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महत्वपूर्ण हैं परवरिश के शुरुआती दस वर्ष (parenting- initial ten years are important)

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बच्चों की परवरिश में शुरुआती वर्ष बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. जन्म के साथ ही व्यवहार व संस्कारों के प्रति माता-पिता यदि सचेत रहें और कोशिश करें कि बच्चे बड़े-बुज़ुर्गों की छत्रछाया में अच्छे संस्कार, अच्छा व्यवहार व अच्छी आदतों का पालन करना सीखें, तो इसमें कोई दो राय नहीं कि आगे चलकर वे एक बेहतर इंसान बनेंगे.

 

चाइल्ड सायकोलॉजिस्ट व एक्सपर्ट्स की राय में शुरुआत के वर्षों में शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक विकास की प्रक्रिया तीव्र होती है. बच्चा जो कुछ भी इन वर्षों में देखता, सुनता या समझता है, उसका प्रभाव आजीवन बना रहता है. वैसे भी व्यक्ति के निजी स्वभाव में कुछ जन्मजात प्रवृत्तियां शामिल होती हैं और कुछ वातावरण का प्रभाव होता है. बच्चों को समझने के लिए इन दोनों पर ध्यान देना ज़रूरी है, अन्यथा हम अपने ही बच्चों को अनजाने में हानि पहुंचा सकते हैं, जिसका नकारात्मक प्रभाव उनके भविष्य को ग़लत मोड़ दे सकता है.

कई बार बच्चों के ग़लत व्यवहार के कारण माता-पिता परेशान भी होते हैं और शर्मिन्दा भी, किंतु यदि बच्चों के व्यवहार पर ग़ौर किया जाए, तो निश्‍चय ही बच्चे के क्रोध, चिड़चिड़ेपन या मिसबिहेव करने के पीछे कोई ऐसा कारण सामने आएगा, जिसे या तो हम समझ ही नहीं पाए हैं या अनदेखा कर बैठे हैं. ये कारण बहुत ही मामूली और मासूम से हो सकते हैं, जैसे –

भूख- ज़रूरी नहीं है कि भूख स़िर्फ खाना खाने की हो. कभी-कभी किसी विशेष आहार की कमी या अधिकता के कारण भी बच्चा चिड़चिड़ा हो सकता है और परेशान कर सकता है, ताकि वो आपका ध्यान आकर्षित कर सके. भूख के अलावा प्यास के कारण भी बच्चों का ध्यान भटकता है और उनकी एकाग्रता टूटने लगती है.

थकान- स्कूल से लौटने पर उन्हें खिला-पिलाकर या तो हम चाहते हैं कि बच्चा होमवर्क करने बैठ जाए या खेलने जाए, जबकि बच्चा अगर थका है, तो हो सकता है कि वो स़िर्फ बैठना या बात करना चाहता हो. एक के बाद एक एक्टिविटी भी बच्चे को थका देती है. हर समय पैरेंट्स के मन मुताबिक कुछ न कुछ करते रहने से भी बच्चे ऊब जाते हैं और पलटकर जवाब देना या काम को टालना शुरू कर देते हैं.

निराशा- किसी बात से दुखी-निराश होने पर भी बच्चे का व्यवहार प्रतिकूल होने लगता है. शरीर में कहीं दर्द या मानसिक डर, पैरेंट्स से दूर होना, पैरेंट्स का किया हुआ वादा तोड़ना, उनकी ज़रूरतों को न समझना, ज़रूरत के समय पैरेंट्स का साथ न मिल पाना आदि बातें बच्चों को निराश करती हैं.

उपेक्षा- छोटे भाई-बहन के कारण, मेहमानों के कारण, किसी नए उपकरण के कारण या अन्य किसी भी वजह से यदि आप व्यस्त हो जाते हैं, तो बच्चा उपेक्षित महसूस करता है अथवा उसके किसी क्रिएशन पर आपका ध्यान न गया हो या जब वो आपसे कुछ शेयर करना चाहता हो और आप व्यस्त हों, वो आपके साथ बैठना चाहता हो और आप फोन पर बातें करने में बिज़ी हों, तो वो ख़ुद को उपेक्षित महसूस करता है. अक्सर देखा गया है कि जब मां फोन पर बात करती है, तो उस समय बच्चा मां का अटेंशन पाने के लिए कुछ ऐसा कर बैठता है कि वो बात नहीं कर पाती है. बच्चे हर समय माता-पिता का ध्यान ख़ुद पर चाहते हैं. न मिलने पर वो निगेटिव बिहेवियर करने लगते हैं, ताकि आप किसी भी तरह रिएक्ट करें और उसे आपका अटेंशन मिले.

