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युवा क्यों चुन रहे हैं अपराध की अंधेरी राह? (Why are the youth choosing the dark path of crime?)

आज जिस तरह प्रेम संबंधों, वैवाहिक रिश्तों और निजी विवादों में हत्या, साजिश, धोखा और हिंसा की घटनाएं सामने आ रही हैं वो स़िर्फ क़ानून-व्यवस्था का विषय नहीं है. ये समाज के मानसिक और नैतिक स्वास्थ्य का भी प्रश्‍न है? आख़िरकार युवाओं के इस प्रवृत्ति के लिए कौन है ज़िम्मेदार?

पिछले दिनों लोनावला के लोहागढ़ किले में हुए रियल एस्टेट बिज़नेसमैन केतन अग्रवाल हत्याकांड में पुणे पुलिस ने कई बड़े खुलासे किए. शुरुआत में इसे ट्रेकिंग के दौरान हुआ हादसा माननेवाली पुलिस ने बाद में केतन की मंगेतर सिया गोयल और उसके प्रेमी चेतन चौधरी को हत्या की साजिश रचने और अंज़ाम देने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया. पढ़े-लिखे युवाओं में कहां से आता है ऐसा खौफ़नाक क्रिमिनल माइंडसेट? यह गंभीरता से सोचने वाली बात है.

आए दिन जिस तरी़के से नई उम्र के युवा आपराधिक घटनाओं को अंज़ाम दे रहे हैं, यह चिंता का विषय है. चाहे वह हनीमून पर अपने पति को पहाड़ी से धक्का देने वाली सोनम रघुवंशी हो या नीले ड्रम में पति की लाश को भरने वाली मुस्कान हो. इन सभी में एक ही बात कॉमन है इन्होंने अपने प्रेमी के लिए पति को मार डाला. इस संदर्भ में हमने साइकेट्रिस्ट डॉ. दिव्या एम. पी. सेे विस्तार से बातचीत की और उन्होंने इसके बारे में मनोवैज्ञानिक रूप से कई पहलुुओं पर प्रकाश डाला.

जब अच्छे परिवारों के पढ़े-लिखे युवा ऐसा कदम उठाते हैं, तो समाज में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आख़िर यह क्रिमिनल माइंडसेट आता कहां से है? कोई इंसान इस हद तक क्रूर और शातिर कैसे हो सकता है? इस बारे में डॉ. दिव्या का क्या कहना है-
- ऐसे युवा जो प्यार में होते हैं और प्यार के लिए कुछ भी कर गुज़रते हैं, दरअसल उनके लिए इस समय शादी करना लाइफ और डेथ का ही प्रश्‍न होता है, क्योंकि वे अपनी फीलिंग्स में इतना आगे निकल चुके होते हैं कि उन्हें लगता है, जो करना है बस अभी करना है. हमारे पास कोई और ऑप्शन नहीं है.
- पैनिक में आकर वे इस तरह का कदम उठाते है, क्योंकि फैमिली उनकी सुन नहीं रही होती है. फैमिली की बात वे मान नहीं सकते. अब बचा क्या? स़िर्फ अपने रास्ते का कांटा जिसे किसी भी क़ीमत पर हटाकर वे अपनी नॉर्मल लाइफ जीना चाहते हैं और उन्हें लगता है हमें ऐसा करने का पूरा अधिकार है. हम ऐसा कर पाएंगे, क्योंकि हमारी परफेक्ट प्लानिंग हमें अपराध करने के बाद बचा भी लेगी और इससे फैमिली और समाज का भी प्रेशर नहीं रहेगा और हम जो चाहते हैं, उसके रास्ते आसानी से खुल भी जाएंगे.
- ऐसे लोग एंटी सोशल पर्सनैलिटी के होते हैं, जिससे उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे क्या कर रहे हैं और उसका उनकी पूरी लाइफ और समाज पर क्या असर पड़ेगा? किसी का बच्चा मार देने से उनकी पूरी लाइफ ख़त्म हो जाएगी? वे इस तरह की इमोशनल बातों को सोच ही नहीं पाते हैं.
- उन्हें सही-ग़लत में डिफरेंस करना नहीं आता. उन्हें बस यही पता है, जो हम कर रहे हैं वही सही है, क्योंकि ऐसा करना हमारी ज़रूरत है. हम मजबूर हैं ऐसा करने के लिए. ऐसे में अपराध हो जाने के बाद भी उन्हें नहीं लगता कि हमने कुछ ग़लत किया है. यही कारण है उन्हें अपने किए का पछतावा भी नहीं होता है.

