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महिलाओं के प्रति बढ़ रहे अपराधों को ध्यान में रखते हुए यह बहुत ज़रूरी है कि वो अपने सुरक्षा से जुड़े क़ानून और अधिकारों के प्रति जागरूक रहें. यहां हमने महिला सुरक्षा से जुड़े सेल्फ डिफेंस क़ानून के बारे में जानकारी देने की कोशिश की है, जिससे आज भी बहुत-सी महिलाएं अनभिज्ञ हैं.

Women's Self Defence Laws In India

मजबूरी कहें या बेबसी, आज भी बहुत-सी महिलाएं अपने ख़िलाफ़ हो रहे अपराध को सहती रहती हैं, क्योंकि उन्हें अपने सेल्फ डिफेंस और सुरक्षा क़ानून के बारे में पता ही नहीं होता. हमारे देश का क़ानून सभी को सेल्फ डिफेंस का अधिकार देता है, पर महिलाओं को विशेषतौर पर अतिरिक्त अधिकार मिले हैं, जिससे कोई उनकी मजबूरी का फ़ायदा न उठा सके.

क्या है सेल्फ डिफेंस का क़ानून?

मूल सिद्धांतों के अनुसार, हर व्यक्ति का पहला कर्त्तव्य ख़ुद की मदद करना है और अगर ऐसे में स्वयं की रक्षा के लिए उसे किसी और को चोट भी पहुंचानी पड़े, तो वह अपराध नहीं माना जाएगा. प्राइवेट डिफेंस के बारे में भारतीय दंड संहिता के सेक्शन्स 96 से लेकर 106 तक में विस्तारपूर्वक बताया गया है. हर नागरिक को ख़ुद को बचाने का अधिकार है, लेकिन उसकी भी एक मर्यादा है.

किन स्थितियों में मान्य होगा सेल्फ डिफेंस?

–     इसके लिए सबसे ज़रूरी है, ख़तरा या डर. अगर आप ख़तरा भांप लें कि कोई आपको जान से मार सकता है, आपका बलात्कार कर सकता है, आपको किडनैप कर सकता है, आपको गंभीर चोट पहुंचा सकता है, तो आप अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं.

–     अगर आपको ख़तरा महसूस हो कि कोई आपकी प्रॉपर्टी को नुक़सान पहुंचा सकता है, उसे लूट या चुरा सकता है या फिर ज़बर्दस्ती आपके घर में घुसने की कोशिश कर सकता है, तो यह अधिकार मान्य होगा.

–     अगर आपके पास पुलिस या किसी सरकारी अधिकारी को सूचित करने का कोई साधन मौजूद न हो, तो ऐसे में अपनी सुरक्षा के लिए उठाया गया आपका कदम जायज़ माना जाएगा.

क्या है इस अधिकार की सीमा?

इस अधिकार की कुछ सीमाएं हैं. क़ानून में साफ़-साफ़ लिखा है कि आपका बचाव हमले के अनुरूप होना चाहिए, न कम, न ज़्यादा. इसे कुछ उदाहरण से समझते हैं-

–     ए ने बी पर चाकू से हमला किया, जिसके बचाव में बी ने धारदार हथियार का इस्तेमाल कर उसे मार दिया, तो यह मान्य होगा.

–     ए ने बी को धक्का मारा और कई तमाचे मारे, तो बचाव में बी ने भी ए को पीट दिया, यह भी सही है.

–     ए ने बी को कई तमाचे मारे, लेकिन बी ने ए को जान से मार दिया, यह मान्य नहीं होगा, क्योंकि तमाचे के लिए आप उसे चोट पहुंचा सकते हैं, पर उससे आपको जान का ख़तरा नहीं, इसलिए जान से नहीं मार सकते.

–     कोर्ट हमला करनेवाले का इरादा, बचाव करनेवाले का इरादा, हमला किस तरह किया गया आदि तथ्यों को ध्यान में रखकर ही फैसला लेता है.

