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कानपुर में पुलिस टीम पर हमले के मुख्‍य आरोपी हिस्‍ट्रीशीटर विकास दुबे के एनकाउंटर में मारे जाने के बाद से ही उनकी पत्नी ऋचा दुबे के बारे में कई तरह की बातें की जा रही थीं कि विकास का रिमोट उन्हीं के हाथों में था और वो क्राइम में उन्हें सपोर्ट करती थीं… वसूली या अपराध से विकास की जो भी कमाई होती थी, उसका पूरा एकाउंट ऋचा के पास ही होता था… और भी कई तरह की बातें की जा रही थीं, लेकिन ऋचा ने अब मीडिया से बात करके विकास के बारे में कई सच बताए हैं और अपनी निजी जिंदगी की भी कई बातें साझा की.

विकास के बारे में बहुत कुछ नहीं जानती थी

Richa Dubey


ऋचा ने कहा कि विकास के किस पुलिस अधिकारी, अफसर या राजनेताओं से संबंध थे, इसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी. ऋचा ने बताया कि वो गांव में बहुत कम जाती थीं, जब उन पर गांव आने का दवाब बनाया जाता था केवल तभी वह पहुंचती थीं. विकास की ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनके बारे में वह नहीं जानती थीं, ”हमारे बीच संबंध सिर्फ इतने थे कि विकास अपने बच्चों की परवरिश के लिए पैसे देते थे और मैं सिर्फ बच्चों के लिए जी रही थी.” 

मुझे उस रात वाली घटना की कोई जानकारी नहीं थी

Vikas Dubey


जिस रात पुलिस के साथ मुठभेड़ हुई और जिसमें 8 पुलिस कर्मी मारे गए और कई घायल हो गए, कहा जा रहा था कि विकास की पत्नी को इसकी जानकारी पहले सी ही थी, लेकिन ऋचा ने इस बात से साफ इंकार कर दिया, उनका कहना है, ”अगर मुझे इसकी कोई भी जानकारी होती, तो मैं ये घटना होने ही न देती. घटना वाली रात दो बजे विकास का फोन आया था. उसने फोन पर कहा कि गांव में कुछ झगड़ा हो गया है. तुम बच्चों को लेकर निकल जाओ. इस पर मैं नाराज़ भी हुई कि मैं तुम्हें समझाकर थक चुकी हूं. तुमने मेरा जीवन बर्बाद कर दिया तो उसने गालियां देनी शुरू कर दी, इसके बाद मैंने गुस्से में फोन पटक दिया था. मैं इतना डर गई थी कि जिस हालत में थी, उसी हालत में बच्चों को लेकर निकल गई. घबराहट में मैं अपना फोन लेना भी भूल गई. अगले दिन बस स्टैंड पर जब मैंने टीवी देखा तो पता चला कि विकास ने आठ पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी है और कई लोग घायल हो गए हैं.” ऋचा कहती हैं कि विकास उन्हें कभी कुछ नहीं बताते थे. ना उनसे कुछ डिस्कस करते थे. बस वो खर्चा पानी भेजते थे.

बहुत मुश्किल से गुजारा एक हफ्ता

रिचा के मुताबिक वह अपने दोनों बच्चों के साथ लखनऊ के एक ऐसी बिल्डिंग के छत पर छिपकर एक सप्ताह तक रहीं, जो अंडर कंस्ट्रक्शन थी. रात के समय वह बच्चों को लेकर छत पर चली जाती थीं और वहीं रात बिताती थीं. अलग-अलग होटलों में जाकर उन्होंने खाना खाया और किसी तरह एक सप्ताह समय काटा.


गाली गलौज करता था विकास, घर का माहौल भी ठीक नहीं था

Vikas Dubey and wife Richa Dubey


ऋचा दुबे ने बताया कि विकास उनके बड़े भाई का दोस्त था. उनकी मुलाकात घर पर हुई थी. विकास उनके घर आता-जाता था. इस दौरान उनकी दोस्ती विकास से हो गई और लगा कि वो दोनों साथ रह सकते हैं. और फिर 23 साल पहले उन्होंने शादी कर ली, उन्होंने कोर्ट मैरिज की थी. ”लेकिन शादी के कुछ दिनों बाद ही मुझे लगने लगा कि गांव का माहौल अच्छा नहीं था. विकास आए दिन लड़ाई झगड़ा करता था. जब मैं विकास को रोकने की कोशिश करती थी, तो वो गाली गलौज करने लगता था. टॉर्चर करता था. इस वजह से 1998 में मैं अपनी मां के घर रहने चली गई थी. इसके बाद 7 साल तक वहीं रही. इस दौरान विकास दुबे बच्चों से मिलने के लिए वहां आता जाता था. मैं भी गांव में जाती थी.”

बच्चों को बदमाश की औलाद नहीं कहलाना था
”मुझे बिकरू गांव स्थित अपनी ससुराल का माहौल बिल्कुल पसंद नहीं था. आमतौर पर लोग कहते हैं चोर का बच्चा चोर होता है और बदमाश का बच्चा बदमाश. मैं नहीं चाहती थी कि मेरे बच्चे बदमाश के बच्चे कहलाएं. मैं अपने बच्चों को अपराध की दुनिया से दूर रखना चाहती थी, इसलिए 2008 में लखनऊ आकर रहने लगी. मैं बिकरू फोर्सफुली ही जाती थी. सिर्फ बच्चों को मिलवाने लेकर वहां जाती थी. सुबह जाती थी और शाम को वापस आ जाती थी. मैं बच्चों को उस माहौल से दूर रखना चाहती थी, उन्हें काबिल बनाना चाहती थी. मेरा एक बेटा मेडिकल में है. दूसरे ने भी अच्छे नंबर हासिल किए हैं. मेरे जीवन का केवल एक ही उद्देश्य था, बच्चे.”
ऋचा ने बताया कि विकास एक अच्छा पति और पिता था. वह चाहता था कि उसके बच्चे पढ़-लिख कर काबिल बनें, लेकिन वह खुद अपराध की दुनिया से बाहर नहीं निकलना चाहता था. ज्यादा समझाने पर मारपीट करता था.

पीड़ितों से मांगी माफी, कहा पता होता तो खुद विकास को गोली मार देती

ऋचा ने बिकरू एनकाउंटर पर बोलते हुए कहा, ”मैं हाथ जोड़कर उन सबसे माफी मांगती हूं. शहीद हुए आठ पुलिसकर्मियों के परिवार व घायल सभी जवानों से और उनके घर वालों से मैं क्षमा मांग रही हूं. इस कृत्य से उनका कोई लेना-देना नहीं था. पुलिस हमारी रक्षक होती है, नहीं होना चाहिए था ऐसा. मैं बस सब से हाथ जोड़कर यही कहना चाहती हूं कि विकास दुबे ने जो किया, उसकी सजा मुझे या मेरे परिवार को ना दी जाए. अब हम लोग चैन से जीना चाहते हैं. मुझे ज़रा भी अंदाजा होता कि विकास इस तरह की हरकत करेगा तो मैं उसे खुद गोली मार देती. इससे सिर्फ एक ही विधवा होती न, उसने तो 8 लोगों को विधवा बना दिया.”

आसान नहीं होता अपनों को यूं अलविदा कहना, भावनाएँ कहती हैं कि काश कुछ और समय साथ बीत जाता लेकिन जीवन का सबसे बड़ा सच यही है कि शरीर एक न एक दिन मिटता ही है.

जब अपने साथ छोड़ जाते हैं तब लगता है कि काश कोई ऐसा हो जो थोड़ा सहारा दे, थोड़ी मदद कर दे ताकि अपने प्रियजन को दुःख की उस घड़ी में जी भर के देख लें, लेकिन अक्सर ज़िंदगी की कड़वी सच्चाइयों से सामना होने लगता है और दुःख की उस घड़ी में भी जुटना पड़ता है अंतिम यात्रा, अंतिम संस्कार की तैयारियों में.
ऐसे में दिल में यही भावना होती है कि शोक मनायें, अपनों को सम्भालें या फिर इस सच्चाई की कठोरता को स्वीकारते हुए जुट जाएँ तैयारियों में… लेकिन कोई है जो इस समय भी आपकी मदद करने को तैयार है, आपके काम की ज़िम्मेदारी को वो खुद लेकर आपको पूरा समय देते हैं कि आप अपनों के साथ इस दुःख दर्द को बाँट सकें और खुद को संभाल सकें.
जी हां, डॉक्टर रमणिक पारेख और डॉक्टर ज्योति पारेख अंतिम संस्कार सेवा के कार्य में जुटे हैं अपनी पूरी टीम के साथ ताकि आपको इस दुःख की घड़ी में संभलने का मौक़ा मिले और अपनी भावनाओं को पूरी तरह से आप जी सकें.

इसी संदर्भ में हमने बात की डॉ. पारेख से, तो उन्होंने अपने इस समाजिक काम के विषय में विस्तार से चर्चा की.
दरअसल, मेरा खुद का कड़वा अनुभव था जिस वक़्त मेरे पिताजी की मृत्यु हुई थी, हुआ यूँ कि उस वक़्त उनकी बॉडी व पूरी प्रक्रिया में उन्हें जो सम्मान मिलना चाहिए था वो अस्पताल प्रशासन की ओर से नहीं मिला, मेरा दिल बैठ गया था यह सब देख के और उसके बाद ही मेरे ज़ेहन में इस काम का ख़याल आया.
मुझे यही महसूस हुआ कि जिस वक़्त हम अपनों को खोने के गहरे दुःख में होते हैं उसी वक़्त हमें उनके अंतिम संस्कार से जुड़ी पूरी प्रक्रिया व काम में जुटना पड़ता है, जो बेहद मुश्किल होता है,क्योंकि ये भावनात्मक समय होता है, हमें लगता है कोई सम्भाल ले हमें, कोई दुःख को बाँट ले, लेकिन हमें भावनाओं को दरकिनार कर समाजिक व पारिवारिक ज़िम्मेदारियों में जुटना पड़ता है और यह बेहद तकलीफ़ देह होता है. ऐसे में मुझे लगता है कि किसी के काम आना सबसे बड़ी सेवा है.

हम अस्पताल से लेकर अंतिम क्रिया तक का पूरा बंदोबस्त करते हैं. सारी सामग्री मुहैया कराते हैं ताकि जो परिवार दुःख में है वो अपनी भावनाओं को हल्का कर सके बजाय इस काम में जुटने के. हमारी 20 लोगों की टीम है और मुंबई शहर में हम अब तक लगभग 13500 लोगों की अंतिम यात्रा को सम्माजनक तौर पे पूरा करवा चुके हैं और अब तक किसी भी परिवार की ओर से कोई शिकायत नहीं मिली. हमारी पूरी टीम बेहद विनम्र है और पूरी ईमानदारी से अपना काम करती है.

जहां तक कोरोना का सवाल है तो उसकी गाइडलाइन्स अलग हैं तो वो हमारे दायरे में नहीं आता. लेकिन कोरोना के समय भी रोज़ाना 5-7 अंतिम क्रियाएँ हम करवा रहे हैं क्योंकि यह मुश्किल दौर है और ऐसे में परिवार जनों को अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है इसलिए हम उनकी मदद करते हैं ताकि उनका दुःख कुछ हद तक हम बाँट सकें.
हमारी फोन सेवा भी चौबीस घंटे चलती है, कोई भी ज़रूरतमंद हमें इन नम्बर्स पर फोन कर सकता है- +91 86553 55591, +91 86553 55592, +91 22-3355500, +91 92233 55511

हमें बेहद सुकून मिलता है कि इस तरह के दुःख दर्द में हम लोगों को सहयोग कर पाते हैं और उनकी ज़िम्मेदारी बांट सकते हैं.


बात इकोनॉमिक पार्टिसिपेशन यानी आर्थिक रूप से भागीदारी की हो, फाइनेंशियल प्लानिंग की हो या फिर फाइनेंस से जुड़े अन्य मुद्दे, महिलाओं में वित्तीय जागरूकता की कमी साफ़ नज़र आती है. किसी भी देश व समाज के विकास के लिए यह ज़रूरी है कि फाइनेंस को लेकर जो लिंगभेद है, वह दूर हो. आख़िर क्या वजह है कि महिलाओं में वित्तीय जागरूकता की इतनी कमी है, जानने का प्रयास करते हैं.

–  रिसर्च बताते हैं कि विश्‍व में मात्र 20% महिलाओं को ही फाइनेंशियल कॉन्सेप्ट की समझ है.

–  इसकी कई वजहें हैं और उनमें से एक वजह यह भी है कि ख़ुद महिलाएं ही इसमें दिलचस्पी नहीं लेतीं.

–  दरअसल, बचपन से हमारे समाज में महिलाओं को घरेलू कामों में दक्ष बनाने पर अधिक ज़ोर दिया जाता है बजाय अन्य गुणों के विकास पर.

–  इस वजह से महिलाओं की मानसिकता ऐसी बन जाती है कि वित्तीय मामलों की समझ व उन पर निर्णय लेना पुरुषों का काम है.

–  घर में भी बचपन से वो देखती हैं कि पिता या भाई ही इस तरह के ़फैसले लेते हैं, मां का हस्तक्षेप ना के बराबर होता है और यहां तक कि उनसे राय भी नहीं ली जाती, तो वो भी अपना रोल उसी के अनुसार समझ लेती हैं.

