Time management

जीवन में समय के महत्व को समझना बहुत जरूरी हैं, क्योंकि गुज़रा हुआ व़क्त कभी लौटकर नहीं आता और तब हमारे पास पछताने के सिवाय और कुछ नहीं रहता. आप अपने जीवन में समय को कितना महत्व देते हैं. क्या आप अपना हर काम वक़्त पर पूरा करते हैं?

Time Management

लोग अक्सर कहते हैं, क्या करें… समय ही नहीं मिलता! लेकिन समय का सदुपयोग करने वाले ऐसा कभी नहीं कहते. हम सभी के पास एक दिन में चौबीस घंटे का ही समय होता है, ये हम पर है कि हम उसका सदुपयोग करते हैं या दुरुपयोग. आप अपने समय का उपयोग कैसे करते हैं?

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… क्योंकि समय मुफ़्त मिलता है
समय बहुत क़ीमती है, लेकिन हमें ये बिल्कुल मुफ़्त मिलता है. जो लोग समय की सही क़ीमत जानते हैं, वो इसका सही इस्तेमाल करके कामयाबी की ऊंचाइयों को छूते हैं और जो समय की क़द्र नहीं करते, वो इसे यूं ही बर्बाद करके अपना भविष्य ख़राब करते हैं. समय का सही उपयोग करके ही अपने सपनों को साकार किया जा सकता है, अपने लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है.

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… क्योंकि समय भेदभाव नहीं करता
प्रकृति और समय कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं करते. हवा, पानी, मौसम, दिन-रात… ये सब हम सबके लिए हमेशा एक जैसे रहते हैं. अमीर व्यक्ति के लिए सूरज पूरब की बजाय पश्‍चिम से नहीं उगता या बरसात किसी की उम्र या हैसियत देखकर उस पर कम या ज़्यादा नहीं बरसती. अमीर-ग़रीब, बच्चे-बूढ़े सभी के लिए समय एक जैसा रहता है. हां, समय का सही उपयोग न करके या समय को व्यर्थ गंवाकर हम अपना भविष्य ज़रूर ख़राब कर देते हैं. यदि हम आज समय की क़द्र करेंगे, तभी समय कल हमारी क़द्र करेगा.

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… क्योंकि समय भविष्य तय करता है
हम आज जो भी हैं, जहां भी हैं उसके लिए हम ख़ुद ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि हमने अपने अतीत में जो मेहनत की है हमारा वर्तमान उस मेहनत का ही नतीजा है. हमारी आज की मेहनत ही हमारा भविष्य तय करती है. अतः समय की क़ीमत समझकर उसका सही उपयोग करना बहुत ज़रूरी है. समय का सही इस्तेमाल करके देखिए, ये आपको हमेशा स्वस्थ और समृद्ध बनाए रखेगा.

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Time Is Money

… क्योंकि व़क्त लौटकर नहीं आता
आप समय का स़िर्फ एक बार ही इस्तेमाल कर सकते हैं, क्योंकि गुज़रा हुआ व़क्त कभी लौटकर नहीं आता यानी हम समय को रीसाइकल नहीं कर सकते. अतः कभी ये न कहें कि ये काम अगली बार करेंगे. हो सकता है, अगली बार आप व़क्त गंवा चुके हों और गुज़रा हुआ व़क्त आपसे कहे कि अब बहुत देर हो चुकी है.

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… क्योंकि समय बेशक़ीमती तोहफ़ा है
यदि आप किसी को वाक़ई कुछ देना चाहते हैं, तो उसे अपना व़क्त दीजिए, क्योंकि साथ गुज़ारा हुआ व़क्त अपने साथ ख़ूबसूरत यादें संजो लेता है, जिन्हें याद करके हम भविष्य में मुस्कुरा सकते हैं. व़क्त जीवन के कई पाठ पढ़ा जाता है, बड़े से बड़े घाव भर देता है और नए सिरे से जीने की ताक़त भी देता है. अतः आज यदि आपका व़क्त सही नहीं चल रहा, तो निराश न हों, मेहनत करते जाएं, आपका अच्छा व़क्त ज़रूर आएगा.