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Women's Self Defence Laws In India

बलात्कार व सेल्फ डिफेंस

– अपने शरीर की सुरक्षा आपकी अपनी ज़िम्मेदारी है. सेक्शन 96 और 97 के अनुसार, अगर किसी महिला को परिस्थितियों को देखते हुए यह ख़तरा महसूस हो कि सामनेवाला व्यक्ति उसका बलात्कार कर सकता है, तो उस महिला को पूरा अधिकार है कि वह अपने बचाव के लिए उस व्यक्ति पर हमला करे.

–     सेक्शन 100 के अनुसार, अगर बलात्कार से ख़ुद को बचाने के लिए आप किसी पर जानलेवा हमला करती हैं, जिससे उसकी मौत हो जाती है, तो यह सेल्फ डिफेंस माना जाएगा.

किडनैपिंग और सेल्फ डिफेंस

–     अगर किसी महिला को कोई किडनैप कर रहा हो या फिर ज़बर्दस्ती किसी जगह पर बांधकर रखना चाहता हो या फिर ऐसी जगह पर रखने की कोशिश करे, जहां से वह किसी से संपर्क न कर पाए, तो ऐसी स्थिति में महिला को अधिकार है कि वह अपने बचाव के लिए उस व्यक्ति पर हमला कर सकती है.

–     ऐसे मामलों में ज़रूरी नहीं कि महिला स़िर्फ बचाव करे या विरोध करे, बल्कि उसे पूरा अधिकार है कि वह हमलावर/ख़तरे को ख़त्म करे.

एसिड अटैक में सेल्फ डिफेंस

अगर किसी महिला को यह ख़तरा महसूस हो कि सामनेवाला व्यक्ति उसके चेहरे या शरीर के किसी अन्य हिस्से पर एसिड से हमला करनेवाला है, तो वह महिला अपने बचाव में उस व्यक्ति पर हमला कर सकती है. बचाव के दौरान अगर हमलावर की मौत हो जाए, तो यह हत्या की श्रेणी में नहीं आएगा.

बचें फेक न्यूज़ से

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक मैसेज बहुत वायरल हो रहा था, जिसमें लिखा था कि- ‘मोदी सरकार ने आज ही एक ऐसा क़ानून पारित किया है, जिसके अनुसार आईपीसी के ‘सेक्शन 233’ के तहत अगर किसी महिला को यह शक हो जाए कि उसका बलात्कार हो सकता है या फिर अगर वह बलात्कार की शिकार हो चुकी है, तो उसे पूरा अधिकार है कि वह बलात्कारी को जान से मार डाले, उसके प्राइवेट पार्ट को घायल करे या फिर उसे गंभीर चोट पहुंचाए और इसके लिए उसे हत्या का दोषी नहीं ठहराया जा सकता.’ आपको बता दें कि यह मैसेज पूरी तरह फेक है. ऐसा कोई नया क़ानून नहीं बना है और आईपीसी की धारा 233 में बलात्कार का कोई ज़िक्र नहीं आता, बल्कि यह धारा नकली सिक्के बनाने और बेचने के अपराध के बारे में है.

–     सोशल मीडिया पर आए दिन ऐसे कई ग़लत मैसेज वायरल होते रहते हैं, इसलिए बिना सोचे-समझे कोई भी मैसेज फॉरवर्ड न करें. ख़ुद के साथ साथ दूसरों को भी सुरक्षित रखें.

Self Defence Laws In India
घरेलू हिंसा से सुरक्षा

हर महिला को पता होना चाहिए कि घरेलू हिंसा से सुरक्षा क़ानून के तहत सरकार हर ज़िले में प्रोटेक्शन ऑफिसर की नियुक्ति करती है, जो पीड़िता की मदद करते हैं. अगर आप घरेलू हिंसा की शिकार नहीं हुई हैं, लेकिन आपको ऐसा ख़तरा महसूस हो रहा है कि आपके साथ ऐसा कुछ हो सकता है, तब भी आप प्रोटेक्शन ऑफिसर की मदद ले सकती हैं. वो आपको अपने अधिकारों व सेफ्टी रूल्स के बारे में गाइड कर सकते हैं, जिससे भविष्य में होनेवाले किसी भी ख़तरे को आप टाल सकती हैं.

