Teenagers Problems

प्री टीन यानी 9-12 साल की उम्र में बच्चों का शारीरिक विकास होने लगता है, ऐसे में उन्हें बॉडी हाइजीन का ख़ास ख़्याल रखने की ज़रूरत है, लेकिन अक्सर देखा गया है कि इस उम्र में बच्चे शरीर की साफ़-सफ़ाई के प्रति लापरवाही बरतने लगते हैं. अतः उन्हें जागरूक बनाने की ज़िम्मेदारी आपकी है.

Personal Hygiene Tips

प्यूबिक एरिया की सफाई
एक्सपर्ट्स प्यूबिक एरिया के बालों को काटना ज़रूरी बताते हैं. इस एरिया को साफ़ करने के लिए बच्चे लूफा का इस्तेमाल कर सकते हैं. लड़कियां दिन में 2-3 बार गर्म या ठंडे पानी से प्यूबिक एरिया की सफ़ाई कर सकती हैं. अगर आपकी बेटी को पीरियड्स शुरू हो चुके हैं तो उसे व्हाइट डिस्चार्ज भी होता होगा. ऐसे में हाइजीन का ख़ास ध्यान रखना चाहिए. अपनी लाडली से दिन में दो बार अंडरवेयर चेंज करने को कहें. पीरियड्स के समय भी दो बार नैपकीन बदलनी ज़रूरी है. लड़कों को भी नहाते समय साबुन या एंटीसेप्टिक्स से प्यूबिक एरिया की सफ़ाई करनी चाहिए.

अंडर आर्म्स की सफाई
बॉडी हाइजीन को बनाए रखने के लिए अंडरआर्म्स के बालों को काटना ज़रूरी है, लेकिन इस उम्र में अपनी बेटी को वैक्सिंग और हेअर रिमूविंग क्रीम के इस्तेमाल से रोकें, क्योंकि इससे आपकी लाडली की त्वचा का रंग गहरा हो सकता है. साथ ही वैंक्सिंग के दौरान स्किन खिंचने से त्वचा में जलन और इं़फेक्शन की शिकायत हो सकती है. इसलिए बेहतर होगा कि उसके लिए आप बाज़ार से किड्स फ्रेंडली रेज़र या सेविंग क्रीम ले आएं. प्री टीन बच्चों को एंटी पर्सपीरैंट्स (दुर्गंधनाशक) से भी दूर रखें इसकी जगह डियोड्रेंट का इस्तेमाल करने के लिए कह सकती हैं. बाज़ार में ख़ासतौर से बच्चों के लिए 100 प्रतिशत एल्कोहल फ्री डियो मिलते हैं, लेकिन इसमें भी थोड़ी मात्रा में ट्राइक्लोज़न केमिकल होता है. दरअसल, ट्राइक्लोज़न बैक्टीरिया और फंगस को दूर रखता है लेकिन इसके ज़्यादा इस्तेमाल से शरीर के सीक्रेट हार्मोन्स को नुक़सान पहुंच सकता है. इसलिए विशेषज्ञ हाइजीन के लिए साफ़-सफ़ाई को ही सबसे कारगर तरीक़ा मानते हैं. वैसे आप अपने बच्चे को ख़ुशबूदार वेट वाइप्स दे सकती हैं. इसके अलावा फ्रेश फील के लिए टैलकम पाउडर भी यूज़ कर सकती है बशर्ते कि बच्चे को इससे इरिटेशन न हो.

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Personal Hygiene Tips

सिखाएं नहाने का सही तरीका
बॉडी हाइजीन का पहला स्टेप है नियमित स्नान. अपने बच्चे को रोज़ाना दिन में कम-से-कम एक बार अच्छी तरह नहाने के लिए कहें. इसके अलावा जब भी वो खेलकर या कहीं बाहर से आए, तो उसे हाथ-पैर धोने को कहें. इस उम्र में शरीर की साफ़-सफाई पर ध्यान नहीं देने से तन की दुर्गंध की समस्या बढ़ जाती है. अंडरआर्म्स और प्युबिक एरिया में बालों की मौजूदगी भी तन की दुर्गंध के लिए ज़िम्मेदार है. दरअसल, प्युबर्टी की शुरुआत होते ही आर्मपिट्स और जेनिटल एरिया में मौजूद एपोक्राइन ग्लैंड्स के एक्टिव होने से इन जगहों पर तेल का स्राव होने लगता है, जिससे दुर्गंध फैलाने वाले बैक्टीरिया पनपने लगते हैं. अतः इन जगहों की सफ़ाई पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत है. आप बच्चे के लिए कोई भी फैमिली सोप इस्तेमाल कर सकती हैं. उसकी गंदी कोहनियों और घुटने पर नींबू रगड़ें. एक्सपर्ट्स हफ़्ते में 2-3 बार लूफा के इस्तेमाल की भी सलाह देते हैं.

