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हैप्पी लोहड़ी- अपनों में ख़ुशियां बांटने लो फिर से आ गई लोहड़ी (It’s time to celebrate lohri)

Festival Lohri

Festival Lohri

सजना, संवरना, रिश्तेदारों से मिलना, गजक, तिल के लड्डू खाने का व़क्त है ये, क्योंकि आ गई है लोहड़ी (Lohri). कहते हैं कि लोहड़ी की रात सबसे ठंड रात होती है और इस रात महिलाएं और पुरुष दोनों ही सजे-धजे रहते हैं. तो चलिए आप भी अपनों के साथ मनाइए लोहड़ी और ख़ुशियां बांटिए.

लोहड़ी की कहानी
ऐसा माना जाता है कि होलिका और लोहड़ी दोनों बहनें थीं. कई जगह लोहड़ी को पहले तिलोड़ी कहा जाता था. यह शब्द तिल और रोड़ी के मेल से बना है, जो समय के साथ बदलकर लोहड़ी के रूप में प्रसिद्ध हो गया.

बॉलीवुड फिल्मों में लोहड़ी
पंजाब की लोहड़ी ने बॉलीवुड पर अपना ऐसा रंग छोड़ा कि फिल्मोंमें इसे अलग अंदाज़ में मनाया जाने लगा. फिल्म वीर ज़ारा की लोहड़ी काफ़ी पॉप्युलर हुई थी.

फुल मेकअप और ड्रेसअप
महिलाओं के लिए ये दिन बहुत ही ख़ास होता है. इस दिन कई महिलाएं अपने शादी का जोड़ा, तो कुछ नई ड्रेस ख़रीदती हैं. उनके ड्रेसअप और मेकअप में किसी तरह की कमी नहीं होती.

मेरी सहेली (Meri Saheli) की ओर से आप सभी को हैप्पी लोहड़ी.

श्वेता सिंह 

… क्योंकि गुज़रा हुआ व़क्त लौटकर नहीं आता (Lost Time Is Never Found Again)

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लोग अक्सर कहते हैं, क्या करें… समय ही नहीं मिलता! लेकिन समय का सदुपयोग करने वाले ऐसा कभी नहीं कहते. हम सभी के पास एक दिन में चौबीस घंटे का ही समय होता है, ये हम पर है कि हम उसका सदुपयोग करते हैं या दुरुपयोग.

… क्योंकि समय मुफ़्त मिलता है
समय बहुत क़ीमती है, लेकिन हमें ये बिल्कुल मुफ़्त मिलता है. जो लोग समय की सही क़ीमत जानते हैं, वो इसका सही इस्तेमाल करके कामयाबी की ऊंचाइयों को छूते हैं और जो समय की क़द्र नहीं करते, वो इसे यूं ही बर्बाद करके अपना भविष्य ख़राब करते हैं. समय का सही उपयोग करके ही अपने सपनों को साकार किया जा सकता है, अपने लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है.

… क्योंकि समय भेदभाव नहीं करता
प्रकृति और समय कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं करते. हवा, पानी, मौसम, दिन-रात… ये सब हम सबके लिए हमेशा एक जैसे रहते हैं. अमीर व्यक्ति के लिए सूरज पूरब की बजाय पश्‍चिम से नहीं उगता या बरसात किसी की उम्र या हैसियत देखकर उस पर कम या ज़्यादा नहीं बरसती. अमीर-ग़रीब, बच्चे-बूढ़े सभी के लिए समय एक जैसा रहता है. हां, समय का सही उपयोग न करके या समय को व्यर्थ गंवाकर हम अपना भविष्य ज़रूर ख़राब कर देते हैं. यदि हम आज समय की क़द्र करेंगे, तभी समय कल हमारी क़द्र करेगा.

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… क्योंकि समय भविष्य तय करता है
हम आज जो भी हैं, जहां भी हैं उसके लिए हम ख़ुद ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि हमने अपने अतीत में जो मेहनत की है हमारा वर्तमान उस मेहनत का ही नतीजा है. हमारी आज की मेहनत ही हमारा भविष्य तय करती है. अतः समय की क़ीमत समझकर उसका सही उपयोग करना बहुत ज़रूरी है. समय का सही इस्तेमाल करके देखिए, ये आपको हमेशा स्वस्थ और समृद्ध बनाए रखेगा.

