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हर महिला को पता होना चाहिए रिप्रोडक्टिव राइट्स (मातृत्व अधिकार)(Every Woman Must Know These Reproductive Rights)

मेरी कोख मेरी नहीं, मेरा अस्तित्व मेरा नहीं, मेरे जज़्बात की कदर है क्या किसी को? मेरी उम्मीदों को क्या समझा है किसी ने? मेरे शरीर पर है किसी और का अधिकार, बरसों से झेल रही हूं मैं ये अत्याचार, कभी कोख में मार देते हैं, तो कभी जन्म के बाद, तड़प उठता है मेरा मन करके चित्कार. पर इतनी मजबूर क्यों हूं मैं आज? क्या मैं स़िर्फ मां ही हूं? क्या मेरी कोख ही सबकुछ है सबके लिए? नहीं, इससे कहीं ऊपर है मेरा अपना वजूद… मेरा अपना मान-सम्मान… 

Reproductive Rights

हमारे समाज में मातृत्व को बहुत सराहा जाता है. यही कारण है कि जो महिलाएं मां नहीं बन पातीं, समाज उन्हें वो सम्मान नहीं देता, जो संतानवाली महिलाओं को मिलता है. पर संतान चाहिए या नहीं चाहिए, कितने चाहिए, कितने सालों बाद चाहिए, दो बच्चों के बीच कितना अंतर चाहिए जैसे अहम् ़फैसले भी उसके लिए कोई और लेता है. बरसों से जो ग़लती दूसरी महिलाएं करती आ रही हैं, उसे आप न दोहराएं. जागरूक बनें और अपने अधिकारों को समझें.

क्यों ज़रूरी हैं रिप्रोडक्टिव राइट्स?

आज भी हमारे समाज में पुरुषों का दबदबा है और यही कारण है कि महिलाओं को दोयम दर्जा मिला है. उन्हें हमेशा कमज़ोर और दया का पात्र समझा जाता है. उन्हें कोमल और कमज़ोर समझकर कोई उनसे जबरन बच्चे पैदा न करवाए या फिर ज़बर्दस्ती गर्भपात न करवाए, इसलिए रिप्रोडक्टिव राइट्स हर महिला की सेहत और अधिकारों की रक्षा के लिए बहुत ज़रूरी हैं.

क्या हैं आपके रिप्रोडक्टिव राइट्स?

1994 में कैरो में हुए इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन पॉप्यूलेशन एंड डेवलपमेंट में महिलाओं के रिप्रोडक्टिव राइट्स के बारे में काफ़ी कुछ डिस्कस हुआ था. हमारे देश में ये सारे अधिकार लागू हैं. आप भी जानें, क्या हैं ये अधिकार.

– हर कपल को यह पूरा अधिकार है कि वो बिना किसी दबाव के अपनी मर्ज़ी से यह निर्णय ले सके कि वो कितने बच्चे चाहते हैं, 1, 2, 4 या फिर 1 भी नहीं.

– शादी के कितने सालों बाद बच्चे पैदा करने हैं.

– दो बच्चों के बीच कितने सालों का अंतर रखना है.

– आपको फैमिली शुरू करने के लिए ज़रूरी जानकारी मिलने का पूरा अधिकार है.

– उच्च स्तर के रिप्रोडक्टिव हेल्थ केयर की सुविधा मिलना आपका अधिकार है.

– बिना किसी भेदभाव, हिंसा और दबाव के आपको पूरी आज़ादी है कि आप बच्चों के बारे में प्लान कर सकें.

– हर महिला को उच्च स्तर की सेक्सुअल और रिप्रोडक्टिव हेल्थ केयर की सुविधा मिलनी चाहिए.

– यह आपका निर्णय होगा कि आप फैमिली प्लानिंग ऑपरेशन कब कराना चाहती हैं. उसके लिए आप पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं बना सकता.

– आपको सेफ और वाजिब दाम पर फैमिली प्लानिंग के मेथड उपलब्ध कराए जाएं.

