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डिप्रेशन को ऐसे करें मैनेज (Self Help: Tips For Managing Depression)

Tips For Managing Depression
डिप्रेशन को ऐसे करें मैनेज (Self Help: Tips For Managing Depression)

डिप्रेशन ऐसी नकारात्मक भावना, जहां आपकी सारी ऊर्जा लगभग ख़त्म हो जाती है, उम्मीदें, आशाएं, ख़ुशियां… सब कुछ धूमिल-सी नज़र आती हैं. ज़िंदगी बेकार लगने लगती है… ऐसा महसूस होता है जैसे इन परिस्थितियों से निकलना अब नामुमकिन है, ज़िंदा रहना मुश्किल लगने लगता है. ऐसे में बहुत ज़रूरी हो जाता है कि आप ख़ुद कुछ प्रयास करें, ताकि अपने इस डिप्रेशन को मैनेज कर सकें और पॉज़िटिव सोच अपना सकें.

बाहर जाएं, कनेक्टेड रहें: यह सच है कि डिप्रेशन के दौरान बाहर जाना और लोगों से मिलना-जुलना बेहद मुश्किल काम है, क्योंकि आपमें वो ऊर्जा नहीं रहती, लेकिन थोड़ा-सा प्रयास आपकी मदद कर सकता है. सोशल गैदरिंग्स में जाएं, दोस्तों से मिलें, रिश्तेदारों से कनेक्टेड रहें. अकेलापन आपकी तकलीफ़ और बढ़ाएगा. बेहतर होगा, नए दोस्त बनाएं और पुरानों से मिलना-जुलना शुरू करें. आपके क़रीबी हमेशा आपकी मदद करने को तत्पर रहेंगे, इसलिए अपनी तकलीफ़ उनसे शेयर करें, इससे आपका मूड बदलेगा और मन हल्का होगा.

किस तरह से कनेक्ट करें?

  • जिनके साथ आप सुरक्षित महसूस करते हों और जिन पर विश्‍वास करते हों, उनसे मिलें.
  • मिलने का अर्थ है आमने-सामने मिलना. यह सही है कि सोशल नेटवर्किंग और फोन कॉल्स से भी कनेक्ट किया जा सकता है, लेकिन फ़ायदा अधिक तभी होगा, जब फेस टु फेस मिलेंगे.
  • दूसरों की सहायता करने का मन बनाएं. दूसरों के लिए कुछ करेंगे, तो आपको कहीं न कहीं संतुष्टि महसूस होगी. मदद चाहे छोटी ही क्यों न हो, किसी के काम आने की भावना आपको पॉज़िटिव बनाएगी.
  • पेट्स रखें और उसके साथ समय बिताएं. यह काफ़ी कारगर तरीक़ा है डिप्रेशन से निपटने का. जानवरों से प्यार करते हैं, तो उनकी केयर करें, इससे आप बेहतर महसूस करेंगे.
  • एक्सरसाइज़, वर्कआउट, योग व मेडिटेशन करें. यह काफ़ी अच्छा उपाय है. इससे आप ऊर्जा व नई शक्ति महसूस करेंगे. मेडिटेशन व योग से मन शांत होगा और नकारात्मक भाव बाहर निकलेंगे.
  • एक्सपर्ट की मदद लें. हिचकिचाएं नहीं. आप सच में अच्छा महसूस करेंगे. ज़िंदगी को देखने का नज़रिया बदलेगा और डिप्रेशन से बाहर आने में मदद मिलेगी.

कनेक्शन के बेस्ट टिप्स

  • किसी क़रीबी या भरोसेमंद से अपनी तकलीफ़ व दुख का कारण शेयर करें.
  • किसी दोस्त के साथ कॉफी या टी डेट पर जाएं.
  • मूवी या डिनर प्लान करें.
  • किसी पुराने दोस्त को कॉल करें.
  • कोई हॉबी क्लास जॉइन कर लें.

अच्छा महसूस करानेवाली गतिविधियां करें: जिन बातों से, जिन गतिविधियों से आप रिलैक्स्ड और ऊर्जावान महसूस करते हों, उन पर ध्यान दें. हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं. शेड्यूल बनाएं और दिनभर में फन एक्टिविटीज़ के लिए टाइम फिक्स करें.

