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जानिए बार-बार पेशाब आने का कारण व निवारण (Frequent Urination: Causes, Symptoms, and Treatment)

ब्लैडर (Bladder) यानी मूत्राशय फुल होने पर वॉशरूम (Washroom) की ओर दौड़ना सामान्य है, लेकिन अगर आपको दिन में कई बार वॉशरूम के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं तो यह गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है.. 

Urination Problems
ख़तरे की घंटी
अगर आप दिनभर से 7 से अधिक बार पेशाब आता है तो यह ख़तरे की घंटी हो सकती है. यदि आपके शौच यानी मूत्र त्यागने की रूटीन में अचानक कोई बड़ा बदलाव तो यह भी किसी समस्या का संकेत हो सकता है. रात में सोने के दौरान दो से अधिक बार मूत्र त्यागने के लिए उठना भी बीमारी का संकेत हो सकता है. मूत्र त्यागने के बाद भी आपको ऐसा लगे कि आपका ब्लैडर खाली नहीं हुआ है तो सावधान हो जाएं. प्रक्रिया जब हमारे ब्लैडर (मूत्राशय) में यूरिन भर जाता है, तो नर्व्स हमारे ब्रेन को सिग्नल भेजकर यूरिन को बाहर निकालने का इशारा करते हैं, लेकिन जिनका ब्लैडर यानी मूत्राशय ओवरएक्टिव होता है ब्लैडर फुल न होने के बावजूद दिमाग तक सिग्नल्स पहुंचने लगते हैं.

कारण
इस समस्या के कई कारण हो सकते हैं. सामान्यरूप से निम्न कारणों के कारण इस समस्या का सामना करना पड़ता है.
डायबिटीज़
पुरुषों को बार-बार पेशाब लगने का सबसे सामान्य कारण डायबिटीज़ होता है. जब शरीर में ग्लूकोज़ लेवल बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है तो शरीर मूत्र के माध्यम से उसे बाहर निकालने की कोशिश करता है. यही वजह है कि डायबिटीज़ से पीड़ित लोगों को बार-बार वॉशरूम जाना पड़ता है.
एक्सरसाइज़
जब हम एक्सरसाइज़ करते हैं तो पसीने के माध्यम से शरीर के सारे विषाक्त तत्व बाहर निकल जाते हैं, साथ ही शरीर डिहाइड्रेट भी हो जाता है. ऐसे में शरीर की हाइड्रेट करने के लिए हम ज़्यादा पानी पीते है, नतीजतन बार-बार वॉशरूम की ओर दौड़ना पड़ता है.
ब्लैडर कैंसर
बार बार पेशाब आने की वजह ब्लैडर कैंसर हो सकता है. यह समस्या होने पर मूत्र त्यागने में थोड़ी परेशानी होती है. ब्लैडर कैंसर से पीड़ित पुरुषों बार-बार पेशाब करने की इच्छा होती है.

Urination Problems
प्रोस्टेट कैंसर
प्रोस्टेट कैंसर होने पर भी यह समस्या होती है. आपके लिए यह जानना आवश्यक है कि पेल्विक एरिया में किसी की तरह का कैंसर होने पर यूरेंथ्रा प्रभावित होता है. जिससे बार-बार पेशाब आती है. प्रोसेक्टॉमी करवाने पर कुछ पुरुषों को इस समस्या का सामना करना पड़ता है.
किडनी में इंफेक्शन
किडनी में संक्रमण होने पर भी बार-बार पेशाब आना बेहद आम बात है  इसले अगर आपको यह परेशानी है तो इसकी जांच ज़रूर करवाएं.
यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन
अगर यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन का समय रहते इलाज न कराया जाए तो बार-बार पेशाब आने की वजह बन सकती है. यूटीआई से पीड़ित होने पर सामान्य से अधिक पेशाब आती है और पेशाब करते समय खुजली और जलन जैसी समस्या भी होती है.
मनोवैज्ञानिक कारण
अधिक पेशाब आने के पीछे केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक कारण भी  हो सकते हैं. कभी-कभी तनाव, थकान, डर इत्यादि के कारण भी बहुत से लोग बारबार शौचालय की ओर रुख करते हैं.

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ट्रीटमेंट
इस समस्या के इलाज के लिए बहुत-से ट्रीटमेंट्स उपलब्ध हैं. अगर बहुत अधिक बार पेशाब नहीं आती तो इलाज की कोई आवश्यकता नहीं है, कुछ केसेज़ में खानपान के बदलाव करके भी इस समस्या से निजात पाया जा सकता है. ओवरएक्टिव ब्लैडर को कंट्रोल करने के लिए बहुत-सी दवाएं उपलब्ध हैं. अगर डायबिटीज़ के कारण यह समस्या होती है तो ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखकर इससे इजात पाया जा सकता है. बैक्टिरियल किडनी इंफेक्शन होने की स्थिति में डॉक्टर्स एंटीबायोटिक्स व पेनकिलर्स का सहारा लेते हैं. ओवएक्टिव ब्लैडर होने पर डॉक्टर दवा देते हैं.

घरेलू उपाय
1. भरपूर मात्रा में पानी पीएं. ताकि यदि किसी प्रकार का इंफेक्शन हो तो वह पेशाब के माध्यम से निकल जाए और आपको इस तरह की परेशानी न झेलनी पड़े.
2. दही, पालक, तिल, अलसी, मेथी की सब्ज़ी आदि का रोज़ाना सेवन करना इस समस्या में फ़ायदेमंद साबित होगा.
3. सूखे आंवले को पीसकर चूर्ण बना लें और इसमें गुड़ मिलाकर खाएं. इससे बार-बार पेशाब आने की समस्या में लाभ होता है. विटामिन सी से भरपूर चीज़ों का सेवन करें.
4. अनार के छिलकों को सुखा लें और इसे पीसकर चूर्ण बना लें. अब सुबह-शाम इस चूर्ण का सेवन पानी के साथ करें. अगर चाहें तो इसका पेस्ट बना सकते हैं.
5. मसूर की दाल, अंकुरित अनाज, गाजर का जूस व अंगूर का सेवन भी इस समस्या के लिए एक कारगर उपाय है.

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इन लक्षणों से जानें थायरॉइड कंट्रोल में  है या नहीं (Thyroid: Causes, Symptoms And Treatment)

Thyroid Causes

इन लक्षणों से जानें थायरॉइड कंट्रोल में  है या नहीं (Thyroid: Causes, Symptoms And Treatment)

समय के साथ-साथ हमारी जीवनशैली बदल रही है, खानपान बदल रहा है, काम करने के तरी़के बदल रहे हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि इन बदलावों को हमारे मन के साथ-साथ हमारा तन भी स्वीकार करे. कई बार हमें इस बात का बिल्कुल एहसास नहीं होता है कि सामान्य से लगनेवाले ये छोटे-छोटेे बदलाव किसी गंभीर बीमारी के संकेत भी हो सकते हैं. ऐसी ही एक हेल्थ प्रॉब्लम (Health Problem) है थायरॉइड (Thyroid), जिसके बारे में हम आपको बता रहे हैं.

क्या है थायरॉइड?

हम में से अधिकतर लोगों को यह बात मालूम नहीं होगी कि थायरॉइड किसी बीमारी का नाम नहीं है, बल्कि यह एक ग्रंथि का नाम है, जो गर्दन में सांस की नली के ऊपर और वोकल कॉर्ड के दोनों ओर दो भागों में तितली के आकार में बनी होती है. यह ग्रंथि थायरॉक्सिन नामक हार्मोन का उत्पादन करती है. हम जो भी खाते हैं, उसे यह हार्मोन ऊर्जा में बदलता है. जब यह ग्रंथि ठीक तरह से काम नहीं करती है, तो शरीर में अनेक समस्याएं होने लगती हैं.

पहचानें थायरॉइड के लक्षणों को?

एनर्जी का स्तर बदलना

थायरॉइड की समस्या होने पर शरीर में ऊर्जा का स्तर बदलता रहता है. ओवरएक्टिव थायरॉइड (हाइपरथायरॉइडिज़्म) में मेटाबॉलिज़्म तेज़ हो जाता है या फिर उसमें अनियमित बदलाव होता रहता है, जिसके कारण अधिक भूख लगना, नींद न आना, चिड़चिड़ापन और बेचैनी जैसी समस्याएं होती हैं. इसी तरह से अंडरएक्टिव थायरॉइड (हाइपोथायरॉइडिज़्म) में शरीर में ऊर्जा का स्तर कम हो जाता है, जिसकी वजह से अधिक थकान, एकाग्रता में कमी, घबराहट और याद्दाश्त में कमी आने लगती है.

वज़न का घटना-बढ़ना

ओवरएक्टिव थायरॉइड (हाइपरथायरॉइडिज़्म) ग्रंथि की समस्या होने पर मेटाबॉलिज़्म तेज़ हो जाता है, जिसके कारण व्यक्ति की भूख बढ़ जाती है. वह ज़रूरत से ज़्यादा खाना खाने लगता है, लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा खाने पर भी उसका वज़न घटने लगता है. वहीं दूसरी ओर अंडरएक्टिव थायरॉइड (हाइपोथायरॉइडिज़्म) होने पर मेटाबॉलिज़्म धीमा हो जाता है, जिसके कारण भूख कम लगती है और कम खाना खाने पर भी वज़न लगातार बढ़ता रहता है.

आंतों की समस्या

ओवरएक्टिव थायरॉइड और अंडरएक्टिव थायरॉइड दोनों के कारण आंतों में  भी गड़बड़ी की समस्या हो सकती है. ये दोनों ही भोजन पचाने और मल-मूत्र के विसर्जन करने की क्रियाओं में मुख्य भूमिका निभाते हैं. अंडरएक्टिव थायरॉइड होने पर व्यक्ति कब्ज़ और डायरिया से परेशान रहता है.

गले में सूजन

सर्दी-जुक़ाम के कारण गले में दर्द और आवाज़ में भारीपन आने लगता है, लेकिन इन लक्षणों की अनदेखी बिल्कुल न करें. कई बार सिंपल से दिखनेवाले ये लक्षण थायरॉइड के भी हो सकते हैं, क्योंकि थायरॉइड होने पर भी गले में दर्द और आवाज़ में भारीपन के साथ-साथ गले में सूजन आती है. अगर गले में सूजन हो, तो इसकी अनदेखी करने की बजाय थायरॉइड टेस्ट कराएं.

मांसपेशियों में दर्द

शारीरिक मेहनत और वर्कआउट करने के बाद बॉडी पेन होना आम बात है. लेकिन ओवरएक्टिव थायरॉइड के कारण भी मांसपेशियों में दर्द होता है. कई बार मांसपेशियों में दर्द के साथ-साथ कमज़ोरी, थकान, कमर व जोड़ों में दर्द और सूजन भी आती है.

अनिद्रा की समस्या

थायरॉइड के प्रमुख लक्षणों में अनिद्रा भी एक लक्षण है. थायरॉइड ग्रंथि का असर व्यक्ति की नींद पर भी पड़ता है, जैसे- रात को नींद नहीं आना, बेचैनी, सोते समय अधिक पसीना आना आदि. नींद न आने के कारण कई बार चक्कर भी आने लगते हैं.

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बालों का झड़ना और त्वचा का ड्राई होना  

हाइपरथायरॉइडिज़्म से ग्रस्त व्यक्ति की त्वचा धीरे-धीरे ड्राई होने लगती है. त्वचा के ऊपर की कोशिकाएं (सेल्स) क्षतिग्रस्त होने लगती हैं, जिसके कारण त्वचा में रूखापन आने लगता है. थायरॉइड के कारण त्वचा में रूखेपन के अलावा बालों की भी कई तरह की समस्याएं होने लगती हैं, जैसे- बालों का झड़ना, रूखापन आदि.