चेहरे की देखभाल
इस उम्र के बच्चे अक्सर अपने पैरेंट्स की क्रीम और फेसवॉश आदि इस्तेमाल करने लगते हैं. यदि आपके फेसवॉश में हार्मफुल ग्रैन्यूल नहीं है, तो इसे इस्तेमाल करने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन उसमें अगर ग्रैन्यूल है तो इससे बच्चे को एक्ने की समस्या हो सकती है. ऐसे में विशेषज्ञ प्रोएक्टिव और क्लीअरसील जैसी एक्ने क्रीम लगाने की सलाह देते हैं. अगर क्रीम लगाने के दो हफ़्ते बाद भी एक्ने ठीक नहीं होता, तो डर्मेटोलॉजिस्ट की सलाह लें. प्री टीन बच्चों को सनस्क्रीन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए लेकिन आपका बच्चा यदि ज्यादा देर तक धूप के संपर्क में रहता है, तो उसे एसपीएफ 15-20 युक्त सनस्क्रीन लगाने के लिए कहें.

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बालों की देखभाल
क्या आपकी लाडली रोज़ाना शैंपू करती है? और बार-बार ब्रांड बदलती रहती है? अगर हां, तो ज़रा उसके बालों पर गौर करें कहीं वो रूख और बेजान तो नहीं हो गए? अपनी लाडली के बालों की देखभाल के लिए कंडीशनर युक्त अच्छी क्वालिटी का शैंपू रखें. इस बात का ध्यान रखें कि वो बार-बार शैंपू न बदलें. साथ ही हेयर फॉल कंट्रोल, डैमेज कंट्रोल और एंटी डैंड्रफ जैसे स्पेशलाइज़्ड शैंंपू का हफ़्ते में एक बार से ज़्यादा इस्तेमाल न करें, क्योंकि ये बालों की सेहत के लिए अच्छा नहीं होता. इसके अलावा किड्स शैंपू भी प्री टीन बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं है. डर्मेटोलॉजिस्ट प्री टीन बच्चों के हेल्दी हेयर के लिए ऑयल मसाज की सलाह देते हैं. इससे स्कैल्प में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है, लेकिन तेल लगाने के आधे घंटे बाद हेयर वॉश करना ज़रूरी है. क्योंकि तेल लगे बालों के साथ सोने से माथे पर पिंपल्स निकल सकते हैं.

पैरों की देखभाल
ज़्यादा देर तक जूते पहने की वजह से बच्चे के पैरों से अजीब-सी गंध आने लगती है. इसलिए इस बात का ध्यान रखें कि बच्चा अच्छी तरह पैर सूखने के बाद टैलकम पाउडर लगाकर ही जूता पहनें. साथ ही उसे हमेशा कॉटन के मोजे ही दें. इसके बाद भी अगर पैरों से बदबू आए, तो हफ़्ते में 2-3 बार जूते में कोई एंटी-फंगल पाउडर छिड़कें और जब बच्चा घर पर हो तो उसे जूते न पहनने दें.

होठों की देखभाल
कुछ बच्चे होंठों को हमेशा चाटते या चबाते रहते हैं जिससे उनके होंठ फट जाते हैं. ऐसे में जब वो घर पर हो तो उनके होंठों पर घी लगाएं. आप उसे ख़ुशबू रहित लिप बाम या पेट्रोलियम जेली भी दे सकती हैं, जिसे वो ज़रूरत के मुताबिक इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके अलावा फॉलिक एसिड, विटामिन बी, जिंक और आयरन की कमी भी होठों के आसपास की त्वचा को ड्राई बना देती है. इसलिए खाने में इन पोषक तत्वों का ध्यान रखें, लेकिन आपके बच्चे के होंठ अगर हमेशा ड्राई रहते हैं, तो इस बारे में डॉक्टर से सलाह लें.

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नाखूनों की देखभाल
आजकल छोटे बच्चे भी बड़ों की देखा-देखी नाखून बढ़ाने लगे हैं. अगर आपका बच्चा भी ऐसा करता है, तो उसे ऐसा करने से रोकें क्योंकि बड़े नाखूनों में जमी गंदगी खाने के साथ उसके शरीर में जा सकती है. इसलिए समय-समय पर उसे नाखून काटने के लिए कहती रहें. उसे नाखून सीधा (स्ट्रेट) काटना सिखाएं फिर उसे नेल फाइल या एमरी बोर्ड की मदद से राउंड करने के लिए कहें. नाखूनों को एक ही दिशा में काटना चाहिए वरना वो टूट जाएंगे. नहाने के बाद हाथों के साथ ही नाखून व आस-पास की त्वचा पर भी मॉइश्‍चराइजर लगाना ज़रूरी है. इं़फेक्शन के ख़तरे को कम करने के लिए नाखून के आसपास की कटी-फटी त्वचा को काटकर अलग कर दें.