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Time is money

ऐसी घड़ी नहीं बन सकती, जो गुज़रे हुए घंटों को बजा दे.
– प्रेमचंद

सही काम करने के लिए समय हर वक़्त ही ठीक रहता है.
– मार्टिन लूथर किंग जूनियर

समय तब तक दुश्मन नहीं बनता, जब तक आप इसे व्यर्थ गंवाने का प्रयास नहीं करते.
– अज्ञात

समय और समुद्र की लहरें किसी का इंतज़ार नहीं करतीं.
– अज्ञात

कल कभी नहीं आता ये बात सौफीसदी सच है, क्योंकि जो लोग कल के भरोसे बैठे रहते हैं वो ज़िंदगी में कभी आगे नहीं बढ़ पाते. यदि आप भी आज का काम कल पर टालते हैं, तो आज ही ये आदत बदल दीजिए.

Tomorrow Never Comes

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में प्रलय होगी बहुरी करेगा कब.
– कबीर दास

आपने कबीरदास जी का ये दोहा तो ज़रूर सुना होगा, लेकिन क्या आप इस पर अमल करते हैं? हम में से ज़्यादातर लोग किसी भी काम या नई शरुआत को हमेशा कल पर टाल देते हैं, मसलन- मैं कल सुबह उठकर पढ़ाई कर लूंगी, मैं कल से एक्सरसाइज़ ज़रूर करूंगी, कल से मैं टाइम पर उठूंगा, कल से मैं कुछ बुरा नहीं बोलूंगा, कल से मैं अपनी बेटी के लिए टाइम ज़रूर निकालूंगी… लेकिन कल के भरोसे ख़ुद से किए ये वादे हम कभी पूरे नहीं कर पाते, क्योंकि जब कल आज में बदल जाता है तो हम फिर उस बात को आने वाले कल पर टाल देते हैं. इस तरह ये सिलसिला कभी महीनों तो कभी सालों तक चलता रहता है.

कभी भी जो काम आप कर सकते हैं उसे कल पर मत टालिए.
– बेंजामिन फ्रैंकलिन

मैं कल से ये काम करूंगी/करूंगा, वाला आपका रवैया आपके आलसी होने का सबूत है. आपने अंग्रेजी की वो कहावत तो सुनी होगी ‘फेलियर ऑलेवज़ मेक्स एक्सक्यूज़ेस’ यानी असफल लोग हमेशा बहाने बनाते हैं. कुछ ऐसा ही हाल आलसी लोगों का भी है, ये हर काम को कल के भरोसे छोड़ देते हैं, क्योंकि इनमें काम करने की इच्छाशक्ति ही नहीं होती. ‘अरे! यार क्या करूं आज तुम्हारा काम नहीं कर पाई, बहुत बिज़ी थी,’ इसके विपरीत यदि आप उस काम को पूरा करने का दृढ़ संकल्प कर लेतीं, तो किसी भी तरह अपने बिज़ी शेड्यूल से समय निकाल ही लेतीं.

कल के भरोसे मत बैठो, मनुष्य का कल कौन जानता है.
– शतपथ ब्राह्मण

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हर घड़ी हर पल जीवन में बदलाव होते रहते हैं ऐसे में कल क्या होगा किसी को नहीं पता, तो फिर आप अनजाने कल के भरोसे क्यों बैठे रहते हैं? आपने अपनी बेटी से वादा किया कि कल से आप उसके साथ ज़्यादा व़क्त बिताएंगी, लेकिन कल आपको अचानक किसी मीटिंग में जाना पड़ा और अपना वादा नहीं निभा पाई, ज़ाहिर है इससे आपकी बेटी का दिल टूट जाएगा. इसलिए कल के भरोसे कोई काम छोड़ने से बेहतर है कि आप उसकी शुरुआत आज से ही करने की कोशिश करें. यदि आप अपने लक्ष्य में क़ामयाब होना चाहते हैं, तो कल का इंतज़ार किए बिना ख़ुद से कहें, ‘मैं ये काम आज, अभी से शुरू कर रहा/रही हूं.’ यक़ीन मानिए, आपका ये दृढ़ संकल्प आपको अपने मकसद में सफलता ज़रूर दिलाएगा.

इंतज़ार करने वाले को उतना ही मिलता है जो कोशिश करने वाले छोड़ देते हैं.
– अब्दुल कलाम

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कल जा चुका है, कल अभी आया नहीं है, हमारे पास केवल आज है, चलिए शुरुआत करते हैं.
– मदर टेरेसा

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बच्चों की अच्छी परवरिश में पैरेंट्स की भूमिका अहम् होती है. कहते हैं बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं, उन्हें जिस तरह से ढाला जाए, वे उसी तरह से ढल जाते हैं. इसलिए उन्हें बचपन से ही ऐसी छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण बातों के बारे में बताना बेहद ज़रूरी है, जो उनके स्वस्थ व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक हो.