तनाव में रहना

दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद थकान होना लाज़िमी है, लेकिन अगर आपको ज़रूरत से ज़्यादा ही थकान महसूस हो, तो इसकी वजह थायरॉइड भी हो सकती है. शुरुआत में इस बात का एहसास नहीं होता है कि थकान किस वजह से है, लेकिन जब थायरॉइड ग्रंथि ओवरएक्टिव हो जाती है, तो यह ग्रंथि शरीर में ज़रूरत से बहुत अधिक मात्रा में थायरॉइड हार्मोंस का निर्माण करने लगती है, जिसके कारण तनाव व बेचैनी होने लगती है.

पीरियड्स की अनियमितता

अधिकतर महिलाओं में पीरियड्स का अनियमित होना आम बात है, लेकिन उन्हें इस बात का बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं होता है कि अंडरएक्टिव और ओवरएक्टिव थायरॉइड के कारण भी पीरियड्स अनियमित होते हैं. इसके लक्षणों में लगातार बदलाव होने पर महिलाएं इस बात से परेशान रहती हैं. जब महिलाओं को हाइपरथायरॉइडिज़्म (ओवरएक्टिव थायरॉइड) की समस्या होती है, तो उन्हें सामान्य से अधिक रक्तस्राव होता है और जब महिलाएं हाइपोथायरॉइडिज़्म (अंडरएक्टिव थायरॉइड) से ग्रस्त होती हैं, तब उन्हें रक्तस्राव बहुत कम होता है या फिर होता ही नहीं है.

डिप्रेशन

अवसाद होने की एक वजह थायरॉइड भी हो सकती है, क्योंकि अवसाद में अधिक नींद आना या अनिद्रा की समस्या होती है. यदि व्यक्तिअंडरएक्टिव थायरॉइड से ग्रस्त है, तो मूड स्विंग होना, आलस, काम में मन न लगना जैसी समस्याएं होती हैं.

थायरॉइड को नियंत्रित करने के लिए क्या खाएं?

थायरॉइड के मरीज़ अगर उपचार के साथ-साथ अपने खानपान पर ध्यान दें, तो बहुत हद तक इसे नियंत्रित किया जा सकता है. उन्हें अपनी डायट में इन चीज़ों को शामिल करना चाहिए, जैसे-

मशरूम: इसमें सेलेनियम अधिक मात्रा में होता है, जो थायरॉइड को नियंत्रित करता है.

अंडा: थायरॉइड के रोगियों को अपनी डायट में अंडा ज़रूर शामिल करना चाहिए. इसमें भी सेलेनियम होता है, जो थायरॉइड को नियंत्रित करने के साथ कमज़ोरी को भी दूर करता है.

नट्स: वैसे तो नट्स सभी को खाने चाहिए, लेकिन थायरॉइड के मरीज़ों को नट्स ज़रूर खाना चाहिए. नट्स में ऐसे पोषक तत्व होते हैं, जो थायरॉइड के कारण होनेवाले हार्ट अटैक के ख़तरे को कम करते हैं.

दही: इसे खाने से इम्यूनिटी लेवल बढ़ता है और थायरॉइड भी नियंत्रित रहता है.

मेथी: इसमें ऐसे एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो थायरॉक्सिन नामक हार्मोन को नियंत्रित करने में मदद करते हैं.

   – पूनम शर्मा

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Personal Problems: एंडोमेटिरियोसिस क्या होता है? (Endometriosis: Symptoms, Causes And Treatment)

मैं 24 वर्षीया कामकाजी महिला हूं. पिछले कई सालों से पीरियड्स (Periods) के दौरान मुझे काफ़ी दर्द (Pain) होता था, तो मैं पेनकिलर ले लेती थी. पर जब ज़्यादा तकलीफ़ बढ़ी, तो गायनाकोलॉजिस्ट को दिखाया. उन्होंने चेकअप करके बताया कि मुझे एंडोमेटिरियोसिस (Endometriosis) है. यह क्या है, कृपया मेरा मार्गदर्शन करें.
– प्रभा अवस्थी, मुंबई.

यूट्रस की अंदरूनी लाइनिंग के टिश्यूज़ को एंडोमेट्रियम कहते हैं. जब ये टिश्यूज़ यूट्र्स के बाहर ओवरीज़ या पेल्विक एरिया में चले जाते हैं, तब उस अवस्था को एंडोमेटिरियोसिस कहते हैं. इसके सही कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है. आमतौर पर यह 25-40 की उम्र की महिलाओं में होता है. इसके कारण महिलाओं को पेड़ू में और पीरियड्स के दौरान काफ़ी दर्द होता है. यह एक वंशानुगत समस्या है. ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स के सेवन से इसके होने की संभावना कम हो जाती है.

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Endometriosis

मैं 41 वर्षीया महिला हूं. मुझे अक्सर योनिमार्ग से स़फेद स्राव निकलता है और कभी-कभी बहुत खुजली भी होती है. मुझे क्या करना चाहिए?
– ख़ुशबू कुकरेजा, देहरादून.

कई बार योनिमार्ग से स़फेद स्राव निकलता है, पर अगर आपको उससे कोई समस्या नहीं है, तोउसके इलाज की कोई ज़रूरत नहीं होती है, वो अपने आप ठीक हो जाता है. योनि में खुजली होना और यूरिन पास करते समय जलन होना किसी इंफेक्शन के कारण हो सकता है और इसके कारण भी स़फेद स्राव होता है. अगर आपको डायबिटीज़ आदि कोई समस्या है, तो काफ़ी हद तक मुमकिन है कि यह फंगल इंफेक्शन हो. सबसे पहले फंगल इंफेक्शन का इलाज कराएं, इसके लिए आप अपने डॉक्टर से सलाह ले सकती हैं. इसके बाद आपको अपने डायबिटीज़ पर नियंत्रण करना होगा. योनि से होनेवाले स्राव के कई कारण हो सकते हैं, इसलिए जल्द से जल्द किसी अच्छे गायनाकोलॉजिस्ट से मिलें.

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Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

 

 

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ऑस्टियोआर्थराइटिस के कारण, लक्षण व उपचार (Osteoarthritis: Causes, Symptoms, and Treatments)

जोड़ों में दर्द (Joints Pain) व सूजन एक आम समस्या (Problem) है. इसके कई कारण हो सकते हैं. उनमें से ही एक है ऑस्टियोआर्थराइटिस (Osteoarthritis), जिसकी वजह से चलना-फिरना भी दूभर हो जाता है. इस बीमारी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए हमने बात की एसआरवी ममता हॉस्पिटल के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निखिल पाटिल से.

Osteoarthritis
ऑस्टियोआर्थराइटिस जोड़ों से संबंधित एक प्रमुख बीमारी है. शरीर में जहां दो हड्डियां आपस में जुड़ती हैं, उसे ज्वॉइंट यानी जोड़ कहते हैं. हड्डियों के अंतिम सिरे को सुरक्षित रखने के लिए एक प्रोटेक्टिव टिशू होता है, जिसे कार्टिलेज कहते हैं. जब किसी कारण से कार्टिलेज टूट जाता है या उसमें दरार पड़ जाती है तो इसके कारण हड्डियां आपस में रगड़ खाती हैं, नतीजतन दर्द, अकड़न या अन्य तरह की समस्याएं होती हैं. इस स्थिति को ऑस्टियोआर्थराइटिस कहते हैं. वैसे तो यह समस्या किसी को भी हो सकती है, लेकिन आमतौर पर उम्रदराज़ लोगों को ज़्यादा होती है. ऑस्टियोआर्थराइटिस को डिजेनेरेटिव आर्थराइटिस या वियर एंड टियर आर्थराइटिस भी कहते हैं.

Osteoarthritis

ऑस्टियोआर्थराइटिस के कारण
यह बीमारी जोड़ों के क्षतिग्रस्त होने के कारण होती है. यह समस्या अचानक नहीं होती, बल्कि समय के साथ जोड़ों की रक्षा करने वाला कार्टिलेज धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होते जाता है. यही कारण है कि यह बीमारी उम्रदराज़ लोगों को ज़्यादा होती है.  जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, जोड़ों के क्षतिग्रस्त होने का ख़तरा बढ़ता जाता है.

 अन्य कारण
चोट के कारण कार्टिलेज में दरार, जोड़ों का डिस्लोकेट होना, लिंगामेंट में चोट, मोटापा, खराब पोश्‍चर इत्यादि ऑस्टियोआर्थराइटिस होने के अन्य प्रमुख कारण हैं. इसके अलावा यदि माता-पिता या घर के किसी क़रीबी रिश्तेदार को यह बीमारी हो तो इसके होने की आशंका बढ़ जाती है.

Osteoarthritis Causes
ऑस्टियोआर्थराइटिस और कार्टिलेज
कार्टिलेज रबर की तरह होता है और हड्डी से ज़्यादा लचीला होता है. इसका प्रमुख कार्य दो हड्डियों को जोड़नेवाले अंतिम सिरों को सुरक्षित रखना होता है, ताकि हड्डियां आपस में रगड़ न खाएं. जब कार्टिलेज क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो हड्डियां आपस में रगड़ खाती हैं, जिसके कारण दर्द व सूजन जैसी समस्याएं होती हैं. सबसे प्रमुख बात यह है कि क्षतिग्रस्त कार्टिलेज अपनेआप रिपेयर नहीं हो सकता, क्योंकि कार्टिलेज में रक्त कोशिकाएं नहीं होती हैं.  जब कार्टिलेज पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो हड्डियों को सुरक्षा प्रदान करनेवाली कुशनिंग चली जाती है, जिसके कारण हड्डियां आपस में रगड़ खाती हैं. फलस्वरूप जोड़ों में दर्द व अन्य तरह की समस्याएं होती हैं. ऑस्टियोआर्थराइटिस शरीर के किसी भी जोड़ में हो सकता है, लेकिन यह सामान्यतौर पर शरीर के निम्न जोड़ों को प्रभावित करता है.
1. हाथ
2. उंगलियां
3. घुटने
4. कुल्हे
5. रीढ़ की हड्डी, ख़ासतौर पर गर्दन और पीठ का निचला हिस्सा

ऑस्टियोआर्थराइटिस के प्रमुख लक्षण
1. दर्दप प्रभावित जोड़ को दबाने पर दर्द महसूस होना
2.  अकड़नप सूजन
 क्रॉनिक ऑस्टियोआर्थराइटिस
ऑस्टियोआर्थराइटिस एक प्रोग्रेसिव बीमारी है, यानी यह समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ती है. इसके 4 स्टेज होते हैं. स्टेज 4 गंभीर ऑस्टियोआर्थराइटिस होता है. ज़रूरी नहीं है कि हर मरीज़ इस स्टेज तक पहुंचे ही. अक्सर सही समय पर इलाज व देखभाल से स्थिति सुधर जाती है. स्टेज 4 ऑस्टियोआर्थराइटिस से पीड़ित व्यक्ति का एक या एक से अधिक जोड़ों का कार्टिलेज पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है. ऐसे में हड्डियों में रगड़ के कारण निम्न समस्याएं होती हैं.
1. जोड़ों में अकड़न, सूजन बढ़ जाती है. जोड़ों में मौजूद सिनोवियल फ्लूइड का स्तर बढ़ जाता है. आपको बता दें कि इस फ्लूइड का प्रमुख कार्य शरीर में मूवमेंट के दौरान हड्डियों को रगड़ खाने से बचाना है. लेकिन इसकी मात्रा अधिक हो जाने पर जोड़ों में सूजन आ जाती है. इसके अलावा टूटे हुए कार्टिलेज के कण फ्लूइड में फ्लोट होते हैं, जिसके कारण दर्द व सूजन बढ़ सकती है.
2. ऑस्टियोआर्थराइटिस के एडवांस स्टेज में सामान्य गतिविधियां करने में भी तकलीफ़ होती है. दिन बीतने के साथ-साथ दर्द बढ़ता जाता है. प चलने-फिरने में परेशानी हो सकती है. जोड़ों में अकड़न आ जाने के कारण मूवमेंट में परेशानी होती है, जिसके कारण रोज़ाना के काम करने में भी दिक्कत होती है.
3. ऑस्टियोआर्थराइटिस की समस्या गंभीर होने पर जोड़ों में असंतुलन हो जाता है. उदाहरण के लिए यदि मरीज़ के घुटनों में ऑस्टियोआर्थराइटिस हो तो अचानक उसका घुटना लॉक हो सकता है, जिसके कारण वो गिर सकता है और उसे चोट लग सकती है. ऑस्टियोआर्थराइटिस के कारण क्षतिग्रस्त हुए ज्वॉइंट को फिर से ठीक नहीं किया जा सकता है, लेकिन ट्रीटमेंट की मदद से इसके लक्षणों को कम किया जा सकता है.