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परवरिश किस माहौल में हुई यह भी मायने रखता है
- अत्यधिक कठोर या बहुत ज़्यादा लाड़-प्यार वाली परवरिश, जहां बच्चे को अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना नहीं सिखाया गया. यदि बचपन के दौरान ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ की नींव ठीक से न रखी जाए, तो आगे चलकर डार्क ट्रायड (Narcissism, Machiavellianism, Psychopathy) जैसे लक्षण विकसित होने का ख़तरा बढ़ जाता है.
- जहां प्यार की जगह केवल अनुशासन और डर हो. जहां घर पर बच्चों को अपनी बात कहने का अधिकार ही न हो, उनकी कोई सुनता ही नहीं हो... वह कहते कुछ नहीं, लेकिन मन ही मन विद्रोही हो जाते हैं और चुपचाप किसी से बिना कुछ कहें एक बड़ी घटना को अंज़ाम दे बैठते हैं.
- ज़्यादा लाड़-प्यार मिले, तो भी ऐसे बच्चे यह मानने लगते हैं कि वे दूसरों से श्रेष्ठ हैं और उनके लिए नियम अलग हैं. यहां से नार्सिसिज्म यानी आत्ममुग्धता विकसित होता है. बचपन का ऐसा वातावरण हिंसक या शातिर माइंडसेट को जन्म दे सकता है.

न्यूरोलॉजिकल कारक
आम लोगों में अपराधबोध और डर का एक मानसिक फिल्टर होता है, जो उन्हें ग़लत काम करने से रोकता है. साइकोपैथ में यह फिल्टर या तो होता ही नहीं या बहुत कमज़ोर होता है. शोध बताते हैं कि साइकोपैथ के मस्तिष्क में एमिग्डाला, जो भावनाओं और डर को नियंत्रित करता है, का कार्य सामान्य लोगों की तुलना में अलग हो सकता है. यही वजह है कि वे इस तरह के अपराध बिना डरे और घबराएं आराम से कर गुज़रते हैं.

'Cognitive Dissonance' की थ्योरी
मनोवैज्ञानिक लियोन फेस्टिंगर द्वारा प्रतिपादित यह थ्योरी बताती है कि जब हमारे ‘कार्य’ (हत्या जैसे अपराध) और हमारे ‘विचार’ (मैं एक अच्छा इंसान हूं) आपस में टकराते हैं, तो दिमाग़ में भारी तनाव पैदा होता है. इस तनाव को कम करने के लिए अपराधी एक मानसिक ढाल तैयार करता है. इसमें अपराधी ख़ुद को ग़लत नहीं मानता, बल्कि उसे लगता है ये करना ज़रूरी था, क्योंकि मैं तो एक अच्छा इंसान हूं. लेकिन सामने वाला मुझे तंग कर रहा था या फिर मेरे प्यार के रास्ते में रुकावट बन रहा था. उसे लगता है ‘मैंने अपराध नहीं किया, बल्कि मैं तो ख़ुद को प्रोटेक्ट कर रहा था, जो मेरा अधिकार है...’ इसलिए उसे लगता है उसने कुछ ग़लत नहीं किया. अपने ग़लत काम को दिमाग़ में जायज़ ठहराने की यह साइंटिफिक प्रोसेस ही उन्हें बिना किसी डर या पछतावे के इतना बड़ा मर्डर करने की हिम्मत देती है.

दया का ना होना
साइकोपैथी में अपराध आवेग से नहीं, बल्कि इरादे से होता है. वे योजना बनाते हैं, वे इंतज़ार करते हैं और वे पूरी तरह शांत रहकर अपने लक्ष्य को अंज़ाम देते हैं. हत्या के बाद भी उनकी धड़कन सामान्य रहती है, क्योंकि उनके दिमाग़ में ‘पछतावा’ पैदा करनेवाली भावनाएं सक्रिय ही नहीं होतीं. इनके अंदर अपने द्वारा किए गए किसी भी अपराध के लिए कोई पछतावा नहीं होता और न ही किसी दूसरे व्यक्ति का दर्द और तकलीफ़ इन्हें महसूस होती है. इनका लक्ष्य केवल अपनी योजना को पूरा करना होता है. इसके आलावा कुछ नहीं. इसके अलावा लगातार अपराध और हिंसा से जुड़े कंटेंट को देखने से इंसान की सहानुभूति कम हो जाती है. जब हम बार-बार स्क्रीन पर किसी को पीड़ित होते देखते हैं, तो हमारा दिमाग़ उसे एक सामान्य बात मानने लगता है. इसी कारण वास्तविक जीवन में किसी को नुक़सान पहुंचाते समय अपराधी को उस अपराध का भयावह एहसास नहीं होता.

सेल्फ लव
इस तरह का अपराध करने वाले अपराधी ख़ुद सेे बहुत प्यार करते हैं. उन्हें ख़ुद में कोई कमी नज़र नहीं आती. उनकी नज़र में वह हमेशा सही हैं और बाकी दुनिया ने उनके साथ ग़लत किया होता है. उनके लिए स़िर्फ मैं, मेरी ख़ुशियां और मेरी इच्छाएं मायने रखती हैं, बाकी दुनिया और किसी की जान की कोई क़ीमत नहीं है. ऐसे अपराधी अपने अपराध को सही मानते हैं, उन्हें लगता है उन्होंने जो किया सही किया.