कैसे करें?

  • जो चीज़ें आपको पहले मज़ेदार लगती थीं, उन्हें फिर करना शुरू करें.
  • यह सच है कि आपका मन नहीं करेगा, ये तमाम चीज़ें करने का, लेकिन ख़ुद को फोर्स करें, क्योंकि एक बार आप इस तरह की फन एक्टिविटीज़ में ख़ुद को व्यस्त कर लेंगे, तो आपको विश्‍वास ही नहीं होगा कि कितना बेहतर महसूस करेंगे.
  • हो सकता है कि एक बार में आप डिप्रेशन से बहुत ज़्यादा बाहर न आ पाएं, लेकिन धीरे-धीरे आप ख़ुद को अधिक सकारात्मक व ऊर्जावान महसूस करने लगेंगे.
  • आप कोई स्पोर्ट्स एक्टिविटी या स्विमिंग, डांस व साइकिलिंग जैसे शौक अपना सकते हैं.

अपनी हेल्थ को ज़रूर सपोर्ट करें

  • डिप्रेशन सबसे पहले आपकी नींद पर असर डालता है. या तो आप बहुत कम या बहुत अधिक सोने लगते हैं. अच्छी नींद लेने की कोशिश करें. हेल्दी स्लीप टेक्नीक्स के बारे में जानें और नींद पूरी लें. इससे आपको रेस्ट मिलेगा और आप फ्रेश फील करेंगे.
  • स्ट्रेस को बढ़ने न दें, क्योंकि स्ट्रेस से डिप्रेशन और बढ़ सकता है. उन तमाम तत्वों पर ध्यान दें, जो स्ट्रेस बढ़ाते हैं, जैसे- काम का प्रेशर, आर्थिक समस्या, ख़राब रिलेशनशिप… बेहतर होगा इन सबसे निपटने के तरीक़ों पर ध्यान दें. एक्सपर्ट की सहायता भी ले सकते हैं.
  • रिलैक्सेशन तकनीकों को अपनाएं. ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ करें, ध्यान करें, म्यूज़िक सुनें, मसल रिलैक्सेशन तकनीक सीखें.

वेलनेस टूलबॉक्स

  • अपने बारे में सकारात्मक बातें लिखें.
  • लिस्ट बना लें कि आपको अपनी कौन-सी बातें और आदतें सबसे ज़्यादा पसंद हैं.
  • कोई फनी मूवी या टीवी सीरीज़ देखें.
  • म्यूज़िक सुनें.
  • नेचर में समय बिताएं. समंदर के किनारे या किसी पार्क में सुबह-शाम जाएं.
  • हॉट बाथ लें. जल्दबाज़ी न करके आराम से गर्म पानी से नहाएं, इससे शरीर हल्का लगेगा.
  • ख़ुद को किसी न किसी काम में बिज़ी रखें. हेल्दी डायट लें. मनपसंद डिश बनाएं.

एक्टिव रहने की कोशिश करें: एक्सरसाइज़ डिप्रेशन से लड़ने का सबसे बेहतर तरीक़ा है. शोध कहते हैं कि एक्सरसाइज़ डिप्रेशन से लड़ने में उतनी ही कारगर है, जितनी दवा. इसके अलावा एक्सरसाइज़ से डिप्रेशन के दोबारा होने की संभावना भी कम हो जाती है.

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एक्सरसाइज़ से मूड को बूस्ट कैसे करें?

  • यह सच है कि डिप्रेशन के चलते एक्सरसाइज़ का मन बनाना बेहद मुश्किल है, लेकिन एक बार आप इच्छाशक्ति दिखा देंगे, तो यह बेहद फ़ायदा पहुंचाएगी.
  • रिसर्च बताते हैं कि डिप्रेशन से जूझ रहे व्यक्ति को एक्सरसाइज़ से ऊर्जा मिलती है और हताशा कम होती है.
  • रिदमवाली एक्सरसाइज़ अधिक फ़ायदेमंद होती है, जैसे- वॉकिंग, वेट ट्रेनिंग, स्विमिंग या डान्सिंग.
  • किसी क्लब के मेंबर बनकर अन्य लोगों के साथ एक्सरसाइज़ करना और बेहतर परिणाम देगा.
  • घर में अगर पेट्स हैं, तो उनके साथ ईवनिंग वॉक पर जाएं.

