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निर्भया… दरिंदगी के 4 साल, अब भी नहीं बदले हैं हालात (Nirbhaya case: nothing has changed in 4 years)

Women Safety Tips

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पूरे देश को झकझोर कर रख देनेवाले निर्भया रेप कांड को आज 4 साल पूरे हो गए हैं. 16 दिसंबर 2012 की काली रात को चलती बस में मासूम निर्भया के साथ हुई दरिंदगी ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया, मगर दिल दहला देने वाली इस घटना के इतने साल बाद भी क्या महिलाओं की सुरक्षा की दिशा में ठोस प्रयास हुए हैं? क्या महिलाएं अब ख़ुद को सुरक्षित महसूस करती हैं? क्या बिना डर के रात के अंधेरे में वो अकेली कहीं आ-जा सकती हैं? देर रात बेटी के आने पर क्या माता-पिता बेफिक्र रहते हैं? इन सारे सवालों का जवाब ‘नहीं’ है.

कहां हैं आरोपी?
निर्भया रेेप कांड के 6 गुनहगारों में से एक पहले ही सुसाइड कर चुका है और नाबालिग आरोपी 3 साल की मामूली सज़ा के बाद जेल से छूट चुका है. बाकी 4 गुनहगारों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हो रही है. चारों ने दिल्ली हाईकोर्ट के मौत की सज़ा के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है. 2012 में इस घटना के ख़िलाफ़ पूरा देश एकजुट दिखा था, मगर लगता है अब लोगों की याददाश्त पर समय की धूल जम चुकी है. निर्भया के माता-पिता हर सुनवाई पर कोर्ट के चक्कर लगाते हैं, इस उम्मीद के साथ कि उनकी बेटी को शायद अब इंसाफ मिल पाए.

निर्भाया रेप कांड के बाद सरकार ने ये क़दम उठाए थे
* बलात्कार विरोधी विधेयक पारित करके रेप और गैंगरेप के लिए अधिकतम आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान किया गया.
* यदि कोई आरोपी दोबारा ऐसा अपराध करता है, तो उसे मृत्युदंड का प्रावधान किया गया.
* चार साल पहले केंद्र ने 1000 करोड़ रुपए से ‘निर्भया फंड’ बनाया था.
* अब यह फंड 4 हजार करोड़ का हो चुका है. पर इसका 10% भी इस्तेमाल नहीं हुआ है.

अपराधियों के मन में सज़ा का ख़ौफ़ पैदा कर पाने में क्यों नाकाम है क़ानून?
स़िर्फ राजधानी दिल्ली ही महिलाओं के लिए असुरक्षित है ऐसा नहीं है, देश के तक़रीबन हर शहर, गांव-कस्बों में महिलाओं/बच्चियों के सेक्सुअल एब्यूज़ की ख़बरें आती रहती हैं और इन अपराधों में अभी तक किसी भी गुनहगार को ऐसी सख़्त सज़ा नहीं मिल पाई है, जो अन्य अपराधियों के लिए सबक बने या जिससे उनके मन में क़ानून का डर पैदा हो. नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़ों से साफ़ पता चलता है कि 16 दिसंबर की घटना के बाद भी कुछ बदला नहीं है.

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नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में भी देश की राजधानी दिल्ली में रोज़ 6 बलात्कार और 15 मोलेस्टेशन के केस दर्ज होते रहे.

NCRB के मुताबिक भारत में हर साल हुए इतने रेप:
2011- 24,206
2012- 24,923
2013- 33,707
2014- 37,000
2015- 34,651

आवाज़ उठाना है ज़रूरी
आमतौर पर महिलाएं ऐसे मामलों में जल्दी आवाज़ नहीं उठा पातीं, वो डरती हैं. ख़ासतौर पर अपने ही घर व रिश्तेदारों द्वारा सेक्सुअली एब्यूज़ होने पर अक्सर उन्हें चुप रहने की सलाह दी जाती है, जो ग़लत है. यदि बेटी मां से कहती है कि फलां चाचा/मामा या व्यक्ति ने मुझे गंदी निगाह से देखा, ग़लत तरी़के से छुआ, कुछ कमेंट किया… तो उससे ये न कहें, ‘छोड़ो न बेटी’, बल्कि उसकी बात को गंभीरता से सुनें और उसे विरोध करना सिखाएं. उसमें इतनी हिम्मत और आत्मविश्‍वास जगाएं कि यदि कोई भीड़ में उसके साथ छेड़खानी करने की कोशिश करे, तो वो चिल्लाकर उसका विरोध कर सके. यदि आज आप एक व्यक्ति द्वारा की गई ग़लत हरकत को बर्दाश्त करती हैं, तो कल को चार और लोगों की हिम्मत बढ़ जाएगी, लेकिन आप यदि उसी वक़्त विरोध करती हैं, तो दोबारा कोई ऐसा करने से पहले 10 बार सोचेगा ज़रूर. अपने ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा को रोकने के लिए बहुत ज़रूरी है कि महिलाएं अपनी चुप्पी तोड़ें.

Women Safety Tips
ख़ुद करें अपनी हिफाज़त
अपनी सुरक्षा सुनिश्‍चित करने के लिए ख़ुद महिलाओं को भी पहल करनी होगी. सेल्फ डिफेंस ट्रेनिंग के साथ ही हर समय अलर्ट व जागरूक भी रहना होगा. अपनी सेफ्टी के लिए इन बातों का ख़्याल रखें.

* सड़क पर चलते समय अपनी ही धुन में न रहें, अपने आसपास की चीज़ों व लोगों पर नज़र रखें.

* अपने परिवार वालों और क़रीबी दोस्तों को इस बात की जानकारी अवश्य दें कि आप कहां और किसके साथ हैं.

* महिलाओं के लिए सेल्फ डिफेंस ट्रेनिंग भी ज़रूरी है.

* कहते हैं, महिलाओं का सिक्स्थ सेंस (छठी इंद्रिय) बहुत स्ट्रॉन्ग होती है. अतः आपको किसी व्यक्ति की हरकत या बातचीत के तरी़के पर यदि किसी  तरह का संदेह होता है, तो उस व्यक्ति से दूर रहें. संभव हो, तो वहां से चली जाएं.

* रास्ते में किसी भी अनजान शख़्स से भले ही वो कितना भी सभ्य दिखे, लिफ्ट लेने की ग़लती न करें.

* रात में रास्ते से कोई भी कैब लेने की बजाय टैक्सी स्टैंड से ही कैब लें. ऑटो भी प्री-पेड बूथ से लें, तो अच्छा रहेगा.

* यदि बस से जाना हो, तो ऐसी बस में न चढ़ें, जिसमें स़िर्फ ड्राइवर व कंडक्टर हों. 4-5 लोग हों तो, भी बस में न चढ़ें. कई बार ये लोग ड्राइवर-कंडक्टर  के दोस्त या जानकार ही होते हैं.

* ऑटो/कैब से जा रही हैं, तो आपको रास्ते की जानकारी होनी चाहिए. जिस इलाके में आपको जाना है, उसके बारे में जान लें और रोड मैप अपने पास  रखें या अपने स्मार्ट फोन में गूगल मैप का इस्तेमाल करें.

* ऑटो या टैक्सी का नंबर अपने मोबाइल में टेक्स्ट के रूप में तैयार रखें. थोड़ी भी गड़बड़ी लगे, तो अपने किसी दोस्त या जानकार को नंबर एसएमएस  कर दें.

* आजकल कई सेफ्टी ऐप्स भी मौजूद हैं, जिसे आप अपने स्मार्टफोन पर डाउलोड करके ख़ुद को प्रोटेक्ट कर सकती हैं. अपने स्मार्टफोन पर ये आप ये  ऐप्स डाउनलोड कर सकती हैं – Safetipin, Raksha – women safety alert, Himmat, Women safety, Smart 24×7, Shake2Safety, bSafe.

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कार चलाते समय रहें सावधान

* गाड़ी में सेंट्रल लॉक लगाकर ड्राइव करें. एसी है तो शीशे चढ़ाकर रखें. यदि न हो, तो खिड़की लॉक करके रखें. बस, एक ही शीशा खोलें.

* गाड़ी में तेज़ म्यूज़िक न चलाएं. ड्राइव करते समय फोन पर बात न करें.

* रात के व़क्त बेसमेंट में कार पार्क करने से बचें. वहां मोबाइल काम करना बंद कर सकता है. गाड़ी रोशनी वाली जगह पर पार्क करें.

* यदि सड़क पर अचानक कार ख़राब हो जाए, तो सबसे पहले अपने घरवालों या किसी ऐसे दोस्त/जानकार को फोन करके अपनी स्थिति के बारे में  बताएं, जो पास में रहता हो. तुरंत कार हेल्पलाइन को बुलाएं. ये नंबर हमेशा मोबाइल में होना चाहिए.

* अगर कोई कार या बाइक लगाकर, पेड़ आदि गिराकर या फिर एक्सीडेंट का बहाना बनाकर आपका रास्ता रोक ले, तो घबराकर गाड़ी से उतरें नहीं.  खिड़की-दरवाज़े लॉक करके कार में ही बैठी रहें और पुलिस को कॉल करें. यदि सामने वाला उतरकर आपकी कार की तरफ़ आने लगे, तो जल्दी से  कार रिवर्स करके भगा लें.

हिफ़ाज़त के हथियार
अपने पास हमेशा कुछ ऐसी चीज़ें रखें, जिससे अचानक अपराधी से सामना होने पर आप उस पर हमला करके ख़ुद को बचा सकें.

* हमलावर की आंखों पर डियोड्रेंट स्प्रे करें.

* अपने पास पेपर स्प्रे (मिर्च का स्प्रे) रखें. इसे हमलावर की आंखों पर स्प्रे करें.

* पर्स में नेल फाइलर, नेलकटर, पेपर कटर आदि रखें.

* पर्स भी आपका हथियार बन सकता है. पर्स को घुमाकर कसकर हमलावर के मुंह पर मारें.

* यदि आपने हाई हील सैंडल पहन रखी हैं, तो उनसे हमलावर के चेहरे पर ज़ोर से मारें.

* बेल्ट से भी ज़ोरदार वार किया जा सकता है.

– कंचन सिंह

Cricket: Women’s T20 एशिया कप2016- पाकिस्तान को रौंदकर भारत ने दर्ज की जीत! (Women’s aisa cup final- India defeated Pakistan)

Cricket: Women’s T20 एशिया कप 2016 में भारत ने कमाल कर दिया. फ़ाइनल में पाकिस्तान को हराकर बड़ी जीत अपने नाम की.

ग़ौरतलब है कि पूरी सिरीज़ में भारत ने हार का मुँह नहीं देखा और फ़ाइनल में भी अपने उत्कृष्ट खेल से सबका दिल जीत लिया!

भारत ने 17 रनों से आसान जीत दर्ज की. भारत की ओर से कैप्टन मिताली राज ने 65 गेंदों में नाबाद 73 रन बनाए.

इस जीत के लिए पूरी टीम को बधाई!

– गीता शर्मा

आख़िरकार हाजी अली दरगाह में महिलाओं को प्रवेश मिला (Women Re-Enter Mumbai’s Haji Ali Dargah After 5 Years)

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लंबी कानूनी लड़ाई, विरोध प्रदर्शनों लंबे साल के इंतज़ार के बाद आख़िरकार मंगलवार को 80 महिलाओं के एक समूह ने मुंबई के बहुचर्चित हाजी अली दरगाह की मुख्य मज़ार में प्रवेश किया और दरगाह तक पहुंच कर महिलाओं ने वहां चादर चढ़ाने की रस्म भी मुकम्मिल की.

 भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सहसंस्थापक नूरजहां एस नियाज़ ने कहा, “आज हमने बड़ी लड़ाई जीत ली. अब महिलाएं हाजी अली दरगाह में पुरुषों की तरह चादर चढ़ा सकेंगी. हमने पुलिस या दरगाह ट्रस्ट को सूचित नहीं किया है. हम लोगों ने मत्था टेका और बाहर आ गए.”

 सुश्री नियाज़ ने कहा कि महिलाओं ने मंगलवार को दरगाह पर फूल और चादरें चढ़ाईं और शांति की दुआ की. उन्होंने कहा, “यह समानता, लैंगिक भेदभाव ख़त्म करने और हमारे संवैधानिक अधिकारों को समाप्त करने की लड़ाई थी. हम ख़ुश हैं कि अब महिलाओं और पुरुषों को पवित्र गर्भगृह में प्रवेश का समान अधिकार मिला.”

 पूरे देश की क़रीब 80 महिलाओं के एक समूह ने दोपहर बाद क़रीब तीन बजे मुंबई के वरली तट के निकट एक छोटे से टापू पर स्थित हाजी अली दरगाह में प्रवेश किया. इस बार उन्हें हाजी अली दरगाह ट्रस्ट की ओर से किसी तरह का विरोध का सामना नहीं करना पड़ा. सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अक्टूबर को महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार के आधार पर अपने फैसले में महिलाओं को दरगाह में प्रवेश की अनुमति दी थी। इसके बाद हाजी अली दरगाह ट्रस्ट ने संकेत दिया था कि उनकी ओर से दरगाह में आने वाली महिलाओं का विरोध नहीं किया जाएगा. हालांकि एहतियात के तौर पर पुलिस ने तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था कर रखी थी.

दरगाह के ट्रस्टी सुहैल खांडवानी ने कहा कि दरगाह में प्रवेश के लिए महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार बना दिए गए हैं और किसी को भी पीर की मज़ार छूने की इजाज़त नहीं दी जाएगी. नई व्यवस्था के तहत पुरुषों और महिलाओं को दरगाह में जाने का समान अधिकार होगा और सभी श्रद्धालु मज़ार से करीब दो मीटर की दूरी से दुआ कर सकेंगे.

 जून 2012 तक महिलाओं को मुस्लिम संत सैयद पीर हाजी अली शाह बुखारी की मज़ार के गर्भगृह तक प्रवेश की अनुमति थी, लेकिन उसके बाद गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी. वर्ष 2014 में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन और कई अन्य ने हाजी अली दरगाह के इस कदम को अदालत में चुनौती दी थी.

