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टीनएज बेटी ही नहीं, बेटे पर भी रखें नज़र, शेयर करें ये ज़रूरी बातें (Raise Your Son As You Raise Your Daughter- Share These Important Points)

 

 

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बदलाव की ज़रूरत तो है, लेकिन हर बार बदलाव की सीख लड़कियों को ही नहीं देनी चाहिए. हर बात उन्हीं पर लागू करवाना, उन्हें ही समाज में फैल रही बुराई का ज़िम्मेदार मानना ग़लत है. बदलाव लड़कियों के कपड़े में नहीं, बल्कि समाज की उस सोच में करना चाहिए, जो स़िर्फ ये सोचते हैं कि अगर परिवर्तन की गुंजाइश कहीं है, तो वो स़िर्फ लड़कियों में ही है. इस सोच को बदलिए और हर प्रतिबंध और परिवर्तन अपनी टीनएज लड़की को समझाने के साथ ही टीनएज लड़कों को भी समझाएं.

अक्सर आप ये भूल कर बैठती हैं. जैसे-जैसे बेटी बड़ी होती है, आप उसके सामने क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए की लिस्ट हर दिन पकड़ाती रहती हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर अपने बेटे पर आपका ध्यान ही नहीं जाता. क्या कभी आपने सोचा कि लड़के और लड़कियों की उम्र समान है, तो ग़लतियां दोनों से हो सकती हैं. ऐसे में स़िर्फ लड़कियों को समझाने की बजाय अपने बेटे को भी समझाएं कुछ ज़रूरी बातें.

लड़कियों से व्यवहार करना

आमतौर पर परिवार में शिष्टाचार की सारी शिक्षा लड़कियों को ही दी जाती है, लेकिन अब ज़माना आ गया है कि आप अपने लड़कों को भी सारे पाठ सिखाएं. सबसे पहले उन्हें ये सिखाएं कि कैसे लड़कियों से व्यवहार करना चाहिए. किस तरह से उनसे बात करनी चाहिए और कैसे उनके साथ समय बिताना चाहिए. इन सारी बातों को बड़ी ही बारीक़ी से अपने लाड़ले को सिखाएं.

ग़लती का एहसास कराना

घर-घर की कहानी है ये. लड़कियों से कोई ग़लती होने से पहले ही उन्हें ग़लती न करने की सीख दी जाती है, लेकिन लड़कों को कभी एहसास भी नहीं कराया जाता कि उनसे भी ग़लती हो सकती है. शायद इसीलिए लड़कियां हर काम करने से पहले कई बार सोचती हैं और लड़कों के दिमाग़ में ये बात आती ही नहीं कि उनसे भी कोई ग़लती हो सकती है.

आज़ादी का ग़लत फ़ायदा

भारतीय परिवेश में आज भी लड़कियों की अपेक्षा लड़कों को ज़्यादा आज़ादी दी जाती है. कॉलेज में दोस्त बनाने की आज़ादी, दोस्तों के साथ ज़्यादा देर तक घूमने की आज़ादी, किसी भी लड़की पर कमेंट करने की आज़ादी, अपने मन मुताबिक़ हेयरस्टाइल रखने की आज़ादी, स्टाइलिश कपड़े पहनने की आज़ादी आदि. लेकिन जैसे ही बात लड़कियों पर आती है, पैरेंट्स टोका-टाकी करने लगते हैं. घर में आपका दोहरा व्यवहार देखने पर ही लड़के बाहर लड़कियों से अच्छी तरह से पेश नहीं आते. अब से आप उन्हें भी इस बात का एहसास कराएं कि आज़ादी उन्हें भी उतनी ही मिलेगी, जिससे किसी का नुक़सान न हो.

