Vyangy

एक समर्थक चोर को सूचना दे रहा है, “पिछली रात सुकई चाचा के घर में चोर घुसा और सब कुछ लूट लिया. ग़लती सरासर सुकई की है, उसे आंख खोल कर सोना चाहिए था.”
चोर ने मुंह खोला, “मैं तो गांव हित में सोता ही नहीं! पूरी रात चिंतन, मनन और खनन में बीत जाती है. ख़ैर, पुलिस भी आई होगी?”

मेरे गांव में चोर को चोर नहीं कहा जाता! कैसे कहें- चोर बुरा मान जाएग. फिर गांधीजी ने कहा भी है कि बुरा मत मत कहो, बुरा मत सुनो और बुरा मत देखो! गांव वाले अक्षरशः पालन करते हैं. चोरी करते देख कर लोग आंखों पर गांधारी पट्टी बांध लेते हैं. चोर को बुरा कहने की जगह पीड़ित की ग़लती निकालते हैं. चोर के अतीत और वर्तमान पर कुछ इस तरह अध्यात्म छिड़कते हैं, “वो अगर चोर है, तो इसके लिए वो नहीं उसके हालात कुसूरवार हैं. चोर को नहीं हमें उसके हालात की निन्दा करनी चाहिए. पाप और पापी का ये रहस्यवाद गांववाले निगल रहे हैं. अब आगे से जब भी चोरी होगी चोर की जगह हालात को ढूंढ़ा जाएगा. अपराध की इस नई नियमावली से सबसे ज़्यादा स्थानीय पुलिस ख़ुश है.
गांववाले जानते हैं कि वह चोर है, पर संस्कार से मजबूर हैं. चोर को चोर नहीं कह सकते. चोर को चोर कहने के लिए जो नैतिक साहस चाहिए, वो अब ऑउट ऑफ डेट हो चुका है. उल्टे गांव के लोग चोर से बडे़ सम्मान के साथ पेश आते हैं. चोर भय बिन होय न प्रीत की हकीक़त जानता है. कई लोग उसके फन से भयभीत होकर इसके पक्के समर्थक बन गए हैं. उनमें से कई उसके चौपाल में चिलम पीने भी पहुंच जाते हैं. चोर का जनाधार बढ़ रहा है, मगर गांव बंट रहा है. समर्थक उसके पक्ष में चमत्कारी दलील दे रहे हैं, “वो चोर नहीं दरअसल संत है.’ विरोधियों को चोरी नहीं करने दे रहा है, इसलिए वो लोग एक संत को चोर कह रहे हैं. संत के आने के बाद विरोधियों की आपदा बढ़ गई और चोरी करने का अवसर गायब हो गया.”
चोर का एक और समर्थक आध्यात्म का सहारा ले रहा है, “हमें चोर से नहीं चोरी से घृणा करना चाहिए. क्या पता कब चोर का हृदय परिवर्तन हो जा. अंगुलिमाल पहले डकैत थे बाद में संत हो गए. ये जो चोर और डाकू होते हैं न, उन्हें ‘संत’ होते देर नहीं लगती. हमें तो भइया पूरा यक़ीन है कि सिद्ध प्राप्ति का कठिन मार्ग चोरी और डकैती से ही निकल कर जाता है. अपन तो कभी भी उसे चोर नहीं मानते, क्या पता कब चोर और भगवान दोनों बुरा मान जाएं… (भगवान तो मान भी जाते हैं, पर चोर की नाराज़गी अफोर्ड नहीं कर सकते. क्या पता कल आंख खुले, तो तो घर स्वच्छ भारत अभियान से गुज़र चुका हो)
गांव के दो-चार मुहल्ले अभी भी विरोध में हैं, पर नक्कारखाने में तूती की आवाज़ कौन सुने, जबकि अब खुलकर चोर को संत घोषित किया जा रहा है. सुबह देर से उसके चौपाल में पहुंचा. एक समर्थक चोर को सूचना दे रहा है, “पिछली रात सुकई चाचा के घर में चोर घुसा और सब कुछ लूट लिया. ग़लती सरासर सुकई की है, उसे आंख खोल कर सोना चाहिए था.”
चोर ने मुंह खोला, “मैं तो गांव हित में सोता ही नहीं! पूरी रात चिंतन, मनन और खनन में बीत जाती है. ख़ैर, पुलिस भी आई होगी?”
“हां, आई थी और चोरी के ज़ुर्म में सुकई को पकड़ कर थाने ले गई! दरोगाजी कह रहे थे, “ज़रूर तूने इस गांव के किसी संत को फंसाने के लिए अपने घर में चोरी की होगी! जब तक ज़ुर्म कबूल नहीं करेगा छोडूंगा नहीं…”
“किसी संत पर इल्ज़ाम नहीं लगाना चाहिए.”
“और क्या! पिछले हफ़्ते जगेसर के घर में चोरी हुई और चोर अपनी सीढ़ी छोड़ गया. पूरे गांव में किसी ने सीढ़ी को नहीं पहचाना कि उसका मालिक कौन है. दरोगाजी ने तीसरे दिन जगेसर को पीट कर थाने में बंद कर दिया. शाम होते-होते जगेसर ने कबूल कर लिया कि उसी ने अपने घर में चोरी की थी.”
कुछ प्रशंसक अब बाकायदा चारण हो गए हैं, हर जगह चोर के शौर्य, सदाचार और सत चित आनंद का गुणगान करते रहते हैं, “अगर वो कभी चोर था, तो वो उसका अतीत था. वर्तमान में वो संत है. हमें उस पर गर्व करना चाहिए.” चोर को अपने फन पर गर्व है. कभी-कभी वो चोरी और गर्व साथ-साथ कर लेता है. गांव के कुछ चारण, तो उसके फन में भी रहस्यवाद ढूंढ़ रहे हैं. चाय की गुमटी के पास शाम को एक चारण गांववालों से कह रहा था, “संत और फकीरों की बातें वही जानें. उनके हर काम के पीछे दूरदृष्टि या कोई दिव्य मक़सद होता है. प्रथम दृष्टया, जो हमें चोरी लग रही है, वो आत्मनिर्भरता हो सकती है.” (जैसे सुकई और जगेसर के दिन फिरे) गांववाले बहुमत का रुझान देख कर भी कन्विंस नहीं हो रहे हैं. ये वो लोग हैं, जिन्होंने कई बार रात के अंधेरे में चोर को आत्मनिर्भर होकर लौटते हुए देखा है. (उनके मन मंदिर से वो दिव्य छवि अब तक नहीं उतरी)
आत्मनिर्भर संत अब सरपंच बनने की ओर अग्रसर है, मगर दुर्भाग्य देखिए कि इतने भागीरथ प्रयत्न के बाद भी गांव और गांववाले ग़रीबी रेखा के नीचे जा रहे हैं!..

Sultan Bharti
सुलतान भारती
Kahani

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Satire Story

इश्क़ का साइड इफेक्ट देखिए. लोग कहते हैं इश्क़ अंधा होता है. मै नहीं मानता. लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट, शिरीन-फरहाद और हीर-रांझा में कोई अंधा नहीं था. सभी आंखवालों ने जान-बूझकर चूल्हे में सिर दिया. हर आदमी इश्क़ नहीं कर सकता. कुछ लोग इश्क़ करते हैं, कुछ लोग इश्क़ के तंदूर पर बैठ जाते हैं. इश्किया साहित्य में और बुरा हाल है. जिसे इश्क़ का सलीक़ा नहीं आता, वही इश्क़ की परिभाषा तय करता है.

अब इस वक़्त जब कि दिन के ग्यारह बज रहे हैं, मैं पूरी निर्भीकता से रजाई ओढ़कर लेटा हूं. बगलवाले घर की बालकनी से अंदर चल रही टीवी की आवाज़ सुनाई पड़ रही है- दे दे प्यार दे.. प्यार दे.. प्यार दे दे.. मुझे प्यार दे… ऐसा लगता है गोया आशिक अपना गिरवी माल छुड़ाने आया हो. पहले इज़हारे इश्क़ का भी एक सलीका हुआ करता था- तेरे प्यार का आसरा चाहता हूं… कोरोना ने कैरेक्टर पर कितना घातक असर डाला है. प्रेमी रिक्वेस्ट करने की जगह राहजनी पर उतारू है- दे दे प्यार दे.. प्यार दे, प्यार दे दे.. मुझे प्यार दे… (जितना है सब निकाल दे) इसे कहते हैं दिनदहाड़े इश्क़ की तहबाजारी. प्यार और व्यापार के बीच की दूरी सिमट रही है.
टीवी बंद हो चुकी है, मगर आवाज़ अभी भी सुनाई पड़ रही है- दे दे प्यार दे… अब उस घर का युवा भविष्य इज़हारे इश्क़ के लिए बालकनी में खड़ा है. मैं हैरान था. दुनिया कोरोना की वैक्सीन मांग रही है और वो प्यार की डिलीवरी का इंतज़ार कर रहा था. लौंडे पर लैला-मजनू का बसंत देख, मैं सोचने लगा, ‘शादी से पहले भला शादी के बाद का संकट क्यों नहीं नज़र आता’ वैसे ये सवाल मैंने वर्माजी से भी पूछा था.
उनका जवाब था, “नज़र भी आ जाए, तो लोग उसे नज़र का धोखा मान लेते हैं. उदाहरण मेरे सामने है. जब तुझे इश्क़ का इन्फेक्शन हुआ था, तो मैंने कितना समझाया था कि इस दरिया-ए-आतिश में मत कूद, पर तू कहां माना था. और फिर… शादी के पांच साल बाद किस तरह के. एल. सहगल की आवाज़ में मेरे सामने रोना रो रहा था, “जल गया जल गया.. मेरे दिल का जहां…”
इश्क़ का साइड इफेक्ट देखिए. लोग कहते हैं इश्क़ अंधा होता है. मै नहीं मानता. लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट, शिरीन-फरहाद और हीर-रांझा में कोई अंधा नहीं था. सभी आंखवालों ने जान-बूझकर चूल्हे में सिर दिया. हर आदमी इश्क़ नहीं कर सकता. कुछ लोग इश्क़ करते हैं, कुछ लोग इश्क़ के तंदूर पर बैठ जाते हैं. इश्किया साहित्य में और बुरा हाल है. जिसे इश्क़ का सलीक़ा नहीं आता, वही इश्क़ की परिभाषा तय करता है. वही तय करता है कि लौकिक और पारलौकिक इश्क़ में- किसके अंदर फिटकरी कम है. जो इश्क़ के मामले में बंजर होता है, वही इश्क़ में ‘अद्वैतवाद’ खोजता है. ऐसे लोगों ने साहित्य को बंजर बनाने में बड़ी अहम भूमिका निभाई है. उन्होंने छायावाद, अद्वैतवाद और अलौकिक दिव्यता के लेप में लपेटकर सीधे-सादे इश्क़ को ममी बनाकर आम आदमी से दूर कर दिया.
तो… इश्क़ क्या है? वो ज़माना गया जब इश्क़ इबादत हुआ करता था. अब इश्क कमीना हो चुका है और उससे आजिज आ गए लोगों का आरोप है कि मुश्किल कर दे जीना… (ये उन्हीं महापुरुषों का काम है, जो इश्क़ को इबादत से कमीना तक लाए हैं) इश्क़ में आदमी निकम्मा हो जाता है, ऐसा मै नहीं चचा गालिब कहते हैं- इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के…
बदलता है रंग आसमां कैसे-कैसे. कोरोना ने इश्क़ को भी संक्रमित कर दिया. इस दौर मे आकर इश्क़ नमाज़ी से इश्क़ जेहादी हो गया. ये अब तक का सबसे बड़ा हृदय परिवर्तन था. लव सीधे जेहाद हो चुका है. अब पुलिस बाकायदा इश्क़ का धर्म, राशन कार्ड और आधार कार्ड चेक करेगी. ऐसे मामले में पुलिस ईश्वर का भी दख़ल बर्दाश्त नहीं करेगी. उधर… इश्क़ गहरे सदमे में है. वो जेहादी हो गया और ख़ुद उसे भनक तक ना लगी. ये सब इतनी जल्दी में हुआ कि इश्क़ को संभलने का भी मौक़ा नहीं मिला. अब उसके सामने चेतावनी है कि चलाओ न नज़रों से बान रे, वरना रोज़ थाने का चक्कर काटना पड़ेगा.
लगता है मां का लाडला बिगड़ गया है. बालकनी से फिर लौंडे के गाने की आवाज़ आ रही है, “दे दे प्यार दे… इस बार उसकी आवाज़ में रोब नहीं याचना है. जैसे वो इश्क़ नहीं गेहूं मांग रहा हो. (वैसे इस हालात-ए-हाजरा में इश्क़ के मुक़ाबले गेहूं ज़्यादा महफूज़ है. इश्क़ को तो पुलिस और पब्लिक दोनों पीट रही है).
मैं एक व्यंग्य लिखने की सोच रहा हूं और देश का भविष्य प्यार का कटोरा उठाए याचना कर रहा है. हम यूपी वाले ऐसे छिछोरे इश्क़ का धुआं देख लें, तो खांसने लगते हैं. मैं फ़ौरन उठकर बालकनी में आ गया. छिछोरा आशिक टॉप फ्लोर की ओर देख कर गाने लगा- हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे.. मरने वाला कोई ज़िंदगी चाहता हो जैसे… उस फ्लैट की खिड़की अभी भी बंद है, पर लौंडा डटा है. आशिक और भिखारी दोनों के धंधे में धैर्य ज़रूरी है.
सतयुग को देखते हुए मुझे पूरा यकीन है कि अभी इश्क़ के इम्तेहान और भी हैं… इश्क़ का दिल से बडा गहरा रिश्ता होता है. और दिल हैं कि मानता नहीं… तो नतीज़ा ये निकला कि सारा किया धरा दिल का है, इश्क़ खामख्वाह बदनाम है. दिल तेरा दीवाना है सनम. दिल खुराफाती है और इश्क़ मासूम.. सदियों से कौआ बेचारा कोयल के बच्चे पालता आया है और दुनिया की नज़र में वो कोयल आज भी मासूम है, जो बडे़ शातिराना तरीक़े से अपने अंडे कौए के घोसले में रख देती है. इश्क़ के इस अवसरवादिता पर एक ताज़ा शेर पेश करता हूं-
दिल ने बड़ी लगन से दरीचे बिछाए थे
कमबख्त मौक़ा पाते ही कुत्ते पसर गए…

