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The Psychology Of Relationships: टीनएज बेटी के व्यवहार से डर लगता है (Afraid Of Teenage Daughters Behavior)

Psychology Of Relationships

रिश्तों का मनोविज्ञान (The Psychology Of Relationships)

मेरी बेटी की उम्र 28 साल है. वो नौकरी करती है. पिछले कुछ समय से उसकी शादी की बात चल रही है. कई रिश्ते भी आए, पर उसे कोई पसंद ही नहीं आता. पता नहीं उसके मन में क्या चल रहा है. उससे पूछती हूं, तो कहती है कि सही समय पर, सही लड़का मिल जाएगा, तब कर लूंगी शादी. जल्दबाज़ी में ग़लत निर्णय नहीं लेना चाहती. लेकिन लोग बातें करते हैं, जिससे मैं बहुत परेशान रहती हूं.

– शिल्पा शुक्ला, उत्तर प्रदेश.

आज की जनरेशन शादी देर से ही करती है. उनकी प्राथमिकताएं अब बदल गई हैं. एक तरह से शादी की उम्र क़रीब 30 साल हो गई है. बच्चे पढ़-लिखकर कुछ बनकर ही शादी करने की सोचते हैं. अपनी बेटी का साथ दीजिए और धीरज रखिए. सही समय पर सब ठीक होगा. लोग क्या कहते हैं, उस पर ज़्यादा ध्यान न दें. यह आपकी बेटी की ज़िंदगी का सवाल है. अपनी बेटी पर भरोसा रखें. वो सही समय आने पर सही निर्णय ले लेगी. उसके कारण ज़्यादा परेशान होकर अपनी सेहत और घर का माहौल ख़राब न करें.

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मेरे पिताजी ने वॉलंटरी रिटायरमेंट ले लिया है. अब वे सारा दिन घर पर रहते हैं, लेकिन वो बहुत चिड़चिड़े से हो गए हैं. बात-बात पर बहस और ग़ुस्सा करते हैं. ज़िद्दी हो गए हैं, जिससे घर का माहौल ख़राब रहने लगा है. समझ में नहीं आता कि उन्हें कैसे हैंडल करें, क्योंकि वो बड़े हैं, तो उन्हें कुछ कह भी नहीं सकते.

– राकेश सिन्हा, पटना.

आप उनके मन की स्थिति समझने की कोशिश करें. हो सकता है, उन्हें भी दिनभर घर पर बैठे रहना अच्छा न लगता हो या यह भी हो सकता है कि उन्हें कोई और परेशानी हो, जो वे आप लोगों से कह न पा रहे हों. थोड़ा धीरज से काम लें. उनका विश्‍वास जीतें. उनसे प्यार से पेश आएं. उन्हें
सुबह-शाम वॉक पर ले जाएं. सोशल एक्टिविटीज़, योगा इत्यादि के लिए प्रोत्साहित करें. उन्हें घर के काम की भी ज़िम्मेदारी दें. घर के महत्वपूर्ण निर्णयों में उन्हें शामिल करें. उनकी राय को महत्व दें. उन्हें महसूस न होने दें कि अब वो काम पर नहीं जाते या कुछ करते नहीं हैं. आप सब का प्यार, सम्मान और सहानुभूति उन्हें शांत रहकर कुछ और करने के लिए प्रोत्साहित करेगी.

मेरी बेटी की उम्र 14 साल है. स्कूल जाती है. आजकल उसका स्वभाव कुछ अलग-सा हो गया है. हर समय मोबाइल पर लगी रहती है. कोई बात सुनती नहीं है. पैरेंट्स तो जैसे उसके दुश्मन हैं. डर लगता है, कहीं कोई ग़लत राह न पकड़ ले.
– कोमल सिंह, पानीपत.

