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कहानी- वापसी (Short Story- Wapsi)

क़ानून क्वेताओं की लम्बी बहस के उपरान्त विद्वान न्यायाधीश ने मिसेज नलिनी चक्रवर्ती को वापस नलिनी उपाध्याय बना दिया. नलिनी जीत जाने के उपरान्त भी उद्विग्न थी. इस मुक़दमें की सम्पूर्ण कार्यवाही स्थानीय अखबारों में नियमित रूप से छपती रही थी. आज की इस ख़बर को करीब क़रीब सभी अखबारों ने अपने सांयकालीन संस्करणों में विशेष सुर्खियों में छापा था.

प्रसिद्ध हार्ट स्पेशलिस्ट डॉ. (मिसेज) नलिनी चक्रवर्ती स्वेच्छा से कुमारी नलिनी बन जाने के पश्चात भी संतुष्ट न थी. चाय की प्याली सम्पूर्ण गर्मी खोकर ‘कोल्ड ड्रिंक’ बनती जा रही थी, मगर विचारमग्न नलिनी को तनिक भी सुध न थी. यादों की चिड़िया अपने पंख फड़फड़ा रही थी. अतीत के भूले-बिखरे पृष्ठ कचोट रहे थे, नलिनी बेबस पंछी-सी समयबाज की गिरफ्त में फंसी अनजान दिशाओं को उड़ी जा रही थी.

बाबू अविनाश चन्द्र उपाध्याय उस रोज़ बहुत प्रसन्न थे, जिस रोज़ उनकी इकलौती पुत्री ने एम.एस. की परीक्षा सर्वाधिक अंकों से पास की थी. प्रथम बार कलकत्ता विश्वविद्यालय से किसी महिला चिकित्सक ने स्वर्ण पदक जीता था. भावातिरेक सीमा पार कर चुका था. उन्होंने गदगद हो नलिनी को अपने अंक में समेट लिया था. पिता-पुत्री दोनों प्रसन्न थे कि अचानक ही वृद्ध पिता के बाहू बंधन की कसक ढीली पड़ गई और वे नलिनी की बांहों में झूल गए. डॉक्टरी योग्यता का प्रथम परीक्षण पिता पर ही करना पड़ा. पुत्री की चिकित्सकीय योग्यताओं एवं सेवा सुश्रुषा ने पिता को त्वरितगति से स्वस्थ कर दिया.

स्वस्थ हो उपाध्याय एक रोज़ पत्नी सुजाता की तस्वीर के सम्मुख खड़े भावुक हो कुछ बुदबुदा रहे थे. अचानक उन्होंने नलिनी को पुकारा, नलिनी आकर पिता के पास खड़ी हो गई. पिता ने पुत्री को सीने से लगाते हुए कहा, “देख, सुज्जो! मैंने तेरी बेटी को डॉक्टर बना दिया है और वह भी ‘कार्डियोलोजिस्ट’ काश! तुम उस वक़्त बच गई होती तो भला क्या अब तुमको यह मरने देती? नहीं, कभी नहीं… अरे, उस रोज़ इसने ही तो मुझे तुम्हारे पास आने से रोक लिया था. बिल्कुल सच कहा था तुमने कि हमारी बच्ची बहुत होनहार होगी. मैंने तुम्हें दिया वचन पूरा कर दिया… सुज्जो!.. अब कोई ममता तुम्हारी तरह यूं तड़प तड़प कर हृदय रोग से दम नहीं तोड़ेगी… तुम मर कर भी नलिनी की सेवाओं के रूप में ज़िन्दा रहोगी…” अचानक ही बाबूजी सिसक पड़े, बड़ी कठिनाई से नलिनी उन्हें सम्भाल पाई थी.

दमदम हवाई अड्डे के रन वे पर एयर इंडिया का विमान बोइंग 707 लैण्ड कर चुका था. जहाज के आगे सीढ़ियां लगाई जा रही थीं. बाबू अविनाश चन्द्र बेसब्री से इन्तज़ार कर रहे थे. उनकी पुत्री अमरीका से हार्ट सर्जरी का पांच वर्ष का विशेष प्रशिक्षण प्राप्त कर आज लौट रही थी. अमरीका में भी उसने सफ़लता के झण्डे गाड़ दिए थे. हृदय प्रत्यारोपण में इतनी दक्षता उसने प्राप्त कर ली थी कि मुख्य प्रशिक्षक एवं वरिष्ठ प्राध्यापक मि. जेम्स हार्डली स्वयं आश्चर्यचकित थे. प्रशिक्षण के दौरान ही उसके बहुत से शोध-पत्र दुनिया के प्रमुख मेडिकल जर्नल्स में प्रकाशित होकर सराहे जा चुके थे.