Sultan Bharti
सुलतान भारती

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Satire Story

तोते ने घूर कर देखते हुए कहा, “कोई फ़ायदा नहीं. इसकी फटेहाल जैकेट देखकर मैं इसका भाग्य बता सकता हूं. बेकारी का शिकार है. शनि इसके घर में रजाई ओढ़कर सो गया है. ये किसान आन्दोलन में सपरिवार बैठा है, घर में आटा और नौकरी दोनों ख़त्म है. इसे नक्षत्रों की जलेबी में मत फसाओ उस्ताद.” ज्योतिषी को भी दया आ गई, “जा भाई, तेरी शक्ल से ही लग रहा है कि तेरे पास किडनी के अलावा कुछ बचा नहीं है.

Satire Story

अचानक आज मुझे तुलसीदासजी की एक अर्धाली याद आ गई, ‘सकल पदारथ है जग माहीं करमहीन नर पावत नाही’ (मुझे लगता है, ये कोरोना काल में नौकरी गंवा चुके उन लोगों के बारे में कहा गया है, जो इस सतयुग में भी आत्मनिर्भर नहीं हो पाए) ये जो ‘सकल पदारथ’ है ना, ये किसी भी युग में शरीफ़ और सर्वहारा वर्ग को नहीं मिला. सकल पदारथ पर हर दौर में नेताओं का कब्ज़ा रहा है. इस पर कोई और चोंच मारे, तो नेता की सहिष्णुता ऑउट ऑफ कंट्रोल हो जाती है. अब देखिए ना, सैंतालीस साल से ऊपर तक कांग्रेसी ‘सकल पदारथ ‘ की पंजीरी खाते रहे, मगर मोदीजी को सात साल भी देने को राजी नहीं. बस, यहीं से भाग्य और दुर्भाग्य की एलओसी शुरु होती है. हालात विपरीत हो, तो दिनदहाड़े प्राणी रतौंधी का शिकार होकर दुर्भाग्य का गेट खोल लेता है- आ बैल मुझे मार!
बुज़ुर्गों ने कहा है- भाग्य बड़ा बलवान हो सकता है.. मैंने तो देखा नहीं. हमने तो हमेशा दुर्भाग्य को ही बलवान पाया है. कमबख्त दादा की जवानी में घर में घुसा और पोते के बुढ़ापे तक वहीं जाम में फंसा रहा. जाने कितनी पंचवर्षीय योजनाएं आईं और गईं, मगर सौभाग्य ग्राम प्रधान के घर से आगे बढ़ा ही नहीं. मैंने चालीस साल पहले अपने गावं के राम ग़रीब का घर बगैर दरवाज़े के देखा था. आज भी छत पर छप्पर है, सिर्फ़ टटिया की जगह लकड़ी का किवाड़ से गया है. इकलौती बेटी रज्जो की शादी हो गई है. राम ग़रीब की विधवा और दुर्भाग्य आज भी साथ-साथ रहते हैं. उनकी ज़िंदगी में ना उज्ज्वला योजना आई, ना आवास योजना. अलबत्ता सरकारें कई आईं! सचमुच दुर्भाग्य ही दबंग है. दलित, दुर्बल और असहाय पीड़ित को देखते ही कहता है, हम बने तुम बने इक दूजे के लिए…
भाग्य कभी-कभी लॉटरी खेलता है. ऐसे मौसम में प्राणी माझी से सीधे मुख्यमंत्री हो जाता है. अब प्रदेश के सकल पदारथ उसी के हैं, बाकी सारे करम हीन छाती पीटें. कभी-कभी ठीक विपरीत घटित होता है. सकल पदारथ की पावर ऑफ अटॉर्नी लेकर विकास की जलेबी तल रहा प्राणी मुख्यमंत्री से लुढ़ककर सीधे कमलनाथ हो जाता है. ये सब सकल पदारथ के लिए किया जाता है.
एक बार सकल पदारथ हाथ आ जाए, फिर विधायक या सांसद के हृदय परिवर्तन का मुहूर्त आसान होता है. सकल पदारथ से युक्त सूटकेस देखते ही काम, क्रोध मद, लोभ में नहाई आत्मा सूटकेस में समा जाती है. अगला चरण विकास का है. जिन्होंने बिकने का कर्म किया उन्हें सकल पदारथ मिला. जो करम हीन पार्टी से चिपके रहे, वो विपक्ष और दुर्भाग्य के हत्थे चढ़े. जाकी रही भावना जैसी…
मुझे कहावतें बहुत कन्फ्यूज़ करती हैं. भाग्य, सौभाग्य और दुर्भाग्य के बारे में कहावत है, ‘भाग्य में जो लिखा है वही मिलेगा ‘.. तो फिर पदारथ और करम की भूलभूलैया काहे क्रिएट करते है. भाग्य में सकल पदारथ का पैकेज होगा, तो डिलीवरी आएगी, फिर भला रूकी हुई कृपा के लिए काहे फावड़ा चलाएं. और… अगर क़िस्मत में सौभाग्य है ही नहीं, तो काहे रजाई से बाहर निकलें (पानी माफ़, बिजली हाफ रोज़गार साफ़).
अब अगर करम हीन कहा, तो तुम्हारे दरवाज़े का बल्ब तोड़ दूंगा… ‘कर्मवान’ और ‘कर्महीन’ के पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहिए. गीता में साफ़-साफ़ लिखा है- जैसा कर्म करोगे वैसा फल देगा भगवान… इलाके का विधायक अगर तुम्हें आठ-आठ आंसू रुला रहा है, तो इसमें विधायक का क्या दोष. वोट देने का कर्म किया है, तो पांच साल तक फल भुगतो. विकास फंड का सकल पदारथ उसी के हाथ में है. तुम अपने आपको इस काम, क्रोध, मद, लोभ से दूर रखो.
वो ज़माना गया जब सकल पदारथ परिश्रम का नतीज़ा हुआ करता था. अब सुविधा, संपदा और सत्ता का सकल पदारथ अभिजात वर्ग को दे दिया गया है, और मेहनत और मजदूरी करनेवालों को रूखी-सूखी खाय के ठंडा पानी पीव… की सात्विक सलाह दी जाती है. धर्माधिकारी की सलाह है कि आम आदमी को तामसी प्रवृत्तिवाले सकल पदारथ के नज़दीक नहीं जाना चाहिए, वरना मरने के बाद स्वर्ग तक जानेवाला हाई वे हाथ नहीं आता. अब आम आदमी धर्म संकट में है. जीते जी सकल पदारथ ले या मरने पर स्वर्ग… (गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय) आख़िरकार संस्कार उसे सत्तू फांक कर स्वर्ग में जाने की सलाह देता है.
देवताओं का कुछ भरोसा नहीं कि कब रूठ जाएं. भाग्य का सौभाग्य में बदलना तो बहुत कठिन है डगर पनघट की, मगर दुर्भाग्य बग़ैर प्रयास बेहद सुगमता से हासिल हो जाता है. जब देखो तब आंगन में महुआ की तरह टपकने लगता है. जिन्होंने साहित्य से गेहूं हासिल करने की ठानी, उसे दुर्भाग्य वन प्लस वन की स्कीम के साथ मिलता है. शादी के सात साल बाद ही मेरी बेगम को साहित्य और साहित्यकार की महानता का ज्ञान हो चुका था. एक दिन उन्होंने मेरे इतिहास पर ही सवाल उठा दिया, “मै वसीयत कर जाऊंगी कि मेरी सात पीढ़ी तक कोई साहित्यकार से शादी ना करे.” लक्ष्मी और सरस्वती के पुश्तैनी विरोध में खामखा लेखक पिसता है. लक्ष्मीजी का वाहक उल्लू उन्हें लेखक की बस्ती से दूर रखता है.
भाग्य और दुर्भाग्य के बीच में सकल पदारथ की चाहत में खड़ा इंसान तोतेवाले ज्योतिषी के पास जाता है. कोरोना की परवाह न करते हुए ज्योतिषि अपने तोते से कहता है, “इस का भाग्यपत्र निकालो वत्स.”
तोते ने घूर कर देखते हुए कहा, “कोई फ़ायदा नहीं. इसकी फटेहाल जैकेट देखकर मैं इसका भाग्य बता सकता हूं. बेकारी का शिकार है. शनि इसके घर में रजाई ओढ़कर सो गया है. ये किसान आन्दोलन में सपरिवार बैठा है, घर में आटा और नौकरी दोनों ख़त्म है. इसे नक्षत्रों की जलेबी में मत फसाओ उस्ताद.” ज्योतिषी को भी दया आ गई, “जा भाई, तेरी शक्ल से ही लग रहा है कि तेरे पास किडनी के अलावा कुछ बचा नहीं है. तोते का पैर छू और फकीरा चल चला चल…”
बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले ना भीख. जाने किस मूर्ख ने ये कहावत गढ़ी थी. मोती को कौन कहे, मिट्टी भी मांगने से नहीं मिलती. रही सकल पदारथ के लिए समुद्र मंथन की बात, तो यहां भाग्य चक्र प्रबल हो जाता है. धर्मभीरू जनता घर का गेहूं बेचकर तीर्थयात्रा पर जा रही है और सेवकनाथजी नौ बैंकों का हरा-हरा सकल पदारथ समेट कर विदेश यात्रा पर. यही विधि का विधान है!
कल मैने अपने मित्र चौधरी से पूछा, “सौभाग्य और दुर्भाग्य को संक्षेप में समझा सकते हो?” चौधरी कहने लगा, “बहुत आसान है. तुम मुझसे उधार दूध ले जाते हो, ये तुम्हारा सौभाग्य है और मेरा दुर्भाग्य…”
जाने क्यों, ये मुझे तुरंत समझ में आ गया.

