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युवाओं को क्यों है हर बात की जल्दबाज़ी? (Why is the younger generation in a big hurry?)

Young Generation

सड़क पर ते़ज रफ़्तार गाड़ी चलाने से लेकर करियर, रिश्ते… हर जगह युवाओं की जल्दबाज़ी साफ़ नज़र आती है. न तो वो ज़्यादा समय तक एक नौकरी में टिक पाते हैं और न ही एक रिश्ता निभा पाते हैं. ऐसा लगता है आज की यंग जनरेशन ज़िंदगी की सहज रफ़्तार को भूल चुकी है. 2 मिनट नूडल्स की तरह उन्हें ज़िंदगी में भी हर चीज़ तुरंत चाहिए. आख़िर क्यों जल्दबाज़ हो रही है युवा पीढ़ी? जानने की कोशिश की मेरी सहेली (Meri Saheli)  ने.

फास्ट फूड और रेडी टु ईट फूड के इस ज़माने में युवाओं की ज़िंदगी भी इंस्टेंट होती जा रही है. स्थायित्व, भावनात्मक जुड़ाव, संवेदनाएं, समर्पण, धैर्य आदि उनके लिए बेकार की बातें हैं. ख़ुद को प्रैक्टिकल बताने वाली ये पीढ़ी मेहनती और स्मार्ट है इस बात में दो राय नहीं है, मगर ज़रूरत से ज़्यादा जल्दबाज़ भी है. पढ़ाई से लेकर नौकरी और रिश्ते तक हर चीज़ में ये जल्दबाज़ी करते हैं, ज़िंदगी को उसकी सहज रफ़्तार से चलने नहीं देते. यही कारण है कि इनके पास बहुत-सी छोटी-छोटी चीज़ें, जो उनके माता-पिता और परिवार के लिए बहुत बड़ी होती हैं, जैसे- अपनों के साथ समय बिताना, एक-दूसरे की भावनाओं को समझना आदि… के लिए व़क्त ही नहीं रहता और न ही ये इन्हें तवज्जो देते हैं.

चाहते हैं तुरंत क़ामयाबी
अपने पिता, चाचा, मामा आदि को आपने एक ही कंपनी में सालों काम करते हुए देखा होगा, मगर आज स्थितियां बदल चुकी हैं. आज के युवाओं को स्लो मोशन में तरक्क़ी बिल्कुल पसंद नहीं, वे तुरंत अमीर और सफल बन जाना चाहते हैं और इसके लिए नौकरी बदलना इन्हें बेहतर विकल्प लगता है. कुछ फील्ड में तो युवा मुश्किल से एक साल भी एक कंपनी में नहीं टिक पाते. हाल ही में रिक्रूटमेंट एजेंसी माइकल पेज के एम्पलॉय इंटरनेशनल सर्वे के मुताबिक़, देश में नौकरी बदलने वालों की तादाद काफ़ी बढ़ रही है. इस सर्वे के मुताबिक़, क़रीब 82 फ़ीसदी कर्मचारी नौकरी बदलने के इच्छुक हैं. क़रीब 73 प्रतिशत कर्मचारियों ने नौकरी बदलने के लिए इंटरव्यू दिए हैं. इस सर्वे के अनुसार, करियर में ग्रोथ के लिए 65 प्रतिशत एम्पलॉई नौकरी बदलेंगे, जबकि 56 फ़ीसदी कर्मचारी सैलरी में बढ़ोतरी के लिए दूसरी नौकरी तलाशेंगे. आजकल ज़्यादातर युवा प्रोफेशनल कोर्स करने के बाद प्लेसमेंट के ज़रिए तुरंत जॉब ज्वाइन कर लेते हैं. फिर इनमें अपने साथियों से आगे निकलने की होड़ लग जाती है. अगर किसी दोस्त का पैकेज 20 लाख है, तो वो 30 लाख पाने की चाह में जल्दी-जल्दी नौकरी बदलते रहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि एक ही कंपनी में सालों रहने पर उन्हें उतना पे हाइक नहीं मिलेगा जितना नौकरी बदलने पर मिल जाता है. हालांकि बार-बार नौकरी बदलने से उनकी स्टेब्लिटी (स्थिरता) पर सवालिया निशान लग जाता है, परंतु उन्हें इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. 30 वर्षीय सौरभ 5 सालों में 3 नौकरियां बदल चुके हैं, सौरभ कहते हैं, “एक ही कंपनी में रहने पर सैलरी उतनी फास्ट नहीं बढ़ती, मगर नौकरी बदलने पर आपको 20 से 30 फ़ीसदी हाइक मिल जाता है.”

