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वास्तु के अनुसार कलर स्कीम सिलेक्शन(Colour Scheme Selection as per Vastu Shashtra)

आपके जीवन में हमेशा ख़ुशियां शामिल हों… सुख-संपत्ति और स्वास्थ्य प्राप्त हो, इसके लिए ज़रूरी है घर को वास्तु शास्त्र से सजाना… कलर स्कीम वास्तु के सिद्धांतों के अनुसार तय करना.

 

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– आसमानी रंग का इस्तेमाल मकान के उत्तर दिशा में करना चाहिए.
– लाल रंग का इस्तेमाल घर के दक्षिणी या दक्षिण-पूर्वी हिस्से में करें.

 

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– अगर इस हिस्से में अगर बेडरूम हो तो वहां लाइट पिंक रंग लगाएं.
– हरे रंग का प्रयोग घर के उत्तर में करना चाहिए. इससे आपकी आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा.

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– पीले रंग का इस्तेमाल घर के पूर्वोत्तर में स्थित किसी भी कमरे में किया जा सकता है.

 

– अगर इस दिशा में स्टडी रूम, लाइब्रेरी या बच्चों का कमरा हो तो डार्क पीले की जगह हल्के पीले रंग का इस्तेमाल करें.
– छोटे बच्चों, लड़कियों और नवविवाहित जोड़ों के कमरे में हल्के बैंगनी रंग का इस्तेमाल करें.
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ध्यान रखें-

 

– दक्षिण पूर्व में कभी हल्के या गहरे ब्लू रंग का इस्तेमाल न करें.
– पूर्वोत्तर या उत्तर दिशा में कभी लाल या ऑरेंज रंगों का इस्तेमाल न करें.
– एक ही बेडरूम की चारों दीवारों पर अलग-अलग कलर न करें. इससे रिश्तोें में तनाव आता है.
– मकान के बाहरी दीवारों पर ग्रे, ब्राउन या काले रंग का इस्तेमाल कभी न करें.
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रसोई की ग़लत दिशा बिगाड़ सकती है सेहत और रिश्ते भी (Vastu Tips For Kitchen)

Vastu Tips For Kitchen
आजकल वास्तु के संबंध में लोगों में काफ़ी भ्रम एवं असमंजस की स्थिति है. जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. वास्तु शास्त्र का मूल आधार भूमि, जल, वायु एवं प्रकाश है, जो जीवन के लिए अति आवश्यक है. इनमें असंतुलन होने से नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न होना स्वाभाविक है. उदाहरण के द्वारा इसे और स्पष्ट किया जा सकता है- सड़क पर बायें ही क्यों चलते हैं, क्योंकि सड़क की बायीं ओर चलना आवागमन का एक सरल नियम है. नियम का उल्लंघन होने पर दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है. इसी तरह वास्तु के नियमों का पालन न करने पर व्यक्ति विशेष का स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि उसके रिश्ते पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

वास्तु में रसोईघर के कुछ निर्धारित स्थान दिए गए हैं, इसलिए हमें रसोईघर वहीं पर बनाना चाहिए. वास्तुशास्त्र के अनुसार रसोईघर, चिमनी, भट्टी, धुएं की चिमनी आदि मकान के विशेष भाग में निर्धारित की जाती है, ताकि हवा का वेग धुएं तथा खाने की गंध को अन्य कमरों में न फैलाए तथा इससे घर में रहने व काम करनेवालों का स्वास्थ्य न बिगड़े.

रसोईघर की ग़लत दिशा

* यदि रसोईघर नैऋत्य कोण में हो तो यहां रहने वाले हमेशा बीमार रहते हैं.

* यदि घर में अग्नि वायव्य कोण में हो तो यहां रहने वालों का अक्सर झगड़ा होता रहता है. मन में शांति की कमी आती है और कई प्रकार की  परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है.

* यदि अग्नि उत्तर दिशा में हो तो यहां रहने वालों को धन हानि होती है.

* यदि अग्नि ईशान कोण में हो तो बीमारी और झगड़े अधिक होते हैं. साथ ही धन हानि और वंश वृद्धि में भी कमी होती है.

* यदि घर में अग्नि मध्य भाग में हो तो यहां रहने वालों को हर प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

* यदि रसोईघर से कुआं सटा हुआ होे तो गृहस्वामिनी चंचल स्वभाव की होगी. अत्यधिक कार्य के बोझ से वह हमेशा थकी-मांदी रहेगी.

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रसोई कहां हो?

* रसोईघर हमेशा आग्नेय कोण में ही होना चाहिए.

* रसोईघर के लिए दक्षिण-पूर्व क्षेत्र सर्वोत्तम रहता है. वैसे यह उत्तर-पश्‍चिम में भी बनाया जा सकता है.

* यदि घर में अग्नि आग्नेय कोण में हो तो यहां रहने वाले कभी भी बीमार नहीं होते. ये लोग हमेशा सुखी जीवन व्यतीत करते हैं.

* यदि भवन में अग्नि पूर्व दिशा में हो तो यहां रहने वालों का ़ज़्यादा नुक़सान नहीं होता है.

* रसोईघर हमेशा आग्नेय कोण, पूर्व दिशा में होना चाहिए या फिर इन दोनों के मध्य में होना चाहिए. वैसे तो रसोईघर के लिए उत्तम दिशा आग्नेय ही  है.

क्या करें, क्या न करें?

* उत्तर-पश्‍चिम की ओर रसोई का स्टोर रूम, फ्रिज और बर्तन आदि रखने की जगह बनाएं.

* रसोईघर के दक्षिण-पश्‍चिम भाग में गेहूं, आटा, चावल आदि अनाज रखें.

* रसोई के बीचोंबीच कभी भी गैस, चूल्हा आदि नहीं जलाएं और न ही रखें.

* कभी भी उत्तर दिशा की तरफ़ मुख करके खाना नहीं पकाना चाहिए. स़िर्फ थोड़े दिनों की बात है, ऐसा मान कर किसी भी हालत में उत्तर दिशा में चूल्हा  रखकर खाना न पकाएं.

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स्मार्ट टिप्स

* रसोई में तीन चकले न रखें, इससे घर में क्लेश हो सकता है.

*  रसोई में हमेशा गुड़ रखना सुख-शांति का संकेत माना जाता है.

* टूटे-फूटे बर्तन भूलकर भी उपयोग में न लाएं, ऐसा करने से घर में अशांति का माहौल बना रहता है.

* अंधेरे में चूल्हा न जलाएं, इससे संतान पक्ष से कष्ट मिल सकता है.

* नमक के साथ या पास में हल्दी न रखें, ऐसा करने से मतिभ्रम की संभावना हो सकती है.

* रसोईघर में कभी न रोएं, ऐसा करने से अस्वस्थता बढ़ती है.

* रसोई घर पूर्व मुखी अर्थात् खाना बनाने वाले का मुंह पूर्व दिशा में ही होना चाहिए. उत्तर मुखी रसोई खर्च ज़्यादा करवाती है.

* यदि आपका किचन आग्नेय या वायव्य कोण को छोड़कर किसी अन्य क्षेत्र में हो, तो कम से कम वहां पर बर्नर की स्थिति आग्नेय अथवा वायव्य      कोण की तरफ़ ही हो.

* रसोई घर की पवित्रता व स्वच्छता किसी मंदिर से कम नहीं होनी चाहिए. ऐसा करने से मां अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है.