हेल्दी खाएं, डिप्रेशन से लड़नेवाली डायट फॉलो करें: जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन… ये कहावत यूं ही नहीं बनी है. हम जो खाते हैं, उसका सीधा असर हमारे शरीर व मन पर पड़ता है. फैटी, ऑयली, कैफीन या अल्कोहल जैसी चीज़ों का सेवन कम करें, क्योंकि ये आपके हार्मोंस पर असर करते हैं और मूड पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं.

कैसी हो आपकी डायट?

  • शुगर और रिफाइंड कार्ब्स का सेवन कम कर दें. फ्रेंच फ्राइज़, पास्ता, एरिएटेड ड्रिंक्स कुछ समय के लिए ही बेहतर महसूस करवाते हैं. आगे चलकर ये आपके मूड को प्रभावित कर सकते हैं.
  • दिन में 3-4 बार थोड़ा-थोड़ा खाएं. खाने में बहुत ज़्यादा अंतर रखेंगे, तो चिड़चिड़ापन बढ़ेगा.
  • विटामिन बी ज़रूर लें, क्योंकि फॉलिक एसिड और विटामिन बी 12 की कमी से डिप्रेशन बढ़ता है. हरी पत्तेदार सब्ज़ियां, अंडा, बींस, सिट्रस फ्रूट्स अधिक लें.
  • ओमेगा 3 फैटी एसिडयुक्त भोजन लें. मूड को संतुलित रखने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. फैटी फिश और ठंडे पानी की मछलियों के तेल का सेवन करें.

ज़रूरी है सनलाइट का डेली डोज़: सनलाइट सेरोटोनिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाकर मूड बेहतर करने में मददगार है. जब भी मौक़ा मिले, रोज़ाना 15 मिनट की धूप ज़रूर लें.

कब और कैसे लें यह डेली डोज़?

  • आप लंच टाइम में बाहर जा सकते हैं, कुछ देर टहलें.
  • आसपास कोई गार्डन वगैरह हो, तो वहां जा सकते हैं.
  • अपने घर पर और वर्कप्लेस में जितना संभव हो, नेचुरल लाइट में रहने की कोशिश करें.
  • छुट्टी के दिन सुबह-सुबह की धूप लेने के लिए छत का इस्तेमाल कर सकते हैं या फिर रोज़ाना वॉक के लिए भी जा सकते हैं.

विंटर ब्लूज़ से कैसे निपटें?

  • सर्दियों के मौसम में सनलाइट वैसे भी कम होती है और इस मौसम में डिप्रेशन अधिक महसूस होता है, जिसे सीज़नल इफेक्टिव डिसऑर्डर कहते हैं. लेकिन यदि आप प्रयास करें, तो सालभर आपका मूड बेहतर बना रह सकता है.

नकारात्मक सोच को चुनौती दें: ज़िंदगी से ऊब महसूस होना, कमज़ोरी-थकान लगना, निराशा महसूस होना… इस तरह के नकारात्मक भाव डिप्रेशन के चलते आते हैं. आपको यह बात मन में बैठा लेनी होगी कि ये तमाम नकारात्मक विचार असल में हैं ही नहीं. आपको अपने माइंड को पॉज़िटिव सोचने के लिए प्रशिक्षित करना होगा. हालांकि यह मुश्किल है, लेकिन लगातार प्रयास से यह संभव हो सकता है.

इस तरह के विचारों से रहें दूर

बहुत कुछ या कुछ भी नहीं सोचना: ब्लैक एंड व्हाइट में चीज़ों को न देखें. ये सही है और ये ग़लत… ऐसा नहीं होता. बीच का रास्ता भी होता है.

