हमारी समस्याओं की जड़ बाहर नहीं, हम स्वयं हैं, “मैं अच्छा हूं” और “मैं बुरा हूं”- दोनों ही धारणाएं समस्या को जन्म देती हैं. जैसे ही हम स्वयं को अच्छा घोषित करते हैं, दुनिया स्वतः संदिग्ध लगने लगती है. फिर हमें हर दूसरा व्यक्ति लापरवाह, स्वार्थी, असंवेदनशील और संस्कारहीन दिखाई देता है.
सुबह के सात बजे हैं. कॉलोनी के पार्क में पक्षी चहचहा रहे हैं, पेड़ ऑक्सीजन छोड़ रहे हैं और हमारे गुप्ता जी अपने अनुभव. कभी-कभी जीवन ऐसे मोड़ पर पहुंचा देता है, जहां हंसी, झुंझलाहट और प्रेम- तीनों एक साथ बैठ कर चाय पीते दिखाई देते हैं. हमारे गुप्ता जी भी कुछ ऐसे ही दिलचस्प क़िरदार हैं. पोती को खिलाना उनका सबसे बड़ा शौक है और बोलना… वह तो उनका जन्मसिद्ध अधिकार है.
सवा साल की पोती को लेकर जैसे ही बाहर निकलते हैं, उनका मुखारविंद स्वतः उद्घाटित हो जाता है-
“अरे… रुको… जूते तो पहन लो!”
“टोपी कहां है?”
“बाहर मत भागो…”
“हमें मत दौड़ाओ… हमारे घुटनों में दर्द है…” “हमारे पैर जवाब दे चुके हैं…”
ध्यान रहे- यह संवाद पोती से कम, ब्रह्मांड से अधिक होता है, क्योंकि पोती अभी केवल दो ही काम जानती है- खिलखिलाना और भागना.
लेकिन गुप्ता जी हैं कि सलाहों का रेडियो बंद होने का नाम नहीं लेता. गुप्ता जी का दर्द भी बड़ा लोकतांत्रिक है. सीढ़ियां चढ़ते समय, बाज़ार जाते समय, पोती के पीछे भागते समय- हर जगह उपस्थित रहता है, पर जैसे ही शाम को दोस्तों के साथ चाट खाने जाना हो या टीवी पर क्रिकेट का रोमांचक मैच हो, घुटनों में राष्ट्रभक्ति लौट आती है.
मैंने एक दिन मज़ाक में कहा,“आपके घुटनों का दर्द बड़ा संस्कारी है. ज़िम्मेदारी देखते ही बढ़ जाता है और मनोरंजन देखते ही गायब.”
गुप्ता जी ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने उनके रेडियो पर प्रतिबंध लगा दिया हो.
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सच तो यह है कि जीवन की अधिकांश समस्याएं गुप्ता जी के घुटनों जैसी ही होती हैं. आधी वास्तविक… आधी मानसिक… और बाकी सामाजिक प्रदर्शन!
हम समस्या से कम, उसकी घोषणा से अधिक परेशान रहते हैं. हमारी सबसे बड़ी समस्या, समस्या नहीं, उसका भावनात्मक प्रसारण है.
जैसे ही हम किसी परिस्थिति को स्वीकार करते हैं, उसका आतंक आधा हो जाता है. हमारे जीवन में हर चुनौती अपने भीतर समाधान का बीज लेकर आती है. अक्सर समस्या का स्वरूप उतना बड़ा नहीं होता, जितना बड़ा हम अपनी प्रतिक्रिया से उसे बना देते हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समस्या को स्वीकार करते ही उसका आधा समाधान अपने आप सामने आ जाता है.
“हां, यह है…” इतना कह देना ही भीतर की लड़ाई शांत कर देता है.
उदाहरण के लिए, यदि हमें लगता है कि “पॉल्यूशन बहुत है…” तो उसके बारे में चिंता करते रहने से कुछ नहीं बदलता. लेकिन जैसे ही हम स्वीकार करते हैं, “यह है… अब मुझे इससे कैसे बचना है?” तो समस्या एक कदम उठाने योग्य बन जाती है. स्वीकार करना समाधान की शुरुआत है.
समाधान तभी मिलता है जब मन शांत हो, बुद्धि स्थिर हो, हम कार्यशील हों, आलस्य दूर हो और हमें अपनी आंतरिक शक्ति या ईश्वरीय ऊर्जा पर दृढ़ विश्वास हो.
विश्वास + बुद्धि + कर्म = समाधान
हमारी समस्याओं की जड़ बाहर नहीं, हम स्वयं हैं, “मैं अच्छा हूं” और “मैं बुरा हूं”- दोनों ही धारणाएं समस्या को जन्म देती हैं.
जैसे ही हम स्वयं को अच्छा घोषित करते हैं, दुनिया स्वतः संदिग्ध लगने लगती है. फिर हमें हर दूसरा व्यक्ति लापरवाह, स्वार्थी, असंवेदनशील और संस्कारहीन दिखाई देता है.
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यदि हम स्वयं को बुरा मान लें, तब भी समस्या; मन ग्लानि का गोदाम बन जाता है.
ना स्वयं को श्रेष्ठ मानें, ना ही हीन; स्वयं का आकलन करें, समझें, स्वीकार करें!
अंततः जीवन वही है, जो हम अपने विचारों से बनाते हैं. इसलिए जीवन का सबसे कठिन अभ्यास यही है- न स्वयं को भगवान समझो, न बेकार सामान. बस मनुष्य समझो.
– नील मणि

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