Vyangya

इस बार कोरोना के साथ उसका एक रिश्तेदार (ओमिक्रॉन) भी आया है. लेकिन सांताक्लॉज धोती में गोबर लगाए गली-गली आवाज़ लगा रहे हैं- तू छुपा है कहां, ढूढ़ता मैं यहां… फिर से जन्नत को लाने के दिन आ गए. लैपटॉप, स्कूटी, राशन, जवानी में वृद्धपेंशन, तीर्थयात्रा, घर-घर में कब्रिस्तान और श्मशान की सुविधा सिर्फ़ एक वोट की दूरी पर. कुछ तो लेना ही पड़ेगा.

अब प्रजातंत्र के सबसे बड़े पर्व (चुनाव) का ऐलान हो गया, ख़ुश तो बहुत होंगे तुम. ये पर्व ख़ास तुम्हारे लिए है. तारणहार तुम्हारे लिए हर पांच साल में पर्व लेकर आ जाते हैं. फिर भी तुम नाशुक्रे लोग पर्व देख कर पालक और पेट्रोल का रोना रोते हो. अब दस फ़रवरी 2022 से 07 मार्च 2022 तक इस पर्व को एंजॉय करो. बीच में पर्व से निकल भागने की कोशिश मत करना. इस पर्व से प्रजातंत्र को मज़बूती मिलेगी और प्रजा को काफ़ी सारी जड़ी-बूटी. चुनावी वादों को विटामिन, प्रोटीन, शिलाजीत और फाइबर समझकर गटक लेना. जब पर्व तुम्हारा है, तो नखरा काहे का. कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. फरवरी और मार्च का महीना पाने का है, खोने के लिए पांच साल पड़े हैं. कुछ निजी कारणों से इस बार सांताक्लॉज नहीं आ पाए थे, अब इस पर्व में पूरा कुनबा लेकर आएंगे.
तो प्रजातंत्र का सबसे बड़ा पर्व आ गया. प्रजा को पता ही नहीं था कि उसके लिए इतने सारे हातिमताई मौजूद हैं. अब जनहित में दूर-दूर से साइबेरियन सारस आएंगे. वो अपनी एक इंची आंखों में पूरा हिंद महासागर भरकर लाएंगे. आते ही वो दरवाज़ा खटखटाएंगे- सोना लै जा रे.. चांदी लै जा रे…
ऐसे मौक़े पर नौसिखिए लोग लपक कर दरवाज़ा खोल बैठते हैं, जबकि भुक्त भोगी जागते हुए भी खर्राटे लेने लगते हैं, जिससे विकास से बचा जा सके. अगले महीने इतने तारणहार लैंड करेंगे कि जनता कन्फ्यूज़ हो जाएगी कि किसकी पूंछ पकड़ कर भव सागर पार करे.
जब शीरीनी बांटनेवाले थोक में हों, तो इस तरह का भ्रम होना स्वाभाविक है. वैसे भी चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद मौसम में जो बदलाव नज़र आ रहा है, उससे साफ़ है कि इस बार जनवरी में ही पलाश में फूल आ जाएंगे. अब वैलेंटाइन भी फरवरी का इंतज़ार नही करेगा. फरवरी के आसपास आदिकाल से बसंत भी आता रहा है, पर जब से चुनाव और वैलेंटाइन साथ-साथ आने लगे, बसंत ने वीआरएस ले लिया. विवश होकर लिए गए बसंत के इस फ़ैसले को वैलेंटाइन ने देशहित में उठाया गया कदम बताया है. (संभव है कि उपेक्षा से आहत वसंत आगे चलकर ख़ुदकशी कर ले और उसकी इस आकस्मिक मृत्यु से प्रजातंत्र को मज़बूती मिलती नज़र आए) मज़बूती का अद्वेतवाद समझना कौन-सा आसान काम है. बरसे कंबल भीगे पानी… का रहस्यवाद आज तक कौन खोज पाया है. बस साहित्य के सारे लाल बुझक्कड़ गैंती लेकर अपना-अपना हड़प्पा खोद रहे हैं.


