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हर महिला को पता होना चाहिए रिप्रोडक्टिव राइट्स (मातृत्व अधिकार)(Every Woman Must Know These Reproductive Rights)

मेरी कोख मेरी नहीं, मेरा अस्तित्व मेरा नहीं, मेरे जज़्बात की कदर है क्या किसी को? मेरी उम्मीदों को क्या समझा है किसी ने? मेरे शरीर पर है किसी और का अधिकार, बरसों से झेल रही हूं मैं ये अत्याचार, कभी कोख में मार देते हैं, तो कभी जन्म के बाद, तड़प उठता है मेरा मन करके चित्कार. पर इतनी मजबूर क्यों हूं मैं आज? क्या मैं स़िर्फ मां ही हूं? क्या मेरी कोख ही सबकुछ है सबके लिए? नहीं, इससे कहीं ऊपर है मेरा अपना वजूद… मेरा अपना मान-सम्मान… 

Reproductive Rights

हमारे समाज में मातृत्व को बहुत सराहा जाता है. यही कारण है कि जो महिलाएं मां नहीं बन पातीं, समाज उन्हें वो सम्मान नहीं देता, जो संतानवाली महिलाओं को मिलता है. पर संतान चाहिए या नहीं चाहिए, कितने चाहिए, कितने सालों बाद चाहिए, दो बच्चों के बीच कितना अंतर चाहिए जैसे अहम् ़फैसले भी उसके लिए कोई और लेता है. बरसों से जो ग़लती दूसरी महिलाएं करती आ रही हैं, उसे आप न दोहराएं. जागरूक बनें और अपने अधिकारों को समझें.

क्यों ज़रूरी हैं रिप्रोडक्टिव राइट्स?

आज भी हमारे समाज में पुरुषों का दबदबा है और यही कारण है कि महिलाओं को दोयम दर्जा मिला है. उन्हें हमेशा कमज़ोर और दया का पात्र समझा जाता है. उन्हें कोमल और कमज़ोर समझकर कोई उनसे जबरन बच्चे पैदा न करवाए या फिर ज़बर्दस्ती गर्भपात न करवाए, इसलिए रिप्रोडक्टिव राइट्स हर महिला की सेहत और अधिकारों की रक्षा के लिए बहुत ज़रूरी हैं.

क्या हैं आपके रिप्रोडक्टिव राइट्स?

1994 में कैरो में हुए इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन पॉप्यूलेशन एंड डेवलपमेंट में महिलाओं के रिप्रोडक्टिव राइट्स के बारे में काफ़ी कुछ डिस्कस हुआ था. हमारे देश में ये सारे अधिकार लागू हैं. आप भी जानें, क्या हैं ये अधिकार.

– हर कपल को यह पूरा अधिकार है कि वो बिना किसी दबाव के अपनी मर्ज़ी से यह निर्णय ले सके कि वो कितने बच्चे चाहते हैं, 1, 2, 4 या फिर 1 भी नहीं.

– शादी के कितने सालों बाद बच्चे पैदा करने हैं.

– दो बच्चों के बीच कितने सालों का अंतर रखना है.

– आपको फैमिली शुरू करने के लिए ज़रूरी जानकारी मिलने का पूरा अधिकार है.

– उच्च स्तर के रिप्रोडक्टिव हेल्थ केयर की सुविधा मिलना आपका अधिकार है.

– बिना किसी भेदभाव, हिंसा और दबाव के आपको पूरी आज़ादी है कि आप बच्चों के बारे में प्लान कर सकें.

– हर महिला को उच्च स्तर की सेक्सुअल और रिप्रोडक्टिव हेल्थ केयर की सुविधा मिलनी चाहिए.

– यह आपका निर्णय होगा कि आप फैमिली प्लानिंग ऑपरेशन कब कराना चाहती हैं. उसके लिए आप पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं बना सकता.

– आपको सेफ और वाजिब दाम पर फैमिली प्लानिंग के मेथड उपलब्ध कराए जाएं.