इस उम्र में बच्चों का यह व्यवहार स्वाभाविक है. उन्हें परिजनों से ज़्यादा उनके दोस्त अच्छे लगते हैं. उन्हें लगता है पैरेंट्स की सोच पुरानी व दकियानूसी है. बच्चों की ख़ुशी का उन्हें ख़्याल नहीं है… आदि. बेहतर होगा आप भी उनके साथ दोस्तों की तरह पेश आएं. उनके साथ समय बिताएं, उनकी एक्टिविटीज़ में सकारात्मक तौर पर शामिल हों. हंसी-मज़ाक करें. हर बात पर टोकना या लेक्चर देना उन्हें पसंद नहीं आएगा. उनका विश्‍वास जीतें. लेकिन साथ ही उन पर नज़र भी रखें, उनके फ्रेंड सर्कल की जानकारी रखें, पर उन्हें कंट्रोल करने की कोशिश न करें. घर का हल्का-फुल्का दोस्ताना माहौल उन्हें घर से और आपसे बांधे रखेगा.

Zeenat Jahan

ज़ीनत जहान
एडवांस लाइफ कोच व
सायकोलॉजिकल काउंसलर

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एक्सक्लूसिव बुनाई डिज़ाइन्स- 5 बेस्ट टीनेज कार्डिगन डिज़ाइन्स (Exclusive Bunai Designs- 5 Best Teenage Cardigan Designs)

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स्टाइलिश गर्ल

सामग्रीः 225 ग्राम मेहंदी रंग का ऊन, 100 ग्राम क्रीम ऊन, सलाइयां.

विधिः आगे का भागः मेहंदी रंग से 60 फं. डालकर 1 फं. सी. 1 उ. की रिब बुनाई में 3 इंच का बॉर्डर बुनें. अब दोनों साइड में 2 फं. उ., 4 फं. का केबल, 2 उ. 4 का केबल और बाकी के फं. सीधी-उल्टी बुनाई में बुनें. 14 इंच बाद गोल गला घटाएं.

पीछे का भागः आगे के भाग की तरह बुनें. गला न घटाएं. गले के फं. उठाकर रिब बुनाई में डबलपट्टी बुनें.

आस्तीनः 32-32 फं. डालकर बॉर्डर बुनें. हर 5वीं सलाई में 1-1 फं. बढ़ाती जाएं. आधी आस्तीन हो जाने पर हर 3री सलाई में बढ़ाएं. फिर हर सीधी सलाई में 7-7 फं. बढ़ाएं. चित्रानुसार क्रीम रंग से डिज़ाइन भी डालती जाएं. अब आस्तीन की चौड़ाई आगे-पीछे के भाग जितनी हो जाएगी. इसे स्वेटर से जोड़कर सिल लें.
स्वेटर के सभी भागों को जोड़कर सिल लें.

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पिकनिक टाइम

सामग्रीः 200 ग्राम फिरोज़ी रंग का ऊन, 200 ग्राम पिंक ऊन, सलाइयां.

विधिः पीछे का भागेः फिरोज़ी रंग से 80 फं. डालकर 4 फं. सी. 2 उ. की बुनाई में 3 इंच का बॉर्डर बुनें. अब पिंक रंग से सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई करते हुए 15 इंच लंबाई होने तक बुनें. उल्टे पल्ले को सीधी तरफ़ रखें, ताकि उल्टी बुनाई दिखाई दे.

आगे का भागः फिरोज़ी रंग से 80 फं. डालकर 4 फं. सी. 2 उ. की बुनाई में 3 इंच का बॉर्डर बुनें. अब 40 फं.फिरोज़ी रंग से सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई में बुनें और बाकी के 40 फं. 6 सलाई पिंक और 6 सलाई फिरोज़ी रंग से बुनें- इस तरह कि सीधी तरफ़ से पिंक फं. सी. और फिरोज़ी फं. उ. दिखाई दें. 8 इंच बुनने के बाद 2 फं. पिंक व 2 फं. फिरोज़ी सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई में बुनें. 3 इंच का गला घटाएं. कंधे जोड़कर गले के फं. उठाकर 2 फं. सी. 2 उ. की बुनाई में गले की पट्टी बुन लें.

आस्तीनः 35-35 फं. डालकर पिंक की सीधी व फिरोज़ी की उल्टी 6-6 सलाइयों की स्ट्राइप्स डालते हुए बुनें. हर 5वीं सलाई में 1-1 फं. बढ़ाती जाएं. 17 इंच लंबाई हो जाने पर फं. बंद कर दें.
स्वेटर के सभी भागों को जोड़कर सिल लें.

