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उच्च रक्तचाप के कारण व निवारण (Causes and Treatment of High Blood Pressure)

उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) कई बीमारियों का जड़ होता है. आख़िर क्यों होती है ये बीमारी और इससे कैसे बचा जा सकता है, बता रहे हैं फोर्टिस एस्कॉर्ट हार्ट इंंस्टिट्यूट, नई दिल्ली के कॉर्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के एडिशनल डायरेक्टर डॉ. अर्पित जायसवाल.

High Blood Pressure

1. मोटापा इसकी प्रमुख वजह है. 40 से अधिक इंच की कमर वाले पुरुष व 35 से अधिक इंच की कमर वाली महिलाओं को उच्च रक्तचाप का ख़तरा ज़्यादा होता है. अतः दिल की बीमारियों से बचना है तो वज़न को नियंत्रित रखें. वज़न घटाकर और कमर का आकार कम करके हार्ट अटैक का ख़तरा कम किया जा सकता है.
2. ज़्यादा तनाव लेने से कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है, जिसके परिणामस्वरूप उच्च रक्तचाप की शिकायत पैदा होती है.
3. धूम्रपान व शराब का सेवन भी दिल की सेहत पर बुरा प्रभाव डालता है. शराब का सेवन कम करें और धूम्रपान छोड़ दें. हफ़्ते में एक-दो शराब पीने में कोई हर्ज़ नहीं है, लेकिन इससे ज़्यादा शराब दिल के लिए हानिकारक होता है.
4. जिन लोगों की लाइफस्टाइल एक्टिव नहीं होती, उन्हें भी हृदय रोग और उच्च रक्तचाप का ख़तरा अन्य लोगों की तुलना में ज़्यादा होता है. इसलिए सप्ताह में कम से कम 5 दिन व्यायाम करें और संतुलित भोजन करें.
5. चाय, एनर्जी ड्रिंक और कैफीन युक्त खाद्य पदार्थ इंस्टेंट एनर्जी तो देते हैं, लेकिन इससे ब्लड प्रेशर बढ़ने का ख़तरा भी रहता है. अतः संतुलित मात्रा में कैफीन ग्रहण करें.

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रक्तचाप संतुलित रखने के लिए लें ये आहार 

केला
केला एक ऐसा फल है जिसका हाई ब्लडप्रेशर के मरीज़ों को नियमित रूप से सेवन करना चाहिए. केले में पोटैशियम प्रचुर मात्रा में होता है जो कि सोडियम के असर को कम करता हैे. रोज़ एक से दो केले का सेवन शुरू करें. केले के साथ आप सूखे खुबानी, किशमिश, संतरे का रस, पालक, बेक्ड आलू और कैंटोलॉप का भी सेवन कर सकते हैं.
अजवायन
अजवायन में मौजूद फाइटोकेमिकल उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में मदद करता है. यह धमनी की दीवारों और आस-पास की मांसपेशियों को आराम देता है, जिससे धमनियों में अधिक स्थान बनाने के साथ बिना बाधा के रक्त प्रवाह होता है. इसके
साथ-साथ यह तनाव पैदा करने वाले हार्मोन, जो कि रक्त वाहिकाओं को सिकोड़ते हैं, को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है.
नारियल पानी
उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों को शरीर में पानी की कमी नहीं होने देना चाहिए. रोज़ाना आठ से दस गिलास पानी पीना अच्छा होता है. रक्तचाप को कम करने के लिए नारियल का पानी विशेष रूप से फ़ायदेमंद है. नारियल के पानी के साथ, आप खाना पकाने में नारियल तेल का उपयोग भी कर सकते हैं.
काली मिर्च
हल्के उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों को काली मिर्च खाने से फ़ायदा होगा. यह प्लेटलेट्स के साथ मिलकर रक्त के थक्के बनने से रोकती है. आप फलों या सब्ज़ियों में कुछ काली मिर्च डाल सकते हैं या सूप में भी एक चुटकी काली मिर्च डाल सकते हैं.
प्याज़ का रस
प्याज़ भी आपके रक्तचाप को कम करने के लिए मददगार है. इसमें फ्लेवेनोल नामक एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होता है. एक मध्यम आकार की कच्ची प्याज़ नियमित रूप से खाने की कोशिश करें. आप एक से दो सप्ताह तक प्रतिदिन दो बार आधा चम्मच प्याज़ का रस शहद के साथ ले सकते हैं.
शहद
शहद दिल पर रक्त के दबाव को कम करती है. शहद रक्त वाहिकाओं पर असर करती है और यह उच्च रक्तचाप को कम करने में सहायक होती है. हर सुबह खाली पेट दो चम्मच शहद खाएं.
लहसुन
कई अध्ययनों में यह साबित हुआ है कि लहसुन में ब्लडप्रेशर कम करने की क्षमता होती है. कच्चा हो या पका हुआ, दोनों तरह का लहसुन उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में मददगार होता है. साथ ही यह कोलेस्ट्रॉल के स्तर को भी कम करता है. लहसुन नाइट्रिक ऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड के उत्पादन को उत्तेजित करके रक्त वाहिकाओं को आराम पहुंचाने में मददगार होता है. रोज़ाना एक या दो कुचले हुए लहसुन खाएं. आप इसे अपने हाथों से भी कुचल सकते हैं. लहसुन को कुचलने से हाइड्रोजन सल्फाइड पैदा होता है. यह रक्त प्रवाह को सामान्य रखता है, गैस निकालता है और दिल पर दबाव कम करता है.
मेथी के बीज
मेथी के बीज में उच्च पोटैशियम और फाइबर होने के कारण यह उच्च रक्तचाप को कम करने के लिए प्रभावी है. दो चम्मच मेथी के बीजों को पानी में लगभग दो मिनट तक उबालें और फिर इसे ठंडा कर लें. इसके बाद इसके बीज निकालकर उसका पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को रोज दो बार खाएं. अपने रक्तचाप के स्तर में महत्वपूर्ण सुधार के लिए इस उपाय को दो से तीन महीनों तक करें.
नींबू
नींबू धमनियों को नरम रखने में सहायक होता है. जब रक्त वाहिकाओं में कठोरता नहीं होगी तो उच्च रक्तचाप स्वाभाविक रूप से कम हो जाएगा. इसके अलावा आप नींबू के नियमित सेवन से हार्टफेल की संभावना को भी कम कर सकते हैं. विटामिन सी एक एंटीऑक्सीडेंट है, जो मुक्त कणों के हानिकारक प्रभावों को बेअसर करने में मदद करता है.
तरबूज के बीज
तरबूज के बीज में कूक्रोबोकिट्रिन नामक एक यौगिक होता है, जो कि रक्त कोशिकाओं को चौड़ा करने में मदद करता है. यह किडनी के कामकाज को बेहतर बनाने में भी मदद करता है, साथ ही यह रक्तचाप के स्तर को कम करता है.

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World TB Day: जानें क्षय रोग (टीबी) के लक्षण और उससे बचने के उपाय(Tuberculosis Causes, Vaccine, Symptoms & Treatment)

Tuberculosis, Causes, Vaccine, Symptoms, Treatment

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विश्व क्षय रोग दिवस (World TB Day) पूरे विश्व में आज यानी 24 मार्च को मनाया जाता है और इसका ध्येय है लोगों को इस बीमारी के विषय में जागरूक करना और टीबी की रोकथाम के लिए कदम उठाना है.  भारत में टीबी के फैलने का एक मुख्य कारण इस बीमारी के लिए लोगों सचेत ना होना और इसे शुरुआती दौर में गंभीरता से न लेना. टी.बी किसी को भी हो सकता है, इससे बचने के लिए कुछ सामान्य उपाय भी अपनाये जा सकते हैं. इसी बारे में ज़्यादा जानकारी के लिए हमने बात की डॉ. लविना मीरचंदानी, हेड ऑफ रेस्पिरेटरी डिपार्टमेंट, के.जी सोमैया हॉस्पिटल, मुंबई से.

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टीबी क्या है?

