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हर महिला के फोन में होने चाहिए ये 5 सेप्टी ऐप्स (5 Safety Apps Every Woman Should Download)

Safety Apps For Women

Safetipin (सेफ्टीपिन)

बात जब महिलाओं (Women) की सेफ्टी (Safety) और सुरक्षा की हो, तो सेफ्टीपिन एक बेहतरीन ऑप्शन है. महिलाओं की पर्सनल सेफ्टी को ध्यान में रखकर यह ऐप बनाया गया है. इसमें उनकी सुरक्षा से जुड़ी सभी ज़रूरी बातों को शामिल किया गया है. इसमें जीपीएस ट्रैकिंग, इमर्जेंसी कॉन्टैक्ट नंबर्स, सेफ लोकेशन के डायरेक्शन्स आदि की सुविधा है. इस ऐप में सभी सुरक्षित जगहों को पिन किया गया है, ताकि ज़रूरत के व़क्त आप सुरक्षित स्थान पर पहुंच सको. इसके अलावा यूज़र्स अनसेफ लोकेशन्स को भी पिन कर सकते हैं, ताकि बाकी के लोग सतर्क रहें. यह ऐप हिंदी और इंग्लिश दोनों भाषाओं में उपलब्ध है.

Raksha – women safety alert (रक्षा- वुमेन सेफ्टी अलर्ट)

यह ऐप भी ख़ासतौर से महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है. इस ऐप में एक बटन है, जिसे प्रेस करने से आपके अपनों को आपका लोकेशन मिल जाएगा, इमर्जेंसी के व़क्त आप इसका इस्तेमाल कर सकती हैं. इस ऐप की एक ख़ास बात और है कि अगर इमर्जेंसी के व़क्त आपका मोबाइल स्विचऑफ हो गया हो, तो भी आप वॉल्यूम बटन को 3 सेकंड तक प्रेस करके रखने पर ऐप अलर्ट भेज देता है. अगर आप नो इंटरनेट एरिया में चली जाएं, तो यह ऐप आपके इमर्जेंसी कॉन्टैक्ट्स को एसएमएस भेजता है.

Himmat (हिम्मत)

दिल्ली पुलिस का महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया यह एक और फ्री मोबाइल ऐप है. ऐप को इस्तेमाल करने के लिए यूज़र को दिल्ली पुलिस की वेबसाइट पर जाकर रजिस्टर करना होगा. रजिस्ट्रेशन पूरा होते ही आपको ओटीपी मिलेगी, जिसे फीड करके आप ऐप को इंस्टॉल कर पाएंगी. अगर कभी इमर्जेंसी के हालात बनें, तो आप एसओएस एलर्ट के ज़रिए पुलिस को इतल्ला कर सकती है. जैसे ही आप एसओएस एलर्ट जारी करेंगे, दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम में आपकी लोकेशन, ऑडियो और वीडियो अपनेआप पहुंच जाएंगे, जिसकी मदद से पुलिस आपकी लोकेशन पर जलद से जल्द पहुंच जाएगी.

Women safety (वुमन सेफ्टी)

वुमन सेफ्टी के लिए यह एक और उपयोगी ऐप है. बाकी ऐप्स की ही तरह यह भी ज़रूरत के व़क्त आपके बारे में आपके करीबी लोगों को जानकारी देगा. आपको स़िर्फ एक बटन दबाना होगा और आपके लोकेशन की पूरी जानकारी आपके करीबियों के पास पहुंच जाएगी. एसएमएस के साथ-साथ गूगल मैक के ज़रिए आपकी लोकेशन का लिंक भी आपके आपनों के पास पहुंच जाएगा. आपके मोबाइल का फ्रंट कैमरा आपका सेफ्टी डिवाइस बन जाता है, यह पिक्चर्स क्लिक करके तुरंत सर्वर को भेज देता है. इसमें तीन कलर के बटन्स हैं, आप अपनी सुविधानुसार और हालात की गंभीरता के मुताबिक बटन प्रेस कर सकती हैं.

VithU (विदयू)

यह चैनल वी के प्रोग्राम गुमराह द्वारा शुरू किया गया ऐप है. बाकी ऐप्स की तरह इसे भी डाउनलोड करके एक्टिवेट करें. ज़रूरत के व़क्त मदद के लिए एक्टिवेट बटन पर दो बार क्लिक करें. एक्टिवेट होते ही ऐप आपके सेव किए हुए कॉन्टैक्ट्स को ऑटोमैटिकली मदद के लिए मैसेज और लोकेशन भेजना शुरू कर देता है और जब तक स्टॉप न किया जाए, हर दो मिनट में मैसेज भेजता रहता है. इसके अलावा इस ऐप में कई सेफ्टी टिप्स भी दिए गए हैं, जो महिलाओं के लिए काफ़ी उपयोगी सिद्ध होंगे.

– अनीता सिंह

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स्मार्ट महिलाओं के लिए मोबाइल वॉलेट टिप्स (Mobile Wallet Tips For Smart Women)

मोबाइल वॉलेट (Mobile Wallet) महिलाओं के लिए एक वरदान की तरह है. हमें हर दिन कितने सारे लेन-देन के काम करने होते हैं. दूध, सब्ज़ी, ग्रॉसरी का सामान, टैक्सी किराया, बिजली का बिल, डीटीएच का बिल, इंटरनेट और मोबाइल रिचार्ज जैसे जाने कितने ट्रांज़ैक्शन हम लगातार करते रहते हैं. इन सारे बिलों का भुगतान करके मोबाइल वॉलेट हमारे जीवन को सरल कर देता है. इनके भुगतान के लिए ना आपको किसी लाइन में खड़ा होना होगा और न चेक काटना होगा और ना ही अलग-अलग वेबसाइट पर जाना पड़ेगा. बस, मोबाइल वॉलेट का ऐप खोला और आप चुटकियों में बिल का भुगतान कर सकती हैं. इसे इस्तेमाल करते समय किन बातों का रखें ख़ास ध्यान, बता रही हैं मोबिक्विक की को-फाउंडर उपासना टाकू.

Mobile Wallet Tips

 

–    अपने फोन और वॉलेट दोनों को ही लॉक करके रखें. अपने मोबाइल में कोई ख़ास पैटर्न या लॉक की लगाकर रखें, ताकि आपकी इजाज़त के बिना कोई आपका वॉलेट इस्तेमाल न कर पाए.

–     अपना वन टाइम पासवर्ड (ओटीपी) कभी किसी से शेयर न करें. अगर कोई फोन करके यह कहता है कि वह मोबाइल वॉलेट कंपनी या आपके बैंक से बोल रहा है, तो भी उससे अपना ओटीपी शेयर न करें.

–     अपने लिए हमेशा बेस्ट मोबाइल वॉलेट सिलेक्ट करें. आप किन कामों के लिए मोबाइल वॉलेट डाउनलोड कर रही हैं, वह सुविधा उसमें है या नहीं, पहले चेक करें. अगर आपको इलेक्ट्रिसिटी बिल भरना है या कैब बुक करना है, तो पहले देखें कि उस ऐप में यह सुविधा कैसी है.

–     मोबाइल वॉलेट को अपने ज़रूरी ऐप्स से लिंक करें. हर ऐप से वॉलेट को लिंक करने की ज़रूरत नहीं, लेकिन जिनका उपयोग आप ज़्यादा करती हैं, उन्हें लिंक करें.

–     आपका मोबाइल वॉलेट यूज़र फ्रेंडली और ईज़ी है, तो इसका ये बिल्कुल मतलब नहीं कि आप ग़ैरज़रूरी शॉपिंग कर लें. अपने मंथली बजट का हमेशा ध्यान रखें.

–     ज़्यादातर वॉलेट ऐप्स कैशबैक के अलावा बहुत-से डिस्काउंट्स भी देते रहते हैं. उनका ट्रैक रखकर आप भी उनके ऑफर्स का फ़ायदा उठा सकती हैं.

–     मोबिक्विक (Mobikwik), पेटीएम (PayTM), फोनपे (PhonePe), भीम (BHIM) और पेयूमनी (PayUMoney) कुछ पॉप्युलर मोबाइल वॉलेट्स हैं.

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अब डिप्रेशन दूर भगाएगा किराये का बॉयफ्रेंड… रेंट ए बॉयफ्रेंड ऐप, एक अनोखी पहल! (RABF: This App Lets You Rent A Boyfriend To Cure Depression)

RABF App
अब डिप्रेशन दूर भगाएगा किराये का बॉयफ्रेंड… रेंट ए बॉयफ्रेंड ऐप, एक अनोखी पहल! (RABF: This App Lets You Rent A Boyfriend To Cure Depression)

आज की तारीख़ में हर दूसरा व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार हो जाता है. कहीं न कहीं हम भी अपने जीवन में कभी न कभी तो डिप्रेशन यानी अवसाद के दौर से गुज़रते हैं, उस व़क्त ज़िंदगी बेकार लगने लगती है और यही डिप्रेशन यदि बढ़ता जाता है, तो सुसाइड तक पहुंच सकता है.
डिप्रेशन को दूर करने का एक अनोखा तरीक़ा कौशल प्रकाश ने खोज निकाला है. उन्होंने मुंबई में एक ऐप लॉन्च किया है, जो अकेलेपन से जूझ रहे डिप्रेस्ड लोगों को पार्टनर यानी साथी प्रोवाइड करता है. रेंट ए बॉयफ्रेंड (RABF) यह ऐप मुंबई बेस्ड है. इसमें शारीरिक यानी फिज़िकल रिलेशन नहीं होता, इमोशनल स्तर पर आपको बेहतर महसूस करवाया जाता है.
कौशल प्रकाश को यह आइडिया अपने अनुभव के आधार पर ही आया. वो ख़ुद डिप्रेशन का शिकार थे और अब वो दूसरों की मदद करना चाहते हैं.

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RABF App
यही नहीं इस ऐप में टोल फ्री नंबर भी होगा, जहां लोग कॉल करके प्रोफेशनल्स की मदद ले सकेंगे और उनसे अपनी समस्या शेयर कर सकेंगे.

RABF की वेबसाइट पर इससे संबंधित सारी डिटेल्स हैं. आप सेलिब्रिटी, मॉडल से लेकर आम आदमी को चुन सकते हैं. सेलेब्स का रेट 3000 प्रति घंटे के हिसाब से होगा, मॉडल्स 2000, वहीं आम आदमी आपको 300-400 तक में मिल सकेंगे. यह वेबसाइट पूरी तरह से कमिशन बेसिस पर काम करती है, जहां 70% कमाई बॉफ्रेंड्स को दी जाती है.

