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प्लास्टिक पॉल्यूशन: कैसे बचाएं ख़ुद को? (Plastic Pollution: Causes, Effects And Solutions)

Plastic Pollution

प्लास्टिक पॉल्यूशन: कैसे बचाएं ख़ुद को? (Plastic Pollution: Causes, Effects And Solutions)

यह माना कि प्लास्टिक ने हमारी ज़िंदगी आसान बना दी है. पिछले दशक में प्लास्टिक ने हमारे रोज़मर्रा के जीवन में इतनी घुसपैठ की है कि उसके बिना अब हमें अपना जीवन अकल्पनीय लगने लगा है, लेकिन जब प्लास्टिक नहीं था, तब भी तो हमारा काम चलता ही था… पर आज बिना प्लास्टिक के हम ख़ुद को अधूरा-सा महसूस करते हैं. बच्चों के टिफिन, वॉटर बॉटल से लेकर हमारे ऑफिस तक का खाना व पानी प्लास्टिक में ही रहता है, क्योंकि प्लास्टिक लाइट वेट, अनब्रेकेबल और सुविधाजनक लगता है.

लेकिन प्लास्टिक की इस सुविधा की हमें बड़ी क़ीमत भी अब चुकानी पड़ रही है, क्योंकि प्लास्टिक अब हमारी सेहत को बुरी तरह प्रभावित करने लगा है. जी हां, पहले भी कई शोधों में यह बात साबित हो चुकी है और अब एक चौंकानेवाला अध्ययन यह कहता है कि हम हर हफ़्ते एक क्रेडिट कार्ड जितना प्लास्टिक खाते हैं.

क्या कहता है शोध?

  • यह स्टडी कहती है कि आप खाने के ज़रिए, पानी के ज़रिए और यहां तक कि सांस के ज़रिए भी लगभग 2,000 प्लास्टिक के कण अपने शरीर में हर हफ़्ते लेते हैं, जो एक क्रेडिट कार्ड के वज़न के बराबर है.
  • हवा और पानी से लेकर हमारा भोजन तक प्लास्टिक की चपेट में है. समुद्री जीवन को भी प्लास्टिक का यह प्रदूषण बुरी तरह प्रभावित कर रहा है. इसी तरह से हमारी सेहत भी इसके प्रभाव से अछूती नहीं है.
  • स्टडी कहती है कि अधिकांश प्लास्टिक पीने के पानी के ज़रिए हमारे शरीर में प्रवेश करता है, इसके अलावा सी फूड और नमक के ज़रिए भी यह हमारे शरीर में आता है.
  • प्लास्टिक का यह ज़हर माइक्रोप्लास्टिक्स से आता है. माइक्रोप्लास्टिक का मतलब है, प्लास्टिक के वो कण जो 5 मिलीमीटर से छोटे होते हैं.

प्लास्टिक का कचरा है सबसे बड़ी चुनौती…

पर्यावरण विद्वानों के लिए प्लास्टिक के कचरे से निपटना सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि हम अधिकांश प्लास्टिक एक बार इस्तेमाल करके फेंक देते हैं, जो पर्यावरण को दूषित करता है और पानी व खाने के ज़रिए हमारे शरीर में पहुंचता है.

प्लास्टिक को नष्ट करना बेहद मुश्किल काम है.  इसे नष्ट होने में हज़ारों साल लग जाते हैं. यदि प्लास्टिक को ज़मीन में दबाया जाता है, तो वह पानी के स्रोतों के ज़रिए हम तक पहुंच ही जाता है और यदि प्लास्टिक को जलाया जाता है, तो उससे ज़हरीले केमिकल्स निकलते हैं, जो हमारे साथ-साथ पूरे पर्यावरण के लिए हानिकारक होते हैं.

  • आपकी कोशिश यह होनी चाहिए कि प्लास्टिक  को इस्तेमाल करने के बाद रिसाइकल सेंटर भेज सकें.
  • ख़ुद प्लास्टिक को नष्ट करने का प्रयास न करें.

स्वास्थ्य को किस तरह नुक़सान पहुंचाता है प्लास्टिक?

  • जैसा कि हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं कि प्लास्टिक हर जगह है और यह सभी स्रोतों से हमारे शरीर में पहुंच ही रहा है.
  • पानी की बोतल से लेकर प्लास्टिक के टिफिन्स, मसाला स्टोर करने के बर्तनों से लेकर माइक्रोवेव तक में अब प्लास्टिक ही यूज़ होता है.
  • यही वजह है कि प्लास्टिक के अंश हम सभी के, जी हां, हम सभी के रक्त से लेकर टिश्यूज़ तक में पाए जाते हैं.
  • लेकिन हार्ड प्लास्टिक में बीपीए होता है, जो एक तरह का टॉक्सिन है.
  • वैज्ञानिकों ने पाया है कि बीपीए का संबंध कैंसर, बर्थ डिफेक्ट्स, इम्यून फंक्शन्स में गड़बड़ी, अर्ली प्यूबर्टी, ओबेसिटी, डायबिटीज़ और हाइपर एक्टिविटी जैसी समस्याओं से है.
  • आजकल मार्केट में माइक्रोवेव सेफ प्लास्टिक आसानी से मिलते हैं, लेकिन माइक्रोवेव में प्लास्टिक का इस्तेमाल न ही करें, तो बेहतर होगा, यहां तक कि माइक्रोवेव सेफ प्लासिक के बर्तन भी नहीं.
  • इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि माइक्रोवेव सेफ का मतलब स़िर्फ यह होता है कि प्लास्टिक मेल्ट नहीं होगा, लेकिन बहुत ज़्यादा हीट की वजह से केमिकल्स ट्रांसफर तेज़ी से होते हैं.
  • एसिडिक फूड प्लास्टिक में स्टोर न करें, क्योंकि वो रिएक्ट कर सकते हैं.
  • इसी तरह से फैटी और ग्रीसी फूड भी प्लास्टिक में स्टोर करना अवॉइड करें.
  • बहुत पुराने, बहुत ज़्यादा यूज़ किए हुए, स्क्रैच पड़े हुए या टूटे-फूटे प्लास्टिक का इस्तेमाल न करें.
  • हार्ड प्लास्टिक मेलामाइन डिशेज़ का भी इस्तेमाल अवॉइड करें, क्योंकि ये मेलामाइन केमिकल को फॉर्मलडिहाइड के साथ मिलाने से बनता है, जो कैंसरस माना जाता है.
  • एक अन्य रिसर्च यह कहता है कि बीपीए फ्री प्लास्टिक में भी सिंथेटिक केमिकल्स होते हैं, जो खाने में जा सकते हैं.
  • हां, अगर फिर भी आपको प्लास्टिक का इस्तेमाल करना ही है, तो कोशिश करें कि वो बीपीए फ्री और पीवीसी फ्री प्लास्टिक हो.

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कुकिंग व स्टोरेज के लिए सेफ ऑप्शन

  • प्लास्टिक जितना हो सके, कम यूज़ करें.
  • अगर प्लास्टिक कंटेनर्स को स्टोरेज के लिए यूज़ करते हैं, तो इस बात का ज़रूर ध्यान रखें कि स्टोर करने से पहले खाना पूरी तरह से ठंडा हो. उसके बाद उसे फ्रिज में रख दें.
  • प्लास्टिक के उन बर्तनों को माइक्रोवेव में बिल्कुल भी यूज़ न करें, जिन पर माइक्रोसेफ का टैग या लेबल न लगा हो.
  • स्टोरेज के लिए ऐसे बर्तनों को चुनें, जिनमें केमिकल्स का रिसाव व केमिकल रिएक्शन न होता हो.
  • मिट्टी व लोहे के बर्तन सबसे सेफ और हेल्दी होते हैं. आयरन वैसे भी शरीर में रेड ब्लड सेल्स के निर्माण के लिए बहुत ज़रूरी है. ऐसे में आयरन के बर्तन हेल्दी ऑप्शन हैं, लेकिन इसकी अधिकता भी ख़तरनाक हो सकती है.
  • ]स्टेनलेस स्टील, ग्लास, आयरन या सिरामिक भी एक तरह से सेफ माने गए हैं.
  • इसी तरह से सिलिकॉन कुकवेयर भी आजकल काफ़ी पॉप्युलर हो रहे हैं. फूड ग्रेड सिलिकॉन कुकवेयर के कोई साइड इफेक्ट्स नहीं देखे गए. न तो यह खाने के साथ रिएक्ट करता है, न ही इसके धुएं से कोई हानि होती है.
  • ये दरअसल सिंथेटिक रबर होता है, जिसमें बॉन्डेड सिलिकॉन (प्राकृतिक तत्व, जो रेत और पत्थरों में प्रचुर मात्रा में होता है) और ऑक्सीजन होता है.

धीरे-धीरे प्लास्टिक फ्री होम व लाइफ बनाएं

  • बर्थडे पार्टीज़ में इस्तेमाल होनेवाले प्लास्टिक ग्लास व प्लेट्स, सब्ज़ियों के लिए कैरी बैग्स, फ्रिज की बॉटल्स व स्टोरेज के बर्तन आदि को नॉन प्लास्टिक से रिप्लेस करें.
  • कपड़े के कैरी बैग्स यूज़ करें.
  • स्टोरेज के लिए स्टील व कांच के बर्तनों का इस्तेमाल करें.
  • यदि प्लास्टिक यूज़ भी कर रहे हैं, तो ऐसे प्लास्टिक का प्रकार यूज़ करें, जो आसानी से रिसाइकिल हो सके.
  • पॉलिथीन का प्रयोग बंद ही कर दें. इनको रिसाइकिल नहीं किया जा सकता है और यह पर्यावरण व स्वास्थ्य को बहुत अधिक नुक़सान पहुंचाते हैं.
  • दूसरों को भी जागरूक करें, ताकि प्लास्टिक का इस्तेमाल कम हो.
  • बच्चों को भी प्लास्टिक के टिफिन व बॉटल्स की जगह स्टील या अन्य मेटल के बर्तनों में खाना व पानी दें.
  • आप ख़ुद भी यही करें.
  • प्लास्टिक के टॉयज़ भी काफ़ी नुक़सान पहुंचाते हैं और छोटे बच्चे इन्हें अक्सर मुंह में डालते हैं, जो उनके लिए हानिकारक होते हैं.
  • बेहतर होगा कि उनकी जगह अन्य मटेरियल के टॉयज़ यूज़ करें.
  • हार्ड प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम कर दें.
  • मिनरल वॉटर या जूस वगैरह की प्लास्टिक की बोतल को यूज़ करने के बाद उन्हें फ्रिज में पानी के स्टोरेज के लिए न रखें.
  • प्लास्टिक के बर्तनों में जो पैक्ड फूड आता है, उन्हें भी अन्य चीज़ों के स्टोरेज के लिए न रख लें.
  • इस तरह यदि आप प्रयास करेंगे, तो धीरे-धीरे प्लास्टिक का प्रयोग कम कर सकेंगे.
  • प्लास्टिक से होनेवाले नुक़सान के बारे में जानकारी इकट्ठी करें और अपने बच्चों को भी उसके बारे में जागरूक करें.

– गीता शर्मा

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सर्वगुण संपन्न बनने में खो न दें ज़िंदगी का सुकून (How Multitasking Affects Your Happiness)

 

 

Multitasking Side Effects

सर्वगुण संपन्न बनने में खो न दें ज़िंदगी का सुकून (How Multitasking Affects Your Happiness)

परफेक्ट बनने की चाह हर किसी की होती है, ख़ासकर महिलाओं की. लेकिन क्या कभी आपने ग़ौर किया है कि ख़ुद को सर्वगुण संपन्न साबित करने की चाह में आप अपना चैन-सुकून भी खोती जा रही हैं. इसी पहलू पर एक नज़र डालते हैं.

अरे, सुनती हो मेरा रूमाल नहीं मिल रहा.” रवि की आवाज़ पर सीमा दौड़कर गई और उसके हाथों में रूमाल पकड़ा आई. केवल इतना ही नहीं, बल्कि सास-ससुर की चाय और दवाइयां, चिंटू का टिफिन, बैंक और बाज़ार के काम और न जाने क्या-क्या सीमा करती रहती है और अपने घर को परफेक्ट रखती है. सभी रिश्तेदारों में वह चहेती है. सीमा की सास कहते नहीं थकती कि उनकी बहू तो सर्वगुण संपन्न है.

स़िर्फ सीमा ही क्यों ऐसी कई महिलाएं हैं, जो हर जगह परफेक्ट रहना चाहती हैं. इसमें कोई बुराई भी नहीं है, पर साथ ही यह ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि जीवन की हर कमान को संभालते-संभालते कहीं आपकी कमान आपके हाथ से छूट तो नहीं गई. इसका अर्थ है कि कहीं इस सर्वगुण संपन्नता के प्रमाणपत्र की क़ीमत आपका अपना व्यक्तित्व या आपका स्वास्थ्य तो नहीं.

सर्वगुण संपन्न से जुड़ी कुछ भ्रांतियां

महिलाएं तो मल्टीटास्किंग होती हैं… यह जुमला आपको गाहे-बगाहे सुनने मिल जाएगा, फिर वह ऑफिस हो या घर. और विडंबना यह है कि इस तथ्य को बतानेवाली अमूमन कोई स्त्री ही होती है. मल्टीटास्किंग का मतलब बहुत ग़लत लगाया जाता है. इसका मतलब अपने आप को सुबह से शाम तक कामों के बोझ तले दबा लेना नहीं होता या फिर एक साथ कई काम करना भी नहीं होता है. मल्टीटास्किंग का मतलब होता है कुछ कामों को एक साथ स्मार्ट तरी़के से करना, जिससे समय और ऊर्जा की बचत हो. इसका स्त्री और पुरुष से कोई लेना-देना नहीं है. अतः मल्टीटास्किंग के नाम पर सर्वगुण संपन्नता की प्रतिस्पर्धा ग़लत है.

किसी काम के लिए ना कहना असमर्थता का प्रमाण है

यह भी एक भ्रांति है कि अगर आपने घर में या ऑफिस में किसी को कोई काम करने से मना कर दिया, तो वह आपकी कमी होगी. साथ ही सामनेवाला नाराज़ हो जाएगा. इस कशमकश में हम कई ऐसे काम कर जाते हैं, जिनकी या तो ज़रूरत नहीं होती या जो हमारी सामर्थ्य के बाहर होता है. कोई भी काम या ज़िम्मेदारी तभी उठाएं, जब वह आवश्यक हो और आपके सामर्थ्य के अंदर हो. इसका सर्वगुण संपन्नता से कोई लेना-देना नहीं है.

