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हर वर्किंग वुमन को पता होना चाहिए ये क़ानूनी अधिकार (Every Working Woman Must Know These Right)

 

Working Woman Rights

 

आज शायद ही ऐसी कोई कंपनी, कारखाना, दफ़्तर या फिर दुकान हो, जहां महिलाएं काम न करती हों. आर्थिक मजबूरी कहें या आर्थिक आत्मनिर्भरता- महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं, पर फिर भी सेक्सुअल हरासमेंट, कम सैलरी, मैटर्निटी लीव न देना या फिर देर रात तक काम करवाने जैसी कई द़िक्क़तों से महिलाओं को दो-चार होना पड़ता है. आपके साथ ऐसा न हो, इसलिए आपको भी पता होने चाहिए वर्किंग वुमन्स के ये अधिकार.

मैटर्निटी बेनीफिट एक्ट में मिले अधिकार

मैटर्निटी एक्ट के बावजूद आज भी बहुत-सी महिलाएं डिलीवरी के बाद नौकरी पर वापस नहीं लौट पातीं. कारण डिलीवरी के बाद बच्चे की देखभाल के लिए क्रेच की सुविधा न होना है, जबकि द मैटर्निटी बेनीफिट अमेंडमेंट एक्ट 2017 में क्रेच की सुविधा पर ख़ास ज़ोर दिया गया है, ताकि महिलाएं नौकरी छोड़ने पर मजबूर न हों.

पेशे से अध्यापिका विभिता अभिलाष ने अपना अनुभव बताते हुए कहा कि जब वो पहली बार मां बननेवाली थीं, तब डिलीवरी के मात्र एक महीने पहले उन्हें अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी, क्योंकि उनके स्कूल ने उनके बच्चे के लिए क्रेच की कोई सुविधा मुहैया नहीं कराई थी. विभिता की ही तरह बहुत-सी महिलाएं डिलीवरी से पहले ही नौकरी छोड़ देती हैं, ताकि बच्चे की देखभाल अच्छी तरह कर सकें. अगर ऐसा ही होता रहा, तो देश की आधी आबादी को आर्थिक आत्मनिर्भरता देने का सपना अधूरा ही रह जाएगा. वर्किंग वुमन होने के नाते आपको अपने मैटर्निटी बेनीफिट्स के बारे में पता होना चाहिए.

–     आपको यह जानकर हैरानी होगी कि पूरी दुनिया में स्वीडन एक ऐसा देश है, जहां सबसे ज़्यादा मैटर्निटी लीव मिलती है. यह लीव 56 हफ़्ते की है यानी 12 महीने 3 हफ़्ते और 5 दिन. हमारे देश में भी महिलाओं को 26 हफ़्तों की मैटर्निटी लीव मिलती है. आइए जानें, इस लीव से जुड़े सभी नियम-क़ायदे.

–     हर उस कंपनी, फैक्टरी, प्लांटेशन, संस्थान या दुकान में जहां 10 या 10 से ज़्यादा लोग काम करते हैं, वहां की महिलाओं को मैटर्निटी बेनीफिट एक्ट का फ़ायदा मिलेगा.

–     अगर किसी महिला ने पिछले 12 महीनों में उस कंपनी या संस्थान में बतौर कर्मचारी 80 दिनों तक काम किया है, तो उसे मैटर्निटी लीव का फ़ायदा मिलेगा. इसका कैलकुलेशन आपकी डिलीवरी डेट के मुताबिक़ किया जाता है. आपकी डिलीवरी डेट से 12 महीने पहले तक का आपका रिकॉर्ड उस कंपनी में होना चाहिए.

–     प्रेग्नेंसी के दौरान कोई भी कंपनी या संस्थान किसी भी महिला को नौकरी से निकाल नहीं सकता. अगर आपकी प्रेग्नेंसी की वजह से आप पर इस्तीफ़ा देने का दबाव बनाया जा रहा है, तो तुरंत अपने नज़दीकी लेबर ऑफिस से संपर्क करें. लेबर ऑफिसर को मिलकर अपने मेडिकल सर्टिफिकेट और अपॉइंटमेंट लेटर की कॉपी दें.

–     जहां पहले महिलाओं को डिलीवरी के 6 हफ़्ते पहले से छुट्टी मिल सकती थी, वहीं अब वो 8 हफ़्ते पहले मैटर्निटी लीव पर जा सकती हैं.

–    हालांकि तीसरे बच्चे के लिए आपको स़िर्फ 12 हफ़्तों की लीव मिलेगी और प्रीनैटल लीव भी आप 6 हफ़्ते पहले से ही ले सकेंगी.

–     अगर आप 3 साल से छोटे बच्चे को गोद ले रही हैं, तो भी आपको 12 हफ़्तों की मैटर्निटी लीव मिलेगी.

–     26 हफ़्ते की लीव के बाद अगर महिला वर्क फ्रॉम होम करना चाहती है, तो वह अपनी कंपनी से बात करके ऐसा कर सकती है. यहां आपका कॉन्ट्रैक्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

–     मैटर्निटी बेनीफिट एक्ट में यह भी अनिवार्य किया गया है कि अगर किसी कंपनी या संस्थान में 50 या 50 से अधिक कर्मचारी हैं, तो कंपनी को ऑफिस के नज़दीक ही क्रेच की सुविधा भी देनी होगी, जहां मां को 4 बार बच्चे को देखने जाने की सुविधा मिलेगी.

–     बच्चे के 15 महीने होने तक मां को दूध पिलाने के लिए ऑफिस में 2 ब्रेक भी मिलेगा.

–     अगर दुर्भाग्यवश किसी महिला का गर्भपात हो जाता है, तो उसे 6 हफ़्तों की लीव मिलेगी, जो उसके गर्भपातवाले दिन से शुरू होगी.

–     अगर प्रेग्नेंसी के कारण या डिलीवरी के बाद महिला को कोई हेल्थ प्रॉब्लम हो जाती है या फिर उसकी प्रीमैच्योर डिलीवरी होती है, तो उसे 1 महीने की छुट्टी मिलेगी.

–     सरोगेट मदर्स और कमीशनिंग मदर्स (जो सरोगेसी करवा रही हैं) को भी 12 हफ़्तों की मैटर्निटी लीव का अधिकार मिला है. यह लीव उस दिन से शुरू होगी, जिस दिन उन्हें बच्चा सौंप दिया जाएगा.

