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क्या आप भी बहुत जल्दी डर जाते हैं? (Generalized Anxiety Disorder: Do You Worry Too Much?)

किसी ने बहुत सही कहा है कि डर आपका सबसे बड़ा दुश्मन है. एक बार आपका डर आप पर हावी हो गया, तो बड़ी मुश्किल से पीछा छोड़ता है. रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी बहुत से ऐसे लोग हैं, जो हर छोटी-छोटी बात को लेकर डर या चिंता में रहते हैं, जिसका ख़ामियाज़ा उन्हें अपनी सेहत से चुकाना पड़ता है. आप डर से न डरें और ज़िंदगी को ज़िंदादिली से जीएं, इसके लिए ज़रूरी है कि इस डर को समझें. क्या है यह एंज़ायटी डिसऑर्डर (Anxiety Disorder), आइए जानते हैं.

Generalized Anxiety Disorder

इन 10 बातों से सबसे ज़्यादा डरते हैं लोग?

हम सभी डरते हैं और डरना मानव स्वभाव भी है, पर क्या आप भी किसी बीमारी के बारे में सुनकर इतना डर जाते हैं कि लगता है कि अब बचेंगे नहीं या फिर कोई छोटी-सी समस्या आने पर ऐसा लगता है, जैसे सब बर्बाद हो गया, अब कुछ नहीं बचा?  इस तरह डरनेवाले लोग ढर्रे पर चलना पसंद करते हैं. ज़रा-सी परिस्थितियां प्रतिकूल हुई नहीं कि सब बेकार लगने लगता है. डर तो कई तरह के हैं, पर देखते हैं कि सबसे आम डर क्या हैं?

  1. कहीं मैं लेट न हो जाऊं?
  2. कहीं कुछ बुरा न हो जाए?
  3. अगर कोई इमर्जेंसी आ गई, तो कैसे संभालेंगे?
  4. कहीं मैं मोटी न हो जाऊं?
  5. अगर टेस्ट करवा लिया, तो कहीं कोई बीमारी न निकल आए?
  6. कहीं ज़िंदगी यूं ही धक्के खाते-खाते न निकल जाए?
  7. अगर मुझे सही जीवनसाथी नहीं मिला तो?
  8. मुझे कुछ हो गया, तो परिवार का क्या होगा?
  9. कहीं हमारे बीच कोई तीसरा ना आ जाए?
  10. क्या मुझे इससे अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी?
डर का होता है केमिकल रिएक्शन

आजकल हर व्यक्ति किसी न किसी बात से चिंतित या डरा हुआ रहता है, चाहे वो काम को लेकर हो, परिवार, पैसा, सेहत या फिर भविष्य की ही बात क्यों न हो. माना कि कुछ चीज़ों की चिंता करना ज़रूरी है, पर हर चीज़ को लेकर हमेशा मन को सशंकित रखना आपकी सेहत के लिए बिल्कुल ठीक नहीं. दरअसल, जब हम चिंताग्रस्त होते हैं, तो हमारे शरीर में कार्टिसोल नामक केमिकल का स्राव होता है, जो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बुरी तरह प्रभावित करता है, जिससे हम आसानी से किसी इंफेक्शन या बीमारी की चपेट में आ जाते हैं.

ख़तरनाक है कार्टिसोल

रिसर्च में यह बात साबित हो गई है कि कार्टिसोल का डायबिटीज़, हार्ट प्रॉब्लम्स और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी गंभीर बीमारियों से गहरा संबंध है. स्ट्रेस और डर के कारण आप न स़िर्फ डिप्रेशन और पैनिक डिसऑर्डर, बल्कि बाई पोलार डिसऑर्डर के शिकार भी हो सकते हैं.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ हम जिन बातों को लेकर डरे हुए रहते हैं या हमें जिनकी चिंता सताती रहती है, 96% मामलों में देखा गया है कि वह समस्या कभी हक़ीक़त में होती ही नहीं. हम बेवजह अपने दिमाग़ में ही उस समस्या को पालते-पोसते रहते हैं.

क्या है जनरलाइज़्ड एंज़ायटी डिसऑर्डर?

– छोटी-मोटी बातों पर घबराना या चिंता करना आम बात है, लेकिन जब व्यक्ति हर छोटी-से-छोटी बात पर घबराने या डरने लगे, तो उसे जनरलाइज़्ड एंज़ायटी डिसऑर्डर (जीएडी) कहते हैं. इससे पीड़ित व्यक्ति अपनी घबराहट या डर को कंट्रोल नहीं कर पाता, जिससे उसका मन किसी काम में नहीं लगता.

पहचानें इसके लक्षण

–     रोज़मर्रा के कामों को लेकर भी चिंता करना.

–     घबराहट और चिंता पर कंट्रोल न होना.

–     उन्हें भी पता होता है कि वो ज़रूरत से ज़्यादा परेशान हो रहे हैं.

–     असहज बने रहते हैं, जिससे जल्दी रिलैक्स नहीं हो पाते.

–     एकाग्र नहीं हो पाते.

–     बहुत जल्दी चौंक जाते हैं.

–     जल्दी नींद नहीं आती या फिर सुकूनभरी नींद नहीं ले पाते.

–     बहुत जल्दी थक जाते हैं या फिर हर व़क्त थका हुआ महसूस करते हैं.

–     सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, पेटदर्द या फिर शरीर के किसी हिस्से में बेवजह का दर्द.

–     खाना खाते समय निगलने में परेशानी होना.

–     चिड़चिड़ापन.

–     चक्कर आना.

–     बार-बार टॉयलेट जाना.

लक्षणों को देखकर बहुत से लोगों को लगेगा कि उनमें भी जीएडी है, पर ज़रूरी नहीं कि आप इससे पीड़ित हों. अगर हैं भी, तो कौन-सी बड़ी बात हो गई, हर किसी की तरह इसका भी तो समाधान है.

क्या हैं जीएडी के प्रमुख कारण?

एक्सपर्ट्स की मानें तो कुछ मामलों में इसका एक प्रमुख कारण आनुवांशिकता भी है. आपके मस्तिष्क और बायोलॉजिकल प्रोसेस डर और एंज़ायटी को तैयार होने में अहम् भूमिका निभाते हैं, हालांकि अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि क्यों कुछ परिवारों में ही लोग ज़्यादा डरते हैं, जबकि दूसरे परिवारवाले उतना नहीं डरते. इसके अलावा स्ट्रेस और बाहरी माहौल भी आपको डराने में कोई कसर नहीं छोड़ते.

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Generalized Anxiety Disorder

कैसे कम करें अपने डर को?

एक बात अच्छी तरह समझ लें कि आप अपने डर को जितना ज़्यादा अनदेखा करेंगे, वह आपके सब कॉन्शियस माइंड में उतनी ही गहरी पैठ जमाएगा. अगर अपने डर से छुटकारा पाना चाहते हैं, तो उसका सामना करें. डर से नज़रे मिलाएं और पूछें कि ज़्यादा से ज़्यादा वो क्या कर सकता है. यहां हम आपको अपने डर पर काबू पाने के कुछ स्मार्ट ट्रिक्स बता रहे हैं, तो आप भी इन्हें अपनाकर निडर, साहसी व सकारात्मक बनें.

– पेपर थेरेपी आज़माएं

सबसे पहले तो आपको जिस भी चीज़ या बात से डर लग रहा है, उसे डायरी में लिखें. लिखने से डर दिमाग़ से निकलकर पेपर पर आ जाता है, जिससे आपका दिमाग़ शांत होता है. अब उसे चार-पांच बार पढ़ें और फिर फाड़कर जला दें. आपको बहुत अच्छा महसूस होगा. यह एक तरह की थेरेपी भी है, जो आपके अंदर के डर को ख़त्म करती है.