चहलकदमी करते करते अचानक बाबूजी ठिठक गए. उनका ध्यान एक पिक्चर पोस्ट पर केन्द्रित हो गया, जिसमें ‘द ग्रेट बुद्धा ऑफ इंडिया’ का एक दृश्य अंकित था, जिसमें बोधि वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध सुजाता से आदरपूर्वक खीर पात्र ग्रहण कर रहे थे, वे एकटक कल्पनाओं में स्वयं पात्र वत् दृश्य को सजीव साकार देख रहे थे. सब कुछ से बेख़बर वृद्ध उपाध्याय की तन्मयता नलिनी ने भंग कर दी. नलिनी, “पापा! पापा!” चिल्लाती हुई दौड़ी आई और बाबूजी से चिपट गई, अचानक मोह भंग हुआ और उन्हें ऐसा लगा मानो नलिनी ने कोई चोरी पकड़ ली हो. उस क्षण उन्हें नलिनी का असमय आना किंचित अखरा, किन्तु एक क्षण में ही वे संयत हो गए. वात्सल्य भाव उमड़ पड़ा और पितृत्व ने पांच वर्ष से बिछुड़ी ममता को लिपटा लिया. दो जोड़ी आंखें प्रेमाश्रु बहा रही थीं, अन्तर्मन के भाषा आन्दोलित थे. उस अपूर्व मिलन को देख नलिनी के साथीगण, प्रोफेसर्स, रिश्तेदार एवं मित्रगण सभी रोमांचित हो उठे, कैमरे के लैन्सेस एवं चमकती फ्लश-गन दृश्यांकन कर रही थी. हृदय भावों एवं उमंगों से हिलोरे ले रहा था. बाबूजी के मानस पटल पर कई संस्मरण, पुरानी यादें चलचित्र की भांति उभरती मिटती जा रही थीं.

यद्यपि रात्रि के खाने का समय आठ बजे ही था, किन्तु आज बाबू अविनाश चन्द्र डाइनिंग टेबल पर अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ जल्दी ही पहुंच गए थे. वे बार-बार क्लाक देख रहे थे, जिसमें अब भी आठ बजने में पूरे पच्चीस मिनट शेष थे. ऐसा नहीं था कि नलिनी को देर हो गई हो, परन्तु बाबूजी की व्यग्रता से लग रहा था कि वे किसी विशेष कारण से नलिनी का इन्तज़ार कर रहे हैं.

आजकल नलिनी ‘मारवाड़ी रिलीफ सोसायटी जनरल हॉस्पिटल’ में सेवारत है. हालांकि हॉस्पिटल सुपरिन्टेन्डेंट उसे यूनिट इंचार्ज बनाना चाहते थे, परन्तु डॉ. नलिनी के विशेष आग्रह पर उसके पुराने प्राध्यापक डॉ. पंकज गोस्वामी को ही यूनिट इंचार्ज रखा गया था. वृद्ध प्राध्यापक शुरू से ही नलिनी की प्रतिभा से प्रभावित थे और उसे बहुत चाहते थे. पितृ तुल्य डॉ. गोस्वामी का, नलिनी बाबूजी के समान ही आदर किया करती थी. अमरीका से लौटने के पश्चात् नलिनी की निखरी प्रतिभा से डॉ. गोस्वामी अधिक प्रभावित थे. ऑपरेशन टेबल पर शिष्या के यंत्रचालित से दक्ष हाथों की कुशलता देख उन्हें गर्वानुभूति होती थी.