सेक्सुअल हैरेसमेंट से सुरक्षा

आईपीसी की धारा 354ए सेक्सुअल हैरेसमेंट के ख़िलाफ़ सबसे महत्वपूर्ण सेक्शन है. इसमें गंदी नीयत से किसी महिला को छूना, शारीरिक संबंध बनाने के लिए दबाव डालना, अश्‍लील वीडियो या मैसेज दिखाना या फिर अश्‍लील कमेंट करना या मैसेज भेजने जैसे अपराध शामिल हैं. इसके लिए दोषी को एक से तीन साल तक की सज़ा का प्रावधान है.

अस्मिता भंग करने की कोशिश करना

आईपीसी की धारा 354बी के तहत अगर कोई पुरुष ज़बर्दस्ती किसी महिला को नग्न अवस्था में देखता है, उसके कपड़े उतारता है या उतारने के लिए उकसाता है, तो उसे पांच से सात साल तक की सज़ा हो सकती है.

बिना अनुमति फोटो खींचना

अगर कोई व्यक्ति किसी महिला का अश्‍लील वीडियो बनाता है या उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ फोटो खींचता है, तो आईपीसी की धारा 354 सी के तहत उसे एक से तीन साल तक की सज़ा हो सकती है.

स्टॉकिंग से सुरक्षा

अगर कोई व्यक्ति लगातार किसी महिला का पीछा करता है, तो स्टॉकिंग के लिए उसे तीन से पांच साल तक की सज़ा हो सकती है. स्टॉकिंग किसी और बड़े अपराध की साज़िश के तहत भी हो सकती है, इसलिए जैसे ही आपको शक हो कि कोई आपका लगातार पीछा कर रहा है, तो तुरंत अलर्ट हो जाएं. उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ एक्शन लें और कभी भी स्टॉकिंग को अनदेखा न करें.

दूसरों की मदद से न हिचकिचाएं

बहुत-से लोग अपने सामने अपराध होते हुए देखते रहते हैं, पर क़ानूनी चक्कर में फंसने के डर से आगे नहीं आते. आपको बता दें कि अगर कोई अपराधी किसी महिला या पुरुष के साथ अपराध को अंजाम देने की कोशिश कर रहा हो, तो आम नागरिक होने के नाते आपको यह अधिकार है कि आप उसकी सुरक्षा के लिए हमलावर पर हमला कर सकते हैं. प्राइवेट डिफेंस का क़ानून आपको यह अधिकार देता है कि आप अपने साथ-साथ दूसरों की भी रक्षा कर सकते हैं.

– अनीता सिंह

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महिलाओं के अधिकार क्षेत्र में एक और इज़ाफ़ा करते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. इसके अनुसार अब कोई भी महिला (Women) अपने ख़िलाफ़ होनेवाले दहेज उत्पीड़न (Dowry Harassment) या क्रूरता के ख़िलाफ़ कहीं से भी केस दर्ज (Case File) कर सकती है. इसके लिए अब उन्हें जूरिस्डिक्शन यानी घटनास्थल का ध्यान रखने की ज़रूरत नहीं. 

Dowry Harassment

अब तक ऐसा होता था कि अगर कोई महिला अपने ख़िलाफ़ होनेवाले उत्पीड़न या अत्याचार के ख़िलाफ़ उसी स्थान से केस दर्ज करा सकती थी, जहां उसके साथ अपराध हुआ था. ऐसे में ऐसी बहुत-सी महिलाएं, जिन्हें अपने ससुराल से निकाल दिया जाता था और जो मायके में जाकर शरण लेती थीं, वो अपने लड़ने के लिए वहां दोबारा नहीं लौटती थीं, जिससे वो न्याय से वंचित रह जाती थीं.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर उत्पीड़न के कारण किसी महिला को उसके ससुराल से निकाल दिया जाए, तो वो अपने मायके या किसी और जगह पर जहां वो आश्रय लेगी, वहां से अपने ससुरालवालों के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 498ए के तहत आपराधिक मामला दर्ज करा सकती है.

