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फीमेल सेक्सुअलिटी को लेकर कितने मैच्योर हैं हम? (Female Sexuality And Indian Society)

हम सोचते हैं कि व़क्त तेज़ी से बदल रहा है, लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? अगर हम यह मान भी लें कि व़क्त बदल रहा है, लेकिन व़क्त के साथ क्या हम भी उतनी ही तेज़ी से बदल रहे हैं? विशेषज्ञों की मानें, तो जिस तेज़ी से भारतीय समाज बदल रहा है, उतनी तेज़ी से लोग, उनकी सोच और हमारा पारिवारिक व सामाजिक ढांचा नहीं बदल रहा. यही वजह है कि महिलाओं की सेक्सुअलिटी को लेकर आज भी हमारा समाज परिपक्व नहीं हुआ है.स़िर्फ समाज ही नहीं, महिलाएं ख़ुद भी अपनी सेक्सुअलिटी को लेकर मैच्योर नहीं हुई हैं.

Female Sexuality And Indian Society

– आज भी महिलाएं सेक्स शब्द के इस्तेमाल से बचना चाहती हैं.

– वो अपनी सेक्सुअलिटी को लेकर कुछ नहीं बोलतीं.

– ख़ासतौर से अपनी शारीरिक ज़रूरतों को लेकर, सेक्स की चाह को लेकर भी वो कुछ भी बोलने से कतराती हैं.

– वो भले ही अपनी चाहत को कितना ही दबाकर रखें, लेकिन इस बात को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि उनमें भी पुरुषों के समान, बल्कि पुरुषों से भी अधिक सेक्सुअल डिज़ायर होती है.

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क्या वजह है?

– सबसे बड़ी वजह है हमारा सामाजिक व पारिवारिक ढांचा.

– महिलाओं को इस तरह ट्रेनिंग दी जाती है कि वो सेक्स को ही ग़लत या गंदा समझती हैं.

– यहां तक कि अधिकांश भारतीय पुरुष यह मानकर चलते हैं कि महिलाएं ‘एसेक्सुअल जीव’ हैं यानी उनमें सेक्स की चाह नहीं होती, बल्कि जब उनका पति उनसे सेक्स की चाह रखे, तब ख़ुद को समर्पित कर देना उनका कर्त्तव्य होता है.

– यही वजह है कि उनका मेल पार्टनर उनकी संतुष्टि से अधिक अपनी शारीरिक संतुष्टि पर ध्यान देता है.

– सेक्स को लेकर ये जो अपरिपक्व सोच है, उसी वजह से शादी के बाद भी अधिकतर महिलाएं ऑर्गेज़्म का अनुभव नहीं कर पातीं, क्योंकि उनका पार्टनर इसे महत्वपूर्ण ही नहीं समझता.

– सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि वेे अपने पति से अपनी संतुष्टि की बात तक नहीं कर पातीं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि कहीं इससे उनके चरित्र पर तो उंगलियां उठनी शुरू नहीं हो जाएंगी.

अच्छी लड़कियां कैसी होती हैं?

– हमारे समाज में यही धारणा बनी हुई है कि अच्छी लड़कियां सेक्स पर बात नहीं करतीं. बात तो क्या, वो सेक्स के बारे में सोचती तक नहीं.

– अच्छी लड़कियां सेक्स में पहल भी नहीं करतीं.प वो अपने पार्टनर से अपनी संतुष्टि की डिमांड नहीं कर सकतीं.

– अच्छी लड़कियां अपने पति के बारे में ही सोचती हैं. उसका सुख, उसकी संतुष्टि, उसकी सेहत… आदि.

– शादी के बाद उनके शरीर पर उनके पति का ही हक़ होता है. ऐसे में अपने शरीर के बारे में, अपने सुख के बारे में सोचना स्वार्थ होता है.

– अच्छी लड़कियां सेक्स को लेकर फैंटसाइज़ भी नहीं करतीं.

– अच्छी लड़कियां मास्टरबेट नहीं करतीं.

– अच्छी लड़कियां शादी से पहले सेक्स नहीं करतीं.

– उनकी सोच होती है कि उन्हें अपनी वर्जिनिटी अपने पार्टनर के लिए बचाकर रखनी चाहिए.

– अच्छी लड़कियां मेडिकल स्टोर से कंडोम्स नहीं ख़रीदतीं.

– वो अपने वेजाइनल हेल्थ के बारे में बात नहीं करतीं. उन्हें हर चीज़ छुपानी चाहिए, वरना उन्हें इज़्ज़त नहीं मिलेगी.