 

हाइजीन की बातें: बच्चों को बचपन से ही बेसिक हाइजीन की बातें बताना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि अच्छी पर्सनल हाइजीन की आदतें न केवल बच्चों को स्वस्थ रखती हैं, बल्कि उन्हें संक्रामक बीमारियों (जैसे- हैजा, डायरिया, टायफॉइड आदि) से भी बचाती हैं और बच्चों में स्वस्थ शरीर और स्वस्थ व्यक्तित्व का निर्माण करने में मदद करती हैं. बच्चों को यह समझाना बहुत ज़रूरी है कि गंदगी से होनेवाली बीमारियों से उनकी ज़िंदगी को ख़तरा हो सकता है, इसलिए उन्हें ओरल हाइजीन, फुट एंड हैंड हाइजीन, स्किन एंड हेयर केयर, टॉयलेट हाइजीन और होम हाइजीन के बारे में बताएं.

टाइम मैनेजमेंट: इस टेकनीक को सिखाकर पैरेंट्स अपने बच्चे को स्मार्ट बना सकते हैं. पढ़ाई के बढ़ते प्रेशर को देखते हुए अब तो अनेक स्कूलों में भी बच्चों को टाइम मैनेजमेंट टेकनीक सिखाई जाने लगी है. टाइम मैनेजमेंट को सीखने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह टेकनीक उनके स्कूल लाइफ में ही नहीं, बल्कि भविष्य के लिए भी बहुत फ़ायदेमंद है. इसलिए पैरेंट्स को चाहिए कि उन्हें बचपन से ही टाइम मैनेज करना सिखाएं, जैसे-
* सबसे पहले महत्वपूर्ण काम/होमवर्क की लिस्ट बनाएं.
* किस तरह से काम/होमवर्क को कम समय में निपटाएं?
* अन्य क्लासेस/गतिविधियों के लिए समय निकालें.
* किस तरह से सेल्फ डिसिप्लिन में रहें?
* सोने, खाने-पीने और खेलने का समय तय करें.

मनी मैनेजमेंट: बच्चों को मनी मैनेजमेंट के बारे में समझाना बेहद ज़रूरी है, जिससे उन्हें बचपन से ही सेविंग व फ़िज़ूलख़र्ची का अंतर समझ में आ सके और वे भविष्य में फ़िज़ूलख़र्च करने से बचें. बचपन से ही उन्हें सिखाएं कि कहां और कैसे बचत और ख़र्च करना है?, उन्हें शॉर्ट टर्म इंवेस्टमेंट करना सिखाएं. इसी तरह से उनमें धीरे-धीरे कंप्यूटर, लैपटॉप आदि ख़रीदने के लिए लॉन्ग टर्म इंवेस्टमेंट करने की आदत भी डालें.

पीयर प्रेशर हैंडल करना: मनोचिकित्सकों का मानना है कि बच्चों में बचपन से ही पीयर प्रेशर का असर दिखना शुरू हो जाता है. आमतौर पर 11-15 साल तक के बच्चों पर दोस्तों का दबाव अधिक होता है, पर पैरेंट्स इस प्रेशर को समझ नहीं पाते. आज के बदलते माहौल में पीयर प्रेशर का बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, इसलिए पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि इस स्थिति में-
* बच्चों का मार्गदर्शन करें, जिससे उन्हें मानसिक सपोर्ट मिलेगा.
* उनमें सकारात्मक सोच विकसित करें.
* बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करें, ताकि अपनी हर बात वे आपके साथ शेयर करें.
* ग़लती होने पर प्यार से समझाएं.
* यदि बच्चा प्रेशर हैंडल नहीं कर पा रहा है या बच्चे के व्यवहार में किसी तरह का बदलाव महसूस हो, तो पैरेंट्स तुरंत उसके टीचर्स व दोस्तों से मिलें और विस्तार से जानकारी हासिल करें.

