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क्या दिखावे के चक्कर में हम खो रहे हैं मेंटल पीस? (Are we losing our mental peace in the pursuit of show-off?)

आज हम जिस दौर में रह रहे हैं, वहां सुकून कम है और दिखावा ज़्यादा. प्यार कम है और स्वार्थ ज़्यादा, संस्कार कम हैं और अहंकार ज़्यादा, अनुशासन कम है और आज़ादी-बेख़याली ज़्यादा, रिश्तों की परवाह कम है और लापरवाही ज़्यादा. तो सोचिए फिर ऐसे में मेंटल पीस, चैन-सुकून की जगह ही कहां बचती है. आइए इसी पर चर्चा करें.

• मेटीरियलिस्टिक वर्ल्ड में हम सभी पैसों के पीछे भाग रहे हैं, क्योंकि हमारी प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं और पैसे की अहमियत हमारे लिए सर्वोपरी हो गई है.

• हम आज कितने ही बड़े मुकाम पर क्यों न हों, संतुष्ट नहीं रहते. पहले पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते थे, फिर सोचा क्यों न अपनी बाइक या स्कूटी ले ली जाए, लेकिन इससे भी संतुष्टि नहीं मिली, तो फिर कार खरीद ली.

• एक दिन देखा पड़ोसी के पास हमसे महंगी और बड़ी कार है. पत्नी ने भी फरमाइश कर डाली कि अब तो अच्छा कमाते हैं, क्यों न बड़ी गाड़ी ले ली जाए. बस यही सिलसिला चलता रहता है, हम उधार की ज़िंदगी जीने लगते हैं और ताउम्र ईएमआई का बोझ बना रहता है.

• कहने और दिखाने को तो सब कुछ है- बड़ा घर, गाड़ी, ज्वेलरी, सुविधाएं लेकिन चैन और सुकून नहीं है. कभी नौकरी की चिंता, कभी कंपनी बंद होने का डर और उसके बाद ईएमआई की फिक्र. ये तमाम चीज़ें हमारा मेंटल पीस छीन लेती हैं.

• सोशल मीडिया ने भी इस दिखावे को और हवा दी है. यहां हर कोई ख़ुद को कूल दिखाने की कोशिश में लगा रहता है और उनको देखकर हम भी इसी भेड़ चाल का हिस्सा बन जाते हैं.

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• दूसरों के नेशनल-इंटरनेशनल ट्रिप्स को देखकर हम भी जुगाड़ में लग जाते हैं, ताकि वहां की पिक्चर्स जल्दी से जल्दी सोशल मीडिया पर अपलोड कर सकें और दूसरों को दिखा सकें कि हम कितने खुश हैं.

• कहीं घूमने भी जाते हैं या कोई फेस्टिवल मनाते हैं तब भी हम उन लम्हों का मज़ा लेने की बजाय, पिक्चर्स क्लिक करवाने में ही सारा समय गंवा देते हैं. बस इसी दिखावे के चक्कर में हम रियल लाइफ के छोटे-छोटे मोमेंट्स का मज़ा नहीं ले पाते.

• इसी दिखावे के चक्कर में हम पर आर्थिक बोझ बढ़ता है, जिससे तनाव पैदा होता है और मेंटल पीस खो जाता है.

• जब हम दिखावे की आदत का शिकार हो जाते हैं, तो हम हमेशा दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं कि वो हमारी प्रशंसा करें और प्रशंसा न मिलने पर हम जल्दी निराश या परेशान हो जाते हैं. इससे हमारा आत्मविश्‍वास भी कम होने लगता है और हमारी मानसिक शांति पर इन सबका नकारात्मक असर पड़ता है.

• बहुत ज़्यादा दिखावे की आदत से दूसरे भी हमसे चिढ़ने लगते हैं और दूरी बनाने लगते हैं या हमारा मज़ाक़ उड़ाने लगते हैं.

• हमारी पर्सनैलिटी दूसरों को धीरे-धीरे फेक लगने लगती है.

कैसे बचें दिखावे से?

• सबसे पहले अपनी प्राथमिकताएं तय करें.

• अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार ही खर्च करें.

• कोशिश करें कि एक साथ बहुत सारा सामान लोन पर न लें.

• बहुत ज़रूरी हो तब भी लोन लें और जल्द से जल्द उसे चुकाने की कोशिश करें.

• लोन भी तभी लें जब आपमें उसे आसानी से चुकाने की क्षमता हो.

• बच्चों या पत्नी की फ़िज़ूल की ज़िद पूरी करने के चक्कर में प्रेशर में न आएं, बल्कि उन्हें प्यार से समझाएं कि उनकी ये डिमांड किस तरह उनकी ज़िंदगी में परेशानी का सबब बन सकती है और उनका मानसिक सुकून छीन सकती है.

• दिखावे की चीज़ों की बजाय अपनी जरूरतों पर ध्यान दें और उसे पूरा करने की कोशिश करें.

• धीरे-धीरे ही ज़िंदगी में आगे बढ़ा जाता है, इसलिए दिखावे की बजाय धैर्य और संयम से काम लें.

• बजट प्लान करें और सेविंग्स पर ध्यान दें. जब आप ट्रिप या को महंगी चीज़ अफोर्ड कर सकें तभी लें.

• अनुशासन से चलें और सोशल मीडिया पर बहुत ज़्यादा समय न बिताएं.

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• बेहतर होगा कि ऐसे लोगों या दोस्तों से दूरी बना लें, जिनको अक्सर दिखावे की आदत होती है, क्योंकि ये एक ह्यूमन साइकोलॉजी है कि सामनेवाला जब दिखावा करता है, तो हम भी दिखावा करने लगते हैं.

• दूसरों की ज़िंदगी में झांकने की बजाय अपनी लाइफ को बैलेंस करने पर ध्यान दें, क्योंकि आप अगर मुसीबत में होंगे, तो कोई दूसरा आपकी मदद नहीं करेगा.

• माना कि मन बहुत चंचल होता है, लेकिन मेंटल पीस के लिए और मन की शांति के लिए भी आप योगा और मेंडिटेशन करें.

• अपनी दिनचर्या बेहतर रखें- समय पर सोना, समय पर उठना, हेल्दी खाना खाना, पॉज़िटिव विचार रखना, ये सब ज़रूरी है.

• दूसरों से अपनी तुलना न करें, दूसरों की लाइफस्टाइल देखकर कुढ़ें या जलें नहीं.

• अपनी ख़ूबियों को अपनी ताक़त बनाएं. हर व्यक्ति अलग होता है और हर किसी की ज़रूरतें भी अलग होती हैं. दूसरों की ज़रूरतों या लाइफस्टाइल को अपनाने की ग़लती न करें.

• संतोष में जो सुकून है, वो किसी भी चीज़ में नहीं. अपने सुकून को प्राथमिकता दें और ख़ुश रहें.

- गीता शर्मा

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