 बॉम्बे हाईकोर्ट ने 26 अगस्त को हाजी अली दरगाह में महिलाओं को मज़ार तक जाने की परमिशन दी थी। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट की ओर से दरगाह में पुरुषों की ही तरह महिलाओं को भी जाने की इजाजत देने का फ़ैसला सुनाया गया था।

 इससे पहले महाराष्ट्र में शनि शिंगणापुर मंदिर में सामाजिक कार्यकर्ता तृप्ति देसाई के आंदोलन के बाद महिलाओं को शनि मंदिर में प्रवेश मिला था.  तृप्ति ने मुंबई स्थित हाजी अली दरगाह में भी महिलाओं को प्रवेश मिलने के लिए आंदोलन किया था. इस आंदोलन का बड़ा विरोध भी हुआ था। इससे पहले महिलाओं को दरगाह में मज़ार तक जाने की इजाज़त नहीं थी.

हाजी अली दरगाह में पीर हाजी अली शाह बुख़ारी की कब्र है. पीर बुखारी एक सूफी संत थे, जो इस्लाम के प्रचार के लिए ईरान से भारत आए थे. ऐसा माना जाता है कि जिन सूफ़ी-संतों ने अपना जीवन धर्म के प्रचार में समर्पित कर दिया और जान क़ुर्बान कर दी, वे अमर हैं. इसलिए पीर हाजी अली शाह बुख़ारी को भी अमर माना जाता है. उनकी मौत के बाद दरगाह पर कई चमत्कारिक घटनाएं देखी जाती हैं. दरगाह मुंबई के साउथ एरिया वरली के समुद्र तट से करीब500 मीटर अंदर पानी में एक छोटे-से टापू पर स्थित है.

(एजेंसियों के इनपुट के साथ)

एक्सक्लूसिव बुनाई डिज़ाइन्स- 5 परफेक्ट डिज़ाइन्स फॉर वुमन (Exclusive Bunai Designs- 5 Perfect designs for women)

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डिज़ाइनर लुक

सामग्रीः 350 ग्राम डार्क ब्राउन, क्रीम, लाइट ब्राउन और ब्लैक रंग का ऊन, सलाइयां.

विधिः आगे-पीछे का भाग एक जैसे ही बुनें. 80-80 फं. डार्क ब्राउन रंग से डालकर 2 फं. सी. 2 उ. की रिब बुनाई में 6 सलाई का बॉर्डर बुनें. अब सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई में 2-2 सलाई क्रीम, लाइट ब्राउन व डार्क ब्राउन से बुनें. 4 सलाई क्रीम से बुनें. अब लाइट ब्राउन, डार्क ब्राउन, क्रीम और डार्क ब्राउन की 2-2 सलाई बुनें. चित्रानुसार डिज़ाइन बनाते हुए सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई में बुनें. 14 इंच लंबाई हो जाने पर डोरी डालने के लिए जाली बुन लें. 2 इंच 2 फं. सी., 2 उ. की बुनाई करते हुए गला बुनें.
दोनों भागों में नीचे से 8 इंच के बाद फं. उठाकर 5 इंच की मुड्ढे जैसी रिब बुनाई की पट्टी बुन लें.
स्वेटर के दोनों भागों को जोड़कर सिल लें. डोरी डालें.

 

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बहुत ठंड है

सामग्रीः 400 ग्राम ऑरेंज रंग का ऊन, थोड़ा-थोड़ा पिस्ता और लाइट ब्राउन ऊन, सलाइयां, बटन.

विधिः पीछे का भागः 125 फं. ऑरेंज रंग से डालकर 10 सलाई सीधी-उल्टी बुनें. अब इसे मोड़कर डबल कर लें. चित्रानुसार सभी रंगों से बेलवाली डिज़ाइन डालते हुए बुनें. 19 इंच बाद मुड्ढे घटाएं. 8 इंच और बुनने के बाद फं. बंद कर दें.

आगे का भागः दाएं-बाएं भाग के लिए 60-60 फं. डालकर पीछे के भाग की तरह ही बुनें. पर दोनों भागों में साथ में जेब भी बुनें. मुड्ढे घटाएं. साथ ही कॉलर के लिए किनारे पर फं. बढ़ाते जाएं. बढ़े हुए हिस्से को मोड़कर सिल दें.

आस्तीनः 50-50 फं. डालकर उल्टी धारियों का 4 इंच का बॉर्डर बुनें. आगे-पीछे की तरह बेलें डालते हुए 23 इंच लंबी आस्तीन बुनें. हर 5वीं सलाई में दोनों तरफ़ से 1-1 फं. बढ़ाते जाएं.
स्वेटर के सभी भागों को जोड़कर सिल लें. बड़े बटन लगाएं. क्रोशिया से लूप बनाएं.

 

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शॉर्ट कोट

सामग्रीः 350 ग्राम ब्लैक-ग्रे शेडेड ऊन, 50 ग्राम ब्लैक ऊन, सलाइयां, बटन.

विधि: आगे का भाग: दाएं-बाएं भाग के लिए ब्लैक रंग से 46-46 फं. डालकर साबुदाने की बुनाई में 2 इंच का बॉर्डर बुनें. अब दोनों भागों के किनारे के 6-6 बटनपट्टी के फं. हर बार साबुदाने की बुनाई में ब्लैक रंग से ही बुनें. शेष फं. ग्रे शेडेड ऊन से इस तरह बुनें- 6 फं. सी., 2 उ., 6 फं. का केबल, 2 उ., 6 सी., 1 उ., 4 का केबल, 1 उ., 6 फं. सी.. उल्टी सलाई पूरी उल्टी बुनें. 6 फं. वाली केबल 6ठी सलाई में और 4 फं. वाली केबल चौथी सलाई में पलटते हुए बुनें. 15 इंच लंबा बुनने के बाद मुड्ढे घटाएं. वी आकार में गला घटाएं. बटनपट्टी के ब्लैक फं. बढ़ाकर कॉलर का शेप दें.

पीछे का भागः 90 फं. डालकर आगे के भाग की तरह ही बुनें. लंबाई हो जाने पर कंधे जोड़ें. पीछे के फं. का भी कॉलर बुन लें.

आस्तीनः 50-50 फं. डालकर आगे-पीछे के भाग की तरह बुनें. हर 5वीं सलाई में दोनों तरफ़ से 1-1 फं. बढ़ाते जाएं. 20 इंच लंबाई हो जाने पर फं. बंद कर दें.
अलग से जेब बुनकर टांक दें. कोट के सभी भागों को जोड़कर सिल लें. बटन टांक लें.

 

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मल्टी कलर

सामग्रीः 150 ग्राम क्रीम रंग का ऊन, 50 ग्राम मेहंदी ऊन, 50 ग्राम यलो ऊन, थोड़ा-थोड़ा स्काई ब्लू और लाल रंग का ऊन, सलाइयां.

विधिः पीछे का भाग: क्रीम रंग से 90 फं. डालकर 1 फं. सी. 1 उ. की रिब बुनाई में 2 इंच का बॉर्डर बुनें. सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई करते हुए 18 इंच लंबा बुनें. मुड्ढे घटाएं. 24 इंच लंबाई हो जाने पर फं. बंद कर दें.

आगे का भागः क्रीम रंग से 90 फं. डालकर बॉर्डर बुनें. चित्रानुसार सभी रंगों की बर्फी बुनें. मुड्ढे व गोल गला घटाएं. कंधे जोड़कर गले के फं. उठाकर गले की पट्टी बुनें.

आस्तीन: 45-45 फं. डालकर सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई में एक आस्तीन मेहंदी रंग और दूसरी यलो रंग से बुनें. 18 इंच लंबी आस्तीन बुनें. हर 5वीं सलाई में दोनों तरफ 1-1 फं.
बढ़ाते जाएं.
स्वेटर के सभी भागों को जोड़कर सिल लें.

 

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क्लासिक चॉइस

सामग्रीः 300 ग्राम पेस्टल ग्रीन रंग का ऊन, सलाइयां, बटन.

विधि: आगे का भाग: दाएं-बाएं भाग के लिए 60-60 फं. डालकर साबुदाने की बुनाई में बॉर्डर बुनें. दोनों भागों में एक किनारे के बटनपट्टी के 8-8 फं. और 2 इंच स्लिट के फं. साबुदाने की बुनाई में ही बुनें. शेष फं. में बुनाई डालें. 4-4 फं. को एक-दूसरे के ऊपर से 2-2 के जोड़े में बुनेंगे. 3 बार केबल की तरह यही डिज़ाइन डालें. अब यही 4-4 फं. ऊपर की तरफ़ बर्फी जैसे शेप में बढ़ेंगे. 1 जाली, 3 सी., 1 जोड़ा, 1 जाली, 3 सी. 1 जो.- पूरी सलाई ऐसे ही बुनें. पॉकेट बुनने के लिए नीचे सीधा-उल्टा ही बुनें. पॉकेट के ऊपर से फिर बुनाई डालें. 15 इंच बाद मुड्ढे घटाएं. वी आकार में गला घटाएं. 22 इंच लंबाई हो जाने पर फं. बंद कर दें.

पीछे का भागः 110 फं. डालकर आगे के भाग की तरह बॉर्डर बुनें. अब सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई में पूरा पीछे का भाग बुनें. मुड्ढे घटाएं.
सभी भागों को जोड़कर सिल लें. हर किनारे पर क्रोशिया से बॉर्डर बनाएं.
बटन टांकें.

स्त्रियों की 10 बातें, जिन्हें पुरुष कभी समझ नहीं पाते (10 Things Men Don’t Understand About Women)

Things Men Don't Understand About Women

मुझे आज आइस्क्रीम खाने का नहीं, बल्कि कॉफी पीने का मन कर रहा है… हमेशा बोलकर बताना क्यों पड़ता है? क्या आप कभी बिना कहे समझ नहीं सकते… आप नहीं समझोगे…  (Things Men Don’t Understand About Women)इस तरह की बातें कई बार पुरुषों को महिलाओं से सुनने को मिलती हैं. क्या वाकई महिलाओं को समझना बहुत मुश्किल है? आइए, नारी-मन को टटोलने की कोशिश करें. women

Things Men Don't Understand About Women

स्त्री-मन एक तरफ़ जहां बहुत सरल है, वहीं बहुत जटिल भी है. स्त्री और पुरुष केवल शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी काफ़ी भिन्न हैं. कई बार स्त्री जो कहती है, उसका मतलब वह नहीं होता है, जो वो कहना चाहती है. तो आइए जानें, स्त्री-मन के कुछ ऐसे राज़, जिन्हें शायद पुरुष कभी जान ही ना पाएं.

1. पर स्त्री प्रशंसाः चाहे कभी भी स्त्री खुलेतौर पर यह ना कहे, पर अगर स्त्री को कोई बात सबसे ज़्यादा बुरी लगती है, तो वह है दूसरी स्त्री की प्रशंसा. फिर वह स्त्री चाहे आपकी मां-बहन, दोस्त-सहकर्मी या पड़ोसन ही क्यों न हो. इसलिए अब आगे किसी भी स्त्री की प्रशंसा करने से पहले दो बार सोचिएगा ज़रूर या फिर यदि आप किसी की प्रशंसा कर भी रहे हैं, तो साथ ही अपनी पत्नी की प्रशंसा भी कर देें. स्त्री, ख़ासकर एक पत्नी कभी भी नहीं चाहेगी कि उसका पति किसी और की तारीफ़ करे. हो सकता है कि वो इस बात को कभी सबके सामने ज़ाहिर न करे, लेकिन इसे आपको समझना होगा.

2. सुझाव देनाः यह ऐसी चीज़ है, जिसे स्त्रियां पसंद नहीं करतीं या शायद नफ़रत करती हैं. यदि आपको कोई स्त्री अपनी किसी परेशानी या समस्या के बारे में बताती है, तो इसका मतलब है कि वह चाहती है कि आप उसकी बातें किसी अच्छे श्रोता की तरह सुनें और उस पर कोई सुझाव न दें. अगर आपको अपनी पत्नी के चेहरे पर शिकन और परेशानी दिखे, तो समझ जाएं कि वह चाहती है कि आप अपने सारे काम छोड़कर उससे पूछें कि समस्या क्या है और स़िर्फ सुनें. उस पर तब तक सुझाव न दें, जब तक सामने से मांगा न जाए.

3. ख़र्चों का हिसाबः यहां मामला ज़रा हटकर है. एक बात हमेशा याद रखें कि लड़कियों और स्त्रियों को दूसरों के ख़र्चों का हिसाब रखना तो पसंद होता है, लेकिन यदि कोई उनसे ख़र्चों का हिसाब मांगे और ख़ासकर अगर हिसाब मांगनेवाला पति या बॉयफ्रेंड हो, तो उन्हें पसंद नहीं आता. इसलिए आगे से अपनी पत्नी या गर्लफ्रेंड को कभी भी फ़िज़ूलख़र्च करनेवाली ना कहें. अपने ख़र्चों की तुलना कभी भी उसके ख़र्चों से न करें. वे कभी भी आपसे इस बारे में नहीं कहेंगी, पर ऐसा कोई ज़िक्र होते ही उनका मूड ख़राब ज़रूर हो जाएगा.

4. बिन कहे समझ लेंः थोड़ा अजीब है ना, पर यह सौ फ़ीसदी सही है. सभी स्त्रियां चाहती हैं कि उन्हें किसी भी ज़रूरत या किसी भी चीज़ के लिए अपने पार्टनर से कहना न पड़े. वे चाहती हैं कि पुरुष बिना कहे ही उनकी सारी ज़रूरतों को समझ ले और उन्हें पूरा कर दे. फिर वह ज़रूरत प्यार की हो, सहारे की या फिर कोई और. ऐसा इसलिए है कि स्त्रियां ख़ुद भी ऐसी ही होती हैं, वे बिना कहे ही अपने साथी की सारी ज़रूरतों को समझ लेती हैं. स्त्रियों के लिए प्यार मांगने के लिए नहीं होता है. वे बिना मांगे मिलनेवाले प्यार में विश्‍वास रखती हैं.

ह भी पढ़ें: ज़िद्दी पार्टनर को कैसे हैंडल करेंः जानें ईज़ी टिप्स

5. सेंटर ऑफ अट्रैक्शनः स्त्री चाहे कई सारी सहेलियों-रिश्तेदारों से घिरी रहे, पर वह हमेशा अपने पति या साथी का पूरा ध्यान पाना चाहती है. वह चाहती है कि उनके साथी का केंद्रबिंदु वो ही रहे. स्त्री की ख़ुद की दुनिया बहुत छोटी होती है. वो हर छोटी से छोटी बात में अपने साथी का प्रोत्साहन चाहती है.