– गीता शर्मा

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पासवर्ड सिलेक्ट करते समय न करें ये ग़लतियां (Avoid These Password Selection Mistakes)

 

पासवर्ड यानी कुछ नंबर, कुछ अक्षर और सांकेतिक चिह्नों का मिला-जुला कॉम्बिनेशन. पासवर्ड बनाते समय अक्सर आप यही सोचते होंगे कि आपके द्वारा बनाए गए पासवर्ड को कोई हैक नहीं कर सकता, लेकिन ऐसा हो सकता है. कई बार पासवर्ड बनाते समय हम छोटी-छोटी ग़लतियां कर बैठते हैं, जिसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा हैकर्स उठाते हैं. अगर आप हैकर्स से सावधान रहना चाहते हैं, तो पासवर्ड बनाते समय इन
ग़लतियों से बचें.

Password Selection Mistakes

कैसा हो पासवर्ड?

–     अगर आप इंटरनेट बैंकिंग का इस्तेमाल करते हैं, तो इंटरनेट बैंकिंग का य़ूजर आईडी और पासवर्ड गोपनीय रखें.

–     समय-समय पर अपना पासवर्ड बदलते रहें. लंबे समय तक एक ही पासवर्ड इस्तेमाल करते रहने से उसके क्रैक होने की संभावना अधिक होती है.

–     एक अकाउंट के लिए केवल एक पासवर्ड का प्रयोग करें.

पासवर्ड बनाते समय रखें कुछ बातों  का ख़ास ख़्याल

–     अपनी व्यक्तिगत जानकारी- नाम, मोबाइल नंबर, एडे्रस आदि कभी किसी के साथ शेयर न करें.

–     मकान नंबर, जन्मदिन, शादी की सालगिरह, मोबाइल नंबर, पत्नी व बच्चों के नाम के आधार पर पासवर्ड बनाने की ग़लती न करें. आपका जान-पहचानवाला कोई भी व्यक्ति इन सूचनाओं के आधार पर आपका अकाउंट हैक कर सकता है.

–     अपने फेवरेट स्टार्स और प्लेस के नाम पर  भी पासवर्ड न बनाएं.

–     उपरोक्त व्यक्तिगत जानकारी के अलावा अपनी मां का सरनेम भी किसी अनजान व्यक्ति के साथ शेयर न करें. इसका कारण है कि यूज़र अपने डेबिट कार्ड का पासवर्ड रिसेट करता है, तो सिक्युरिटी क्वेश्‍चन में सबसे पहले आपकी मां का सरनेम या पेट नेम पूछा जाता है.

–     बैंक अपने ग्राहकों को समय-समय पर मैसेज भेजकर सचेत करते रहते हैं कि अगर कोई आपसे व्यक्तिगत जानकारी मांगे, तो उनसे शेयर करने की बजाय तुरंत बैंक को सूचित करें.

–     एक ही पासवर्ड को अलग-अलग अकांउट के लिए यूज़ करना ज़ोख़िम भरा हो सकता है. यदि हैकर्स आपके एक अकाउंट का पासवर्ड जान लेता है, तो उसे अन्य खातों को साइन इन करना आसान हो जाएगा.

–     एक बार साइन इन करने के बाद हैकर्स आपके ईमेल और एड्रेस से आपके बैंक अकाउंट को भी एक्सेस कर सकता है.

–     ईज़ी पासवर्ड बेशक याद रखने में आसान होते हैं, लेकिन इन्हें बनाने से अकाउंट हैैक होने का ख़तरा बढ़ जाता है, क्योंकि हैकर्स सरल पासवर्ड को आसानी से क्रैक कर लेते हैं.

–     पासवर्ड बनाते समय ऐसी निजी जानकारी शेयर न करें, जिसे अन्य लोग आपके बारे में जानते हों, जैसे- आपका निक नेम, आपके घर की गली व रोड का नाम व नंबर, मोबाइल नंबर, आपके पेट एनिमल का नाम आदि.

–     पासवर्ड बनाते समय आसान शब्दों (जैसे- रिीीुेीव) और वाक्यों, कीबोर्ड पैटर्न (जैसे- िुंशीींू या रिंूुीु) और अनुक्रम (जैसे- रललव या 1234) का इस्तेमाल करने से बचें.

–     स्ट्रॉन्ग पासवर्ड बनाने के लिए वाक्यों व मुहावरों का प्रयोग करें. वाक्य या मुहावरे ऐसे होने चाहिए, जिसे दूसरे लोग नहीं जानते हों.

–     अपने पर्सनल और प्रोफेशनल अकाउंट के पासवर्ड अलग-अलग बनाएं. यदि आपका प्रोफेशनल अकाउंट हैक हो गया या फिर प्रोफेशनल स्तर पर आपके साथ कोई धोखाधड़ी होती है, तो आपका पर्सनल इंफॉर्मेशन भी लीक हो जाएगा.

स्ट्रॉन्ग पासवर्ड बनाने के लिए क्या करें?

–    अगर आप कुछ वर्णों को जोड़कर पासवर्ड बना रहे हैं, तो उस पासवर्ड में 8 या उससे अधिक वर्ण होने चाहिए.

–     अक्षर, अंक और प्रतीक चिह्नों का संयोजन करके पासवर्ड बनाएं.

–    पासवर्ड बनाते समय अक्षरों को अंकों के साथ बदलें.

–     पासवर्ड हमेशा लंबे बनाएं. लंबे यानी जिनमें कम से कम 10 अक्षरों, अंकों व प्रतीक चिह्नों का इस्तेमाल किया गया हो.

–     लंबे पासवर्ड बनाने का एक फ़ायदा यह भी है कि ये पासवर्ड स्ट्रॉन्ग होते हैं, जिन्हें हैक करना मुश्किल होता है.

–     स्ट्रॉन्ग पासवर्ड को याद रखना थोड़ा मुश्किल होता है, इसलिए आप पासवर्ड मैनेजर ऐप डाउनलोड कर सकते हैं.

–     यह ऐप आपका पासवर्ड सेव कर लेता है, जिसे सिंगल पासवर्ड या ओटीपी से एक्सेस किया जा सकता है.

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Password Selection Mistakes
कैसे रखें अपना पासवर्ड सुरक्षित?

–     स्ट्रॉन्ग पासवर्ड बनाने के बाद उसे पर्स, वॉलेट या डेस्क आदि जगहों पर लिखकर रखने की ग़लती न करें. कोई भी इस पासवर्ड को चोरी करके आपके अकाउंट को साइन इन कर सकता है.

–     अपने महत्वपूर्ण अकाउंट, जैसे- ईमेल, ऑनलाइन बैंकिंग अकाउंट के लिए अलग-अलग पासवर्ड बनाएं. कुछ वेबसाइट्स ओटीपी का ऑप्शन देती हैं, जिससे आपकी सिक्योरिटी और मज़बूत हो जाती है.

–     अगर आप अपना पासवर्ड भूल जाते हैं, तो पासवर्ड मैनेजर ऐप्स की सहायता से इस परेशानी से निजात पा सकते हैं.

–     हमेशा पासवर्ड मैनेजर ऐप्स डाउनलोड करने से पहले इनका रिव्यू चेक कर लें.

कब ज़रूरत है पासवर्ड रिसेट करने की?

–     अगर आप अपना पासवर्ड भूल गए हैं या आपका पासवर्ड लॉक हो गया है, तो अपने अकाउंट को दोबारा ओपन करने के लिए आपको अपना पासवर्ड रिसेट करना पड़ेगा.

–     यदि आपको ऐसा महसूस हो कि कोई अन्य व्यक्ति भी आपके अकाउंट को एक्सेस कर रहा है, तो तुरंत अपना पासवर्ड रिसेट करें.

–     यदि आप अपना अकाउंट किसी कारण से साइन इन नहीं कर पा रहे हैं, तो आपको पासवर्ड रिसेट करने की आवश्यकता है.

– नागेश चमोली

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कहीं डिजिटल और रियल पर्सनैलिटी में अंतर आपके रिश्ते को बिगाड़ तो नहीं रहा? (Difference In Digital and Real Personality May Affect Your Relationship)

Difference In Digital and Real Personality

कहीं डिजिटल और रियल पर्सनैलिटी (Difference In Digital and Real Personality) में अंतर आपके रिश्ते को बिगाड़ तो नहीं रहा?

सोशल मीडिया की दस्तक ने हमारी निजी ज़िंदगी को बहुत प्रभावित किया है. अधिकांश व़क्त हम यहां जो भी कुछ देखते हैं, करते हैं, वह हक़ीक़त से बिल्कुल विपरीत होता है. डिजिटल दुनिया की जो हमारी पर्सनैलिटी है, वह रियल लाइफ से अक्सर मेल नहीं खाती है. क्यों ऐसा करते हैं हम? और क्या है इसकी वजह? इसी के बारे में जानने की हमने यहां कोशिश की है.

Difference In Digital and Real Personality

लीला एक हाउसवाइफ हैं. वे बताती हैं कि पति के शोरूम और बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद मैं खाली व़क्त में इंटरनेट, व्हाट्सऐप और फेसबुक पर समय बिताती थी. मेरे दोस्तों की संख्या सैकड़ों में थी. घर पर रहूं, तो लैपटॉप और बाहर निकली, तो मोबाइल में उंगलियां चलती ही रहती थीं. कुछ महीनों बाद यह स्थिति बन गई कि हमारा दांपत्य जीवन प्रभावित होने लगा. मैं बच्चों की केयर और परिवार की ज़िम्मेदारियों से दूर भागने लगी. पति की नाराज़गी और पैरेंट्स के समझाने पर मुझे आभास हुआ कि मैं ग़लत कर रही हूं. मुझे इससे निकलने में काफ़ी व़क्त लगा. लीला मात्र एक उदाहरण है, कमोबेश आज हर दूसरा व्यक्ति डिजिटल और रियल पर्सनैलिटी के बीच उलझा हुआ है.

