इस प्रकार सरदार नारायण सिंह की मेहरबानियां एक जाल की तरह चारों ओर फैली हुई थी. वे प्रतीक्षा में रहते कि कब जाल के किसी हिस्से में तनाव पैदा हो और वे वहां पहुंचकर उसके धागों को टूटने से बचाएं.
कांटेदार तार से घिरी यह ज़मीन, जिस पर आज सरदार नारायण सिंह का दुमंजिला मकान, सात चालें और कुछ खाली प्लॉट पड़े हैं. पहले धान का एक खेत होता था. सावन की पहली बरसात में जब यह खेत पानी से भर जाता, तो शंकर और उसका बूढ़ा बाप और उनके परिवार के अन्य व्यक्ति इसमें धान बोते. फिर इस खेत की हरियाली बरसात की फुहारों में निखर उठती और उस हरियाली में सूरज का सोना चमकने लगता. अंत में उस धान को शंकर और उसका बूढ़ा बाप और उसकी तीन बहनें और चार बेटियां बांहें भर-भर कर संभालते और उनकी छोटी सी झोपडी चावलों से भर जाती.
कई पीढ़ियों से यह खेत उनका अपना था. इस खेत के सिर पर कितनी ही बार उन्होंने क़र्ज़ उठाया था और अपने बेटे-बेटियों के ब्याह किए थे. मेहनती हाथ और अमृत जैसी वर्षा और उपजाऊ मिट्टी की बदौलत आख़िर यह क़र्ज़ उतरता रहा था.
इसी खेत के सिर पर क़र्ज़ ली हुई रक़म से शंकर की शादी हुई थी. इसी खेत के सिर पर उसने अपनी तीनों बहनें ब्याही थीं. इसी खेत के सिर पर उसकी दो बेटियों के ब्याह हुए थे और अभी इसी खेत के सिर पर उसे जवान हो रही दो और बेटियों के ब्याह करने थे. लेकिन, इस बार सरदार नारायण सिंह की दी हुई क़र्ज़ की रक़म उतर न सकी.

पिछले आठ वर्षों से वह उनके बहीखाते में सूद दर सूद ब्याज जनती रही थी और आख़िर फैलती हुई जैसे इस खेत पर छा गई थी, तब अगले वर्ष इस खेत के गिर्द कांटेदार तार लगा दिए गए थे. फिर सरदार नारायण सिंह ने इसके कुछ प्लॉट बनाए, उसमें से कुछ एक बेचकर शंकर और उसके बूढ़े बाप को दी हुई ब्याज समेत अपनी रक़म वसूल की और ज़मीन के एक कोने में अपने लिए दुमंजिला मकान और बाकी हिस्से में सात चालें बनवाकर किराए पर चढ़ा दी, जिनमें आजकल चालीस-बयालीस कुटुम्ब रह रहे हैं. वह धान का खेत, जिस पर सरदार नारायण सिंह की कई वर्षों से नज़र लगी हुई थी, आख़िर उनकी मिल्कियत बन गया था.
सरदार नारायण सिंह को ख़ुशी थी कि बम्बई जैसे शहर में, जहां मकानों की इतनी किल्लत रहती है, उन्होंने अपने वतन से उजड़कर आए शरणार्थियों को अपने यहां घर देकर बसाया था. यह ज़मीन, जिस पर पहले एक परिवार का ही निर्वाह होता था, आज कई परिवारों को आश्रय दे रही थी, इनमें से कई परिवारों को सरदार नारायण सिंह ने रुपया देकर सहायता की थी. उन्होंने कितनों को पैरों पर खड़ा किया था, कितनों के रुके हुए काम चलाए थे, उनके पास आकर कभी कोई खाली हाथ नहीं गया था. इस इलाके के गुरुद्वारे में उनसे ज़्यादा दान आज तक किसी ने नहीं दिया था. जब उनकी यह चालें बनी थी, तो उन्होंने ख़ास तौर पर एक कमरा गुरुद्वारे के नाम भेंट किया था और गुरुद्वारा, जो पहले किराए के एक कमरे में था, यहां आ गया था. गुरुवारे के दरवाज़े के ऊपर सरदार नारायण सिंह की स्वर्गवासी माता का नाम लिखा हुआ था और उनकी ओर से दान में दिए गए इस कमरे का ज़िक्र था.