–  भारत में ट्रेड एसोसिएशन द्वारा किए गए सर्वे भी इस ओर साफ़-साफ़ इशारा करते हैं कि स्वयं महिलाएं भी वित्तीय मामलों में सेकंडरी रोल प्ले करके ख़ुश व संतुष्ट रहती हैं. अपने पिता, भाई या पति से ही वो उम्मीद करती हैं कि फाइनेंस व पैसों के मामले वही हैंडल करें.

–  इस रिपोर्ट में वो कारण भी सामने आए, जो भारत में महिलाओं में फाइनेंशियल लिट्रसी यानी वित्तीय साक्षरता को प्रभावित करते हैं.

–  सबसे पहली वजह है- आत्मनिर्भरता व ख़ासतौर से आर्थिक आत्मनिर्भरता की कमी. पैसों के लिए आज भी अधिकांश महिलाएं अपने पति पर ही निर्भर रहती हैं, जिससे उन्हें फाइनेंशियल आत्मनिर्भरता का ख़्याल तक नहीं आता.

–  सामाजिक व पारिवारिक संरचना भी एक बड़ी वजह है. हमारे समाज व परिवार में पुरुष को ही घर का मुखिया माना जाता है. यही वजह है कि पैसों से जुड़े सारे मामलों में उनकी ही रज़ामंदी होती है. चाहे घर ख़रीदना हो, बेचना हो, लोन लेना हो, कहीं घूमने जाना हो- सब वो ही मैनेज करते हैं. महिलाएं न तो इसमें दिलचस्पी लेती हैं और न ही उन्हें इतने अधिकार हैं कि आर्थिक मसलों पर वो आगे बढ़कर बड़े फैसले ले सकें.

–  शैक्षिक योग्यता आज भी बड़ा कारण है. महिलाओं को स्पेशलाइज़्ड कोर्सेस कम कराए जाते हैं. उनकी परवरिश शादी को ध्यान में रखकर अधिक की जाती है बजाय करियर के. ऐसे में उनकी एजुकेशन का मतलब होता है- होम साइंस, ग्रैजुएशन, फैशन डिज़ाइनिंग, कुकिंग आदि…

–  आत्मविश्‍वास की कमी के चलते भी महिलाएं आर्थिक मामलों में कमज़ोर रहती हैं. उन्हें डर लगता है कि कहीं उनका निर्णय ग़लत न साबित हो जाए. ऐसे में घर व आस-पड़ोस के लोग भी उसे ताने मारने से बाज़ नहीं आएंगे.

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–  इन सब कारणों के अलावा एक अन्य वजह यह भी है कि उनके पास इतने पैसे ही नहीं होते कि वो कोई निर्णय ले सकें. अगर बाहर काम करनेवाली महिलाओं की बात छोड़ दें, तो अधिकांश हाउसवाइफ का अपना अलग अकाउंट तक नहीं होता. पति के नाम पर या फिर जॉइंट अकाउंट होता है, जिसमें पैसों व ख़र्च के लिए वो पार्टनर पर ही निर्भर रहती हैं. ऐसे में उनकी पहुंच ही नहीं होती इतनी कि वो आर्थिक मामलों के बारे में कुछ सोच सकें.

– यही नहीं, नौकरीपेशा महिलाएं भी अपनी ही सैलरी या कमाए हुए पैसों से संबंधित निर्णय अकेले नहीं ले पातीं. उन्हें यह छूट ही नहीं है. वो घरवालों से व पार्टनर से पूछे बिना कोई कदम नहीं उठातीं.

– कई बार मात्र अपने पार्टनर के ईगो को संतुष्ट करने के लिए व घर में शांति बनाए रखने के लिए भी महिलाएं इस तरह के निर्णय लेने से हिचकिचाती हैं.

– ज़्यादातर महिलाएं यही कहती हैं कि पति इस बारे में हमसे बेहतर जानते हैं और इसीलिए उनका निर्णय ही फाइनल व बेस्ट होगा.

– ऐसे में यह भी संभव होता है कि महिलाओं को आर्थिक मुद्दों की समझ व बेहतर जानकारी होने के बाद भी वो इनसे जुड़े मामलों में हस्तक्षेप नहीं करतीं.

– हालांकि सरकार व प्रशासन द्वारा कई ऐसी योजनाएं शुरू की गई हैं, जिनमें महिलाओं को ध्यान में रखकर उन्हें आर्थिक तौर पर जागरूक, शिक्षित व सक्षम किया जा सके. कई बैंक भी महिलाओं के लिए ख़ासतौर से अलग व नई स्कीम्स लाते रहते हैं, जिससे आर्थिक मामलों में महिलाओं की भागीदारी बढ़े, लेकिन इनकी जानकारी भी बहुत कम महिलाओं को होती है या वो इनका लाभ लेने की ज़रूरत ही महसूस नहीं करतीं. घरवाले भी यही कह देते हैं कि तुम्हें इसकी क्या ज़रूरत…?

–  चूंकि महिलाओं के करियर को भी पुरुषों के मुक़ाबले कम तवज्जो मिलती है, इसलिए उनकी सैलरी भी पुरुषों से कम होती है, उनका करियर ग्राफ भी ऊपर-नीचे होता रहता है और फाइनेंस को लेकर पति भी सारी बातें डिसकस नहीं करते.

–  शादी के बाद, बच्चे होने के बाद महिलाओं को ही अपने करियर से समझौता करना पड़ता है.

क्यों ज़रूरी है फाइनेंशियल अवेयरनेस?

–  चाहे पुरुष हो या महिला यह सबके लिए ज़रूरी है.

–  निर्णय लेने की आज़ादी व जागरूकता के चलते आप अपने पैसों को बेहतर तरी़के से मैनेज कर सकती हैं.

–  बुरे व़क्त के लिए प्लानिंग कर सकती हैं.

–  सेविंग्स के अधिक ऑप्शन्स यूज़ कर सकती हैं.

–  आपका आत्मविश्‍वास बढ़ेगा.

–  आप छोटा-मोटा बिज़नेस भी शुरू कर सकती हैं.

–  छुट्टियों या हॉलीडे प्लान के लिए अलग से कुछ सोच सकती हैं. ट्रैवल फंड अलग से जमा कर सकती हैं.

–  अपनी लाइफस्टाइल बेहतर बना सकती हैं.

–  हर छोटी-मोटी ज़रूरतों के लिए पति पर निर्भर रहने की मजबूरी नहीं रहेगी, तो आपकी आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी.

–  आर्थिक निर्णयों में आपकी राय को भी अहमियत मिलेगी.

सोच बदलें…

और भी कई कारण हैं, जिनके चलते आपके लिए वित्तीय मामलों में जागरूक होना ज़रूरी है. बेहतर होगा कि अपनी जानकारी बढ़ाएं. बैंक के काम अपने हाथों में ले लें, नई स्कीम्स का पता करें. बैंक जाने या लोन संबंधी जानकारी लेने से हिचकिचाएं नहीं. सरकारी योजनाओं का भी लाभ उठाएं. पूरे समाज की उन्नति तभी संभव है, जब हर वर्ग व हर तबका जागरूक होगा. लिंग के आधार पर आपको दोयम दर्जा मिले, यह सही नहीं है, लेकिन इसके लिए आपको ही पहला कदम उठाना व बढ़ाना पड़ेगा. अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर निकलें और देखें दुनिया बहुत अलग है. चुनौतियों का सामना करें, ताकि आपको अपने अस्तित्व के एहसास से संतुष्टि मिले. पति तो सब देख ही रहे हैं, हमें अपना दिमाग़ ख़राब करने की क्या ज़रूरत है… इस सोच से बाहर निकलें और अपनी आर्थिक जागरूकता को बढ़ाएं और इस आर्थिक आज़ादी का आनंद लें.

– गीता शर्मा

How To Respect Yourself

आत्मसम्मान यानी सेल्फ रिस्पेक्ट (Self-respect) का सीधा-सरल अर्थ है ख़ुद का सम्मान करना और ये ख़ुद से प्यार करने का ही दूसरा नाम है. कुछ लोग इसे ईगो समझ बैठते हैं, लेकिन ईगो का मतलब होता है अपना महत्व जताना. ख़ासतौर से दूसरों के सामने ख़ुद को अधिक महत्वपूर्ण व उनसे बड़ा समझना.

क्यों ज़रूरी है आत्मसम्मान?

आत्मसम्मान जहां सकारात्मक भावना है, वहीं ईगो यानी अहम् नकारात्मक भाव है. ऐसे में आत्मसम्मान बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि आप अपना ही सम्मान नहीं करेंगे, तो दूसरे भी आपका सम्मान नहीं करेंगे.

  • जब आप ख़ुद का सम्मान करते हैं, तो आपको पता होता है कि कब और कहां ‘ना’ कहना ज़रूरी है.
  • आपको अपनी क़द्र करनी आती है, तो आप हर बात को भावनात्मक तरी़के से नहीं सोचते.
  • कोई आपका फ़ायदा उठा रहा है, यह आप जानते-समझते हैं, लेकिन फिर भी आप चुपचाप सहते हैं, तो इसका अर्थ है आप अपना सम्मान नहीं करते.
  • आत्मसम्मान इसलिए भी ज़रूरी है कि वो आपको परिपक्वता से वो निर्णय लेने की क्षमता देता है, जिसका असर आपके व आपसे जुड़े लोगों पर पड़ता है.
  • आत्मसम्मान आपके रिश्ते को बेहतर बनाता है. ख़ुश रहने के लिए भी यह बहुत ज़रूरी है.
  • जब आप ख़ुद से प्यार करते हो, तो आप तुलना करना बंद कर देते हो. आपको अपने हुनर और अपने काम करने के तरी़के पर विश्‍वास होता है.
  • जब आप अपने निर्णय, अपने संस्कारों पर भरोसा करते हो, तो आप और ज़िम्मेदार बनते हो.

क्या होता है, जब आत्मसम्मान की कमी होती है?

  • जब आप में आत्मसम्मान की कमी होती है, तो आप महज़ डोरमैट बनकर रह जाते हैं यानी लोग आपका इस्तेमाल करके छोड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि आप बिना शिकायत के उनकी सुविधानुसार उनके लिए उपलब्ध रहोगे.
  • आप रिश्तों में ख़ुद को पूरी तरह भूल जाते हैं. आप रिश्ते में तो बंधते हो, लेकिन उसके बाद आप भूल जाते हो कि आप कौन हो और रिश्ते में आपकी अहमियत क्या है?
  • आप अटेंशन यानी दूसरों के ध्यानाकर्षण के लिए अजीब-सी चीज़ें व हरक़तें करने लगते हैं, चाहे ऑफिस हो या घर, ख़ुद को बेव़कूफ़ बनाते चले जाते हैं.
  • बुरी आदतों व लतों के शिकार होने लगते हो, क्योंकि आप अपने शरीर, अपने स्वास्थ्य व अपनी ज़रूरतों का सम्मान नहीं करते.
  • आप उन लोगों की फ़िक्र करते हो, जिन्हें आपकी परवाह तक नहीं और आप हर बार ख़ुद को समझाते हो कि आप जो कर रहे हो,  वो सही है. जबकि सामनेवाले व्यक्ति को इस बात से कोई लेना-देना तक नहीं होता कि आप उनके लिए क्या और कितना करते हो.
  • आप भावनात्मक, शारीरिक, मानसिक और मौखिक शोषण को बर्दाश्त व स्वीकार करते हो. आप एब्यूसिव पार्टनर को बर्दाश्त करते हो और जो आपको बार-बार बेइज़्ज़त करते हैं, आपका मज़ाक बनाते हैं, उन्हें आप दोस्त बनाए रखते हो.
  • आप कैज़ुअल सेक्स से परहेज़ नहीं करते और इसके पीछे कारण यह होता है कि आप सेक्स को एंजॉय करने के लिए नहीं, बल्कि ख़ुद को यह समझाने व महसूस कराने के लिए करते हो कि आपको भी कोई चाहता है.
  • आप दूसरों के हाथों की कठपुतली बन जाते हो. अपनी ज़िंदगी, अपने निर्णय भी दूसरों के मुताबिक़ लेते हो.
  • ख़ुद पर ध्यान देना छोड़ देते हो. ग्रूमिंग का ख़्याल नहीं रखते. सजना-संवरना बंद कर देते हो.

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Love Yourself

कैसे करें ख़ुद का सम्मान?

  • अपनी सोच, अपने संस्कारों पर विश्‍वास रखें और दूसरों की सुविधा के लिए उन्हें कभी न बदलें.
  • अपने शरीर का सम्मान करें. हेल्दी रहें, हेल्दी खाएं और ख़ुद के सजने-संवरने में भी दिलचस्पी लें.
  • अपनी हॉबीज़ को भी महत्व दें. अपने पैशन को लोगों से शेयर करें.
  • साफ़ कहना सीखें. कम्यूनिकेट करें. अगर आपको किसी का व्यवहार या बात असहज कर रहा है, तो उससे कहें. झिझकें नहीं, क्योंकि यदि लोगों को यह पता होता है कि आपको मैन्युपुलेट किया जा सकता है, तो वो आपका सम्मान न करके आपको यूज़ करने लगते हैं.
  • अपनी ख़ूबियों पर ध्यान दें, वहीं अपनी कमज़ोरियों को भी सहजता व ईमानदारी से स्वीकारें.
  • ख़ुद की कद्र करने के लिए बेहद ज़रूरी है कि आप अपने समय की भी कद्र करें. टाइम मैनेजमेंट सीखें और अपने समय को बेहतर कामों के लिए इस्तेमाल करें.
  • सकारात्मक लोगों के साथ रहें. उनसे कुछ अच्छा सीखने को मिले, तो ज़रूर उन्हें फॉलो करें.
  • इसी तरह बुज़ुर्गों का सम्मान करें और उनकी राय को महत्व दें. उनके अनुभव आपको बहुत कुछ सिखा सकते हैं.
  • नकारात्मक न बनें. हर बात के लिए, हर असफलता के लिए ख़ुद को ही दोषी या ज़िम्मेदार न ठहराएं. यह सोचें कि ग़लती किसी से भी हो सकती है. दोबारा कोशिश करना ही आपको हारने से बचाता है.
  • हां, अपनी ज़िम्मेदारियों से कभी पीछे न हटें.
  • अपने प्रति अपनी सोच को बदलें. उसे सकारात्मक बनाएं.
  • मेडिटेशन का सहारा लें, यह आपको रिफ्रेश और पॉज़िटिव बनाता है.
  • अपना ध्यान क्रिएटिव कार्यों में लगाएं और निगेटिव लोगों से दूर रहें.
  • आत्मविश्‍वासी बनें. निर्णय लेने से पीछे न हटें और अपने निर्णय पर भरोसा करें. यदि काम न भी बने, तो भी निराशा से बचें. यह सोचें कि कोशिश करना बेहतर होता है, बजाय कोशिश न करने के.