– आपको पूरा हक़ है कि आप जिस उम्र में चाहें, उस उम्र में शादी करें और फैमिली की शुरुआत करें.

– क्योंकि सेक्सुअल हेल्थ आपके रिप्रोडक्टिव हेल्थ से जुड़ी है, इसलिए किसी भी तरह के सेक्सुअल एब्यूज़ का आप विरोध करें. उसके ख़िलाफ़ उचित कार्रवाई करें. जानें इन सरकारी सुविधाओं के बारे में

– सरकार ने सभी सरकारी अस्पतालों में ये सभी सुविधाएं मुहैया कराई हैं, जहां महिलाएं अपने रिप्रोडक्टिव राइट्स का इस्तेमाल कर सकती हैं.

– समय-समय पर महिलाओं के लिए सरकार की तरफ़ से कई योजनाएं भी बनाई जाती हैं, ताकि मातृत्व को एक सुखद अनुभव बनाया जा सके.

– जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के तहत सभी गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पतालों में प्रेग्नेंसी से लेकर डिलीवरी, दवा, ट्रांसपोर्ट आदि सेवाएं मुफ़्त हैं.
सिज़ेरियन डिलीवरी के लिए भी कोई पैसा नहीं लिया जाएगा.

– प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पतालों में चेकअप आदि की सारी सुविधाएं मुफ़्त हैं.

– सभी सरकारी अस्पतालों में फैमिली प्लानिंग के सभी मेथड की जानकारी महिलाओं को दी जाती है, ताकि वो अपनी सुविधानुसार किसी एक मेथड का इस्तेमाल कर सकें.

– किलकारी मैसेजेस, एक ऑडियो मैसेज सुविधा है, जो सरकारी अस्पतालों की ओर से प्रेग्नेंट महिलाओं को भेजे जाते हैं. इसमें उनके खानपान, सेहत और गर्भ की सुरक्षा के लिए कई टिप्स बताए जाते हैं.

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 Reproductive Rights
घट रही है मैटर्नल मोर्टालिटी रेट

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आज प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान महिलाओं की मृत्युदर में कमी आई है, पर अभी भी हर घंटे डिलीवरी के दौरान 5 महिलाओं की मृत्यु हो जाती है.

– वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2015 में भारत में हर 1 लाख चाइल्ड बर्थ में 174 महिलाओं की मौत हो जाती थी, जो 2010 में 215 था.

– एक अनुमान के अनुसार, हर साल चाइल्ड बर्थ के दौरान लगभग 45 हज़ार मांओं की मृत्यु हो जाती है.

– मैटर्नल और नियोनैटल मोर्टालिटी को कम करने के इरादे से सरकार प्रधानमंत्री मातृ वंदना  योजना लेकर आ रही है, ताकि उनकी मृत्यु दर को कम किया जा सके.

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971

गर्भपात का निर्णय हमारे रिप्रोडक्टिव राइट्स से जुड़ा है, इसलिए हर महिला को इसके बारे में पता होना चाहिए.

– हमारे देश में 1971 से ही एबॉर्शन लीगल है, पर आज भी बहुत-सी महिलाएं इस बात को नहीं जानतीं.

– एक अनुमान के मुताबिक क़रीब 8% मैटर्नल डेथ अनसेफ कंडीशन्स में एबॉर्शन कराने के दौरान हो जाती है.

– हर महिला को पता होना चाहिए कि कुछ विशेष हालात में आप क़ानूनन अपना गर्भपात करवा सकती हैं, जैसे-

  • भ्रूण का सही तरी़के से विकास नहीं
    हो रहा.
  • भू्रण में किसी तरह की ख़राबी आ गई.
  • बलात्कार के कारण गर्भ ठहर गया हो.
  • गर्भनिरोधक फेल हो गया.
  • भ्रूण के कारण गर्भवती मां को ख़तरा हो.
  • भ्रूण में किसी तरह की मानसिक और शारीरिक एब्नॉर्मिलिटी हो.-
  • गर्भपात किसी रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर से ही करवाएं.

