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कहानी- वह और मैं (Short Story- Vah Aur Main)

मैं तो चाहती हूं कि उसके पश्चाताप के आंसू मेरी गोद में आ गिरें और मैं पूरी की पूरी पिघल जाऊं. परंतु अभी तो मैं डरती हूं कि यह मेरी जागती आंखों का सपना मात्र तो नहीं.

सिम्मी सहेलियों के साथ खेलने चली गई है. अभी मेरे पास बैठी बातें कर रही थी और नर्म-नर्म हाथों से मेरे पैर दबा रही थी. उसके जाने पर मैं बड़ा अकेलापन महसूस कर रही हूं. आजकल एकांत से मैं डरने लगी हूं. एकाकीपन मुझे चारों ओर से घेर लेता है. लगता है कि जैसे कोई मेरी छाती पर चढ़कर मेरा गला दबा रहा हो. मेरी सांस रुकने लगती है. मैं एकांत की परछाइयों से हमेशा बचने का प्रयास करती रहती हूं. बालकनी की ओर खुलने वाले दरवाज़े की ओर देखती हूं, बाहर काफ़ी तेज़ हवा है, यूकेलिप्टस के पेड़ मस्ती से झूम रहे हैं.

'अधिक पेड़ लगाओ' अभियान के समय इस खाली पड़ी ज़मीन पर यूकेलिप्टस के कई पेड़ लगाए गए थे, जिनमें से केवल ये चार ही बचे हैं. दो पेड़ तो हमारी तीसरी मंज़िल से भी ऊंचे हो गए हैं और दो छोटे ही रह गए हैं.

'क्या ये लम्बे पेड़ नर है?' अचानक मेरे दिमाग़ में यह विचार आया. इन दोनों में जैसे होड़ लगी हुई है. छोटे पेड़ शायद मादा हैं, बेचारे, सिकुड़े तथा सहमे हुए.

मुझे सिम्मी पर ग़ुस्सा आ रहा है. वह सारे दरवाज़े तथा खिड़कियां भी खुले छोड़ गई है. सभी कमरों पर चिड़ियों ने हमला बोल दिया है. घोंसला बनाने की होड़ लगी है. तीनों कमरों के पंखों पर, किताबों की आलमारी पर क़ब्ज़ा करने के लिए चीख-पुकार मची हुई है. वे परस्पर लड़ती-झगड़ती, उड़ती, इधर-उधर गिर पड़ रही हैं, फिर उड़कर चोंचें लड़ाने लगती हैं, हार मानने को कोई तैयार नहीं.

मैं भी सुमीत के हाथों हार मानने को कहां तैयार हूं. मैं भी तो अपना अधिकार छोड़ने को तैयार नहीं हूं.

खड़-खड़ करता बाहर का दरवाज़ा खुलता है. गौतम आया है. लगता है जैसे बड़ी तेजी से सीढ़ियां चढ़कर आया है.

"मम्मी, मम्मी! इस सिम्मी को देखो, नीचे खेल रही है. छु‌ट्टी तो उसने आपके लिए ली थी, आपको अकेला छोड़कर स्वयं नीचे चली गई है."

ग़ुस्से में वह अपने जूते और जुराबें उतार रहा है, तभी उसका ध्यान चिड़ियों की ओर चला जाता है.

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"मम्मी, इन चिड़ियों को देखो, बिना आज्ञा लिए घुसपैठ कर रही हैं. न कोई प्लॉट ख़रीदा, न नक्शा पास करवाया, न कोई किराया, न टेक्स... मम्मी इन चिड़ियों को कोई जगह अलॉट कर देनी चाहिए." गौतम स्वयं ही अपनी बात पर हंस पड़ा.

वह मेरे पास आकर बैठ गया, "मम्मी कैसी हो?"

"ठीक हूं." मैंने मुस्कुराने का यत्न किया.

"पैर दबा दूं?"

"नहीं, पहले खाना खा लो, सिम्मी को बुला लाओ."

वह सिम्मी को बुलाने चला गया.

बेचारे बच्चे! इनको कितना काम करना पड़ता है. सुबह महरी जो बना कर रख जाती है, वहीं गर्म करके खा लेते हैं. अभी न जाने कब तक मैं बिस्तर पर पड़ी रहूंगी. एक्सीडेंट हुआ भी तो बहुत बुरी तरह था.