टीबी अर्थात ट्यूबरक्लोसिस एक संक्रामक रोग होता है, जो बैक्टीरिया की वजह से होता है. यह बैक्टीरिया शरीर के सभी अंगों में प्रवेश कर जाता है. हालांकि ये ज्यादातर फेफड़ों में ही पाया जाता है. मगर इसके अलावा आंतों, मस्तिष्क, हड्डियों, जोड़ों, गुर्दे, त्वचा तथा हृदय भी टीबी से ग्रसित हो सकते हैं.

टीबी के लक्षण

  • तीन हफ़्ते से ज़्यादा खांसी
  • बुखार (जो शाम को बढ़ जाता है)
  • छाती में तेज दर्द
  • वजन का अचानक घटना
  • भूख में कमी आना
  • बलगम के साथ खून का आना
  • बहुत ज्यादा फेफड़ों का इंफेक्शन

    ऐसे होता है टीबी का संक्रमण

    टीबी से संक्रमित रोगियों के कफ से, छींकने, खांसने, थूकने और उनके द्वारा छोड़ी गई सांस से वायु में बैक्टीरिया फैल जाते हैं, जोकि कई घंटों तक वायु में रह सकते हैं. जिस कारण स्वस्थ व्यक्ति भी आसानी से इसका शिकार बन सकता है. हालांकि संक्रमित व्यक्ति के कपड़े छूने या उससे हाथ मिलाने से टीबी नहीं फैलता. जब टीबी बैक्टीरिया सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंचता है तो वह कई गुना बढ़ जाता है और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है. हालांकि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता इसे बढ़ने से रोकती है, लेकिन जैसे-जैसे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ती है, टीबी के संक्रमण की आशंका बढ़ती जाती है.

    जांच के तरीक़े

    टीबी की जांच करने के कई माध्यम होते हैं, जैसे छाती का एक्स रे, बलगम की जांच, स्किन टेस्ट आदि. इसके अलावा आधुनिक तकनीक के माध्यम से आईजीएम हीमोग्लोबिन जांच कर भी टीबी का पता लगाया जा सकता है. अच्छी बात तो यह है कि इससे संबंधित जांच सरकार द्वारा निशुल्क करवाई जाती हैं.

    बचने के उपाय

    •    दो हफ्तों से अधिक समय तक खांसी रहती है, तो डॉक्टर को दिखाएं.
    •    बीमार व्यक्ति से दूर रहें.
    •    आपके आस-पास कोई बहुत देर तक खांस रहा है, तो उससे दूर रहें.
    •    अगर आप किसी बीमार व्याक्ति से मिलने जा रहे हैं, तो अपने हाथों को ज़रूर धोलें.
    •    पौष्टिक आहार लें जिसमें पर्याप्त  मात्रा में विटामिन्स , मिनेरल्स , कैल्शियम , प्रोटीन और फाइबर हों क्योंोकि पौष्टिक आहार हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है.
    •   अगर आपको अधिक समय से खांसी है, तो बलगम की जांच ज़रूर करा लें.

    ये भी पढ़ेंः पैरासिटामॉल या आईब्रू़फेन? क्या है बेहतर 

बच्चों में बढ़ता निमोनिया का ख़तरा (Pneumonia: Symptoms & cause)

निमोनिया

निमोनिया

निमोनिया वैसे तो हर उम्र के लोगों के लिए ख़तरा होती है लेकिन इसका आक्रमण छोटे बच्चों, ख़ासकर नवजात शिशु से लेकर पांच साल के बच्चों को सबसे ज़्यादा होता है. यह बीमारी क़रीब-क़रीब हर मिनट देश के एक भविष्य को मौत की नींद सुला देती है. सबसे अहम् निमोनिया भारत में सर्दियों में विकराल रूप धारण कर लेती है. लिहाज़ा, ज़रूरत है वक़्त रहते चौकस होने की ताकि ढेर सारे नौनिहालों को इसकी भेंट चढ़ने से बचाया जा सके.

कैसे होता है निमोनिया ?
दरअसल, निमोनिया एक संक्रमण बीमारी है. हवा में मौजूद बैक्टीरिया और वायरस सांस के ज़रिए फेफड़ों में पहुंच कर उसे संक्रमित कर देते हैं. कई बार फंफूद की वजह से भी संक्रमण हो जाता है. लंग डिसीज़ या हार्ट डिसीज़ से पीड़ित व्यक्तियों को सीवियर निमोनिया होने का खतरा हमेशा रहता है. अब इसका इलाज संभव हो गया है. किसी क्वालिफाइड डॉक्टर से एंटीबॉयोटिक दवा लेकर निमोनिया से पूरी तरह मुक्त हुआ जा सकता है. आमतौर पर बैक्टीरिया जनित निमोनिया से पीड़ित मरीज़ दो से चार सप्ताह में ठीक हो जाता है. मगर वायरल जनित निमोनिया से पीड़ित मरीज़ के ठीक होने में ज़्यादा वक़्त लगता है. मरीज़ को तेल, मसालेदार और बाहर के खाने का परहेज करना चाहिए. पानी खूब पीना चाहिए.

निमोनिया के लक्षण

  • बुख़ार 103 या 104 डिग्री फारेनहाइट पहुंचना.
  • तेज़ सर्दी लगना और शरीर का ठंडा पड़ जाना.
  • खांसी के दौरान ललाई युक्तन कफ निकलना.
  • सीने में तेज़ दर्द व सांस लेने में भी कठिनाई.
  • त्वचा नीला पड़ना व मितली जैसा महसूस होना.
  • भूख न लगना, जोड़ों व टिश्यूज़ में दर्द होना.

अगर आपके बच्चे को 103 या 104 डिग्री फारेनहाइट तक बुख़ार है? उसे सर्दी भी लग रही है. शरीर भी ठंडा पड़ रहा है? उसे खांसी के साथ भी है, सीने में दर्द भी है. वह सांस लेने में कठिनाई महसूस कर रहा है? तो उसे शर्तिया निमोनिया बुख़ार है, क्योंकि ये तमाम लक्षण निमोनिया के ही हैं. ज़रूरत है फ़ौरन अलर्ट होने की, क्योंकि अपने देश में 4.30 करोड़ लोग निमोनिया से ग्रस्त हैं. 

हर घंटे 45 बच्चे तोड़ते हैं दम
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन की रिपोर्ट के
मुताबिक़ भारत में निमोनिया से हर
घंटे 45 से ज़्यादा बच्चों की
मौत हो जाती है.

निमोनिया के कारण

  • इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की छवि में निमोनिया का आम कारण बैक्टीरियम स्ट्रेप्टोकॉकस निमोनिया.
  • निमोनिया मुख्य रूप से बैक्टीरिया या वायरस द्वारा और कम आमतौर पर फफूंद और परजीवियों द्वारा होता है. हालांकि संक्रामक एजेंटों के 100 से ज़्यादा उपभेदों की पहचान हुई है लेकिन अधिकांश मामलों के लिये इनमें केवल कुछ ही ज़िम्मेदार हैं.
  • वायरस व बैक्टीरिया के मिश्रित कारण वाले संक्रमण बच्चों के संक्रमणों के मामलों में 45 फ़ीसदी तक और वयस्कों में 15 फ़ीसदी तक ज़िम्मेदार होते हैं. सावधानी के साथ किए गए टेस्ट के बावजूद क़रीब आधे मामलों में कारक एजेंट अलग नहीं किए जा सकते.
  • निमोनिया होने की संभावना को बढ़ाने वाले हालात और जोखिम कारकों में धूम्रपान, कमज़ोर इम्यूनिटी और तथा शराब की लत, सीरियस लंग डिसीज़, किडनी डिसीज़ और लिवर डिसीज़ शामिल हैं. एसिडिटी दबाने वाली दवाओं जैसे प्रोटॉन-पंप इन्हिबटर्स या एचटू ब्लॉकर्स का उपयोग निमोनिया के बढ़े जोखिम से संबंधित है.
  • उम्र का अधिक होना निमोनिया के होने को बढ़ावा देता है.

टीका, उचित पौष्टिक आहार
और पर्यावरण की स्वच्छता
के ज़रिए निमोनिया की
रोकाथाम संभव है.