– कमलेश शर्मा

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Plastic Pollution

प्लास्टिक पॉल्यूशन: कैसे बचाएं ख़ुद को? (Plastic Pollution: Causes, Effects And Solutions)

यह माना कि प्लास्टिक ने हमारी ज़िंदगी आसान बना दी है. पिछले दशक में प्लास्टिक ने हमारे रोज़मर्रा के जीवन में इतनी घुसपैठ की है कि उसके बिना अब हमें अपना जीवन अकल्पनीय लगने लगा है, लेकिन जब प्लास्टिक नहीं था, तब भी तो हमारा काम चलता ही था… पर आज बिना प्लास्टिक के हम ख़ुद को अधूरा-सा महसूस करते हैं. बच्चों के टिफिन, वॉटर बॉटल से लेकर हमारे ऑफिस तक का खाना व पानी प्लास्टिक में ही रहता है, क्योंकि प्लास्टिक लाइट वेट, अनब्रेकेबल और सुविधाजनक लगता है.

लेकिन प्लास्टिक की इस सुविधा की हमें बड़ी क़ीमत भी अब चुकानी पड़ रही है, क्योंकि प्लास्टिक अब हमारी सेहत को बुरी तरह प्रभावित करने लगा है. जी हां, पहले भी कई शोधों में यह बात साबित हो चुकी है और अब एक चौंकानेवाला अध्ययन यह कहता है कि हम हर हफ़्ते एक क्रेडिट कार्ड जितना प्लास्टिक खाते हैं.

क्या कहता है शोध?

  • यह स्टडी कहती है कि आप खाने के ज़रिए, पानी के ज़रिए और यहां तक कि सांस के ज़रिए भी लगभग 2,000 प्लास्टिक के कण अपने शरीर में हर हफ़्ते लेते हैं, जो एक क्रेडिट कार्ड के वज़न के बराबर है.
  • हवा और पानी से लेकर हमारा भोजन तक प्लास्टिक की चपेट में है. समुद्री जीवन को भी प्लास्टिक का यह प्रदूषण बुरी तरह प्रभावित कर रहा है. इसी तरह से हमारी सेहत भी इसके प्रभाव से अछूती नहीं है.
  • स्टडी कहती है कि अधिकांश प्लास्टिक पीने के पानी के ज़रिए हमारे शरीर में प्रवेश करता है, इसके अलावा सी फूड और नमक के ज़रिए भी यह हमारे शरीर में आता है.
  • प्लास्टिक का यह ज़हर माइक्रोप्लास्टिक्स से आता है. माइक्रोप्लास्टिक का मतलब है, प्लास्टिक के वो कण जो 5 मिलीमीटर से छोटे होते हैं.

प्लास्टिक का कचरा है सबसे बड़ी चुनौती…

पर्यावरण विद्वानों के लिए प्लास्टिक के कचरे से निपटना सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि हम अधिकांश प्लास्टिक एक बार इस्तेमाल करके फेंक देते हैं, जो पर्यावरण को दूषित करता है और पानी व खाने के ज़रिए हमारे शरीर में पहुंचता है.

प्लास्टिक को नष्ट करना बेहद मुश्किल काम है.  इसे नष्ट होने में हज़ारों साल लग जाते हैं. यदि प्लास्टिक को ज़मीन में दबाया जाता है, तो वह पानी के स्रोतों के ज़रिए हम तक पहुंच ही जाता है और यदि प्लास्टिक को जलाया जाता है, तो उससे ज़हरीले केमिकल्स निकलते हैं, जो हमारे साथ-साथ पूरे पर्यावरण के लिए हानिकारक होते हैं.

  • आपकी कोशिश यह होनी चाहिए कि प्लास्टिक  को इस्तेमाल करने के बाद रिसाइकल सेंटर भेज सकें.
  • ख़ुद प्लास्टिक को नष्ट करने का प्रयास न करें.

स्वास्थ्य को किस तरह नुक़सान पहुंचाता है प्लास्टिक?

  • जैसा कि हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं कि प्लास्टिक हर जगह है और यह सभी स्रोतों से हमारे शरीर में पहुंच ही रहा है.
  • पानी की बोतल से लेकर प्लास्टिक के टिफिन्स, मसाला स्टोर करने के बर्तनों से लेकर माइक्रोवेव तक में अब प्लास्टिक ही यूज़ होता है.
  • यही वजह है कि प्लास्टिक के अंश हम सभी के, जी हां, हम सभी के रक्त से लेकर टिश्यूज़ तक में पाए जाते हैं.
  • लेकिन हार्ड प्लास्टिक में बीपीए होता है, जो एक तरह का टॉक्सिन है.
  • वैज्ञानिकों ने पाया है कि बीपीए का संबंध कैंसर, बर्थ डिफेक्ट्स, इम्यून फंक्शन्स में गड़बड़ी, अर्ली प्यूबर्टी, ओबेसिटी, डायबिटीज़ और हाइपर एक्टिविटी जैसी समस्याओं से है.
  • आजकल मार्केट में माइक्रोवेव सेफ प्लास्टिक आसानी से मिलते हैं, लेकिन माइक्रोवेव में प्लास्टिक का इस्तेमाल न ही करें, तो बेहतर होगा, यहां तक कि माइक्रोवेव सेफ प्लासिक के बर्तन भी नहीं.
  • इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि माइक्रोवेव सेफ का मतलब स़िर्फ यह होता है कि प्लास्टिक मेल्ट नहीं होगा, लेकिन बहुत ज़्यादा हीट की वजह से केमिकल्स ट्रांसफर तेज़ी से होते हैं.
  • एसिडिक फूड प्लास्टिक में स्टोर न करें, क्योंकि वो रिएक्ट कर सकते हैं.
  • इसी तरह से फैटी और ग्रीसी फूड भी प्लास्टिक में स्टोर करना अवॉइड करें.
  • बहुत पुराने, बहुत ज़्यादा यूज़ किए हुए, स्क्रैच पड़े हुए या टूटे-फूटे प्लास्टिक का इस्तेमाल न करें.
  • हार्ड प्लास्टिक मेलामाइन डिशेज़ का भी इस्तेमाल अवॉइड करें, क्योंकि ये मेलामाइन केमिकल को फॉर्मलडिहाइड के साथ मिलाने से बनता है, जो कैंसरस माना जाता है.
  • एक अन्य रिसर्च यह कहता है कि बीपीए फ्री प्लास्टिक में भी सिंथेटिक केमिकल्स होते हैं, जो खाने में जा सकते हैं.
  • हां, अगर फिर भी आपको प्लास्टिक का इस्तेमाल करना ही है, तो कोशिश करें कि वो बीपीए फ्री और पीवीसी फ्री प्लास्टिक हो.

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कुकिंग व स्टोरेज के लिए सेफ ऑप्शन

  • प्लास्टिक जितना हो सके, कम यूज़ करें.
  • अगर प्लास्टिक कंटेनर्स को स्टोरेज के लिए यूज़ करते हैं, तो इस बात का ज़रूर ध्यान रखें कि स्टोर करने से पहले खाना पूरी तरह से ठंडा हो. उसके बाद उसे फ्रिज में रख दें.
  • प्लास्टिक के उन बर्तनों को माइक्रोवेव में बिल्कुल भी यूज़ न करें, जिन पर माइक्रोसेफ का टैग या लेबल न लगा हो.
  • स्टोरेज के लिए ऐसे बर्तनों को चुनें, जिनमें केमिकल्स का रिसाव व केमिकल रिएक्शन न होता हो.
  • मिट्टी व लोहे के बर्तन सबसे सेफ और हेल्दी होते हैं. आयरन वैसे भी शरीर में रेड ब्लड सेल्स के निर्माण के लिए बहुत ज़रूरी है. ऐसे में आयरन के बर्तन हेल्दी ऑप्शन हैं, लेकिन इसकी अधिकता भी ख़तरनाक हो सकती है.
  • ]स्टेनलेस स्टील, ग्लास, आयरन या सिरामिक भी एक तरह से सेफ माने गए हैं.
  • इसी तरह से सिलिकॉन कुकवेयर भी आजकल काफ़ी पॉप्युलर हो रहे हैं. फूड ग्रेड सिलिकॉन कुकवेयर के कोई साइड इफेक्ट्स नहीं देखे गए. न तो यह खाने के साथ रिएक्ट करता है, न ही इसके धुएं से कोई हानि होती है.
  • ये दरअसल सिंथेटिक रबर होता है, जिसमें बॉन्डेड सिलिकॉन (प्राकृतिक तत्व, जो रेत और पत्थरों में प्रचुर मात्रा में होता है) और ऑक्सीजन होता है.

धीरे-धीरे प्लास्टिक फ्री होम व लाइफ बनाएं

  • बर्थडे पार्टीज़ में इस्तेमाल होनेवाले प्लास्टिक ग्लास व प्लेट्स, सब्ज़ियों के लिए कैरी बैग्स, फ्रिज की बॉटल्स व स्टोरेज के बर्तन आदि को नॉन प्लास्टिक से रिप्लेस करें.
  • कपड़े के कैरी बैग्स यूज़ करें.
  • स्टोरेज के लिए स्टील व कांच के बर्तनों का इस्तेमाल करें.
  • यदि प्लास्टिक यूज़ भी कर रहे हैं, तो ऐसे प्लास्टिक का प्रकार यूज़ करें, जो आसानी से रिसाइकिल हो सके.
  • पॉलिथीन का प्रयोग बंद ही कर दें. इनको रिसाइकिल नहीं किया जा सकता है और यह पर्यावरण व स्वास्थ्य को बहुत अधिक नुक़सान पहुंचाते हैं.
  • दूसरों को भी जागरूक करें, ताकि प्लास्टिक का इस्तेमाल कम हो.
  • बच्चों को भी प्लास्टिक के टिफिन व बॉटल्स की जगह स्टील या अन्य मेटल के बर्तनों में खाना व पानी दें.
  • आप ख़ुद भी यही करें.
  • प्लास्टिक के टॉयज़ भी काफ़ी नुक़सान पहुंचाते हैं और छोटे बच्चे इन्हें अक्सर मुंह में डालते हैं, जो उनके लिए हानिकारक होते हैं.
  • बेहतर होगा कि उनकी जगह अन्य मटेरियल के टॉयज़ यूज़ करें.
  • हार्ड प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम कर दें.
  • मिनरल वॉटर या जूस वगैरह की प्लास्टिक की बोतल को यूज़ करने के बाद उन्हें फ्रिज में पानी के स्टोरेज के लिए न रखें.
  • प्लास्टिक के बर्तनों में जो पैक्ड फूड आता है, उन्हें भी अन्य चीज़ों के स्टोरेज के लिए न रख लें.
  • इस तरह यदि आप प्रयास करेंगे, तो धीरे-धीरे प्लास्टिक का प्रयोग कम कर सकेंगे.
  • प्लास्टिक से होनेवाले नुक़सान के बारे में जानकारी इकट्ठी करें और अपने बच्चों को भी उसके बारे में जागरूक करें.

– गीता शर्मा

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Multitasking Side Effects

सर्वगुण संपन्न बनने में खो न दें ज़िंदगी का सुकून (How Multitasking Affects Your Happiness)

परफेक्ट बनने की चाह हर किसी की होती है, ख़ासकर महिलाओं की. लेकिन क्या कभी आपने ग़ौर किया है कि ख़ुद को सर्वगुण संपन्न साबित करने की चाह में आप अपना चैन-सुकून भी खोती जा रही हैं. इसी पहलू पर एक नज़र डालते हैं.

अरे, सुनती हो मेरा रूमाल नहीं मिल रहा.” रवि की आवाज़ पर सीमा दौड़कर गई और उसके हाथों में रूमाल पकड़ा आई. केवल इतना ही नहीं, बल्कि सास-ससुर की चाय और दवाइयां, चिंटू का टिफिन, बैंक और बाज़ार के काम और न जाने क्या-क्या सीमा करती रहती है और अपने घर को परफेक्ट रखती है. सभी रिश्तेदारों में वह चहेती है. सीमा की सास कहते नहीं थकती कि उनकी बहू तो सर्वगुण संपन्न है.

