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समय से पहले बड़े होते बच्चे

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दिल्ली के एक स्कूल में 2 बच्चों ने आपत्तिजनक स्थिति में अपना एमएमएस बनाया और दोस्तों को भेज दिया… एक टीनएज बच्चे ने छोटी बच्ची के साथ बलात्कार किया… कुछ बच्चे स्कूल में असामान्य अवस्था में पाए गए और जब उनसे पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि हम रेप गेम खेल रहे थे… माता-पिता अपने बच्चों के बारे में ऐसी बातें सपने में भी नहीं सोच सकते, पर ये आज की सच्चाई है. आज बच्चे तेज़ी से अपनी उम्र से पहले ही बड़े हो रहे हैं. ऐसे में पैरेंट्स को उन्हें हैंडल करना किसी चैलेंज से कम नहीं.

 

मुझे चांद-खिलौना ला दो मां… मुझे तारों तक पहुंचा दो मां… नन्हीं-सी गुड़िया ला दो मां… प्यारी-सी चुनरी दिला दो मां… पहन चुनरिया नाचूंगी, गुड़िया का ब्याह रचाऊंगी…” ऐसी ही ख़्वाहिशें थीं और कुछ ऐसा ही था हमारा बचपन और शायद 20-25 साल पहले तक भी बच्चों का बचपन कुछ ऐसा ही मासूमियत भरा था, लेकिन आज बचपन ऐसा नहीं है. आज के बच्चे कच्ची उम्र में ही जाने-अनजाने वयस्कों की तरह व्यवहार करने लगे हैं और उसे सही भी समझते हैं.

बोल्ड होते बच्चे

पुरानी पीढ़ी जिन विषयों पर युवावस्था में भी बातें करने से कतराती थी, वो बातें मासूम बच्चे या टीनएजर बेहिचक करने लगे हैं. 30 वर्षीया विनिता अपनी 4 साल की बेटी के साथ खिलौने की दुकान पर गई थी. वहां एक डॉल देखकर वो मचल गई कि बस यही चाहिए. विनिता के मना करने पर बच्ची ने कहा, “प्लीज़ मम्मा, ले दो ना. देखो ना कितनी हॉट और सेक्सी लग रही है.” 4 साल की बेटी के मुंह से निकले ऐसे शब्दों ने उसे अंदर तक हिला दिया, लेकिन आज ऐसे शब्द बोलचाल की भाषा मेंे बच्चे बड़ी सहजता से इस्तेमाल कर रहे हैं, भले ही वे इसका अर्थ समझें या न समझें. इतना ही नहीं, वे सेक्स की आधी-अधूरी जानकारी के साथ एक्सपेरिमेंट करने से भी नहीं कतराते. इस बात का खुलासा करते हुए सिनेमा हॉल में टिकट बुकिंग विंडो पर बैठनेवाले महेश कहते हैं, “बच्चे नकली आईडी प्रूफ़ के साथ एडल्ट फ़िल्म आराम से देखते हैं. शक के बावजूद हम कुछ नहीं कर पाते हैं.”
आजकल बच्चियांं मल्लिका व राखी बनना चाहती हैं. मुन्नी-शीला जैसा डांस करना चाहती हैं. छोटे-छोटे लड़कों की पसंद भी मुन्नी-शीला है. आज 4-10 साल की उम्र में ही बच्चे हॉट और सेक्सी की चाहत में सेक्सी कपड़े पहनना चाहते हैं. उत्तेजित क़िस्म के डांस करना चाहते हैं.