–  बांट दें अपने डर को

जिस तरह लिखने से डर कमज़ोर लगने लगता है, वही हाल उसे बांट देने से भी होता है. किसी भी तरह का डर क्यों न हो, अपने किसी बड़े-बूढ़े या फिर दोस्तों से डिस्कस करें. बांटने से आपको बहुत से समाधान एक साथ मिल जाते हैं, जो शायद ही आपके दिमाग़ में आए हों.

–     थैंक्यू कहें, ख़ुश रहें

सुबह सोकर उठने पर और रात को सोने से पहले आपके पास जो भी है, उसके लिए ईश्‍वर को धन्यवाद कहने और आभार प्रकट करने से आत्मिक संतोष मिलता है, जिससे दिमाग़ में मौजूद डर की ओर आपका ध्यान नहीं जाता. धीरे-धीरे इसे रोज़मर्रा की आदत में शामिल करें. आपकी सोच सकारात्मक होने लगेगी और डर दूर होगा.

–    वर्तमान में जीने की आदत डालें

डर का अस्तित्व भूत या भविष्य से होता है. जितना ज़्यादा आप वर्तमान में जीने की कोशिश करेंगे, उतने ही ज़्यादा ख़ुश रहेंगे. इस व़क्त मैं कैसा महसूस कर रहा हूं? यह जो सांस चल रही है, कितनी अनमोल है, यह वातावरण में घुली ख़ुशबू, ये मधुर आवाज़, सब कुछ कितना अच्छा है. इसे अपनी आदत में शुमार करें. रोज़ाना थोड़ी देर, ख़ुद को महसूस करें. इसमें मेडिटेशन आपकी बहुत मदद करेगा.

–     अनिश्‍चितताओं को स्वीकारें

ज़िंदगी अगले क़दम क्या मोड़ लेगी, आप इसका अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते. हमें पता नहीं कि कल हमारी सेहत कैसी होगी, कौन हमें प्यार करेगा, कौन अनदेखा करेगा, हमारे अपनों के क्या हालात होंगे- हमें कुछ भी नहीं पता. हमें स़िर्फ इतना पता है कि ज़िंदगी के हर पल को एंजॉय करना है. जब कुछ पता ही नहीं कि कल क्या होगा, तो डर किस बात का? क्या पता जिस चीज़ से हम डर रहे हैं, कल उसका अस्तित्व ही ख़त्म हो जाए, इसलिए अनिश्‍चितताओं को स्वीकार करें और हर डर को ख़ुद से दूर कर दें.

–     नर्वस सिस्टम को शांत करें

जब हम लगातार डरे हुए रहते हैं, तो हमारा नर्वस सिस्टम हाई अलर्ट पर रहता है. मानसिक डर हमारे शरीर को बुरी तरह से प्रभावित करता है, इसलिए बेवजह मसल पेन होना, चक्कर आना और घबराहट जैसी भावनाएं महसूस होती हैं. इससे बचने का बेहतरीन तरीक़ा है फिज़िकल एक्टीविटीज़, एक्सरसाइज़, मेडिटेशन आदि.

–     छोड़ दें कंट्रोल

एक बात ध्यान में रखें कि आप जिस चीज़ के लिए डर रहे हैं और जिस तरह का माहौल है, उस पर आपका कोई कंट्रोल नहीं है. और जब कोई कंट्रोल ही नहीं, तो छोड़ दें उन्हें. उन पर कब्ज़ा जमाकर न रखें. याद रहे, जितना कम दिमाग़ में रखेंगे, उतना ज़्यादा हल्का महसूस करेंगे.

– अनीता सिंह

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सेहत पर भारी पड़ता वर्कलोड… (The Effects Of Workload On Your Health)

Effects Of Workload

सेहत पर भारी पड़ता वर्कलोड… (The Effects Of Workload On Your Health)

कैसे हैंडल करें वर्कप्रेशर (Work Pressure) का स्ट्रेस (Stress)? अक्सर हम लोगों के मुंह से यह सुनते हैं कि बहुत बिज़ी हूं, वर्कलोड बहुत ज़्यादा है… यही हाल हमारा ख़ुद का भी है. न नींद पूरी होती है, न समय पर खाना… प्रोफेशनल लाइफ में बढ़ता कॉम्पटीशन, सबसे बेहतर करने का दबाव इस कदर बढ़ता जा रहा है कि हमारी सेहत बिगड़ रही है.

–   कम उम्र में ही हाई ब्लड प्रेशर.

–    बढ़ती हार्ट डिसीज़.

–   टाइप 2 डायबिटीज़.

–   ओबेसिटी यानी मोटापा.

–   सिरदर्द, कमरदर्द, गर्दन में अकड़न.

–    तनाव, डिप्रेशन, अवसाद.

–    अल्कोहल, स्मोकिंग की लत.

–   मन व शरीर में भारीपन आदि… ये तमाम शिकायतें हमारे बढ़ते वर्कलोड की देन हैं.

ज़ाहिर है पैसे कमाना ज़रूरी है. ऑफिस में अपने काम को ईमानदारी से करना भी अच्छी बात है, लेकिन काम का प्रेशर इतना भी न बढ़ जाए कि आप ज़िंदगी जीना ही भूल जाएं.

क्या आप पर भी है वर्कलोड?

यह जानने के लिए इन लक्षणों पर ध्यान दें…

रिलैक्सेशन के लिए आप अल्कोहल की शरण में ज़्यादा जाने लगे हैं: रिसर्च बताते हैं कि हफ़्ते में 40 घंटे से अधिक काम करने पर आपके शराब के सेवन की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. आप इतने थक जाते हैं कि रिस्की अमाउंट में अल्कोहल का सेवन करने लगते हैं. वीकेंड में आप बहुत ज़्यादा शराब पी लेते हैं या जिस दिन आपका मूड ख़राब होता है, तो भी आप शराब की शरण में जाते हैं.

यह ट्राई करें: घर लौटते समय लैपटॉप, कंप्यूटर या फोन को न देखें, बल्कि अपने फेवरेट गाने सुनें या ऑडियो बुक भी अच्छा आइडिया है.

आपके काम की क्वालिटी व प्रोडक्टिविटी कम हो रही है: अगर आपका काम समय पर नहीं हो पा रहा, तो इसका मतलब है कि आपकी प्रोडक्टिविटी कम हो रही है. आपने काम करने के घंटे बढ़ा दिए हैं, पर इसका यह अर्थ नहीं कि आप ज़्यादा काम कर रहे हैं. स्टैनफोर्ड रिसर्च पेपर में पाया गया है कि जो लोग 70 घंटे प्रति हफ़्ता काम करते हैं, वो अपने उन साथियों के मुक़ाबले अधिक काम नहीं कर रहे होते, जो 56 घंटे प्रति हफ़्ता काम करते हैं, क्योंकि हम हर रोज़, हर मिनट काम नहीं कर सकते. यह प्रकृति के ख़िलाफ़ है और असंभव भी है.

यह ट्राई करें: टु डू लिस्ट तैयार करें और मल्टी टास्किंग अवॉइड करें. बेहतर होगा कि काम में भी प्राथमिकताएं तय करें. जो काम सबसे ज़रूरी है, वह पहले करें. टाइम मैनेजमेंट करें, टाइम टेबल बनाएं. इससे आप व्यवस्थित रहेंगे और कम प्रेशर महसूस करेंगे.