धैर्य ना होना
सोशल मीडिया blinkit, flipkart जैसी साइट के चलते आज एक क्लिक पर सब कुछ आपके हाथ में होता है. यह ‘क्लिक-एंड-गेट’ माइंडसेट जब वास्तविक जीवन के जटिल मानवीय रिश्तों पर लागू होता है, तो वह बहुत ख़तरनाक साबित होता है. वे जीवन के गंभीर ़फैसलों में भी शॉर्टकट खोजने लगते हैं. जब किसी युवा की इच्छा के बीच कोई रुकावट आती है (जैसे केतन अग्रवाल मर्डर केस में वह रुकावट जो हत्या का कारण बनी), तो वे इसे बर्दाश्त करने की बजाय उसे मिटाने का रास्ता चुनते हैं. उनके पास इंतज़ार करने या समय के साथ सब कुछ सही हो जाने या किसी से सलाह कर अपनी समस्याओं को सुलझाने का ना वक़्त है न ही सब्र.

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फैमिली में कम्यूनिकेशन की कमी
क्या हमारे घरों में रिश्तों को लेकर खुलकर बात करने की जगह है? क्या बेटी साहस के साथ कह सकती है- मुझे यह रिश्ता नहीं चाहिए?
क्या बेटा भी कह सकता है- मैं अभी तैयार नहीं हूं? बिना इस डर के कि घर टूट जाएगा... बिना इस डर के कि रिश्तेदार क्या कहेंगे... बिना इस डर के कि किसी की इज़्ज़त चली जाएगी... शायद आज भी बहुत से परिवारों का जवाब होगा- नहीं. अक्सर ऐसे परिवारों में मान-सम्मान इतना बड़ा मुद्दा होती है जिसके नीचे बच्चों की समस्याएं, उनके सपने, उनका सच, उनका झूठ, उनका मन, उनकी भावनाएं कहीं दब जाती हैं. उन परिवारों में स़िर्फ बड़े अपना ़फैसला सुनाते हैं. बच्चों की मर्ज़ी पूछने की कोशिश भी नहीं करते. उनसे बातचीत ही नहीं करते, इसलिए पैरेंट्स जान ही नहीं पाते कि बच्चों के मन में आख़िर चल क्या रहा है. बच्चे भी एक नकली मुखौटा पहने हुए माता-पिता की हर बात मानते रहने को मजबूर हो जाते है और अंदर ही अंदर विद्रोही हो अपने मन का करने के लिए इस तरह के अपराध की योजना तैयार करते हैं.

अपराध का बीज अक्सर घर की चारदीवारी में उस अनकही चुप्पी में छिपा होता है, जिसे समय रहते समझा नहीं गया. जब एक युवा के पास अपनी कुंठाओं को व्यक्त करने के लिए कोई सकारात्मक ज़रिया नहीं बचता, तब वह उस कुंठा को हिंसा में बदल देता है.

सोशल मीडिया की आभासी दुनिया और अपराध को जस्टिफाई करना
इंटरनेट, क्राइम वेब सीरीज़ और सोशल मीडिया पर कई बार अपराधियों को एक ‘कूल’ या ‘विद्रोही’ छवि के रूप में दिखाया जाता है. यह ‘ग्लैमरस क्राइम’ की दुनिया युवाओं के कोमल मन पर ग़लत प्रभाव डालती हैं, जिससे उन्हें अपराध करना साहसी काम लगने लगता है. वह यह भी देखते है कि अपराध करने के बाद अपने पैसे और पावर की मदद से किस तरह जेल जाने से बचा जा सकता है, इसलिए उन्हें अपराध करने में डर नहीं लगता. क्योकि वे कहीं ना कहीं जानते हैं कि जब अपने पति को हनीमून पर मारने वाली सोनम रघुवंशी अपना ज़ुर्म क़बूल करने के बाद भी कुछ समय में जमानत पर रिहा होकर अपनी नॉर्मल लाइफ जी सकती है, तो हम भी इसी तरह बच ही जाएंगे. यही कारण है वे अपराध करने से डरते नहीं.

अपराध की ट्रेनिंग सिनेमा और वेब सीरीज़ से मिल जाती है
आजकल ज़्यादातर वेब सीरीज़ अपराध और क्राइम पर बनती है, जिसमें न स़िर्फ ये बताया जाता है कि अपराध कैसे किया जाए, बल्कि यह भी बताया जाता है कि अपराध करने के बाद उसे छिपाया कैसे जाता है. और पुलिस को चकमा देकर सबूतों के अभाव में बचा कैसे जा सकता है.
‘दृश्यम’ जैसी फिल्मों में परफेक्ट मर्डर को जिस तरह से एक Intellectual Game की तरह पेश किया गया, उसने युवाओं के एक वर्ग के मन में यह असुरक्षित विचार पैदा कर दिया कि यदि मैं पर्याप्त स्मार्ट हूं, तो मैं क़ानून से बच सकता हूं.

- शिखा जैन

Source: Shutterstock

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