जो ख़ुद के लिए कम-से-कम समय निकाले, वही सर्वगुण संपन्न है

हमारे समाज में अगर स्त्री ख़ुद के लिए स्पेस रखती है या अपने लिए कुछ समय निकालती है, तो वह सर्वगुणता के पैमाने पर खरी नहीं उतरती. इस भ्रांति को बदलने की ज़रूरत है. स़िर्फ स्त्री ही नहीं, हर किसी को अपने लिए समय निकालने की आवश्यकता होती है. अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करते हुए ऐसा करना कोई अपराध नहीं है. समाज या परिवार क्या कहेगा, इस डर से अपनी किसी रुचि या अपने लिए समय निकालना ना छोड़ें.

अगर आपसे सब ख़ुश हैं, तो ही आप सर्वगुण संपन्न हैं

सबको ख़ुश करना मुश्किल ही नहीं असंभव है, लेकिन सर्वगुण संपन्न बनने की चाह में हम हर किसी को ख़ुश करने की कोशिश करते रहते हैं. इसमें पूरी तरह से सफल कम ही हो पाते हैं, साथ ही कई बार निराशा भी हाथ लगती है. इससे अच्छा है कि हम यह कोशिश करें कि हमारी वजह से कोई दुखी ना हो.

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Multitasking Side Effects

कैसे पहचानें कि सर्वगुण संपन्न बनने की चाहत में आप ख़ुद को खो रही हैं?

अक्सर छोटी छोटी बातें ही हमें किसी बड़े बदलाव का इशारा देती हैं-

*    अगर आपको अपने कामों को पूरा करने के लिए दिनभर का समय कम पड़ता है.

*    समय के साथ आप अपनी पसंद-नापसंद भूलती जा रही हैं.

*    आपकी अपनी कोई हॉबी नहीं है.

*    हमेशा थकान महसूस होती है.

*    अक्सर चिड़चिड़ापन और निराशा होती है.

*    आपके आसपास सब ख़ुश हैं, पर आपको अंदर से ख़ुशी का अनुभव नहीं होता है.

*    हमेशा तनाव और दबाव महसूस होता है.

*    अगर आपके दोस्त या सहेलियां नहीं हैं.

*    आप दिन का कोई भी समय अपने मन मुताबिक़ नहीं बिता पाती हैं.

*    आपको लोगों के बीच अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ता है.

समाधान के लिए इन बातों पर ध्यान दें

*    सबसे पहले और ज़रूरी है अपने लिए कुछ क्वालिटी समय निकालना.

*    अपने आसपास कुछ सहेलियां हमेशा रखें.

*    अपनी किसी भी रुचि को जीवित रखें.

*    अगर आप अपने बारे में सोच रही हैं, तो इसके लिए किसी भी प्रकार का अपराधबोध ना रखें.

*    कम-से-कम 15 दिनों में एक बार बाहर घूमने ज़रूर जाएं.

*    अपने बचपन का अलबम, कॉलेज के ज़माने की फोटोज़ ज़रूर देखें.

*    घर में हर किसी की ख़ुशी का ध्यान रखें, पर अपनी ख़ुशी को दांव पर ना लगाएं.

*    घर हो या ऑफिस, कामों को मिल-बांटकर करें. काम करने के लिए किसी की मदद लेने में कोई बुराई नहीं है.

सर्वगुण संपन्न नहीं स्मार्ट बनें

*    सर्वगुण संपन्न होना असल में किसी और के पैमाने पर ख़ुद को सिद्ध करना है.

*    यह तमगा लेने के लिए अपने स्व को खो देने से अच्छा है कि आप स्मार्ट बनें.

*    दिन के चौबीस घंटे का इस्तेमाल चतुराई और पूरी प्लानिंग से करें.

*    अपने रिश्तों में मधुरता बनाएं रखने के लिए किसी बड़े प्रयास की ज़रूरत नहीं है, बल्कि छोटी-छोटी बातों को याद रखें.

*    दिन में थोड़ा समय ख़ुद को ज़रूर दें, फिर चाहे वह योग हो या फिर डांस. तो स्मार्ट बनें और जीवन की हर कमान को कुशलता से संभालें.

 – माधवी कठाले निबंधे

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क्यों मुस्कुराने में भी कंजूसी करते हैं लोग? (Why Don’t Some People Smile)

Smile

क्यों मुस्कुराने में भी कंजूसी करते हैं लोग? (Why Don’t Some People Smile)

ऐसे तमाम लोग (People) हमें रोज़ ही मिल जाते हैं, जो बेवजह ही मुस्कुराकर (Smile) चले जाते हैं और ऐसे भी लोग मिलते हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि शायद ये ज़िंदगी में कभी मुस्कुराए ही नहीं. कोई उन्हें घमंडी समझता है, तो कोई ग़मग़ीन… आइए, जानते हैं कि वो ऐसे क्यों हैं?

टेस्टोस्टेरॉन का हाई लेवल: रिसर्च बताते हैं कि जिनका टेस्टोस्टेरॉन स्तर अधिक होता है, वो कम मुस्कुराते हैं. यही वजह है कि महिलाओं के मुक़ाबले पुरुष कम मुस्कुराते हैं.

पावर: कुछ अध्ययन यह बताते हैं कि ख़ास परिस्थितियों में मुस्कुराने का मतलब ख़ुद को कमज़ोर दर्शाना या एक तरह से आत्मसमर्पण की निशानी माना जाता है. जो लोग कम मुस्कुराते हैं, वो ख़ुद को पावरफुल महसूस करते हैं. उन्हें लगता है कि वो हर परिस्थिति का मुक़ाबला कर सकते हैं और उनमें वो शक्ति है.

कम संवेदनशीलता: स्टडीज़ इस बात की ओर भी इशारा करती हैं कि इमोशनल सेंसिटिविटी हंसने और मुस्कुराने से जोड़कर देखी जाती है, कम मुस्कुरानेवाले लोग इतने संवेदनशील नहीं होते यानी वो कम संवेदनशील होते हैं.

संवादहीनता व असहमति: कम मुस्कुरानेवाले दूसरों की बातों और विचारों से कम सहमत होते हैं. मुस्कुराहट को संवाद स्थापित करने का एक अच्छा ज़रिया माना जाता है, ऐसे में कम मुस्कुरानेवाले दूसरों से अधिक बात करना पसंद नहीं करते हैं.

कठोर व दृढ़ नज़र आने की कोशिश: कुछ लोग प्रभावशाली, मज़बूत, कठोर या दृढ़ नज़र आने की कोशिश में कम मुस्कुराते हैं. शायद ये ऐसे लोग होते हैं, जिनकी परवरिश के दौरान मन में यह बात बैठा दी जाती है या परिस्थितियां इन्हें ऐसा महसूस कराती हैं कि मुस्कुराना उन्हें कमज़ोर बना सकता है यानी मुस्कुराहट को वो कमज़ोरी की निशानी मानने लगते हैं.

नाख़ुश: ज़िंदगी से जिन्हें बहुत-सी शिकायतें हैं, जो ख़ुश नहीं हैं, वो चाहकर भी मुस्कुरा नहीं पाते.

रक्षात्मक प्रतिक्रिया: ज़िंदगी के कुछ कड़वे अनुभव और जो लोग भावनात्मक रूप से आहत हुए होते हैं कभी या फिर बुली का शिकार भी हुए होते हैं, तो वो ख़ुद को बचाने व अधिक आहत होने से बचाने के लिए न मुस्कुराने को एक रक्षात्मक प्रतिक्रिया के तौर पर लेते हैं.

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लोग गंभीरता से लें: कुछ लोग चाहते हैं कि दूसरे उन्हें अधिक गंभीरता से लें, इसलिए वो कम मुस्कुराते हैं, क्योंकि उनकी यह सोच होती है कि मुस्कुराने से अन्य लोग उन्हें उतनी गंभीरता से नहीं लेंगे या उनकी बातों को उतना महत्व नहीं देंगे, जितना वो चाहते हैं.

परिपक्वता: कम मुस्कुरानेवाले ख़ुद को परिपक्व दिखाने के लिए ऐसा करते हैं. उन्हें लगता है हंसना-मुस्कुराना अपरिपक्वता की निशानी है. उन्हें यह बचकाना लगता है. वे सोचते हैं कि कम मुस्कुराना उन्हें अधिक मैच्योर दिखाएगा और लोग उन्हें अधिक महत्व देंगे.

ख़ूबसूरत नहीं लगते: कुछ लोगों में यह भावना घर कर जाती है कि मुस्कुराते हुए वो अच्छे नहीं लगते या तो उनके दांत ख़राब होते हैं या उन्हें कभी किसी ने कहा होता है कि वो गंभीर अधिक आकर्षक नज़र आते हैं, इसलिए भी वो कम मुस्कुराते हैं.

मुखौटा: कुछ लोग इसे आवरण या मुखौटा बना लेते हैं, जिससे उनकी तकलीफ़ या भावनाएं दूसरों पर ज़ाहिर न हों. कहीं न कहीं वो तकलीफ़ में होते हैं, पर वो शेयर नहीं करना चाहते, इसलिए वो दूसरों से उतना कंफर्टेबल नहीं होना चाहते, जहां लोग उनकी मुस्कुराहट के पीछे दर्द को पहचान सकें. ऐसे में वो गंभीर व ख़ुद को मज़बूत दिखाने के लिए यह मुखौटा ओढ़ लेते हैं.

महत्व कम न हो: कुछ लोगों की यह पक्की धारणा बन जाती है कि बात-बात पर या जब-तब मुस्कुरानेवालों की वैल्यू कम हो जाती है. हर किसी को देखकर मुस्कुरा देने से वो व्यक्ति भी आपकी कद्र नहीं करता, जिसे देखकर आप मुस्कुराते हैं.

ईगो: यह भी एक कारण है, क्योंकि कई बार आपसी रिश्तों या दोस्तों में भी लोग यह सोचते हैं कि एक स्वीट-सी स्माइल से अगर झगड़ा ख़त्म होता है, तो क्या बुराई है, पर वहीं कुछ लोग अपना ईगो सैटिस्फाई करने के लिए यह सोचकर नहीं मुस्कुराते कि भला मैं क्यों झुकूं, ग़लती तो सामनेवाले की थी, मैं क्यों पहल करूं… यदि सामनेवाला पहल करता है, तो भी वो जल्दी से अपनी प्रतिक्रिया नहीं देते, क्योंकि उन्हें लगता है कि इतनी जल्दी माफ़ करने पर अगली बार आपको वो हल्के में लेंगे और आपका महत्व धीरे-धीरे ख़त्म हो जाएगा.

Sad Face

क्या-क्या और कैसे-कैसे बहाने…

जी हां, कम मुस्कुराने के मनोविज्ञान व मनोवैज्ञानिक कारणों की चर्चा तो हम कर चुके. अब उन बहानों को भी जानते हैं, जो लोग अपने न मुस्कुराने पर बनाते हैं.

क्या मैं पागल हूं: बहुत-से लोग यही कहते हैं कि बेवजह या बात-बात पर मुस्कुराने व हंसनेवाला तो पागल होता है. क्या मैं आपको पागल लगता/लगती हूं, जो हर बात पर या हर किसी को देखकर मुस्कुराऊं?

मूड भी कोई चीज़ है या नहीं: न मुस्कुराने की वजह पूछने पर कुछ लोग यही तर्क देते हैं कि मूड भी कोई चीज़ है, बिना मूड के कोई काम नहीं होता, फिर चाहे वो मुस्कुराना ही क्यों न हो.

झूठी हंसी क्यों भला: हम ज़बर्दस्ती किसी को ख़ुश करने के लिए नहीं मुस्कुरा सकते. झूठी हंसी नहीं आती हमें. यह बहाना भी बहुत लोग बनाते हैं.

कुछ अच्छा तो हो मुस्कुराने के लिए: कुछ लोग इतने नकारात्मक होते हैं कि उन्हें हर बात में, हर चीज़ में, हर इंसान में और हर परिस्थिति में कमियां ही नज़र आती हैं. उनके लिए कुछ भी कभी भी अच्छा नहीं होता, तो भला मुस्कुराना किस बात का.

मैं क्यों अपनी वैल्यू कम करूं: कुछ लोगों को लगता है कि उनकी वैल्यू कम हो जाएगी, लोगों के बीच उन्होंने जो छवि बना रखी है, वो हल्की पड़ जाएगी.

जब मेरा मन होगा, तब हंसूंगा/हंसूंगी: तुम्हारे कहने या दुनिया के चाहने से थोड़ी हंसी आएगी. जब मेरी मर्ज़ी होगी, मन होगा, भीतर से हंसने जैसा महसूस होगा तब हंसूगा.

कोई ज़बर्दस्ती है क्या: नहीं हंसना, तो नहीं हंसना, कोई ज़ोर-ज़बर्दस्ती है क्या कि हर बात पर मुस्कुराया जाए या हर चुटकुले पर हंसा ही जाए.

हम तो ऐसे ही हैं: आपको हम पसंद हों या न हों, पर हम तो ऐसे ही हैं. हमको नहीं आता मुस्कुराना. बात करनी हो, तो करो, वरना आप अपने रास्ते, हम अपने रास्ते.

आपको क्या तकलीफ़ है: हमारे नहीं मुस्कुराने से क्या आपका कोई नुक़सान हो रहा है? नहीं न, तो फिर?

हम किसी के ग़ुलाम नहीं: आपको जब लगेगा कि हमें मुस्कुराना चाहिए, क्या तब हम मुस्कुराएंगे? हम किसी के ग़ुलाम नहीं कि किसी के चाहने पर हंसे या मुस्कुराएं.

आपके पेट में दर्द क्यों है: हमारे कम या नहीं मुस्कुराने से दूसरों के पेट में दर्द क्यों होता है, यह बात आज तक समझ नहीं आई. अगर हमें कोई घमंडी या सिरफिरा समझता है, तो यह हमारी प्रॉब्लम है, इससे आपको क्या लेना-देना भला?

–  गीता शर्मा

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जब मेडिकल लापरवाही के हों शिकार, तो कहां करें शिकायत? (Medical Negligence: Consumer Rights And The Law)

Medical Consumer Rights

जब मेडिकल लापरवाही के हों शिकार, तो कहां करें शिकायत? (Medical Negligence: Consumer Rights And The Law)

एबी पॉज़िटिव मरीज़ को एबी निगेटिव का खून चढ़ाना, दाएं पैर की बजाय बाएं पैर की सर्जरी करना, मलेरिया के मरीज़ को डेंगू की दवाइयां देना, दवाइयों का इतना ओवरडोज़ कि मरीज़ की जान पर बन आए… आए दिन हमें मेडिकल लापरवाही की ऐसी ख़बरें

देखने-सुनने को मिलती हैं. क्या हो, अगर उनकी जगह हमारे परिवार का कोई सदस्य या हम ख़ुद हों? ऐसी लापरवाही किसी के साथ भी हो सकती है, इसलिए ज़रूरी है कि आप अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें, ताकि सही समय पर सही कार्रवाई कर सकें.