निजी ज़िंदगी हो रही है प्रभावित

आज के दौर में हम सोशल मीडिया को पसंद या नापसंद तो कर सकते हैं, लेकिन उसे नज़रअंदाज नहीं कर सकते. आज लोग इंसानों के साथ कम और सोशल साइट्स ज़्यादा समय बिता रहे हैं. इस पर रिश्ते बनने से ज़्यादा बिगड़ने लगे हैं.

आपको बता दें कि 55 से 60 फ़ीसदी लोगों का तलाक़ आज के समय में सोशल साइट्स की वजह से हो रहा है. यह खुलासा अमेरिका के क़ानूनी फर्म के सर्वे में किया गया है. इसमें बताया गया है कि आजकल रिश्ते जल्द टूटने की वजह सोशल साइट्स के प्रति लोगों का एडिक्शन है.

आपके दोस्त अपनी लव लाइफ की शानदार तस्वीरें पोस्ट कर सकते हैं, लेकिन आपको इस बात का एहसास भी नहीं होता कि उनकी निजी यानी ऑफलाइन ज़िंदगी कितनी भयानक हो सकती है. उन्हें देखकर आपको भी लगता है कि आप भी अपने साथी के साथ ऐसी फोटो खिंचवाकर पोस्ट करें. हो सकता है आपका साथी ऐसा करने के ख़िलाफ़ हो या फिर आपके रिश्ते में थोड़ीबहुत तल्ख़ी हो, लेकिन इसके बावजूद आप चाहते हैं कि दुनिया को बताएं कि आप एक हैप्पी कपल हैं.

डिजिटल पर्सनैलिटी की बड़ी उम्मीदें 

डिजिटल पर्सनैलिटी बड़ी उम्मीदों को जन्म देती है. हो सकता है कि रियल लाइफ में आपकी लव लाइफ बहुत दिलचस्प या संतोषजनक न हो, पर डिजिटल लाइफ पर आप अपनी लव लाइफ को सबसे बेहतरीन और दिलचस्प दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते. अक्सर कपल्स जिन स्माइली और इमोशंस का इस्तेमाल डिजिटल लाइफ में अपना प्रेम ज़ाहिर करने के लिए करते हैं, उनका रियल लाइफ में मतलब तभी होता है, जब हक़ीक़त की ज़िंदगी में भी आप अपने साथी को प्यार करते हैं. दिखावटी प्रेम जो डिजिटल दुनिया में चलता है, वह रियल ज़िंदगी में कई बार नज़र तक नहीं आता है. लेकिन इससे उत्पन्न उम्मीदें आपके रिश्तों में सेंध लगाकर उन्हें बिगाड़ सकती हैं.

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मन-मुटाव का बनता कारण

बच्चे हों या बड़े, घर, कॉलेज, ऑफिस, ड्राइविंग यहां तक कि देर रात बिस्तर तक में आराम नहीं है. जिसे देखो, वही उलझा है डिजिटल दुनिया के रिश्तों में. जिनमें भले ही सच्चाई की संभावना न के बराबर हो, लेकिन सभी चैटिंग, फोटो शेयरिंग और कमेंट्स में सुकून और अपने सवालों के उत्तर ढूंढ़ने में लगे हैं. संवाद और एकदूसरे के संपर्क में रहने के नएनए तकनीकी तरीक़ों में बुरी तरह उलझी है आज की ज़िंदगी. टीनएजर्स ही नहीं, उम्रदराज़ लोगों की संख्या भी कम नहीं है, तकनीक के इस जाल में. शायद यही वजह है कि क़रीबी और सामाजिक रिश्ते गौण हो रहे हैं और लोग अवास्तविक दुनिया के सागर में डूब रहे हैं.

प्रभावित हो रही है सेक्स लाइफ

मनोवैज्ञानिक शमा अग्निहोत्री कहती हैं, आपके जीवनसाथी के साथ के अंतरंग पलों के दौरान स्मार्टफोन पर आई एक बेव़कूफ़ीभरी पोस्ट का नोटिफिकेशन आपसी रिश्तों में दरार पैदा करने के लिए काफ़ी है. युवा जोड़ों, विशेषकर

नौकरीपेशा की संख्या एकाएक तेज़ी से बढ़ी है और इनकी सेक्स लाइफ पर जिस तरह से डिजिटल दुनिया की वजह से असर पड़ा है, वह संबंधों में मनमुटाव उत्पन्न कर रहा है. सोशल मीडिया पर मित्रों के लगातार अपडेट्स के चलते लोग अपने जीवनसाथी के साथ क्वालिटी टाइम बिताने में असफल हो रहे हैं. यही नहीं, दूसरों को देखकर यह जीवनसाथी में बेमतलब की कमियां ढूंढ़ने को भी उकसा रहा है.

हक़ीक़त से अलग है यह दुनिया

जब आपको अपने बेडरूम की चारदीवारी के अंदर प्रेम नहीं मिलता, तो आप इसे कहीं बाहर खोजने लगते हैं. रिश्तों की ख़त्म होती गर्माहट और ऑनलाइन दुनिया में आसानी से मेलजोल बढ़ाने से अपने लिए एक नया साथी तलाशना काफ़ी आसान हो गया है. साथ ही यह आपको एक ग़लत क़दम उठाने में भी ज़्यादा व़क्त नहीं लगने देता, जिसके चलते आप अपने निजी रिश्तों को भी दांव पर लगा देते हैंसच तो यह है कि हम अपनी रियल पर्सनैलिटी से दूर होते जा रहे हैं और एक दिखावटी दुनिया का हिस्सा बन रहे हैं. उस दिखावटी दुनिया में हमारी सोच, हमारी मानसिकता और पर्सनैलिटी हमारी रियल पर्सनैलिटी से एकदम भिन्न होती है. लेकिन हम अपनी स्वाभाविक भावनाओं को ताक पर रख ऑनलाइन वीडियो या पोस्ट को पढ़ ख़ुश हो जाते हैं.

ज़िंदगी सोशल मीडिया नहीं

समाजशास्त्री नीरू यादव का मानना है कि एक ऑनलाइन वीडियो को देखकर अकेले हंसने में उतना मज़ा कहां है, जो आप अपने जीवनसाथी के साथ बैठकर एक पुराने चुटकुले पर उठा सकते हैं. सोशल मीडिया हमारी ज़िंदगी का केवल एक हिस्सा भर है, जबकि हमारी ज़िंदगी सोशल मीडिया का हिस्सा बिल्कुल भी नहीं है, इसलिए इस दूरी को बरकरार रखने की कोशिश करते हुए चीज़ों की प्राथमिकता तय करनी होगी.

यह समझना ज़रूरी है कि आपकी फ़िक्र करनेवाला या आपको प्यार करनेवाला इंसान आपके आसपास होगा.

वे जो आपकी पोस्ट पर लाइक और कमेंट करते हैं, वे केवल आपको दिखावटी प्यार ही मैसेज कर भेज सकते हैं.

अपने साथी की अहमियत समझें और उन्हें केवल उनके लिए (जो आपकी निजी ज़िंदगी की सार्वजनिक रूप में चर्चा करते हैं) दूर न जाने दें.

ड्रीमवर्ल्ड में जीते लोग

डिजिटल और रियल पर्सनैलिटी एक ही इंसान द्वारा निभाए जानेवाले दो तरह के क़िरदार हैं. फेसबुक पर हम ऐसी ही चीज़ें पोस्ट करते हैं, जो हम लोगों को दिखाना चाहते हैं यानी हम एक में जी रहे होते हैं. वहां हमारी एक अलग छवि बनती है और उस छवि के अनुरूप ही हमारे पोस्ट होते हैं भले ही असल ज़िंदगी में हम वैसे न भी हों.

Difference In Digital and Real Personality

सार्वजनिक न बनाएं अपनी ज़िंदगी

जब हम डिजिटल की दिखावटी दुनिया में प्रवेश करते हैं, तो हम दूसरों की अच्छी चीज़ों को देखकर हीनभावना से ग्रस्त हो जाते हैं और फिर ख़ुद को उनके बराबर दिखाने के लिए या उनसे बेहतर दिखाने के लिए अपनी एक झूठी छवि सोशल मीडिया पर पेश करते हैं.

असल में हम भूल जाते हैं कि जो कुछ सोशल मीडिया पर दिखाई दे रहा है, वह वास्तविकता नहीं है. वह किसी व्यक्ति की ज़िंदगी का एक लम्हा भर है, जिसे उसने सोशल मीडिया पर शेयर किया. ज़िंदगी की वास्तविक छवि इससे अलग हो सकती है. हमारी ख़ुशी दूसरों पर निर्भर करने लगती है. यह इसलिए भी ख़तरनाक है, क्योंकि हम हर चीज़ का सर्टिफिकेट दूसरों से लेने लगते हैं.

किसी पल को आपने एंजॉय किया या नहीं, यह प्राथमिकता होने की बजाय प्राथमिकता यह हो जाती है कि उस पल की तस्वीर को सोशल मीडिया पर कितना रिस्पॉन्स मिल रहा है. उदाहरण के लिए यदि आप किसी जगह डिनर पर गए, तो आपको इस बात की ख़ुशी होनी चाहिए की डिनर टेस्टी था और आपने इसे अपने फैमिली/दोस्तों के साथ एंजॉय किया. न कि यह कि आपकी डिनरवाली तस्वीर पर 100 लाइक्स आए.

सच यह है कि आपकी डिजिटल पर्सनैलिटी आपको अपने वास्तविक संबंधों को मज़बूत करने की बजाय आपको एक ऐसी नकली दुनिया का आदी बना देती है, जिसमें आप अपने विचारों की अभिव्यक्ति उतने बेहतर तरी़के से नहीं कर पाते, जितना आप वास्तविक दुनिया में कर सकते हैं.

आप अपनी असल ज़िंदगी का मज़ा लेना ही भूलने लगते हैं. कई ख़ूबसूरत जगहों पर घूमते हुए वहां की ख़ूबसूरती का मज़ा लेने की बजाय लोग सेल्फी लेने और फोन से तस्वीरें खींचने में व्यस्त हो जाते हैं, जो उन्हें उस वास्तविक पलों को जीने से रोक देता है. ऐसे में आप अपने साथी का साथ क्या एंजॉय कर पाएंगे, तो रिश्तों पर आंच आना स्वाभाविक ही है.

अपनी जिंदगी के हर पहलू को सार्वजनिक करना कहां तक ठीक है. यह समझने की ज़रूरत है कि असल ज़िंदगी साढ़े पांच इंच की स्क्रीन में नहीं है, बल्कि उसके बाहर है.