– आपको पूरा हक़ है कि आप जिस उम्र में चाहें, उस उम्र में शादी करें और फैमिली की शुरुआत करें.

– क्योंकि सेक्सुअल हेल्थ आपके रिप्रोडक्टिव हेल्थ से जुड़ी है, इसलिए किसी भी तरह के सेक्सुअल एब्यूज़ का आप विरोध करें. उसके ख़िलाफ़ उचित कार्रवाई करें. जानें इन सरकारी सुविधाओं के बारे में

– सरकार ने सभी सरकारी अस्पतालों में ये सभी सुविधाएं मुहैया कराई हैं, जहां महिलाएं अपने रिप्रोडक्टिव राइट्स का इस्तेमाल कर सकती हैं.

– समय-समय पर महिलाओं के लिए सरकार की तरफ़ से कई योजनाएं भी बनाई जाती हैं, ताकि मातृत्व को एक सुखद अनुभव बनाया जा सके.

– जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के तहत सभी गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पतालों में प्रेग्नेंसी से लेकर डिलीवरी, दवा, ट्रांसपोर्ट आदि सेवाएं मुफ़्त हैं.
सिज़ेरियन डिलीवरी के लिए भी कोई पैसा नहीं लिया जाएगा.

– प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पतालों में चेकअप आदि की सारी सुविधाएं मुफ़्त हैं.

– सभी सरकारी अस्पतालों में फैमिली प्लानिंग के सभी मेथड की जानकारी महिलाओं को दी जाती है, ताकि वो अपनी सुविधानुसार किसी एक मेथड का इस्तेमाल कर सकें.

– किलकारी मैसेजेस, एक ऑडियो मैसेज सुविधा है, जो सरकारी अस्पतालों की ओर से प्रेग्नेंट महिलाओं को भेजे जाते हैं. इसमें उनके खानपान, सेहत और गर्भ की सुरक्षा के लिए कई टिप्स बताए जाते हैं.

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 Reproductive Rights
घट रही है मैटर्नल मोर्टालिटी रेट

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आज प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान महिलाओं की मृत्युदर में कमी आई है, पर अभी भी हर घंटे डिलीवरी के दौरान 5 महिलाओं की मृत्यु हो जाती है.

– वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2015 में भारत में हर 1 लाख चाइल्ड बर्थ में 174 महिलाओं की मौत हो जाती थी, जो 2010 में 215 था.

– एक अनुमान के अनुसार, हर साल चाइल्ड बर्थ के दौरान लगभग 45 हज़ार मांओं की मृत्यु हो जाती है.

– मैटर्नल और नियोनैटल मोर्टालिटी को कम करने के इरादे से सरकार प्रधानमंत्री मातृ वंदना  योजना लेकर आ रही है, ताकि उनकी मृत्यु दर को कम किया जा सके.

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971

गर्भपात का निर्णय हमारे रिप्रोडक्टिव राइट्स से जुड़ा है, इसलिए हर महिला को इसके बारे में पता होना चाहिए.

– हमारे देश में 1971 से ही एबॉर्शन लीगल है, पर आज भी बहुत-सी महिलाएं इस बात को नहीं जानतीं.

– एक अनुमान के मुताबिक क़रीब 8% मैटर्नल डेथ अनसेफ कंडीशन्स में एबॉर्शन कराने के दौरान हो जाती है.

– हर महिला को पता होना चाहिए कि कुछ विशेष हालात में आप क़ानूनन अपना गर्भपात करवा सकती हैं, जैसे-

  • भ्रूण का सही तरी़के से विकास नहीं
    हो रहा.
  • भू्रण में किसी तरह की ख़राबी आ गई.
  • बलात्कार के कारण गर्भ ठहर गया हो.
  • गर्भनिरोधक फेल हो गया.
  • भ्रूण के कारण गर्भवती मां को ख़तरा हो.
  • भ्रूण में किसी तरह की मानसिक और शारीरिक एब्नॉर्मिलिटी हो.-
  • गर्भपात किसी रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर से ही करवाएं.