6. सही संकेत देंः हमेशा याद रखें कि स्त्रियां अवलोकन करने में माहिर होती हैं. वे कही हुई बातों से ज़्यादा अपने अवलोकन पर विश्‍वास करती हैं. स्त्रियों को ख़ामोशी और संकेतों को पढ़ना अच्छा लगता है. उदाहरण के तौर पर, यदि आप बच्चों के साथ ज़्यादा घुलते-मिलते नहीं हैं, तो इसका उनकी नज़र में मतलब है कि आपमें मैरिज मटेरियल नहीं हैं. फिर आप उन्हें लाख समझाने की कोशिश करें कि आप उनसे शादी करके उन्हें ख़ुश रखेंगे. यदि आप किसी स्त्री के साथ हैं, तो उन्हें अपनी तरफ़ से सही संकेत दें.

7. स्पर्श की भाषाः पुरुष चाहे इसमें विश्‍वास रखे या न रखे, पर स्त्री स्पर्श की भाषा में बहुत विश्‍वास रखती है. हल्की-सी छुअन भी उसे रोमांचित कर सकती है या फिर किसी के ग़लत इरादों के बारे में बता सकती है. स्त्री के स्पर्श के मायने काफ़ी अलग हैं. पति का उनका स़िर्फ हाथ पकड़ना या ऑफिस से आने के बाद उन्हें बांहों में भर लेना, उनके लिए किसी ऐसे संवाद से कम नहीं, जिसमें शब्द न हो. इसलिए वे समय-समय पर चाहती हैं कि उनका साथी उन्हें प्यार से छूए या फिर बांहों में भर ले.

8. ग़ुस्से का मतलब हमेशा ग़ुस्सा नहीं होताः पुरुषों को शायद इसे समझने में थोड़ी मुश्किल हो, क्योंकि वे अपनी भावनाओं को सीधे तौर पर ज़ाहिर करते हैं, पर स्त्रियों के मामले में यह थोड़ा उल्टा है. यदि किसी दिन आप घर आएं और आपकी श्रीमतीजी ग़ुस्से में हैं, बात-बात पर आप पर बरस रही हैं, तो इसका मतलब यह मत निकालिए कि वे आपसे नाराज़ हैं. हो सकता है कि दिनभर में कुछ ऐसा हुआ हो, जिससे वह परेशान हो या हो सकता है कि उनके ग़ुस्से के पीछे कोई बहुत बड़ी पीड़ा छुपी हो. कई बार तो स्त्री अपनी किसी कमज़ोरी या बीमारी को छिपाने के लिए भी ग़ुस्सा करती है. अतः जब कभी आपको लगे कि आपकी पत्नी बेवजह ग़ुस्सा कर रही है, तो उससे लड़ने की बजाय यह जानने की कोशिश करें कि कौन-सी बात उसे परेशान कर रही है.

9. भावनात्मक प्यारः सेक्स स्त्रियों के मामले में ज़रा संवेदनशील मसला है. पहले ही यह बताया गया है कि स्त्रियां बहुत भावुक होती हैं. वे रिश्ते के हर स्तर पर पहले भावनाओं से जुड़ती हैं. सेक्स में भी ऐसा ही है. स्त्रियों के लिए सेक्स कोई प्रक्रिया या ज़रूरत नहीं है. उनके लिए सेक्स एक ऐसा माध्यम है, जिससे वे किसी पुरुष के साथ भावनात्मक स्तर पर जुड़ती हैं. वे सेक्स को शारीरिक नहीं, मानसिक स्तर पर अधिक महत्व देती हैैं. इसलिए सेक्स के मामले में उनकी ज़रूरतें भी अलग होती हैं. उन्हें सेक्स से पहले फोरप्ले पसंद है. वे चाहती हैं कि सेक्स के दौरान पार्टनर उन्हें पैंपर करे और सेक्स के बाद उनसे ख़ूब बातें भी करे.

10. जेंटलमैन पहली पसंदः आज स्त्री-पुरुष समानता का ज़माना है, बाहर स्त्री चाहे जितना पुरुषों की तरह सबल और कठोर दिखने की कोशिश कर ले, पर अपना पार्टनर वो ऐसा चाहती है, जिस पर वो निर्भर हो सके. वह ऐसा पुरुष चाहती है, जो न केवल उसकी अच्छाइयों को, बल्कि उसकी कमज़ोरियों को भी जाने. और न स़िर्फ उन्हें जाने, बल्कि उन्हें आत्मसात् कर ले और स्वीकार कर ले. वह चाहती है कि उसका पार्टनर कभी उसकी कमज़ोरियों को किसी बाहरवाले के सामने न आने दे.

– विजया कठाले निबंधे

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15 इन्वेस्टमेंट ऑप्शन्स महिलाओं के लिए (15 Investment options for women)

Investment options

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रिटर्न्स तो हर इन्वेस्टमेंट से मिलते हैं, लेकिन हमारे लिए क्या सही है, ये जानने के लिए ज़रूरी है इन्वेस्टमेंट ऑप्शन्स को जानना. मीनाक्षी ओस्तवाल बता रही हैं महिलाओं के लिए इन्वेस्टमेंट के 15 ऑप्शन्स, ताकि आप चुन सकें अपने लिए निवेश का सही विकल्प. निवेश करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ होती है निवेशक की रिस्क कैपेसिटी यानी निवेशक कितना रिस्क ले सकता है, क्योंकि इसी पर काफ़ी हद तक रिटर्न्स निर्भर होते हैं. तो आइए, इन्वेस्टमेंट के विकल्पों को लो रिस्क और हाई रिस्क के अनुसार वर्गीकृत करके जानते हैं. (Investment Options)

लो रिस्क लो रिटर्न इन्वेस्टमेंट्स
लो रिस्क वाले इन्वेस्टमेंट ज़्यादातर गवर्नमेंट बॉन्ड या पोस्ट ऑफ़िस इन्वेस्टमेंट होते हैं. इनमें रिस्क काफ़ी कम होता है और साथ ही रिटर्न्स भी. यदि आप सेफ़र साइड रहकर रिटर्न से ज़्यादा फ़्यूचर के लिए जमा करने में यक़ीन रखती हैं, तो ये इन्वेस्टमेंट ऑप्शन्स आपके लिए बेहतर साबित होंगे.

पब्लिक प्रोविडेंट फंड (पीपीएफ़)
पीपीएफ़ 15 वर्ष के एन्युटी टर्म (मैच्योरिटी पीरियड) के साथ होता है. इसमें आप प्रति वर्ष न्यूनतम 500 रु. तथा अधिकतम 70,000 रु. तक इन्वेस्ट कर सकती हैं. 70,000 रु. से अधिक निवेश करने पर एक्स्ट्रा राशि बिना किसी ब्याज के लौटा दी जाती है. पीपीएफ़ में निवेश करने पर डबल टैक्स बेनिफ़िट मिलता है. इस पर मिलने वाला 8% वार्षिक ब्याज तो टैक्स फ्री है ही, इसके अलावा इसमें जमा की गई राशि पर आप सेक्शन 80 ङ्गसीफ के तहत डिडक्शन (छूट) भी क्लेम कर सकती हैं. इसके अलावा आप पीपीएफ़ में जमा की गई राशि पर लोन भी ले सकती हैं. सातवें वर्ष की शुरुआत से 50% तक राशि विदड्रॉ भी करवा सकती हैं. मगर ये विदड्रॉवल आप साल में केवल एक बार ही कर सकती हैं.

भविष्य निर्माण बॉन्ड्स
भविष्य निर्माण बॉन्ड्स 10 साल के ज़ीरो कूपन बॉन्ड्स होते हैं. ज़ीरो कूपन बॉन्ड्स यानी इन बॉन्ड्स पर आपको कोई इन्ट्रेस्ट नहीं मिलता. ज़ीरो कूपन बॉन्ड्स कम क़ीमत पर इश्यु करके ज़्यादा क़ीमत पर रिडीम किए जाते हैं. उदाहरण के तौर पर, यदि कोई बॉन्ड 9000 रु. में इश्यु करके 20,000 रु. में रिडीम होता है तो निवेशक को 11000 रु. का फ़ायदा होता है यानी 8.31% का रिटर्न. भविष्य निर्माण बॉन्ड की इश्यु प्राइज़ (जारी करने की क़ीमत) नाबार्ड (नेशनल बैंक फ़ॉर एग्रीकल्चरल एंड रूरल डेवलपमेंट) द्वारा पब्लिश की जाती है. चूंकि ज़ीरो कूपन बॉन्ड्स पर कोई इंट्रेस्ट नहीं मिलता, अतः इस पर टैक्स भी नहीं लगता, किंतु इसके रिडम्शन प्राइज़ पर होने वाले प्रॉफ़िट पर कैपिटल गेन टैक्स पे करना पड़ता है. यह टैक्स अमाउंट इंडेक्शन बेनिफ़िट्स के बाद हुए कैपिटल गेन का 20% होता है.

नेशनल सेविंग सर्टिफ़िकेट (एनएससी)
एनएससी ही एक मात्र ऐसा इन्वेस्टमेंट है, जिसमें आप को निवेश के साथ-साथ ब्याज पर भी 5 साल तक डिडक्शन मिलता है. एनएससी की कालावधि 6 वर्ष की होती है. इसमें 8% प्रति वर्ष की दर से ब्याज मिलता है. एनएससी को गिरवी रख कर आप इस पर लोन भी ले सकती हैं. एनएससी अब डीमेट फ़ॉर्मेट में भी उपलब्ध है.

सीनियर सिटिज़न सेविंग स्कीम 
यदि आप की उम्र 60 वर्ष या उससे अधिक है तो आप सीनियर सिटिज़न सेविंग स्कीम में इन्वेस्ट कर सकती हैं. इसका इन्ट्रेस्ट रेट (ब्याज दर) 9% प्रति वर्ष होता है. आप इसमें कम-से-कम 1000 रु. या 1000 रु. के मल्टीपल्स (गुणांक) में इन्वेस्ट कर सकती हैं. इसमें कोई टैक्स बेनिफ़िट नहीं मिलता. यदि इस पर मिलने वाले ब्याज की रकम सालाना 10,000 रु. या अधिक होती ़़है तो इस पर 10.30% की दर से टीडीएस भी कटता है. वीआरएस सिस्टम के तहत रिटायर हुए लोगों के लिए इस स्कीम में इन्वेस्ट करने के लिए न्यूनतम उम्र 60 वर्ष नहीं, बल्कि 55 वर्ष है. जबकि रिटायर्ड ड़िफेंस सर्विस ऑफ़िसर्स के लिए कोई एज लिमिट नहीं है.

किसान विकास पत्र (केवीपी)
मैच्योरिटी पर किसान विकास पत्र की रकम दोगुनी हो जाती है. पहले केवीपी का मैच्योरिटी पीरियड 7 वर्ष 8 महीने था, पर मार्च 2003 में इसे बढ़ाकर 8 वर्ष 7 महीने कर दिया गया यानी मार्च 2003 से ख़रीदे गए केवीपी को मैच्योरिटी के लिए 8 वर्ष 7 महीने तक होल्ड करना होगा.

आरबीआई टैक्सेबल सेविंग बॉन्ड्स
आरबीआई टैक्सेबल सेविंग बॉन्ड्स नॉन-सीनियर सिट़िज़न्स के बीच बहुत पॉप्युलर है. इसका इन्ट्रेस्ट रेट 8% है. ये बॉन्ड्स 4 साल के लिए होते हैं. इसमें आप कम-से-कम 1000 रु. या 1000 रु. के मल्टीपल्स में अनलिमिटेड इन्वेस्ट कर सकती हैं. ये बॉन्ड्स स्टॉक सर्टिफ़िकेट के रूप में इश्यु किए जाते हैं. यदि आप चाहें तो इनका क्रेडिट बॉन्ड लेज़र अकाउंट यानी बीएलए में भी ले सकती हैं. बीएलए में स्टॉक सर्टिफ़िकेट के बजाय अकाउंट स्टेटमेंट इश्यु किए जाते हैं. यदि इस पर मिलने वाले ब्याज की रकम सालाना 10,000 रु. या इससे अधिक होती है तो इस पर 10.30% की दर से टीडीएस भी कटता है. ये बॉन्ड्स डीमेट अकाउंट में भी रख सकती हैं. इन्हें ट्रान्सफ़र या गिरवी नहीं रखा जा सकता और न ही किसी को ग़िफ़्ट में दिया जा सकता है.

बैंक डिपॉज़िट्स
बैंक डिपॉज़िट इन्वेस्टमेंट का एक अच्छा और सेफ़ ऑप्शन है. आप बैंक एफ़डी या आरडी में इन्वेस्ट कर सकती हैं. अपने इन्वेस्टमेंट की कालावधि अपनी सहूलियत के अनुसार तय कर सकती हैं. एफ़डी और आरडी का इन्ट्रेस्ट रेट सालाना 8 से 10.5 % तक होता हैं. अलग-अलग बैंकों का इन्ट्रेस्ट रेट अलग-अलग होता है.
हालांकि यदि इस पर मिलने वाले ब्याज की रकम सालाना 10,000 रु. या इससे अधिक होती है तो इस पर 10.30% की दर से टीडीएस भी कटता है और साथ ही बैंक डिपॉज़िट्स में टैक्स बेनिफ़िट्स नहीं मिलते, पर पांच वर्ष से अधिक कालावधि की एफ़डी में निवेश करने से आप इन्वेस्टमेंट अमाउंट पर डिडक्शन क्लेम कर सकती हैं.

पोस्ट ऑफ़िस मंथली इनकम स्कीम (एमआईएस)
पोस्ट ऑफ़िस मंथली इनकम स्कीम में आप अपनी सुविधा के अनुसार हर महीने एक फ़िक्स अमाउंट जमा कर सकती हैं. इस पर 8% प्रति वर्ष की दर से ब्याज मिलता है. आप इसमें न्यूनतम 1000 रु. से लेकर अधिकतम 3 लाख तक इन्वेस्ट कर सकती हैं. ज्वॉइंट अकाउंट की दशा में लिमिट 6 लाख तक होती है. एमआईएस अकाउंट ओपन करने के एक साल बाद आप इसे मैच्योरिटी पीरियड से पहले ही विदड्रा करवा सकती हैं.

हाई रिस्क हाई रिटर्न इन्वेस्टमेंट्स
यदि आप अपने निवेश पर ज़्यादा रिटर्न चाहती हैं तो थोड़ा रिस्क भी लेना चाहिए. आइए, नज़र हालते हैं हाई रिस्क हाई रिटर्न वाले इनवेस्टमेंट ऑप्शन्स पर.