स़िर्फ सीमा ही क्यों ऐसी कई महिलाएं हैं, जो हर जगह परफेक्ट रहना चाहती हैं. इसमें कोई बुराई भी नहीं है, पर साथ ही यह ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि जीवन की हर कमान को संभालते-संभालते कहीं आपकी कमान आपके हाथ से छूट तो नहीं गई. इसका अर्थ है कि कहीं इस सर्वगुण संपन्नता के प्रमाणपत्र की क़ीमत आपका अपना व्यक्तित्व या आपका स्वास्थ्य तो नहीं.

सर्वगुण संपन्न से जुड़ी कुछ भ्रांतियां

महिलाएं तो मल्टीटास्किंग होती हैं… यह जुमला आपको गाहे-बगाहे सुनने मिल जाएगा, फिर वह ऑफिस हो या घर. और विडंबना यह है कि इस तथ्य को बतानेवाली अमूमन कोई स्त्री ही होती है. मल्टीटास्किंग का मतलब बहुत ग़लत लगाया जाता है. इसका मतलब अपने आप को सुबह से शाम तक कामों के बोझ तले दबा लेना नहीं होता या फिर एक साथ कई काम करना भी नहीं होता है. मल्टीटास्किंग का मतलब होता है कुछ कामों को एक साथ स्मार्ट तरी़के से करना, जिससे समय और ऊर्जा की बचत हो. इसका स्त्री और पुरुष से कोई लेना-देना नहीं है. अतः मल्टीटास्किंग के नाम पर सर्वगुण संपन्नता की प्रतिस्पर्धा ग़लत है.

किसी काम के लिए ना कहना असमर्थता का प्रमाण है

यह भी एक भ्रांति है कि अगर आपने घर में या ऑफिस में किसी को कोई काम करने से मना कर दिया, तो वह आपकी कमी होगी. साथ ही सामनेवाला नाराज़ हो जाएगा. इस कशमकश में हम कई ऐसे काम कर जाते हैं, जिनकी या तो ज़रूरत नहीं होती या जो हमारी सामर्थ्य के बाहर होता है. कोई भी काम या ज़िम्मेदारी तभी उठाएं, जब वह आवश्यक हो और आपके सामर्थ्य के अंदर हो. इसका सर्वगुण संपन्नता से कोई लेना-देना नहीं है.

जो ख़ुद के लिए कम-से-कम समय निकाले, वही सर्वगुण संपन्न है

हमारे समाज में अगर स्त्री ख़ुद के लिए स्पेस रखती है या अपने लिए कुछ समय निकालती है, तो वह सर्वगुणता के पैमाने पर खरी नहीं उतरती. इस भ्रांति को बदलने की ज़रूरत है. स़िर्फ स्त्री ही नहीं, हर किसी को अपने लिए समय निकालने की आवश्यकता होती है. अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करते हुए ऐसा करना कोई अपराध नहीं है. समाज या परिवार क्या कहेगा, इस डर से अपनी किसी रुचि या अपने लिए समय निकालना ना छोड़ें.

अगर आपसे सब ख़ुश हैं, तो ही आप सर्वगुण संपन्न हैं

सबको ख़ुश करना मुश्किल ही नहीं असंभव है, लेकिन सर्वगुण संपन्न बनने की चाह में हम हर किसी को ख़ुश करने की कोशिश करते रहते हैं. इसमें पूरी तरह से सफल कम ही हो पाते हैं, साथ ही कई बार निराशा भी हाथ लगती है. इससे अच्छा है कि हम यह कोशिश करें कि हमारी वजह से कोई दुखी ना हो.

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Multitasking Side Effects

कैसे पहचानें कि सर्वगुण संपन्न बनने की चाहत में आप ख़ुद को खो रही हैं?

अक्सर छोटी छोटी बातें ही हमें किसी बड़े बदलाव का इशारा देती हैं-

*    अगर आपको अपने कामों को पूरा करने के लिए दिनभर का समय कम पड़ता है.

*    समय के साथ आप अपनी पसंद-नापसंद भूलती जा रही हैं.

*    आपकी अपनी कोई हॉबी नहीं है.

*    हमेशा थकान महसूस होती है.

*    अक्सर चिड़चिड़ापन और निराशा होती है.

*    आपके आसपास सब ख़ुश हैं, पर आपको अंदर से ख़ुशी का अनुभव नहीं होता है.

*    हमेशा तनाव और दबाव महसूस होता है.

*    अगर आपके दोस्त या सहेलियां नहीं हैं.

*    आप दिन का कोई भी समय अपने मन मुताबिक़ नहीं बिता पाती हैं.

*    आपको लोगों के बीच अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ता है.

समाधान के लिए इन बातों पर ध्यान दें

*    सबसे पहले और ज़रूरी है अपने लिए कुछ क्वालिटी समय निकालना.

*    अपने आसपास कुछ सहेलियां हमेशा रखें.

*    अपनी किसी भी रुचि को जीवित रखें.

*    अगर आप अपने बारे में सोच रही हैं, तो इसके लिए किसी भी प्रकार का अपराधबोध ना रखें.

*    कम-से-कम 15 दिनों में एक बार बाहर घूमने ज़रूर जाएं.

*    अपने बचपन का अलबम, कॉलेज के ज़माने की फोटोज़ ज़रूर देखें.

*    घर में हर किसी की ख़ुशी का ध्यान रखें, पर अपनी ख़ुशी को दांव पर ना लगाएं.

*    घर हो या ऑफिस, कामों को मिल-बांटकर करें. काम करने के लिए किसी की मदद लेने में कोई बुराई नहीं है.

सर्वगुण संपन्न नहीं स्मार्ट बनें

*    सर्वगुण संपन्न होना असल में किसी और के पैमाने पर ख़ुद को सिद्ध करना है.

*    यह तमगा लेने के लिए अपने स्व को खो देने से अच्छा है कि आप स्मार्ट बनें.

*    दिन के चौबीस घंटे का इस्तेमाल चतुराई और पूरी प्लानिंग से करें.

*    अपने रिश्तों में मधुरता बनाएं रखने के लिए किसी बड़े प्रयास की ज़रूरत नहीं है, बल्कि छोटी-छोटी बातों को याद रखें.

*    दिन में थोड़ा समय ख़ुद को ज़रूर दें, फिर चाहे वह योग हो या फिर डांस. तो स्मार्ट बनें और जीवन की हर कमान को कुशलता से संभालें.

 – माधवी कठाले निबंधे

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Smile

क्यों मुस्कुराने में भी कंजूसी करते हैं लोग? (Why Don’t Some People Smile)

ऐसे तमाम लोग (People) हमें रोज़ ही मिल जाते हैं, जो बेवजह ही मुस्कुराकर (Smile) चले जाते हैं और ऐसे भी लोग मिलते हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि शायद ये ज़िंदगी में कभी मुस्कुराए ही नहीं. कोई उन्हें घमंडी समझता है, तो कोई ग़मग़ीन… आइए, जानते हैं कि वो ऐसे क्यों हैं?

टेस्टोस्टेरॉन का हाई लेवल: रिसर्च बताते हैं कि जिनका टेस्टोस्टेरॉन स्तर अधिक होता है, वो कम मुस्कुराते हैं. यही वजह है कि महिलाओं के मुक़ाबले पुरुष कम मुस्कुराते हैं.

पावर: कुछ अध्ययन यह बताते हैं कि ख़ास परिस्थितियों में मुस्कुराने का मतलब ख़ुद को कमज़ोर दर्शाना या एक तरह से आत्मसमर्पण की निशानी माना जाता है. जो लोग कम मुस्कुराते हैं, वो ख़ुद को पावरफुल महसूस करते हैं. उन्हें लगता है कि वो हर परिस्थिति का मुक़ाबला कर सकते हैं और उनमें वो शक्ति है.

कम संवेदनशीलता: स्टडीज़ इस बात की ओर भी इशारा करती हैं कि इमोशनल सेंसिटिविटी हंसने और मुस्कुराने से जोड़कर देखी जाती है, कम मुस्कुरानेवाले लोग इतने संवेदनशील नहीं होते यानी वो कम संवेदनशील होते हैं.

संवादहीनता व असहमति: कम मुस्कुरानेवाले दूसरों की बातों और विचारों से कम सहमत होते हैं. मुस्कुराहट को संवाद स्थापित करने का एक अच्छा ज़रिया माना जाता है, ऐसे में कम मुस्कुरानेवाले दूसरों से अधिक बात करना पसंद नहीं करते हैं.

कठोर व दृढ़ नज़र आने की कोशिश: कुछ लोग प्रभावशाली, मज़बूत, कठोर या दृढ़ नज़र आने की कोशिश में कम मुस्कुराते हैं. शायद ये ऐसे लोग होते हैं, जिनकी परवरिश के दौरान मन में यह बात बैठा दी जाती है या परिस्थितियां इन्हें ऐसा महसूस कराती हैं कि मुस्कुराना उन्हें कमज़ोर बना सकता है यानी मुस्कुराहट को वो कमज़ोरी की निशानी मानने लगते हैं.

नाख़ुश: ज़िंदगी से जिन्हें बहुत-सी शिकायतें हैं, जो ख़ुश नहीं हैं, वो चाहकर भी मुस्कुरा नहीं पाते.

रक्षात्मक प्रतिक्रिया: ज़िंदगी के कुछ कड़वे अनुभव और जो लोग भावनात्मक रूप से आहत हुए होते हैं कभी या फिर बुली का शिकार भी हुए होते हैं, तो वो ख़ुद को बचाने व अधिक आहत होने से बचाने के लिए न मुस्कुराने को एक रक्षात्मक प्रतिक्रिया के तौर पर लेते हैं.

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लोग गंभीरता से लें: कुछ लोग चाहते हैं कि दूसरे उन्हें अधिक गंभीरता से लें, इसलिए वो कम मुस्कुराते हैं, क्योंकि उनकी यह सोच होती है कि मुस्कुराने से अन्य लोग उन्हें उतनी गंभीरता से नहीं लेंगे या उनकी बातों को उतना महत्व नहीं देंगे, जितना वो चाहते हैं.

परिपक्वता: कम मुस्कुरानेवाले ख़ुद को परिपक्व दिखाने के लिए ऐसा करते हैं. उन्हें लगता है हंसना-मुस्कुराना अपरिपक्वता की निशानी है. उन्हें यह बचकाना लगता है. वे सोचते हैं कि कम मुस्कुराना उन्हें अधिक मैच्योर दिखाएगा और लोग उन्हें अधिक महत्व देंगे.

ख़ूबसूरत नहीं लगते: कुछ लोगों में यह भावना घर कर जाती है कि मुस्कुराते हुए वो अच्छे नहीं लगते या तो उनके दांत ख़राब होते हैं या उन्हें कभी किसी ने कहा होता है कि वो गंभीर अधिक आकर्षक नज़र आते हैं, इसलिए भी वो कम मुस्कुराते हैं.

मुखौटा: कुछ लोग इसे आवरण या मुखौटा बना लेते हैं, जिससे उनकी तकलीफ़ या भावनाएं दूसरों पर ज़ाहिर न हों. कहीं न कहीं वो तकलीफ़ में होते हैं, पर वो शेयर नहीं करना चाहते, इसलिए वो दूसरों से उतना कंफर्टेबल नहीं होना चाहते, जहां लोग उनकी मुस्कुराहट के पीछे दर्द को पहचान सकें. ऐसे में वो गंभीर व ख़ुद को मज़बूत दिखाने के लिए यह मुखौटा ओढ़ लेते हैं.

महत्व कम न हो: कुछ लोगों की यह पक्की धारणा बन जाती है कि बात-बात पर या जब-तब मुस्कुरानेवालों की वैल्यू कम हो जाती है. हर किसी को देखकर मुस्कुरा देने से वो व्यक्ति भी आपकी कद्र नहीं करता, जिसे देखकर आप मुस्कुराते हैं.

ईगो: यह भी एक कारण है, क्योंकि कई बार आपसी रिश्तों या दोस्तों में भी लोग यह सोचते हैं कि एक स्वीट-सी स्माइल से अगर झगड़ा ख़त्म होता है, तो क्या बुराई है, पर वहीं कुछ लोग अपना ईगो सैटिस्फाई करने के लिए यह सोचकर नहीं मुस्कुराते कि भला मैं क्यों झुकूं, ग़लती तो सामनेवाले की थी, मैं क्यों पहल करूं… यदि सामनेवाला पहल करता है, तो भी वो जल्दी से अपनी प्रतिक्रिया नहीं देते, क्योंकि उन्हें लगता है कि इतनी जल्दी माफ़ करने पर अगली बार आपको वो हल्के में लेंगे और आपका महत्व धीरे-धीरे ख़त्म हो जाएगा.

Sad Face

क्या-क्या और कैसे-कैसे बहाने…

जी हां, कम मुस्कुराने के मनोविज्ञान व मनोवैज्ञानिक कारणों की चर्चा तो हम कर चुके. अब उन बहानों को भी जानते हैं, जो लोग अपने न मुस्कुराने पर बनाते हैं.

क्या मैं पागल हूं: बहुत-से लोग यही कहते हैं कि बेवजह या बात-बात पर मुस्कुराने व हंसनेवाला तो पागल होता है. क्या मैं आपको पागल लगता/लगती हूं, जो हर बात पर या हर किसी को देखकर मुस्कुराऊं?

मूड भी कोई चीज़ है या नहीं: न मुस्कुराने की वजह पूछने पर कुछ लोग यही तर्क देते हैं कि मूड भी कोई चीज़ है, बिना मूड के कोई काम नहीं होता, फिर चाहे वो मुस्कुराना ही क्यों न हो.

झूठी हंसी क्यों भला: हम ज़बर्दस्ती किसी को ख़ुश करने के लिए नहीं मुस्कुरा सकते. झूठी हंसी नहीं आती हमें. यह बहाना भी बहुत लोग बनाते हैं.