कोलेस्ट्रॉल को कैसे करें कंट्रोल: कारण, लक्षण और उपचार (How to Control High Cholesterol: Causes, Symptoms, Treatments)

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हाई कोलेस्ट्रॉल हेल्थ व लाइफ दोनों को ही ख़तरा व नुक़सान पहुंचा सकता है, क्योंकि रक्त में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल कोरोनरी धमनियों में अवरोध पैदा करके हार्ट प्रॉब्लम व हार्ट अटैक जैसी घातक स्थिति को जन्म देता है. इसलिए ज़रूरी है इसे कंट्रोल में रखना.

कोलेस्ट्रॉल रक्त में पाया जानेवाला वसा (फैट) है. स्वस्थ जीवन के लिए यह बहुत ज़रूरी हैे, परंतु जब रक्त में इसकी मात्रा सामान्य से अधिक हो जाती है, तो रक्त में थक्के जम जाते हैं, जो हृदय के लिए घातक होता है. डॉक्टर्स के अनुसार, किसी भी उम्र के स्त्री-पुरुष में कोलेस्ट्रॉल का स्तर 200 एमजी/डीएल से कम ही रहना चाहिए.

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कोलेस्ट्रॉल क्यों ज़रूरी है?

कोलेस्ट्रॉल शरीर के क्रियाकलाप में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. यह कोशिकाओं की दीवारों का निर्माण करने और विभिन्न हार्मोंस को बैलेंस करने के लिए भी ज़रूरी होता है. इनमें एचडीएल को अच्छा कोलेस्ट्रॉल तथा एलडीएल को बुरा कोलेस्ट्रॉल कहते हैं.
एलडीएल को बुरा इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह कोरोनरी धमनियों में अवरोध उत्पन्न करता है, जिससे रक्त संचार में बाधा होती है और हार्ट अटैक की स्थिति पैदा होती है. एचडीएल कोलेस्ट्रॉल इसलिए अच्छा है, क्योंकि यह धमनियों में अवरोध बनने से रोकता है.

कोलेस्ट्रॉल के रिस्क फैक्टर्स

प हाई कोलेस्ट्रॉल से ग्रस्त लोगों में कोई लक्षण तब तक दिखाई नहीं देते, जब तक कोलेस्ट्रॉल दिल व दिमाग़ की तरफ़ जानेवाली धमनियों को काफ़ी संकरा नहीं कर देता है. इसके परिणामस्वरूप सीने में दर्द होता है.
प रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाने से पथरी रोग, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और गुर्दे की बीमारी हो सकती है.
प हाई कोलेस्ट्रॉल होने पर ये बढ़ते-बढ़ते नसों में उतर आता है, जिससे चलना-फिरना कठिन हो जाता है.
प हार्ट अटैक, किडनी डिसऑर्डर, थायरॉयड, लकवा जैसे रोग कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने से हो सकते हैं. इनसे बचने के लिए दवा के साथ-साथ अपने खानपान पर ध्यान देना भी ज़रूरी है. कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करके हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक जैसी बीमारियों की वजह से होनेवाली अकाल मृत्यु को रोका जा सकता है.

कोलेस्ट्रॉल के कारण और लक्षण

रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के कारणों को तीन भागों में बांटा गया है.
– कोलेस्ट्रॉल बढ़ानेवाले आहार यानी वसायुक्त खाद्य पदार्थ का अधिक मात्रा में लगातार सेवन करना.
– मेटाबॉलिक सिस्टम जब एलडीएल की मात्रा को पर्याप्त रूप में रक्त से बाहर नहीं कर पाता, तो रक्त में एलडीएल का स्तर बढ़ जाता है.
– तीसरी स्थिति वह होती है, जब लिवर कोलेस्ट्रॉल को अधिक मात्रा में बनाने लगता है.
उपरोक्त कारणों को यदि नियंत्रण में रखा जाए, तो हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी.
जहां तक लक्षणों की बात है, तो थकान, कमज़ोरी, सांस लेने में तकलीफ़, अधिक पसीना आना, सीने में दर्द, बेचैनी-सी महसूस होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं.

कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखने के लिए क्या खाएं?

– अपने खानपान में अधिकाधिक मौसमी फल व सब्ज़ियों को शामिल करें.
– इनमें संतरे का जूस प्रमुख है, जिसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है.
– ज़ीरो कोलेस्ट्रॉल वाले पदार्थ, जैसे- ताज़ा फल, सब्ज़ियां और फ़ाइबरयुक्त पदार्थ अपने भोजन में शामिल करें.
– सुबह नाश्ते में कॉर्नफ्लैक्स जैसे आहार फ़ायदेमंद रहते हैं.

ये न खाएं

– रेड मीट का सेवन न करें.
– दूध, बटर, घी, क्रीम यहां तक कि आइस्क्रीम जैसे पदार्थ, जिनमें भारी मात्रा मेें कोलेस्ट्रॉल होता है, खाने से बचें.
– मावा से बनी मिठाइयां स्लो पॉइज़न का काम करती हैं, इनसे दूर ही रहें.
– सिगरेट-शराब का सेवन कम करें.

सावधानियां

– दवा के अलावा कुछ सावधानियों और खानपान में सुधार लाकर भी कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल किया जा सकता है, क्योंकि खानपान व रहन-सहन के तौर-तरीक़ों में बिगड़ते संतुलन की वजह से ही शहरी लोग विशेष रूप से हाई कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) के शिकार हो रहे हैं.
– डॉक्टर की सलाह के अनुसार अपने खानपान और जीवनशैली में परिवर्तन करें.
– शरीर का वज़न बढ़ने न दें. शरीर की एक्स्ट्रा कैलोरीज़ बर्न करें यानी ज़्यादा से ज़्यादा पैदल चलें.
– नियमित एक्सरसाइज़ इसमें मददगार है. जॉगिंग, स्विमिंग, डांसिंग और एरोबिक्स नियमित रूप से करें.
– बिल्डिंग मेें चढ़ने के लिए लिफ़्ट की बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करें.
– यदि आपको हार्ट से जुड़ी बीमारी होने का ज़रा भी शक है, तो तुरंत हार्ट स्पेशलिस्ट की सलाह लें.
– जो लोग चिकनाई वाले आहार कम खाते हैं, उनके शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का अनुपात कम होता है.
– खाद्य पदार्थ ख़रीदते समय उनके लेबल गौर से पढ़ लें. ऐसे ही पदार्थ ख़रीदें, जिनमें वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम हो.

कोलेस्ट्रॉल की जांच

– 20 साल की उम्र से अधिक आयुवालों को हर 5 साल में कोलेस्ट्रॉल का टेस्ट ज़रूर करवाना चाहिए.
– टेस्ट में लिपोप्रोटीन टेस्ट करवाना ज़रूरी होता है, जिससे आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल पता चलता है.
– यह भी देखा गया है कि मेनोपॉज़ से पहले एक ही उम्र के स्त्री-पुरुषों में कोलेस्ट्रॉल का स्तर अलग-अलग होता है. स्त्रियों में पुरुषों के मुक़ाबले कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– लेकिन मेनोपॉज़ के बाद स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा कोलेस्ट्रॉल का स्तर काफ़ी ज़्यादा पाया जाता है.
– ऐसे में मेनोपॉज़ के बाद महिलाओं को अपने कोलेस्ट्रॉल स्तर पर ख़ास ध्यान देना चाहिए.

हाई कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने की होम रेमेडीज़

– 1 कप गर्म पानी में 1-1 टीस्पून शहद और नींबू का रस मिलाकर रोज़ सुबह पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर प्राकृतिक रूप से कम होता जाता है.
– 1 ग्लास पानी में 2 टेबलस्पून साबूत धनिया उबाल लें. ठंडा होने पर छान लें. इसे दिन में दो बार पीएं.
– प्याज़ का रस न स़िर्फ कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है, बल्कि खून साफ़ करके हृदय को भी मज़बूत करता है.
– विटामिन ई से भरपूर डायट लें, जैसे- सूरजमुखी के बीज, सोयाबीन ऑयल, अंकुरित अनाज आदि.
– विटामिन बी 6 भी लें.
– इसके अलावा रोज़ाना लहसुन खाएं. गुग्गुल भी बहुत फ़ायदेमंद है.
– गिलोय और कालीमिर्च पाउडर के मिश्रण को रोज़ाना दिन में दो बार 3 ग्राम की मात्रा में खाएं.
– 1 ग्लास पानी में 1 टीस्पून मेथी पाउडर मिलाकर 1 महीने तक रोज़ खाली पेट पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– मेथीदाने का नियमित सेवन भी काफ़ी फ़ायदेमंद होता है.
– रोज़ाना 1 टेबलस्पून शहद के सेवन से भी कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण में रहता है.
– कुकिंग के लिए सनफ्लावर ऑयल का ही इस्तेमाल करें.