… क्योंकि व़क्त लौटकर नहीं आता
आप समय का स़िर्फ एक बार ही इस्तेमाल कर सकते हैं, क्योंकि गुज़रा हुआ व़क्त कभी लौटकर नहीं आता यानी हम समय को रीसाइकल नहीं कर सकते. अतः कभी ये न कहें कि ये काम अगली बार करेंगे. हो सकता है, अगली बार आप व़क्त गंवा चुके हों और गुज़रा हुआ व़क्त आपसे कहे कि अब बहुत देर हो चुकी है.

… क्योंकि समय बेशक़ीमती तोहफ़ा है
यदि आप किसी को वाक़ई कुछ देना चाहते हैं, तो उसे अपना व़क्त दीजिए, क्योंकि साथ गुज़ारा हुआ व़क्त अपने साथ ख़ूबसूरत यादें संजो लेता है, जिन्हें याद करके हम भविष्य में मुस्कुरा सकते हैं. व़क्त जीवन के कई पाठ पढ़ा जाता है, बड़े से बड़े घाव भर देता है और नए सिरे से जीने की ताक़त भी देता है. अतः आज यदि आपका व़क्त सही नहीं चल रहा, तो निराश न हों, मेहनत करते जाएं, आपका अच्छा व़क्त ज़रूर आएगा.
ऐसी घड़ी नहीं बन सकती, जो गुज़रे हुए घंटों को बजा दे.
– प्रेमचंद

 सही काम करने के लिए समय हर वक़्त ही ठीक रहता है.
– मार्टिन लूथर किंग जूनियर

समय तब तक दुश्मन नहीं बनता, जब तक आप इसे व्यर्थ गंवाने का प्रयास नहीं करते.
– अज्ञात

समय और समुद्र की लहरें किसी का इंतज़ार नहीं करतीं.
– अज्ञात

 

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करें पढ़ाई के साथ कमाई (Earn while learn)

अपने सपनों कोे साकार करने और अपने दम पर कुछ कर दिखाने की ज़िद्द और जज़्बा ही आज की युवा पीढ़ी को पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. ज़मानेे के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलने के लिए आज की युवा पीढ़ी पढ़ाई करते हुए आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही है. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें किस क्षेत्र में आगे अपना करियर बनाना है, इसकी शुरुआत वे पढ़ाई के दौरान ही कर देते हैं. पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करने के क्या नफ़ा-नुक़सान हैं? बता रहे हैं करियर काउंसलर फ़रज़ाद दमानिया.

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सही प्लानिंग
पढ़ाई के साथ नौकरी करने के लिए सबसे ज़रूरी है सही प्लानिंग, तभी आप दोनों काम अच्छी तरह कर सकते हैं. साथ ही किसी एक को दूसरे पर हावी न होने दें. पढ़ाई के बाद बचे हुए समय में ही नौकरी के बारे में सोचें. अच्छा होगा कि पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम जॉब करें, फुल टाइम जॉब के बारे में न सोचें.

टाइम मैनेजमेंट
पढ़ाई के साथ जॉब करने के लिए सबसे ज़रूरी है टाइम मैनेजमेंट. आप अपने टाइम को जितनी कुशलता से बांटेंगे, आपको दोनों कामों में उतनी ही सफलता मिलेगी. अतः पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय निकालकर ही पार्ट टाइम जॉब के लिए अप्लाई करें. अगर आप सुबह कॉलेज जाते हैं, तो दोपहर के बाद का समय नौकरी को दें.

फ्लैक्सिबल जॉब
पढ़ाई के दौरान नौकरी करते समय इस बात का ख़ास ध्यान रखें कि नौकरी के चलते आप पढ़ाई को बोझ न समझने लगें. पढ़ाई आपकी प्राथमिकता है, यह बात आपको हमेशा ध्यान में रखनी होगी. बेहतर होगा कि आप कोई ऐसा फ्लैक्सिबल जॉब चुनें, जिसमें पढ़ाई के हिसाब से देर से जाना या कई बार न जाना संभव हो और इससे आपकी नौकरी पर कोई आंच न आए. इस तरह का फ्लैक्सिबल जॉब आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगा.