* रसोईघर हेतु दक्षिण-पूर्व क्षेत्र का प्रयोग उत्तम है, किन्तु जहां सुविधा न हो वहां विकल्प के रूप में उत्तर-पश्‍चिम क्षेत्र का प्रयोग किया जा सकता है,  किन्तु उत्तर-पूर्व मध्य व दक्षिण-पश्‍चिम क्षेत्र का सदैव त्याग करना चाहिए.

वास्तु-दोष कैसे दूर करें?

– घर के द्वार पर आगे वास्तुदोष नाशक हरे रंग के गणपति को स्थान दें.  बाहर की दीवारों पर हल्का हरा या पीला रंग लगवाएं.

– मुख्य द्वार पर वास्तु मंगलकारी यंत्र लगाएं.

– घर की मुख्य पूजा में गणपति को स्थान दें.

डायनिंग रूम

* डायनिंग एरिया में हल्का हरा या हल्का नीला रंग करें.

* डायनिंग टेबल पर या ग्रुप में बैठकर भोजन करते हों तो दिशाओं पर ध्यान न दें, पर घर के मुखिया या विशेष मेहमान का मुंह पूर्व दिशा में अवश्य  होना चाहिए एवं वह स्थान कभी खाली नहीं रहना चाहिए. स्वामी के अभाव में उस ग्रुप में जो प्रमुख हो, वह वहां बैठे.

* पूर्व की ओर मुख करके खाने से मनुष्य की आयु बढ़ती है, दक्षिण की ओर मुख करके खाने से प्रेतत्व की प्राप्ति होती है, पश्‍चिम की ओर मुख करके  खाने से मनुष्य रोगी होता है और उत्तर की ओर मुख करके खाने से आयु तथा धन की प्राप्ति होती है.

वास्तु और फेंगशुई के जानकारी से भरपूर आर्टिकल्स के लिए यहां क्लिक करें: Vastu and Fengshui

बेडरूम में पॉज़िटीविटी बनाए रखने के लिए फॉलो करें ये 9 वास्तु रूल्स (9 Effective Vastu Tips to bring Positive energy to your bedroom)

Vastu Tips to bring Positive energy

Vastu Tips to bring Positive energy

जहां सकारात्मक ऊर्जा मौजूद होती है, वहां का माहौल भी ख़ुशनुमा बना रहता है. ऐसे में अपने बेडरूम को ख़ुशियों से भरने के लिए क्या करें कि बेडरूम में सकारात्मक ऊर्जा भर जाए? आइए, हम बताते हैं.

बेडरूम की दिशा
कोशिश करें कि आपका मास्टर बेड दक्षिण दिशा में हो. इससे बेडरूम सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर होगा और सौभाग्य की प्राप्ति होगी.
बेडरूम का दरवाज़ा
इस बात का ध्यान रहे कि बेडरूम में प्रवेश करने के लिए एक से अधिक दरवाज़े न हों. हालांकि ऐसा बहुत कम होता है, मगर तब भी इस ओर विशेष ध्यान दें.
बचें अवरोध से
बेडरूम में इस तरह से सामान सेट करें कि दरवाज़ा और खिड़की आसानी से खुले और बंद हो सके. किसी तरह की कोई रुकावट न हो. ऐसा होने से कमरे में सकारात्मक ऊर्जा आसानी से प्रवेश करती है.
पर्याप्त रोशनी
रोज़ाना सुबह के वक़्त और रात होने से पहले 15 से 20 मिनट के लिए बेडरूम का दरवाज़ा और खिड़की खुला रखें ताकि घर में पर्याप्त प्राकृतिक रोशनी और ताज़ी हवा का संचार हो सके.
बेडरूम की सफ़ाई
बेडरूम की सजावट से ज़्यादा सफ़ाई पर ध्यान दें. बिखरी पड़ी चीज़ों को एक ओर समेटकर रखें. नियमित झाड़ू-पोंछा लगाएं. गंदगी से नकारात्मक ऊर्जा आकर्षित होती है.
बेडरूम में बेड
बेडरूम में बेड को किसी भी दीवार से सटाकर न रखें. वास्तु के अनुसार बेड की ये स्थिति अशुभ का प्रतीक मानी जाती है.
सीनरी या पेंटिंग
बेडरूम के दरवाज़े के ठीक सामने सुंदर-सी सीनरी या पेंटिंग लगाएं. जिसे देखकर सुखद एहसास हो. मायूस या दुख से भरी तस्वीरें दीवारों पर न लगाएं.
बेडरूम न खाएं खाना
बेडरूम में लंच या डिनर करने की ग़लती न करें, ख़ासकर बेड पर. ऐसा करने से न स़िर्फ बेडरूम में गंदगी फैलती है, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा भी आकर्षित होती है.
समय बिताएं बेडरूम में
स़िर्फ सोने के लिए ही बेडरूम की ओर रूख़ न करें, बल्कि बाकी चीज़ें, जैसे- लिखने-पढ़ने, म्यूज़िक सुनने आदि के लिए भी बेडरूम में जाएं यानी सकारात्मकता के लिए ज़्यादा से ज़्यादा समय बेडरूम में बिताएं.

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Vastu Tips to bring Positive energy

रखें इन बातों का भी ध्यान

* डबल बेड पर दो अलग-अलग गद्दे न बिछाएं. एक ही गद्दा बिछाएं. हो सके तो तकिया भी शेयर करें. इससे पति-पत्नी के रिश्ते मज़बूत होते हैं.

* रात में सोते वक़्त सिर दक्षिण दिशा की ओर करके सोएं. भूल से भी उत्तर दिशा की ओर सिर या दक्षिण दिशा की ओर पैर न करें. ये अशुभ माना    जाता है.

* पानी या पानी से बने शो पीसेस, जैसे- वॉटर डेकोरेटिव आइटम्स, फाउंटेन, वॉटर फॉल पेंटिंग/सीनर आदि बेडरूम में न रखें. ये पति-पत्नी के बीच  झगड़े की वजह बन सकता है.

* बेडरूम में टीवी रखने की भूल न करें. अगर आप टीवी देखने के शौक़ीन हैं और हटाना नहीं चाहते, तो इसे ढंक दें, मगर ढंकने के लिए कपड़े की बजाय  प्लास्टिक कवर का इस्तेमाल करें.

* इसी तरह बेडरूम के ठीक सामने आईना न हो, इस बात का भी ध्यान रखें. साथ ही साथ बेडरूम में मौजूद बाकी आईने को भी ढंक कर रखें.

* सिलिंग को जोड़ने वाले पिलर के नीचे न सोएं. ये न स़िर्फ आपके बीच होने वाले झगड़े की वजह बन सकता है, बल्कि आप दोनों को एक-दूसरे से  अलग भी कर सकता है.

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17 असरदार वास्तु टिप्स स्पाइसी सेक्स लाइफ के लिए (17 Effective Vastu tips for spicy sex life)

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यदि कुछ समय से आपकी सेक्स लाइफ ठीक नहीं चल रही है, तो अपने बेडरूम का वास्तु चेक करें. हो सकता है वहां कुछ कमी हो. वास्तु के अनुसार बेडरूम को अरेंज करें, इससे आप मानसिक रूप से ख़ुश रहेंगे और पार्टनर के साथ रिश्ता भी गहरा होगा. सेक्स लाइफ को बेहतर बनाने के लिए कैसा हो बेडरूम का वास्तु? चलिए, जानते हैं.

* सिर को उत्तर दिशा में रखकर सोने से न स़िर्फ सेक्स लाइफ प्रभावित होती है, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी होती हैं. सेक्स के बाद थकान भी  अधिक महसूस होती है. इसकी मुख्य वजह है मैग्नेटिक वेव्स यानी चुंबकीय तरंगें जो हमें प्रभावित करती हैं.

