Struggle story

एंटरटेनमेंट और कंट्रोवर्सी क्वीन राखी सावंत ने सोशल मीडिया पर अपने बचपन की तस्वीरें शेयर कीं जिनमें वो लग रही हैं बड़ी क्यूट. इन तस्वीरों के ज़रिए उन्होंने अपनी स्ट्रगल स्टोरी भी बयां की. राखी ने तस्वीरें शेयर करके लिखा कि बचपन से लेकर अब तक का सफ़र, मैं बेहद खुश हूं. मैंने ज़िंदगी में बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं तो कृपया मेरे बचपन की तस्वीरों पर ज़रूर कमेंट करें.

Rakhi Sawant
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फैंस भी इन तस्वीरों पर जमकर कमेंट कर रहे हैं और राखी पर बेशुमार प्यार बरसा रहे हैं. राखी ने अपने संघर्ष के बारे में एक इंटरव्यू में बताया था कि वो बेहद गरीब परिवार से थीं, जहां महिलाओं पर काफ़ी पाबंदी भी हुआ करती थी. वो चाल में रहा करती थीं और परिवार की हालत इतनी ख़राब थी कि वो देहाड़ी पर काम करने को मजबूर थीं. उन्हें रोज़ के 50 रुपए मिला करते थे. यहां तक कि बिग बॉस में भी उन्होंने बताया था कि टीना अंबानी की शादी में भी उन्होंने खाना परोसने का काम किया था जिसके बदले उन्होंने 50 रुपए कमाए थे.

Rakhi Sawant
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राखी ने ये भी बताया था कि उनको भर पेट खाना तक नसीब नहीं होता था और वो पड़ोसियों का जूठा खाना खाने को मजबूर थीं. उनके द्वारा बचा हुआ खाना जब फेंक दिया जाता था तब वो उसे उठाके खाती थीं.

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कम लोग ही जानते हैं कि राखी का असली नाम नीरू भेदा है, राखी सावंत नाम उन्होंने इंडस्ट्री के लिए रखा था. आज राखी एक बड़ा नाम है और उन्होंने अपना मुक़ाम खुद बनाया. वो बेहद अच्छी डान्सर हैं और उनके काम को लोग सराहते हैं.

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राखी बिग बॉस 14 में वापस नज़र आई थीं क्योंकि उन्हें पैसों की ज़रूरत है, उन्होंने काम करना बंद कर दिया था पर अब वो वापस काम करना चाहती हैं और उनकी मां कैन्सर से जूझ रही हैं, उनके इलाज के लिए भी उन्हें पैसों की ज़रूरत है.

Photo Courtesy: Instagram (All Photos)

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सूफी गायिकी के उस्ताद कैलाश खेर आज सफल गायक हैं. उनकी गायकी के दीवाने देश ही नहीं पूरी दुनिया में हैं, लेकिन कैलाश के लिए मेरठ से बॉलीवुड तक का सफर तय करना इतना आसान नहीं था. यहां तक कि उनके जीवन में एक दौर ऐसा भी आया कि उन्होंने सुसाइड तक करने की कोशिश की थी. उन्होंने ऐसा क्यों किया था, कितनी संघर्षपूर्ण रही उनकी ये सक्सेस जर्नी, आइए जानते हैं.

Kailash Kher

कैलाश खेर का जन्म कश्मीरी पंडित परिवार में मेरठ (उत्तर-प्रदेश) में हुआ था. कैलाश के घर में शुरू से ही संगीत का माहौल रहा. उनके पिता पारंपरिक लोक गायक थे. कैलाश को बचपन से ही गाने का शौक था. महज 12 वर्ष की उम्र से उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी. वे पाकिस्तानी सूफी गायक नुसरत फतेह अली खान से बहुत पर प्रभावित थे और संगीत के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए उन्हें प्रेरणा भी उन्हीं से मिली. लेकिन आज जिस मुकाम पर कैलाश खेर हैं, वहां तक पहुंचने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा है.
 
महज 13 साल की उम्र में वो संगीत की तलाश में घर छोड़कर निकल पड़े थे. 