एक दिन एक खतरनाक ऑपरेशन को कुशलतापूर्वक सम्पन्न कर डॉ. नलिनी ने प्रोफेसर को ही नहीं वरन् सम्पूर्ण चिकित्सा जगत को स्तंभित कर दिया था. देश की एकमात्र सर्वश्रेष्ठ हृदय विशेषज्ञा मान ‘प‌द्म श्री’ के सर्वोच्च पुरस्कार से उसे सम्मानित किया गया. आशीर्वाद प्राप्त करने आई नलिनी के सिर पर गदगद हो स्नेहपूर्वक हाथ फिराते हुए डॉ. गोस्वामी ने कहा था, “तुम नहीं जानती मैं कितना ख़ुश हूं नलिनी. काश! तुमने ३० वर्ष पूर्व ही जन्म ले लिया होता… भगवान तुम्हें दिन दूनी-रात चौगुनी सफलता प्रदान करें.”

आठ बज कर पांच मिनट पर हारी थकी नलिनी खाने की मेज पर पहुंची और पहुंचते ही खाने पर टूट पड़ी. बाबूजी को उस वक़्त वह नलिनी लग रही थी, जो स्कूल से आते ही लापरवाही से बस्ता फेंक स्वेद कणों को बिना पोंछे ही खाने पर टूट पड़ती थी. बाबूजी उठे और बेटी के सिर पर हाथ फिराते हुए पूछने लगे, “बेटा, क्या ज़ोरों की भूख लगी है?” नलिनी ने कहा, “नहीं पापा, मैं फटाफट खाना खाकर एक केस स्टडी करना चाहती हूं. मुझे कल एक सीरियस ऑपरेशन करना है.”

भावों को दबाने का असफल प्रयास करते हुए भी पिता ने आख़िरकार कह ही दिया, “बेटे, मैं तेरी शादी कर कर्तव्य से निवृत होना चाहता हूं. इस स्वान्तः सुखाय कर्म द्वारा मैं इस प्रकार तुम्हारी मां की आत्मा को भी संतुष्टि प्रदान कर पाऊंगा.”

नलिनी ने ‘मूड ऑफ’ करके न जाने क्या क्या कह दिया. मनोवेग को, अधिक स्पष्ट करते हुए उसने कहा, “पापा, मैं डॉक्टर हूं, जिसका जीवन अपना नहीं वरन् सिसकती, तड़पती मानवता की सेवा के लिए होता है. हर एक रुग्ण व्यक्ति मेरा मन्दिर है और स्वर्गीय मां की प्रेरणा से आप द्वारा दिखलाई गई उच्च शिक्षा के परिणाम जन्य मेरे द्वारा प्रस्तुत सेवाएं, मेरी पूजा के भाव-प्रसून है. प्लीज़ पापा, मुझे शादी के नकारात्मक बन्धन में न बांधे और यह आशीर्वाद दें कि मैं मां कि अन्तिम इच्छा पूरी कर सकूं, ताकि दुनिया में मेरी तरह कोई भी औलाद चिकित्सकीय सुविधाओं के अभाव में अपनी मां को खोकर जीवनभर बिना मां के न तड़पे.”

लम्बे वाद‌ विवाद के पश्वात् बाबू अविनाश चन्द्र बेटी को इस बात पर रजामंद कर पाए कि वे उसकी शादी उसी लड़के के साथ करेंगे, जो मानवता की सेवा में बाधक न हो. नलिनी ने यहां तक स्पष्ट तय करवा लिया था कि मानव सेवा के प्रथम दायित्व की पूर्ति के उपरान्त यदि समय शेष रहा तो गृहस्थ जीवन होगा, अन्यथा नहीं. वह आश्वस्त थी कि इन शर्तों पर कोई भी शादी करने को तैयार नहीं होगा.

आधुनिक विचारों से युक्त प्रवीण चन्द्र चक्रवतों, जो हयूस्टन (अमरीका) से अन्तरिक्ष विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त कर लौटा था, बाबू अविनाशचन्द्र की निगाहों में चढ़ गया. विश्वविख्यात डॉक्टर से शादी का मोह प्रवीण भी नहीं टाल सका अस्तु उसने डॉ. नलिनी की शर्तों पर शादी करना स्वीकार कर लिया.