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Reproductive Rights

सोच बदलने की ज़रूरत है

जस्टिस काटजू ने एक बार कहा था कि महिला सशक्तिकरण में क़ानून का रोल महज़ 20% होता है, जबकि 80% की महत्वपूर्ण भूमिका एजुकेशन सिस्टम की है, जहां लोगों की सोच को बदलकर ही इस मुकाम को हासिल किया जा सकता है.

– पुरुषों की सोच को बदलने में तो बहुत समय लगेगा, पर महिलाएं तो पहल करें. सालों से चले आ रहे दमन का नतीजा है कि उनकी सोच ही उनकी दुश्मन बन
गई है.

– उन्होंने मान लिया है कि उनके शरीर पर उनके पति का अधिकार है और जो वो कहेंगे वही होगा. जो अपने शरीर को ही अपनी प्रॉपर्टी नहीं मानती, वो भला अधिकारों के लिए संघर्ष क्या करेगी.

– महिलाओं को अपनी सोच बदलनी होगी.
आपका शरीर आपकी अपनी प्रॉपर्टी है, आपकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई और उसके बारे में निर्णय नहीं ले सकता.

– अनीता सिंह

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हर वर्किंग वुमन को पता होना चाहिए ये क़ानूनी अधिकार (Every Working Woman Must Know These Right)

 

Working Woman Rights

 

आज शायद ही ऐसी कोई कंपनी, कारखाना, दफ़्तर या फिर दुकान हो, जहां महिलाएं काम न करती हों. आर्थिक मजबूरी कहें या आर्थिक आत्मनिर्भरता- महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं, पर फिर भी सेक्सुअल हरासमेंट, कम सैलरी, मैटर्निटी लीव न देना या फिर देर रात तक काम करवाने जैसी कई द़िक्क़तों से महिलाओं को दो-चार होना पड़ता है. आपके साथ ऐसा न हो, इसलिए आपको भी पता होने चाहिए वर्किंग वुमन्स के ये अधिकार.

मैटर्निटी बेनीफिट एक्ट में मिले अधिकार

मैटर्निटी एक्ट के बावजूद आज भी बहुत-सी महिलाएं डिलीवरी के बाद नौकरी पर वापस नहीं लौट पातीं. कारण डिलीवरी के बाद बच्चे की देखभाल के लिए क्रेच की सुविधा न होना है, जबकि द मैटर्निटी बेनीफिट अमेंडमेंट एक्ट 2017 में क्रेच की सुविधा पर ख़ास ज़ोर दिया गया है, ताकि महिलाएं नौकरी छोड़ने पर मजबूर न हों.

पेशे से अध्यापिका विभिता अभिलाष ने अपना अनुभव बताते हुए कहा कि जब वो पहली बार मां बननेवाली थीं, तब डिलीवरी के मात्र एक महीने पहले उन्हें अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी, क्योंकि उनके स्कूल ने उनके बच्चे के लिए क्रेच की कोई सुविधा मुहैया नहीं कराई थी. विभिता की ही तरह बहुत-सी महिलाएं डिलीवरी से पहले ही नौकरी छोड़ देती हैं, ताकि बच्चे की देखभाल अच्छी तरह कर सकें. अगर ऐसा ही होता रहा, तो देश की आधी आबादी को आर्थिक आत्मनिर्भरता देने का सपना अधूरा ही रह जाएगा. वर्किंग वुमन होने के नाते आपको अपने मैटर्निटी बेनीफिट्स के बारे में पता होना चाहिए.

–     आपको यह जानकर हैरानी होगी कि पूरी दुनिया में स्वीडन एक ऐसा देश है, जहां सबसे ज़्यादा मैटर्निटी लीव मिलती है. यह लीव 56 हफ़्ते की है यानी 12 महीने 3 हफ़्ते और 5 दिन. हमारे देश में भी महिलाओं को 26 हफ़्तों की मैटर्निटी लीव मिलती है. आइए जानें, इस लीव से जुड़े सभी नियम-क़ायदे.