दातों की देखभाल
इस उम्र में बच्चे स्नैक्स और जंक फूड ज़्यादा खाने लगते हैं. अतः दांतों की सफ़ाई पर बहुत ध्यान देने की ज़रूरत है. उन्हें कम से कम दो बार और यदि संभव हो तो हर बार खाने के बाद ब्रश करने के लिए कहें. बच्चे को फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट दें. साथ ही हर 6 महीने में उसका डेंटल चेकअप करवाएं. ऐसा करने से कैविटी की समस्या शुरू होने से पहले ही रोकी जा सकती है. साथ ही अगर स्वस्थ दातों के लिए आपके बच्चे को एक्स्ट्रा फ्लोराइड या कुछ पोषक तत्वों की ज़रूरत होगी, तो डॉक्टर आपको बता देगा. साथ ही अगर आपके बच्चे के दांत टेढ़े-मेढ़े हैं, तो उसे ठीक करवाने का भी ये सही समय है.

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बच्चों के पर्सनल हाइजीन के लिए एक्सपर्ट एडवाइस

  • जब आपकी बेटी का साइज़ 30 हो, तो वो ब्रा पहन सकती है, लेकिन जब उसे 32 ए कप साइज़ की जरूरत पड़े, तो स्पोर्ट के लिए उसे रेग्युलर ब्रा का इस्तेमाल करना चाहिए.
  • खेलते समय अपने बेटी को एक्स्ट्रा कंफ़र्ट के लिए स्पोर्टस ब्रा लाकर दें.
  • किसी भी तरह के इंफेक्शन से बचाने के लिए उसके साथ अपना मेकअप, हेयरब्रश या कंघी शेयर न करें.
  • जब आपकी लाडली नेलपॉलिश यूज़ करने लगे, तो नेल पेंट उतारने के लिए उसे एसिटोन फ्री रिमूवर लाकर दें.
  • अगर आपकी बेटी आर्टिफ़िशियल इयररिंग्स पहनना चाहती है, तो आप ख़ुद उसे पहनाएं ताकि आपको पता चल सके कि वो बहुत टाइट तो नहीं है. रात को सोने से पहले उसके इयररिंग्स ध्यान से निकाल दें.
  • अपने बेटे को मूस और हेयर स्प्रे के इस्तेमाल से रोकें. अगर वो इनका इस्तेमाल करता है तो कुछ घंटों के अंदर ही बालों को शैंपू करने के लिए कहें.

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आए दिन हम ऐसी ख़बरें सुनते-पढ़ते हैं कि किस तरह किसी किशोर या किशोरी ने ख़ुद को हानि पहुंचा ली है या आत्महत्या कर ली है. आत्महत्या का कारण कभी एक्ज़ाम स्ट्रेस होता है, तो कभी करियर से जुड़ी परेशानियां. कभी मामला पारिवारिक तनाव से जुड़ा होता है, तो कभी प्यार में दिल टूट जाना. कारण कुछ भी हो, आंकड़े बताते हैं कि ऐसे मामलों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है और यह समस्या गंभीर होती जा रही है.

टीनएजर्स और यंगस्टर्स के मन में ऐसा क्या, कब और किस अवस्था में आ जाता है कि वो ख़ुद को हर्ट कर बैठते हैं? कभी हाथ की नस काट लेना, सिगरेट से ख़ुद को जला लेना या कभी दीवार पर ज़ोर से सिर पटकना जैसी हरक़तों से वे ख़ुद को हर्ट कर लेते हैं. मोटे तौर पर तो यही कहा जा सकता है कि भावनात्मक आवेग या कुंठा की स्थिति में ही वे ख़ुद को हर्ट करते हैं या फिर आत्महत्या जैसा क़दम तक उठा लेते हैं.
अक्सर देखा गया है कि पारिवारिक सदस्य या प्रियजन ख़ुद सकते में आ जाते हैं कि आख़िर बच्चे ने ऐसा किया क्यों? क्योंकि ऊपरी तौर पर तो सब कुछ सामान्य ही लगता है. एक ओर वे बच्चे की मनोस्थिति को लेकर परेशान होते हैं, तो दूसरी ओर वे यह नहीं समझ पाते हैं कि उनकी तरफ़ से क्या ग़लती हो गई या क्या कमी रह गई कि बच्चे ने ऐसा क़दम उठाया.
मनोवैज्ञानिक श्रुति भट्टाचार्य के अनुसार- लड़कों की अपेक्षा लड़कियों में इस तरह की प्रवृत्ति ज़्यादा देखी जाती है. ज़्यादातर जो मामले सामने आते हैं, उनमें प्रायः भावनात्मक कमज़ोरी, संवेदनात्मक आवेग, कठिन स्थितियों को डील न कर पाना जैसी असमर्थता के कारण ऐसा क़दम उठाकर थोड़ी देर के लिए वो अपनी कुंठा, अवसाद संवेदनाओं से मुक्ति पा जाते हैं और पैरेंट्स व प्रियजनों को अपने साथ जोड़ लेते हैं.