 

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आइसी कूल

सामग्रीः 200 ग्राम पेस्टल ग्रीन रंग का ऊन, 100 ग्राम पिंक ऊन, सलाइयां.

विधिः आगे-पीछे का भागः आगे-पीछे के भाग के लिए ग्रीन रंग से 80-80 फं. डालकर 2 फं. सी. 2 उ. की रिब बुनाई में बॉर्डर बुनें. 2 सलाई सीधी-उल्टी बुनें. अब सीधी सलाई में 3 फं. पिंक, 1 ग्रीन, 1 पिंक, 1 ग्रीन, 3 पिंक- इसी तरह पूरी सलाई बुनें. उल्टी सलाई में 3 पिंक फं. सी. ही बुनें. ग्रीन बिना बुने उतारें और 1 पिंक फं. उ. बुनें. अब 2 सलाई ग्रीन से सीधी-उल्टी बुनें. यही 4 सलाई दोहराते हुए पूरा स्वेटर बुनें. लंबाई 19 इंच रखें. आगे के भाग में गोल गला घटाएं. कंधे जोड़कर गले के फं. उठाएं और गले की पट्टी बुन लें.

आस्तीनः 40-40 फं. डालकर आगे-पीछे के भाग की तरह ही बुनें. हर 5वीं सलाई में 1-1 फं. बढ़ाते जाएं. 14 इंच लंबाई हो जाने पर फं. बंद कर दें. स्वेटर के सभी भागों को जोड़कर सिल लें.

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स्माइल प्लीज़

सामग्रीः 300 ग्राम बचे हुए रंगबिरंगे ऊन, 50 ग्राम पिंक ऊन, सलाइयां.

विधिः आगे का भागः दाएं-बाएं भाग के लिए 40-40 फं. पिंक रंग से डालकर उल्टी धारी का बॉर्डर बुनें. बीच में 2 धारी हरे रंग से बुनें. शुरू के 5-5 फं. बटनपट्टी के रखकर चित्रानुसार सभी रंग लगाकर सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई में ज्योमैट्रिकल डिज़ाइन बुनें. 19 इंच लंबाई हो जाने पर फं. बंद कर दें.

पीछे का भागः 80 फं. डालकर आगे के भाग की तरह ही बुनें.
80 फं. की टोपी बुनकर गले पर सिल लें.

आस्तीनः 40-40 फं. डालकर आगे-पीछे के भाग की तरह डिज़ाइन डालते हुए 17 इंच लंबी आस्तीन बुनें. हर 5वीं सलाई में 1-1 फं. बढ़ाती जाएं.
स्वेटर के सभी भागों को जोड़कर सिल लें. चेन लगाएं.

 

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अपोज़िट डिज़ाइन

सामग्रीः 300 ग्राम आसमानी रंग का ऊन, 50 ग्राम मेहंदी ऊन, 25 ग्राम लाल ऊन, सलाइयां.

विधि: आगे का भागः आसमानी ऊन से 90 फं. डालकर उल्टी धारियों का बॉर्डर बुनें. अब सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई करते हुए 17 इंच लंबा बुनें. मुड्ढे घटाएं. 6 इंच और बुनें.

आगे का भागः दाएं-बाएं भाग के लिए 45-45 फं. डालकर पीछे के भाग की तरह बॉर्डर बुनें. अब सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई में थोड़ा बुनकर सारे फं. इकट्ठे कर लें. बाईं तरफ 30 फं. की मेहंदी व आसमानी रंग से उल्टी धारियां डालें. शेष फं. आसमानी ऊन से सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई में बुनें. बीच में केबल बुनें- 2 फं. उ., 4 सी. की केबल, 2 उ., 4 सी. की केबल, 2 उ. बुनें. 14 धारियां बुनने के बाद आसमानी ऊन से बुनें. अब दाहिनी तरफ लाल व आसमानी धारियां बुनते हुए बुनें. गोल गला घटाएं. कंधे जोड़कर गले के फं. उठाएं और 1 फं. सी. 1 उ. की बुनाई में लाल और आसमानी धारी डालते हुए गले की पट्टी बुन लें.