कुछ अच्छा तो हो मुस्कुराने के लिए: कुछ लोग इतने नकारात्मक होते हैं कि उन्हें हर बात में, हर चीज़ में, हर इंसान में और हर परिस्थिति में कमियां ही नज़र आती हैं. उनके लिए कुछ भी कभी भी अच्छा नहीं होता, तो भला मुस्कुराना किस बात का.

मैं क्यों अपनी वैल्यू कम करूं: कुछ लोगों को लगता है कि उनकी वैल्यू कम हो जाएगी, लोगों के बीच उन्होंने जो छवि बना रखी है, वो हल्की पड़ जाएगी.

जब मेरा मन होगा, तब हंसूंगा/हंसूंगी: तुम्हारे कहने या दुनिया के चाहने से थोड़ी हंसी आएगी. जब मेरी मर्ज़ी होगी, मन होगा, भीतर से हंसने जैसा महसूस होगा तब हंसूगा.

कोई ज़बर्दस्ती है क्या: नहीं हंसना, तो नहीं हंसना, कोई ज़ोर-ज़बर्दस्ती है क्या कि हर बात पर मुस्कुराया जाए या हर चुटकुले पर हंसा ही जाए.

हम तो ऐसे ही हैं: आपको हम पसंद हों या न हों, पर हम तो ऐसे ही हैं. हमको नहीं आता मुस्कुराना. बात करनी हो, तो करो, वरना आप अपने रास्ते, हम अपने रास्ते.

आपको क्या तकलीफ़ है: हमारे नहीं मुस्कुराने से क्या आपका कोई नुक़सान हो रहा है? नहीं न, तो फिर?

हम किसी के ग़ुलाम नहीं: आपको जब लगेगा कि हमें मुस्कुराना चाहिए, क्या तब हम मुस्कुराएंगे? हम किसी के ग़ुलाम नहीं कि किसी के चाहने पर हंसे या मुस्कुराएं.

आपके पेट में दर्द क्यों है: हमारे कम या नहीं मुस्कुराने से दूसरों के पेट में दर्द क्यों होता है, यह बात आज तक समझ नहीं आई. अगर हमें कोई घमंडी या सिरफिरा समझता है, तो यह हमारी प्रॉब्लम है, इससे आपको क्या लेना-देना भला?

–  गीता शर्मा

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Medical Consumer Rights

जब मेडिकल लापरवाही के हों शिकार, तो कहां करें शिकायत? (Medical Negligence: Consumer Rights And The Law)

एबी पॉज़िटिव मरीज़ को एबी निगेटिव का खून चढ़ाना, दाएं पैर की बजाय बाएं पैर की सर्जरी करना, मलेरिया के मरीज़ को डेंगू की दवाइयां देना, दवाइयों का इतना ओवरडोज़ कि मरीज़ की जान पर बन आए… आए दिन हमें मेडिकल लापरवाही की ऐसी ख़बरें

देखने-सुनने को मिलती हैं. क्या हो, अगर उनकी जगह हमारे परिवार का कोई सदस्य या हम ख़ुद हों? ऐसी लापरवाही किसी के साथ भी हो सकती है, इसलिए ज़रूरी है कि आप अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें, ताकि सही समय पर सही कार्रवाई कर सकें.

अपनी भलाई के लिए हम डॉक्टर की हर बात पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं, जबकि हमें अपनी आंखें और कान हमेशा खुले रखने चाहिए. किसी ज़माने में नोबल प्रोफेशन माना जानेवाला मेडिकल प्रोफेशन आज प्रॉफिट मेकिंग बिज़नेस बन गया है. ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि हम अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें और किसी भी तरह की मेडिकल लापरवाही होने पर सही जगह उसकी शिकायत करें.

क्या है मेडिकल लापरवाही?

यह डॉक्टर की नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वह अपने पास आनेवाले सभी मरीज़ों का सही तरी़के से इलाज या कंस्लटेशन करे. अपने कर्त्तव्यों को ईमानदारीपूर्वक निभाए, लेकिन जब डॉक्टर अपने कर्त्तव्यों को सही तरी़के से न निभाए और उसकी लापरवाही से मरीज़ को शारीरिक क्षति पहुंचे या जान चली जाए, तो यह मेडिकल लापरवाही होगी.

किन मामलों में कर सकते हैं शिकायत?

किसी भी सर्जरी से पहले डॉक्टर्स कुछ पेपर्स पर आपके सिग्नेचर लेते हैं, ताकि कुछ गड़बड़ होने पर वो ज़िम्मेदार न ठहराए जाएं. लेकिन वो इससे पूरी तरह बच नहीं सकते. आइए देखें, कौन-से हैं वो मामले, जो मेडिकल लापरवाही की श्रेणी में आते हैं.

–   लापरवाही के कारण ग़लत दवा देना.

–    सही तरी़के से इलाज न करना.

–    मरीज़ को ऐसी जगह रखना, जिससे उसे संक्रामक रोग हो जाए.

–    अस्पताल में स्टाफ की कमी के कारण मरीज़ की सही तरी़के से देखभाल न हो पाना.

–    मरीज़ की परेशानियों को अनसुना करना.

–    बीमारी के लक्षणों को पहचानने में ग़लती करना.

–    ग़लत लक्षण के कारण बेवजह सर्जरी कर देना.

–    लक्षणों को पहचानने में बहुत ज़्यादा देर करना, जिससे मरीज़ की जान पर बन आए.

–    सर्जरी के दौरान किसी और अंग को नुक़सान पहुंचाना.

–    सर्जरी के दौरान ग़लती करना, जिससे किसी तरह का इंफेक्शन हो जाए या फिर इम्यून सिस्टम फेल हो जाए.

–    सर्जरी के दौरान किसी चीज़ का अंदर छूट जाना, सर्जरी के कारण बहुत ज़्यादा खून बहना, ग़लत बॉडी पार्ट की सर्जरी कर देना.

–    एनेस्थीसिया देने में ग़लती करना.

–    बच्चे के जन्म के दौरान किसी तरह की ग़लती से बच्चे का नर्व डैमेज होना या फिर जान पर बन आना आदि.

भले ही डॉक्टर ने लापरवाहियां ग़लती से कर दी हों, फिर भी वह दोषी माना जाएगा.

 

क्या है टाइम लिमिट?

यह जानना बहुत ज़रूरी है कि आपको मेडिकल लापरवाही के तीन साल के भीतर शिकायत दर्ज करनी है, वरना उसके बाद भले ही आपका केस कितना भी मज़बूत क्यों न हो, आपको एक पैसा नहीं मिलेगा.

–    यहां यह ध्यान देने की ज़रूरत है कि लापरवाही के बारे में आपको पता कब चला, क्योंकि ऐसे कई मामले होते हैं, जहां कई सालों बाद इसके बारे में पता चलता है. उदाहरण के लिए अगर कैंसर ट्रीटमेंट के दौरान बहुत ज़्यादा रेडिएशन का इस्तेमाल किया गया हो, तो उसका असर कुछ सालों बाद दिखेगा और जब असर दिखने लगे, तब से लेकर तीन साल के भीतर आप शिकायत कर सकते हैं.

कौन कर सकता है शिकायत?

मरीज़ या मरीज़ के परिवारवालों के अलावा कोई रजिस्टडर्र् ग़ैरसरकारी  संस्था  भी मरीज़ की तरफ़ से शिकायत दर्ज कर सकती है. मेडिकल लापरवाही को साबित करने की ज़िम्मेदारी पीड़ित पर होती है, इसलिए आपको सभी पेपर्स संभालकर रखने चाहिए.

शिकायत से पहले ध्यान में रखें ये बातें

–    अगर आपको संदेह है कि डॉक्टर सही इलाज नहीं कर रहा है, तो किसी और डॉक्टर से सलाह लें और मरीज़ को किसी अच्छे अस्पताल में भर्ती कराएं. उसके ठीक होने के बाद ही इस मामले को उठाएं. मरीज़ को प्राथमिकता दें.

–    सबसे पहले इस बात की पुष्टि के लिए कि मेडिकल लापरवाही हुई है, आपको किसी सरकारी अस्पताल के डॉक्टर या उसी फील्ड के एक्सपर्ट से एक रिपोर्ट लेनी होगी, जिसमें वो इस बात की पुष्टि करे कि मेडिकल लापरवाही हुई है.

–    आप चाहें, तो कंज़्यूमर कोर्ट में भी गुहार लगा सकते हैं कि वो अपनी तरफ़ से मेडिकल बोर्ड को जांच के आदेश दे, ताकि आपको रिपोर्ट मिल जाए.

–    शिकायत करने के लिए सबसे ज़रूरी है डॉक्यूमेंट्स. इलाज से जुड़े सभी एडमिशन पेपर्स से लेकर रिपोर्ट्स, दवाई के बिल्स वगैरह सभी जमा करके रखें.

–    अगर अस्पताल आपको मेडिकल रिकॉर्ड्स नहीं दे रहा, तो आप कोर्ट में जा सकते हैं. कोर्ट के आदेश पर उन्हें मेडिकल रिकॉर्ड्स देने ही पड़ेंगे.

Consumer Rights

कहां करें शिकायत?

मेडिकल लापरवाही के मामले में आपको सही कड़ी का इस्तेमाल करना चाहिए. सबसे पहले अस्पताल से ही शुरुआत करें, अगर वहां आपकी सुनवाई नहीं होती, तो न्याय मांगने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने से न हिचकिचाएं.

मेडिकल सुप्रिटेंडेंट

–    डॉक्टर की लापरवाही हो या फिर स्टाफ की ग़ैरज़िम्मेदारी, उसकी शिकायत तुरंत अस्पताल के मेडिकल सुप्रिटेंडेंट से करें.

–    आप उनसे उचित कार्रवाई के साथ हर्जाने की मांग भी कर सकते हैं.

स्टेट मेडिकल काउंसिल

–   डॉक्टर या अस्पताल से जुड़ी किसी भी तरह की शिकायत आपको पहले मेडिकल काउंसिल में करनी चाहिए. वो अपने लेवल पर जांच करके उचित कार्रवाई करते हैं.

–   अगर काउंसिल की जांच में डॉक्टर्स दोषी पाए जाते हैं, तो काउंसिल उनका लाइसेंस तक रद्द कर सकती है.

–    अगर आपको लगता है कि मामले को जान-बूझकर टाला जा रहा है, तो आप अपनी शिकायत नेशनल मेडिकल काउंसिल में भी कर सकते हैं. ये दोनों ही गवर्निंग बॉडीज़ हैं, जो दोषी पाए जाने पर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हैं.

कंज़्यूमर कोर्ट

जब आप किसी डॉक्टर या अस्पताल में जाकर इलाज करवाते हैं और उनकी सेवा के बदले उन्हें फीस देते हैं, तो आप उनके ग्राहक माने जाते हैं और क्योंकि आप ग्राहक हैं, तो आप मेडिकल लापरवाही के ख़िलाफ़ अपनी शिकायत कंज़्यूमर कोर्ट में कर सकते हैं.

–    आप अपनी शिकायत डिस्ट्रिक्ट फोरम में कर सकते हैं.

–    यहां आपको एक बात ध्यान में रखनी होगी किकंज़्यूमर कोर्ट में आपको स़िर्फ मुआवज़ा मिलेगा.

–    यहां आप डॉक्टर के ख़िलाफ़ किसी तरह की क्रिमिनल कार्रवाई की मांग नहीं कर सकते.

–    हाल ही में लोकसभा में कंज़्यूमर प्रोटेक्शन बिल 2018 पास हुआ है, जिसमें कई नए बदलाव किए गए हैं, ताकि ग्राहकों की शिकायत पर जल्द सुनवाई हो सके. इस बिल के क़ानून बन जाने से मेडिकल लापरवाही के मामलों को और आसानी से सुलझाया जा सकेगा.

सज़ा का प्रावधान

इंडियन पीनल कोड की धारा 304ए के तहत लापरवाही के कारण होनेवाली मौत के लिए दो  साल की जेल और जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है.

ख़राब है देश में मेडिकल कंडीशन

–    मेडिकल लापरवाही में ह्यूमन एरर के कारण हर साल हमारे देश में लगभग 52 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 44 हज़ार से 98 हज़ार का है.

–    साल 2016 में हुई एक स्टडी के मुताबिक़ हर साल इंडिया में मेडिकल लापरवाही के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. आंकड़ों में बात की जाए, तो हर साल इन मामलों में 110% बढ़ोतरी हो रही है.

–    हमारे देश में मेडिकल बजट हमारे पड़ोसी देश नेपाल और श्रीलंका से भी बहुत कम है. देश के जीडीपी का महज़ 1% मेडिकल बजट के लिए दिया जाता है.

– अनीता सिंह

 

CM Manohar Parrikarहमेशा याद रहेंगे… सरल, सहज… मनोहर परिकर! (Goa CM Manohar Parrikar Passes Away)

अपनी निष्ठा और सहज स्वभाव के लिए तो मनोहर परिकर जाने जाते ही थे पर देश के रक्षा मंत्री के तैर पर भी इन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी है!

मनोहर परिकर ने रविवार १७ मार्च को लम्बी बीमारी के बाद अंतिम सांसें लीं! उन्हें पैंक्रीयास की बीमारी थी जिसका इलाज भी काफ़ी चला, पर अफ़सोस के वो अब हमारे बीच नहीं रहे!