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चुनाव और कोरोना के बीच में विकास अटक गया है. चुनाव आचार संहिता की वजह से 10 मार्च तक विकास करने पर रोक लगी है. इसलिए जनवरी-फरवरी में करने की जगह विकास बांटने का काम किया जाएगा. सारे सांताक्लॉज उसी गिफ्ट पैकिंग में लगे हैं. स्लेज गाड़ी में हिरनों को जोतने पर वन्य जीव संरक्षण अधिनियम में फंसने का ख़तरा है, इसलिए सांता अब फरारी और बीएमडब्लू से आने लगे हैं (स्लेज की अपेक्षा कार में विकास रखने के लिए ज़्यादा स्पेस होता है) जन और तंत्र के बीच में कोरोना कन्फ्यूज़ होकर गा रहा है- अब के सजन फरवरी में… आग लगेगी बदन में… (इसका मतलब कोरोना के तेज़ बुखार के साथ आने की संभावना है.
विकास थोड़ा घबराया हुआ है. कोरोना का आंकड़ा बढ़ रहा है. इस बार कोरोना के साथ उसका एक रिश्तेदार (ओमिक्रॉन) भी आया है. लेकिन सांताक्लॉज धोती में गोबर लगाए गली-गली आवाज़ लगा रहे हैं- तू छुपा है कहां, ढूढ़ता मैं यहां… फिर से जन्नत को लाने के दिन आ गए. लैपटॉप, स्कूटी, राशन, जवानी में वृद्धपेंशन, तीर्थयात्रा, घर-घर में कब्रिस्तान और श्मशान की सुविधा सिर्फ़ एक वोट की दूरी पर. कुछ तो लेना ही पड़ेगा. इतना बड़ा पैकेज लाए हैं- कुछ लेते क्यों नहीं. ऑप्शन बहुत हैं- साइकिल से लेकर सूरज तक कुछ भी मांग लो. बड़ी दूर से आए हैं साथ में हाथी लाए हैं. बुधई काका छोपड़ी में ताला मार कर भागने की सोच रहे हैं. पिछले चुनाव में रोज़ कोई न कोई देवता उनकी झोपड़ी में खाना खाने आ जाता था.
एक महीने में बखार चर गए थे.
अब कोई भी पार्टी विकास के नाम पर वोट मांगने की मूर्खता नहीं करेगी. वो दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था. अब सतयुग है, इसलिए धर्म के अलावा सारे मुद्दे गौण हैं. धर्म ही न्याय है, धर्म ही विकास है, इसलिए इस बार जो जितना बड़ा धर्माधिकारी होगा, उतना वोट बटोरेगा. पिछले कुछ सालों की घोर तपस्या से यह शुभ लाभ मिला कि जनता ने धर्म को ही विकास समझ लिया है. तपस्या का अगला चरण गेहूं को लेकर है. काश! धर्म को ही गेहूं समझ लिया जाए. उसके बाद फिर कभी किसान आंदोलन की नौबत नहीं आएगी. एमएसपी का टंटा ख़त्म. जब भी भूख लगी, सत्संग में बैठ गए.
आज सुबह चौधरी ने मुझसे पूछा, “सुण भारती, तू चुनाव में उतै गाम न जा रहो के?”
“न भाई, कोरोना फिर बढ़ रहा है.”
“ता फेर चुनाव क्यूं करावे सरकार?”
“सरकार जानती है कोरोना की पसंद-नापसंद, पर मुझे नहीं मालूम.”
“पसंद न पसंद, समझा कोन्या. कोरोना बीमारी है या फूफा लगे म्हारा?”
“तीन साल से यही समझने की कोशिश में लगा रहा. बीच में कोरोना ने मुझे ऐसा रगड़ा कि याददाश्त तक आत्मनिर्भर ना रह सकी.”
“नू बता किस नै वोट गेरेगा इब के?’
“जिस को तू कहेगा. विकास और गेहूं की समझ तुम्हें ज़्यादा है.”
“अपना वोट योगीजी नै दे दे. सुना है अक बुलडोजर देख कर यूपी ते कोरोना भाग रहो. योगीजी अकेले ही दूध का दूध अर पानी का पानी अलग कर देवें.”