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अपनी तिरपन वर्ष की आयु में जब सरदार नारायण सिंह दुनियादारी के कामों की तरफ़ से मुंह मोड़ने लगे थे. वे रोज़ सुबह-शाम अपनी छड़ी के सहारे थोड़ा सा लंगड़ाते हुए गुरुद्वारे में जाते. बहुत समय पहले एक दुर्घटना में टांग टूट जाने के कारण वे लंगड़ाकर चलने लगे थे. दरवाज़े की दहलीज़ से ही वे माथा टेकना शुरू करते और जैसे रेंगते हुए 'गुरु ग्रन्थ साहब' की हजूरी में पहुंचते और फिर देर तक आंखें बंद किए वहां बैठे रहते.
जब वे आंखें मूंदें मन-ही-मन पाठ कर रहे होते, तो कभी उनके सामने उनकी बदसूरत जवान बेटी आ जाती, जो उनकी दूसरी पत्नी से थी और जिसके ब्याह की चिंता बढ़ती ही जा रही थी. साथ ही उनके सामने अपने तीसरे ब्याह से हुए दोनों बेटे आते और उनकी मराठन मां आती (जो दो साल हुए मर चुकी थी) तब उनको बड़ा सूना सूना-सा लगता.
आस-पड़ोस के सभी लोग इस बात की प्रशंसा करते थे कि सरदार नारायण सिंह को कभी दूध या राशन जैसी दूसरी चीज़ें ख़रीदनी नहीं पड़ती थी. ये सब चीज़ें उनके घर मुफ़्त ही आ जाती थीं. दूधवाले भइए को उन्होंने तीन सौ रूपए क़र्ज़ दिए हुए थे, उसके ब्याज के बदले में उनके यहां मुफ़्त दूध आता था. अपनी चाल में बस रहे, पेशावर से आए एक शरणार्थी को उन्होंने पांच सौ रुपए देकर राशन की दुकान खुलवाई थी. उससे वे कोई ब्याज नहीं लेते थे और वह हर महीने उनका ज़रूरी राशन उनके घर पहुंचा देता था.
दसवीं में पढ़ रहे एक ग़रीब लड़के की उन्होंने सालभर के लिए हर महीने फीस देनी मंज़ूर कर ली थी और वह लड़का कृतज्ञता स्वरूप उनके लड़कों को पढ़ा जाया करता था. एक गोरखा, जिसे कोई काम नहीं मिल रहा था और जिसे सरदार नारायण सिंह ने रात के समय अपने और आसपास के घरों की रखवाली करने के लिए नौकरी दिलवाई थी, दिन के समय उनके घर का छोटा-मोटा काम कर जाता था.
इस प्रकार सरदार नारायण सिंह की मेहरबानियां एक जाल की तरह चारों ओर फैली हुई थी. वे प्रतीक्षा में रहते कि कब जाल के किसी हिस्से में तनाव पैदा हो और वे वहां पहुंचकर उसके धागों को टूटने से बचाएं.

एक बार जाल में एक तरफ़ तनाव पैदा हुआ, तो दूधवाले भइए के साथ उनका झगड़ा हो गया कि वह दूध में पानी डालकर देता है. तब उन्होंने उसका दूध बन्द कर दिया और अपनी रक़म मांगी. दूधवाला पिछले ढाई साल से ब्याज से तिगुने मोल का दूध दे चुका था. उसने सरदार नारायण सिंह से हिसाब करने के लिए कहा, हिसाब अदालत में हुआ. क्या सबूत था कि उसे दूध के पैसे नहीं मिले थे?