दहेज उत्पीड़न के ख़िलाफ़ क़ानूनी लड़ाई लड़ रही महिलाओं के लिए यह बहुत बड़ी राहत लेकर आया है. अब तक किसी भी तरह का आपराधिक मामला दर्ज कराने के लिए पीड़ित को उसी स्थान से केस दर्ज कराना होता था, जहां उसके साथ उत्पीड़न हुआ है यानी घटनास्थल से ही मामला दर्ज हो सकता था.

– अनीता सिंह

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मैं ख़्वाब नहीं, हक़ीक़त हूं… मैं ख़्वाहिश नहीं, एक मुकम्मल जहां हूं… किसी की बेटी, बहन या अर्द्धांगिनी बनने से पहले मैं अपने आप में संपूर्ण आसमान हूं, क्योंकि मैं एक व्यक्ति हूं, व्यक्तित्व हूं और मेरा भी अस्तित्व है… मुझमें संवेदनाएं हैं, भावनाएं हैं, जो यह साबित करती हैं कि मैं भी इंसान हूं… 

Targeting Women In Name Of Lady Luck

जी हां, एक स्त्री को हम पहले स्त्री और बाद में इंसान के रूप में देखते हैं या फिर यह भी हो सकता है कि हम उसे स़िर्फ और स़िर्फ एक स्त्री ही समझते हैं… उसके अलग अस्तित्व को, उसके अलग व्यक्तित्व को शायद ही हम देख-समझ पाते हैं. यही वजह है कि उसे हम एक शगुन समझने लगते हैं. कभी उसे अपना लकी चार्म बना लेते हैं, तो कभी उसे शापित घोषित करके अपनी असफलताओं को उस पर थोपने का प्रयास करते हैं…

…बहू के क़दम कितने शुभ हैं, घर में आते ही बेटे की तऱक्क़ी हो गई… बेटी नहीं, लक्ष्मी हुई है, इसके पैदा होते ही बिज़नेस कितना तेज़ी से बढ़ने लगा है… अक्सर इस तरह के जुमले हम अपने समाज में सुनते भी हैं और ख़ुद कहते भी हैं… ठीक इसके विपरीत जब कभी कोई दुखद घटना या दुर्घटना हो जाती है, तो भी हम कुछ इस तरह की बातें कहते-सुनते हैं… इस लड़की के क़दम ही शुभ नहीं हैं, पैदा होते ही यह सब हो गया या फिर ससुराल में नई बहू के आने पर यदि कोई दुर्घटना हो जाती है, तब भी इसी तरह की बातें कहने-सुनने को मिलती हैं. कुल मिलाकर बात यही है कि हर घटना को किसी स्त्री के शुभ-अशुभ क़दमों से जोड़कर देखा जाता है और आज हम इसी की चर्चा करेंगे कि यह कहां तक जायज़ है?

– अगर किसी सेलिब्रिटी की लाइफ में कोई लड़की आती है, तो उसकी हर कामयाबी या नाकामयाबी को उस लड़की से जोड़कर देखा जाने लगता है. ऐसे कई उदाहरण हमने देखे हैं, फिर चाहे वो क्रिकेटर हो या कोई एक्टर, उनकी परफॉर्मेंस को हम उस लड़की को पैमाना बनाकर जज करने लगते हैं.

– यहां तक कि हम ख़ुद भी बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर यह सब करते हैं, चाहे जान-बूझकर न करें,  लेकिन यह हमारी मानसिकता बन चुकी है.  श्र हम ख़ुद भी बहुत गर्व महसूस करते हैं, जब हमारा कोई अपना हमारे लिए यह कहे कि तुम मेरे लिए बहुत लकी हो…

– लेडी लक की अक्सर बहुत बातें की जाती हैं और इसे हम सकारात्मक तरी़के से ही लेते हैं, लेकिन ग़ौर करनेवाली बात यह है कि हर सुखद व दुखद घटना को किसी स्त्री के लकी या अनलकी होने से जोड़ना सही है?

