time for children

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अपने बच्चे सभी को प्यारे होते हैं. उसकी हर हरकत, हर बात माता-पिता को अच्छी लगती है और कई बार तो लाड़-प्यार के कारण वे अपने बच्चों की ग़लतियों को भी नज़रअंदाज़ कर देते हैं, बगैर यह सोचे कि यह उनके भविष्य के लिए कितना नुक़सानदायक हो सकता है. कहीं आप भी तो ये ग़लती नहीं कर रहे हैं?children

 

फटी कमीज़, धूल से सना शरीर और नाक से बहता हुआ ख़ून. अपने सात वर्षीय बेटे गौतम की ऐसी हालत देखते ही सपना समझ गई कि यह सब सोनू की करतूत है. अपने रोते हुए बच्चे का हाथ पकड़ कर जब सपना सोनू की मां के पास उसकी शिकायत करने पहुंची तो उल्टे वह अपने बदमाश बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “मेरा सोनू ऐसा नहीं है, ज़रूर शुरुआत तुम्हारे बेटे ने ही की होगी.”
जबकि पूरी बिल्डिंग के लोग जानते हैं कि सोनू बहुत शैतान और झगड़ालू क़िस्म का बच्चा है. फिर भी जब भी कोई उसकी शिकायत लेकर उसकी मां के पास जाता, वह फौरन अपने बच्चे की ग़लती को ढंकने की कोशिश करती. किन्तु एक दिन जब पैसा न देने पर सोनू ने अपनी ही मां का पेपर वेट से सिर फोड़ दिया तो उसके होश ठिकाने आ गए.
यूं तो हर माता-पिता को अपने बच्चे सर्वश्रेष्ठ लगते हैं, फिर भी हर बच्चे में कुछ न कुछ कमी तो होती ही है. वैसे भी बच्चे शरारती होते हैं, ख़ासतौर पर लड़के. किन्तु बहुत-सी मांएं ऐसी होती हैं, जिन्हें अक्सर अपने बच्चों की कमियां नज़र नहीं आतीं. अगर नज़र आती भी हैं तो वे उन्हें नज़रअंदाज़ कर देती हैं. वहीं कुछ मांएं ऐसी भी होती हैं, जिन्हें अपने बच्चों की कमियां या ग़लतियां नज़र आती तो हैं, पर वे उस पर पर्दा डालने की कोशिश करती हैं.

बच्चे तो आख़िर बच्चे हैं

कहते हैं, बच्चे तो गीली मिट्टी जैसे होते हैं. उनके अभिभावक उन्हें जैसा चाहें, गढ़ सकते हैं. कुछ हद तक यह बात सही भी है. शुरुआत में बच्चों में इतनी समझ नहीं होती है कि वे सही और ग़लत में फ़र्क़ कर सकें. जब वे कुछ ग़लत करते हैं तो ये अभिभावक का कर्त्तव्य होता है कि वे उसे समझाएं कि वह जो कर रहा है, वह ग़लत है. साथ ही उन्हें यह भी बताना ज़रूरी है कि सही क्या है, क्योंकि जब तक बच्चे के ग़लत व्यवहार पर उसे टोका नहीं जाता, तब तक वह सोचता है कि वह जो कर रहा है, वह सही है और उसे आगे भी दोहराता रहता है.

ग़लतियों को नज़रअंदाज़ न करें

लंदन की एक दुकान पर जब एक सभ्रांत महिला चोरी करती हुई पकड़ी गई तो उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उसने बताया, “जब मैं बहुत छोटी थी तो आदतन अपने सहपाठियों की पेंसिल, रबर, खिलौने और बुक्स चुरा कर घर लाती थी और मेरे अति व्यस्त माता-पिता मेरी हर ग़लती को देख कर भी अनदेखा कर देते थे. उन्होंने मुझे कभी इसके लिए टोका नहीं तो मुझे लगा कि चोरी करने में कोई बुराई नहीं है. आज मेरे पास किसी भी चीज़ की कमी नहीं है, किन्तु मैं अपनी इस आदत को छोड़ नहीं पाई हूं.”
बचपन में माता-पिता द्वारा बरती गई इस तरह की लापरवाही अक्सर आगे चलकर बच्चों को अपराधी बना देती है. सब कुछ होते हुए भी चोरी करने की इस आदत को मनोवैज्ञानिक ‘पिक पॉकेटिंग’ समस्या बताते हैं.