– अच्छी लड़कियां हमेशा अच्छे कपड़े पहनती हैं. वो छोटे कपड़े नहीं पहनतीं और सिंपल रहती हैं.

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Female Sexuality And Indian Society

क्या असर होता है?

– महिलाएं अपनी इंटिमेट हाइजीन पर बात नहीं करतीं, जिसके कारण कई तरह के संक्रमण का शिकार हो जाती हैं.

– पार्टनर को भी कंडोम यूज़ करने के लिए नहीं कह पातीं.

– कंट्रासेप्शन के बारे में भी पार्टनर को नहीं कहतीं, वो ये मानकर चलती हैं कि ये तमाम ज़िम्मेदारियां उनकी ही हैं.

– इन सबके गंभीर परिणाम हो सकते हैं, लेकिन फिर भी हमारा समाज सतर्क नहीं होना चाहता, क्योंकि सेक्स जैसे विषय पर महिलाओं का खुलकर बोलना हमारी सभ्यता व संस्कृति के ख़िलाफ़ माना जाता है.

क्या सचमुच बदल रहा है इंडिया?

– बदलाव हो रहे हैं, यह बात सही है, लड़कियां अब बोल्ड हो रही हैं.

– सेक्स पर बात करती हैं, मेडिकल स्टोर पर जाकर कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स या कंडोम भी ख़रीदती हैं… लेकिन यहां हम बात महिलाओं के बदलाव व परिपक्वता की नहीं कर रहे, बल्कि उनके इस बोल्ड अंदाज़ पर समाज की परिपक्व सोच की बात कर रहे हैं.

– क्योंकि पीरियड्स तक पर बात करना यहां बेशर्मी समझा जाता है, सेक्स तो दूर की बात है.

– हमारे समाज में आज भी लिंग आधारित भेदभाव बहुत गहरा है. शादी से पहले भी और शादी के बाद भी हम पुरुषों के अफेयर्स को स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन स्त्री के विषय में हम उसे घर की इज़्ज़त, संस्कार व चरित्र से जोड़कर देखते हैं.

– जबकि सच तो यही है कि जो चीज़ ग़लत है, वो दोनों के लिए ग़लत है.

– अगर कोई लड़की छेड़छाड़ का शिकार होती है, तो आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो छेड़छाड़ के लिए लड़कों की बुरी नियत को नहीं, बल्कि लड़की को ही दोषी ठहराते हैं. कभी उनके कपड़ों को लेकर, तो कभी उनके रहन-सहन व बातचीत के तरीक़ों पर तंज कसकर.

– अगर कोई युवती शादी से पहले प्रेग्नेंट हो जाती है, तो सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर दी जाती है, लेकिन उन पुरुषों का क्या, जो शादी से पहले और बाद में भी कई महिलाओं के साथ संबंध बनाते हैं और यहां तक कि उन्हें यूज़ करते हैं, प्रेग्नेंट करते और फिर छोड़ देते हैं, क्योंकि उनकी भी यही धारणा होती है कि शादी से पहले जिस लड़की ने हमारे साथ सेक्स कर लिया, वो पत्नी बनाने के लायक नहीं होती, क्योंकि वो तो चरित्रहीन है.

– आज भी हमारा समाज महिलाओं को समान स्तर के नागरिक के रूप में नहीं स्वीकार पा रहा.

– यही वजह है कि जब भी महिलाओं पर कोई अपराध होता है, तो उसका दोष भी महिलाओं के हावभाव और कपड़ों को दिया जाता है, न कि अपराधी की ग़लत सोच को.

– यह बात दर्शाती है कि हम फीमेल सेक्सुअलिटी को लेकर आज भी कितने अपरिपक्व हैं.

– गीता शर्मा 

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क्यों आज भी बेटियां वारिस नहीं? (Why Daughters Are still not accepted as Successor)

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क्यों उसके जन्म की ख़ुशी ग़म में बदल दी जाती है, क्यों बधाइयों की जगह लोग अफ़सोस ज़ाहिर कर चले जाते हैं, क्यों उसकी मासूम-सी मुस्कान किसी और के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच देती हैं? आख़िर वो भी तो एक संतान ही है, फिर क्यों उसे लड़का न होने की सज़ा मिली? बेटे-बेटी के बीच का यह भेदभाव आख़िर कब तक चलेगा? आज भी ऐसे कई अनगिनत सवाल वो बेटियां करती हैं, जिन्हें परिवार में एक बेटी का सम्मान नहीं मिला. क्या परिवार का वारिस स़िर्फ एक बेटा ही बन सकता है? क्यों आज भी बेटियां वारिस नहीं? समाज की इसी सोच को समझने की हमने यहां कोशिश की है.