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आपकी नींद पूरी नहीं हो रही और दिन में थकान महसूस होती है: काम के बढ़ते बोझ के चलते नींद डिस्टर्ब होने लगती है. मन-मस्तिष्क शांत नहीं रहता, जिससे नींद न आने की समस्या व मानसिक तनाव बढ़ता जाता है. नींद पूरी न होने से अगले दिन ऑफिस में भी थकान महसूस होती है और आप काम पर भी फोकस नहीं कर पाते. इन तमाम वजहों से आपको टाइप 2 डायबिटीज़ व हार्ट डिसीज़ होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.

यह ट्राई करें: ख़ुद को ब्रेक दें. काम के बीच-बीच में उठकर वॉक पर जाएं. थोड़ा स्ट्रेचिंग करें. इससे नींद व थकान दूर होगी और स्ट्रेस नहीं होगा.

डिप्रेशन महसूस होने लगा है: ज़्यादा काम करने से आपकी मेंटल हेल्थ ख़राब हो सकती है. एक स्टडी में पाया गया है कि जो लोग रोज़ाना 11 घंटे काम करते हैं, वो डिप्रेशन से अधिक जूझ रहे होते हैं, बजाय उन लोगों के जो 7-8 घंटे काम करते हैं.

यह ट्राई करें: आप मेडिटेशन ट्राई करें. यह मानसिक तनाव को दूर करके रिफ्रेश करता है.

आप ही नहीं, आपका दिल भी अधिक काम कर रहा होता है: वर्कलोड स़िर्फ आप पर ही असर नहीं डालता, बल्कि आपके अंगों को भी प्रभावित करता है. आप भले ही यह नोटिस नहीं कर पाते, लेकिन वर्क स्ट्रेस कॉर्टिसोल नाम का हार्मोन रिलीज़ करता है, जो हृदय पर असर डालता है. यह स्ट्रोक, कोरोनरी आर्टरी डिसीज़, टाइप 2 डायबिटीज़ और कैंसर तक को जन्म दे सकता है.

यह ट्राई करें: ज़्यादा देर तक बैठे रहने की बजाय स्टैंड अप मीटिंग्स करें, कॉफी ब्रेक में, लंच में भी डेस्क की बजाय साथियों के साथ खड़े होकर खाना खाएं. टी ब्रेक लें और फोन पर भी खड़े-खड़े या घूमते हुए बात करें.

आपकी गर्दन व कमर में दर्द रहने लगा है: ऑक्यूपेशनल एंड एनवायर्नमेंटल मेडिसिन जरनल ने अपनी स्टडी में यह पाया है कि लोग जितना अधिक काम करते हैं, उनकी कमर में दर्द होने का रिस्क उतना ही बढ़ जाता है. महिलाओं में यह दर्द गर्दन में अधिक होता है, जबकि पुरुषों में लोअर बैक पेन होता है. यह स्ट्रेस का लक्षण है, जो मसल टेंशन की वजह से होता है.

यह ट्राई करें: बेहतर होगा आप थेरेपिस्ट की मदद लें, अपनी तकलीफ़ों व स्ट्रेस के बारे में बात करके आप बेहतर महसूस करेंगे.

आपके रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं: अगर आपके पास रिश्तों के लिए समय होता भी है, तो स्ट्रेस और थकान के कारण आप में वो ऊर्जा नहीं होती कि कुछ बेहतर समय अपनों के साथ बिता सकें. आप डिप्रेशन में या चिढ़े हुए रहते हैं.

यह ट्राई करें: अपने काम के बीच में ही नॉन वर्क एक्टिविटीज़ के लिए भी समय निकालें. टाइम टेबल बनाएं- फ्रेंड्स के साथ गेट-टुगेदर रखें, मूवी जाएं, म्यूज़िक सुनें, एक्सरसाइज़, लॉन्ग ड्राइव या जो भी आपको अच्छा लगे, उसके लिए टाइम निकालें.

– गीता शर्मा

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आदतें, जो आपको बूढ़ा बना रही हैं (Daily Habits That Are Aging You?)

Do You Look Older Than Your Age

क्या आप अपनी उम्र से ज़्यादा बड़ी दिखती हैं? आपके जीन्स के अलावा भी ऐसी बहुत-सी आदतें हैं जो आपको समय से पहले बूढ़ा बना रही हैं.

Do You Look Older Than Your Age

 

लो-फैट डायट्स 
झुर्रियों से बचने के लिए व त्वचा को नर्म-मुलायम बनाए रखने के लिए ओमेगा-थ्री फैटी एसिड्स ग्रहण करना बहुत ज़रूरी है. ज़्यादातर लो-फैट डायट्स में इन फैटी एसिड्स की कमी होती है, जिसके कारण त्वचा समय से पहले बूढ़ी होने लगती है.

स्ट्रॉ का इस्तेमाल

Do You Look Older Than Your Age
स्ट्रॉ से ड्रिंक्स इत्यादि का सेवन करने के लिए हमें अपने होंठों को सिकोड़ना पड़ता है, जिसके कारण मुंह के आस-पास लाइन्स व रिंकल्स उभर जाते हैं. ध्रूमपान करने पर भी यही समस्या होती है. इसलिए स्ट्रॉ के बजाय ग्लास से पिएं और अगर स्मोकिंग की आदत है तो इसे छोड़ने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है. यह थोड़ा मुश्किल तो ज़रूर है, लेकिन स्मोकिंग छोड़ने के कई फायदे हैं.

ग़लत पॉश्‍चर
ग़लत तरी़के से बैठने-उठने से रीढ़ की हड्डी झुक जाती है, जिसके कारण मसल्स व बोन्स पर दबाव पड़ता है. नतीज़तन शरीर में दर्द व थकान की समस्या होती है व स़िर्फ इतना ही नहीं पीठ हमेशा के लिए झुक जाती है.

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हीटिंग का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल
घर को गर्म रखने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा आर्टिफिशियल हीटिंग का इस्तेमाल करने से घर के अंदर की हवा रूखी हो जाती है. जिससे त्वचा व बाल रूखे हो जाते है, नतीज़तन चेहरे पर ज़्यादा झुर्रियां बनती है. इसलिए घर के अंदर हीट को कम से कम रखने की कोशिश करें.

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सनस्क्रीन का इस्तेमाल न करना
अधिक समय तक सूर्य की हानिकारक यूवी किरणों के संपर्क में आने से त्वचा समय से समय बूढ़ी होने लगती है. इससे बचने के लिए घर से बाहर निकलते समय बिना भूले सनस्क्रीन लगाएं, बारिश के मौसम में भी क्योंकि बादल यूवी रेज़ को मात्र 20 फीसदी ब्लॉक कर पाते हैं.

पेट के बल सोना

Do You Look Older Than Your Age
पेट के बल तकिए में मुंह घुसाकर सोने से गालों व चिन पर रिंकल्स बढ़ते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, पीठ के बल सोने का सबसे सही तरीक़ा है.

नींद की कमी
एक व्यस्क व्यक्ति को कम से कम 7 घंटे की नींद लेना ज़रूरी होता है. नींद पूरी न होने पर न स़िर्फ हम थके हुए दिखते हैं, बल्कि हमारी आयु भी कम होती है. विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आप ऊर्जा की कमी या वेट गेन जैसी समस्या का सामना कर रहे हैं तो टाइम पर सोना शुरू कर दीजिए.

तनाव

बहुत-से अध्ययनों से सिद्ध हो चुका है कि तनाव हमारे शरीर में उपस्थित सेल्स को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त करते हैं, जिससे एज़िंग की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है. इसलिए जवां रहना है तो तनाव को ख़ुद से दूर रखिए.