ऑस्टियोआर्थराइटिस बनाम रूमेटॉइड आर्थराइटिस
हालांकि ऑस्टियोआर्थराइटिस और रूमेटॉइड आर्थराइटिस के लक्षण एक जैसे होते हैं, लेकिन ये दोनों बिल्कुल अलग बीमारियां हैं. ऑस्टियोआर्थराइटिस समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ता है, जबकि रूमेटॉइड आर्थराइटिस ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम ही टिशूज़ पर अटैक करने लगता है और जोड़ों के आस-पास की लाइनिंग को क्षतिग्रस्त कर देता है, जिसके कारण शरीर के जोड़ों में सूजन, अकड़न व दर्द की समस्या होती है. यह अचानक और किसी भी उम्र में हो सकती है.
ऑस्टियोआर्थराइटिस की जांच
ऑस्टियोआर्थराइटिस धीरे-धीरे विकसित होनेवाली बीमारी है, इसलिए जब जोड़ों में दर्द व अन्य तरह के संकेत न दिखें, तब तक इसका पता लगाना मुश्किल होता है. किसी तरह का एक्सिडेंट या चोट लगने की स्थिति में एक्स-रे करवाने पर ऑस्टियोआर्थराइटिस का पता लगाया जा सकता है. एक्स-रे के अलावा एमआरआई स्कैन की मदद से भी इसकी जांच की जाती है. इसके अलावा ब्लडटेस्ट, ज्वॉइंट फ्लूइड एनालिसिस की मदद से भी इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है.

ऑस्टियोआर्थराइटिस का इलाज
ऑस्टियोआर्थराइटिस को जड़ से ख़त्म करना मुश्किल है, लेकिन इलाज के माध्यम से इसके लक्षणों को कम करने की कोशिश की जाती है. हालांकि इलाज ज्वॉइंट के लोकेशन पर निर्भर करता है. ट्रीटमेंट के लिए ओटीसी मेडिसिन, जीवनशैली में बदलाव और घरेलू उपायों का इस्तेमाल किया जाता है. इनकी मदद से दर्द को कम करने की कोशिश की जाती है. ऑस्टियोआर्थराइटिस में आराम के लिए मरीज़ को निम्न उपाय करने चाहिए.

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व्यायामः शारीरिक गतिविधि जोड़ों के आस-पास की मांसपेशियों को मज़बूती प्रदान करती है, जिससे अकड़न में आराम मिलता है.  इसके लिए कम से कम 20 से 30 मिनट तक शारीरिक रूप से एक्टिव रहने की कोशिश करनी चाहिए. हल्के-फुल्के एक्सरसाइज़, जैसे- वॉकिंग, स्ट्रेचिंग या योग करना सही रहेगा. इससे ज्वॉइंट्स फ्लेक्सिबल होंगे और दर्द में आराम मिलता है, लेकिन कोई भी एक्सरसाइज़ करने से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें.
 वज़न कम करनाः वज़न अधिक होने पर शरीर के जोड़ों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिसके कारण दर्द होता है. वज़न कम करने से जोड़ों पर प्रेशर कम होता है, जिससे दर्द में आराम मिलता है. वज़न नियंत्रित रखकर दूसरी तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को भी कम किया जा सकता है.
समुचित नींदः मांसपेशियों को आराम देने से सूजन और दर्द कम होता है, इसलिए इस समस्या के होने पर भरपूर नींद लेना बहुत ज़रूरी है. इससे दर्द में आराम मिलता है. हीट एंड कोल्ड थेरेपीः जोड़ों में दर्द व सूजन कम करने के लिए मरीज़ हीट एंड कोल्ड थेरेपी का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके लिए रोज़ाना 20 मिनट तक जोड़ों पर ठंडा-गर्म सेंक दिया जाता है. इन उपायों से मरीज़ को काफ़ी आराम मिल सकता है.

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ऑस्टियोआर्थराइटिस के लिए दवाएं
ऑस्टियोआर्थराइटिस में दर्द से आराम दिलाने के लिए डॉक्टर कई तरह की दवाएं देते हैं.
ओरल एनाल्जेसिक्सः दर्द कम करने के लिए टाइलेनॉल व अन्य तरह की दर्द निवारक दवाइयां दी जाती हैं.
ट्रॉपिकल एनाल्जेसिक्सः ये क्रीम, जेल और सैशे इत्यादि में मिलती हैं. ये क्रीम्स दर्द वाले हिस्से को सुन्न कर देती हैं, जिससे दर्द का एहसास नहीं होता. माइल्ड आर्थराइटिस में ये फ़ायदेमंद होती हैं.
नॉन-स्टेरॉइडल एंटीइंफ्लेमेटरी ड्रग्सः सूजन और दर्द कम करने के लिए डॉक्टर्स आइब्रूफेन या कोई अन्य नॉन-स्टेरॉइडल एंटीइंफ्लेमेटरी ड्रग्स देते हैं.
कॉर्टिकोस्टेरॉइडः यह क्रीम के साथ-साथ इंजेक्शन के रूप में भी उपलब्ध है. डॉक्टर्स इंजेक्शन को प्रभावित जोड़ पर लगाते हैं. इसके अलाावा वैकल्पिक ट्रीटमेंट के लिए फिश ऑयल, एक्युपंचर, फिज़ियोथेरेपी व मसाज थेरेपी की भी सहायता ली जाती है. लेकिन किसी भी तरह का हर्ब्स या सप्लीमेंट लेने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना ज़रूरी होता है, ताकि किसी तरह का साइड इफेक्ट न हो.

खान-पान
वैसे तो हर किसी को सेहतमंद भोजन करना चाहिए, लेकिन ऑस्टियोआर्थराइटिस होने पर डायट पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि जोड़ों पर अतिरिक्त दबाव डालने से बचने के लिए वज़न नियंत्रण में रखना ज़रूरी होता है. बहुत से शोधों से इस बात की पुष्टि हुई है कि अगर घुटनों का ऑस्टियोआर्थराइटिस हो तो फ्लैवोनॉइड्स युक्त फल व सब्ज़ियों का सेवन करने से काफ़ी फ़ायदा होता है. इसके अलावा विटामिन सी, विटामिन डी, बीटा कैरोटिन व ओमेगा3 फैटी एसिड्स युक्त खाद्य पदार्थो का सेवन करने से भी फ़ायदा होता है.

ऑस्टियोआर्थराइटिस से बचने के उपाय
कुछ रिस्क फैक्टर्स, जैसे-उम्र, आनुवांशिक कारण इत्यादि से बचना तो मुश्किल है, लेकिन कुछ चीज़ों पर कंट्रोल करके आप ऑस्टियोआर्थराइटिस के ख़तरे को कम कर सकते हैं.
अपने शरीर का ध्यान रखेंः अगर आप एथेलेटिक हैं या फिटनेस फ्रीक हैं तो अपने शरीर का ख़ास ख़्याल रखें. घुटनों को सुरक्षित रखने के लिए दौड़ने या अन्य तरह की शारीरिक गतिविधि करते समय एथेलेटिक शूज़ पहनें.
वज़न नियंत्रित रखेंः वज़न नियंत्रित रखने की कोशिश करें. वज़न बढ़ने पर कई तरह की समस्याएं होती हैं.
 पौष्टिक डायटः खाने में ख़ूब सारी सब्ज़ियां व फल शामिल करें.
आराम करेंः शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आराम करना और पर्याप्त नींद लेना भी बहुत ज़रूरी है. डायबिटीज़ से पीड़ित व्यक्ति को ब्लडशुगर नियंत्रित रखने की कोशिश करनी चाहिए.

जानिए सीने में जलन के लक्षण, कारण, उपचार और परहेज (Heartburn Causes, Symptoms, Diagnosis, Treatment and Prevention)

सीने (Chest) में जलन (Burning) व दर्द (Pain), खट्टी डकार आना, उल्टी और पेट में भारीपन महसूस होना जैसी समस्याएं हार्टबर्न (Heartburn) की ओर इशारा करती हैं. हार्टबर्न को मेडिकल भाषा में गैस्ट्रोइसोफेगल रिफ्लक्स डिज़ीज़ (Gastroesophageal Reflux Disease) (जीईआरडी) कहा जाता है. हालांकि कई बार लोग इसके लक्षणों को हृदय से संबंधित परेशानियों से जोड़कर देखते हैं, लेकिन सही मायने में हार्टबर्न का हृदय की परेशानियों से कोई संबंध नहीं है. हार्टबर्न वैसे तो कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या नहीं है, लेकिन इसे नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता. चलिए जानते हैं, आख़िर किन वजहों से होता है हार्टबर्न और कैसे इससे निजात मिल सकती है?

Heartburn

क्या है हार्टबर्न?
हार्टबर्न की समस्या पेट में बनने वाले एसिड की वजह से होती है. अगर आप एक ही बार में आवश्कता से अधिक भोजन करते हैं, तो आपके पेट और इसोफेगस (भोजन नली) के बीच एक वाल्व द्वार बन जाता है. जब यह वाल्व पेट में बनने वाले एसिड को इसोफेगस की तरफ़ धकेलता है तो हार्टबर्न की परेशानी शुरू हो जाती है. ऐसी स्थिति में कई बार मरीज़ को सांस लेने में दिक्कत महसूस होने लगती है. हालांकि यह अपेक्षाकृत मामूली स्थिति होती है, जिसे एंटीएसिड दवाओं से कंट्रोल किया जा सकता है या फिर खान-पान की आदतों में सुधार लाकर भी इस स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है.