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Working Woman Rights

वर्कप्लेस पर सेक्सुअल हरासमेंट से सुरक्षा

इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन द्वारा किए गए सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ है कि सेक्सुअल हरासमेंट ऑफ वुमन ऐट वर्कप्लेस एक्ट, 2013 के बावजूद आज भी सेक्सुअल हरासमेंट हर इंडस्ट्री, हर सेक्टर में जारी है. सर्वे में यह बात सामने आई कि आज भी 38% महिलाएं इसका शिकार होती हैं, जिसमें सबसे ज़्यादा चौंकानेवाली बात यह है कि उनमें से 89.9% महिलाओं ने कभी इसकी शिकायत ही नहीं की. कहीं डर, कहीं संकोच, तो कहीं आत्मविश्‍वास की कमी के कारण वो अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ीं, लेकिन आप अपने साथ ऐसा न होने दें. अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनें और जानें अपने अधिकार.

–     किसी भी कंपनी/संस्थान में अगर 10 या 10 से ज़्यादा कर्मचारी कार्यरत हैं, तो उनके लिए इंटरनल कंप्लेंट कमिटी (आईसीसी) बनाना अनिवार्य है.

–     चाहे आप पार्ट टाइम, फुल टाइम या बतौर इंटर्न ही क्यों न किसी कंपनी या संस्थान में कार्यरत हैं, आपको सेक्सुअल हरासमेंट ऑफ वुमन ऐट वर्कप्लेस एक्ट, 2013 के तहत सुरक्षित माहौल मिलना आपका अधिकार है.

–    स़िर्फ कंपनी या ऑफिस ही नहीं, बल्कि किसी ग़ैरसरकारी संस्थान, फर्म या घर/आवास में भी काम करनेवाली महिलाओं को इस एक्ट के तहत सुरक्षा का अधिकार मिला है यानी आप कहीं भी काम करती हों, कुछ भी काम करती हों, कोई आपका शारीरिक शोषण नहीं कर सकता.

–     अगर आपको लगता है कि कोई शब्दों के ज़रिए या सांकेतिक भाषा में आपसे सेक्सुअल फेवर की मांग कर रहा है, तो आप उसकी लिखित शिकायत ऑफिस की आईसीसी में तुरंत करें.

–     हालांकि आपको पूरा अधिकार है कि आप घटना के 3 महीने के भीतर कभी भी शिकायत दर्ज कर सकती हैं, पर जितनी जल्दी शिकायत करेंगी, उतना ही अच्छा है.

–     सरकारी नौकरी करनेवाली महिलाएं जांच के दौरान अगर ऑफिस नहीं जाना चाहतीं, तो उन्हें पूरा अधिकार है कि वे तीन महीने की पेड लीव ले सकती हैं. यह छुट्टी उन्हें सालाना मिलनेवाली छुट्टी से अलग होगी.

–     आप अपने एंप्लॉयर से कहकर कंपनी के किसी और ब्रांच में अपना या उस व्यक्ति का ट्रांसफर करा सकती हैं.

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Working Womans

समान वेतन का अधिकार

ऐसा क्यों होता है कि एक ही ऑफिस में एक ही पद पर काम करनेवाले महिला-पुरुष कर्मचारियों को वेतन के मामले में अलग-अलग नज़रिए से देखा जाता है? महिलाओं को ख़ुद को साबित करने के लिए दुगुनी मेहनत करनी पड़ती है, पर बावजूद इसके जब उन्हें प्रमोशन मिलता है, तो वही पुरुष कलीग महिला के चरित्र पर उंगली उठाने से बाज़ नहीं आते. पुरुषों को प्रमोशन मिले, तो उनकी मेहनत और महिलाओं को मिले, तो महिला होने का फ़ायदा, कैसी विचित्र मानसिकता है हमारे समाज की.

–     ऐसा नहीं है कि यह स़िर्फ हमारे देश की समस्या है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाएं इसका विरोध कर रही हैं यानी दुनिया के दूसरे देशों में भी वेतन के मामले में लिंग के आधार पर पक्षपात किया जाता है.

–     हाल ही में चीन की एक इंटरनेशनल मीडिया हाउस की एडिटर ने स़िर्फ इसलिए अपनी नौकरी छोड़ दी, क्योंकि उनके ही स्तर के पुरुष कर्मचारी को उनसे अधिक वेतन दिया जा रहा था.

–     यह ऐसा एक मामला नहीं है, समय-समय पर आपको ऐसी कई ख़बरें देखने-सुनने को मिलती रहती हैं, जब ‘इक्वल पे फॉर इक्वल वर्क’ बस मज़ाक बनकर रह जाता है.

–     हमारे देश में भी पुरुषों और महिलाओं को समान वेतन के लिए ‘इक्वल पे फॉर इक्वल वर्क’ का अधिकार है, जो इक्वल रेम्यूनरेशन एक्ट, 1976 में दिया गया है.

–     एक्ट के मुताबिक़, अगर महिला और पुरुष एक जैसा काम कर रहे हैं, तो एम्प्लॉयर को उन्हें समान वेतन देना होगा.

–     नौकरी पर रखते समय भी एम्प्लॉयर महिला और पुरुष में लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता.

–     दरअसल, बहुत से एम्प्लॉयर जानबूझकर पुरुषों को नौकरी देते हैं, ताकि उन्हें मैटर्निटी लीव न देनी पड़े.

–     हालांकि इसके लिए कई महिलाओं ने लड़ाई लड़ी और जीती भी हैं. अगर आपको भी लगता है, आपके ऑफिस में आप ही के समान काम करनेवाले पुरुष को आपसे अधिक तनख़्वाह मिल रही है, तो आप भी अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठा सकती हैं.

–     पहले ऑफिस में मामला सुलझाने की कोशिश करें, अगर ऐसा न हो, तो कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने से हिचकिचाएं नहीं.

काम की अवधि/समय

–     फैक्टरीज़ एक्ट के मुताबिक़ किसी भी फैक्टरी में रात 7 बजे से सुबह 6 बजे तक महिलाओं का काम करना वर्जित है. लेकिन कमर्शियल संस्थान, जैसे- आईटी कंपनीज़, होटेल्स, मीडिया हाउस आदि के लिए इसमें छूट मिली है, जिसे रात 10 बजे से लेकर सुबह 5 बजे तक के लिए बढ़ा दिया गया है.

–     किसी भी महिला के लिए वर्किंग आवर्स 9 घंटे से ज़्यादा नहीं हो सकते यानी हफ़्ते में 48 घंटे से ज़्यादा आपसे काम नहीं कराया जा सकता. अगर इससे ज़्यादा काम आपको दिया जा रहा है, तो आपको ओवरटाइम के हिसाब से पैसे मिलने चाहिए.

–     किसी भी महिला कर्मचारी से महीने में 15 दिन से ज़्यादा नाइट शिफ्ट नहीं कराई जा सकती.

–     रात 8.30 बजे से सुबह 6 बजे तक महिला कर्मचारी को कंपनी की तरफ़ से ट्रांसपोर्ट आदि की सुविधा मिलनी चाहिए.

–     साप्ताहिक छुट्टी के अलावा कुछ सालाना छुट्टियां भी मिलेंगी, जिन्हें आप अपनी सहूलियत के अनुसार ले सकती हैं.

