रमाकांत जी कुछ बोल नहीं पाए. आंखों के कोने गीले हो गए. “पापा? आप सुन रहे हो? आप हंस क्यों रहे हो?”“कुछ नहीं बेटा,” उन्होंने धीमे से कहा. “बस लगा, कर्ज़ उतर रहा है और सच ही तो है… कर्मा रिटर्न्स!..”
“तुम्हें पता है, मेरी एक प्रॉब्लम है. मुझे हर लड़की में अपनी बेटी दिखाई देती है.”
चाय की दुकान पर 50 साल के रमाकांत जी ने यह कहा तो उनके दोस्त हरिओम हंस पड़े.
“अरे, यह कोई प्रॉब्लम है? यह तो एक तरह की बीमारी है.”
“बीमारी ही सही पर मैं कर्मा रिटर्न्स पर भरोसा करता हूं.” रमाकांत जी ने कुल्हड़ नीचे रखा.
हरिओम फिर से हंस पड़े थे, पर रमाकांत जी शांत रहे.
“सब्ज़ी वाली लड़की तराज़ू उठाती है तो लगता है उसकी कलाई लचक न जाए. बस में कोई लड़की अकेली चढ़ती है तो मैं तब तक नहीं उतरता जब तक उसका स्टॉप न आ जाए.
कल रात स्टेशन के बाहर एक लड़की फोन कान से लगाए खड़ी थी, बार बार इधर उधर देख रही थी. मैं आधा घंटा दूर खड़ा रहा. उसकी गाड़ीआई, वह बैठी, तब जाकर मैं लौटा.”
“उसे पता था कि तुम खड़े हो?”
“नहीं. पता भी नहीं चलना चाहिए. उसे अकेले होने का डर नहीं लगना चाहिए, बस यही चाहता हूं.”
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हरिओम ने धीरे से पूछा, “अनु तो पुणे में है न?”
“हां. उसे फोन पर कहता हूं ध्यान रखना तो चिढ़ जाती है. कहती है, पापा, मैं बड़ी हो गई हूं.” रमाकांत जी मुस्कुराए.
“मैं उसे वहां तक पहुंचा नहीं सकता. इसलिए यहां जो भी लड़की दिखती है, उसे पहुंचा देता हूं. क्या पता, वहां कोई मेरी अनु को भी पहुंचा रहा हो.”
हरिओम चुप हो गया. इस बार उसने हंसने की कोशिश भी नहीं की.
उस रात ग्यारह बजे फोन बजा. स्क्रीन पर अनु का नाम चमका.
“पापा, आज ऑफिस से देर हो गई थी. ऑटो नहीं मिला तो पैदल निकली. एक अंकल मेरे पीछे-पीछे बहुत दूर तक आए. मैं डर के मारे तेज़ चलनेलगी. फिर मेरी बिल्डिंग का गेट आया. मैंने अंदर जाकर मुड़कर देखा, तो वे वहीं रुके थे. जब मैं लिफ्ट में चढ़ गई, तब वे लौट गए. पापा, मुझे बाद में समझ आया कि वे मुझे छोड़ने आए थे.”
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रमाकांत जी कुछ बोल नहीं पाए. आंखों के कोने गीले हो गए.
“पापा? आप सुन रहे हो? आप हंस क्यों रहे हो?”
“कुछ नहीं बेटा,” उन्होंने धीमे से कहा.
“बस लगा, कर्ज़ उतर रहा है और सच ही तो है…कर्मा रिटर्न्स!..”
– नीरज
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