सुजाता की अर्थी उठने के बाद प्रथम बार बाबूजी की कोठी पर व्यस्तता का वातावरण आज ही दिखाई पड़ रहा था. बधाई देने वालों का तांता बंधा हुआ था. प्रवीण और नलिनी की जोड़ी सर्वत्र सराही गई थी. बाबूजी बहुत प्रसन्न थे, लेकिन रह-रह कर उन्हें सुजाता की याद साल जाती थी. पड़ती भांवरों की पूर्ण होती गिनती लगातार बाबूजी को दायित्वमु‌क्ति का आभास करवा रही थी. बाबूजी जहां चिन्तामुक्त थे, वहीं प्रवीण, नलिनी जैसी पत्नी पाकर प्रफुल्लित था. किन्तु नलिनी व्यग्रता से औपचारिकताओं की समाप्ति का इन्तज़ार कर रही थी, ताकि वह रात्रि में ही कल के ऑपरेशन के लिए आवश्यक अध्यन कर तैयार हो सके.

दूसरे दिन डोली बिदाई की रस्म सम्पन्न हुई. प्रवीण व नलिनी दोनों कार में रवाना होकर सर्वप्रथम काली दर्शन को गए. नलिनी के भाल पर चमकता सिन्दूर सूर्य की किरणों से देदीप्यमान हो और भी चमक रहा था. प्रसन्न प्रवीण ‘मां’ से आशीर्वाद मांग रहा था, “बस, नलिनी सब कुछ छोड़ केवल उसी की हो जाए. नलिनी, देवी मां के चरणों में मस्तक झुकाए स्वामी विवेकानन्द की भांति भौतिक सुख न मांग, पीड़ित मानवता की सेवा का आशीर्वाद मांग रही थी. मां के चरणों में बिखर कर कुछ सौभाग्य कणों (सिन्दूर कणों) ने वचन दिया कि सेवा कार्य में हम कभी बाधक न होंगे.

आख़िर मन्दिर से लौटते वक़्त नलिनी निवेदन कर आवश्यक ऑपरेशन करने के लिए हॉस्पिटल ही रुक गई और कार में अकेला प्रवीण ही घर पहुंचा था. बिना बहू प्रवीण का अकेले लौटना मां को बहुत अखरा, किन्तु, उसे तत्क्षण ही आभास हो गया कि बेटा बहू नहीं, डॉक्टर ब्याह कर लाया है.

सार्यकाल तक सास देहली संजोये बहुरानी का इन्तजार कर रही थी और बहूरानी मृत्यु से जूझते रोगी को कृत्रिम श्वसन प्रक्रिया द्वारा जिन्दा रखने का प्रयास कर रही थी. मानवता की सेवा में स्वेदकणों ने श्रृंगार को धो डाला था, रक्तावर्ण वैवाहिक वस्त्रों से सुसज्जित नलिनी श्वेत परिधान में आवृत हो जीवन दान दे रही थी. सास और पति की आंखों में बसी गुड़िया जैसी बहू उनके स्वप्नों से एकदम बेखबर थी. ऑप्रेशन थियेटर में प्रवेश करने से पूर्व सौभाग्य सूचक सिन्दूर कणों को पहले ही अनाथ किया जा चुका था.

करीब सात बजे विजयी मुस्कान के साथ डॉ. नलिनी स्टाफ कार से हारी थकी पति के घर तक पहुंच पाई. विवाह के कपड़ों की गठरी बनाए हॉस्पिटल का चपरासी बगल में दबाए था. हाथ में ‘एमरजेन्सी ब्रीफकेस’ था और बहू डॉक्टरी परिधान में लिपटी विचारों में खोई थी. मोहल्ले की अन्य स्वियों के साथ राह जोहती सास ने प्रथम प्रवेश पर ही बहू की सूनी मांग, चूड़ियों से रहित एवं अमंगल सूचक श्वेत वस्त्रों में देख सिर ठोक लिया था. अन्य स्त्रियां कानाफूसी करती हास-परिहास मुद्रा में लौट गई थीं. यह तो प्रवीण ने बात संभाल ली, जो दोनों को ही समझाकर सीधा नलिनी को किसी ‘ब्यूटी पार्लर पर श्रृंगारित करवाने ले गया, मन ही मन सब एक-दूसरे से असंतुष्ट थे.‌