अपनी भलाई के लिए हम डॉक्टर की हर बात पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं, जबकि हमें अपनी आंखें और कान हमेशा खुले रखने चाहिए. किसी ज़माने में नोबल प्रोफेशन माना जानेवाला मेडिकल प्रोफेशन आज प्रॉफिट मेकिंग बिज़नेस बन गया है. ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि हम अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें और किसी भी तरह की मेडिकल लापरवाही होने पर सही जगह उसकी शिकायत करें.

क्या है मेडिकल लापरवाही?

यह डॉक्टर की नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वह अपने पास आनेवाले सभी मरीज़ों का सही तरी़के से इलाज या कंस्लटेशन करे. अपने कर्त्तव्यों को ईमानदारीपूर्वक निभाए, लेकिन जब डॉक्टर अपने कर्त्तव्यों को सही तरी़के से न निभाए और उसकी लापरवाही से मरीज़ को शारीरिक क्षति पहुंचे या जान चली जाए, तो यह मेडिकल लापरवाही होगी.

किन मामलों में कर सकते हैं शिकायत?

किसी भी सर्जरी से पहले डॉक्टर्स कुछ पेपर्स पर आपके सिग्नेचर लेते हैं, ताकि कुछ गड़बड़ होने पर वो ज़िम्मेदार न ठहराए जाएं. लेकिन वो इससे पूरी तरह बच नहीं सकते. आइए देखें, कौन-से हैं वो मामले, जो मेडिकल लापरवाही की श्रेणी में आते हैं.

–   लापरवाही के कारण ग़लत दवा देना.

–    सही तरी़के से इलाज न करना.

–    मरीज़ को ऐसी जगह रखना, जिससे उसे संक्रामक रोग हो जाए.

–    अस्पताल में स्टाफ की कमी के कारण मरीज़ की सही तरी़के से देखभाल न हो पाना.

–    मरीज़ की परेशानियों को अनसुना करना.

–    बीमारी के लक्षणों को पहचानने में ग़लती करना.

–    ग़लत लक्षण के कारण बेवजह सर्जरी कर देना.

–    लक्षणों को पहचानने में बहुत ज़्यादा देर करना, जिससे मरीज़ की जान पर बन आए.

–    सर्जरी के दौरान किसी और अंग को नुक़सान पहुंचाना.

–    सर्जरी के दौरान ग़लती करना, जिससे किसी तरह का इंफेक्शन हो जाए या फिर इम्यून सिस्टम फेल हो जाए.

–    सर्जरी के दौरान किसी चीज़ का अंदर छूट जाना, सर्जरी के कारण बहुत ज़्यादा खून बहना, ग़लत बॉडी पार्ट की सर्जरी कर देना.

–    एनेस्थीसिया देने में ग़लती करना.

–    बच्चे के जन्म के दौरान किसी तरह की ग़लती से बच्चे का नर्व डैमेज होना या फिर जान पर बन आना आदि.

भले ही डॉक्टर ने लापरवाहियां ग़लती से कर दी हों, फिर भी वह दोषी माना जाएगा.

 

क्या है टाइम लिमिट?

यह जानना बहुत ज़रूरी है कि आपको मेडिकल लापरवाही के तीन साल के भीतर शिकायत दर्ज करनी है, वरना उसके बाद भले ही आपका केस कितना भी मज़बूत क्यों न हो, आपको एक पैसा नहीं मिलेगा.

–    यहां यह ध्यान देने की ज़रूरत है कि लापरवाही के बारे में आपको पता कब चला, क्योंकि ऐसे कई मामले होते हैं, जहां कई सालों बाद इसके बारे में पता चलता है. उदाहरण के लिए अगर कैंसर ट्रीटमेंट के दौरान बहुत ज़्यादा रेडिएशन का इस्तेमाल किया गया हो, तो उसका असर कुछ सालों बाद दिखेगा और जब असर दिखने लगे, तब से लेकर तीन साल के भीतर आप शिकायत कर सकते हैं.

कौन कर सकता है शिकायत?

मरीज़ या मरीज़ के परिवारवालों के अलावा कोई रजिस्टडर्र् ग़ैरसरकारी  संस्था  भी मरीज़ की तरफ़ से शिकायत दर्ज कर सकती है. मेडिकल लापरवाही को साबित करने की ज़िम्मेदारी पीड़ित पर होती है, इसलिए आपको सभी पेपर्स संभालकर रखने चाहिए.

शिकायत से पहले ध्यान में रखें ये बातें

–    अगर आपको संदेह है कि डॉक्टर सही इलाज नहीं कर रहा है, तो किसी और डॉक्टर से सलाह लें और मरीज़ को किसी अच्छे अस्पताल में भर्ती कराएं. उसके ठीक होने के बाद ही इस मामले को उठाएं. मरीज़ को प्राथमिकता दें.

–    सबसे पहले इस बात की पुष्टि के लिए कि मेडिकल लापरवाही हुई है, आपको किसी सरकारी अस्पताल के डॉक्टर या उसी फील्ड के एक्सपर्ट से एक रिपोर्ट लेनी होगी, जिसमें वो इस बात की पुष्टि करे कि मेडिकल लापरवाही हुई है.

–    आप चाहें, तो कंज़्यूमर कोर्ट में भी गुहार लगा सकते हैं कि वो अपनी तरफ़ से मेडिकल बोर्ड को जांच के आदेश दे, ताकि आपको रिपोर्ट मिल जाए.

–    शिकायत करने के लिए सबसे ज़रूरी है डॉक्यूमेंट्स. इलाज से जुड़े सभी एडमिशन पेपर्स से लेकर रिपोर्ट्स, दवाई के बिल्स वगैरह सभी जमा करके रखें.

–    अगर अस्पताल आपको मेडिकल रिकॉर्ड्स नहीं दे रहा, तो आप कोर्ट में जा सकते हैं. कोर्ट के आदेश पर उन्हें मेडिकल रिकॉर्ड्स देने ही पड़ेंगे.

Consumer Rights

कहां करें शिकायत?

मेडिकल लापरवाही के मामले में आपको सही कड़ी का इस्तेमाल करना चाहिए. सबसे पहले अस्पताल से ही शुरुआत करें, अगर वहां आपकी सुनवाई नहीं होती, तो न्याय मांगने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने से न हिचकिचाएं.

मेडिकल सुप्रिटेंडेंट

–    डॉक्टर की लापरवाही हो या फिर स्टाफ की ग़ैरज़िम्मेदारी, उसकी शिकायत तुरंत अस्पताल के मेडिकल सुप्रिटेंडेंट से करें.

–    आप उनसे उचित कार्रवाई के साथ हर्जाने की मांग भी कर सकते हैं.

स्टेट मेडिकल काउंसिल

–   डॉक्टर या अस्पताल से जुड़ी किसी भी तरह की शिकायत आपको पहले मेडिकल काउंसिल में करनी चाहिए. वो अपने लेवल पर जांच करके उचित कार्रवाई करते हैं.

–   अगर काउंसिल की जांच में डॉक्टर्स दोषी पाए जाते हैं, तो काउंसिल उनका लाइसेंस तक रद्द कर सकती है.

–    अगर आपको लगता है कि मामले को जान-बूझकर टाला जा रहा है, तो आप अपनी शिकायत नेशनल मेडिकल काउंसिल में भी कर सकते हैं. ये दोनों ही गवर्निंग बॉडीज़ हैं, जो दोषी पाए जाने पर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हैं.

कंज़्यूमर कोर्ट

जब आप किसी डॉक्टर या अस्पताल में जाकर इलाज करवाते हैं और उनकी सेवा के बदले उन्हें फीस देते हैं, तो आप उनके ग्राहक माने जाते हैं और क्योंकि आप ग्राहक हैं, तो आप मेडिकल लापरवाही के ख़िलाफ़ अपनी शिकायत कंज़्यूमर कोर्ट में कर सकते हैं.

–    आप अपनी शिकायत डिस्ट्रिक्ट फोरम में कर सकते हैं.

–    यहां आपको एक बात ध्यान में रखनी होगी किकंज़्यूमर कोर्ट में आपको स़िर्फ मुआवज़ा मिलेगा.

–    यहां आप डॉक्टर के ख़िलाफ़ किसी तरह की क्रिमिनल कार्रवाई की मांग नहीं कर सकते.

–    हाल ही में लोकसभा में कंज़्यूमर प्रोटेक्शन बिल 2018 पास हुआ है, जिसमें कई नए बदलाव किए गए हैं, ताकि ग्राहकों की शिकायत पर जल्द सुनवाई हो सके. इस बिल के क़ानून बन जाने से मेडिकल लापरवाही के मामलों को और आसानी से सुलझाया जा सकेगा.

सज़ा का प्रावधान

इंडियन पीनल कोड की धारा 304ए के तहत लापरवाही के कारण होनेवाली मौत के लिए दो  साल की जेल और जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है.

ख़राब है देश में मेडिकल कंडीशन

–    मेडिकल लापरवाही में ह्यूमन एरर के कारण हर साल हमारे देश में लगभग 52 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 44 हज़ार से 98 हज़ार का है.

–    साल 2016 में हुई एक स्टडी के मुताबिक़ हर साल इंडिया में मेडिकल लापरवाही के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. आंकड़ों में बात की जाए, तो हर साल इन मामलों में 110% बढ़ोतरी हो रही है.

–    हमारे देश में मेडिकल बजट हमारे पड़ोसी देश नेपाल और श्रीलंका से भी बहुत कम है. देश के जीडीपी का महज़ 1% मेडिकल बजट के लिए दिया जाता है.

– अनीता सिंह

 

हमेशा याद रहेंगे… सरल, सहज… मनोहर परिकर! (Goa CM Manohar Parrikar Passes Away)

CM Manohar Parrikarहमेशा याद रहेंगे… सरल, सहज… मनोहर परिकर! (Goa CM Manohar Parrikar Passes Away)

अपनी निष्ठा और सहज स्वभाव के लिए तो मनोहर परिकर जाने जाते ही थे पर देश के रक्षा मंत्री के तैर पर भी इन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी है!

मनोहर परिकर ने रविवार १७ मार्च को लम्बी बीमारी के बाद अंतिम सांसें लीं! उन्हें पैंक्रीयास की बीमारी थी जिसका इलाज भी काफ़ी चला, पर अफ़सोस के वो अब हमारे बीच नहीं रहे!

63 वर्षीय पर्रिकर को सोमवार सुबह 11 बजे श्रधांजलि दी जाएगी. मनोहर पर्रिकर को  उनके कार्य और उनकी ईमानदारी के लिए जाना जाएगा.

प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने मनोहर परिकर के निधन पर ट्विट करके शोक प्रकट करते हुए लिखा ”श्री मनोहर पर्रिकर एक अद्वितीय नेता थे. एक सच्चे देशभक्त और असाधारण प्रशासक, वह सभी की प्रशंसा करते थे. राष्ट्र के प्रति उनकी त्रुटिहीन सेवा को पीढ़ियों द्वारा याद किया जाएगा। उनके निधन से गहरा दुख हुआ. उनके परिवार और समर्थकों के प्रति संवेदना.”

मेरी सहेली की ओर से उन्हें श्रद्धांजलि!

अंडरगार्मेंट से जुड़ी 10 सच्चाइयां (10 Interesting Facts About Undergarment)

Facts About Undergarment

अंडरगार्मेंट से जुड़ी 10 सच्चाइयां (10 Interesting Facts About Undergarment)

हम अपने आउटफिट्स से तो सभी को इंप्रेस करना चाहते हैं, लेकिन हम शायद ही अपने अंडरगार्मेंट्स (Undergarments) पर ध्यान देते हैं, क्योंकि हमें लगता है वो तो छिपे हुए होते हैं, तो जैसे-तैसे काम चला लो, क्या फ़र्क़ पड़ता है. लेकिन फ़र्क़ पड़ता है, आपकी हेल्थ से लेकर पर्सनैलिटी तक उनसे प्रभावित होती है. इसलिए आपको भी अंडरगार्मेंट्स से जुड़ी ये बातें ज़रूर जाननी चाहिए, ताकि आप सही अंडरगार्मेंट्स का सिलेक्शन कर सकें. हम अपने आउटफिट्स से तो सभी को इंप्रेस करना चाहते हैं, लेकिन हम शायद ही अपने अंडरगार्मेंट्स पर ध्यान देते हैं, क्योंकि हमें लगता है वो तो छिपे हुए होते हैं, तो जैसे-तैसे काम चला लो, क्या फ़र्क़ पड़ता है. लेकिन फ़र्क़ पड़ता है, आपकी हेल्थ से लेकर पर्सनैलिटी तक उनसे प्रभावित होती है. इसलिए आपको भी अंडरगार्मेंट्स से जुड़ी ये बातें ज़रूर जाननी चाहिए, ताकि आप सही अंडरगार्मेंट्स का सिलेक्शन कर सकें.

– एक सर्वे से पता चला है कि लगभग तीन में से दो महिलाएं ग़लत साइज़ की ब्रा पहनती हैं, इनमें से 29% महिलाएं इस बात को जानते हुए भी ऐसा करती हैं.

– अधिकतर थॉन्ग्स लेसी और सैटिन के फैब्रिक में ही मिलते हैं, जो स्किन को ब्रीद नहीं करने देते और स्किनी होने के कारण वहां बैक्टीरिया ज़्यादा पनपते हैं, जिनसे इंफेक्शन का ख़तरा रहता है. –

– कॉटन पैंटीज़ सबसे सेफ होती हैं. इन्हें पहनने से पसीना कम आता है, जिससे बैक्टीरिया का जमाव और इंफेक्शन नहीं हो पाता.

– अक्सर यह माना जाता है कि अंडरवियर पहनने से पुरुषों के स्पर्म काउंट पर असर होता है, लेकिन जब तक कि अंडरवियर बहुत ज़्यादा टाइट न हो, तो कोई ख़तरा नहीं है.

– अधिकतर महिलाएं एक ही तरह की ब्रा हर ड्रेस पर पहनती हैं, क्योंकि उन्हें अलग-अलग तरह की ब्रा के बारे में पता ही नहीं होता, जैसे- स्मूद, टी-शर्ट ब्रा, पुशअप ब्रा, मिनिमाइज़र ब्रा आदि.प यही हाल पैंटीज़ का भी है, इसमें भी हाई वेस्ट, लो वेस्ट, बिकनी, बॉय शॉर्ट पैंटीज़ मिलती हैं, जो ड्रेस के अनुसार पहनी जानी चाहिए.

– जिन महिलाओं के पास रोज़ाना के लिए अलग-अलग ब्रा नहीं होती, वो एक ही ब्रा को दो-तीन दिनों तक लगातार पहनती हैं, जिससे बैक्टीरियल इंफेक्शन का ख़तरा बढ़ जाता है.