मीडिया व मॉडर्न लाइफ़स्टाइल भी ज़िम्मेदार

चाइल्ड सायकोलॉजी की टीचर वंदना उपाध्याय कहती हैं, “बच्चे ये सब कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें अपने आसपास यही सब दिखाई दे रहा है. मीडिया व मॉडर्न लाइफ़स्टाइल उन्हें सिखा रहा है कि सुंदर व सेक्सी दिखने के आगे अन्य गुणों का मोल फीका है. बच्चों को सुपरस्टार बनाने की होड़ में कभी-कभी पैरेंट्स भी अनजाने ही इन चीज़ों को बढ़ावा दे जाते हैं.”
सायकोलॉजिस्ट अरुणेश कुमार का कहना है, “हमारे बच्चों का दिमाग़ पहले से ही इंटरनेट से मिलनेवाली आधी-अधूरी जानकारी से भरा हुआ है. इसके साथ जो दूसरी समस्या जुड़ी है, वो यह है कि हमारे घरों में अभी भी सेक्स जैसे विषय पर बातचीत नहीं की जाती है, तो उन्हें सही ज्ञान या सीमा के बारे में कहां से समझ में आएगा?”
महानगरीय संस्कृति ने भी इन बातों को बढ़ावा दिया है. वर्किंग पैरेंट्स अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं. बच्चे घर से बाहर जाकर मस्ती न करें, इसलिए उन्हें कंप्यूटर और वीडियो गेम थमा देते हैं, ताकि वो घर पर ही एंजॉय कर सकें. उन्हें ़ज़्यादा से ज़्यादा सुविधाएं प्रदान करते हैं. अब बच्चे घर पर रह कर क्या रहे हैं, भला इसका पैरेंट्स को कहां पता होता है? ऐसे में वो इंटरनेट का ग़लत इस्तेमाल भी करने लग जाते हैं.
हालांकि आज बच्चों के साथ किसी बात के लिए जोर-ज़बरदस्ती नहीं की जानी चाहिए. इस तरह उन्हें रोका भी नहीं जा सकता है, लेकिन यह कहकर भी पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता है कि ‘हम क्या करें. बच्चे सुनते ही नहीं हैं, समझना ही नहीं चाहते हैं’ आज ब्लैक एंड व्हाइट का ज़माना नहीं है. बच्चों की दुनिया में रंगीन सपने हैं. अतः उनके सपनों में रंग भरना भी पैरेंट्स की ही ज़िम्मेदारी है. शुरू से उन्हें संतुलित मनोरंजन व अनुशासन की आदत होनी चाहिए और उन्हें जानना चाहिए कि हर चीज़ या हर बात की एक उम्र होती है.
बच्चों के ऐसे व्यवहार के पीछे कई कारण हो सकते हैं. आइए, इनमें से कुछ आम कारणों पर नज़र डालें-
जिज्ञासु प्रवृत्ति- बच्चों में हर बात को जानने की जिज्ञासा होती है. यह उनकी सहज प्रवृत्ति है. वे कहीं कुछ भी होता देखते हैं, तो उसे ख़ुद भी करके देखना चाहते हैं. उनके मन में विपरीत सेक्स के शारीरिक अंगों के प्रति भी जिज्ञासा होती है. यदि इस जिज्ञासा को सही तरी़के से हैंडल न किया गया, तो ये ग़लत मनोभावों को जन्म देती है.
खुलकर बातचीत न होना- हमारे देश में आज भी पैरेंट्स अपने बच्चों से सेक्स के विषय में बात नहीं करते हैं. बच्चा यदि सवाल करता है, तो उसे डांटकर चुप करा दिया जाता है. धीरे-धीरे बच्चे इधर-उधर से आधी-अधूरी जानकारी हासिल करने लगते हैं और ग़लत राह पर भटक जाते हैं. उम्र के साथ उनको सेक्स से संबंधित ज़रूरी जानकारी भी दी जानी चाहिए. बेहतर तो यही है कि पैरेंट्स स्वयं उनसे बात करें और सही ज्ञान दें.
प्राइवेसी व स्पेस- प्राइवेसी ने जहां एक तरफ़ बच्चे को थोड़ा आत्मनिर्भर बनाया है, वहीं दूसरी तरफ़ उन्हें बिगाड़ने में भी कमी नहीं रखी है. 14 वर्षीय राहुल दिनभर अपने कमरे में रहता है. कंप्यूटर जैसी सब सुविधाएं हैं, दोस्त भी आते हैं. गेम्स भी खेलते हैं. एक दिन मम्मी के अचानक प्रवेश करने पर राहुल ने तुरंत टोक दिया, “मम्मी, नॉक करके आया कीजिए.” जब चुपचाप छानबीन की गई, तो ड्रग्स, अश्‍लील साहित्य व अनेक नग्न चित्र मिले. स्पेस व प्राइवेसी आत्मनिर्भता के लिए सही है, लेकिन यह देखना भी ज़रूरी है कि एकांत में बच्चे करते क्या हैं. कहीं वे एकांत का नाजायज़ फ़ायदा तो नहीं उठा रहे हैं.
भावनात्मक जुड़ाव का अभाव- कुछ लोगों का मानना है कि वर्किंग पैरेंट्स बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते, इसलिए बच्चे बिगड़ जाते हैं. ये सच नहीं है. समस्या तब बढ़ती है, जब पैरेंट्स साथ होकर भी भावनात्मक रूप से उनसे जुड़ नहीं पाते हैं, बल्कि उनकी ज़रूरतें पूरी करके और पैसे कमाकर यह समझ लेते हैं कि बच्चों को पूरा प्यार दे रहे हैं. वे साथ खाना तो खाते हैं, लेकिन टीवी देखते हुए. धीरे-धीरे घर में पसरता कम्यूनिकेशन गैप बच्चों को दोस्तों के क़रीब ले आता है. फिर तो सही-ग़लत की दुनिया या आधी-अधूरी जानकारी का रास्ता भी दोस्त ही बनते हैं.
शक्की पैरेंट्स- 15 वर्षीय रोहित अपने मम्मी-पापा के शक्की स्वभाव से परेशान है. कहीं मीडिया में बच्चों के बिगड़ने की कोई ख़बर आई नहीं कि रोहित पर पाबंदियां बढ़ जाती हैं. उसके दोस्तों पर शक किया जाने लगता है. पैरेंट्स ऐसे व्यवहार करते हैं, मानो बच्चे कुछ छुपा रहे हैं. बच्चों को जब महसूस होता है कि पैरेंट्स को उन पर भरोसा नहीं है, तो वो भी उनसे बातें छुपाने लगते हैं. इस तरह बच्चा साथ रहकर भी अकेला हो जाता है और उसके ग़लत रास्ते की ओर बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है.

