बॉलीवुड के फाइनेस्ट एक्टर्स में से एक इरफान खान (Irrfan Khan) को इस दुनिया को अलविदा कहे आज 6 साल (Irrfan Khan's death anniversary) हो गए हैं. आज ही के दिन यानी 29 अप्रैल, 2020 को एक्टर कैंसर से जंग हार गए थे और सिनेमा का एक नायाब सितारा हमेशा के लिए खामोश हो गया था. अपनी मौत से पहले इरफान खान ने अस्पताल से कुछ खत (Irrfan Khan's last letter) लिखे थे, जिसे पढ़कर किसी की भी आंखें नम हो जाती हैं. यह खत इरफान ने तब लिखा था जब वो अपनी जिंदगी की सबसे कठिन जंग लड़ रहे थे. दर्द उन्हें जीने नहीं दे रहा था और ज़िंदगी के प्रति प्यार उन्हें मरने से रोक रहा था. उस मुश्किल हालात में उन्होंने शारीरिक और मानसिक दर्द को खत के जरिए शब्दों में बयां किया था.

इरफान खान (Irrfan Khan) को जब अपने कैंसर (Cancer treatment) के बारे में पता चला तो उन्होंने इंग्लैंड के अस्पताल से ये खत लिखे थे. जब उन्हें कैंसर के बारे में पता चला तो उन्होंने लिखा था, "कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला था कि मुझे न्यूरो एन्डोक्रिन कैंसर है. मैंने पहली बार ये शब्द सुना था. खोजने पर मैंने पाया कि इस शब्द पर ज़्यादा रिसर्च नहीं हुई है. ये बहुत रेयर कंडीशन थी, इसलिए इसका इलाज भी मुश्किल था." उन्होंने कहा, "अभी तक मैं तेज़ रफ़्तार वाली ट्रेन में सफर कर रहा था. मेरे कुछ सपने थे, कुछ प्लान्स थे, कुछ इच्छाएं थीं, कुछ लक्ष्य थे. लेकिन अचानक किसी ने मेरे कंधे पर थपथपाया. मैंने मुड़कर देखा तो वो टीसी था. उसने कहा, 'आपका स्टेशन आ रहा है, प्लीज उतर जाएं.' मेरी समझ में नहीं आया, मैंने कहा, नहीं नहीं ये मेरी मंज़िल नहीं. तो जवाब मिला, 'आपकी मंज़िल आ गई है, आपको किसी भी स्टेशन पर उतरना होगा. जिंदगी कभी कभी ऐसे ही होती है. अचानक एहसास हुआ कि आप किसी कॉर्क की तरह अनजान सागर में लहरों पर बह रहे हैं इस गलतफहमी के साथ कि लहरों को काबू कर लेंगे."

इरफान ने खत में आगे लिखा कि उन्होंने डरकर, घबरा कर अपने बेटे से कुछ बातें शेयर की थीं, "इस डर और दर्द के बीच मैं अपने बेटे से कहता हूं, मैं किसी भी हालत में ठीक होना चाहता हूं. मुझे अपने पैरों पर वापस खड़े होना है. मुझे ये डर और दर्द नहीं चाहिए."

खत के एक हिस्से में इरफान ने लिखा, "कुछ हफ्तों के बाद मैं एक अस्पताल में भर्ती हो गया. बेइंतहा दर्द हो रहा है. ये तो मालूम था कि दर्द होगा, लेकिन ऐसा दर्द... कुछ भी काम नहीं कर रहा है. ना कोई सांत्वना और ना कोई दिलासा. दर्द खुदा से भी बड़ा महसूस हो रहा है. मैं जिस अस्पताल में हूं, उसमें बालकनी भी है. बाहर का नजारा दिखता है. सड़क की एक तरफ मेरा अस्पताल है और दूसरी तरफ लॉर्ड्स स्टेडियम है. वहां विवियन रिचर्ड्स का मुस्कुराता पोस्टर है. मेरे बचपन के ख्वाबों का मक्का, उसे देखने पर पहली नजर में मुझे कोई एहसास ही नहीं हुआ. मानो वो दुनिया कभी मेरी थी ही नहीं. इस एहसास ने मुझे समर्पण तैयार किया. अब चाहे जो भी नतीजा हो, ये चाहे जहां ले जाये, आज से आठ महीनों के बाद, या आज से चार महीनों के बाद या फिर दो साल... मेरे दिमाग से जीने मरने का हिसाब किताब निकल गया."

इरफान ने अपने खत के जरिए बताया कि बीमारी से जूझते हुए आजादी की अहमियत क्या होती है, "पहली बार मुझे शब्द आज़ादी का एहसास हुआ, सही अर्थ में! एक उपलब्धि का एहसास. इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया. उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरी एक एक कोशिका में पैठ गया. वक्त ही बताएगा कि वह ठहरता है या नहीं. फिलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूं."

बीमारी के दौरान लोगों से मिल रहे प्यार का ज़िक्र भी उन्होंने अपने खतों में किया. उन्होंने सबका शुक्रिया भी अदा किया था. "कई बार जीतने की दौड़ में हम यह भूल जाते हैं कि प्यार पाना कितना महत्व-पूर्ण होता है. अब मैं जिंदगी के उन पड़ावों पर अपने पैरों के निशान छोड़ता हूं और आप सबके प्यार और सहयोग के लिए धन्यवाद कहना चाहता हूं."
आज 29 अप्रैल को इरफान खान को दुनिया छोड़े हुए छह साल हो गये हैं, लेकिन आज भी उनकी यादें दिलों में ज्यों की त्यों बसी हुई हैं. आज भी उनके खत के ये टुकड़े कलेजा चीर कर रख देते हैं, क्योंकि इरफान का लिखा ये खत, खत नहीं, दर्द है.