पूर्णतः मानवता को समर्पित नलिनी प्रथम रात्रि को भी पत्नी नहीं बन सकी, दाम्पत्य के आकर्षण से रहित देर रात तक अध्ययन क्लान्त देह को आवश्यक विश्राम, समय असमय टेलीफोन की घन्टी, हॉस्पिटल, बस यही सब कुछ था वहाँ. प्रतिज्ञा सूत्र में बंधा प्रवीण मन ही मन छटपटाता, मन को समझाता, इन्तज़ार करता, कि शायद वह भी कभी दाम्पत्य के क्षण व्यतीत कर पायेगा, जितना चातक-सा वह स्वाति नक्षत्र का इन्तज़ार करता, उतना ही वह दूर होता जा रहा था. लग रहा था, नक्षत्र-विज्ञान ने सत्ताईस नक्षत्रों की गणना में से स्वाति को निकाल बाहर किया है. प्रवीण की मृग मरीचिका अशान्त और वृद्धि की ओर अग्रसर थी. प्रथम रात्रि की भांति आगामी रात्रियां भी काल गर्त में समाती जा रही थीं, पति का अहम् जागता, परन्तु परिस्थितियों से समझौता कर शान्त होता रहता था.

विवाह हुए २ माह हो चुके थे, परन्तु अब भी श्रीमती नलिनी वास्तव में कुमारी नलिनी ही थी. वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रही थी. हर रात्रि में पत्नी क्लान्त, पत्ति अशान्त किंकर्तव्य विमूढ, और फिर, दैनन्दिनी की शुरुआत. एक दिन प्रवीण अपनी व्यथा डॉ. गोस्वामी को सुना बैठा. यों वह यह सब कुछ नहीं कहता, मगर डॉ. गोस्वामी का यह कहना उसे कचोट गया था, कि नलिनी से जुड़ा उसका पतित्व कितना सौभाग्यशाली है. व्यथित प्रवीण को एक माह के लिए नलिनी को रोमांटिक कश्मीर ले जाने का सुझाव एवं स्वीकृति डॉ. गोस्वामी ने दे दी. नलिनी को जब यह सब कुछ पता चला तो वह बहुत नाराज़ हुई, परन्तु वह इस शर्त पर जाने को रजामन्द हो गई कि हम कश्मीर का पता डॉ. गोस्वामी को दे जायेंगे और यदि किसी आवश्यक कारणवश उन्होंने बीच में ही बुला लिया तो हम तुरन्त लौट आयेंगे.

हवाई जहाज ने पंख पसार अन्य दम्पत्तियों की तरह उस दम्पत्ति को भी कश्मीर की वादियों में पहुंचा दिया, लेकिन उसे क्या पता था कि यह अन्य दम्पत्तियों से भिन्न है.

उल्लासमय दो सप्ताह न जाने कब भूतकाल बन गये, पति-पत्नी प्रसन्न थे. कभी-कभी नलिनी को हॉस्पिटल की याद हो आया करती थी, परन्तु प्रवीण कुशलतापूर्वक उसका ध्यान अन्य ओर आकर्षित कर ऐसे क्षणों को टाल दिया करता था. डॉ. गोस्वामी नियमित रूप से दैनिक रिपोर्ट भिजवा दिया करते थे, जिसके कारण नलिनी आश्वस्त थी.

उस दिन मौसम खुला हुआ था. सूर्य की सुनहरी रश्मियां हिमाच्छादित घाटियों को

प्रकाशित कर वादियों को और भी रोमांटिक बना रही थीं. ऐसे में चक्रवर्ती दम्पत्ति पहलगांव जाने का मोह न टाल सके. पहलगांव घूम कर दोनों प्रफुल्लित हो होटल लौटे, डाक के साथ ही नलिनी के नाम से एक एक्सप्रेस टेलिग्राम भी था. टेलिग्राम डॉ. पंकज गोस्वामी ने भेजा था, जिसमें एक केन्द्रीय मंत्री के सीरियस हार्ट ऑप्रेशन’ के लिए तुरन्त बुलवाया गया था. ऑप्रेशन को तारीख २५ थी, जब कि आज तारीख बाईस हो चुकी थी.