63 वर्षीय पर्रिकर को सोमवार सुबह 11 बजे श्रधांजलि दी जाएगी. मनोहर पर्रिकर को  उनके कार्य और उनकी ईमानदारी के लिए जाना जाएगा.

प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने मनोहर परिकर के निधन पर ट्विट करके शोक प्रकट करते हुए लिखा ”श्री मनोहर पर्रिकर एक अद्वितीय नेता थे. एक सच्चे देशभक्त और असाधारण प्रशासक, वह सभी की प्रशंसा करते थे. राष्ट्र के प्रति उनकी त्रुटिहीन सेवा को पीढ़ियों द्वारा याद किया जाएगा। उनके निधन से गहरा दुख हुआ. उनके परिवार और समर्थकों के प्रति संवेदना.”

मेरी सहेली की ओर से उन्हें श्रद्धांजलि!

Facts About Undergarment

अंडरगार्मेंट से जुड़ी 10 सच्चाइयां (10 Interesting Facts About Undergarment)

हम अपने आउटफिट्स से तो सभी को इंप्रेस करना चाहते हैं, लेकिन हम शायद ही अपने अंडरगार्मेंट्स (Undergarments) पर ध्यान देते हैं, क्योंकि हमें लगता है वो तो छिपे हुए होते हैं, तो जैसे-तैसे काम चला लो, क्या फ़र्क़ पड़ता है. लेकिन फ़र्क़ पड़ता है, आपकी हेल्थ से लेकर पर्सनैलिटी तक उनसे प्रभावित होती है. इसलिए आपको भी अंडरगार्मेंट्स से जुड़ी ये बातें ज़रूर जाननी चाहिए, ताकि आप सही अंडरगार्मेंट्स का सिलेक्शन कर सकें. हम अपने आउटफिट्स से तो सभी को इंप्रेस करना चाहते हैं, लेकिन हम शायद ही अपने अंडरगार्मेंट्स पर ध्यान देते हैं, क्योंकि हमें लगता है वो तो छिपे हुए होते हैं, तो जैसे-तैसे काम चला लो, क्या फ़र्क़ पड़ता है. लेकिन फ़र्क़ पड़ता है, आपकी हेल्थ से लेकर पर्सनैलिटी तक उनसे प्रभावित होती है. इसलिए आपको भी अंडरगार्मेंट्स से जुड़ी ये बातें ज़रूर जाननी चाहिए, ताकि आप सही अंडरगार्मेंट्स का सिलेक्शन कर सकें.

– एक सर्वे से पता चला है कि लगभग तीन में से दो महिलाएं ग़लत साइज़ की ब्रा पहनती हैं, इनमें से 29% महिलाएं इस बात को जानते हुए भी ऐसा करती हैं.

– अधिकतर थॉन्ग्स लेसी और सैटिन के फैब्रिक में ही मिलते हैं, जो स्किन को ब्रीद नहीं करने देते और स्किनी होने के कारण वहां बैक्टीरिया ज़्यादा पनपते हैं, जिनसे इंफेक्शन का ख़तरा रहता है. –

– कॉटन पैंटीज़ सबसे सेफ होती हैं. इन्हें पहनने से पसीना कम आता है, जिससे बैक्टीरिया का जमाव और इंफेक्शन नहीं हो पाता.

– अक्सर यह माना जाता है कि अंडरवियर पहनने से पुरुषों के स्पर्म काउंट पर असर होता है, लेकिन जब तक कि अंडरवियर बहुत ज़्यादा टाइट न हो, तो कोई ख़तरा नहीं है.

– अधिकतर महिलाएं एक ही तरह की ब्रा हर ड्रेस पर पहनती हैं, क्योंकि उन्हें अलग-अलग तरह की ब्रा के बारे में पता ही नहीं होता, जैसे- स्मूद, टी-शर्ट ब्रा, पुशअप ब्रा, मिनिमाइज़र ब्रा आदि.प यही हाल पैंटीज़ का भी है, इसमें भी हाई वेस्ट, लो वेस्ट, बिकनी, बॉय शॉर्ट पैंटीज़ मिलती हैं, जो ड्रेस के अनुसार पहनी जानी चाहिए.

– जिन महिलाओं के पास रोज़ाना के लिए अलग-अलग ब्रा नहीं होती, वो एक ही ब्रा को दो-तीन दिनों तक लगातार पहनती हैं, जिससे बैक्टीरियल इंफेक्शन का ख़तरा बढ़ जाता है.

– ज़्यादा लंबे समय तक अंडरगार्मेंट्स को रिप्लेस नहीं करेंगे, तो इंफेक्शन्स का भी ख़तरा बढ़ जाता है, क्योंकि उनका मटेरियल ख़राब होने लगता है, साथ ही उनका शेप भी सही नहीं रहता. बेहतर होगा कि समय-समय पर नए अंडरगार्मेंट्स ख़रीदते रहें.

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– ब्रा को ताउम्र के लिए न रखें. जी हां, हर छह महीने में ब्रा को बदल दें, क्योंकि उसका इलास्टिक लूज़ होने लगता है.

– आपका साइज़ बदलता है, तो ब्रा का साइज़ भी बदलें. जी हां, ब्रेस्ट्स का आकार व शेप समय के साथ बदलता है. ऐसे में आप उसी साइज़ की ब्रा हमेशा पहनेंगी, तो इसका मतलब है कि आप ग़लत साइज़ की ब्रा पहन रही हैं.

– वर्कआउट के बाद अंडरगार्मेंट्स ज़रूर बदलें, क्योंकि पसीने की वजह से बैक्टीरियल इंफेक्शन का ख़तरा रहता है.

अंडरगार्मेंट्स से जुड़े इंट्रेस्टिंग फैक्ट्स

– यूके की महिलाओं का ब्रा साइज़ अन्य देशों के मुक़ाबले औसतन सबसे बड़ा होता है.

– यूके की महिलाओं का ब्रा साइज़ अन्य देशों के मुक़ाबले औसतन सबसे बड़ा होता है.

– जापान की महिलाओं का ब्रा साइज़ सबसे छोटा होता है.

– अमेरिका में औसत ब्रा साइज़ है 36 सी.

– अमेरिका में महिलाओं के पास औसतन अंडरवेयर के 22 पेयर होते हैं.

– कप साइज़ का सिस्टम 1930 में चलन में आया था.

– इटली में महिलाएं न्यू ईयर में रेड कलर की अंडरवेयर पहनती हैं, क्योंकि इसको गुड लक से जोड़कर देखा जाता है.

– स्पोर्ट्स ब्रा की शुरुआत साल 1975 से हुई थी.

– फ्रेंच में लॉन्जरी शब्द महिला व पुरुष दोनों के अंडरगार्मेंट्स के लिए यूज़ किया जाता है. प एक कपल ने विक्टोरिया सीक्रेट सेक्सी लॉन्जरी को पॉप्युलर करने के लिए बनाया था, जिसमें रोज़ाना पहनने के अंडरगार्मेंट्स हों और एक ऐसी जगह हो, जहां महिलाएं व पुरुष बेझिझक अंडरगार्मेंट्स ख़रीद सकें. आज विक्टोरिया सीक्रेट बहुत बड़ा ब्रांड बन चुका है.

 – विजयलक्ष्मी

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Why Do We Need To Learn Humanities

हम ख़ुद को अन्य जीवों से बेहतर मानते हैं और कहा भी जाता है कि मनुष्य योनि में जन्म बड़ी ही मुश्किल से मिलता है. मनुष्य सभी जीवों में सबसे शक्तिशाली माना जाता है, क्योंकि वो सोचने-समझने की क्षमता सबसे अधिक रखता है, वो बोल सकता है, वो नए-नए आविष्कार कर सकता है, वो दुख-दर्द महसूस कर सकता है, वो अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकता है, क्योंकि वो एक सामाजिक प्राणी है और उसमें मानवी भावनाएं हैं. लेकिन क्या सचमुच ऐसा ही है, जैसा हम सोचते हैं? हम ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ तो मानते हैं, लेकिन कहीं न कहीं समय के साथ-साथ हमारी इंसानियत खोती जा रही है. अगर ऐसा न होता, तो कई तरह के अमानवीय पहलू हमें देखने को न मिलते.

  • बच्चे अपने बूढ़े माता-पिता से पीछा छुड़ाने के लिए उन्हें वृद्धाश्रमों में न छोड़ देते.
  • स़िर्फ पैसों व ज़रूरतों के लिए एक-दूसरे को हम इस्तेमाल न करते.
  • कहीं 7 महीने की बच्ची से बलात्कार, तो कहीं अपने ही पिता से शोषण का शिकार बेटी… कहीं अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति का ही क़त्ल, तो कहीं माता-पिता से पैसे ऐंठने के लिए ख़ुद के अपहरण की कहानी… इस तरह की ख़बरों से आजकल हमारे दिन की शुरुआत होती है. ज़ाहिर है, कहीं न कहीं कुछ तो ग़लत हो रहा है, जो हम इंसानियत भूलकर इस हद तक चले जाते हैं.
  • जब भी कोई इंसान ग़लत व्यवहार या अपराध करता है, तो हम उसकी तुलना जानवर से करते हैं, लेकिन जानवर तो कभी भी अपनी हदें पार नहीं करते. ये हम ही हैं, जो सीमाएं लांघते हैं और अपने इंसानी दंभ में सब कुछ भूलकर जघन्य अपराध तक कर डालते हैं.
  • ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या अब ज़रूरी हो गया है कि इंसानियत को बचाया जाए, सहेजा जाए?
  • हम वॉटर कंज़र्वेशन, एनर्जी कंज़र्वेशन, फ्यूअल कंज़र्वेशन, फॉरेस्ट और एनिमल कंज़र्वेशन आदि की बातें करते हैं, लेकिन शायद ही कभी ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन की तरफ़ हमारा ध्यान जाता हो.
  • दिन-ब-दिन बढ़ते अपराध, गिरते मानवी मूल्य और बढ़ते लालच के चलते बेहद ज़रूरी हो गया है कि सबसे ज़्यादा और सबसे पहले ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन की तरफ़ ध्यान दिया जाए.

कैसे किया जाए ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन?

  • बच्चे हमारे देश के भविष्य हैं. यही हमारे भविष्य के समाज के निर्माण में मुख्य भूमिका निभानेवाले हैं. ऐसे में ज़रूरी है कि बच्चों की नींव मज़बूत बने.
  • हमारे बच्चे हमसे ही सीखते हैं. हम झूठ और फरेब करेंगे, तो यह अपेक्षा न रखें कि बच्चे सब कुछ देखकर भी सच्चाई की राह पर चलेंगे. बेहतर होगा कि हम पहले ख़ुद को बदलें.
  • जितना संभव हो सके, सच्चाई और ईमानदारी से काम करें.
  • अपने बच्चों को भी यही सीख दें. स्वार्थ और झूठ की राह शुरुआत में तो बड़ी आसान लगती है, लेकिन इसके नतीज़े उतने ही घातक होते हैं.
  • स़िर्फ अपने बारे में सोचना ही काफ़ी नहीं है, अपने परिवार के अलावा, समाज व देश की बेहतरी के लिए प्रयास करने भी ज़रूरी हैं.
  • जैसा कि कहा जाता है- क्या हम अपने बच्चों के लिए बेहतर प्लानेट (धरती) छोड़कर जाएंगे…? इसी तरह से कुछ लोग यह भी कहते हैं कि क्या हम अपने प्लानेट के लिए बेहतर बच्चे छोड़कर जाएंगे? तो दोनों ही तरह से सोचना ज़रूरी है.
  • यदि अब हमने ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन पर ध्यान नहीं दिया, तो ज़ाहिर है बहुत कुछ हाथ से निकल जाएगा.

क्यों खोती जा रही है इंसानियत?

  • स्वार्थ और लालच के चलते हम सभी सबसे आगे रहने की ख़्वाहिश रखते हैं.
  • हम सबसे ज़्यादा पैसा कमाएं, हम सबसे ज़्यादा पॉप्युलर हो जाएं, अपने दोस्तों व रिश्तेदारों में हम सबसे अधिक कामयाब रहें… इस तरह की चाहत आम है.
  • कामयाब होना ग़लत नहीं, लेकिन ग़लत तरह से कामयाब होना या किसी और की कामयाबी को देखकर उससे ईर्ष्या रखना ग़लत है.
  • किसी के पास कार है, तो हमारे पास उससे भी बड़ी कार होनी चाहिए, पड़ोसी की टीवी से हमारी टीवी बड़ी होनी चाहिए, वो थाईलैंड के ट्रिप पर गए, तो हमें यूरोप ट्रिप पर जाना है… कुल मिलाकर दिखावे की ज़िंदगी आजकल हम पर हावी रहती है.
  • हमें ख़ुद को दिखाना है कि हम कामयाब हैं, ख़ुश हैं और सबसे ज़्यादा हम ‘कूल’ हैं.