–     हर उस कंपनी, फैक्टरी, प्लांटेशन, संस्थान या दुकान में जहां 10 या 10 से ज़्यादा लोग काम करते हैं, वहां की महिलाओं को मैटर्निटी बेनीफिट एक्ट का फ़ायदा मिलेगा.

–     अगर किसी महिला ने पिछले 12 महीनों में उस कंपनी या संस्थान में बतौर कर्मचारी 80 दिनों तक काम किया है, तो उसे मैटर्निटी लीव का फ़ायदा मिलेगा. इसका कैलकुलेशन आपकी डिलीवरी डेट के मुताबिक़ किया जाता है. आपकी डिलीवरी डेट से 12 महीने पहले तक का आपका रिकॉर्ड उस कंपनी में होना चाहिए.

–     प्रेग्नेंसी के दौरान कोई भी कंपनी या संस्थान किसी भी महिला को नौकरी से निकाल नहीं सकता. अगर आपकी प्रेग्नेंसी की वजह से आप पर इस्तीफ़ा देने का दबाव बनाया जा रहा है, तो तुरंत अपने नज़दीकी लेबर ऑफिस से संपर्क करें. लेबर ऑफिसर को मिलकर अपने मेडिकल सर्टिफिकेट और अपॉइंटमेंट लेटर की कॉपी दें.

–     जहां पहले महिलाओं को डिलीवरी के 6 हफ़्ते पहले से छुट्टी मिल सकती थी, वहीं अब वो 8 हफ़्ते पहले मैटर्निटी लीव पर जा सकती हैं.

–    हालांकि तीसरे बच्चे के लिए आपको स़िर्फ 12 हफ़्तों की लीव मिलेगी और प्रीनैटल लीव भी आप 6 हफ़्ते पहले से ही ले सकेंगी.

–     अगर आप 3 साल से छोटे बच्चे को गोद ले रही हैं, तो भी आपको 12 हफ़्तों की मैटर्निटी लीव मिलेगी.

–     26 हफ़्ते की लीव के बाद अगर महिला वर्क फ्रॉम होम करना चाहती है, तो वह अपनी कंपनी से बात करके ऐसा कर सकती है. यहां आपका कॉन्ट्रैक्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

–     मैटर्निटी बेनीफिट एक्ट में यह भी अनिवार्य किया गया है कि अगर किसी कंपनी या संस्थान में 50 या 50 से अधिक कर्मचारी हैं, तो कंपनी को ऑफिस के नज़दीक ही क्रेच की सुविधा भी देनी होगी, जहां मां को 4 बार बच्चे को देखने जाने की सुविधा मिलेगी.

–     बच्चे के 15 महीने होने तक मां को दूध पिलाने के लिए ऑफिस में 2 ब्रेक भी मिलेगा.

–     अगर दुर्भाग्यवश किसी महिला का गर्भपात हो जाता है, तो उसे 6 हफ़्तों की लीव मिलेगी, जो उसके गर्भपातवाले दिन से शुरू होगी.

–     अगर प्रेग्नेंसी के कारण या डिलीवरी के बाद महिला को कोई हेल्थ प्रॉब्लम हो जाती है या फिर उसकी प्रीमैच्योर डिलीवरी होती है, तो उसे 1 महीने की छुट्टी मिलेगी.

–     सरोगेट मदर्स और कमीशनिंग मदर्स (जो सरोगेसी करवा रही हैं) को भी 12 हफ़्तों की मैटर्निटी लीव का अधिकार मिला है. यह लीव उस दिन से शुरू होगी, जिस दिन उन्हें बच्चा सौंप दिया जाएगा.