आस्तीनः 46-46 फं. डालकर एक आस्तीन का बॉर्डर लाल रंग से और पूरी आस्तीन लाल-आसमानी रंग से धारियां डालते हुए बुनें. दूसरी आस्तीन का बॉर्डर आसमानी-मेहंदी रंग की धारियां डालते हुए बुनें और पूरी आस्तीन मेहंदी रंग से बुनें. आस्तीन की लंबाई 17 इंच रखें.
स्वेटर के सभी भागों को जोड़कर सिल लें.

एक्सक्लूसिव बुनाई डिज़ाइन्स- टीनेज स्टाइल (Exclusive Bunai Designs- Teenage style)

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चार्मिंग गर्ल

सामग्रीः 250 ग्राम ग्रे रंग का शेडेड ऊन, 50 ग्राम स़फेद व लाल रंग का ऊन, सलाइयां.

विधिः पीछे का भागः 80 फं. ग्रे रंग से डालकर 1 फं. सी. 1 उ. की रिब बुनाई में 3 इंच का बॉर्डर बुनें. अब सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई करते हुए 18 इंच लंबाई होने तक बुनें.

आगे का भागः 80 फं. ग्रे रंग से डालकर 1 फं. सी. 1 उ. की रिब बुनाई में 3 इंच का बॉर्डर बुनें. चित्रानुसार स़फेद व लाल रंग से डिज़ाइन डालते हुए बुनें. 16 इंच लंबाई हो जाने पर गोल गला घटाएं. कंधे जोड़कर गले के फं. उठाकर 1 फं. सी. 1 उ. की बुनाई में डबलपट्टी बुनें.

आस्तीनः 40-40 फं. डालकर रिब बुनाई में बॉर्डर बुनें. सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई करते हुए 14 इंच लंबी आस्तीन बुनें. हर 5वीं सलाई में दोनों तरफ़ से 1-1 फं. बढ़ाते जाएं.
स्वेटर के सभी भागों को जोड़कर सिल लें.

 

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चेरी गार्डन

सामग्रीः 100 ग्राम चेरी पिंक रंग का ऊन, 150 ग्राम क्रीम ऊन, सलाइयां, बटन.

विधिः आगे का भागः दाएं-बाएं भाग के लिए क्रीम रंग से 2 फं. सी., 2 उ. की बुनाई मेें 1 सलाई बुनें. अब 2 इंच बॉर्डर पिंक रंग से बुनें. अब सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई करते हुए क्रीम रंग से बुनें. बीच-बीच में 1-1 फं. पिंक से बुनें. इससे बूटी की डिज़ाइन बन जाएगी. 12 इंच लंबाई हो जाने पर मुड्ढे घटाएं. 3 इंच बाद गोल गला घटाएं. 3 इंच और बुनें. बटनपट्टी के फं. उठाकर बेड़ी बटनपट्टी बुनें.

पीछे का भागः 80 फं. डालकर आगे के भाग की तरह बुनें. मुड्ढे घटाएं.
कंधे जोड़ें. गले के फं. उठाकर गले की पट्टी बुनें.

आस्तीनः 36-36 फं. डालकर आगे-पीछे के भाग की तरह बुनें.
स्वेटर के सभी भागों को जोड़कर सिल लें. बटन लगाएं.

 

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मिक्स डिज़ाइन

सामग्रीः 200 ग्राम ब्राउन रंग का ऊन, 20 ग्राम बैंगनी रंग का ऊन, 50-50 ग्राम पीला व पिंक ऊन, सलाइयां.

विधिः आगे-पीछे का भागः ब्राउन ऊन से 90-90 फं. डालकर 10 फं. उ. 2 सी. 10 उ. 2 सी. की बुनाई में बॉर्डर बुनें. अब 10 फं. पिंक, 2 ब्राउन, 1 पिंक, 2 ब्राउन, 1 पिंक, 2 पिंक से सीधे बुनें. उल्टी सलाई में पिंक फं. सीधे बुनें, शेष उल्टे. अब 2 सलाई सीधी-उल्टी बुनकर दूसरे रंग से बुनाई डालें. तीनों रंग लगाने के बाद चेक पलट लें. 16 इंच लंबाई हो जाए, तो मुड्ढे घटाएं. आगे के भाग में बाईं तरफ़ 6 फं. की बटनपट्टी अंगरखे की तरह ऊपर-नीचे बुन लें. गोल गला घटाएं. कंधे जोड़कर गले की पट्टी बुन लें.