सोशल मीडिया ने भी बदले हैं बहुत-से समीकरण

  • यह सच है कि सोशल मीडिया ने हमें क़रीब किया है, अपने पुराने दोस्तों से, रिश्तेदारों से व ढेर सारे नए अंजान चेहरों से भी.
  • लेकिन हम शायद इसे पचा नहीं पा रहे या इसका ओवरडोज़ इतना हो चुका है कि हम भटक रहे हैं.
  • हम दोहरी ज़िंदगी जीने लगे हैं. अपनी लाइफ को कूल दिखाने की कोशिश में लगे हैं, क्योंकि सोशल मीडिया के वो अंजान चेहरे, जो दोस्त बन चुके हैं, हमारे लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि उन्हें इंप्रेस करने के लिए हम नकली ज़िंदगी जीने या दिखावा करने से भी परहेज़ नहीं करते.
  • इन सबके चलते हम अपने निजी रिश्तों को अपेक्षाकृत कम महत्व देने लगे हैं, हम उनसे दूर हो रहे हैं. ऐसे में भावनाएं, अपनापन, प्यार, मेलजोल, संस्कार आदि बैकवर्ड बातें हो गई हैं और प्रैक्टिकल बनना ही मॉडर्न और कामयाबी की निशानी मानी जाने लगी है.
  • पैरेंट्स भी सोशल मीडिया में बिज़ी हैं और बच्चे भी, ऐसे में कब, कहां और कैसे मूल संस्कार दिए जाएंगे? न व़क्त है और न ही हमें इसकी ज़रूरत महसूस होती है.

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कूल बनना है बहुत ज़रूरी…

  • जी हां, आपके पास महंगे गैजेट्स और ब्रान्डेड कपड़े-जूते हों, यही आपकी बेसिक ज़रूरतें या प्राथमिकता बन चुकी है.
  • दूसरी प्राथमिकता है कि आप सोशल मीडिया पर बहुत ही एक्टिव हों, वरना आप आउटडेटेड कहे जाएंगे.
  • ऐसे में यदि बच्चों को या युवाओं को समझाने बैठेंगे कि ये करो, ये मत करो, तो उन्हें लेक्चर से ज़्यादा कुछ नहीं लगेगा. बेहतर होगा कि आप ख़ुद एक उदाहरण के तौर पर अपने व्यवहार को आदर्श बनाएं, इससे वो बेहतर तरी़के से सीख पाएंगे.
  • ज़रूरी नहीं कि बच्चों की हर डिमांड को पूरा ही किया जाए, उन्हें अनुशासन का महत्व सिखाना भी बेहद ज़रूरी है.
  • अनुशासित युवा ही बेहतर इंसान भी बन सकेगा और सही-ग़लत के बीच के फ़र्क़ को भी समझेगा.
  • बच्चों को बचपन से ही यह एहसास कराना ज़रूरी है कि उनका संबंध स़िर्फ अपने परिवार से ही नहीं है, बल्कि देश व समाज के प्रति भी उनका कर्त्तव्य है. वो एक बेहतर नागरिक बनें, नियमों का पालन करें, समाज के लिए बेहतर इंसान बनें, सबको सम्मान दें.
  • बच्चों को यह समझाना भी महत्वपूर्ण है कि कूल बनने का सही अर्थ क्या होता है. एक अनुशासनहीन युवा कभी भी कूल नहीं होता, वो एंटीसोशल एलीमेंट होता है, जबकि सच के लिए खड़े रहनेवाला ही कूल होता है, जिसमें गट्स होता है, जो दूसरों के लिए भी आवाज़ उठाता है.
  • क्योंकि एकाएक अचानक यदि हम यह चाहें कि समाज बदल जाए, तो यह संभव ही नहीं, बदलाव के लिए समय व प्रयास दोनों ही ज़रूरी हैं और यह बदलाव हमें ही लाना होगा, तभी बेहतर समाज का निर्माण होगा और इंसानियत की जीत भी.

देश और समाज के प्रति भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है…

  • हम बेहतर नागरिक बनें, बेहतर इंसान बनें यह हमारे व हमारे परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए सकारात्मक बात होगी.
  • ज़ाहिर-सी बात है, जब सामाजिक मूल्य ऊंचे होंगे, तो अपराध कम होंगे.
  • हम समाज के प्रति अधिक ज़िम्मेदार बनेंगे, ग़लत राह पर न ख़ुद चलेंगे और न ही दूसरों को चलने देंगे.
  • यह जज़्बा हरेक में होना चाहिए. न स़िर्फ अपने देश व समाज में बल्कि आज के दौर में विश्‍वभर में इंसानियत को सहेजने की बेहद आवश्यकता है.
  • यदि इंसानियत होती, तो आतंकी हमले न होते, यदि इंसानियत होती, तो दुनिया बारूद के ढेर पर न बैठी होती, यदि इंसानियत होती, तो सरहदों पर हथियार और बंदूकें नहीं होतीं… लेकिन यह इंसानियत सबमें नहीं है. आत्मरक्षा के लिए भी बहुत कुछ करना मजबूरी है. ऐसे में यदि हम शुरुआत अपने परिवार व समाज से करें, तो धीरे-धीरे ही सही, सफलता मिलेगी. लेकिन इसके लिए सतत प्रयास करने होंगे, वरना इंसानियत मरती जाएगी और यह शब्द स़िर्फ क़िस्से-कहानियों में ही सीमित होकर रह जाएगा.

सच्चाई बयां करते आंकड़े

  • नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में सर्वाधिक हत्या व बलात्कार के मामले पाए जाते हैं.
  • यही नहीं, महिलाओं के ख़िलाफ़ भी सबसे अधिक अपराधों में उत्तर प्रदेश को सबसे आगे पाया गया.
  • रेप यानी बलात्कार के मामलों में पिछले वर्षों के मुक़ाबले लगभग 12.4 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी देखी गई.
  • इसके अलावा एक और तथ्य जो आंकड़ों से सामने आया है, वो यह कि 95% बलात्कार की शिकार महिलाएं अपराधी को पहचानती थीं.
  • अब तक बलात्कार को लेकर एक धारणा समाज में बनी हुई थी कि एक ख़ास तरह के लोग ही बलात्कार करते हैं और ख़ास क़िस्म की महिलाएं ही इसका शिकार होती हैं. समाज व परिवार की इसी सोच के चलते आज भी अधिकांश मामले दर्ज ही नहीं किए जाते.
  • आंकड़े बताते हैं कि 95% मामलों में पीड़िता अपराधी को पहचानती है. इसमें से 27% तो पड़ोसी ही होते हैं, 22% वो जो शादी का झूठा दिलासा देकर संबंध बनाते हैं, 9% घर-परिवार व नाते-रिश्तेदार होते हैं. इसी तरह से कहीं-कहीं एंप्लॉयर, को-वर्कर्स, पार्टनर आदि भी अपराधी होते हैं.
  • इंसानियत को शर्मसार करने के लिए ये आंकड़े काफ़ी हैं. इसी से यह अंदाज़ा लग जाता है कि आज की तारीख़ में सबसे अधिक यदि किसी बात की ज़रूरत है, तो वो है इंसानियत को सहेजने की.

– रामेश्‍वर दयाल शर्मा

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       बेला मुखर्जी

Hindi Short Story

 

“यार! सब घर-परिवार में आराम से रह रहे हैं. तेरे लिए सभी चिंता करते हैं. इतना सूना जीवन, अकेला, इस उम्र में… पर क्या करें? तूने तो अपने लिए कभी सोचा ही नहीं. अरे, डॉक्टर तो हम सभी थे, पर तेरी तरह अधूरा तो कोई भी नहीं रहा.”
राजीव के जाने के बाद डॉक्टर साहब कुर्सी पर ढीले पड़ गए.