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एग्ज़ाम के समय क्या करें पैरेंट्स? (What Can Parent Do To Help Their Children’s During Exam?)

 

study copy

एग्ज़ाम के नाम से एक तो वैसे ही अधिकांश बच्चे डरते हैं. ऐसे में यदि पैरेंट्स बार-बार पढ़ाई के लिए उनके पीछे पड़े रहें और अच्छे मार्क्स लाने की धमकी देते रहें, तो बच्चे का आत्मविश्‍वास चला जाता है. बच्चा फ्री होकर खुले दिमाग़ से पढ़ सके, इसके लिए पैरेंट्स को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए.

 

* घर का माहौल ख़ुशनुमा व शांत बनाए रखने की कोशिश करें.

* बच्चे को हमेशा सही टाइम पर पढ़ने, पढ़ाई से ब्रेक लेने और सोने के लिए प्रोत्साहित करें. बिना ब्रेक के लगातार पढ़ते रहने से वो तनावग्रस्त हो सकते हैं.

* उस पर किसी तरह का दबाव न डालें. “बेटा, तुम्हें 90% मार्क्स लाने ही होंगे…” जैसे वा़क्य ग़लती से भी न दोहराएं.

* यदि परीक्षा के दौरान बच्चे का व्यवहार सही नहीं है, तो ग़ुस्सा होने की बजाय ख़ुद पर क़ाबू रखें और प्यार से उसे समझाने की कोशिश करें.

* एग्ज़ाम पीरियड में उसे किसी भी तरह का घर का काम न दें और न ही कोई ऐसी बात कहें, जिससे उसका ध्यान पढ़ाई से हटे.

* पढ़ाई को लेकर बच्चे के पीछे न पड़े रहें. रिलैक्स व फ्रेश होने के लिए उसे थोड़ी देर खेलने व टीवी देखने की छूट दें.

* एग्ज़ाम का हौवा न बनाएं, उसे सामान्य तरी़के से लें.

* बच्चे के सामने ये कभी न ज़ाहिर करें कि आप उसकी परीक्षा को लेकर चिंतित हैं.

– कंचन सिंह

 

 

कौन-सी 12 आदतें बिगाड़ रही हैं आपकी फर्टिलिटी ?(These 12 habits can kill your fertility)

habits can kill your fertility

हमारी लाइफस्टाइल से ही जुड़ी कुछ ऐसी ग़लत आदतें हैं, जिनका फर्टिलिटी पर काफ़ी बुरा असर पड़ता है. इन आदतों को अगर समय रहते सुधारा न गया, तो आप माता-पिता बनने के सुख से वंचित हो सकते हैं, इसलिए समय रहते इनमें सुधार लाएं और फिट रहें.

habits can kill your fertility

1. ग़लत खानपान: शरीर को ठीक प्रकार से काम करने के लिए कई तरह के पौष्टिक तत्वों की आवश्यकता होती है. अगर आप सही प्रकार का आहार नहीं लेते हैं, तो इसका असर फर्टिलिटी पर पड़ सकता है. तीखे, खट्टे, गर्म और नमकीन पदार्थों का ज़्यादा सेवन करने से पित्त कुपित होकर वीर्य व अण्डाणु का क्षय करता है, जिससे नपुंसकता पैदा होती है.

2. नींद की कमी: अगर आप रोज़ाना 8 घंटे की पर्याप्त नींद नहीं लेते, तो शरीर में हार्मोंस का असंतुलन हो जाता है, जो इंफर्टिलिटी का कारण बनता है. आपकी देर रात तक जागने की आदत आपकी फर्टिलिटी के लिए ख़तरनाक साबित हो सकती है, इसलिए इस आदत को जल्द से जल्द छोड़ दें.
3. मोबाइल फोन या लैपटॉप का अत्यधिक इस्तेमाल: हाल में हुए कुछ शोधों के आधार पर पुरुष बांझपन और सेल फोन के बीच संबंध को लेकर कई रोचक बातें सामने आई हैं. इंफर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. गौरी अग्रवाल के अनुसार, बांझपन की समस्या के लिए मोबाइल फोन और लैपटॉप का ठीक प्रकार से इस्तेमाल न करना भी बड़ा कारण है. शर्ट की जेब में दिल के पास और पैंट की जेब में रखने पर मोबाइल से निकलनेवाली रेज़ फर्टिलिटी के लिए ख़तरनाक साबित होती हैं. यह पुरुषों के शुक्राणुओं पर बुरा प्रभाव डालती हैं और उनकी संख्या व क्षमता में बीस से तीस प्रतिशत तक की कमी कर देती हैं. इसलिए बेहतर होगा कि अपनी गोद में रखने की बजाय लैपटॉप को मेज़ पर रखकर इस्तेमाल करें.
4. दिन-ब-दिन बढ़ता तनाव: एसीआई अस्पताल, दिल्ली के कंसल्टेंट यूरोलॉजिस्ट, एंड्रोलॉजिस्ट डॉ. गौतम बग्गा के अनुसार, अत्यधिक तनाव कुछ हार्मोंस पर प्रभाव डालता है, जो स्पर्म बनाने के लिए अनिवार्य होते हैं. तनाव पुरुष को मानसिक व शारीरिक रूप से शिथिल कर देता है, जिससे उनमें इंफर्टिलिटी का ख़तरा बढ़ जाता है. वहीं आईवीएफ एक्सपर्ट शैली गुप्ता के अनुसार, तनाव से महिलाओं के मस्तिष्क, पिट्यूटरी ग्लैंड और ओवरीज़ के बीच कम्यूनिकेशन बिगड़ जाता है. तनाव के दौरान शरीर में कई तरह के
न्यूरोकेमिकल परिवर्तन होते हैं, जो महिलाओं को इंफर्टिलिटी का शिकार बनाते हैं.
5. धूम्रपान: स्मोकिंग से शरीर का रक्तसंचार धीमा पड़ जाता है. जहां एक ओर यह पुरुषों के शुक्राणुओं पर बुरा प्रभाव डालता है, वहीं
महिलाओं में गर्भपात, अण्डाणुओं को नुक़सान पहुंचाना, सर्वाइकल कैंसर व फैलोपियन ट्यूब से जुड़ी समस्याएं आदि पैदा करता है. इसलिए स्मोकिंग करना छोड़ दीजिए, जिससे शरीर में अच्छी तरह से ब्लड सर्कुलेट होना शुरू हो सके और आप इंफर्टिलिटी से बच सकें.
6. अल्कोहल: बेबी जॉय, दिल्ली के आईवीएफ एक्सपर्ट डॉ. जगजीत सिंह के अनुसार, यदि आप 60 मि.ली. से अधिक मात्रा में
अल्कोहल लेते हैं, तो आप इंफर्टिलिटी के शिकार हो सकते हैं. ज़्यादा शराब पीने से अक्सर लोगों को कई गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ता है, परंतु उन बीमारियों में से इंफर्टिलिटी की जानकारी बेहद कम लोगों को होती है. शराब के कारण शरीर में टेस्टोस्टेरॉन का स्तर कम होने लगता है, जिसके कारण पुरुषों में शुक्राणु उत्पादन की क्षमता कम हो जाती है. वहीं एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि हफ़्ते में 3-4 बार अल्कोहल का सेवन करनेवाली महिलाओं को कंसीव करने में सामान्य से कहीं अधिक समय लग जाता है.
7. बहुत ज़्यादा एक्सरसाइज़ या वर्कआउट: फिट व हेल्दी रहने के लिए एक्सरसाइज़ बेहद ज़रूरी है, पर जिस तरह अति किसी भी चीज़ की हानिकारक होती है, ठीक उसी तरह बहुत ज़्यादा एक्सरसाइज़ आपकी फर्टिलिटी को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है. रोज़ाना 1 घंटा और हफ़्ते में 7 घंटे से ज़्यादा एक्सरसाइज़ आपकी फर्टिलिटी के लिए ख़तरनाक हो सकती है. बहुत ज़्यादा एक्सरसाइज़ का ख़ामियाज़ा बहुत-से एथलीट्स को भुगतना पड़ता है, जो इंफर्टिलिटी की समस्या से जूझते हैं.
डॉ. जगजीत सिंह के अनुसार, जो पुरुष स्टेरॉयड का इस्तेमाल कर बॉडी बनाते हैं, उनके शुक्राणुओं पर उसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और परिणामस्वरूप उनके पिता बनने की संभावना न्यूनतम रह जाती है.
8. ओवरईटिंग या बहुत ज़्यादा जंक फूड का सेवन: ओवरईटिंग का सीधा असर मोटापे के रूप में दिखाई देता है, जो आपकी फर्टिलिटी के लिए बिल्कुल भी सही नहीं है. जंक फूड का सेवन शरीर में ब्लड शुगर की मात्रा बढ़ा देता है और यह समस्या का कारण इसलिए बन जाता है, क्योंकि इंसुलिन और फर्टिलिटी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.
9. अनसेफ सेक्स: अनसेफ सेक्स के कारण कई सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ (एसटीडी) होने की आशंका बढ़ जाती है. महिलाओं में इंफर्टिलिटी का एक कारण एसटीडी भी है. पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिसीज़ के कारण महिलाओं की फैलोपियन ट्यूब्स ब्लॉक हो जाती हैं, जो उनकी फर्टिलिटी में बाधक बनती हैं. अनसेफ सेक्स पुरुषों की फर्टिलिटी को भी प्रभावित करता है, पर जल्द लक्षण दिखने के कारण उनका इलाज जल्दी हो जाता है, जो महिलाओं के मामले में देरी से होता है.
10. बहुत ज़्यादा कैफीन का सेवन: चाय, कॉफी, चॉकलेट का सेवन इंफर्टिलिटी का कारण नहीं बनता, पर अगर आप इनके आदी हैं और इनके बिना आपकी ज़िंदगी रुक जाती है, तो आपको इस बारे में थोड़ा सोचना होगा. कुछ स्टडीज़ में यह बात सामने आई है कि अत्यधिक कैफीन का सेवन करनेवाली महिलाओं को अन्य महिलाओं के मुक़ाबले कंसीव करने में अधिक समय लगता है यानी अगर आप जल्दी ही मां बनना चाहती हैं, तो कैफीन का सेवन कम कर दें.
11. बॉडी फिट कपड़े पहनना: यदि आप बहुत ज़्यादा टाइट कपड़े पहनते हैं, तो इसके कारण आपको फर्टिलिटी से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. बॉडी फिट कपड़े ब्लड सर्कुलेशन में परेशानी उत्पन्न करते हैं, जिसका असर नसों पर काफ़ी गहरा पड़ता है और इस कारण इंफर्टिलिटी की समस्या बढ़ जाती है.
12. बॉडी हीट: बहुत ज़्यादा टाइट कपड़े पहनना, ज़्यादा व लगातार बाइक चलाना या फिर बहुत गर्म पानी से नहाना आदि टेस्टिकल्स का तापमान बढ़ाता है, जिससे स्पर्म काउंट भी घटता है और उनकी गुणवत्ता भी प्रभावित होती है. महिलाओं के शरीर में अत्यधिक गर्मी उनकी फर्टिलिटी को प्रभावित करती है.