Heartburn prevention
कारण
हार्टबर्न की समस्या आमतौर पर अपच से जुड़ी होती है और इसके लिए हमारे खान-पान में शामिल कई चीज़ें ज़िम्मेदार हो सकती हैं, जैसे
1. मसालेदार भोजनप प्याज़ का सेवन
2. खट्टे व अम्लीय पदार्थप टमाटर से निर्मित चीज़ें
3. ऑयली और फ्राइड फूड अत्यधित वसा वाली चीज़ें
4. पुदीने का उपयोगप चॉकलेट का सेवन प अल्कोहल
5. कार्बोनेटेड ड्रिंक्सप कॉफी या कैफीन युक्त पेय पदार्थप मोटापा
6. गर्भावस्था
डॉक्टर से कब मिलें?
अगर हार्टबर्न की समस्या कभी-कभी हो तो इससे स्वास्थ्य को कोई गंभीर ख़तरा नहीं होता है, लेकिन अगर आपको बार-बार सीने में दर्द या जलन की समस्या हो रही है तो इसे नज़रअंदाज़ न करें. इसके अलावा निम्न लक्षण दिखाई दें तो डॉक्टर से संपर्क करें.
1. हफ़्ते में दो से अधिक बार हार्टबर्न होने पर.
2. अगर दवा लेने के बावजूद इसके लक्षण कम न हों.
3. खाद्य पदार्थों को खाने या निगलने में कठिनाई होने पर.
4. लगातार उल्टी और मितली जैसा महसूस होने पर.
5. भूख न लगने या खाने में दिक्कत होने व वज़न घटने पर.

Heartburn Causes
करें परहेज़ 
अपने डायट और लाइफस्टाइल में छोटे-छोटे बदलाव करके आप हार्टबर्न की समस्या से आसानी से निजात पा सकते हैं. अगर आप हार्टबर्न की समस्या को बढ़ाने वाले कारणों के बारे में जानते हैं तो उनसे बचने की कोशिश करें. इसके अलावा अपने डेली रूटीन में कुछ तरीक़ों को अपनाकर आप इस समस्या को कंट्रोल कर सकते हैं.
 न करें अम्लीय पदार्थों का सेवन
खट्टे फल, टमाटर, प्याज़, फैटी फूड और कैफीन जैसी चीज़ों का सेवन करने से एसिडिटी की समस्या हो सकती है और इन चीज़ों का अत्यधिक सेवन हार्टबर्न का कारण भी बन सकता है. इसलिए बेहतर यही होगा कि आप इन चीज़ों का सेवन बहुत सोच-समझकर करें.
भोजन को अच्छे से चबाएं
खाना खाते समय इस बात का विशेष ख़्याल रखना चाहिए कि हर एक निवाले को ठीक तरह से चबाकर खाया जाए, क्योंकि जो लोग बिना चबाए खाने को जल्दबाज़ी में खाते हैं उनमें पाचन संबंधी समस्याएं होती हैं. आगे चलकर ये समस्याएं हार्टबर्न का कारण बनती हैं. इनके अलावा कम पानी पीने से भी सीने में जलन हो सकती है.

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शराब और सिगरेट से तौबा 
स्मोकिंग करना और शराब का अत्यधिक सेवन करना हार्टबर्न की समस्या को जन्म देता है. इतना ही नहीं, यह पाचनतंत्र और शरीर के आंतरिक अंगों को प्रभावित कर अन्य गंभीर रोगों को भी जन्म दे सकता है. ऐसे में बेहतर यही होगा कि आप शराब और सिगरेट से दूरी बना लें.
अत्यधिक तनाव से बचें
हार्टबर्न के प्रमुख कारणों में से एक कारण तनाव भी है. अत्यधिक तनाव लेने की आदत या फिर डिप्रेशन आपको हार्टबर्न की समस्या दे सकता है, इसलिए तनाव मुक्त रहने के लिए योग करें और मेडिटेशन का सहारा लें. टाइट कपड़े न पहनेंअत्यधिक फिटिंग वाले टाइट कपड़े पहनने से हार्टबर्न की समस्या हो सकती है. टाइट कपड़ों के चलते कई बार पेट में बनने वाला एसिड फिर से भोजन नली में प्रवेश कर जाता है, जिसके कारण हार्टबर्न हो सकता है और आप सीने में जलन महसूस कर सकते हैं.
ग़ौर करें इन बातों पर
1. कई बार लोग हार्ट अटैक के लक्षणों को भी हार्टबर्न समझने की ग़लती कर बैठते हैं और समय पर इलाज नहीं कराते, जिसके चलते वो मौत के शिकार हो जाते हैं.
2.कुछ डकारों के बाद अगर स्थिति सुधर जाती है तो कोई बात नहीं, अन्यथा यह सुनिश्‍चित ज़रूर करें कि सीने में दर्द आपको पेट में गैस के कारण था या किसी और वजह से.
3. सीने में अगर असहजता बकरार रहे तो समय गवाएं बगैर तत्काल किसी डॉक्टर से संपर्क करें, वरना आगे चलकर स्थिति और भी गंभीर हो सकती है.
4 . एंटी एसिड दवा लेने के 20 मिनट बाद भी आराम न मिले तो यह हार्ट अटैक का लक्षण हो सकता है. ऐसे में मरीज़ को ईसीजी कराने के लिए तत्काल किसी नज़दीकी अस्पताल जाना चाहिए.
5. एसिड इनडाइजेशन के कारण सीने में होने वाले दर्द को कई लोग हार्ट अटैक समझकर भ्रमित हो जाते हैं. ऐसे में किसी कार्डियोलॉजिस्ट से मिलकर यह सुनिश्‍चित करें कि आपमें दिखाई देने वाले लक्षण गंभीर तो नहीं हैं.

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उच्च रक्तचाप के कारण व निवारण (Causes and Treatment of High Blood Pressure)

उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) कई बीमारियों का जड़ होता है. आख़िर क्यों होती है ये बीमारी और इससे कैसे बचा जा सकता है, बता रहे हैं फोर्टिस एस्कॉर्ट हार्ट इंंस्टिट्यूट, नई दिल्ली के कॉर्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के एडिशनल डायरेक्टर डॉ. अर्पित जायसवाल.

High Blood Pressure

1. मोटापा इसकी प्रमुख वजह है. 40 से अधिक इंच की कमर वाले पुरुष व 35 से अधिक इंच की कमर वाली महिलाओं को उच्च रक्तचाप का ख़तरा ज़्यादा होता है. अतः दिल की बीमारियों से बचना है तो वज़न को नियंत्रित रखें. वज़न घटाकर और कमर का आकार कम करके हार्ट अटैक का ख़तरा कम किया जा सकता है.
2. ज़्यादा तनाव लेने से कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है, जिसके परिणामस्वरूप उच्च रक्तचाप की शिकायत पैदा होती है.
3. धूम्रपान व शराब का सेवन भी दिल की सेहत पर बुरा प्रभाव डालता है. शराब का सेवन कम करें और धूम्रपान छोड़ दें. हफ़्ते में एक-दो शराब पीने में कोई हर्ज़ नहीं है, लेकिन इससे ज़्यादा शराब दिल के लिए हानिकारक होता है.
4. जिन लोगों की लाइफस्टाइल एक्टिव नहीं होती, उन्हें भी हृदय रोग और उच्च रक्तचाप का ख़तरा अन्य लोगों की तुलना में ज़्यादा होता है. इसलिए सप्ताह में कम से कम 5 दिन व्यायाम करें और संतुलित भोजन करें.
5. चाय, एनर्जी ड्रिंक और कैफीन युक्त खाद्य पदार्थ इंस्टेंट एनर्जी तो देते हैं, लेकिन इससे ब्लड प्रेशर बढ़ने का ख़तरा भी रहता है. अतः संतुलित मात्रा में कैफीन ग्रहण करें.

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रक्तचाप संतुलित रखने के लिए लें ये आहार 

केला
केला एक ऐसा फल है जिसका हाई ब्लडप्रेशर के मरीज़ों को नियमित रूप से सेवन करना चाहिए. केले में पोटैशियम प्रचुर मात्रा में होता है जो कि सोडियम के असर को कम करता हैे. रोज़ एक से दो केले का सेवन शुरू करें. केले के साथ आप सूखे खुबानी, किशमिश, संतरे का रस, पालक, बेक्ड आलू और कैंटोलॉप का भी सेवन कर सकते हैं.
अजवायन
अजवायन में मौजूद फाइटोकेमिकल उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में मदद करता है. यह धमनी की दीवारों और आस-पास की मांसपेशियों को आराम देता है, जिससे धमनियों में अधिक स्थान बनाने के साथ बिना बाधा के रक्त प्रवाह होता है. इसके
साथ-साथ यह तनाव पैदा करने वाले हार्मोन, जो कि रक्त वाहिकाओं को सिकोड़ते हैं, को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है.
नारियल पानी
उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों को शरीर में पानी की कमी नहीं होने देना चाहिए. रोज़ाना आठ से दस गिलास पानी पीना अच्छा होता है. रक्तचाप को कम करने के लिए नारियल का पानी विशेष रूप से फ़ायदेमंद है. नारियल के पानी के साथ, आप खाना पकाने में नारियल तेल का उपयोग भी कर सकते हैं.
काली मिर्च
हल्के उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों को काली मिर्च खाने से फ़ायदा होगा. यह प्लेटलेट्स के साथ मिलकर रक्त के थक्के बनने से रोकती है. आप फलों या सब्ज़ियों में कुछ काली मिर्च डाल सकते हैं या सूप में भी एक चुटकी काली मिर्च डाल सकते हैं.
प्याज़ का रस
प्याज़ भी आपके रक्तचाप को कम करने के लिए मददगार है. इसमें फ्लेवेनोल नामक एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होता है. एक मध्यम आकार की कच्ची प्याज़ नियमित रूप से खाने की कोशिश करें. आप एक से दो सप्ताह तक प्रतिदिन दो बार आधा चम्मच प्याज़ का रस शहद के साथ ले सकते हैं.
शहद
शहद दिल पर रक्त के दबाव को कम करती है. शहद रक्त वाहिकाओं पर असर करती है और यह उच्च रक्तचाप को कम करने में सहायक होती है. हर सुबह खाली पेट दो चम्मच शहद खाएं.
लहसुन
कई अध्ययनों में यह साबित हुआ है कि लहसुन में ब्लडप्रेशर कम करने की क्षमता होती है. कच्चा हो या पका हुआ, दोनों तरह का लहसुन उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में मददगार होता है. साथ ही यह कोलेस्ट्रॉल के स्तर को भी कम करता है. लहसुन नाइट्रिक ऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड के उत्पादन को उत्तेजित करके रक्त वाहिकाओं को आराम पहुंचाने में मददगार होता है. रोज़ाना एक या दो कुचले हुए लहसुन खाएं. आप इसे अपने हाथों से भी कुचल सकते हैं. लहसुन को कुचलने से हाइड्रोजन सल्फाइड पैदा होता है. यह रक्त प्रवाह को सामान्य रखता है, गैस निकालता है और दिल पर दबाव कम करता है.
मेथी के बीज
मेथी के बीज में उच्च पोटैशियम और फाइबर होने के कारण यह उच्च रक्तचाप को कम करने के लिए प्रभावी है. दो चम्मच मेथी के बीजों को पानी में लगभग दो मिनट तक उबालें और फिर इसे ठंडा कर लें. इसके बाद इसके बीज निकालकर उसका पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को रोज दो बार खाएं. अपने रक्तचाप के स्तर में महत्वपूर्ण सुधार के लिए इस उपाय को दो से तीन महीनों तक करें.
नींबू
नींबू धमनियों को नरम रखने में सहायक होता है. जब रक्त वाहिकाओं में कठोरता नहीं होगी तो उच्च रक्तचाप स्वाभाविक रूप से कम हो जाएगा. इसके अलावा आप नींबू के नियमित सेवन से हार्टफेल की संभावना को भी कम कर सकते हैं. विटामिन सी एक एंटीऑक्सीडेंट है, जो मुक्त कणों के हानिकारक प्रभावों को बेअसर करने में मदद करता है.
तरबूज के बीज
तरबूज के बीज में कूक्रोबोकिट्रिन नामक एक यौगिक होता है, जो कि रक्त कोशिकाओं को चौड़ा करने में मदद करता है. यह किडनी के कामकाज को बेहतर बनाने में भी मदद करता है, साथ ही यह रक्तचाप के स्तर को कम करता है.