रिश्तों में खोखलापन
जिस तरह आग में तपकर सोना कुंदन बनता है, उसी तरह जो चीज़ जितनी मुश्किल और धीमी गति से मिलती है उसकी अहमियत भी ज़्यादा होती है, मगर आज के युवाओं की डिक्शनरी में पेशेंस (सब्र) नाम का कोई शब्द ही नहीं. उन्हें तो बस, सब इंस्टेंट चाहिए. फास्टफूड की तरह उनकी ज़िंदगी और रिश्ते सब इतने फास्ट हो गए हैं कि उनमें जुड़ाव ही नहीं रह गया. आपको बहुत से ऐसे कपल्स दिख जाएंगे जो कहने को तो पति-पत्नी हैं, मगर उनके बीच भी एक प्रोफेशनल रिश्ता ही लगता है. उनके बीच भावनात्मक व संवेदनात्मक लगाव कहीं भी नहीं दिखता. नतीजतन, छोटी-छोटी बातों पर दोनों के बीच मनमुटाव व झगड़े शुरू हो जाते हैं और किसी दिन ग़ुस्से में एक हमसफ़र दूसरे को तलाक़ का नोटिस थमा देता है. वो अपने रिश्ते को सेकंड चांस देने की ज़हमत भी नहीं उठाते हैं, क्योंकि उन्हें ज़िंदगी में बस आगे बढ़ने की जल्दी होती है. पार्टनर ही नहीं, पैरेंट्स से भी इनका भावनात्मक जुड़ाव बहुत गहरा नहीं होता है. तृप्ति कहती हैं, “अभी कुछ दिन पहले की ही बात है, मेरे ऑफिस से अचानक फोन आ गया और मुझे जाना था, इसलिए पहले से ही बेटे के साथ बना बाहर जाने का प्रोग्राम कैंसल करना पड़ा. मैंने बेटे से कहा सॉरी बेटा, अर्जेंट काम से जाना है, आप पापा के साथ चले जाओ, मैं नहीं आ सकती, तो उसने कहा इट्स ओके मम्मा, कोई बात नहीं. अब तो मुझे आपके बग़ैर हर जगह जाने की आदत पड़ गई है. सच कहूं तो बेटे के कहे ये शब्द मेरे दिल में तीर की तरह चुभ गए. ऐसा लगा, कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खो रही हूं. बेटे की मुझसे इमोशनल बॉन्डिंग उतनी मज़बूत नहीं है, जितना कि हमारे पैरेंट्स की हमसे थी.”