शेयर्स
शेयर यानी स्टॉक मार्केट में निवेश करने से जितने अच्छे रिटर्न मिलते हैं यह उतना ही रिस्की भी है. किंतु यदि आप हाई रिस्क लेने में यक़ीन रखती हैं तो स्टॉक मार्केट फटाफट पैसा कमाने का अच्छा ऑप्शन साबित हो सकता है. इसके लिए किसी भी कंपनी के शेयर्स ख़रीदते समय केवल ब्रोकर पर भरोसा न करके अपनी तरफ़ से कंपनी का पास्ट परफ़ॉर्मेंस ज़रूर चेक कर लें. साथ ही शेयर को लॉन्ग टर्म तक होल्ड करने की आदत डालें, क्योंकि लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन यानी एक साल से ज़्यादा समय तक होल्ड करने पर होने वाला प्रॉफ़िट टैक्स फ्री है, जबकि शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन पर 10% टैक्स लगता है.

म्यूचुअल फंड
यदि स्टॉक मार्केट पर नज़र बनाए रखना आपके लिए संभव न हो, तो म्यूचुअल ़फंड्स आपके लिए बेस्ट ऑप्शन है. म्यूचुअल फंड में आपका पैसा मार्केट एक्सपर्ट की निगरानी में स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट किया जाता है. इस निवेश पर होनेवाले प्रॉफ़िट में से म्यूचुअल फंड प्रदाता कंपनी अपने चार्जेज़ काट कर बाक़ी रकम आपके अकाउंट में जमा कर देती है. म्यूचुअल फंड्स की कई अलग-अलग स्कीम्स मार्केट में उपलब्ध हैं, जैसे- डेब्ट फंड्स, इक्विटी फंड्स, बैलेंड्स फंड्स आदि. म्यूचुअल फंड में होने वाला लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स फ्री होता है, जबकि शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन पर 10% टैक्स पे करना होता है.

इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम
इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम म्यूचुअल फंड्स का ही एक प्रकार है. यह 3 वर्ष के लॉक इन पीरियड के साथ होता है. इसमें अच्छे रिटर्न मिलते हैं, क्योंकि इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम में 80% तक इक्विटी मार्केट में इन्वेस्ट किया जाता है. यह इन्वेस्टमेंट ऑप्शन टैक्स प्लानिंग के लिए बेस्ट माना जाता है, क्योंकि इस इन्वेस्टमेंट में सेक्शन 80 C के तहत डिडक्शन मिलता है. 3 वर्ष के लॉक इन पीरियड के कारण लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन होता है, जो कि टैक्स फ्री होता है.

गोल्ड
यदि गोल्ड में इन्वेस्ट करना चाहती हैं, तो गहनों के बजाय गोल्ड कॉइन्स, बार्स और गोल्ड बुलियन्स ख़रीदें. गोल्ड कॉइन्स या बार ख़रीदते समय यह ज़रूर ध्यान रखिए कि इन पर हॉलमार्क लगा हो. गोल्ड रेप्युटेड ज्वेलर्स या बैंक से ही ख़रीदें. गोल्ड में इन्वेस्ट करने के लिए गोल्ड ख़रीदने के बजाय आप गोल्ड ट्रेडेड फंड या गोल्ड म्यूचुअल फंड्स में भी निवेश कर सकती हैं. गोल्ड में हुए कैपिटल गेन पर शॉर्ट टर्म यानी 3 साल से कम पर 10 प्रतिशत और लॉन्ग टर्म यानी 3 साल से ज़्यादा पर 20 प्रतिशत टैक्स लगता है.

प्रॉपर्टी
ज़मीन की क़ीमतों में हो रही लगातार बढ़ोतरी के मद्देनज़र प्रॉपर्टी में इन्वेस्टमेंट आजकल काफ़ी पॉप्युलर हो रहा है. इसमें आपको टैक्स बेनिफ़िट्स भी मिलता है. उदाहरण के लिए यदि आप कोई घर ख़रीदती हैं तो उस घर पर अदा की गई स्टैम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन चार्जेज़ को डिडक्शन के रूप में क्लेम कर सकती हैं. प्रॉपर्टी इन्वेस्टमेंट पर होने वाले कैपिटल गेन पर लॉन्ग टर्म में 20% और शॉर्ट टर्म में 10% टैक्स पे करना पड़ता है. प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट करते समय प्रॉपर्टी के लोकेशन का अच्छे से मुआयना कर लें.

यूलिप
यूलिप में हाई रिटर्न्स के साथ-साथ लाइफ़ कवर भी मिलता है. यूलिप का मैच्योरिटी टर्म 10 से 15 वर्ष का होता है. इसमें आप प्रति वर्ष न्यूनतम 15000 रु. और अधिकतम 5 लाख रु. तक इन्वेस्ट कर सकती हैं. साथ ही इन्वेस्टमेंट अमाउंट पर डिडक्शन भी क्लेम कर सकती हैं. यूलिप में आप अपनी सहूलियत के मुताबिक़ इंस्टॉलमेंट में भी इन्वेस्ट कर सकती हैं, पर पैसे विदड्रॉ करवाने के लिए कम-से-कम 7 साल का इंतज़ार करना होता है. यूलिप में निवेश की गई राशि का 60% हिस्सा गवर्नमेंट डिपॉज़िट्स और 40% हिस्सा स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट होता है. यानी शेयर्स और इक्विटी ओरियंटेड म्यूचुअल ़फंड्स के मुक़ाबले ये कम रिस्की होते हैं.

डेरिवेटिव्स
निवेश करने के लिए डेरिवेटिव्स यानी कोमोडिटी मार्केट एक अच्छा विकल्प है. शेयर्स की तरह इन्हें भी आप ओपन मार्केट में ख़रीद-बेच सकती हैं. इनका डिलिवरी पीरियड एक महीना होता है. यानी ख़रीदने के एक महीने के अंदर आपको इन्हें क़ीमतें बढ़ने पर बेचना होता है. चूंकि ये कोमोडिटीज़ कई किलो और टन में होती हैं, अतः इनकी फ़िज़िकल डिलिवरी लेना संभव नहीं होता है. अतः इनके ट्रांजेक्शन को डीमेट अकाउंट में रखा जाता है.

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30 के बाद करें रिटायरमेंट प्लानिंग ( Retirement Planning After 30 )

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ज़िंदगी में क़ामयाब करियर पाने के लिए प्लानिंग करना जितना ज़रूरी है, उतना ही अहम् है रिटायरमेंट के बाद की ज़िंदगी का नक्शा तैयार करना यानी अपना रिटायरमेंट प्लान करना. किन अहम् बातों का ध्यान रखकर रिटायरमेंट के बाद की ज़िंदगी को भी आप ख़ुशगवार बना सकते हैं.

कुछ अहम् सवाल
रिटायरमेंट प्लानिंग की बात आते ही सबसे पहले जो बात ज़ेहन में आती है, वो यही है कि रिटायरमेंट के बाद नियमित आमदनी में कोई बाधा तो नहीं आएगी? इसके साथ ही कुछ और सवाल भी जुड़ जाते हैं, जैसे-

  • क्या मेरे पास इतनी संपत्ति या साधन होंगे, जो रिटायरमेंट के बाद भी पर्याप्त आय दे सकें?
  • उस व़क़्त तक ख़र्चों (लिविंग कॉस्ट) का स्तर कितना बढ़ जाएगा?
  • उस समय तक हेल्थ केयर कितना महंगा हो जाएगा?
  • सोशल सिक्यॉरिटी बेनिफिट्स का लेवल क्या होगा?
  • लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट में कितना नफ़ा-नुक़सान होगा? नुक़सान होने पर अगर शुरू में ही ज़्यादा पैसा निकालना पड़ा तो…?

इन सारी चिंताओं का निचोड़ यही है कि रिटायरमेंट तक देश की मुद्रास्फीति में कितनी बढ़ोत्तरी होगी और आपकी बचत, जमाराशि व इन्वेस्टमेंट पर इसका कितना असर पड़ेगा? मुद्रास्फीति का असर ही आपके ख़र्चों यानी लिविंग कॉस्ट व हेल्थ केयर लागत को भी बढ़ा देता है. ज़ाहिर है, रिटायरमेंट प्लानिंग करते व़क़्त आपको मुद्रास्फीति के संभावित स्तर को भी ध्यान में रखना होगा. भविष्य की मुद्रास्फीति के स्तर का अंदाज़ा लगाने के लिए आपको दस या बीस साल पहले के मुद्रास्फीति स्तर से इसके मौजूदा स्तर की तुलना करनी होगी. देखना होगा कि इन सालों में मुद्रास्फीति किस दर से बढ़ी है. इससे दस या बीस साल बाद के संभावित मुद्रास्फीति स्तर का कुछ अनुमान आप लगा सकेंगे.

रिटायरमेंट प्लानिंग के 5 स्टेप्स
मुद्रास्फीति का आकलन कर लेनेे के बाद आप अपने पैसे को इस तरह मैनेज कर पाएंगे कि वह अंत तक आपका साथ दे सके. इसके लिए इन 5 स्टेप्स पर
अमल करें-

1. इन बातों पर ग़ौर करें

  • इन्फ्लेशन (मुद्रास्फीति) आपकी संपत्ति(जमाराशि, निवेश और प्रॉपर्टी) पर कितना असर डालेगी?
  • रिटायरमेंट इनकम टिकाऊ होने के साथ-साथ बढ़ती भी रहेगी या नहीं.
  • लाभदायक सरकारी योजनाओं पर नज़र रखें. सोशल सिक्योरिटी व मेडीकेयर जैसी योजनाएं आपके बजट को संतुलित रखने में मददगार हो सकती हैं.
  • रिटायरमेंट इनकम प्लानिंग में लंबी उम्र, हेल्थ केयर के बढ़ते ख़र्चों और अन्य अतिरिक्त ख़र्चों का ध्यान ज़रूर रखें, ताकि आपको अपना कोई निवेश समय से पहले न निकालना पड़े.

2. बचत व निवेश विकल्पों को परखें
हर व्यक्ति अधिक से अधिक उम्र तक जीना चाहता है. अतः अपनी इनकम प्लान की लॉन्गेविटी (अवधि या उम्र) भी अधिक से अधिक रखें, ताकि आपका पैसा अधिक समय तक आपके साथ रहे. इसके साथ ही, इन्फ्लेशन यानी मुद्रास्फीति को नज़र में रखते हुए अपनी लाइफ़ स्टाइल का एक ख़ाका बनाएं. मुद्रास्फीति न स़िर्फ आपके ख़र्चों की लागत बढ़ा देती है, बल्कि आपकी बचत व निवेश की क़ीमत भी घटा देती है. बचत व निवेश के विकल्पों को अच्छी तरह परखें, जिनमें आप अपना पैसा डालेंगे. इस बात का ध्यान रखें कि यहां भी मुद्रास्फीति आपके मैच्योरिटी अमाउंट पर अपना असर डालेगी. साथ ही ऐसे विकल्पों में बचत या निवेश करें, जिनमें आपको आयकर नहीं देना पड़े या कम देना पड़े. कई निवेश विकल्पों में आयकर से छूट दी जाती है.

3. सेहत से जुड़े जोखिम
उम्र बढ़ने पर सेहत से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ेंगी, अत: उस व़क़्त के लिए हेल्थ केयर का पूरा इंतज़ाम अभी से कर लें. ऐसा हेल्थ केयर व इन्श्योरेंस प्लान लें, जिसमें रिटायरमेंट के बाद के सालों में अधिकतम बेनिफिट मिले. आजीवन हेल्थ केयर व इन्श्योरेंस पॉलिसीज़ इसी उम्र में ख़रीद लें. रिटायरमेंट के बाद जिनमें कोई प्रीमियम न देनी पड़े और जो सेहत से जुड़े अधिकांश जोखिम को कवर करें, ऐसे प्लान एवं पॉलिसीज़ चुनें.

4. एक्सेस विथड्राल से बचें
रिटायरमेंट प्लानिंग में यह भी ध्यान में रखना होगा कि उस व़क़्त आपको कोई अतिरिक्त निकासी (एक्सेस विथड्रॉल) न करना पड़े. जिन पॉलिसीज़ व प्लान्स को आपने रिटायरमेंट को ध्यान में रखकर ख़रीदा है, उन्हें बीच में छोड़ना या निकालना न पड़े, इसका पक्का बंदोबस्त करें. साथ ही यह भी सुनिश्‍चित करें कि रिटायरमेंट के बाद भी आप योजना के अनुरूप केवल नियमित पैसे की ही निकासी करेंगे. उस व़क़्त कोई अतिरिक्त निकासी न करनी पड़े, इसके लिए एक आपातकालीन बैंक सेविंग अकाउंट ज़रूर रखें.

5. तमाम जोख़िमों का आकलन
हर व्यक्ति की लाइफ़ स्टाइल व ज़रूरतें अलग-अलग होती हैं, अत: आप भी अपनी जीवनशैली के अनुरूप ही उसी के हिसाब से संभावित जोखिम यानी ख़तरों का आकलन करें. अपनी लाइफ़ स्टाइल व इनकम के हिसाब से रिटायरमेंट प्लान बनाएं और उसमें तमाम संभावित जोखिमों से निपटने के उपाय भी शामिल करें. साथ ही अपने रिटयारमेंट प्लान में अपने जीवनसाथी और उसकी ज़रूरतों व जोख़िम को भी शामिल करें तथा उनके लिए भी बीमा व मेडिकल प्लान या पॉलिसीज़ ज़रूर ख़रीदें. किसी आकस्मिक ख़तरे, दुर्घटना या आर्थिक ज़रूरत से आप कैसे निपटेंगे, इसके लिए भी अलग से कुछ बचत या निवेश कर लें, जिन्हें आपातकालीन ज़रूरतों के व़क़्त निकाला जा सके. साथ ही जैसा कि पहले भी बताया गया है, मुद्रास्फीति, आयकर कटौती, बढ़ते ख़र्चों आदि जोखिमों का भी आकलन करना ज़रूरी है.
और हां, उम्र के इस पायदान पर रिटायरमेंट प्लानिंग के साथ-साथ आपको तमाम मौजूदा जिम्मेदारियां भी तो निभानी ही हैं, जैसे-अपना घर, बच्चों की पढ़ाई, उनकी शादी आदि. अत: इनकी प्लानिंग करना भी न भूलें, ताकि रिटायरमेंट के बाद आपकी परेशानियों में कोई इजाफ़ा न हो.