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World TB Day: जानें क्षय रोग (टीबी) के लक्षण और उससे बचने के उपाय(Tuberculosis Causes, Vaccine, Symptoms & Treatment)

Tuberculosis, Causes, Vaccine, Symptoms, Treatment

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विश्व क्षय रोग दिवस (World TB Day) पूरे विश्व में आज यानी 24 मार्च को मनाया जाता है और इसका ध्येय है लोगों को इस बीमारी के विषय में जागरूक करना और टीबी की रोकथाम के लिए कदम उठाना है.  भारत में टीबी के फैलने का एक मुख्य कारण इस बीमारी के लिए लोगों सचेत ना होना और इसे शुरुआती दौर में गंभीरता से न लेना. टी.बी किसी को भी हो सकता है, इससे बचने के लिए कुछ सामान्य उपाय भी अपनाये जा सकते हैं. इसी बारे में ज़्यादा जानकारी के लिए हमने बात की डॉ. लविना मीरचंदानी, हेड ऑफ रेस्पिरेटरी डिपार्टमेंट, के.जी सोमैया हॉस्पिटल, मुंबई से.

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टीबी क्या है?

टीबी अर्थात ट्यूबरक्लोसिस एक संक्रामक रोग होता है, जो बैक्टीरिया की वजह से होता है. यह बैक्टीरिया शरीर के सभी अंगों में प्रवेश कर जाता है. हालांकि ये ज्यादातर फेफड़ों में ही पाया जाता है. मगर इसके अलावा आंतों, मस्तिष्क, हड्डियों, जोड़ों, गुर्दे, त्वचा तथा हृदय भी टीबी से ग्रसित हो सकते हैं.

टीबी के लक्षण

  • तीन हफ़्ते से ज़्यादा खांसी
  • बुखार (जो शाम को बढ़ जाता है)
  • छाती में तेज दर्द
  • वजन का अचानक घटना
  • भूख में कमी आना
  • बलगम के साथ खून का आना
  • बहुत ज्यादा फेफड़ों का इंफेक्शन

    ऐसे होता है टीबी का संक्रमण

    टीबी से संक्रमित रोगियों के कफ से, छींकने, खांसने, थूकने और उनके द्वारा छोड़ी गई सांस से वायु में बैक्टीरिया फैल जाते हैं, जोकि कई घंटों तक वायु में रह सकते हैं. जिस कारण स्वस्थ व्यक्ति भी आसानी से इसका शिकार बन सकता है. हालांकि संक्रमित व्यक्ति के कपड़े छूने या उससे हाथ मिलाने से टीबी नहीं फैलता. जब टीबी बैक्टीरिया सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंचता है तो वह कई गुना बढ़ जाता है और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है. हालांकि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता इसे बढ़ने से रोकती है, लेकिन जैसे-जैसे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ती है, टीबी के संक्रमण की आशंका बढ़ती जाती है.

    जांच के तरीक़े

    टीबी की जांच करने के कई माध्यम होते हैं, जैसे छाती का एक्स रे, बलगम की जांच, स्किन टेस्ट आदि. इसके अलावा आधुनिक तकनीक के माध्यम से आईजीएम हीमोग्लोबिन जांच कर भी टीबी का पता लगाया जा सकता है. अच्छी बात तो यह है कि इससे संबंधित जांच सरकार द्वारा निशुल्क करवाई जाती हैं.

    बचने के उपाय

    •    दो हफ्तों से अधिक समय तक खांसी रहती है, तो डॉक्टर को दिखाएं.
    •    बीमार व्यक्ति से दूर रहें.
    •    आपके आस-पास कोई बहुत देर तक खांस रहा है, तो उससे दूर रहें.
    •    अगर आप किसी बीमार व्याक्ति से मिलने जा रहे हैं, तो अपने हाथों को ज़रूर धोलें.
    •    पौष्टिक आहार लें जिसमें पर्याप्त  मात्रा में विटामिन्स , मिनेरल्स , कैल्शियम , प्रोटीन और फाइबर हों क्योंोकि पौष्टिक आहार हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है.
    •   अगर आपको अधिक समय से खांसी है, तो बलगम की जांच ज़रूर करा लें.

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बच्चों में बढ़ता निमोनिया का ख़तरा (Pneumonia: Symptoms & cause)

निमोनिया

निमोनिया

निमोनिया वैसे तो हर उम्र के लोगों के लिए ख़तरा होती है लेकिन इसका आक्रमण छोटे बच्चों, ख़ासकर नवजात शिशु से लेकर पांच साल के बच्चों को सबसे ज़्यादा होता है. यह बीमारी क़रीब-क़रीब हर मिनट देश के एक भविष्य को मौत की नींद सुला देती है. सबसे अहम् निमोनिया भारत में सर्दियों में विकराल रूप धारण कर लेती है. लिहाज़ा, ज़रूरत है वक़्त रहते चौकस होने की ताकि ढेर सारे नौनिहालों को इसकी भेंट चढ़ने से बचाया जा सके.

कैसे होता है निमोनिया ?
दरअसल, निमोनिया एक संक्रमण बीमारी है. हवा में मौजूद बैक्टीरिया और वायरस सांस के ज़रिए फेफड़ों में पहुंच कर उसे संक्रमित कर देते हैं. कई बार फंफूद की वजह से भी संक्रमण हो जाता है. लंग डिसीज़ या हार्ट डिसीज़ से पीड़ित व्यक्तियों को सीवियर निमोनिया होने का खतरा हमेशा रहता है. अब इसका इलाज संभव हो गया है. किसी क्वालिफाइड डॉक्टर से एंटीबॉयोटिक दवा लेकर निमोनिया से पूरी तरह मुक्त हुआ जा सकता है. आमतौर पर बैक्टीरिया जनित निमोनिया से पीड़ित मरीज़ दो से चार सप्ताह में ठीक हो जाता है. मगर वायरल जनित निमोनिया से पीड़ित मरीज़ के ठीक होने में ज़्यादा वक़्त लगता है. मरीज़ को तेल, मसालेदार और बाहर के खाने का परहेज करना चाहिए. पानी खूब पीना चाहिए.

निमोनिया के लक्षण

  • बुख़ार 103 या 104 डिग्री फारेनहाइट पहुंचना.
  • तेज़ सर्दी लगना और शरीर का ठंडा पड़ जाना.
  • खांसी के दौरान ललाई युक्तन कफ निकलना.
  • सीने में तेज़ दर्द व सांस लेने में भी कठिनाई.
  • त्वचा नीला पड़ना व मितली जैसा महसूस होना.
  • भूख न लगना, जोड़ों व टिश्यूज़ में दर्द होना.

अगर आपके बच्चे को 103 या 104 डिग्री फारेनहाइट तक बुख़ार है? उसे सर्दी भी लग रही है. शरीर भी ठंडा पड़ रहा है? उसे खांसी के साथ भी है, सीने में दर्द भी है. वह सांस लेने में कठिनाई महसूस कर रहा है? तो उसे शर्तिया निमोनिया बुख़ार है, क्योंकि ये तमाम लक्षण निमोनिया के ही हैं. ज़रूरत है फ़ौरन अलर्ट होने की, क्योंकि अपने देश में 4.30 करोड़ लोग निमोनिया से ग्रस्त हैं. 

हर घंटे 45 बच्चे तोड़ते हैं दम
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन की रिपोर्ट के
मुताबिक़ भारत में निमोनिया से हर
घंटे 45 से ज़्यादा बच्चों की
मौत हो जाती है.

निमोनिया के कारण

  • इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की छवि में निमोनिया का आम कारण बैक्टीरियम स्ट्रेप्टोकॉकस निमोनिया.
  • निमोनिया मुख्य रूप से बैक्टीरिया या वायरस द्वारा और कम आमतौर पर फफूंद और परजीवियों द्वारा होता है. हालांकि संक्रामक एजेंटों के 100 से ज़्यादा उपभेदों की पहचान हुई है लेकिन अधिकांश मामलों के लिये इनमें केवल कुछ ही ज़िम्मेदार हैं.
  • वायरस व बैक्टीरिया के मिश्रित कारण वाले संक्रमण बच्चों के संक्रमणों के मामलों में 45 फ़ीसदी तक और वयस्कों में 15 फ़ीसदी तक ज़िम्मेदार होते हैं. सावधानी के साथ किए गए टेस्ट के बावजूद क़रीब आधे मामलों में कारक एजेंट अलग नहीं किए जा सकते.
  • निमोनिया होने की संभावना को बढ़ाने वाले हालात और जोखिम कारकों में धूम्रपान, कमज़ोर इम्यूनिटी और तथा शराब की लत, सीरियस लंग डिसीज़, किडनी डिसीज़ और लिवर डिसीज़ शामिल हैं. एसिडिटी दबाने वाली दवाओं जैसे प्रोटॉन-पंप इन्हिबटर्स या एचटू ब्लॉकर्स का उपयोग निमोनिया के बढ़े जोखिम से संबंधित है.
  • उम्र का अधिक होना निमोनिया के होने को बढ़ावा देता है.

टीका, उचित पौष्टिक आहार
और पर्यावरण की स्वच्छता
के ज़रिए निमोनिया की
रोकाथाम संभव है.

कोलेस्ट्रॉल को कैसे करें कंट्रोल: कारण, लक्षण और उपचार (How to Control High Cholesterol: Causes, Symptoms, Treatments)

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हाई कोलेस्ट्रॉल हेल्थ व लाइफ दोनों को ही ख़तरा व नुक़सान पहुंचा सकता है, क्योंकि रक्त में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल कोरोनरी धमनियों में अवरोध पैदा करके हार्ट प्रॉब्लम व हार्ट अटैक जैसी घातक स्थिति को जन्म देता है. इसलिए ज़रूरी है इसे कंट्रोल में रखना.

कोलेस्ट्रॉल रक्त में पाया जानेवाला वसा (फैट) है. स्वस्थ जीवन के लिए यह बहुत ज़रूरी हैे, परंतु जब रक्त में इसकी मात्रा सामान्य से अधिक हो जाती है, तो रक्त में थक्के जम जाते हैं, जो हृदय के लिए घातक होता है. डॉक्टर्स के अनुसार, किसी भी उम्र के स्त्री-पुरुष में कोलेस्ट्रॉल का स्तर 200 एमजी/डीएल से कम ही रहना चाहिए.

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कोलेस्ट्रॉल क्यों ज़रूरी है?

कोलेस्ट्रॉल शरीर के क्रियाकलाप में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. यह कोशिकाओं की दीवारों का निर्माण करने और विभिन्न हार्मोंस को बैलेंस करने के लिए भी ज़रूरी होता है. इनमें एचडीएल को अच्छा कोलेस्ट्रॉल तथा एलडीएल को बुरा कोलेस्ट्रॉल कहते हैं.
एलडीएल को बुरा इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह कोरोनरी धमनियों में अवरोध उत्पन्न करता है, जिससे रक्त संचार में बाधा होती है और हार्ट अटैक की स्थिति पैदा होती है. एचडीएल कोलेस्ट्रॉल इसलिए अच्छा है, क्योंकि यह धमनियों में अवरोध बनने से रोकता है.

