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कहानी- गुलाबी छतरी वाली बारिश (Short Story- Gulabi Chhatari Wali Barish)

रोटी बेलती मां बार-बार खिड़की से बाहर झांकतीं और हर बार उनकी चिंता थोड़ी और बढ़ जाती. मां के चेहरे की बेचैनी देखकर चारु भी अपनी सारी शिकायतें भूल गई. अब उसे भी बस बाबा के सकुशल लौट आने की चिंता सताने लगी.

“चारु बेटा, बाबा आ जाएंगे. अंदर चल, कुछ खा ले, स्कूल से आने के बाद से भूखी बैठी है, बस बाबा की राह देख रही है. देख, तेरी पसंद का आमरस बनाया है मैंने.”

मां ने प्यार से पुकारा पर चारु का मन कहां मानने वाला था. उसका तो जी तो बाबा में अटका था. आज उसे स्कूल की सारी शिकायतें बाबा से जो करनी थीं.

निमिकी ने चिढ़ाते हुए कहा था, “अरे, तू तो बिना छतरी के स्कूल आती है, मेरी छतरी चाहे टूटी-फूटी हो, पर है तो सही.”

और धीरू भी अपने दादा के पुराने काले छाते को बड़े गर्व से लहराते हुए बोला था, “देख चारु! मेरे दादा का पुश्तैनी छाता. बारिश क्या, ओले भी इससे हार जाए.”

यह सब याद आते ही चारु की आंखें फिर भर आईं.

बाबा अभी तक नहीं लौटे थे. उधर आसमान में घिर आए बादलों ने देखते ही देखते बारिश की हल्की फुहारों को मूसलाधार बरसात में बदल दिया. ऐसी छमाछम बारिश देखकर तो चारु हमेशा नाच उठती थी, लेकिन आज उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी. बारिश तेज़ हुई तो वह मजबूर होकर भीतर आ गई.

रोटी बेलती मां बार-बार खिड़की से बाहर झांकतीं और हर बार उनकी चिंता थोड़ी और बढ़ जाती. मां के चेहरे की बेचैनी देखकर चारु भी अपनी सारी शिकायतें भूल गई. अब उसे भी बस बाबा के सकुशल लौट आने की चिंता सताने लगी. थोड़ी देर बाद बारिश कुछ थमी. तभी दूर से साइकिल की घंटी सुनाई दी.

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टन… टन…

चारु बिजली सी बाहर दौड़ी. धुंधली बारिश के बीच धीरे-धीरे बाबा की साइकिल नज़र आने लगी. लेकिन आज एक बात अलग थी. बरसों पुराना काला छाता उनके हाथ में नहीं था, बल्कि उनकी साइकिल के पीछे बंधा था. और उनके हाथ में थी छाते की जगह एक नई गुलाबी छतरी थी.

बाबा के पास पहुंचते ही चारु उनसे लिपट गई और चमकती आंखों से बोली, “बाबा! ये किसकी छतरी है? कितनी सुंदर है!”

बाबा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए मुस्कुराकर कहा, “तेरी है बिटिया… तेरे लिए ही लेने गया था, इसलिए देर हो गई.”

बस, इतना सुनना था कि चारु की सारी उदासी जैसे बारिश के पानी में बह गई. वह गुलाबी छतरी को बार-बार खोलती, बंद करती और उसे सीने से लगाए खिलखिला उठी.

मां मुस्कुराईं और बोलीं, “लो, अब तेरे बाबा भी आ गए और तेरी छतरी भी, अब तो चल, खाना खा ले, लाडो!”

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चारु ख़ुशी-ख़ुशी मां के साथ भीतर चली गई.

बाहर बारिश अब भी रिमझिम बरस रही थी और घर के भीतर गरमा-गरम रोटियों और आमरस की मिठास में एक छोटी सी गुलाबी छतरी पूरे घर की ख़ुशियों का रंग बन चुकी थी.

पूर्ति खरे

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Photo Courtesy: Freepik

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