे साबित हो?

यामिनी की बारीक़ नज़र उधर की हर एक गतिविधि पर है. अब प्रखर भइया का सेलफोन ये दूसरी-तीसरी बार ऐसे बजा है कि नंबर देखते ही कॉल काट दी है. ज़रूर कार में बैठी पत्नी मौन दबाव बना रही है. अब प्रखर भइया की मुद्रा अनुमति मांगने जैसी दिख रही है, लेकिन इससे पहले कि देवरानी की तरह यामिनी ने भी छुटकारे की राहतभरी सांस ली होती, उसे लगा मलय ने छोटे भाई को कुछ और देर ठहरने को कहा है. अब तीनों बच्चों को अपने पास बुलाया है.

‘हो क्या रहा है वहां?’

दो कारों में से दो बिल्कुल अलग-अलग व्यक्तित्व की स्त्रियां समान उतावलेपन से देख रही हैं.

मलय ने बेटे की कलाई से चांदी की राखी निकाल ली है. अब नन्हीं रोली के हाथों वही राखी टीटू की सूनी कलाई पर बंधवा रहे हैं. अपने पापा के इशारे पर टीटू ने बड़े पापा, बड़े भाई-बहन सबके पैर बारी-बारी से छुए हैं और मलय ने आगे बढ़कर छोटे भाई के बेटे को बांहों में भींच लिया है.

टीटू को गले से लगाए उसके बड़े पापा की बंद आंखों से आंसू बह चले हैं. यही एक पल है… यही जब ज्योत्सना अपने लिए मुख्य परिवार में सच्चा स्वागत देख रही है… यही एक पल जब यामिनी सभी बाहरी अदालतों के परे अपने भीतर है और अपनी ही सफ़ाई में कहने को उसके पास कुछ नहीं! इस पल को यहां से ताकती यामिनी ने ख़ुद को कार में इतना अकेला पाया है, जैसे मरीचिका में भटकती कोई हिरणी अब थकने लगी हो.

प्रखर भइया रुमाल से अपनी आंखों को पोंछ रहे हैं या दूर से बड़ी भाभी को भ्रम हो रहा है? और क्या ये भी सच है जो आंखें देख रही हैं? आधुनिका देवरानी कार से उतरी है. झुककर बड़े भाईसाहब के पैर छुए हैं… और अब मुस्कुराती हुई, इस कार की ओर चली आ रही है.

…इधर बनानेवाले ने पंचर का जोड़ बनाने का काम शुरू कर दिया है.

 

        इंदिरा दांगी

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कहानी- बंद घड़ी (Short Story- Bandh Ghadi)

Hindi Short Story

मैंने स्वयं ही मीरा के मन के दीपक को बुझाकर अपना मन और जीवन अंधेरा कर दिया. प्लीज़ मीरा लौट आओ. जला लो फिर से अपने मन में मेरे लिए प्रेम का वही पवित्र दीपक, पिघला दो इस किले की सारी ईंटें, मेरे अधूरे व्यक्तित्व को अपने आप में समेटकर मुझे संपूर्ण कर दो. मुझे एक ‘पूरा घर’ दे दो मीरा, बहुत अकेला हूं मैं. मेरा हाथ थाम लो. आज मैं तुम्हारे साथ अपना आप बांटना चाहता हूं. तुम्हारी धारा में तुम्हारे साथ घुल-मिलकर, एक होकर बहना चाहता हूं. मुझे अपनी धारा में बहा लो…

Hindi Short Story

मीरा की डायरी

दिनांक 17-02-

आज बिस्तर की चादर ठीक करते हुए दीवार पर लगी घड़ी की ओर नज़र गई. ना जाने कब से, कितने महीनों से बंद पड़ी है. मैंने नज़रभर घड़ी को देखा और एक गहरी सांस ली. व़क्त जैसे ठहर गया है. व़क्त जैसे व़क्त न होकर घड़ी हो गया है, जब तक घड़ी चल रही थी, वो भी चल रहा था. घड़ी रुकी, तो वो भी ठहर गया.

और बंद घड़ी में ठहरे व़क्त की तरह ही ठहर गया है मेरा और असीम का रिश्ता. जैसे घड़ी के बारे में याद नहीं है कि वह किस दिन बंद पड़ी, ठीक उसी तरह यह भी याद नहीं कि असीम और मेरे बीच कब किस समय सब कुछ ठहर-सा गया था.

कोई हलचल, कोई उमंग, कोई लहर, कोई उत्साह नहीं. दूर क्षितिज तक जैसे एक गहरी, उदास निःश्‍वास है.

20-02-

असीम का स्वभाव मुझे कभी समझ ही नहीं आया. अब तक उत्साह से भरकर, अपना समझकर उसके दिन के, मन के काम के कुछ हिस्से बांटना चाहती थी, तो वह झल्ला जाता था. उसे लगता कि मैं उसके जीवन में दख़लअंदाज़ी कर रही हूं. उसे कुरेदकर जासूसी कर रही हूं. उसकी निजता में व्यर्थ का हस्तक्षेप कर रही हूं.

मैं तो दंग रह गई थी यह प्रत्यारोप सुनकर. पत्नी के आत्मीय स्नेह की, पति के साथ, उसके जीवन के साथ, उसके कार्यकलापों के साथ जुड़ने की एक प्राकृतिक स्वाभाविकता, एक निश्‍चल प्रेम की भावना असीम को अपने जीवन में अनाधिकार हस्तक्षेप लगता है.

असीम कभी समझ ही नहीं पाया कि दांपत्य जीवन सहज प्राकृतिक रूप से बहती हुई स्वच्छ धारा की तरह होता है. उस पर यदि दुराव, छिपाव और शर्तों के बांध बना दिए जाएं, तो उसका प्रवाह रुक जाने से उसमें से दुर्गंध आने लगती है. उस पर अलगाव और बोझिलता की काई जमने लगती है.

वही काई असीम और मेरे रिश्ते पर भी जमने लगी है और उसकी दुर्गंध अब मेरी आत्मा को महसूस होती है. बड़ी घुटन-सी छाई है ज़िंदगी में.

03-03-

आज मन बहुत विकल हो रहा था. देर तक मां से बात की. कुछ भी बताया नहीं, लेकिन मां मानो बच्चों का मन पढ़ लेती हैं. सब समझ गईं. बोलीं, “बेटा, किसी-किसी का मन कठोर पर्तों से घिरा होता है, देर लगती है, लेकिन कवच टूटकर देर-सबेर अंदर से कोमल मन बाहर निकल ही आता है. तुम धीरज से काम लेकर उसका मन जीतने की कोशिश करो.”

मैं चुप रह गई. कैसे समझाऊं मां को कि असीम का मन परतों से घिरा हुआ नहीं, वरन एक दुर्भेद्य किले की तरह है. और इस किले की दीवारों में सेंध लगाना या इसे जीत पाना असंभव है. बहुत वर्ष व्यर्थ कर दिए हैं अपने जीवन के मैंने इसी प्रयत्न में, मगर कुछ हासिल नहीं हुआ.

08-03-

आज फिर मां का फोन आया था. समझा रही थीं कि कुछ लोगों का मन कई खानों में विभक्त होता है. उनमें से कुछ खाने खुले होते हैं और कुछ पर ताले लगे होते हैं. असीम का मन भी ऐसा ही है. खुले खानों की पहचान में ही ख़ुश रह, बंद ताले तोड़ने की कोशिश मत कर.

लेकिन क्या सच में ऐसे विभक्त होकर पूरी उम्र रहा जा सकता है?

मां-पिताजी का रिश्ता कितना सुंदर है. दोनों का मन, विचार, व्यवहार सब एक है. लगता ही नहीं कि दोनों दो अलग व्यक्ति हैं. सागर में घुली हुई नदी जैसे हैं दोनों. जिस प्रकार सागर और नदी के पानी को अलग-अलग नहीं पहचाना जा सकता, ठीक उसी प्रकार मां और पिताजी के व्यक्तित्व भी आपस में घुल-मिल गए हैं. एकमत, समन्वय, सामंजस्य की एक अनुपम सुंदर छवि है दोनों का दांपत्य.

और मीरा…असीम… प्रकृति के रचे हुए दो विपरीत ध्रुव, दिन और रात की तरह दो कभी भी एक न हो सकनेवाले. दिन और रात जो सांझ की चौखट पर खड़े होकर उदास और सरोकार रहित दृष्टि से एक-दूसरे को क्षणभर देखते हैं और फिर रात के निःस्तब्ध अंधकार में विलीन हो जाते हैं.

12-03-

20-03-

04-04

बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा. जीवन की धारा यदि प्रवाहमान हो, तो नित नए दृश्यों में मन रमा रहता है. सोचने और लिखने को बहुत कुछ होता है, लेकिन किसी ठहराव पर कोई कितना लिखे.

घड़ी अब भी बंद है. आज सोचा पलंग की चादर बदल दूं, पर मन ही नहीं किया. दस दिन हो गए तो क्या, एक सलवट तक तो पड़ी नहीं है. कल, परसों या फिर कभी और बदल दूंगी.

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12-04-

मेरे और असीम के बीच बस कामचलाऊ बातचीत ही होती है. स्नेह और आत्मीयता में बंधे वार्तालाप के धागे तो ना जाने कब के टूट गए हैं. बातें, बस यही कि आटा-दाल ख़त्म हो गए हैं या फिर आते समय फल-सब्ज़ी लेते आना.

मां-पिताजी का दांपत्य और आपसी संबंध देखते हुए बड़ी हुई थी. मन में जन्म से ही एक सहज स्वाभाविक छाप अंकित थी. विवाह यानी जीवन के हर क्षण, हर रहस्य, हर सुख-दुख और प्रत्येक पहलू को साथ जीना, यही तो होता है

जीवनसाथी. हृदय में यही कोमल, सुवासित, मगर मज़बूत, दृढ़माला लेकर मैंने असीम का वरण किया था. लेकिन कुछ ही महीनों बाद असीम के व्यवहार के कारण उस माला के एक-एक फूल मुरझाते चले गए और अब तो धागा भी टूटनेवाला है…

क्यों ऐसा है असीम? क्यूं नहीं मन मिलाकर, एक होकर अपना संपूर्ण हृदय और मन मेरे साथ मिलाकर रहता है. कैसी गांठ है उसके मन में, जो उसे अपनी ही पत्नी से पूरी आत्मीयता और सामंजस्य से रहने नहीं देती.

25-04-

30-04-

10-05-

फिर वही सांसों का बोझ ढोते हुए दिन से रात और रात से दिन. अब तो कमरे में जाती हूं, तो बंद घड़ी से नज़रें चुरा लेती हूं. कभी लगता है वह भी बेचारी मेरी तरह ही है, ठहरी हुई, निरुद्देश्य, दीवार पर टंगी हुई है.

कभी-कभी उससे सहानुभूति होने लगती है. लेकिन उसे देखकर मेरे अपने जीवन का दुख और ठहराव और अधिक घना होकर बोझिल हो जाता है. क्या कभी ये घड़ी चलेगी और मेरा व़क्त बदलेगा…

असीम की डायरी

01-06-

बहुत दिनों से देख रहा हूं मीरा अंदर से मुरझाती जा रही है. कारण भी ज्ञातव्य ही है, मेरा स्वभाव और व्यवहार. पहले पहल कितने लंबे समय तक उसने प्रयत्न किया कि वह मेरी हर सांस के बारे में जाने, मेरे व्यक्तित्व के हर पक्ष से परिचय प्राप्त करे. सही अर्थों में दो तन एक प्राण बने. लेकिन उसके साथ कुछ भी बांटना मुझे बड़ा हास्यास्पद-सा लगता था तब. बड़ी खीझ होती थी मीरा से, वह कुछ भी सोचे, कुछ भी करे, पहने-ओढ़े उससे मुझे क्या? और मैं भी क्या करता हूं, कहां आता-जाता हूं, यह उसे क्यूं बताने जाऊं. हम दोनों के ही स्वतंत्र व्यक्तित्व हैं, तो एक-दूसरे के जीवन में व्यर्थ हस्तक्षेप क्यूं करें.

मीरा मेरे स्वभाव को बहुत जल्दी ही समझ गई, तभी उसने अपना व्यवहार एकदम बदल लिया और मेरे जीवन से अपने आप को पूरी तरह काट लिया. बस, अपने कर्तव्यभर निभाती जा रही है.

लेकिन अब मेरे मन में एक खालीपन-सा होता जा रहा है. यही तो मैं चाहता था मीरा से और वो वही कर भी रही है, बिना शिकायत किए, बिना कोई जवाब-तलब किए. लेकिन अब मैं खाली-खाली-सा, आहत-सा क्यों महसूस कर रहा हूं. हर शाम को घर में पैर रखते ही मैं क्यों प्रतीक्षा करता हूं कि मीरा शुरुआती दिनोंवाले उसी प्रेम, अपनेपन और उत्साह से भरी हुई आए और अपनी सुनाते हुए कुरेद-कुरेदकर मुझसे भी मेरे बारे में पूछे.

मैं जानता हूं हम दोनों ही दो विपरीत पारिवारिक पृष्ठभूमियों से आए हैं. मीरा भरे-पूरे मज़बूत घर से आई है, इसलिए उसकी नींव भी मज़बूत है और तभी उसने मुझे भी एक पक्का, सुंदर, सुरक्षित और मज़बूत घर देना चाहा था…

11-06…

उस दिन बात अधूरी रह गई थी. मगर मैं स्वेच्छा से अलग हुए महत्वाकांक्षी माता-पिता के आधे-अधूरे टूटे हुए घर से उत्पन्न हुआ था, जिसने घर के दोनों हिस्सों को बस अपना-अपना भाग समेटते देखा था. एक-दूसरे से कटे हुए अपने-अपने खोल में सिमटे हुए. मेरी प्रकृति में भी वही आधा-अधूरा, अपने आप में सिमटा हुआ बीज पड़ा था. मेरी अपनी ही नींव कमज़ोर थी, तभी तो मैं मीरा को उसका संपूर्ण घर नहीं दे सका.

अपने माता-पिता के अलगाववादी रिश्ते ने मेरे मन के चारों ओर ईंटें खड़ी कर दीं और मन में बस अपने ‘मैं’ तक ही सिमटकर रह गया.

मेरा मन एक दुर्भेद्य किला बन गया. मगर मीरा के प्यार की आंच ने जगह-जगह उन ईंटों को पिघलाकर झरोखे बना दिए थे और मन एक प्रेममय उजास से भरने लगा था कि मेरे व्यवहार ने…

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मैंने स्वयं ही मीरा के मन के दीपक को बुझाकर अपना मन और जीवन अंधेरा कर दिया. प्लीज़ मीरा लौट आओ. जला लो फिर से अपने मन में मेरे लिए प्रेम का वही पवित्र दीपक, पिघला दो इस किले की सारी ईंटें, मेरे अधूरे व्यक्तित्व को अपने आप में समेटकर मुझे संपूर्ण कर दो. मुझे एक ‘पूरा घर’ दे दो मीरा, बहुत अकेला हूं मैं. मेरा हाथ थाम लो.