"तुम्हें परमात्मा ने हाथ देकर रख दिया है." सभी कहते हैं.

जब मैं बहुत तकलीफ़ में थी तो बार-बार यही कहती थी- मैं मर ही जाती तो ठीक था. परंतु अब तो मैं बहुत ठीक हूं, अब यदि सचमुच ही मौत मेरे पास आ खड़ी हो, तो मैं कहूंगी, "अभी लौट जाओ, मैं नहीं जाना चाहती, अभी मुझे अपनी हार को जीत में बदलना है."

हवा का एक ठंडा झोंका बालकनी के खुले द्वार से आकर टकराता है. मैं कंबल अपने ऊपर तक कर लेती हूं, सामने वाला लम्बा पेड़ झूमता हुआ हमारी बालकनी के जंगले से टकराता है, मदमस्त होकर नाच रहा है. कभी सुमीत भी यूं ही मस्त रहता था सदैव ख़ुश, हंसता-मुस्कुराता. अब वह पतझड़ के पीले पत्तों की तरह मुरझाया हुआ घर लौटता है. मेरे साथ कभी आंखें नहीं मिलाता. आशा है कि वह मस्ती, वही हंसी, वही बहार पुनः लौट आएगी इस घर में.

कहानी- वह और मैं

वसंत के मौसम में सुमीत हमें बुद्धा गार्डन, मुगल गार्डन अवश्य ले जाता था. उसे फूलों से कितना लगाव था. वह बालकनी में पड़े गमलों में लगे फूल-पौधों की कितनी सेवा करता था, परन्तु अब तो बच्चे ही कभी-कभार पौधों को पानी दे देते हैं.

सामने गमले में गुलाब का बड़ा सुंदर सा फूल झूम रहा है. पहले जैसी बात होती तो सुमीत मेरा हाथ पकड़ कर बाहर ले जाकर फूल दिखाता. अब तो उसका ध्यान इस खिले हुए फूल की ओर जाता ही नहीं होगा.

गौतम सिम्मी को डांटता हुआ घर ला रहा है. बड़े होने का वह पूरा लाभ उठाता है.

"मम्मी लंदन से मौली आंटी की चि‌ट्ठी आई है." सिम्मी ने मेरे सामने चि‌ट्ठी लाकर रखी.

वे दोनों मेरे पास आकर बैठ गए. लिफ़ाफ़ा खोला, तो उसमें डाक टिकटें देखकर दोनों प्रसन्न हो गए. पत्र चार-पांच पन्नों का था. उसका पत्र सदैव लंबा होता है. उसे मैंने एक वर्ष से कोई पत्र नहीं लिखा. उसने अपने पत्र में इस बात की शिकायत की है. मैं अपनी परेशानियों के बारे में उसे क्या लिखूं, मुझे लगता है कि वह भी सुमीत के विषय में वही कहेगी, जो कभी मैंने उसे रॉल्फ के बारे में लिखा था. जैसे मुझे रॉल्फ के बारे में यकीन नहीं आया था, वैसे ही मौली को सुमीत के विषय में यकीन नहीं आएगा.

मौली ने अपने पत्र में अपने बेटे विलियम और दोनों बेटियों के विषय में लिखा है.

मौली ने सबसे अन्त में रॉल्फ के विषय में लिखा है, "रॉल्फ से अब मेरे संबंध ठीक हो रहे हैं. वह चाहता है कि में जिल से भी दोस्ती कर लूं, परंतु यह कभी नहीं हो सकता, मैं उस औरत का चेहरा भी नहीं देखना चाहती."

मौली ने चिट्ठी में जिल को बहुत सारी गालियां लिखी हैं.

मौली की इस चिट्ठी में लिखा है कि रॉल्फ से उसके संबंध सुधर रहे हैं. इससे पूर्व उसके हर पत्र में लिखा होता था कि वह रॉल्फ से अब कोई संबंध नहीं रखेगी, इन संबंधों को ठीक होने में तीन वर्ष से ऊपर का समय लग गया था.

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मौली आख़िर झुक ही गई. औरत है ना! यूरोप में तो औरत बहुत स्वतंत्र है. अपना जीवनसाधी स्वयं चुनती है. न निभ सके, तो तलाक़ ले लेती हैं. परंतु वह मौली... पति-पत्नी के संबंधों को यूं उखाड़ फेंकना आसान तो नहीं, एहसास, भावनाएं, प्यार, संवेदना, ममता तो शाश्वत सत्य है.