 

– ऊषा गुप्ता

 

कोलेस्ट्रॉल लेवल तेज़ी से घटाने के 10+ असरदार व आसान उपाय (10+ Natural Ways to Lower Your Cholesterol Levels)

जानें कोलेस्ट्रॉल के रिस्क फैक्टर्स, ट्राई करें ये होम रेमेडीज़(Risk factors of Cholesterol: Try these home remedies)

Risk factors of Cholesterol

हृदय रोगियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए तक़रीबन हर डॉक्टर मरीज़ों को कोलेस्ट्रॉल से बचने की सलाह देते हैं. दिल के मरीज़ों के लिए कोलेस्ट्रॉल अभिशाप के समान है. आइए, शरीर में पर्याप्त मात्रा में कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखने के तरीक़ों और इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं के बारे में जानें.

Risk factors of Cholesterol

कोलेस्ट्रॉल रक्त में पाया जानेवाला वसा (फैट) है. स्वस्थ जीवन के लिए यह बहुत ज़रूरी हैे, परंतु जब रक्त में इसकी मात्रा सामान्य से अधिक हो जाती है, तो रक्त में थक्के जम जाते हैं, जो हृदय के लिए घातक होता है. डॉक्टर्स के अनुसार, किसी भी उम्र के स्त्री-पुरुष में कोलेस्ट्रॉल का स्तर 200 एमजी/डीएल से कम ही रहना चाहिए. हाई कोलेस्ट्रॉल व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवन दोनों को ही ख़तरा व नुक़सान पहुंचा सकता है, क्योंकि रक्त में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल कोरोनरी धमनियों में अवरोध पैदा करके हार्ट प्रॉब्लम व हार्ट अटैक जैसी घातक स्थिति को जन्म देता है.

 

कोलेस्ट्रॉल क्यों ज़रूरी है?

कोलेस्ट्रॉल शरीर के क्रियाकलाप में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. यह कोशिकाओं की दीवारों का निर्माण करने और विभिन्न हार्मोंस को बैलेंस करने के लिए भी ज़रूरी होता है. इनमें एचडीएल को अच्छा कोलेस्ट्रॉल तथा एलडीएल को बुरा कोलेस्ट्रॉल कहते हैं.
एलडीएल को बुरा इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह कोरोनरी धमनियों में अवरोध उत्पन्न करता है, जिससे रक्त संचार में बाधा होती है और हार्ट अटैक की स्थिति पैदा होती है. एचडीएल कोलेस्ट्रॉल इसलिए अच्छा है, क्योंकि यह धमनियों में अवरोध बनने से रोकता है.

 

कोलेस्ट्रॉल के रिस्क फैक्टर्स

– हाई कोलेस्ट्रॉल से ग्रस्त लोगों में कोई लक्षण तब तक दिखाई नहीं देते, जब तक कोलेस्ट्रॉल दिल व दिमाग़ की तरफ़ जानेवाली धमनियों को काफ़ी संकरा नहीं कर देता है. इसके परिणामस्वरूप सीने में दर्द होता है.
– रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाने से पथरी रोग, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और गुर्दे की बीमारी हो सकती है.
– हाई कोलेस्ट्रॉल होने पर ये बढ़ते-बढ़ते नसों में उतर आता है, जिससे चलना-फिरना कठिन हो जाता है.
– हार्ट अटैक, किडनी डिसऑर्डर, थायरॉयड, लकवा जैसे रोग कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने से हो सकते हैं. इनसे बचने के लिए दवा के साथ-साथ अपने खानपान पर ध्यान देना भी ज़रूरी है. कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करके हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक जैसी बीमारियों की वजह से होनेवाली अकाल मृत्यु को रोका जा सकता है.

कोलेस्ट्रॉल के कारण और लक्षण

रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के कारणों को तीन भागों में बांटा गया है.
– कोलेस्ट्रॉल बढ़ानेवाले आहार यानी वसायुक्त खाद्य पदार्थ का अधिक मात्रा में लगातार
सेवन करना.
– मेटाबॉलिक सिस्टम जब एलडीएल की मात्रा को पर्याप्त रूप में रक्त से बाहर नहीं कर पाता, तो रक्त में एलडीएल का स्तर बढ़ जाता है.
– तीसरी स्थिति वह होती है, जब लिवर कोलेस्ट्रॉल को अधिक मात्रा में बनाने लगता है.
उपरोक्त कारणों को यदि नियंत्रण में रखा जाए, तो हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी.जहां तक लक्षणों की बात है, तो थकान, कमज़ोरी, सांस लेने में तकलीफ़, अधिक पसीना आना, सीने में दर्द, बेचैनी-सी महसूस होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं.

कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखने के लिए क्या खाएं?

– अपने खानपान में अधिकाधिक मौसमी फल व सब्ज़ियों को शामिल करें.
– इनमें संतरे का जूस प्रमुख है, जिसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है.
– ज़ीरो कोलेस्ट्रॉल वाले पदार्थ, जैसे- ताज़ा फल, सब्ज़ियां और फ़ाइबरयुक्त पदार्थ अपने भोजन में शामिल करें.
– सुबह नाश्ते में कॉर्नफ्लैक्स जैसे आहार फ़ायदेमंद रहते हैं.

ये न खाएं

– रेड मीट का सेवन न करें.
– दूध, बटर, घी, क्रीम यहां तक कि आइस्क्रीम जैसे पदार्थ, जिनमें भारी मात्रा मेें कोलेस्ट्रॉल होता है, खाने से बचें.
– मावा से बनी मिठाइयां स्लो पॉइज़न का काम करती हैं, इनसे दूर ही रहें.
प सिगरेट-शराब का सेवन कम करें.

सावधानियां

– दवा के अलावा कुछ सावधानियों और खानपान में सुधार लाकर भी कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल किया जा सकता है, क्योंकि खानपान व रहन-सहन के तौर-तरीक़ों में बिगड़ते संतुलन की वजह से ही शहरी लोग विशेष रूप से हाई कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) के शिकार हो रहे हैं.
– डॉक्टर की सलाह के अनुसार अपने खानपान और जीवनशैली में परिवर्तन करें.
– शरीर का वज़न बढ़ने न दें. शरीर की एक्स्ट्रा कैलोरीज़ बर्न करें यानी ज़्यादा से ज़्यादा पैदल चलें.
– नियमित एक्सरसाइज़ इसमें मददगार है. जॉगिंग, स्विमिंग, डांसिंग और एरोबिक्स नियमित रूप से करें.
– बिल्डिंग मेें चढ़ने के लिए लिफ़्ट की बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करें.
– यदि आपको हार्ट से जुड़ी बीमारी होने का ज़रा भी शक है, तो तुरंत हार्ट स्पेशलिस्ट की सलाह लें.
– जो लोग चिकनाई वाले आहार कम खाते हैं, उनके शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का अनुपात कम होता है.
– खाद्य पदार्थ ख़रीदते समय उनके लेबल गौर से पढ़ लें. ऐसे ही पदार्थ ख़रीदें, जिनमें वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम हो.

कोलेस्ट्रॉल की जांच

– 20 साल की उम्र से अधिक आयुवालों को हर 5 साल में कोलेस्ट्रॉल का टेस्ट ज़रूर करवाना चाहिए.
– टेस्ट में लिपोप्रोटीन टेस्ट करवाना ज़रूरी होता है, जिससे आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल पता चलता है.
– यह भी देखा गया है कि मेनोपॉज़ से पहले एक ही उम्र के स्त्री-पुरुषों में कोलेस्ट्रॉल का स्तर अलग-अलग होता है. स्त्रियों में पुरुषों के मुक़ाबले कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– लेकिन मेनोपॉज़ के बाद स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा कोलेस्ट्रॉल का स्तर काफ़ी ज़्यादा पाया जाता है.
– ऐसे में मेनोपॉज़ के बाद महिलाओं को अपने कोलेस्ट्रॉल स्तर पर ख़ास ध्यान देना चाहिए.