कोलेस्ट्रॉल के रिस्क फैक्टर्स

प हाई कोलेस्ट्रॉल से ग्रस्त लोगों में कोई लक्षण तब तक दिखाई नहीं देते, जब तक कोलेस्ट्रॉल दिल व दिमाग़ की तरफ़ जानेवाली धमनियों को काफ़ी संकरा नहीं कर देता है. इसके परिणामस्वरूप सीने में दर्द होता है.
प रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाने से पथरी रोग, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और गुर्दे की बीमारी हो सकती है.
प हाई कोलेस्ट्रॉल होने पर ये बढ़ते-बढ़ते नसों में उतर आता है, जिससे चलना-फिरना कठिन हो जाता है.
प हार्ट अटैक, किडनी डिसऑर्डर, थायरॉयड, लकवा जैसे रोग कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने से हो सकते हैं. इनसे बचने के लिए दवा के साथ-साथ अपने खानपान पर ध्यान देना भी ज़रूरी है. कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करके हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक जैसी बीमारियों की वजह से होनेवाली अकाल मृत्यु को रोका जा सकता है.

कोलेस्ट्रॉल के कारण और लक्षण

रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के कारणों को तीन भागों में बांटा गया है.
– कोलेस्ट्रॉल बढ़ानेवाले आहार यानी वसायुक्त खाद्य पदार्थ का अधिक मात्रा में लगातार सेवन करना.
– मेटाबॉलिक सिस्टम जब एलडीएल की मात्रा को पर्याप्त रूप में रक्त से बाहर नहीं कर पाता, तो रक्त में एलडीएल का स्तर बढ़ जाता है.
– तीसरी स्थिति वह होती है, जब लिवर कोलेस्ट्रॉल को अधिक मात्रा में बनाने लगता है.
उपरोक्त कारणों को यदि नियंत्रण में रखा जाए, तो हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी.
जहां तक लक्षणों की बात है, तो थकान, कमज़ोरी, सांस लेने में तकलीफ़, अधिक पसीना आना, सीने में दर्द, बेचैनी-सी महसूस होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं.

कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखने के लिए क्या खाएं?

– अपने खानपान में अधिकाधिक मौसमी फल व सब्ज़ियों को शामिल करें.
– इनमें संतरे का जूस प्रमुख है, जिसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है.
– ज़ीरो कोलेस्ट्रॉल वाले पदार्थ, जैसे- ताज़ा फल, सब्ज़ियां और फ़ाइबरयुक्त पदार्थ अपने भोजन में शामिल करें.
– सुबह नाश्ते में कॉर्नफ्लैक्स जैसे आहार फ़ायदेमंद रहते हैं.

ये न खाएं

– रेड मीट का सेवन न करें.
– दूध, बटर, घी, क्रीम यहां तक कि आइस्क्रीम जैसे पदार्थ, जिनमें भारी मात्रा मेें कोलेस्ट्रॉल होता है, खाने से बचें.
– मावा से बनी मिठाइयां स्लो पॉइज़न का काम करती हैं, इनसे दूर ही रहें.
– सिगरेट-शराब का सेवन कम करें.

सावधानियां

– दवा के अलावा कुछ सावधानियों और खानपान में सुधार लाकर भी कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल किया जा सकता है, क्योंकि खानपान व रहन-सहन के तौर-तरीक़ों में बिगड़ते संतुलन की वजह से ही शहरी लोग विशेष रूप से हाई कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) के शिकार हो रहे हैं.
– डॉक्टर की सलाह के अनुसार अपने खानपान और जीवनशैली में परिवर्तन करें.
– शरीर का वज़न बढ़ने न दें. शरीर की एक्स्ट्रा कैलोरीज़ बर्न करें यानी ज़्यादा से ज़्यादा पैदल चलें.
– नियमित एक्सरसाइज़ इसमें मददगार है. जॉगिंग, स्विमिंग, डांसिंग और एरोबिक्स नियमित रूप से करें.
– बिल्डिंग मेें चढ़ने के लिए लिफ़्ट की बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करें.
– यदि आपको हार्ट से जुड़ी बीमारी होने का ज़रा भी शक है, तो तुरंत हार्ट स्पेशलिस्ट की सलाह लें.
– जो लोग चिकनाई वाले आहार कम खाते हैं, उनके शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का अनुपात कम होता है.
– खाद्य पदार्थ ख़रीदते समय उनके लेबल गौर से पढ़ लें. ऐसे ही पदार्थ ख़रीदें, जिनमें वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम हो.

कोलेस्ट्रॉल की जांच

– 20 साल की उम्र से अधिक आयुवालों को हर 5 साल में कोलेस्ट्रॉल का टेस्ट ज़रूर करवाना चाहिए.
– टेस्ट में लिपोप्रोटीन टेस्ट करवाना ज़रूरी होता है, जिससे आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल पता चलता है.
– यह भी देखा गया है कि मेनोपॉज़ से पहले एक ही उम्र के स्त्री-पुरुषों में कोलेस्ट्रॉल का स्तर अलग-अलग होता है. स्त्रियों में पुरुषों के मुक़ाबले कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– लेकिन मेनोपॉज़ के बाद स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा कोलेस्ट्रॉल का स्तर काफ़ी ज़्यादा पाया जाता है.
– ऐसे में मेनोपॉज़ के बाद महिलाओं को अपने कोलेस्ट्रॉल स्तर पर ख़ास ध्यान देना चाहिए.

हाई कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने की होम रेमेडीज़

– 1 कप गर्म पानी में 1-1 टीस्पून शहद और नींबू का रस मिलाकर रोज़ सुबह पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर प्राकृतिक रूप से कम होता जाता है.
– 1 ग्लास पानी में 2 टेबलस्पून साबूत धनिया उबाल लें. ठंडा होने पर छान लें. इसे दिन में दो बार पीएं.
– प्याज़ का रस न स़िर्फ कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है, बल्कि खून साफ़ करके हृदय को भी मज़बूत करता है.
– विटामिन ई से भरपूर डायट लें, जैसे- सूरजमुखी के बीज, सोयाबीन ऑयल, अंकुरित अनाज आदि.
– विटामिन बी 6 भी लें.
– इसके अलावा रोज़ाना लहसुन खाएं. गुग्गुल भी बहुत फ़ायदेमंद है.
– गिलोय और कालीमिर्च पाउडर के मिश्रण को रोज़ाना दिन में दो बार 3 ग्राम की मात्रा में खाएं.
– 1 ग्लास पानी में 1 टीस्पून मेथी पाउडर मिलाकर 1 महीने तक रोज़ खाली पेट पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– मेथीदाने का नियमित सेवन भी काफ़ी फ़ायदेमंद होता है.
– रोज़ाना 1 टेबलस्पून शहद के सेवन से भी कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण में रहता है.
– कुकिंग के लिए सनफ्लावर ऑयल का ही इस्तेमाल करें.

 

– ऊषा गुप्ता

 

कोलेस्ट्रॉल लेवल तेज़ी से घटाने के 10+ असरदार व आसान उपाय (10+ Natural Ways to Lower Your Cholesterol Levels)

जानें कोलेस्ट्रॉल के रिस्क फैक्टर्स, ट्राई करें ये होम रेमेडीज़(Risk factors of Cholesterol: Try these home remedies)

Risk factors of Cholesterol

हृदय रोगियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए तक़रीबन हर डॉक्टर मरीज़ों को कोलेस्ट्रॉल से बचने की सलाह देते हैं. दिल के मरीज़ों के लिए कोलेस्ट्रॉल अभिशाप के समान है. आइए, शरीर में पर्याप्त मात्रा में कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखने के तरीक़ों और इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं के बारे में जानें.

Risk factors of Cholesterol

कोलेस्ट्रॉल रक्त में पाया जानेवाला वसा (फैट) है. स्वस्थ जीवन के लिए यह बहुत ज़रूरी हैे, परंतु जब रक्त में इसकी मात्रा सामान्य से अधिक हो जाती है, तो रक्त में थक्के जम जाते हैं, जो हृदय के लिए घातक होता है. डॉक्टर्स के अनुसार, किसी भी उम्र के स्त्री-पुरुष में कोलेस्ट्रॉल का स्तर 200 एमजी/डीएल से कम ही रहना चाहिए. हाई कोलेस्ट्रॉल व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवन दोनों को ही ख़तरा व नुक़सान पहुंचा सकता है, क्योंकि रक्त में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल कोरोनरी धमनियों में अवरोध पैदा करके हार्ट प्रॉब्लम व हार्ट अटैक जैसी घातक स्थिति को जन्म देता है.

 

कोलेस्ट्रॉल क्यों ज़रूरी है?

कोलेस्ट्रॉल शरीर के क्रियाकलाप में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. यह कोशिकाओं की दीवारों का निर्माण करने और विभिन्न हार्मोंस को बैलेंस करने के लिए भी ज़रूरी होता है. इनमें एचडीएल को अच्छा कोलेस्ट्रॉल तथा एलडीएल को बुरा कोलेस्ट्रॉल कहते हैं.
एलडीएल को बुरा इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह कोरोनरी धमनियों में अवरोध उत्पन्न करता है, जिससे रक्त संचार में बाधा होती है और हार्ट अटैक की स्थिति पैदा होती है. एचडीएल कोलेस्ट्रॉल इसलिए अच्छा है, क्योंकि यह धमनियों में अवरोध बनने से रोकता है.

 

कोलेस्ट्रॉल के रिस्क फैक्टर्स

– हाई कोलेस्ट्रॉल से ग्रस्त लोगों में कोई लक्षण तब तक दिखाई नहीं देते, जब तक कोलेस्ट्रॉल दिल व दिमाग़ की तरफ़ जानेवाली धमनियों को काफ़ी संकरा नहीं कर देता है. इसके परिणामस्वरूप सीने में दर्द होता है.
– रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाने से पथरी रोग, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और गुर्दे की बीमारी हो सकती है.
– हाई कोलेस्ट्रॉल होने पर ये बढ़ते-बढ़ते नसों में उतर आता है, जिससे चलना-फिरना कठिन हो जाता है.
– हार्ट अटैक, किडनी डिसऑर्डर, थायरॉयड, लकवा जैसे रोग कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने से हो सकते हैं. इनसे बचने के लिए दवा के साथ-साथ अपने खानपान पर ध्यान देना भी ज़रूरी है. कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करके हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक जैसी बीमारियों की वजह से होनेवाली अकाल मृत्यु को रोका जा सकता है.

कोलेस्ट्रॉल के कारण और लक्षण

रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के कारणों को तीन भागों में बांटा गया है.
– कोलेस्ट्रॉल बढ़ानेवाले आहार यानी वसायुक्त खाद्य पदार्थ का अधिक मात्रा में लगातार
सेवन करना.
– मेटाबॉलिक सिस्टम जब एलडीएल की मात्रा को पर्याप्त रूप में रक्त से बाहर नहीं कर पाता, तो रक्त में एलडीएल का स्तर बढ़ जाता है.
– तीसरी स्थिति वह होती है, जब लिवर कोलेस्ट्रॉल को अधिक मात्रा में बनाने लगता है.
उपरोक्त कारणों को यदि नियंत्रण में रखा जाए, तो हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी.जहां तक लक्षणों की बात है, तो थकान, कमज़ोरी, सांस लेने में तकलीफ़, अधिक पसीना आना, सीने में दर्द, बेचैनी-सी महसूस होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं.

कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखने के लिए क्या खाएं?

– अपने खानपान में अधिकाधिक मौसमी फल व सब्ज़ियों को शामिल करें.
– इनमें संतरे का जूस प्रमुख है, जिसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है.
– ज़ीरो कोलेस्ट्रॉल वाले पदार्थ, जैसे- ताज़ा फल, सब्ज़ियां और फ़ाइबरयुक्त पदार्थ अपने भोजन में शामिल करें.
– सुबह नाश्ते में कॉर्नफ्लैक्स जैसे आहार फ़ायदेमंद रहते हैं.

ये न खाएं

– रेड मीट का सेवन न करें.
– दूध, बटर, घी, क्रीम यहां तक कि आइस्क्रीम जैसे पदार्थ, जिनमें भारी मात्रा मेें कोलेस्ट्रॉल होता है, खाने से बचें.
– मावा से बनी मिठाइयां स्लो पॉइज़न का काम करती हैं, इनसे दूर ही रहें.
प सिगरेट-शराब का सेवन कम करें.

सावधानियां

– दवा के अलावा कुछ सावधानियों और खानपान में सुधार लाकर भी कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल किया जा सकता है, क्योंकि खानपान व रहन-सहन के तौर-तरीक़ों में बिगड़ते संतुलन की वजह से ही शहरी लोग विशेष रूप से हाई कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) के शिकार हो रहे हैं.
– डॉक्टर की सलाह के अनुसार अपने खानपान और जीवनशैली में परिवर्तन करें.
– शरीर का वज़न बढ़ने न दें. शरीर की एक्स्ट्रा कैलोरीज़ बर्न करें यानी ज़्यादा से ज़्यादा पैदल चलें.
– नियमित एक्सरसाइज़ इसमें मददगार है. जॉगिंग, स्विमिंग, डांसिंग और एरोबिक्स नियमित रूप से करें.
– बिल्डिंग मेें चढ़ने के लिए लिफ़्ट की बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करें.
– यदि आपको हार्ट से जुड़ी बीमारी होने का ज़रा भी शक है, तो तुरंत हार्ट स्पेशलिस्ट की सलाह लें.
– जो लोग चिकनाई वाले आहार कम खाते हैं, उनके शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का अनुपात कम होता है.
– खाद्य पदार्थ ख़रीदते समय उनके लेबल गौर से पढ़ लें. ऐसे ही पदार्थ ख़रीदें, जिनमें वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम हो.

कोलेस्ट्रॉल की जांच

– 20 साल की उम्र से अधिक आयुवालों को हर 5 साल में कोलेस्ट्रॉल का टेस्ट ज़रूर करवाना चाहिए.
– टेस्ट में लिपोप्रोटीन टेस्ट करवाना ज़रूरी होता है, जिससे आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल पता चलता है.
– यह भी देखा गया है कि मेनोपॉज़ से पहले एक ही उम्र के स्त्री-पुरुषों में कोलेस्ट्रॉल का स्तर अलग-अलग होता है. स्त्रियों में पुरुषों के मुक़ाबले कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– लेकिन मेनोपॉज़ के बाद स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा कोलेस्ट्रॉल का स्तर काफ़ी ज़्यादा पाया जाता है.
– ऐसे में मेनोपॉज़ के बाद महिलाओं को अपने कोलेस्ट्रॉल स्तर पर ख़ास ध्यान देना चाहिए.

हाई कोलेस्ट्रॉल को कम करने की होम रेमेडीज़

– 1 कप गर्म पानी में 1-1 टीस्पून शहद और नींबू का रस मिलाकर रोज़ सुबह पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर प्राकृतिक रूप से कम होता जाता है.
– 1 ग्लास पानी में 2 टेबलस्पून साबूत धनिया उबाल लें. ठंडा होने पर छान लें. इसे दिन में दो बार पीएं.
– प्याज़ का रस न स़िर्फ कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है, बल्कि खून साफ़ करके हृदय को भी मज़बूत करता है.
– विटामिन ई से भरपूर डायट लें, जैसे- सूरजमुखी के बीज, सोयाबीन ऑयल, अंकुरित अनाज आदि.
– विटामिन बी 6 भी लें.
– इसके अलावा रोज़ाना लहसुन खाएं. गुग्गुल भी बहुत फ़ायदेमंद है.
– गिलोय और कालीमिर्च पाउडर के मिश्रण को रोज़ाना दिन में दो बार 3 ग्राम की मात्रा में खाएं.
– 1 ग्लास पानी में 1 टीस्पून मेथी पाउडर मिलाकर 1 महीने तक रोज़ खाली पेट पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– मेथीदाने का नियमित सेवन भी काफ़ी फ़ायदेमंद होता है.
– रोज़ाना 1 टेबलस्पून शहद के सेवन से भी कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण में रहता है.
– कुकिंग के लिए सनफ्लावर ऑयल का ही इस्तेमाल करें.

– ऊषा गुप्ता

 

सावधानः रोज़ाना की ये आदतें आपको कर सकती हैं बीमार (Everyday Habits That Can Make You Sick)

कैसे करें हार्मोंस को बैलेंसःहोम रेमेडीज़ (20 wonderful Home Remedies for Hormonal Imbalance)

Home Remedies for Hormonal Imbalance

हार्मोंस का बैलेंस स्वस्थ रहने के लिए बेहद ज़रूरी है. हमारी भूख, नींद, स्वाद और मूड से लेकर सेक्स लाइफ तक हार्मोंस द्वारा प्रभावित होती है. ऐसे में जब भी हार्मोंस का असंतुलन होता है, हमारा स्वास्थ्य बिगड़ता है. बहुत ज़रूरी है कि हार्मोंस का संतुलन बना रहे, ताकि हम हमेशा स्वस्थ और फिट रहें. (Home Remedies for Hormonal Imbalance)

Home Remedies for Hormonal Imbalance

अगर ड्राई स्किन, वज़न बढ़ना, नींद न आना या बहुत अधिक नींद आना, इंफर्टिलिटी आदि समस्याएं आपको घेर लें, तो काफ़ी हद तक संभव है कि इसकी वजह हार्मोंस का असंतुलन ही है.
हार्मोंस क्या होते हैं?
ये शरीर के केमिकल मेसेंजर होते हैं. ये रक्तप्रवाह द्वारा टिश्यूज़ या अन्य अंगों तक पहुंचते हैं. ये धीरे-धीरे समय के साथ शरीर में काम करते हैं और बहुत-सी चीज़ों को प्रभावित करते हैं, जैसे-
–  शरीर का विकास व निर्माण
– मेटाबॉलिज़्म- जो खाना हम खाते हैं, उससे कैसे शरीर को ऊर्जा मिलती है
– सेक्सुअल क्रिया
– रिप्रोडक्शन
– मूड आदि.

 

हार्मोंस के असंतुलन के सामान्य लक्षण ( Home Remedies for Hormonal Imbalance)
वज़न बढ़ना: हेल्दी रहने के लिए हेल्दी लाइफस्टाइल ज़रूरी है, लेकिन हर किसी पर यह बात लागू नहीं होती. हार्मोंस के असंतुलन से हेल्दी लाइफस्टाइल के बावजूद वज़न बढ़ सकता है. ऐसे में बेहतर होगा कि प्रोसेस्ड फूड, शुगर व गेहूं को अवॉइड करें.
पेट पर फैट्स का बढ़ना: जब एंडोक्राइन सिस्टम पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, तो शरीर भविष्य के लिए फैट्स स्टोर करने लगता है, इस वजह से पेट पर फैट्स बढ़ जाता है, जबकि शरीर में थकान रहती है.
सेक्स की इच्छा में कमी: इसकी शुरुआत नींद में कमी से होती है, क्योंकि क्वालिटी नींद के बिना सेक्स हार्मोंस का निर्माण कम होता है. यह एक महत्वपूर्ण लक्षण है हार्मोंस में असंतुलन का.
थकान: हर व़क्त थकान महसूस करने का मतलब है हार्मोंस का संतुलन ठीक नहीं. आप डायट में बदलाव लाएं, जैसे- गेहूं व अनाज से दूर रहें. इससे बहुत फ़र्क़ पड़ेगा.
चिंता, चिड़चिड़ापन और अवसाद: मूड में परिवर्तन यह बताता है कि आप बहुत ज़्यादा तनाव में हैं और अपना ध्यान नहीं रख रहे, जिस वजह से हार्मोंस असंतुलित हो रहे हैं. बेहतर होगा ख़ुद के लिए कुछ करें. हेल्दी डायट, एक्सरसाइज़, योगा को अपने रूटीन का हिस्सा बनाएं और रिलैक्स करें.
अनिद्रा और डिस्टर्ब्ड स्लीप: हार्मोंस के असंतुलन से नींद बेहद प्रभावित होती है.
पसीना अधिक आना: नाइट स्वेट्स और हॉट फ्लैशेज़ महिलाओं में हार्मोनल बदलाव की निशानी हैं. अचानक रात को तेज़ गर्मी व पसीना आने का मतलब है हार्मोंस में परिवर्तन हो रहा है. यह ख़ासतौर से मेनोपॉज़ के समय होता है, जब हार्मोंस काफ़ी तेज़ी से बदलते हैं.
पाचन संबंधी समस्या: स्ट्रेस के कारण जो हार्मोंस में बदलाव होता है, उससे कई समस्याएं हो सकती हैं, जिनमें से पाचन से जुड़ी समस्या भी एक है. गैस, बदहज़मी या कब्ज़ की समस्या हार्मोंस में बदलाव का संकेत भी हो सकती है. इसके अलावा सिरदर्द, बदनदर्द, कई मानसिक समस्याएं भी हार्मोंस में बदलाव के कारण होती हैं.
क्या करें कि बना रहे हार्मोंस का संतुलन?
– हाई ओमेगा 6 पॉलीअनसैचुरेटेड फैट्स को अवॉइड करें. हमारे शरीर को बहुत ही कम मात्रा में पॉलीअनसैचुरेटेड फैट्स की ज़रूरत होती है, लेकिन जब हम इन्हें अधिक मात्रा में लेने लगते हैं, तो शरीर इन्हें ही हार्मोंस के निर्माण के काम में प्रयोग करने लगता है, जिससे स्वास्थ्य को नुक़सान पहुंच सकता है. बेहतर होगा वेजीटेबल ऑयल्स, जैसे- पीनट, कनोला, सोयाबीन आदि का इस्तेमाल कम करके कोकोनट ऑयल, रियल बटर, ऑलिव ऑयल (बिना गर्म किए) और एनीमल फैट्स का प्रयोग करें.
– कैफीन की मात्रा कम करें. सीमित मात्रा में चाय-कॉफी ठीक है, लेकिन बहुत अधिक मात्रा में कैफीन से एंडोक्राइन सिस्टम पर विपरीत प्रभाव पड़ता है.
– टॉक्सिन्स शरीर में न जाने पाएं, इसका ख़्याल भी रखें. पेस्टिसाइड्स, प्लास्टिक्स व कोटेड बर्तनों का प्रयोग कम करें, क्योंकि इनमें ऐसे केमिकल्स होते हैं, जो शरीर को हार्मोंस निर्माण करनेवाले तत्वों का आभास देते हैं, जिससे शरीर इन्हीं तत्वों से हार्मोंस बनाने लगता है और शरीर में नेचुरल व हेल्दी हार्मोंस का निर्माण रुक सकता है. यदि आपके हार्मोंस असंतुलित हैं या आप कंसीव नहीं कर पा रहे, तो इन टॉक्सिन्स से दूर रहना बेहद ज़रूरी है. स्टील या कांच के बर्तनों का प्रयोग करें, नॉनस्टिक से दूर रहें और स्टोरेज के लिए भी प्लास्टिक का प्रयोग न करें.