मैं इस उधेड़बुन में उलझी थी कि मेरा ध्यान बच्चों ने खींच लिया, वे दोनों टिकटों को लेकर झगड़ रहे थे.

"टिकटें रख दो, पहले खाना खाओ, जाओ." मैं अपने स्वर में रोबीलापन लाने की पूरी कोशिश करती हूं.

सिम्मी झगड़ा एकदम बंद कर देती है. मेरे पास आकर पूछती है, "मम्मी आपके लिए खाना लाऊं?"

मैं 'नहीं' में सिर हिला देती हूं, वे दोनों रसोई में चले गए हैं. मैं आंख बंद करके कंबल ऊपर तक खींच लेती हूं. मेरा ध्यान पुनः मौली के पत्र की ओर चला जाता है. मौली ने इस वर्ष के अन्त में पुनः भारत आने को लिखा है.

मेरी बचपन की सहेली बलविन्दर पिछले बीस वर्षों से लंदन में है, जिल उसी की सहेली है. दोनों एक स्कूल में अध्यापिका हैं. जिल वहां के कुछ साथियों के साथ एक शैक्षणिक ट्रिप पर भारत आई थी. इंग्लैंड में हिन्दुस्तान तथा पाकिस्तान से आए बच्चों की पृष्ठभूमि को समझने के लिए ही वहां की सरकार ने उन्हें भारत में‌ भेजा था. जिल पंजाब के कई गांवों तथा कस्बों में होकर आई थी. वापसी पर वह हमारे पास रही थी.

सुमीत और मैं उसे घुमाते रहे, शॉपिंग करवाई, जिल बहुत ख़ुश थी. वह हमारा धन्यवाद करते थकती नहीं थी. हमें भी वह बड़ी मिलनसार, स्नेहमयी तथा लुभावनी लगी. उसका पति भी वहां अध्यापक था. उसके तीन बच्चे स्कूल में पढ़ते थे. जिल की इच्छा उर्दू सीखने की बहुत थी. मैं उसकी इस भावना को जान कर बहुत प्रसन्न हुई. मैंने पूछा, "जिल, तुम वहां उर्दू कहां से सीखोगी?"

"रॉल्फ से सीखेंगी, वह लंदन में ही है. वह एक बार हमारे स्कूल आया था. उसे उर्दू बहुत अच्छी आती है. वह बहुत वर्ष हिन्दुस्तान में रहा है. वहां उर्दू पढ़ाता है. वह अक्सर हिन्दुस्तान का चक्कर लगाता रहता है, उसको आपका पता दूंगी, उसका बेटा विलियम भारत में आकर ही हिन्दी और पंजाबी सीखेगा. रॉल्फ तथा विलियम को कहूंगी कि आपसे मिले."

कहानी- वह और मैं

जिल लंदन चली गई तो एक आध पत्र उसने डाला. एक-आध हम लोगों ने, फिर हम अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गए. नए वर्ष का कार्ड हम एक दूसरे को भेजना न भूलते. उसके अगले वर्ष रॉल्फ और मौली दिल्ली आए. वे पूरा एक दिन हमारे घर पर रहे. मौली बड़ी शर्मीली, मितभाषी, ऊंची-लम्बी और आकर्षक औरत थी. रॉल्फ का कद नाटा था-लम्बोतरा चेहरा, गंजा सिर, वह बोलता भी बहुत ऊंची आवाज़ में था. रॉल्फ की बनिस्बत मौली बहुत सुंदर तथा जवान थी.

मौली एक फर्म में फैशन डिज़ाइनर थी. घर की देखभाल मौली की मां कर लेती थीं. मौली से बातें करके यूं लगा कि उसके दिल में रॉल्फ के लिए उतनी ही श्रद्धा और प्रेम है, जितना एक हिन्दुस्तानी बीवी के दिल में होता है. उसको इस बात का एहसास था कि उसका पति बहुत पढ़ा-लिखा है और उसके सामने वह बहुत कम पढ़ी-लिखी है.

एक दिन अचानक रॉल्फ हमसे मिलने आया. उसने बताया कि मौली भी उसके साथ थी, लेकिन बीमार होने के कारण मिलने नहीं आ सकी. वे लोग एक होटल में ठहरे हुए थे. रॉल्फ ने बताया कि मौली कुछ दिन पंजाब रहेगी और वापसी में हमें मिलेगी.