सुमन बाजपेयी

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इंटरनेट ने छीनी ज़िंदगी की फ़ुर्सत … (Internet Has Taken Over Our Lives)

disadvantages of internet
न जाने कितने ही पल यूं ही तारों को तकते-तकते साथ गुज़ारे थे हमने… न जाने कितनी ही शामें यूं ही बेफिज़ूल की बातें करते-करते बिताई थीं हमने… न जाने कितनी ऐसी सुबहें थीं, जो अलसाते हुए एक-दूजे की बांहों में संवारी थी हमने… पर अब न वो रातें हैं, न वो सुबह, न वो तारे हैं और न वो बातें… क्योंकि अब वो पहले सी फ़ुर्सत कहां, अब वो पहले-सी मुहब्बत कहां…!

disadvantages of internet

जी हां, हम सबका यही हाल है आजकल, न व़क्त है, न ही फ़ुर्सतक्योंकि ज़िंदगी ने जो रफ़्तार पकड़ ली है, उसे धीमा करना अब मुमकिन नहीं. इस रफ़्तार के बीच जो कभीकभार कुछ पल मिलते थे, वो भी छिन चुके हैं, क्योंकि हमारे हाथों में, हमारे कमरे में और हमारे खाने के टेबल पर भी एक चीज़ हमारे साथ रहती है हमेशा, जिसे इंटरनेट कहते हैं. ज़ाहिर है, इंटरनेट किसी वरदान से कम नहीं. आजकल तो हमारे सारे काम इसी के भरोसे चलते हैं, जहां यह रुका, वहां लगता है मानो सांसें ही रुक गईं. कभी ज़रूरी मेल भेजना होता है, तो कभी किसी सोशल साइट पर कोई स्टेटस या पिक्चर अपडेट करनी होती हैऐसे में इंटरनेट ही तो ज़रिया है, जो हमें मंज़िल तक पहुंचाता है. लेकिन आज यही इंटरनेट हमारे निजी पलों को हमसे छीन रहा है. हमारे फुर्सत के क्षणों को हमसे दूर कर रहा है. हमारे रिश्तों को प्रभावित कर रहा है. किस तरह छिन रहे हैं फ़ुर्सत के पल?

किस तरह छिन रहे हैं फ़ुर्सत के पल?

चाहे ऑफिस हो या स्कूलकॉलेज, पहले अपनी शिफ्ट ख़त्म होने के बाद का जो भी समय हुआ करता था, वो अपनों के बीच, अपनों के साथ बीतता था.

आज का दिन कैसा रहा, किसने क्या कहा, किससे क्या बहस हुईजैसी तमाम बातें हम घर पर शेयर करते थे, जिससे हमारा स्ट्रेस रिलीज़ हो जाता था.

 लेकिन अब समय मिलते ही अपनों से बात करना या उनके साथ समय बिताना भी हमें वेस्ट ऑफ टाइम लगता है. हम जल्द से जल्द अपना मोबाइल या लैपटॉप लपक लेते हैं कि देखें डिजिटल वर्ल्ड में क्या चल रहा है.

कहीं कोई हमसे ज़्यादा पॉप्युलर तो नहीं हो गया है, कहीं किसी की पिक्चर को हमारी पिक्चर से ज़्यादा कमेंट्स या लाइक्स तो नहीं मिल गए हैं…?

और अगर ऐसा हो जाता है, तो हम प्रतियोगिता पर उतर आते हैं. हम कोशिशों में जुट जाते हैं फिर कोई ऐसा धमाका करने की, जिससे हमें इस डिजिटल वर्ल्ड में लोग और फॉलो करें.

भले ही हमारे निजी रिश्ते कितने ही दूर क्यों न हो रहे हों, उन्हें ठीक करने पर उतना ध्यान नहीं देते हम, जितना डिजिटल वर्ल्ड के रिश्तों को संजोने पर देते हैं.

 

आउटडेटेड हो गया है ऑफलाइन मोड

आजकल हम ऑनलाइन मोड पर ही ज़्यादा जीते हैं, ऑफलाइन मोड जैसे आउटडेटेडसा हो गया है.

यह सही है कि इंटरनेट की बदौलत ही हम सोशल साइट्स से जुड़ पाए और उनके ज़रिए अपने वर्षों पुराने दोस्तों व रिश्तेदारों से फिर से कनेक्ट हो पाए, लेकिन कहीं न कहीं यह भी सच है कि इन सबके बीच हमारे निजी रिश्तों और फुर्सत के पलों ने सबका ख़ामियाज़ा भुगता है.

शायद ही आपको याद आता हो कि आख़िरी बार आपने अपनी मॉम के साथ बैठकर चाय पीते हुए स़िर्फ इधरउधर की बातें कब की थीं? या अपने छोटे भाईबहन के साथ यूं ही टहलते हुए मार्केट से सब्ज़ियां लाने आप कब गए होंगे?

बिना मोबाइल के आप अपने परिवार के सदस्यों के साथ कब डायनिंग टेबल पर बैठे थे?

अपनी पत्नी के साथ बेडरूम में बिना लैपटॉप के, बिना ईमेल चेक करते हुए कब यूं ही शरारतभरी बातें की थीं?

याद नहीं आ रहा नआएगा भी कैसे? ये तमाम ़फुर्सत के पल अब आपने सूकून से जीने जो छोड़ दिए हैं.

अपने बच्चे के लिए घोड़ा बनकर उसे हंसाने का जो मज़ा है, वो शायद अब एक जनरेशन पहले के पैरेंट्स ही जान पाएंगे, क्योंकि आजकल स़िर्फ पिता ही नहीं, मम्मी भी इंटरनेट के बोझ तले दबी हैं.

वर्किंग वुमन के लिए भी अपने घर पर टाइम देना और फुर्सत के साथ परिवार के साथ समय बिताना कम ही संभव हो गया है.

लेकिन फिर भी कहीं न कहीं वो मैनेज कर रही हैं, पर जहां तक पुरुषों की बात है, युवाओं का सवाल है, तो वो पूरी तरह इंटरनेट की गिरफ़्त में हैं और वहां से बाहर निकलना भी नहीं चाहते.

यही नहीं, आजकल जिन लोगों के पास इंटरनेट कनेक्शन नहीं होता या फिर जो लोग सोशल साइट्स पर नहीं होते, उन पर लोग हैरान होते हैं और हंसते हैं, क्योंकि उन्हें आउटडेटेड व बोरिंग समझा जाता है.

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स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है

रिसर्च बताते हैं कि सोशल साइट्स पर बहुत ज़्यादा समय बिताना एक तरह का एडिक्शन है. यह एडिक्शन ब्रेन के उस हिस्से को एक्टिवेट करता है, जो कोकीन जैसे नशीले पदार्थ के एडिक्शन पर होता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की एक स्टडी के मुताबिक, जो लोग सोशल साइट्स पर अधिक समय बिताते हैं, वो अधिक अकेलापन और अवसाद महसूस करते हैं, क्योंकि जितना अधिक वो ऑनलाइन इंटरेक्शन करते हैं, उतना ही उनका फेस टु फेस संपर्क लोगों से कम होता जाता है.

यही वजह है कि इंटरनेट का अधिक इस्तेमाल करनेवालों में स्ट्रेस, निराशा, डिप्रेशन और चिड़चिड़ापन पनपने लगता है. उनकी नींद भी डिस्टर्ब रहती है. वो अधिक थकेथके रहते हैं. ऐसे में ज़िंदगी का सुकून कहीं खोसा जाता है.

इन सबके बीच आजकल सेल्फी भी एक क्रेज़ बन गया है, जिसके चलते सबसे ज़्यादा मौतें भारत में ही होने लगी हैं.

लोग यदि परिवार के साथ कहीं घूमने भी जाते हैं, तो उस जगह का मज़ा लेने की बजाय पिक्चर्स क्लिक करने के लिए बैकड्रॉप्स ढूंढ़ने में ज़्यादा समय बिताते हैं. एकदूसरे के साथ क्वालिटी टाइम गुज़ारने की जगह सेल्फी क्लिक करने पर ही सबका ध्यान रहता है, जिससे ये फुर्सत के पल भी यूं ही बोझिल होकर गुज़र जाते हैं और हमें लगता है कि इतने घूमने के बाद भी रिलैक्स्ड फील नहीं कर रहे.

मूवी देखने या डिनर पर जाते हैं, तो सोशल साइट्स के चेकइन्स पर ही ध्यान ज़्यादा रहता है. इसके चलते वो ज़िंदगी की ़फुर्सत से दूर होते जा रहे हैं.

सार्वजनिक जगहों पर भी लोग एकदूसरे को देखकर अब मुस्कुराते नहीं, क्योंकि सबकी नज़रें अपने मोबाइल फोन पर ही टिकी रहती हैं. रास्ते में चलते हुए या मॉल मेंजहां तक भी नज़र दौड़ाएंगे, लोगों की झुकी गर्दन ही पाएंगे. इसी के चलते कई एक्सीडेंट्स भी होते हैं.

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इंटरनेट की देन: पोर्न साइट्स भी पहुंच से दूर नहीं

 आजकल आसानी से पोर्न वीडियोज़ देखे जा सकते हैं. चाहे आप किसी भी उम्र के हों. इंटरनेट के घटते रेट्स ने इन साइट्स की डिमांड और बढ़ा दी है. बच्चों पर जहां इस तरह की साइट्स बुरा असर डालती हैं, वहीं बड़े भी इसकी गिरफ़्त में आते ही अपनी सेक्स व पर्सनल लाइफ को रिस्क पर ला देते हैं. इसकी लत ऐसी लगती है कि वो रियल लाइफ में भी अपने पार्टनर से यही सब उम्मीद करने लगते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि इन वीडियोज़ को किस तरह से बनाया जाता है. इनमें ग़लत जानकारियां दी जाती हैं, जिनका उपयोग निजी जीवन में संभव नहीं.

– यही नहीं, अक्सर एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर्स भी आजकल ऑनलाइन ही होने लगे हैं. चैटिंग कल्चर लोगों को इतना भा रहा है कि अपने पार्टनर को चीट करने से भी वो हिचकिचाते नहीं. इससे रिश्ते टूट रहे हैं, दूरियां बढ़ रही हैं.