– कर्म और भाग्य सबके अपने ही होते हैं, किसी दूसरे को अपने कर्मों या अपने भाग्य के लिए ज़िम्मेदार बताना कितना सही है?

– 42 वर्षीया सुनीता शर्मा (बदला हुआ नाम) ने इस संदर्भ में अपने अनुभव शेयर किए, “मेरी जब शादी हुई थी, तो मेरे पति और ससुरजी का बिज़नेस काफ़ी आगे बढ़ने लगा था. मुझे याद है कि हर बात पर मेरे पति और यहां तक कि मेरी सास भी कहती थीं कि सुनीता इस घर के लिए बहुत लकी है. मेरे पति की जब भी कोई बड़ी बिज़नेस डील फाइनल होती थी, तो घर आकर मुझे ही उसका श्रेय देते थे कि तुम जब से ज़िंदगी में आई हो, सब कुछ अच्छा हो रहा है. कितनी लकी हो तुम मेरे लिए… उस व़क्त मैं ख़ुद को बहुत ही ख़ुशनसीब समझती थी कि इतना प्यार करनेवाला पति और ससुराल मिला है. फिर कुछ सालों बाद मुझे बेटा हुआ, सब कुछ पहले जैसा ही था, बिज़नेस के उतार-चढ़ाव भी वैसे ही थे, कभी अच्छा, तो कभी कम अच्छा होता रहता था. फिर बेटे के जन्म के 3 साल बाद मुझे बेटी हुई. हम सब बहुत ख़ुश थे कि फैमिली कंप्लीट हो गई.

मेरे पति भी अक्सर कहते कि तुम्हारी ही तरह देखना, हमारी बेटी भी हमारे लिए बहुत लकी होगी. मैं ख़ुश हो जाती थी उनकी बातें सुनकर, लेकिन बिटिया के जन्म के कुछ समय बाद ही उनको बिज़नेस में नुक़सान हुआ, तो मेरी सास ने कहना शुरू कर दिया कि जब से गुड़िया का जन्म हुआ है, बिज़नेस आगे बढ़ ही नहीं रहा… मेरे पति भी बीच-बीच में कुछ ऐसी ही बातें करते, तब जाकर मुझे यह महसूस हुआ कि हम कितनी आसानी से किसी लड़की को अपने लिए शुभ-अशुभ घोषित कर देते हैं और यहां तक कि मैं ख़ुद को भी इसके लिए ज़िम्मेदार मानती हूं. जब पहली बार मुझे अपने लिए यह सुनने को मिला था, उसी व़क्त मुझे टोकना चाहिए था, ताकि इस तरह की सोच को पनपने से रोका जा सके.

मैंने अपने घरवालों को प्यार से समझाया, उनसे बात की, उन्हें महसूस करवाया कि इस तरह किसी भी लड़की को लकी या अनलकी कहना ग़लत है. वो लोग समझदार थे, सो समझ गए. कुछ समय बाद हमारा बिज़नेस फिर चल पड़ा, तो यह तो ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव लगे रहते हैं, इसके लिए किसी की बेटी-बहू को ज़िम्मेदार ठहराना बहुत ही ग़लत है. समाज को अपनी धारणा बदलनी चाहिए.”

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– भले ही हमें यह बात छोटी-सी या ग़ैरज़रूरी लगे, लेकिन अब यह ज़रूरी हो गया है कि हम इस तरह की मानसिकता से बाहर निकलें कि जब कोई क्रिकेटर यदि आउट ऑफ फॉर्म हो, तो उसके लिए पूरा समाज उसकी सेलिब्रिटी गर्लफ्रेंड को दोषी ठहराने लगे. उस पर तरह-तरह के ताने-तंज कसे जाने लगें या उस पर हल्की बातें, अपशब्द, सस्ते जोक्स बनाकर सोशल मीडिया पर फैलाने लगें.

