विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों और संस्कृतियों का संगम माना जाता है. भारतीय समाज में संयुक्त परिवार की एक समृद्ध परंपरा रही है, जहां साथ मिलकर रहना और एक-दूसरे का संबल बनना आदर्श माना गया है. परंतु, जब इसी घर की चारदीवारी के भीतर आपसी सामंजस्य के स्थान पर लगातार क्लेश, मानसिक प्रताड़ना और टॉक्सिक वातावरण पनपने लगे, तो वैवाहिक जीवन का मूल आधार मानसिक शांति और गरिमा संकट में पड़ जाता है.
ऐसे में एक यक्ष प्रश्न खड़ा होता है कि क्या परंपरा और सामाजिक दबाव के नाम पर घुट-घुट कर जीना ही एकमात्र विकल्प है या अपनी मानसिक सेहत और शादी को बचाने के लिए अलग आशियाना बनाना सही कदम है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21, देश की सर्वोच्च अदालतें (सुप्रीम कोर्ट) और घरेलू हिंसा क़ानून (DV Act, 2005)
यह स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि किसी भी व्यक्ति को मानसिक प्रताड़ना सहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. अलग घर बसाना परिवार तोड़ना या कोई पाप नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा, स्वाभिमान और बिखरते रिश्ते को थामने का एक समझदारी भरा व क़ानूनी रूप से मान्य प्रयास है. कैसे, आइए जानते हैं.
जानें ससुरालवाले कैसे घर के माहौल को ख़राब करते हैं?
बेटे को बहू के ख़िलाफ़ भड़कानाः छोटी छोटी बातों को ग़लत ढंग से पेश करके दोनों के बीच में ग़लतफ़हमी पैदा की जाती है, जिससे बेटा बहू पर चिल्लाता है और दोनों के बीच बातचीत बंद हो जाती है. इसका फ़ायदा भी ससुरालवाले उठाते हैं और चिकनी चुपड़ी बातों में बेटे को फंसाते हैं और बहू को पति से अलग करने की कोशिश करते हैं.

बेटे को जोरू का ग़ुलाम होने का ताने देनाः माता-पिता अपने ही बेटे को बेवजह गिल्ट में रखते हैं और उसे एहसास कराते रहते हैं कि शादी के बाद तुम बहुत बदल गए हो. तुम्हें अपनी बीवी के आगे कुछ दिखता ही नहीं. ऐसे में बेटा माता-पिता को ख़ुश करने के लिए पत्नी से दूरी बनाने लगता है और दोनों का रिश्ता ख़राब होने लगता है.
घर में तुलना करनाः अब यह तुलना बेटों के बीच भी हो सकती है और हर वक़्त देवरानी के ज़्यादा समझदार और पढ़ा लिखा होने का ताना बड़ी बहू को दिया जाता है. उसे हर काम हर बात में नीचा दिखाया जाता है कि वह किसी भी काम के लायक नहीं है. ऐसे में धीरे-धीरे वह अपना आत्मविश्वास खोने लगती है.
अपनी मनमर्ज़ी करनाः जब घर के बड़े लोग हर बात में अपनी मनमर्ज़ी करने लगें, चाहे वह बात ग़लत ही क्यों ना हो, तो मामला और भी बिगड़ जाता है. इस स्थिति में वहां सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है. जैसे कि खाने में क्या बनेगा? तुम अपने मायके कब जाओगी? तुम कितनी देर फोन का इस्तेमाल करोगी? बच्चों की परवरिश कैसे करनी है? हर बात में अपनी मर्ज़ी थोपने से घर का माहौल टॉक्सिक हो जाता है.

प्राइवेसी का सम्मान न करनाः पति-पत्नी के निजी मामलों, कमरे की प्राइवेसी या उनके व्यक्तिगत ़फैसलों में बिना वजह टांग अड़ाना.
ऐसे टॉक्सिक माहौल से बचने के लिए क्या करें-
पति-पत्नी एक दूसरे का साथ देंः ऐसे समय पर पति को चाहिए कि घरवालों की बातों में आकर अपना रिश्ता पत्नी के साथ ख़राब ना करें, बल्कि दोनों एक-दूसरे को समझें और इस समस्या का हल बातचीत के ज़रिए खोजने का प्रयास करें. पत्नी की ढाल बनें.