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Reproductive Rights

सोच बदलने की ज़रूरत है

जस्टिस काटजू ने एक बार कहा था कि महिला सशक्तिकरण में क़ानून का रोल महज़ 20% होता है, जबकि 80% की महत्वपूर्ण भूमिका एजुकेशन सिस्टम की है, जहां लोगों की सोच को बदलकर ही इस मुकाम को हासिल किया जा सकता है.

– पुरुषों की सोच को बदलने में तो बहुत समय लगेगा, पर महिलाएं तो पहल करें. सालों से चले आ रहे दमन का नतीजा है कि उनकी सोच ही उनकी दुश्मन बन
गई है.

– उन्होंने मान लिया है कि उनके शरीर पर उनके पति का अधिकार है और जो वो कहेंगे वही होगा. जो अपने शरीर को ही अपनी प्रॉपर्टी नहीं मानती, वो भला अधिकारों के लिए संघर्ष क्या करेगी.

– महिलाओं को अपनी सोच बदलनी होगी.
आपका शरीर आपकी अपनी प्रॉपर्टी है, आपकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई और उसके बारे में निर्णय नहीं ले सकता.

– अनीता सिंह

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लेडी लक के बहाने महिलाओं को निशाना बनाना कितना सही? (Targeting Women In Name Of Lady Luck)

Targeting Women, In Name Of Lady Luck
मैं ख़्वाब नहीं, हक़ीक़त हूं… मैं ख़्वाहिश नहीं, एक मुकम्मल जहां हूं… किसी की बेटी, बहन या अर्द्धांगिनी बनने से पहले मैं अपने आप में संपूर्ण आसमान हूं, क्योंकि मैं एक व्यक्ति हूं, व्यक्तित्व हूं और मेरा भी अस्तित्व है… मुझमें संवेदनाएं हैं, भावनाएं हैं, जो यह साबित करती हैं कि मैं भी इंसान हूं… 

Targeting Women In Name Of Lady Luck

जी हां, एक स्त्री को हम पहले स्त्री और बाद में इंसान के रूप में देखते हैं या फिर यह भी हो सकता है कि हम उसे स़िर्फ और स़िर्फ एक स्त्री ही समझते हैं… उसके अलग अस्तित्व को, उसके अलग व्यक्तित्व को शायद ही हम देख-समझ पाते हैं. यही वजह है कि उसे हम एक शगुन समझने लगते हैं. कभी उसे अपना लकी चार्म बना लेते हैं, तो कभी उसे शापित घोषित करके अपनी असफलताओं को उस पर थोपने का प्रयास करते हैं…

…बहू के क़दम कितने शुभ हैं, घर में आते ही बेटे की तऱक्क़ी हो गई… बेटी नहीं, लक्ष्मी हुई है, इसके पैदा होते ही बिज़नेस कितना तेज़ी से बढ़ने लगा है… अक्सर इस तरह के जुमले हम अपने समाज में सुनते भी हैं और ख़ुद कहते भी हैं… ठीक इसके विपरीत जब कभी कोई दुखद घटना या दुर्घटना हो जाती है, तो भी हम कुछ इस तरह की बातें कहते-सुनते हैं… इस लड़की के क़दम ही शुभ नहीं हैं, पैदा होते ही यह सब हो गया या फिर ससुराल में नई बहू के आने पर यदि कोई दुर्घटना हो जाती है, तब भी इसी तरह की बातें कहने-सुनने को मिलती हैं. कुल मिलाकर बात यही है कि हर घटना को किसी स्त्री के शुभ-अशुभ क़दमों से जोड़कर देखा जाता है और आज हम इसी की चर्चा करेंगे कि यह कहां तक जायज़ है?

– अगर किसी सेलिब्रिटी की लाइफ में कोई लड़की आती है, तो उसकी हर कामयाबी या नाकामयाबी को उस लड़की से जोड़कर देखा जाने लगता है. ऐसे कई उदाहरण हमने देखे हैं, फिर चाहे वो क्रिकेटर हो या कोई एक्टर, उनकी परफॉर्मेंस को हम उस लड़की को पैमाना बनाकर जज करने लगते हैं.