कुछ युवतियां अधिक पैसा कमाने के चक्कर में इन साइट्स के मायाजाल में फंस जाती हैं. बाद में उन्हें ब्लैकमेल करके ऐसे काम करवाए जाते हैं, जिससे बाहर निकलना उनके लिए संभव नहीं होता.

इंटरनेट फ्रॉड के भी कई केसेस अब आम हो गए हैं, ये तमाम बातें साफ़तौर पर यही ज़ाहिर करती हैं कि इंटरनेट ने वाक़ई ज़िंदगी की फुर्सत छीन ली है…!

योगिनी भारद्वाज

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हर वक्त सेल्फी लेना है ‘मेंटल डिस्ऑर्डर’ (Selfitis Is A Genuine Mental Disorder)

Selfitis, Mental Disorder

सेल्फी लेना तो हर किसी का शौक़ होता है, पर कहीं यह शौक़ आपको शॉक न दिला दे. चौंकिए नहीं, क्योंकि बार-बार सेल्फी लेना और सोशल मीडिया पर लगातार पोस्ट करते रहना एक मेंटल डिस्ऑर्डर यानी मानसिक विकार है. सेल्फी के इस मानसिक विकार की क्या है कहानी और आपके लिए कितना ख़तरनाक हो सकता है यह? आइए जानते हैं.

 Selfitis, Mental Disorder

क्या है सेल्फीटिस?

बारबार सेल्फी लेना और सोशल मीडिया पर पोस्ट करना एक गंभीर मानसिक अवस्था है, जिसे सायकोलॉजिस्ट्स ने ‘सेल्फीटिस’ का नाम दिया है. पहली बार इस शब्द का इस्तेमाल 2014 में किया गया, जब अमेरिकन सायकैट्रिक एसोसिएशन इसे डिस्ऑर्डर घोषित करने पर विचार कर रही थी. इसके बाद नॉटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी और थियागराजर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट ने अमेरिकन रिसर्च में कितनी सच्चाई है, उसका पता लगाने के लिए आगे स्टडी की. अपनी स्टडी में इन्होंने पाया कि वाक़ई ‘सेल्फीटिस’ एक मानसिक विकार है. इसके बाद रिसर्चर्स ने एक बिहेवियर स्केल बनाया, ताकि इस बात की जांच की जा सके कि सेल्फीटिस किस लेवल पर है.

सेल्फीटिस के लेवल्स

बॉर्डरलाइन: दिनभर में कम से कम 3 बार सेल्फी लेना, पर उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट न करना. अगर आप भी सुबह, दोपहर, शाम सेल्फी लेते हैं, तो समझ जाइए कि आप बॉर्डरलाइन पर हैं.

अक्यूट: दिनभर में कम से कम 3 बार सेल्फी लेना और हर बार सोशल मीडिया पर पोस्ट करना गंभीर अवस्था है. अगर आप ऐसा कुछ करते हैं, तो इसे अवॉइड करना शुरू करें.

क्रॉनिक: दिनभर सेल्फी लेने से ख़ुद को रोक न पाना. बारबार सेल्फी लेते रहना और सोशल मीडिया पर 6 बार से ज़्यादा पोस्ट करना क्रॉनिक लेवल है. इन पर सेल्फी लेने का जुनून हर व़क्त सवार रहता है.

इंटरनेशनल जरनल ऑफ मेंटल हेल्थ में छपी स्टडी में इस बात की पुष्टि की गई है कि सेल्फीटिस एक मेंटल या सायकोलॉजिकल डिस्ऑर्डर है. हालांकि अभी भी कुछ लोग हैं, जो इसका विरोध कर रहे हैं. उनके मुताबिक किसी भी रवैये को नाम देने भर से वह विकार में परिवर्तित नहीं हो जाता.

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सेल्फीटिस बिहेवियर स्केल

ख़ुद को 1-5 तक की रैंकिंग दें, जहां 5 का मतलब है आप उस बात से पूरी तरह सहमत हैं, वहीं 1 का मतलब है कि आप उससे बिल्कुल सहमत नहीं. आपका स्कोर जितना ज़्यादा होगा, सेल्फीटिस की संभावना उतनी ज़्यादा होगी.

सेल्फी लेने से मेरा मूड अच्छा हो जाता है.

फोटो एडिटिंग टूल्स का इस्तेमाल करती हूं, ताकि दूसरों से बेहतर दिख सकूं.

इससे मैं कॉन्फिडेंट महसूस करती हूं.

अलगअलग पोज़ेज़ में सेल्फी शेयर करने पर मेरा सोशल स्टेटस बढ़ जाता है.

सेल्फी पोस्ट करते रहने से मैं ख़ुद को पॉप्युलर महसूस करती हूं.

इससे मेरा तनाव दूर होता है.

ज़्यादा सेल्फी पोस्ट करती हूं, ताकि ज़्यादा लाइक्स और कमेंट्स मिलें.

सोशल मीडिया पर दोस्तों की तारीफ़ सुनने के लिए सेल्फी पोस्ट करती हूं.

ख़ूब सेल्फी लेती हूं, फिर अकेले में देखती हूं, इससे मेरा आत्मविश्‍वास बढ़ता है.

अगर सेल्फी नहीं लेती हूं, तो अपने पीयर ग्रुप से अलगथलग महसूस करती हूं.

Selfitis, Mental Disorder

सेल्फी न बन जाए ‘किलफी’

हाल ही में हुए एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि पूरी दुनिया में सेल्फी लेने के चक्कर में सबसे ज़्यादा लोगों की मौत भारत में ही होती है, जिसे ‘किलफी’ कहते हैं. इस बात की गंभीरता का पता इसी से लगाया जा सकता है कि दुनिया में होनेवाली सभी सेल्फी डेथ्स के 50% मामले भारत में होते हैं.

2014-2016 के बीच सेल्फी के कारण 127 मौतें हुईं, जिनमें से 76 इंडिया में हुईं.

ज़्यादातर सेल्फी डेथ का कारण समंदर या नदी में सेल्फी लेते हुए या टू व्हीलर पर स्टंट करते हुए या फिर बिल्डिंग से गिरने से हुई.

क्या है सोल्यूशन?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, क्योंकि यह एक एडिक्शन या लत है, इसलिए इसे छुड़ाने के लिए सायकोलॉजिस्ट्स वही तरीक़ा अपनाते हैं, जो व्यसन मुक्ति के लिए किया जाता है.

सेल्फी लें, पर कोशिश करें कि सोशल मीडिया पर पोस्ट न करें.

– ख़ुद को कैमरे के लेंस से देखना बंद करें. आप जैसे हैं, वैसे ख़ुद को स्वीकारें.

अगर आप ख़ुद को कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं, तो किसी मनोचिकित्सक से मिलें.

दिनेश सिंह

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मोबाइल से पेमेंट करते समय अपनाएं ये 10 सेफ्टी टिप्स (10 Must Follow Tips For Safe Mobile Payments)

Tips For Safe Mobile Payments
टेक्नोलॉजी के दौर में स्मार्टफोन का इस्तेमाल सिर्फ बातचीत या वेब ब्राउज़िंग तक ही सीमित नहीं रह गया है. पेमेंट व मनी ट्रांसफर करने के लिए पहले आपको घंटों लाइनों में लगना पड़ता था, लेकिन अब आप उन्हीं कामों को मिनटों में स्मार्टफोन की सहायता से निपटा सकते हैं मोबाइल पेमेंट ऐप के ज़रिए, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मोबाइल द्वारा भुगतान करते समय आपको सतर्क रहने की ज़रूरत है, आइए जानें कैसे?

 

 Tips For Safe Mobile Payments

1. सार्वजनिक वाई-फाई का उपयोग न करें

अगर आप सार्वजनिक वाई-फाई का इस्तेमाल करके अपने मोबाइल द्वारा के्रडिट कार्ड की सूचनाएं, जैसे- बैंक अकाउंट नंबर, पिन नंबर आदि मेन्युली टाइप कर रहे हैं या फिर कार्ड स्वाइप करके दर्ज़ कर रहे हैं, तो आपका डाटा लीक होने की संभावना हो सकती है, क्योंकि आपको यह पता नहीं होता है कि आप जिस वाई-फाई रूट से भुगतान कर रहे हैं, वो सेफ डाटा सोर्स है या नहीं. इसलिए सार्वजनिक जगहों पर उपलब्ध वाई-फाई का उपयोग मोबाइल द्वारा भुगतान करने के लिए न करें.
इसके अलावा सार्वजनिक वाई-फाई द्वारा मोबाइल पेमेंट करने से हैकर्स के लिए आपका पासवर्ड/पिन हैक करना आसान हो जाएगा.

2. पासवर्ड स्ट्रॉन्ग होना चाहिए: अगर आप अपने मोबाइल का इस्तेमाल वित्तीय

लेन-देन करने के लिए करते हैं, तो इस बात का ध्यान रखें कि आपका पासवर्ड स्ट्रॉन्ग हो, जिसे कोई आसानी से हैक न कर सके. पासवर्ड बनाते समय अपनी व्यक्तिगत जानकारियां, जैसे- जन्म तिथि, फ्लैट नंबर, मोबाइल नंबर, गली/रोड का नाम, बच्चों के नाम के अलावा ऐसा कोई भी नंबर, जो आपसे जुड़ा हो- उसे पासवर्ड में न डालें. इन जानकारियों को हासिल करना हैकर्स के लिए बहुत आसान होता है.
सुरक्षा की दृष्टि से आजकल स्मार्टफोन में अनेक सुविधाएं दी जाती हैं, जैसे- चेहरे की पहचान, फिंगर प्रिंट अनलॉक आदि.
इन सुविधाओं के द्वारा भी आप अपने पासवर्ड/पिन को सुरक्षित रख सकते हैं.

3. अनऑथोराइज़ ऐप डाउनलोड करने से बचें

पेमेंट और मनी ट्रांसफर करने के लिए कोई भी अनऑथोराइज़ ऐप डाउनलोड न करें. अगर आपने कोई अनऑथोराइज़ या फर्ज़ी ऐप
डाउनलोड किया है, तो आपके वन टाइम पासवर्ड का ग़लत इस्तेमाल हो सकता है. इसलिए किसी ऐप को डाउनलोड करने से पहले उसकी विश्‍वसनीयता की जांच अच्छी तरह कर लें.