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हर चीज़ के एक्सपेरिमेंट की चाह
आज के युवाओं को दोस्तों के साथ मौज-मस्ती और ज़िंदगी में हर चीज़ के एक्सपेरिमेंट की जल्दी रहती है, फिर चाहे वो सिगरेट, शराब का स्वाद चखना हो या किसी से अंतरंग रिश्ते बनाना. उन्हें इन सबमें कोई बुराई नज़र नहीं आती. उन्हें तो ये सब कूल लगता है, मगर व़क्त से पहले ही हर चीज़ जान लेने और हर तरह का एक्सपेरिमेंट कर लेने पर उनकी ज़िंदगी से रोमांच जल्द ही ख़त्म हो जाता है. यंग एज में ही कई पार्टनर के साथ अंतरंग हो जाने वाले युवाओं के लिए शादी की अहमियत भी ख़त्म हो जाती है और यदि ऐसे लोग शादी कर भी लेते हैं, तो उनकी मैरिड लाइफ में प्यार का रूहानी एहसास और रोमांच नहीं रह जाता, क्योंकि ये सब तो वो पहले ही कर चुके हैं. एक ही पार्टनर के साथ ईमानदार रहने वाले व्यक्ति का रिश्ता ऐसे लोगों से कहीं ज़्यादा मज़बूत होता है, जो कपड़ों की तरह पार्टनर बदलते हैं और आजकल के युवाओं में ऐसा ज़्यादा देखा जा रहा है. डॉक्टर प्रवीण कहते हैं, “पता नहीं आजकल की यंग जनरेशन को क्या हो गया है जो किसी एक के साथ रिश्ता निभा ही नहीं पाते. पार्टनर तो ऐसे बदलते हैं जैसे कि वो इंसान न होकर कोई कपड़ा हो. मेरे एक दोस्त ने हाल ही में शादी की थी, मगर शादी के 1 महीने बाद ही उसका तलाक़ हो गया. मेरे फ्रेंड सर्कल में मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है जिनका जितनी जल्दी अफेयर होता है उतनी ही जल्दी ब्रेकअप भी हो जाता है. प्यार नाम की कोई चीज़ रह ही नहीं गई है.”

प्रोफेशन में आगे रिश्तों में पीछे
इस बात में कोई दो राय नहीं है कि आज की युवा पीढ़ी करियर के मामले में अपने पैरेंट्स से कहीं ज़्यादा आगे है. रिलेशनशिप एक्सपर्ट डॉ. राजीव आनंद कहते हैं, “उनके पास ज्ञान का भंडार है, बड़ी-बड़ी डिग्रियां औैर बड़ा पैकेज है. कई तो यंग एज में ही कंपनी में ग्रुप लीडर या सीनियर मैनेजर से लेकर वाइस प्रेसिडेंट तक की ऊंची पोस्ट पर पहुंच जाते हैं. ज़ाहिर है, इतनी कम उम्र में ये बहुत बड़ी उपलब्धि है और यही वजह है कि वो ख़ुद को बहुत जानकार/समझदार मानने लगते हैं. बड़ी पोस्ट व पैकेज जैसी चीज़ें ज़िंदगी के छोटे-मोटे निर्णय लेने में सहायक ज़रूर होती हैं, जैसे- इस कॉफी शॉप में जाएं या कहीं और… वो फिल्म देखें या कोई और… अगर नहीं जमी तो छोड़ देंगे, बाहर आ जाएंगे.. स़िर्फ पैसे ही तो जाएंगे. अपना टाइम क्यों बर्बाद करें. आज के युवा रिश्तों को भी कमॉडिटी (सामान) की तरह ट्रीट करते हैं.” दरअसल, यंग जनरेशन के लिए करियर और अपनी ग्रोथ सबसे ज़्यादा मायने रखती है और रिश्तों की बारी बाद में आती है.