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“अच्छा याद दिलाया, कल से बुखार, ज़ुकाम और छींक आ रही है. बंगाली बाबा जिन्नात अली शाह को दिखाया था. उन्होंने कहा कि फर्स्ट अप्रैल तक किसी काली भैंस का सफ़ेद दूध सुबह-शाम उधार पीने से कोरोना मंहगाई की तरह भाग जाता है.”
चौधरी भड़क उठा, “इब और उधार न दू. कहीं अर तलाश ले काड़ी भैंस नै. कोरोना ते बचाने कू सबै भैंसन पै मैंने सफ़ेदी करा दई. इब हट जा भारती पाच्छे.” अभी भी दूध का संकट बना हुआ है.

  • सुलतान भारती

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सोशल मीडिया पर तमाम कौरव योद्धा ललकार रहे हैं, लेकिन धर्मयोद्धाओं की समझ में नहीं आ रहा है कि पक्ष में पोस्ट डालें या विपक्ष में. अभी तक जिस कृषि क़ानून को लागू करने से गंगा पृथ्वी पर उतरनेवाली थी, अब बताया जा रहा है कि राम तेरी गंगा मैली… अर्द्ध बेहोशी-सी चैतन्यता है. आंखों से गांधारी पट्टी हटाकर भी देख लिया, अंधापन बना हुआ है. लगता है कि आंखों का बुद्धि से संपर्क टूट गया है. अधर्मी कोलाहल मचा रहे हैं- आवाज़ दो कहां हो…


म्हारे समझ में कती न आ रहो अक कृषि क़ानून इब कूण से कलर का है! अभी हफ़्ता पाच्छे सरकार की नज़र में यू क़ानून घणा दुधारू हुआ करता हा! पर किसानन कू समझाने में सब फेल हुए! ता फेर, देश हित में दरबारश्री ने दुधारू से अचानक बांझ नज़र आने लगे तीनों क़ानून कू वापस ले लिया! (बेलाग होकर कहें तो ये फ़ैसला बड़ी हिम्मत और जोख़िम भरा था! जिसने दरबारश्री के समर्थकों और विरोधिओ को सकते में डाल दिया है)
विपक्ष और विरोधिओं को किसी करवट चैन नहीं मिलता. अब विपक्षी सवाल उठा रहे हैं कि सैकड़ों किसानों की बलि लेने के बाद ही सरकार को कृषि क़ानून का नुक़सान क्यों नज़र आया. उसके पहले यही क़ानून किसानों को मालामाल करता हुआ नज़र रहा था. सरकार किसानों को मंहगाई, मंदी और लुटेरों की मंडी से बचाकर आत्मनिर्भर बनाना चाहती थी, लेकिन किसानों को फ़ायदा ही नहीं रास आ रहा था. कमाल है, बौद्धिक चैतन्यता का बड़ा अजीब दौर आ चुका है- लोग अपना फ़ायदा ही नहीं चाहते. जिस नए क़ानून से देश के किसान गुफ़ा युग से निकल कर सीधे विश्व गुरु होनेवाले थे, उसके ही ख़िलाफ़ सड़क पर बैठ गए. विपक्षी दलों ने तीनों क्रान्तिकारी कृषि क़ानूनों के विटामिन, प्रोटीन और कैल्शियम में घुन ढूंढ़ना शुरु कर दिया. ये हस्तिनापुर की सत्ता के ख़िलाफ़ संयुक्त कौरव दलों का सरासर विद्रोह था. फिर भी दरबारश्री के ज्ञानी मंत्री और चारण अज्ञानी किसानों से तमसो मा ज्योतिर्गमय की उम्मीद लगाए बैठे थे.