4. केवल विश्‍वसनीय ऐप ही डाउनलोड करें

अगर आप किसी विश्‍वसनीय ऐप में अपनी भुगतान संबंधी जानकारी शेयर करते हैं, तो अपने मोबाइल पर डाउनलोड किए गए अन्य ऐप के बारे में सावधान रहें, क्योंकि इनमें कुछ स्पाइवेयर हो सकते हैं, जो भुगतान संबंधी जानकारी को कैप्चर करने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं और हैकर्स इनका फ़ायदा उठा सकते हैं.

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Tips For Safe Mobile Payments

5. सुरक्षित पेमेंट ऐप यूज़ करें

अगर आप अपने स्मार्टफोन में भुगतान संबंधी जानकारी जोड़ना चाहते हैं, तो स्वयं के मोबाइल में मौजूद सॉफ्टवेयर (एप्पल पे या एंड्रॉइड पे) का इस्तेमाल करें. मोबाइल में मौजूद सॉफ्टवेयर में विश्‍वसनीयता की गारंटी होती है. इसके अलावा प्रतिष्ठित और आधिकारिक मोबाइल भुगतान ऐप कंपनियां आपके क्रेडिट कार्ड विवरण को संग्रहित करके नहीं रखती हैं.

6. केवल एक पेमेंट ऐप का इस्तेमाल करें

भुगतान करने के लिए अपने मोबाइल पर अनेक पेमेंट ऐप डाउनलोड करने की ग़लती न करें. ध्यान रखें कि आप जो भी पेमेंट ऐप डाउनलोड करते हैं, वे सुरक्षित व विश्‍वसनीय होना चाहिए. बहुत सारे पेमेंट ऐप का इस्तेमाल एक साथ करने से डाटा लीक होने की संभावना हो सकती है.

7. ऑफिशियल ऐप स्टोर से डाउनलोड करें

अगर आप अपने मोबाइल में पेमेंट ऐप डाउनलोड करने की सोच रहे हैं, तो ऑफिशियल ऐप स्टोर, जैसे- गूगल प्ले स्टोर, एप्पल प्ले स्टोर और विंडोज़ स्टोर में जाकर ही डाउनलोड करें.

8. अगर फोन खो जाए या चोरी हो जाए तो

अगर फोन खो जाए या चोरी हो जाए, तो तुरंत पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज़ करें और बैंक को भी सूचित करके अपनी ई बैंकिंग पर रोक लगवाएं, ताकि मोबाइल द्वारा किए जानेवाले भुगतान को रोका
जा सके.

9. मोबाइल पेमेंट करते समय क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करें

क्रेडिट कार्ड की अपेक्षा, डेबिट कार्ड में धोखा होने की संभावना अधिक होती है. इसलिए मोबाइल द्वारा भुगतान करते समय के्रडिट कार्ड का इस्तेमाल अधिक करना चाहिए.

10. अपने क्रेडिट कार्ड अकाउंट पर नज़र रखें

हमेशा अपने क्रेडिट कार्ड अकाउंट के लेन-देन को चेक करते रहें. चाहे आप मोबाइल द्वारा भुगतान कर रहे हों या नहीं. अगर आपको लगता है कि मोबाइल पेमेंट ऐप द्वारा किए लेन-देन के साथ कोई छेड़खानी की गई है, तो तुरंत अपना पासवर्ड बदल दें.

– देवांश शर्मा

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जीपीएस का सही इस्तेमाल किसी लोकेशन को यूं करें ट्रैक (Track Your Locations With Help Of GPS)

Track Your Locations With Help Of GPS

 

Track Your Locations With Help Of GPS

आजकल हर स्मार्ट फोन में जीपीएस नाम का ऐप होता है, लेकिन हम में से अधिकतर लोगों को पता ही नहीं होता है कि जीपीएस क्या होता है? और आप रोज़मर्रा की जिंदगी में इसका यूज़ किस तरह से कर सकते हैं? तो कोई बात नहीं. हम आपको बताते हैं कि जीपीएस का सही इस्तेमाल आप कैसे और कहां पर कर सकते हैं?

क्या है जीपीएस?

जीपीएस (ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम) एक ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम है, जिसका प्रयोग वाहन में ड्राइवर को रास्ते की जानकारी और उसकी ट्रैकिंग के लिए किया जाता है. इसके अतिरिक्त कोई अप्रत्याशित दुर्घटना की स्थिति में तुरंत मदद के लिए पहुंचने पर भी जीपीएस काफ़ी मददगार साबित होता है. इसकी मदद से आप अपने वाहन पर नज़र रख सकते हैं. इसके द्वारा सही रास्ते का पता चलता है, यहां तक कि जीपीएस ड्राइवर को दाएं और बाएं मुड़ने के निर्देश भी देता है.

जीपीएस कैसे काम करता है?

जीपीएस डिवाइस एक सिम के ज़रिए सैटेलाइट से जुड़ा रहता है. इसके माध्यम से वह संदेशों का आदान-प्रदान करता है. आज सभी स्मार्टफोन जीपीएस से लैस हैं. जीपीएस को वाहन में हैंडल के पास या फिर किसी अन्य जगह पर सेट किया जा सकता है. स्मार्टफोन में मौजूद जीपीएस टेक्नीक से यूज़र अपने लोकेशन का पता लगा सकता है. जीपीएस डिवाइस सैटेलाइट से प्राप्त सिग्नल द्वारा उस जगह को मैप में दर्शाता है, जिसके द्वारा ड्राइवर अपने गंतव्य तक आसानी से पहुंच सकता है.

कैसे करें जीपीएस का इस्तेमाल?

–    जीपीएस को प्रयोग करने के लिए सबसे पहले अपने स्मार्टफोन में जीपीएस के ऑप्शन को ऑन करें

–    आप जिस स्थान पर जाना चाहते हैं, उस जगह का नाम नीचे सर्च बॉक्स में टाइप करें.

–    अगर आप अपनी लोकेशन की स्थिति जानना चाहते हैं, मोबाइल की स्क्रीन पर (मैप में) ग्रीन कलर का पॉइंट दिखाई देगा. मैप में जहां पर वह ग्रीन कलर बना होगा, वही पॉइंट आपकी लोकेशन होगी.

–    जीपीएस में अकांउट में अन्य सेटिंग ऑप्शन्स भी होते हैं, जैसे- आप अपनी पसंदीदा जगहों (एक ही शहर के होटल, रेस्टॉरेंट, पार्क, सिनेमा हॉल और मॉल्स आदि) सेट कर सकते हैं, ताकि शहर के किसी कोने में क्यों न हों, बस एक क्लिक करते ही आपको पता चल जाएगा कि आप उस लोकेशन से कितनी दूरी पर हैं.

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जीपीएस से कर सकते हैं आप ये 7 काम

फाइंड माईफोन: अधिकतर स्मार्टफोन में ये फीचर मौजूद होता है. इस ऐप के ज़रिए आप अपने फोन का लोकेशन ट्रैक कर सकते

हैं. अगर आपका फोन चोरी हो जाए या फिर कहीं छूट जाए, तो ऐसे में आप अपनी गूगल आईडी से लॉग इन करके अपने फोन को ट्रैक कर सकते हैं.

कार सेफ्टी: अगर आप अपनी कार को ट्रैक करना चाहते हैं, तो मैपमाईइंडिया की सहायता से कर सकते हैं.

की एंड वॉलेट ट्रैकिंग: अगर आप अपनी चाभियां और पर्स कहीं पर रखकर भूल जाते हैं, तो इस ट्रैकर की मदद से उन्हें बड़ी आसानी से ढूंढ़ सकते हैं.

फाइंड वेहिकल्स: आप अपने टू व्हीलर में ‘लेट्सट्रैक बाइक सीरीज़’ का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसकी सहायता से आप अपने बाइक की स्पीड मॉनिटर कर सकते हैं, पार्किंग नोटिफिकेशन रिसीव कर सकते हैं, फ्यूल-माइलेज आदि की डिटेल्स को ट्रैक कर सकते हैं. इसमें आप 24 घंटे की हिस्ट्री भी देख सकते हैं.

फॉर योर पेट्स: आप अपने पेट्स, जैसे- डॉग, कैट आदि को ट्रैक करना चाहते हैं, तो इसके लिए जीपीएस पेट ट्रैकर का यूज़ कर सकते हैं. इस ट्रैकर को आप अपने पेट के गले पर बांध दें, जिससे आप कभी उसका रियल टाइम लोकेशन और डिस्टेंस अपने मोबाइल पर देख सकते हैं.

फॉर योर किड्स: अगर आप अपने बच्चों पर या किसी अन्य व्यक्ति पर नज़र रखना चाहते हैं, तो ट्रैकआईडी या लेट्सट्रैक की मदद ले सकते हैं. इसे आप बच्चे/व्यक्ति के कपड़ों, बेल्ट आदि पर लगाकर उसकी लोकेशन ट्रैक कर सकते हैं.

फाइंड शेयर योर लोकेशन: अपनी लोकेशन को किसी दूसरे व्यक्तिके साथ शेयर करना चाहते हैं, तो इसके लिए आप गूगल मैप पर पहले अपनी लोकेशन को ट्रेस करें, फिर उसे पिन करके आप अपने ऑप्शन पर क्लिक कर सकते हैं.

जीपीएस ऐप को 5 श्रेणी में बांटा जाता है

–   लोकेशन: स्थिति का निर्धारण करने के लिए.

–    नेविगेशन: एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए.

–    ट्रैकिंग के लिए: किसी वस्तु, पेट्स या व्यक्ति की निगरानी के लिए.

–    मैपिंग: दुनिया में कहीं भी जाने के लिए मैप बनाने के लिए.

–    टाइमिंग: सही समय के बारे में.

किन क्षेत्रों में जीपीएस का यूज़ किया जाता है?

एस्ट्रोनॉमी, ऑटोमेटेड वेहिकल्स, वेहिकल्स के नेविगेशन, मोबाइल फोन, ट्रैकिंग, जीपीएस एयर क्राफ्ट ट्रैकिंग, डिज़ास्टर रिलीफ, इमर्जेंसी रिलीफ, रोबोटिक्स और टेक्टोनिक्स आदि.