* दक्षिण की ओर सिर रखने से सेक्स का आनंद ज़्यादा मिलता है.

* पश्‍चिम की ओर सिर रखने से सेक्स लाइफ़ सामान्य रहती है और सेक्स के बाद नींद भी अच्छी आती है.

* पूर्व दिशा में सिर रखने से दोनों में से एक पार्टनर पैसिव होगा, जबकि दूसरा फ्रस्टेट हो जाएगा.

* आपका बेड लकड़ी का होना चाहिए. धातुओं के बेड के प्रयोग से बचें, क्योंकि उनसे पति-पत्नी के बीच ईगो प्रॉब्लम होती है.

* बेड दीवार को सपोर्ट करते हुए होना चाहिए, इससे रिश्ते में मज़बूती आती है.

* एक और बात का ज़रूर ध्यान रखें कि आपके बेड को सपोर्ट करनेवाली दीवार पर कोई खिड़की न हो, इससे विवाहेतर संबंधों की संभावना बढ़ जाती  है, क्योंकि दीवार का सपोर्ट चला जाता है.

* इसी तरह दरवाज़े की दिशा दक्षिण-पश्‍चिम की ओर नहीं होनी चाहिए.

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* बेडरूम में आईना कभी भी बेड को फेस करते हुए नहीं होना चाहिए, क्योंकि उसके रिफ्लेक्शन से नींद डिस्टर्ब होती है और ज़ाहिर है नींद सही नहीं होगी तो उसका नकारात्मक प्रभाव हमारी मानसिक दशा, दिनचर्या और जीवन से जुड़े तमाम पहलुओं पर पड़ेगा, जिसमें सेक्स भी शामिल है.

* बेडरूम में मंदिर व श्रीयंत्र वगैरह नहीं रखना चाहिए. यहां हम भगवान की मूर्ति जैसी पवित्र चीज़ें रखेंगे, तो उसका बुरा प्रभाव पड़ेगा. यदि किसी के  यहां एक ही कमरा है, तो वे लकड़ी का मंदिर रखकर उसे पर्दे से ढंक सकते हैं.

* वस्तुओं के साथ-साथ रंगों का भी प्रभाव पड़ता है. दीवारों का रंग ग्रे, ब्लैक या ब्लू नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये रंग आपके मूड को प्रभावित करते हैं  और नकारात्मक भावनाएं उत्पन्न करते हैं. ये डलनेस भी पैदा करते हैं.

* यदि सेक्स की इच्छा कम होती हो तो ब्राइट कलर्स का प्रयोग करें. इनसे जोश, उत्साह बना रहेगा.

* कमरे में रोशनी भरपूर होनी चाहिए. इससे मूड प्रभावित होता है. कमरे में यदि रोशनी उचित मात्रा में नहीं रहेगी, तो जोश और उत्साह में कमी  आएगी. नकारात्मक चीज़ें जल्दी प्रभावित करेंगी.

* कमरे में क्रिएटिव चीज़ें रखें, चाहे वो पेंटिंग हो या कुछ और. आप फ्लावर पॉट रख सकते हैं, इससे एक ताज़गी का एहसास भी बना रहेगा.

* साज-सज्जा के अलावा बहुत ज़रूरी है कि कमरा साफ़-सुथरा रहे. न स़िर्फ वास्तु के दृष्टिकोण से, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी साफ़-सफ़ाई ज़रूरी  है. यह आपके मूड को भी प्रभावित करती है.

* सेक्स से पहले व्यक्तिगत तौर पर भी कुछ तैयारियां ज़रूरी हैं. आप नहा-धोकर, इत्र लगाएं, साफ़-सुथरे, आकर्षक और आरामदायक कपड़े पहनें.

* कपड़ों का रंग भी बहुत महत्व रखता है. जितना संभव हो, गहरे रंग के कपड़ों से दूर रहें, जैसे- ब्लैक, डार्क ब्लू. इन रंगों से ईगो क्लैशेज़ हो सकते हैं.

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28 असरदार वास्तु टिप्स से पाएं सौभाग्य व समृद्धि (28 Effective Vastu Tips for Good Luck & Prosperity )

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यदि आप जीवन में सौभाग्य व समृद्धि चाहते हैं, तो वास्तु से जुड़ीं इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखें.

* तुलसी के गमले में दूसरा और कोई पौधा न लगाएं, ऐसा करने से धनहानि हो सकती है या बनते काम बिगड़ सकते हैं.

* पूर्व या उत्तर में तुलसी अवश्य लगाएं. इससे घर में शारीरिक, मानसिक, आर्थिक लाभ बना रहता है.

* पलंग पर स्टील के बर्तन न रखें, इससे स्वास्थ्य लाभ में कमी आ सकती है.

* चलते हुए आभूषण पहनने से उनकी वृद्धि में कमी आती है. अतः ऐसा न करें.

* पूर्व या उत्तरमुखी होकर आभूषण पहनना सौभाग्यशाली होता है. इससे प्रतिष्ठा बढ़ती है और अपयश से बचाव भी होता है.

* मकान बनवाते समय सबसे पहले बोरिंग, फिर चौकीदार का कमरा और बाद में बाहरी दीवार बनवाएं. इससे काम समय पर पूरा होता है.

* एक्सपायर्ड दवाएं रात को ही फेंकनी चाहिए. इससे घर में दवाओं का आना बंद हो जाता है.

* बिजली के स्विचेज़, बिजली का मुख्य मीटर, टीवी आदि कमरे में आग्नेय कोण अथवा वायव्य कोण पर रखने से धन में वृद्धि होती है.

* मकान की सब दिशाओं की तुलना में उत्तरी व पूर्वी भाग में खाली स्थान अधिक हो तो आर्थिक उन्नति के साथ व्यापार में भी विशेष वृद्धि होगी.

* छत की ढलान उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा में रखें. इससे आर्थिक उन्नति होती है.

* घर में कन्याओं का स्थान उत्तर-पश्‍चिम क्षेत्र में ही बनाना चाहिए. ऐसा करने से कन्याओें से संबंधित कार्य जल्दी होते हैं.

* भूलकर भी दर्पण पश्‍चिम या दक्षिण की दीवार पर न लगाएं. दर्पण पूर्व या उत्तर की दीवार पर लगाएं. ऐसा करने से प्रगति जल्दी होती है.

* भवन की ऊंचाई दक्षिण व पश्‍चिम भाग में अधिक तथा उत्तर व पूर्व भाग में कम हो. इससे कार्यों में आसानी होती है.

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* सूर्य की किरणों तथा शुद्ध वायु से वंचित मकान अच्छा नहीं होता तथा मध्याह्न के पश्‍चात् की सूर्य किरणें भी घर में स्थित कूप या जलस्थान आदि  पर पड़ें तो भी अच्छा नहीं होता. तात्पर्य यह है कि प्रातःकालीन सूर्य की किरणों का प्रवेश घर में अवश्य ही होना चाहिए, जो कि श्रेष्ठ है.

* भवन निर्माण इस प्रकार से किया जाए कि भूखण्ड में भवन के चारों ओर खुला स्थान रहे. इससे यशवृद्धि होती है.

* वास्तु की दृष्टि से पश्‍चिम तथा दक्षिण की तुलना में उत्तर तथा पूर्व में अधिक खुला हुआ भाग होना चाहिए. फ्लैट्स में इस सूत्र का उपयोग करके लाभ  लिया जा सकता है. ऐसा करने से जीवन में स्थायित्व भी आता है.