–     अगर कोई कंपनी रात में देर तक महिला कर्मचारियों से काम करवाना चाहती है, तो उन्हें सिक्योरिटी से लेकर तमाम सुविधाएं देनी पड़ेंगी.

कुछ और अधिकार

–     सभी महिलाओं को वर्कप्लेस पर साफ़-सुथरा माहौल, पीने का साफ़ पानी, सही वेंटिलेशन, लाइटिंग की सुविधा सही तरी़के  से मिलनी चाहिए.

–     अगर कोई महिला ओवरटाइम करती है, तो उसे उतने घंटों की दुगुनी सैलेरी मिलेगी.

–     जॉब जॉइन करने से पहले आपको अपॉइंटमेंट लेटर मिलना चाहिए, जिसमें सभी नियम-शर्ते, सैलेरी शीट सब  साफ़-साफ़ लिखे हों.

–     किसी भी महिला कर्मचारी को ग्रैच्युटी और प्रॉविडेंट फंड की सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता.

–     एम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस एक्ट के तहत सभी कर्मचारियों के हेल्थ को कवर किया जाता है. ईएसआई के अलावा कंपनी सभी कर्मचारियों का हेल्थ इंश्योरेंस भी करवाती है, ताकि किसी मेडिकल इमर्जेंसी में उन्हें आर्थिक मदद मिल सके.

– अनीता सिंह

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मल्टी टास्किंग के १० ख़तरे महिलाओं के लिए हैं हानिकारक (10 Risks of Multitasking Every Woman Must Know)

मल्टी टास्किंग के १० ख़तरे महिलाओं के लिए हानिकारक हैं. मल्टी टास्किंग महिलाओं का ख़ास गुण माना जाता है, लेकिन एक साथ बहुत सारे काम करने से कई बार उनकी हेल्थ, पर्सनल लाइफ, सोशल लाइफ पर बुरा असर पड़ने लगता है. कितनी नुक़सानदायक हो सकती है मल्टी टास्किंग? आइए, जानते हैं.

Risks Of Multitasking

1) मल्टी टास्किंग से शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ता है
आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में मल्टी टास्किंग यानी एक साथ कई काम करना ज़रूरी हो गया है, लेकिन ऐसा करना ख़तरनाक भी हो सकता है. महिलाओं के लिए कहा जाता है कि वो बहुत आसानी से मल्टी टास्किंग कर लेती हैं, लेकिन ऐसा करना उनके शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के बहुत नुक़सानदायक हो सकता है.

2) मल्टी टास्किंग से काम की क्वालिटी पर असर पड़ता है
मल्टी टास्किंग का असर सबसे पहले काम की क्वालिटी पर पड़ता है. आप चाहे कितने ही क़ाबिल क्यों न हों, यदि आप एक साथ बहुत सारे काम करते हैं, तो आपके काम की क्वालिटी कम होगी हो. मल्टी टास्किंग करते समय आपका ध्यान सभी कामों पर रहता है, जिससे आप किसी भी काम को पूरी लगन से नहीं कर पाते. इससे काम तो पूरा हो जाता है, लेकिन वो उतना अच्छा नहीं हो पाता, जितना आप उसे कर सकते हैं.

3) मल्टी टास्किंग से काम में ग़लतियां अधिक होती हैं
फ्रांस में हुई एक रिसर्च के मुताबिक, जो लोग एक समय पर एक से अधिक काम करते हैं, वो अपने काम में अधिक ग़लतियां करते हैं. ऐसा होना स्वाभाविक है, क्योंकि मल्टी टास्किंग करते समय हम किसी एक काम पर फोकस नहीं कर पाते, जिसके कारण काम में ग़लतियां छूट जाती हैं. कोई इंसान कितना भी अलर्ट क्यों न हो, यदि वो एक समय पर बहुत सारे काम करता है, तो उससे ग़लतियां छूटेंगी ही. कई बार काम में इतनी बड़ी ग़लती छूट जाती है कि बाद में उसे ठीक करना भी मुश्किल हो जाता है. ऐसा होने पर तनाव बढ़ जाता है, जिसका असर सेहत पर भी पड़ने लगता है.

4) मल्टी टास्किंग से काम की स्पीड (गति) कम हो जाती है
एक साथ बहुत सारे काम करने वाले लोग इस भ्रम में रहते हैं कि ऐसा करके वो समय बचा लेंगे, लेकिन असल में ऐसा होता नहीं है. जब आप एक साथ बहुत सारे काम करते हैं, तो आप किसी एक काम पर फोकस नहीं कर पाते, जिससे आपके काम की स्पीड स्लो हो जाती है. यदि आप एक-एक करके अपने सारे काम निपटाते जाएं, तो आपका काम भी अच्छा होगा और काम की स्पीड भी अच्छी होगी.

5) मल्टी टास्किंग से क्रिएटिविटी कम हो जाती है
जी हां, मल्टी टास्किंग का असर आपकी क्रिएटिविटी पर भी पड़ता है. जब आप एक समय पर एक से अधिक काम करते हैं, तो आपका पूरा ध्यान काम को निपटाने में लगा रहता है. उस समय आप ये नहीं सोच पाते कि इस काम को और रचनात्मक तरी़के से कैसे किया जाए. मल्टी टास्किंग से बहुत सारे काम निपट तो जाते हैं, लेकिन उनमें से कोई भी काम बेस्ट नहीं हो पाता. साथ ही आपको काम करने की संतुष्टि भी नहीं मिलती.

6) मल्टी टास्किंग से याददाश्त कमज़ोर होने लगती है
जब हम एक साथ बहुत सारे काम करते हैं, तो चीज़ों को भूलने लगते हैं, जिससे हमारी याददाश्त कमज़ोर होने लगती है. उम्र बढ़ने के साथ ये समस्या तेज़ी से बढ़ने लगती है. महिलाएं एक साथ बहुत सारे कामों की ज़िम्मेदारी ओढ़ तो लेती हैं, लेकिन ऐसा करते समय जब वो चीज़ों को भूलने लगती हैं, तो उनमें चिड़चिड़ापन आ जाता है. इससे उनका स्वास्थ्य तो प्रभावित होता ही है, उनके रिश्तों में भी तनाव बढ़ने लगता है.

7) मल्टी टास्किंग से तनाव बढ़ जाता है
एक साथ बहुत सारे काम करने से काम पर से फोकस तो बिगड़ता ही है, साथ ही काम समय पर पूरा करने का प्रेशर भी बना रहता है, जिससे तनाव बढ़ जाता है. कैलिफोर्निया विश्‍वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार, एक साथ बहुत सारे काम करने से दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं, जिससे तनाव बढ़ जाता है. यही वजह है कि मल्टी टास्किंग करने वाले लोग अक्सर तनाव में रहते हैं.

