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टीनएजर्स ख़ुद को हर्ट क्यों करते हैं? (Why Do Teens Hurt Themselves?)

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आए दिन हम ऐसी ख़बरें सुनते-पढ़ते हैं कि किस तरह किसी किशोर या किशोरी ने ख़ुद को हानि पहुंचा ली है या आत्महत्या कर ली है. आत्महत्या का कारण कभी एक्ज़ाम स्ट्रेस होता है, तो कभी करियर से जुड़ी परेशानियां. कभी मामला पारिवारिक तनाव से जुड़ा होता है, तो कभी प्यार में दिल टूट जाना. कारण कुछ भी हो, आंकड़े बताते हैं कि ऐसे मामलों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है और यह समस्या गंभीर होती जा रही है.

टीनएजर्स और यंगस्टर्स के मन में ऐसा क्या, कब और किस अवस्था में आ जाता है कि वो ख़ुद को हर्ट कर बैठते हैं? कभी हाथ की नस काट लेना, सिगरेट से ख़ुद को जला लेना या कभी दीवार पर ज़ोर से सिर पटकना जैसी हरक़तों से वे ख़ुद को हर्ट कर लेते हैं. मोटे तौर पर तो यही कहा जा सकता है कि भावनात्मक आवेग या कुंठा की स्थिति में ही वे ख़ुद को हर्ट करते हैं या फिर आत्महत्या जैसा क़दम तक उठा लेते हैं.
अक्सर देखा गया है कि पारिवारिक सदस्य या प्रियजन ख़ुद सकते में आ जाते हैं कि आख़िर बच्चे ने ऐसा किया क्यों? क्योंकि ऊपरी तौर पर तो सब कुछ सामान्य ही लगता है. एक ओर वे बच्चे की मनोस्थिति को लेकर परेशान होते हैं, तो दूसरी ओर वे यह नहीं समझ पाते हैं कि उनकी तरफ़ से क्या ग़लती हो गई या क्या कमी रह गई कि बच्चे ने ऐसा क़दम उठाया.
मनोवैज्ञानिक श्रुति भट्टाचार्य के अनुसार- लड़कों की अपेक्षा लड़कियों में इस तरह की प्रवृत्ति ज़्यादा देखी जाती है. ज़्यादातर जो मामले सामने आते हैं, उनमें प्रायः भावनात्मक कमज़ोरी, संवेदनात्मक आवेग, कठिन स्थितियों को डील न कर पाना जैसी असमर्थता के कारण ऐसा क़दम उठाकर थोड़ी देर के लिए वो अपनी कुंठा, अवसाद संवेदनाओं से मुक्ति पा जाते हैं और पैरेंट्स व प्रियजनों को अपने साथ जोड़ लेते हैं.

ऐसी स्थिति क्यों आ जाती है?
ऐसी संवेदनाओं के पीछे अनेक कारण होते हैं-
स्ट्रेस- पैरेंट्स की आशाएं व महत्वाकांक्षाएं, पीयर प्रेशर, मज़ाक बनाया जाना, पढ़ाई का प्रेशर आदि अनेक ऐसे कारण हैं, जो बच्चों में स्ट्रेस पैदा करते हैं. आज पढ़ाई को लेकर बच्चों में ज़बरदस्त स्ट्रेस है. देखा गया है कि आत्महत्या के मामले प्रायः परीक्षा के पहले या बाद में बढ़ जाते हैं.
यदि पैरेंट्स बच्चे की योग्यता को पहचान लेते हैं और समय रहते उनकी मनोस्थिति को समझ लेते हैं, तो समस्या नहीं होती है, वरना निराशा की यह स्थिति उन्हें नुक़सान पहुंचाने या आत्महत्या तक के लिए प्रेरित कर सकती है.
कभी-कभी पैरेंट्स दूसरे बच्चों से तुलना करके इस तनाव को बढ़ा देते हैं. पढ़ने में कमज़ोर बच्चों का यदि साथी मज़ाक बनाते हैं, तब भी तनाव व स्ट्रेस की स्थिति आ जाती है. किशोर बच्चे यह बात न तो पैरेंट्स को बताना चाहते हैं, न ही दोस्तों से शेयर करते हैं.