इस बात को तीन-चार महीने बीत गए. हमने सोचा, मौली और रॉल्फ इंग्लैंड वापस लौट गए होंगे, परंतु अचानक एक दिन मौली को अपने सामने देखकर मैं हैरान रह गई. बिल्कुल हड्डियों का ढांचा, गाल अंदर को धंसे हुए, कमीज-सलवार के ऊपर शनील की जैकेट, फुलकारी की शॉल, आंखों में काजल, गले में मोतियों की रंग-बिरंगी मालाएं, माथे पर बिन्दी, बाजुओं में कई तरह की चूड़ियां, मैं हतप्रभ सी उसके लिबास को देखती रह गई.

वह मुझसे गले मिली, तो कितनी देर लिपटी रही. अलग हुई तो उसकी आंखों का काजल धारा बनकर आंखों से बह रहा था. वह बच्चों को गले लगाकर घूमने लगी. पहली बार मौली आई थी, तो बच्चे बहुत छोटे थे. आंटी के चुम्बनों और आलिंगन से हैरान वे कभी मेरी ओर देखते, कभी सुमीत की ओर और कभी उस आंटी की ओर.

मौली के आंसुओं का बांध टूट गया. मैं और सुमीत हैरान-परेशान से उसको देखते रहे. जितना हम उसे चुप कराने की कोशिश करते, उतना ही तेज वह रोने लगती. रोते-रोते वह मेरे कंधे पर लुढ़क गई. हमें कुछ सूझ नहीं रहा था. कुछ देर उसके हाथ-पैर मलने पर वह होश में आई. कुछ संभल गई तो बोली, "जिस रॉल्फ को आप इतना अच्छा आदमी समझते थे, वह बहुत ही कमीना है. उसने मुझे बहुत दुख दिया है. जिस जिल को तुम अपनी दोस्त कहती हो, जिसकी प्रशंसा करते हुए तुम थकती नहीं, वह बड़ी बेईमान तथा धोखेबाज़ है. उसने मेरी रातों की नींद छीन ली है. मेरे लिए ज़िंदगी बहुत बड़ा बोझ बन गई है. न दिन को चैन, न रात को.

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वह पुनः ज़ोर से रोने लगी. मुझे उसकी बात पर विश्वास नहीं आ रहा था. मुझे जिल बहुत पसंद आई थी. रॉल्फ के विषय में यह सब जान कर यकीन भी करने को मन नहीं मान रहा था.

उस समय हमारे घोंसले में सुमीत अपने पंखों की गर्मी से मुझे, सिम्मी तथा गौतम को समेटे परिवार के लिए कई सपने बुनता रहता. वे हमारे संघर्ष के दिन थे, हम किराए के एक कमरे में राहते थे. वही हमारा सोने का, बैठने का, खाने का कमरा था. उसी कमरे के एक कोने में खाना पकता.

उसी कमरे में गौतम और सिम्मी पैदा हुए थे. उसी कमरे में जिल, रॉल्फ, विलियम और मौली आकर रहे थे.

दो वर्ष पूर्व ही सुमीत की तरक़्क़ी हुई है. तभी से हमें वह फ्लैट कंपनी की ओर से मिला है. इस पदवी पर आने पर ही सुमीत की मुलाक़ात सुनीता से हुई. मैं उसके नैन-नक्श का मुक़ाबला स्वयं से करती रहती हूं. सुमीत को उसमें क्या विलक्षण लगा? बार-बार यही विचार मेरे दिमाग़ में घूमता रहता.

"मम्मी, मम्मी देखी, गौतम चिड़ियों का घोंसला तोड़ रहा है... इसे मना करो मम्मी, उसमें शायद अंडा हो, वह टूट जाएगा." सिम्मी चीखती हुई मुझे झिंझोड़ रही थी.

पहले तो मैं कुछ समझी ही नहीं. मैं खोई हुई थी, बहुत दूर... सिम्मी की बात जब समझ में आई, तो मैंने गौतम को डांट दिया. गौतम रूठ कर दूसरे कमरे में चला गया. सिम्मी को मैंने अपने पास लिटा लिया. थोड़ी देर में ही सिम्मी की आंख लग गई. गौतम शायद दूसरे कमरे में अकेला ही खेल रहा था.