– हम ख़ुद भी इस कुचक्र का हिस्सा बन जाते हैं और इस तरह की बातें सर्कुलेट करते हैं. न्यूज़ में अपनी स्टोरी की टीआरपी बढ़ाने के लिए चटखारे ले-लेकर लोगों के रिएक्शन्स दिखाते हैं, लेकिन इन सबके बीच हम भूल जाते हैं कि जिसके लिए यह सब कहा जा रहा है, उसके मनोबल पर इसका क्या असर होता होगा…?

– किसी को भी किसी के लिए शुभ-अशुभ कहनेवाले भला हम कौन होते हैं? और क्यों किसी लेडी लक के बहाने हर बार एक स्त्री को निशाना बनाया जाता है?

– दरअसल, इन सबके पीछे भी हमारी वही मानसिकता है, जिसमें पुरुषों के अहं को तुष्ट करने की परंपरा चली आ रही है.

– हम भले ही ऊपरी तौर पर इसे अंधविश्‍वास कहें, लेकिन कहीं न कहीं यह हमारी छोटी मानसिकता को ही दर्शाता है.

– इस तरह के अंधविश्‍वास किस तरह से रिश्तों व समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं यह समझना ज़रूरी है.

– किसी स्त्री के अस्तित्व पर ही आप प्रश्‍नचिह्न लगा देते हैं और फिर आप इसी सोच के साथ जीने भी लगते हैं. हर घटना को उसके साथ जोड़कर देखने लगते हैं… क्या यह जायज़ है?

– क्या कभी ऐसा देखा या सुना गया है कि किसी पुरुष को इस तरह से लकी-अनलकी के पैमाने पर तोला गया हो?

– चाहे आम ज़िंदगी हो या फिर सेलिब्रिटीज़, किसी भी पुरुष को इन सबसे नहीं गुज़रना पड़ता, आख़िर क्यों?

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– घूम-फिरकर हम फिर वहीं आ रहे हैं कि लेडी लक के बहाने क्यों महिलाओं को ही निशाना बनाया जाता है? और यह कब तक चलता रहेगा?

– सवाल कई हैं, जवाब एक ही- जब तक हमारे समाज की सोच नहीं बदलेगी और इस सोच को बदलने में अब भी सदियां लगेंगी. एक पैमाना ऐसी भी न जाने कितनी घटनाएं आज भी समय-समय पर प्रकाश में आती हैं, जहां किसी महिला को डायन या अपशगुनि घोषित करके प्रताड़ित या समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है. कभी किसी पेड़ से बांधकर, कभी मुंह काला करके, तो कभी निर्वस्त्र करके गांवभर में घुमाया जाता है… हालांकि पहले के मुकाबले अब ऐसी घटनाएं कम ज़रूर हो गई हैं, लेकिन पूरी तरह से बंद नहीं हुई हैं. ये और इस तरह की तमाम घटनाएं महिलाओं के प्रति हमारी उसी सोच को उजागर करती हैं, जहां उन्हें शुभ-अशुभ के तराज़ू में तोला जाता है.

– गीता शर्मा

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लंबी कानूनी लड़ाई, विरोध प्रदर्शनों लंबे साल के इंतज़ार के बाद आख़िरकार मंगलवार को 80 महिलाओं के एक समूह ने मुंबई के बहुचर्चित हाजी अली दरगाह की मुख्य मज़ार में प्रवेश किया और दरगाह तक पहुंच कर महिलाओं ने वहां चादर चढ़ाने की रस्म भी मुकम्मिल की.

 भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सहसंस्थापक नूरजहां एस नियाज़ ने कहा, “आज हमने बड़ी लड़ाई जीत ली. अब महिलाएं हाजी अली दरगाह में पुरुषों की तरह चादर चढ़ा सकेंगी. हमने पुलिस या दरगाह ट्रस्ट को सूचित नहीं किया है. हम लोगों ने मत्था टेका और बाहर आ गए.”