* मकान की नींव खोदने का काम आग्नेय कोण से शुरू करके नैऋत्य कोण की तरफ़बढ़े. कंस्ट्रक्शन नैऋत्य कोण की तरफ़ से आरंभ करके आग्नेय  कोण की तरफ़ बढ़े. ऐसा करने से वास्तुदोष का प्रभाव कम होता है.

* उत्तर या पूर्व में लॉन, सुंदर वृक्ष या फुलवारी होनी चाहिए.

* बिल्डिंग प्लॉट के नैऋत्य कोण में बनवाएं. ऐसा करने से सरकारी विभाग परेशान नहीं करता.

* भूखण्ड व वास्तु की चार दीवारें उत्तर व पूर्व की ओर की अपेक्षा दक्षिण व पश्‍चिम की ओर अधिक मोटी तथा ऊंचाई लिए हों.

* सदा पूर्व की ओर मुख करके ही ब्रश करना चाहिए.

* क्षौरकर्म (बाल कटवाना) पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके ही कराना चाहिए.

* तोते का आना शुभ माना जाता है. इनके आवागमन से कोई हानि नहीं है.

* बेसमेंट में दुकान या ऑफ़िस लेना आवश्यक हो तो पूर्व या उत्तर की दिशा में ही लें.

* प्लॉट के तीनों तरफ़ रास्तों का होना शुभ होता है.

* घर के दक्षिण या पश्‍चिमी भाग में फर्नीचर होना अत्यंत लाभदायक है. फर्नीचर को उत्तर या पूर्वी दीवार से सटा कर कभी नहीं रखना चाहिए.

* गृह-प्रवेश के समय वास्तुशांति हवन, वास्तु जाप, कुलदेवी-देवताओं की पूजा, बड़ों को सम्मान, ब्राह्मणों एवं परिजनों को भोजन कराना चाहिए.

* पानी का निकास वायव्य कोण, उत्तर व ईशान कोण में रखने से कई तरह के लाभ प्राप्त होते हैं.

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14 आसान वास्तु टिप्स से ख़ुशहाल बनाएं बेटी का वैवाहिक जीवन (14 easy vastu tips for daughter’s happy married life)

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क्या कभी आपने सोचा है कि वास्तु दोष से भी वैवाहिक बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं? मगर ये सच है, तो आइए जानते हैं वास्तु की सहायता से कैसे करें इन अड़चनों को दूर?

* वास्तु नियमों के अनुसार वायव्य कोण वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका गुणधर्म तत्काल या यथाशीघ्र एक स्थान से हटकर दूसरे स्थान  में चले जाना है.

* वास्तु नियमों के अनुसार दिशा, स्वामी और ग्रह देवता की उपयोगिता की दृष्टि से अगर हम अपने घर का उपयोग करें, तो गृहस्वामी सहित उसके  माता-पिता और बेटे-बेटियां अपने जीवन में सही समय पर सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं.

* यदि आपके घर का वास्तु सही है, तो आपकी बेटी बिना असमंजस के सही निर्णय ले सकेगी. उसकी शादी भी समय पर अच्छी तरह से हो सकती है.

* कई बार प्रेम-विवाह के मामलेे मेेें लड़कियां ग़लत निर्णय ले लेती हैं और बाद में सिवाए पछतावे के कुछ हाथ नहीं आता. अतः बेटी की बेहतर निर्णय  क्षमता के लिए बेटी का कमरा माता-पिता के कमरे के पूर्व की दिशा में रखना चाहिए.

* जहां तक संभव हो, बेटी को उसके अपने कमरे में सोने दें. यही नहीं उसकी पढ़ने की दिशा भी पूर्व दिशा होनी चाहिए. इसके अलावा उसके कमरे में  रचनात्मक, सुंदर और आकर्षक पेंटिंग लगी होनी चाहिए, जिन्हें देखकर उसमें आत्मविश्‍वास की भावना पनपे.

* कमरे में गहरे या भड़काऊ पर्दे न हों. पर्याप्त रोशनी हो. जहां तक हो, लाल रंग का प्रयोग कम-से-कम करें. यदि संभव हो, तो पीले रंग का प्रयोग करें.

* कुछ घरों में देखा जाता है कि कमरे को खोलने से लेकर शयनकक्ष तक जाने में कहीं सोफे में पैर अटकता है तो कहीं-कहीं दरवाज़ा खोलने में  आलमारी रुकावट बनती है. यह ठीक नहीं, बल्कि घर की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो सुगम हो, आपका हर क़दम सुगमता से पड़े, इससे आपकी  मानसिकता प्रभावित होती है.

* वास्तु संतुलन का इसलिए भी विशेष महत्व है कि माता-पिता के व्यवस्थित रहने और उनके घर का वास्तु सही रहने का प्रभाव बेटी की शादी और  उसके सुखी जीवन पर भी पड़ता है. बेटी के घर मेेें कितना भी वैभव हो, अगर बेटी के माता-पिता परेशान हैं, उनका वास्तु ग़लत है, तो बेटी के दांपत्य  पर उसका प्रभाव पड़ेगा.

* शोधों से यह प्रमाणित हुआ है कि जिस घर में माता-पिता परेशान थे या जिनके घर का वास्तु असंतुलित था, उन बेटियों का दांपत्य जीवन भी  मुश्किल दौर से गुज़रता है, इसलिए अपने घर के वास्तु संतुलन पर पूरा ध्यान दें.

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वास्तु के अनुसार वैवाहिक स्थल

* ध्यान दें कि वैवाहिक स्थल का मुख्य प्रवेशद्वार पूर्व ईशान, दक्षिण आग्नेय, पश्‍चिम वायव्य या उत्तर ईशान में
होना चाहिए.

* वैवाहिक परिसर में जनरेटर, विद्युत मीटर, अन्य विद्युत उपकरण इत्यादि की व्यवस्था आग्नेय कोण में करनी चाहिए.

* दूल्हा-दुलहन के बैठने एवं आर्केस्ट्रा के लिए स्टेज की व्यवस्था दक्षिण से पश्‍चिम मध्य के बीच वास्तु सिद्धांत के अनुसार हो, जहां दूूल्हा-दुलहन पूर्व  या उत्तर की ओर मुंह करके बैठ सकें.

* विवाह का अग्नि कुंड रिसेप्शन एरिया के आग्नेय कोण में रखना चाहिए. रसोई बनाने का स्थान एवं तंदूर भी रसोेई परिसर के आग्नेय कोण में ही  रखें.

* भोजन की व्यवस्था उत्तर या पश्‍चिम में रखनी चाहिए. खाने-पीने के स्टॉल का क्रम क्लॉक वाइज ही रखें.
सलाद एवं प्लेट्स रखने का स्टॉल समारोह क मध्य में नहीं रखें. परिसर व गार्डन के मध्य का ब्रह्म स्थान खाली रहना चाहिए.

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चाहते हैं बच्चों की तरक्क़ी तो वास्तु के अनुसार सजाएं कमरा (Vastu tips for kids room)

Vastu Tips

बच्चों के बहुमुखी विकास के लिए सही खानपान, मार्गदर्शन व शिक्षा के अलावा एक स्वस्थ वातावरण की भी ज़रूरत होती है. ऐसे में क्यों न, वास्तु के अनुसार बच्चों का कमरा सजाया-संवारा जाए, ताकि एकाग्रता के साथ-साथ उनका बौद्धिक विकास भी हो सके. आइए, वास्तु के अनुसार बच्चों का कमरा किस तरह होना चाहिए, इसके बारे में जानते हैं.