रिलेशनशिप मैनेजमेंट: बच्चों के भावनात्मक व सामाजिक विकास में रिलेशनशिप मैनेजमेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए पैरेंट्स होने के नाते आपकी ज़िम्मेदारी बनती है कि बच्चे में पॉज़िटिव रिलेशनशिप (रिलेशनशिप मैनेजमेंट) का विकास करने की शुरुआत
करें, जैसे-
* उन्हें अपने फ्रेंड्स और फैमिली मेंबर्स से परिचित कराएं.
* समय-समय पर बच्चों को उनसे मिलवाएं या फोन पर बातचीत कराएं.
* उनके साथ ज़्यादा टाइम बिताने से बच्चों की उनके साथ बॉन्डिंग मज़बूत होगी और रिलेशनशिप भी स्ट्रॉन्ग होगी.
* बच्चों में कम्यूनिकेशन स्किल डेवलप करें, ताकि वे पूरे आत्मविश्‍वास के साथ लोगों से बातचीत कर सकें.
* बच्चों को सोशल एक्टिविटीज़ में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करें, जिससे वे अधिक से अधिक लोगों के संपर्क में आएं.
* बच्चों को चाइल्ड फ्रेंडली माहौल प्रदान करें, जिससे वे बेहिचक ‘हां’ या ‘ना’ बोल सकें.

सेल्फ कंट्रोल: यह ऐसा टास्क है, जिसकी ट्रेनिंग बचपन से ही ज़रूरी है. सेल्फ कंट्रोल के ज़रिए बच्चे वर्तमान में ही नहीं, भविष्य में भी अनेक पर्सनल व प्रोफेशनल समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं. सेल्फ कंट्रोल सिखाने के लिए-
* बच्चों को प्रोत्साहित करनेवाली गतिविधियों में डालें, जिससे उनमें सेल्फ कंट्रोल का निर्माण हो, जैसे- स्पोर्ट्स, म्यूज़िक सुनना आदि.
* उन्हें घर की छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियां सौंपें, जैसे- अपने कमरे की सफ़ाई करना, किड्स पार्टी का होस्ट बनाना, पेट्स की देखभाल की ज़िम्मेदारी आदि.
* उनकी सीमाएं तय करें. यदि बच्चा पैरेंट्स या अपने भाई-बहन के साथ बदतमीज़ी से बात करता है, तो तुरंत टोकें.
* उन्हें अनुशासन में रहना सिखाएं.

सिविक सेंस: बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने की ज़िम्मेदारी पैरेंट्स की होती है. अच्छा
नागरिक बनने के लिए उन्हें बचपन से ही सिविक सेंस सिखाना बेहद ज़रूरी है. सिविक सेंस यानी समाज के प्रति अपने दायित्वों व कर्तव्य के बारे में उन्हें बताएं,
जैसे- घर में नहीं, बाहर भी स्वच्छता का ध्यान रखें, रोड सेफ्टी नियमों का पालन करना, सार्वजनिक जगहों पर धैर्य रखना, लोगों को
आदर-सम्मान देना, महिलाओं की इज़्ज़त करना, देशभक्ति की भावना आदि. पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि वे बच्चों को अलग-अलग तरीक़ों से सिविक सेंस सिखाएं.

सोशल मीडिया अलर्ट: टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव से बच्चे भी अछूते नहीं हैं, इसलिए पैरेंटस की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों की सोशल मीडिया से जुड़ी एक्टिविटीज़ पर पैनी नज़र रखें. वे क्या ‘पोस्ट’ कर रहे हैं और किससे बातें कर रहे हैं? सोशल साइट्स पर कोई उन्हें परेशान तो नहीं कर रहा? हाल ही में हुए एक अध्ययन से यह साबित हुआ है कि जो बच्चे सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताते हैं, वे न केवल अपने समय का नुक़सान करते हैं, बल्कि इसका उनके मूड पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इसके अलावा स्कूल के टीचर्स का मानना है कि सोशल मीडिया पर वर्तनी और व्याकरण के कोई नियम नहीं होते. सोशल मीडिया पर चैट करते हुए ग़लत वर्तनी और व्याकरण के ग़लत नियमों का असर उनके स्कूली लेखन पर भी पड़ रहा है. इसलिए पैरेंट्स को चाहिए कि-
* लैपटॉप, स्मार्टफोन और टैबलेट का इस्तेमाल निर्धारित समय सीमा तक ही करने दें.
* स्मार्टफोन, टैबलेट और लैपटॉप को पासवर्ड प्रोटेक्टेड रखें.
* थोड़े-थोड़े समय बाद पासवर्ड बदलते रहें.
* नया पासवर्ड़ बच्चों को न बताएं. आपकी अनुमति के बिना वे इन्हें नहीं खोल पाएंगे.
* फिज़िकल एक्टिविटी के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें.