आज मैं तुम्हारे साथ अपना आप बांटना चाहता हूं. तुम्हारी धारा में तुम्हारे साथ घुल-मिलकर, एक होकर बहना चाहता हूं. मुझे अपनी धारा में बहा लो…

मीरा की डायरी

20-06-

आज असीम के टेबल पर बिखरे काग़ज़ समेट रही थी कि एक डायरी में अपना नाम देखकर उत्सुकतावश पढ़ने बैठ गई.

पढ़ते-पढ़ते मन भर आया, आंखें नम हो गईं. मां ठीक ही कहती थीं प्रेम की ऊष्मा कठोर से कठोर ईस्पात को भी पिघला देती है. असीम के मन में भी प्रेम की ऐसी अनुभूति, ऐसी संवेदनाएं हैं, मैं उन्हें कभी समझ ही नहीं पाई. नहीं असीम, मेरे मन में तुम्हारे प्रति प्रेम का दीपक कभी बुझा ही नहीं था, वह तो सतत् जल रहा था.

अरे! यह क्या? घड़ी तो चल रही है. पता नहीं कब असीम ने नई बैटरी डालकर इसे शुरू कर दिया. कितना अच्छा लग रहा है इसे देखकर. उत्साह से, टिक-टिक करती ठुमक-ठुमककर जीवन लय के समान आगे बढ़ रही है. कितना सुखद है इसका चलना. अवरोध खुल गए हैं, अब ठहरा हुआ बासी पानी छट जाएगा और ताज़े पानी की स्वच्छ निर्मल धार कल-कल करती बहेगी.

उ़फ्! पांच बजने में स़िर्फ दस मिनट ही शेष हैं. कितना काम है, साढ़े छह बजे तक असीम का मनपसंद नाश्ता बनाना है, फिर कैंडल लाइट डिनर की तैयारी और फिर ख़ुद को भी तो संवारना है. असीम के आते ही उन्हें अपनी दिनभर की आपबीती सुनानी है और उनकी सुननी है.

और…    और…

डबलबेड की पुरानी चादर हटाकर नई चादर बिछानी है. हम दोनों को मिलकर एक नया मज़बूत और ख़ुशहाल घर बनाना है.

डॉ. विनीता राहुरीकर

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कहानी- नई दिशा (Short Story- Nai Disha)

“आज यदि मैं इस मुक़ाम तक पहुंच पाई हूं, तो उसके पीछे एक बहुत बड़ा योगदान मेरी उस सहेली का है, जिससे मेरा दर्द, मेरी मायूसी, मेरे जीवन की निराशा बर्दाश्त नहीं हुई और एक सच्चे मित्र की तरह उसने मुझे नई दिशा दिखाई… ”

Kahaniya

इस गणतंत्र दिवस पर सुमति को राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित किया जा रहा था. उसके द्वारा पोलियो निवारण के लिए किए गए कार्यों के लिए उसे समाजसेवा के क्षेत्र में अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका था. लेकिन आज उसे देश के सबसे बड़े पदाधिकारी द्वारा इस महान दिवस पर सम्मानित किया जा रहा था. मेरी ख़ुशी का तो जैसे ठिकाना ही न था. इतने बरस बीत गए, पर अब भी लगता है जैसे कल की ही बात है.

उस समय मैं कक्षा ग्यारहवीं में पढ़ती थी. पापा के ट्रांसफर के कारण अजमेर ज़िले के एक छोटे से कस्बे केकड़ी के नए स्कूल में पहला दिन था मेरा. बहुत छोटा-सा कस्बा था यह. स्कूल के नाम पर सरकारी स्कूल ही थे और किसी प्रकार के कोई प्राइवेट स्कूल नहीं थे. यूं तो मेरी रुचि साइंस में थी, लेकिन इस कस्बे में सभी लड़कियां आर्ट के ही विषय पढ़ती थीं. कॉमर्स और साइंस पर जैसे लड़कों का एकाधिकार था. मेरा स्कूल में नया-नया दाख़िला हुआ था, इसलिए मेरी कम ही सहेलियां थीं, लेकिन एक अच्छी सहेली थी- सुमति. अपने नाम की ही तरह अनमोल गुणों का ख़ज़ाना थी वह. ऐसा कोई काम नहीं था, जो उसे नहीं आता था. पढ़ाई, संगीत, गायन, कढ़ाई-बुनाई, गृहकार्य इत्यादि में अव्वल थी वो. उसके बनाए चित्र तो जैसे जीवंत हो उठते थे. वो न स़िर्फ मेरी सहेली थी, बल्कि एक प्रेरणास्रोत भी थी.

ईश्‍वर ने उसे सर्वगुण संपन्न तो बनाया था, पर उन सबके साथ उसके एक पैर को पोलियो का शिकार भी बना दिया था. हमारी दोस्ती में यह कोई अड़चन नहीं थी, लेकिन लोगों के ताने जब-तब उसे मायूस कर देते थे. वह हमेशा सोचती कि वह पोलियो की शिकार हुई, इसमें उसका क्या दोष? लेकिन उन दिनों यह माना जाता था कि पिछले जन्म के दुष्कर्मों के कारण इस जन्म में पोलियो होता है. यही कारण था कि उसके अपने रिश्तेदारों के मुंह से जब-तब खरी-खोटी निकल जाती थी और उसे मायूस कर देती थी.

वह जितनी अच्छी थी, उतनी ही भावुक भी थी. लोगों के ताने उसे अंदर तक झकझोर कर रख देते थे और वह मायूसी के अथाह सागर में डूब जाती. मैं अपनी सहेली को यूं दुखी देखकर भी कुछ नहीं कर सकती थी. मैंने कई बार उसे समझाने की कोशिश की, “लोग तो कहते रहेंगे, दूसरों की बातों को दिल से नहीं लगाना चाहिए. जब तक तुम स्वयं को विकलांग न समझो, तुम विकलांग नहीं हो. तुम जितने गुणों से भरपूर हो, उतने गुण तुम्हारे अच्छे कर्मों का ही नतीजा हैं. पोलियो तुम्हें कमज़ोर नहीं बना सकता.” लेकिन मेरी बातों का उस पर कुछ असर नहीं होता. वो चुपचाप स्वयं को दोष देती रहती कि उसके पोलियोग्रस्त होने के कारण उसे और उसके माता-पिता को दूसरों की बातें सुननी पड़ती हैं.

यूं तो हर माता-पिता संतान का हित ही चाहते हैं, लेकिन यदि समाज भारतीय हो, तो एक विकलांग बेटी के माता-पिता को कितनी चिंताएं सताती होंगी, सुमति अच्छी तरह से जानती थी. उसकी मां को हर समय उसकी शादी की चिंता रहती थी. डर वाजिब भी था. कौन करेगा शादी एक विकलांग लड़की से! उनकी रूपवान व गुणवान लड़की की शादी किसी विकलांग, नेत्रहीन और विधुर से ही होनी थी, जो उन्हें अंदर ही अंदर कचोटता रहता था. उन्हें उसे पढ़ाना भी तो एक बोझ के समान लगता था, क्योंकि यदि वह ज़्यादा पढ़-लिख गई, तो शायद उसके माता-पिता के लिए उसके लायक लड़का ढ़ूंढ़ना बेहद मुश्किल हो जाएगा. माता-पिता की यह बेचैनी और ये आशंकाएं सुमति से छिपे नहीं थे, इसीलिए उम्र से कहीं ज़्यादा समझदार और दूरदर्शी बन गई थी वो. चाहकर भी हमउम्र लड़कियों की तरह सहेलियों के साथ बैठकर गप्पे लड़ाना, इधर-उधर की फ़िज़ूल की बातें करना उसके स्वभाव में नहीं था. वह अपनी सोच का साथी अपने चित्रों को ही बनाती और उसी में ख़ुश रहती. कक्षा में नई होने के कारण मैंने भी इस एकाकी, शांत और समझदार लड़की को अपनी सहेली बनाना मुनासिब समझा और कम बातें होते हुए भी हम दोनों के बीच अपनेपन का रिश्ता बहुत गहरा हो गया था. इसी वजह से जब भी उसे उदास पाती, तो मैं भी गुमसुम हो जाती.

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एक दिन पापा ने भांप लिया और मुझसे जानना चाहा कि आख़िर क्या कारण है मेरे यूं बार-बार उदास होने का. जब मैंने उन्हें सुमति के बारे में बताया, तो उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया और वादा किया कि वो ऐसा कोई उपाय ज़रूर ढूंढ़ निकालेंगे, जिससे सुमति की मायूसी दूर हो सके.

इस बीच हमारा सत्र बीत गया. एक बार फिर सुमति ने कक्षा में टॉप किया था. मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा, पर यह ख़ुशी भी कुछ पलों के लिए ही थी. जैसे ही वो रिपोर्ट कार्ड लेकर बाहर निकली, वाणिज्य संकाय के कुछ छात्रों ने उसकी विकलांगता पर ताने कसने शुरू कर दिए. उसके चेहरे से मुस्कान यूं गायब हुई मानो मुस्कुराना कभी भी उसका हक़ नहीं था. मेरे लिए यह असह्य था. मैंने उन लड़कों को ख़ूब खरी-खोटी सुनाई, पर उनकी सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. जब तक सुमति और मैं घर तक नहीं पहुंचे, वो लड़के सायकिल पर हमारा पीछा करते रहे और तरह-तरह के ताने कसते रहे. मुझे लगा कि मैंने सुमति व अपनी परेशानी और बढ़ा दी है. आख़िर कर भी क्या सकते थे हम दोनों उन बदतमीज़ व बदमिज़ाज लड़कों का, जिन्हें उनके अपने परिवार और उससे भी बढ़कर इस सामाजिक व्यवस्था ने निरंकुश और नपुंसक बना दिया था.

मैंने घर पर आकर सारा क़िस्सा पापा को बताया. उन्हें उनके वायदे की याद दिलाई. कुछ ही दिनों बाद पापा ने देहरादून घूमने का प्लान बनाया. उन्होंने कहा कि मैं सुमति और उसके माता-पिता को भी देहरादून चलने के लिए कहूं. यूं भी सुमति को अकेले मेरे साथ भेजने के लिए उसके माता-पिता तैयार नहीं होते, इसलिए वो हमारे साथ चलने को तैयार हो गए, पर बहुत सारी मिन्नतों के बाद. लेकिन मैं ख़ुश थी, आख़िर मेरी इच्छा जो पूरी होने जा रही थी.

पापा के मित्र देहरादून के कलेक्टर थे. उन्होंने ही हमारे वहां ठहरने का इंतज़ाम किया था और वहां की कुछ संस्थाओं में हमारे भ्रमण की भी व्यवस्था करवाई थी. सबसे पहले हम एन.आई.वी.एच. (नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ विज़ुअली हैंडीकैप्ड) गए, जहां पर अनेक जन्मांध लोग अलग-अलग क्षेत्रों में शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं. आंखों में अंधेरे के बावजूद वहां हरेक की ज़िंदगी में उम्मीद का उजाला था. काले घने अंधेरे के बावजूद अपने लिए एक नई राह तलाशना उन्हें आता था. उनकी कठिनाइयां सुमति से कहीं बड़ी थीं, पर मायूसी की चादर ओढ़कर बैठने की बजाय वो अपनी कठिनाइयों का मुक़ाबला करने के लिए हर पल मुस्कुराते हुए तैयार रहते थे. हर चेहरे पर ज़िंदगी को मुस्कुराकर जीने का जज़्बा खिलखिलाता था.

उसके बाद हम राफेल संस्थान गए, जहां पर मंदबुद्धि बच्चों को पढ़ाया जाता था. इनमें कई वयस्क भी थे, जो बाल्यकाल से ही इस संस्था में प्रशिक्षण प्राप्त कर आत्मनिर्भर बनने में क़ामयाब हुए थे. इस संस्था में लाइब्रेरियन के तौर पर काम करनेवाली महिला एक दिन इसमें पढ़नेवाली मानसिक रूप से अक्षम बच्ची थी, जिसे उसके माता-पिता ने छोड़ दिया था. उन भोले-मासूम बच्चों में सीखने की इतनी ललक और जिज्ञासा थी कि कोई भी अपने बचपन की मधुर स्मृतियों में खो जाए.

बाद में हम विकलांग बच्चों की ऐसी संस्था में गए, जहां पोलियो या किसी हादसे के कारण विकलांग हुए कई बच्चे एक साथ रहते थे और किसी कौशल में प्रशिक्षण प्राप्त करते थे. वहां जो हमने देखा, उसे देखकर हमारी आंखें भीगे बिना नहीं रह सकीं. एक कमरे में संजू नाम का एक लड़का पेंटिंग बना रहा था. उसके दोनों हाथ और पैर एक सड़क हादसे में कट गए थे, लेकिन मुंह में पेंसिल रखकर भी वो बहुत ख़ूूबसूरत पेंटिंग बना रहा था. वहां खड़ी एक टीचर ने बताया कि संजू को बचपन से ही पेंटिंग का बहुत शौक़ था, इसलिए जब इसके हाथ-पैर दोनों कट गए, तब भी इसने अपने शौक़ को नहीं छोड़ा और मुंह में पेंसिल रखकर भी वो ऐसी पेंटिंग बनाता है कि लोग दांतों तले उंगली दबाने को विवश हो जाएं. आज संजू की देशभर में कई पेंटिंग एक्ज़ीबिशन लग चुकी हैं.

सुमति और उसके माता-पिता इन बच्चों की ऐसी जीजिविषा देखकर अचम्भित थे. उन्हें भी यह प्रेरणा मिली कि अपनी बेटी को एक बोझ मानने की बजाय उसकी क्षमताओं और सामर्थ्य को बढ़ाने की ओर ध्यान देना चाहिए. उस एक दिन ने सुमति और उसके परिवार की सोच पूरी तरह बदल दी. पापा ने अपना वादा भली-भांति निभाया था, उन्होंने मेरी सहेली की निराशा को जिस तरह आशा में बदल दिया, वह सोचकर ही मेरा मन आह्लादित हो उठता है.

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अब यदि कोई सुमति को उसकी विकलांगता की याद दिलाता, तो वह उन जन्मांध, मंदबुद्धि, विकलांग बच्चों, विशेषकर संजू के जीवन के सकारात्मक पहलुओं को याद कर और आत्मविश्‍वासी हो जाती. ज़िंदगी जीने का उसका हौसला और बढ़ जाता. उसने ठान लिया कि वह अपना सारा जीवन असहाय माने जानेवाले विकलांग बच्चों को सशक्त बनाने में लगाएगी. अब सुमति के माता-पिता भी इस कोशिश में उसके साथ थे. आज जब उसे उसके प्रयासों के लिए सम्मानित किया जा रहा है, तो मेरी ख़ुशी की कोई सीमा नहीं है.