आस्तीनः 46-46 फं. डालकर आगे-पीछे के भाग की तरह बुनें. हर 5वीं सलाई में दोनों तरफ़ से 1-1 फं. बढ़ाते जाएं. 18 इंच लंबाई हो जाने पर फं. बंद कर दें.
स्वेटर के सभी भागों को जोड़कर सिल लें.

बड़े होते बच्चों को ज़रूर बताएं ये बातें

यौवन को छू लेने की हसरत… बड़ों-सा बड़ा बनने की चाहत… कभी घंटों आईने में ख़ुद को निहारना… कभी छोटी-सी ही बात पर बिगड़ जाना… कभी धड़कनों का अचानक बेक़ाबू हो जाना, कभी बेपरवाह-सा जीने का मज़ा लेना… दोस्तों की संगत, अदाओं में अजीब-सी रंगत… हर बात पर ढेरों सवाल और कभी सवालों के बेतुके-से जवाब… कुछ अलग ही होता है इस उम्र का हिसाब…

जी हां, थोड़ी मासूमियत, थोड़ी नादानी, थोड़ा अल्हड़पन और बहुत-सी अपरिपक्वता… कुछ ऐसी ही होती है किशोरावस्था. कई सवाल मन में आते हैं, कई आशंकाएं होती हैं, असमंजस भी होता है, शंकाएं भी होती हैं… कुल मिलाकर कंफ्यूज़न की स्टेज व दौर से गुज़र रहे होते हैं इस उम्र में बच्चे. ऐसे में सही पैरेंटिंग से आप अपने बच्चों की ज़रूर मदद कर सकते हैं. उन्हें सही उम्र में उचित मार्गदर्शन देकर और उनके मन में सवालों के पनपने से पहले ही उनके जवाब व हल देकर. तो हर पैरेंट्स के लिए ज़रूरी है कि वो अपने बड़े होते बच्चों को कुछ बातें ज़रूर बताएं.

शरीर में होनेवाले बदलाव: किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों के शरीर में बहुत-से बदलाव होते हैं. अचानक शरीर में आ रहे इन परिवर्तनों से बच्चे घबरा जाते हैं. उनके मन में भी ढेर सारे प्रश्‍न उठते हैं. उन्हें बार-बार यह एश्योरेंस चाहिए होता है कि वे सामान्य हैं. ऐसे में पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी बनती है कि उन्हें यह महसूस कराएं कि ये तमाम बदलाव सामान्य हैं. आप भी जब उनकी उम्र में थे, तो इन्हीं बदलावों से गुज़रे थे.

प्यूबर्टी: प्यूबिक हेयर, आवाज़ में बदलाव, चेहरे पर अचानक ढेर सारे पिंपल्स, क़द का बढ़ना, हार्मोंस में परिवर्तन आदि के कारणों को बड़े होते बच्चे समझ नहीं पाते. हालांकि आज के इंटरनेट के युग में बहुत-सी चीज़ों के बारे में बच्चे पहले से ही जान ज़रूर लेते हैं, लेकिन वे उन्हें ठीक से समझ नहीं पाते. यहां पैरेंट्स के लिए सबसे ज़रूरी यह है कि आप इंतज़ार न करें कि बच्चा आकर आपसे सवाल करे. बेहतर होगा कि समय से पहले ही आप उन्हें बातचीत के दौरान या अन्य तरीक़ों से इन चीज़ों के बारे में एजुकेट करते रहें. इससे बच्चे मानसिक रूप से तैयार रहेंगे और ग़लत जगहों से जानकारी इकट्ठा नहीं करेंगे.

मासिक धर्म: अगर आप इस इंतज़ार में हैं कि जब बच्ची को पीरियड्स शुरू होंगे, तब इस बारे में उसे बताएंगी, तो आप ग़लत हैं. अगर आपकी बेटी को इस विषय में कोई भी जानकारी नहीं होगी, तो अचानक पीरियड्स होने पर ब्लड देखकर वो घबरा सकती है. बेहतर होगा कि उसे इस बात का अंदाज़ा पहले से हो कि पीरियड्स होना एक नेचुरल क्रिया है, जो एक उम्र के बाद हर लड़की को होता है और इसमें घबराने जैसी कोई बात ही नहीं है.