– पूनम नागेंद्र शर्मा

 

अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करेंः Parenting Guide 

 

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बच्चों को होमवर्क कराना पैरेंट्स के लिए किसी सिरदर्द से कम नहीं होता, क्योंकि एक तरफ जहां बच्चे होमवर्क के महत्व से अनजान होते हैं, वहीं होमवर्क न करने पर बच्चे क्लास में पीछे न रह जांए, इस बात से पैरेंट्स भी परेशान रहते हैं. अगर आप होमवर्क कराने से पहले बच्चे का मूड, होमवर्क का टाइम, स्टडी रूम का माहौल आदि बातों का ध्यान रखें, तो ये काम आसान हो सकता है. कैसे? आइए जानते हैं.

 

घर का साइलेंस ज़ोन चुनें

* बच्चे को होमवर्क कराने के लिए कोई ऐसा कमरा चुनें, जहां आने जाने वालों की संख्या कम हो टीवी या कंप्यूटर न चल रहा हो.

* इससे आप बिना किसी डिस्टर्बेंस के बच्चे को पढ़ा सकेंगी और बच्चे का भी पूरा ध्यान होमवर्क में ही लगेगा.

हेल्प करें, होमवर्क नहीं

* होमवर्क करते हुए बच्चे को गाइड करना आपकी ड्यूटी है.

* अत: आप उन्हें केवल गाइड करें, उनका होमवर्क ख़ुद न करें.

* कई बार पैरेंट्स बच्चों को पढ़ाते हुए उनका होमवर्क ख़ुद ही कंप्लीट कर देते हैं.

* ऐसा करने से बच्चे आलसी और पढ़ाई के प्रति लापरवाह होने लगते हैं.

प्यार से कराएं होमवर्क

* होमवर्क करते-करते कई बार बच्चे बोर होने लगते हैं और उनमें चिड़चिड़ापन आ जाता है. \

* ऐसी स्थिति में अपना भी मूड ऑफ़ न होने दें.

* सुलझे दिमाग़ से काम लें और बच्चे को उसकी पढ़ाई में होमवर्क का महत्व समझाएं.

होमवर्क को सेक्शन में डिवाइड करें

* यदि आपके बच्चे का होमवर्क ज़्यादा है, तो उसे सब्जेक्ट या सेक्शन वाइज़ कुछ हिस्सों में बांट लें.

* हर सेक्शन का वर्क ख़त्म करने के बाद बच्चे को कुछ देर का ब्रेक दें.

* ऐसे में बच्चे होमवर्क के हर पार्ट को फ्रेश मूड से एंजॉय करते हैं.

टाइम मैनेजमेंट

होमवर्क के लिए ऐसा समय तय करें, जिसमें आप और बच्चा दोनों कंफर्टेबल हों.

* ध्यान रहे कि ये टाइम आपके स्ट्रेस लेवल को बढ़ाने वाला न हो यानी ऐेसा समय न चुनें जब आप ऑफ़िस से तुरंत लौटती हों या बच्चा स्कूल से लौटते हो.

* नियमित रूप से इसी समय होमवर्क कराने की कोशिश करें.

अपने काम को भी महत्व दें

बच्चे को होमवर्क कराते समय अपने निजी कामों को नज़रअंदाज न करें.

* बच्चे को पूरा होमवर्क कराने के बजाय स़िर्फ उसके कठिन प्रश्‍नों को हल करने में मदद करें.

पढ़ाई के दौरान उसकी परेशानियों को दूर करके अपने काम में व्यस्त हो जाएं.

* बीच-बीच में उसे नोटिस ज़रूर करते रहें.

ट्यूशन भी है ऑप्शन

* आपके पास समय की कमी हो, तो बच्चे को ट्यूशन भेज सकती हैं.

* ट्यूशन ज्वाइन कराने से पहले टीचर को बच्चे के वीक प्वाइंट्स बताएं, ताकि वे बच्चे की अधिक मदद कर सकें.

* बच्चे का होमवर्क नियमित रूप से चेक करें और उसकी पढ़ाई पर हमेशा निगरानी रखें.

– रेषा गुप्ता
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