बुरे अनुभव को मन में बैठा लेना: एक जगह अगर असफलता हाथ लगी हो, तो इसका यह मतलब नहीं कि हर बार और हर जगह ही असफलता मिलेगी. अपने बुरे अनुभवों को मन में बैठा न लें.

पॉज़िटिव बातों को भूलकर स़िर्फ निगेटिव ही याद रखना: आपके साथ बहुत कुछ अच्छा होता है, लेकिन आप उसे अधिक समय तक याद नहीं रखते, लेकिन कोई एक बात ग़लत हो, तो उसे बार-बार याद करते हैं. इस सोच से बाहर निकलें. अच्छा-बुरा सभी के साथ होता है और दोनों को ही समान रूप से लें और जब मन निराश हो, तो पॉज़िटिव बातों को याद करें.

पॉज़िटिव बातों को कम आंकना: कुछ अच्छा हो, तो उसके बारे में भी यह सोचना कि ये तो सामान्य-सी बात है, इसमें कुछ ख़ास क्या है… इस तरह के विचारों से दूर रहें और हर छोटी-छोटी बात में ख़ुशियां ढूंढ़ें.

फ़ौरन निष्कर्ष पर पहुंच जाना: प्रयास करने से पहले ही यह सोच लेना कि परिणाम ग़लत ही होगा या हमें असफलता ही मिलेगी… ग़लत व नकारात्मक पहलू है. इससे दूर रहें.

अपने बारे में इमोशनली निगेटिव सोचना: ‘मैं ज़िंदगी में कुछ नहीं कर सकता’ या ‘मेरे साथ कभी भी कुछ अच्छा नहीं हो सकता’… इस तरह की बातों से अपने बारे में निगेटिविटी न बढ़ाएं. हम जो सोचते हैं हम वही बन जाते हैं, इसलिए अपनी सोच को पॉज़िटिव बनाएं.

बहुत अधिक नियमों में ख़ुद को बांध लेना: अपने लिए बहुत स्ट्रिक्ट रूल्स बना लेना, जिससे आप ज़िंदगी जीना ही भूल जाएं, आपको नकारात्मकता की ओर ले जाएंगे. फ्लेक्सिबल बनें.

कब लें एक्सपर्ट एडवाइस?

जब तमाम सेल्फ हेल्प टेक्नीक्स के बाद भी आपको लग रहा हो कि आपका डिप्रेशन ठीक नहीं हो रहा, तब आपको एक्सपर्ट के पास जाने से हिचकिचाना नहीं चाहिए. आपको अपनी मदद ख़ुद ही करनी होगी. ये न सोचें कि एक्सपर्ट के पास जाना किसी कमज़ोरी की निशानी है. अगर शरीर में तकलीफ़ हो, तो आप डॉक्टर के पास जाते ही हैं, तो मन की तकलीफ़ के लिए क्यों नहीं जाना चाहते?

हां, एक बात का ध्यान रहे कि प्रोफेशनल हेल्प के बाद भी ये सेल्फ हेल्प टेक्नीक्स फॉलो करते रहें और यह बात भी मन में बैठा लें कि डिप्रेशन ठीक हो सकता है और आप इससे निकलकर बेहतर व हैप्पी लाइफ जी सकते हैं.

– गीता शर्मा

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पैरेंटिंग स्टाइल से जानें बच्चों की पर्सनैलिटी (Effects of Parenting Style on child’s personality)

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पैरेंट्स बच्चों के रोल मॉडल होते हैं, इसलिए जैसा व्यवहार वे बच्चों के साथ करते हैं, बड़े होकर बच्चे भी वैसे ही बनते हैं और यहीं से उनके व्यक्तित्व की नींव भी तैयार होती है. लेकिन आज समय के साथ-साथ स्थितियां भी बदलने लगी हैं. पैरेंट्स और बच्चों के व्यवहार में भी परिवर्तन आने लगा है. आइए जानें, कुछ ऐसे ही पैरेंटिंग स्टाइल और बच्चों के स्वभाव पर पड़ने वाले उसके प्रभाव के बारे में.

 

पैरेंट्स का व्यवहार: ज़रूरत से ज़्यादा केयरिंग.
बच्चे बनेंगे: चिपकू.