तीन सौ रुपए का काग़ज़, जिस पर ढाई साल पहले उसने अंगूठा लगाया था, पता नहीं कैसे अदालत में ब्याज समेत साढ़े पांच सौ रुपए का बन गया. दूसरी पेशी में ही फ़ैसला हो गया. दूधवाला एक साथ इतने रुपए नहीं दे सकता था, सो उसकी एक नई जनी भैंस सरदार नारायण सिंह के यहां आ गई, जिसके लिए कुछ दिन पहले से ही उन्होंने टीन का एक छपरा बनवाना शुरू कर दिया था.
उस भैंस के दूध का एक लोटा रोज़ सुबह गुरुद्वारे जाता और एक लोटा चाल के कमरा नं, बारह में बस रहे एक परिवार के लिए जाता. उस कमरे में पंजाब के फ़सादों में तबाह हुआ बंता सिंह अपने परिवार समेत रहता था. उसकी अधेड़ उम्र की पत्नी दमे की मरीज़ थी और तेईस वर्ष की बड़ी बेटी, अनूप कौर उसकी सबसे बड़ी चिंता थी. दो और छोटी बेटियां थीं और एक बेटा था, जिन्हें पढ़ाने-लिखाने का अरमान अब बंता सिंह के दिल में दब कर ही रह गया था. जहां पेट भरने के लिए रोटी का अभाव हो, वहां शिक्षा का सवाल ही कैसे पैदा हो सकता था. सिर्फ़ सरदार नारायण सिंह का ही सहारा था कि वे आज तक दिन काटते आ रहे थे. कपड़े का व्यापार करने के लिए एक हज़ार रुपए की रकम उन्होंने बंता सिंह को दी थी. पंजाब में बंता सिंह का गांव उनके अपने गांव से सिर्फ़ दो कोस के फ़ासले पर था. सो पड़ोस की बात ठहरी, बंता सिंह कपड़ों का गट्टा उठाए गलियों, बाजारों में घूमता. शाम को उसका वृद्ध शरीर थक कर चकनाचूर हो जाता. उसकी टांगें टूटने लगतीं, सो उसने कपड़े की मार्केट में दुकान खोलनी चाही. दुकान का साठ रुपए किराया तो वह शायद दे लेता, लेकिन डेढ़ हज़ार रुपए पगड़ी? तब सरदार नारायण सिंह को उसकी वृद्धावस्था पर तरस आया और उसकी दमे की बीमार पत्नी और उसके चारों बच्चों के लिए उनका दिल पसीज उठा. उन्होंने बंता सिंह को पगड़ी के लिए डेढ़ हजार रुपए का और क़र्ज़ देना मंज़ूर कर लिया.
अब बंता सिंह दुकान पर बैठा अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखता हुआ ग्राहकों की प्रतीक्षा करता. उसकी रूखी-सूखी रोटी चल जाती. बंता सिंह सोचता कि दुकान ठीक तरह चल जाए, चार पैसे जमा हो जाएं, तो कुछ और रुपए सरदार नारायण सिंह से लेकर अनूप के हाथ पीले कर दे. उसकी नज़र में एक योग्य लड़का भी था, जो उसी मार्केट में दुकानदारी करता था. कहीं पंजाब का बंटवारा न हुआ होता, तो वह कितनी धूमधाम के साथ बेटी का ब्याह करता, कभी आसपास के गांवों के अच्छे-अच्छे परिवार उससे सम्बन्ध जोड़ने के लिए तरसा करते थे और अनूप कौर भी खऊं-खऊं करती अपनी मां के सिरहाने बैठी या रोटियां पकाती हुई कभी सोचती कि क्यों न उसका उन दंगे-फ़सादों में ही अन्त हो गया. वह आज अपने बूढ़े मां-बाप पर कितना बड़ा बोझ है. उसकी आंखें यद्यपि पहले जैसी ही बड़ी-बड़ी थीं, लेकिन अब उनकी चमक धुंधली पड़ गई थी. उसकी हंसी की खनक यद्यपि अभी भी वैसी ही थी, लेकिन अब हंसने के बहुत कम मौक़े आते थे. उसकी जवानी की उमड़ती हुई बाढ़ जब बेकाबू हो जाती, तो उसकी आंखों के सामने अंधकार फैलने लगता...