आकर्षण: टीनएज में हार्मोनल बदलावों के कारण अपोज़िट सेक्स के प्रति आकर्षण भी सहज ही उत्पन्न हो जाता है. आज भी हमारे देश में अधिकतर स्कूलों में सेक्स एजुकेशन नहीं दी जाती, लेकिन दूसरी तरफ़ पारिवारिक माहौल भी ऐसा ही होता है कि सेक्स शब्द को ही बुरा समझा जाता है. यही वजह है कि बच्चे न कुछ पूछ पाते हैं, न समझ पाते हैं और कुंठित हो जाते हैं. इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं, जैसे- वे ग़लत संगत में पड़ सकते हैं, भविष्य में सेक्स को लेकर विकृत मानसिकता बन सकती है, ग़लत काम कर सकते हैं. बेहतर होगा कि बच्चों को समझाएं कि आप जब उनकी उम्र के थे, तो आपको भी अपने क्लास की कोई लड़की/लड़का पसंद आया करता था, यह बहुत ही नॉर्मल है. लेकिन इस अट्रैक्शन को किस तरह से पॉज़ीटिविटी में बदला जाए, इसके टिप्स देने ज़रूरी हैं, जैसे-

– अगर कोई पसंद आ रहा है, तो उससे दोस्ती करने में, बातचीत करने में कोई बुराई नहीं है.

– लड़के-लड़की अच्छे दोस्त बन सकते हैं. एक-दूसरे की मदद भी कर सकते हैं.

– बच्चों को बताएं कि यह उम्र पढ़ाई और हेल्दी कॉम्पटीशन की है.

एसटीडी: सेक्सुअली ट्रांसमीटेड डिसीज़ के बारे में भी इस उम्र में ही बच्चों को बता देना और आगाह करना भी पैरेंट्स का फ़र्ज़ है. बच्चे इस उम्र में एक्सपेरिमेंट करते ही हैं, ख़ासतौर से सेक्स को लेकर अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने या उनके जवाब ढूंढ़ने के लिए वे बहुत ही उत्सुक रहते हैं. ऐसे में उन्हें सतर्क करना पैरेंट्स के लिए बेहद ज़रूरी है. बच्चों को एसटीडी, उससे जुड़े गंभीर परिणाम व उससे बचने के तरीक़ों के बारे में बताएं. इसी तरह आप उन्हें मास्टरबेशन के बारे में भी एजुकेट करें.

टीनएज प्रेग्नेंसी: आजकल एक्सपोज़र के चलते न स़िर्फ प्यूबर्टी जल्दी होने लगी है, बल्कि बच्चे सेक्स में भी जल्दी एंगेज होने लगे हैं. उन्हें सेक्स में जल्दी एंगेज होने के दुष्परिणामों के बारे में बताएं. किस तरह से ये चीज़ें सेहत, पढ़ाई और भविष्य को नुक़सान पहुंचा सकती हैं, इससे संबंधित लेख वगैरह पढ़ने को दे सकते हैं. टीनएज प्रेग्नेंसी के रेट्स और उससे होनेवाली समस्याओं से संबंधित आर्टिकल्स के ज़रिए भी आप बच्चों को एजुकेट व गाइड कर सकते हैं.

एडिक्शन्स: एक्सपेरिमेंट की इस उम्र में ऐसा नहीं है कि बच्चे स़िर्फ सेक्स को लेकर ही एक्सपेरिमेंट करते हैं, वो सिगरेट-शराब और बाकी चीज़ों की तरफ़ भी आकर्षित होते हैं. आप अगर बच्चों के रोल मॉडल बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने व्यवहार को नियंत्रित रखना होगा. साथ ही अपने बच्चों को व्यसनों से होनेवाले सेहत व पैसों के नुक़सान के विषय में समझाना होगा. उनके दोस्तों व संगत पर भी ध्यान देना होगा और अनुशासन के महत्व पर ज़ोर देना होगा.