समारोह में दिए भाषण में उसने कहा, “आज यदि मैं इस मुक़ाम तक पहुंच पाई हूं, तो उसके पीछे एक बहुत बड़ा योगदान मेरी उस सहेली का है, जिससे मेरा दर्द, मेरी मायूसी, मेरे जीवन की निराशा बर्दाश्त नहीं हुई और एक सच्चे मित्र की तरह उसने मुझे नई दिशा दिखाई… उस दिन से मैंने ठान लिया कि मैं भी हरसंभव कोशिश करूंगी कि मेरे जैसे हताश, मायूस विकलांग लोगों को मज़बूत और समर्थ बनाने का बीड़ा उठा सकूं. मेरी सहेली ने एक सुमति को नई दिशा दिखाई, ताकि मैं कई सुमतियों के जीवन की बैसाखी को फिर से चलायमान कर सकूं…”

मैं उसे बोलते देख भावविभोर थी. आज मेरी मित्रता गर्व की किसी भी सीमा को नहीं पहचानती थी. मैं जानती हूं कि उसकी इस सफलता के पीछे अकेले मेरा योगदान नहीं था, बल्कि मैंने जो किया स्वयं के लिए किया. आख़िर उसे दुखी देखकर मैं ख़ुश कैसे रह सकती थी. फिर जीवन के लिए एक नई सोच, नया रास्ता, तो स्वयं सुमति ने तलाशा और अकेले अपने दम पर तय किया था.

Nidhi Choudhary

     निधि चौधरी

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कहानी- गोल्डन जुबली (Short Story- Golden Jubilee)

“हम सभी अभिभावक बच्चों की बात से सहमत थे. सच तो यह है कि हम सभी चाहते हैं कि हमारे परिवार के बुज़ुर्ग सदस्य ख़ुश रहें, व्यस्त रहें, पर कैसे? इसका समाधान खोजने के लिए न समय जुटा पा रहे थे और न ही आपसी संवाद कायम कर पा रहे थे. बच्चों ने इस दिशा में एक प्रेरक क़दम उठाना चाहा, तो सैकड़ों क़दम उनके साथ जुड़कर क़दमताल करने लगे. हमारे मना करने के बावजूद बच्चों ने अपनी पूरी पॉकेटमनी इस फंड में डाल दी. उसके अलावा हर परिवार से इतनी सहयोग राशि मिली है कि हम और दो-तीन बेंच और शेड पार्क में लगवा सकते हैं. लेकिन आज के शुभ दिन को ध्यान में रखते हुए जल्दी-जल्दी में दो बेंच और शेड ही लगवा पाए हैं. हम चाह रहे थे कि उनका भी अब उद्घाटन कर दिया जाए.”

Hindi Kahani

टीना जब से मम्मी-पापा के पास रहने आई है, उन्हें एक ही टॉपिक पर बातों में मशगूल पा रही है और वह है उसके नाना-नानी यानी मिस्टर एंड मिसेज़ खन्ना की गोल्डन जुबली मैरिज एनीवर्सरी.

“कोई मुझे बताएगा ये सेलीब्रेशन है कब?”

“अगले साल नवंबर में.” मम्मी ने बताया तो टीना की हैरानी और भी बढ़ गई.

“उसके लिए अभी से तैयारियां?”

“तो और क्या? करनेवाला है कौन? कोई भाई-बहन तो हैं नहीं मेरे. जो करना है सब मुझे और तेरे पापा को ही करना है. तो प्लानिंग भी हमें ही करनी पड़ेगी ना? किन-किन को बुलाना है, कहां ठहराना है, क्या बनवाना है, क्या रिटर्न गिफ्ट देना है…?”

“ओके! ओके! समझ गई.” कहने के साथ ही टीना कुछ सोचने में मगन हो गई थी. पिछले दो सालों से वह नाना-नानी के पास रहकर पढ़ रही है. पापा का वकालत का पेशा है और मम्मी का मेडिसिन का. दोनों का ही आए दिन तबादला होता रहता है, लेकिन इस रेलमपेल में सबसे ज़्यादा नुक़सान हो रहा था टीना की पढ़ाई का. तब नाना-नानी ने उसे अपने पास छोड़ देने की पेशकश की थी, जिसे काफ़ी सोच-विचार के पश्‍चात् दोनों ने स्वीकार कर लिया था और इस तरह ननिहाल के सबसे प्रतिष्ठित कॉन्वेंट स्कूल में टीना का दाख़िला करवा दिया गया था. जहां टीना के मम्मी-पापा यानी सीमा और अमित टीना के भविष्य को लेकर निश्‍चिंत हो गए थे, वहीं टीना के नाना-नानी को तो मानो जीने का सहारा मिल गया था. दोनों ब्लडप्रेशर और डायबिटीज़ के मरीज़ थे, पर किशोरावस्था की सीढ़ियां चढ़ती टीना के खानपान और स्वास्थ्य के साथ कोई समझौता उन्हें मंज़ूर न था. उसके लिए घर में खीर भी बनती और आलू का परांठा भी. टीना भी इतना लाड़-दुलार और साज-संभाल पाकर बेहद ख़ुश थी.

मम्मी-पापा तो चाहकर भी अपनी व्यस्त दिनचर्या में से उसके लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाते थे. अपने इस अपराधबोध की भरपाई वे तरह-तरह के उपहारों से करते थे. जब भी आते टीना को नए-नए कपड़ों, खिलौनों और चॉकलेट्स से लाद जाते. टीना के तो दोनों हाथों में लड्डू थे और कोई बच्चा होता, तो इतना लाड़-दुलार पाकर निश्‍चित रूप से सिर चढ़ गया होता, लेकिन यह नाना-नानी के दिए संस्कार थे, जिन्होंने टीना को हमेशा मर्यादित आचरण में बांधे रखा. उसे पता था कि प्यार देकर ही प्यार पाया जा सकता है और कि वह कितनी ही शिक्षा अर्जित कर ले, कितने ही ऊंचे पद पर पहुंच जाए, लेकिन सम्मान उसे तभी मिलेगा, जब अनुभव के आगे उसका सिर झुकेगा. किशोरावस्था से गुज़र रही उस बालिका को घर के सदस्य भले ही बच्ची समझते हों, पर वह अपने आपको घर की एक ज़िम्मेदार और समझदार सदस्या मानती थी. और इसलिए यह ख़ूबसूरत पारिवारिक उत्सव उसे कुछ विशिष्ट, पर महत्वपूर्ण करने के लिए उकसा रहा था. मम्मी-पापा की बातचीत वह अब और भी गौर से सुनने लगी थी.

“मेरे ख़्याल से हमें उनके बेडरूम में एक बड़ा-सा एलईडी लगवा देना चाहिए. दोनों का ही काफ़ी समय टीवी देखते हुए गुज़रता है, विशेषकर पापाजी का. मम्मीजी तो फिर भी घर के कामों में लगी रहती हैं.” पापा के सुझाव से टीना मन ही मन सहमत थी.

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“एक फुली ऑटोमैटिक वॉशिंग मशीन भी लगवा देते हैं. अब कुछ भी कहो सेमी में थोड़ी मेहनत तो होती ही है. मम्मी में अब कहां इतना दम है? जितना कर लेती हैं, वही काफ़ी है.” टीना को मम्मी का सुझाव भी पसंद आया. हालांकि कोई उसकी राय नहीं पूछ रहा था.

…पर उसे भी तो नाना-नानी को कुछ देना चाहिए. आख़िर वे उसका इतना ख़्याल रखते हैं. नाना जब-तब होमवर्क और प्रोजेक्ट में उसका हाथ बंटाते रहते हैं. और नानी तो बेचारी पूरा दिन ही उसके पीछे लगी रहती है. सुबह टिफिन से लेकर यूनिफॉर्म, च्यवनप्राश, रात का दूध तक.

मजाल है, जो एक भी चीज़ छूट जाए या ज़रा भी वक़्त से आगे-पीछे हो जाए. सोचते हुए टीना ने अपना पिग्गी बैंक फोड़ डाला और रुपए गिनने लगी. इतने रुपयों में वह नाना-नानी के लिए क्या गिफ्ट ला सकती है? मम्मी-पापा के महंगे-महंगे तोहफ़ों के सामने उसका गिफ्ट तो वैसे भी कहीं नहीं टिकेगा. टीना रुआंसी हो उठी थी.

“अरे, टीना बेटी, यह पिग्गी बैंक क्यों फोड़ा? और ये रुपए क्यों फैला रखे हैं?” पापा अचानक कब कमरे में आ खड़े हुए थे, टीना को ख़्याल ही नहीं आया. मम्मी अस्पताल जा चुकी थीं.

“मैं भी नाना-नानी को गिफ्ट देना चाहती हूं, इसलिए…”

“अरे, तो मुझसे बोल देती. बोलो, कितने पैसे चाहिए तुम्हें? क्या लेना है?”

“वो तो मैंने अभी तक सोचा ही नहीं.” टीना का भोला-सा प्रत्युत्तर सुन पापा को बरबस ही उस पर प्यार उमड़ आया.

“तो पहले सोच लो. फिर मुझे बता देना. मैं ला दूंगा. अब दरवाज़ा बंद कर लो और अपनी पढ़ाई करो.”

पापा तो निश्‍चिंत हो चले गए थे, पर टीना आश्‍वस्त नहीं हो सकी थी. यदि पापा ही ला देंगे, तो फिर उसकी तरफ़ से क्या गिफ्ट हुआ? लेकिन गिफ्ट का मतलब स़िर्फ पैसों से ख़रीदी वस्तु ही तो नहीं होती. ख़ुद नाना ने और उसकी टीचर ने समझाया था कि यदि आप किसी को प्रसन्न करनेवाला कोई काम करो, तो वह भी उसके लिए गिफ्ट ही होता है, तो फिर मैं क्या करूं?

टीना का मन अब सोते-जागते इसी सवाल में उलझा रहता. यहां तक कि उसकी छुट्टियां समाप्त हो गईं और नाना-नानी के पास लौटने के दिन भी आ गए. पापा उसे छोड़ने चल रहे थे. रास्ते में उन्होंने टीना से पूछा, “अच्छा तो फिर तुमने क्या उपहार निश्‍चित किया बेटा?”

“मैं सोचकर बता दूंगी पापा.” टीना उन्हें नहीं बताना चाहती थी कि उसने अपना इरादा बदल दिया है. वह अब जो भी करेगी, अपने बलबूते पर करेगी.

नानी ने सबकी पसंद का खाना दाल-बाटी और चूरमा बनाया था. सब खाने पर टूट पड़े थे.

“मैं और सीमा आपके हाथ का खाना बहुत मिस करते हैं. कभी छुट्टीवाले दिन सीमा का कुछ ख़ास बनाने का मूड बन भी जाता है, तो कहती है अभी मां से फोन पर रेसिपी पूछती हूं. पर इतने में कोई पेशेंट आ जाता है या इमर्ज़ेंसी कॉल आ जाती है और सब धरा ही रह जाता है.”

“मैंने ख़ूब सारा साथ ले जाने के लिए पैक कर दिया है. आराम से खाना.” नानी ने हंसते हुए कहा, तो सभी हंस पड़े.

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“सीमा को आपसे पूछ लेने का आसरा तो है. मुझे तो बेचारी टीना और उसके होनेवाले बच्चों की फ़िक्र है. उनका कभी ऐसा कुछ बनाने-खाने का मन किया, तो वे किससे पूछेंगे? आपकी पाक कला तो मम्मीजी आप ही तक सीमित रह गई.”

“अरे, तू फ़िक़्र मत कर. मेरी टीना बहुत होशियार है. मैं उसे सब सिखाकर मरूंगी.”

पूरे खाने के दौरान ऐसे ही हंसी-मज़ाक चलता रहा, पर टीना अलग ही सोच में डूबी रही. वह आजकल हर बात में से कोई न कोई सूत्र खोजने लगी थी.

अब तो नानी कुछ भी बनाती, पहला चम्मच खाते ही टीना के सवाल-जवाब आरंभ हो जाते. यह कैसे बनाया नानी आपने? कौन-सी चीज़ कितनी-कितनी डाली?

“अरे, मैंने तो उस दिन मज़ाक में तेरे पापा से कह दिया था कि तुझे सब कुछ सिखा दूंगी. तू तो सीरियस हो गई. पहले अपनी पढ़ाई ख़त्म कर ले. फिर सब सीख लेना.”

नाना गौर कर रहे थे कि आजकल टीना नीचे बच्चों के साथ भी ज़्यादा वक़्त बिताने लगी है. कभी किसी के घर में घुसी रहती है, तो कभी किसी के. पूछने पर टीना कभी क्राफ्ट का बहाना बना देती, कभी कुछ इनडोर गेम्स खेलने का.

आख़िर वह चिर-प्रतीक्षित दिन भी आ ही गया. घर में दूर-पास के रिश्तेदारों का जमावड़ा होने लगा था. टीना के मम्मी-पापा तो सप्ताह भर पहले से ही आए गए थे और ज़ोर शोर से तैयारियों में जुटे हुए थे. घरभर में शादी जैसी चहल-पहल और रौनक़ हो गई थी. सीमा और अमित ने मम्मी-पापा के पुराने दोस्तों और सहेलियों को भी आमंत्रित कर लिया था. खाने-पीने और बातों में ही पूरा वक़्त कैसे गुज़र रहा था, मुख्य मेज़बान मिस्टर एंड मिसेज़ खन्ना तो क्या, किसी को पता नहीं लग रहा था.

शाम को दोनों को दूल्हा-दुल्हन की तरह सजाकर नीचे ले जाया गया, जहां शानदार स्टेज और सुसज्जित पंडाल उनका इंतज़ार कर रहा था. एक के बाद एक अतिथि स्टेज पर चढ़ते जा रहे थे और मिस्टर एंड मिसेज खन्ना के सफल व सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हुए नीचे उतरते जा रहे थे. अंत में टीना अपने सोसायटी के दोस्तों के साथ मंच पर चढ़ी. सबकी उत्सुक निगाहें उस पर टिक गईं. उसके हाथ में एक गुलाबी रंग का गिफ्ट पैक था.

“यह क्या है टीना?” नाना ने उत्सुकता से पूछा.

“खोलकर देख लीजिए.”

नाना ने धीरे-धीरे गुलाबी पन्नी हटाई. सभी की उत्सुक नज़रें उन्हीं पर टिकी थीं. उनके हाथ में एक सुंदर-सी जिल्द में बंधी पांडुलिपि चमक उठी, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, ‘नानी की रसोई.’

टीना ने आगे बढ़कर पुस्तक नानी के हाथ में थमा दी. “आपको आपकी पुस्तक के विमोचन की बहुत-बहुत बधाई नानी. आप द्वारा बनाए जानेवाले सारे परंपरागत व्यंजन इसमें लिपिबद्ध हो चुके हैं और यह देखिए बतौर लेखिका आपकी फोटो और नाम- मिसेज़ सरला खन्ना.”