थर्टीज़ में क्या-क्या करें?
उम्र के इस पड़ाव पर रिटायरमेंट प्लानिंग के साथ-साथ इन बातों पर भी पूरा ध्यान देना ज़रूरी है-

  • बच्चों की परवरिश, स्वास्थ्य पर ख़र्च.
  • जीवनसाथी की मौजूदा ज़रूरत तथा भविष्य की आर्थिक सुरक्षा का बंदोबस्त.
  • बच्चों की उच्च शिक्षा, शादी तथा करियर में सैटल करने के लिए बचत या निवेश.
  • अगर अपना घर न हो तो घर ख़रीदना.
  • रिटायरमेंट प्लानिंग.
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30 बातें जहां महिलाएं पुरुषों से बेहतर हैं (30 things women do better than men)

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पुरुष भले ही ये साबित करें कि वे महिलाओं से श्रेष्ठ हैं, लेकिन कई बातों में महिलाएं पुरुषों से कहीं बेहतर हैं और ये हम नहीं कहते, हमारी रिसर्च रिपोर्ट्स कहती हैं.

1. महिलाएं रिश्तों के प्रति वफ़ादार और ईमानदार होती हैं, जबकि अक्सर पुरुष इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते. एक बार महिलाएं किसी से रिश्ते में बंध गईं, तो अपना 100% देने की कोशिश करती हैं. वे रिश्तों को लेकर बेहद संवेदनशील भी होती हैं.

2. पूरी दुनिया में हुए शोध बताते हैं कि महिलाओं का आईक्यू लेवल पुरुषों की तुलना में कहीं ज़्यादा अच्छा होता है.

3. हाइजीन और साफ़-सफ़ाई के मामले में भी महिलाएं पुरुषों से आगे हैं. चाहे घर में वॉर्डरोब, बेड या डाइनिंग टेबल की बात हो या ऑफिस डेस्क की-  सफ़ाई के मामले में पुरुष महिलाओं से पीछे ही रहते हैं.

4. महिलाएं मल्टीटास्किंग होती हैं. वे एक साथ कई काम कर सकती हैं, खाना बनाना, सफ़ाई, बच्चे का होमवर्क, मोबाइल पर बातें- कई काम एक  साथ वे उतने ही परफेक्शन के साथ कर सकती हैं, जबकि पुरुष ऐसा नहीं कर पाते. दरअसल, महिलाओं का मस्तिष्क ज़्यादा सक्रिय होता है, जिसकी  वजह से वे एक साथ कई कार्य कर पाती हैं.

5. यूके की एक स्टडी के मुताबिक महिलाएं अच्छी ड्राइवर भले ही न हों, पर सुरक्षित ड्राइविंग के मामले में वे पुरुषों से काफ़ी आगे हैं. रिपोर्ट के  अनुसार महिलाओं द्वारा होनेवाले एक्सीडेंट की दर पुरुषों के मुक़ाबले बहुत कम है. इसके अलावा ट्रैफिक रूल्स फॉलो करने में भी वे पुरुषों से बेहतर हैं.

6. दर्द झेलने और बोरिंग काम करने की क्षमता भी स्त्रियों में पुरुषों से अधिक होती है. पुरुष घंटों बेमतलब के टीवी कार्यक्रम देख सकते हैं, यूं ही खाली  बैठे रह सकते हैं, जबकि स्त्रियां ऐसा नहीं कर सकतीं.

7. चेहरे की भाव-भंगिमा पढ़ने में महिलाएं मास्टर होती हैं. एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी में हुए एक रिसर्च में ये बात सामने आई है. रिसर्च से यह भी पता  चला है कि कोई सामाजिक निर्णय लेना हो, तो पुरुष मस्तिष्क को इसके लिए ज़्यादा काम करना पड़ता है, जबकि महिलाएं ऐसे निर्णय चुटकियों में  ले लेती हैं.

8. महिलाएं लोगों को बेहतर समझ पाती हैं. किसी के व्यक्तित्व, उसके बॉडी लैंग्वेज को वे पुरुषों के मुक़ाबले बेहतर और जल्दी समझ पाती हैं.

9. रिश्ते जोड़नेे में भी महिलाएं माहिर होती हैं. वे लोगों से बहुत जल्दी कनेक्ट हो जाती हैं और रिश्ते भी जल्दी बना लेती हैं. अपने मन की बात भी वे  लोगों से शेयर कर लेती हैं, जबकि पुरुष ऐसा नहीं कर पाते.

10. जॉर्जिया और कोलंबिया यूनिवर्सिटी की एक स्टडी रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएं अच्छी लर्नर होती हैं यानी वे बहुत जल्दी सीख-समझ जाती हैं.  रिसर्च के अनुसार वे अलर्ट, फ्लेक्सिबल और ऑर्गेनाइज़्ड होती हैं और किसी भी टास्क को पुरुषों के मुक़ाबले जल्दी समझ जाती हैं.

11. महिलाएं फाइनेंस भी पुरुषों से बेहतर ढंग से हैंडल करती हैं. चाहे सेविंग की बात हो, शॉपिंग की या इन्वेस्टमेंट की, महिलाएं पैसे को बहुत अच्छी  तरह से मैनेज करती हैं, जबकि पुरुष ऐसा नहीं कर पाते.

12. बच्चों को संभालना, फिर चाहे नवजात शिशु हो या बड़े बच्चे- पुरुषों के वश की बात नहीं. न वे रोते बच्चे को चुप करा पाते हैं, न उसका डायपर  बदल सकते हैं, न उनकी ज़िद को हैंडल कर सकते हैं और न ही उन्हें बहला-फुसला सकते हैं, जबकि महिलाएं ये काम पूरी ज़िम्मेदारी व ईमानदारी के
साथ करती हैं.

13. महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज़्यादा स्ट्रॉन्ग होती हैं. अगर उनके हाथ-पैर में कहीं चोट लग जाए, तो वेे जानती हैं कि उसे कैसे ठीक किया जाए,  जबकि पुरुष छोटी-सी चोट से भी घबरा जाते हैं. हल्का-सा बुखार भी आ जाए, तो उन्हें कमज़ोरी महसूस होने लगती है और आराम करने का बहाना  मिल जाता है, जबकि महिलाएं बड़ी-बड़ी तकलीफ़ होने पर भी अपना काम और ज़िम्मेदारियां उसी तेज़ी और ख़ूबी से निभाती हैं.

14. महिलाएं पुरुषों से बेहतर इसलिए भी हैं, क्योंकि कई क़ानून ख़ासकर महिलाओं के हितों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं, उन्हें कई सुविधाएं
प्राप्त  हैं.

15. महिलाओं की रोगप्रतिरोधक क्षमता भी पुरुषों से मज़बूत होती है. कनाडा में हुए एक शोध के अनुसार फीमेल सेक्स हार्मोन एस्ट्रोजन महिलाओं  की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और उन्हें इंफेक्शन से लड़ने की बेहतर क्षमता प्रदान करता है.

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16. ग्रैजुएशन करने में भी महिलाएं पुरुषों से आगे हैं. डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन के आंकड़ों के अनुसार पुरुष स्नातक की डिग्री लेने में महिलाओं से पीछे हैं. इतना ही नहीं, स्नातक की डिग्री हासिल करने में पुरुषों को 5 वर्ष से अधिक समय लगता है, जबकि महिलाएं 5 वर्ष में ही  स्नातक की डिग्री हासिल कर लेती हैं.

17. महिलाएं पुरुषों की तुलना में हेल्दी डायट लेती हैं. पुरुष जहां दिनभर ऊल-जुलूल खाते हैं, ड्रिंक व स्मोकिंग करते हैं, वहीं महिलाएं हेल्दी फूड पसंद करती हैं. महिलाओं के बैग में आपको सलाद, फ्रूट, ड्रायफ्रूट्स, बिस्किट जैसे हेल्दी ऑप्शन मिल  जाएंगे, जबकि पुरुषों के बैग से ये सब मिसिंग होते हैं.

18. महिलाएं पुरुषों की तुलना में 5 से 10 वर्ष अधिक जीती हैं यानी आयु के मामले में भी बाज़ी महिलाओं ने ही मारी है. इतना ही नहीं, महिलाएं पुरुषों  के मुक़ाबले बेहतर जीवन जीती हैं यानी जीवन को ज़्यादा एंजॉय करती हैं.

19. पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएं स्टाफ को ज़्यादा बेहतर ढंग से हैंडल कर पाती हैं.

20. महिलाएं अनुशासित और समय की पाबंद होती हैं. लेटलतीफ़ी उन्हें पसंद नहीं.

21. महिला लीडर्स सहायता के लिए हमेशा उपलब्ध होती हैं और किसी प्रॉब्लम की स्थिति में जल्दी रिस्पॉन्ड भी करती हैं.

22. पर्सनल ग्रूमिंग के मामले में भी वे पुरुषों से बेहतर हैं. हम उनके अपीयरेंस, उनके मेकअप, ड्रेस की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि पर्सनल हाइजीन की  बात कर रहे हैं. आप महिलाओं और पुरुषों के नाखून देख लें, आप ख़ुद ही समझ जाएंगे कि हम क्या कहना चाहते हैं.

23. महिलाएं समस्याओं को जल्दी भांप लेती हैं और उसका समाधान भी जल्दी निकाल लेती हैं.

24. महिलाओं की कम्युनिकेशन स्किल भी बेहतर होती है. भले ही वे ज़्यादा बोलती हों, लेकिन अपने विचारों को खुलकर व्यक्त करती हैं. विवाद-बहस आदि की स्थिति में भी महिलाएं बोलना बंद नहीं करतीं, न ही न सुनने का बहाना बनाती हैं. शोधों से साबित हो  चुका है कि महिलाओं का मस्तिष्क कई सारे शब्द, भावनाओं और एहसासात को प्रोसेस कर सकता है, जबकि पुरुष मस्तिष्क ऐसा नहीं कर सकता.

25. महिलाएं फ्युचर प्लानिंग व रिलेशनशिप को बेहतर ढंग से मैनेज करती हैं.

26. ख़तरों को जल्दी भांप लेती हैं और सुरक्षा को लेकर भी ज़्यादा सतर्क रहती हैं. कहीं जाना हो तो घर की सुरक्षा, सेफ्टी सिस्टम पर अधिक ध्यान  देती हैं.

27. महिलाएं सामनेवाले के चरित्र को तुरंत ही पहचान जाती हैं. उनका सिक्स्थ सेंस इतना स्ट्रॉन्ग होता है कि सामनेवाले के मन में क्या चल रहा है, वे  देखते ही समझ जाती हैं.

28. महिलाएं जीवन में संतुलन को बेहतर ढंग से मेंटेन करती हैं. महिलाओं के शरीर में सेरोटोनिन का लेवल पुरुषों की तुलना में हाई होता है.  सेरोटोनिन इमोशन्स को कंट्रोल में रखता है, जिससे महिलाओं को लाइफ को बैलेंस करने में आसानी होती है.

29. महिलाएं तनाव को पुरुषों के मुक़ाबले बेहतर ढंग से हैंडल करती हैं. हां, ये सच है कि तनाव व मुश्किल परिस्थिति में महिलाएं जल्दी रो देती हैं, लेकिन एक बार दिल का गुबार आंसू बनकर निकल गया, तो उनकी सोच एकदम स्पष्ट हो जाती है और वे एकदम सटीक निर्णय लेने में सक्षम हो  जाती हैं. अमेरिका में पुरुष और महिलाओं पर हुए एक शोध से ये बात सामने आई कि तनाव दोनों को उतना ही प्रभावित करता है, लेकिन तनाव की  स्थिति में भी महिलाओं का परफॉर्मेंस बेहतर था, जबकि पुरुष इसमें चूक गए.

30. महिलाओं की याद्दाश्त भी पुरुषों से तेज़ होती है. महिलाएं कोई फिल्म देखती हैं, तो कॉस्ट्यूम, मेकअप, फिल्म के सेट से लेकर हर चीज़ उन्हें याद   रहती है. ऐसा इसलिए नहीं है कि वे अपीयरेंस पर ज़्यादा ध्यान देती हैं, बल्कि उनका इनबिल्ट सिस्टम ऐसा होता है कि देखी हुई चीज़ें उन्हें याद
रहती  हैं.

– प्रतिभा तिवारी

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जब महिलाएं लें रिटायरमेंट

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गाड़ी के दो चक्के जो निरंतर घूमते रहते हैं, जिससे गाड़ी की रफ़्तार बनी रहती है, पर एक समय आता है, जब गाड़ी थक जाती है और चक्के घूमना बंद कर देते हैं. अचानक सब कुछ थम-सा जाता है. ना कहीं जाने की जल्दी और ना ही कहीं से घर लौटने की ख़ुशी. ऐसा ही कुछ होता है, जब आप रिटायर्ड या सेवानिवृत होती हैं. जी हां, यहां हम बात कर रहे हैं, उन स्त्रियों की, जो एक लंबी अवधि की नौकरी के बाद रिटायर हो जाती हैं.

क्या है रिटायरमेंट ब्लूज़?
जब आप काम करती हैं, तो अक्सर ही यह कहती हैं कि मैं तो इस काम से तंग आ गई हूं, पता नहीं कब इससे छुट्टी मिलेगी, पर क्या अब आपको ऐसा लगता है कि आपको यही छुट्टी चाहिए थी? कहीं रिटायरमेंट ने आपको अकेला तो नहीं कर दिया है? ऐसे कई सवाल आपके ज़ेहन में भी आते होंगे. तो आइए जानें, आपके रिटायरमेंट ब्लूज़ को. जब आप रिटायर होती हैं, तो अचानक आपको लगता है कि-

  •  आपकी पहचान खो गई है या आपके अस्तित्व को कोई ख़तरा है.
  •  अचानक आपको अपने ओहदे से जुड़े मान-सम्मान में कमी नज़र आने लगती है.
  •  जिस स्वतंत्रता को आप इतने सालों से पाना चाहती थीं, वह अचानक सज़ा लगने लगती है.
  • अचानक आपको लगता है कि आपसे कोई बात नहीं करना चाहता और आपके साथ कोई खाना नहीं खाना चाहता.
  • आप अपने आपको अकेली और अनुपयोगी पाती हैं.