* सबसे पहले कमरे के बीच में खड़े होकर कम्पास की मदद से दिशा का ज्ञान करें. यह स्थान साफ़-सुथरा, प्रकाशमय व शांतिपूर्ण होना चाहिए, ताकि  बच्चे का मन एकाग्र हो सके.

* बच्चों का कमरा घर के पश्‍चिम, उत्तर व पूर्व दिशा में होना चाहिए.

* कमरे का प्रवेश द्वार उत्तर तथा पूर्व में होना चाहिए.

* पढ़ते समय अपना मुख पूर्व अथवा उत्तर की तरफ़ होना चाहिए. इस बात को ध्यान में रखकर टेबल-कुर्सी की व्यवस्था करें.

* मां सरस्वती व गणपति भगवान की स्थापना ईशान कोण में होनी चाहिए.

* पलंग का सिरहाना पूर्व दिशा की तरफ़ हो.

* टाइम टेबल, पेंटिंग, फोेटो पिनअप बोर्ड 4 फ़ीट पर उत्तर या पश्‍चिम में लगाएं.

* जीवन में कामयाब व प्रभावशाली व्यक्तियों, पौधों आदि की तस्वीर लगाएं.

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* हरा, गुलाबी, स़फेद व पीला रंग उपयुक्त है.

* प्लग प्वाइंट कमरे के दाहिनी तरफ़ हो.

* सोने का बिस्तर नैऋत्य कोण में हो.

* टेबल लैम्प (60 वॉल्ट) इस तरह हो कि प्रकाश पीछे की तरफ़ से आए.

* पीठ पीछे दीवार हो, तो अति उत्तम. यदि न हो, तो भी परेशानी की बात नहीं.

* उत्तर-पूर्व में खिड़की उत्तम है.

* कमरे का मध्य खाली हो.

* खिलौने, कपड़े, जूते दक्षिण या पश्‍चिम दिशा में रखें.

* आईना उत्तर और पूर्व दीवार पर हो और कॉपी-क़िताबें सुविधानुसार रखें.

* घड़ी पूर्वी दीवार पर हो और कम्प्यूटर आग्नेय कोण में हो.

* हर रोज़ ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः की एक माला का जाप करें.

* बच्चों का शयन-कक्ष पूर्व अथवा ईशान क्षेत्र में होना शुभ है. अध्ययन भवन, सभा और पठन-पाठन के लिए यह क्षेत्र शुभ है.

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सकारात्मक जीवन के लिए वास्तु टिप्स (Vastu Tips for Positive Life)

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हमारे जीवन पर वास्तु का सकारात्मक प्रभाव पड़े, इसके लिए ज़रूरी है कि कई छोटी-छोटी बातों का हम ध्यान रखें.

 

जीवन को प्रभावशाली बनाने के लिए

* रसोई हमेशा अग्निकोण (दक्षिण-पूर्व) में ही होनी चाहिए.

* घर के पास कोई श्मशान भूमि नहीं होनी चाहिए.

* नए मकान-फैक्ट्री व उद्योग को शुरू करने के पहले भूमि-पूजन करके नींव का मुुहूर्त ज़रूर करना चाहिए. इस शुभ मुहूर्त में चांदी का सर्प बनाकर नींव
(ज़मीन) में किसी विद्वान ब्राह्मण के हाथों अवश्य डालना चाहिए.

* दरवाज़ा खुलते या बंद करते समय अटकना नहीं चाहिए. दरवाज़े का अटकना जीवन में रुकावट आने का संकेत है.

* मुख्य द्वार पर अंधेरा नहीं होना चाहिए. वह प्रकाशमय होना चाहिए, इसलिए वहां लाइट आदि की व्यवस्था ज़रूर करें.

* बेडरूम में सिरहाने की ओर तीरनुमा शार्प कॉर्नर नहीं होने चाहिए.

* कमरे को ताज़ा फूलों से सजाएं और समय-समय पर फूल बदलते रहें.

* जूते बाहर निकालकर ही घर में प्रवेश करें.

* ऑफिस में आपकी कुर्सी के पीछे दीवार ज़रूर होनी चाहिए, ये आपको निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है.

* उत्तर या पूर्व में लॉन, सुंदर पेड़-पौधे या फुलवारी होनी चाहिए.

* प्रवेश द्वार के सामने लोहार, धोबी एवं नाई की दुकान नहीं होनी चाहिए.

* यदि नैऋत्य (दक्षिण-पश्‍चिम) में भूसतह के नीचे पानी की टंकी है, तो उसे तुरंत वहां से हटवा दें.

* घर के सामने कचरा जमा न होने दें.

* उत्तर-पूर्व एवं उत्तर-पश्‍चिम दिशा से हवा और रोशनी आने की व्यवस्था बनाए रखें.

* शौचालय और रसोई घर का दरवाज़ा आमने-सामने नहीं होना चाहिए.

* पूर्व दिशा में तुलसी का पौधा होना चाहिए.

* घर में बहुत समय तक अंधेरा न रहने दें, रोज़ दीपक जलाएं, नियमित रूप से सफ़ाई करें, ताकि नकारात्मक ऊर्जा पनपने न पाए.

 

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स्वयं के कल्याण के लिए

* सोते समय सिर पूर्व अथवा दक्षिण में रखने के साथ-साथ छेदवाला तांबे का सिक्का तकिए के नीचे रखना चाहिए.

* कैक्टस आदि घर में लगाना वर्जित है.

* यदि घर की खिड़कियां बंद हों, विकृत या फिर टूटी-फूटी हों, तो परिवार की सम्पन्नता व ऐश्‍वर्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है.

* यदि रसोई की दीवार टूटी-फूटी या ख़राब हालत में है, तो घर के मालिक की पत्नी अस्वस्थ हो सकती है व उसका जीवन संघर्षयुक्त रहेगा.

* पूजा स्थल का निर्माण सदा ईशान (उत्तर-पूर्व) कोण में ही करना श्रेष्ठ होता है.

* अतिथियों का स्थान या कक्ष उत्तर या पश्‍चिम दिशा की ओर बनाना चाहिए.

* बेसमेन्ट बनाना आवश्यक हो, तो उत्तर और पूर्व में ब्रह्म स्थान को बचाते हुए बनाना चाहिए.

* घर की उत्तर दिशा में कुआं, तालाब, बगीचा, पूजा घर, तहखाना, स्वागत कक्ष, तिजोरी व लिविंग रूम बनाए जा सकते हैं.

* पश्‍चिम में पीपल, उत्तर में पाकड व दक्षिण में गूलर का वृक्ष अति उत्तम है.

* घर के मुख्य द्वार पर बेल नहीं चढ़ानी चाहिए.

* घर में लगाए गए वृक्षों की कुल संख्या सम होनी चाहिए.

* बरगद व पीपल के वृक्ष पवित्र माने जाते हैं, इसलिए इन्हें मंदिर आदि के आसपास लगाना चाहिए.

* गुलाब को छोड़कर कोई भी कांटेदार पौधा घर में नहीं लगाना चाहिए अन्यथा सुख-शांति में बाधा आ सकती है.

* जिन वृृक्षों या पौधों के पत्तों से दूध जैसा द्रव्य निकलता हो, ऐसे वृक्षों को भी नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि ये द्रव्य भी ऋणात्मक ऊर्जा के बहुत बड़े  स्रोत कहलाते हैं.