– सुलतान भारती


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Satire Story

“क्या लिखते हो?”
“व्यंग्य”
“कितना लिखा है?”
“कभी गिनकर नहीं देखा.”
”गिनने को कौन कह रहा. कभी तौल कर नहीं देखा कि कितना लिखा है? दस किलो-पंद्रह किलो, आख़िर कितना लिखा है.”
“कभी तौला नहीं.”
“इसका मतलब तुम्हारी रचनाओं में कोई वज़न नहीं है.”
मैं तुरंत हीनता के दबाव में आ गया. उस दिन मुझे पहली बार पता चला कि उनकी सारी रचनाओं का वज़न एक कुंटल से ऊपर जा चुका था.

अब आप ये सोच कर हैरान होंगे कि इतना वज़नदार लेखक है कौन? इस कोरोना काल में दिमाग़ पर इतना ज़ोर मत डालें, मैं बता देता हूं. डेढ़ कुंतल शब्द लेखक के शरीर के बारे में नहीं, अपितु लेखक की कुछ प्रकाशित और ज़्यादातर अप्रकाशित रचनाओं के बारे में है. लेखक अब कालजयी हो चुके हैं (जी हां, दो वर्ष पूर्व वह काल के मुंह में जा चुके हैं) तब से हम उन्हे कालजयी मानते हैं. वैसे उन्होंने जीते जी लेखन की कोई विधा ऐसी नहीं छोड़ी जिसे छेड़ा ना हो. वो साहित्य में छेड़खानी के लिए जानें जाएंगे.
काॅलेज छोड़ने के बाद उन्होंने वकालत शुरू की. इसमें मन रमा नहीं. अचानक एक रात स्वप्न में आकर सरस्वती ने उनकी सोई हुई साहित्यिक प्रतिभा को जगा दिया. बस, उसके बाद चिराग़ों में रोशनी ना रही. गनीमत थी कि तब तक घर बनवा चुके थे और परिवार ठीक ठाक था. पर जैसे ही उनका हृदय परिवर्तन हुआ, लक्ष्मी ने अपना तबादला ले लिया और सरस्वती अंदर आ गईं. नए-नए लेखक बने थे, हर विधा पर फावड़ा लेकर टूट पड़े. कोर्ट जाना छोड़ दिया. रात-दिन रचनाएं जन्म लेने लगीं. कविता, मुक्तक, छंद, चौबोला, शेर, ग़ज़ल के बाद बहुमुखी प्रतिभा नाटक, कहानी, संस्मरण और उपन्यास की ओर मुड़ गई. उनकी प्रतिभा से मोहल्ले में आतंक छा गया. बीवी की चिंता बढ़ रही थी और पड़ोसी त्राहिमाम त्राहिमाम कर रहे थे (क्यों ना करते, वकील साहब उन्हें घर से निकलते ही पकड़कर रचना सुनाने लगते थे. कई पड़ोसी रात में निकलने लगे).
अब तक सृजन ही चल रहा था, कोई रचना प्रकाशित नहीं हुई थी, फिर भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ. ऐसी महान प्रतिभा से मेरी मुलाक़ात पहली बार साल २०१४ के विश्व पुस्तक मेले में हुई. मैं उनकी प्रतिभा देख कर सन्न था. उस वक़्त वह सत्तर साल के हो चुके थे. हम दोनों के बीच कुछ इस तरह बातचीत हुई, उन्होंने पूछा था़, “आपका नाम?”
“सुलतान भारती”
“क्या लिखते हो?”
“व्यंग्य”
“कितना लिखा है?”
“कभी गिनकर नहीं देखा.”
”गिनने को कौन कह रहा. कभी तौल कर नहीं देखा कि कितना लिखा है? दस किलो-पंद्रह किलो, आख़िर कितना लिखा है.”
“कभी तौला नहीं.”
“इसका मतलब तुम्हारी रचनाओं में कोई वज़न नहीं है.”
मैं तुरंत हीनता के दबाव में आ गया. उस दिन मुझे पहली बार पता चला कि उनकी सारी रचनाओं का वज़न एक कुंटल से ऊपर जा चुका था. काफ़ी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी थीं और काफ़ी सुयोग्य प्रकाशकों की प्रतीक्षा में अभी अविवाहित थीं. एक विस्मयकारी जानकारी ये हाथ लगी कि उनकी पहली रचना पत्नी की मृत्यु के बाद छपी थी (वकील साहब ने पत्नी का जीवन बीमा करवाया था) पत्नी ने ख़ामोशी से मर कर वकील साहब को अमर कर दिया था.
वो मुझे बहुत चाहते थे. लगभग हर महीने फोन करके मुझे याद दिलाते थे, “तुम व्यंग्य अच्छा लिखते हो, मगर मुझसे अच्छा नहीं लिख पाते. अभी भी तुम्हारे व्यंग्य में ऑक्सीजन की कमी है.”
मुझे कलम के साथ ऑक्सीजन सिलेंडर जोड़ना आज भी नहीं आता. लिहाज़ा मैं संजीदगी से उनकी बात मान जाता था. उन्होंने लगभग अपनी हर रचना मुझे भेंट दी. मगर वो गिफ्ट दे कर भूलते नहीं थे, बल्कि दो दिन बाद पूछना शुरू कर देते थे, “कैसी लगी रचना. इसकी समीक्षा कब लिखोगे?”
उनका ह्यूमर सेंस भी तगड़ा था. एक बार मुझसे बोल रहे थे, “एक जन्म में लेखक का विख्यात होना लगभग असंभव है. साहित्यिक पुरस्कार मिलता ही नहीं. मेरा एक सुझाव है.”
“क्या?”
“हम साहित्य साधकों को ‘प्रतिभा श्री’ पुरस्कार देना शुरू करते हैं.”
“नाम तो अच्छा है, लेकिन हम विजेताओं को किस आधार पर चुनेंगे?”
“बहुत आसान है, जिसकी रचना को प्रकाशकों ने सबसे ज़्यादा ठुकराई हो, उसी रचनाकार को प्रतिभा श्री से सम्मानित किया जाए.”
वो अब इस दुनिया में नहीं रहे, इसलिए प्रतिभा श्री की योजना परवान नहीं चढ़ पाई, पर आज भी जब किसी नए लेखक से सामना होता है, तो मुझे उनके शब्द याद आ जाते हैं, “तुम्हारी रचना में वज़न की भारी कमी है, इसमें थोड़ा ऑक्सीजन डालो.”
अल्लाह उन्हें जन्नत अता करे!..

सुल्तान भारती

Kahaniya

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Satire Story

आजकल सब्ज़ीवाले से धनिया-मिर्ची नहीं मांगनी चाहिए. वैसे ही पडोसी से प्यार और नेता से उपहार न मांगने में ही भलाई है. पर इसका यह अर्थ नहीं कि कहीं कुछ मांगना ही नहीं चाहिए. सुनार के पास जाएं, तो पर्स ज़रूर मांगिए, वह आपके लिए बड़ी चीज़ होगी, तो उसके लिए फ्यूचर इनवेंस्टमेंट.