शक़ और शर्तों के साथ शुरू होता रिश्ता
आज की यंग जनरेशन ज़रूरत से ज़्यादा प्रैक्टिकल भी होती जा रही है. उनका प्रैक्टिकल होना प्रोफेशनल लाइफ के लिए तो अच्छा है, मगर पर्सनल के लिए नहीं. हमसफ़र के प्रति प्यार, लगाव और अपनेपन की भावना से ज़्यादा इनके लिए मायने रखता है पार्टनर का पैकेज और प्रॉपर्टी. ये बात दोनों पर लागू होती है. लड़के भी ऐसी लड़की से शादी करना चाहते हैं, जो वर्किंग हो और जिसकी सैलरी अच्छी ख़ासी हो. शादी से पहले आमतौर पर इनके सवाल कुछ ऐसे होते हैं… तुम कितना कमाते/कमाती हो, फ्लैट है या नहीं, पहले किसी से अफेयर था या नहीं, अभी फ्री हो कि नहीं, मेरा ख़्याल रखोगे, किसी और को तो नहीं चाहोगे, बीच में छोड़कर तो नहीं जाओगे? और अगर तुमने किसी भी बात से मुकरने की कोशिश की तो मैं तुम्हें छोड़ दूंगी/दूंगा. अमूमन ऐसी शर्तों के साथ ही रिश्ता शुरू होता है. ज़ाहिर है, बिना विश्‍वास के संदेह और शर्तों के बल पर शुरू हुआ रिश्ता ज़्यादा दिन टिक नहीं पाता.

पैरेंट्स कितने ज़िम्मेदार?
युवाओं के इस रवैये के लिए पैरेंट्स भी ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि उन्हें हमेशा डर रहता है कि कहीं उनका बेटा/बेटी प्रतिस्पर्धा की दौड़ में पिछड़ न जाए, इसलिए उन पर हमेशा और अच्छे अंक लाने और बेहतर परफॉर्म करने के लिए दबाव डालते रहते हैं ताकि वो गर्व कर सकें और ज़्यादा और, और की ये ख़्वाहिश बच्चे की कोमल भावनाओं को मार देती है. वो संवेदनहीन बनते जाते हैं, जिसका असर उनके रिश्ते पर भी होता है. दूसरों से आगे बढ़ने की अपनी इस अंधाधुंध ज़िद्द में वो क्या खो रहे हैं इस बात का एहसास युवाओं को यंग एज में नहीं होता, क्योंकि तब तो स्कोर, मार्क्स, पैकेज ही ज़्यादा मायने रखता है. इमोशन जैसी चीज़ें उनके लिए मायने नहीं रखतीं. रिलेशनशिप एक्सपर्ट डॉ. राजीव आनंद कहते हैं, “लोगों से जुड़ने और रिश्ते बनाने/निभाने का गुण यंग जनरेशन में नहीं है, इसलिए उनके जल्दी-जल्दी ब्रेकअप और दूसरी शादी होती है.” साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ कहती हैं, “इस बात में कोई दो राय नहीं है कि युवाओं के इस बदलते रवैये का कारण पैरेंट्स की एक्सपेक्टेशन्स और उन्हें हमेशा हर चीज़ में बेस्ट करने के लिए दबाव डालना है. देखा जाए तो स़िर्फ युवाओं को ही नहीं, हम सबको फ्लेक्सिब्लिटी और एडजस्टमेंट सीखने की ज़रूरत है.”

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तकनीक और लाइफस्टाइल ने बदली ज़िंदगी
इंटरनेट और वाईफाई के साथ दिन की शुरुआत करने वाली यंग जनरेशन को एक क्लिक पर ही पढ़ाई से लेकर अन्य ज़रूरी जानकारियां मिल जाती हैं. इतना ही नहीं, आजकल तो खाने की चीज़ें भी इंस्टेट या रेडी टु ईट मिलने लगी हैं. अब जब रोज़मर्रा की छोटी-मोटी ज़रूरतें भी इस तरह पूरी होने लगी हैं, तो ज़ाहिर है युवा हर जगह जल्दबाज़ी और स्पीड की ही उम्मीद करेगा, क्योंकि बचपन से ही वो जिस माहौल में रहा है, वहां इंतज़ार और धैर्य जैसी चीज़ें थीं ही नहीं, तो भला अचानक वो ये सब कैसे सीख सकता है. 22 वर्षीय राहुल कहते हैं, “मुझे लाइन में लगना बिल्कुल पसंद नहीं है, इसलिए मैं ट्रेन/फ्लाइट की टिकट से लेकर मूवी टिकट और रेस्टोरेंट की बुकिंग भी ऑनलाइन ही करा लेता हूं. इससे काम जल्दी होता है और मेरा टाइम भी बच जाता है.” निश्‍चय ही टेक्नोलॉजी ने कुछ चीज़ें आसान बना दी हैं, मगर संतुलन के अभाव में ज़िंदगी की सहज़ रफ़्तार प्रभावित हो रही है. साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ कहती हैं, “आज जब हम बच्चों को दो मिनट में नूडल्स सर्व कर रहे हैं, तो ज़ाहिर है वो हर चीज़ दो मिनट में ही मिलने की उम्मीद करेंगे.
आज की जनरेशन किसी भी चीज़ को देर तक खींचने में विश्‍वास नहीं करती, उन्हें तुरंत नतीजा चाहिए. वो बहुत ज़्यादा प्रैक्टिकल हैं, यही वजह है कि उनका भावनात्मक पक्ष कमज़ोर होता जा रहा है. उनका प्रैक्टिकल डिसिज़न उन्हें इमोशनलेस बना रहा है.”