8) मल्टी टास्किंग से मोटापा बढ़ने लगता है
आपको जानकर अजीब लग सकता है, लेकिन ये सच है. मल्टी टास्किंग करने वाले लोग अक्सर खाते समय भी काम करते रहते हैं, जिससे उन्हें ये पता नहीं चल पाता कि उन्होंने कितना खाना खाया है. इसके अलावा एक साथ अधिक काम करने से तनाव बढ़ता है और तनाव में भूख ज़्यादा लगता है, जिसके कारण व्यक्ति ज़रूरत से ज़्यादा खाता है और उसका मोटापा बढ़ने लगता है.

9)  मल्टी टास्किंग का रिश्तों पर भी पड़ता है असर
जो लोग एक साथ बहुत सारे काम करते हैं, वो अपने काम में इतने बिज़ी रहते हैं कि अपने परिवार व क़रीबी रिश्तों के लिए भी टाइम नहीं निकाल पाते. इससे रिश्तों में तनाव और दूरियां बढ़ने लगती हैं. यही वजह है कि बहुत ज़्यादा काम करने वाले लोगों के लाइफ पार्टनर या परिवार के लोग उनसे ख़ुश नहीं रहते. ऐसे लोग अपनी पर्सनल या सोशल लाइफ के लिए टाइम नहीं निकाल पाते, जिससे उनके रिश्तों में तनाव बढ़ जाता है. ऐसे लोग आगे चलकर अकेलेपन के शिकार भी हो सकते हैं.

10) मल्टी टास्किंग की शिकार वर्किंग वुमन
एसोचैम के अध्ययन के अनुसार, 77% वर्किंग वुमन डिप्रेशन, मोटापा, डायबिटीज़, हार्ट और किडनी डिसीज़, पीठदर्द, हाइपरटेंशन जैसी लाइस्टाइल डिसीज़ की शिकार हैं. इस अध्ययन में 32 से 57 वर्ष की वर्किंग वुमन को शामिल किया गया था. एक्सपर्ट्स के अनुसार, वर्किंग वुमन घर और करियर दोनों जगह प्रेशर झेल रही हैं. करियर में उन्हें डेड लाइन का प्रेशर झेलना पड़ता है और घर में उन पर परिवार व बच्चों की ज़िम्मेदारी निभाने का दबाव रहता है. लगातर तनाव में रहने के कारण महिलाओं के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है.

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How to Avoid Multi Tasking?

मल्टी टास्किंग से कैसे बचें?
मल्टी टास्किंग के प्रेशर से आप थोड़ी स्मार्टनेस से बच सकते हैं. मल्टी टास्किंग से बचने के लिए अपनाएं ये आसान उपाय:

* टाइम मैनेजमेंट है बेस्ट उपाय
मल्टी टास्किंग के नुक़सान से बचने का सबसे आसान तरीफ़ा है टाइम मैनेजमेंट. यदि आप अपने सभी काम समय पर करें और हर काम के लिए निश्‍चित समय तय कर लें, तो आपको मल्टी टास्किंग की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. एक समय पर एक काम करके आप अपने काम की क्वालिटी, स्पीड और क्रिएटिविटी बढ़ा सकते हैं.

* दूसरों की हेल्प लें
महिलाएं अमूमन घर के सारे काम अपने सिर ओढ़ लेती हैं और बाद में काम के प्रेशर में चिढ़ने लगती हैं. इससे बचने के लिए घर के कुछ काम परिवार के अन्य सदस्यों में बांट लें. इससे आपके काम का प्रेशर भी कम हो जाएगा और आपको मदद भी मिल जाएगी.

* स्टेमिना बढ़ाएं
काम का प्रेशर झेलने के लिए स्टेमिना बढ़ाना ज़रूरी है. इसके लिए आप योग, मेडिटेशन, एक्सरसाइज़, डांस या किसी खेल का सहारा ले सकते हैं. फिज़िकल एक्टिविटी से स्टेमिना भी बढ़ता है और फोकस भी, इसलिए दिनभर में कुछ समय इसके लिए ज़रूर निकालें.

* झूठी तारीफ़ से बचें
महिलाओं को अक्सर मल्टी टास्कर, सुपर वुमन आदि का ख़िताब देकर उनसे ज़रूरत से ज़्यादा काम कराया जाता है. यदि आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो ऐसी झूठी तारीफ़ों के झांसे में न आएं. यदि आपके घर या ऑफिस में आपकी तारीफ़ करके आपसे ज़्यादा काम कराया जा रहा है, तो इससे ख़ुश होने के बजाय पहले ये देख लें कि आप उतना काम करने में सक्षम हैं या नहीं. यदि आपको लगता है कि ये काम आपके लिए ज़्यादा है तो साफ़ मना कर दें.

* ना कहना सीखें
कुछ लोगों को इसलिए भी ज़्यादा काम करना पड़ता है, क्योंकि वो किसी को किसी भी काम के लिए ना नहीं कह पाते. ऐसा करना ठीक नहीं है. किसी के काम आना या किसी की मदद करना अच्छी बात है, लेकिन उसके लिए अपनी सेहत को ख़तरे में डालना समझदारी नहीं है. आप जो काम नहीं कर सकते, उसके लिए ना कहना सीखें.

* अपने लिए व़क्त निकालें
हर व़क्त काम में डूबे रहने वाले लोगों की पर्सनल और सोशल लाइफ अच्छी नहीं रहती. वो लोगों से जल्दी घुल-मिल नहीं पाते, जिससे वो अक्सर अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं. इससे बचने के लिए थोड़ा समय अपने लिए ज़रूर निकालें. इस समय में अपने शौक पूरे करें, परिवार के साथ समय बिताएं, दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलें, ऐसा करके आपको ज़रूर ख़ुशी मिलेगी.

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कामकाजी महिलाओं के लिए हेल्दी स्नैकिंग आइडियाज़ (Healthy Snacking Ideas For Working Women)

Healthy Snacking Ideas, Working Women cooking tips

वर्किंग वीमेन (Working Women) के लिए ज़रूरी है वर्क लाइफ (worklife) और पर्सनल लाइफ (personallife) में बैलेंस बनाते हुए भी अपने हेल्थ को इग्नोर न करना, ऐसी में ये हेल्दी स्नैकिंग (Healthy Snacking) टिप्स (Tips) उनकी मदद करेंगे