 

पुरुषों में बढ़ती इंफर्टिलिटी
आंकड़ों के मुताबिक भारत के 9 करोड़ पुरुष इंफर्टिलिटी के शिकार हो चुके हैं. इस आंकड़े को बढ़ते देख मेडिकल कंपनियां इन्हें एक बड़े उभरते हुए बाज़ार के रूप में देख रही हैं. अनुमान के आधार पर विशेषज्ञ कहते हैं कि देश में बांझपन के इलाज के लिए उपयोग होनेवाली दवा का कुल कारोबार क़रीब 90 करोड़ से एक अरब तक का हो चला है. दवा का यह बाज़ार फल-फूल रहा है. इसके साथ ही इसके उपचार का कारोबार हर साल 20 से 30 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ रहा है.

– सुमन बाजपेयी

 

थायरॉइड को जड़ से ख़त्म करने के घरेलू उपाय (Tips for Treating Thyroid Problems Naturally)

कैसे रहें ऑफिस में स्ट्रेस फ्री? (how to keep yourself stress free in the office?)

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वर्कप्लेस पर स्ट्रेस न हो, ये तो संभव नहीं है, मगर आप थोड़ी कोशिश करके ख़ुद को स्ट्रेस फ्री ज़रूर रख सकते हैं. आज के दौर में जब तनाव कई बीमारियों को जन्म दे रहा है, इससे बचना बहुत ज़रूरी है. ऑफिस में स्ट्रेस फ्री रहने के लिए आज़माइए ये आसान तरी़के.

डेस्क पर रखें ग्रीन प्लांट
अपने डेस्क को साफ़-सुथरा रखने के साथ ही उस पर हरा पौधा लगा छोटा-सा गमला रखें. एक्सपर्ट्स के मुताबिक़, हरा पौधा देखने से आप अच्छा महसूस करते हैं और मन को शांति मिलती है. अब से जब भी ऑफिस में आपको किसी बात पर ग़ुुस्सा आए या फिर थकान महसूस हो, तो डेस्क पर रखे ग्रीन प्लांट को देखकर कुछ अच्छा सोचने की कोशिश करें. आप रिलैक्स महसूस करेंगे.

थोड़ी चहलक़दमी है ज़रूरी
यदि आपकी अपने सहकर्मी या बॉस से किसी बात पर अनबन हो गई है, तो ग़ुस्से को शांत करने के लिए अपनी चेयर से उठकर थोड़ी देर के लिए बाहर टहलें. इससे तनाव कम होगा. चलने से मांसपेशियां फैलती हैं और मन में सकारात्मक विचार आते हैं.

बॉडी को स्ट्रेच करें
लगातार कई घंटों तक बैठकर काम करते रहने से मांसपेशियां अकड़ जाती हैं. साथ ही फ्रस्ट्रेशन भी होता है. अतः काम के बीच-बीच में अपनी चेयर पर बैठकर या फिर खड़े होकर बॉडी को स्ट्रेच करें. साथ ही थोड़ा समय निकालकर कुछ आसान एक्सरसाइज़ भी कर लें ताकि मसल्स अकड़े नहीं.

ड्राईफ्रूट्स खाएं
ऑफिस में हल्की भूख लगने पर चिप्स, नमकीन खाने की बजाय ड्राईफ्रूट्स खाएं. काम के बीच-बीच में ड्राईफ्रूट्स खाने से तनाव कम होता है, साथ ही इससे मेंटल प्रेशर कम करने में भी मदद मिलती है और ग़ुस्सा जल्दी शांत हो जाता है.

मनपंसद लंच करें
काम का तनाव हो या किसी से अनबन हुई हो, मूड अच्छा करना चाहते हैं, तो उस दिन अपनी पसंद का खाना खाएं. इससे संतुष्टि मिलेगी और मूड भी अच्छा हो जाएगा. फिर आपका बाकी दिन स्ट्रेस फ्री रहेगा.