अनुशासन
पढ़ाई के साथ आर्थिक रूप से सक्षम होने के लिए आपको अपनी दिनचर्या से जुड़ी कुछ चीज़ों का त्याग करना होगा. उदाहरण के तौर पर, आप यदि प्रतिदिन 2 घंटे टीवी देखते हैं या बाहर दोस्तों के साथ घूमने जाते हैं, तो आपको इन पर रोक लगानी होगी. पार्ट टाइम जॉब करने पर भी आपको अपना डेली रूटीन अनुशासित रखना होगा.

पढ़ाई के साथ जॉब के फ़ायदे
करियर काउंसलर फ़रज़ाद दमानिया के अनुसार, ङ्गङ्घपढ़ाई के साथ नौकरी करना काफ़ी हद तक फ़ायदेमंद होता है. आर्थिक स्थिति ठीक न होने पर पढ़ाई के लिए ख़र्च होने वाले पैसे के लिए हमें किसी दूसरे के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता. इतना ही ही पढ़ाई के साथ नौकरी करने से पढ़ाई पर कोई बुरा असर पड़ता है, बल्कि इससे भविष्य में स्टूडेंट्स को फ़ायदा ही मिलता है. नहीं, पढ़ाई के दौरान नौकरी करने पर बच्चे बहुत जल्दी अपनी ज़िम्मेदारियां उठाना सीख जाते हैं.फफ पढ़ाई के साथ काम करने के निम्न फ़ायदे हैंः

आर्थिक मज़बूती
पढ़ाई के साथ जॉब करना एक अच्छा विकल्प है. इससे स्टूडेंट्स को आर्थिक मज़बूती मिलती है. पैरेंट्स से जेब ख़र्च लेने की बजाय बच्चे आत्मनिर्भर होकर अपना जेब ख़र्च उठा सकते हैं. बड़े शहरों में पार्ट टाइम जॉब के कई विकल्प मौजूद हैं. इससे स्टूडेंट्स अपना ख़र्च उठाने के साथ ही परिवार की मदद भी कर पाते हैं.

आत्मविश्वास
कम उम्र में पढ़ाई के साथ नौकरी करने से स्टूडेंट्स का आत्म-विश्‍वास बढ़ता है. जिस उम्र में उनके दोस्त/सहेलियां दूसरों से बात तक करने से झिझकते हैं, उस उम्र में नौकरी करके वे कई लोगों के संपर्क में आते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है. आगे की पढ़ाई को लेकर भी वे उतने ही उत्साहित होते हैं.

अनुभव
पढ़ाई के दौरान नौकरी करने से छात्र ऑफिस में काम करने के तौर-तरी़के सीख जाते हैं. पढ़ाई और नौकरी करते हुए वे ज़्यादा काम करने के आदी हो जाते हैं और ज़्यादा से ज़्यादा काम करना चाहते हैं. पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी ढूंढ़ते वक़्त उन्हें कोई परेशानी नहीं होती.

दमदार सीवी
पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम नौकरी करके वर्क एक्सपीरिएंस बढ़ता है. पढ़ाई पूरी करते-करते आपके सीवी में दो से तीन साल तक का वर्क एक्सपीरिएंस जुड़ जाता है, जिससे आगे नौकरी के लिए इंटरव्यू देते समय सामने वाले पर आप अच्छी छाप छोड़ने में सफल होते हैं.

पढ़ाई के साथ जॉब के नुक़सान
पढ़ाई के साथ जॉब करते समय यदि दोनों में सही तालमेल न हो, तो फ़ायदे के साथ-साथ कुछ नुक़सान भी हो सकते हैं. पढ़ाई के दौरान जॉब करने से निम्न नुक़सान हो सकते हैंः

पढ़ाई पर बुरा असर
पढ़ाई और जॉब के बीच सही संतुलन न बिठाने पर कुछ समय बाद पढ़ाई में रुचि कम होने लगती है. थोड़े-से पैसों का लालच पढ़ाई पर हावी होने लगता है, जिसके चलते कई बार बच्चे अपनी पढ़ाई बीच में ही रोक देते हैं. ऐसे में कई बार अच्छी पढ़ाई करने वाले छात्र भी भटक जाते हैं.