ख़त्म होती ज़िंदगी की सहज रफ़्तार
पहले बच्चे धीरे-धीरे बड़े होते थे, मगर अब तो वो छोटी उम्र में ही ज़रूरत से ज़्यादा समझदार बनने लगे हैं. माता-पिता दोनों के वर्किंग होने के कारण छोटी उम्र से ही बच्चे आत्मनिर्भर बन जाते हैं, अपना काम ख़ुद करने लगते हैं. फिर कॉलेज ख़त्म होते-होते किसी बड़ी कंपनी में अच्छे ख़ासे पैकेज पर प्लेसमेंट मिल जाती है, कम उम्र में बड़ी पोस्ट और पैकेज… शुरू-शुरू में तो बहुत ख़ुशी मिलती है, मगर कुछ ही दिनों में ये सब बोर लगने लगता है, क्योंकि उनके पास नया करने के लिए कुछ बचा ही नहीं होता. ढेर सारी दौलत होेने के बावजूद उनकी ज़िंदगी में सुकून व ख़ुशी नहीं मिलती, क्योंकि जल्दबाज़ी और सबसे आगे निकलने की होड़ में वो अपनों का साथ और छोटी-छोटी ख़ुशियों को एन्जॉय करना भूल जाते हैं. दोस्तों के साथ कॉलेज टाइम में मस्ती न कर पाना, पढ़ाई के कारण पिकनिक के लिए ना करना, पहली वेडिंग एनिवर्सरी मिस करने का दुख बरसों बाद जब महसूस होता है, तब लगता है ज़िंदगी के बेहद अनमोल पल खो दिए, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.
यदि तकनीक, ज्ञान, क़ामयाबी और रिश्तों में थोड़ा-सा समन्वय स्थापित कर लिया जाए, तो शायद ज़िंदगी की सहजता को बनाए रखा जा सकता है.

आई क्यू नहीं, ई क्यू है ज़रूरी
आपने आई क्यू (बौद्धिक स्तर) के बारे में तो सुना ही होगा, हर इंसान का आई क्यू लेवल अलग-अलग होता है. मगर नए-नए गैजेट्स ने आई क्यू की अहमियत घटा दी है, क्योंकि अब शब्दावली, गणना और चीज़ें याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती, सब कुछ एक क्लिक पर उपलब्ध है. अब आई क्यू से ज़्यादा ज़रूरी हो गया है ई क्यू (इमोशनल क्वोशन्ट). यानी चीज़ों को याद रखना इतना ज़रूरी नहीं है जितना कि दूसरों की भावनाओं को समझना और रिश्तों को मैनेज करना. हो सकता है, अगले कुछ सालों में हमें अपनी यंग जनरेशन को भावनाओं और रिश्तों के बारे में एजुकेट करना पड़े.
– माधवी सेठ, साइकोलॉजिस्ट

 

– कंचन सिंह