लड़कियों से समानता

बचपन से ही लड़के जब ग्रुप में खेलते हैं, तो किसी लड़की के आने पर वो उसके साथ न खेलने की बात कहते हैं. उन्हें ऐसा लगता है कि लड़कियां उनके साथ खेल नहीं सकतीं. बचपन में लड़के की इस बात पर हंसने की बजाय उसे उसी समय टोकें और कहें कि वो भी उनके समान है. यही बात जब आपका बेटा टीनएज में हो, तो उसे समझाएं. स्कूल के नोट्स शेयर करने से लेकर सारी बातों में वो उसे अपने समान ही समझे.

लड़कियों पर कमेंट करना

ये उम्र ऐसी होती है कि जब लड़कों के मन में कई तरह की भावनाएं उमड़ने-घुमड़ने लगती हैं. अपनी उम्र से थोड़े बड़े लड़कों में उनका उठना-बैठना होने लगता है. बड़े लड़कों की संगत से वो भी लड़कियों को देखकर कई तरह के कमेंट करने लगते हैं. लड़कियों की ड्रेस, उनकी बॉडी पर कमेंट करना लड़कों को आम बात लगती है. अपने बेटे को समझाएं कि ये ग़लत है.

अपने मज़े की वस्तु न समझें

लड़कों को ये बात समझाना बहुत ज़रूरी है कि लड़कियां उनके लिए किसी वस्तु की तरह नहीं हैं. वो भी उन्हीं की तरह हैं. अपने लाड़लों को इस उम्र में ये ज़रूर सिखाएं. उन्हें ऐसा लगता है कि वो आसानी से किसी भी लड़की को अपनी गर्लफ्रेंड बना सकते हैं, वो ना नहीं कह सकती. लड़के उसके साथ घूमने जा सकते हैं. ऐसे में उन्हें ये समझाना ज़रूरी है कि वो किसी भी लड़की को अपने कंफर्ट के अनुसार यूज़ नहीं कर सकते.

लड़कियों से फ़िज़िकल न होना

टीनएज लड़कों को लगता है कि वो बहुत मज़बूत हैं. वो लड़कियों को अपने से कमज़ोर समझते हैं और कई बार किसी बात पर बहस होने पर वो हाथ भी चला देते हैं. ऐसा नहीं है कि वो ये घर से बाहर करते हैं. ज़रा ग़ौर कीजिए, जब घर में बहन के साथ झगड़ा होता है, तब भी लड़के हाथा-पाई पर उतर आते हैं. बहन के साथ झगड़ा होने पर आप स़िर्फ बेटी को बोलने की बजाय बेटे को भी डांटें और कहें कि ऐसा करना ग़लत है. घर से ही ऐसी रोक लगने पर वो बाहर भी किसी लड़की से झगड़ा करने पर हाथ नहीं उठाएंगे.

कमज़ोर न समझें

लड़कों को लगता है कि दुनिया का कोई भी काम वो कर सकते हैं, लेकिन लड़कियां नहीं. इतना ही नहीं, टीनएज लड़के लड़कियों को ये कहकर भी चिढ़ाते हैं कि वो कमज़ोर हैं और कोई भी काम वो लड़कों के बिना नहीं कर सकतीं. अपने होनहार को इस बात से अवगत कराएं कि लड़कियां हर काम कर सकती हैं. बस, वो लड़कों को रिसपेक्ट देने के लिए उनसे मदद लेती हैं.

सिखाएं ये बातें भी

* टीनएज में लड़कों को सेक्स से जुड़ी बातें भी समझाएं.
* उनके शरीर में होनेवाले बदलाव से उन्हें अवगत कराएं.
* शारीरिक बदलाव के साथ उन्हें किस तरह से कोपअप करना चाहिए, ये
भी बताएं.
* लड़के होने का मतलब उन्हें समझाएं. उनके दिमाग़ में भरें कि लड़के होने से वो ज़्यादा आज़ाद नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार हैं.
* अगर उनके साथ कोई लड़की है और उसे मदद की ज़रूरत हो, तो उसे पूरा सहयोग करें.
* घर में अपने से बड़ों की बातों का आदर करें और उसका अनुकरण करें.
* उन्हें समझाएं कि अभी उनकी उम्र प्यार करने और ढेर सारी गर्लफ्रेंड बनाने की नहीं है.
* उन्हें इस बात से भी अवगत कराएं कि अगर उन्हें कोई ग़लत तरी़के से अप्रोच करता है, तो वो उससे दूरी बनाएं.
* स्कूल में भी बच्चे गुंडा गैंग बनाते हैं. अपने लाडले से कहें कि इस तरह के ग्रुप में शामिल होने से उसकी ज़िंदगी बर्बाद हो सकती है.
* इस उम्र में उन्हें पढ़ाई का महत्व समझाएं.