ऐसी स्थिति क्यों आ जाती है?
ऐसी संवेदनाओं के पीछे अनेक कारण होते हैं-
स्ट्रेस- पैरेंट्स की आशाएं व महत्वाकांक्षाएं, पीयर प्रेशर, मज़ाक बनाया जाना, पढ़ाई का प्रेशर आदि अनेक ऐसे कारण हैं, जो बच्चों में स्ट्रेस पैदा करते हैं. आज पढ़ाई को लेकर बच्चों में ज़बरदस्त स्ट्रेस है. देखा गया है कि आत्महत्या के मामले प्रायः परीक्षा के पहले या बाद में बढ़ जाते हैं.
यदि पैरेंट्स बच्चे की योग्यता को पहचान लेते हैं और समय रहते उनकी मनोस्थिति को समझ लेते हैं, तो समस्या नहीं होती है, वरना निराशा की यह स्थिति उन्हें नुक़सान पहुंचाने या आत्महत्या तक के लिए प्रेरित कर सकती है.
कभी-कभी पैरेंट्स दूसरे बच्चों से तुलना करके इस तनाव को बढ़ा देते हैं. पढ़ने में कमज़ोर बच्चों का यदि साथी मज़ाक बनाते हैं, तब भी तनाव व स्ट्रेस की स्थिति आ जाती है. किशोर बच्चे यह बात न तो पैरेंट्स को बताना चाहते हैं, न ही दोस्तों से शेयर करते हैं.

डिप्रेशन- स्ट्रेस के बाद स्थिति आती है डिप्रेशन यानी अवसाद की. यहां प्रायः व्यक्ति को ख़ुद भी और उसके घरवालों को भी पता नहीं चल पाता है कि वो चाहता क्या है? अवसाद का कारण क्या है? अनजाने में ही वो ख़ुद को नुक़सान पहुंचा लेते हैं.
एक अध्ययन के अनुसार, आत्महत्या की ओर प्रवृत्त होनेवाले लोगों के शरीर में सिरोटोनिन हार्मोन का स्तर कम होता है. ये हार्मोन मूड, इमोशन्स, नींद व भूख को नियमित व नियंत्रित करने में सहायक होता है. इसलिए डिप्रेशन की अवस्था में उनकी सोच प्रभावित होने लगती है. वे केवल अपनी असफलता या निराशा के बारे में ही सोचते रहते हैं. डिप्रेशन जेनेटिक भी हो सकता है, जो विपरीत माहौल में बढ़ जाता है.

फ्रस्ट्रेशन- किसी भी स्थिति में यदि समाधान नहीं मिल पाता है या परिस्थितियां प्रतिकूल ही होती चली जाती हैं, तब उस फ्रस्ट्रेशन को किसी से शेयर न कर पाने की अवस्था में ग़लत विचार मन में आने लगते हैं.

कम्युनिकेशन गैप- यह आज की तारीख़ में एक अनचाही स्थिति है. भौतिक सुखों की प्राप्ति या बच्चों को ब्रांडेड चीज़ें देने और महंगे स्कूलों में पढ़ाने की लालसा ने मां को बच्चों से दूर कर दिया है. आज सारे सुख-साधनों को जुटाने के लिए दोनों पार्टनर्स के लिए काम करना ज़रूरी हो गया है. व्यस्त पैरेंट्स चाहकर भी बच्चों की भावनाओं व संवेदनाओं के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं. एकल परिवार में बुज़ुर्गों का साथ भी नहीं है. बच्चा अपने मन की उथल-पुथल किससे शेयर करे? वह दोस्तों के सामने भी नहीं खुल पाता है कि कहीं उसकी भावनाओं का मज़ाक न बन जाए. कभी अंतर्मन की कोई दुविधा या भय ग़लत सोच में बदल जाती है, तो कभी पैरेंट्स का ध्यान आकर्षित करने के लिए वे ख़ुद को हर्ट कर बैठते हैं.