– नागेश चमोली

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डिप्रेशन दूर भगाएंगे ये Top 10 ऐप्स (Top 10 Apps To Combat Depression)

Top Apps To Combat Depression

ज़िंदगी में हर कोई कभी न कभी डिप्रेशन से गुज़रता ही है. यह स्थिति कभी-कभार हो, तो कोई बात नहीं, लेकिन यदि यह ज़िंदगी का हिस्सा बन जाए, तो दिल का सुकून, ख़ुशी, उमंग-उत्साह सब कुछ छीन लेता है. मेट्रो सिटीज़ में तो यह जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है. ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि जल्द से जल्द इस समस्या से निजात पाया जाए. ऐसे कई ऐप्स हैं, जो इसमें आपकी मदद करते हैं.

Top Apps To Combat Depression

हाल ही में हुई एक स्टडी के अनुसार, डिप्रेशन के बढ़ते केसेस से यह साबित हो चुका है कि अब यह शहरी समस्या नहीं रही. अब छोटे शहरों, गांव-कस्बों में भी तनाव से घिरकर लोग डिप्रेशन (अवसाद) के शिकार हो रहे हैं. हाल ही में हुई एक स्टडी के अनुसार, डिप्रेशन के बढ़ते केसेस से यह साबित हो चुका है कि अब यह शहरी समस्या नहीं रही. अब छोटे शहरों, गांव-कस्बों में भी तनाव से घिरकर लोग डिप्रेशन (अवसाद) के शिकार हो रहे हैं.

– डिप्रेशन बायो-सायको-सोशल प्रॉब्लम है यानी यह खानदानी भी हो सकता है, जो अवसादग्रस्त व्यक्ति व पारिवारिक-सामाजिक तनाव के कारण उत्पन्न होता है.

– शोध के अनुसार तीन में से दो वयस्क अपने जीवन में एक बार अवसाद से ग्रस्त ज़रूर होते हैं.

– 4% बच्चे भी टेंशन के कारण डिप्रेशन में चले जाते हैं.

– डिलीवरी व मेनोपॉज़ के बाद कई महिलाएं हार्मोनल बदलाव के कारण डिप्रेशन की शिकार हो जाती हैं.

– डब्ल्यूएचओ (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन) के अनुसार, भारत में भी क़रीब 36% लोग डिप्रेशन के शिकार हैं.

– हमारे देश में टीनएज भी डिप्रेशन के शिकार हैं. देश की जनसंख्या 131.11 करोड़ है, जिसमें से 13 से 15 साल की उम्र के टीनएजर्स की संख्या 7.5 करोड़ है. यह कुल जनसंख्या का 5.8% है. पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया की बात करें, तो 8.6 करोड़ लोग डिप्रेशन की समस्या से ग्रस्त हैं.

बेहतरीन ऐप्स जिनसे डिप्रेशन दूर करने में मदद मिलती है

1. डिप्रेशन सीबीटी सेल्फ हेल्प गाइड (Depression CBT Self-Help Guide)

– यह ऐप डिप्रेशन के मरीज़ को बीमारी से उबरने व सही मार्गदर्शन देने में मदद करता है.

– इस ऐप में डिप्रेशन को कंट्रोल करने से जुड़े टिप्स और टूल्स दिए गए हैं.

– इसमें डिप्रेशन मूड को मॉनिटर करने के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट, क्लीनिकल डिप्रेशन व कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (सीबीटी) से जुड़े लेख हैं.

2. स्टार्ट ऐप (Start App)

– कई बार हमें पता ही नहीं होता कि हमें डिप्रेशन की समस्या है.

– इस स्थिति में यह ऐप काफ़ी फ़ायदेमंद है. इसमें डिप्रेशन टेस्ट की सुविधा से लेकर हर रोज़ आपके प्रोग्रेस का भी ट्रैक रखा जाता है.

– इसमें डिप्रेशन से जुड़ी मेडिसिन लेने के लिए अलर्ट भी है.

– इसके अलावा यह ऐप आप जो मेडिसिन ले रहे हैं, उसके फ़ायदे व साइड इफेक्ट्स के बारे में भी बताता है.

– साथ ही इसमें मेडिकल प्रोफेशनल्स व फार्मासिस्ट द्वारा हर रोज़ डिप्रेशन से निजात पाने के टिप्स भी हैं.

– यह ऐप एंड्रायड व आईओएस यूज़र के लिए उपलब्ध है.

3. स्टॉप, ब्रीद एंड थिंक (Stop, Breathe & Think)

– यह ऐप टेंशन व डिप्रेशन को दूर करने में सहायक है. इसमें सांस किस तरह से लेनी चाहिए, इसके उपाय बताते हैं.

– ध्यान लगाने के लिए मार्गदर्शन भी किया जाता है.

– इस ऐप के ज़रिए आप मेडिटेशन से पहले व बाद में अपनी भावनाओं को भी चेक कर सकते हैं.

– इसे ख़ासतौर पर स्ट्रेस-डिप्रेशन, सेल्फ हीलिंग, सेल्फ मोटिवेशन को ध्यान में रखकर बनाया गया है.

– यह आपके मूड के अनुसार मेडिटेशन टिप्स भी बताता है.

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Top Apps To Combat Depression
4. मूड टूल्स (MoodTools)

– यदि आप बहुत तनाव में हैं और लगातार अवसाद से घिर जाते हैं, तो यह मूड टूल्स आपकी काफ़ी मदद कर सकता है.

– इसमें कई रिसर्च सपोर्टेड टूल्स दिए गए हैं.

– इसमें दिए गए थॉट डायरी टूल में आपके विचारों व सोच के प्रकार के अनुसार आपके मूड को किस तरह से बेहतर बनाया जा सकता है, के उपाय बताए गए हैं.

– इस ऐप के बिहेवियर एक्टिवेशन थेरेपी में किसी एक्टिविटीज़ से पहले व बाद की स्थिति को जांचा-परखा जाता है.

– साथ ही सेफ्टी प्लान को आत्महत्या सुरक्षा के नज़रिए से विकसित किया गया है.

– इस ऐप के ज़रिए आप डिप्रेशन के शिकार हैं या नहीं, इसके लिए पीएचक्यू 9 टेस्ट में पार्ट भी ले सकते हैं.

5. मेडिटेशन म्यूज़िक (Meditation Music)

– डिप्रेशन के कारण हद से ज़्यादा परेशान हैं, तो इस ऐप का सहारा ले सकते हैं.

– यह आपके मन को सुकून देने के साथ ही आराम भी देता है.

– ऐप में मेडिटेशन से जुड़ी उच्च स्तर के संगीत व दिल को सुकून देनेवाली धुनें भी दी गई हैं.

– इस ऐप से आपको नकारात्मक भावनाओं को दूर करने में मदद मिलेगी.

– साथ ही मेडिटेशन के लिए अलग-अलग साउंड भी हैं, जैसे- परफेक्ट रेन, सॉफ्ट पियानो, लेक, सनलाइज, हेवन साउंड, नेचर फॉरेस्ट मेलोडीज़ आदि.

इन सब के अलावा और भी कई ऐप हैं, जो डिप्रेशन के इलाज में कारगर हैं

6. पॉज़िटिव थींकिंग (Positive Thinking)- यह एंड्रॉयड ऐप पॉज़िटिव नज़रिया रखने में मदद करता है. ज़रूरत पड़ने पर यह दोस्ताना सलाह भी देता है.

7. डिप्रेशनचेक (Depressioncheck)- यह आईफोन ऐप न केवल आपकी बीमारी का कंप्लीट रिकॉर्ड रखता है, बल्कि डिप्रेशन से निजात पाने के टिप्स भी बताता है.

8. डिफीट डिप्रेशन (Defeat depression)– इसमें डिप्रेशन से छुटकारा पाने व निपटने के लिए उपयोगी टिप्स व जानकारियां मिल जाएंगी. सोशल मीडिया में फेसबुक पर भी डिप्रेशन, बेचैनी, मेंटल हेल्थ व बीमारी को दूर करने से संबंधित पूरी जानकारी दी जाती है, जिसका लाभ उठाया जा सकता है. यहां पर अवसाद के अलावा दिमाग़ से जुड़ी विभिन्न तरह की समस्याओं के बारे में बहुत सारी जानकारियां दी जाती हैं.

9. यूट्यूब यानी www.youtube.com पर ऐसे कई वीडियोज़ हैं, जिनकी मदद से डिप्रेशन को दूर किया जा सकता है.

10. माय थेरेपी (MyTherapy)- यह डिप्रेशन के लिए बेहतरीन डायरी ऐप है. ऑस्ट्रेलिया के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कॉम्प्लिेमेंट्री मेडिसिन और अमेरिका के हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में किए गए रिसर्च के अनुसार, स्मार्टफोन से लोगों को मेंटल हेल्थ पर ध्यान देने, उसे जानने-समझने व ज़रूरी इलाज करने में मदद मिलती है.

– ऊषा गुप्ता

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इन फ्री ऐप्स से उठाएं लाइव टीवी का मज़ा (Top 7 Free Apps To Watch TV Online)

Free Apps, Watch TV Online
आज की फास्ट लाइफ में हम सभी इस कदर बिज़ी रहते हैं कि ख़ुद के मनोरंजन के लिए अधिक समय ही नहीं निकाल पाते हैं. ऐसे में यदि हम अपने मोबाइल फोन पर ही फ्री ऐप्स के ज़रिए लाइव टीवी शोज़ एंजॉय कर सकें, तो क्या बात है. 

Free Apps, Watch TV Online

1.  नेक्सजी टीवी ऐप के ज़रिए 140 से भी अधिक लाइव टीवी चैनल्स के कार्यक्रमों को देखने का आनंद उठा सकते हैं. इसमें हिंदी, मराठी, बंगाली से लेकर बॉलीवुड और हॉलीवुड तक के चैनल्स हैं. कई सीरियल्स के स्पेशल कवरेज भी हैं. इसमें आप शॉर्ट मूवी का भी मज़ा ले सकते हैं.

2. टाटा स्काई एवरीवेयर टीवी ऐप के ज़रिए 80 लाइव टीवी चैनल्स को फ्री में देखने का आनंद उठा सकते हैं. इसके लिए अपने स्मार्ट डिवाइस में ऐप डाउनलोड करना होगा. फिर सर्विस को डिवाइस में एक्टिवेट करना होगा. इसके लिए टाटा स्काई की ओर से सब्सिक्रप्शन आईडी पर एक एसएमएस आएगा. इस एसएमएस की जानकारी को ऐप में डालने के बाद आप फ्री लाइव चैनल्स को एंजॉय कर सकेंगे.