– ज़्यादा लंबे समय तक अंडरगार्मेंट्स को रिप्लेस नहीं करेंगे, तो इंफेक्शन्स का भी ख़तरा बढ़ जाता है, क्योंकि उनका मटेरियल ख़राब होने लगता है, साथ ही उनका शेप भी सही नहीं रहता. बेहतर होगा कि समय-समय पर नए अंडरगार्मेंट्स ख़रीदते रहें.

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– ब्रा को ताउम्र के लिए न रखें. जी हां, हर छह महीने में ब्रा को बदल दें, क्योंकि उसका इलास्टिक लूज़ होने लगता है.

– आपका साइज़ बदलता है, तो ब्रा का साइज़ भी बदलें. जी हां, ब्रेस्ट्स का आकार व शेप समय के साथ बदलता है. ऐसे में आप उसी साइज़ की ब्रा हमेशा पहनेंगी, तो इसका मतलब है कि आप ग़लत साइज़ की ब्रा पहन रही हैं.

– वर्कआउट के बाद अंडरगार्मेंट्स ज़रूर बदलें, क्योंकि पसीने की वजह से बैक्टीरियल इंफेक्शन का ख़तरा रहता है.

अंडरगार्मेंट्स से जुड़े इंट्रेस्टिंग फैक्ट्स

– यूके की महिलाओं का ब्रा साइज़ अन्य देशों के मुक़ाबले औसतन सबसे बड़ा होता है.

– यूके की महिलाओं का ब्रा साइज़ अन्य देशों के मुक़ाबले औसतन सबसे बड़ा होता है.

– जापान की महिलाओं का ब्रा साइज़ सबसे छोटा होता है.

– अमेरिका में औसत ब्रा साइज़ है 36 सी.

– अमेरिका में महिलाओं के पास औसतन अंडरवेयर के 22 पेयर होते हैं.

– कप साइज़ का सिस्टम 1930 में चलन में आया था.

– इटली में महिलाएं न्यू ईयर में रेड कलर की अंडरवेयर पहनती हैं, क्योंकि इसको गुड लक से जोड़कर देखा जाता है.

– स्पोर्ट्स ब्रा की शुरुआत साल 1975 से हुई थी.

– फ्रेंच में लॉन्जरी शब्द महिला व पुरुष दोनों के अंडरगार्मेंट्स के लिए यूज़ किया जाता है. प एक कपल ने विक्टोरिया सीक्रेट सेक्सी लॉन्जरी को पॉप्युलर करने के लिए बनाया था, जिसमें रोज़ाना पहनने के अंडरगार्मेंट्स हों और एक ऐसी जगह हो, जहां महिलाएं व पुरुष बेझिझक अंडरगार्मेंट्स ख़रीद सकें. आज विक्टोरिया सीक्रेट बहुत बड़ा ब्रांड बन चुका है.

 – विजयलक्ष्मी

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ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन: क्या इंसानियत को सहेजने का व़क्त आ गया है? (Humanity Conservation: Why Do We Need To Learn Humanities?)

Why Do We Need To Learn Humanities

Why Do We Need To Learn Humanities

हम ख़ुद को अन्य जीवों से बेहतर मानते हैं और कहा भी जाता है कि मनुष्य योनि में जन्म बड़ी ही मुश्किल से मिलता है. मनुष्य सभी जीवों में सबसे शक्तिशाली माना जाता है, क्योंकि वो सोचने-समझने की क्षमता सबसे अधिक रखता है, वो बोल सकता है, वो नए-नए आविष्कार कर सकता है, वो दुख-दर्द महसूस कर सकता है, वो अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकता है, क्योंकि वो एक सामाजिक प्राणी है और उसमें मानवी भावनाएं हैं. लेकिन क्या सचमुच ऐसा ही है, जैसा हम सोचते हैं? हम ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ तो मानते हैं, लेकिन कहीं न कहीं समय के साथ-साथ हमारी इंसानियत खोती जा रही है. अगर ऐसा न होता, तो कई तरह के अमानवीय पहलू हमें देखने को न मिलते.

  • बच्चे अपने बूढ़े माता-पिता से पीछा छुड़ाने के लिए उन्हें वृद्धाश्रमों में न छोड़ देते.
  • स़िर्फ पैसों व ज़रूरतों के लिए एक-दूसरे को हम इस्तेमाल न करते.
  • कहीं 7 महीने की बच्ची से बलात्कार, तो कहीं अपने ही पिता से शोषण का शिकार बेटी… कहीं अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति का ही क़त्ल, तो कहीं माता-पिता से पैसे ऐंठने के लिए ख़ुद के अपहरण की कहानी… इस तरह की ख़बरों से आजकल हमारे दिन की शुरुआत होती है. ज़ाहिर है, कहीं न कहीं कुछ तो ग़लत हो रहा है, जो हम इंसानियत भूलकर इस हद तक चले जाते हैं.
  • जब भी कोई इंसान ग़लत व्यवहार या अपराध करता है, तो हम उसकी तुलना जानवर से करते हैं, लेकिन जानवर तो कभी भी अपनी हदें पार नहीं करते. ये हम ही हैं, जो सीमाएं लांघते हैं और अपने इंसानी दंभ में सब कुछ भूलकर जघन्य अपराध तक कर डालते हैं.
  • ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या अब ज़रूरी हो गया है कि इंसानियत को बचाया जाए, सहेजा जाए?
  • हम वॉटर कंज़र्वेशन, एनर्जी कंज़र्वेशन, फ्यूअल कंज़र्वेशन, फॉरेस्ट और एनिमल कंज़र्वेशन आदि की बातें करते हैं, लेकिन शायद ही कभी ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन की तरफ़ हमारा ध्यान जाता हो.
  • दिन-ब-दिन बढ़ते अपराध, गिरते मानवी मूल्य और बढ़ते लालच के चलते बेहद ज़रूरी हो गया है कि सबसे ज़्यादा और सबसे पहले ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन की तरफ़ ध्यान दिया जाए.

कैसे किया जाए ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन?

  • बच्चे हमारे देश के भविष्य हैं. यही हमारे भविष्य के समाज के निर्माण में मुख्य भूमिका निभानेवाले हैं. ऐसे में ज़रूरी है कि बच्चों की नींव मज़बूत बने.
  • हमारे बच्चे हमसे ही सीखते हैं. हम झूठ और फरेब करेंगे, तो यह अपेक्षा न रखें कि बच्चे सब कुछ देखकर भी सच्चाई की राह पर चलेंगे. बेहतर होगा कि हम पहले ख़ुद को बदलें.
  • जितना संभव हो सके, सच्चाई और ईमानदारी से काम करें.
  • अपने बच्चों को भी यही सीख दें. स्वार्थ और झूठ की राह शुरुआत में तो बड़ी आसान लगती है, लेकिन इसके नतीज़े उतने ही घातक होते हैं.
  • स़िर्फ अपने बारे में सोचना ही काफ़ी नहीं है, अपने परिवार के अलावा, समाज व देश की बेहतरी के लिए प्रयास करने भी ज़रूरी हैं.
  • जैसा कि कहा जाता है- क्या हम अपने बच्चों के लिए बेहतर प्लानेट (धरती) छोड़कर जाएंगे…? इसी तरह से कुछ लोग यह भी कहते हैं कि क्या हम अपने प्लानेट के लिए बेहतर बच्चे छोड़कर जाएंगे? तो दोनों ही तरह से सोचना ज़रूरी है.
  • यदि अब हमने ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन पर ध्यान नहीं दिया, तो ज़ाहिर है बहुत कुछ हाथ से निकल जाएगा.

क्यों खोती जा रही है इंसानियत?

  • स्वार्थ और लालच के चलते हम सभी सबसे आगे रहने की ख़्वाहिश रखते हैं.
  • हम सबसे ज़्यादा पैसा कमाएं, हम सबसे ज़्यादा पॉप्युलर हो जाएं, अपने दोस्तों व रिश्तेदारों में हम सबसे अधिक कामयाब रहें… इस तरह की चाहत आम है.
  • कामयाब होना ग़लत नहीं, लेकिन ग़लत तरह से कामयाब होना या किसी और की कामयाबी को देखकर उससे ईर्ष्या रखना ग़लत है.
  • किसी के पास कार है, तो हमारे पास उससे भी बड़ी कार होनी चाहिए, पड़ोसी की टीवी से हमारी टीवी बड़ी होनी चाहिए, वो थाईलैंड के ट्रिप पर गए, तो हमें यूरोप ट्रिप पर जाना है… कुल मिलाकर दिखावे की ज़िंदगी आजकल हम पर हावी रहती है.
  • हमें ख़ुद को दिखाना है कि हम कामयाब हैं, ख़ुश हैं और सबसे ज़्यादा हम ‘कूल’ हैं.

सोशल मीडिया ने भी बदले हैं बहुत-से समीकरण

  • यह सच है कि सोशल मीडिया ने हमें क़रीब किया है, अपने पुराने दोस्तों से, रिश्तेदारों से व ढेर सारे नए अंजान चेहरों से भी.
  • लेकिन हम शायद इसे पचा नहीं पा रहे या इसका ओवरडोज़ इतना हो चुका है कि हम भटक रहे हैं.
  • हम दोहरी ज़िंदगी जीने लगे हैं. अपनी लाइफ को कूल दिखाने की कोशिश में लगे हैं, क्योंकि सोशल मीडिया के वो अंजान चेहरे, जो दोस्त बन चुके हैं, हमारे लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि उन्हें इंप्रेस करने के लिए हम नकली ज़िंदगी जीने या दिखावा करने से भी परहेज़ नहीं करते.
  • इन सबके चलते हम अपने निजी रिश्तों को अपेक्षाकृत कम महत्व देने लगे हैं, हम उनसे दूर हो रहे हैं. ऐसे में भावनाएं, अपनापन, प्यार, मेलजोल, संस्कार आदि बैकवर्ड बातें हो गई हैं और प्रैक्टिकल बनना ही मॉडर्न और कामयाबी की निशानी मानी जाने लगी है.
  • पैरेंट्स भी सोशल मीडिया में बिज़ी हैं और बच्चे भी, ऐसे में कब, कहां और कैसे मूल संस्कार दिए जाएंगे? न व़क्त है और न ही हमें इसकी ज़रूरत महसूस होती है.

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कूल बनना है बहुत ज़रूरी…

  • जी हां, आपके पास महंगे गैजेट्स और ब्रान्डेड कपड़े-जूते हों, यही आपकी बेसिक ज़रूरतें या प्राथमिकता बन चुकी है.
  • दूसरी प्राथमिकता है कि आप सोशल मीडिया पर बहुत ही एक्टिव हों, वरना आप आउटडेटेड कहे जाएंगे.
  • ऐसे में यदि बच्चों को या युवाओं को समझाने बैठेंगे कि ये करो, ये मत करो, तो उन्हें लेक्चर से ज़्यादा कुछ नहीं लगेगा. बेहतर होगा कि आप ख़ुद एक उदाहरण के तौर पर अपने व्यवहार को आदर्श बनाएं, इससे वो बेहतर तरी़के से सीख पाएंगे.
  • ज़रूरी नहीं कि बच्चों की हर डिमांड को पूरा ही किया जाए, उन्हें अनुशासन का महत्व सिखाना भी बेहद ज़रूरी है.
  • अनुशासित युवा ही बेहतर इंसान भी बन सकेगा और सही-ग़लत के बीच के फ़र्क़ को भी समझेगा.
  • बच्चों को बचपन से ही यह एहसास कराना ज़रूरी है कि उनका संबंध स़िर्फ अपने परिवार से ही नहीं है, बल्कि देश व समाज के प्रति भी उनका कर्त्तव्य है. वो एक बेहतर नागरिक बनें, नियमों का पालन करें, समाज के लिए बेहतर इंसान बनें, सबको सम्मान दें.
  • बच्चों को यह समझाना भी महत्वपूर्ण है कि कूल बनने का सही अर्थ क्या होता है. एक अनुशासनहीन युवा कभी भी कूल नहीं होता, वो एंटीसोशल एलीमेंट होता है, जबकि सच के लिए खड़े रहनेवाला ही कूल होता है, जिसमें गट्स होता है, जो दूसरों के लिए भी आवाज़ उठाता है.
  • क्योंकि एकाएक अचानक यदि हम यह चाहें कि समाज बदल जाए, तो यह संभव ही नहीं, बदलाव के लिए समय व प्रयास दोनों ही ज़रूरी हैं और यह बदलाव हमें ही लाना होगा, तभी बेहतर समाज का निर्माण होगा और इंसानियत की जीत भी.

देश और समाज के प्रति भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है…

  • हम बेहतर नागरिक बनें, बेहतर इंसान बनें यह हमारे व हमारे परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए सकारात्मक बात होगी.
  • ज़ाहिर-सी बात है, जब सामाजिक मूल्य ऊंचे होंगे, तो अपराध कम होंगे.
  • हम समाज के प्रति अधिक ज़िम्मेदार बनेंगे, ग़लत राह पर न ख़ुद चलेंगे और न ही दूसरों को चलने देंगे.
  • यह जज़्बा हरेक में होना चाहिए. न स़िर्फ अपने देश व समाज में बल्कि आज के दौर में विश्‍वभर में इंसानियत को सहेजने की बेहद आवश्यकता है.
  • यदि इंसानियत होती, तो आतंकी हमले न होते, यदि इंसानियत होती, तो दुनिया बारूद के ढेर पर न बैठी होती, यदि इंसानियत होती, तो सरहदों पर हथियार और बंदूकें नहीं होतीं… लेकिन यह इंसानियत सबमें नहीं है. आत्मरक्षा के लिए भी बहुत कुछ करना मजबूरी है. ऐसे में यदि हम शुरुआत अपने परिवार व समाज से करें, तो धीरे-धीरे ही सही, सफलता मिलेगी. लेकिन इसके लिए सतत प्रयास करने होंगे, वरना इंसानियत मरती जाएगी और यह शब्द स़िर्फ क़िस्से-कहानियों में ही सीमित होकर रह जाएगा.