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विभिन्न स्थितियों में बच्चों को कैसे हैंडल करें?
ग़लत व्यवहार को नज़रअंदाज़ करें- यदि बच्चा तीन वर्ष से कम उम्र का है और उसने आपका ध्यान आकर्षित करने के लिए रोने की आदत बना ली है, तो उसके रोने पर ध्यान न दें. हां, ज़रूरत इस बात को समझने की भी है कि रोना किस कारण से है. साथ ही शांतिपूर्वक व्यवहार दर्शाने पर प्रशंसा करना न भूलें. धीरे-धीरे बच्चा पॉज़ीटिव व निगेटिव व्यवहार के अंतर को समझने लगता है.

ध्यान हटाएं- जिस चीज़ के लिए बच्चा ज़िद कर रहा है, उससे उसका ध्यान हटाने के लिए किसी दूसरी मज़ेदार वस्तु के प्रति उसे आकर्षित करें या बात ऐसे बदलें कि वो रोना-चिल्लाना भूलकर बहल जाए, लेकिन आजकल ङ्गचिड़िया ले गईफ या ङ्गचंदा मामा लाएगाफ जैसी बातें निरर्थक हैं, क्योंकि बच्चे काफ़ी स्मार्ट हैं.

प्रतिक्रिया बदलें- तीन साल से बड़ी उम्र के बच्चों के लिए उपेक्षा करना या ध्यान हटाने जैसी क्रियाएं बेमानी हो जाती हैं. बेहतर होगा, उनसे बात करें. उनकी बात बिना रोक-टोक के सुनें और फिर अपनी प्रतिक्रिया उसके अनुरूप बदलें. सही-ग़लत के अंतर को समझाएं. हां, बात करते समय सही शब्दों के चुनाव व सही तरीक़ा अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें.

सलाह दें- किसी बड़े-बुज़ुर्ग के पास जाकर शिकायत करने के बाद कभी-कभी बच्चे अच्छा महसूस करते हैं और उनसे समाधान भी चाहते हैं, लेकिन कई बार पैरेंट्स की प्रतिक्रिया विपरीत होती है, जैसे- ङ्गक्या बार-बार शिकायत करने आ जाते हो, आपस में निबट लो.फ ऐसा न कहें, क्योंकि वो आपसे सलाह व समाधान चाहते हैं.

शेयर करना सिखाएं- शेयर करना एक महत्वपूर्ण सामाजिक गुण है. इस गुण के साथ बच्चे छोटे-बड़े, भाई-बहन व दोस्तों के साथ गेम्स या अपने खिलौनों को शेयर करके एंजॉय कर सकते हैं. ऐसी बातों के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें और उनकी प्रशंसा भी करें.

हट जाना सिखाएं- जब बच्चों के बीच झगड़ा बढ़ता हुआ लगे, तो उन्हें बताएं कि ऐसी स्थिति में वहां से चुपचाप हट जाना झगड़े को शांत करने का एक अच्छा तरीक़ा है. बुलीज़ के साथ डील करने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है. सामने रहकर तर्क-वितर्क करने से बेहतर है, वहां से
चले जाना.

पिटाई न करें- इस विषय पर दो राय हो सकती है. कुछ पैरेंट्स को लगता है कि सुधारने या अनुशासित करने के लिए पिटाई ज़रूरी है, क्योंकि ये पिटाई उनके भले के लिए ही तो होती है, लेकिन मुख्य बात तो ये है कि पिटाई करके आप बच्चे को मारना सिखा रहे हैं. वो अपने ही छोटे भाई-बहनों या दोस्तों पर हाथ उठाने में झिझकेगा नहीं. साथ ही हिंसा व क्रोध को भी ग़लत नहीं समझेगा.

धैर्य रखें- यदि मेहमानों के सामने या सार्वजनिक स्थानों पर बच्चा मिसबिहेव करने लगे, तो शांत रहें. धैर्य से काम लें. उसे समझाने की कोशिश करें, फिर भी वो न माने, तो वहां से बच्चे को हटा दें. किसी भी स्थिति में चिल्लाना या मार-पीट उचित नहीं.

सम्मान दें- बच्चों के साथ हमेशा बड़ों जैसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए. बच्चे भी चाहते हैं कि उनसे अच्छी तरह बात की जाए, उन्हें महत्वपूर्ण समझा जाए, इसलिए उनसे संबंधित बातों में उनकी राय ली जा सकती है.

– प्रसून भार्गव