* यदि किसी फलहीन वृक्ष की छाया मकान पर पड़ती है, तो विभिन्न रोगों का सामना करना पड़ता है तथा कई तरह की परेशानियां भी पैदा हो सकती हैं.

 

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आत्मविश्‍वास बढ़ाने के लिए

* पूर्व दिशा की ओर स़फेद या लाल आसन पर बैठकर प्राणायाम करना चाहिए.

* घर की दक्षिण दिशा की तरफ़ मेन बेडरूम, स्टोर, सीढ़ियां व ऊंचे पेड़ होना शुभ होता है.

* किसी भी तरह की टूटी-फूटी या कटी-फटी वस्तु का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

* महत्वपूर्ण काम के लिए घर से बाहर जाते समय सुहागिन स्त्री या कुंवारी कन्या के दर्शन करके निकलना चाहिए.

* त्रिभुज आकृतिवाली ज़मीन का चुनाव घर के निर्माण के लिए कभी नहीं करना चाहिए.

* घर की बनावट ऐसी होनी चाहिए कि उसमें सूर्य और चांद का प्रकाश बिना किसी बाधा के पहुंचे. घर में कम से कम तीन घंटे के लिए सूर्य का प्रकाश  सीधा पड़ना चाहिए.

* सेवा कर्मियों को अमावस्या के दिन मिठाई खिलाएं.

* मुख्य प्रवेश द्वार आकर्षक व मजबूत होना चाहिए.

* घर के प्रवेश द्वार के सामने की ज़मीन भी ऊंची नहीं होनी चाहिए.

* हनुमान चालीसा, दुर्गासप्तशती या महामृत्युंजय का पाठ सुविधा व इच्छानुसार नियमित रूप से करना चाहिए.

20 वास्तु टिप्स पूजाघर के लिए (20 vastu tips for pooja room)

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ये सच है कि ईश्‍वर सर्वव्यापी हैं और वे हमेशा सबका कल्याण ही करेंगे, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि दिशाओं के स्वामी भी देवता ही हैं.  अत: आवश्यक है कि पूजा स्थल बनवाते समय भी वास्तु के कुछ नियमों का ध्यान रखा जाए.

 

* घर में कुलदेवता का चित्र होना अत्यंत शुभ है. इसे पूर्व या उत्तर की दीवार पर लगाना श्रेष्ठकर है.

* पूजा घर का द्वार टिन या लोहे की ग्रिल का नहीं होना चाहिए.

* आश्‍विन माह में दुर्गा माता के मंदिर की स्थापना करना शुभ माना गया है. इसका बहुत पुण्य फल मिलता है.

* घर में एक बित्ते से अधिक बड़ी पत्थर की मूर्ति की स्थापना करने से गृहस्वामी की सन्तान नहीं होती. उसकी स्थापना पूजा स्थान में ही करनी  चाहिए.2

* पूजा घर शौचालय के ठीक ऊपर या नीचे न हो.

* पूजा घर शयन-कक्ष में न बनाएं.

* घर में दो शिवलिंग, तीन गणेश, दो शंख, दो सूर्य-प्रतिमा, तीन देवी प्रतिमा, दो द्वारका के (गोमती) चक्र और दो शालिग्राम का पूजन करने से  गृहस्वामी को अशान्ति प्राप्त होती है.

* पूजा घर का रंग स़फेद या हल्का क्रीम होना चाहिए.

* भूल से भी भगवान की तस्वीर या मूूर्ति आदि नैऋत्य कोण में न रखें. इससे बनते कार्यों में रुकावटें आती हैं.

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* पूजा स्थल के लिए भवन का उत्तर पूर्व कोना सबसे उत्तम होता है. पूजा स्थल की भूमि उत्तर पूर्व की ओर झुकी हुई और दक्षिण-पश्‍चिम से ऊंची हो,  आकार में चौकोर या गोल हो तो सर्वोत्तम होती है.

* मंदिर की ऊंचाई उसकी चौड़ाई से दुगुनी होनी चाहिए. मंदिर के परिसर का फैलाव ऊंचाई से 1/3 होना चाहिए.

* मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा उस देवता के प्रमुख दिन पर ही करें या जब चंद्र पूर्ण हो अर्थात 5,10,15 तिथि को ही मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा करें.

* शयनकक्ष में पूजा स्थल नहीं होना चाहिए. अगर जगह की कमी के कारण मंदिर शयनकक्ष में बना हो तो मंदिर के चारों ओर पर्दे लगा दें. इसके  अलावा शयनकक्ष के उत्तर पूर्व दिशा में पूजास्थल होना चाहिए.

* ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य और कार्तिकेय, गणेश, दुर्गा की मूर्तियों का मुंह पश्‍चिम दिशा की ओर होना चाहिए कुबेर, भैरव का मुंह दक्षिण की तरफ़ हो,  हनुमान का मुंह दक्षिण या नैऋत्य की तरफ़ हो.

* उग्र देवता(जैसे काली) की स्थापना घर में न करें.

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3* पूजास्थल में भगवान या मूर्ति का मुख पूर्व या पश्‍चिम की तरफ़ होना चाहिए और उत्तर दिशा की ओर नहीं होना चाहिए, क्योंकि ऐसी दशा में  उपासक दक्षिणामुख होकर पूजा करेगा, जो कि उचित नहीं है.

* पूजाघर के आसपास, ऊपर या नीचे शौचालय वर्जित है. पूजाघर में और इसके आसपास पूर्णत: स्वच्छता तथा शुद्वता होना अनिवार्य है.

* रसोई घर, शौचालय, पूजाघर एक-दूसरे के पास न बनाएं. घर में सीढ़ियों के नीचे पूजाघर नहीं होना चाहिए.

* मूर्ति के आमने-सामने पूजा के दौरान कभी नहीं बैठना चाहिए, बल्कि सदैव दाएं कोण में बैठना उत्तम होगा.

* पूजन कक्ष में मृतात्माओं का चित्र वर्जित है. किसी भी श्रीदेवता की टूटी-फूटी मूर्ति या तस्वीर व सौंदर्य प्रसाधन का सामान, झाडू व अनावश्यक  सामान

* पूजागृह के द्वार पर दहलीज़ ज़रूर बनवानी चाहिए. द्वार पर दरवाज़ा, लकड़ी से बने दो पल्लोंवाला हो तो अच्छा होगा. घर में बैठे हुए गणेशजी की  प्रतिमा ही रखनी चाहिए.

वास्तु और फेंगशुई के जानकारी से भरपूर आर्टिकल्स के लिए यहां क्लिक करें: Vastu and Fengshui

वास्तु के अनुसार कैसा हो मुख्यद्वार (Vastu Tips For Home’s Main Door)

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घर के हर कमरे में वास्तु के नियमों का पालन कर के किस तरह सुख, शांति, समृद्धि के साथ-साथ उत्साह, उमंग और उल्लास का माहौल बनाया जा सकता है, आइए, जानते हैं.

प्रवेशद्वार

घर में सुख-शांति, समृद्धि, धन-वैभव व ख़ुशहाली चाहते हैं तो मुख्यद्वार बनवाते समय वास्तु के कुछ नियमों का पालन करें और घर को नकारात्मक ऊर्जा से बचाएं.

* प्रमुख प्रवेश द्वार अत्यंत सुशोभित होना चाहिए. इससे प्रतिष्ठा बढ़ती है.

* प्रमुख प्रवेश द्वार अन्य दरवाज़ों से ऊंचा और बड़ा भी होना चाहिए यानी घर के मुख्यद्वार का आकार हमेशा घर के भीतर बने अन्य दरवाज़ों की तुलना  में बड़ा होना चाहिए. वास्तु के अनुसार 4ु8 का मुख्यद्वार सर्वोत्तम होता है.