सच्चाई बयां करते आंकड़े

  • नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में सर्वाधिक हत्या व बलात्कार के मामले पाए जाते हैं.
  • यही नहीं, महिलाओं के ख़िलाफ़ भी सबसे अधिक अपराधों में उत्तर प्रदेश को सबसे आगे पाया गया.
  • रेप यानी बलात्कार के मामलों में पिछले वर्षों के मुक़ाबले लगभग 12.4 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी देखी गई.
  • इसके अलावा एक और तथ्य जो आंकड़ों से सामने आया है, वो यह कि 95% बलात्कार की शिकार महिलाएं अपराधी को पहचानती थीं.
  • अब तक बलात्कार को लेकर एक धारणा समाज में बनी हुई थी कि एक ख़ास तरह के लोग ही बलात्कार करते हैं और ख़ास क़िस्म की महिलाएं ही इसका शिकार होती हैं. समाज व परिवार की इसी सोच के चलते आज भी अधिकांश मामले दर्ज ही नहीं किए जाते.
  • आंकड़े बताते हैं कि 95% मामलों में पीड़िता अपराधी को पहचानती है. इसमें से 27% तो पड़ोसी ही होते हैं, 22% वो जो शादी का झूठा दिलासा देकर संबंध बनाते हैं, 9% घर-परिवार व नाते-रिश्तेदार होते हैं. इसी तरह से कहीं-कहीं एंप्लॉयर, को-वर्कर्स, पार्टनर आदि भी अपराधी होते हैं.
  • इंसानियत को शर्मसार करने के लिए ये आंकड़े काफ़ी हैं. इसी से यह अंदाज़ा लग जाता है कि आज की तारीख़ में सबसे अधिक यदि किसी बात की ज़रूरत है, तो वो है इंसानियत को सहेजने की.

– रामेश्‍वर दयाल शर्मा

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कहानी- डॉक्टर (Short Story- Doctor)

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       बेला मुखर्जी

Hindi Short Story

 

“यार! सब घर-परिवार में आराम से रह रहे हैं. तेरे लिए सभी चिंता करते हैं. इतना सूना जीवन, अकेला, इस उम्र में… पर क्या करें? तूने तो अपने लिए कभी सोचा ही नहीं. अरे, डॉक्टर तो हम सभी थे, पर तेरी तरह अधूरा तो कोई भी नहीं रहा.”
राजीव के जाने के बाद डॉक्टर साहब कुर्सी पर ढीले पड़ गए.

‘डॉक्टर साहब!’ घर-बाहर, छोटे-बड़े सभी इसी नाम से जानते हैं उनको. यही उनका परिचय भी है और पहचान भी. इस पहचान के चलते लोग उनके मम्मी-पापा द्वारा दिया गया नाम ‘सत्य प्रकाश’ भूल ही गए हैं. पापा के कुलगुरु ने उनकी जन्मपत्री बनाते समय आशीर्वाद के साथ कहा था, “यह संतान भाग्यवान है. इसका यश चारों दिशाओं में फैलेगा. इसका बहुत बड़ा परिवार होगा और उस परिवार में यह ईश्‍वर की तरह पूजा जाएगा.”
सुनकर मम्मी-पापा उस समय अवश्य ही ख़ुशी में फूले नहीं समाए होंगे. आज उनको हंसी आती है उस भविष्यवाणी पर. बड़ा तो दूर, आज पचास की उम्र हो गई है, लेकिन घर व जीवन दोनों सूने पड़े हैं. अकेले हैं, नौकर मुरारी के भरोसे. मज़े की बात यह है कि अपने मरीज़ों की चिंता में उनकी नींद तो उड़ती रही, पर अपने या अपने भविष्य में आनेवाले बुढ़ापे के लिए सोचने का समय ही नहीं मिला.
मेडिकल कॉलेज में दुखी लोगों की सेवा में अपने सुख व आराम को त्याग देने की जो शपथ ली थी, उन्होंने उसका अक्षरशः पालन किया है. उसके लिए मन में कभी कोई अभावबोध या अकेलापन भी नहीं जागा. और मरीज़ भी एक से बढ़कर एक. यदि किसी के दम तोड़ते समय भी डॉक्टर साहब आकर खड़े हो जाते तो सबकी आंखों में आशा की किरण फूट पड़ती. लोग धर्म गुरु को सिर पर बैठाते हैं, क्योंकि वो परलोक सुधारते हैं और डॉक्टर साहब परलोक के रास्ते में चट्टान बनकर खड़े हो जाते हैं. मौत से हाथापाई कर भगाते हैं तो लोग उनको अपने प्राणों में बसा लेते हैं. वैसे उनका शरीर मज़बूत है. संयमित, व्यसन रहित जीवन और संतुलित भोजन के साथ सदा कर्मठ रहने से बीमारी पास नहीं आती. पर अचानक वायरल ने आक्रमण करके आठ दिन में ही शरीर तोड़-सा दिया है. जूनियर्स को मौक़ा मिल गया उन पर रौब चलाने का. घर में ज़बरदस्ती नज़रबंद कर रखा है. लेटे-लेटे वर्षों के बाद, अपनी स्टूडेंट सुमन की याद आई. उस भोली मासूम-सी लड़की ने भी तो उनको दिल से प्रेम और आदर अर्पण किया?था. इतनी सुंदर थी सुमन कि उसका प्यार पाने के लिए पूरे मेडिकल कॉलेज के युवा तड़प रहे थे, पर वो तो समर्पित हो चुकी थी अपने से 15 वर्ष बड़े अपने सर के प्रति.
कई बार क्लास लेते-लेते उस पर नज़र गई तो देखा वो तन्मय हो उनके चेहरे को देख रही है, पर उनकी समझ में नहीं आया कि उसकी आंखों में जानने-समझने का आग्रह था या प्रेम की मुग्धता. असल में अपना काम छोड़ और किसी ओर ध्यान देने का समय या मानसिकता थी ही नहीं उनमें. आज फुर्सत के पलों में अचानक उसकी याद आई. पता नहीं कहां होगी वो. अवश्य ही एक सुखी जीवन जी रही होगी. बहुत अच्छी लड़की थी सुमन. अच्छी पत्नी होने के सारे गुण थे उसमें. उसके साथ उन्होंने जो किया वो ग़लत तो था, पर अपराध नहीं. कम से कम उनके मन में कभी कोई अपराधबोध नहीं जागा उस घटना को लेकर.
सच तो यह है कि पुरानी बातों को याद करने का समय उन्हें कभी नहीं मिला. कोई नाज़ुक हालत में हो तो उस मरीज़ को जूनियर डॉक्टर के भरोसे नहीं छोड़ सकते. वे रात में भी एक-दो राउंड लेने चले आते हैं. वर्षों बाद घर में आराम करने का अवसर दिया इस वायरल ने. ऊपर से जूनियर डॉक्टरों को मौक़ा मिल गया उनको बिस्तर पर बांधने का. आज जाकर उनको थोड़ा समय मिला अपने बीते जीवन को याद करने का. अब बुख़ार नहीं, बस, वायरल वाली कमज़ोरी भर है. वे अस्पताल जाना भी चाहते थे, पर सारे जूनियर डॉक्टरों ने एकजुट हो अल्टीमेटम दे दिया कि ह़फ़्ते से पहले उन्होंने अस्पताल में पैर रखा तो सारे के सारे अनिश्‍चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे. वे जानते हैं कि ये लोग उनका आदर-सम्मान ही नहीं करते, बल्कि दिल से बेहद प्यार भी करते हैं. जब बुख़ार था, तब एक-दो डॉक्टर दिन-रात घर में ही रहकर पहरेदारी करते रहे. अब बुख़ार उतरा तो उनसे पीछा छूटा.
बाहर के बरामदे में एक जरनल लेकर बैठे थे. तभी एक चमचमाती गाड़ी आकर रुकी. चौकीदार ने गेट खोल लंबा सलाम मारा. कोई परिचित होगा. ड्राइविंग सीट से उतर वे सज्जन पास आकर बोले, “क्यों बे, तू कैसे बीमार पड़ गया?‘’ और सामने पड़ी दूसरी कुर्सी खींच बैठ गए. उन्होंने ध्यान से देखा तो पहचान गए. क्लासमेट राजीव, एमआरसीपी करने लंदन गया था. रईस खानदान का बेटा. पढ़ाई के बाद नौकरी कर वहीं बस गया.
“अरे राजीव! कब आया तू?”
“कल! बाबूजी की पहली बरसी थी तो आना पड़ा. तुझसे मिलने अस्पताल गया था तो पता चला तू बीमार है. तेरा अस्पताल अनाथ पड़ा है तेरे बिना.” हंस पड़े दोनों.
“मामूली वायरल था. बुख़ार भी कब का उतर गया, पर सब लोगों ने मिलकर पाबंदी लगा घर में बिठा रखा है.”
“भाग्यवान है मेरे भाई. तुझे सब चाहनेवाले ही मिले. वैसे यह नई उम्र के लड़के हमसे ज़्यादा समझदार हैं. पर सत्य! काम करने की भी सीमा होती है. ढलती उम्र में थकान को अनदेखा कैसे कर सकता है तू?”
“ढलती उम्र, थकान… ये सारे शब्द मेरे लिए नए और अजीब-से लग रहे हैं. मुझे तो ऐसा कुछ भी नहीं लगता.”
“लगे या न लगे, पचास को पार कर आए हैं हम.”
“पर मुझे लगता है, मैं अभी-अभी पच्चीस का हुआ हूं. तूने अपना यह क्या हाल बना लिया है? मन भर फ़ालतू चर्बी जमा करेगा शरीर में तो पचास क्या सत्तर वर्ष की थकान आएगी.”
“क्या करूं यार? घरेलू पत्नी किसी को न मिले. उसे कुकिंग छोड़ दुनिया में कुछ भी पसंद नहीं. रोज़ नई-नई चीज़ बनाती और खिलाती है.”
“मज़े में है यार.”
“अब घर है तो उसका सुख भी होगा. तेरा तो न घर, न घर का आराम.” खुलकर हंसे दोनों.
“ऐसा नहीं है. बोल न क्या खाएगा? हां, तू क्या देश में नहीं लौटेगा?” हंसता राजीव अचानक उदास हो गया,
“बहुत मन करता है मेरे भाई. पर यह विदेश ऐसा चक्रव्यूह है कि इसमें घुसना आसान है, पर निकलने का रास्ता नहीं मालूम. रास्ता भी खोज लिया तो अनिश्‍चित भविष्य का डर, असुरक्षा का आतंक, बच्चों के करियर की चिंता…”
“बहुत दिन हो गए देश को छोड़े, इसलिए ऐसी सोच है तेरी. आया है तो महीने-दो महीने रहकर जा. देख, देश कहां पहुंचा है. कितनी ऊंचाई को छू रहा है.”
“नहीं होगा यार, बच्चे नहीं आना चाहते. मन तो हर पल रोता है अपनी माटी के लिए, पर… फिर भी बच्चे अपना दाना आप चुगने लगें तो दोनों बूढ़े-बूढ़ी लौट आने का सपना देख रहे हैं.”
“मैंने तुझको तभी मना किया था.”
“इतनी गहरी सोच कहां थी तब? लालच में चला गया था. अरे हां, सुमन भी वहीं है, हमारे पड़ोस में ही रोज़ का आना-जाना, उठना-बैठना है.’
“सुमन! लंदन में है?”
“हां, हमारे पड़ोस में. तूने उसकी क़दर नहीं की, पर ईश्‍वर ने उस भली लड़की को भरा-पूरा सुख दिया है. बहुत ही सुखी परिवार है उसका, तीन प्यारे से बच्चे और हंसमुख, मिलनसार पति. बहुत ख़ुश है सुमन. पास ही एक छोटे से अस्पताल में पार्ट टाइम नौकरी भी करती है.”
“उसका पति डॉक्टर है?”
“न… न… सीए है किसी कंपनी में. अच्छी नौकरी पर है. अपना घर भी ले लिया है.” फिर दोनों मित्रों ने बहुत सारी पुरानी यादें ताज़ा कीं. राजीव का बहुत सारे दोस्तों से अभी भी संपर्क बना हुआ है. कुछ विदेश में हैं, पर अधिकतर देश में ही सुखी-संपन्न जीवन जी रहे हैं. थोड़ी देर बाद चलते हुए बोले, “यार! सब घर-परिवार में आराम से रह रहे हैं. तेरे लिए सभी चिंता करते हैं. इतना सूना जीवन, अकेला, इस उम्र में… पर क्या करें? तूने तो अपने लिए कभी सोचा ही नहीं. अरे, डॉक्टर तो हम सभी थे, पर तेरी तरह अधूरा तो कोई भी नहीं रहा.”
राजीव के जाने के बाद डॉक्टर साहब कुर्सी पर ढीले पड़ गए. आंखें बंद हो गईं. लगभग दो दशक बाद आंखों के सामने आ गई फूल-सी खिली-खिली, ख़ूबसूरत सुमन. शांत स्वभाव की थी वो. अपनी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों को उनके मुख पर गड़ाकर तन्मय हो उनका लेक्चर सुनती. सिर झुका नोट्स लेती, जब भी उस पर नज़र पड़ती, उसकी एकाग्रता में कभी कोई कमी नहीं पाते. उन्होंने कभी उस पर ध्यान नहीं दिया. हां, उसको शिष्य के रूप में पसंद अवश्य करते थे. नए-नए मेडिकल कॉलेज में लेक्चरार हुए थे. अपने ज्ञान को शिष्यों पर प्रदर्शित करने की प्रबल इच्छा थी, पर शायद सुमन इन सब से अलग और ज़्यादा पाने की आशा रखती थी. पर वो इन सबको समझ ही नहीं पाते. फिर भी मौन पुजारिन की तरह सुमन उनके साथ साये की तरह रहती. वो पढ़ाई पूरी कर उनके ही अंडर में काम कर रही थी. तब उसके मम्मी-पापा ही प्रस्ताव लेकर आए. ना ही कर देते, पर मित्रों ने ऐसे घेरा, ऐसी लताड़ लगाई कि उनको हां करना ही पड़ा.
सुमन खिल उठी ताज़े गुलाब की तरह. सगाई का दिन निकाला गया. ख़ूब धूमधाम व रौनक थी. सारे दोस्तों को निमंत्रण दिया गया था. सगाई की रस्म पूरा करके हाथोंहाथ शादी का मुहूर्त भी निकाला जाना था. दोस्त उनके घर जमा होने लगे तो उन्होंने उन सबको सीधे सुमन के घर भेज दिया.
“बस, एक राउंड लेकर फिर तैयार होकर अभी आया. तुम लोग चलो तब तक. ठंडा-वंडा पीयो.” ठीक समय पर वार्ड का राउंड लेकर घर लौटे. आज किसी मरीज़ से ज़्यादा उलझे नहीं. नहाकर तैयार होते-होते कई दोस्तों के कई फ़ोन आए, “अबे जल्दी आ.”
एक बार सुमन ने भी लजाते हुए पूछा, “कितनी देर में आएंगे.”
“बस, निकल रहा हूं.”
हल्के आसमानी शर्ट के ऊपर ग्रे सूट पहना. टाई उनको पसंद नहीं, पर राजीव चेतावनी दे गया था, “टाई ज़रूर बांधना.” टाई बांधी. सुमन के लिए एक हीरे की अंगूठी ख़रीद लाए थे, उसे जेब में रखा. घर से निकले ही थे कि एक बूढ़ा आकर पैरों पर पछाड़ खाकर गिर पड़ा. बुरी तरह रो रहा था वो, “डाक्टर साब! मेरे पोते को बचा लो. हम बूढ़े-बूढ़ी की बुढ़ापे की लाठी है वो. बहू-बेटे को पहले ही खो चुके, पोते के सहारे ज़िंदा थे. अब डॉक्टरों ने उसे भी जवाब दे दिया. आप हमारे भगवान हैं. आप हमारे सहारे को बचा लीजिए.”
एक बार सोचा भगा दें. डॉक्टरों के जीवन में ये सब तो लगा ही रहता है, तभी अपनी शपथ याद आ गई. झुककर बूढ़े को दोनों हाथों से उठाया. जेब से अंगूठी की डिब्बी फिसल बाहर लुढ़क गई, उसे देखा भी नहीं.
“कहां है तुम्हारा पोता?”
“दस नंबर के बेड पर.”
याद आया यह फ्री बेड है. अति ग़रीब बूढ़ा-बूढ़ी अपने पंद्रह-सोलह वर्ष के पोते को लेकर आए थे. बुरा हाल था लड़के का. वास्तव में ही संकट था. लगा, लड़का अंतिम सांसें गिन रहा है. दो हाउस जॉब वाले असहाय खड़े हैं. सब कुछ भूल तैयार हो गए मौत से कुश्ती लड़ने. रातभर खींचतान रही उनमें और मौत में. भोर में मौत तंग आकर, थककर लौट गई. घर लौटे तो भोर की पहली किरण धरती को चूमने नीचे उतर रही थी. किसी प्रकार कपड़े बदल बिस्तर पर लेटकर गहरी नींद सो गए थे.
दूसरे दिन से सुमन काम पर नहीं आई. कभी भी नहीं आई, किसी ने बताया कि कोई स्कॉलरशिप ले वो विदेश चली गई है. भूल ही गए थे उसको. असल में वो उनके मन की गहराई को इतना बड़ा समर्पण करके भी छू नहीं पाई थी. आज इतने वर्षों बाद राजीव के मुंह से उसके सुखी, भरे-पूरे परिवार की बात सुन अच्छा ही लगा. थोड़ा स्नेह तो था ही उसके लिए मन में, स्टूडेंट थी अपनी. उनके मन में सभी स्टूडेंट के लिए स्नेह था. मन ही मन आशीर्वाद दिया, “मैं बहुत ख़ुश हुआ सुमन तुम्हारे सुखी और भरे-पूरे जीवन की बात सुन. ईश्‍वर! तुमको अखंड सौभाग्य दे.”
हां, राजीव के मन में उनके लिए दुख है. अपना कोई नहीं, परिवार के नाम पर कोई भी नहीं. घर-जीवन सब सूना पड़ा है, लेकिन क्या यह सच है? झपकी-सी आने लगी, शायद सो ही गए थे कि पैरों पर किसी के स्पर्श से चौंककर जाग उठे. एक युवती उनके दोनों पैरों पर माथा रख प्रणाम कर रही है. दो प्यारे से बच्चे हाथ में गेंदे के फूल लिए और एक आकर्षक युवक हाथ में थैला लिए खड़ा था.
“अरे… उठो, यह क्या? कौन हो तुम?”
युवती ने सिर उठाया, आंचल से आंसू पोंछे, मन के आवेग से आंसू आ गए थे.
“मैं मालती हूं डॉक्टर बाबा.”
“मालती…?” कुछ याद नहीं आया. इतने मरीज़ आते-जाते हैं. सबको याद रखना संभव नहीं है. शायद कभी इसके बच्चे, पति या इसका ही इलाज किया होगा.
“बाबा! सुना आपकी तबीयत ठीक नहीं तो मुझसे रहा नहीं गया. आप तो हमारे ईश्‍वर हैं.” अब युवक भी आगे आया. मालती का पति होगा. थैला उसे पकड़ा घुटनों के बल बैठ उसी प्रकार पैर पर माथा रख प्रणाम किया. बच्चों को आगे किया. उन्होंने डरते-डरते दोनों फूल बढ़ा दिए. मन में वसंत ऋतु की सुगंधित हवा बह चली, मानो उनका जीवन परिपूर्ण हो उठा. सिर पर हाथ रख आशीर्वाद दिया उनको, “सच्चे इंसान बनो. सबके लिए जीयो.”
युवती ने काग़ज़ की प्लेट में दो सेब रख आगे कर दिया, “बाबा! हम ग़रीब आपके लिए भला क्या लाते? आपको याद नहीं होगा. इतने मरीज़ आते-जाते हैं. दो वर्ष पहले मेरे पति को जब सबने जवाब दे दिया था, तब आपने दिन-रात एक करके उनका जीवन लौटाया था.”
तभी याद आ गया, हां जीवित रहने की आशा एकदम नहीं थी. निमोनिया पूरी तरह बिगड़ चुका था. झोला छाप डॉक्टरों ने मौत के द्वार तक पहुंचा दिया था. उसको तो अस्पताल में ले भी नहीं रहे थे. जूनियर्स ने बार-बार कहा, “इसका आख़िरी समय आ गया है सर. क्यों बेकार में बदनामी अपने सिर लें?” पर वो नहीं माने. स्वयं उसकी देखभाल करते रहे, दूसरों पर भरोसा नहीं किया. कुछ दवाएं बहुत महंगी थीं, जो अस्पताल से नहीं मिलतीं, उनको अपनी जेब से मंगाकर देते. बचा लिया था उसे. आज स्वस्थ युवक सामने खड़ा है. एक अनजान ख़ुशी से मन भर उठा.
“डॉक्टर बाबा! भगवान को हमने देखा नहीं, पर इतना जानते हैं कि कभी-कभी वो भी कान बंद कर लेते हैं. आप हमारे लिए भगवान हैं. मेरा सुहाग लौटा दिया. आज मैं भगवान की पूजा से पहले आपको प्रणाम करती हूं रोज़.”
“पर ये सब क्यों…?”
“ईश्‍वर के दर्शन तो खाली हाथ नहीं करते. हम ग़रीब और क्या भेंट दें…”
वो हंसे. दोनों सेब उठा दोनों बच्चों को दे दिया.
“ख़ुश रहो.”
आंसू पोंछ वे लोग चले गए. वो फिर कुर्सी पर ढीले पड़ गए. मन ने कहा,
‘राजीव! तेरा हिसाब ग़लत है. तुम सबको हरा दिया है मैंने! मेरा जीवन सूना नहीं है. क्या है तुम लोगों के पास? अपना छोटा-सा परिवार. एक दिन चुपचाप संसार को छोड़ चले जाओगे तो पता भी नहीं चलेगा किसी को, पर मेरा परिवार इतना बड़ा है कि मैं ही अपने सदस्यों को पहचान नहीं पाता. बीमार पड़ा, तो ऐसे घेर लेते हैं मुझे कि मौत मेरे पास आने के लिए चार बार सोचकर हिम्मत जुटाएगी. नहीं राजीव, मैंने खोया कुछ भी नहीं, बल्कि इतना पाया है कि तुम सबको हरा दिया है.’