– यहां तक कि हम ख़ुद भी बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर यह सब करते हैं, चाहे जान-बूझकर न करें,  लेकिन यह हमारी मानसिकता बन चुकी है.  श्र हम ख़ुद भी बहुत गर्व महसूस करते हैं, जब हमारा कोई अपना हमारे लिए यह कहे कि तुम मेरे लिए बहुत लकी हो…

– लेडी लक की अक्सर बहुत बातें की जाती हैं और इसे हम सकारात्मक तरी़के से ही लेते हैं, लेकिन ग़ौर करनेवाली बात यह है कि हर सुखद व दुखद घटना को किसी स्त्री के लकी या अनलकी होने से जोड़ना सही है?

– कर्म और भाग्य सबके अपने ही होते हैं, किसी दूसरे को अपने कर्मों या अपने भाग्य के लिए ज़िम्मेदार बताना कितना सही है?

– 42 वर्षीया सुनीता शर्मा (बदला हुआ नाम) ने इस संदर्भ में अपने अनुभव शेयर किए, “मेरी जब शादी हुई थी, तो मेरे पति और ससुरजी का बिज़नेस काफ़ी आगे बढ़ने लगा था. मुझे याद है कि हर बात पर मेरे पति और यहां तक कि मेरी सास भी कहती थीं कि सुनीता इस घर के लिए बहुत लकी है. मेरे पति की जब भी कोई बड़ी बिज़नेस डील फाइनल होती थी, तो घर आकर मुझे ही उसका श्रेय देते थे कि तुम जब से ज़िंदगी में आई हो, सब कुछ अच्छा हो रहा है. कितनी लकी हो तुम मेरे लिए… उस व़क्त मैं ख़ुद को बहुत ही ख़ुशनसीब समझती थी कि इतना प्यार करनेवाला पति और ससुराल मिला है. फिर कुछ सालों बाद मुझे बेटा हुआ, सब कुछ पहले जैसा ही था, बिज़नेस के उतार-चढ़ाव भी वैसे ही थे, कभी अच्छा, तो कभी कम अच्छा होता रहता था. फिर बेटे के जन्म के 3 साल बाद मुझे बेटी हुई. हम सब बहुत ख़ुश थे कि फैमिली कंप्लीट हो गई.

मेरे पति भी अक्सर कहते कि तुम्हारी ही तरह देखना, हमारी बेटी भी हमारे लिए बहुत लकी होगी. मैं ख़ुश हो जाती थी उनकी बातें सुनकर, लेकिन बिटिया के जन्म के कुछ समय बाद ही उनको बिज़नेस में नुक़सान हुआ, तो मेरी सास ने कहना शुरू कर दिया कि जब से गुड़िया का जन्म हुआ है, बिज़नेस आगे बढ़ ही नहीं रहा… मेरे पति भी बीच-बीच में कुछ ऐसी ही बातें करते, तब जाकर मुझे यह महसूस हुआ कि हम कितनी आसानी से किसी लड़की को अपने लिए शुभ-अशुभ घोषित कर देते हैं और यहां तक कि मैं ख़ुद को भी इसके लिए ज़िम्मेदार मानती हूं. जब पहली बार मुझे अपने लिए यह सुनने को मिला था, उसी व़क्त मुझे टोकना चाहिए था, ताकि इस तरह की सोच को पनपने से रोका जा सके.

मैंने अपने घरवालों को प्यार से समझाया, उनसे बात की, उन्हें महसूस करवाया कि इस तरह किसी भी लड़की को लकी या अनलकी कहना ग़लत है. वो लोग समझदार थे, सो समझ गए. कुछ समय बाद हमारा बिज़नेस फिर चल पड़ा, तो यह तो ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव लगे रहते हैं, इसके लिए किसी की बेटी-बहू को ज़िम्मेदार ठहराना बहुत ही ग़लत है. समाज को अपनी धारणा बदलनी चाहिए.”