हाई कोलेस्ट्रॉल को कम करने की होम रेमेडीज़

– 1 कप गर्म पानी में 1-1 टीस्पून शहद और नींबू का रस मिलाकर रोज़ सुबह पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर प्राकृतिक रूप से कम होता जाता है.
– 1 ग्लास पानी में 2 टेबलस्पून साबूत धनिया उबाल लें. ठंडा होने पर छान लें. इसे दिन में दो बार पीएं.
– प्याज़ का रस न स़िर्फ कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है, बल्कि खून साफ़ करके हृदय को भी मज़बूत करता है.
– विटामिन ई से भरपूर डायट लें, जैसे- सूरजमुखी के बीज, सोयाबीन ऑयल, अंकुरित अनाज आदि.
– विटामिन बी 6 भी लें.
– इसके अलावा रोज़ाना लहसुन खाएं. गुग्गुल भी बहुत फ़ायदेमंद है.
– गिलोय और कालीमिर्च पाउडर के मिश्रण को रोज़ाना दिन में दो बार 3 ग्राम की मात्रा में खाएं.
– 1 ग्लास पानी में 1 टीस्पून मेथी पाउडर मिलाकर 1 महीने तक रोज़ खाली पेट पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– मेथीदाने का नियमित सेवन भी काफ़ी फ़ायदेमंद होता है.
– रोज़ाना 1 टेबलस्पून शहद के सेवन से भी कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण में रहता है.
– कुकिंग के लिए सनफ्लावर ऑयल का ही इस्तेमाल करें.

– ऊषा गुप्ता

 

सावधानः रोज़ाना की ये आदतें आपको कर सकती हैं बीमार (Everyday Habits That Can Make You Sick)

कैसे करें हार्मोंस को बैलेंसःहोम रेमेडीज़ (20 wonderful Home Remedies for Hormonal Imbalance)

Home Remedies for Hormonal Imbalance

हार्मोंस का बैलेंस स्वस्थ रहने के लिए बेहद ज़रूरी है. हमारी भूख, नींद, स्वाद और मूड से लेकर सेक्स लाइफ तक हार्मोंस द्वारा प्रभावित होती है. ऐसे में जब भी हार्मोंस का असंतुलन होता है, हमारा स्वास्थ्य बिगड़ता है. बहुत ज़रूरी है कि हार्मोंस का संतुलन बना रहे, ताकि हम हमेशा स्वस्थ और फिट रहें. (Home Remedies for Hormonal Imbalance)

Home Remedies for Hormonal Imbalance

अगर ड्राई स्किन, वज़न बढ़ना, नींद न आना या बहुत अधिक नींद आना, इंफर्टिलिटी आदि समस्याएं आपको घेर लें, तो काफ़ी हद तक संभव है कि इसकी वजह हार्मोंस का असंतुलन ही है.
हार्मोंस क्या होते हैं?
ये शरीर के केमिकल मेसेंजर होते हैं. ये रक्तप्रवाह द्वारा टिश्यूज़ या अन्य अंगों तक पहुंचते हैं. ये धीरे-धीरे समय के साथ शरीर में काम करते हैं और बहुत-सी चीज़ों को प्रभावित करते हैं, जैसे-
–  शरीर का विकास व निर्माण
– मेटाबॉलिज़्म- जो खाना हम खाते हैं, उससे कैसे शरीर को ऊर्जा मिलती है
– सेक्सुअल क्रिया
– रिप्रोडक्शन
– मूड आदि.

 

हार्मोंस के असंतुलन के सामान्य लक्षण ( Home Remedies for Hormonal Imbalance)
वज़न बढ़ना: हेल्दी रहने के लिए हेल्दी लाइफस्टाइल ज़रूरी है, लेकिन हर किसी पर यह बात लागू नहीं होती. हार्मोंस के असंतुलन से हेल्दी लाइफस्टाइल के बावजूद वज़न बढ़ सकता है. ऐसे में बेहतर होगा कि प्रोसेस्ड फूड, शुगर व गेहूं को अवॉइड करें.
पेट पर फैट्स का बढ़ना: जब एंडोक्राइन सिस्टम पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, तो शरीर भविष्य के लिए फैट्स स्टोर करने लगता है, इस वजह से पेट पर फैट्स बढ़ जाता है, जबकि शरीर में थकान रहती है.
सेक्स की इच्छा में कमी: इसकी शुरुआत नींद में कमी से होती है, क्योंकि क्वालिटी नींद के बिना सेक्स हार्मोंस का निर्माण कम होता है. यह एक महत्वपूर्ण लक्षण है हार्मोंस में असंतुलन का.
थकान: हर व़क्त थकान महसूस करने का मतलब है हार्मोंस का संतुलन ठीक नहीं. आप डायट में बदलाव लाएं, जैसे- गेहूं व अनाज से दूर रहें. इससे बहुत फ़र्क़ पड़ेगा.
चिंता, चिड़चिड़ापन और अवसाद: मूड में परिवर्तन यह बताता है कि आप बहुत ज़्यादा तनाव में हैं और अपना ध्यान नहीं रख रहे, जिस वजह से हार्मोंस असंतुलित हो रहे हैं. बेहतर होगा ख़ुद के लिए कुछ करें. हेल्दी डायट, एक्सरसाइज़, योगा को अपने रूटीन का हिस्सा बनाएं और रिलैक्स करें.
अनिद्रा और डिस्टर्ब्ड स्लीप: हार्मोंस के असंतुलन से नींद बेहद प्रभावित होती है.
पसीना अधिक आना: नाइट स्वेट्स और हॉट फ्लैशेज़ महिलाओं में हार्मोनल बदलाव की निशानी हैं. अचानक रात को तेज़ गर्मी व पसीना आने का मतलब है हार्मोंस में परिवर्तन हो रहा है. यह ख़ासतौर से मेनोपॉज़ के समय होता है, जब हार्मोंस काफ़ी तेज़ी से बदलते हैं.
पाचन संबंधी समस्या: स्ट्रेस के कारण जो हार्मोंस में बदलाव होता है, उससे कई समस्याएं हो सकती हैं, जिनमें से पाचन से जुड़ी समस्या भी एक है. गैस, बदहज़मी या कब्ज़ की समस्या हार्मोंस में बदलाव का संकेत भी हो सकती है. इसके अलावा सिरदर्द, बदनदर्द, कई मानसिक समस्याएं भी हार्मोंस में बदलाव के कारण होती हैं.
क्या करें कि बना रहे हार्मोंस का संतुलन?
– हाई ओमेगा 6 पॉलीअनसैचुरेटेड फैट्स को अवॉइड करें. हमारे शरीर को बहुत ही कम मात्रा में पॉलीअनसैचुरेटेड फैट्स की ज़रूरत होती है, लेकिन जब हम इन्हें अधिक मात्रा में लेने लगते हैं, तो शरीर इन्हें ही हार्मोंस के निर्माण के काम में प्रयोग करने लगता है, जिससे स्वास्थ्य को नुक़सान पहुंच सकता है. बेहतर होगा वेजीटेबल ऑयल्स, जैसे- पीनट, कनोला, सोयाबीन आदि का इस्तेमाल कम करके कोकोनट ऑयल, रियल बटर, ऑलिव ऑयल (बिना गर्म किए) और एनीमल फैट्स का प्रयोग करें.
– कैफीन की मात्रा कम करें. सीमित मात्रा में चाय-कॉफी ठीक है, लेकिन बहुत अधिक मात्रा में कैफीन से एंडोक्राइन सिस्टम पर विपरीत प्रभाव पड़ता है.
– टॉक्सिन्स शरीर में न जाने पाएं, इसका ख़्याल भी रखें. पेस्टिसाइड्स, प्लास्टिक्स व कोटेड बर्तनों का प्रयोग कम करें, क्योंकि इनमें ऐसे केमिकल्स होते हैं, जो शरीर को हार्मोंस निर्माण करनेवाले तत्वों का आभास देते हैं, जिससे शरीर इन्हीं तत्वों से हार्मोंस बनाने लगता है और शरीर में नेचुरल व हेल्दी हार्मोंस का निर्माण रुक सकता है. यदि आपके हार्मोंस असंतुलित हैं या आप कंसीव नहीं कर पा रहे, तो इन टॉक्सिन्स से दूर रहना बेहद ज़रूरी है. स्टील या कांच के बर्तनों का प्रयोग करें, नॉनस्टिक से दूर रहें और स्टोरेज के लिए भी प्लास्टिक का प्रयोग न करें.