अगर आप भी ऐसा ही महसूस कर रही हैं, तो चिंता की कोई बात नहीं है. हर रिटायर होती स्त्री ऐसी ही कशमकश में होती है. इसे ट्रांज़िशन पीरियड कहा जाता है, मतलब आप इस समय अपने जीवन के बहुत बड़े बदलाव के दौर से गुज़र रही होती हैं. ऐसा नहीं है कि स़िर्फ स्त्रियां ही इससे गुज़रती हैं, पुरुष भी इस कठिन समय का सामना करते हैं, पर यह समय स्त्रियों के लिए अधिक संवेदनशील इसलिए हो जाता है, क्योंकि उम्र का यह वही पड़ाव है, जिसमें वे मेनोपॉज़ से भी जूझ रही होती हैं. मानसिक और शारीरिक दोनों ही आक्षेपों में यह समय काफ़ी नाज़ुक और कठिन होता है.

मनोवैज्ञानिक डॉ. केहाली बताती हैं कि चाहे कोई स्त्री ऐच्छिक सेवानिवृत्ति ले या फिर अपनी सेवाएं पूरी करने के बाद रिटायर हो, ङ्गएंप्टीनेस सिंड्रोमम दोनों ही जगहों पर देखने को मिलता है. इसका मतलब है, अचानक अकेलेपन का एहसास होना. ऐसा लगता है, जैसे अब किसी को आपकी ज़रूरत नहीं है. मेनोपॉज़ के समय वैसे ही हार्मोंस काफ़ी डिस्टर्ब हो जाते हैं. इस अवस्था को डिप्रेशन तो नहीं कहा जा सकता, पर हां, यह डिप्रेशन के काफ़ी क़रीब है.

श्रीमती जोशी बताती हैं कि मेरे रिटायरमेंट को 5 साल पूरे होनेवाले हैं, फ़िलहाल तो सब ठीक है, पर जब मैं नई-नई रिटायर हुई थी, तब घर बहुत खाली-खाली लगता था. मैं घर के रूटीन को पूरी तरह से भूल गई थी. उम्र के 55वें वसंत में मैंने टीचिंग प्रोफेशन से रिटायरमेंट लिया था. सुबह तड़के उठ जाती थी, पर फिर याद आता था कि उठकर क्या करूं, अब कहीं जाना तो नहीं है. अपने उस रूटीन को तोड़कर नए रूटीन में ढलने के लिए मुझे पूरा एक साल लग गया. पर अब मैंने अपने खालीपन का इलाज ढूंढ़ लिया है, अब मैं घर पर ट्यूशन पढ़ाती हूं.

जिन शुरुआती दिनों की बात श्रीमती जोशी कर रही हैं, वह उनका ङ्गट्रांज़िशन पीरियडफ है. इस समय सबसे ज़रूरी है, समय के बहाव के साथ बहना. अपने साथ किसी तरह की ज़बर्दस्ती ना करें. ख़ुद को समय दें. धीरे-धीरे आप ख़ुद ही नई परिस्थिति में ढल जाएंगी.
श्रीमती लिमये की सरकारी नौकरी थी. वो कहती हैं कि रिटायरमेंट मुझे कभी भी मुश्किल नहीं लगा. मैं बहुत सकारात्मक सोचवाली महिला हूं. मुझे लगता है कि सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आपके सोचने का तरीक़ा कैसा है. मैंने पहले ही अपना रिटायरमेंट प्लान किया हुआ था, इसलिए मेरे लिए यह बदलाव कोई अचानक आया हुआ बदलाव नहीं था. मैंने पहले ही तय कर लिया था कि मुझे रिटायरमेंट के बाद अपने दिन कैसे बिताने हैं. मैंने जो भी अपनी नौकरी से सीखा, उसे रिटायरमेंट के बाद अपने निजी जीवन में उपयोग में लाया. मेरे दोनों ही बच्चों की शादियां हो चुकी हैं. मेरा दिन हमउम्र सहेलियों के साथ घूमने और भजन-कीर्तन में कटता है. मैं बहुत आध्यात्मिक हूं और अध्यात्म ही मुझे जीवन की हर कठनाई से लड़ने की शक्ति देता है.

रिटायरमेंट के लिए क्या है ज़रूरी?

  • श्रीमती लिमये ने अपने रिटायरमेंट को आसान बनाया और अब जीवन को सुकून से जी रही हैं. ऐसे ही जीवन के हर मोड़ पर प्लानिंग बहुत ज़रूरी है.
  •  आज जीवनशैली और सामाजिक संरचना में काफ़ी बदलाव आए हैं, तो उस हिसाब से हमें भी अपनी सोच को
    बदलना होगा.
  •  आज हो सकता है कि आपके रिटायरमेंट के बाद आपके बच्चे या नाती-पोतेे आपको समय ना दे पाएं, या फिर वे आपके साथ भी ना रह पाएं, तो उसमें उनको दोष ना दें, क्योंकि हो सकता है कि वाकई उनके पास समय का अभाव हो.
  •  डॉ. केहाली बताती हैं कि यह हमेशा ध्यान में रखें कि आप अपने जीवन में जो भी क़दम उठाती हैं, वह आप स़िर्फ अपने लिए उठा रही हैं, दूसरों के लिए अपने जीवन के निर्णय ना लें. तात्पर्य यह है कि अगर आप को अपनी नौकरी छोड़नी है, तो अपने लिए छोड़िए, यह मत कहिए कि आपने नौकरी बच्चों के लिए या फिर पति के लिए या फिर घर के लिए छोड़ी है, क्योंकि आपको ऐसा लगता है कि बच्चों को आपकी ज़रूरत है, पर हो सकता है कि ऐसा ना हो.
  •  दूसरी मुख्य बात यह है कि हमेशा ध्यान रखें कि एक आत्मनिर्भर मां अपने बच्चों को भी आत्मनिर्भर ही बनाएगी, तो सेवानिवृत्ति के बाद यह सोचना कि बच्चे हर छोटी बात के लिए आप पर निर्भर होंगे, यह ग़लत है. बदलाव आपके जीवन में आया है,
    दूसरों के नहीं.
  • ख़ुद को समय दीजिए, अपनी सोच को सकारात्मक रखिए.

कैसे लड़ें रिटायरमेंट ब्लूज़ से?

  •  रिटायरमेंट के कुछ समय पहले से ख़ुद को उसके लिए तैयार करें.
  •  रिटायरमेंट को अपने जीवन की दूसरी पारी की शुरुआत बनाएं. यह अंत नहीं है.
  •  कल बिताए हुए समय के लिए अपने आज को दांव पर ना लगाएं अर्थात् अपने अस्तित्व को अपने काम से जोड़कर ना रखें.
    ऑफिस के बाहर भी अपना सामाजिक सर्कल रखें. ऑफिस के अलावा भी अपने मित्र बनाएं.
  • रिटायरमेंट के बाद भी अपने आपको किसी ना किसी काम में व्यस्त रखें, जैसे- बच्चों को पढ़ाना, संगीत या ऐसी ही किसी हॉबी में ख़ुद का समय व्यतीत करना.
  •  अपने अकेलेपन के लिए किसी और को दोषी ना ठहराएं. इसकी जगह दूसरों की व्यस्तताओं को समझने का प्रयत्न करें.
    ख़ुद को किसी एनजीओ या संस्था से जोड़ें. हमउम्र लोगों के साथ समय व्यतीत करें.

अगर इन सबके बावजूद आपकी मानसिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आ रहा है, तो एक बार किसी मनोवैज्ञानिक से मिलने में कोई बुराई नहीं है. आपका जीवन आपका अपना है. आपकी अहमियत, आपकी महत्ता किसी नौकरी से जुड़ी नहीं है, बल्कि आपकी सकारात्मक सोच से जुड़ी है, तो अपने पंखों को पूरा खोलिए, जो आज तक कई बंधनों से जकड़े थे और सकारात्मक सोच की हवा में अपने आसमान पर जी भरकर उड़ान भरिए.

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बिज़नेस वुमन के लिए स्मार्ट स्कीम्स ( Smart Business Woman Schemes)

Smart Business

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देश में महिला उद्यमियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पिछले कुछ समय से सरकार और बैंक कई योजनाएं लागू कर रहे हैं ताकि देश की आधी आबादी बिज़नेस में भी बराबरी का दर्जा पा सके.

सरकार की मुद्रा स्कीम
ये योजना किसी भी बैंक में मिल सकती है. सरकार ने ये योजना ख़ासकर अनऑर्गनाइज़्ड सेक्टर (असंगठित क्षेत्र) की महिलाओं को ध्यान में रखकर बनाया है. इस स्कीम के तहत माइक्रो इंडस्ट्री चलाने वालों को बैंक 50 हज़ार से 10 लाख रुपए तक का लोन देती है. इस स्कीम के तहत लोन के लिए डिप्लोमा, डिग्री होल्डर होने की ज़रूरत नहीं होती, साथ ही लोन के लिए गारंटर भी ज़रूरी नहीं है.

स्टार्टअप इंडिया
युवा उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से हाल ही में सरकार द्वारा लॉन्च की गई स्टार्टअप स्कीम में भी महिलाओं के हितों का ध्यान रखा गया है. इसके तहत महिलाओं और अनुसूचित जाति को स्टार्टअप में मदद के लिए अलग से फंड की व्यवस्था की जाएगी.

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भारतीय महिला बैंक की स्पेशल लोन स्कीम

* बीएमबी शृंगार लोन- ब्यूटी पार्लर/सलून/स्पा के लिए लोन

* बीएमबी अन्नपूर्णा लोन- फूड कैटरिंग बिज़नेस के लिए लोन

* बीएमबी किचन मॉडर्नाइज़ेशन लोन

* बीएमबी परवरिश लोन- डे केयर सेंटर के लिए लोन

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वैभव लक्ष्मी
महिला उद्यमियों को बढ़ावा देने के लिए बैंक ऑफ बड़ौदा वैभव लक्ष्मी स्कीम चला रहा है. इसके तहत लोन लेने के लिए महिलाओं को बैंक में अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट जमा करनी होगी, जिससे कि बैंक आसानी से लोन मुहैया करा सके. महिला को एक गारंटर देना होता है. इस स्कीम के तहत महिलाएं घर का सामान भी लोन से ख़रीद सकती हैं.

वी शक्ति
महिला कारोबारियों की मदद के लिए विजया बैंक वी शक्ति स्कीम चला रहा है. इस स्कीम का लाभ उठाने के लिए इस बैंक में अकाउंट होना ज़रूरी है. इसके बाद 18 साल या इससे अधिक उम्र की महिलाएं आसानी से लोन के लिए अप्लाई कर सकती हैं. इस स्कीम के तहत लोन लेकर महिलाएं टेलरिंग, कैटरिंग, कैंटीन, अचार व मसाला बनाने जैसे काम शुरू कर सकती हैं.

सिंड महिला शक्ति
सिंडिकेट बैंक की इस स्कीम के तहत हर साल हज़ारों महिला कारोबारियों को लोन दिया जाता है. इसके तहत बैंक 5 करोड़ का लोन कम ब्याज दर पर देती है. इतना ही नहीं, बैंक लोन के साथ ही क्रेडिट कार्ड की भी सुविधा देती है. ये लोन 7-10 साल के लिए दिया जाता है.

विमेन सेविंग
महिला कारोबारियों की संख्या बढ़ाने के लिए एचडीएफसी भी अहम् भूमिका निभा रहा है. साथ ही ये बैंक महिला कस्टमर्स को ईज़ी शॉप एडवांटेज कार्ड की सुविधा भी दे रहा है.

स्त्री शक्ति पैकेज
देश का सबसे बड़ा बैंक एसबीआई (स्टेट बैंक ऑफ इंडिया) महिला कारोबारियों को स्त्री शक्ति पैकेज देता है. इस स्कीम के तहत महिलाओं को 2 लाख रुपए से अधिक लोन लेने पर 0.5 फ़ीसदी कम ब्याज देना होता है. 5 लाख रुपए तक के लोन के लिए कोई कोलैरटल सिक्योरिटी की ज़रूरत नहीं होती.

– कंचन सिंह

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क्या मां बनना ही सब कुछ है ?

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ज़िंदगी की हर रेस में जीत दर्ज करने के बावजूद उसकी क़ामयाबी तब तक अधूरी रहती है जब तक उसकी गोद न भर जाए. आख़िर बच्चे के जन्म को औरत के अस्तित्व और पूर्णता से जोड़कर क्यों देखा जाता है? क्या बच्चे को जन्म दिए बिना औरत को ख़ुशहाल ज़िंदगी जीने का हक़ नहीं है? क्या उसका अपना कोई वजूद नहीं है? महिलाओं की ज़िंदगी से जुड़े कुछ ऐसे ही संवेदनशील पहलुओं को छूने की कोशिश की है हमने अपनी इस स्पेशल रिपोर्ट में.

शादी और फिर बच्चा, ये दो शब्द ऐसे हैं जिनकी ग़ैर मौजूदगी में किसी भी औरत की ज़िंदगी को पूर्ण नहीं माना जा सकता. भले ही बेटा नकारा, निकम्मा हो और बहू दिनभर मेहनत करके घर का ख़र्च चला रही हो, फिर भी किसी कारणवश यदि वो बच्चे को जन्म देने में समर्थ नहीं है, तो उसे परिवार व समाज की चुभती निगाहों और तानों से रोज़ाना छलनी होना पड़ता है, मगर पुरुष पर कोई उंगली नहीं उठाता. हम आधुनिक और शिक्षित होने का लाख दंभ भरें, लेकिन हमारी कथनी और करनी में बहुत अंतर है. देश के अलग-अलग हिस्सों में कई औरतों को मां न बन पाने का
खामियाज़ा अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है.