Healthy Snacking Ideas, Working Women cooking tips

अब वो व़क्त तो रहा नहीं, जब महिलाएं केवल किचन और घर की शोभा बढ़ाती थीं. समय बदलने के साथ-साथ महिलाओं की भूमिका में भी बहुत परिवर्तन आ गया है. फैमिली लाइफ के अलावा आज उसकी सोशल और प्रोफेशनल लाइफ भी है. यही वजह है कि उसके लिए चुनौतियां बढ़ी हैं. घर-परिवार, जॉब और बच्चों की देखभाल… इन सबके बीच उसकी अपनी सेहत काफ़ी प्रभावित होती है. लेकिन अगर वो हेल्दी डायट ले और अपनी हेल्थ को इग्नोर न करे, तो इन सारी चुनौतियों का सामना वो बेहतर तरी़के से कर पाएगी.
लें सही डायट
– काम के बीच अपने लिए कुछ भी ख़ास बनाकर खाना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन अगर आप स्मार्टली स्नैकिंग करें, तो यह आसान हो जाएगा.
– ऑयली और जंक फूड की जगह हेल्दी फूड लें.
– आपके दोपहर के भोजन में कम से कम एक हरी सब्ज़ी, एक हिस्सा ताज़ा सलाद का और एक हिस्सा कैल्शियम से भरपूर डेयरी प्रोडक्ट, जैसे- छाछ, पनीर या दही, का होना चाहिए.
– महिलाओं को वैसे भी कैल्शियम की अधिक ज़रूरत होती है, तो ऐसे में अपनी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ न करें.
– पानी भरपूर पीएं. अपने डेस्क पर पानी की बोतल भरकर रखें, ताकि हमेशा हाइड्रेटेड रहें.
– काम के तनाव के बीच, देर तक काम करने और डेड लाइन्स पूरी करने के चक्कर में खानपान अनियमित और अनहेल्दी हो जाता है. लेकिन ऐसा जंक फूड न लें, जिनमें न एनर्जी है, न पोषण. बेहतर होगा कि जब भूख लगे, तो फ्रेश फ्रूट या फिर नट्स खाएं.
– एक्सरसाइज़ के लिए समय नहीं मिल पाता, तो बैठे-बैठे कुछ देेर के लिए मेडिटेशन करें. इससे तनाव कम होकर ऊर्जा मिलेगी.
– दिल्ली बेस्ड न्यूट्रिशनिस्ट रितिका समादार के अनुसार, “वर्किंग वुमन को सेहत संबंधी समस्याएं होने की अधिक आशंका रहती है, क्योंकि समय के अभाव के चलते उनकी खाने में हेल्दी फूड और पोषण की कमी रहती है. वो जब भी समय मिलता है, कुछ भी अनहेल्दी खा लेती हैं, जिससे स़िर्फ फैट्स और कैलोरीज़ ही बढ़ती हैं. इससे बचने के लिए स्मार्ट स्नैकिंग की ज़रूरत है.
– रोज़ सुबह रातभर पानी में भिगोए हुए बादाम खाएं, इससे दिनभर एनर्जी बनी रहेगी, क्योंकि यह विटामिन ई, फाइबर, प्रोटीन, राइबोफ्लेविन और अन्य कई पोषक तत्वों से भरपूर होता है.
– स्नैकिंग के लिए ऐसी हेल्दी चीज़ें सिलेक्ट करें, जिन्हें कैरी करना भी आसान हो.”

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कैसे करें स्मार्ट स्नैकिंग?
– सलाद काटने का समय नहीं हो, तो गाजर, ककड़ी, टमाटर, सेब आदि को आप यूं ही बैग में रख लें और लंच के समय काटकर खाएं.
– जब कभी भूख लगे, तो ऑयली खाने की बजाय एक सेब या कोई अन्य फ्रूट खाएं.
– कभी-कभी भूख दिमाग़ में भी होती है, इसलिए जब भी भूख महसूस हो, तो पहले पानी पीएं. हो सकता है इसी से आपकी भूख शांत हो जाए.
– कोल्ड ड्रिंक्स की बजाय ताज़ा फलों का जूस पीएं.
– ग्रीन टी भी अच्छा ऑप्शन है. यह काफ़ी हेल्दी होती है.
– बहुत अधिक मीठा न खाएं. इससे फैट्स बढ़ेगा.
– अपने खाने में या फिर एक बाउल दही में कुछ क्रश्ड बादाम मिलाकर खाएं. यह बहुत ही हेल्दी ऑप्शन है और इससे पेट भी भरा रहेगा.
– हर 4 घंटे में भूख लगती ही है, ऐसे में अपने डेस्क या ड्रॉअर में ऐसे हेल्दी स्नैक्स रखें, जिनमें 200 से कम कैलोरीज़ हों.
– मल्टीग्रेन बिस्किट्स या क्रैकर्स, पीनट बटर, नट्स, चना, स्प्राउट्स, फ्रूट्स आदि रखें.
– बेहतर होगा कि बादाम का पैकेट लाकर ड्रॉअर में रखें, जब कभी भूख लगे, तो इसे अलग-अलग तरह से खाने में मिलाकर खाएं.
– आप रोस्टेड आल्मंड भी खा सकती हैं. चिप्स और समोसे से यह ऑप्शन बेहतर है.
– फैट फ्री, माइक्रोवेव में भुने पॉपकॉर्न भी एक विकल्प है, क्योंकि यह अधिक समय तक पेट भरे होने का एहसास कराते हैं.
– ऑलिव्स भी बहुत हेल्दी होते हैं और गुणों से भरपूर भी.
– व्हाइट ब्रेड की बजाय ब्राउन ब्रेड लें. पीनट बटर के साथ या अन्य हेल्दी चीज़ों के साथ उसकी सैंडविच बनाकर खाएं.

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ब्यूटी प्रॉब्लम्स: क्या कंप्यूटर के सामने ज़्यादा बैठने से आंखों को नुकसान हो रहा है? (Beauty Problems: Protect Your Eyes While Work On Computer)

कम्प्यूटर के सामने ज्यादा बैठने के नुकसान और उपचार

मैं वर्किंग वुमन हूं. ऑफ़िस में कंप्यूटर पर ज़्यादा देर काम करने के कारण मेरी आंखें लाल हो जाती हैं और आंखों में जलन व खुजली होने लगती है. कृपया, बताएं कि आंखों की सही देखभाल के लिए मुझे क्या करना चाहिए?
– शिखा मेहरा, मुंबई