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कैलाश खेर को शुरू से ही संगीत में दिलचस्पी थी. कैलाश को लगता था कि जो हुनर उनके अंदर है, उसे निखारने के लिए उन्हें किसी गुरू की जरूरत है. वे घर से तो निकल पड़े थे, पर घर छोड़ने के बाद कैलाश को जिंदगी काटने के लिए पैसों की तो ज़रूरत थी ही. इसलिए कैलाश ने संगीत की शिक्षा देनी शुरू कर दी. उन्हें हर क्लास के 150 रुपये मिलते थे. बस उनका जीवन कटने लगा. उन्हें मिलता था. इस पैसे से कैलाश अपना खर्च चलाने लगे. पर कुछ दिनों बाद उन्हें लगने लगा कि सिर्फ इतने से पूरा जीवन नहीं कटेगा. कुछ और सोचना पड़ेगा.

फैमिली लाइफ, 9 साल के बेटे के पिता हैं कैलाश खेर

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कैलाश खेर ने 11 साल पहले 14 फरवरी, 2009 को मुंबई बेस्ड स्टूडेंट शीतल भान से शादी की थी. शादी के दो साल बाद कैलाश दिसंबर, 2011 में बेटे कबीर के पिता बने. वैसे, कैलाश खेर की वाइफ शीतल बेहद खूबसूरत हैं और पेशे से लेखिका हैं. वो कद में भी कैलाश खेर से लंबी हैं. कैलाश खेर जहां 5 फीट 2 इंच के हैं, वहीं उनकी पत्नी की हाइट करीब साढ़े 5 फीट है. 

जब डिप्रेशन की वजह से सुसाइड करने की कोशिश की

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प्लेबैक सिंगिंग से लेकर अपने म्यूजिक कॉन्सर्ट में कैलाश खेर ने काफी शोहरत कमाई है, लेकिन उन्हें यहां तक पहुंचने के लिए काफी संघर्ष भी करना पड़ा है. उनकी जिंदगी में एक दौर ऐसा भी था कि वो डिप्रेशन में आ गए थे और उन्होंने आत्महत्या करने की कोशिश तक की थी. दरअसल घर छोड़ने के बाद कैलाश ऋषिकेश आकर बस गए और गंगा तट पर साधु संतों के साथ मिलकर भजन मंडली में हिस्सा लेने लगे थे.  इस दौरान उन्होंने इस दौरान वो ज्योतिष और कर्मकांड सीखने तक की कोशिश की. यहां भी मन नहीं लगा
तो खुद का बिजनेस शुरू किया. 1999 में उन्होंने अपने एक फैमिली फ्रेंड के साथ हैंडिक्राफ्ट का बिजनेस शुरू किया. कुछ समय तो ये काम ठीक चला, लेकिन फिर कैलाश को इस काम में भारी नुकसान हुआ. बिजनेस में नुकसान होने से कैलाश डिप्रेशन में चले गए और उन्होंने अपनी जिंदगी को खत्म करने का फैसला कर लिया. उन्होंने एक दिन नदी में छलांग तक लगा दी, लेकिन उनके दोस्तों ने उन्हें डूबने से बचा लिया. इस तरह सुसाइड की कोशिश में वो कामयाब नहीं हो पाए. 

सपनों के शहर जाने के बाद संयोग से गायक बन गए

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इतना सब करने के बाद कैलाश खेर को लग रहा था कि वो एक सफल गायक बन सकते हैं. साल 2001 में दिल्ली से निकल कर वो मुंबई पहुंच गए. पैसे तो थे नहीं तो पैसों के अभाव के चलते वो सस्ते से चॉल में रहते थे. काम की तलाश में जगह-जगह भटकते रहते थे. उनकी हालत इतनी खराब थी कि स्टूडियो जाने तक के लिए उनके पास पैसे नहीं होते थे. उनके पास पहनने के लिए एक सही चप्पल भी नहीं थी. वह एक टूटी चप्पल ले 24 घंटे स्टूडियो के चक्कर लगाते रहते, ताकि कोई उनकी आवाज को सुन उनको गाने का मौका दे दे. फिर उनकी मुलाकात हुई डायरेक्टर राम सम्पत से, जिसने उनकी ज़िंदगी बदल दी. राम संपत ने कैलाश को एड जिंगल्स गाने का मौका दिया. कैलाश ने पेप्सी से लेकर कोका कोला जैसे बड़े ब्रान्ड्स के लिए जिंगल्स गाए.