* बड़े शहरों में इतना बड़ा मुख्यद्वार बनाना संभव नहीं होता. ऐसे में इसका आकार 3ु7 भी रखा जा सकता है.

* अगर मुख्यद्वार किसी कारण से घर के अन्य दरवाज़ों से छोटा बन गया हो और उसे बदलना संभव न हो, तो उसके आसपास एक ऐसी फोकस लाइट  लगाएं, जिसका प्रकाश मुख्यद्वार और वहां से प्रवेश करने वालों के चेहरों पर पड़े.

* तोरण बांधने से देवी-देवता सारे कार्य निर्विघ्न रूप से सम्पन्न कराकर मंगल प्रदान करते हैं.

* कम्पाउंड वॉल के पूर्व और उत्तर की तरफ़ मेन गेट होने से समृद्धि और ऐश्‍वर्य मिलता है.

* दरवाज़े जहां तक हो अंदर की ओर ही खुलने चाहिए. बाहर खुलने से हर कार्य में बाधा व धीरे-धीरे धनहानि होकर धनाभाव शुरू हो जाता है.

* घर का कोई भी द्वार धरातल से नीचा न हो.

* नैऋत्य और वायव्य कोण में द्वार न बनवाएं.

* द्वार स्वतः खुलने या बन्द होने वाला नहीं होना चाहिए एवं खोलते या बंद करते समय किसी भी प्रकार की आवाज़ नहीं होनी चाहिए.

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* यदि किसी भवन में एक ही मुख्यद्वार बनवाना हो, तो पूर्व अथवा उत्तर दिशा में मुख्यद्वार बनवाएं. इससे शुभ फल मिलेगा.

* यदि घर दक्षिणमुखी या पश्‍चिममुखी है तो उसमें प्रवेशद्वार एक ही बनवाएं. साथ ही द्वार के बाहर गणेशजी की मूर्ति लगाएं.

* कभी भी नैऋत्य कोण में मुख्यद्वार न बनवाएं.

* वास्तु के अनुसार घर का मुख्यद्वार हमेशा दो पल्ले का होना चाहिए.

* घर के प्रवेशद्वार के आसपास किसी तरह का अवरोध नहीं होना चाहिए, जैसे बिजली के खंभे, कोई कांटेदार पौधा आदि.

* मुख्यद्वार के सामने डस्टबिन यानी कचरे का डिब्बा न रखें. साथ ही प्रवेशद्वार के आसपास सफ़ाई का भी पूरा ध्यान रखें.

* मुख्यद्वार के पास तुलसी का पौधा रखें. इससे वास्तु दोष दूर होते हैं और नकारात्मक ऊर्जा घर में प्रवेश नहीं कर पाती.

* इसके अलावा मुख्यद्वार पर जल से भरा कलश रखने से कई तरह की व्याधि घर के बाहर ही रह जाती है.

* निम्न कोटि के स्थान पर मुख्यद्वार कभी न बनवाएंं, वरना घर में रहनेवाले कई रोगों व परेशानियों के शिकार हो जाते हैं.

* मकान की चौखट या मुख्यद्वार हमेशा लकड़ी का बना होना चाहिए. मकान के भीतर के बाकी दरवाज़ों के फ्रेम लोहे के हो सकते हैं.

* मुख्यद्वार से अंदर प्रवेश करने पर बाईं ओर कुछ भी न रखें. इससे मुख्यद्वार से घर में वायु का प्रवाह सही तरीके से नहीं होगा. अक्सर लोग यहां शू  रैक रखते हैं. ऐसा न करें.

मुख्यद्वार में दिशाओं का महत्व

* यदि घर का मुख्यद्वार उत्तर दिशा में हो तो उस घर में रहनेवालों के पास रुपए-पैसों की कमी कभी नहीं होती. सफलता हमेशा इनके क़दम चूमती है.

* पूर्व दिशा में मुख्यद्वार हो तो नाम, यश, सुख, क़ामयाबी तो मिलती ही है, साथ ही वंशवृद्धि भी होती है.

* अगर मुख्यद्वार दक्षिण दिशा में हो तो यहां रहनेवालों के पास न तो धन-दौलत रहती है और न ही स्वास्थ्य.

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किन दिशाओं का क्या प्रभाव

पूर्व ईशान- सुख-समृद्धि, वंश वृद्धि एवं गृहस्वामी यशस्वी बनेंगे.

पूर्व- ऐश्‍वर्य की प्राप्ति तथा संतान की क़ामयाबी.

पूर्व आग्नेय- पुत्र कष्ट व अग्नि-भय.

दक्षिण आग्नेय- गृहिणी अस्वस्थ एवं भय की शिकार.

दक्षिण- स्त्रियों को मानसिक बीमारियां, आर्थिक तथा शारीरिक तकली़फें.

दक्षिण नैऋत्य- महिलाएं अधिक अस्वस्थ, कर्ज व चरित्रहीनता.

पश्‍चिम नैऋत्य- घर के मुख्य व्यक्ति को कष्ट, दुर्घटना, निराशा तथा पुरुष का चरित्रहीन होना.

पश्‍चिम- धन लाभ, पूजा-पाठ, अध्यात्म के प्रति रुचि एवं पुरुषों की अस्वस्थता.

पश्‍चिम वायव्य- पुरुषों को आर्थिक कष्ट, अकारण शत्रुता, कोर्ट-कचहरी के झगड़े एवं मति भ्रम.

उत्तर वायव्य- महिलाओं का सुख-शान्ति से वंचित होकर घर से बाहर अधिक रहना.

उत्तर- धन लाभ, मान-सम्मान, सुख तथा ख़ुशियों की प्राप्ति.

उत्तर ईशान- सुख-समृद्धि का लाभ, परिवार सुख-सम्पन्न तथा वंश वृद्धि.

वास्तु के मध्य केंद्र- भयंकर आर्थिक एवं मानसिक कष्ट.

वास्तु के अनुसार कैसा हो किचन? (vastu tips for kitchen)

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आजकल वास्तु के संबंध में लोगों में काफ़ी भ्रम एवं असमंजस की स्थिति है. जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. वास्तु शास्त्र का मूल आधार भूमि, जल, वायु एवं प्रकाश है, जो जीवन के लिए अति आवश्यक है. इनमें असंतुलन होने से नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न होना स्वाभाविक है. उदाहरण के द्वारा इसे और स्पष्ट किया जा सकता है- सड़क पर बायें ही क्यों चलते हैं, क्योंकि सड़क की बायीं ओर चलना आवागमन का एक सरल नियम है. नियम का उल्लंघन होने पर दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है. इसी तरह वास्तु के नियमों का पालन न करने पर व्यक्ति विशेष का स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि उसके रिश्ते पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. वास्तु में रसोईघर के कुछ निर्धारित स्थान दिए गए हैं, इसलिए हमें किचन (रसोईघर) वहीं पर बनाना चाहिए. Vastu tips

रसोईघर की ग़लत दिशा से बढ़ सकती हैं मुश्किलें

* यदि रसोईघर नैऋत्य कोण में हो तो यहां रहने वाले हमेशा बीमार रहते हैं.

* यदि घर में अग्नि वायव्य कोण में हो तो यहां रहने वालों का अक्सर झगड़ा होता रहता है. मन में शांति की कमी आती है और कई प्रकार की  परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है.

* यदि अग्नि उत्तर दिशा में हो तो यहां रहने वालों को धन हानि होती है.