तुरन्त वापस लौटने की बात सुन प्रवीण अपना सन्तुलन खो बैठा, वह झुंझलाया एवं जाने के लिए मना कर दिया. संयमित हो उसने समझाना चाहा कि तुम पहले मेरी पत्नी हो, तत्पश्चात् एक डॉक्टर कृपया मेरे दिल को खंडित कर दूसरों के दिलों को मत जोड़ो, नलिनी! मेरा कहना मानो और तुम नौकरी से तुरन्त इस्तीफा दे दो. प्रवीण को विश्वास था कि आम महिलाओं की तरह पति आज्ञा को नलिनी भी शिरोधार्य करेगी, क्योंकि अब उसे भी नैसर्गिक सुखानुभूति हो चुकी है.

वाद विवाद जारी रहा. सीमा बन्धन खण्डित होने लगे. न ही तो मानव सेवा भाव हार मान रहा था और न पति अहम् पराजय स्वीकारने को तैयार था. उधर तीनों प्रहर प्रो. गोस्वामी के तार नियमित रूप से पहुंच विवादाग्नि को और प्रज्वलित कर रहे थे. ऊर्जा पर्याप्त उत्पन्न हो चुकी थी. फैसला नलिनी के हाथ था ‘विवाहित जीवन ‘ अथवा ‘मानव सेवा’, मात्र २४ घन्टे ऑप्रेशन

जितना चातक सा वह स्वाति नक्षत्र का इन्तज़ार करता, उतना ही वह दूर होता जा रहा था. लग रहा था, नक्षत्र-विज्ञान ने सत्ताईस नक्षत्रों की गणना में से स्वाति को निकाल बाहर किया है.

करती भूल भुलैया सी प्रवीण पतवार, द्वन्द्व बढ़ते जा रहे थे. कुछ क्षणों को झपकी पलके एक संक्षित स्वप्न दे दिशा निर्देश कर ही गई. मृत्यु से जूझती स्वर्गीया मां, छोटा-सा गांव, चिकित्सकीय सुविधाओं का सर्वथा अभाव, थोथा ढांढस बांधे व्यथित पिता, बिलखती दस वर्षीया किंकर्तव्यविमूढ़ वह स्वयं… बस, बस दिग्दर्शन पर्याप्त था, वह एकदम चौंक कर उठी. पौ फट चुकी थी, प्रवीण स्त्रान घर में था.

नलिनी ने कलाई पर बंधी घड़ी में समय देखा, एक क्षण सोचा और तुरुन्त ब्रीफकेस में आवश्यक सामान लिया, खेद सहित संक्षेप में अपना फैसला लिखा और तुरन्त टैक्सी ले हवाई अड्डे रवाना हो गई. साढ़े आठ बजे की उड़ान में उसे जगह प्राप्त हो गई और वह कलकत्ता के लिए रवाना हो गई. पीछे पीछे प्रवीण भी हवाई अड्डे पहुंचा, परन्तु तब तक विमान धरती छोड़ चुका था.

नलिनी सीधे हॉस्पिटल पहुंची और मंत्री महोदय की जांच की. दो घन्टे की पूरी जांच एवं अध्ययनोपरान्त वह ऑप्रेशन थियेटर में पहुंच गई, छः घन्टे की कड़ी मेहनत निखार ले आई और रुकती हृदय स्पन्दन नियमित हो गई. देश की कोटिशः जनता कृतज्ञ थी, परन्तु प्रवीण उद्विग्न था. प्रो. गोस्वामी शिष्या की एकलव्यवत् परीक्षा ले गर्वाभिभूत थे. कर्तव्य पालन की संतुष्टि नलिनी के मुखमण्डल पर मुखरित थी.

के लिए शेष थे, उधर मंत्री महोदय जीवन के लिए संघर्षरत् थे और इधर नलिनी.

करवटें बदलते रात गुजरी. आकाशीय विद्युत सम कोंधते विचार, मन में भूचाल, कड़ी परीक्षा लेता गहन सेवा का समुद्र, पलायन को प्रेरित हॉस्पिटल से नलिनी सीधे पति गृह न जा कर एक प्रसिद्ध वकील के यहां पहुंची और आवश्यक काराज तैयार करवा पिता के घर पहुंच गई, पिता असंतुष्ट जान पड़ते थे, किन्तु विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहे. दूसरे दिन प्रवीण भी मनाने आया, परन्तु सेवा भाव अपने निर्णय पर अटल था और वाद न्यायालय में विचाराधीन था.

– रमाकान्त ‘कान्त’

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