अल्लाह के बंदे’ गाने से मिली पहचान

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मुंबई में कई सालों तक स्ट्रगल करने के बाद कैलाश को फिल्म ‘अंदाज’ से ब्रेक मिला. इस फिल्म में कैलाश ने ‘रब्बा इश्क ना होवे’ में अपनी आवाज दी, जिसे लोगों ने पसन्द किया, लेकिन उन्हें पहचान मिली ‘अल्लाह के बंदे’ गाने से. इसके बाद वो इतने हिट हो गए कि कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. कैलाश 18 से अधिक भाषाओं में गाने गा चुके हैं. बॉलीवुड में ही उन्होंने 500 से ज्यादा गाने गाए और दर्जनों अवार्ड जीत चुके हैं. ‘तेरी दीवानी’, ‘ओ सिकंदर’ उनके पॉपुलर गाने में से एक हैं.

पद्मश्री’ सम्मान
कैलाश खेर को साल 2017 में ‘पद्मश्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. फिल्मफेयर बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर का अवॉर्ड भी कैलाश खेर अपने नाम कर चुके हैं. 

नवाज़ुद्दीन सिद्दिकी (Nawazuddin Siddiqui) बॉलीवुड के एक ऐसे अभिनेता हैंं, जो किसी भी किरदार में बेहद आसानी से ढल जाते हैं. अपनी बेमिसाल एक्टिंग के दम पर ही नवाज़ुद्दीन ने बॉलीवुड इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. आज वो अपना 45वां जन्मदिन मना रहे हैं. मुज़फ्फरनगर के एक छोटे से गांव बुढ़ाना में 19 मई 1974 को जन्में नवाज़ुद्दीन ने 19 साल पहले आमिर खान की फिल्म ‘सरफरोश’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी, लेकिन उन्हें पहचान मिली अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से. चलिए उनके जन्मदिन के इस ख़ास मौके पर जानते हैं एक चौकीदार से दमदार कलाकार बनने तक का दिलचस्प सफर….

नवाज़ुद्दीन के पिता एक किसान थे और वो कुल आठ भाई-बहन थे, जिसके चलते परिवार का खर्च उठाना उनके पिता के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था. लिहाजा ख़राब आर्थिक स्थिति के चलते नवाज़ ने छोटी सी उम्र से ही नौकरी करना शुरू कर दिया. साइंस में ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद वो दिल्ली आ गए, जहां दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए उन्होंने चौकीदारी की नौकरी भी की.

बताया जाता है कि नवाज के गांव में एक भी थिएटर नहीं था इसलिए उन्हें फिल्म देखने के लिए 45 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था. आपको जानकर हैरानी होगी कि फिल्मों में आने से पहले उन्होंने सिर्फ़ 5 फिल्में ही देखी है. हालांकि उन्हें एक्टिंग का शौक तो था लेकिन गरीबी उनके सपनों के बीच दीवार बनकर खड़ी थी, लेकिन वो रोज़ाना शीशे के सामने खड़े होकर एक्टिंग की रिहर्सल करते थे. इतना ही नहीं दिल्ली में चौकीदारी की नौकरी करने के साथ-साथ उन्होंने वहां थिएटर में दाखिल भी ले लिया था.

आख़िरकार वो दिन आ ही गया जब नवाज़ुद्दीन को पहली बार पेप्सी के कैंपेन विज्ञापन में काम करने का मौका मिला. इसके लिए उन्हें 500 रुपए फीस के तौर पर दिए गए थे, लेकिन फिल्मों में अपनी पहचान बनाने के लिए उन्हें 12 साल तक कड़ी मेहनत करनी पड़ी. उन्हें पहली बार आमिर की फिल्म ‘सरफरोश’ में एक छोटा सा किरदार निभाने का मौका मिला, लेकिन ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में फैज़ल का किरदार निभाकर नवाज़ुद्दीन ने ख़ूब नाम कमाया. इस फिल्म के बाद से नवाज़ के पास फिल्मों की झड़ी लगने लगी और वो एक चौकीदार से दमदार कलाकार बन गए. अब बॉलीवुड का यह दमदार कलाकार एक फिल्म के लिए 6 करोड़ रुपए बतौर फीस लेते हैं.

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