कम्प्यूटर के सामने ज्यादा बैठने के नुकसान और उपचार

आंखें हमारे शरीर का बहुत ही महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्सा हैं इसलिए इनकी सही देखभाल बेहद ज़रूरी है. आंखों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखें:
* कंप्यूटर पर काम करते समय स्क्रीन पर लगातार न देखें. 20 से 30 मिनट के अंतराल पर स्क्रीन से नज़रें हटा लें, इससे आंखों को आराम मिलेगा.
* नियमित अंतराल पर आंखों पर ठंडे पानी के छीटें मारती रहें.
* आंखों में जलन या खुजली होने पर मलने या रगड़ने की भूल न करें. डॉक्टर की सलाह लेकर आई ड्रॉप का इस्तेमाल करें.
* चेहरा धोने के लिए माइल्ड सोप या केमिकल फ्री फेसवॉश का इस्तेमाल करें.
* आंखों के आस-पास की त्वचा बेहद नाज़ुक होती है, ज़रा-सी भी लापरवाही से झुर्रियां व डार्क सर्कल की समस्या हो सकती है.
* डार्क सर्कल व झुर्रियों से बचने के लिए रोज़ाना सोने से पहले मॉइश्‍चराइज़िंग क्रीम से आंखों के चारों तरफ़ हल्के हाथों से मसाज करें.
* आंखों को धूप से बचाने के लिए यूवी प्रोटेक्टिव लेंस वाले सनग्लासेज़ का इस्तेमाल करें. सस्ते और घटिया क्वालिटी के लेन्स या सनग्लास़ेज न लगाएं. ये आंखों को नुक़सान पहुंचा सकते हैं.
* 1 मिनट में कम से कम 12 से 15 बार पलकें झपकाएं, वरना आंखें ड्राई हो सकती हैं.
* ज़्यादा गर्मी पैदा करने वाले टेबल लैंप व इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स से दूर रहें. इनके संपर्क में ज़्यादा रहने से आंखों में जलन की शिकायत हो सकती है.
* क़िताब या मैग्ज़ीन पढ़ते समय अपनी आंखों और क़िताब के बीच कम से कम आधे फ़ीट की दूरी रखें.
* एक्सरसाइज़ से भी आंखों को हेल्दी रखा जा सकता है. अतः थोड़ी देर के लिए आंखें बंद करें, पुतलियों को क्लॉक वाइज़ और एंटी क्लॉक वाइज़ घुमाएं. इससे आंखों को आराम मिलेगा.

वर्किंग वुमन के लिए क्विक कुकिंग आइडियाज़ (Quick cooking Ideas for working women)

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वर्किंग वुमन को घर और ऑफिस दोनों जगह की ज़िम्मेदारी निभानी होती है. ऐसे में उन्हें कई ऐसे प्री-कुकिंग ट्रिक्स ट्राई करने चाहिए जिससे उनका समय और एनर्जी दोनों बचें. वर्किंग वुमन के लिए हमने जुटाए हैं ख़ास टाइम सेविंग टिप्स.

* छुट्टी के दिन 2-3 तरह की ग्रेवी पीसकर फ्रिज में रख दें ताकि अचानक मेहमान आने पर आपको परेशानी न हो.

* हरी चटनी, इमली का पल्प, नारियल का दूध आदि ज़्यादा मात्रा में बनाकर डिब्बे में स्टोर करके रखें और ज़रूरत के मुताबिक इस्तेमाल करें.

* कुछ संस्थाएं कटी हुई साफ़ सब्ज़ियां बेचती हैं. आप उनसे कॉन्टेक्ट कर सकती हैं. सुपर मार्केट, मॉल आदि में भी कटी हुई सब्ज़ियां मिलती हैं.

* अदरक, लहसुन, हरी मिर्च का पेस्ट बनाकर रखें. इसमें तेल मिलाकर रखें ताकि रंग और स्वाद न बदले.

* घर में अचानक मेहमान आ जाएं तो फ्रोज़न मटर और कॉर्न का इस्तेमाल करें, ये बहुत जल्दी पकते हैं.

* इमली की चटनी और हरी चटनी घर में हमेशा तैयार रखें और इनका सिज़निंग के लिए इस्तेमाल करें.

* घर में क्रीम, टोमैटो प्यूरी इस तरह की रेडीमेड पैकिंग रखें ताकि पास्ता, पिज़्ज़ा बनाने में सुविधा हो और वो जल्दी बनें.

* मिल्कमेड, पाइनेप्पल टिन आदि से मिठाइयां भी मिनटों में बन जाती हैं.

* घर में हमेशा सूखे रेडी टू मिक्स के पैकेट रखें, जैसे- ढोकला मिक्स, पकौड़ा मिक्स, उपमा मिक्स, डोसा आदि. इन इंडियन प्रॉडक्ट्स में आमतौर पर  नुक़सानदेह प्रिज़र्वेटिव कम होते हैं और इनसे आप झटपट गरम नाश्ता बना सकती हैं.

* गाजर का हलवा, लौकी का हलवा आदि को घी में सेंककर उसमें ढेर सारा दूध डालने की बजाय ज़रा-सा दूध और मिल्क पावडर डालें. इससे हलवा  जल्दी और अच्छा बनेगा. बच्चों के लिए दो गाजर कसकर आप पांच मिनट में हलवा बना सकती हैं.

 

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स्मार्ट आइडियाज़

* साफ़ करने में अधिक समय लेने वाली सब्ज़ियां, जैसे- मटर, लहसुन, हरी पत्तेदार सब्ज़ियां आदि को छीलने व साफ़ करने के लिए कामवाली की  मदद लें, ताकि आपका काम करना आसान हो जाए और आप अपनी एनर्जी खाने को हेल्दी-टेस्टी बनाने में लगाएं.

* घर में अच्छे चॉपर व फूड प्रोसेसर अवश्य रखें. इनका प्रयोग करके आप अपना बहुत समय बचा सकती हैं.

* चाकू की धार ख़त्म होते ही उसे तुरंत फेंक दें. बिना धार वाले चाकू के प्रयोग से हाथ कटने का डर रहता है और समय भी बर्बाद होता है.

* सुपर मार्केट जाने की बजाय सामान की लिस्ट दुकानदार को भेज दें. ब्रांडेड सामान देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती. इससे आपका समय बचेगा और  आप सुपर मार्केट की लाइन में लगने से भी बच जाएंगी.

* फ्रिज हमेशा बड़ा लें, ताकि आप इसमें ज़रूरत का सारा सामान स्टोर कर सकें.

* घर में हमेशा सूखे नाश्ते रखें ताकि अचानक मेहमान आने पर आपको परेशानी न हो.

* पूरे हफ़्ते का मेनू बनाकर रखें. इससे समय की बचत होगी और सामान खरीदने में भी सुविधा होगी.

मां से पहले मैं

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हर मां के लिए उसका बच्चा सबसे पहले होता है बाकी सब कुछ बाद में. बच्चे के लिए वो ख़ुद को भी भुला देती है. अपनी ज़रूरतों और इच्छाओं का भी उसे ख़्याल नहीं रहता, मगर वो ये भूल जाती है कि जब तक वो ख़ुद स्वस्थ और ख़ुश नहीं रहेगी, अपनी मां होने की ज़िम्मेदारी सौ फीसदी नहीं निभा पाएगी.