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अपने फ़ैसले ख़ुद लें: माता-पिता की सेवा करें, उन्हें पैसे दें, उनका पूरा ध्यान रखें. लेकिन आपका और आपकी पत्नी का बेडरूम, आपके बच्चे और आपके पर्सनल ़फैसलों में उनका दख़ल पूरी तरह बंद होना चाहिए.
अपनी प्राइवेसी का पूरा ध्यान रखेंः आपकी अपनी भी ज़िंदगी है और इसे अपने तरी़के से जीने का आपको और आपकी पत्नी को पूरा अधिकार है, इसलिए हर बात में माता-पिता को बीच में ना लाएं. अपना फर्ज़ निभाएं, लेकिन उन्हें ख़ुद पर इस तरह हावी ना करें कि अपनी ज़िंदगी ही जीना भूल जाएं और हर वक़्त घर में प्राइवेसी की जगह क्लेश होने लगे.
‘लो-कॉन्टैक्ट’ नियम अपनाएंः हर बात या बहस पर प्रतिक्रिया देना बंद करें. टॉक्सिक लोग अक्सर आपको भड़काने की कोशिश करते हैं. जब आप शांत रहकर जवाब देंगे, तो उनका नियंत्रण ख़त्म होने लगेगा.
‘ना’ कहना सीखेंः यदि आपकी क्षमता या इच्छा से बाहर जाकर कोई अनुचित मांग (जैसे अत्यधिक काम का बोझ या आर्थिक नियंत्रण) की जा रही है, तो बिना गिल्ट महसूस किए विनम्रता से मना करना सीखें.
अपना अलग आशियाना बनाना ग़लत नहीं हैः हर रोज़ के क्लेश, अपमान और तनाव में रहकर एक-दूसरे से नफ़रत करने से कई गुना बेहतर है कि थोड़ी शारीरिक और भावनात्मक दूरी बनाकर रिश्तों में मिठास और सम्मान कायम रखा जाए. एक ज़िम्मेदार बेटा अलग घर में रहकर भी अपने बूढ़े माता-पिता की देखभाल कर सकता है, उनकी आर्थिक मदद कर सकता है और समय-समय पर उनसे मिलने जा सकता है. यह कदम बेटे और पति दोनों कर्तव्यों के बीच एक संतुलित रास्ता हो सकता है.
अलग आशियाना बनाने का फेवर क़ानून और कोर्ट भी करता है
जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण और शांतिपूर्ण जीवन जीने का अधिकार है. आइए जानें कैसे-
मानसिक शांति और जीवन का अधिकार (Article 21)
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन और मानसिक शांति का अधिकार देता है. यदि कोई व्यक्ति अपने घर या ससुराल में लगातार मानसिक तनाव, अपमान, ताने या भावनात्मक शोषण का सामना कर रहा है, तो यह अनुच्छेद 21 के तहत मिले मानसिक शांति के अधिकार का हनन है. अगर ससुराल में रहने पर पति-पत्नी की मानसिक शांति भंग हो रही है, तो उन्हें वहां रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. वे चाहें तो अपना अलग घर बसा सकते हैं. यह हर व्यक्ति का अधिकार है. इसे घर तोड़ना नहीं, बल्कि अपना घर और रिश्ते बचाने की एक कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए.
घरेलू हिंसा क़ानून (DV Act, 2005)
‘डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट’ के तहत मानसिक और भावनात्मक उत्पीड़न को भी गंभीर अपराध माना गया है. अगर ससुराल का माहौल टॉक्सिक है, तो महिला इसके ख़िलाफ़ क़ानून की मदद ले सकती है. यह हिंसा केवल शारीरिक हो, यह भी ज़रूरी नहीं है, बल्कि अगर आप मानसिक रूप से परेशान हं, कोई आपके साथ गाली-गलौज कर रहा है, आपके कैरक्टर को लेकर सवाल उठा रहा है, झूठ और भ्रामक बातें फैला रहा है, तो यह भी हिंसा ही है. इसके अलावा अगर ससुरालवाले आपको कुछ कहने नहीं दें, आपके कपड़े-गहने छीन लें, आपको एक एक पैसे के लिए मोहताज़ कर दें, पति की सैलेरी भी उनके ही अकॉउंट में जाए, आपको नौकरी ना करने दें, यह सब भी हिंसा की श्रेणी में आता है और इसके लिए आप अपना ससुराल छोड़ सकती है. आपको क़ानूनन ऐसा करने का पूरा हक़ है.