जनरेशन गैप- जनरेशन गैप भी इस स्थिति का अप्रत्यक्ष कारण हो सकता है. चूंकि बातचीत के लिए पैरेंट्स के पास समय नहीं है, सब अपने-अपने रूटीन से बंधे होते हैं. ऐसे में भावनाओं को न जानने-समझने के कारण दूरियां बढ़ जाती हैं. इस स्थिति को संभालने के लिए पैरेंट्स को ही पहल करनी होगी, क्योंकि वे भी इस दौर से गुज़र चुके हैं. उन संवेदनाओं को जी चुके हैं.

सोशल समस्याएं- जो बच्चे कम उम्र में ही हिंसा, नशा, गरीबी अथवा शारीरिक, मानसिक या सेक्सुअल एब्यूज़ (दुर्व्यवहार) के अनुभव से गुज़रते हैं, उनमें इस तरह की प्रवृत्तियां ज़्यादा देखी जाती हैं. जिन बच्चों के परिवार में संतुलन व सामंजस्य की कमी है, वहां भी बच्चों की सोच ग़लत दिशा में मुड़ने लगती है.

रिलेशनशिप प्रॉब्लम्स- रिलेशनशिप की समस्याएं भी बच्चों के विवेक को प्रभावित करती हैं. असफल प्यार या दोस्ती, अनुचित रिलेशनशिप, पैरेंट्स के डायवोर्स आदि के कारण भी आत्मविश्‍वास व आत्मसम्मान टूटता है. व्यक्ति का ख़ुद पर से भरोसा उठ जाता है. व्यक्ति की सोच अपराधबोध में बदल जाती है और जीने की इच्छा ख़त्म होने लगती है. भावनाएं यदि ईर्ष्या प्रधान हो जाती हैं, तब भी व्यक्ति ख़ुद को या दूसरे को हर्ट करना चाहता है.

उनकी मदद कैसे करें?
* डिप्रेस्ड टीनएजर्स सुसाइड करने की या ख़ुद को नुक़सान पहुंचाने की कई बार प्लानिंग करते हैं और कई बार बिना कुछ सोचे अचानक ही ख़तरनाक क़दम उठा बैठते हैं.
* फ़िलहाल यह तो निश्‍चित है कि यह स्थिति किसी भावनात्मक पीड़ा से जुड़ी है. वो चाहते हैं कि उनकी बात कोई समझे, कोई उनकी मदद करे. अतः सबसे पहली ज़रूरत है इस स्थिति से निबटने के लिए पैरेंट्स अपने बच्चों की हर बात को गंभीरता व धैर्य के साथ सुनें, ताकि उन्हें यह महसूस हो कि उनकी भावनाओं को आप समझते हैं.
* उनके दिल की बात जानने के लिए भावनात्मक रवैया अपनाएं. उनसे कहें कि आप भी इस उम्र में कुछ इसी तरह के दौर से गुज़र चुके हैं.
* आपके किशोर बच्चे की बातें या सोच बहुत ग़लत हो सकती हैं, लेकिन आप शांत व नियंत्रण में रहें. प्रश्‍न करें, किंतु यह न कहें कि तुम्हारी सोच बिल्कुल ग़लत है, क्योंकि ऐसे वाक्य के बाद तो वह आपसे अपनी मनोव्यथा कहेगा ही नहीं.
* इसके अलावा घर का माहौल पॉज़िटिव रखें यानी अच्छी बात के लिए प्रशंसा करें, ग़लत बातों को नज़रअंदाज़ न करें, पर उन्हें हर व़क़्त दोषी भी न ठहराएं.
* बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं. उनके साथ डिनर करें. कुछ गेम्स या एक्टिविटीज़ ऐसी रखें, जिसमें पूरा परिवार शामिल हो.
* बच्चों की तुलना किसी दूसरे से न करें. व्यंग, मज़ाक या अत्यधिक अनुशासित रूटीन भी इस उम्र के लिए उचित नहीं है.
* बच्चों के सामने आपसी झगड़े या तर्क-वितर्क से बचें.
* यदि फिर भी लगता है कि बच्चे की सोच ग़लत दिशा में जा रही है, तो मेंटल हेल्थ प्रो़फेशनल से संपर्क करें. यह सोचकर हाथ पर हाथ धरे बैठे न रहें कि बड़ा होकर ठीक हो जाएगा.

