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पहला अफेयर- फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों… (Love Story- Phir Se Ajnabi Ban Jaye Hum Dono…)

"यदि आंसुओं की मौन भाषा में उनकी ख़ुशी है, तो इन आंसुओं को बह जाने दो, 'मेरी बिटिया ऐसी है' के विश्वास व गर्व में उन्हें जीने का सहारा मिलता है, तो उन्हें वो सहारा दे दो. हम उनसे ये ख़ुशी, ये सहारा छीन नहीं सकते..."

उस वक़्त मैं कॉलेज में प्रथम वर्ष की छात्रा थी. उम्र के नाज़ुक मोड़ पर कदम रखने के बावजूद अब तक मेरी ज़िंदगी में कोई ख़ास परिवर्तन नहीं हुआ था. हां, कुछ नई चीज़ों का समावेश ज़रूर हो गया था, जैसे डायरी, अधूरी पंक्तियां, लेखन विद्या के प्रति मेरे झुकाव को कॉलेज की मासिक पत्रिका के रूप में मानो नया आकाश मिल गया और मेरा अधिकतर वक़्त काव्य-रचनाओं की उड़ान में ही व्यतीत होने लगा था.

राज उस पत्रिका के संपादक समूह के सदस्य में से थे. कॉलेज में अब उनका अंतिम वर्ष था. जाने मेरी अधूरी व अपरिपक्व रचनाओं में उन्हें क्या मिला कि वे उन्हें अपने कलम की छुअन से नया रूप देकर पत्रिका में शामिल करने लगे. कभी-कभी संशोधन के बहाने हमारी मुलाक़ात हो जाती. धीरे-धीरे कब ये संबंध दोस्ती की दहलीज़ लांघकर प्रेम के चौखट पर पहुंचा, हमें ख़बर ही न हुई, हमारे संबंधों में और प्रगाढ़ता आने लगी थी, चूंकि इसके प्रति हम दोनों ही गंभीर थे.

इसी बीच पड़ोस की एक लड़की के प्रेम संबंध की ख़बर ने हमारे मोहल्ले में जहां बहस का मुद्दा दे डाला, वहीं मेरा परिवार भी इसकी सुगबुगाहट से अछूता न रह पाया. उस दिन मैं कॉलेज से लौटकर कमरे में आ रही थी कि पिताजी की आवाज़ सुनकर मेरे कदम रुक गए. वे सगर्व किसी से कह रहे थे, "ऐसा सब होने में संस्कारों का भी असर होता है. मेरी बेटियां कभी ऐसा काम कर ही नहीं सकतीं, जिससे मेरा विश्वास टूटे या मेरे स्वाभिमान व आत्मसम्मान को ठेस पहुंचे, हम मध्यमवर्गीय परिवारों की बेटियां समझदार होती हैं. वो दर्द सह लेती हैं, लेकिन आह नहीं करतीं. यही विश्वास तो हमारे जीने का आधार है..."

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इससे ज़्यादा सुनने की मेरी हिम्मत न थी. सुनने को अब शेष रह ही क्या गया था? मुझे प्रेम संबंधों के बारे में पिताजी के मंतव्यों के बारे में ख़बर न थी, मगर आज प्रेम के प्रति उनके विचार जानकर मैं चिंतित हो उठी. जाने क्यों, ख़ुद को मैं दोषी भी समझने लगी. रातभर मैं गहरी उलझन में थी, कल को अगर पिताजी को मेरे व राज के संबंधों के बारे में पता चल गया, तो उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी? क्या वे इसे अपने विश्वास पर ठेस न समझेंगे? प्रेम कोई गुनाह नहीं, मगर जब यह उनके दुख का कारण बनेगा तो क्या मैं ख़ुद को माफ़ कर पाऊंगी? इन सारे सवालों ने मुझे परेशान कर दिया और मैं रो पड़ी.

दूसरे दिन मैं अनिर्णय की स्थिति में राज के सामने थी. उम्मीद के विपरीत उन्होंने कहा, "यदि आंसुओं की मौन भाषा में उनकी ख़ुशी है, तो इन आंसुओं को बह जाने दो, 'मेरी बिटिया ऐसी है' के विश्वास व गर्व में उन्हें जीने का सहारा मिलता है, तो उन्हें वो सहारा दे दो. हम उनसे ये ख़ुशी, ये सहारा छीन नहीं सकते. हमारा प्यार इतना स्वार्थी तो नहीं है न आशु?" कहते-कहते उनकी भी आंखें नम हो गईं. उन्होंने मुझे मुक्त ज़रूर कर दिया, मगर अब भी मैं अपराधबोध से ग्रसित थी, शायद उन्होंने मेरे मनोभावों को समझ लिया, कहा, "जब तक पिताजी का विश्वास रहेगा, मेरा प्यार रहेगा." फिर कुछ रुककर बोले, अब हमेशा के लिए यह शहर छोड़कर जा रहा हूं. मैं नहीं चाहता कि तुम फिर अपने प्रेम और कर्त्तव्य के संघर्ष में घिर जाओ." आंखों में आंसू लिए हम अलग हो गए.

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आज पूरे तीन वर्ष गुज़र चुके हैं उनसे बिछड़े, मुझे मालूम नहीं वे कहां है. उन्होंने अपना पता तक न दिया कि कहीं इस फ़ैसले में मैं कमज़ोर न पड़ जाऊं. हमारा प्यार भले ही उस मंज़िल तक नहीं पहुंचा, जिसकी कभी ख़्वाहिश की थी, मगर दूर रहकर भी वे क़रीब हैं. जब जब पिताजी की निश्चिंतता भरी सगर्व मुस्कान देखती हूं अनायास आंखें भर आती हैं और मैं उस मुस्कान को देनेवाले प्यार के बलिदान में दो बूंद आंसू समर्पित कर देती हूं.

- आशु

पहला अफेयर

Photo Courtesy: Freepik

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