गैस पर चाय की केतली चढ़ाने से शुरू हुई मेरी सुबह की रफ़्तार ऑफिस जाकर थोड़ी थम जाती है. सारा दिन फाइलों और कम्प्यूटर कीबोर्ड पर उंगलियां घुमाने के बाद शाम को फिर शुरू होती है किचन की भागदौड़. पति और बच्चों की मनपसंद डिश बनाने के लिए तेज़ी से चलते मेरे हाथ शायद अब अपनी पसंद का खाना बनाना ही भूल गए हैं. टेलीविज़न प्रोग्राम से लेकर खाने का मेनू और घूमने की जगह तक में अब मेरी पसंद मायने नहीं रखती… ये कहानी तक़रीबन हर मां की होती है. बच्चे की पसंद-नापंसद और ज़रूरत का ख़्याल रखना हर मां की ज़िम्मेदारी है, मगर इन सबके साथ ही थोड़ा समय अपने लिए, अपनी पसंद का कोई काम करने के लिए निकालना भी आपके लिए ज़रूरी है. ये मत सोचिए कि कोई और आपसे आकर ये कहेगा कि जाओ, इतने घंटे तुम अपने हिसाब से बिताओ, मैं तुम्हारा बाकी काम कर दूंगी. आपको उन्हीं चौबीस घंटों में से कुछ मिनट या घंटे अपने लिए निकालने होंगे ताकि आप ख़ुद को रिफ्रेश और रिचार्ज कर सकें.

मॉम को क्यों चाहिए मी टाइम?
आपसे आपके घर-परिवार और बच्चों की ख़ुशी जुड़ी हुई है. जब तक आप अंदर से ख़ुश नहीं रहेंगी तब तक अपने परिवार और बच्चे की सही देखभाल नहीं कर पाएंगी. माना आप अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछे नहीं हट सकतीं, मगर अपने लिए कुछ समय तो निकाल ही सकती हैं, जब स़िर्फ आप अपने साथ हों यानी उस व़क्त आप मां या पत्नी नहीं स़िर्फ ‘मैं’ हों. मी टाइम का ये मतलब कतई नहीं है कि आप अपने बच्चे को छोड़कर 4-5 घंटे के लिए पार्लर चली जाएं या सहेलियों के साथ घंटों गप्पे मारें, बल्कि सारा काम निपटाकर आधे या एक घंटे के लिए अपने मनमुताबिक कोई भी काम करें.
साइकोथेरेपिस्ट नीता शेट्टी कहती हैं, “हर मां के लिए मी टाइम बहुत ज़रूरी है. इससे फील गुड हार्मोन रिलीज़ होता है, जो स्ट्रेस दूर करके उन्हें इमोशनली और साइकोलॉजिकली ख़ुश रखता है. जब आप ख़ुश रहेंगी, तभी अपने आसपास के लोगों को भी ख़ुश रख सकती हैं. मां चाहे कामकाजी हो या हाउसवाइफ, बच्चे के जन्म के बाद उसकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाती है. बच्चे और घर-ऑफिस की ज़िम्मेदारियों में उलझकर वो अपने आप को भूल जाती है, जिससे उसका फ्रस्ट्रेशन और तनाव बढ़ने लगाता है. कई मामलों में ये डिप्रेशन का रूप भी अख़्तियार कर लेता है. मेरे पास जितनी भी क्लाइंट आती हैं, मैं उन्हें यही सलाह देती हूं कि कुछ देर के लिए ही सही अपने लिए समय ज़रूर निकालें.”

अपराधबोध क्यों?
“अरे यार दो घंटे हो गए, मेरा बेटा भूखा होगा, जल्दी शॉपिंग करो ना.” नेहा जब भी अपनी दोस्त शिवानी के साथ कहीं बाहर जाती, तो थोड़ी देर में ही जल्दी मचाने लगती थी. इससे कई बार शिवानी को बहुत ग़ुस्सा भी आता था. जल्दी के चक्कर में वो लोग न तो ठीक से शॉपिंग कर पाते हैं और न ही नेहा उस पल को एंजॉय कर पाती थी. फिर एक दिन शिवानी ने नेहा को समझाया, “माना तुम्हें बच्चे की परवाह है, मगर इसका ये मतलब नहीं है कि तुम अपने लिए जीना छोड़ दो. यदि महीने में एक बार वो 3-4 घंटे किसी और के साथ (पापा/दादी या परिवार के किसी अन्य सदस्य) है, तो इसमें गिल्टी फील करने की ज़रूरत नहीं है. तुम हमेशा उसकी हर ज़रूरत का ख़्याल रखती हो, ऐसे में कभी-कभार यदि अपने बारे में सोचती हो, तो इसमें कोई बुराई नहीं है. वैसे भी बच्चे की ज़िम्मेदारी स़िर्फ मां की नहीं, बल्कि पिता की भी होती है. जब वो दोस्तों के साथ मौज-मस्ती करते हैं, तब तुम बच्चे को खाना खिलाने और सुलाने में बिज़ी रहती हो. अगर एक दिन तुम्हारे बिज़ी रहने पर उन्होंने बच्चे को संभाल लिया, तो इसमें कोई बुराई नहीं है.”
मनीषा कहती है, “वर्किंग होने के कारण मैं अपनी बेटी के साथ मुश्किल से 2-3 घंटे बिता पाती हूं. ऑफिस से निकलते ही उसके पास पहुंचने के लिए भागती हूं और छुट्टी का पूरा दिन उसके साथ रहने की कोशिश करती हूं, लेकिन इस वजह से मेरा सोशल दायरा बिल्कुल सिमट गया. कभी शॉपिंग का मन भी होता था, तो नहीं जाती थी, जिससे धीरे-धीरे मेरी ज़िंदगी बोझिल होने लगी. फिर मैंने अपना सोशल दायरा थोड़ा बढ़ाना शुरू किया. कभी-कभार ऑफिस से निकलने के बाद दोस्तों के साथ कॉफी पी लेती या कहीं शॉपिंग के लिए निकल जाती थी. हालांकि ऐसा मैं महीने में एकाध बार ही कर पाती थी, मगर फिर भी इससे मुझे थोड़ा फ्रेश फील होने लगा. 2 घंटे घर देर से पहुंचने पर थोड़ा बुरा ज़रूर लगता, क्योंकि बेटी मेरा इंतज़ार कर रही होती थी. अतः इसकी खानापूर्ति के लिए मैं छुट्टी का पूरा दिन उसके साथ ही रहती हूं.” साइकोलॉजिस्ट मीता दोषी कहती हैं, “अपने लिए टाइम निकालने पर गिल्टी फील करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि जब आप अपने साथ क्वालिटी टाइम बिताएंगी, ख़ुश और स्ट्रेस फ्री रहेंगी, तभी बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम बिता पाएंगी.”