डिप्रेशन- स्ट्रेस के बाद स्थिति आती है डिप्रेशन यानी अवसाद की. यहां प्रायः व्यक्ति को ख़ुद भी और उसके घरवालों को भी पता नहीं चल पाता है कि वो चाहता क्या है? अवसाद का कारण क्या है? अनजाने में ही वो ख़ुद को नुक़सान पहुंचा लेते हैं.
एक अध्ययन के अनुसार, आत्महत्या की ओर प्रवृत्त होनेवाले लोगों के शरीर में सिरोटोनिन हार्मोन का स्तर कम होता है. ये हार्मोन मूड, इमोशन्स, नींद व भूख को नियमित व नियंत्रित करने में सहायक होता है. इसलिए डिप्रेशन की अवस्था में उनकी सोच प्रभावित होने लगती है. वे केवल अपनी असफलता या निराशा के बारे में ही सोचते रहते हैं. डिप्रेशन जेनेटिक भी हो सकता है, जो विपरीत माहौल में बढ़ जाता है.

फ्रस्ट्रेशन- किसी भी स्थिति में यदि समाधान नहीं मिल पाता है या परिस्थितियां प्रतिकूल ही होती चली जाती हैं, तब उस फ्रस्ट्रेशन को किसी से शेयर न कर पाने की अवस्था में ग़लत विचार मन में आने लगते हैं.

कम्युनिकेशन गैप- यह आज की तारीख़ में एक अनचाही स्थिति है. भौतिक सुखों की प्राप्ति या बच्चों को ब्रांडेड चीज़ें देने और महंगे स्कूलों में पढ़ाने की लालसा ने मां को बच्चों से दूर कर दिया है. आज सारे सुख-साधनों को जुटाने के लिए दोनों पार्टनर्स के लिए काम करना ज़रूरी हो गया है. व्यस्त पैरेंट्स चाहकर भी बच्चों की भावनाओं व संवेदनाओं के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं. एकल परिवार में बुज़ुर्गों का साथ भी नहीं है. बच्चा अपने मन की उथल-पुथल किससे शेयर करे? वह दोस्तों के सामने भी नहीं खुल पाता है कि कहीं उसकी भावनाओं का मज़ाक न बन जाए. कभी अंतर्मन की कोई दुविधा या भय ग़लत सोच में बदल जाती है, तो कभी पैरेंट्स का ध्यान आकर्षित करने के लिए वे ख़ुद को हर्ट कर बैठते हैं.

जनरेशन गैप- जनरेशन गैप भी इस स्थिति का अप्रत्यक्ष कारण हो सकता है. चूंकि बातचीत के लिए पैरेंट्स के पास समय नहीं है, सब अपने-अपने रूटीन से बंधे होते हैं. ऐसे में भावनाओं को न जानने-समझने के कारण दूरियां बढ़ जाती हैं. इस स्थिति को संभालने के लिए पैरेंट्स को ही पहल करनी होगी, क्योंकि वे भी इस दौर से गुज़र चुके हैं. उन संवेदनाओं को जी चुके हैं.

सोशल समस्याएं- जो बच्चे कम उम्र में ही हिंसा, नशा, गरीबी अथवा शारीरिक, मानसिक या सेक्सुअल एब्यूज़ (दुर्व्यवहार) के अनुभव से गुज़रते हैं, उनमें इस तरह की प्रवृत्तियां ज़्यादा देखी जाती हैं. जिन बच्चों के परिवार में संतुलन व सामंजस्य की कमी है, वहां भी बच्चों की सोच ग़लत दिशा में मुड़ने लगती है.

रिलेशनशिप प्रॉब्लम्स- रिलेशनशिप की समस्याएं भी बच्चों के विवेक को प्रभावित करती हैं. असफल प्यार या दोस्ती, अनुचित रिलेशनशिप, पैरेंट्स के डायवोर्स आदि के कारण भी आत्मविश्‍वास व आत्मसम्मान टूटता है. व्यक्ति का ख़ुद पर से भरोसा उठ जाता है. व्यक्ति की सोच अपराधबोध में बदल जाती है और जीने की इच्छा ख़त्म होने लगती है. भावनाएं यदि ईर्ष्या प्रधान हो जाती हैं, तब भी व्यक्ति ख़ुद को या दूसरे को हर्ट करना चाहता है.