नानी के कंपकंपाते हाथों में पुस्तक हिलने लगी थी. आंखों से अनवरत बहते आंसुओं के बीच भी अपनी तस्वीर और नाम देख लेने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई. वे और नाना उत्सुकता से पुस्तक के पन्ने उलट-पुलट रहे थे. वाक़ई सब कुछ तो था उसमें- नानी के हाथ की कढ़ी, चूरमा, लड्डू, रबड़ी, ढोकला, लापसी आदि वो भी चित्रों के साथ.

“ये सब तूने कब किया बन्नो?” नानी जब बहुत ख़ुश होती थीं, तो लाड़ में टीना को इसी नाम से पुकारती थीं.

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“आप जब-जब मेरे लिए कुछ ख़ास बनातीं, तब मैं मोबाइल से उसकी तस्वीर उतार लेती और फिर आपसे पूछ-पूछकर रेसिपी भी लिख लेती. फिर हम सब दोस्तों ने अपनी क्राफ्ट टीचर की मदद से यह ख़ूबसूरत जिल्द कवर तैयार किया.”

“इस बहुमूल्य पांडुलिपी को पुस्तक रूप में प्रकाशित करवाने की ज़िम्मेदारी अब मेरी. और आप सभी को इसकी एक-एक प्रति सस्नेह भेंट की जाएगी.” अमित ने बेटी टीना को गले लगाते हुए मंच से यह घोषणा की, तो पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. सीमा ने भी भावुक होकर बेटी को सीने से लगा लिया, तो सामने के फ्लैट में रहनेवाली मिसेज़ कपूर आगे बढ़ आईं.

“अरे सीमाजी, आप तो इतने में ही भावुक हो गईं? अपनी बेटी के दूसरे बड़े कारनामे सुनेंगी, तो ख़ुशी से पागल ही हो उठेंगी.”

“वाक़ई टीना और उसके सब दोस्तों ने मिलकर बहुत ही सराहनीय क़दम उठाया है. सभी के घरों के बुज़ुर्ग शाम को एक जगह एकत्रित होकर मिल सकें, बतिया सकें, इसके लिए सभी ने अपनी पॉकेटमनी एकत्रित कर पार्क में दो बेंच और शेड लगवाया है.”

मि. कपूर ने मंच पर चढ़कर यह उद्घोषणा की, तो एक बार फिर करतल ध्वनि से माहौल गूंज उठा. सभी बुज़ुर्गों ने अपने-अपने नाती-पोतों को सीने से लगा लिया.

“मैं नाना-नानी को अक्सर बोर होते देखती थी. नानी तो फिर भी घर-गृहस्थी के कामों में लगी रहती थीं, पर नाना तो शाम को सात बजते ही टीवी खोलकर बैठ जाते और फिर देर रात तक चैनल उलटते-पलटते रहते. जिस दिन शाम बारिश हो जाती थी और उनकी सैर स्थगित हो जाती थीं उस दिन यह बोरियत और भी बढ़ जाती थी. मुझे लगा यदि पार्क में शेड और बेंच हो, तो सभी बुज़ुर्ग शाम की सैर के बाद दो घंटे आराम से वहां बैठकर गपशप कर सकते हैं. इससे उनका मन बहल जाएगा. अपने हमउम्र संगी-साथियों का साथ किसे नहीं लुभाता? मैंने पहले अपने दोस्तों से सलाह-मशविरा किया. फिर हम एक-एक के घर जाकर सब अभिभावकों से मिले…”

“एक मिनट टीना बेटी, अब मुझे बोलने दो.” सोसायटी के सचिव गुप्ता ने मोर्चा संभाल लिया.

“हम सभी अभिभावक बच्चों की बात से सहमत थे. सच तो यह है कि हम सभी चाहते हैं कि हमारे परिवार के बुज़ुर्ग सदस्य ख़ुश रहें, व्यस्त रहें, पर कैसे? इसका

समाधान खोजने के लिए न समय जुटा पा रहे थे और न ही आपसी संवाद कायम कर पा रहे थे. बच्चों ने इस दिशा में एक प्रेरक क़दम उठाना चाहा, तो सैकड़ों क़दम उनके साथ जुड़कर क़दमताल करने लगे. हमारे मना करने के बावजूद बच्चों ने अपनी पूरी पॉकेटमनी इस फंड में डाल दी. उसके अलावा हर परिवार से इतनी सहयोग राशि मिली है कि हम और दो-तीन बेंच और शेड पार्क में लगवा सकते हैं. लेकिन आज के शुभ दिन को ध्यान में रखते हुए जल्दी-जल्दी में दो बेंच और शेड ही लगवा पाए हैं. हम चाह रहे थे कि उनका भी अब उद्घाटन कर दिया जाए.”

“ज़रूर-ज़रूर! और यह शुभ कार्य हम सभी बुज़ुर्गजन अपने-अपने नाती-पोतों के साथ मिलकर संपन्न करना चाहेंगे.” नाना-नानी सहित सोसायटी के सभी बुज़ुर्गजन, बच्चे और उनके पीछे-पीछे उपस्थित जन समुदाय पार्क के उस हिस्से की ओर उत्साह से बढ़ गए.

मिस्टर एंड मिसेज़ खन्ना ने सोचा भी न था कि उनकी स्वर्णजयंती न केवल उनके, बल्कि सोसायटी के हर परिवार की ज़िंदगी में ख़ुशियों के इतने स्वर्णिम पल लेकर आएगी.

– अर्णिम माथुर

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कहानी- सच्चे मोती (Short Story- Sachche Moti)

 

सुमिता जानती थी कि अमित उन मर्दों में से है, जो पत्नी की गैरमौजूदगी में अपना और घर का ख़याल बख़ूबी रख सके. सो आख़िरकार हार मानकर उसी ने घर लौटने का निश्‍चय किया और वो अमित को बिना कोई पूर्व सूचना दिए वापस लौट आई. घर आकर सुमिता हैरान रह गई.

Kahani

शाम हो चली थी, घर के काम-धाम निपटाकर, रात के खाने की तैयारी करके सुमिता हाथ-मुंह धोने चली गई. इस व़क़्त तैयार होकर घर के आगे चहलक़दमी करना और अपने पति अमित की ऑफ़िस से आने की राह देखना, यही उसका रूटीन था. इसी समय अक्सर उसे सामने के घर में रहनेवाली पारुल मिल जाती थी. दोनों गपशप करतीं और अपने पतियों की राह तकतीं.

आज सुमिता का ध्यान पारुल के कपड़ों पर विशेष रूप से गया. वो तो कह रही थी कि उसे हल्के शेडवाले सूट ही पसंद आते हैं, तो फिर ये चटक ऑरेंज सूट. “क्या बताऊं सुमिता, पतिदेव ने फ़ोन पर निर्देश दिया है कि आज यही सूट पहनूं. मुझे क्या पहनना है, कैसे तैयार होना है, इन बातों का बड़ा ध्यान रहता है इन्हें.” कहते हुए पारुल की आंखों में सहज ही तैर आई शर्म की लाली जैसे कह रही थी, बहुत प्यार जो करते हैं मुझसे.

पारुल की यह बात सुमिता के दिल में कुछ हलचल-सी मचा गई. दो साल हो गए थे उसकी शादी को. उसका पति अमित बेहद अच्छा इंसान था. उसके और घर के प्रति अपनी तमाम ज़िम्मेदारियां बख़ूबी निभाता. लेकिन उनके बीच कहीं कुछ कमी-सी महसूस होती थी उसे. वो क्या थी, ये तो वह ख़ुद भी नहीं समझ पाई थी.

कई बार ऐसा हुआ जब ख़ास मौक़ों पर सुमिता सजती-संवरती और परिचितों से कॉम्प्लीमेंट पाती. मगर एक स्त्री को तो असली संतुष्टि तभी मिलती है, जब उसका पति उसकी सुंदरता की तारीफ़ करे. पर ऐसा कभी नहीं हुआ. अमित सुमिता को नज़रभर देखते, मुस्कुराते और सामान्य बने रहते. क्या हो जाता अगर इतना ही कह देते कि अच्छी लग रही हो, वो सोचती, लेकिन मन मसोसकर रह जाती.

अमित के साथ रहते हुए सुमिता इतना तो जान ही गई थी कि अमित एक अनरोमांटिक, उदासीन प्रकृति के व्यक्ति हैं, जो उससे प्रेम तो करते हैं, मगर उस प्रेम का प्रदर्शन उनके बस की बात नहीं. सुमिता के हसीन रोमांटिक कल्पनाओं के पंख टूटकर यथार्थ के धरातल पर बिखर चुके थे और उसने इस स्थिति से समझौता भी कर लिया था. लेकिन जब कभी वह अपनी सहेलियों के साथ बैठ उन्हें उनके पतियों द्वारा मिलनेवाले सरप्राइज़ ग़िफ़्ट, फूलों के गुलदस्ते और रोमांटिक बातों के क़िस्से सुनती, तो उसके दिल में एक टीस उभर आती.

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आज सुमिता को उसकी एक पुरानी सहेली रीमा का फ़ोन आया था. एक छोटे-से गेट-टुगेदर का न्यौता देने के लिए. न्यौता पाकर वो असमंजस में पड़ गई, “शाम को कैसे आऊं? अमित उसी समय ऑफ़िस से आते हैं, फिर उनकी चाय-डिनर…”

“कभी अपने पतिदेव को भी कुछ करने का मौक़ा दिया कर. क्या एक दिन वो ख़ुद मैनेज नहीं कर सकते?”

“वो तो ठीक है, मगर…”

“अगर-मगर कुछ नहीं. तेरे जैसी औरतों ने ही पतियों के दिमाग़ ख़राब किए हुए हैं, तभी वे हम बीवियों की वैल्यू नहीं समझते. ख़ुद ऑफ़िस से कितना भी लेट आएं, मगर बीवी ज़रा-सी इधर-उधर हुई नहीं कि त्यौरियां चढ़ जाती हैं. पतियों को कभी-कभी उनके कामों के साथ अकेला छोड़ देना चाहिए, तभी उन्हें हम बीवियों की क़द्र समझ में आएगी.”

“ओ़फ़्फ़ो… लेक्चर मत दे. अच्छा आऊंगी…” रीमा का अंतिम वाक्य सुमिता को जंच गया, उसने हामी भर ली और अमित को सूचित करने के लिए फ़ोन मिलाया.

“आज शाम को रीमा ने एक गेट-टुगेदर में बुलाया है, सोचती हूं चली जाऊं.”

“हां… हां… बिल्कुल, तुम चली जाना, जब आना हो मुझे फ़ोन कर देना, मैं तुम्हें पिकअप कर लूंगा.” अमित की सहर्ष स्वीकृति पा सुमिता को कुछ निराशा हुई, उसने सोचा था अमित ना-नुकर करेंगे और वो अपनी बात पर अड़ जाएगी. आख़िर

लड़कर जीती गई चीज़ का तो मज़ा ही कुछ और होता है, चाहे वो एक मामूली-सी स्वीकृति ही क्यों न हो. ख़ैर, वो बेमन से तैयार होकर चली गई.

गेट-टुगेदर में अपनी सभी पुरानी सहेलियों से मिलकर उसे बहुत अच्छा लगा. कितनों से तो वो सालों बाद मिल रही थी. गपशप हो रही थी, हंसी-ठट्ठे चल रहे थे. एक रीमा ही है, जो सभी पुरानी सहेलियों को किसी न किसी बहाने इकट्ठा कर लेती है. काश! मैं भी ऐसा गेट-टुगेदर कर पाती. मगर अमित को ये सब ज़रा भी पसंद नहीं. सुमिता सोच रही थी, तभी उसे ध्यान आया कि वहां उपस्थित नीलू का जन्मदिन अभी पिछले ह़़फ़्ते ही था. “बिलेटिड हैप्पी बर्थडे नीलू, कहो कैसी रही सालगिरह?” सुमिता ने बधाई देते हुए पूछा.

“बहुत अच्छी. इन्होंने रात को बारह बजते ही पहले एक रोज़ बुके दिया, फिर केक कटवाया. मुझसे चोरी-छुपे लाए थे. फ्रिज में ही कहीं छुपाया था और मुझे पता भी ना चला.” नीलू चहकते हुए बता रही थी, “फिर सुबह एक सुंदर-सी साड़ी ग़िफ़्ट की और हम दोनों सारा दिन घूमे-फिरे.”

नीलू अति उत्साहित थी, मगर उसका उत्साह सुमिता के मन में ईर्ष्या उत्पन्न कर रहा था. मेरे जन्मदिन पर तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. बस, अमित ने सुबह मुबारक़बाद दी. फिर दोनों मंदिर गए और फिर वो रोज़ की तरह ऑफ़िस और मैं घर में व्यस्त हो गई. तुलना करने पर सुमिता का दिल बुझ गया.

10 बजने को आए थे, चार घंटे हो गए थे सुमिता को घर से आए, मगर अमित का एक बार भी फ़ोन नहीं आया. वो बार-बार अपना मोबाइल चेक कर रही थी. डिनर का समय निकला जा रहा था. क्या अमित को अभी भी मेरी याद नहीं आई? सबके फ़ोन आ रहे हैं सिवाय मेरे. ज़्यादा देरी होती देख उसने ख़ुद ही अमित को आने के लिए कह दिया. वो 15 मिनट में ही उसे लेने आ पहुंचा और दोनों घर की ओर चल दिए.

“कैसी रही तुम्हारी पार्टी?” अमित ने औपचारिक लहज़े में पूछा.

“अच्छी रही… घर कब आए? तुमने फ़ोन भी नहीं किया.”

“मैं तुम्हारी सहेलियों के बीच तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था.”

“तुम्हें भूख लग रही होगी?”

“नहीं… मैंने ब्रेड-बटर खा लिया था.” अमित का नॉर्मल व्यवहार सुमिता को अखर रहा था. न ही उसके लौटने में देरी होने पर झल्लाहट, न ही डिनर न मिलने पर ग़ुस्सा… मेरी कमी ज़रा भी नहीं अखरी… सुमिता ख़ुद को उपेक्षित महसूस कर रही थी.

धीरे-धीरे अमित की उदासीनता सुमिता के लिए असहनीय होती जा रही थी. उसे अपने दांपत्य जीवन में शांत झील का ठहराव नहीं, बल्कि समुंदर की तेज़ तूफ़ानी लहरों का उफान चाहिए था. प्यार नहीं तो तक़रार ही सही… कुछ तो खट्टा-मीठा स्वाद हो जीवन का… देखती हूं कब तक ऐसे ही बने रहते हैं. मन में कुछ निश्‍चय कर सुमिता शांत झील में कंकड़ फेंक हलचल उत्पन्न करने की कोशिशें करने लगी.

“आज खाना बनाने का मूड नहीं है.”

“कोई बात नहीं, बाहर से मंगा लेंगे.”

“आज मैं ज़ल्दी सो जाऊंगी, तुम दूध ख़ुद गर्म करके पी लेना.”

“अच्छा.”

“शाम को मैं अपनी एक सहेली के यहां जाऊंगी, तुम बाहर से ही डिनर करके

घर आना.”

“ठीक है.”