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Working Woman Rights

वर्कप्लेस पर सेक्सुअल हरासमेंट से सुरक्षा

इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन द्वारा किए गए सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ है कि सेक्सुअल हरासमेंट ऑफ वुमन ऐट वर्कप्लेस एक्ट, 2013 के बावजूद आज भी सेक्सुअल हरासमेंट हर इंडस्ट्री, हर सेक्टर में जारी है. सर्वे में यह बात सामने आई कि आज भी 38% महिलाएं इसका शिकार होती हैं, जिसमें सबसे ज़्यादा चौंकानेवाली बात यह है कि उनमें से 89.9% महिलाओं ने कभी इसकी शिकायत ही नहीं की. कहीं डर, कहीं संकोच, तो कहीं आत्मविश्‍वास की कमी के कारण वो अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ीं, लेकिन आप अपने साथ ऐसा न होने दें. अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनें और जानें अपने अधिकार.

–     किसी भी कंपनी/संस्थान में अगर 10 या 10 से ज़्यादा कर्मचारी कार्यरत हैं, तो उनके लिए इंटरनल कंप्लेंट कमिटी (आईसीसी) बनाना अनिवार्य है.

–     चाहे आप पार्ट टाइम, फुल टाइम या बतौर इंटर्न ही क्यों न किसी कंपनी या संस्थान में कार्यरत हैं, आपको सेक्सुअल हरासमेंट ऑफ वुमन ऐट वर्कप्लेस एक्ट, 2013 के तहत सुरक्षित माहौल मिलना आपका अधिकार है.

–    स़िर्फ कंपनी या ऑफिस ही नहीं, बल्कि किसी ग़ैरसरकारी संस्थान, फर्म या घर/आवास में भी काम करनेवाली महिलाओं को इस एक्ट के तहत सुरक्षा का अधिकार मिला है यानी आप कहीं भी काम करती हों, कुछ भी काम करती हों, कोई आपका शारीरिक शोषण नहीं कर सकता.

–     अगर आपको लगता है कि कोई शब्दों के ज़रिए या सांकेतिक भाषा में आपसे सेक्सुअल फेवर की मांग कर रहा है, तो आप उसकी लिखित शिकायत ऑफिस की आईसीसी में तुरंत करें.

–     हालांकि आपको पूरा अधिकार है कि आप घटना के 3 महीने के भीतर कभी भी शिकायत दर्ज कर सकती हैं, पर जितनी जल्दी शिकायत करेंगी, उतना ही अच्छा है.

–     सरकारी नौकरी करनेवाली महिलाएं जांच के दौरान अगर ऑफिस नहीं जाना चाहतीं, तो उन्हें पूरा अधिकार है कि वे तीन महीने की पेड लीव ले सकती हैं. यह छुट्टी उन्हें सालाना मिलनेवाली छुट्टी से अलग होगी.

–     आप अपने एंप्लॉयर से कहकर कंपनी के किसी और ब्रांच में अपना या उस व्यक्ति का ट्रांसफर करा सकती हैं.

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Working Womans

समान वेतन का अधिकार

ऐसा क्यों होता है कि एक ही ऑफिस में एक ही पद पर काम करनेवाले महिला-पुरुष कर्मचारियों को वेतन के मामले में अलग-अलग नज़रिए से देखा जाता है? महिलाओं को ख़ुद को साबित करने के लिए दुगुनी मेहनत करनी पड़ती है, पर बावजूद इसके जब उन्हें प्रमोशन मिलता है, तो वही पुरुष कलीग महिला के चरित्र पर उंगली उठाने से बाज़ नहीं आते. पुरुषों को प्रमोशन मिले, तो उनकी मेहनत और महिलाओं को मिले, तो महिला होने का फ़ायदा, कैसी विचित्र मानसिकता है हमारे समाज की.

–     ऐसा नहीं है कि यह स़िर्फ हमारे देश की समस्या है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाएं इसका विरोध कर रही हैं यानी दुनिया के दूसरे देशों में भी वेतन के मामले में लिंग के आधार पर पक्षपात किया जाता है.