तब मौली हमारे घर दो दिन तक रही, वह बच्चों से बहुत घुल-मिल गई. बच्चे भी आंटी के साथ बहुत प्रसन्न थे. मौली बच्चों को अंग्रेज़ी गाने गाकर सुनाकर नाचती. पंजाबी के एक गीत की कुछ पंक्तियां गुनगुनाती. बच्चे हंस-हंस कर दोहरे हो जाते.

मौली बोली, "जानती हो तुम्हारे बच्चे मुझे क्या कहते हैं. वे कहते हैं, मैं इंग्लैंड की रानी हूं. कहते हैं, मेरी सूरत उससे मिलती है. तुम्हारे बच्चे मेरे गालों पर बार-बार हाथ फेरते है, लुधियाने का एक लड़का मुझ पर फ़िदा हो गया था. होगा यही सोलह-सत्रह वर्ष का. उसने मुझ पर एक कविता लिखी थी. मैंने किसी से उस कविता को अंग्रेज़ी अनुवाद करवा लिया था. तुम्हें सुनाऊं?"

इससे पूर्व कि मैं कुछ कहती, वह झूम कर वही कविता सुनाने लगी.

"कैसी है?" उसने पूछा था.

"बहुत बढ़िया." मैं ठहाका लगाकर हंसकर बोली.

"वहां गांव के लड़के मेरे ऊपर फ़िदा थे, वे मुझे 'मैम आंटी' कहते थे."

ये सब बातें बताते हुए मौली की आंखों में एक अद्भुत चमक थी, बातों-बातों में उसकी बात का विषय फिर जिल और रॉल्फ की ओर मुड़ जाता. वह जिल को गालियां देने लगती. एक हिन्दुस्तानी औरत और उसमें यही अन्तर था कि गालियां अंग्रेज़ी में होती थीं.

"वह चुड़ैल उर्दू पढ़ने आती थी, मुझे क्या पता था कि अन्दर ही अन्दर वे क्या गुल खिला रहे थे. मैं अपनी आंखों से सब न देखती तो विश्वास ही न करती. मैंने ग़ुस्से में जिल को घर से निकाल दिया. उसके पति को सब बातें पत्र में लिख दी. मैंने रॉल्फ के लिए सारी उम्र गाली दी. वह तो सदैव किताबों में डूबा रहा या यात्रा करता रहा. मैं नौकरी करके बच्चों को पालती रही. मेरी मां मेरा साथ न देती तो आज मैं ज़िंदा न रहती. परंतु दुख इस बात का है कि मेरी मां भी आजकल दामाद का पक्ष लेती है. मुझे वहमी कहती है.

"रॉल्फ और जिल के बारे में तुम्हें कहीं ग़लतफ़हमी तो नहीं?" मैं पूछने की ग़लती कर बैठी.

"कल यदि सुमीत को किसी लड़की ने फंसा लिया तो तुम्हें पता लगेगा."

तब मैं मन ही मन हंस पड़ी थी, परंतु ऊपर से गंभीर चेहरा बनाए रखा था. तब मुझमें कितना आत्मविश्वास था. तब तो मुझे यह एहसास ही नहीं हुआ था कि वह मुझे श्राप दे रही थी. दुखी मन से निकली आह शायद लग ही जाती है.

"रॉल्फ स्वयं को बुद्धिजीवी कहता है. क्या बुद्धिजीवी अपनी पत्नी को ऐसे दुख देते हैं. छिः छिः... उस आदमी से अब मेरा कोई संबंध नहीं हो सकता, मैं उस पर थूकती हूं. मैं अपना बहुत-सा सामान पंजाब रख आई हूं. मैं एक महीने बाद इंग्लैंड से लौट आऊंगी. लुधियाना स्कूल में पढ़ाऊंगी, मैं तो अब भी वापस नहीं जाना चाहती. परंतु मां की बीमारी का समाचार सुनकर रह नहीं सकती. मैं तो अपने आभूषण भी लुधियाने, गांव में ही छोड़कर आना चाहती थी, परंतु गांव वालों ने रखने नहीं दिए. ये लोग कहते हैं कि किसी के आभूषण रखना हमारे लिए अशुभ है. वे लोग पढ़-लिख कर भी बड़े अंधविश्वासी हैं. परंतु वे लोग मुझसे बड़ा मोह करते हैं. मुझे पंजाब के लोगों से बड़ा ही प्यार मिला है..."