 

    कैसी बनेंगी स्थितियां?

ऐसे पैरेंट्स जो अपने बच्चों को ओवर प्रोटेक्ट करते हैं या उनकी ज़रूरत से ज़्यादा केयर करते हैं, बड़े होकर उनके बच्चों को काफ़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. वे अपने बच्चों को ज़िदंगी की मुश्किलों व सच्चाइयों से रू-ब-रू नहीं होने देते, जिसके कारण बच्चा हर छोटी से छोटी बात के लिए पूरी तरह से उन पर ही निर्भर रहने लगता है. ऐसे बच्चों में बोल्डनेस नहीं होती. हर काम, हर निर्णय लेने के लिए पैरेंट्स की तरफ़ भागता है. बच्चों पर हमेशा मंडराने वाली अपनी आदत के चलते ही इन पैरेंट्स को ‘हेलीकॉप्टर पैरेंट्स’ कहा जाता है.

पैरेंट्स के लिए टिप्स

पैरेंट्स का ऐसा व्यवहार बच्चों के भावनात्मक और मानसिक विकास में बाधक बनता है.
बच्चों की उंगली पकड़कर चलाने की बजाय उन्हें अपनी आंखों से दुनिया देखने व समझने का मौक़ा दें.
जहां बच्चों को आपकी ज़रूरत हो, वहां उनको सहयोग ज़रूर दें.
पैरेंट्स का बच्चों के प्रति ज़्यादा केयरिंग बिहेवियर उन्हें आत्मनिर्भर बनने से रोकता है.
बच्चों को अपने छोटे-छोटे काम स्वयं करने दें. ऐसा करने से वे बचपन से ही ज़िम्मेदार व आत्मनिर्भर बनेंगे.

पैरेंट्स का व्यवहार: शक्की.
बच्चे बनेंगे: किसी पर भी विश्‍वास न करनेवाले और झूठ बोलनेवाले.

 

    कैसी बनेंगी स्थितियां?

सभी पैरेंट्स अपने बच्चों पर पैनी नज़र रखते हैं कि कहीं उनका बच्चा ग़लत राह पर तो नहीं जा रहा, लेकिन शक्की स्वभाव वाले पैरेंट्स ज़रूरत से ज़्यादा ही निगरानी रखते हैं अपने बच्चों पर. ऐसे पैरेंट्स भूल जाते हैं कि उनका ऐसा व्यवहार बच्चों के लिए कितनी मुश्किलें खड़ी कर देता है. यदि बच्चा किसी काम से बाहर गया है तो उनका बार-बार फ़ोन या मैसेज देखते ही वह परेशान हो जाएगा और अपने आप को बचाने के लिए उनसे झूठ भी बोलने लगेगा.
शक्की स्वभाव वाले पैरेंट्स हर स्थिति को लेकर अपने बच्चे के मन में एक डर बैठा देते हैं और इसी डर के साथ उनके बच्चे बड़े होने लगते हैं. ऐसे बच्चों में आत्मविश्‍वास की कमी होती है. वे किसी पर भी आसानी से विश्‍वास करने लगते हैं.

पैरेंट्स के लिए टिप्स

बच्चों पर कड़ी नज़र रखने की बजाय उनसे खुलकर बातें करें.
आपस में मिल-जुलकर समस्या का हल निकालें.
बच्चों पर शक करने की बजाय उन्हें आज़ादी दें, लेकिन उन्हें इतनी छूट भी न दें कि वे लापरवाह ही हो जाएं.
पैरेंट्स अपने शक्की स्वभाव को छोड़कर बच्चों पर विश्‍वास करना सीखें.
यह मानकर चलें कि बच्चे ग़लतियों से ही सीखते हैं, बजाय आपके समझाने के.

पैरेंट्स का व्यवहार: अभद्र भाषा बोलनेवाले.
बच्चे बनेंगे: बेक़ाबू.

 

  कैसी बनेंगी स्थितियां?