–     हाल ही में चीन की एक इंटरनेशनल मीडिया हाउस की एडिटर ने स़िर्फ इसलिए अपनी नौकरी छोड़ दी, क्योंकि उनके ही स्तर के पुरुष कर्मचारी को उनसे अधिक वेतन दिया जा रहा था.

–     यह ऐसा एक मामला नहीं है, समय-समय पर आपको ऐसी कई ख़बरें देखने-सुनने को मिलती रहती हैं, जब ‘इक्वल पे फॉर इक्वल वर्क’ बस मज़ाक बनकर रह जाता है.

–     हमारे देश में भी पुरुषों और महिलाओं को समान वेतन के लिए ‘इक्वल पे फॉर इक्वल वर्क’ का अधिकार है, जो इक्वल रेम्यूनरेशन एक्ट, 1976 में दिया गया है.

–     एक्ट के मुताबिक़, अगर महिला और पुरुष एक जैसा काम कर रहे हैं, तो एम्प्लॉयर को उन्हें समान वेतन देना होगा.

–     नौकरी पर रखते समय भी एम्प्लॉयर महिला और पुरुष में लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता.

–     दरअसल, बहुत से एम्प्लॉयर जानबूझकर पुरुषों को नौकरी देते हैं, ताकि उन्हें मैटर्निटी लीव न देनी पड़े.

–     हालांकि इसके लिए कई महिलाओं ने लड़ाई लड़ी और जीती भी हैं. अगर आपको भी लगता है, आपके ऑफिस में आप ही के समान काम करनेवाले पुरुष को आपसे अधिक तनख़्वाह मिल रही है, तो आप भी अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठा सकती हैं.

–     पहले ऑफिस में मामला सुलझाने की कोशिश करें, अगर ऐसा न हो, तो कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने से हिचकिचाएं नहीं.

काम की अवधि/समय

–     फैक्टरीज़ एक्ट के मुताबिक़ किसी भी फैक्टरी में रात 7 बजे से सुबह 6 बजे तक महिलाओं का काम करना वर्जित है. लेकिन कमर्शियल संस्थान, जैसे- आईटी कंपनीज़, होटेल्स, मीडिया हाउस आदि के लिए इसमें छूट मिली है, जिसे रात 10 बजे से लेकर सुबह 5 बजे तक के लिए बढ़ा दिया गया है.

–     किसी भी महिला के लिए वर्किंग आवर्स 9 घंटे से ज़्यादा नहीं हो सकते यानी हफ़्ते में 48 घंटे से ज़्यादा आपसे काम नहीं कराया जा सकता. अगर इससे ज़्यादा काम आपको दिया जा रहा है, तो आपको ओवरटाइम के हिसाब से पैसे मिलने चाहिए.

–     किसी भी महिला कर्मचारी से महीने में 15 दिन से ज़्यादा नाइट शिफ्ट नहीं कराई जा सकती.

–     रात 8.30 बजे से सुबह 6 बजे तक महिला कर्मचारी को कंपनी की तरफ़ से ट्रांसपोर्ट आदि की सुविधा मिलनी चाहिए.

–     साप्ताहिक छुट्टी के अलावा कुछ सालाना छुट्टियां भी मिलेंगी, जिन्हें आप अपनी सहूलियत के अनुसार ले सकती हैं.

–     अगर कोई कंपनी रात में देर तक महिला कर्मचारियों से काम करवाना चाहती है, तो उन्हें सिक्योरिटी से लेकर तमाम सुविधाएं देनी पड़ेंगी.

कुछ और अधिकार

–     सभी महिलाओं को वर्कप्लेस पर साफ़-सुथरा माहौल, पीने का साफ़ पानी, सही वेंटिलेशन, लाइटिंग की सुविधा सही तरी़के  से मिलनी चाहिए.