सुमिता अपनी भरसक कोशिशों पर संक्षिप्त-सा उत्तर पा सिमटकर रह जाती. आज उसने दाल में जान-बूझकर तेज़ नमक डाल दिया था, मगर अमित चुपचाप खाता जा रहा था. उसे यूं चुपचाप खाता देख सुमिता से रहा नहीं गया, “दाल में नमक कुछ ज़्यादा नहीं है?”

“कोई बात नहीं, हो जाता है कभी-कभी, तुमने जान-बूझकर तो नहीं डाला न.”

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सुमिता स्वयं को रोक न सकी, “इंसान है या पत्थर…” बुदबुदाती हुई वो भीतर चली गई और उसकी रुलाई फूट पड़ी. अमित उसे ऐसे देख घबरा गया.

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं, मम्मी-पापा की बहुत याद आ रही है, मुझे उनसे मिलने जाना है.”

“ठीक है, कब जाना चाहती हो?”

“जितनी जल्दी हो सके, कल ही…”

“मैं कल की टिकट देखता हूं और वापसी की भी.”

“वापसी की टिकट मैं वहीं से करा लूंगी. तुम बस जाने की करा दो.”

अमित के लिए सुमिता का ये विचित्र व्यवहार एक पहेली था. शायद मम्मी-पापा की बहुत याद आ रही है, ऐसा अनुमान लगा उसने कुछ पूछताछ करना उचित नहीं समझा और उसकी इस बात से सुमिता और अधिक चिढ़ गई. एक बार भी नहीं पूछा कि क्या हुआ? क्यों जा रही हो? बस, मुझे समझ आ गया कि मैं कहीं आऊं या जाऊं, जीऊं या मरूं, इन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. तो ठीक है, मैं भी भला क्यों परवाह करूं? तब तक वापस नहीं आऊंगी, जब तक ख़ुद आकर सौ-सौ मिन्नतें नहीं करेंगे. रीमा सच ही कह रही थी. आगे-पीछे घूम-घूमकर, जी-हुज़ूरी कर मैंने ही इनकी आदत बिगाड़ दी है. मेरे पीछे अकेले रहकर दो दिन में ही मेरी अहमियत पता चल जाएगी… और मन में अनकहा गुबार समेटे वो मायके चली गई.

तीन सप्ताह बीत गए थे सुमिता को मायके आए. धीरे-धीरे उसे अपने घर-आंगन की याद सताने लगी, साथ ही मन ही मन एक ग्लानि भी घर करने लगी थी. अपने पति को और अपने घर को अनदेखा करने की ग्लानि… क्या खा-पहन रहे होंगे? कैसे रह रहे होंगे? फ़ोन करते हैं, हालचाल पूछते हैं, मगर कभी भूलकर भी यह नहीं कहते कि कब आ रही हो? तुम्हारे बिना घर सूना हो गया है, जल्दी वापस आ जाओ. क्या इतना कहने भर से पुरुष की नाक नीची हो जाती है? क्या उसका अहं स्त्री के सामने छोटा हो जाता है.

सुमिता जानती थी कि अमित उन मर्दों में से है, जो पत्नी की गैरमौजूदगी में अपना और घर का ख़याल बख़ूबी रख सके. सो आख़िरकार हार मानकर उसी ने घर लौटने का निश्‍चय किया और वो अमित को बिना कोई पूर्व सूचना दिए वापस लौट आई. घर आकर सुमिता हैरान रह गई.

अमित बेहद कमज़ोर और बीमार दिखाई दे रहा था. उसे वायरल इंफेक्शन ने जकड़ा हुआ था. अमित की ये हालत सुमिता से देखी नहीं गई. उसका दिल भर आया और वो रो पड़ी, “क्या हाल बना लिया है आपने? एक बार बता नहीं सकते थे कि इतनी तबीयत ख़राब है? क्या मैं लौट नहीं आती?”

“मुझे मालूम है कि बताता तो तुम भागी चली आती, इसीलिए तो नहीं बताया था…”

“मगर क्यों?”

“इतने महीनों बाद तुम कुछ दिनों के लिए अपने मायके मम्मी-पापा के पास ख़ुशी-ख़ुशी रहने गई थी. अपना हाल बताकर मैं तुम्हारी ख़ुशियों में खलल नहीं डालना चाहता था. आख़िर तुम उनकी बेटी हो, उनका भी तो हक़ बनता है तुम पर…”

“अच्छा, अब ज़्यादा बातें मत करो. क्या हालत कर दी है तुम्हारी इस बुखार ने?” अमित को यूं बेहाल देख पत्थर बनी सुमिता मोम की तरह पिघल उठी.

“हालत ख़राब बुखार ने नहीं, बल्कि तुम्हारी जुदाई ने की है सुमि. अब तुम आ गई हो, तो मैं जल्द ही अच्छा हो जाऊंगा.” कहते हुए अमित ने सुमिता को बांहों में भर लिया. उसकी नम हुई आंखों से छलक आए दो आंसुओं को सुमिता ने अपनी हथेली में थाम लिया. कुछ और कहने-सुनने की लालसा शेष न रह गई थी मन में. सारी इच्छाएं, सारी अपेक्षाएं न जाने कहां हवा हो गई थीं. उसकी मुट्ठी में बंधे ये दो सच्चे मोती ही अमित के प्रेम की सर्वोच्च प्रस्तुति थे, जो उसके सात जन्मों के लिए काफ़ी थे.

Deepti Mittal

दीप्ति मित्तल

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कहानी- फॉल्स पैराडाइज़ (Short Story- False Paradise)

“वैभव, तुम इतने बड़े ओहदे पर हो, इस तरह का हंसी-मज़ाक क्या तुम्हें सूट करता है? डीसेंट रहना चाहिए तुम्हें. क्या बच्चों की तरह संडे को कैरमबोर्ड खेलने बैठ जाते हो. खेलना ही है, तो चेस खेलो या फिर ताश.”

“यह घर है पायल. यहां अगर खुलकर नहीं रहूंगा, तो अपनेपन की फीलिंग कैसे आएगी? मैं तो कहता हूं कि तुम भी हमारे साथ खेला करो. कान में ईयरफोन लगाकर म्यूज़िक सुनने से कहीं ज़्यादा रिलैक्सेशन मिलता है अपनों के साथ छोटी-छोटी ख़ुशियां बांटने में.”

Kahani

हर ओर गहमा-गहमी थी… उस गहमा-गहमी का असर पड़ोस तक भी पहुंच गया था. शोर इतना ज़्यादा था कि दो बार बोलने पर ही, वह भी चिल्लाकर, बात कानों तक पहुंचती थी, लेकिन ये आवाज़ें, यह कोलाहल, हर तरफ़ फैला यह अस्त-व्यस्त माहौल खल नहीं रहा था. सब आनंदमग्न थे. घर पर आनेवालों की संख्या भी लगातार बढ़ती ही जा रही थी.

शांतिदेवी तो चक्करघिन्नी-सी हर ओर घूम रही थीं. हर एक चीज़ कितने चाव से ख़रीदकर लाई हैं. आख़िर उनके इकलौते बेटे का ब्याह जो है आज. उसका घर बस जाए, बस यही तो उनकी चाहत थी. इसीलिए जब वैभव ने मां से कहा कि वह पायल से शादी करना चाहता है, तो बेटे के निर्णय पर आपत्ति जताए बगैर तुरंत उन्होंने सहमति दे दी थी. उनके पति को हालांकि थोड़ी आपत्ति थी कि पायल कुछ ज़्यादा ही हाई-फाई क़िस्म की लगती है, पर तब शांतिदेवी ने यह कहकर उन्हें तैयार कर लिया था कि उसे हमारे घर आना है, अपने रंग-ढंग में उसे ढाल लेंगे. प्यार मिलेगा, तो वह ख़ुद ही हमारे तौर-तरी़के अपना लेगी.

वैभव को भी पूरा यक़ीन था कि उसकी मां, जो किसी को भी अपना बनाने की क्षमता रखती  हैं, उनके लिए पायल को सहज मन से अपना लेना कठिन नहीं होगा. “वैसे भी सास-बहू के बीच झगड़ा न हो, तो घर में रौनक़ नहीं रहती,” वह अक्सर हंसकर मां को कहता. शांतिदेवी ख़ुद एक प्रोफेसर थीं और वैभव के पिता एक बड़ी कंपनी के डायरेक्टर. बड़ी बहन का विवाह हो चुका था, जो स्वयं डॉक्टर थी और वैभव तो मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर था. एक तरह से वैभव की फैमिली को न्युक्लीयर फैमिली कहा जा सकता था, पर कोठी के ऊपर के एक-एक फ्लोर पर उसके बड़े व छोटे चाचा रहते थे और दो कोठी छोड़ उसकी बुआ रहती थीं. आपसी जुड़ाव इतना था कि संयुक्त परिवार ही लगता था वह, इसीलिए तो उत्सवों पर उनके घरों में मेला-सा लग जाता था.

इतनी एजुकेटेड फैमिली की बहू बनना किसी भी लड़की का सपना हो सकता है और पायल तो चाहती ही थी ऐसा ही परिवार, क्योंकि वह ख़ुद एक बड़ी कंपनी में सीईओ थी. कार, मोटा वेतन और समाज में रिस्पेक्ट… सब कुछ था उसके पास.

“वैभव, मुझे तुम्हारी फैमिली बहुत अच्छी लगती है, एकदम मॉडर्न विचार हैं तुम्हारे मम्मी-पापा के. मुझे नहीं लगता कि उनके साथ एडजस्ट करने में कोई प्रॉब्लम आएगी. तुम तो जानते ही हो कि मुझे दख़लअंदाज़ी पसंद नहीं है.” अक्सर पायल वैभव से कहती, तो वह हंस पड़ता. “डोंट वरी पायल, जब तुम मेरे साथ-साथ मेरे मम्मी-पापा को अपना लोगी, तो दिक़्क़त नहीं आएगी.”

शादी के दौरान वैभव और पायल की ख़ुशी देखते ही बनती थी. पायल अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी और पिता का चूंकि बहुत बड़ा बिज़नेस था, तो पैसों की कभी कोई कमी नहीं रही. फाइव स्टार होटल में उन्होंने शादी की. वैभव के सारे रिश्तेदारों को महंगे गिफ्ट्स दिए और पायल को एक से बढ़कर एक चीज़ उन्होंने दी.

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वैभव ने पायल से शादी उसके पैसों के कारण नहीं, उसकी योग्यता की वजह से की थी, इसलिए वह दहेज के ख़िलाफ़ था. शांतिदेवी को भी पायल के घरवालों का दिखावा खटका था, पर उन्होंने इस बात को यह सोचकर नज़रअंदाज़ कर दिया था कि पायल इकलौती संतान है, तो उसके माता-पिता के भी अरमान होंगे.

शादी के बाद बहुत धूमधाम से पायल का स्वागत किया गया. बहन ने द्वार रोकने का नेग भी लिया और रिश्ते की भाभियों ने देवर से छेड़छाड़ भी की. सारी रस्में भी हुईं और फिर सुबह चार बजे वैभव और पायल को अपने कमरे में जाने का मौक़ा मिला.

“उफ़्, मैंने नहीं सोचा था कि एक प्रोफेसर होने के बावजूद तुम्हारी मां इतने पुराने विचारों की होंगी. आजकल कौन इतनी रस्में करता है. वैभव, ताज्जुब हो रहा था कि तुम भी उन सब रस्मों को एंजॉय कर रहे थे. कितनी थक गई हूं मैं. पूरी रात बर्बाद हो गई. कितनी भीड़ है तुम्हारे घर में. इतने रिश्तेदार, बाप रे, मैं यह सब बर्दाश्त नहीं कर सकती. हर किसी के पांव छुओ… तुम्हारा परिवार अभी भी इन परंपराओं में जकड़ा हुआ है.

एक हमारा परिवार है, छोटी फैमिली. मम्मी-पापा इन सब चक्करों में नहीं पड़ते. देखा था न शादी में स़िर्फ बिज़नेस के लोग ही थे. परिवार के लोग कम ही थे. अब मुझे सोने दो.”  पायल ने नाइटी पहनते हुए कहा और गुडनाइट कह एक ओर करवट लेकर सो गई. वैभव उसकी बात सुन परेशान हो उठा. फिर उसने सोचा कि वह थक गई है, इसलिए ऐसा रिएक्ट कर रही है.

अगले दिन रात की फ्लाइट से वे सिंगापुर के लिए निकल गए. हफ़्ते बाद जब वे लौटे, तो पायल की ख़ुशी देखते ही बनती थी. वैभव के मम्मी-पापा और बहन के लिए वह गिफ्ट लाई थी. “बेटा, अगली बार अगर गिफ्ट लाओ, तो दोनों चाचा के परिवारों के लिए भी लाना.” शांतिदेवी ने टोका, तो पायल हैरानी से बोली, “पर मम्मी, दे आर नॉट आवर फैमिली.”

“पायल, बेशक हम लोग अलग-अलग फ्लोर पर रहते हैं, पर हैं एक ही परिवार. इसलिए अगली बार ध्यान रखना.” ऐसी कोई न कोई घटना रोज़ ही हो जाती. पायल ने तो यह सोचकर वैभव से शादी की थी कि उसके घर में एक खुला वातावरण होगा, वह अपने तरी़के से जी सकेगी. हालांकि उसके आने-जाने या मनचाहे कपड़े पहनने पर किसी ने रोक नहीं लगाई थी, न ही रात की पार्टियां  अटेंड करने पर किसी को आपत्ति थी, फिर भी उसे लगता था कि वह आज़ादी से सांस भी नहीं ले पा रही है. वह घर आती, तो कभी कोई चाची बैठी होती, कभी कोई ननद या देवर. वैभव को उनसे हंसी-मज़ाक करते देख वह चिढ़ जाती.

“वैभव, तुम इतने बड़े ओहदे पर हो, इस तरह का हंसी-मज़ाक क्या तुम्हें सूट करता है? डीसेंट रहना चाहिए तुम्हें. क्या बच्चों की तरह संडे को कैरमबोर्ड खेलने बैठ जाते हो. खेलना ही है, तो चेस खेलो या फिर ताश.”

“यह घर है पायल. यहां अगर खुलकर नहीं रहूंगा, तो अपनेपन की फीलिंग कैसे आएगी? मैं तो कहता हूं कि तुम भी हमारे साथ खेला करो. कान में ईयरफोन लगाकर म्यूज़िक सुनने से कहीं ज़्यादा रिलैक्सेशन मिलता है अपनों के साथ छोटी-छोटी ख़ुशियां बांटने में.”

“वैभव, बिहेव लाइक ऐन एजुकेटेड पर्सन. मैं देख रही हूं कि तुम्हारी फैमिली में सभी ऐसे हैं. बड़े चाचा आईएएस अफ़सर हैं, पर व्यवहार एक लोअर मिडिल क्लास की तरह करते हैं. और तो और, तुम्हारी छोटी चाची इंटीरियर डिज़ाइनर हैं, पर घर में ख़ुद कितनी सादगी से रहती हैं. क्लास नाम की भी कोई चीज़ होती है, वी नीड टू मेंटेन इट. इलीट क्लास के लोग कम बोलते हैं, सोफिस्टीकेटेड ढंग से रहते हैं, लाइक माई पैरेंट्स.”