कहते हैं बिन मांगे मोती मिले और मांगे मिले न भीख. अर्थ यह कि जिनके पास मांगने का हुनर होता है वे बिना कुछ बोले बस इशारों-इशारों में बड़ी से बड़ी चीज़ हासिल कर लेते हैं और जो इस कला को नहीं जानते वे छोटी-छोटी चीज़ें भी नहीं प्राप्त कर पाते.
मांगने के मामले को छोटा मत समझिए दुनिया में ऐसा कोई नहीं, जो हाथ फैलाए न खड़ा हो. क्या राजा क्या रंक सभी मंगते हैं. कोई धन-दौलत मांगता है, तो कोई औलाद, कोई सुख-चैन मांगता है, तो कोई तरक्की. किसी का काम थोड़े-बहुत से ही चल जाता है, तो कोई छप्पर फाड़ कर मांगता है. मिलना न मिलना और बात है, पर मांगना तो हक़ है. कभी वोट मांगे जाते हैं, तो कभी नोट. और कहते हैं, जब दवा काम नहीं करती तो दुआ मांगी जाती है.
वैसे रोमांटिक लोग बस साथ मांगते हैं और इज्ज़तदार लोग बडी नफासत से लडकी का हाथ मांगते हैं. समाज का आलम इतना ख़राब है कि आज लड़की का हाथ मांगने से पहले दहेज़ मांगने की फार्मेलटी की जाती है यह कहते हुए कि भाई आप जो दे रहे हैं अपनी बेटी को. अब भला बताइए जब देनेवाले की नीयत पर इतना ही भरोसा है, तो दहेज़ की लिस्ट क्यों नत्थी की जाती है.
मांगनेवालों की भारी-भरकम लिस्ट और सूची देखकर ही भजन बना है- दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया… यदि मांगने का सिलसिला न हो, तो मदिरों की लाइन खाली हो जाए.
वैसे मांगना इतना बुरा भी नहीं है. मांगना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है. हममें से कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि उसने जन्म से ही मांगने की ट्रेनिंग नहीं ली है. कहते हैं बिना रोए, तो मां भी दूध नहीं पिलाती अर्थात बच्चा जब बोलना भी नहीं जानता, तब भी मांगने की कला में पारंगत होता है.
मैं कह रहा था मांगना इतना बुरा भी नहीं होता. शहरों की बात छोड दीजिए गांव और कस्बे में बिना पास-पड़ोस से मांगे गुज़ारा नहीं चल सकता. हमारे नाना के गांव में तो मांगने की पुरानी प्रथा थी, जैसेे- लेमन सेट या टी सेट मांगना. पूरे मुहल्ले में बस एक ही टी सेट था और जब किसी के घर कोई मेहमान (मेहमान से तात्पर्य समधी के लेवल का होता है) आ जाता, तो वह लेमन सेट कहीं भी हो स्वत: उसके घर पहुंच जाता. बस, गांव में ख़बर होनी चाहिए कि फलाने के घर मेहमान आए हैं. इस मांगने का प्रभाव ही था कि किसी का भी मेहमान पूरे मुहल्ले का सम्माननीय होता था और पूरा गांव उसे बड़ी इज़्ज़त देता था. जैसे ही वह पक्की सड़क छोड़ पगडण्डी पर आता कि ख़बर हो जाती फलाने के मेहमान बस से उतर गए हैं, बस पहुंच रहे हैं. हालत यह होती कि कदम-कदम पर उसे रास्ता बतानेवाले मिलते और जगह-जगह रोक कर घडे का ठण्डा पानी पिलानेवाले. उस ज़माने में बिना मीठे के पानी पिलाना अपराध माना जाता था. कुछ नही तो ताज़ा गुड़ ही खिला कर बडे स्नेह से पानी पूछते थे लोग. और देखने वाला गांव के इस संस्कार को देख कर भाप लेता था कि जिस घर में रिश्ता कर रहे हैं वह लोग हैं कैसे. वैसे चाय, चीनी और नमक तेल मांगने का रिवाज़ शहर के पड़़ोस में भी पनपा, पर लानत है मंहगाई की कि इसने पड़ोस पड़ोस न रहने दिया. आज किसी से कुछ मांगने से पहले संकोच होने लगता है कहीं बेचारा रहीम के कहे दोहे के अनुसार शर्मिन्दा न हो जाए. यथा रहिमन वे नर मर चुके जे कछु मांगन जायें उन ते पहले वे मुये जिन मुख निकसत नाय. इस मंहगाई के जमाने में कहीं मांग कर हम पड़ोसी को धर्मसंकट में न डाल दें.
देखिए मांगने में एक बड़ा ही ख़ूबसूरत एहसाह है और विश्‍वास मानिए अपनों से अपनापन बनाए रखने के लिए उनसे कुछ न कुछ मांगते रहना चाहिए.
मैं अपनों से प्यार बनाए रखने के लिए मांगने का ज़़िक्र कर रहा था. देखिए अपनत्व बनाए रखने के लिए कुछ न कुछ ऐसा मांगते रहना चाहिए कि आप के अपनों को एहसास होता रहे कि आप उनके लिए ख़ास हैं और इतना ही नहीं आप उन्हें भी अपना ख़ास समझते हैं. ऐसे में मैं मांगने की कुछ ऐसी टिप्स दे रहा हूं, जो बडी काम आएगी और इसे देने वाला मंहगाई के जमाने में भी प्रफुिल्लत होकर देगा इसे.
सुबह उठ कर अपने बड़़ेे़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद ज़रूर मांग लेंं. वे बेहद ख़ुुश हो जाएंगे और अपने जाननेवालों के बीच आपके गुण गाएंगे. इतना ही नहीं उन्हें इस बात की आत्मिक सन्तुष्टी होगी कि उन्होंने अपने बच्चे को बड़े अच्छे संस्कार दिए हैं.
रही दोस्तों की बात तो उन्हें अपना बनाए रखने के लिए सलाह ज़रूर मांगिए. जितने ही क़रीबी मामले में आप उनसे सलाह मांगेंगे, वे उतने ही आपसे जुड जाएंगे.
जैसा कि मैंने कहा मांगना एक हुनर हैै, सो मांगते समय सही पात्र से उचित चीज़ ही मांगनी चाहिए. ऐसा न हो कि जिसके पास जो नहीं हैै, उस से आप वही मांग बैठे और दोनों को शर्मिन्दा करें.
आजकल सब्ज़ीवाले से धनिया-मिर्ची नहीं मांगनी चाहिए. वैसे ही पडोसी से प्यार और नेता से उपहार न मांगने में ही भलाई है. पर इसका यह अर्थ नहीं कि कहीं कुछ मांगना ही नहीं चाहिए. सुनार के पास जाएं, तो पर्स ज़रूर मांगिए, वह आपके लिए बड़ी चीज़ होगी, तो उसके लिए फ्यूचर इनवेंस्टमेंट. वैसे ही जब किसी बड़े आदमी से कुछ मांगने का अवसर पड़ेे, तो सुदामा भाव में आ जाइए अर्थात छोटी-छोटी भावनात्मक मुद्राएं अपनाइए और उसे कृष्ण भाव का एहसास कराते रहिए. और तब-जब आप वहां से वापस लौटेंगे तो उम्मीद से दुगना पा चुके होंगे.
नई पीढ़ी से मोबाइल और इंटरनेट चलाने की टिप्स मांगना मत भूलिए. ससुराल में साली का प्यार बिन मांगे मिला हुआ मुफ़्त उपहार है, पर ऐसे उपहार को ज़रा सम्हाल कर रखना चाहिए, वर्ना लेने के देने पड़ जाते हैं.
रहा उधार मांगने का सवाल, तो बडे-बुजुर्ग पहले ही कह गए हैं उधार प्रेम की कैंची है, सो आजकल ऐसे मौक़े पर बैंक के ऐजेंट को याद करना चाहिए. मुझे विश्वास है कि अब आप जब अपने विवेक का इस्तेमाल कर सही पात्र से सही चीज़ मांगेंगेे, तो निराश नहीं होंगे और जीवन में मांगने की कला को अपनाकर नज़दीकी बढ़़ाने में सक्षम होंगे.

Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव


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“भइया, मेरी नाक फिर कट गई.”
रावण को बिल्कुल हैरानी नहीं हुई. उसने नॉर्मल लहज़े में पूछा, “तुम नाक लेकर जाती ही क्यों हो ?”
सूर्पनखा ने धमकी दी, “अगर इस केस में आपने कुछ ना किया, तो मैं अपनी कटी हुई नाक का वीडियो विभीषण भइया को पोस्ट कर दूंगी. विभू भइया तुरंत वॉयरल कर देंगे. फिर अपनी नाक कैसे बचाओगे?” इतना कहकर शूर्पी ने फ़ोन काट दिया.

(आप सब कल्पना कीजिए कि आज 2020 में अगर सूर्पनखा की नाक काटी गई होती, तो बाहुबली रावण और उसकी फैमली पर क्या प्रतिक्रिया होती! तो आइए देखते हैं…)

      एक कटी हुई नाक

अपने शानदार फॉर्महाउस अशोक वाटिका में रावण बैठा गृहमंत्री विभीषण के बारे में खुफिया एजेंसी की भेजी गई रिपोर्ट देख रहा था. सुपरसोनिक पुष्पक विमानो के सौदे में ‘विभू’ ने करोडो डॉलर कमीशन खाया था यानी इस जन्म में भी विभीषण अपनी आदत से मजबूर थे. रावण ने फाइल एक तरफ़ रखी, हाथ को सेनेटाइज किया और चेहरे से फेस मास्क उतारते हुए खुलकर सांस ली. उसके बाद वह लैपटॉप पर अपनी फेवरेट फिल्म बजरंगी भाई जान देखने लगा. तभी उसके फोन पर मिस्ड कॉल आई. रावण ने पलटकर फोन किया, उधर से जानी-पहचानी कॉलर ट्यून बजी- मुश्किल कर दे जीना इश्क़ कमीना…
रावण समझ गया कि दूसरी तरफ़ उसकी छोटी बहन सूर्पनखा है. रावण घबरा गया. बहन रोती हुई कह रही थी, “भइया, मेरी नाक फिर कट गई.”
रावण को बिल्कुल हैरानी नहीं हुई. उसने नॉर्मल लहज़े में पूछा, “तुम नाक लेकर जाती ही क्यों हो ?”
सूर्पनखा ने धमकी दी, “अगर इस केस में आपने कुछ ना किया, तो मैं अपनी कटी हुई नाक का वीडियो विभीषण भइया को पोस्ट कर दूंगी. विभू भइया तुरंत वॉयरल कर देंगे. फिर अपनी नाक कैसे बचाओगे?” इतना कहकर शूर्पी ने फ़ोन काट दिया. रावण धर्मसंकट में था. मेघनाथ किडनी बदलवाने इण्डिया गया हुआ था. विभीषण एक और कमीशन का चेक लेने मलेशिया की यात्रा पर था. कुंभकरण था तो लंका में, लेकिन एक कुंटल गांजा पीकर छह महीने के लिए कोमा में जा चुका था. रावण ने डायरी देखकर तीन नाम निकाले और फिर पहला फोन अमेरिका में चुनाव हार चुके डॉनल्ड ट्रंप को मिलाया. रावण ने बहन के नाक कटने की व्यथा बताई, तो उधर से ट्रंप ने रावण का मज़ाक उड़ाते हुए कहा, “भतीजे. तुम समझदार नहीं खोत्ते हो, जो इस ज़माने में भी नाक की परवाह करते हो. हमारे देश में तो महिलाओं का कुछ भी लुट जाए, पर हम उसे नाक पर नहीं लेते.”
“क्यों?”
“इतना भी नहीं समझे कि अब लक्ष्मी बाई का नहीं, जलेबी बाई का ज़माना है. जानम समझा करो.”
रावण ने फोन काट दिया. वाइडन से हारने के बाद ट्रंप अनाप-शनाप बोल रहे थे. रावण ने अपने कुलगुरू का नंबर निकाला, जो शोषण के अपराध में भारत की एक जेल में बंद थे. रावण ने फोन करके कहा, “सत श्री अकाल गुरुजी.”
“ओय रावण पुत्तर! की हालचाल है ट्वाडा.”
“क्या बताऊं गुरुजी. छोटी बहन की नाक कट गई.”
“ओय तो इसमें माइंड करने दी की गल. हुण तुसी ऐवे कर, सूर्पनखा नू साड्डे कोल भेज दे. असी एडजस्ट कर लांगे. साड्डे नाल रहेगी ता ऐश करेगी.”
रावण हैरान था, “मै समझा नहीं गुरुजी.”
“ट्वानू समझने दी की लोढ़! नाक कट गी, तो कट जान दे. त्वाडी बहन विदाउट नाक भी चलेगी. बस तुसी शुर्पी नू साड्डे कोलो भेज दे.”
अब रावण का माथा ठनका, उसने ग़ुस्से से पूछा, “आप कहना क्या चाहते हैं?”
“देख पुत्तर. वाहे गुरु ने किन्नी सोनी जोड़ी बनाई है. कुंडली दा मैच देख- हम दोनों ने ही नाक कटाई है. बल्ले बल्ले, ते याहू याहू…”
रावण ग़ुस्से से चिल्लाया, “सूर्पनखा तुम्हारी बेटी की तरह है. तुम्हें शर्म आनी चाहिए.”
“मै इस दुनियां के रिश्ते मानता ही नहीं. शूरपी ने भेज दे. असी इक नवीं फिल्म बनावांगे और ज़मानत मिली तो अगला वेलेंटाइन लंका आकर मनावांगे.” रावण ने घबराकर फोन रख दिया. थोड़ी देर में नॉर्मल होने के बाद रावण ने आख़िरी फोन अपने फैमिली फ्रैंड प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को लगाया. उधर से हिन्दी में गाने की आवाज़ आई- मोहे ‘पीओके ‘ पे नंदलाल छेड़ गयो रे.. गज़ब भयो रामा जुलम भयो रे…
रावण हैरान था, “ख़ान साहब, क्या हो गया. हिन्दी में रो रहे हो?”
“ओय रावन बिरादर, इस भरी दुनियां में कोई भी हमारा ना हुआ. मै फटेहाल पाकिस्तान को संभालूं या फजलुर रहमान को. पीओके पर हालत ख़राब है निरादर.”
“पीओके पर क्या हुआ?”
“उधर इंडियन आर्मी रोज़ आकर हमारा दरवाज़ा खटखटाकर मेरे बारे में पूछती, “खोचेे बुड्ढा घर पर है?”
“वेरी बैड.”
“खोचे इससे भी बुरा, छप्पन मुस्लिम कंट्री हैं, पर मोदीजी ने क्या शहद चटाई है कि आज की डेट में इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा ना हुआ. ख़ैर तुमने कैसे याद किया बिरादर.”
अब रावण ने अपने दर्दे दिल की वजह बताई, “बहन की नाक कट गई ख़ान भाई.”
इमरान ख़ान चौंककर बोले, “सिस्टर ने बताया कि किसने नाक काटा ?”
रावण ने झूठ बोला, “मैंने नहीं पूछा.”
“खोचे पूछने का ज़रूरत ही नहीं, नाक तो ज़रूर किसी हिन्दुस्तानी ने काटा होगा.”
रावण दंग था. इमरान को कैसे पता, “भाईजान, आप तो जीनियस हो. आप को कैसे पता चला. ओह ख़ान तुसी ग्रेट हो.”
“ओय नहीं रावण बिरादर. ये ग्रेटवाली नहीं, शर्म की
बात है. अल्लाह दुहाई है, दुहाई है. कश्मीर से कारगिल तक हमने नाक ही कटाई है. हमकू पता है.”
रावण की उम्मीद ठंडी हो रही थी.
“रावण बिरादर, बीसवीं सदी में तुमने पहली बार नाक कटाई है, इसलिए बिलबिला रहे हो. हम तो पिछले सत्तर साल से रेगुलर नाक कटा रहे हैं.”
“अदभुत नाक है.”
“ट्रेज्डी देखो. हिन्दुस्तान का मुस्लिम भी हमारा सपोर्ट नहीं करता. उधर का हिन्दू-मुस्लिम आपस में लाठियां चलाता है, पर हमारा नाक काटने के लिए दोनो एक हो जाता है.”
“बहुत दुख हुआ”
“इस सर्जिकल स्ट्राइक ने रही सही मेरे नाक की “टीआरपी” ही ख़त्म कर दी…”
“मेरे लिए क्या सलाह है भ्राता श्री?”
“एक बार कटी सो कटी, कोशिश करो कि आगे नाक ना कटे.” इतनी सलाह देने के बाद इमरान ख़ान ज़ोर-ज़ोर से गाने लगे- दुनिया बनानेवाले, क्या तेरे मन में समाई. तूने काहे को नाक बनाई…
रावण सिर पकड़कर बैठ गया!