–     अगर कोई महिला ओवरटाइम करती है, तो उसे उतने घंटों की दुगुनी सैलेरी मिलेगी.

–     जॉब जॉइन करने से पहले आपको अपॉइंटमेंट लेटर मिलना चाहिए, जिसमें सभी नियम-शर्ते, सैलेरी शीट सब  साफ़-साफ़ लिखे हों.

–     किसी भी महिला कर्मचारी को ग्रैच्युटी और प्रॉविडेंट फंड की सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता.

–     एम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस एक्ट के तहत सभी कर्मचारियों के हेल्थ को कवर किया जाता है. ईएसआई के अलावा कंपनी सभी कर्मचारियों का हेल्थ इंश्योरेंस भी करवाती है, ताकि किसी मेडिकल इमर्जेंसी में उन्हें आर्थिक मदद मिल सके.

– अनीता सिंह

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Happy Whatever! वुमेन्स डे पर कृति सनोन का ये स्ट्रॉन्ग मैसेज ज़रूर देखें (Kriti Sanon’s Strong Message on Women’s Day)

Kriti Sanon

Kriti Sanon8 मार्च को जहां हर कोई इंटरनेशनल वुमेन्स डे मना रहा है, वहीं कृति सनोन ने एक वीडियो के ज़रिए पूछा है एक बेहद ज़रूरी सवाल. कृति ने इस वीडियो में बिना कुछ बोले मैसेज बोर्ड के ज़रिए कहा है कि लोग आजकल जेंडर इक्वैलिटी, गर्ल पावर, महिलाओं के अधिकार और न जाने क्या क्या बातें करते हैं, जबकि हमारी सड़के अब भी असुरक्षित हैं. लोग अब भी ये तय करते हैं कि हमें क्या पहनना चाहिए. हम सिर्फ़ बातें करते हैं और मैं अब बात कर चुकी हूं, Happy Whatever!

Here we go again..! #HappyWhatever @ms.takenfashion

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ट्रिपल तलाक़ असंवैधानिक, मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन- इलाहाबाद हाईकोर्ट (Triple Talaq Unconstitutional, Violates Muslim Women’s Rights: Allahabad HC)

highcourt

ट्रिपल तलाक़ (triple talaq) को लेकर देश में चल रही बहस के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बृहस्पतिवार को बड़ी टिप्पणी में ट्रिपल  तलाक़ (तीन तलाक़) के प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया. हाईकोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अधिकारों का हनन करने वाली यह परंपरा आमानवीय और मुस्लिम महिलाओं के साथ क्रूरता है. लिहाज़ा, इसे मान्य नहीं किया जाना चाहिए. ट्रिपल तलाक़ की शिकार एक महिला की याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस सुनीत कुमार की पीठ ने कहा है कि संविधान में सब के लिए समान अधिकार हैं, इसमें मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं. इसलिए ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे पर उनके अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए. हाईकोर्ट ने कहा है कि पर्सनल लॉ बोर्ड का कानून संविधान से ऊपर नहीं हो सकता है.
उधर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगा. पहले से ही वहां यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. मणिपुर की राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला ने कहा कि कोई भी पर्सनल कानून संविधान से ऊपर नहीं हो सकता. ट्रिपल तलाक़ के पैरोकार समाजवादी पार्टी नेता अबू आज़मी ने इस फैसले पर कहा कि यह पूरी तरह से धार्मिक मामला है. हम अपने इस्लामिक कानून में दखलंदाजी नहीं चाहते. समाजवादी पार्टी नेता आजम खान ने कहा कि मज़हब आस्था के लिए होता है और आस्था पर बहस नहीं होनी चाहिए. वैसे केंद्र सरकार भी ट्रिपल  तलाक़ के पक्ष में नहीं है. सरकार सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में कह चुकी है कि ट्रिपल तलाक़ के लिए संविधान में कोई जगह नहीं है. तीन तलाक़ और बहुविवाह की इस्लाम में कोई जगह नहीं है.