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“हां, जो मुस्कुराते भी नाप-तौल के हैं. मुझे समझ नहीं आता कि तुम हर बार एजुकेटेड लोगों का ताना क्यों देने लगती हो? हम अगर शिक्षित हैं, तो क्या अपने संस्कारों को न मानें, संबंधों की कद्र न करें और सहजता से न जीएं, ऐसा किस क़िताब में लिखा है?”

धीरे-धीरे पायल और वैभव की बहस उनके संबंधों में कड़वाहट लाने लगी थी. पायल की महत्वाकांक्षा और ख़ुद को सबसे परफेक्ट और स्मार्ट मानने का सुपीरियॉरिटी कॉम्प्लैक्स उसे वैभव के साथ-साथ सबसे दूर कर रहा था. पूरा परिवार जब एक साथ बैठा होता, तो वह अपने कमरे में बैठी लैपटॉप पर काम कर रही होती. रिश्तों की सोंधी सुगंध को नकारती वह एक ऐसे फॉल्स पैराडाइज़ में जी रही थी, जिसमें ऊपरी चमक-दमक और अपने को बेहतर साबित करने की होड़-सी लगी रहती है, जिसमें बच्चों से भी एक दूरी बनाकर रखना तहज़ीब माना जाता है. पायल ने भी शायद कभी नज़दीक़ से अपने पैरेंट्स के प्यार को महसूस नहीं किया था, इसलिए वह समझ नहीं पा रही थी कि रिश्तों की महक ज़िंदगी को सुवासित करने की कितनी क्षमता रखती है.

शांतिदेवी पायल के साथ एडजस्ट करने की कोशिश करतीं, पर पायल बदलने को तैयार ही नहीं थी. एक-दो बार उन्होंने वैभव से बातों-बातों में कहा भी कि अगर वह चाहे, तो अलग रह सकता है, पर वैभव के लिए ऐसा सोचना भी असंभव था. उसे मां की गोद में सिर रखकर लेटना अभी भी अच्छा लगता था, उसे पापा के साथ सैर करने में मज़ा आता था और बहन की चुटिया खींचने में वह शर्म महसूस नहीं करता था. पायल ये सब देख चिढ़ जाती.

“तुम लोग पढ़े-लिखे गंवार हो.” वह कहती तो वैभव खून का घूंट पीकर रह जाता. वह अजीब-सी मनोस्थिति से जूझ रहा था. उनकी शादी हुए छह महीने बीत चुके थे, लेकिन पायल अभी भी एडजस्ट नहीं हुई थी. सच तो यह था कि वह एडजस्ट होना चाहती ही नहीं थी, इसलिए वैभव पर ज़ोर डालती रहती कि उन्हें अपने फ्लैट में जाकर रहना चाहिए, जो उसके पापा ने उसके नाम से ख़रीदा था.

“तुम्हें यहां क्या दिक़्क़त है? तुम देर रात घर लौटती हो, टाइट जींस पहनती हो और स़िर्फ अपने करियर के बारे में सोचती हो. कभी सोचा है कि तुमने आज तक किचन में पैर तक नहीं रखा है. मम्मी ने कभी तुम्हें इस बात का ताना दिया क्या? तुम अपने मन की करती हो, दूसरों की भावनाओं के बारे में कभी सोचती तक नहीं हो. फिर क्यों अलग होना चाहती हो? आख़िर किस चीज़ की कमी है तुम्हें यहां?” एक दिन वैभव का आक्रोश फट गया था.

“मैं किचन में क्यों जाऊं? असल में क़ामयाब हो जाने के बावजूद तुम लोगों की सोच मिडिल क्लास ही है, आगे बढ़ने के बारे में सोचना ही नहीं चाहते.” उस दिन पायल ने सारी मर्यादाएं पार कर दी थीं और सूटकेस लेकर मायके चली गई थी. वैभव ने जब फोन किया था, तब पायल ने यही कहा था कि जिस दिन अलग होने की सोचो, तभी मैं वापस आऊंगी, वह भी अपने फ्लैट में.

पायल को गए एक महीना बीत गया था. वैभव की चुप्पी के साथ घर में भी सन्नाटा पसरा रहता. एक दिन शाम के समय पायल का फोन आया. वह रो रही थी. “वैभव, पापा के बिज़नेस में भारी नुक़सान हो गया है. बैंक से जो लोन लिया था, वह चुका नहीं सके, तो बैंक हमारे घर पर कब्ज़ा कर रहा है. हमारी मदद करने के लिए कोई नहीं है. कोई भी रिश्तेदार और मित्र मदद नहीं कर रहे. आएगा भी क्यों, पापा ने उनसे कभी संबंध बनाकर ही नहीं रखे थे. प्लीज़ हेल्प मी, मेरी कंपनी भी ज़्यादा लोन नहीं दे रही है. जो मेरी सेविंग्स हैं, वह काफ़ी नहीं हैं. हमारा सब कुछ बिक चुका है.”

पायल के घर पहुंचने में वैभव के सारे परिवार ने एक पल की भी देर नहीं की. किसी ने एक बार भी उसके कटु व्यवहार का उलाहना नहीं दिया. वैभव ने मां को देखा, तो वह बोलीं, “बेटा है तो वह अपनी ही न. भूल जा पिछली बातें. अभी उसे हमारी आवश्यकता है.” बड़े चाचा ने अपने रसूख़ से मकान पर कब्ज़ा होने से रोका और सबने मिलकर कर्ज़ की थोड़ी रक़म की अदायगी कर उसे चुकाने की मोहलत भी बढ़वा ली.

पायल की आंखों से निरंतर आंसू बह रहे थे. हालांकि अभी भी वह शब्दों से माफ़ी मांगने में हिचक रही थी, पर उसके झर-झर बहते आंसू कह रहे थे कि वह अपने फॉल्स पैराडाइज़ से बाहर निकल आई है. शांतिदेवी के गले से लगते ही उसे महसूस हुआ कि रिश्तों की सोंधी महक कैसी होती है. पहली बार उसे महसूस हुआ था कि ममता का आंचल कितना सुकूनदायक और सुरक्षित होता है.

suman bajapaye

सुमन बाजपेयी

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कहानी- संस्कारी (Hindi Short Story- Sanskari)

“आरतीजी, आप बुरा न मानें. आपने रिया को कुछ ज़्यादा ही आज़ादी दे रखी है. लड़की है… कल को शादी होगी. क्या इस तरह पूरे दिन ससुराल में मैच देखती रहेगी और हर चौके-छक्के पर उसकी सास उसे चाय-पकौड़े खिलाती रहेगी.”

short stories

“यह क्या ममा, आज फिर आपने लंच बॉक्स में आलू का परांठा रख दिया?” रिया ने अंदर आते ही बैग सोफे पर पटक दिया और भुनभुनाते हुए अपने कमरे में चली गई.

“सॉरी बेटा.” कहते हुए आरतीजी भी उसके पीछे चली गईं. यह देखकर ड्रॉइंगरूम में बैठी दोनों पड़ोसन मीनाक्षी और सुजाता आपस में बोल पड़ीं.

“बड़ी अजीब है आरती की बेटी. यह भी नहीं देखा कि कोई बैठा है, कम से कम उनका तो लिहाज़ कर लेती.”

“ऐसी ज़िद्दी और नकचढ़ी लड़कियां ही ससुराल में एडजस्ट नहीं कर पातीं. यहां तो आरती इसके नखरे सह रही है, सास थोड़े ही सहेगी.”

तभी आरतीजी आ गई, तो वे दोनों चुप हो गईं. वे चलने लगीं, तो आरतीजी बोली, “प्लीज़, आप लोग थोड़ी देर और बैठिए न. मैं गैस पर चाय का पानी चढ़ाकर आई हूं. बस, रिया कपड़े बदल ले, फिर उसकी पसंद की अदरकवाली चाय और प्याज़ के गरम-गरम पकौड़े बनाऊंगी. उसका मूड भी ठीक हो जाएगा और हम सब एक साथ चाय और पकौड़ों का आनंद भी उठा लेगें.”

“नहीं नहीं… आरतीजी हम तो चलते हैं. आप रिया का मूड ठीक करो. हम फिर कभी चाय पीने आ जाएंगे.” थोड़े व्यंग्यात्मक स्वर में कहते हुए वे दोनों वहां से निकल पड़ीं.

आरतीजी, रिया के साथ अभी महीनाभर पहले ही इस कॉलोनी में शिफ्ट हुई हैं. दोनों अकेले रहती थीं. आसपास किसी से मेलजोल भी नहीं कर पाती थीं. रिया सुबह नौ बजे ऑफिस निकल जाती थी. उसके बाद आरतीजी घर का काम निबटाकर अपना लेखन कार्य करती थीं. वह लेखिका थीं. उन्हें पढ़ने का भी शौक था.

पास-पड़ोस की महिलाओं ने सोचा कि यह नई पड़ोसन कामवालीबाई के बारे में पूछने के लिए तो आएगी ही, लेकिन आरतीजी को बाई की ज़रूरत ही नहीं थी. एक तो उनका फ्लैट छोटा था. फिर दो लोगों के बीच ज़्यादा काम भी नहीं था. दोनों मिल-जुलकर काम निबटा लेती थीं. 15 दिन बीत गए, तो उन महिलाओं के सब्र का बांध टूट ही गया. सो मीनाक्षी, सुजाता और नीलिमा पहुंच ही गईं उनके यहां उनके निजी जीवन की जानकारी लेने और मेलमिलाप बढ़ाने. नाम आदि पूछने की औपचारिकता पूर्ण हो चुकी थी. उनके बीच थोड़ा-बहुत आना-जाना भी शुरू हो गया था, लेकिन आरतीजी किसी के यहां नहीं जा पाती थीं, क्योंकि उनके पास एक तो व़क्त नहीं था. दूसरे सास-बहू, जेठानी-देवरानी की बुराई-भलाई करने में उन्हें बिल्कुल भी रुचि नहीं थी और उन महिलाओं की बातचीत का मुख्य विषय यही होता था.

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रिया देखने में बहुत ख़ूबसूरत और आकर्षक थी. जब वह तैयार होकर ऑफिस के लिए निकलती, तो सभी उसे घूर-घूरकर देखतीं. सबकी नज़र में रिया ज़िद्दी, नकचढ़ी और संस्कारहीन लड़की थी, इसलिए वे सब अक्सर आरतीजी से कहतीं, “आरतीजी, प्लीज़ बुरा मत मानिएगा, रिया को अच्छे संस्कार दीजिए. कुछ मैनर्स सिखाइए. आप तो इसकी हर बात मानती हैं. सिर पर चढ़ा रखा है आपने. कल को दूसरे घर जाएगी, तो सास थोड़े-ही इसके नखरे उठाएगी. सारा दोष आप पर ही आएगा कि आपने इसे अच्छे संस्कार नहीं दिए हैं.”

आरतीजी मुस्कुराकर कहतीं, “नहीं नहीं… ऐसा नहीं है. बहुत संस्कारी है मेरी रिया. सुबह ऑफिस जाती है. शाम को थकी-हारी लौटती है, तो मैं उसे गरमागरम चाय बनाकर देती हूं. चाय पीते ही उसकी थकान उड़न छू हो जाती है और गुलाब-सी खिल जाती है वह. एक चाय के बदले वह मुझ पर ढेर सारा प्यार लुटाती है. यह क्या कम है. फिर हम दोनों मिलकर अपना मनपसंद खाना बनाते हैं, साथ में खाते हैं. वह अपने ऑफिस की सारी बातें शेयर करती है. मैं भी अपनी रचनाओं के बारे में उससे डिसकस करती हूं. कभी-कभी वह मुझे लिखने के लिए नई और रोचक जानकारियां देती है.”

यह बात सुनकर वे सब महिलाएं बोर होने लगीं. आरतीजी की बात बीच में काटकर सुजाता बोल पड़ी, “और रिया के पापा?”

“वह एक साल के लिए कंपनी के काम से अमेरिका गए हैं.”

इधर मीनाक्षी के बेटे अंश का दिल ख़ूबसूरत रिया पर आ गया. उसे अपने लिए रिया जैसी स्मार्ट और जॉबवाली लड़की चाहिए थी. वह स्वयं भी आकर्षक होने के साथ-साथ एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत था. उसने रिया का ज़िक्र अपनी मां मीनाक्षी से किया था. मीनाक्षी को रिया पसंद तो थी, लेकिन उसकी आदतें पसंद नहीं थीं. उसे नौकरीवाली ख़ूबसूरत बहू तो चाहिए थी, लेकिन घर के कामकाज करने के साथ-साथ सास की ग़ुलामी करनेवाली बहू की भी तलाश थी और रिया उनके इन मापदंडों पर खरी नहीं उतर रही थी.

वह नहीं चाहती थी कि रिया उसकी बहू बने, लेकिन अंश ने ज़िद पकड़ ली थी. आख़िर एक दिन बेटे की ज़िद और उसके दबाव में आकर वह इस बारे में बात करने अपनी सहेलियों के साथ आरतीजी के घर पहुंच ही गई.

“आरतीजी क्षमा चाहती हूं, आज रविवार के दिन अचानक आना हुआ. आप बहुत व्यस्त होंगी और रिया भी घर पर होगी?”

“नहीं नहीं… आज हम बिल्कुल फ्री हैं. मौज-मस्ती के मूड में हैं, क्योंकि रिया आज अपना फेवरेट क्रिकेट मैच देख रही है. एक बॉल तक नहीं छोड़ती है. मैच देखने की बेहद शौकीन है. जिस दिन मैच होता है, उस दिन तो वह ऑफिस से छुट्टी तक ले लेती है.” तभी अंदर से रिया की ताली बजाते हुए ख़ुशी से भरपूर आवाज़ आई, “कोहली का छक्का! इसी बात पर ममा प्लीज़ एक कप अदरकवाली चाय हो जाए.”

“ओके बेटा. अभी बनाती हूं. अगर दूसरी साइड से धोनी भी छक्का लगा दे, तो फिर साथ में प्याज़ के पकौड़े भी बना दूंगी.” आरतीजी ने हंसते हुए ज़ोर से कहा, तो मीनाक्षी से न रहा गया.

“आरतीजी, आप बुरा न मानें. आपने रिया को कुछ ज़्यादा ही आज़ादी दे रखी है. लड़की है, कल को शादी होगी, क्या इस तरह पूरे दिन ससुराल में मैच देखती रहेगी और हर चौके-छक्के पर उसकी सास चाय-पकौड़े खिलाती रहेगी.”