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सोशल मीडिया के सूरमाओं ने आंख और अक्ल दोनों पर गांधारी पट्टी बांध ली थी. ऐसा करने से बुद्धि और विवेक का सारा लावा  ज्वालामुखी की शक्ल में श्रीमुख से बाहर आ रहा था. इन जीवों की अपनी कोई विचारधारा आत्मचिंतन के अधीन नहीं थी. इन्हें अधीनता और ग़ुलामी से इतनी नफ़रत थी कि उन्होंने आज़ादी की एक नई तारीख़ ही ढूंढ़ कर निकाल ली. इन प्रचण्ड वीर समर्थकों के कलम और कलाम दोनों से फेसबुक पर लावा फैल रहा था. अब उन सभी वीर पुरुषों की अक्षौहिणी सेना औंधे मुंह पड़ी है. कलम कुंद है और गला अवरुद्ध. अंदर से आग की जगह आह निकल रही है- ये क्या हुआ… कैसे हुआ.. क्यों हुआ?.. छोड़ों ये न पूछो…
लेकिन लोग चुटकी लेने से कहां बाज आते हैं. तरह-तरह के तीर सोशल मीडिया पर उड़ रहे हैं.
‘अगला आत्म ज्ञान कब प्राप्त होगा’… मूर्खों को ज्ञान देने का जोख़िम कौन उठाए. बुज़ुर्गों की सलाह तो यह है कि बेवकूफ़ों के मुहल्ले में अक्लमंद होने की मूर्खता नहीं करना चाहिए, वरना अकेले पड़ जाने का ख़तरा है.
दरबारश्री कभी भी कोई कदम ऐसा नहीं उठाते, जो नौ रत्नों के विमर्श और सहमति के बगैर हो. बड़े सियासी योद्धा और ज्योतिषाचार्य इस फ़ैसले के पीछे का लक्ष्य ढूंढ़ रहे हैं. विपक्ष सामूहिक ख़ुशी मनाने की बजाय सामूहिक चिंतन शिविर में बैठ गया है.
मगर भक्त सदमे में हैं. अनुप्राश अलंकार जैसी स्थिति है- नारी बीच साड़ी है या साड़ी बीच नारी है?.. कन्फ्यूजन गहरा गया है. विषम परिस्थिति है. गांडीव भारी हो गया है. सोशल मीडिया पर तमाम कौरव योद्धा ललकार रहे हैं, लेकिन धर्मयोद्धाओं की समझ में नहीं आ रहा है कि पक्ष में पोस्ट डालें या विपक्ष में. अभी तक जिस कृषि क़ानून को लागू करने से गंगा पृथ्वी पर उतरनेवाली थी, अब बताया जा रहा है कि राम तेरी गंगा मैली… अर्द्ध बेहोशी-सी चैतन्यता है. आंखों से गांधारी पट्टी हटाकर भी देख लिया, अंधापन बना हुआ है. लगता है कि आंखों का बुद्धि से संपर्क टूट गया है. अधर्मी कोलाहल मचा रहे हैं- आवाज़ दो कहां हो… क्रोध में गाली देने का जी करता है रे बाबा…
मित्रों में वर्माजी सांड की तरह फुफकार रहे हैं. निरस्त हुए कृषि क़ानून की दुधारू उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कह रहे हैं, “क़ानून को वापस लेने से मुझे तो कुछ ऐसा फील हो रहा है जैसे आलू की फसल को पाला मार गया. देश हित में लाए गए तीनों कृषि क़ानून खेत और किसानों को नई दशा और दिशा देते. अब तो सब कुछ दिशाहीन हो जाएगा…”
मैंने पूछने का दुस्साहस किया, “आपको खेती किसानी का बहुत नॉलेज है. गांव में खेती होती होगी ना?”
वो आगबबूला होकर बोले, “भैंस का दूध सेहत के लिए फ़ायदेमंद होता है या नुक़सानदेह, ये जानने के लिए भैंस ख़रीदने की ज़रूरत नहीं होती मूर्ख.”
चौधरी कन्फ्यूजन में है. वो अभी तक फ़ैसला नहीं कर पाया कि उसे ख़ुश होना चाहिए या नाराज़. कल मुझसे पूछ रहा था, “उरे कू सुण भारती, इब क़ानून कूण से रंग कौ हो गयो?”