 

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कहानी – उसके बिना (Short Story- Uske Bina)

Hindi Short Story
1
                 गीता सिंह

Hindi Short Story

“तुमने तो इस लड़के को एकदम पैरासाइट बना दिया है. अभी तुम इसके लिए हर तरफ़ से ढाल बन कर खड़ी रहती हो. कल को बाहर निकलेगा, नौकरी-चाकरी करेगा तो अपने इस अपाहिजपने से दो कौड़ी का साबित होगा.”

बहुत एहतियात के साथ सुनील ने जया को गाड़ी की पिछली सीट पर बैठाया, फिर भी जया के चेहरे पर दर्द की लकीरें उभर आईं. सुनील परेशान हो उठा, “टांकें खिंच रहे हैं जया?”
“नहीं, ठीक है.” जया अपने आपको संभालती हुई बोली.
“रुको, मैं पीछे कुशन लगा देता हूं. फिर तुम आराम से सिर टिका लो. बस, एक घंटे में घर पहुंच जाएंगे.”
कुशन पर सिर टिका कर जया ने आंखें बंद कर लीं.
“गाड़ी बहुत आराम से चलाना.” ड्राइवर को बोलकर सुनील ने आगे की सीट पर बैठे बेटे के हाथ से रैपर लेकर जया के ऊपर डाल दिया और एक दुलार भरी निगाह जया के चेहरे पर डालकर उसका हाथ अपने हाथ में लेकर धीरे-धीरे सहलाने लगा.
आज पूरे दस दिन बाद जया नर्सिंग होम से डिस्चार्ज होकर घर आ रही थी. आठ दिन पहले यूटेरस निकालने के लिए उसका ऑपरेशन हुआ था. कुछ तो ऑपरेशन की कमज़ोरी थी, कुछ शायद स्त्रीत्व से जुड़ा एक अहम् हिस्सा शरीर से निकल जाने की वजह से वह एकदम बेजान-सी हो गई थी.
पिछले डेढ-दो साल से काफ़ी परेशानी झेलने के बाद डॉक्टरों ने यही सलाह दी कि यूटेरस निकलवा दिया जाए. इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं था. जानती तो वह भी थी, लेकिन दस-बारह दिनों तक घर छोड़ कर हॉस्पिटल में रहने की बात सोच कर ही वह कांप जाती. फिर भी ऑपरेशन तो करवाना ही था. इधर बच्चों की जाड़े की छुट्टियां भी थीं.
सुनील ने भी ऑफ़िस से छुट्टी ले ली थी. एक बहुत बड़ा काम था यह सबके लिए. चलो हर महीने की परेशानी और दर्द से निजात तो मिली. ऑपरेशन भी ठीक से हो गया था, टांकें भी काफ़ी हद तक सूख चुके थे. बस, कुछ दिनों के बेड रेस्ट के बाद वह फिर पहले की तरह सामान्य ज़िंदगी जीने लगेगी.
पूरे दस दिनों तक घर से दूर रहने के बाद वह आज अपने घर जा रही थी. उसकी ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं होना चाहिए था, लेकिन जया का दिल आशंका और चिंता के मारे बैठा जा रहा था. उसके बिना उसके घर की जो दुर्दशा हुई होगी, यह सोच-सोच कर उसकी घबराहट बढ़ने लगी थी.
वह हमेशा यही कहती थी कि वह दो नहीं, तीन बच्चों को पाल रही है. सच, सुनील अपनी उम्र और अनुभव की सीमा के बाहर अपनी ज़रूरतों के मामले में एक बच्चे की तरह ही निर्भर था जया पर. जया को याद नहीं पड़ता कि शादी के बाद वह कभी इतने लंबे समय तक घर और सुनील को छोड़कर बाहर रही हो. शादी के बाद जब भी वह मायके गई तो सुनील के साथ ही गई. तीन-चार दिन रुककर फिर सुनील के साथ ही वापिस आ जाती. भाभी अक्सर चुटकी लेती, “ये क्या कुंवरजी, क्या दो-चार रोज़ भी हमारी ननद रानी को आप हमारे पास नहीं छोड़ सकते? रात को अकेले बिस्तर पर चींटियां काटती हैं क्या?” जवाब में सुनील बस मुस्कुरा देते.
पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे सुनील बस घर के सबसे छोटे होकर ही रह गए थे. छोटी-छोटी बात पर मां पर निर्भर रहना, हर बात उनसे पूछ कर करना उनकी कमज़ोरी-सी बन गई थी. कभी-कभी बाबूजी मां पर बहुत ग़ुस्सा भी हो जाते थे, “तुमने तो इस लड़के को एकदम पैरासाइट बना दिया है. अभी तुम इसके लिए हर तरफ़ से ढाल बन कर खड़ी रहती हो. कल को बाहर निकलेगा, नौकरी-चाकरी करेगा तो अपने इस अपाहिजपने से दो कौड़ी का साबित होगा.”
लेकिन मां हमेशा अपनी स्नेहिल मुस्कान बिखेरती आश्‍वस्त-सी रहती, “मैं इसके लिए इतनी गुणी और समझदार बहू ढूंढ़कर लाऊंगी, जो मेरे बाद मुझसे भी बढ़कर इसकी देखभाल करेगी.”
जया की काफ़ी तारीफ़ सुनने के बाद और ख़ुद भी अपनी अनुभवी आंखों से बहुत जांच-परख कर ही उन्होंने उसे अपनी बहू के रूप में चुना था. शादी के दूसरे दिन ही उन्होंने जया को अलग बुलाकर अपने लाडले और नाज़ुक मिजाज़ बेटे की सारी ज़िम्मेदारी उस पर सौंप दी थी और जया ने भी कभी उन्हें निराश नहीं किया. पति के रूप में सुनील बेहद प्यार करने वाले, अपनी सामर्थ्य भर पत्नी की हिफाज़त और इज्ज़त करने वाले थे. ऐसे मासूम और भोले-भाले पति के लिए तो कोई भी पत्नी अपनी पूरी ज़िंदगी न्यौछावर कर के भी अपने आपको धन्य मानती. ऑफ़िस जाने से पहले तैयार होते समय जब सुनील जया से पूछता, “जया, ज़रा देखकर बताओ तो इस डार्क ब्राउन पैंट पर कौन-सी शर्ट ज़्यादा ठीक लगेगी?” तो वह मन ही मन निहाल होती हुई बनावटी ग़ुस्सा दिखाती, “अब तुम अपने कपड़े तो कम से कम अपने मन से पहना करो. आख़िर जेन्ट्स के कपड़ों के बारे में मुझे क्या मालूम?”
उसका रुमाल, पेन, गाड़ी की चाबी और ब्रीफकेस सब जया के भरोसे ही रहता. टाई तक वह जया के हाथ से ही बंधवाने के लिए किचन तक चला आता. हाथ का काम रोक कर जया झुंझलाती तो उसकी ख़ुुशामद करता, “अरे यार, इसी बहाने तुम कम से कम थोड़ी और देर तक मेरे इतने क़रीब आ जाती हो.”
ठीक यही आदत बच्चों ने भी पाल रखी थी. बेटी दिव्या इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी और बेटा शान्तनु नौवीं में था. लेकिन ये तीनों ही पूरी तरह उस पर निर्भर थे. खाने की मेज़ पर अगर जया एक-एक चीज़ डोंगे से निकाल कर उनकी प्लेट में न परोसे तो वे शायद अपने आप पूरा खाना भी न खा पाएं. कभी-कभी तो जया सचमुच बहुत खीझ जाती, “हद हो गई बावलेपन की. आख़िर मैं कहां तक तुम लोगों के पीछे-पीछे लगी रहूंगी.”
दिव्या की हालत देख कर उसे सचमुच कभी-कभी बहुत चिंता होती. इसकी उम्र की ही थी वह, जब ब्याह कर आई थी. पूरा घर कितनी कुशलता से सम्भाल लिया था उसने. लेकिन दिव्या है कि बस पढ़ाई-लिखाई और मौज-मस्ती के अलावा कोई शउर ही नहीं है इस लड़की में. उसे दालों और मसालों तक की पहचान नहीं थी अभी तक. जब भी वह दिव्या की हमउम्र लड़कियों के बारे में सुनती कि फलां लड़की तो खाना बना लेती है, फलां बुनाई-सिलाई कर लेती है, तो उसे बड़ी को़फ़्त होती. कितनी बार वह सोचती कि इस बार छुट्टियों में ज़रूर दिव्या से कुछ घर के काम करवाएगी. लेकिन हर बार अपनी नाज़ुक छुईमुई-सी बेटी को रसोई के कामों में धकेलने पर उसका मन कच्चा होने लगता. ठीक है, मेरी बेटी ऐसी ही सही. जब अपने ऊपर पड़ेगी तो वह भी सब सीख लेगी. अभी तो मैं हूं न सब कुछ करने के लिए.
सच बात तो यह है कि उसे अपने पति और बच्चों के लिए खटने में एक असीम तृप्ति मिलती थी. जब भी वह कहती, मैं तो काम करते-करते मरी जा रही हूं, तो मन ही मन वह कहीं बहुत गौरवान्वित होती रहती थी कि धन्य है वह औरत, जिसे अपनी गृहस्थी में दम मारने की भी फुर्सत न मिले. क़िस्मत वाली औरतों को ही यह सुख नसीब होता है.
हर रोज़ सुनील और बच्चों के बाहर निकल जाने के बाद पूरे घर की सफ़ाई की कवायद शुरू हो जाती थी. शान्ति तो नाम की कामवाली थी. बस, नपा-तुला झाडू-पोछे का काम निपटाकर फटाफट अधजले और चिकनाई लगे बर्तन धोए और भाग खड़ी हुई. सोफों पर कुशन आड़ा-तिरछा रखा हो, चद्दरें सलवटों से भरी हों- उसे किसी चीज़ से कोई मतलब नहीं.
दोनों बच्चों के कमरों में उनका सारा बिखरा सामान एक-एक कर यथास्थान सहेजना उसकी आदत बन चुकी थी. उसे पता है कि थोड़ी देर बाद बच्चे आएंगे और फिर सारा सामान पूरे कमरे में बिखेर देंगे. शान्ति अक्सर टोकती, “अरे मेम साब, अभी ये सनी बाबा का बैट-बॉल आप अलमारी में रख रही हैं, शाम को फिर सनी बाबा इसे निकाल कर ले जाएंगे और फिर यहीं कोने में पटक देंगे. उसे वहीं दरवाज़े के पीछे ही रहने दिया करो. क्यों रोज़-रोज़ की यह बेकार की उठा-पटक करती हो?”
वह शान्ति को तरेरती, “ऐसे तो फिर तू भी रोज़ झाडू-फटका मत किया कर. बर्तन भी मत धोया कर, क्योंकि उन्हें दोबारा तो गन्दा होना ही है. और वैसे भी तू जिस तरह के काम करके जाती है, वह तो मैं ही
जानती हूं.”
जया को शान्ति का काम ज़रा भी नहीं पसन्द था. लेकिन वह क्या करती? उसके मन का काम तो दुनिया की कोई भी औरत नहीं कर सकती. फिर रोज़-रोज़ काम वाली बदलने से अच्छा है, जो मिली है उसी से काम चलाया जाए. नर्सिंग होम जाने से पहले उसने शान्ति की काफ़ी ख़ुशामद की थी कि उसके न रहने पर वह दोनों टाइम का खाना किसी तरह बना दिया करे. उसे अलग से कुछ एडवांस पैसे भी उसने दे दिए थे. शान्ति ने पहले तो टाइम न होने की दलील दी, फिर एहसान जताते हुए बोली, “ठीक है, दस-बाहर दिन की बात है. अब मेरे रहते बच्चे भूखे रहें, यह भी तो मुझसे न देखा जाएगा.”