ग़लत संगत
कॉलेज कैंपस के बाहर जब हम नौकरी करने के लिए जाते हैं, तो उस दौरान हम कई लोगों के संपर्क में आते हैं. उनमें से कुछ अच्छे तो कुछ बुरे भी होते हैं. ऐसे में कई बार छात्र बुरे लोगों के संपर्क में आकर ग़लत राह पर चल पड़ते हैं, जिससे न तो वे नौकरी कर पाते हैं और न ही पढ़ाई पर ध्यान दे पाते हैं.

ओवरकॉन्फिडेंस
कॉलेज के दौरान पार्ट टाइम जॉब करने पर कई छात्र ख़ुद को अपनी उम्र से ज़्यादा बड़े और समझदार समझने लगते हैं. कम उम्र में पैसा कमाने की होड़ में वे पढ़ाई को नज़रअंदाज़ करने लगते हैं, जिसके चलते वे आगे नहीं बढ़ पाते और ज़िंदगीभर उसी दायरे में सिमट कर रह जाते हैं.

पढ़ाई के दौरान कौन-सी जॉब है बेहतर?
कॉलेज की पढ़ाई के दौरान युवाओं के मन में अक्सर ये सवाल उठता है कि किस क्षेत्र में क़िस्मत आज़माएं कि आगे चलकर परेशानी न हो. आइए, हम आपको बताते हैं कि पढ़ाई के दौरान कौन-सी जॉब आपके लिए बेहतर साबित हो सकती है?

* आप अपनी क्वॉलिफिकेशन और इंटरेस्ट के हिसाब से जॉब कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, आप यदि मैनेजमेंट और कॉमर्स की पढ़ाई कर रहे हैं, तो मार्केटिंग, सेल्स, फायनेंस और अकाउंट में काम कर सकते हैं.

* अगर तकनीकी क्षेत्र में पढ़ाई कर रहे हैं, तो टेक्निकल असिस्टेंट, कंप्यूटर प्रोग्रामर या ग्राफिक डिज़ाइनिंग में क़िस्मत आज़मा सकते हैं.

* इसी तरह आगे चलकर आप यदि टीचर बनना चाहते हैं, तो क्लासेस या फिर घर पर ट्यूशन लेकर पार्ट टाइम जॉब करके अपने करियर की शुरुआत कर सकते हैं.

क्या है युवा पीढ़ी की राय?
पढ़ाई के साथ काम करने को लेकर नई पीढ़ी में ख़ासा उत्साह देखने को मिलता है. कुछ युवा मजबूरी में, तो कुछ शौक़िया तौर पर पढ़ाई के साथ काम करते हैं.
मुंबई की कृतिका सिंह कॉलेज की पढ़ाई के साथ ही एक कॉल सेंटर में काम कर रही हैं. कृतिका कहती हैं, ”पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम जॉब करने में मुझे कोई परेशानी नहीं होती. हां, एग्ज़ाम के दौरान मैं एक महीने का ब्रेक ले लेती हूं.”

कृतिका की ही तरह चेन्नई के सौरभ कृष्णमूर्ति कहते हैं, ”पढ़ाई और नौकरी दोनों साथ-साथ करना आसान नहीं है, लेकिन मुझे काम करना अच्छा लगता है. मैं आगे चलकर बैंक से जुड़ा काम करना चाहता हूं इसलिए उसकी प्रैक्टिस मैंने अभी से शुरू कर दी है. इसके लिए मैं पार्ट टाइम जॉब करता हूं.”

दिल्ली की प्रज्ञा जायसवाल बीकॉम फर्स्ट ईयर की छात्रा हैं और पढ़ाई के साथ शॉपिंग मॉल में कैशियर के तौर पर पार्ट टाइम जॉब भी करती हैं. प्रज्ञा के अनुसार, ”जॉब और पढ़ाई दोनों को एक साथ मैनेज करना आसान नहीं है, लेकिन पढ़ाई के साथ काम करने से एक ओर जहां हम अपनी फैमिली को आर्थिक रूप से मज़बूती देते हैं, वहीं दूसरी ओर हमारा आत्मविश्वास भी बढ़ता है. इससे आगे चलकर हमें फुल टाइम जॉब करने में मदद मिलती है.”