कम्यूनिकेशन: चाहे बच्चों से कितनी भी बड़ी ग़लती हो जाए, उनमें यह कॉन्फिडेंस जगाएं कि वो अपनी ग़लती स्वीकार करें और आपसे आकर बात करें. बच्चों को आप यह भरोसा दिलाएं कि आप हर क़दम पर उनके साथ हैं, उन्हें सपोर्ट करने के लिए. अगर उनसे कोई ग़लत क़दम उठ भी जाता है, तो भी घबराने की बजाय वो आपसे शेयर करें. बच्चों को रिलेशनशिप में कम्यूनिकेशन व विश्‍वास के महत्व का एहसास दिलाएं. आप उनसे कह सकते हैं कि न स़िर्फ उनकी उम्र में, बल्कि किसी भी उम्र में किसी से भी ग़लतियां हो सकती हैं. कोई भी परफेक्ट नहीं होता, इसलिए अपराधबोध महसूस न करके कम्यूनिकेट करें.

 

 

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कैसे करें बच्चों को एजुकेट?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि कहना आसान है कि बच्चों को इन बातों के बारे में बताएं, लेकिन दरअसल पैरेंट्स के मन में कई तरह की दुविधाएं होती हैं. इस विषय पर विस्तार से हमें बता रही हैं सायकोथेरेपिस्ट डॉ. चित्रा मुंशी-

– आपकी बातचीत बहुत ही कैज़ुअल होनी चाहिए. आप कॉन्फिडेंट रहें और कोई अलग-सा माहौल बनाकर बात न करें, जिससे आप के साथ-साथ बच्चे भी असहज महसूस करें.

– बच्चों को उनके बॉडी डेवलपमेंट के बारे में इस तरह से बताएं कि जिस तरह तुम बड़े हो रहे हो, हाइट बढ़ रही है, उसी तरह बॉडी ऑर्गन्स भी धीरे-धीरे बड़े होते हैं.

– इसी तरह लड़कों को नाइटफॉल के बारे में समझाना चाहिए कि बॉडी में जो चीज़ एक्सेस हो जाती है, उसे बॉडी बाहर फेंक देती है. इसमें घबराने की कोई बात नहीं. तो 10 साल के बच्चों के लिए सेक्स एजुकेशन यही और इसी तरह से होनी चाहिए.

– यह ज़रूरी है कि बच्चों को प्यूबर्टी से पहले ही मानसिक रूप से धीरे-धीरे इस विषय पर तैयार किया जाए, लेकिन आजकल प्यूबर्टी जल्दी होने लगी है. बच्चियों को छठी कक्षा में ही पीरियड्स होने लगे हैं, तो ऐसे में क्या उन्हें पांचवीं क्लास से ही सेक्स एजुकेशन देनी शुरू करनी चाहिए? जबकि यह उम्र बहुत कम होगी सेक्स एजुकेशन के लिए.

– इसलिए यह ध्यान रखना भी बेहद ज़रूरी है कि बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार ही एजुकेट करें यानी बताने का तरीक़ा ‘एज फ्रेंडली’ होना चाहिए.

– बेटी को आप अगर यह बताएंगे कि पीरिड्स में ख़ून निकलता है, तो वह डर जाएगी. आप उसे यह कहें कि हमारे शरीर में बहुत से टॉक्सिन्स होते हैं, जिनका बाहर निकलना ज़रूरी भी है और नेचुरल भी. शरीर में ऐसे कई ग़ैरज़रूरी विषैले तत्व होते हैं, जिन्हें बॉडी ख़ुद बाहर निकाल देती है, ताकि हम हेल्दी रह सकें. आप उन्हें उदाहरण देकर समझा सकते हैं कि जिस तरह अगर आंखों में कचरा चला जाए, तो उसका बाहर निकलना ज़रूरी होता है, इसी तरह शरीर के अंदर भी अलग-अलग ऑर्गन्स में कचरा जम जाता है, जो समय-समय पर बाहर निकलता है. साथ ही बच्ची को यह भी बताएं कि जो बाहर निकलता है, वो दरअसल ब्लड नहीं होता, वो अनवॉन्टेड चीज़ है, जिसका बाहर निकलना हेल्दी रहने के लिए ज़रूरी है.

