strict discipline

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कभी बच्चों को अनुशासित करने के लिए तो कभी उनकी ग़लतियां सुधारने के नाम पर अक्सर पैरेंट्स बच्चों से सख़्ती से पेश आते हैं, लेकिन उनकी इस सख़्ती का बच्चों के मन पर बुरा असर होता है और इसका ख़ामियाज़ा कहीं न कहीं बच्चों को जीवनभर भुगतना पड़ता है.

 

अधिकतर घरों में यह देखा गया है कि पैरेंट्स गाहे-बगाहे अपने बच्चों को डांटते या फिर मारते-पीटते रहते हैं. लेकिन इससे बच्चों का आत्मविश्‍वास व आत्मसम्मान काफ़ी आहत होता है. उनके मन में यह बात बैठ जाती है कि मम्मी-पापा उनसे प्यार नहीं करते हैं और जब वे उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाते तो वे एग्रेसिव व डिस्ट्रक्टिव हो जाते हैं. वे सोचते हैं कि उनके पैरेंट्स हर समय चिल्लाते रहते हैं, क्योंकि वे छोटी-छोटी बातों पर ज़रूरत से ज़्यादा उग्र हो जाते हैं और जब बच्चे पैरेंट्स के ग़ुस्से का जवाब ग़ुस्से से देते हैं, तो पैरेंट्स और एग्रेसिव हो जाते हैं.

कंफ्यूज़ होते बच्चे

यदि पति-पत्नी के संबंध हेल्दी नहीं हैं, तो इसका असर सबसे ज़्यादा बच्चों पर ही पड़ता है. झगड़े के दौरान जब पैरेंट्स एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं या एक-दूसरे को भला-बुरा कहते हैं, तो बच्चा यह निर्णय नहीं ले पाता कि वह किसे सही माने. एक समय जो बात उसे सही कही जाती है, वही बाद में ग़लत ठहरा दी जाती है. कंफ्यूज़न में बच्चा टेंशन में रहने लगता है और वह पैरेंट्स की रिस्पेक्ट करना भी छोड़ देता है. यही नहीं, बच्चा कुछ हद तक स्वार्थी भी हो जाता है.

उग्र होकर अनुशासन न थोपें

हर पैरेंट्स चाहते हैं कि उनका बच्चा अनुशासित जीवन जीए और इसके लिए वे बचपन से ही उसे ट्रेनिंग देना शुरू कर देते हैं. यह सही भी है, क्योंकि अनुशासित जीवन बिताने की आदत डालने में कई बार बरसों लग जाते हैं, इसलिए यह कोशिश बचपन से ही करनी ज़रूरी होती है. लेकिन उसके लिए बच्चे को डांटना-फटकारना, मारना या चिल्लाना उचित नहीं है. चाइल्ड सायकोलॉजिस्ट के अनुसार, बच्चा वैसा ही करता है, जैसा आप करते हैं. आप उस पर चिल्लाएंगे तो वह भी पलटकर चिल्लाएगा और धीरे-धीरे ये उसके व्यवहार का हिस्सा बन जाएगा. उसे लगेगा कि इस तरह का व्यवहार करना नॉर्मल है, क्योंकि जब वह पैरेंट्स को छोटी-सी बात पर ग़ुस्सा होते देखता है, तो वह सोचता है कि ऐसा ही करना सही है. ऐसे में जब तक आप यह समझ पाते हैं कि अनुशासित करने की चाह में आपका एग्रेसिव होना ग़लत है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और एक प्रॉब्लम चाइल्ड आपके सामने होता है.
बच्चों को डरा-धमकाकर, ग़ुस्से में या दबाव में अनुशासित करना एक ग़लत तरीक़ा है. अनुशासित करने का मतलब सही व्यवहार करने के लिए बच्चे को गाइड करना होता है. उग्रता यदि शारीरिक ढंग से सज़ा देने के रूप में हो, तो उसका प्रभाव पॉज़िटिव नहीं होता, बल्कि इससे बच्चे के अंदर विद्रोह की भावना पनपने लगती है. फिर यह विद्रोह अक्सर एक ज्वालामुखी की तरह फटता है. पैरेंट्स द्वारा अव्यावहारिक मापदंडों को अपनाकर बच्चों से ज़रूरत से ज़्यादा अपेक्षाएं रखना भी उनके अंदर उग्रता का समावेश कर देता है.