मौली लगातार बोलती जा रही थी, पंजाब के लोगों की बातें ख़त्म होने में नहीं आ रही थी.

तब मैं कभी सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि सुमीत को लेकर मेरे सामने भी यही स्थिति आने वाली है.

अब हमारे परिवार के कुछ लोग तो मुझे ही दोषी मानते हैं कि मैं सुमीत को संभालकर नहीं रख सकी. अपने साथ बांध नहीं सकी. कुछ सगे-संबंधी सलाह देते हैं, "छोड़ इस आदमी को. तुम्हें तो इस आदमी से घृणा होनी चाहिए."

कुछ और लोग भी हैं, जो कहते हैं, "अरे वह सब तो चलता ही है. इन बातों की परवाह नहीं करते, घर की शांति के लिए यह सब तो सहना ही पड़ता है. चार दिन खाक छान कर स्वयं घर आ जाएगा."

कहानी

सुमीत का एक मित्र कहता है, "अरे भाभी, तुम भी किसी से इश्क़ कर लो. इतना दुखी होने की क्या ज़रूरत है."

इस दौरान एक समय ऐसा भी आया जब सुमीत ने कोर्ट-कचहरी तक जाने की धमकी दी थी. तब मेरा अहम् बड़ा आहत हुआ था, परंतु सिम्मी और गौतम के कारण में झुक गई थी.

मैं स्वयं को कितना कमज़ोर अनुभव करने लगी थी. तब लगता था कि हम तीनों पतझड़ के सूखे पत्ते हैं और सुमीत वह तेज़ हवा है, जो जिधर चाहे, हमें बहा के ले जाएगी. उसके बाद मैंने एक लंबी चुप्पी साध ली. सुमीत घर में आ जाता तब भी ठीक, नहीं आता तब भी ठीक.

जब मौली और रॉल्फ की अनबन थी तो मौली ने कहा था, "मैं सब कुछ छोड़कर हिंदुस्तान आ जाऊंगी, अब बच्चे बड़े हो गए हैं, स्वयं नौकरी ढूंढ़ लेंगे और अपना-अपना घर बसा लेंगे."

मैंने सुना-पढ़ा हुआ था कि वहां तलाक़ बढी जल्दी हो जाते हैं. मैंने मौली से पूछा तो बोली, "तलाक़ तो नहीं देना है. उस आदमी को तो फिर जिल से पूरे संबंध स्थापित करने की छूट मिल जाएगी. वह घर मैंने तिनका-तिनका जोड़कर बनाया है अब मैं इसे यूं बिसारने नहीं दूंगी." यह कह वह पुनः रोने लगी थी.

मुझे उसकी यह बात समझ में नहीं आई, एक ओर तो वह सब छोडकर भारत में आना चाहती है, रॉल्फ को गालियां देती हैं, परंतु तलाक़ के नाम पर बिफर जाती है. पश्चिमी स्त्रियों की आज़ादी के विषय में जो पढ़ा-सुना था, सब झूठ लग रहा था. मुझे अब मौली और स्वयं में बड़ी समानता नज़र आने लगी है.

जब मौली इंग्लैंड गई तो महीने भर पश्चात् उसका पत्र मिला कि उसकी मां ज़्यादा बीमार है. उसके बच्चे भी उसे भारत नहीं आने देना चाहते हैं.

उसके पत्र अक्सर आते ही रहते. प्रत्येक पत्र में जिल की बुराई लिखी होती. रॉल्फ से कोई शारीरिक संबंध न रखने की बात लिखी होती. परंतु आज उसकी चि‌ट्ठी का स्वर बदला हुआ है. उसका रॉल्फ से समझौता हो गया है. वह खुश है.

मेरे इस एक्सीडेंट की ख़बर जब सुमीत को मिली थी, तो वह भागता हुआ आया था. उसने कितनी ही रातें अस्पताल में जागकर काटी थी. उसके पश्चात् उसकी ओर से बर्फ़ कुछ पिघलती हुई अनुभव हो रही है.

मैं तो चाहती हूं कि उसके पश्चाताप के आंसू मेरी गोद में आ गिरें और मैं पूरी की पूरी पिघल जाऊं. परंतु अभी तो मैं डरती हूं कि यह मेरी जागती आंखों का सपना मात्र तो नहीं.

- राजेन्द्र कौर

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