कैसे जानें कि टीनएजर्स इस दौर से गुज़र रहे हैं?
बच्चे में अचानक या धीरे-धीरे आए बदलावों पर नज़र रखें. ये लक्षण हो सकते हैं-
– स्कूल या कॉलेज की एक्टिविटीज़ में रुचि न लेना.
– अकेले रहने की इच्छा, लोगों के साथ हंसना-बोलना बेव़कूफ़ी लगना.
– खाने-पीने या नींद का पैटर्न बदल जाना या ज़्यादा नींद आना.
– सिरदर्द या थकान की शिकायत.
– अपने लुक्स आदि पर ध्यान न देना.
– सुसाइड करनेवाले बच्चों में कई बार अचानक बदलाव दिखता है. उनका अपनी प्रिय वस्तुओं के प्रति भी मोह ख़त्म हो जाता है. वे उन्हें बांटना शुरू कर देते हैं.
– अपनी असफलताओं को ही याद करते रहना.
– पैरेंट्स से बार-बार कहना कि मैं आपका अच्छा बेटा/बेटी नहीं हूं. अब मैं आपको ज़्यादा परेशान नहीं करूंगा.
– कभी डिप्रेशन में, तो कभी एकदम ख़ुश दिखते हैं.
– ये तो कुछेक सामान्य से लक्षण हैं. इसके अलावा व्यक्तिगत व्यवहार में भी बदलाव आता है, इसलिए ज़रूरी है कि टीनएज़र्स के व्यवहार पर नज़र रखी जाए.

– प्रसून भार्गव
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बचपन से कुछ ज़्यादा, जवानी से कुछ कम…
न अपनों की चिंता, न दुनिया का ग़म…
उमंगों का तूफ़ान और मन में ढेर सारे सवाल…
कुछ भोली नादानियां, कुछ मीठी शैतानियां…
छोटी-छोटी ख़ुशियां और कभी छोटी-सी बात पर बड़ी परेशानियां…
कुछ ऐसी ही होती है इस उम्र की मेहरबानियां…

 

पीयर और फैमिली प्रेशर: दोस्त कहते हैं पार्टी में चल, मॉम-डैड कहते हैं पूजा में चल. कहां जाएं? किसकी बात सुनें? यह दुविधा हर टीनएजर के मन में होती है.
* दरअसल जो चीज़ पैरेंट्स के लिए पीयर प्रेशर है, वही टीनएजर्स के लिए पीयर प्लेज़र है. उन्हें वो प्रेशर नहीं लगता. उन्हें लगता है कि जो दोस्त कहते हैं, वही सही है.
* दोस्तों का प्रभाव इस उम्र में इतना ज़्यादा होता है कि उनकी हर बात सही लगती है. उनके साथ ही मन भी लगता है. ऐसे में पैरेंट्स चिंतित होते हैं कि क्या करें, क्या न करें?
* बच्चों को मनमानी करना भाता है. उन्हें सही-ग़लत का अंदाज़ा नहीं होता है. इसी पीयर प्रेशर में वो अक्सर ग़लत राह पकड़कर भटक भी जाते हैं.
* शराब-सिगरेट और यहां तक कि सेक्स को लेकर भी काफ़ी एक्सपेरिमेंट करने लगते हैं.

एक्सपर्ट सलाह: बच्चों को समझाएं कि उनकी अपनी मर्ज़ी, अपनी सोच और अपना निर्णय कितना महत्व रखता है. वो हर बात, हर समस्या आपसे शेयर करें. यदि कोई उन पर किसी भी तरह का दबाव बनाना चाहता है, तो अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ वो दबाव में न आएं. दूसरों के प्रभाव में रहनेवाला व्यक्ति कमज़ोर माना जाता है. इससे उनका भविष्य और रिश्ते भी प्रभावित हो सकते हैं, यह बात उन्हें समझाएं.

अपोज़िट सेक्स के प्रति आकर्षण: हमारे समाज में आज भी सेक्स को टैबू ही माना जाता है. इस शब्द तक को ‘बुरा’ और ‘गंदा’ बताया जाता है. ऐसे में टीनएजर्स जब हार्मोनल बदलाव के चलते अपोज़िट सेक्स के प्रति आकर्षण महसूस करते हैं, तो उनके मन में सबसे पहले यही दुविधा होती है कि यह आकर्षण ग़लत चीज़ होती है.
* यही वजह है कि वो इसके बारे में किसी को बताने से भी हिचकते हैं और फिर यहां-वहां से ग़लत जानकारियां इकट्ठी करते हैं.
* दोस्तों में जो बातें होती हैं, उन्हें ही सही मानकर ग़लत रास्ता पकड़ लेते हैं या फिर ख़ुद को अपराधी महसूस करके डिप्रेशन में चले जाते हैं.

