तुम भी मजाज़ इंसान हो, आख़िर लाख छुपाओ इश्क़ अपना, ये भेद मगर खुल जाएगा, ये राज़ मगर अफ़शा होगा... उसने मुझसे कहा, "जानती हो, यह ख़त मैंने तीस साल पहले लिखा था, जो आज अपनी मंज़िल तै करता हुआ सही हाथों में पहुंच गया है." मैं सन्न रह गई. "तुम्हारा मतलब, ये ख़त, तुमने मुझे लिखा था." गोपाल कुछ नहीं बोला, वैसे ही ख़ामोश बैठा रहा.
- तेजेन्द्र खेर

मैं उसके द्वारा भेजी गई सभी पुरानी और फटी किताबों को दुरुस्त कर रही थी कि एक पुरानी किताब, जिसमें मजाज़ साहब की शायरी लिखी हुई थी, मेरे सामने आ गई. किताब की हालत बहुत ख़राब हो गई थी. शुरू के आठ-दस पन्ने ग़ायब थे और पिछले पन्नों का भी यही हाल था. पर पुस्तक इतने महान शायर की थी कि मैंने दिल लगाकर उसे पढ़ा और पुस्तक को अच्छी तरह से चिपका कर दुरुस्त भी कर दिया.
एकाएक मेरे हाथ में एक पत्र भी आ गया, जो सन् १९६५ में लिखा गया था. 'आपके लिए... शायद किसी कमसिन को लिखा गया था वह पत्र, पर ऊपर नाम लिखना शायद उसने ठीक नहीं समझा. पत्र के अंत में आपका गोपाल लिखकर पत्र को बंद कर दिया गया था. ख़त का मजमून कुछ ख़ास नहीं था. मजाज़ साहब के कुछ शेर ही लिखे गए थे, जो शायद उस कमसिन से मुखातिब थे.
हमेशा की तरह कोई पन्द्रह दिन बाद गोपाल हमारे घर आया. वही शांत चेहरा, उसकी बुझी-बुझी-सी आंखें, वह बरामदे में आकर बैठ गया, मैं भीतर रसोईघर में कोई काम कर रही थी. मेरे बच्वों से गोपाल की ख़ूब पटती थी, वह बाहर बैठा- मेरे बेटे-बेटी को अपने कॉलेज के दिनों की बातें बता रहा था, साथ ही उनसे भी कोई न कोई सवाल पूछता जाता था.
मैंने रसोईघर से सुना, मेरी बेटी गोपाल अंकल से पूछ रही थी, "गोपाल अंकल, आपने शादी क्यों नहीं की?" गोपाल ने हंसते हुए सहज ढंग से कहा, "बिटिया, हमें किसी लड़की ने पसंद ही नहीं किया."
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उनकी इस बात पर मेरे बेटे ने कहा, "नहीं अंकल, ऐसा नहीं हो सकता. मेरी समझ से आपने किसी लड़की को पसन्द नहीं किया होगा तभी आपकी शादी नहीं हुई होगी." गोपाल बच्चों के साथ बैठकर मज़े से बातें कर रहा था. मैं भी किचन से उसकी सारी बातें सुनती रही.
मेरी बेटी शिल्पा ने गोपाल से चाय के लिए पूछा और मेरे पास किचन में आ गई.
मैंने उसे डांटते हुए कहा, "यह क्या फ़ालतू की बातें अंकल से पूछ रही हो?" उसने कहा, "मम्मी, गोपाल अंकल हमारे अपने हैं. हमने कोई ग़लत बात थोड़े ही पूछी है. आपने भी तो डैडी से शादी की है, फिर गोपाल अंकल को भी किसी से शादी करनी चाहिए थी."
किचन का काम ख़त्म कर मैं गोपाल के पास आकर बैठ गई. वह मेरे पति से कोई दो बरस छोटा था, यही कोई पचास की उम्र होगी उसकी. शुरू में मेरी मुलाक़ात जब उससे हुई थी वह मुझे भाभी कहकर बुलाता था. धीरे-धीरे वह इतने क़रीब आ गया कि उसने मुझे कुछ भी कहकर बुलाना शुरू कर दिया, जैसे सुनिए या मैडम. कभी अन्नपूर्णा, कभी देवीजी, वह कुछ भी कहकर बुलाता, पर उसके बुलाने में एक अजीब सा प्यार होता.
गोपाल जानता था कि मुझे पढ़ने का बहुत शौक है इसलिए हमेशा मेरे लिए कोई न कोई अच्छी किताब लेकर आता. उस दिन उसने हाथों में अल्वेयर कामू की 'प्लेग' पकड़ी हुई थी, पुस्तक को मेरे सामने रखते हुए उसने कहा- "यह ला पेस्ट का हिन्दी अनुवाद है. इसे बड़े चाव से पढ़ना, तुम्हें बहुत अच्छी लगेगी." मैंने पुस्तक उसके हाथों से ले ली. मैंने देखा वह मेरे हाथों की तरफ़ देख रहा है, शांत गंभीर.
एकाएक गोपाल को जाने क्या हो गया उसने मेरे हाथों को थाम लिया और मेरे हाथों की लकीरों को पढ़ने लगा. मैंने भी हंसकर पूछा, "क्या लिखा है मेरी क़िस्मत में, बताओ न? तुम तो बहुत अच्छा हाथ देखते हो."