क्या हमारा कोई वजूद नहीं?
एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत इंदु गुप्ता (परिवर्तित नाम) कहती हैं, “शादी के 1 साल बाद भी जब मैं प्रेग्नेंट नहीं हुई तो डॉक्टर को दिखाया. फिर दवाइयों का सिलसिला शुरू हो गया. क़रीब 2-3 साल इधर-उधर भटकने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला. एक तरफ़ दवाइयां बेअसर हो रही थीं और दूसरी तरफ़ ससुराल वालों के दबाव और तानों ने मुझे डिप्रेस कर दिया था. मैं इतनी तनावग्रस्त हो गई थी कि देर रात तक पागलों की तरह ऑफिस में ही बैठी रहती, रास्ते पर यूं ही घूमती रहती. घर में न तो किसी को मुझसे कोई लगाव था और न ही मेरी परवाह. हां, इस मुश्किल दौर में पति ने हर मोड़ पर मेरा साथ दिया. तीन साल बाद मैंने आईवीएफ ट्रीटमेंट कराना शुरू किया, मगर लाखों रुपए
फूंकने और पूरे शरीर में सूइयां चुभोने के बावजूद ये सफल न हो सका. सासू मां के ताने ‘हमारे परिवार में आज तक ऐसा नहीं हुआ’ और पार्टी-फंक्शन में लोगों के तीखे सवाल ‘अरे! तेरा हुआ कि नहीं अब तक?’ मेरे दिल को छलनी कर देते हैं, अब तो लोगों के बीच जाने से भी डर लगने लगा है.”
साइकोलॉजिस्ट निमिषा रस्तोगी कहती हैं, “हमारे देश में मां बनने को लेकर लोगों का नज़रिया बहुत संकुचित है, वो इसे महिलाओं की क़ाबिलियत से जोड़कर देखते हैं. इसी सोच के कारण महिलाएं धीरे-धीरे हीन भावना से घिर जाती हैं, जिसका असर उनकी पर्सनल लाइफ के साथ ही प्रोफेशनल लाइफ पर भी पड़ता है. बैंग्लोर की एक शिक्षिका के केस में भी ऐसा ही हुआ. बच्चा न होने के कारण वो महिला इस कदर अवसादग्रस्त हो गई कि धीरे-धीरे उसने बाहर आना-जाना, यहां तक कि नौकरी भी छोड़ दी. पति से भी उसके संबंध अच्छे नहीं रहे.”
महिलाओं के प्रति शिक्षित परिवारों की भी मानसिकता नहीं बदली है. महिलाएं कितनी भी तरक्क़ी क्यों न कर लें, लेकिन मां बने बिना उसकी सारी सफलता बेकार है. आख़िर समाज ये क्यों नहीं समझता कि औरतों का भी अपना वजूद है, उनकी भी भावनाएं हैं, उन्हें भी दर्द होता है, उनमें भी एहसास है. क्यों उसे एक मशीन की तरह ट्रीट किया जाता है?
मैरिज काउंसलर मोना बक्षी कहती हैं, “पढ़ी-लिखी और प्रतिष्ठित पद पर काम करने वाली क़ामयाब महिलाएं भी मां न बन पाने के अपराधबोध से ग्रसित रहती हैं, क्योंकि उन्हें सही मार्गदर्शन और सपोर्ट नहीं मिलता. इस स्थिति से बाहर आने के लिए परिवार, ख़ासकर पति का सपोर्ट बेहद ज़रूरी है.”

प्यार व त्याग के बदले अपमान
परिवार के लिए किए उसके सारे त्याग व समझौते क्या बच्चा न होने के कारण ज़ाया हो जाएंगे? ये कहां की नैतिकता है? पराये घर से आने के बावजूद वो आपके घर को, उसके तौर-तरीक़ों को न स़िर्फ अपनाती है, बल्कि उन्हें बेहतर बनाने की कोशिश में अपनी पूरी ताक़त लगा देती है, मगर इन कोशिशों का उसे क्या सिला मिलता है?
मुंबई की अचला (परिवर्तित नाम) शादी के 13 साल बाद भी मां नहीं बन पाईं. कई साल डॉक्टरों के चक्कर काटने के बाद उन्हें पता चला कि कमी उनके पति में है. कोई पति की मर्दानगी पर सवाल न उठाए और परिवार व समाज के सामने उनका सिर शर्म से न झुक जाए, इसलिए अचला ने पति के बाप न बन पाने वाला राज़ अपने सीने में ही दफ़न कर लिया. अचला ने तो पति से यहां तक कह दिया कि यदि वो चाहे तो बच्चे के लिए दूसरी शादी कर सकता है, उसे कोई दिक्क़त नहीं है, मगर उसके इस त्याग के बदले उसे मिली ज़िल्लत और दर्द. ससुराल वाले उसके पति पर उसे छोड़कर दूसरी शादी का दबाव डालने लगे. जिस पति की कमी को उसने दुनिया से छिपाया, वही पति मां और भाई की बातों में आकर उसे ही प्रताड़ित करने लगा. उस पर किसी और से रिश्ता होने का झूठा आरोप लगाकर हर रोज़ शारीरिक व मानसिक रूप से परेशान करने लगा. इन सबसे आजीज़ आकर अचला अब अलग रह रही हैं और पति से तलाक़ लेना चाहती हैं, मगर वो उसे आसानी से तलाक़ देने को भी राज़ी नहीं है, क्योंकि तलाक़ की सूरत में उसे मुआवज़ा देना पड़ेगा.
हमारे देश में अचला के पति और ससुराल वालों जैसी ओछी मानसिकता वाले लोगों की कोई कमी नहीं है. बच्चे के लिए बेटे की दूसरी शादी कराने वाले लोग ये जानने की ज़हमत भी नहीं उठाते कि कमी बहू में है या बेटे में. लोगों ने तो जैसे मान ही लिया है कि जो भी बुरा होता है उसके लिए बहू ही ज़िम्मेदार है. मैरिज काउंसलर मोना बक्षी कहती हैं, “कई केसेस में महिलाएं इतनी परेशान व डिप्रेस्ड हो जाती हैं कि वो ख़ुद ही पति से दूसरी शादी करने के लिए कह देती हैं. बच्चा न होने के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार मानकर वो हमेशा एक अपराधबोध से घिरी रहती हैं.”

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क्यों मंज़ूर नहीं गोद लेने का विकल्प?
21वीं सदी में जब हम आधुनिकता का दंभ भरते हैं ये स्थिति बदलनी बेहद ज़रूरी है. लोगों को ये समझना होगा कि पति और बच्चे से अलग भी महिला का अपना एक अलग अस्तित्व होता है और बच्चा न होने का ये मतलब नहीं कि ज़िंदगी ही ख़त्म हो गई. किसी ग़रीब, बेसहारा अनाथ बच्चे को गोद लेकर न स़िर्फ उसकी ज़िंदगी संवारी जा सकती है, बल्कि ममता के सुख से वंचित महिलाओं की ज़िंदगी के खालीपन को भी भरा जा सकता है. निमिषा कहती हैं, “एडॉप्शन को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं, जैसे- अपना बच्चा या ख़ून का रिश्ता ही सच्चा है, गोद लिए बच्चे को जब सच्चाई का पता चलेगा तो वो हमें छोड़कर चला जाएगा, पता नहीं उसकी रगो में कैसा ख़ून है? आदि. ऐसी सोच के कारण ही ज़्यादातर दंपति बच्चा गोद नहीं लेते, मगर ये सोच बिल्कुल ग़लत है. कुछ साल पहले मेरे पास एक केस आया जिसमें शादी के 12 साल बाद भी मां न बन पाने के कारण वो महिला बहुत ज़्यादा तनावग्रस्त हो गई थी. दो बार आईवीएफ करवाने का भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ. अब वो फोबिया की शिकार हो चुकी थी, उसे इंजेक्शन और डॉक्टर से चिढ़ हो गई थी, वो रिश्तेदारों व अपने कलीग से भी मिलना पसंद नहीं करती थी. जब ये कपल मेरे पास आए, तो कई हफ़्तों तक लगातार सेशन करने के बाद वो बच्चा गोद लेने के लिए राज़ी हो गए. उन्होंने अनाथाश्रम से 1 महीने की बच्ची को गोद लिया. आज अपनी इस प्यारी-सी बच्ची के साथ ये कपल बहुत ख़ुश है. वो मानते हैं कि अपनी पुरानी सोच बदलकर उन्होंने समझदारी का काम किया, तभी तो आज एक ओर जहां उनकी ज़िंदगी की कमी पूरी हो चुकी है, वहीं उस बेसहारा बच्ची को भी परिवार का प्यार और सहारा मिल गया.”
मोना बक्षी कहती हैं, “जो लोग इस डर से कि गोद लिया बच्चा हमसे अटैच हो पाएगा या नहीं, बच्चा एडॉप्ट करने से कतराते हैं, उन्हें ये याद रखना चाहिए कि जब बच्चा पैदा होता है तो उसका मां से भी कोई अटैचमेंट नहीं होता, वो मां से तब जुड़ता है जब वो उसे पहली बार गोद में लेती है और फिर धीरे-धीरे ये रिश्ता गहरा होता है.”

महिलाओं के लिए ज़रूरी है थोड़ी सतर्कता
कई बार महिलाएं करियर या किसी मुक़ाम पर पहुंचने की ख़ातिर मां बनने का फैसला टालती रहती हैं और जब वो बच्चा चाहती हैं, तो उनका शरीर साथ नहीं देता या किसी मेडिकल प्रॉब्लम की वजह से वो कंसीव नहीं कर पातीं. ऐसे में सब कुछ होते हुए भी वो तनाव से घिर जाती हैं और उन्हें अपनी सारी क़ामयाबी बेकार लगने लगती है. अतः करियर और बाक़ी चीज़ों के साथ ही ज़रूरी है कि अपनी ज़िंदगी के इस महत्वपूर्ण फैसले को हल्के में न लें और सही समय पर प्लानिंग कर लें. डॉक्टर किरण कोयले के अनुसार, “30 वर्ष के बाद प्रेग्नेंसी में कई तरह के कॉम्पलीकेशन हो सकते हैं.”

मां बनना ज़िंदगी का हिस्सा है, ज़िंदगी नहीं
अपनी तरफ़ से सावधानी बरतने और हर चीज़ का ख़्याल रखने के बाद भी यदि आप मां नहीं बन पाती हैं, तो इस ग़म को दिल से लगाकर बैठने की बजाय ख़ुद को ख़ुश करने के दूसरे तरी़के निकालिए. समाज और परिवार क्या कहेगा? की चिंता छोड़ दीजिए. यदि आपका दिल कहता है कि बच्चा गोद लेकर आप इस कमी को पूरा कर सकती हैं, तो बेझिझक अपने दिल की सुनिए. हो सकता है, घरवाले इसका विरोध करें, मगर ये ज़िंदगी आपकी है और इसे अपनी मर्ज़ी व ख़ुशी से जीने का आपको पूरा हक़ है. मां बनना किसी भी औरत की ज़िंदगी का ज़रूरी हिस्सा है, मगर ये ज़िंदगी नहीं है. क्या पिता न बनने पर पुरुष जीना छोड़ देते हैं? नहीं ना, तो फिर महिलाएं ऐसा क्यों करती हैं? वैसे भी मां बनने के लिए बच्चे पैदा करना ज़रूरी नहीं है. यशोदा ने कृष्ण को जन्म नहीं दिया था, मगर उनकी मां तो वही कहलाती हैं, क्योंकि उन्होंने कृष्ण को दिल से प्यार किया, आप भी ऐसा कर सकती हैं.

एक्सपर्ट स्पीक
यदि हम सोच बदल लें तो आईवीएफ और सरोगेसी की ज़रूरत ही नहीं रहेगी. किसी बेघर अनाथ को अच्छी ज़िंदगी देकर हम अपने घर और उसकी ज़िंदगी दोनों को रोशन कर सकते हैं.     – मोना बक्षी, साइकोलॉजिस्ट

लोगों की संकुचित मानसिकता के लिए कहीं न कहीं मीडिया भी ज़िम्मेदार है. कई सीरियल्स में वही दकियानूसी सोच दिखती है कि मां न बन पाने पर ज़िंदगी अधूरी है. ये ग़लत है और इसे बदलने की ज़रूरत है.       – निमिषा रस्तोगी

– कंचन सिंह

मैरिटल रेप- ये कैसा पुरुषत्व ? ( Marital Rep- how’s masculinity?)

Marital Rep

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हमारे देश में संबंध बनाने के लिए शादी का लाइसेंस ज़रूरी है. इस लाइसेंस के बिना बने संबंधों को परिवार/समाज/क़ानून अवैध मानता है, मगर जब शादी के बाद भी ज़बर्दस्ती की जाए तब क्या? क्या शादी के बाद पुरुषों का पत्नी पर एकाधिकार हो जाता है, वो जब चाहें, जैसे चाहें उसके साथ व्यवहार करेंगे? क्या पत्नी की कोई मर्ज़ी नहीं होती? दांपत्य जीवन में सेक्स को प्यार जताने का ज़रिया माना गया है, मगर जब ये वहशियाना रुख़ अख़्तियार कर ले, पार्टनर की भावनाओं का ख़्याल न हो, क्या तब भी इसे प्यार कहा जाए? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है हमने इस ख़ास रिपोर्ट में.

क्या है मैरिटल रेप?
मैरिटल रेप… हमारे पुरुषवादी समाज के अधिकांश लोग इस शब्द को पचा नहीं पाते, क्योंकि उन्हें लगता है शादी का लाइसेंस मिलने के बाद पति को पत्नी के साथ कुछ भी करने की छूट मिल जाती है. पत्नी की मर्ज़ी के बिना पति द्वारा उसके साथ जबरन बनाए गए संबंध को मैरिटल रेप की श्रेणी में रखा जाता है, हालांकि हमारा क़ानून इस संबंध को रेप नहीं मानता.

डर लगता है इस प्यार से…
मैरिटल रेप कोई नई चीज़ नहीं है. हां, यह शब्द ज़रूर आधुनिक ज़माने की देन है. हमारे देश में तो सदियों से पत्नियां अपने पति को परमेश्‍वर मानने के लिए बाध्य हैं, भले ही उनका परमेश्‍वर उनके साथ पाश्‍विक हरक़तें ही क्यों न करे. इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वुमन की 2011 की एक स्टडी के मुताबिक, हर 5 में से 1 भारतीय पुरुष अपनी पत्नी के साथ जबरन संबंध बनाता है. शादी… जिसे हमारे समाज में सात जन्मों का बंधन, दो दिलों, दो परिवारों का मिलन, पवित्र रिश्ता जैसी न जाने कितनी उपाधियों से नवाज़ा गया है, मगर इसके पीछे की एक कड़वी सच्चाई मैरिटल रेप भी है, जिस पर कम ही लोगों की ज़ुबान खुल पाती है. मोनिका (परिवर्तित नाम) कहती हैं, “कई बार हमारे बीच बहुत झगड़ा होता है, इतना कि उस व़क्त हम एक-दूसरे की शक्ल देखना भी पसंद नहीं करते. इसकी वजह से मैं कई दिनों तक अपसेट रहती हूं, मगर मेरे पति को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. झगड़े के कुछ देर बाद ही अगर उनका मूड हुआ, तो मुझे संबंध बनाने के लिए मजबूर कर देते हैं. इतना ही नहीं, इस दौरान कई बार वो हिंसक भी हो जाते हैं और मुझे चोट पहुंचाते हैं, मगर शिकायत करने पर उल्टा मेरे ऊपर ये इल्ज़ाम लगाने लगते हैं कि मैं उन्हें अब प्यार नहीं करती, मैं पत्नी का धर्म नहीं निभाती. बहुत मुश्किल से मैं अपनी भावनाओं और आक्रोश को क़ाबू कर पाती हूं. पति के लिए सेक्स बस एक फिज़िकल एक्ट है जिसमें प्यार व भावनाओं की कोई जगह नहीं होती. मैं समझ नहीं पाती कि पति-पत्नी के प्यार को हमेशा सेक्स से ही जोड़कर क्यों देखा जाता है? स़िर्फ अपनी संतुष्टि के लिए पत्नी को चोट पहुंचाना, शारीरिक व मानसिक दर्द देने को भला प्यार कैसे माना जाए?” मोनिका जैसी मैरिटल रेप के दर्दनाक अनुभव से गुज़र चुकी महिलाओं को प्यार शब्द से ही डर लगने लगता है.