एक्सपर्ट सलाह: सबसे पहले तो पैरेंट्स को ही यह बात समझनी होगी कि सेक्स और आकर्षण को लेकर अपने बच्चों के मन में नकारात्मक विचार न डालें. उन्हें यह न बताएं कि यह बहुत गंदी व ग़लत चीज़ है. उन्हें बताएं कि यह एक प्राकृतिक भावना है, लेकिन इसकी सही उम्र व सही व़क्त होता है. किसी को पसंद करना या किसी की तरफ़ अट्रैक्ट होना बहुत नेचुरल है. इसे स्वीकारने में कोई बुराई नहीं, लेकिन अपनी इन भावनाओं को सही दिशा कैसे दी जाए, यह भी जानना ज़रूरी है. वो आपसे सब कुछ आसानी से शेयर कर सकें, उनमें इतना विश्‍वास जगाएं.

रैगिंग और बुली: स्कूल में बच्चे को चिढ़ाना, सताना व मारपीट करना बहुत-से बच्चों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है.
* उनके मन में एक डर बैठ जाता है. कॉलेज में सीनियर्स द्वारा रैगिंग के चलते भी न जाने कितनी युवा ज़िंदगियां ख़त्म होती हैं हर साल.
* क़ानूनी प्रावधान के बावजूद ये वारदातें होती हैं और शायद होती भी रहें, क्योंकि स़िर्फ क़ानून काफ़ी नहीं है.
* ये समस्याएं बहुत हद तक सामाजिक और पारिवारिक पहलुओं से भी जुड़ी हैं. जब तक वहां से कोई ठोस शुरुआत नहीं होगी, समाधान लगभग नामुमकिन है.

एक्सपर्ट सलाह: जो लड़के/लड़कियां हॉस्टल में रैगिंग का शिकार होते हैं, उनके पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी होती है कि जब वो अपने बच्चे को बाहरी दुनिया में जाने के लिए खुला छोड़ रहे हैं, तो उन बच्चों में इतना आत्मविश्‍वास भी भरें कि वो ग़लत व अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकें.
अपने बच्चों को अच्छा इंसान बनाने की ट्रेनिंग हर व़क्त जारी रखें, ताकि वो किसी को परेशान न करें. बच्चे में आत्मविश्‍वास जगाएं, ताकि वो इस तरह की चीज़ों से परेशान होकर ग़लत क़दम न उठाए. उसे समझाएं कि दूसरों को परेशान करनेवाले दरअसल ख़ुद बहुत कमज़ोर व्यक्तित्व के होते हैं, ऐसे में उनसे डरने की बजाय स्कूल-कॉलेज और घरवालों से मदद लें.

डिप्रेशन और सुसाइड: कभी अपने अफेयर्स टूटने के कारण, कभी पढ़ाई में पीछे रह जाने के चलते या कभी पैरेंट्स या टीचर्स से हल्की-सी डांट खाने पर भी टीनएजर्स डिप्रेशन में आकर आत्महत्या जैसा क़दम उठाते देर नहीं लगाते.
* इस उम्र में वो इमोशनली इतने मैच्योर नहीं होते, उनके लिए हर छोटी चीज़ भी बड़े मायने रखती है.
* छोटी-सी बात पर उनका दिल टूट जाता है, छोटी-सी डांट से उनकी इनसल्ट हो जाती है… उनकी यही अपरिपक्वता उनकी समस्याओं को बड़ा बना देती है.