नर्सिंग होम में पड़ी-पड़ी जया दिन-रात बस अपने घर और बच्चों के बारे में ही सोचती रहती. वहां का कोई ज़िक्र छेड़ने पर भी उसे घबराहट होती थी. पता नहीं क्या सुनने को मिले. सुनील स्वयं ही दिन में आठ-दस बार उसे दिलासा दिया करता, “तुम घर की चिंता बिल्कुल मत किया करो, वहां सब ठीक-ठाक चल रहा है. बच्चे भी मज़े में हैं.” दिव्या और शान्तनु भी जब आते तो बस उसी को लेकर चिंतित रहते, “मम्मा, तुम बस अपना ख़याल रखो. हम सब वहां एकदम ठीक से रह रहे हैं.”
क्या खाक ठीक से होंगे उसके बिना? आने से पहले वह सारी ज़रूरी दवाओं के साथ फ़र्स्ट एड बॉक्स तैयार कर तीनों को बार-बार बता कर आई थी. शान्तनु को तो रोज़ ही कहीं न कहीं चोट लगती है. दिव्या को भी एलर्जी की शिकायत है. सुनील को बी.पी. की रेग्युलर दवा लेनी होती है. पता नहीं, सब कैसे चल रहा होगा?
बच्चों से हट कर अब जया का ध्यान अपने बगीचे पर चला गया. एक-एक पौधे की हिफाज़त वह किसी बच्चे से कम नहीं करती. जाड़ों के कितने फूल उसने अभी लगाए हैं. पैंजी, नेस्टर्शियम, डहेलिया, कैलीफोर्नियन, पॉपी, रंग-बिरंगे गुलाब और न जाने क्या-क्या. सर्दियों की हल्की पीली धूप में जब उसके लगाए फूल अपनी छटा बिखेरते हैं तो देखने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता है. बच्चों के साथ सुनील भी उनकी ख़ूूबसूरती के क़ायल हो जाते हैं, लेकिन मजाल है कभी किसी ने उसके फूलों को थोड़ा-सा पानी भी दिया हो, कभी एक तिनका भी तोड़ा हो. उन्हें क्या पता, पूरी-पूरी शाम कितनी मेहनत करती है जया इन फूलों के लिए. अब सारा बगीचा वीरान हो गया होगा. दस दिन तक पानी न मिल पाने पर क्या पौधे टिक पाएंगे? चलो अब इतना नुक़सान तो होना ही है. बस, वह एक बार पूरी तरह ठीक हो जाए फिर तो वह सब कुछ संभाल ही लेगी.
“जया उठो, घर आ गया.” अचानक सुनील के कोमल स्पर्श से वह चौंक उठी. गाड़ी अन्दर पोर्टिको में आ चुकी थी. हॉर्न की आवाज़ सुन कर दिव्या भागती हुई बाहर आ गई.
“वेलकम होम मम्मा.” वह चहकती हुई बोली. जया ने एक उड़ती हुई निगाह बगीचे पर डाली. अरे! सारे फूल उसी तरह लहलहा रहे थे, जैसा वह उन्हें छोड़ कर गई थी. उसका मन थोड़ा हल्का हो गया. शायद शान्ति ने पौधों को पानी देने का काम ले लिया होगा.
ड्रॉइंगरूम से होते हुए अपने बेडरूम तक के रास्ते में उसने हर तरफ़ एक सरसरी निगाह डाली. सभी चीज़ें तो उसी तरह करीने से चमक रही थीं. बेडरूम में भी हर एक चीज़ यथास्थान थी. न सुनील के कपड़े बेड पर पड़े थे और न ही उसकी फ़ाइलें ड्रेसिंग टेबल पर फैली थीं. बाथरूम भी एकदम चमक रहा था. एक-एक टाइल्स वह रोज़ अपने हाथों से घिसती थी, बेसिन और पॉट ब्रश से रगड़-रगड़कर चमकाती थी. उसके अलावा तो बाथरूम में कोई दूसरा हाथ भी नहीं लगाता था. फिर उसके बिना सब कुछ इतना साफ़-सुथरा? वह बेड पर आकर लेट गई तो सुनील उसे लिहाफ़ से ढंकता हुआ प्यार से मुस्कुराया, “अब तुम आ गई हो जया, सहेजो अपनी गृहस्थी.”
फिर उसके सिर पर हाथ फेरता हुआ क्षमायाचना भरे स्वर में बोला, “हम सबने बहुत कोशिश की जया कि तुम्हें कोई शिकायत का मौक़ा न दें, हम तीनों जी-जान से तुम्हारी गृहस्थी सम्भालते रहे, लेकिन तुम्हारे जैसा कुछ भी न हो सका. बस, अब तुम पूरी तरह ठीक हो जाओ और फिर सम्भालो सब कुछ. सच, पहली बार जाना कि हम सब कितने असहाय और अधूरे हैं तुम्हारे बिना.” कहते-कहते सुनील का स्वर भीग-सा गया.
सुनील क्षमायाचना कर रहा है या व्यंग्य, यह जया समझ नहीं पा रही थी. सब कुछ कितना अच्छे से तो सम्भाला है इन लोगों ने. तभी दिव्या चाय की ट्रे लेकर अन्दर आई, “लो मम्मा, मेरे हाथ की गरम-गरम चाय पीओ और ये सैंडविचेज़ मैंने बनाए हैं, खाकर देखो.”
जया एकटक अपनी बेटी को देखती रही. दस दिनों में ही एकदम से कितनी बड़ी लगने लगी थी उसकी बेटी. थोड़ी देर में शान्तनु हाथ में सब्ज़ी और फलों से भरी टोकरी लेकर अन्दर दाख़िल हुआ, “मम्मी, देखो मैं भी उसी कोने वाले बाबा से सब्ज़ी और फल ख़रीदता हूं, जिससे तुम ख़रीदती हो. एकदम ताज़ी और बाज़ार से एक रुपए सस्ती.”
टोकरी एक तरफ़ रख कर वह जया के पैरों से लिपटता हुआ बोला, “आपके बिना यह घर अधूरा-सा लगता था मम्मा. आप आ गई हैं, अब फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा.”
तभी बाहर से शान्ति की आवाज़ आई, “मेमसाब आ गई हैं क्या? अन्दर आ जाऊं मेमसाब?” और वह पर्दा उठा कर अन्दर आ गई. सुनील और बच्चे उठकर बाहर चले गए. जाते-जाते दिव्या शान्ति को हिदायत देती गई, ज़्यादा बक-बक करके मम्मा को तंग मत करना शान्ति, अभी उन्हें बहुत कमज़ोरी है.” ज़मीन पर धप् से बैठती हुई शान्ति बोली, “अरे मैं भी जानू हूं बिटिया, एत्ता बड़ा आपरेसन हुआ है, कमज़ोरी तो होगी ही.” शान्ति की ओर एहसानभरी निगाहों से देखती हुई जया बोली, “अभी एक ह़फ़्ता रसोई का काम और देख लेना शान्ति. सचमुच मुझे बहुत कमज़ोरी लग रही है. मैं तुम्हारा हिसाब ठीक से कर दूंगी.”
“अरे काहे का हिसाब मेमसाब? मुझसे तो किसी ने कुछ करवाया ही नहीं. दिव्या बिटिया ने कहा कि बस, मैं आटा गूंथ दिया करूं और सब्ज़ियां काट दिया करूं, सो मैंने तो बस इतना ही किया.”
“और खाना कौन बनाता है?” जया के आश्‍चर्य का ठिकाना न था.
“तुम्हारी बिटिया और साहब मिल कर बनाते हैं मेमसाब. और क्या कोई बाहर वाला आकर बनाता है? हमसे तो जितना कहा, उतना कर दिया. बाकी मेेमसाब आपके घर के परानी सब बहुत लायक हैं. दिव्या बिटिया तो जिस घर में जाएगी, समझो उजाला कर देगी. आपकी ही सारी आदतें पाई हैं बिटिया ने. पूरा दिन आपकी तरह खटर-पटर करती रहती है. सनी बाबा अपना कमरा ख़ुद ही साफ़ करते हैं. बाहर से सौदा लाने का ज़िम्मा भी तो उन्हीं का है.”
जया की बंद आंखें देखकर शान्ति का प्रताप रूका, “अच्छा अब आप थोड़ा आराम कर लो मेमसाब. मैं भी जाकर बर्तन निपटा लूं.”
जया ने अपना मुंह लिहाफ़ के अन्दर कर लिया. उसके आंसुओं से तकिया भीगने लगा था. उसके बिना भी उसके पति और बच्चों ने उसका घर-संसार इतने करीने से संवारा, यह उसके लिए कितने संतोष और सुख की बात थी. फिर उसके मन में कहीं कुछ दरक-सा क्यों रहा था?

 

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ह्यूमन ट्रैफिकिंग…शारीरिक शोषण और देह व्यापार मानव तस्करी का अमानवीय व्यापार…! ( Human Trafficking )

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न सपनों की ये दुनिया है, न ख़्वाबों का आसमान… अंधे हैं तमाम रास्ते यहां, अंधा है ये जहां… रूह को बेचकर हर बात होती है यहां इशारों में, जिस्मों को ख़रीदा जाता है मात्र चंद हज़ारों में. किससे शिकवा करें, किससे करें गिला, कुछ अजीब-से हैं इन गलियों के निशान… रिश्ते ढूंढ़ने पड़ते हैं जहां इश्तेहारों में, इंसान भी बिकते हैं यहां बाज़ारों में…

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ह्यूमन ट्रैफिकिंग (Human Trafficking) यानी मानव तस्कारी कहने को तो ग़ैरक़ानूनी है, लेकिन फिर भी यह हमारे समाज की गंभीर समस्या बनी हुई है. शारीरिक शोषण और देह व्यापार से लेकर बंधुआ मज़दूरी तक के लिए ह्यूमन ट्रैफिकिंग की जाती है.

–  ड्रग्स और हथियारों के बाद ह्यूमन ट्रैफिकिंग दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑर्गनाइज़्ड क्राइम है.

– 80% मानव तस्करी जिस्मफ़रोशी के लिए होती है.

–  एशिया की अगर बात करें, तो भारत इस तरह के अपराध का गढ़ माना जाता है.

–  ऐसे में हमारे लिए यह सोचने का विषय है कि किस तरह से हमें इस समस्या से निपटना है.

–  मानव तस्करी में अधिकांश बच्चे बेहद ग़रीब इलाकों के होते हैं.

–  मानव तस्करी में सबसे ज़्यादा बच्चियां भारत के पूर्वी इलाकों के अंदरूनी गांवों से आती हैं.

– अत्यधिक ग़रीबी, शिक्षा की कमी और सरकारी नीतियों का ठीक से लागू न होना ही बच्चियों को मानव तस्करी का शिकार बनने की सबसे बड़ी वजह बनता है.

– इस कड़ी में लोकल एजेंट्स बड़ी भूमिका निभाते हैं.

–  ये एजेंट गांवों के बेहद ग़रीब परिवारों की कम उम्र की बच्चियों पर नज़र रखकर उनके परिवार को शहर में अच्छी नौकरी के नाम पर झांसा देते हैं.