उनकी मदद कैसे करें?
* डिप्रेस्ड टीनएजर्स सुसाइड करने की या ख़ुद को नुक़सान पहुंचाने की कई बार प्लानिंग करते हैं और कई बार बिना कुछ सोचे अचानक ही ख़तरनाक क़दम उठा बैठते हैं.
* फ़िलहाल यह तो निश्‍चित है कि यह स्थिति किसी भावनात्मक पीड़ा से जुड़ी है. वो चाहते हैं कि उनकी बात कोई समझे, कोई उनकी मदद करे. अतः सबसे पहली ज़रूरत है इस स्थिति से निबटने के लिए पैरेंट्स अपने बच्चों की हर बात को गंभीरता व धैर्य के साथ सुनें, ताकि उन्हें यह महसूस हो कि उनकी भावनाओं को आप समझते हैं.
* उनके दिल की बात जानने के लिए भावनात्मक रवैया अपनाएं. उनसे कहें कि आप भी इस उम्र में कुछ इसी तरह के दौर से गुज़र चुके हैं.
* आपके किशोर बच्चे की बातें या सोच बहुत ग़लत हो सकती हैं, लेकिन आप शांत व नियंत्रण में रहें. प्रश्‍न करें, किंतु यह न कहें कि तुम्हारी सोच बिल्कुल ग़लत है, क्योंकि ऐसे वाक्य के बाद तो वह आपसे अपनी मनोव्यथा कहेगा ही नहीं.
* इसके अलावा घर का माहौल पॉज़िटिव रखें यानी अच्छी बात के लिए प्रशंसा करें, ग़लत बातों को नज़रअंदाज़ न करें, पर उन्हें हर व़क़्त दोषी भी न ठहराएं.
* बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं. उनके साथ डिनर करें. कुछ गेम्स या एक्टिविटीज़ ऐसी रखें, जिसमें पूरा परिवार शामिल हो.
* बच्चों की तुलना किसी दूसरे से न करें. व्यंग, मज़ाक या अत्यधिक अनुशासित रूटीन भी इस उम्र के लिए उचित नहीं है.
* बच्चों के सामने आपसी झगड़े या तर्क-वितर्क से बचें.
* यदि फिर भी लगता है कि बच्चे की सोच ग़लत दिशा में जा रही है, तो मेंटल हेल्थ प्रो़फेशनल से संपर्क करें. यह सोचकर हाथ पर हाथ धरे बैठे न रहें कि बड़ा होकर ठीक हो जाएगा.

कैसे जानें कि टीनएजर्स इस दौर से गुज़र रहे हैं?
बच्चे में अचानक या धीरे-धीरे आए बदलावों पर नज़र रखें. ये लक्षण हो सकते हैं-
– स्कूल या कॉलेज की एक्टिविटीज़ में रुचि न लेना.
– अकेले रहने की इच्छा, लोगों के साथ हंसना-बोलना बेव़कूफ़ी लगना.
– खाने-पीने या नींद का पैटर्न बदल जाना या ज़्यादा नींद आना.
– सिरदर्द या थकान की शिकायत.
– अपने लुक्स आदि पर ध्यान न देना.
– सुसाइड करनेवाले बच्चों में कई बार अचानक बदलाव दिखता है. उनका अपनी प्रिय वस्तुओं के प्रति भी मोह ख़त्म हो जाता है. वे उन्हें बांटना शुरू कर देते हैं.
– अपनी असफलताओं को ही याद करते रहना.
– पैरेंट्स से बार-बार कहना कि मैं आपका अच्छा बेटा/बेटी नहीं हूं. अब मैं आपको ज़्यादा परेशान नहीं करूंगा.
– कभी डिप्रेशन में, तो कभी एकदम ख़ुश दिखते हैं.
– ये तो कुछेक सामान्य से लक्षण हैं. इसके अलावा व्यक्तिगत व्यवहार में भी बदलाव आता है, इसलिए ज़रूरी है कि टीनएज़र्स के व्यवहार पर नज़र रखी जाए.

– प्रसून भार्गव
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