‘डॉक्टर साहब!’ घर-बाहर, छोटे-बड़े सभी इसी नाम से जानते हैं उनको. यही उनका परिचय भी है और पहचान भी. इस पहचान के चलते लोग उनके मम्मी-पापा द्वारा दिया गया नाम ‘सत्य प्रकाश’ भूल ही गए हैं. पापा के कुलगुरु ने उनकी जन्मपत्री बनाते समय आशीर्वाद के साथ कहा था, “यह संतान भाग्यवान है. इसका यश चारों दिशाओं में फैलेगा. इसका बहुत बड़ा परिवार होगा और उस परिवार में यह ईश्‍वर की तरह पूजा जाएगा.”
सुनकर मम्मी-पापा उस समय अवश्य ही ख़ुशी में फूले नहीं समाए होंगे. आज उनको हंसी आती है उस भविष्यवाणी पर. बड़ा तो दूर, आज पचास की उम्र हो गई है, लेकिन घर व जीवन दोनों सूने पड़े हैं. अकेले हैं, नौकर मुरारी के भरोसे. मज़े की बात यह है कि अपने मरीज़ों की चिंता में उनकी नींद तो उड़ती रही, पर अपने या अपने भविष्य में आनेवाले बुढ़ापे के लिए सोचने का समय ही नहीं मिला.
मेडिकल कॉलेज में दुखी लोगों की सेवा में अपने सुख व आराम को त्याग देने की जो शपथ ली थी, उन्होंने उसका अक्षरशः पालन किया है. उसके लिए मन में कभी कोई अभावबोध या अकेलापन भी नहीं जागा. और मरीज़ भी एक से बढ़कर एक. यदि किसी के दम तोड़ते समय भी डॉक्टर साहब आकर खड़े हो जाते तो सबकी आंखों में आशा की किरण फूट पड़ती. लोग धर्म गुरु को सिर पर बैठाते हैं, क्योंकि वो परलोक सुधारते हैं और डॉक्टर साहब परलोक के रास्ते में चट्टान बनकर खड़े हो जाते हैं. मौत से हाथापाई कर भगाते हैं तो लोग उनको अपने प्राणों में बसा लेते हैं. वैसे उनका शरीर मज़बूत है. संयमित, व्यसन रहित जीवन और संतुलित भोजन के साथ सदा कर्मठ रहने से बीमारी पास नहीं आती. पर अचानक वायरल ने आक्रमण करके आठ दिन में ही शरीर तोड़-सा दिया है. जूनियर्स को मौक़ा मिल गया उन पर रौब चलाने का. घर में ज़बरदस्ती नज़रबंद कर रखा है. लेटे-लेटे वर्षों के बाद, अपनी स्टूडेंट सुमन की याद आई. उस भोली मासूम-सी लड़की ने भी तो उनको दिल से प्रेम और आदर अर्पण किया?था. इतनी सुंदर थी सुमन कि उसका प्यार पाने के लिए पूरे मेडिकल कॉलेज के युवा तड़प रहे थे, पर वो तो समर्पित हो चुकी थी अपने से 15 वर्ष बड़े अपने सर के प्रति.
कई बार क्लास लेते-लेते उस पर नज़र गई तो देखा वो तन्मय हो उनके चेहरे को देख रही है, पर उनकी समझ में नहीं आया कि उसकी आंखों में जानने-समझने का आग्रह था या प्रेम की मुग्धता. असल में अपना काम छोड़ और किसी ओर ध्यान देने का समय या मानसिकता थी ही नहीं उनमें. आज फुर्सत के पलों में अचानक उसकी याद आई. पता नहीं कहां होगी वो. अवश्य ही एक सुखी जीवन जी रही होगी. बहुत अच्छी लड़की थी सुमन. अच्छी पत्नी होने के सारे गुण थे उसमें. उसके साथ उन्होंने जो किया वो ग़लत तो था, पर अपराध नहीं. कम से कम उनके मन में कभी कोई अपराधबोध नहीं जागा उस घटना को लेकर.
सच तो यह है कि पुरानी बातों को याद करने का समय उन्हें कभी नहीं मिला. कोई नाज़ुक हालत में हो तो उस मरीज़ को जूनियर डॉक्टर के भरोसे नहीं छोड़ सकते. वे रात में भी एक-दो राउंड लेने चले आते हैं. वर्षों बाद घर में आराम करने का अवसर दिया इस वायरल ने. ऊपर से जूनियर डॉक्टरों को मौक़ा मिल गया उनको बिस्तर पर बांधने का. आज जाकर उनको थोड़ा समय मिला अपने बीते जीवन को याद करने का. अब बुख़ार नहीं, बस, वायरल वाली कमज़ोरी भर है. वे अस्पताल जाना भी चाहते थे, पर सारे जूनियर डॉक्टरों ने एकजुट हो अल्टीमेटम दे दिया कि ह़फ़्ते से पहले उन्होंने अस्पताल में पैर रखा तो सारे के सारे अनिश्‍चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे. वे जानते हैं कि ये लोग उनका आदर-सम्मान ही नहीं करते, बल्कि दिल से बेहद प्यार भी करते हैं. जब बुख़ार था, तब एक-दो डॉक्टर दिन-रात घर में ही रहकर पहरेदारी करते रहे. अब बुख़ार उतरा तो उनसे पीछा छूटा.
बाहर के बरामदे में एक जरनल लेकर बैठे थे. तभी एक चमचमाती गाड़ी आकर रुकी. चौकीदार ने गेट खोल लंबा सलाम मारा. कोई परिचित होगा. ड्राइविंग सीट से उतर वे सज्जन पास आकर बोले, “क्यों बे, तू कैसे बीमार पड़ गया?‘’ और सामने पड़ी दूसरी कुर्सी खींच बैठ गए. उन्होंने ध्यान से देखा तो पहचान गए. क्लासमेट राजीव, एमआरसीपी करने लंदन गया था. रईस खानदान का बेटा. पढ़ाई के बाद नौकरी कर वहीं बस गया.
“अरे राजीव! कब आया तू?”
“कल! बाबूजी की पहली बरसी थी तो आना पड़ा. तुझसे मिलने अस्पताल गया था तो पता चला तू बीमार है. तेरा अस्पताल अनाथ पड़ा है तेरे बिना.” हंस पड़े दोनों.
“मामूली वायरल था. बुख़ार भी कब का उतर गया, पर सब लोगों ने मिलकर पाबंदी लगा घर में बिठा रखा है.”
“भाग्यवान है मेरे भाई. तुझे सब चाहनेवाले ही मिले. वैसे यह नई उम्र के लड़के हमसे ज़्यादा समझदार हैं. पर सत्य! काम करने की भी सीमा होती है. ढलती उम्र में थकान को अनदेखा कैसे कर सकता है तू?”
“ढलती उम्र, थकान… ये सारे शब्द मेरे लिए नए और अजीब-से लग रहे हैं. मुझे तो ऐसा कुछ भी नहीं लगता.”
“लगे या न लगे, पचास को पार कर आए हैं हम.”
“पर मुझे लगता है, मैं अभी-अभी पच्चीस का हुआ हूं. तूने अपना यह क्या हाल बना लिया है? मन भर फ़ालतू चर्बी जमा करेगा शरीर में तो पचास क्या सत्तर वर्ष की थकान आएगी.”
“क्या करूं यार? घरेलू पत्नी किसी को न मिले. उसे कुकिंग छोड़ दुनिया में कुछ भी पसंद नहीं. रोज़ नई-नई चीज़ बनाती और खिलाती है.”
“मज़े में है यार.”
“अब घर है तो उसका सुख भी होगा. तेरा तो न घर, न घर का आराम.” खुलकर हंसे दोनों.
“ऐसा नहीं है. बोल न क्या खाएगा? हां, तू क्या देश में नहीं लौटेगा?” हंसता राजीव अचानक उदास हो गया,
“बहुत मन करता है मेरे भाई. पर यह विदेश ऐसा चक्रव्यूह है कि इसमें घुसना आसान है, पर निकलने का रास्ता नहीं मालूम. रास्ता भी खोज लिया तो अनिश्‍चित भविष्य का डर, असुरक्षा का आतंक, बच्चों के करियर की चिंता…”
“बहुत दिन हो गए देश को छोड़े, इसलिए ऐसी सोच है तेरी. आया है तो महीने-दो महीने रहकर जा. देख, देश कहां पहुंचा है. कितनी ऊंचाई को छू रहा है.”
“नहीं होगा यार, बच्चे नहीं आना चाहते. मन तो हर पल रोता है अपनी माटी के लिए, पर… फिर भी बच्चे अपना दाना आप चुगने लगें तो दोनों बूढ़े-बूढ़ी लौट आने का सपना देख रहे हैं.”
“मैंने तुझको तभी मना किया था.”
“इतनी गहरी सोच कहां थी तब? लालच में चला गया था. अरे हां, सुमन भी वहीं है, हमारे पड़ोस में ही रोज़ का आना-जाना, उठना-बैठना है.’
“सुमन! लंदन में है?”
“हां, हमारे पड़ोस में. तूने उसकी क़दर नहीं की, पर ईश्‍वर ने उस भली लड़की को भरा-पूरा सुख दिया है. बहुत ही सुखी परिवार है उसका, तीन प्यारे से बच्चे और हंसमुख, मिलनसार पति. बहुत ख़ुश है सुमन. पास ही एक छोटे से अस्पताल में पार्ट टाइम नौकरी भी करती है.”
“उसका पति डॉक्टर है?”
“न… न… सीए है किसी कंपनी में. अच्छी नौकरी पर है. अपना घर भी ले लिया है.” फिर दोनों मित्रों ने बहुत सारी पुरानी यादें ताज़ा कीं. राजीव का बहुत सारे दोस्तों से अभी भी संपर्क बना हुआ है. कुछ विदेश में हैं, पर अधिकतर देश में ही सुखी-संपन्न जीवन जी रहे हैं. थोड़ी देर बाद चलते हुए बोले, “यार! सब घर-परिवार में आराम से रह रहे हैं. तेरे लिए सभी चिंता करते हैं. इतना सूना जीवन, अकेला, इस उम्र में… पर क्या करें? तूने तो अपने लिए कभी सोचा ही नहीं. अरे, डॉक्टर तो हम सभी थे, पर तेरी तरह अधूरा तो कोई भी नहीं रहा.”
राजीव के जाने के बाद डॉक्टर साहब कुर्सी पर ढीले पड़ गए. आंखें बंद हो गईं. लगभग दो दशक बाद आंखों के सामने आ गई फूल-सी खिली-खिली, ख़ूबसूरत सुमन. शांत स्वभाव की थी वो. अपनी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों को उनके मुख पर गड़ाकर तन्मय हो उनका लेक्चर सुनती. सिर झुका नोट्स लेती, जब भी उस पर नज़र पड़ती, उसकी एकाग्रता में कभी कोई कमी नहीं पाते. उन्होंने कभी उस पर ध्यान नहीं दिया. हां, उसको शिष्य के रूप में पसंद अवश्य करते थे. नए-नए मेडिकल कॉलेज में लेक्चरार हुए थे. अपने ज्ञान को शिष्यों पर प्रदर्शित करने की प्रबल इच्छा थी, पर शायद सुमन इन सब से अलग और ज़्यादा पाने की आशा रखती थी. पर वो इन सबको समझ ही नहीं पाते. फिर भी मौन पुजारिन की तरह सुमन उनके साथ साये की तरह रहती. वो पढ़ाई पूरी कर उनके ही अंडर में काम कर रही थी. तब उसके मम्मी-पापा ही प्रस्ताव लेकर आए. ना ही कर देते, पर मित्रों ने ऐसे घेरा, ऐसी लताड़ लगाई कि उनको हां करना ही पड़ा.
सुमन खिल उठी ताज़े गुलाब की तरह. सगाई का दिन निकाला गया. ख़ूब धूमधाम व रौनक थी. सारे दोस्तों को निमंत्रण दिया गया था. सगाई की रस्म पूरा करके हाथोंहाथ शादी का मुहूर्त भी निकाला जाना था. दोस्त उनके घर जमा होने लगे तो उन्होंने उन सबको सीधे सुमन के घर भेज दिया.
“बस, एक राउंड लेकर फिर तैयार होकर अभी आया. तुम लोग चलो तब तक. ठंडा-वंडा पीयो.” ठीक समय पर वार्ड का राउंड लेकर घर लौटे. आज किसी मरीज़ से ज़्यादा उलझे नहीं. नहाकर तैयार होते-होते कई दोस्तों के कई फ़ोन आए, “अबे जल्दी आ.”
एक बार सुमन ने भी लजाते हुए पूछा, “कितनी देर में आएंगे.”
“बस, निकल रहा हूं.”
हल्के आसमानी शर्ट के ऊपर ग्रे सूट पहना. टाई उनको पसंद नहीं, पर राजीव चेतावनी दे गया था, “टाई ज़रूर बांधना.” टाई बांधी. सुमन के लिए एक हीरे की अंगूठी ख़रीद लाए थे, उसे जेब में रखा. घर से निकले ही थे कि एक बूढ़ा आकर पैरों पर पछाड़ खाकर गिर पड़ा. बुरी तरह रो रहा था वो, “डाक्टर साब! मेरे पोते को बचा लो. हम बूढ़े-बूढ़ी की बुढ़ापे की लाठी है वो. बहू-बेटे को पहले ही खो चुके, पोते के सहारे ज़िंदा थे. अब डॉक्टरों ने उसे भी जवाब दे दिया. आप हमारे भगवान हैं. आप हमारे सहारे को बचा लीजिए.”
एक बार सोचा भगा दें. डॉक्टरों के जीवन में ये सब तो लगा ही रहता है, तभी अपनी शपथ याद आ गई. झुककर बूढ़े को दोनों हाथों से उठाया. जेब से अंगूठी की डिब्बी फिसल बाहर लुढ़क गई, उसे देखा भी नहीं.
“कहां है तुम्हारा पोता?”
“दस नंबर के बेड पर.”
याद आया यह फ्री बेड है. अति ग़रीब बूढ़ा-बूढ़ी अपने पंद्रह-सोलह वर्ष के पोते को लेकर आए थे. बुरा हाल था लड़के का. वास्तव में ही संकट था. लगा, लड़का अंतिम सांसें गिन रहा है. दो हाउस जॉब वाले असहाय खड़े हैं. सब कुछ भूल तैयार हो गए मौत से कुश्ती लड़ने. रातभर खींचतान रही उनमें और मौत में. भोर में मौत तंग आकर, थककर लौट गई. घर लौटे तो भोर की पहली किरण धरती को चूमने नीचे उतर रही थी. किसी प्रकार कपड़े बदल बिस्तर पर लेटकर गहरी नींद सो गए थे.
दूसरे दिन से सुमन काम पर नहीं आई. कभी भी नहीं आई, किसी ने बताया कि कोई स्कॉलरशिप ले वो विदेश चली गई है. भूल ही गए थे उसको. असल में वो उनके मन की गहराई को इतना बड़ा समर्पण करके भी छू नहीं पाई थी. आज इतने वर्षों बाद राजीव के मुंह से उसके सुखी, भरे-पूरे परिवार की बात सुन अच्छा ही लगा. थोड़ा स्नेह तो था ही उसके लिए मन में, स्टूडेंट थी अपनी. उनके मन में सभी स्टूडेंट के लिए स्नेह था. मन ही मन आशीर्वाद दिया, “मैं बहुत ख़ुश हुआ सुमन तुम्हारे सुखी और भरे-पूरे जीवन की बात सुन. ईश्‍वर! तुमको अखंड सौभाग्य दे.”
हां, राजीव के मन में उनके लिए दुख है. अपना कोई नहीं, परिवार के नाम पर कोई भी नहीं. घर-जीवन सब सूना पड़ा है, लेकिन क्या यह सच है? झपकी-सी आने लगी, शायद सो ही गए थे कि पैरों पर किसी के स्पर्श से चौंककर जाग उठे. एक युवती उनके दोनों पैरों पर माथा रख प्रणाम कर रही है. दो प्यारे से बच्चे हाथ में गेंदे के फूल लिए और एक आकर्षक युवक हाथ में थैला लिए खड़ा था.
“अरे… उठो, यह क्या? कौन हो तुम?”
युवती ने सिर उठाया, आंचल से आंसू पोंछे, मन के आवेग से आंसू आ गए थे.
“मैं मालती हूं डॉक्टर बाबा.”
“मालती…?” कुछ याद नहीं आया. इतने मरीज़ आते-जाते हैं. सबको याद रखना संभव नहीं है. शायद कभी इसके बच्चे, पति या इसका ही इलाज किया होगा.
“बाबा! सुना आपकी तबीयत ठीक नहीं तो मुझसे रहा नहीं गया. आप तो हमारे ईश्‍वर हैं.” अब युवक भी आगे आया. मालती का पति होगा. थैला उसे पकड़ा घुटनों के बल बैठ उसी प्रकार पैर पर माथा रख प्रणाम किया. बच्चों को आगे किया. उन्होंने डरते-डरते दोनों फूल बढ़ा दिए. मन में वसंत ऋतु की सुगंधित हवा बह चली, मानो उनका जीवन परिपूर्ण हो उठा. सिर पर हाथ रख आशीर्वाद दिया उनको, “सच्चे इंसान बनो. सबके लिए जीयो.”
युवती ने काग़ज़ की प्लेट में दो सेब रख आगे कर दिया, “बाबा! हम ग़रीब आपके लिए भला क्या लाते? आपको याद नहीं होगा. इतने मरीज़ आते-जाते हैं. दो वर्ष पहले मेरे पति को जब सबने जवाब दे दिया था, तब आपने दिन-रात एक करके उनका जीवन लौटाया था.”
तभी याद आ गया, हां जीवित रहने की आशा एकदम नहीं थी. निमोनिया पूरी तरह बिगड़ चुका था. झोला छाप डॉक्टरों ने मौत के द्वार तक पहुंचा दिया था. उसको तो अस्पताल में ले भी नहीं रहे थे. जूनियर्स ने बार-बार कहा, “इसका आख़िरी समय आ गया है सर. क्यों बेकार में बदनामी अपने सिर लें?” पर वो नहीं माने. स्वयं उसकी देखभाल करते रहे, दूसरों पर भरोसा नहीं किया. कुछ दवाएं बहुत महंगी थीं, जो अस्पताल से नहीं मिलतीं, उनको अपनी जेब से मंगाकर देते. बचा लिया था उसे. आज स्वस्थ युवक सामने खड़ा है. एक अनजान ख़ुशी से मन भर उठा.
“डॉक्टर बाबा! भगवान को हमने देखा नहीं, पर इतना जानते हैं कि कभी-कभी वो भी कान बंद कर लेते हैं. आप हमारे लिए भगवान हैं. मेरा सुहाग लौटा दिया. आज मैं भगवान की पूजा से पहले आपको प्रणाम करती हूं रोज़.”
“पर ये सब क्यों…?”
“ईश्‍वर के दर्शन तो खाली हाथ नहीं करते. हम ग़रीब और क्या भेंट दें…”
वो हंसे. दोनों सेब उठा दोनों बच्चों को दे दिया.
“ख़ुश रहो.”
आंसू पोंछ वे लोग चले गए. वो फिर कुर्सी पर ढीले पड़ गए. मन ने कहा,
‘राजीव! तेरा हिसाब ग़लत है. तुम सबको हरा दिया है मैंने! मेरा जीवन सूना नहीं है. क्या है तुम लोगों के पास? अपना छोटा-सा परिवार. एक दिन चुपचाप संसार को छोड़ चले जाओगे तो पता भी नहीं चलेगा किसी को, पर मेरा परिवार इतना बड़ा है कि मैं ही अपने सदस्यों को पहचान नहीं पाता. बीमार पड़ा, तो ऐसे घेर लेते हैं मुझे कि मौत मेरे पास आने के लिए चार बार सोचकर हिम्मत जुटाएगी. नहीं राजीव, मैंने खोया कुछ भी नहीं, बल्कि इतना पाया है कि तुम सबको हरा दिया है.’

 

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