गोपाल ने कुछ नहीं कहा, वह बहुत कम बोलता था. हमेशा की तरह वह मुस्कुरा दिया. तभी मेरी बेटी भीतर से चाय लेकर आ गई. वैसे गोपाल को चाय से ज़्यादा कॉफी पसन्द थी, पर वह मेरे साथ हमेशा चाय पीना ही पसंद करता था.
"अरे गोपाल सुनो, तुमसे एक बात पूछनी है." मुझे सुबह वाले पत्र की याद हो आई, जो मुझे मजाज़ साहब की पुस्तक में से मिला था. मैंने देखा, गोपाल मेरी तरफ़ अजीब निगाहों से देख रहा है. उसने अपनी बुझी-बुझी आंखों से मेरी तरफ़ देखते हुए कहा, "पूछो, क्या पूछना है?"
"आज मुझे कोई तीस साल पुराना एक ख़त मिला है. शायद तुमने किसी को लिखा होगा- ऊपर किसी का नाम नहीं है. बीच में मजाज़ साहब के कुछ शेर कोट किए गए हैं और नीचे लिखा है आपका गोपाल. तुमने यह ख़त किसे लिखा था, मुझे उसका नाम बताओगे?"
वह हंस दिया. उसने ख़त में लिखा वह शेर ख़ूबसूरत अंदाज़ में पढ़कर सुनाया.
तुम भी मजाज़ इंसान हो, आख़िर लाख छुपाओ इश्क़ अपना, ये भेद मगर खुल जाएगा, ये राज़ मगर अफ़शा होगा... उसने मुझसे कहा, "जानती हो, यह ख़त मैंने तीस साल पहले लिखा था, जो आज अपनी मंज़िल तै करता हुआ सही हाथों में पहुंच गया है." मैं सन्न रह गई.
"तुम्हारा मतलब, ये ख़त, तुमने मुझे लिखा था." गोपाल कुछ नहीं बोला, वैसे ही ख़ामोश बैठा रहा. थोड़ी देर बाद वह उठा और मुझे 'गुड नाइट' कहकर अपने घर चला गया.
मुझे रातभर नींद नहीं आई. रह-रह कर गोपाल का चेहरा सामने आ जाता. कृष्णचन्दर की एक कहानी 'एक करोड़ की बोतल' मेरे ज़ेहन में घूम गई, जैसे कोई बोतल में बंद दस्तावेज़ समुद्र में फेंक दे और कुछ सालों बाद वह किसी प्रेमी युगल के हाथ लग जाए एक करोड़ की जायदाद.
कोई पन्द्रह दिन बीत गए, गोपाल हमारे घर नहीं आया. मैंने सोचा आजकल में ज़रूर आएगा, अकेला है, थोड़ा मूडी भी है.
पर जब तीन सप्ताह बीत गए तो मैंने अपने पति से कहा कि वह गोपाल का पता करें.
मेरी बात उन्होंने कभी नहीं टाली थी.
वह तैयार होकर गोपाल के घर की तरफ़ चल दिए, पर गोपाल के घर पर ताला लगा था. मकान मालिक ने मेरे पति से कहा कि गोपाल मकान छोड़कर चला गया है.
घर आकर जब मेरे पति करतार ने मुझे यह बात सुनाई तो मैं हतप्रभ खड़ी रह गई. 'कहां जा सकता है गोपाल?' हज़ारों सवाल दिमाग़ में कौंध गए. कहीं उसने आत्महत्या तो नहीं कर ली. न जाने कितने बुरे-बुरे ख़्याल मुझे घेरते रहे.
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करतार खाना खाकर सो गए, पर मेरी आंखों में नींद नहीं थी. 'यदि गोपाल मुझसे प्यार करता था तो उसने यह बात मुझसे तीस साल पहले क्यों नहीं कही, पर मैं तो तीस बरस पहले किसी गोपाल नाम के आदमी को जानती भी नहीं थी.
दो माह बाद हमें दिल्ली से एक पत्र मिला. पत्र गोपाल का था-
प्रिय करतार,
तुम चाहो तो मुझे गुनहगार कह सकते हो, क्योंकि मैने तुम्हारी ब्याहता इन्दू से प्यार किया है, जिसका मुझे कोई हक़ नहीं था. इन्दू तो ये बात शायद जानती भी नहीं थी. तुम्हें याद होगा, कॉलेज में एक लड़की थी मधुरिमा, जिसकी कैंसर से मृत्यु हो गई थी. मैं उस लड़की से बेहद प्यार करता था. मैंने तुम्हारी इन्दू में मधुरिमा की सूरत देखी थी और अनजाने में ही उससे प्यार करने लग गया था. मैं तुम्हारी विवाहित ज़िंदगी में खलल डालना नहीं चाहता था इसलिए तुम सबसे दूर इंग्लैंड जा रहा हूं. मैंने वसीयत में अपनी तमाम दिल्ली वाली प्रॉपर्टी अपनी ख़ुशी से इन्दू के नाम कर दी है. इन्दू से कहना मुझे माफ़ कर दे. अब यदि बच्चे पूछें कि गोपाल अंकल ने शादी क्यों नहीं कि तो तुम जो सही समझो उन्हें जवाब दे देना.
तुम्हारा गोपाल
पत्र मैंने करतार के हाथ से ले लिया और बहुत देर तक कुछ कह न सकी. गोपाल जैसे मेरी आंखों में बस गया था. क्या मैं भी अनजाने में गोपाल से प्यार करने लगी थी.

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