क्या करें पैरेंट्स?

सकारात्मक अनुशासन का इस्तेमाल करें. बच्चा इस बात को समझ ले कि उसके ग़लत व्यवहार को सहन नहीं किया जाएगा. इसके लिए उसकी ग़लतियों को उजागर किए बिना अपनी भावनाओं को बताएं. बिहेवियर पर फोकस करें, न कि उसकी पर्सनैलिटी पर. यह कहने की बजाय कि ‘तुम कितने क्रूर हो, जो अपनी बहन को मारते हो’ कहें कि ‘अच्छे व दयालु लोग मारते नहीं हैं.’
•इस बात को समझने की कोशिश करें कि आपका बच्चा ग़लत व्यवहार क्यों कर रहा है? हो सकता है इसकी वजह आपका एग्रेसिव बिहेवियर ही हो.
बच्चे को मारने-डांटने से आप उसके व्यवहार में बदलाव नहीं ला सकते हैं. इसके लिए आपको अपना उदाहरण पेश करना होगा, जिसमें ग़ुस्से की जगह प्यार हो.
• बच्चा यदि आपकी बात न सुने तो उसे कंट्रोल करने की कोशिश न करें. पहले ख़ुद को शांत करें और फिर उसे शांत करें, वरना आप उसे केवल ग़ुस्सा करना और छोटी-सी बात पर निगेटिव ढंग से रिएक्ट करना ही सिखाएंगे.
• बच्चे से इस तरह का व्यवहार करना ज़रूरी है, जिससे उसे यह एहसास हो कि उसकी भी उतनी ही अहमियत है जितनी कि बड़ों की. प्यार, सम्मान व उपेक्षित न होने की भावना के साथ बच्चा अधिक बेहतर ढंग से ख़ुद को कंट्रोल कर पाता है. उसे वही सम्मान दें जिसका वह हक़दार है, इससे उसके अंदर आप दूसरों के प्रति आदर भावना व अच्छे संस्कारों के बीज रोप पाएंगे.
• पैरेंट्स के लिए सबसे ज़रूरी है अपने बच्चे का विश्‍वास जीतना और वो स़िर्फ प्यार से ही जीता जा सकता है. आप उसके दोस्त बनकर उसका विश्‍वास जीत सकते हैं. उसकी दुनिया में प्रवेश करने से एक अटूट रिश्ता क़ायम हो जाता है, जो ज़िंदगीभर एक मज़बूत नींव की तरह उसके काम आता है. उसे यह यक़ीन दिलाएं कि उसकी मुसीबत, तकलीफ़ व परेशानियों में आप हमेशा उसके साथ हैं.
• पैरेंट्स का बिहेवियर बच्चे के प्रति हमेशा उदार व खुले विचारोंवाला होना चाहिए. उसकी बात को समझनेवाला होना चाहिए. बच्चा जो भी कह रहा हो, उसे महत्व देते हुए उसकी भावनाओं को समझें. बीच में न तो टोकें, न ही एग्रेसिव होकर उसे चुप करा दें. बच्चा जो भी कह रहा है, उसकी उपेक्षा न करें. उसे कभी ऐसा न लगे कि उसके विचार या अभिव्यक्ति में आपकी दिलचस्पी नहीं है.

मनोवैज्ञानिक साधना प्रकाश के अनुसार, जहां पैरेंट्स अधिक एग्रेसिव स्वभाव के होते हैं, वहां बच्चा अपनी एक अलग दुनिया बना लेता है. उस दुनिया में वह आसपास की चीज़ों से ख़ुद को इतना काट लेता है कि केवल अपने बारे में सोचने के कारण वह स्वार्थी हो जाता है. वह अपनेपन व रिश्तों की क़द्र करना नहीं सीख पाता, जिससे बड़े होकर हर स्तर पर उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. पैरेंट्स के एग्रेेसिव बिहेवियर का सबसे बुरा प्रभाव बच्चे पर यह पड़ता है कि वह किसी पर भी विश्‍वास करना नहीं सीख पाता है. जब वह अपने पैरेंट्स से ही अपने मन की बात शेयर नहीं कर पाता, तो किसी बाहरी व्यक्ति के साथ कैसे कर सकता है? इसलिए हर पैरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चों के दोस्त बनें, न कि तानाशाह.

– सुमन बाजपेयी