पूर्वाग्रही न बनें

अक्सर पूर्वाग्रहों से ग्रस्त माता-पिता दूसरों के बच्चों में तो कमियां ढूंढ़ लेते हैं, किन्तु अपने बच्चों में उन्हें कोई दोष नज़र नहीं आता. शिखा ने जब अपनी भाभी से कहा कि उसका बेटा बात-बात पर गालियां देता है तो वह तुनक गई, “मेरा मनु तो गालियां देना जानता ही नहीं. ज़रूर उसने तुम्हारे बेटे से ही सीखी होंगी ये गंदी आदतें.”
इसी तरह दस साल के विकी को जब उसकी पड़ोसन ने अपने पापा की सिगरेट पीते हुए पकड़ा तो उसकी मां यह मानने को तैयार ही नहीं हुई कि उसका बच्चा ऐसी हरकत कर सकता है. उसने उल्टे अपनी पड़ोसन को ही डांट दिया कि वह झूठ बोल रही है.
वास्तव में एक बच्चे के लिए तो सारी दुनिया ही रहस्यमय होती है. वह रोज़ एक नई चीज़ सीखता है और नए-नए अनुभव प्राप्त करना चाहता है. ऐसे में अभिभावकों को चाहिए कि वे देखें कि उनका बच्चा जो सीख रहा है, वह ग़लत है अथवा सही.

व्यस्तता में भी बच्चों के लिए समय निकालें

आज के भौतिकवादी युग में अधिक पैसा कमाने की होड़ में अक्सर अभिभावक इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें अपने बच्चों की देखभाल तक का समय नहीं मिल पाता. अठारह वर्षीय रोनित को जब बेहोशी की हालत में अस्पताल में भर्ती किया गया तो उसके करोड़पति माता-पिता डॉक्टर से अपने बच्चे की ज़िन्दगी के लिए गिड़गिड़ा रहे थे. बिज़नेस और क्लब पार्टीज़ के शौक़ीन साहनी दम्पति के इकलौते बेटे रोनित का बचपन आया और नौकरों के बीच ही बीता था. दिन-रात उन्हीं के बीच उठते-बैठते उसे तम्बाकू और फिर धीरे-धीरे ड्रग्स की लत लग गई. जब कभी साहनी दम्पति के कोई शुभचिंतक अथवा रोनित के शिक्षक उसकी ग़लत आदतों की चर्चा करते तो वे लापरवाही से झिड़क देते, “हमारा बाबा ऐसा नहीं है, आपको ज़रूर कोई ग़लतफ़हमी हुई होगी.” अभिभावकों की लापरवाही और अपने प्रति बरती गई उदासीनता ने अंत में रोनित को ड्रग एडिक्ट बना दिया.
इस तरह एक नहीं, अनेक उदाहरण अपने आस-पास मिल जाते हैं, जहां माता-पिता की अपनी लापरवाहियों और कमियों की वजह से बच्चों का भविष्य दांव पर लग जाता है. अक्सर अभिभावक अपने बच्चों की किसी ग़लत आदत को यह सोच कर भी नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि अभी तो यह बच्चा है, बाद में सुधर जाएगा. किन्तु वे भूल जाते हैं कि सद्व्यवहार और अच्छे आचरण की नींव बचपन में ही पड़ती है.

प्यार और समझदारी से काम लें

कभी भी अपने बच्चों की ग़लतियों अथवा कमियों को अनदेखा न करें. किन्तु यह भी बहुत ज़रूरी है कि यदि आपके बच्चे से कोई ग़लती हो रही है तो उसे दूसरों के सामने न तो डांटें और न ही प्रताड़ित करें. दिल्ली स्थित इन्स्टीट्यूट ऑफ़ ह्यूमन बिहेवियर एंड एप्लाइड साइंस के मनौवैज्ञानिक डॉ. उदय कुमार सिन्हा के अनुसार, “बच्चों को डांटने अथवा मारने से उनकी भावनाएं दमित होती हैं और विचार कुंठित होते हैं, अतः उन्हें प्यार से समझाना और सुधारना चाहिए.”
अक्सर कुछ अभिभावक लाड़-दुलार की वजह से भी बच्चों की ग़लतियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं. वे उसकी तोड़-फोड़ करने अथवा मारपीट की आदत को टालते रहते हैं. किन्तु इस तरह बच्चों को बढ़ावा मिलता है और वे ज़िद्दी और उद्दंड होते चले जाते हैं. लखनऊ के मनोवैज्ञानिक डॉ. एस. नायडू के अनुसार, “बच्चों के साथ न अधिक प्यार और न अधिक ग़ुस्से का बर्ताव करें. एक संतुलित व्यवहार ही बच्चों को अच्छा इंसान बना सकता है.”
कहते हैं, बच्चों की पहली पाठशाला मां होती है. घर से ही उसकी शिक्षा की शुरुआत होती है. इसलिए बच्चे को अच्छे संस्कार देने की ज़िम्मेदारी भी माता-पिता की ही होती है. उसे अच्छा या बुरा इंसान बनाना भी आप पर ही निर्भर करता है. आप चाहें तो समझदारी, संतुलित व्यवहार और उचित देखभाल से अपने बच्चों को एक अच्छा इंसान बना सकते हैं. अतः उसकी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ नहीं, बल्कि नज़र में रखें और दूर करने की कोशिश करें.

– गीता सिंह