यह भी पढ़ें: बादाम के हेल्थ बेनिफिट्स

यह भी पढ़ें: बॉडी के अनुसार डाइट

– नारियल के तेल को अपने डायट में शामिल करें. यह हार्मोंस के संतुलन में मदद करता है. यह वज़न को भी नियंत्रित करता है.
हल्की-फुल्की एक्सरसाइज़ करें, क्योंकि बहुत हैवी एक्सरसाइज़ से समस्या बढ़ सकती है. बेहतर होगा योग व प्राणायाम करें. आप वॉकिंग और जॉगिंग भी कर सकते हैं.
– हेल्दी डायट लें. गाजर में अलग तरह का फाइबर होता है, जो अतिरिक्त एस्ट्रोजेन को शरीर से बाहर निकालकर डिटॉक्सीफिकेशन में मदद करता है. गाजर खाएं, ख़ासतौर से वो महिलाएं, जो पीएमएस (माहवारी से पहले होनेवाली समस्याएं) से परेशान हों.
ब्रोकोली, पत्तागोभी व फूलगोभी जैसी सब्ज़ियों में फाइटोन्यूट्रिएंट्स की भरमार होती है, जो टॉक्सिन्स को कंट्रोल करके हार्मोंस को बैलेंस रखते हैं और कैंसर जैसे रोगों से बचाव भी करते हैं.
– फ्लैक्ससीड भी बहुत हेल्दी है. अपने डेली डायट में 2-3 टीस्पून फ्लैक्ससीड को शामिल करें.
– ग्रीन टी मेटाबॉलिज़्म को बेहतर करके फैट्स भी बर्न करती है. इसमें मौजूद थियानाइन नामक नेचुरल कंपाउंड हार्मोंस का संतुलन बनाए रखने में कारगर है.
– एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल हेल्दी होता है और वेजीटेबल ऑयल की बजाय इसे डायट में शामिल करें.
– एवोकैडो में बीटा-साइटॉस्टेरॉल नाम का प्राकृतिक तत्व होता है, जो ब्लड कोलेस्ट्रॉल को कम करने के साथ-साथ स्ट्रेस हार्मोंस
(कोर्टिसॉल) को भी बैलेंस करता है. यह एड्रेनल ग्लैंड द्वारा बनाए जानेवाले हार्मोन (डीएचईए) के कम होते स्तर को बहाल करता है.
– ड्रायफ्रूट्स बहुत हेल्दी होते हैं. बादाम में प्रोटीन, फाइबर और कई तरह के पोषक तत्व होते हैं. अखरोट में मेलाटोनिन होता है. यह एक तरह का हार्मोन होता है, जो अच्छी नींद में सहायक होता है. इसमें भूख को नियंत्रण में रखनेवाले तत्व होते हैं. शोध में पाया गया है कि हफ़्ते में 5 दिन मुट्ठीभर अखरोट खाने से आवश्यक फैट्स शरीर को मिल जाता है, जो लैप्टिन (एक प्रकार का प्रोटीन) के निर्माण को बढ़ाता है. लैप्टिन ही वह तत्व है, जो भूख को नियंत्रित करता है.
– पानी उचित मात्रा में पीएं, क्योंकि डिहाइड्रेशन के कारण कुछ हार्मोंस का निर्माण अधिक होने लगता है. बेहतर होगा शरीर में पानी की कमी न होने दी जाए.
– दालचीनी भी हार्मोंस को संतुलित रखने में सहायक है. दालचीनी पाउडर को अपने डायट में शामिल करें. यह इंसुलिन को भी काफ़ी हद तक संतुलित रखता है.
– ओट्स न स़िर्फ ढेर सारे पोषक तत्वों से भरपूर होता है, ये ब्लड शुगर व इंसुलिन को भी संतुलित रखता है. ओट्स आपके हार्मोंस का बैलेंस बनाए रखता है और आपको हेल्दी भी बनाता है.
– दही बहुत हेल्दी होता है. ये शरीर में हेल्दी बैक्टीरिया के संतुलन को बनाए रखता है और बहुत-से हार्मोंस को भी संतुलित रखता है. इम्यूनिटी बढ़ाता है और शोधों से पता चला है कि आधा कप दही रोज़ खाने से सर्दी और फ्लू होने की फ्रिक्वेंसी कम होती है.
– अनार को ज़रूर डायट में शामिल करें. अध्ययन बताते हैं कि अनार कैंसर उत्पन्न करनेवाले हार्मोंस को नियंत्रित करके कैंसर से बचाव करता है.
– हल्दी न स़िर्फ खाने का स्वाद बढ़ाती है, बल्कि इसका हार्मोंस बैलेंसिंग इफेक्ट हमें हेल्दी भी रखता है.
– डार्क चॉकलेट मूड ठीक करके डिप्रेशन दूर करता है. यह एंडॉर्फिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाता है और इसमें मौजूद कई अन्य तत्व भी फील गुड के एहसास को बढ़ानेवाले हार्मोंस को बढ़ाकर डिप्रेशन दूर करते हैं. रोज़ डार्क चॉकलेट का 1 इंच का ब्लॉक खाएं.
– अदरक, लहसुन, कालीमिर्च, जीरा, करीपत्ता आदि में भी हार्मोंस को संतुलित रखने के गुण होते हैं. इन सभी को अपने डेली डायट में शामिल करें.

– गीता शर्मा

 

पर्सनल प्रॉब्लम्स: क्या है हार्मोनल इंट्रायूटेराइन कॉन्ट्रासेप्टिव?

ब्रेस्ट कैंसर से डरें नहीं लड़ें !(Fight Breast Cancer )

Fight Breast Cancer

ब्रेस्ट कैंसर (Breast Cancer) से पीड़ित महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. जागरूकता की कमी और बदलती लाइफस्टाइल इसका मुख्य कारण है. महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरूकता लाने के लिए अक्टूबर माह को पूरी दुनिया में ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाया जाता है. ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरूक करने की एक कोशिश हमारी भी.

 Fight Breast Cancer

हमारे देश में ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. भारत में तो करीब 22-25 % महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित हैं. जागरूकता की कमी और बदलती लाइफस्टाइल इसके मुख्य कारण हैं, लेकिन अगर थोड़ी सावधानी बरती जाए तो इससे बचा जा सकता है.

 

क्या हैं कारण?

 

– ग़लत लाइफस्टाइल
– देर से शादी और लेट प्रेंग्नेंसी
– बच्चों को ब्रेस्ट फीडिंग न कराना
– रेडियाएक्टिव व केमिकल्स का एक्सपोज़र
– फैमिली हिस्ट्री
– ओबेसिटी
– हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी
– अर्ली पीरियड्स और देरी से मेनोपॉज. जिन महिलाओं को पीरियड्स जल्दी शुरू हो जाता है और मेनोपॉज़ लेट होता है, उन्हें ब्रेस्ट कैंसर होने की संभावना ज़्यादा होती है.
– बढती उम्र भी ब्रेस्ट कैंसर की बड़ी वजह है. ब्रेस्ट कैंसर के 80% मामले 50+ की उम्र की महिलाओं में देखे जाते हैं.
– जिन महिलाओं का कद लंबा होता है, उन्हें भी ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क ज़्यादा होता है.
– अल्कोहल पीने और स्मोकिंग करनेवाली महिलाएं भी रिस्क जोन में होती हैं.
– नाइट शिफ्ट में काम करनेवाली महिलाओं को भी ख़तरा ज़्यादा होता है.