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Targeting Women In Name Of Lady Luck

– भले ही हमें यह बात छोटी-सी या ग़ैरज़रूरी लगे, लेकिन अब यह ज़रूरी हो गया है कि हम इस तरह की मानसिकता से बाहर निकलें कि जब कोई क्रिकेटर यदि आउट ऑफ फॉर्म हो, तो उसके लिए पूरा समाज उसकी सेलिब्रिटी गर्लफ्रेंड को दोषी ठहराने लगे. उस पर तरह-तरह के ताने-तंज कसे जाने लगें या उस पर हल्की बातें, अपशब्द, सस्ते जोक्स बनाकर सोशल मीडिया पर फैलाने लगें.

– हम ख़ुद भी इस कुचक्र का हिस्सा बन जाते हैं और इस तरह की बातें सर्कुलेट करते हैं. न्यूज़ में अपनी स्टोरी की टीआरपी बढ़ाने के लिए चटखारे ले-लेकर लोगों के रिएक्शन्स दिखाते हैं, लेकिन इन सबके बीच हम भूल जाते हैं कि जिसके लिए यह सब कहा जा रहा है, उसके मनोबल पर इसका क्या असर होता होगा…?

– किसी को भी किसी के लिए शुभ-अशुभ कहनेवाले भला हम कौन होते हैं? और क्यों किसी लेडी लक के बहाने हर बार एक स्त्री को निशाना बनाया जाता है?

– दरअसल, इन सबके पीछे भी हमारी वही मानसिकता है, जिसमें पुरुषों के अहं को तुष्ट करने की परंपरा चली आ रही है.

– हम भले ही ऊपरी तौर पर इसे अंधविश्‍वास कहें, लेकिन कहीं न कहीं यह हमारी छोटी मानसिकता को ही दर्शाता है.

– इस तरह के अंधविश्‍वास किस तरह से रिश्तों व समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं यह समझना ज़रूरी है.

– किसी स्त्री के अस्तित्व पर ही आप प्रश्‍नचिह्न लगा देते हैं और फिर आप इसी सोच के साथ जीने भी लगते हैं. हर घटना को उसके साथ जोड़कर देखने लगते हैं… क्या यह जायज़ है?

– क्या कभी ऐसा देखा या सुना गया है कि किसी पुरुष को इस तरह से लकी-अनलकी के पैमाने पर तोला गया हो?

– चाहे आम ज़िंदगी हो या फिर सेलिब्रिटीज़, किसी भी पुरुष को इन सबसे नहीं गुज़रना पड़ता, आख़िर क्यों?

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Targeting Women In Name Of Lady Luck

– घूम-फिरकर हम फिर वहीं आ रहे हैं कि लेडी लक के बहाने क्यों महिलाओं को ही निशाना बनाया जाता है? और यह कब तक चलता रहेगा?

– सवाल कई हैं, जवाब एक ही- जब तक हमारे समाज की सोच नहीं बदलेगी और इस सोच को बदलने में अब भी सदियां लगेंगी. एक पैमाना ऐसी भी न जाने कितनी घटनाएं आज भी समय-समय पर प्रकाश में आती हैं, जहां किसी महिला को डायन या अपशगुनि घोषित करके प्रताड़ित या समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है. कभी किसी पेड़ से बांधकर, कभी मुंह काला करके, तो कभी निर्वस्त्र करके गांवभर में घुमाया जाता है… हालांकि पहले के मुकाबले अब ऐसी घटनाएं कम ज़रूर हो गई हैं, लेकिन पूरी तरह से बंद नहीं हुई हैं. ये और इस तरह की तमाम घटनाएं महिलाओं के प्रति हमारी उसी सोच को उजागर करती हैं, जहां उन्हें शुभ-अशुभ के तराज़ू में तोला जाता है.