* यदि अग्नि ईशान कोण में हो तो बीमारी और झगड़े अधिक होते हैं. साथ ही धन हानि और वंश वृद्धि में भी कमी होती है.

* यदि घर में अग्नि मध्य भाग में हो तो यहां रहने वालों को हर प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

* यदि रसोईघर से कुआं सटा हुआ होे तो गृहस्वामिनी चंचल स्वभाव की होगी. अत्यधिक कार्य के बोझ से वह हमेशा थकी-मांदी रहेगी.

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रसोई कहां हो?

* रसोईघर हमेशा आग्नेय कोण में ही होना चाहिए.

* रसोईघर के लिए दक्षिण-पूर्व क्षेत्र सर्वोत्तम रहता है. वैसे यह उत्तर-पश्‍चिम में भी बनाया जा सकता है.

* यदि घर में अग्नि आग्नेय कोण में हो तो यहां रहने वाले कभी भी बीमार नहीं होते. ये लोग हमेशा सुखी जीवन व्यतीत करते हैं.

* यदि भवन में अग्नि पूर्व दिशा में हो तो यहां रहने वालों का ़ज़्यादा नुक़सान नहीं होता है.

* रसोईघर हमेशा आग्नेय कोण, पूर्व दिशा में होना चाहिए या फिर इन दोनों के मध्य में होना चाहिए. वैसे तो रसोईघर के लिए उत्तम दिशा आग्नेय ही  है.

क्या करें, क्या न करें?

* उत्तर-पश्‍चिम की ओर रसोई का स्टोर रूम, फ्रिज और बर्तन आदि रखने की जगह बनाएं.

* रसोईघर के दक्षिण-पश्‍चिम भाग में गेहूं, आटा, चावल आदि अनाज रखें.

* रसोई के बीचोंबीच कभी भी गैस, चूल्हा आदि नहीं जलाएं और न ही रखें.

* कभी भी उत्तर दिशा की तरफ़ मुख करके खाना नहीं पकाना चाहिए. स़िर्फ थोड़े दिनों की बात है, ऐसा मान कर किसी भी हालत में उत्तर दिशा में चूल्हा  रखकर खाना न पकाएं.

* भोजन कक्ष (डाइनिंग रूम) हमेशा पूर्व या पश्‍चिम में हो. भोजन कक्ष दक्षिण दिशा में बनाने से बचना चाहिए.

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स्मार्ट टिप्स

* रसोई में तीन चकले न रखें, इससे घर में क्लेश हो सकता है.

* रसोई में हमेशा गुड़ रखना सुख-शांति का संकेत माना जाता है.

* टूटे-फूटे बर्तन भूलकर भी उपयोग में न लाएं, ऐसा करने से घर में अशांति का माहौल बना रहता है.

* अंधेरे में चूल्हा न जलाएं, इससे संतान पक्ष से कष्ट मिल सकता है.

* नमक के साथ या पास में हल्दी न रखें, ऐसा करने से मतिभ्रम की संभावना हो सकती है.

* रसोईघर में कभी न रोएं, ऐसा करने से अस्वस्थता बढ़ती है.

* रसोई घर पूर्व मुखी अर्थात् खाना बनाने वाले का मुंह पूर्व दिशा में ही होना चाहिए. उत्तर मुखी रसोई खर्च ज़्यादा करवाती है.

* यदि आपका किचन आग्नेय या वायव्य कोण को छोड़कर किसी अन्य क्षेत्र में हो, तो कम से कम वहां पर बर्नर की स्थिति आग्नेय अथवा वायव्य  कोण की तरफ़ ही हो.

* रसोई घर की पवित्रता व स्वच्छता किसी मंदिर से कम नहीं होनी चाहिए. ऐसा करने से मां अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है.

* रसोईघर हेतु दक्षिण-पूर्व क्षेत्र का प्रयोग उत्तम है, किन्तु जहां सुविधा न हो वहां विकल्प के रूप में उत्तर-पश्‍चिम क्षेत्र का प्रयोग किया जा सकता है,  किन्तु उत्तर-पूर्व मध्य व दक्षिण-पश्‍चिम क्षेत्र का सदैव त्याग करना चाहिए.

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वास्तु के अनुसार कैसी होनी चाहिए सीढ़ियां?

आपके घर की सीढ़ियां आपकी क़ामयाबी की सीढ़ियां भी बन सकती हैं. बस, सीढ़ियां बनवाते समय वास्तु के कुछ नियमों का पालन करें और आप क़ामयाबी की ऊंचाइयों को छू सकते हैं.

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* मकान की सीढ़ियां पूर्व से पश्‍चिम या उत्तर से दक्षिण की ओर जाने वाली होनी चाहिए.
* बड़े मकानों में सीढ़ी का पूरा हिस्सा मकान के दक्षिण या दक्षिण-पश्‍चिम हिस्से में होना चाहिए. मकान के उत्तर-पूर्व कोने में तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए.
* कई ऐसे घरों में जहां दो मंज़िला मकान होता है, वहां अक्सर यह देखने में आता है कि लोग ऊपर का घर किराए पर दे देते हैं और नीचे की मंज़िल में स्वयं रहते हैं और वहां तक पहुंचने के लिए सीढ़ी घर के सामने ही बना देते हैं, यह एकदम ग़लत है. ऐसे में मकान मालिक को आर्थिक तकलीफ़ से गुज़रना पड़ता है, जबकि उसका किराएदार फ़ायदे में रहता है.
* हमेशा मकान के दक्षिण या पश्‍चिम हिस्से में ही सीढ़ियां बनाएं. साथ ही इस बात का ध्यान भी रखना चाहिए कि सीढ़ियां उत्तर से दक्षिण की ओर तथा पूर्व से पश्‍चिम की ओर जाती हों और जब पहली मंज़िल की ओर निकलती हों तो हमारा मुख उत्तर-पश्‍चिम या दक्षिण-पूर्व में होना चाहिए.
* जहां तक हो सके, अंदरूनी या बाहरी सीढ़ियां उत्तर या पूर्वी दीवार से जुड़ी हुई नहीं होनी चाहिए. उनके बीच कम-से-कम तीन इंच का अंतर होना चाहिए. यदि आपके घर के भीतर सीढ़ियां बनी हुई हों तो ध्यान रखें कि वह आपके लिए लाभदायी कोण में हों अन्यथा परिवार में अनबन रहती है.
* ग़लत स्थान पर ग़लत ढंग से ग़लत नियमों के आधार पर यदि सीढ़ियों का निर्माण होता है, तो पागलपन, विवाद, नीलामी, आयकर के छापे, बीमारी एवं निर्धनता का प्रवेश शनै:-शनै: होने लगता है.

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ध्यान रखें
* भवनों में सीढ़ियां वास्तु के अनुरूप बनाएं.
* सीढ़ियों का द्वार पूर्व व दक्षिण दिशा में होना चाहिए.
* सीढ़ियां घुमावदार निर्मित करानी हों तो घुमाव सदैव पूर्व से दक्षिण, दक्षिण से पश्‍चिम, पश्‍चिम से उत्तर और उत्तर से पूर्व दिशा में हों.
* सीढ़ियों में घुमाव चाहे कितने भी हों, संख्या विषम ही रहे यानी 5,11,17,23 आदि संख्या में सीढ़ियां हों. सीढ़ियों के शुरू और अंत में द्वार बनाना चाहिए.
* उतरते समय सीढ़ियों की समाप्ति पर हमारा मुंह पूर्व वा उत्तर की ओर होना चाहिए.