– फिज़िकल अट्रैक्शन के बारे में भी ज़रूर बताएं कि यह नॉर्मल है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वो इंटिमेट हो जाएं. बच्चे इस उम्र में एक्सपेरिमेंट करते ही हैं और शायद उन्हें पता ही नहीं चलता कि कब वो सीमाएं तोड़कर ग़लत क़दम उठा लेते हैं. यह भी उन्हें अच्छी तरह से समझाएं. बेहतर होगा इंटरनेट के इस्तेमाल के समय आप साथ बैठें, बहुत ज़्यादा बच्चों को घर पर अकेला न छोड़ें.

– बच्चों को एजुकेट करने का पहला क़दम व बेहतर तरीक़ा होगा कि उन्हें क़िताबें, लेख व अच्छी पत्रिकाओं के ज़रिए समझाना शुरू करें और फिर उन विषयों पर आप बात करके उनकी शंकाएं और मन में उठ रहे सवाल व दुविधाओं को दूर करें.

– सबसे ज़रूरी है कि अगर आप रोल मॉडल नहीं बन सकते, तो बच्चों को हिदायतें न ही दें. आपको देखकर ही बच्चे अनुशासन सीखेंगे. आप अगर ख़ुद सिगरेट-शराब पीते हैं, घंटों नेट पर, फोन या टीवी पर समय व्यतीत करते हैं, तो बच्चों को आपकी कही बातें मात्र लेक्चर ही लगेंगी.

पैरेंट्स यह भी जानें

– अक्सर पैरेंट्स इस बात को लेकर असमंजस में रहते हैं कि क्या मांएं बेटियों को और पिता बेटों को इस बारे में बता सकते हैं या मां भी बेटे को और पिता भी बेटी को एजुकेट कर सकते हैं. जबकि यह एक बेहतर तरीक़ा है कि अपोज़िट सेक्स के होने के बाद भी पैरेंट्स बच्चों से इस पर बात करें. इससे वो समझ सकेंगे कि एडल्ट्स के लिए यह सामान्य बात है कि स्त्री-पुरुष के शरीर के विषयों में वो सब कुछ जानते हैं और इसमें हिचकने की कोई बात नहीं है.

– क्या लड़कियों को लड़कों के विषय में और लड़कों को लड़कियों के विषय में भी एजुकेट करना सही होगा, यह भी एक सवाल पैरेंट्स के मन में आता है? जवाब यही है कि क्यों नहीं? बच्चों को अपने शरीर के प्रति जितना कम कॉन्शियस और जितना अधिक नॉलेजेबल बनाएंगे, उतना ही उनका मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा रहेगा. लड़के-लड़कियों दोनों को पता होना चाहिए कि प्यूबर्टी सबके लिए सामान्य बात है, यह नेचुरल प्रोसेस है, जिससे सबको गुज़रना पड़ता है. इससे दोनों में एक-दूसरे के प्रति अधिक समानता की भावना, अधिक संवेदनशीलता व अधिक सम्मान भी पनपेगा.

– बच्चों से कभी भी सीबीआई की तरह इंटरोगेट न करें, बल्कि उनमें दिलचस्पी दिखाएं. अपनी दिनचर्या उन्हें बताएं और फिर बातों-बातों में उनकी दिनचर्या, दोस्तों का हाल, पढ़ाई, खेल, मूवीज़ आदि के बारे में पूछें. इससे रिश्ते सहज होंगे और शेयरिंग ज़्यादा से ज़्यादा होगी.

– बच्चों के दोस्तों को भी घर पर कभी डिनर, पार्टी या लंच पर आमंत्रित करें. इससे आपको अंदाज़ा होगा कि बच्चों के दोस्त कौन-कौन हैं और किस तरह की संगत में बच्चे दिनभर रहते हैं.

– बढ़ते बच्चों में बहुत जल्दबाज़ी होती है ख़ुद को परिपक्व व ज़िम्मेदार दिखाने की, क्योंकि वो चाहते हैं कि लोग उन्हें गंभीरता से लें. आप अपने बच्चों पर भरोसा जताकर उन्हें कुछ ज़िम्मेदारियां ज़रूर सौंपे. ऐसे में उनका आत्मविश्‍वास बढ़ेगा और वो ख़ुद को महत्वपूर्ण समझकर और भी परिपक्वता व ज़िम्मेदारी से काम लेंगे.

– गीता शर्मा