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देश की अदालतें क्या कहती हैं?
नरेंद्र बनाम के. मीना (सुप्रीम कोर्ट) (2016)
यह सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक और बेहद चर्चित ़फैसला है. 2016 के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय दिया था, वह पति के पक्ष में था. इस मामले में पत्नी लगातार पति पर उसके बूढ़े माता-पिता को छोड़ने और अलग घर बसाने का दबाव बना रही थी, जिसके लिए कोई ठोस या न्यायसंगत कारण (जैसे कोई गंभीर उत्पीड़न) नहीं था. लेकिन फिर देश की सबसे बड़ी अदालत ने साफ़ कहा है कि शादी के बाद पति-पत्नी को अपनी ज़िंदगी बसाने के लिए प्राइवेसी और स्पेस की ज़रूरत होती है. अगर घर में रोज़-रोज़ के क्लेश हैं और पत्नी अपनी मानसिक शांति के लिए अलग घर की मांग करती है, तो इसे पति पर क्रूरता (Cruelty) नहीं माना जाएगा, लेकिन यह सिद्ध होना चाहिए कि क्रूरता हो रही है. सार यही है कि भारतीय क़ानून किसी को भी अपने माता-पिता को बेवजह छोड़ने के लिए नहीं कहता, लेकिन क़ानून यह भी कभी नहीं कहता कि कोई महिला या पुरुष टॉक्सिक माहौल और प्रताड़ना में घुट-घुट कर जिए. यदि कारण जायज़ है, तो मानसिक शांति और निजता के लिए अलग रहना क़ानून की नज़र में पूरी तरह सही है.
लक्ष्मी वसंत थिटे बनाम वसंत श्रीपाद थिटे (2021)
क़ानूनी रिकॉर्ड्स के अनुसार, लक्ष्मी वसंत थिटे से जुड़े मामले (जैसे Vasant Shripad Thite v. Laxmi Vasant Thite)
बॉम्बे हाई कोर्ट में पारिवारिक विवादों, भरण-पोषण और वैवाहिक अधिकारों से संबंधित रहे हैं. बॉम्बे हाई कोर्ट ने साफ़ किया कि यदि सास-ससुर का बर्ताव टॉक्सिक है, तो अलग घर की व्यवस्था करना पति का कर्तव्य है. यह सिद्धांत केवल इस एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि बॉम्बे हाई कोर्ट और देश की कई अन्य अदालतों ने लगातार अपने विभिन्न ़फैसलों में इस विचार को स्थापित किया है. अगर सास-ससुर का बर्ताव बहू के प्रति लगातार टॉक्सिक और अपमानजनक है, तो यह पति का फर्ज़ है कि वह अलग घर की व्यवस्था करे. पत्नी को घुट-घुट कर जीने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.
सतीश चंद्र शर्मा बनाम स्नेहा शर्मा (Satish Chandra Sharma v. Sneha Sharma) 2014 (मध्य प्रदेश हाई कोर्ट)
इस मामले में पति-पत्नी के बीच परिवार के हस्तक्षेप और आए दिन होने वाले क्लेश के कारण अलग रहने का मुद्दा उठा था. हाई कोर्ट ने माना कि यदि ससुराल का माहौल लगातार तनावपूर्ण है और परिवार के सदस्य वैवाहिक जीवन में अत्यधिक दख़ल दे रहे हैं, तो पत्नी द्वारा अलग मकान की मांग करना वैवाहिक क्रूरता (Cruelty) नहीं है. कोर्ट ने कहा कि शादी को बचाने के लिए शांतिपूर्ण माहौल बेहद ज़रूरी है.
रीना अग्रवाल बनाम अनुपम वर्मा (Reena Agarwal v. Anupam Verma) 2003 (दिल्ली हाई कोर्ट)
इस मामले में कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की थी कि विवाह के बाद पत्नी को अपने ससुराल में गरिमा, सुरक्षा और मानसिक शांति के साथ रहने का पूरा अधिकार है. यदि ससुराल में लगातार ऐसा माहौल बनाया जाता है, जहां महिला का मानसिक स्वास्थ्य और सम्मान प्रभावित हो रहा हो, तो पति का यह कर्तव्य है कि वह अपनी शादी को बचाने और पत्नी को सुरक्षित माहौल देने के लिए आवश्यक कदम उठाएं.
– शिखा जैन