क्या शादीशुदा ज़िंदगी में सेक्स ही सबसे अहम् है?
सेक्स पति-पत्नी के बीच प्यार जताने का एक ज़रिया है और ख़ुशहाल दांपत्य जीवन के लिए ज़रूरी भी, मगर तब जब इसमें दोनों की रज़ामंदी हो. मैरिज काउंसलर डॉ. राजीव आनंद कहते हैं, “सेक्स तो दिल में बसे प्यार की अभिव्यक्ति है. जैसे आपके बैंक अकाउंट में पैसे नहीं होंगे, तो एटीएम से कहां से निकलेंगे? इसी तरह यदि दिल में प्यार न हो, तो अंतरंग संबंध बोझिल और दर्दनाक अनुभव बन जाते हैं. दरअसल, शादी के शुरुआती साल में कपल्स के बीच अंतरंग संबंध बहुत अहम् होते हैं, क्योंकि तब उनका शरीर हार्मोन्स के नियंत्रण में रहता है न कि दिल और भावनाओं के. हार्मोनल बदलाव के कारण पति पत्नी की ओर शारीरिक रूप से आकर्षित होते हैं, मगर महिलाएं इस बात को समझ नहीं पातीं. वो सोचती हैं, जो हो रहा है, होने दो. शायद ऐसा ही होता है शादी में… तभी मन न होने पर भी ना नहीं कर पातीं, पति के शारीरिक प्रेम की हकीक़त समझने में उन्हें लंबा अरसा बीत जाता है.” साइकोलॉजिस्ट निमिषा रस्तोगी भी मानती हैं कि सफल शादी के लिए हेल्दी सेक्स लाइफ के साथ ही कपल्स के बीच आपसी तालमेल बहुत ज़रूरी है.

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मायने नहीं रखती पत्नी की मर्ज़ी
हमारा क़ानून और सरकार मैरिटल रेप शब्द से इत्तेफ़ाक नहीं रखती है. हाल ही में राज्य सभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय गृहराज्य मंत्री हरीभाई परथीभाई चौधरी ने कहा था कि मैरिटल रेप की अवधारणा को भारत में लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि हमारे समाज में विवाह को पवित्र संस्कार माना जाता है. साफ़ है कि हमारे देश में वैवाहिक बलात्कार को अपराध नहीं माना जाता यानी पत्नी बनने के बाद एक औरत की मर्ज़ी के कोई मायने नहीं होते. पति जब चाहे जैसे चाहे पत्नी के साथ संबंध बना सकता है, उसका किसी सामान की तरह इस्तेमाल कर सकता है.
डॉ. राजीव आनंद कहते हैं, “कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए, तो ज़्यादातर पति को अपनी पत्नी की मर्ज़ी और उसके सम्मान से कोई लेना-देना नहीं होता, इस बारे में वो सोचते तक नहीं हैं. उन्हें लगता है सेक्स या शारीरिक प्रेम प्रदर्शन ही काफ़ी है और यही अच्छे वैवाहिक संबंध का प्रतीक है. उन्हें ये बात समझ नहीं आती कि बिना आपसी समझ और सम्मान के अच्छा रिश्ता और गहरा प्यार असंभव है. पत्नी की इच्छा या मर्ज़ी का भी उतना ही महत्व होता है जितना कि पति का, मगर ये बात समझते-समझते पूरी उम्र बीत जाती है.”

भूल जाते हैं मर्यादा
अपना और परिवार का मान-सम्मान बचाने की ख़ातिर अक्सर महिलाएं मैरिटल रेप के बारे में चुप ही रहती हैं. गांव-खेड़े की अशिक्षित और लंबे घूंघट में रहने वाली महिलाएं भले ही मैरिटल रेप शब्द से वाकिफ़ न हों, मगर इसके दर्दनाक अनुभव से ज़रूर वाकिफ़ हैं. 26 साल की बिंदिया (परिवर्तित नाम) कहती हैं, “शादी की पहली रात ही मेरे पति शराब पीकर कमरे में दाख़िल हुए और मेरे साथ ज़ोर-ज़बर्दस्ती करने लगे. उन्होंने जो मेरे साथ किया उसे मैं कहीं से भी प्यार नहीं मान सकती. मैं बेजान निर्जीव वस्तु की तरह पड़ी रही और मेरे पति मेरे शरीर से तब तक खेलते रहे जब तक उनका नशा नहीं उतर गया. इस वाक़ये से मैं इतनी सहम गई कि अगली रात उनके आने से पहले मैंने कमरे की कुंडी बंद कर दी.”
यदि आप इस ग़लतफ़हमी में हैं कि स़िर्फ कम पढ़े-लिखे या अशिक्षित पुरुष ही ऐसा करते हैं, तो आप ग़लत हैं. प्रिया (बदला हुआ नाम) के पति मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर हैं, हर जगह लोग उनके शालीन व्यवहार के क़ायल हैं, मगर बेडरूम के अंदर जाते ही उनके रंग-ढंग बदल जाते हैं. पत्नी बीमार हो या किसी और परेशानी की वजह से जब भी वो संबंध बनाने में आनाकानी करती हैं, तो उनका पारा चढ़ जाता है और वो न स़िर्फ पत्नी के साथ ज़बर्दस्ती करते, बल्कि उसे दर्द पहुंचाने में उन्हें मज़ा भी आता. इतना ही नहीं, कई पुरुष तो परिवार और बच्चों का भी लिहाज़ नहीं करते हैं.

आख़िर क्यों करते हैं पति ऐसा?
हमारे समाज में हमेशा से महिलाओं को कमज़ोर और पुरुषों को शक्तिशाली माना गया है, इसलिए अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए कई पुरुष पत्नी पर ही अपनी ताक़त आज़माते हैं. साइकोलॉजिस्ट निमिषा कहती हैं, “महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता की कमी, मीडिया में पेश महिलाओं की ग़लत छवि या अपने अहं/ग़ुस्से को ग़लत तरी़के से पेश करने की आदत भी मैरिटल रेप के लिए ज़िम्मेदार होती है. उत्तेजना में आकर किसी दूसरे (पत्नी) को चोट पहुंचाकर आनंद का अनुभव करने वाला व्यक्ति सामान्य नहीं हो सकता. ऐसे बीमार और विकृत मानसिकता वाले पुरुषों को इलाज, सज़ा और काउंसलिंग तीनों की ज़रूरत है.”

क्यों चुप रहती हैं महिलाएं?
परिवार/समाज क्या कहेगा और क़ानून भी तो इसे अपराध नहीं मानता, तो पति के ख़िलाफ़ जाकर कहां रहूंगी, मेरे बच्चों के भविष्य का क्या होगा आदि बातें सोचकर महिलाएं मैरिटल रेप की ज़िल्लत झेलती रहती हैं. पूर्णिमा (परिवर्तित नाम) कहती हैं, “पीरियड्स के दिनों में मुझे बदन दर्द और सिरदर्द की शिकायत रहती है, उस दौरान मैं पति के साथ सोने से कतराती हूं, क्योंकि उन दिनों में भी वो संबंध बनाने की ज़िद्द करते हैं. मैं दर्द से कराहती रहती हूं, मगर उन्हें बस अपनी संतुष्टि से मतलब होता है. मेरी हां और ना के तो कोई मायने ही नहीं हैं. अपने इस शारीरिक व मानसिक दर्द को मैं किसी से साझा भी नहीं कर सकती, क्योंकि लोग कहते हैं, कैसी औरत है पति पर ही ग़लत इल्ज़ाम लगाती है.”
दरअसल, हमारे देश में शादी का मतलब है संबंध बनाने का लाइसेंस. डॉ. आनंद के मुताबिक, “हर महिला अपने परिवार को बचाना चाहती है, बच्चों का अच्छा भविष्य चाहती है. समाज में अपने परिवार और पति की प्रतिष्ठा चाहती है, लेकिन इन सबकी क़ीमत उसकी शारीरिक/मानसिक यातना व पीड़ा नहीं हो सकती. स़िर्फ त्याग करते रहने, चुप रहने और ग़लत चीज़ों को सहने की बजाय महिलाओं को सही समय पर, सही तरी़के से बिना पार्टनर के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाए, उन्हें विश्‍वास में लेकर इस बारे में विचार-विमर्श करना चाहिए कि कहां और कैसे दोनों अपने संबंधों को और मधुर बना सकते हैं? ताकि उनका रिश्ता और परिवार सलामत रहे.”
साइकोलॉजिस्ट निमिषा कहती हैं, “हमारे देश में सदियों से औरतों को दबाया गया है, मगर आज के दौर में महिलाओं को अन्याय के ख़िलाफ़ चुप नहीं रहना चाहिए. आज तो उनके पास कई महिला संगठन और क़ानून का साथ है जो उनकी मदद कर सकते हैं, मगर इसके लिए उन्हें ख़ुद पहल करनी होगी. जब तक वो ख़ुद ग़लत के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठाएंगी उनके साथ ज़्यादती बंद नहीं होगी. मैरिटल रेप के मुद्दे पर महिलाएं मैरिज काउंसलर की भी मदद ले सकती हैं.”

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बेबस महिलाएं कहां करें गुहार?
कई ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जब हिम्मत जुटाकर कोई महिला क़ानून के दरवाज़े तक तो गई, मगर उसकी दलील ये कहकर खारिज कर दी गई कि हमारे देश में मैरिटल रेप की कोई अवधारणा नहीं है. आईपीसी की धारा 375 के मुताबिक, यदि पत्नी की उम्र 15 साल से कम है और पति उससे जबरन यौन संबंध बनाता है, तो वो बलात्कार माना जाएगा, मगर पत्नी की उम्र यदि 15 साल से ज़्यादा है, तो उस स्थिति में बना शारीरिक संबंध, भले ही वो ज़बर्दस्ती बना हो, रेप नहीं कहलाएगा. जब समाज और क़ानून दोनों ही पुरुषों की इस ज़्यादती को ग़लत नहीं मानते, ऐसे में पीड़ित महिलाओं का दर्द दुगुना हो जाता है.

महिलाओं पर असर
मैरिटल रेप का न स़िर्फ महिलाओं के शरीर, बल्कि दिलो-दिमाग़ पर भी बहुत गहरा असर पड़ता है.
डॉ. आनंद कहते हैं, “महिलाओं के लिए सेक्स का प्यार से गहरा संबंध होता है, प्यार की पराकाष्ठा होती है. मगर जब ये संबंध बिना उनकी मर्ज़ी के हो, तो शरीर के साथ ही उनका दिल भी टूट जाता है. फिर पार्टनर के प्रति उनके दिल में कोई प्यार और सम्मान नहीं रह जाता. रह जाती है तो स़िर्फ विवशता, खोखलापन, अविश्‍वास और ख़ुद को भोग की वस्तु समझे जाने की भावना, जो बहुत दुखदायी होती है. चूंकि महिलाएं इस बारे में किसी से कुछ कह भी नहीं पातीं, अतः अंदर ही अंदर घुटती रहती हैं जिससे वो कई मानसिक व शारीरिक बीमारियों की शिकार हो जाती हैं.” साइकोलॉजिस्ट निमिषा के मुताबिक, “इसके कारण महिलाओं की मानसिक स्थिति बुरी तरह प्रभावित होती है, उनका आत्मविश्‍वास कमज़ोर हो जाता है, उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है. दुख, आक्रोश और चिड़चिड़ाहट, जिसे वो पति पर नहीं निकाल सकतीं, कहीं और निकलता है. सेक्स के प्रति उनके मन में घृणा पैदा हो जाती है और पार्टनर के प्रति नफ़रत और अविश्‍वास से भर जाती हैं. कुछ मामलों में लगातार मैरिटल रेप सहते रहने पर महिलाओं का शादी पर से ही विश्‍वास उठ जाता है और डिप्रेशन में वो या तो ख़ुद को या सामने वाले को नुक़सान पहुंचाने की भी सोच सकती हैं.”

एक्सपर्ट स्पीक
मैरिटल रेप के लिए हमारे देश में अलग से कोई क़ानून नहीं है, मगर महिलाएं इंडियन पीनल कोड के सेक्शन 498ए के क्रुअलिटी क्लॉज़ के तहत पति के ख़िलाफ़ मामला दर्ज करा सकती हैं. इसमें शारीरिक व मानसिक क्रूरता शामिल है. मैरिटल रेप के लिए अलग से क़ानून बनाने की बजाय मौजूदा सेक्शन 498ए में ही संशोधन (अमेंडमेंट) की ज़रूरत है. नया क़ानून बना देने से मसला हल नहीं हो जाएगा.

– ज्योति सहगल, एडवोकेट (बॉम्बे हाईकोर्ट)

फैक्ट फाइल
* 2005-06 में हुए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-3 के मुताबिक, भारत के 29 राज्यों की 10 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि उनके पति जबरन शारीरिक संबंध बनाते हैं.

* दुनिया के 80 देशों में मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में रखा गया है. इसमें इंग्लैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, कनाडा, मलेशिया और तुर्की जैसे देश शामिल हैं. यहां तक कि हमारे पड़ोसी देश नेपाल में भी इसे अपराध माना गया है.
इंटरनेशनल सेंटर फॉर वुमन और यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन फंड की ओर से साल 2014 में 7 राज्यों में कराए गए एक सर्वे के मुताबिक, एक-तिहाई पुरुषों ने माना कि वो अपनी पत्नी के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाते हैं.

 

– कंचन सिंह