3. डिश टीवी ने भी एक नया एप्लीकेशन लॉन्च किया है, जिससे स्मार्टफोन यूज़र्स अपने सेल फोन और टैबलेट लाइव टीवी देख सकेंगे. यह ऐप एंड्रॉयड और एप्पल दोनों ऐप स्टोर पर उपलब्ध हैं. इसमें 35 से अधिक लाइव चैनल्स को एंजॉय कर सकते हैं.  डिश टीवी ने अलग-अलग डिश टीवी पैक भी मोबाइल यूज़र्स की ज़रूरत के मुताबिक़दिए हैं.

4. रिलायंस जियो के फ्री डाटा और कॉलिंग सुविधा द्वारा भी आप फ्री लाइव टीवी देख सकते हैं. जियो के नए फीचर से यूज़र्स स्मार्टफोन पर छह हज़ार से अधिक फिल्में डाउनलोड कर सकते हैं और जब चाहे, अपनी पसंद की मूवी देख सकते हैं. जियो सिनेमा भी बेस्ट ऑप्शन है. इसमें क़रीब एक लाख से अधिक मूवीज़ हैं. इसे आप ऑफलाइन मोड में भी देख सकते हैं. यदि आप जियो यूज़र्स नहीं हैं, तो भी आप जियो की मूवी, लाइव टीवी का आनंद ले सकतेे हैं. इसके लिए आपको कंप्यूटर पर RemixOS डाउनलोड करना होगा. फिर ओएस को अपने कंप्यूटर पर इंस्टॉल करना है. RemixOS एंड्रॉयड एम्यूलेटर एंड्रॉयड ऐप को कंप्यूटर पर चलाने की सुविधा देता है.

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5. हॉट स्टार एप्लीकेशन काफ़ी समय से बेहद चर्चा में रहा है. यह एप्लीकेशन फ्री है और इस पर आप स्टार चैनल के सभी प्रोग्राम्स को भी फ्री में देख सकते हैं.  यदि आप चाहें, तो पुराने एपिसोड्स भी देख सकते हैं.

6. सोनी लाइव एप्लीकेशन में आप सोनी, सब टीवी और पल टीवी के सभी प्रोग्राम्स को अपने मोबाइल फोन पर देख सकते हैं. इसकी सबसे अच्छी बात यह कही जा सकती है कि आप हाई डेफिनेशन में भी सीरियल को देख सकते हैं. इसमें आप अपना प्ले लिस्ट बना सकते हैं और वीडियो को फेवरेट में भी रख सकते हैं.

7. यूटीवी भी नेक्सजी टीवी की तरह भी मोबाइल फोन पर लाइव टीवी की सर्विस देता है. इससे आप 170 से भी अधिक भारतीय चैनल्स देख सकते हैं. एप्लीकेशन में ऑन डिमांड टीवी शोज़ के अलावा कई अन्य तरह की सेवाएं भी हैं. इसके साथ ही इसमें 1000 से भी अधिक बॉलीवुड यानी हिंदी मूवी फ्री में उपलब्ध हैं.

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– टाटा स्काई के डीटीएच सेवा का भी फ़ायदा उठाया जा सकता है. टाटा स्काई भी सेल फोन पर एप्लीकेशन मुहैया करवाती है. इस एप्लीकेशन के माध्यम से आप अपने फोन पर लाइव टीवी देख सकते हैं. इसमें ऑन डिमांड वीडियो की भी सेवा है, जहां आप अपने फोन के लिए भी सौ से अधिक वीडियो स्ट्रीम कर देख सकते हैं. ऑन डिमांड वीडियो के तहत आप पांच दिन पुराने एपिसोड को भी अपने मोबाइल फोन कर देख सकते हैं. यह आपके टाटा सेट टॉप बॉक्स से कनेक्ट भी होता है और इस एप्लीकेशन के ज़रिए उसे कंट्रोल भी कर सकते हैं.

– इन सब के अलावा शोबॉक्स, व्यूस्टर, क्रैकल फ्री, फ्लिप्स, स्नैग फिल्म्स जैसे ऐप्स के ज़रिए फ्री में देश-विदेश के लाइव टीवी प्रोग्राम्स, मूवी आदि देख सकते हैं.

– सावित्री गुप्ता

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स्मार्टफोन आंखों के लिए है हानिकारक (Smartphone Overuse May Damage Your Eyes)

Smartphone Overuse

दिन-रात फोन से चिपके रहने की आदत भले ही आपको दूर-दराज़ बैठे लोगों से जोड़ रही हो, लेकिन ये आपकी आंखों की सेहत बड़ी तेज़ी से बिगाड़ रहा है. आंखों का एकटक मोबाइल फोन पर टिके रहना, उसकी सेहत को डैमेज कर रही है. आइए, हम आपको बताते हैं कि कैसे मोबाइल फोन बहुत स्मार्टली आपकी आंखों को ख़राब कर रहा है. स्मार्टफोन की स्क्रीन आंखों के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है. स्मार्टफोन के आने से आंखों की परेशानी में इज़ाफ़ा हुआ है. नई-नई तरह की बीमारियां सुनने और देखने को मिल रही हैं.

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रेटिना पर अटैक

रात में जब आप अपना फोन यूज़ करते हैं, तो उससे निकलनेवाली लाइट सीधे रेटिना पर असर करती है. इससे आपकी आंखें जल्दी ख़राब होने लगती हैं. देखने की क्षमता धीरे-धीरे घटने लगती है.

ड्राईनेस

दिनभर काम करते रहने से आंखों को आराम नहीं मिलता, ऐसे में रात में भी सोने की बजाय फोन पर देर तक बिज़ी रहना आंखों को ड्राई कर देती है. इससे आंखों में खुजली और जलन होने लगती है. लगातार ऐसा करने से आंखों की अश्रु ग्रंथि पर बुरा प्रभाव पड़ता है.

आईसाइट डैमेज

क्या आप जानते हैं कि स्मार्टफोन हमेशा के लिए आंखों की रोशनी छीन सकता है? जी हां, कई शोधों में ये बात साबित हो चुकी है. फोन से निकलनेवाली ब्लू लाइट (कएत श्रळसहीं) आंखों को पूरी तरह से डैमेज कर सकती है.

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आंखों से पानी गिरना

घंटों स्मार्टफोन से चिपके रहने से आंखों से पानी गिरने लगता है. ऐसा मोबाइल से निकलनेवाली किरणों के कारण होता है. लगातार मोबाइल पर देखते रहने से पलकों का झपकना लगभग कम हो जाता है. इससे आखों को आराम नहीं मिलता और आंखों से पानी गिरने लगता है.

चश्मा लगना

ये मोबाइल फोन आपको भले ही सोशल साइट्स से जोड़कर सुकून पहुंचाते हों, लेकिन आपकी आंखों पर जल्द ही चश्मा चढ़ा देते हैं. इतना ही नहीं, धीरे-धीरे आंखों का नंबर बढ़ने लगता है और पतला चश्मा मोटा होने लगता है. कुछ सालों के बाद आपको आंखों का ऑपरेशन तक करवाना पड़ सकता है.

पुतलियों का सिकुड़ना

स्मार्टफोन का अधिक उपयोग करने से न केवल पलक झपकाने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है, बल्कि आंखों की पुतलियां भी सिकुड़ने लगती हैं. आंखों की नसें सिकुड़ने लगती हैं. इससे आंखों की रोशनी के साथ सिरदर्द की समस्या भी होने लगती है.

आंखों का लाल होना

लगातार फोन की स्क्रीन पर देखते रहने से आंखों का स़फेद भाग लाल होने लगता है. आईड्रॉप डालने से भी ये समस्या कम नहीं होती. लाल होने के साथ ही आंखें हमेशा सूजी हुई भी लगती हैं.

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टेंपरेरी ब्लाइंडनेस

लगातार फोन की तरफ़ देखने से जब अचानक आप कहीं और देखते हैं, तो कुछ देर के लिए सब ब्लैक दिखता है. आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है. यह आपकी आंखों के लिए अच्छा संकेत नहीं है.

धुंधला दिखना

स्मार्टफोन का अधिक उपयोग आपको इतना नुक़सान पहुंचाता है कि आपको धुंधला दिखने लगता है. अंग्रेज़ी में इसे ब्लर्ड विज़न कहते हैं. यह प्रक्रिया आगे चलकर गंभीर हो जाती है और आपको दिखने में समस्या होने लगती है

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कैसे बचें?

अगर आप चाहते हैं कि आपकी आंखें ख़राब न हों, तो आप नीचे दिए गए सुझावों को अपनाएं.

दूरी मेंटेन करें

आप अचानक तो फोन का यूज़ करना बंद या कम नहीं कर सकते. ये सच भी है लेकिन फोन को आंखों से दूर रखकर कुछ हद तक आंखों को सेफ रख सकते हैं. जब भी फोन यूज़ करें इस बात का ज़रूर ध्यान रखें कि फोन आंखों के बेहद क़रीब न हो.

20 सेकंड का ब्रेक

दिनभर ऑफिस में कंप्यूटर पर काम करने के बाद वैसे ही आपकी आंखें थक जाती हैं. ऐसे में फोन की स्क्रीन से चिपके रहने पर आंखों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है. जब भी फोन इस्तेमाल करें, तब हर 20 मिनट के बाद 20 सेकंड का ब्रेक लें. यह ब्रेक आंखों को रिलैक्स करेगा.

नो नाइट वॉच

क्या आपको नहीं लगता कि रात सोने के लिए बनी है. दिनभर काम और रात को फोन पर चैटिंग, वीडियो वॉचिंग आदि आपको कितना थका देता है. ख़ुद ही एक लिमिट तय करें. रात में एक समय के बाद फोन यूज़ न करें. देर रात तक फोन यूज़ करने से नींद ख़राब होती है और बाद में ये आदत-सी हो जाती है. इससे आंखों के नीचे डार्क सर्कल, पफनेस आदि होने के साथ आईसाइट पर भी बुरा असर होता है.

लाइट कम करें

शुरुआत में फोन की लत से बचना बहुत मुश्किल है. हां, धीरे-धीरे इस आदत को आप कम कर सकते हैं, इसलिए बेहतर होगा कि फोन यूज़ करते समय फोन की ब्राइटनेस कम करें. इससे आंखों पर प्रेशर कम पड़ेगा.

– श्‍वेता सिंह

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