क्या करें पैरेंट्स?

कम्यूनिकेशन गैप न आने दें- समस्याएं तभी बढ़ती हैं, जब आपसी बातचीत का ज़रिया रुक जाता है और बातें अनकही रह जाती हैं. साथ ही बच्चों से बातचीत करते समय उनकी समस्या को समझने के लिए आपको उनके स्तर पर आना होगा, क्योंकि आप उनकी उम्र के दौर से गुज़र चुके हैं. वो आपकी उम्र की विचार शक्ति तक नहीं पहुंचे हैं.
रिश्तों व संस्कारों की अहमियत समझाएं- बचपन से ही सही व अच्छे संस्कारों के साथ उनकी परवरिश करें. आदर्श माता-पिता बनें, तभी वो सही दृष्टिकोण को अपना सकेंगे और रिश्तों को समझेंगे. उनमें पॉज़िटिव सोच बढ़ेगी और ग़लत हरकतों से दूर रह पाएंगे.
अलग कमरा दें, अलग ज़िंदगी नहीं- यदि सुविधा है और आपने अपने बच्चों को अलग कमरा दिया है, तो शुरू से ही उसके कमरे में आते-जाते रहें. वहां बैठकर बातें करें और पूरी कोशिश करें कि उसकी ज़िंदगी उस कमरे में सिमटकर न रह जाए. अपनी आलमारी अरेंज करते समय उसकी मदद लें और उसके कमरे की साफ़-सफ़ाई में उसकी मदद करें, ताकि आपस में खुलापन बना रहे.
अच्छी क़िताबें पढ़ने की आदत डालें- क़िताबों से बच्चों का परिचय एक वर्ष की उम्र के अंदर ही हो जाना चाहिए. जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगें, उम्र के अनुसार उन्हें अच्छी क़िताबें पढ़ने के लिए दें, ताकि शुरू से अच्छा साहित्य व अच्छी पुस्तकों के प्रति सम्मान बना रहे. अच्छी क़िताबें पढ़ने से तर्क बुद्धि विकसित होती है तथा सही-ग़लत की पहचान समय पर आने लगती है.
पैसे से प्यार को न जोड़ें- प्यार के नाम पर बच्चों की हर सही-ग़लत मांग को पूरा न करें. आप उन्हें समय नहीं दे पा रहे हैं, इस कारण हीनभावना या अपराधबोध मन में मत पालें, क्योंकि आप जो कर रहे हैं, उन्हीं के लिए कर रहे हैं. बच्चों की हर मांग को पूरी करने से पहले देखें कि वो कितनी ज़रूरी है. उसे ख़ुश करने के लिए पैसे मत दें.
दोस्त बनें- बच्चों को हर बात शेयर करने की छूट दें. कई बार पैरेंट्स पूरी बात सुने बिना ही अपनी टिप्पणी या निर्णय दे बैठते हैं. ऐसे में बच्चा अपनी बात शेयर नहीं करना चाहता. बच्चों को समझने के आपके तरी़के सही हो सकते हैं, लेकिन उनकी उम्र और उस उम्र की जिज्ञासा को समझना ज़रूरी है. उनके साथ टीवी प्रोग्राम देखें. साथ डिनर करें. उसके दोस्त बनें. फिर देखिए वो अपनी हर बात आपसे शेयर करने लगेगा.
उपदेश देनेे की बजाय बच्चे की भी सुनें- हमारे यहां बड़े हमेशा बच्चों को उपदेश देते रहते हैं यानी उन्हें समझाते रहते हैं. यदि पिता की उम्र 60 की है और बेटे की 35, तो भी पिता उसे उपदेश देना अपना अधिकार समझते हैं. ऐसा करने से बचें. बच्चों को सही दिशा देने या उनकी ग़लत बातों को जानने के लिए ज़रूरी है कि धैर्य के साथ उन्हें सुना जाए. अपनी बात रखने का उन्हें मौक़ा दिया जाए. हम जितना ज़्यादा बच्चों को सुनेंगे, उतनी अच्छी तरह उनकी मनोवृत्ति समझ पाएंगे व उनके क़दम बहकने से पहले ही उन्हें रोक पाएंगे.

– प्रसून भार्गव