 सुश्री नियाज़ ने कहा कि महिलाओं ने मंगलवार को दरगाह पर फूल और चादरें चढ़ाईं और शांति की दुआ की. उन्होंने कहा, “यह समानता, लैंगिक भेदभाव ख़त्म करने और हमारे संवैधानिक अधिकारों को समाप्त करने की लड़ाई थी. हम ख़ुश हैं कि अब महिलाओं और पुरुषों को पवित्र गर्भगृह में प्रवेश का समान अधिकार मिला.”

 पूरे देश की क़रीब 80 महिलाओं के एक समूह ने दोपहर बाद क़रीब तीन बजे मुंबई के वरली तट के निकट एक छोटे से टापू पर स्थित हाजी अली दरगाह में प्रवेश किया. इस बार उन्हें हाजी अली दरगाह ट्रस्ट की ओर से किसी तरह का विरोध का सामना नहीं करना पड़ा. सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अक्टूबर को महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार के आधार पर अपने फैसले में महिलाओं को दरगाह में प्रवेश की अनुमति दी थी। इसके बाद हाजी अली दरगाह ट्रस्ट ने संकेत दिया था कि उनकी ओर से दरगाह में आने वाली महिलाओं का विरोध नहीं किया जाएगा. हालांकि एहतियात के तौर पर पुलिस ने तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था कर रखी थी.

दरगाह के ट्रस्टी सुहैल खांडवानी ने कहा कि दरगाह में प्रवेश के लिए महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार बना दिए गए हैं और किसी को भी पीर की मज़ार छूने की इजाज़त नहीं दी जाएगी. नई व्यवस्था के तहत पुरुषों और महिलाओं को दरगाह में जाने का समान अधिकार होगा और सभी श्रद्धालु मज़ार से करीब दो मीटर की दूरी से दुआ कर सकेंगे.

 जून 2012 तक महिलाओं को मुस्लिम संत सैयद पीर हाजी अली शाह बुखारी की मज़ार के गर्भगृह तक प्रवेश की अनुमति थी, लेकिन उसके बाद गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी. वर्ष 2014 में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन और कई अन्य ने हाजी अली दरगाह के इस कदम को अदालत में चुनौती दी थी.

 बॉम्बे हाईकोर्ट ने 26 अगस्त को हाजी अली दरगाह में महिलाओं को मज़ार तक जाने की परमिशन दी थी। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट की ओर से दरगाह में पुरुषों की ही तरह महिलाओं को भी जाने की इजाजत देने का फ़ैसला सुनाया गया था।

 इससे पहले महाराष्ट्र में शनि शिंगणापुर मंदिर में सामाजिक कार्यकर्ता तृप्ति देसाई के आंदोलन के बाद महिलाओं को शनि मंदिर में प्रवेश मिला था.  तृप्ति ने मुंबई स्थित हाजी अली दरगाह में भी महिलाओं को प्रवेश मिलने के लिए आंदोलन किया था. इस आंदोलन का बड़ा विरोध भी हुआ था। इससे पहले महिलाओं को दरगाह में मज़ार तक जाने की इजाज़त नहीं थी.

हाजी अली दरगाह में पीर हाजी अली शाह बुख़ारी की कब्र है. पीर बुखारी एक सूफी संत थे, जो इस्लाम के प्रचार के लिए ईरान से भारत आए थे. ऐसा माना जाता है कि जिन सूफ़ी-संतों ने अपना जीवन धर्म के प्रचार में समर्पित कर दिया और जान क़ुर्बान कर दी, वे अमर हैं. इसलिए पीर हाजी अली शाह बुख़ारी को भी अमर माना जाता है. उनकी मौत के बाद दरगाह पर कई चमत्कारिक घटनाएं देखी जाती हैं. दरगाह मुंबई के साउथ एरिया वरली के समुद्र तट से करीब500 मीटर अंदर पानी में एक छोटे-से टापू पर स्थित है.

(एजेंसियों के इनपुट के साथ)