स्मार्ट टिप्स
पढ़ाई के दौरान पार्ट टाइम जॉब या एंटर्नशिप करें.

* पैसा कमाने के नज़रिए से नहीं, बल्कि सीखने के लिए जॉब करें.

* पढ़ाई और नौकरी दोनों में सही तालमेल बिठाएं.

* पैसे की लालच में पढ़ाई को दरकिनार न करें.

* पढ़ाई और जॉब का बहुत ज़्यादा दबाव न झेलें.

* काम के साथ सेहत पर भी ध्यान दें.

* ओवरकॉन्फिडेंस से बचें.

* गर्मी की छुट्टियों में पार्ट टाइम जॉब करें.

* अनुशासित होकर अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही पढ़ाई और जॉब करें.

* समय का सदुपयोग करें.

– श्वेता सिंह

दूर होते रिश्ते, क़रीब आती टेक्नोलॉजी (Technology effecting negatively on relationships)

Technology effecting on relationships

Technology effecting on relationships
वर्तमान में पति-पत्नी, माता-पिता, बच्चे या फिर दोस्त ही क्यों न हों, सभी टेक्नोलॉजी (Technology effecting on relationships) की चपेट में इस कदर आ गए हैं कि वे चाहकर भी इससे निकल नहीं पा रहे. ऐसा क्यों? इसी विषय पर मनोचिकित्सक रेनू कुंदर से हमने बात की. उन्होंने कई छोटी-छोटी बातों के ज़रिए टेक्नोलॉजी के फ़ायदे-नुक़सान की पैरवी की.

* ग्लोबली हमें अपनी पोज़ीशन बनाए रखनी है, तो टेक्नोलॉजी को अपनाना ही पड़ेगा, वरना हम अपने ही दायरे में सिमट
जाएंगे. इसके प्रभाव और फ़ायदों को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन इसके साइड इफेक्ट्स भी कम नहीं हैं.

* आज सोशल साइट्स पर एक्टिव रहना, अपडेट करते रहना, हर किसी का शग़ल बनता जा रहा है. इसका साइड इफेक्ट यह हो रहा है कि हमारे पास अपनों से बात तक करने का व़क्त नहीं मिल पाता है.

* पति-पत्नी दोनों ही वर्किंग हैं, तो वैसे ही वे एक-दूसरे को कम व़क्त दे पाते हैं, उस पर जो समय मिलता है, उसमें पति महाशय सोशल साइट्स में बिज़ी रहते हैं, वहीं पत्नी अपने फेवरेट सीरियल्स का मोह छोड़ नहीं पाती.

* आज बच्चों के पास पैरेंट्स ही नहीं, अपने ग्रैंड पैरेंट्स के लिए भी बिल्कुल व़क्त नहीं है. वे अपने स्कूल-कॉलेज, पढ़ाई, दोस्तों के बाद जो भी व़क्त मिलता है, उसे घंटों सेल फोन पर गेम्स (Technology effecting on relationships) खेलने, कंप्यूटर पर सर्फिंग करने, चैटिंग करने आदि में बिताते हैं.

Technology effecting on relationships

* अब तो आलम यह है कि कइयों को रात को सोने से पहले और सुबह उठने पर बिना अपने सेल फोन पर मैसेज देखे, दोस्तों व सोशल गु्रप्स को ‘गुड मॉर्निंग’ कहे बगैर दिन की शुरुआत ही नहीं होती. वहीं क़रीब बैठे पार्टनर से दो मीठे बोल कहने का भी व़क्त
नहीं रहता.

* ताज्जुब होता है तब कॉलेज स्टूडेंट लता कहती हैं- “मैं बिना खाए-पीए रह सकती हूं, पर अपने सेल फोन, लैपटॉप और आईपॉड की दूरी बर्दाश्त नहीं कर सकती.” यानी गैजेट्स हम पर डिपेंड हैं या हम गैजेट्स के ग़ुलाम(Technology effecting on relationships) हो गए हैं.