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वारिस शब्द का अर्थ

शब्दकोष के अनुसार- वारिस शब्द का अर्थ उत्तराधिकारी या मृत जन की संपत्ति का अधिकारी होता है.
सामाजिक अर्थ- वारिस वह है, जो परिवार का वंश बढ़ाए और परिवार के नाम को आगे ले जाए, जो सामाजिक मान्यता के अनुसार लड़के ही कर सकते हैं, क्योंकि लड़कियां पराया धन होती हैं और शादी करके दूसरों की वंशवृद्धि करती हैं, इसलिए वो वारिस नहीं मानी जातीं.
सार्थक शब्दार्थ- वारिस शब्द का मतलब है- ङ्गवहन करनेवालाफ. बच्चों को माता-पिता का वारिस इसलिए कहते हैं, क्योंकि वो उनके संस्कारों का, अधिकारों का, कर्त्तव्यों का वहन करते हैं और ये सब काम लड़कियां भी कर सकती हैं. सही मायने में इस शब्द
की यही व्याख्या होनी चाहिए और आज हमें इस सोच को अपनाने की ज़रूरत है.

वारिस के रूप में बेटा ही क्यों?

इसके पीछे कई आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और भावनात्मक कारण हैं-
* बुढ़ापे में बेटा आर्थिक सहारे के साथ-साथ भावनात्मक सहारा भी देता है, जबकि बेटियां शादी करके दूसरे के घर चली
जाती हैं.
* बेटे परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में सहयोग देते हैं और प्रॉपर्टी में इज़ाफ़ा करते हैं, जबकि बेटियों को दहेज देना पड़ता है, जिससे घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ जाती है.
* बेटे वंश को आगे बढ़ाते हैं, जबकि बेटियां किसी और का परिवार बढ़ाती हैं.
* हमारे समाज में माता-पिता के जीते जी और मरने के बाद भी बेटे कई धार्मिक संस्कार निभाते हैं, जिसकी इजाज़त धर्म ने बेटियों को नहीं दी है.
* बेटे परिवार के मान-सम्मान को बढ़ाते हैं और परिवार की ताक़त बढ़ाते हैं, जबकि बेटियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी घरवालों पर होती है.
* प्रॉपर्टी और फाइनेंस जैसी बातें स़िर्फ पुरुषोें से जोड़कर देखी जाती हैं, लड़कियों को इसके लिए समर्थ नहीं समझा जाता.
* कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बेटा ही माता-पिता को स्वर्ग के द्वार पार कराता है, इसीलिए ज़्यादातर लोग बेटों की ही चाह रखते हैं.
* बेटे के बिना परिवार अधूरा माना जाता है.

क्या कहते हैं आंकड़े?

* इस साल हुए एक सर्वे में पता चला है कि चाइल्ड सेक्स रेशियो पिछले 70 सालों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है, जहां 1000 लड़कों पर महज़ 918 लड़कियां रह गई हैं.
* एक्सपर्ट्स के मुताबिक़, अगर स्थिति को संभाला न गया, तो 2040 तक भारत में लगभग 23 मिलियन महिलाओं की कमी हो जाएगी.
* कन्या भ्रूण हत्या का सबसे बड़ा कारण वारिसवाली सोच ही है.
* इंडिया ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे, यूनिवर्सिटी ऑफ मैरिलैंड और नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा किए गए सर्वे में यह बात सामने आई है कि 77% भारतीय आज भी बुढ़ापे में बेटी की बजाय बेटे के घर रहना पसंद करते हैं. शायद इसके पीछे का कारण हमारी परंपरागत सोच है, जो कहती है कि बेटियों के घर का पानी भी नहीं पीना चाहिए.
* ऐसा बिल्कुल नहीं है कि यह भेदभाव अनपढ़ और ग़रीब तबके के लोगों के बीच है, बल्कि सुशिक्षित व अमीर घरों में भी यह उतना ही देखा जाता है.