“मीनाक्षीजी, रिश्तों में आज़ादी और बंधन कहां से आ गए? अगर मैं रिया की भावनाओं का ख़्याल रखती हूं, तो वह भी मेरे ज़ज़्बात का पूरा सम्मान करती है. मेरी परवाह करती है, मेरे स्वास्थ्य की, मेरे मन, इच्छाओं और शौक की… मैं कभी-कभी पढ़ते-लिखते व़क्त इतना खो जाती हूं कि वह चाय वगैरह मेरे पास मेरे बिना मांगे ही रख जाती है. हमेशा मुझे लिखने के लिए उत्साहित करती रहती है. ऑफिस से छुट्टी लेकर मुझे विश्‍व पुस्तक मेले में ले जाती है. घरेलू कामकाज में भी बराबर मेरी मदद करती है.”

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“यह तो उसका कर्त्तव्य है.” मीनाक्षी तपाक से बोली.

“अगर यह उसका कर्त्तव्य है, तो उसको यह हक़ नहीं है कि वह मुझसे साधिकार चाय मांग सके… मुझसे ग़ुस्सा कर सके… मुझसे रूठे…”

“आरतीजी, देखो आप जो कह रही हैं ना वह सब ठीक है, लेकिन ये चोंचले और नखरे स़िर्फ मां ही उठाती है, सास नहीं.” मीनाक्षी हाथ नचाते हुए व्यंग्यात्मक स्वर

में बोली.

“अरे, उस दिन कैसे आप पर ग़ुस्सा कर रही थी कि आज फिर आलू का परांठा

रख दिया.”

“तो क्या हो गया? ग़लती मेरी ही थी ना. मैंने एक दिन पहले भी आलू का परांठा रख दिया था और याद नहीं रहा. दूसरे दिन भी रख दिया. मीनाक्षीजी, सच तो यह है जब बच्चियां ग़ुस्सा होती हैं, तो बहुत क्यूट लगती हैं. ढेर सारा प्यार आता है उन पर. जब रिया ग़ुस्सा होती है, तो मैं उसे छेड़ती हूं, ‘रिया, तुम तो ग़ुस्से में पहले से और भी ज़्यादा ख़ूबसूरत लग रही हो’ यह सुनकर वह हंस देती है और लाड़ से गले लगकर कहती है कि थैंक्स ममा, लव यू सो मच. सच, उस समय ऐसा लगता है जैसे ममता के मामले में मुझसे धनी और कोई नहीं है.”

“फिर भी, आज तो आप पूरा दिन बंध ही गईं न? न कुछ लिख पाएंगी और न कुछ पढ़ पाएंगी.”

“अरे, ऐसा कुछ नहीं है. आज सुबह जल्दी ही हम दोनों ने मिलकर सारे ज़रूरी काम कर लिए हैं. ब्रेकफास्ट भी कर लिया है. दोपहर में स़िर्फ खिचड़ी खाएंगे और रात को डिनर के लिए बाहर जाएंगे. आज का दिन पहले ही प्लान कर रखा है.”

“चलो, फिर हम तो चले. आप तो अब खिचड़ी बनाएंगी.” नीलिमा थो़ड़ा मुस्कुराकर, लेकिन व्यंग्यात्मक स्वर में बोली.

“अरे, उसमें कितना व़क्त लगेगा? दाल-चावल बिन रखे हैं. बस, धोकर कुकर में चढ़ानी है खिचड़ी.”

लेकिन वह तीनों रुकी नहीं. रिया मैच का आनंद ले रही थी, तो आरतीजी पत्रिका लेकर पढ़ने बैठ गईं और एक ब्रेक में रिया ने खिचड़ी भी बनने के लिए रख दी.

मीनाक्षी ग़ुस्से में तमतमा रही थी. “ऐसी नकचढ़ी और ज़िद्दी लड़की को मैं अपने घर की बहू हरगिज़ नहीं बना सकती, जो बिस्तर से ही चाय ऑर्डर करे. मैं आज ही अंश को साफ़-साफ़ बोल दूंगी. अगर तुझे इस लड़की से शादी करनी है, तो पहले मुझसे रिश्ता तोड़ना होगा.”

“बिल्कुल सही कह रही है तू.” सुजाता ने चिंगारी लगाते हुए कहा, “ऐसी लड़की को बहू बनाना ख़ुद अपनी ज़िंदगी में आग लगाना है.”

“तू बच गई मीनाक्षी, क्योंकि रिया के व्यवहार और तेवर के तूने पहले ही साक्षात् दर्शन कर लिए.” नीलिमा ने भी फुलझड़ी छोड़ दी.

“आरतीजी अपनी बेटी की इतनी तारीफ़ करती हैं उसे सिर-आंखों पर बिठाने के साथ-साथ उसके नाज़-नखरे सहती हैं. क्या अपनी बहू को ऐसे रख पाएंगी?”

“कभी नहीं.” कहते हुए सुजाता ने बुरा-सा मुंह बनाया.

“अरे, ये सब छोड़ो. मुझे यह बताओ कि अंश के ऊपर से रिया का भूत कैसे उतारा जाए? वह तो पूरी तरह से रिया पर लट्टू हो गया है.” मीनाक्षी चिंतित स्वर में बोली.

“अंश तो गया तेरे हाथ से मीनाक्षी, अब तू रिया की चाकरी के लिए तैयार हो जा.” नीलिमा ने चुटकी ली.

“चाकरी! वह भी बहू की? माई फुट.” मीनाक्षी पैर पटकते हुए बोली.

अंश के सिर से रिया का भूत उतारने के लिए वे तीनों योजनाएं बनाने लगीं.

अगले दिन वैलेंटाइन डे था. उसका विरोध करने उन्हें जाना था. वे सब खाली थीं. सो एक संस्था बना रखी थी. वैलेंटाइन डे वाले दिन वे दोपहर को निकल पड़ीं. सबसे पहले वे एक रेस्टॉरेंट में घुस गईं. वहां का एक दृश्य देखकर तो वे सभी हक्की-बक्की रह गईं, लेकिन मीनाक्षी की आंखों में एक विजयी चमक उभर आई. सामने की टेबल पर एक हैंडसम युवक और रिया दीन-दुनिया से बेख़बर आलिंगनबद्ध थे.

मीनाक्षी व्यंग्य से बोली, “यह देखो, आरती की संस्कारी लड़की रिया! कितनी बेशर्मी से लड़के के गले लगकर खड़ी है. मेरे लिए तो बहुत बढ़िया है यह प्रणय दृश्य. अभी फोटो खींचकर अंश को भेजती हूं, ताकि उसके सिर से रिया का भूत उतर जाए और शाम को आरती के घर जाकर उनकी संस्कारी बेटी के सुंदर संस्कारों के दर्शन करवाऊंगी.” कहते हुए मीनाक्षी ने मोबाइल से धड़ाधड़ कई फोटो खींच लिए और वहां से निकल गई दूसरी जगह अपने मिशन के लिए. इस बीच उसने वे सारे फोटो अंश को फॉरवर्ड कर दिए और शाम को पहुंच गई आरतीजी के घर. संस्कारी रिया की छवि दिखाने और उसके क़िस्से सुनाने.

“आरतीजी, रिया नहीं दिखाई दे रही है? कहां है वह? आज तो रविवार है और ऑफिस भी बंद है.”

“मीनाक्षीजी, मै ख़ुद भी परेशान हूं रिया को लेकर. वह अचानक ही घर से निकल गई थी यह कहते हुए कि ममा मैं अभी आती हूं, अब तो बहुत देर हो गई है उसे. उसका मोबाइल भी स्विच ऑफ है.” आरतीजी चिंतित स्वर में बोलीं. वे सब मन ही मन आरतीजी की हालत देखकर ख़ुश हो रही थीं. तभी अचानक दरवाज़ा खुला, जो बंद नहीं था.

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सामने रिया और वह रेस्टॉरेंटवाला युवक साथ थे. रिया दौड़ती हुई आई और आरती के गले लगकर उलाहना, मगर प्यारभरे स्वर में बोली, “ममा आपका बेटा बहुत नॉटी है. पता है, आज इसने जो काम किया है, मेरी तो जान ही निकल गई थी. किसी दूसरे नंबर से मुझे व्हाट्सऐप मैसेज किया- तुम्हारा पति ‘लवबर्ड्स’ रेस्टॉरेंट में किसी लड़की के साथ वैलेंटाइन डे मना रहा है. विश्‍वास न हो, तो वहां जाकर देखो. मेरे तो होश ही उड़ गए और उल्टे पांव दौड़ पड़ी रेस्टॉरेंट. वहां जाकर देखा, तो ये महाशय ख़ूब ज़ोर से हंस रहे थे मेरी हालत देखकर.”

“लेकिन रोमी तू तो 16 को आ रहा था. आज कैसे?” आरती ने आश्‍चर्य से पूछा.

“मम्मी, मुझे आना तो 14 तारीख़ को ही था, लेकिन इस वैलेंटाइन डे पर आपकी बहू को सरप्राइज़ देने के लिए मैंने झूठ बोला था कि मुझे 16 को आना है.” रोमी शरारत से मुस्कुराया.

“यू चीटर! मेरी तो जान ही निकल गई थी. तुझे छोड़ूंगी नहीं.” कहते हुए रिया उसकी छाती पर हौले-हौले प्यारभरे मुक्के बरसाने लगी.

फिर आरतीजी से बोली, “प्लीज़ ममा, आप जल्दी से तैयार हो जाइए. पहले ढेर सारी शॉपिंग, मूवी, फिर डिनर और हां प्लीज़ अपने बर्थडे पर मेरी दी हुई जींस और टॉप ही पहनिएगा. उसमें आप एकदम ब्यूटीफुल नज़र आती हैं और फिर पापा से आपकी वीडियो कॉल भी तो होनी है.” शरारती अंदाज़ में रिया बोली.

“नहीं नहीं… आज नहीं… फिर कभी चलूंगी. आज के दिन कबाब में हड्डी नहीं बनना है मुझे.” आरती ने इंकार कर दिया.

“तो ठीक है हम भी नहीं जाएंगे और घर में भी कुछ नहीं खाएंगे. आज भूख हड़ताल है.” रिया और रोमी एक स्वर में बोले.

“ओके. ठीक है बाबा चल रही हूं. तुम दोनों यूं मुंह न फुलाओ. रिया बेटा, मैं तैयार होकर आती हूं, तब तक इन आंटियों को गरमागरम अदरकवाली चाय पिलाओ.”

“ओके ममा.”

“नहीं नहीं बेटा… फिर कभी चाय पीने आएंगे.” यह कहकर वे सब वहां से निकल गईं.

डॉ. अनिता राठौर ‘मंजरी’

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कहानी- कैनवास (Short Story- Canvas)

वह अपनी छोटी सोच के चलते आज तक ज़िंदगी को एक छोटे से फे्रम में कैदकर एक निश्‍चित एंगल से उसका मूल्यांकन करती आई थी, जबकि ज़िंदगी का कैनवास तो बहुत बड़ा होता है. न जाने कितने एंगल और फे्रम इसमें छिपे होते हैं. कहीं ख़ुशियों के शोख़-चटक रंग, तो कहीं ग़मों के उड़ते बादल इस कैनवास पर दिखाई देते हैं.

Kahani

जीवन में न जाने ऐसे कितने ही प्रश्‍न हैं, जो समझ से परे होते हैं. जिनके उत्तर चाहकर भी इंसान खोज नहीं पाता है. ऐसा ही एक प्रश्‍न उसके मन को अक्सर उद्वेलित करता है कि एक ही घर में पले-बढ़े, एक ही माता-पिता की दो संतानों की तक़दीर में इतना अंतर क्यों होता है. यह टीस उस समय और बढ़ जाती है, जब कर्त्तव्य और फ़र्ज़ जैसे भारी-भरकम शब्दों के बोझ तले उसकी छोटी-छोटी इच्छाएं भी दम तोड़ देती हैं और उससे उपजी पीड़ा का समीर को एहसास तक नहीं होता. उस समय न चाहते हुए भी वह अपनी ज़िंदगी की तुलना दीपा दी से करने लगती है और समीर से उसका झगड़ा हो जाता है.

तनिक-सी भी परवाह नहीं है समीर को उसकी ख़ुशियों की, उसकी भावनाओं की. कौन-सा पहाड़ टूट पड़ता, अगर उस दिन समीर उसे एक्स स्टूडेंट मीट में जाने देते. लेकिन समीर ने उसकी इच्छा को अनदेखा करते हुए कहा था, “तुम्हें पता है न कि मम्मी की तबीयत ख़राब है.”

“मैंने मम्मी को नाश्ता करवाकर दवा दे दी है. महाराजिन लंच बनाएगी. तीन बजे तक मैं लौट भी आऊंगी.”

“स़िर्फ दवा देने से फ़र्ज़ पूरा नहीं होता है. बड़ों को अपनेपन की भी ज़रूरत होती है. उनके पास बैठोगी, माथा सहलाओगी, तो आधी तबीयत तो यूं ही ठीक हो जाएगी. एक बेटे की मां बन चुकी हो, फिर भी ज़िम्मेदारी का एहसास नहीं.”

नीतू को भी ग़ुस्सा आ गया था, “कौन-सी ज़िम्मेदारी है, जो पूरी नहीं करती. सारा दिन तुम लोगों के इशारों पर नाचती हूं. ज़रा-सा अपने मन की कर लो, तो तुम्हें बुरा लग जाता है. आख़िर दीपा दी भी तो हैं.”

दीपा का नाम सुनते ही समीर भड़क उठा, उसकी बात उसने बीच में काट दी, “नीतू, दीपा दी से अपनी तुलना मत किया करो. निखिलजी शिप पर रहते हैं और वह यहां अकेली. उन पर किसी की जवाबदेही नहीं है, किंतु तुम तो परिवार के बीच में हो. क्या यह फ़र्क़ तुम्हें दिखाई नहीं देता.”

“उफ़़्फ्!” पैर पटकते हुए वह कमरे से बाहर निकल गई थी. यह कोई एक दिन की बात नहीं थी.

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ऐसे कितने ही मौ़के आते जब वह अपना मनचाहा करना चाहती. छोटी-छोटी ख़ुशियों को अपनी दोनों हथेलियों में समेटकर अपने जीवन में इंद्रधनुषी रंग बिखेरना चाहती, किंतु अक्सर ही उसकी मासूम भावनाओं को छिन्न-भिन्न करने के लिए कोई न कोई बाधा रास्ते का रोड़ा बन जाती. वसंत पंचमी पर भी तो ऐसा ही हुआ था. निखिल जीजू आए हुए थे. उसने और दीपा दी ने मसूरी घूमने का प्लान बनाया था. समीर भी तैयार हो गए थे, किंतु ऐन व़क्त पर उसकी ननद लतिका दी का फोन आ गया कि वह दो दिनों के लिए दिल्ली आ रही हैं और समीर ने प्रोग्राम कैंसल कर दिया. दी और जीजू तो आराम से चले गए थे और वह मन मसोसकर रह गई थी. ऐसे समय अक्सर ही उसकी रातों की नींद उड़ जाती है और वह सोचती रहती है कि ज़िंदगी की तस्वीर को बदल देनेवाले इतने महत्वपूर्ण फैसले में उससे चूक हो गई. समीर का लाखों का बिज़नेस, इतनी बड़ी कोठी, घर में नौकर-चाकर, इन्हीं को वह ख़ुशियों का मापदंड समझ बैठी थी, लेकिन अब समझ आया कि ख़ुशियां स्वच्छंदता में है. मौजमस्ती में है. क्या उसकी नियति यही है कि वह ख़ामोशी से अपने मन को मरता देखती रहे.