– ये एजेंट इन बच्चियों को घरेलू नौकर उपलब्ध करानेवाली संस्थाओं को बेच देते हैं. आगे चलकर ये संस्थाएं और अधिक दामों में इन बच्चियों को घरों में नौकर के रूप में बेचकर मुनाफ़ा कमाती हैं.

– ग़रीब परिवार व गांव-कस्बों की लड़कियों व उनके परिवारों को बहला-फुसलाकर, बड़े सपने दिखाकर या शहर में अच्छी नौकरी का झांसा देकर बड़े दामों में बेच दिया जाता है या घरेलू नौकर बना दिया जाता है, जहां उनका अन्य तरह से और भी शोषण किया जाता है.

– नई दिल्ली के पश्‍चिमी इलाकों में घरेलू नौकर उपलब्ध करानेवाली लगभग 5000 एजेंसियां मानव तस्करी के भरोसे ही फल-फूल रही हैं. इनके ज़रिए अधिकतर छोटी बच्चियों को ही बेचा जाता है, जहां उन्हें घरों में 16 घंटों तक काम करना पड़ता है.

– साथ ही वहां न स़िर्फ उनके साथ मार-पीट की जाती है, बल्कि अन्य तरह के शारीरिक व मानसिक शोषण का भी वे शिकार होती हैं.

–  न स़िर्फ घरेलू नौकर, बल्कि जिस्मफ़रोशी के जाल में भी ये बच्चियां फंस जाती हैं और हर स्तर व हर तरह से इनका शोषण होने का क्रम जारी रहता है.

एक नज़र आंकड़ों पर…

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के नए आंकड़ों के अनुसार ट्रैफिकिंग में यह दूसरा सबसे बड़ा अपराध है, जो पिछले 10 सालों में 14 गुणा बढ़ा है और वर्ष 2014 में 65% तक बढ़ा है.

– लड़कियां और महिलाएं ट्रैफिकिंग के निशाने पर रहती हैं, जो पिछले दस सालों में देशभर के ह्यूमन ट्रैफिकिंग केसेस का 76% है.

–  ह्यूमन ट्रैफिकिंग के अंतर्गत ही अन्य जो केसेस रजिस्टर होते हैं, उनमें वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों को बेचना, विदेशों से लड़कियों को ख़रीदना और वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों की ख़रीद-फरोख़्त आदि आते हैं.

–  यदि भारत की बात की जाए, तो ह्यूमन ट्रैफिकिंग का जाल लगभग हर राज्य में फैला हुआ है. इसमें तमिलनाडु 9, 701 केसेस के साथ सबसे ऊपर है. उसके बाद 5861 केसेस के साथ आंध्र प्रदेश, 5443 केसेस के साथ कर्नाटक, 4190 केसेस के साथ पश्‍चिम बंगाल और 3628 केसेस के साथ महाराष्ट्र का नंबर आता है.

– ये 5 राज्य ह्यूमन ट्रैफिकिंग के मुख्य स्रोत और गढ़ भी हैं, जहां लड़कियों को रेड लाइट एरिया के लिए ख़रीदा व बेचा जाता है. ह्यूमन ट्रैफिकिंग के रिपोर्टेड केसेस में 70% इन्हीं राज्यों से आते हैं.

–  यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक़ तमिलनाडु युवा लड़कियों की तस्करी मुंबई व दिल्ली के रेड लाइट इलाक़ों में करता है.

–  हालांकि पिछले कुछ समय से तमिलनाडु में इस तरह के मामलों की कमी देखी गई है, जबकि पश्‍चिम बंगाल में ये बढ़ रहे हैं.

–  वर्ष 2009 से लेकर 2014 के बीच ह्यूमन ट्रैफिकिंग के मामलों में 92% बढ़ोत्तरी हुई है.

–  इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि यह बहुत अधिक मुना़फे का धंधा है, ज़्यादा-से-ज़्यादा पैसा कमाने का लालच इस तरह के अपराधों के फलने-फूलने की बड़ी वजह बन रहा है.

– वर्ष 2014 में देशभर में ह्यूमन ट्रैफिकिंग के रजिस्टर्ड केसेस में 39% की बढ़ोत्तरी देखी गई. जैसा कि पहले भी हमने बताया है कि पिछले 6 वर्षों में 92% की बढ़ोत्तरी देखी गई है, जबकि वर्ष 2005 से लेकर 2009 के बीच इस तरह के मामलों में 55% तक की गिरावट देखी गई थी.

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क़ानूनी प्रावधान

इम्मॉरल ट्रैफिकिंग प्रिवेंशन एक्ट (आईटीपीए) के अनुसार अगर व्यापार के इरादे से ह्यूमन ट्रैफिकिंग होती है, तो 7 साल से लेकर उम्र कैद तक की सज़ा हो सकती है. इसी तरह से बंधुआ मंज़दूरी से लेकर चाइल्ड लेबर तक के लिए विभिन्न क़ानून व सज़ा का प्रावधान है. लेकिन सबसे बड़ी समस्या क़ानून को क्रियान्वित करने की ही है.

–  बात अगर सज़ा की की जाए, तो पिछले 5 सालों में ह्यूमन ट्रैफिकिंग के फाइल्ड केसेस में 23% में दोष सिद्ध हुआ.
–  इस मामले में लगभग 45,375 लोगों की गिरफ़्तारी हुई और 10,134 लोगों को दोषी क़रार दिया गया, जिसमें जुर्माने से लेकर जेल तक की सज़ा दी गई.

– पिछले 5 सालों में आंध्र प्रदेश में सर्वाधिक गिरफ़्तारियां हुईं, लगभग 7, 450 के क़रीब. महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर आता है, उसके बाद कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्‍चिम बंगाल हैं.

–  इन बढ़ते मामलों की एक वजह यह भी हो सकती है कि अब मामले अधिक दर्ज होने लगे हैं.

प्रशासनिक प्रयास

–  केंद्र सरकार विभिन्न राज्यों को फंड्स प्रदान करती है और वेब पोर्टल भी लॉन्च किया गया है, ताकि मानव तस्करी का यह अमानवीय व्यापार रुक सके या कम हो सके.

–  इसके अलावा महिला व बाल विकास विभाग ने भी पीड़ितों के बचाव व पुनर्वसन के लिए अपने प्रयास तेज़ किए हैं.

एनजीओ की भूमिका

कैथरिन क्लार्क, फाउंडर और सीईओ, ए सेलिब्रेशन ऑफ वुमेन: यह संस्था महिलाओं की विभिन्न समस्याओं पर काम करती है. कैथरिन क्लार्क कनाडा में रहती हैं, लेकिन संस्था के विभिन्न सदस्य विभिन्न देशों में काम करते हैं. कैथरिन के अनुसार ह्यूमन ट्रैफिकिंग न स़िर्फ विकासशील, बल्कि विकसित देशों की भी बड़ी समस्या है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस समस्या से हम किस तरह से जूझते हैं और पुनर्वसन के लिए किस तरह की योजनाएं हैं हमारे पास, क्योंकि भले ही हम लड़कियों को या बच्चों को इस कड़ी से बाहर निकाल लें, लेकिन सही तरी़के से पुनर्वसन के अभाव में वे फिर से इस कड़ी का हिस्सा बन जाते हैं. हमारी संस्था इस तरह के लोगों के लिए सेलिब्रेशन हाउसेस बनाती है और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने की दिशा में काम करती है. बच्चों को भी मानसिक रूप से क्लीन किया जाता है, उनकी काउंसलिंग होती है, ताकि उनके मन से वो ख़ौफ़ व बुरी यादें निकल सकें. इसी तरह के काम कई देशों में किए जाते हैं, जिन्हें काफ़ी सफलता भी मिली है.

ए सेलिब्रेशन ऑफ वुमेन से जुड़ी मितिका श्रीवास्तव भारत में एडवायज़र टू एशिया के तौर पर काम करती हैं. ह्यूमन ट्रैफिकिंग के संदर्भ में उन्होंने काफ़ी जानकारी दी है-

– दरअसल, ह्यूमन ट्रैफिकिंग को अक्सर सेक्स ट्रैफिकिंग ही समझ लिया जाता है, जबकि ह्यूमन ट्रैफिकिंग काफ़ी विस्तृत है और सेक्स ट्रैफिकिंग ह्यूमन ट्रैफिकिंग का ही हिस्सा है.

– सस्ते लेबर के चक्कर में काफ़ी बड़े पैमाने पर मानव तस्करी की जाती है.

– बच्चे इसका शिकार जल्दी होते हैं, क्योंकि उनका शोषण करना आसान होता है.

– सेक्स ट्रैफिकिंग भी बहुत बड़े पैमाने पर की जाती है, जिसमें कम उम्र के बच्चों और ख़ासतौर से लड़कियों को निशाना बनाया जाता है.

– भारत में भी कई संस्थाएं हैं, जो सेक्स ट्रैफिकिंग से पीड़ित लोगों के लिए काम करती हैं, इसमें प्रमुख है- डॉ. सुनीता कृष्णन की प्रज्वला नाम की एनजीओ. डॉ. सुनीता ख़ुद एक रेप विक्टिम रह चुकी हैं और उनकी यह संस्था तस्करी की शिकार महिलाओं और बच्चियों के पुनर्वसन का काम करती है. यह संस्था पीड़ितों की शिक्षा व उनमें से जो एचआईवी से संक्रमित होते हैं, उन बच्चों की भी सहायता करती है.  प्रज्वला जिस्मफ़रोशी में लिप्त महिलाओं के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए भी काम करती है, ताकि वे एक बेहतर जीवन जी सकें. सुनीता कहती हैं कि चकला घरों से महिलाओं को बचाकर लाना बेहद मुश्किल काम होता है. इस दौरान अक्सर उन पर अटैक भी किया गया. इस वजह से वो अपने दाहिने कान से सुनने की क्षमता तक खो बैठीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और न हारेंगी.

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केस स्टडी….

आंध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले के छोटे-से गांव के ग़रीब परिवार में जन्मी भवानी अपने पैरेंट्स के साथ ही मज़दूरी का काम करती थी. भवानी के परिवार में कुल 11 सदस्य थे, जिनमें 6 लड़कियां और 3 लड़के थे. भवानी की मां के किसी रिश्तेदार के कहने पर 12 वर्षीया भवानी की शादी दिल्ली में रहनेवाले अमर नाम के एक व्यक्ति से करवा दी गई. भवानी के अनुसार, “हालांकि मैं उस व़क्त बहुत छोटी थी, लेकिन फिर भी मैं इस बात से बेहद ख़ुश थी, क्योंकि शादी का पूरा ख़र्च भी उन्हीं लोगों ने उठाया था और मेरे माता-पिता को काफ़ी पैसा
भी दिया था.”शादी के बाद भवानी, उसका रिश्तेदार और अमर दिल्ली के लिए रवाना हुए, जहां पहुंचकर अमर ने भवानी को कुछ समय तक उसके रिश्तेदार के साथ रहने को कहा, ताकि वो उनके रहने का बंदोबस्त कर सके. भवानी के रिश्तेदार का घर दरअसल दिल्ली के रेड लाइट एरिया- जीबी रोड पर स्थित एक वेश्यालय था और भवानी की परीक्षा अगले ही दिन से शुरू हो गई थी, जहां उसे ग्राहकों की देखभाल करने को कहा गया. उस व़क्त उसे एहसास हुआ कि दरअसल उसे 45,000 में बेचा गया था. वहां मौजूद अन्य लड़कियों से बातचीत करने पर पता चला कि उसके पति अमर ने उस एक साल में 12 शादियां की थीं.

शुरुआती विरोध का नतीजा यह हुआ कि भवानी को काफ़ी पीटा गया व भूखा रखा गया. 7 दिनों तक संघर्ष के बाद भवानी ने हथियार डाल दिए. 5 एबॉर्शन्स और ढेर सारे सेक्सुअली ट्रान्समीटेड इंफेक्शन्स के बाद 17 साल की आयु में भवानी को रेस्न्यू किया गया और तब वो एचआईवी पॉज़िटिव थी.

कभी काम दिलाने के नाम पर, कभी फिल्मों या मॉडलिंग में काम दिलाने के लालच में, तो कभी शादी के नाम पर लाखों लड़कियों को
जिस्मफ़रोशी के धंधे में धोखे से व जबरन धकेल दिया जाता है.

प्रज्वला की स्थापना का उद्देश्य था उन महिलाओं और बच्चों की मदद करना, जो तस्करी का शिकार होते हैं. ऐसे में यह संस्था तस्करी विरोधी यानी एंटी ट्रैफिकिंग के रूप में उभरी है, जो महिलाओं और बच्चों को वेश्यावृत्ति में जाने से रोकने में विश्‍वास करती है, क्योंकि यह सेक्सुअल स्लेवरी का सबसे भयावह रूप होता है.

 

 

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पुनर्वसन

ट्रैफिकिंग का अर्थ होता है बहुत-से मानवाधिकारों का उल्लंघन, ऐसे में उनका पुनर्वसन बहुत ही संवदेनशील मुद्दा होता है. चूंकि पीड़ित न स़िर्फ शारीरिक, बल्कि बहुत-से मानसिक शोषण और प्रताड़ना से गुज़रते हैं, इसके अलावा उन्हें ढेरों यौन संक्रमण भी हो जाते हैं. सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि परिवार भी इन्हें अपनाने से कतराते हैं, क्योंकि इसे वो समाज में बदनामी से जोड़कर देखते हैं, वहीं दूसरी ओर एक संभावना यह भी होती है कि परिवार ख़ुद ही इस धंधे में लिप्त होता है. ऐसे में सबसे ज़्यादा ज़रूरत इस बात की होती है कि पीड़ित को सुरक्षा मिले. मानसिक रूप से भी उसे सामान्य किया जाए, उसे बेहतर भविष्य की ओर आशान्वित किया जाए, तब कहीं जाकर पूरी तरह से कामयाबी मिल पाएगी.

पुनर्वसन में एक और बड़ी समस्या यह भी होती है कि पीड़ित हर स्तर पर इतना अधिक शोषण का शिकार हो चुका होता है कि उसका विश्‍वास सभी पर से उठ जाता है, उसे रेस्न्यू की प्रक्रिया पर भी अधिक भरोसा नहीं रहता और न ही वो अधिक पॉज़िटिव होता है अपने भविष्य के प्रति. उसमें फिर से आशा जगाना बेहद चुनौतीभरा काम है. यही वजह है कि जहां पहले प्रज्वला जैसी संस्थाएं रेस्न्यू का काम करती थीं, वहीं वे अब पुलिस की अधिक मदद लेती हैं और अधिक ध्यान पुनर्वसन की प्रक्रिया पर देती हैं, ताकि पीड़ितों को पूरी तरह से इससे बाहर निकाला जा सके.

– गीता शर्मा