* एक ज़माना था, जब शादी के निमंत्रण कार्ड दूर तो नहीं, पर क़रीबी रिश्तेदारों को पर्सनली मिलकर मिठाई के साथ दिए जाते थे, पर अब तो ईमेल और सोशल साइट्स के ज़रिए ही इन्वाइट कर दिया जाता है. सफ़ाई यह दी जाती है कि इससे व़क्त, पैसे और ग़ैरज़रूरी परेशानी से बच जाते हैं.

* आज की पीढ़ी का यह मानना है कि टेक्नोलॉजी न केवल आपको सहूलियत देती है, बल्कि आपका स्टेटस भी बढ़ाती है. इसलिए न चाहते हुए भी आपको इसे मेंटेन तो करना ही पड़ेगा.

Technology effecting on relationships

टेक्नोलॉजी एडिक्शन से कैसे बचें?

– इसमें टाइम मैनेजमेंट अहम् भूमिका निभाती है. सेल फोन का अधिक इस्तेमाल, नेट पर सर्फिंग करना, लैपटॉप पर चैटिंग करना इत्यादि बातें ग़लत नहीं, पर इसका एडिक्ट हो जाना नुक़सानदायक होता है. इसलिए अपना रोज़ का शेड्यूल कुछ इस तरह बनाएं कि इन सब बातों को व़क्त देने के साथ-साथ अपनों के साथ भी क्वॉलिटी टाइम बिताएं.

– पार्टनर के साथ हों, तो जितना कम हो, उतना गैजेट्स के साथ व़क्त बिताएं.

– ऐसा भी न हो कि जीवनसाथी आपको अपनी ऑफिस से जुड़ी कोई समस्या बता रहा हो और आप सेल फोन पर चैटिंग करने में मशगूल हैं. तब तो यही बात हो जाएगी कि क़रीब के दूर होते चले गए और जो कोसों दूर थे, वे न जाने कितने पास आ गए.

– अक्सर कहा जाता है कि बच्चों का अपना सर्कल होता है, वे उसी में एंजॉय करते हैं और उनके पास न अपने पैरेंट्स के लिए व़क्त रहता है और न ही ग्रैंड पैरेंट्स के लिए. लेकिन यह सही नहीं है. यह तो हमारी सोच है, जो जाने-अनजाने में बच्चों ने भी उस पर सहमति की मोहर लगा दी. यदि घर का एक नियम बन जाए कि चाहे सुबह का नाश्ता, दोपहर या शाम का खाना हो, कोई भी एक समय पूरा परिवार साथ मिलकर खाएं और क्वॉलिटी टाइम बिताएं, एक-दूसरे की दिनभर की एक्टिविटीज़ को जानें-समझें, तो इसमें ग़लत क्या है?

Amitabh.Bachchan

– सेलिब्रिटीज़ भी आपसी संवाद के महत्व को समझते हैं, तभी तो सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के बाऊजी ने भी अपने दौर में यह नियम बना दिया था कि दिनभर कोई भी एक समय पूरा परिवार साथ हो. फिर चाहे वो खाने का समय हो या रात को सोने के लिए जाते समय. हां, आउटडोर शूटिंग या कोई और कारणों से कोई सदस्य आउट ऑफ स्टेशन है, तो यह और बात है. बकौल अमितजी के, “यही छोटी-छोटी बातें आपसी रिश्तों को जोड़ती हैं और रिश्तों में आपसी मिठास और अपनापन बनाए रखती हैं.”

– माना सोशल साइट्स की अलग ही दीवानगी और एडिक्शन है, जो छूटता ही नहीं, पर जीवंत रिश्तों को दांव पर लगाकर बेजान चीज़ों से मोह भला कहां की समझदारी है.

– क्यों न एक बार फिर अपने रिश्तों को रिवाइव किया जाए, जिनसे बरसों न बात हुई और न ही मुलाक़ात, उनसे मिला जाए. देखिए, यक़ीनन उस सुखद एहसास से आप ही नहीं, वे भी सराबोर हो जाएंगे.

– याद रहे, टेक्नोलॉजी हमारे कामों को आसान करने और सुविधा मुहैया कराने के लिए ज़रूरी है, न कि रिश्तों से दूर होने और संवेदनशीलता को मारने के लिए.

– ऊषा गुप्ता

रिश्तेदारों से कभी न पूछें ये 9 बातें (9 Personal Questions You Shouldn’t Ask To Your Relatives)