Sultan Bharti
सुल्तान भारती

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खांसी से पीड़ित लोग अमूमन उतना नहीं घबराते, जितना सुननेवाला घबराता है. क्या पता टीबी ना हो. खांसी की वैरायटी बहुत है. डॉक्टर को भी उतना ज्ञान नहीं होगा, जितना यूपीवालों को होगा. सरसों के खेत में उड़ता हुआ भुनगा गले में घुस जाए, तो यूपीवाले ऐसे खांसते हैं, गोया गले में पेड़ उग आया हो. हुक्का पीनेवाले बुज़ुर्ग खांसने पर उतर आएं, तो पूरे मोहल्ले का रतजगा करा दें. इतने ज़बर्दस्त तरीक़े से खांसते हैं कि आंतों में रूकी हुई गैस भी ख़ारिज हो जाती है.

आदमी की फ़ितरत देखिए, मरना ही नहीं चाहता. बीमार होने पर आसानी से अस्पताल नहीं जाना चाहता और कोरोना को मौसमी वायरल बताकर डॉक्टरों से बचना चाहता है. विकास की तरह बीमारी भी ‘हरि अनन्त हरि कथा अनंता’ है. डॉक्टर और केमिस्ट की जन्नत का दरवाज़ा इसी दोजख से होकर जाता है. कितने ‘ज़मीनी भगवान’ (डॉक्टर) तो अपनी बेटी का रिश्ता तक बीमारी का मुहूर्त देखकर तय करते हैं, “लड़केवाले जल्दी मचा रहे थे, पर मैंने शादी की तारीख़ दिसम्बर से हटाकर जून कर दी! मई-जून खांसी, ऐक्सिडेंट, टीबी और हैजा का सीज़न होता है- यू नो!”
खांसी से पीड़ित लोग अमूमन उतना नहीं घबराते, जितना सुननेवाला घबराता है. क्या पता टीबी ना हो. खांसी की वैरायटी बहुत है. डॉक्टर को भी उतना ज्ञान नहीं होगा, जितना यूपीवालों को होगा. सरसों के खेत में उड़ता हुआ भुनगा गले में घुस जाए, तो यूपीवाले ऐसे खांसते हैं, गोया गले में पेड़ उग आया हो. हुक्का पीनेवाले बुज़ुर्ग खांसने पर उतर आएं, तो पूरे मोहल्ले का रतजगा करा दें. इतने ज़बर्दस्त तरीक़े से खांसते हैं कि आंतों में रूकी हुई गैस भी ख़ारिज हो जाती है. हमारे गांव के गियासू भाई बीड़ी के चेन स्मोकर थे, (खुदा उन्हें जन्नत दे) जब खांसना शुरू करते, तो मुंह के अलावा भी कई जगह से आवाज़ आती थी.
कुछ लोगों ने खांसने में भी काफ़ी नाम कमाया है. इन्हें अगर वरीयता क्रम में रखा जाए, तो ‘केजरीवाल’ जी की खांसी को गोल्ड मेडल मिलेगा. क्या खांसी थी, उड़ी बाबा! लोग निरूपा रॉय की खांसी भूल गए. जब खांसने पर उतारू हो जाते, तो टीवी देख रहा अभिभावक बीबी को डांटता था, “बच्चों को टीवी से थोडा़ दूर बिठाया करो.” उन्होंने खांस-खांस कर पूरे देश को इमोशन में ला दिया था. उनकी खांसी से घबराकर दिल्ली के वोटरों ने डिसाइड किया कि ज जीताने से ही जान छूटेगी और जीतते ही उन्होंने मफ़लर और खांसी को अलविदा कर दिया. अब उनकी खांसी अच्छे दिन की तरह नदारद है और दिल्लीवाले खांस रहे हैं. विरोधियों का दिल पराली की तरह जल रहा है और केजरीवालजी मुस्कुराकर प्रदूषण पर झाड़ू फेर रहे हैं. आंकड़ों में पराली खाद में बदल रही है और खांसी मुस्कुराहट में. ख़ुशहाल दिल्ली फेस मास्क लगाए आज भी खांस रही है.
कुछ खांसी सामयिक होती है, कुछ अल्कोहलिक और कुछ मौसमी. एक ‘कुकुर खांसी’ भी होती है, जिसकी दवा है- कुकर सुधा (नाम से ऐसा लगता है कि इसका आविष्कार किसी कुत्ते ने किया होगा) लेकिन इसके इतर एक रहस्यमय खांसी ऐसी भी है, जो सनातनकाल से चली आ रही है और आज तक उसका कोई इलाज नहीं है. अगर आपके याददाश्त का प्लग स्पार्क नहीं कर रहा, तो याद दिला देता हूं. ये रहस्यमय खांसी हिन्दी फिल्मों के ग़रीब हीरो की विधवा मां को होती थी. याद कीजिए, ग़रीब गांव का बचपन से गरीब और अनाथ हीरो. हीरो की खांसती हुई अम्मा. पास में सनातनकाल से बनता आ रहा एक बांध (पता नहीं उस बांध का ठेकेदार कौन है) हर तीसरी फिल्म में माताजी खांस रही हैं और बांध पर डायनामाइट फट रहा है. हीरो पीपल के नीचेवाले गुरुकुल में पढ़कर सीधे इंस्पेक्टर हो रहा है. दर्शक सोच रहे हैं कि अब हीरो माताजी के बलगम की जांच ज़रूर कराएगा या खांसी की दवा दिलाएगा, पर हीरो इतना हयादार नहीं है, वो माताजी के लिए खांसी की दवा लाने की बजाय हीरोइन से इश्क़ कर रहा है. यार ये कौन-सी खांसी है, जिसे केजरीवालजी की खांसी भी ओवरटेक नहीं कर पाई.
मैं सच कह रहा हूं, पिछले हफ़्ते दबाकर मूली खाया था. पहले ज़ुकाम हुआ,फिर बुखार और फिर गला ख़राब. मित्रों! ये किस बीमारी के लक्षण हैं. ओह तो आप बताना ही नहीं चाहते. तीन दिन से खांसी भी आ रही है. कैरेक्टर में- फिफ्टी फिफ्टी लेकर घूम रहे मित्रों को ज़्यादा ख़ुश होने की ज़रूरत नहीं, ज़ुकाम-बुखार दोनों ठीक हो चुका है. कुछ लोगों की बददुआ में एंटी बायोटिक की तासीर होती है.
खांसते रहिए…

Sultan Bharti
सुल्तान भारती


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Satire Story

सारे रसों के लिए महाबली निंदा रस कोरोना साबित हुआ है. ये एक ऐसा रस है, जिसका ज्ञान जेनेटिक होता है. किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती. हमारे वर्माजी कद में छोटे हैं, पर घाव करें गंभीर की ख़ासियत रखते हैं. उनके पास निंदा रस का पूरा गोदाम रहता है. पहले आओ-पहले पाओ की सहूलियत भी है. वो बगैर दोस्ती-दुश्मनी के भी बिल्कुल निर्विकार भाव से निंदा करते हैं.