 

क्या हो सकते हैं लक्षण

– ब्रेस्ट में गांठ या सूजन
– अंडरआर्म्स में गांठ, सूजन या दर्द.
– ब्रेस्ट की त्वचा का लाल हो जाना
– निप्पल से डिस्चार्ज
– ब्रेस्ट के आकार में बदलाव
– निप्पल का अंदर धंस जाना
– निप्पल या ब्रेस्ट की त्वचा का निकलना
अगर उपरोक्त लक्षण दिखाई दें तो फौरन डॉक्टर को कंसल्ट करें और ज़रूरी जांच जाएं.
ब्रेस्ट चेकअप ज़रूरी
– समय-समय पर ब्रेस्ट की जांच करती रहें, ताकि समय रहते इनके लक्षणों को पहचानकर इलाज किया जा सके.
– सेल्फ ब्रेस्ट एक्ज़ामिनेशन करें.
– अपने गायनेकोलॉजिस्ट से चेकअप करवाएं और ज़रूरी हो तो मेमोग्राफी भी करवाएं.
– इसके अलावा डॉक्टर आपको ब्रेस्ट की सोनाग्राफी. 2 डी या 3 डी मेमोग्राम, ब्रेस्ट एमआरआई, बायोप्सी करवाने की सलाह भी दे सकते हैं.

अगर आपको ब्रेस्ट कैंसर का पता चल जाए तो डरें नहीं. एक बात ध्यान रखें, कैंसर लाइलाज नहीं है. जितना जल्दी कैंसर के बारे में पता चलेगा, जितनी जल्दी आप ट्रीटमेंट शुरू करेंगी, इलाज उतना ही आसान हो जाएगा. कैंसर का टाइप, स्टेज, मरीज़ की हेल्थ कंडीशन, उसकी उम्र आदि को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर इलाज की प्रक्रिया तय करते हैं.

 

सावधानियांः अपनाएं हेल्दी हैबिट्स

– वज़न को कंट्रोल रखें.
– जितना ज़्यादा हो सके, फल और सब्ज़ियां खाएं.
– एक्सरसाइज़ करें व एक्टिव रहें.
– ब्रेस्ट फीडिंग ब्रेस्ट कैंसर से प्रोटेक्ट करता है. इसलिए अपने बच्चे को ब्रेस्ट फीड ज़रूर कराएं.
– शराब और सिगरेट से दूर रहें.
– स्ट्रेस से दूर रहें. पॉज़िटिव सोच रखें.

 

 

एक नज़र आंकड़ों पर

 

 

इंडियन काउंसिल फॉर मेडीकल रिसर्च (आईसीएमआर) के मुताबिक़ भारत में महिलाओं में औसतन 23 फीसदी कैंसर स्तन कैंसर होते हैं. कैंसर से होने वाली कुल मौंतों में 50 फीसदी का कारण स्तन कैंसर है. हर साल स्तन कैंसर के एक लाख पंद्रह हज़ार (1,15,000) नए मरीज़ सामने आते हैं, जिनमें 53 हज़ार की मौत हो जाती है. यानी हर दो नए स्तन कैंसर मरीज़ में एक की मौत हो जाती है. आईसीएमआर के मुताबिक़ स्तन कैंसर रोगियों की तादाद ढाई लाख के ऊपर है. स्तन कैंसर के सबसे ज़्यादा मामले 45 से 55 की उम्र के बीच होते हैं. क़रीब 70 फीसदी मामलों में स्तन कैंसर के मरीज़ के अस्पताल पहुंचने के समय ट्यूमर का आकार पांच सेंटीमीटर से ज़्यादा यानी मरीज़ थर्ड स्टेज में होता है. पहले स्टेज के पांच फ़ीसदी मरीज़ अस्पताल पहुंच पाते हैं.

वर्ल्ड हार्ट डे पर विशेष: क्यों बढ़ रही हैं महिलाओं में दिल की बीमारियां?(Heart disease in women)

आपके दिल की धड़कन… पूरे परिवार की धड़कन, जिसके रुकने से आपका दिल भी धड़कना भूल सकता है, आपका पूरा परिवार बिखर सकता है… सोचिए तो अगर उसके दिल ने सचमुच धड़कना बंद कर दिया तो… ऐसा न हो आपके साथ, इसीलिए ज़रूरी है कि समय रहते सावधानी बरती जाए.
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एक सर्वे के अनुसार, आज से क़रीब तीन दशक पहले तक पुरुषों और स्त्रियों में दिल की बीमारी होने का औसत 5ः1 था, लेकिन आज हालात कुछ और हैं और दिन-ब-दिन यह अंतर घटता जा रहा है. 1984 व उसके बाद दुनियाभर में हार्ट अटैक से मरनेवाली महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा हैं. स़िर्फ पचास पार की ही नहीं, तीस व चालीस साल के बीच की उम्र की महिलाओं में भी यह ख़तरा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है. आंकड़े बताते हैं कि तीस से चालीस साल के बीच की उम्र की महिलाओं में सडेन कार्डियक डेथ के मामले पुरुषों की तुलना में इक्कीस फ़ीसदी से अधिक तेज़ी से बढ़े हैं.
आख़िर क्या हैं इसके कारण और क्या सावधानियां बरतनी ज़रूरी हैं?

 

महिलाओं में बढ़ते हार्ट अटैक के कारण

 

– हाई कोलेस्ट्रॉल, उच्च रक्तचाप, मोटापा, डायबिटीज़ आदि कारण तो हैं ही, जो महिला और पुरुष दोनों को प्रभावित करते हैं, लेकिन महिलाओं के दिल को प्रभावित करने के और भी कई कारण हैं.
– पेट के आसपास जमा चर्बी, उच्च रक्तचाप, डायबिटीज़ और उच्च ट्राइग्लिसिराइड लेवल पुरुषों से ज़्यादा स्त्रियों को प्रभावित करते हैं.
– शारीरिक कारणों के अलावा भावनात्मक कारणों से भी हृदय रोग के ख़तरे बढ़ते हैं और महिलाओं को सबसे ज़्यादा भावनात्मक कारण ही प्रभावित करते हैं, क्योंकि पुरुषों के मुक़ाबले वे काफ़ी संवेदनशील और भावुक होती हैं. क्रोध, दुख, मानसिक तनाव और डिप्रेशन का असर महिलाओं के दिल पर पुरुषों की अपेक्षा ज़्यादा पड़ता है.
– सिगरेट का कश लेती लड़कियों को देखकर लोग अब चौंकते नहीं. ओकेज़नल ड्रिंक भी अब बुरी नहीं मानी जाती. नतीजतन पुरुषों में आम हार्ट अटैक अब स्त्रियों में भी आम हो चला है.
– मेनोपॉज़ के पहले स्त्रियों को एस्ट्रोजन हार्मोन के चलते हार्ट अटैक से जो नेचुरल प्रोटेक्शन मिला था, डायबिटीज़ ने अब उस सुरक्षा कवच में भी सेंध लगा दी है.
– लाइफस्टाइल और खान-पान के तरीक़ों में आया बदलाव भी महिलाओं में हार्ट प्रॉब्लम की एक बड़ी वजह है.
– शारीरिक श्रम व एक्सरसाइज़ की कमी से बढ़ता मोटापा भी दिल को कमज़ोर बना रहा है.
– स्तन कैंसर के ख़तरों से तो महिलाएं परिचित हैं और इससे सुरक्षा के प्रति जागरूक भी हैं, लेकिन हृदय रोगों के बारे में आम मान्यता यही है कि ये तो पुरुषों का रोग है और महिलाओं को इससे कोई ख़तरा नहीं. इसी सोच के चलते हृदय रोग के लक्षण नज़र आने पर भी महिलाएं और उनके परिवारवाले इस पर ध्यान ही नहीं देते और जब तक वो कोई क़दम उठाते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.
– तेज़ ऱफ़्तार ज़िंदगी, घर और बाहर के काम का दोहरा दबाव, तनाव, रिश्तों और करियर के बीच संतुलन बैठाने की जद्दोज़ेहद आदि कई कारण हैं, जिनसे महिलाओं में दिल की बीमारियों का ख़तरा बढ़ा है.
– प्री एक्लेम्प्सिया, प्रेग्नेंसी के दौरान होनेवाले उच्च रक्तचाप, डायबिटीज़, हाई कोलेस्ट्रॉल और निष्क्रियता स्ट्रोक के ख़तरे को 60% बढ़ा देता है.
– मेनोपॉज़ के दौरान ली जानेवाली एचआरटी यानी हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी से भी स्ट्रोक का ख़तरा 40% बढ़ जाता है.
– गर्भनिरोधक गोलियों के सेवन से भी कुछ तक हद ब्लड क्लॉट और स्ट्रोक का ख़तरा बढ़ जाता है, लेकिन ये ख़तरा उन महिलाओं में ज्यादा होता है, जो डायबिटीज़ से पीड़ित होती हैं या जो धूम्रपान करती हैं.
– माइग्रेन से पीड़ित महिलाओं को स्ट्रोक का ख़तरा अपेक्षाकृत दोगुना होता है.