मेडिटेशन करें
ऑफिस के माहौल से यदि आपको ज़्यादा तनाव हो रहा हो, तो कुछ देर के लिए मेडिटेशन करें. 5 मिनट के लिए अपनी कुर्सी पर बैठकर आंखें बंद करके कुछ सकारात्मक सोचें. ऐसा करने से ग़ुस्सा और तनाव दूर हो जाएगा.

पसंदीदा म्यूज़िक सुनें
स्ट्रेस दूर करने का सबसे आसान तरीक़ा है म्यूज़िक. यदि ऑफिस में मनाही न हो, तो कुछ समय के लिए अपना पसंदीदा म्यूज़िक सुनें. इससे स्ट्रेस कम होता है और दिमाग़ की नसों को भी आराम पहुंचता है.

 – कंचन सिंह

बचें स्ट्रेस ईटिंग से (Tricks to Get Rid of Eating in Stress in Hindi)

बेहिसाब ख़्वाहिशें, रिश्तों की उलझन, सबसे आगे बढ़ने की ज़िद, सब कुछ जल्दी से जल्दी पा लेने की इच्छाएं… इन सबने तमाम सुविधाएं देने के साथ ही हमारी लाइफ को स्ट्रेसफुल भी बना दिया है. कुछ लोग स्ट्रेस दूर करने के लिए दूसरे तरीके अपनाते हैं, तो कई लोग स्ट्रेस से बचने के लिए खाने का सहारा लेते हैं, जिसे स्ट्रेस ईटिंग या इमोशनल ईटिंग कहते हैं.

Eating in Stress in Hindi

क्यों होता है ऐसा?
– प्राइमस सुपर स्पेशैलिटी हॉस्पिटल के जर्नल फिज़ीशियन डॉ. अनुराग सक्सेना के अनुसार, तनाव बढ़ने पर ऐडे्रनल ग्लैंड सक्रिय हो जाते हैं और ये कॉर्टिसोल नामक हार्मोन का स्राव करते हैं, जो भूख बढ़ाता है और खाने के लिए उकसाता है.
– जब स्ट्रेस वाली स्थिति ख़त्म हो जाती है, तो कॉर्टिसोल का लेवल गिर जाता है, पर अगर तनाव बना रहता है या इंसान तनाव से बाहर नहीं आता, तो कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ भी सकता है और तब लगातार कुछ खाते रहने की इच्छा होती है.
– तनाव के हार्मोन मुंह के स्वादवाली कोशिकाओं में छिपे होते हैं और तनाव की स्थिति में ये न स़िर्फ स्वाद को प्रभावित करते हैं, बल्कि मीठा खाने की इच्छा भी पैदा करते हैं.
– शोधकर्ताओं का मानना है कि जब मस्तिष्क तनाव में होता है, तो ग्लूकोकॉर्टिकोइड्स (जीसी) नामक हार्मोन्स सक्रिय हो जाते हैं. ये स्वाद की कोशिकाओं को प्रभावित करते हैं, जिससे मीठा खाने की तीव्र इच्छा होती है.
– अध्ययनों के अनुसार मीठा खाने की इच्छा और तनाव में संबंध है. यही वजह है कि कुछ लोग तनाव की स्थिति में अधिक मीठा खाते हैं.
– फिनलैंड में हुए एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि बहुत ज़्यादा काम के कारण थके हुए लोग भी स्ट्रेस ईटिंग के शिकार हो जाते हैं.
– शोध में सामने आया है कि इस तरह खाने वाले लोग अक्सर खाते ही जाते हैं. तनाव या भावनात्मक अस्थिरता के कारण इन्हें हमेशा भूख लगी होती है और ऐसे लोग खाना तब तक बंद नहीं करते, जब तक प्लेट में रखा खाना ख़त्म नहीं हो जाए.
– मनोवैज्ञानिक नीरा पारेख के अनुसार, काम हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है और करियर में आगे बढ़ने के लिए हम एक जुनून की हद तक काम करते हैं और इस वजह से तनावग्रस्त रहते हैं
– यही नहीं, आजकल संबंधों में बने रहनेवाले टकराव के कारण भी युगल निरंतर तनाव से घिरे रहते हैं. ऐसी स्थिति में खाना ही उनके जीवन का एकमात्र सुख बन जाता है.
– उदासी या भावनात्मक रूप से आहत होने पर उसका आउटलेट अगर सही तरह से नहीं मिलता, तो हम खाने के माध्यम से उसे बाहर निकालने की कोशिश करते हैं.
– स्ट्रेस ईटिंग उन लोगों में ज़्यादा होती है, जो जल्दी से जल्दी तनाव से बाहर आना चाहते हैं.
– तनाव के समय फैट्स और कार्बोहाइड्रेटयुक्त भोजन खाने की इच्छा होती है. इससे शरीर में सेरोटोनिन का स्तर तुरंत बढ़ जाता है, जिसका प्रभाव ठंडक देनेवाला होता है.
– इसके अलावा एंडोफिन हार्मोन का स्तर भी बढ़ता है, जिसे ङ्गफील-गुडफ हार्मोन कहा जाता है. चूंकि अच्छा महसूस होता है, इसलिए धीरे-धीरे व्यक्ति स्ट्रेस ईटिंग का आदी हो जाता है.

ज़रिया बनाते हैं नकारात्मक भावनाओं को नियंत्रित करने का
– यह जानना ज़रूरी है कि कौन-सी चीज़ें आपको इमोशनल ईटिंग के लिए उकसाती हैं?
– किन हालात, जगह अथवा भावनाओं के वशीभूत होकर हम खाने की ओर दौड़ते हैं.
– आमतौर पर नकारात्मक भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए ही हम भोजन को इलाज मानते हैं, वहीं कई बार ख़ुशी भी इसका कारण हो सकती है.
– लक्ष्य हासिल करने की ख़ुशी में आप ख़ुद को पार्टी देते हैं. भावनाएं चाहे सकारात्मक हों या नकारात्मक- उनमें बहते इंसान को देर नहीं लगती.
– तनाव, डर, अवसाद, ख़ुशी, बोर होना, उत्तेजना या अन्य कई भावनाओं को शांत करने के लिए भी हम भोजन का सहारा लेते हैं.
– कई बार सामाजिक दबाव में भी पेट भरा होने के बाद भी आप कुछ न कुछ खा लेते हैं. यह दबाव भी स्ट्रेस ईटिंग की उपज होता है.