अगर कोई मुझसे पूछे कि रस कितने प्रकार के होते हैं, तो मेरा जवाब होगा, “चाहे जितने तरह का हो, पर निंदा रस के सामने सारे भिन्डी हैं. मीडिल क्लॉस में दाखिले से पहले ही मैं इस रस की महानता से परिचित हो गया था. जब हम लंच में क्लॉस से बाहर जाते, तो गणित और विज्ञान के अध्यापकों की निन्दा करते और फीस टाइम पर ना देने के लिए अध्यापक के सामने अपने मां-पिता की निन्दा करते, “मेरी कोई ग़लती नहीं, फीस मांगने पर अब्बा ने कान ऐंठ दिया था (ये सरासर झूठ था). निंदा रस की लज्जत का क्या कहना. अनार और आम के जूस को मूर्छा आए-जाए, गन्ना बगैर काटे गिर जाए और संतरा सदमे से गश खा जाए.
साहित्यिक रस (वीर रस, श्रृंगार रस, वीभत्स रस, सौन्दर्य रस, करुण रस आदि) मिलकर भी निन्दा रस का मुक़ाबला नहीं कर सकते. निंदा रस ने सदियों से सबका टीआरपी गिरा रखा है. सारे रसों के लिए महाबली निंदा रस कोरोना साबित हुआ है. ये एक ऐसा रस है, जिसका ज्ञान जेनेटिक होता है. किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती. हमारे वर्माजी कद में छोटे हैं, पर घाव करें गंभीर की ख़ासियत रखते हैं. उनके पास निंदा रस का पूरा गोदाम रहता है. पहले आओ-पहले पाओ की सहूलियत भी है. वो बगैर दोस्ती-दुश्मनी के भी बिल्कुल निर्विकार भाव से निंदा करते हैं.
पिछले हफ़्ते की बात है, मोहल्ले के कवि बुद्धिलाल पतंग के लिए चंदा लेने वर्माजी मेरे घर आए. मैंने पूछा, “उनके कविता की पतंग मोहल्ले से बाहर भी उड़ती है या नहीं?”
बस निंदारस का क्रेटर खुल गया. वर्माजी बगैर नफ़ा-नुक़सान के अमृत उगलने लगे, “सारे मंचों से धक्का देकर खदेड़ा हुआ कवि है. पूरे शहर से इसकी पतंग कट गई है, वो तो मैंने हाथ पकड़ लिया. तुम्हें तो पता है कि मैं कितना दयालु और कृपालु हूं. कोई कुछ भी मांग ले, मैं मना नहीं कर पाता.”
“मुझे अर्जेंट पांच हज़ार रुपए की ज़रूरत है.”
वर्माजी के निंदा रस की पाइप लाइन मेरी तरफ़ घूम गई,” बाज़ार लगी नहीं कि गिरहकट हाज़िर… ” इतना कहकर वो बगैर चन्दा लिए झपाक से निकल लिए.
कुछ लोगों ने तो अपनी जीभ को निंदा रस का गोदाम बना लिया है. दिनभर बगैर ऑर्डर के सप्लाई चलती रहती है. उनके रूटीन में निंदा ही नाश्ता है और निंदा ही उपासना. उपासना पर हैरत में मत पड़िए, वो गाना सुना होगा, कैसे कैसों को दिया है, ऐसे वैसों को दिया है… यहां बन्दा ईश्वर की निन्दा कर रहा है कि तूने अपने बंदों को छप्पर फाड़कर देने में बड़ी जल्दबाज़ी की है.. पात्र-कुपात्र भी नहीं देखा.. मेरे जैसे होनहार और सुयोग्य के होते हुए भी सारी पंजीरी ‘ऐसे वैसों’ को बांट दी ( कम-से-कम पूछ तो लेते).
कुछ लोग निंदा रस को अपनी ज़िंदगी का आईना बनाकर जीते हैं. वो अपनी निंदा में अपने चरित्र की परछाईं देखते हैं, ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय!’ @जब निंदा रस का ज़िक्र होता है, तो महिलाओं को कैसे इग्नोर कर दें. इस विधा में भी महिलाओं ने बाज़ी मार रखी है. अपनी आदत से मजबूर कुछ महिलाओं ने इस कला में डिप्लोमा और डिग्री दोनों ले रखी है, ख़ासकर गांवों में कुछ महिलाओं के योगदान स्वरूप अक्सर दो परिवारों में लाठियां चल जाती हैं. गांव हो या शहर निंदा रस लबालब है. लगभग हर आदमी भुक्तभोगी है. अपने फ्रैंड सर्कल में कंघी मार कर देखिए, कोई-ना-कोई बरामद हो जाएगा, जिसने आपको आकार कभी ज़रूर ये कहा होगा, “फलां आदमी से आपके रिश्ते ख़राब चल रहे हैं क्या. परसो ऐसे ही मुलाक़ात हो गई, तो कह रहा था, किसी से बात ही नहीं करते, बड़े सड़े दिमाग़ के आदमी हैं.”
आप कई दिन बेचैन रहते हैं. बार-बार ख़ुद को सूंघते हैं, क्या पता, कहीं सचमुच तो नहीं सड़ गया!..

Sultan Bharti
सुल्तान भारती

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Satire

कान के रास्ते अंदर जाने में कोरोना को क्या प्रॉब्लम है, इस पर रिसर्च की ज़रूरत है. मेरे ख़्याल से, नाक और मुंह के रास्ते में तमाम ख़तरे हैं. आदमी दाल-रोटी के साथ कोरोना को भी खा जाएगा. नाक में और भी ख़तरा है, आदमी ने छिनका, तो मलबा के साथ कोरोना की पूरी कॉलोनी दलदल में गाना गाती नज़र आएगी, “ये कहां आ गए हम, सरे राह चलते-चलते…” फिर भी कोरोना है कि मानता नहीं.

मेट्रो रेल बंद होने के बाद आज पहली बार मेट्रो का सफ़र किया, मज़ा आ गया. डीएमआरसी ने सीटों को कोरोना की सहूलियत के हिसाब से अरेंज किया है. एक सीट छोड़कर बैठने की व्यवस्था की गई है. (ताकि बीच में कोरोना के बैठने की सहूलियत रहे!) कोरोना चलने-फिरने में चूंकि लाचार होता है, इसलिए उसकी संख्या और विकलांगता को देखते हुए हर डिब्बे में उसकी सीटें सुरक्षित की गई हैं. डीएमआरसी हर स्टेशन के इंट्री गेट पर यात्री के हाथ का टेंप्रेचर जांच कर उसे कोरोन फ्री मान लेती है. अब अगर कोरोना यात्री के पीठ पर बैठकर अन्दर आ गया, तो ये कोरोना की ग़लती है, डीएमआरसी की नहीं.
अंदर मेट्रो ट्रेन ख़ाली सी लगी. मेट्रो के नए नियम और कोरोना के खौफ़ ने सूरत ही बदल रखा है. अगर सांसों के आवागमन से परेशान होकर किसी ने फेस मास्क उतार दिया, तो बगल बैठा यात्री घबरा जाता है. ऐसा लगता है गोया सारा कोरोना सिर्फ़ मुंह के रास्ते अंदर जाने का इंतज़ार कर रहा हो. (मुंह के अलावा और कहीं से जाना ही नहीं चाहता) फेस मास्क के बावजूद दोनों कान खुले होते हैं, मगर उधर से जाने के लिए कोरोना है कि मानता नहीं. कान के रास्ते अंदर जाने में कोरोना को क्या प्रॉब्लम है, इस पर रिसर्च की ज़रूरत है. मेरे ख़्याल से, नाक और मुंह के रास्ते में तमाम ख़तरे हैं. आदमी दाल-रोटी के साथ कोरोना को भी खा जाएगा. नाक में और भी ख़तरा है, आदमी ने छिनका, तो मलबा के साथ कोरोना की पूरी कॉलोनी दलदल में गाना गाती नज़र आएगी, “ये कहां आ गए हम, सरे राह चलते-चलते…” फिर भी कोरोना है कि मानता नहीं.
फेस मास्क की आड़ में पुलिसवाले आत्मनिर्भर होने में लगे हैं. जैसे-जैसे कोरोना का ग्राफ गिर रहा है, प्राइवेट अस्पताल और पुलिस की बैचैनी बढ़ रही है. ट्रैफिक पुलिस आपके स्वास्थ्य को लेकर कितनी चिंतित है, इसका पता मुझे कल चला, जब चलती कार के ठीक सामने आकर पुलिसवाले ने मेरे दोस्त की गाड़ी रोककर फेस मास्क चेक किया. सबके चेहरे पर मास्क पाकर उसके चेहरे पर जो निराशा मैंने देखी, तो ऐसा लगा गोया अभी-अभी उसका टाइटेनिक जहाज़ डूबा हो. जनता के स्वास्थ्य को लेकर पुलिस की इतनी चिंता और बेचैनी कभी देखी नहीं. फेस मास्क के बगैर चेहरा तुम्हारा.. वसूली हमारा.. मिले सुर मेरा तुम्हारा…
मुझे कोरोना के कैरेक्टर पर शुरू से ही डाउट रहा है, चीन से आए माल का क्या भरोसा. लगता है साले चीन ने कोरोना को सिखा-पढ़ाकर भेजा है कि फेस मास्क के बगैर मानना मत, कम्पनियों से हमारी डील हो चुकी है. फेस मास्क देखते ही पतली गली से निकल लेना, पापी पेट का सवाल है.. आजकल वैसे भी इंडियावाले हमारे पेट पर लात मार रहे हैं. दो लोगों के बीच की खाली सीट पर मरणासन्न अवस्था में लेटा कोरोना दो लोगों की बात सुनकर अपना बीपी बढ़ा रहा है, “ये साला मनहूस कब दफ़ा होगा इंडिया से?”
“बिहार का चुनाव हो जाने दो, फिर इसी का लिट्टी-चोखा खाएंगे. वैसे भी चाइनीज़ माल की होली तो जलानी तय है.”
“इस वायरस का फेस मास्क से क्या लेना-देना है?”
“वो कहावत तो सुनी होगी, मुंह लगना. गंदे लोग हमेशा मुंह लगने के फ़िराक़ में रहते हैं, इसलिए हमने मुंह पर फेस मास्क लगा लिया है. वैसे, मैं तो चाहता हूं कि ये मरदूद एक बार घुसे तो सही मुंह के अंदर.”
“फिर तो बहुत बुरा हाेगा.”
“वही तो! रोटी-रोज़ी की तलाश में भटक रहे इन्सान के लिए दस रुपए का फेस मास्क भी भारी पड़ रहा है. भूख और ग़ुस्से की आग में उसकी आंतें नाग की तरह फनफना रही हैं. एक बार कोरोना अंदर गया कि भूखे इन्सान ने डकार मारी. कोरोना की पूरी कॉलोनी एक बार में ‘स्वाहा ‘.. देख रहे हो कि पिछले दस दिन में कोरोना की आबादी कितनी घटी है?”
“हां, सर्दियों में भूख बहुत लगती है.”
कोरोना अगले स्टेशन पर उतरकर अपनी फैमिली की गिनती करने लगा.

Sultan Bharti
सुल्तान भारती


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Mask Hai To Mumkin Hai

“जैसे बाढ़, सूखा, भूकंप, कोरोना आदि सब एक्ट ऑफ गॉड की सूची में है. जैसे मेरे ऊपर आठ महीने से दूध की उधारी चढ़ी है और मैं लगातार गिरती जीडीपी के कारण तुम्हें पेमेंट नहीं दे नहीं पा रहा हूं, तो उसके लिए मैं नहीं, एक्ट ऑफ गॉड ज़िम्मेदार है.”

‘अब जा के आया मेरे बेचैन दिल को करार…’ बड़े दिनों बाद ‘एक्ट ऑफ गॉड’ समझ में आया है. अभी तक गॉड ही समझ में नहीं आया था, एक्ट कहां समझ में आता! ग़लती मेरी है, आपदा के कई अवसर पर गॉड ने मेरा दरवाज़ा खटखटाया था, ‘तेरे द्वार खड़ा भगवान भगत भर ले रे झोली…’ मैं ये सोचकर घर से बाहर नहीं निकला कि कहीं चौधरी उधारी वसूलने ना आया हो. एक्ट ऑफ गॉड को एक्ट ऑफ चौधरी समझने के फेर में आत्मनिर्भर होने से रह गया! ग़लती मेरी भी नहीं, आजकल लोग अपने गुनाहों का ‘अंडा’ गॉड के घोंसले में रखने लगे हैं.
अब थोड़ा-थोड़ा एक्ट ऑफ गॉड समझ में आया. पहले जब आबादी और पॉल्यूशन कम था, तो गॉड और एक्ट ऑफ गॉड दोनों पृथ्वी पर नज़र आते थे. अब एक्ट तो रतौंधी के बावजूद नज़र आता है, मगर गॉड कोरोना की तरह अन्तर्ध्यान बना हुआ है. वो ऊपर स्वर्ग में बैठे भू लोक के लोगों को पाताल लोक के कीड़ों की तरह रेंगते देखकर चिंतित होते रहते हैं. पास खड़े सुर, मुनि, किन्नर, निशाच, देव आदि चारण गीत गाते रहते हैं, ‘दुख भरे दिन बीते रे भैया, सतयुग आयो रे…’
सितंबर की दुपहरी में सावन नदारद था, पर एक्ट ऑफ गॉड देखकर जनता गांधारी बनी नाच रही थी! ईमानदार देवता गॉड को वस्तु स्थिति से आगाह कर रहे थे, “सर! पृथ्वी लोक पर हाहाकार मचा है, पेट में आग जल रही है और चूल्हे ठंडे होते जा रहे हैं!”
गॉड के बोलने से पहले ही एक मुंहलगा चारण बोल
पड़ा, “पेट की आग को चूल्हे में डालो. आग को पेट में नहीं, चूल्हे में जलना चाहिए. आग के लिए चूल्हा सही जगह है.”
गॉड ने प्रशंसनीय नज़रों से चारण को देखा.
कल मेरे कॉलोनी में भैंस का तबेला चलानेवाले चौधरी ने मुझसे पूछा, “उरे कू सुन भारती. एक्ट ऑफ गॉड के बारे में तमें कछु पतो सै?”
“बहुत लंबी लिस्ट है, जो भी दुनिया में हो रहा है, सब एक्ट ऑफ गॉड में शामिल है.”
“मन्नें के बेरा. साफ़-साफ़ बता.”
“जैसे बाढ़, सूखा, भूकंप, कोरोना आदि सब एक्ट ऑफ गॉड की सूची में है. जैसे मेरे ऊपर आठ महीने से दूध की उधारी चढ़ी है और मैं लगातार गिरती जीडीपी के कारण तुम्हें पेमेंट नहीं दे नहीं पा रहा हूं, तो उसके लिए मैं नहीं, एक्ट ऑफ गॉड ज़िम्मेदार है.”
“मैं गॉड के धोरे क्यूं जाऊं. मैं थारी बाइक बेच दूं. इब तो मोय एक्ट ऑफ गॉड के मामले में कछु काला लग रहो. दूध कौ मामलो में एक्ट ऑफ गॉड की बजाय मोय एक्ट ऑफ गुरु घंटाल दीखे सै…”
चौधरी भी कैसा पागल आदमी है. एक्ट ऑफ गॉड को एक्ट ऑफ गुरु घंटाल बता रहा है…