न करें सुपर मॉम बनने की कोशिश
कोई भी इंसान हर काम में परफेक्ट नहीं हो सकता, मगर आजकल की वर्किंग मॉम सुपर/परफेक्ट मॉम बनने के चक्कर में अपना ही नुक़सान कर रही हैं. आप अच्छी मां, पत्नी और बहू नहीं बन पाईं, ये सोचकर परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. आपने अपना काम और ज़िम्मेदारी ईमानदारी से निभाई. बस, इतना ही काफ़ी है, लोग क्या कहेंगे की परवाह मत कीजिए. यह बात हमेशा ध्यान में रखें कि आप भी इंसान हैं मशीन नहीं. आपको भी बाकी इंसानों की तरह जीने का अधिकार है. इस सच्चाई को स्वीकार कीजिए कि आप एकसाथ सारे काम नहीं कर सकतीं, जैसे- ऑफिस से आने के बाद आपको खाना भी बनाना है और बच्चे का होमवर्क भी कराना है, तो दोनों काम ख़ुद ही करने की कोशिश में तनावग्रस्त होने की बजाय पति या घर के अन्य सदस्यों की मदद ले सकती हैं. यदि आप किचन में हैं, तो पति से कहें कि वो बच्चे का होमवर्क करवा दे. दूसरों की वाहवाही पाने के चक्कर में हर काम ख़ुद ही करना आपको महंगा पड़ सकता है.

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जिएं उस पल को
काम की प्राथमिकता तय करें, कौन-सा काम ज़्यादा ज़रूरी है और कौन-सा नहीं? जैसे- बहुत दिनों बाद छुट्टी के दिन दोस्तों ने आपको किसी पार्टी में इन्वाइट किया, मगर घर की सफ़ाई करनी है, कबर्ड अरेंज करना है या घर के किसी अन्य काम की वजह से यदि आप दोस्तों को मना करती हैं, तो ये ग़लत है. मना करने के बाद आपके दिल में उनसे न मिल पाने की कसक रह जाएगी और सारा दिन आप उसी बारे में सोचकर परेशान होती रहेंगी, जिससे आप घर का काम भी सही तरह से नहीं कर पाएंगी. अतः बेहतर होगा कि दोस्तों के लिए घर के काम को टाल दें, क्योंकि सफ़ाई तो आप अगले संडे भी कर सकती हैं, मगर दोस्तों के साथ मस्ती का मौक़ा आपको फिर नहीं मिलेगा. अपने इस मी टाइम को यूं ही ज़ाया न होने दें. साथ ही बाहर जाने के बाद उस पल का पूरा मज़ा लें. बार-बार ये न सोचती रहें कि अरे यार! सिंक में पड़े बर्तन और वॉशिंग मशीन में पड़े कपड़े मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे. घर के काम से आप भाग तो नहीं सकतीं, वो तो करना ही है, मगर जब करना होगा उस बारे में तब सोचें. पहले से ही उसके बारे में सोचकर अपना पार्टी मूड क्यों ख़राब करना? घर का बोझ बाहर न ले जाएं. जब जहां हैं उस पल को एंजॉय करें. इससे तनाव दूर हो जाएगा और आप रिलैक्स महसूस करेंगी.

बनें स्मार्ट मॉम
थोड़ी-सी स्मार्टनेस दिखाकर आप न स़िर्फ अपने लिए समय निकाल सकती हैं, बल्कि बच्चे का भी ख़्याल रख सकती हैं. मीनाक्षी कहती हैं, “जब भी मुझे शॉपिंग करनी होती है, तो छुट्टी के दिन अपनी बेटी को लेकर पास के एक मॉल में चली जाती हूं. उस मॉल में गेम सेक्शन हैं जहां बच्चों को एक-डेढ़ घंटे के लिए रखा जाता है. बच्चों के हाथ में स्टिकर लगा देते हैं, जिससे किसी तरह का कंफ्यूज़न नहीं होता. अपने हम उम्र बच्चों के साथ मेरी बेटी भी बहुत एंजॉय करती है और उतनी देर में मैं आराम से शॉपिंग कर लेती हूं. इस तरह हम दोनों की आउटिंग हो जाती है.”

दोस्त/रिश्तेदार आ सकते हैं काम
शहरों में न्यूक्लियर फैमिली के बढ़ते चलन के कारण बच्चों की परवरिश थोड़ी मुश्किल हो गई है. ऐसे में आपके पड़ोसी, दोस्त या नज़दीक में रहने वाले रिश्तेदार आपके बहुत काम आ सकते हैं. दिल्ली की प्रिया कहती हैं, “मेरे इनलॉज़ हमारे साथ नहीं रहते, ऐसे में कभी दोस्तों की गेट-टुगेदर या पति की ऑफिस पार्टी में साथ जाने पर मैं अपनी 4 साल की बेटी को अपनी एक सहेली, जिसका बेटा भी क़रीब 3 साल का है, उसके घर छोड़ देती हूं. उसके घर पर वो आराम से खेलती रहती है और मैं भी अपनी पार्टी एंजॉय करती हूं. मुझे लगता है, जब आपके पैरेंट्स साथ न हों, तो ऐसे दोस्त आपके बहुत काम आ सकते हैं. हां, ये बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि ताली एक हाथ से नहीं बजती, यदि आज वो हमारी मदद कर रही है, तो हमें भी उसकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए. जब मेरी सहेली कहीं बाहर जाती है, तो उसके बेटे को मैं संभालती हूं.”

क्वालिटी टाइम है ज़रूरी
साइकोथेरेपिस्ट नीता शेट्टी कहती हैं, ”मेरे पास ऐसे कई केस आए हैं जिनमें मांएं कहती हैं कि वो बच्चे को छोड़कर अकेले कहीं नहीं जा पातीं और यदि जाती भी हैं, तो उन्हें गिल्टी फील होता है कि उन्होंने अपने लाड़ले को अकेला छोड़ दिया. दरअसल, महिलाओं की इस गिल्ट फीलिंग की वजह है हमारी सोसाइटी, जिसमें हमेशा ही महिलाओं को ही त्याग करना सिखाया जाता है. ज़रा याद कीजिए अपना बचपन, क्या आपकी मां ने कभी आपको अकेला छोड़ा था? शायद नहीं, क्योंकि उन्हें हमेशा ये एहसास दिलाया जाता था कि बच्चा स़िर्फ उनकी ज़िम्मेदारी है, मगर ये सोच ग़लत है. मां भी तो आख़िर इंसान ही है, बाकी लोगों की तरह उसे भी तो ख़ुद को रिफ्रेश करने के लिए थोड़े ब्रेक की ज़रूरत होती है. वैसे भी बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना ज़्यादा ज़रूरी है न कि क्वांटिटी टाइम. एक रिसर्च में भी ये बात सामने आई है कि हाउसवाइफ की तुलना में कामकाजी महिलाएं अच्छी मां साबित होती हैं, क्योंकि वो बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम बिताती हैं, जबकि हाउसवाइफ क्वांटिटी टाइम.”

– कंचन सिंह