क्या हानिकारक प्रभाव हो सकते हैं?
– स्ट्रेस ईटिंग से कुछ ख़तरनाक अंजाम भी हो सकते हैं. एक शोध में पाया गया कि तनाव के कारण ज़्यादा खानेवाली महिलाओं के शरीर में कैलोरी और फैट्स अधिक मात्रा में जमा हो जाता है.
– डायटीशियन मोना अग्रवाल के मुताबिक़, अधिक भोजन करने के कारण शरीर में वसा का प्रतिशत बढ़ सकता है और अपच व पेट की समस्या हो सकती है.
– महिलाओं में हार्मोन संबंधी असंतुलन भी पैदा हो सकता है, जिससे मासिक धर्म में अनियमितता आ सकती है.
– तनाव के दिनों में कुछ लोग अधिक खाना खाते हैं, तो कुछ बहुत कम भोजन करते हैं. इसकी वजह से लोगों में बाल गिरने, कैल्शियम की कमी, प्रतिरोधक क्षमता व चेहरे की चमक में कमी तथा एनीमिया की शिकायत हो जाती है.
– अत्यधिक खाने की वजह से वज़न बढ़ता है और इससे कई चिकित्सकीय जटिलताएं हो सकती हैं.
– डॉ. रमेश मलिक कहते हैं कि तनाव में भूख लगने पर हम पौष्टिक चीज़ें खाने की बजाय चिप्स, आइस्क्रीम, फ्रेंच फ्राईज़ जैसे जंक फूड खाते हैं. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि इन चीज़ों में शुगर लेवल ज़्यादा होता है, जो हमें अच्छा महसूस कराता है.
– धीरे-धीरे हाल यह हो जाता है कि हर बार तनाव कम करने के लिए हम इन्हीं चीज़ों को खाना पसंद करते हैं.
शांत रहने की कोशिश करें
– जज़्बाती होकर खाने से हमारी भावनात्मक समस्याओं का हल नहीं होता. आमतौर पर इससे परेशानी बढ़ती ही है. तनाव तो ज्यों का त्यों बना ही रहता है, साथ ही हम ओवरईटिंग करने के कारण भी ग्लानि से भर जाते हैं.
– स्ट्रेस ईटिंग से बचने के लिए ख़ुद को शांत करें. ख़ुद से पूछें कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं और आपको क्या चाहिए.
– कुछ मिनट आनेवाले कल की प्लानिंग में लगा दें. भले ही वह अगले महीने घर में होनेवाली शादी की तैयारियों के बारे में हो या दो दिन बाद आनेवाला आपके बेटे का जन्मदिन. इससे आप उस व़क्त की समस्या से कुछ देर के लिए बाहर आ जाएंगे और धीरे धीरे शांत
हो जाएंगे.
– तनाव कम करने के और भूख पहचानने के तरी़के सीखें. इससे आप अपनी भावनाओं को जानना भी सीखेंगे. एक शोध में सामने आया था कि ऐसा करनेवाली महिलाओं का फैट काफ़ी मात्रा में कम हुआ.

ख़ुद से प्यार करें
– यह बात ख़ासतौर से महिलाओं पर लागू होती है कि वे घर-परिवार, बच्चे, करियर इन सब में बिज़ी होने के कारण ख़ुद पर ध्यान देना ही भूल जाती हैं.
– यहां तक कि कई बार छोटी-छोटी ख़ुशियों को भी नज़रअंदाज़ कर देती हैं. धीरे-धीरे एक तरह की उदासीनता उन पर हावी होने लगती है और वही तनाव का रूप ले लेती है.
– दिल की बात किसी से शेयर न कर पाने के कारण, खाने की तरफ़ रुख कर लेती हैं और स्ट्रेस ईटिंग की शिकार हो जाती हैं.
– इससे बचने के लिए ज़रूरी है कि ख़ुद से प्यार करें और अपनी ज़रूरतों पर भी ध्यान दें और बिना किसी ग्लानि के ख़ुद के लिए समय निकालें.
– अपने लिए रोज़ाना 30 मिनट निकालें. इससे आप ख़ुद को रिचार्ज महसूस करेंगे. दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलें. थोड़े सामाजिक हो जाएं. सकारात्मक लोगों से मिलना आपका जीवन स्तर सुधारता है और आप तनाव जैसी नकारात्मक भावनाओं से दूर रहते हैं.

– सुमन बाजपेयी

पीठदर्द से राहत के लिए योग (Yoga for Backpain)

कमरदर्द (Yoga for Backpain) एक आम समस्या है, लेकिन अक्सर हम इसे नज़रअंदाज़ करते रहते हैं, नतीजतन तकलीफ़ दिन-ब-दिन बढ़ती ही जाती है. लेकिन नियमित योग से आप कमरदर्द से छुटकारा पा सकते हैं.

ताड़ासन

* सीधे खड़े हो जाएं. पैरों में ज़्यादा फासला न रखें.
* सांस लेते हुए धीरे-धीरे अपने हाथों को साइड से ऊपर उठाएं.
* धीरे-धीरे हथेली को, कलाई को, हाथों को, कंधे, सीने व पैरों को भी ऊपर की तरफ़ खींचें और अंत में पैरों के पंजों पर आ जाएं.
* सारा शरीर ऊपर की तरफ़ खिंचा हुआ लगे. कुछ क्षण इस स्थिति में रहें.
* धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में आ जाएं.
* यदि आंखें बंद करके करें, तो अधिक लाभ होगा.

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अन्य लाभः नियमित ये आसन करने से बच्चों की हाइट बढ़ती है. घुटनों और एंकल की हेल्थ के लिए भी फ़ायदेमंद.

बद्ध कोणासन

* दंडासन में बैठ जाएं. पीठ सीधी रखें और दोनों हाथ कूल्हे के पास ज़मीन पर.
* घुटने मोड़ें. दोनों पैरों के तलवों को नमस्ते की मुद्रा में लाएं.
* दोनों हाथों से पैरों के अंगूठों या पंजों को पकड़ें. इसी अवस्था में 1-2 मिनट तक रहें. घुटनों पर ज़्यादा दबाव न डालें.
* अगर सीधे बैठने में तकलीफ़ हो रही है, तो सपोर्ट के लिए कूल्हों के नीचे तकिया या चादर रख सकते हैं.
* आगे की ओर झुकें और फिर सीधे बैठ जाएं. पैरों को सीधा फैलाते हुए पूर्वावस्था में आ जाएं.

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अन्य लाभः हाई ब्लड प्रेशर, अस्थमा, हार्मोनल प्रॉब्लम और इंफर्टिलिटी में लाभदायक. प्रेग्नेंसी के आख़िरी महीनों तक ये आसन करने से डिलीवरी आसानी से हो जाती है.

 

जाथरा परिवर्तासन

* पीठ के बल लेट जाएं.
* दोनों हाथ कंधे के समानांतर रखें.
* सांस लेते हुए दोनों पैरों को ऊपर उठाएं. सांस छोड़ते हुए दोनों पैरों को धीरे-धीरे दाईं तरफ ले जाकर ज़मीन को टच करें.
* दोनों पैर आपस में मिले होेंं. सिर बाईं दिशा में हो.
* दाहिने हाथ से दोनों पैरों को पकड़ने की कोशिश करें. सांस सामान्य रहे. एक मिनट इस स्थिति में रहें. अब यही क्रिया दूसरी ओर से भी दोहराएं.
* अगर पैर उठाने में तकलीफ़ या असुविधा हो रही हो, तो घुटनों को मोड़कर यही क्रिया कर सकते हैं.

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अन्य लाभः पैरों, जोड़ों, पीठदर्द व डायबिटीज़ में लाभदायक.

 

सेतु बंधासन

* पीठ के बल लेट जाएं. दोनों हाथ साइड में हों. पैरों को मोड़कर एड़ियों को कूल्हे के पास रखें और
* धीरे-धीरे सांस लेते हुए कमर व कूल्हे को ऊपर उठाएं. जांघें और पंजे ज़मीन के समानांतर होने चाहिए.
* कुछ क्षण रुकिए. सांस सामान्य रहे. अब सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे वापस पहलेवाली स्थिति में आ जाएं.
* 3-7 बार या क्षमतानुसार करें.
* चाहें तो कमर और पीठ को उठाते समय कमर को हाथों से सपोर्ट दें.
* पेट की सभी बीमारियों, एंज़ाइटी, थकान, सिरदर्द, अनिद्रा में लाभदायक. गले को स्ट्रॉन्ग बनाता है.
* अत्यधिक कमरदर्द, गर्दन दर्द या घुटनों में दर्द हो तो ये आसन न करें.
* गर्भवती महिलाएं छह महीने तक यह आसन कर सकती हैं.