– गीता शर्मा

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महिला सुरक्षा पर रिपोर्ट: कौन-से राज्य सबसे सुरक्षित, कौन सबसे असुरक्षित? (Women Safety Report: Goa Safest, Delhi, Bihar Vulnerbale)

Women Safety Report india
क्या आप जानते हैं कि महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज़ से देश का कौन-सा राज्य कितना सुरक्षित और कौन सबसे असुरक्षित है? नहीं, तो हम आपको बताते हैं, ये रिपोर्ट. 1 नवंबर, 2017 को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने प्लान इंडिया की वह रिपोर्ट सार्वजनिक की, जो उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा पर सर्वे के आधार पर बनाई है, जिसमें महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज़ से गोवा देश में अव्वल है और दिल्ली, बिहार सबसे बदतर. 

Women Safety Report india

गोवा सबसे सुरक्षित राज्य

रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज़ से गोवा देश में अव्वल है. इस बात का पता लगाने के लिए जेंडर वल्नरेबिलिटी इंडेक्स यानी जीवीआई का इस्तेमाल किया गया है. राज्यों को 0 से 1 के बीच में नंबर दिए गए यानी जो राज्य 1 नंबर के क़रीब है, वो सबसे सुरक्षित और जो 0 के क़रीब वो सबसे असुरक्षित. इस रिपोर्ट में गोवा का जीवीआई 0.656 है, जो देश के औसत जीवीआई 0.5314 से ज़्यादा है. लोगों की सुरक्षा के मामले में भी गोवा देश का नंबर 1 राज्य है. सुरक्षा के अलावा इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, जीविका कमाने और गरीबी के भी आंकड़े जारी किए गए. गोवा शिक्षा के मामले में पांचवे, स्वास्थ्य में छठे, जीविका कमाने में छठे और गरीबी के मामले में पांचवे नंबर पर है.

केरल दूसरे नंबर पर

महिलाओं की सुरक्षा के मामले में केरल दूसरे नंबर पर है. इसका जीवीआई 0.634 है. रिपोर्ट में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि केरल ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफ़ी सुधार करके नई ऊंचाइयां छुई हैं. इसके बाद मिज़ोरम, सिक्किम और मणिपुर का नंबर आता है. यानी ग़ौर करें, तो पूर्वोत्तर भारत के ये राज्य राजधानी दिल्ली और मेट्रो शहरों के मुकाबले महिलाओं के लिए काफ़ी सुरक्षित हैं.

राजधानी दिल्ली महिलाओं के लिए असुरक्षित

देश की राजधानी दिल्ली महिलाओं के लिए बेहद असुरक्षित है. 30 राज्यों की इस रिपोर्ट में दिल्ली 28वें नंबर पर है यानी बिहार से स़िर्फ दो पायदान ऊपर. दिल्ली का जीवीआई स्कोर 0.436 है.

बिहार सबसे नीचे

बिहार का नंबर इस लिस्ट में सबसे नीचे है यानी बिहार देश में महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित राज्य है. इसका जीवीआई स्कोर 0.410 है. सुरक्षा के अलावा लड़कियों की शिक्षा व स्वास्थ्य के मामले में भी सबसे पीछे हैं. बिहार को सबसे नीचे रखने का कारण कम उम्र में लड़कियों की शादी और उनका मां बनना है. राज्य के आंकड़ों पर नज़र डालें, तो बिहार में 39 फ़ीसदी लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में कर दी जाती है, जिससे वो जल्द ही मां बन जाती हैं और मां और बच्चे दोनों का ही स्वास्थ्य बहुत कमज़ोर होता है. 15-19 साल की उम्र की 12.2 लड़कियां गर्भवती थीं या मां बन चुकी थीं.

इस लिस्ट में जहां झारखंड 27वें नंबर पर है, वहीं उत्तर प्रदेश 29वें नंबर पर. यानी देखा जाए, तो देश के किसी अन्य राज्यों के मुकाबले, बिहार, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और झारखंड सबसे असुरक्षित हैं.

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