एक्सपर्ट सलाह: इस उम्र में मूड स्विंग्स बहुत होते हैं. कभी बेहद ख़ुश, तो कभी बेहद दुखी. सेल्फ एस्टीम भी कभी-कभी लो हो जाता है. जहां कुछ टीनएजर्स फिलॉसॉफिकल हो जाते हैं, तो कुछ में बचपना ही बना रहता है. ऐसे में पैरेंट्स को चाहिए कि वो ख़ुद को तैयार करें. अपने बड़े होते बच्चे के साथ कैसे रहना है, यह उन्हें जानना होगा.
बच्चे में यदि कोई भी परिवर्तन दिखे, तो नज़रअंदाज़ न करें. उनसे बात करें. उन्हें समय दें. उन्हें बीच-बीच में समझाते रहें कि जिन बातों को जितना महत्व दे रहे हैं, दरअसल वो उतनी महत्वपूर्ण हैं ही नहीं. आगे चलकर जब कुछ सालों बाद वो इनके बारे में सोचेंगे, तो ख़ुद पर ही हंसेंगे. यदि बच्चों में नकारात्मक बातें और व्यवहार नज़र आने लगे, तो फ़ौरन काउंसलर की मदद लें. हर पल उन पर नज़र रखें. उन्हें अकेला न छोड़ें.
कंफ्यूज़न- सही-ग़लत का फ़र्क़: उम्र के इस दौर में सही-ग़लत का निर्णय लेना या सही-ग़लत में फ़र्क़ समझ पाना ही उनके लिए बहुत मुश्किल होता है.
* पैरेंट्स और टीचर्स की रोक-टोक, पाबंदियां उन्हें अपनी आज़ादी में खलल लगती हैं.
* वहीं दूसरी तरफ़ वो अपनी ही आइडेंटिटी और अपने रोल को लेकर भी कंफ्यूज़ रहते हैं.
* उन्हें लगता है कि समाज में उन्हें कोई एक्सेप्ट नहीं करता और न ही उनकी समाज और परिवार को कोई ज़रूरत है.
* उन्हें न तो बच्चा समझकर उतना प्यार-दुलार मिलता है और न ही बड़ों-सा सम्मान. हर व़क्त रोक-टोक और सलाहें दी जाती हैं.
* ये सब बातें उन्हें और कंफ्यूज़ करती हैं.
* किसी लड़की से बात करें, तो सौ हिदायतें दी जाती हैं, दोस्तों के साथ रहें, तो भी सलाहें दी जाती हैं. उन्हें लगता है कि हर कोई उन्हें ग़लत ही साबित करने पर तुला है और यही वजह है कि वो किसी पर भी भरोसा नहीं कर पाते.
* अपनी बातें किसी से शेयर नहीं करते और यही चीज़ें आगे चलकर परेशानियों का सबब बन जाती हैं.

एक्सपर्ट सलाह: यह पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि वो अपने टीनएज बच्चों को उनका महत्व समझाएं. उन्हें घर-परिवार की कुछ ज़िम्मेदारियां भी सौंपें, जिससे उन्हें महसूस हो कि उनका भी कोई रोल है आपकी ज़िंदगी में. हर व़क्त रोक-टोक न करें. कभी-कभी उनकी मस्तियों में ख़ुद भी शामिल हो जाएं. उनकी सराहना करें और अपने कॉलेज के दिनों का उदाहरण देकर बताएं कि आप भी तब इसी तरह व्यवहार करते थे.

सेक्सुअल हैरेसमेंट: बच्चे ही नहीं, टीनएजर्स भी सेक्स एब्यूज़ का शिकार होते हैं और टीनएजर्स एब्यूज़ करते भी हैं. सेक्स को लेकर समाज में जिस तरह की धारणाएं हैं, उसी के चलते इस उम्र में सबसे ज़्यादा भटकाव होता है. पैरेंट्स न तो बच्चों के सेक्स से जुड़े सवालों के जवाब देते हैं और न ही सेक्स एजुकेशन. स्कूल के टीचर से लेकर सीनियर्स तक सेक्सुअल हैरेसमेंट करते हैं और डर की वजह से इसका शिकार होनेवाले लड़के-लड़कियां कुछ नहीं कहते. कभी राह चलते, कभी बस स्टॉप पर और कभी ख़ुद अपने ही घर में सेक्सुअल एब्यूज़ की शिकार लड़कियां चुप रहकर सब सहती हैं, क्योंकि उन्हें ऐसी बातों को दबाकर रखने की ही सलाह बचपन से दी जाती है. वहीं लड़कों को ज़रूरत से ज़्यादा आज़ादी मिलती है, तो वो सेक्सुअल क्राइम तक में आसानी से शामिल हो जाते हैं.

एक्सपर्ट सलाह: जो लड़कियां सेक्सुअल हैरेसमेंट का शिकार होती हैं, उन्हें दरअसल समझ ही नहीं आता कि वो आवाज़ उठाएं या नहीं. कंफ्यूज़न के कारण वो चुप रह जाती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ज़्यादा बोलने पर या तो लोग उन्हें बदतमीज़
समझेंगे या फिर क्या पता कोई उनका भरोसा करेगा भी या नहीं. एक तरफ़ लड़कों को यह समझाना-सिखाना ज़रूरी है कि वे महिलाओं और लड़कियों की इज़्ज़त करें, वहीं लड़कियों को भी इतना साहसी बनाना ज़रूरी है कि वो अपने साथ हो रही छेड़छाड़ के बारे में खुलकर बात कर सकें और उसका विरोध कर सकें.

– मेरी सहेली संपादकीय

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