 

घर के पुरुषों को निभानी चाहिए ये ज़िम्मेदारी

हेड ऑफ द फैमिली होने के नाते आपकी ये ज़िम्मेदारी बनती है कि आप अपने बेटे को सही तरह से ये बात बताएं कि उसे महिलाओं की इज़्ज़त कैसे करनी चाहिए. ख़ुद आप भी अपनी पत्नी और मां को सम्मान दें, तभी आपका बेटा भी वैसा ही करेगा. हो सके तो बेटे को शारीरिक बदलाव के बारे में आप ख़ुद ही बताएं.

महिलाओं का सम्मान करना

आजकल के लड़कों को सबसे ज़रूरी है ये सिखाना कि कैसे वो किसी महिला का सम्मान करें. ऐसा उन्हें घर से ही करना सिखाएं. घर में पुरुष सदस्य को लड़के सम्मान तो देते हैं, लेकिन जब बात महिलाओं की आती है, तो वो उन्हें सम्मान देना तो दूर, उनसे डरते भी नहीं हैं. पापा की बात वो झट से मानकर काम को पूरा कर लेते हैं, लेकिन आपके किसी काम को कई बार कहने के बावजूद नहीं करते. आप इसे अगर लाड समझती हैं, तो ग़लत है. इससे बच्चा अपनी लाइफ में आनेवाली हर महिला के साथ वैसा ही व्यवहार करेगा. उसे लगेगा कि महिलाओं को सम्मान देना उचित नहीं है.

– श्‍वेता सिंह
अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करेंः Parenting Guide 

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कमज़ोर बनाता है डर (Kamzore Banata Hai Dar)

डर

डर

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जो किसी चीज़ से डरता न हो, डर एक सहज प्रवृति है, मगर जब ये हद से बढ़ जाए और आपके विकास को प्रभावित करने लगे, तो संभल जाइए. किसी चीज़ को लेकर ज़रूरत से ज़्यादा डर आपको आगे बढ़ने नहीं देता है. अतः ज़िंदगी की रेस में जीतने के लिए सबसे पहले अपने डर पर जीत हासिल करिए.

आख़िर क्यों लगता है डर?
जब इंसान को अपनी क्षमताओं/योग्यताओं पर विश्‍वास नहीं होता, उसमें आत्मविश्‍वास नहीं होता, वो हमेशा नकारात्मक सोचता है, ये नहीं हुआ तो? ऐसा हो गया तो क्या करूंगा? आदि. ऐसा इंसान हमेशा किसी अनहोनी की आशंका से घिरा रहता है, क्योंकि उसमें हालात का सामना करने की हिम्मत नहीं होती. ऐसे लोगों के मन में हमेशा डर बना रहता है, कभी सामाजिक प्रतिष्ठा खोने का डर, कभी किसी चीज़ में हार का डर, कभी करियर तो कभी रिश्ते में असफलता का डर. इसके अलावा भी ये न जाने और कितने डरों से घिरे होते हैं. एक हाउसवाइफ जिसकी दुनिया बस पति तक ही सीमित हो, उसे डर रहता है कि कहीं उसका पति अपने ऑफिस की किसी कलीग की तरफ़ आकर्षित न हो जाए, किसी की ख़ूबसूरती, किसी के फिगर पर फिदा न हो जाए. अपने इसी डर के कारण वो पति के सामने हमेशा बन-ठनकर रहती है, पति के साथ होकर भी उसका मन भटकता रहता है यही सोचकर कि पता नहीं आज ऑफिस में क्या हुआ होगा? उसका डर उसे सहज और ख़ुशहाल ज़िंदगी जीने नहीं देता. इतना ही नहीं हमेशा पति के बारे में सोचकर वो अपना क़ीमती व़क्त बर्बाद करती रहती है, जिसे वो किसी अन्य काम में लगाती, तो शायद पर्सनैलिटी और ज्ञान बढ़ता. कहीं कोई समस्या न होने के बावजूद उसका डर ख़ुद उसके लिए एक समस्या बन जाता है.