दो दिन बाद उसकी किटी पार्टी थी. ध्रुव को खाना खिलाकर वह अपनी सहेली सारिका के घर पहुंच गई. उनका छह सहेलियों का गु्रप हर माह किसी एक के घर एकत्रित होता था, जहां वे लंच के साथ तम्बोला का मज़ा लेते थे, लेकिन उस दिन रिया ने सुझाव दिया था, “क्यों न आज कुछ चेंज किया जाए. लंच के बाद मूवी देखने चलें?”

“वाउ, गुड आइडिया.” सभी ख़ुशी से चिल्लाईं. नीतू ने मम्मी को फोन करके बता दिया. उन्होंने भी प्रसन्नता से उसे जाने की इजाज़त दे दी थी. अभी वह मल्टीप्लेक्स पहुंची ही थी कि उसका फोन बज उठा. मम्मी का कॉल था, किंतु उनसे बात करती, तो मूवी शुरू हो जाती. हॉल में भी उसे एक-दो बार लगा कि उसका फोन बज रहा है, लेकिन उसने अनदेखा कर दिया. बाहर निकलने पर देखा, उसके मोबाइल पर पांच मिस्ड कॉल थीं. घर पहुंची, तो पता चला धु्रव झूले से गिर गया था. उसके सिर में चोट लगी देख उसका कलेजा मुंह को आ गया. मम्मी ने तो कुछ नहीं कहा, लेकिन कमरे में आते ही समीर ने आड़े हाथों लिया, “सहेलियों के साथ इतना खो गईं कि घर का होश ही नहीं रहा. फोन उठाने की भी फुर्सत नहीं मिली. किटी के बाद मूवी जाना ज़रूरी था क्या?”

“समीर, तुम बेकार ही बात को बढ़ा रहे हो. मुझे क्या पता था कि धु्रव को चोट लग जाएगी.” “जानती हो, तुम्हारे फोन न उठाने से मुझे मीटिंग छोड़कर घर आना पड़ा.”

“मैं भी तो घर के सारे दायित्व अकेले उठा रही हूं. एक दिन तुम्हें आना पड़ा, तो क्या हो गया?”

“कौन से दायित्व? सुनूं तो. ऐश करने के सिवा तुम करती क्या हो?”

वह कहना चाहती थी, बंधन में रहकर भी भला कोई ऐश कर सकता है क्या, किंतु कुछ तो धु्रव के चोटिल हो जाने का दर्द और कुछ अपनी लापरवाही का मन ही मन मलाल, वह ख़ामोश रही.

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अगले शनिवार को वह पैरेंट्स टीचर्स मीटिंग से लौटी, तो दीपा दी भी उसके साथ थीं. धु्रव और दीपा की लड़की पीहू दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे. नीतू और दीपा को मम्मी ने अपने कमरे में बुलाकर कहा, “नैनीताल से तुम्हारे चाचा का फोन आया था. दो दिन बाद उनकी शादी की 50वीं सालगिरह है, जिसे वे लोग धूमधाम से सेलिबे्रट कर रहे हैं. तुम दोनों को उन्होंने ख़ासतौर पर बुलाया है.”

नीतू बोली, “हम कैसे जा सकते हैं मम्मी. बच्चों की परीक्षाएं सिर पर हैं. उनकी स्कूल से छुट्टी करवाना ठीक नहीं है.”

“धु्रव और पीहू की तुम दोनों चिंता मत करो. ये दोनों यहीं रहेंगे हमारे साथ और स्कूल भी जाएंगे. क्यों बच्चों रहोगे न दादा-दादी के साथ?”

“हां, हम रहेंगे दादा-दादी के साथ. लूडो खेलेंगे, आइस्क्रीम खाएंगे, ख़ूब मज़े करेंगे.” धु्रव और पीहू ख़ुश थे.

“लेकिन आंटी, आप परेशान हो जाएंगी.” दीपा संकोच से बोली.

“क्यों दीपा, क्या पीहू मेरी पोती नहीं? अब दोनों जाने की तैयारी करो और हां, गिफ्ट बढ़िया-सा लेकर जाना.”

दो दिन बाद वे दोनों कार से नैनीताल जा रहे थे. नीतू बेहद ख़ुश थी. एक उन्मुक्तता का एहसास उसके मन को उड़ाए लिए जा रहा था. मार्ग के विहंगम दृश्यों को अपलक निहारते हुए वे लोग जल्दी ही नैनीताल पहुंच गए.

चाचा-चाची और उनके परिवार के संबंध हमेशा से ही घनिष्ठ और आत्मीय रहे हैं. उन्होंने अपनी बेटी अल्पना और नीतू-दीपा में कभी फ़र्क़ नहीं किया और अब तो जब से मम्मी-पापा का स्वर्गवास हुआ, चाचा-चाची ही उनके सब कुछ थे. रात में पूरा परिवार रजाई में बैठा गपशप में तल्लीन था. चाचा बोले, “नीतू, तुम्हारे सास-ससुर की सज्जनता का मैं क़ायल हो गया. मेरे एक फोन पर ही उन्होंने न स़िर्फ तुम दोनों को भेजा, बल्कि दोनों बच्चों को भी रख लिया. इतना बड़प्पन बहुत कम लोगों में होता है.”

“हां चाचा, इसमें संदेह नहीं कि हम उन्हीं की वजह से आ पाए, लेकिन…”

“लेकिन क्या बेटा?” चाचा-चाची की सवालिया नज़रें उसकी ओर उठ गईं, नीतू दुविधा में पड़ गई. क्या करे वह, ज़ाहिर कर दे सबसे अपनी नाराज़गी? तभी उसने सुना, दीपा दी कह रही थीं? “अरे! मैं बताती हूं. नीतू सास-ससुर के साथ रहना नहीं चाहती.”

“आप तो चुप ही रहो दी. जिस तन लागे सो तन जाने. आप स्वच्छंद हो. आपको क्या पता बंधन में रहना किसे कहते हैं?”

“अरे, आख़िर पता तो चले बात क्या है?” चाची असमंजस में थीं. नीतू के मन का गुबार आख़िर छलक ही पड़ा, “मम्मी-पापा और आप लोगों ने मेरी शादी में बहुत जल्दबाज़ी की. यह भी नहीं सोचा कि संयुक्त परिवार में लड़की की ज़िंदगी कैसे कटेगी?”

“इसका सीधा-सा अर्थ है कि तुम वहां ख़ुश नहीं हो. तुम्हारी सास तुम्हें तंग करती हैं. यह सब पहले क्यों नहीं बताया?”

“ओहो चाची, सास की प्रताड़ना ही एक अकेला दुख नहीं होता. कुछ दुख ऐसे होते हैं, जो दिखाई नहीं देते, किंतु मन को टीसते रहते हैं. बंधन, कर्त्तव्य और ज़िम्मेदारियों के बीच क्या इंसान स्वच्छंदतापूर्वक घूम-फिर सकता है? मौजमस्ती कर सकता है? आप ही बताइए, मन मारकर जीना भी कोई जीना है.” नीतू की बातें सुनकर चाचा गंभीर हो उठे. कुछ पल वह सोचते रहे, फिर बोले, “जानती हो नीतू, भइया-भाभी यानी तुम्हारे मम्मी-पापा के विवाह को तीन वर्ष ही बीते थे, जब अम्मा का स्वर्गवास हो गया. मैं उस समय कॉलेज में पढ़ता था. भाभी पर परिवार का पूरा दायित्व आ गया. सोचो बेटा, उस समय उनकी क्या उम्र रही होगी. क्या उनके मन में उमंगें नहीं रही होंगी, किंतु उन्होंने अपनी ख़ुशियों से अधिक अपने कर्त्तव्यों को अहमियत दी. अपनी ज़िम्मेदारियों को कभी बोझ नहीं समझा. एक बड़ी बहन की तरह मेरे और तुम्हारी चाची के सिर पर सदैव उनका हाथ रहा. नीतू, भाभी के कर्त्तव्यों में आस्था थी. उनकी इस आस्था ने पूरे परिवार को स्नेह के एक अटूट बंधन में बांध दिया. बेटा, घूमने-फिरने और मौज-मस्ती का ही नाम ज़िंदगी नहीं है. त्याग, समर्पण, पे्रम और रिश्तों को सहेजने का नाम भी ज़िंदगी है. अपनों को प्यार देने और प्यार पाने का नाम भी ज़िंदगी है.”

चाचा की बातों पर नीतू नि:शब्द थी. अपने ही शब्दों के कारण उसे अपना अस्तित्व बौना महसूस हो रहा था. सचमुच मम्मी ने अपने परिवार के लिए इतने त्याग और समझौते न किए होते, तो उनके जाने के बाद भी क्या उसे और दीपा दी को चाचा-चाची के घर मायके-सा सुख मिलता. आज भी वे दोनों गर्मी की छुट्टियों में पूरे हक़ से यहां आती हैं और चाचा-चाची पूरी शिद्दत से रिश्ता निभाते हैं, जैसे कभी मम्मी-पापा ने उनके साथ निभाया था. अब जीवन का एक दूसरा पहलू उसके समक्ष था. तो क्या उसे मम्मी की इस परंपरा को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए? अपने परिवार को पूर्ण आस्था के साथ अपनाकर प्रेम के सूत्र में नहीं बांधना चाहिए, ताकि रिश्तों की गरमाहट को वह अपने दूसरे परिवार में भी महसूस करे, जो यहां करती आई है.

उसकी आंखों के समक्ष ऐसे कितने ही दृश्य तैर गए, जब उसकी सास और ननद लतिका ने अपने स्नेह की खाद से रिश्तों को पल्लवित करने का प्रयास किया था. धु्रव पैदा हुआ, तो मम्मी ने जी-जान से उसकी देखभाल की थी, किंतु वह उनसे सदैव औपचारिकता ही निभाती रही. रिश्तों को बोझ समझकर कर्त्तव्य निभाए. न तो ससुराल में किसी को अपना प्रेम दिया और न ही अपनापन. वह अपनी छोटी सोच के चलते आज तक ज़िंदगी को एक छोटे से फे्रम में ़कैदकर एक निश्‍चित एंगल से उसका मूल्यांकन करती आई थी, जबकि ज़िंदगी का कैनवास तो बहुत बड़ा होता है. न जाने कितने एंगल और फे्रम इसमें छिपे होते हैं. कहीं ख़ुशियों के शोख़-चटक रंग, तो कहीं ग़मों के उड़ते बादल इस कैनवास पर दिखाई देते हैं. इसका मूल्यांकन करने के लिए विस्तृत दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है.

दो दिन नैनीताल रहकर नीतू और दीपा दिल्ली लौट आए. कार से उतरकर ज्यों ही वे अंदर की ओर बढ़े, अंदर से आती आवाज़ों ने उनके पांव रोक दिए. लतिका कह रही थी, “मम्मी, नीतू का साहस देखकर मैं अचम्भित हूं. ख़ुद तो मैडम मज़े से घूम रही हैं और अपने बेटे के साथ-साथ अपनी बहन की बेटी को भी आपके पास छोड़ गई. समीर ने भी उसे मना नहीं किया. इस घर को क्या डे केयर समझा हुआ है. नहीं मम्मी, आपने और पापा ने उसे बहुत छूट दे रखी है. पछताएंगे आप लोग किसी दिन.”

यह भी पढ़ेहम क्यों पहनते हैं इतने मुखौटे? (Masking Personality: Do We All Wear Mask?)

“बस लतिका, अब चुप हो जाओ. बहुत सुन चुकी मैं तुम्हारी बेकार की बातें. याद रखो, मैं उन मांओं में से नहीं हूं, जो बेटी के कहने में आकर बहू से दुर्व्यवहार करने लगती हैं और अपना घर ख़राब कर लेती हैं और न ही मेरी ममता अंधी है. अरे, ध्रुव मेरा पोता है, मेरा अपना ख़ून. उसके लिए कुछ करना मुझे आत्मसंतोष देता है. उसके लिए तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो? क्या वह तुम्हारा भतीजा नहीं? जानती हो, नीतू मेरा कितना ख़्याल रखती है. न जाने कितनी बार हमारी ख़ातिर अपना मन मार लेती है, लेकिन उसके चेहरे पर कभी शिकन नहीं आती. उसके स्नेह को मैं हृदय की गहराइयों से महसूस करती हूं. लतिका, कभी तुम्हारे बच्चे भी छोटे थे. उन्हें मेरे पास छोड़कर तुम कितना घूमती-फिरती थी और आज जब मैं धु्रव को संभाल रही हूं, तब तुम्हें बुरा लग रहा है. मेरी तबीयत का ख़्याल आ रहा है.”

“मम्मी, आप बेकार ही नाराज़ हो रही हैं. मेरा मतलब धु्रव से नहीं पीहू से था.” लतिका की खिसियाई हुई-सी आवाज़ आई.

“पीहू के लिए भी तुमने इतनी छोटी बात कैसे कह दी? नीतू की बहन के साथ क्या हमारा कोई संबंध नहीं?” मम्मी की बातों से नीतू की आंखों में आंसू आ गए. उसकी भावनाओं से अनभिज्ञ वे उसे इतना अच्छा समझती हैं. उनके मन में उसके लिए इतना प्यार छिपा हुआ है और वह… दो दिन पूर्व उसने लतिका दीदी की ऐसी बातें सुन ली होतीं, तो उनसे बात तक नहीं करती, लेकिन आज… आज वह बदल चुकी थी. अपने परिवार को अपने पे्रम और समर्पण की डोर में बांधने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थी. भावविह्वल हो वह तेज़ी से अंदर की ओर बढ़ी.

“अरे दीदी, आप कब आईं?” उसने चौंकने का अभिनय किया. मम्मी और लतिका की बातें उन दोनों ने सुन ली हैं, यह दर्शाकर वह उन्हें शर्मिंदा करना नहीं चाहती थी.

“अभी थोड़ी देर पहले आई हूं.” लतिका बोली. “कैसा रहा वहां का प्रोग्राम? घर में सब कैसे हैं?” मम्मी ने पांव छूने को झुकी नीतू को गले से लगाते हुए पूछा.

“सब अच्छे हैं मम्मी. प्रोग्राम भी अच्छा रहा.” मम्मी के गले से लगी नीतू के मन में चाचा की कही बातें गूंज रही थीं, ‘हमारी भावनाएं और सोच का नज़रिया रिश्तों को स्वरूप प्रदान करता है.’ कितना सच कहा था उन्होंने. आज उसकी बदली हुई भावनाओं के कारण मम्मी में उसे अपनी सास नहीं, वरन् ममतामयी मां नज़र आ रही थीं.

renu mandal

       रेनू मंडल

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