 

सावधानियां

– सबसे पहले अपने दिल से दोस्ती करें. अपने आप से प्यार करें, ताकि आप अपना ज़्यादा से ज़्यादा ख़्याल रखें.
– स्मोकिंग और अल्कोहल को ना कहें. हालांकि स्मोकिंग पुरुषों में भी हृदय रोग का बड़ा कारण है, लेकिन ये महिलाओं को ज़्यादा प्रभावित करता है.
– जंक फूड को छोड़कर हेल्दी डायट लें, ताकि आपके कोलेस्ट्रॉल का स्तर संतुलन में रहे.
– भले ही कोई लक्षण नज़र न आए, लेकिन फिर भी समय-समय पर अपना पूरा टेस्ट कराते रहें, ताकि रोग की कोई संभावना होने पर समय रहते उसका इलाज कराया जा सके.
– वज़न पर काबू रखें.
– नियमित एक्सरसाइज़, योगा या मॉर्निंग वॉक की आदत डालें.
– महिलाएं यदि हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी ले रही हैं, तो इसके ख़तरों के बारे में डॉक्टर से पहले ही पूछ लें.
– 2 डी इको, लिपिड प्रोफाइल, डायबिटीज़ आदि कुछ आसानी से किए जा सकनेवाले टेस्ट हैं, जिनसे आप अपने दिल की सेहत का जायज़ा ले सकती हैं.
हार्ट अटैक पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के लिए अधिक ख़तरनाक क्यों? बता रहे हैं डॉ. पवन कुमार-
– दरअसल, स्त्रियों के दिल में पाई जानेवाली कोरोनरी आर्टरीज़ पुरुषों की अपेक्षा छोटी व संकरी होती हैं, जिससे उनके ब्लॉक होने का ख़तरा ज़्यादा रहता है. आर्टरीज़ के ब्लॉक होने पर हार्ट अटैक की गंभीरता भी अधिक होती है. दिल की पेशियों के डैमेज होने व मृत्यु का ख़तरा भी अधिक रहता है.

 

चेकअप कराना कब ज़रूरी है?

– आपकी उम्र 30 वर्ष से अधिक है.
– काम करते वक़्त आपकी सांसें फूलने लगती हैं.
– वज़न औसत से 10 से 15 किलो अधिक है.
– आपको डायबिटीज़, कोलेस्ट्रॉल या उच्च रक्तचाप की शिकायत है.
– आप अपने ऑफिस में स्ट्रेस से जूझ रहे हैं.
– पेट पर चर्बी का जमाव ज़्यादा हो और कमर की चौड़ाई 80 सें.मी. से अधिक हो.
– रक्त में ट्राइग्लिसिराइड की मात्रा 150ास/वश्र से अधिक हो.
– गुड कोलेस्ट्रॉल लेवल 50ास/वश्र से कम हो.
-फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज़ लेवल 100ास/वश्र या उससे अधिक हो.
– आपके परिवार में किसी को हार्ट डिसीज़, डायबिटीज़ या हाई ब्लडप्रेशर की शिकायत हो.

 

दिल का दौरा पड़ने के संकेत

– सांस लेने में तकलीफ़ महसूस होनाफ
– थकान लगना, गले, जबड़े या पीठ के ऊपरी हिस्से में दर्द होना.
– सीने में दबाव और दर्द. एन्जाइना के मुक़ाबले यह दर्द ज्यादा देर तक रहता है.
– सीने का दर्द बांहों, कंधों, गले, पीठ और कमर में भी उतर सकता है.
– मितली, पसीना, दम घुटना, चक्कर, बेहोशी, बोलने में तकलीफ़ होना, उलझन महसूस होना, धुंधला दिखना-कुछ लोगों को ये सारे लक्षण प्रकट होते हैं तो कुछ को इनमें से एक भी लक्षण दिखाई नहीं देते.
– ये लक्षण इतने आम होते हैं कि पीड़ित महिला को लगता है कि उसे बस यूं ही अच्छा नहीं महसूस हो रहा है. ये लक्षण दिल का दौरा पड़ने के भी हो सकते हैं, इसका ख़याल तक उसके मन में नहीं आता, लेकिन अगली बार ये लक्षण नज़र आएं तो नज़रअंदाज़ न करें. क्या पता आपकी लापरवाही आपकी जान ले ले.

 

क्या करें?

– जो भी काम कर रही हों, तुरंत बंद कर दें.
– बैठ या लेट जाएं.
– ख़ुद चलकर या कार चलाकर अस्पताल न जाएं. किसी को अस्पताल ले जाने के लिए कहें.
अपनी तकलीफ़ को छोटा समझकर छिपाएं नहीं, न ही नज़रअंदाज़ करें. दिल के दौरे का इलाज जितना जल्दी हो सके, हो जाना चाहिए. वरना आपको अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता है.

कुछ ज़रूरी बातें

रखें ख़याल मांसपेशियों की जकड़न का

अक्सर कभी-कभी बैठे-बैठे तो कभी रात को सोते समय मांसपेशियों में जकड़न यानी क्रेम्प से आप बेचैन हो उठती हैं. इसको हल्के से न लें. यह पेरीफेरल आटीअल डिसीज़ हो सकती है. कूल्हे, जांघ या फिर चलते हुए क्रेम्प के आने का अर्थ है कि उस हिस्से में रक्त प्रवाह नहीं पहुंच रहा. डॉक्टर से ज़रूर सलाह लें.

 

काली चाय दिल के लिए अच्छी

अमेरिकन कॉलेज ऑफ कॉर्डियोलोजी में हुए एक अनुसंधान में यह कहा गया है कि काली चाय हमारे दिल के लिए अ च्छी है. काली चाय में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट स्वस्थ कॉर्डियो वस्कूलर फंक्शन में मदद करते हैं. इससे हार्ट अटैक के ख़तरे कम होते हैं.

 

शहरी लोगों को ज्यादा ख़तरा

दक्षिण एशियाई देशों में भले ही चिकित्सा सुविधाएं बढ रही हैं, पर तनाव, व्यायाम का अभाव, तम्बाकू सेवन व तेज़ रफ्तार वाले लाइफ़स्टाइल के कारण शहरी लोगों में हृदय रोग बढ रहे हैं. हाइपरटेंशन, डिप्रेशन और डायबिटीज़ की पारिवारिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को नियमित जांच करवाना ज़रूरी है.

 

टमाटर भी फ़ायदेमंद

कॉर्डियोलॉजिस्ट के चक्कर से बचना है तो प्रोसेस्ड टमाटर पेस्ट, केचअप, सॉस, जूस के अलावा तरबूज का सेवन करें.

 

एस्प्रीन दिल की बीमारी की सबसे सस्ती दवा

एस्प्रीन का सेवन हृदयरोगियों के लिए वरदान है और 20 % तक मृत्युदर कम कर देती है. उच्च रक्तचाप, हाई कोलेस्ट्रॉल, मोटाप, धूम्रपान, हृदयरोग, पारिवारिक पृष्ठभूमि हो तो डॉक्टर 75 मिग्रा. से 100 मिग्रा. तक एस्प्रीन लेने की सलाह देते हैं, ताकि ख़तरे को 30% तक कम किया जा सके. सीने में दर्द हो तो एस्प्रहन चबाने से अटैक से होनेवाली क्षति को कम किया जा सकता है.

 

– प्रतिभा तिवारी