आख़िर वह अंधकार फटता, तो उसके सामने दो आंखें आती. कितना बड़ा संसार था उन दो आंखों में, उसके सामने तुर्रेवाली तरबूजी रंग की पगड़ी आती, जिस पर लगे अबरक की चमक उसकी आंखों को चुंधिया देतीं. फिर वह देखती उन शहद रंगी आंखों के नीचे एक तीखी नाक और हल्के भूरे रंग की रेशम जैसी मुलायम दाढ़ी और गले में बंधा काला धागा और उसके साथ लटका हुआ सोने का ताबीज़ और... और फिर पंजाब में फ़साद और लहू की बाढ़, जिसमें यह सब कुछ बह गया था. आख़िर वह ख़ुद भी उस लहू की बाढ़ में क्यों न बह गई? चारों तरफ़ लगी आग में क्यों न जलकर राख हो गई?
लेकिन वह आग, जिसमें वह जल नहीं सकी थी, अब उसको निगलने के लिए आई लकड़ी के खोखों की बनी वह मार्केट, जिसमें बंता सिंह की दुकान थी, एक रात अचानक आग पकड़ गई. डेढ़ हजार रुपए पगड़ीवाले लकड़ी के वे खोखे, जिनमें कपड़ा भरा पड़ा था, फायर ब्रिगेड के आने के पहले ही राख हो गए. बाद में, बेशक सुना गया कि वह आग सेठ रमणलाल ने लगवाई थी, जिसने वह ज़मीन लीज पर लेकर पंजाबी और सिन्धी शरणार्थियों के लिए लकड़ी के खोखों की मार्केट बनवाई थी, और जो अब तीन-तीन हज़ार रुपया पगड़ी लेकर वहां पक्की मार्केट बनवाने की योजना बना रहा था.
लेकिन बंता सिंह तो अपने परिवार सहित उस आग में झुलस गया था. अब सरदार नारायण सिंह भी तो उसे और रुपया नहीं दे सकते थे. अगर ब्याज छोड़ भी दिया जाए, तो भी उनका नकद ढाई हज़ार रुपया डूब रहा था. आख़िर बंता सिंह इस बुढ़ापे में कौन सा काम करके यह रक़म उतार सकता था? और फिर ऊपर से पत्नी की बीमारी और परिवार का ख़र्च...
सरदार नारायण सिंह ने बंता सिंह की एक बार फिर मदद की. उन्होंने सलाह दी कि वह पंजाब चला जाए. बम्बई शहर उसको रास नहीं आ सकता. बम्बई की हवा तो दमे के रोगी के लिए मौत के बराबर है और फिर बम्बई में छोटे-मोटे व्यापार की कोई सम्भावना भी नहीं है. पंजाब जाकर वह किसी शहर में कोई छोटा-मोटा व्यापार शुरू करे, इसके लिए सरदार नारायण सिंह ने उसे दो हज़ार रुपए की और मदद देने का वादा किया, लेकिन पिछली रकम? ब्याज छोड़ भी दिया जाए, तो भी पूरे ढाई हज़ार रुपए.
सरदार नारायण सिंह ने बन्ता सिंह को इसके बारे में भी सलाह दी.
आख़िर जिस दिन बंता सिंह को अपने कुटुम्ब समेत पंजाब के लिए रवाना होना था, उसके एक सप्ताह पहले सरदार नारायण सिंह का चौथी बार ब्याह हुआ और अनूप कौर उस चौथी चाल के कमरा नम्बर बारह से सरदार नारायण सिंह के दुमंजिले मकान में आ गई.
- सुखबीर
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