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सोच बदलने की ज़रूरत है

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* जब ज़माने के साथ हमारी लाइफस्टाइल बदल रही है, हमारा खानपान बदल रहा है, हमारी सोच बदल रही, तो भला शब्दों के अर्थ वही क्यों रहें? क्या यह सही समय नहीं है, सही मायने में लड़कियों को समानता का अधिकार देने का?
* वैसे भी हमारे देश का क़ानून भी समानता का पक्षधर है, तभी तो लड़कियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार प्राप्त है. पर क्या यह काफ़ी है, शायद नहीं. क्योेंकि भले ही इस अधिकार को क़ानूनी जामा पहना दिया गया है, पर क्या इस पर अमल करना इतना आसान है? ऐसे कई मामले देखने को मिलते हैं, जब अपना हक़ लेनेवाली बेटियों से परिवार के लोग ही नाते-रिश्ते तोड़ लेते हैं.
* समाज में ऐसे कई उदाहरण प्रस्तुत हैं, जहां लड़कियां अपने माता-पिता की सेवा व देखभाल की ख़ातिर अपनी ख़ुशियों को तवज्जो नहीं देतीं, तो क्या ऐसे में उनका वारिस कहा जाना ग़लत है?
* हम हमेशा समाज की दुहाई देते हैं, पर जब-जब बदलाव होते हैं, तो सहजता से हर कोई उसे स्वीकार्य कर ले, यह ज़रूरी तो नहीं. पर क्या ऐसे में परिवर्तन नहीं होते? बदलाव तो होते ही रहे हैं और होते रहेंगे. हम क्यों भूल जाते हैं कि समाज हमीं से बनता है, अगर हम इस ओर पहल करेंगे, तो दूसरे भी इस बात को समझेंगे.
* बेटियों को लेकर हमेशा से ही हमारे समाज में दोहरा मापदंड अपनाया जाता रहा है. जहां एक ओर लोग मंच पर महिला मुक्ति और सशक्तिकरण के नारे लगाते हैं, वहीं घर में बेटियों को मान-सम्मान नहीं दिया जाता.
* कई जगहों पर अभी भी बच्चों की परवरिश इस तरह की जाती है कि उनमें बचपन से लड़का-लड़कीवाली बात घर कर जाती है.
* हमारे समाज की यह भी एक विडंबना है कि सभी को मां चाहिए, पत्नी चाहिए, बहन चाहिए, पर बेटी नहीं चाहिए. अब भला आप ही सोचें, अगर बेटी ही न होगी, तो ये सब रिश्ते कहां से आएंगे.
* बेटों को बुढ़ापे का सहारा बनाने की बजाय सभी को अपना रिटायरमेंट सही समय पर प्लान करना चाहिए, ताकि किसी पर आश्रित न रहना पड़े.

रंग लाती सरकारी मुहिम

* प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस ओर एक सकारात्मक पहल की है. ङ्गबेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओफ के साथ वो देश में लड़कियों की स्थिति मज़बूत करना चाहते हैं, जो हमारे भविष्य के लिए बहुत ज़रूरी है.
* कुछ महीने पहले मोदीजी ने ट्विटर पर ङ्गसेल्फी विद डॉटरफ मुहिम भी शुरू की, ताकि लोग बेटियों की महत्ता को समझें.
* पिछले साल ङ्गसुकन्या समृद्धिफ नामक लघु बचत योजना की शुरुआत की गई, ताकि बेटियों की उच्च शिक्षा और शादी-ब्याह में किसी तरह की परेशानी न आए.
* कन्या भ्रूण हत्या के विरोध और बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने 2008 में ङ्गधनलक्ष्मी योजनाफ शुरू की थी, जिसमें 18 की उम्र के बाद शादी किए जाने पर सरकार की ओर से 1 लाख की बीमा राशि देने का प्रावधान है.
* महाराष्ट्र सरकार की ङ्गमाझी कन्या भाग्यश्री योजनाफ ख़ासतौर से ग़रीबी रेखा के नीचे रहनेवाले परिवारों के लिए है, जिसमें बच्ची के 18 साल की होने पर सरकार की ओर से 1 लाख मिलते हैं.
* राजस्थान सरकार ने बेटियों के जन्म को प्रोत्साहित करने के लिए मुख्यमंत्री शुभलक्ष्मी योजना की शुरुआत की थी. इसके तहत बालिका के जन्म पर, टीकाकरण के लिए, स्कूल में दाख़िले के लिए मां को कुल 7300 मिलते हैं.
* जम्मू-कश्मीर सरकार की लाडली बेटी योजना भी गरीब परिवार की बेटियों के लिए है, जो हर महीने बेटी के खाते में
1000 जमा करते हैं और 21 साल पूरे होने पर साढ़े छह लाख रुपए एकमुश्त देते हैं.
* हिमाचल सरकार की ङ्गबेटी है अनमोल योजनाफ के तहत बेटी के जन्म पर उसके खाते में 1 लाख की रक़म जमा की जाती है और बेटियों की 12वीं तक की शिक्षा के लिए सरकार 300 से 1200 की स्कॉलरशिप भी देती है.
* मध्य प्रदेश सरकार की लाडली लक्ष्मी योजना भी इसी कड़ी में शामिल है. बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उसकी शिक्षा के दौरान समय-समय पर स्कॉलरशिप दी जाती है.

 

– अनीता सिंह

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