Sultan Bharti
सुल्तान भारती
Satire

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बाई चॉइस और बाई डिफाॅल्ट की एनालिसिस से ज़िंदगी बदलने लगती है और एहसास होता है कि वाकई जिसे हम बाई डिफाॅल्ट मान दूसरे पर शिफ्ट कर रहे हैं, वह हमारी अपनी ही चॉइस है, पर माहौल बदला हुआ देख हम उसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं.

कुछ चीज़ें हमें बाई डिफाॅल्ट मिलती हैं और कुछ को हम चुनते हैं. भ्रष्टाचार हमें बाई डिफाॅल्ट मिला है और ईमानदारी हम चुनते हैं. विश्‍वास न हो, तो ज़रा बचपन में पढ़ाए जानेवाले पाठ याद करिए. सदा सच बोलो.. अहिंसा परमो धर्म.. जैसी चीज़ें इसके विपरीत गुणों के लिए क्यों नहीं पढाई जाती. सीधी-सी बात है कि यह मानकर चला जाता है कि बुरे गुण बच्चे के भीतर बाई डिफाॅल्ट हैं और उसे अच्छा बनाने के लिए नैतिक शिक्षा ज़रूरी है. मज़ा देखिए कि बचपन में तमाम नैतिक बातों को रोज़ रटवाने के बाद भी बच्चा जब बड़ा होता है, तो उस नैतिकता का बस एक-दो प्रतिशत ही बचता है उसके भीतर. इससे बुरे गुणों का आदमी के भीतर बाई डिफाॅल्ट छुपे होना सिद्ध होता है.
बाई डिफाॅल्ट का आजकल बहुत बड़ा स्कोप है. आप कोई भी साइट खोलिए, पाप अप विंडो बाई डिफाॅल्ट है और यहां आप चाहकर भी बाई चॉइस नहीं अपना सकते. कुछ आईटी वाले कहेंगे, “भाईसाहब, आप पाप अप विंडो ब्लाॅक का विकल्प चुन सकते हैं, पर उनसे पूछिए आजकल मेन साइट के ऊपर चिपककर जो ऐड खुलते हैं उनका क्या करें. नेटवर्क बाई चॉइस है, पर प्रमोशनल काल बाई डिफाॅल्ट. डीएनडी का तोड़ आजकल सारी है, जिसमें डायरेक्ट काॅल कर कस्टमर को डील किया जाता है और अब्जेक्शन करने पर कहा जाता है, “सर, दिस केस इज डिफरेंट हम एनजीओ से काॅल कर रहे हैं.” या फिर “साॅरी सर, हमें पता नहीं था कि डीएनडी एक्टिवेट है.”
देखिए सर, बाॅस डिफाॅल्ट होता है और उसे ख़ुश रखना आपकी चॉइस है. वैसे ही घर में सास-बहू का रिश्ता सदियों से खटासवाला बाई डिफाॅल्ट है और सुख-शान्ति बनाए रखना बेटे की चॉइस.
वैसे आप देखेंगे, तो पाएंगे ज़िंदगी में जो चीज़ें आपको ज़्यादा परेशान करती हैं, वे बाई चॉइस अधिक है, बाई डिफाॅल्ट कम. यह अलग बात है कि हम अपनी चॉइस को प्राॅब्लम में आने पर बाई डिफाॅल्ट की कैटेगरी में शिफ्ट कर देते हैं. जैसे घर से ऑफिस जाने के लिए शार्टकट वाला रास्ता हम चुनते हैं और जाम लगने पर ट्रैफिकवाले को कोसते हैं, जबकि सबने शार्टकट चुना और ऐसे रास्ते पर जाम लगना बाई डिफाॅल्ट है. कहने का अर्थ यह कि हम अपनी सुविधा अनुसार बाई डिफाॅल्ट को नेचुरल चॉइस बना देते हैं और फिर अपनी ज़िम्मेदारी से दूर हट जाते हैं. वैसे ही कपड़े ख़रीदने और टेलर चुनने तक मामला आपके हाथ में है, लेकिन सिल जाने के बाद पहनने पर लुक क्या आएगा यह अपकी बाॅडी से बाई डिफाॅल्ट जनरेट होता है. यही वजह है कि हर कोई स्टार नहीं बन सकता. राइटर की ज़िंदगी का त्रस्त और अस्त-व्यस्त होना बाई डिफाॅल्ट है, जबकि राइटर बन कर जीते रहना चॉइस है. इस चॉइस का रोना यह है कि तमाम झंझटों के बाद भी लेखक ख़ुद को बाई चॉइस मानने को तैयार नहीं होते और ज़बर्दस्ती अपने आपको बाई डिफाॅल्ट की कैटेगरी में रखते हैं जैसे वे पैदायशी सिरफिरे हैं और हर चीज़ को अलग नज़रिए से देखने के लिए ही पैदा हुए हैं.
वैसे हम गहराई से देखेना शुरु करें, तो बाई चॉइस और बाई डिफाॅल्ट की एनालिसिस से ज़िंदगी बदलने लगती है और एहसास होता है कि वाकई जिसे हम बाई डिफाॅल्ट मान दूसरे पर शिफ्ट कर रहे हैं, वह हमारी अपनी ही चॉइस है, पर माहौल बदला हुआ देख हम उसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं. बाई डिफाॅल्ट ज़्यादातर मामलों में हम अज्ञानी और नासमझ हैं और बाई चॉइस पूरी ज़िन्दगी दूसरों को अज्ञानी और नासमझ सिद्ध करते रहते हैं.

Satire
Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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इतिहास गवाह है कि किसी भी जेनुईन शायर ने अपनी प्रजाति बदलने की कोशिश नहीं की. न ही उसने अपनी शायरी के अलावा किसी और बात का क्रेडिट लिया. वैसे भी जिस पर शायर का ठप्पा लग गया, वह बस शायर ही रहा और कुछ नहीं बन पाया. उसकी शक्ल ही अलग-सी हो जाती है शायराना टाइप, जिसे देखकर दूर से ही अंदाज़ा लग जाता है कि फलाना शायर चला आ रहा है.