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सफलता की राह का रोड़ा है डर

आचार्य चाणक्य के अनुसार, डर हमें कमज़ोर बनाता है, जिस व्यक्ति के मन में भय आ जाए वो अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुंच सकता. ये बात सौ फीसदी सच है, अपने आसापास नज़र दौराने पर आप पाएंगे कि निडर लोग ही ज़िंदगी में सफल हुए हैं और जो अपने डर पर क़ाबू नहीं कर पाते वो अपनी असफलता के लिए दूसरों को कोसते रहते हैं या फिर ख़ुद से कमज़ोर लोगों पर अपनी खीझ व ग़ुस्सा उतारते हैं. ऑफिस में पति के हाथ से कोई प्रोजेक्ट निकल गया या हर काम के लिए ना-नुकुर करने की वजह से उसकी जगह किसी और को प्रमोशन मिल गया. अपनी इस हार की खीझ अधिकतर पति पत्नी या बच्चों पर उतारते हैं. वो अपने परिवार के सामने ये तो ज़ाहिर नहीं कर सकतें कि उनके डर ने उनकी सफलता का मार्ग अवरूद्ध किया, ऐसे में किसी और बहाने से अपना ग़ुस्सा/चिढ़ उनके सामने ज़ाहिर करते हैं.

कैसे काबू में करें डर?
हिम्मत, आत्मविश्‍वास और ख़ुद की क्षमताओं का विकास और ख़ुद पर विश्‍वास करके ही आप डर को वश में कर सकते हैं. यदि बॉस आपको कोई काम दे रहा है, तो ये तो बहुत मुश्किल है, पता नहीं कब तक हो पाएगा कहने की बजाय कहें सर ये काम मुश्किल ज़रूर है, मगर हो जाएगा डोन्ट वरी. डर से दूर रहने पर ही आप किसी काम को अपना सौ फीसदी दे पाएंगे और निश्‍चय ही पूरे मन व लगन से किया गया काम सफ़ल होगा. इसके विपरित यदि आप काम शुरु करने से पहले ही डरकर ये कहें कि अरे ये कैसे होगा, तो आप उस काम में कभी क़ामयाब नहीं हो पाएंगे यानी डर आपको असफल बना देगा. स्टीव जॉब्स, अब्दुल कलाम और थॉमस एडिसन
जैसे महान व्यक्ति यदि हालात और असफलता से डर जाते, तो शायद आज दुनिया उन्हें महान नहीं मानती, मगर इन शख़्सियतों ने विपरित परिस्थितियों के डर को अपने आत्मविश्‍वास और हिम्मत से दूर करके क़ामयाबी की बेहतरीन मिसाल पेश की. आप भी ऐसा कर सकते हैं.

डर का सकारात्मक असर
डर हमेशा बुरा ही हो, ज़रूरी नहीं. कई बार डर के सकारात्मक परिणाम भी होते हैं, जैसे- बच्चों के मन में पैरेंट्स का डर रहने पर वो घर से बाहर कुछ भी ग़लत करने से डरते हैं, अनुशासन में भी रहते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि ऐसा न करने पर मम्मी/पापा नाराज़ हो जाएंगे या फिर डाटेंगे.कहीं मेरी इमेज न ख़राब हो जाए, इस डर से यदि कोई व्यक्ति हमेशा समय पर काम पूरा करता है और हर जगह सही व़क्त पर पहुंचता है, तो ऐसा डर अच्छा है.

कंचन सिंह 

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