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“कौन-सा क़ानून? सभी क़ानून एक जैसे ही हैं.”
“घणा वकीड़ मत नै बण. मैं किसान वाड़े क़ानून कौ बात करूं सूं. पहले तो घणा दुधारू बताया हा, इब के हुआ. किसने दूध में नींबू गेर दई. इब घी न लिकड़ता दीखे कती. इब और कितनी दुधारू योजना ते मक्खी लिकाड़ी ज्यांगी?”
मेरे पास तो नहीं है, किसी बुद्धिजीवी के धौरे जवाब हो तो दे दे…
                                            
– सुलतान भारती

Satire

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इस किचन के बाहुपाश से निकलना बड़ा ही मुश्किल है. किसी ने कहा है कि व्यक्ति के दिल का रास्ता पेट से होकर गुज़रता है, पर यह जिस किसी ने कहा है उसने यह बात बड़ी ही ख़ूबसूरती से छुपा ली कि इस पेट से दिल तक के रास्ते में किचन नाम का एक बड़ा स्पीड ब्रेकर भी आता है…और पिछले लगभग दो सालों से यह स्पीड ब्रेकर, हर महिला के जीवन में बहुत अच्छे से रच-बस गया है.

मैं और मेरा किचन… अक्सर यह बातें करते हैं, अगर तुम ना होते तो ऐसा होता… अगर तुम ना होते तो वैसा होता… तुम ना होते तो मैं कुछ कहती… मुझे कुछ खाली समय मिलता और मैं भी पैर फैलाकर टीवी देख लेती, ना कोई मुझसे पूछता कि आज खाने में क्या बना है? और ना ही बर्तनों के अंबार लगते.
इस किचन के बाहुपाश से निकलना बड़ा ही मुश्किल है. किसी ने कहा है कि व्यक्ति के दिल का रास्ता पेट से होकर गुज़रता है, पर यह जिस किसी ने कहा है उसने यह बात बड़ी ही ख़ूबसूरती से छुपा ली कि इस पेट से दिल तक के रास्ते में किचन नाम का एक बड़ा स्पीड ब्रेकर भी आता है…और पिछले लगभग दो सालों से यह स्पीड ब्रेकर, हर महिला के जीवन में बहुत अच्छे से रच-बस गया है.
चाइना से चला कोरोना वायरस जैसे ही भारत पहुंचा, सबसे पहला भूकंप भारतीय रसोईघरों में आया. इस भूकंप के शुरुआती झटके बेहद सुखद थे, जिसमें गृहिणियों ने इंटरनेट से देख-देखकर इतने व्यंजन बनाए कि बाज़ार से मैदा और बेसन खाली हो गए. हर किचन में गृहिणियों में इतना उत्साह और स्फूर्ति देखने को मिली कि देखते ही देखते, घर-घर में रेस्टोरेंट्स-सा खाना बनने लगा.
अरे भाई, इन पंचतारिका रसोइयों और खानसामाओं  के उत्साह और पाक कला कौशल को देखकर एक बार को लगा कि इन होटलों पर लॉकडाउन के चलते लगे ताले अब कभी ना खुल पाएंगे. इन रसोई वीरांगनाओं ने अचानक बरसों से धूल में पड़े अपने हथियार उठा लिए थे. हर घर में अब सिर्फ़ पनीर, दाल आदि के छौंकों की महक नहीं उठी, बल्कि यूरोपियन, कॉन्टिनेंटल, अरबी, फारसी पता नहीं और क्या-क्या पकना शुरू हुआ. भारत में आने के बाद कोरोना वायरस को एक बार तो ऐसा ज़रूर लगा होगा कि उसके आगमन की ख़ुशी में हर घर में प्रतिदिन उत्सव मनाया जा रहा है.
अरे भाई, अब आगे का भी तो हाल सुनिए, धीरे-धीरे ऑफिस… स्कूल वर्क फ्राॅम होम माध्यम से शुरू हुए. झाड़ू-पोछा, कपड़े, बर्तन आदि सब कामों को करने के बाद रसोई में नए-नए प्रयोग करनेवाले हमारे यह वैज्ञानिक थकने लगे थे. साथ ही किचन से निकलते मुगलई परांठे, गोलगप्पे, पिज्जा आदि पेट पर दिखने लगे थे. अब यथार्थ और वस्तुस्थिति यह है कि इस रसोईघर नामक जगह की सीमा में कोई प्रवेश नहीं करना चाहता.