यह भी पढ़ें: बादाम के हेल्थ बेनिफिट्स

यह भी पढ़ें: बॉडी के अनुसार डाइट

– नारियल के तेल को अपने डायट में शामिल करें. यह हार्मोंस के संतुलन में मदद करता है. यह वज़न को भी नियंत्रित करता है.
हल्की-फुल्की एक्सरसाइज़ करें, क्योंकि बहुत हैवी एक्सरसाइज़ से समस्या बढ़ सकती है. बेहतर होगा योग व प्राणायाम करें. आप वॉकिंग और जॉगिंग भी कर सकते हैं.
– हेल्दी डायट लें. गाजर में अलग तरह का फाइबर होता है, जो अतिरिक्त एस्ट्रोजेन को शरीर से बाहर निकालकर डिटॉक्सीफिकेशन में मदद करता है. गाजर खाएं, ख़ासतौर से वो महिलाएं, जो पीएमएस (माहवारी से पहले होनेवाली समस्याएं) से परेशान हों.
ब्रोकोली, पत्तागोभी व फूलगोभी जैसी सब्ज़ियों में फाइटोन्यूट्रिएंट्स की भरमार होती है, जो टॉक्सिन्स को कंट्रोल करके हार्मोंस को बैलेंस रखते हैं और कैंसर जैसे रोगों से बचाव भी करते हैं.
– फ्लैक्ससीड भी बहुत हेल्दी है. अपने डेली डायट में 2-3 टीस्पून फ्लैक्ससीड को शामिल करें.
– ग्रीन टी मेटाबॉलिज़्म को बेहतर करके फैट्स भी बर्न करती है. इसमें मौजूद थियानाइन नामक नेचुरल कंपाउंड हार्मोंस का संतुलन बनाए रखने में कारगर है.
– एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल हेल्दी होता है और वेजीटेबल ऑयल की बजाय इसे डायट में शामिल करें.
– एवोकैडो में बीटा-साइटॉस्टेरॉल नाम का प्राकृतिक तत्व होता है, जो ब्लड कोलेस्ट्रॉल को कम करने के साथ-साथ स्ट्रेस हार्मोंस
(कोर्टिसॉल) को भी बैलेंस करता है. यह एड्रेनल ग्लैंड द्वारा बनाए जानेवाले हार्मोन (डीएचईए) के कम होते स्तर को बहाल करता है.
– ड्रायफ्रूट्स बहुत हेल्दी होते हैं. बादाम में प्रोटीन, फाइबर और कई तरह के पोषक तत्व होते हैं. अखरोट में मेलाटोनिन होता है. यह एक तरह का हार्मोन होता है, जो अच्छी नींद में सहायक होता है. इसमें भूख को नियंत्रण में रखनेवाले तत्व होते हैं. शोध में पाया गया है कि हफ़्ते में 5 दिन मुट्ठीभर अखरोट खाने से आवश्यक फैट्स शरीर को मिल जाता है, जो लैप्टिन (एक प्रकार का प्रोटीन) के निर्माण को बढ़ाता है. लैप्टिन ही वह तत्व है, जो भूख को नियंत्रित करता है.
– पानी उचित मात्रा में पीएं, क्योंकि डिहाइड्रेशन के कारण कुछ हार्मोंस का निर्माण अधिक होने लगता है. बेहतर होगा शरीर में पानी की कमी न होने दी जाए.
– दालचीनी भी हार्मोंस को संतुलित रखने में सहायक है. दालचीनी पाउडर को अपने डायट में शामिल करें. यह इंसुलिन को भी काफ़ी हद तक संतुलित रखता है.
– ओट्स न स़िर्फ ढेर सारे पोषक तत्वों से भरपूर होता है, ये ब्लड शुगर व इंसुलिन को भी संतुलित रखता है. ओट्स आपके हार्मोंस का बैलेंस बनाए रखता है और आपको हेल्दी भी बनाता है.
– दही बहुत हेल्दी होता है. ये शरीर में हेल्दी बैक्टीरिया के संतुलन को बनाए रखता है और बहुत-से हार्मोंस को भी संतुलित रखता है. इम्यूनिटी बढ़ाता है और शोधों से पता चला है कि आधा कप दही रोज़ खाने से सर्दी और फ्लू होने की फ्रिक्वेंसी कम होती है.
– अनार को ज़रूर डायट में शामिल करें. अध्ययन बताते हैं कि अनार कैंसर उत्पन्न करनेवाले हार्मोंस को नियंत्रित करके कैंसर से बचाव करता है.
– हल्दी न स़िर्फ खाने का स्वाद बढ़ाती है, बल्कि इसका हार्मोंस बैलेंसिंग इफेक्ट हमें हेल्दी भी रखता है.
– डार्क चॉकलेट मूड ठीक करके डिप्रेशन दूर करता है. यह एंडॉर्फिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाता है और इसमें मौजूद कई अन्य तत्व भी फील गुड के एहसास को बढ़ानेवाले हार्मोंस को बढ़ाकर डिप्रेशन दूर करते हैं. रोज़ डार्क चॉकलेट का 1 इंच का ब्लॉक खाएं.
– अदरक, लहसुन, कालीमिर्च, जीरा, करीपत्ता आदि में भी हार्मोंस को संतुलित रखने के गुण होते हैं. इन सभी को अपने डेली डायट में शामिल करें.

– गीता शर्मा

 

पर्सनल प्रॉब्लम्स: क्या है हार्मोनल इंट्रायूटेराइन कॉन्ट्रासेप्टिव?

ब्रेस्ट कैंसर से डरें नहीं लड़ें !(Fight Breast Cancer )

Fight Breast Cancer

ब्रेस्ट कैंसर (Breast Cancer) से पीड़ित महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. जागरूकता की कमी और बदलती लाइफस्टाइल इसका मुख्य कारण है. महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरूकता लाने के लिए अक्टूबर माह को पूरी दुनिया में ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाया जाता है. ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरूक करने की एक कोशिश हमारी भी.

 Fight Breast Cancer

हमारे देश में ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. भारत में तो करीब 22-25 % महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित हैं. जागरूकता की कमी और बदलती लाइफस्टाइल इसके मुख्य कारण हैं, लेकिन अगर थोड़ी सावधानी बरती जाए तो इससे बचा जा सकता है.

 

क्या हैं कारण?

 

– ग़लत लाइफस्टाइल
– देर से शादी और लेट प्रेंग्नेंसी
– बच्चों को ब्रेस्ट फीडिंग न कराना
– रेडियाएक्टिव व केमिकल्स का एक्सपोज़र
– फैमिली हिस्ट्री
– ओबेसिटी
– हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी
– अर्ली पीरियड्स और देरी से मेनोपॉज. जिन महिलाओं को पीरियड्स जल्दी शुरू हो जाता है और मेनोपॉज़ लेट होता है, उन्हें ब्रेस्ट कैंसर होने की संभावना ज़्यादा होती है.
– बढती उम्र भी ब्रेस्ट कैंसर की बड़ी वजह है. ब्रेस्ट कैंसर के 80% मामले 50+ की उम्र की महिलाओं में देखे जाते हैं.
– जिन महिलाओं का कद लंबा होता है, उन्हें भी ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क ज़्यादा होता है.
– अल्कोहल पीने और स्मोकिंग करनेवाली महिलाएं भी रिस्क जोन में होती हैं.
– नाइट शिफ्ट में काम करनेवाली महिलाओं को भी ख़तरा ज़्यादा होता है.

 

क्या हो सकते हैं लक्षण

– ब्रेस्ट में गांठ या सूजन
– अंडरआर्म्स में गांठ, सूजन या दर्द.
– ब्रेस्ट की त्वचा का लाल हो जाना
– निप्पल से डिस्चार्ज
– ब्रेस्ट के आकार में बदलाव
– निप्पल का अंदर धंस जाना
– निप्पल या ब्रेस्ट की त्वचा का निकलना
अगर उपरोक्त लक्षण दिखाई दें तो फौरन डॉक्टर को कंसल्ट करें और ज़रूरी जांच जाएं.
ब्रेस्ट चेकअप ज़रूरी
– समय-समय पर ब्रेस्ट की जांच करती रहें, ताकि समय रहते इनके लक्षणों को पहचानकर इलाज किया जा सके.
– सेल्फ ब्रेस्ट एक्ज़ामिनेशन करें.
– अपने गायनेकोलॉजिस्ट से चेकअप करवाएं और ज़रूरी हो तो मेमोग्राफी भी करवाएं.
– इसके अलावा डॉक्टर आपको ब्रेस्ट की सोनाग्राफी. 2 डी या 3 डी मेमोग्राम, ब्रेस्ट एमआरआई, बायोप्सी करवाने की सलाह भी दे सकते हैं.

अगर आपको ब्रेस्ट कैंसर का पता चल जाए तो डरें नहीं. एक बात ध्यान रखें, कैंसर लाइलाज नहीं है. जितना जल्दी कैंसर के बारे में पता चलेगा, जितनी जल्दी आप ट्रीटमेंट शुरू करेंगी, इलाज उतना ही आसान हो जाएगा. कैंसर का टाइप, स्टेज, मरीज़ की हेल्थ कंडीशन, उसकी उम्र आदि को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर इलाज की प्रक्रिया तय करते हैं.

 

सावधानियांः अपनाएं हेल्दी हैबिट्स

– वज़न को कंट्रोल रखें.
– जितना ज़्यादा हो सके, फल और सब्ज़ियां खाएं.
– एक्सरसाइज़ करें व एक्टिव रहें.
– ब्रेस्ट फीडिंग ब्रेस्ट कैंसर से प्रोटेक्ट करता है. इसलिए अपने बच्चे को ब्रेस्ट फीड ज़रूर कराएं.
– शराब और सिगरेट से दूर रहें.
– स्ट्रेस से दूर रहें. पॉज़िटिव सोच रखें.

 

 

एक नज़र आंकड़ों पर

 

 

इंडियन काउंसिल फॉर मेडीकल रिसर्च (आईसीएमआर) के मुताबिक़ भारत में महिलाओं में औसतन 23 फीसदी कैंसर स्तन कैंसर होते हैं. कैंसर से होने वाली कुल मौंतों में 50 फीसदी का कारण स्तन कैंसर है. हर साल स्तन कैंसर के एक लाख पंद्रह हज़ार (1,15,000) नए मरीज़ सामने आते हैं, जिनमें 53 हज़ार की मौत हो जाती है. यानी हर दो नए स्तन कैंसर मरीज़ में एक की मौत हो जाती है. आईसीएमआर के मुताबिक़ स्तन कैंसर रोगियों की तादाद ढाई लाख के ऊपर है. स्तन कैंसर के सबसे ज़्यादा मामले 45 से 55 की उम्र के बीच होते हैं. क़रीब 70 फीसदी मामलों में स्तन कैंसर के मरीज़ के अस्पताल पहुंचने के समय ट्यूमर का आकार पांच सेंटीमीटर से ज़्यादा यानी मरीज़ थर्ड स्टेज में होता है. पहले स्टेज के पांच फ़ीसदी मरीज़ अस्पताल पहुंच पाते हैं.