ग़लती करने पर बच्चे को उसकी ग़लती का एहसास कराना ज़रूरी है, लेकिन उसके साथ बदतमीज़ी से बात करना या उसे मारना-पीटना सही नहीं है. पैरेंट्स द्वारा ऐसा व्यवहार करने पर उनके मन-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ेगा.
अभद्र भाषा (गाली-गलौज) का प्रयोग करनेवाले पैरेंट्स अपने बच्चों के विकास को रोककर उनके आत्मविश्‍वास को कम करते हैं. ऐसे पैरेंट्स के बच्चे अनुशासन में न रहने वाले, तोड़-फोड़ करने वाले, बेक़ाबू और अनेक तरह की मानसिक परेशानियों से घिरे होते हैं. इन बच्चों में बिस्तर गीला करना, डिप्रेशन, पढ़ाई में कमज़ोर होना आदि जैसी समस्याएं देखने में आती हैं.

पैरेंट्स के लिए टिप्स

ग़लती करने पर बच्चे को उसकी ग़लती का एहसास ज़रूर कराएं.
अपना आपा खोने से पहले स्थिति को समझने की कोशिश करें. बेवजह गाली-गलौज न करें.
बच्चों के सामने अपशब्दों का प्रयोग न करें, क्योंकि जिस ढंग से आप अपने बच्चे से बात करेंगे, बच्चा भी उसी तरी़के से आपसे बात करेगा. इसलिए स्थितियां चाहे कैसी भी हों, बच्चों के साथ सहज व सौम्य व्यवहार करें.
बच्चों के सामने अनावश्यक झूठ न बोलें, क्योंकि बच्चे अपने पैरेंट्स की नकल करते हैं.
पैरेंंट्स बच्चों के आदर्श होते हैं. इसलिए वह बच्चों के साथ जैसा आचरण करेंगे, वे भी वैसा ही सीखेंगे.

 

पैरेंट्स का व्यवहार: बच्चों पर जीत का दबाव बनानेवाले.
बच्चे बनेंगे: आत्महत्या की प्रवृत्तिवाले.

 

  कैसी बनेंगी स्थितियां?

कॉम्पिटीशन के इस दौर में ऐसे महत्वाकांक्षी पैरेंट्स की संख्या बढ़ती जा रही है, जो अपने बच्चों को हमेशा विजेता के रूप में देखना चाहते हैं या उन पर जीत के लिए हमेशा दबाव बनाए रखते हैं. ऐसे पैरेंट्स जाने-अनजाने में अपने बच्चों पर मानसिक बोझ लाद देते हैं. मानसिक बोझ तले दबे ऐसे बच्चे नर्वस ब्रेकडाउन और डिप्रेशन का शिकार होकर आत्महत्या जैसा क़दम उठा लेते हैं.
जीत का दबाव बनाने वाले पैरेंट्स अपने बच्चों की छोटी से छोटी असफलताओं को भी बर्दाश्त नहीं कर पाते. धीरे-धीरे उन पर भी तनाव हावी होने लगता है. दूसरों की अपेक्षाओं पर खरे न उतरने के कारण वे उनसे कतराने लगते हैं और ख़ुद को नकारा समझने लगते हैं. ऐसे पैरेंट्स हाइपर पैरेंटिंग सिंड्रोम से पीड़ित होते हैं, जो बच्चों को नॉर्मल तरीक़े से बड़ा भी नहीं होने देते.

पैरेंट्स के लिए टिप्स

बच्चों पर प्रेशर बनाने की बजाय उनमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार करें.
उनके सामने नकारात्मक बातें कर उनका आत्मविश्‍वास कम करने की कोशिश न करें.
किसी कॉम्पिटीशन में हारने के बाद भी बच्चे को डांटने-फटकारने की बजाय उत्साहित करें, ओवर रिएक्ट न करें.
बच्चों से बहुत ज़्यादा अपेक्षाएं न रखें.
अक्सर पैरेंट्स अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाओं को बच्चों के ज़रिए पूरा करना चाहते है, इसलिए उन पर अधिक दबाव बनाते हैं, जो सही नहीं है.

पैरेंट्स का व्यवहार: तुलना करनेवाले.
बच्चे बनेंगे: दिखावा करनेवाले.

 

  कैसी बनेंगी स्थितियां?