Vyangy


कभी-कभी मैं दूर से रसोईघर को निहारती हूं… तो वह मुझे मुंह चिढ़ाता-सा नज़र आता है. मानो कह रहा हो, “बहन, मुझसे ना बच पाओगे. जब तक तुम्हारे शरीर में पेट है, मेरी सत्ता कायम रहेगी. ऐसे समय लगता है ईश्वर ने पेट और घर के डिज़ाइन में आर्किटेक्ट ने किचन क्यों डाल दी. कभी-कभी तो साजिश की बू आती है कि कहीं धोखे से शादियां पति की जगह किचन से तो नहीं करवा दी जाती. अगर ऐसा है, तो फिर तो तलाक़ की भी कोई उम्मीद नहीं. कोरोना काल ने तो इस रिश्ते को और भी प्रगाढ़ कर दिया है.


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जो काम सिर्फ़ पकने-पकाने तक सीमित था, अब बाज़ार से आई सब्ज़ियों को नहलाना-धुलाना… सुखाना… हाथों को पहले सैनिटाइज करना, फिर धोना आदि के चक्कर में यह काम कभी ख़त्म ही नहीं होता. बाज़ार से सब्ज़ी ख़रीद के लौटो, तो ऐसा लगता है कि थैले में कोई विस्फोटक बम है. जिसे सबसे पहले निष्क्रिय करना ज़रूरी है… और जब इतनी मेहनत-मशक्कत के बाद सब्ज़ी, रोटी, दाल, चावल बन कर तैयार होता है, तो बाहर से फ़रमाइश आती है कि आज कुछ अच्छा खाने का मन कर रहा है, कुछ अच्छा बना दो. अब इंटरनेट से कहो कि इस कुछ अच्छे की रेसिपी भी डालें ज़रा अपने यूट्यूब चैनल पर.
तो सौ बातों की एक बात यह है कि दुनिया गोल है. मसला जहां शुरू हुआ, फिर वहीं पर आकर ख़त्म होगा अर्थात रसोईघर या किचन. तो जो गृहिणियां या गृहस्थ भी… इस उद्देश्य से यह लेख पढ़ रहे हैं कि अंत में इस समस्या का समाधान ज़रूर लिखा होगा, तो उनकी अपेक्षाएं रेत के महल से ढहनेवाली है. चाहे जितने उपाय आज़मा ले… रसोई का गठबंधन ना तोड़ पाएंगे, क्योंकि यह किचन अवसरवादी नहीं, बल्कि आपके साथ बड़ी वफ़ादार है. तो आपके लिए यह अच्छा है कि किसी भी व्यक्ति के दिल तक पहुंचने का रास्ता पेट से ना गुज़रे और जब तक ऐसा ना हो मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं!

डिस्क्लेमर: यह लेख किसी व्यक्ति विशेष जिसे रसोई और पाक कला में सच्चा प्रेम है उसकी भावनाओं को आहत करने के लिए नहीं है. यह तो केवल मेरे जैसों की व्यथा है आप व्यंग्य समझकर हंस लीजिए.


– माधवी कठाले निबंधे



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