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उत्तान वक्रासन

* पीठ के बल लेट जाएं. दोनों घुटनों को मोड़ें. पंजे ज़मीन पर टिके हों. दोनों हथेलियों को चित्रानुसार सिर के नीचे रखें.
* सांस छोड़ें और घुटनों को बाईं तरफ़ व सिर को दाईं तरफ़ ले आएं.
* कंधे से ज़मीन पर दबाव डालें.
* 1 मिनट तक इसी अवस्था में रहें. पूर्वावस्था में आ जाएं.
* दूसरी तरफ़ से भी यही क्रिया दोहराएं.
* पेट में अत्यधिक दर्द हो, स्पाइन की प्रॉब्लम हो या लिवर में सूजन हो, तो ये आसन न करें. गर्भवती महिलाएं भी ये आसन न करें.

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अन्य लाभः पेट, पीठ, पैर को सुडौल बनाता है.

 

ये आसन भी हैं फ़ायदेमंद
कमरदर्द के लिए शशांकासन, मारिच्य आसन और शलभासन भी फ़ायदेमंद हैं.

राहुल द्रविड़, क्रिकेटर

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बेहद शांत मिज़ाज राहुल द्रविड़ अपनी फिटनेस को लेकर काफ़ी सतर्क रहते हैं. लाइट एक्सरसाइज़, योग और मेडिटेशन उनकी फिटनेस रूटीन में शामिल हैं. कॉन्संट्रेशन और फ्लेक्सिबिलिटी बनाए रखने के लिए राहुल द्रविड़ नियमित रूप से योग करते हैं.

अगर हों स्ट्रेस में
* जीवन के प्रति सकारात्मक सोच रखें. आपकी पॉज़िटिव सोच आपको सभी समस्याओं को देखने का सकारात्मक नज़रिया देती है.
* लाफ्टर थेरेपी अपनाएं. खुलकर हंसें और मुस्कुराएं. ये आपके तनाव, थकान व डिप्रेशन को तुरंत दूर कर देता है.
* सुबह-सुबह प्राणायाम आपके लिए बहुत हेल्दी साबित होगा. 15-20 मिनट जॉगिंग से शरीर और मन एकदम फ्रेश रहता है.
* रोज़ाना योग व प्राणायाम से शरीर में रक्तसंचार बेहतर होता है, जिससे तनाव व थकान दूर होती है.

स्ट्रेस फ्री रहने के लिए ट्राई करें ये आसन
सर्वांगासन, हलासन, शवासन, नाड़ीशोधन क्रिया और चंद्रभेदन प्राणायाम स्ट्रेस व थकान को दूर करने के लिए बेस्ट हैं.

मेडिटेशन इन 5 मिनट्स (Health Benefits of Meditation)

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भागदौड़ और तनाव से भरी ज़िंदगी में मस्तिष्क और मन को शांत बनाए रखना बेहद ज़रूरी है. इसका एक आसान और कारगर तरीक़ा है मेडिटेशन यानी ध्यान. कुछ लोगों को लगता है कि ध्यान करने के लिए किसी ट्रेनर की आवश्यकता होती है या इसमें काफ़ी समय लगता है, पर ऐसा कुछ भी नहीं है. कुछ बातों का ध्यान रखकर आप घर पर ही आसानी से 5 मिनट मेडिटेट करके ख़ुद को स्वस्थ रख सकते हैं.

Health Benefits of Meditation

टाइम सेट कर लें

ध्यान लगाने के लिए सबसे ज़रूरी है कि आप अपने मन को शांत बनाए रखें. मोबाइल में टाइमर सेट कर दें, जिससे आपको ध्यान लगाते समय ये चिंता न रहे कि कहीं आप लेट तो नहीं हो रहे. टाइमर आपका ध्यान भटकने नहीं देगा.

आराम से बैठ जाएं

– घर में किसी एकांत और हवादार जगह पर आराम से बैठ जाएं.
– मेडिटेशन के दौरान ढीले-ढाले आरामदायक कपड़े पहनें.
– शरीर को तनावमुक्त रखें.
– ज़रूरी नहीं कि आप ध्यान लगाने के लिए सुखासन में ही बैठें. अगर पालथी मारकर बैठना आपके लिए असुविधाजनक है, तो आप उस अवस्था में बैठें, जिसमें आप सहज महसूस कर रहे हों. मेडिटेशन तभी पूरी तरह प्रभावकारी होगा जब आप कंफर्टेबल होंगे.
– आप बेड, कुर्सी या ज़मीन पर चादर या कालीन बिछा कर भी मेडिटेट कर सकते हैं.

ब्रीदिंग पर ध्यान दें

– ध्यान लगाने के लिए ज़रूरी है कि आप अपना पूरा ध्यान अपनी सांसों पर केंद्रित करें.
– टाइमर स्टार्ट करें और आंखें बंद करके मेडिटेशन शुरू करें.
– आराम से सांस लें और छोड़ें. इस प्रक्रिया की ओर ध्यान लगाएं.
– ब्रीदिंग पैटर्न न बदलें और न ही कोई और हलचल करें. जैसे सांस लेते हैं, वैसे ही लेते रहें.
– अगर आप आराम से गहरी सांस ले सकते हैं, तो और भी बेहतर होगा. धीरे-धीरे गहरी सांस लें और छोड़ें.

ध्यान केंद्रित करें

– मेडिटेशन के व़क्त मस्तिष्क में कई ख़्याल आते हैं, जो इस प्रक्रिया में बाधक बनते हैं.
– इन ख़्यालों को आने से रोका नहीं जा सकता, लेकिन आपकी कोशिश यही होनी चाहिए कि आप उनसे अपना ध्यान हटाकर ब्रीदिंग पर लगाएं.
– हर एक सांस पर ध्यान दें. आपका पूरा ध्यान तब तक केवल सांस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया पर होना चाहिए, जब तक टाइमर का अलार्म समय समाप्ति की घोषणा न कर दे.

फ़ायदे

– रोज़ाना ध्यान लगाने से शारीरिक और मानसिक तौर पर फिट रहा जा सकता है.
– तनाव और थकान दूर होता है.
– मस्तिष्क शांत रहता है और शरीर को ऊर्जा मिलती है.
– काम में ध्यान लगता है और कार्यक्षमता भी बढ़ती है.
– भावनात्मक रूप से मज़बूत बनाता है.
– हाई ब्लडप्रेशर नियंत्रण में रहता है.
– सिरदर्द से आराम मिलता है.
– जिन्हें ग़ुस्सा अधिक आता है, उन्हें ग़ुस्से पर कंट्रोल रखने के लिए मेडिटेशन करना चाहिए.
– 2011 में हुए एक रिसर्च के मुताबिक़, गठिया से ग्रसित लोग अगर नियमित रूप से मेडिटेशन करते हैं, तो उन्हें आराम मिलता है.
– गर्भावस्था के दौरान अक्सर पांच में से एक महिला डिप्रेशन की शिकार होती है. इस समस्या से बचने के लिए मेडिटेशन एकमात्र आसान उपाय है.
– मेडिटेशन आत्मबल को बढ़ाता है, जो एक स्वस्थ जीवन के लिए ज़रूरी है.

अगर आपके पास व़क्त है, तो 20 मिनट तक ध्यान करें. 20 मिनट तक मेडिटेशन करने से 4 घंटे तक सोने जितनी ऊर्जा मिलती है.

सावधानियां

अगर आप किसी तरह की बीमारी से पीड़ित हों, तो ज़्यादा देर तक मेडिटेट न करें. आपके लिए मेडिटेशन का सही तरीक़ा कौन-सा है? ये जानने के लिए किसी प्रोफेशनल की मदद लें.