आपसे क्या बताएं, कोई मुझसे पूछे, तो मैं शायरों की बातें न ही करूं पर क्या करें इनके बिना गुज़ारा भी तो नहीं है.
गीत-गाने, सुर-ताल, रस-छंद, दोहे, सोरठा ग्रंथ, महाकाव्य सब इनकी बदौलत ही तो हैं. शायर का कलाम बढ़िया हो, तो एक से एक अदना सिंगर स्टार बन जाए, एक मामूली हीरो भी हिट हो जाए, एक साधारण-सा प्रोड्यूसर भी नाम कमा लें और डायरेक्टर के तो कहने ही क्या! काम किसी और का नाम उसका.
वैसे ही अगर किसी फिल्म में स्टोरी, गीत और डायलाॅग अच्छे न हों, तो बड़े से बड़ा हीरो फ्लाप होते देर नहीं लगती, नामी प्रोड्यूसर और डायरेक्टर भी ऐसी फिल्म की नैया डूबने से नहीं बचा सकते.
ख़ैर यह स्टोरी और डायलाॅग वाला मामला दूसरा है, गीत-ग़ज़ल और शायरीवाला दूसरा. एक अच्छा शायर एक अच्छा गीतकार, बस शायर और गीतकार ही होता है. यह अलग बात है कि बहुत से स्टोरी राइटर, प्रोड्यूसर, डायरेक्टर या फिर एक्टर ख़ुद को मल्टी टैलेंटेड घोषित कर देते हैं. वे फिल्म में गीत-गज़ल लिखने से लेकर उसे डायरेक्ट करने तक का क्रेडिट ख़ुद लूट लेते हैं. मगर इतिहास गवाह है कि किसी भी जेनुईन शायर ने अपनी प्रजाति बदलने की कोशिश नहीं की. न ही उसने अपनी शायरी के अलावा किसी और बात का क्रेडिट लिया. वैसे भी जिस पर शायर का ठप्पा लग गया, वह बस शायर ही रहा और कुछ नहीं बन पाया. उसकी शक्ल ही अलग-सी हो जाती है शायराना टाइप, जिसे देखकर दूर से ही अंदाज़ा लग जाता है कि फलाना शायर चला आ रहा है. बड़ी ही अजीब टाइप की शख्सियत होती है इनकी. इन्हें समझ पाना और उससे बड़ी बात यह कि इनके साथ निभा पाना बड़ा मुश्किल काम होता है.
कुछ पता नहीं इनका कि कब किस बात पर ख़ुश हो जाएं और कब किस बात पर किसी से नाराज़. ये बड़े मूडी क़िस्म के प्राणी होते हैं. मूड है तो ये कुछ भी कर डालेंगे और मूड नहीं है, तो एक लाइन नहीं लिखवा सकते आप इनसे.
अपनी रौ में आ जाएं, तो कहो एक ही दिन में कई फिल्मों का कोटा पूरा कर दें और मूड न बने तो बड़े से बड़े प्रोड्यूसर का एडवांस वापस कर दें. कभी लाखों का ऑफर ठुकरा दें, तो कहीं मुफ़्त में खड़े होकर सुनाने लगें.
कई बार स्टडी हुई कि आख़िर ये ऐसे होते क्यों हैं या कोई शख़्स शायर क्यों और कैसे बनता है, पर कोई सही और ठोस उत्तर इस मामले में मिल नहीं सका. एक आम धारणा घर कर गई कि जो लोग इश्क़ में असफल होते हैं, वे शायर बन जाते हैं, पर यह बात भी सही नहीं मालूम होती. ऐसा होता तो हर फ्लाॅप मजनू शायर होता, लेकिन न जाने कितने प्यार-व्यार में असफल लोग क्रिमिनल बन जाते हैं. कई तो समाज की दूसरी फील्ड चुनकर उसमें हाथ आज़माने लगते हैं, कुछ साधू-सन्यासी बन जाते हैं. कुछ प्रभु प्रेम में लीन हो जाते हैं. कहने का अर्थ यह कि शायर बन जाने का कोई हिट या डिफाइन फार्मूला नहीं है.
जो शायर हैं, उनकी एक ख़ासियत तो होती है, वे भीड़ को इम्प्रेस कर लेते हैं. जहां बड़े-बड़े लोग किसी से अपनी बात कहने में सोचते हुए पूरी उम्र निकाल देते हैं. वहीं ये दो मिनट में अनजान लोगों से भी ऐसे घुलमिल कर बातें करने लगते हैं, जैसे न जाने कितने जन्मों की जान-पहचान हो इनकी. ये लोग लेडीज़ के प्रति एक्स्ट्रा साॅफ्ट कार्नर रखते हैं, जिसका नतीज़ा यह कि कहीं भी इन्हें बड़ी जल्दी शायर होंने के नाते लेडीज़ की सिम्पैथी मिलते देर नहीं लगती.
पता नहीं क्यों मुझे तो लगता है इनमें चाहे जितने ऐब हों, चाहे ये स्मार्ट फिट और जिमनास्टिक बाॅडी न रखते हों, सेंटर ऑफ अट्रेक्शन बन ही जाते हैं. सभा समारोह हो, मुहल्ले का जलसा हो या किसी रिश्ते-नाते में पार्टी… ये सबसे व्यस्त नज़र आते हैं और ढेरों लोगों से घिरे हुए. कभी किसी को कुछ सुनाते हुए, तो कभी किसी पर कुछ सुनाते हुए. हाय इनकी नफासत और नजाकत का क्या कहना. जिसे देखकर अपना बना लें वह बस लुट जाए इनके अंदाज़ पर.
प्लीज़ मुझे रुकना पड़ेगा, वर्ना हारोस्कोप देखकर लोगों का भूत, भविष्य और उनके गुण-नेचर बताने वाले ज्योतिषाचार्य मुझसे नाराज़ हो जाएंगे. इस मामले में मेरे पास एकाधा फोन आ जाए. इन गुणी लोंगों का तो कोई बड़ी बात नहीं है. हो सकता है कोई नामी भविष्यवक्ता महोदय यह कह दें कि तुम मेरी फील्ड में इंटरफीयर क्यों कर रहे हो. इतना ही शौक है किसी के बारे में कुछ बताने का तो यह लिखना-पढ़ना छोड़कर ज्योतिष का अध्ययन करो और टीवी पर आ कर हमें चैलेंज करो, तब देखते हैं कितनी देर टिक पाते हो.
ख़ैर मुझे क्या पड़ी है कि मैं बैठे-बिठाये दुनियाभर के लोगों से पंगा लेता फिरू. इस मामले में मुझे संज्ञान इसलिए लेना पड़ा कि आज सुबह मुझसे मुहल्ले के सम्मानित शायर ‘बेचैन सुराहीवाले’ टकरा गए.
वैसे तो वे हमेशा अपने जिगर का दर्द सीने में दबाए हंसते-मुस्कुराते मिलते थे, पर आज न जाने क्यों मुझे लगा कि उनका दर्द चेहरे से लेकर शरीर तक छलका पड़ रहा है. यह जो फिजिकल दर्द होता है, वह बड़ा पीड़ादायक होता है. दिल-विल में दर्द हो, वह पलता रहे, आदमी शायरी-वायरी करता रहे. उससे फ़र्क नहीं पड़ता. हां, कभी-कभी ऐसे दिल का दर्द शौक से पालनेवालों को जब डाॅक्टर असली दिल के दर्द यानी हार्ट अटैक के ख़तरे के बारे में आगाह करता है, तो उसका नकली दर्द छूमंतर होते देर नहीं लगती. तब वह भूल जाता है कि अपने पाले हुए दिल के दर्द से शायर बना है. उस वक़्त उसे अपना दर्द सच में पीड़ा देने लगता है. वह जल्द से जल्द उससे छुटकारा पाने को बेचैन हो जाता है. वह पूछता है डाॅक्टर साहब यह जो दिल मेरे पास है और वह जो दिल आप बता रहे हैं, जिस पर हार्ट अटैक का ख़तरा मंडरा रहा है, वह एक ही है या अलग-अलग.
और जैसे ही डाॅक्टर कहता है कि सीने में दिल तो एक ही होता है और अटैक भी उसी पर आता है, यह शायर घबरा जाता है.
वह सोचता है यह जो दर्द मैंने पाला हुआ है हो न हो अटैक का कारण वही दर्द है, वह पूछता है, “डाॅक्टर साहब, अगर मैं अपने दिल के दर्द को मिटा लूं, तो क्या बाईपास सर्जरी नहीं करानी पड़ेगी?”

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और उस की ऐसी भोली बातें सुनकर डाॅक्टर सिर पकड़ लेता है, “कहता है, जनाब आप किस दिल और कौन से दर्द की बात कर रहे हैं. यह मेरी समझ से बाहर है. मुझे इतना पता है कि यह जो आपके सींने में दिल है इसे हार्ट अटैक आया है और यह बिना ऑपरेशन के ठीक नहीं होगा. अगर मुझे आपकी जान बचानी है, तो मुझे इसका ऑपरेशन करना ही पड़ेगा.
शायर सोचता है यह दिल तो न जाने कब से घायल है. चलो मरहम-पट्टी और दवा-दारू से कुछ रिपेयर हो जाएगा, कर लेने दो डाॅक्टर को भी अपनी मनमानी कौन-सा ऑपरेशन करने से मेरे दिल की किताब से मेरी ग़ज़लें चुरा लेगा.
ख़ैर, मुझे बेचैन सुराहीवाला के दिल का दर्द आज डाॅक्टरवाले दिल के दर्द सा फील हुआ. वे भी मुझे देखकर बात करने को तड़प उठे.
मैंने दुआ-सलाम की, तो थोड़ा नाॅर्मल हुए. मुझसे रहा न गया, मैंने पूछ ही लिया, “सब खैरियत तो है. आज न जानें क्यों आप अपने नाम की तरह बेचैन लग रहे हैं.
वे तड़पते हुए बोले, “अरे, क्या ख़ाक खैरियत है तुम्हें. क्या पता कि पिछले चार महींने कितनी टेंशन में बीते हैं.”
मैं चौंका, “आख़िर ऐसी क्या बात हो गई, जो आप इतना परेशान हैं सेहत तो ठीक है ?”
वे बोले अब क्या बताऊं सेहत +-वेहत की कोई बात नहीं है बात ऐसी है कि कहते-सुनते भी डर लगता है.
मैं सोच में पड़ गया कि आखिर शायर साहब के साथ लफडा क्या है?
वे और इंतजार न करते हुए बोले, “तुम ने मी टू सुना…“
मैं हंसा, “आप भी कमाल करते हैं. आज बच्चा-बच्चा मी टू के बारे में जानता है. इसमें न सुनने की कौन-सी बात है. बड़े-बड़े नाम इस लपेटे में आ रहे हैं. कहीं आपका नाम भी तो नहीं. वैसे आ जाए, तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा. हां, एक बात है, आप पॉपुलर हो जाएंगे इसके बाद.
वे गु़स्साते हुए बोले, “लाहौल वला कूवत, मेरा तुमसे इसीलिए बात करने का मन नहीं होता. तुम्हें सीरियस मैटर में भी व्यंग्य दिखाई देता है.”
मैंने कान पकड़ा, “नहीं, नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. आप अपनी बात बताइए.” मैंने थोड़ी सिंपैथी दिखाई.
वे बोले पता नहीं क्यों मुझे जब से यह मी टू चला है बड़ा डर लग रहा है.
मैं बोला, “बेचैन साहब, जब आपने कोई ग़लत काम किया ही नहीं है, तो डरते क्यों हैं.”
वे सिटपिटाये बोले, “तुम नहीं समझोगे– ये शायरी-वायरी बड़ी बेकार चीज़ होती है. इसमें कहीं भी और कभी भी फंसने का चांस बन सकता है.
तुम्हें तो पता ही है बिना इंस्पायर हुये तो कोई लिख नहीं सकता – जब काॅलेज में था, तो मैंने कई शेर लिखे थे-
“तुम्हारी निगाह में समंदर ढूढ़ लाया हूं, चेहरे झील का पानी है, जो नूर बन के ठहरा है.“
वैसे ही एक लिखा था-
यह जो काली रात मेरे कमरे में उतर आई है, लगता है तेरी जुल्फ का तब्बसुम उतर आया है .
वहीं एक था कि – बिजली सी कौंधती है तेरी एक हंसी के साथ ए खयालों की मलिका तू यूं हंसा न कर .
मैं चौंक गया – बेचैन साहब यह सब तो आपकी हिट शायरी के शेर हैं जो हर मंच से आप सालों से सुना रहे हैं .
वे बोले यही तो लफड़ा है– हर शेर किसी न किसी से इंस्पायर है और मज़ा यह कि शेर मे जिससे वह इंस्पायर है ख़ुद-ब-ख़ुद उसका नाम आ रहा है %.
इतना ही नहीं मेरी हर गज़ल में इंडायरेक्टली कोई न कोई करेक्टर रिफ्लेक्ट हो जाता है.
मामला इतना सीधा नहीं है आजकल मेरी गज़लों के कैरेक्टर मुझे संदेहास्प्रद नज़रों से देखते हैं. ऐसे एक दो नहीं हैं कई कैरेक्टर हैं कोई सब्जी मार्केट में मिल जाता है तो कोई शापिंग माल में , किसी से पार्क में मुलाकात हो जाती है तो कोई बच्चों को स्कूल कालेज छोडते मिल जाता है .
मुझे रश्क हुआ (मेन विल बी मेन) तो बेचैन साहब आपने जितनी ग़ज़लें और शेर लिखे हैं उतने ही इंस्पायरिंग कैरेक्टर हैं आपकी लाइफ में.
इस बार वे कुछ बोले नहीं, बस मुस्कुरा के रह गए.
मैं सोचने लगा क्या आइटम है. अगला कम से कम सौ-दो सौ ग़ज़ल तो लिखी है इसने और हजार-पांच सौ शेर से कम का खजाना नहीं होगा इसका. मन में ख़्याल आया फंसने दो फिर देखता हूं.
ख़ैर ऊपर से मैं कुछ नहीं बोला, बस इतना ही कहा, “बेचैन साहब, यह आग जो जली है, इसका धुआं दूर तक उठ रहा है. और हां, कम से कम अब इंस्पायर होना बंद कर दीजिए. ऐसा न हो कल को आप कोई नई ग़ज़ल लिखो और फिर जलोटाजी की तरह टीवी पर आकर सफ़ाई देते फिरो कि ऐसा-वैसा कुछ नहीं है, मैं तो उस का कन्यादान कर रहा हूं.”
उन्हें शायद मेरी बात अच्छी नहीं लगी. वे अपने फेवर में कुछ सुनना चाहते थे वे चाहते थे कि मैं कह दूं किसी से इंस्पायर होने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन इस तेज़ चलती आंधी में कोई भी स्टेटमेंट देंना भला कौन-सी समझदारी है. भले ही मुझे पता है कि आज “मेन” कितनी पीड़ा में हैं, पर सब कुछ के बाद भी ग़लत काम की तरफ़दारी तो नहीं की जा सकती है न.
जिसे लोग इंसिपिरेशन समझ इग्नोर कर देते हैं, न जाने वह दूसरे को कितना फिजिकल व मेंटल पीड़ा देता हो?

मुरली मनोहर श्रीवास्तव
Satire

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