तुलना करने वाले पैरेंट्स अपने बच्चों को सही तरी़के से समझ नहीं पाते हैं. इसलिए दूसरे बच्चों के साथ अपने बच्चों की तुलना करने लगते हैं. बच्चों की सही बात को सुने-समझे बिना अपनी बातों को ज़बर्दस्ती उन पर लादने की कोशिश करते हैं.
ऐसे पैरेंट्स के बच्चे स्वयं को किसी लायक नहीं समझते. वे अपनी क्षमता को नहीं पहचान पाते और स्वयं को बेवकूफ़ समझने लगते हैं. कई बार तो स्थितियां उलट भी होती हैं, जब पैरेंट्स अपने समझदार बच्चे की तुलना किसी कमज़ोर बच्चे से करते हैं तो वह ख़ुद को बहुत स्पेशल और ओवर कॉन्फिडेंट समझने लगता है.

पैरेंट्स के लिए टिप्स

भाई-बहनों की भी आपस में तुलना न करें.
दूसरे बच्चों के साथ तुलनात्मक व्यवहार करने से उनमें सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स आ जाता है.
बच्चों की छोटी से छोटी सफलता पर भी उनकी तारीफ़ करें. माता-पिता द्वारा की गई प्रशंसा बच्चों में आत्मविश्‍वास जगाती है और वे भविष्य में बेहतर प्रदर्शन करने का प्रयास करते हैं.
यदि पैरेंट्स बच्चों की किसी बात पर सहमत नहीं हैं तो उनकी तुलना करने के बजाय उन्हें पॉज़ीटिव फील कराएं.
बच्चों को समझाते समय दिल दुखाने वाले शब्दों का प्रयोग न करें, बल्कि प्यार व नम्रता से उनके साथ पेश आएं.
हर बच्चे का स्वभाव अलग-अलग होता है. इसलिए उसके अच्छे गुणों को परखना, हर पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी होती है.

पैरेंट्स का व्यवहार: बच्चों में दिलचस्पी न लेने वाले.
बच्चे बनेंगे: घमंडी.

 

  कैसी बनेंगी स्थितियां?

काम के बढ़ते बोझ और तनाव के चलते आजकल के पैरेंट्स के पास इतना व़क़्त ही नहीं है कि अपने बच्चों केलिए व़क़्त निकाल सकें. यदि पैरेंट्स बच्चों के लिए कुछ व़क़्त निकालते भी हैं तो उनके साथ बेरुखी और सख़्ती से पेश आते हैं.
पैरेंट्स का ऐसा व्यवहार बच्चों के मन पर बुरा प्रभाव डालता है और वे उनसे दूर और मन ही मन दुखी रहने लगते हैं. ऐसे पैरेंट्स बच्चों की सारी डिमांड्स पूरी करते हैं. उनकी मामूली-सी बात को भी नकार नहीं पाते, जिसके कारण बच्चे ज़िद्दी और घमंडी बन जाते हैं. ऐसे बच्चे अपनी आलोचना कभी बर्दाश्त नहीं कर पाते.

पैरेंट्स के लिए टिप्स

बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं. उनकी दिनचर्या में शामिल होना भी बच्चों के संपूर्ण विकास का ही हिस्सा है.
बच्चों के साथ पेंटिंग करने, कहानी सुनाने, पार्क में जाने जैसी एक्टिविटीज़ में शामिल हों.
बच्चों के द्वारा ग़लतियां करने पर उन्हें प्यार से समझाएं.
बच्चों की हर ज़िद, इच्छा को पूरा न करें. जो उनके लिए ज़रूरी हो, उन्हीं पर ध्यान दें. यदि बच्चा इस दौरान रोने-चिल्लाने लगे, तो उसकी इस एक्टिविटी को नज़रअंदाज़ करें, नहीं तो आपका ऐसा व्यवहार उसकी आदतों को और भी बिगाड़ सकता है.
थोड़ी-सी समझदारी से पैरेंट्स बच्चों के इस स्वभाव को हैंडल करें तो उनकी यह आदत धीरे-धीरे अपने आप ही छूट जाएगी.

– पूनम नागेन्द्र शर्मा