आज की स्मार्ट और समझदार महिलाएं घर-परिवार-करियर की तमाम ज़िम्मेदारियां निभाते हुए अपने मी टाइम को भी एंजॉय कर रही हैं. जी हां, महिलाएं बदल रही हैं और उनमें आए इस बदलाव को उनका परिवार और समाज भी स्वीकारने लगा है. और सबसे ख़ास बात, इस बदलाव से महिलाओं की ज़िंदगी और भी ख़ूबसूरत हो गई है. महिलाओं के लिए क्यों और कितना ज़रूरी है मी-टाइम? आइए, जानते हैं.

ये बात तो हम सभी जानते हैं कि यदि आप ख़ुद ख़ुश नहीं हैं तो आप दूसरों को कभी ख़ुश नहीं रख सकते, इसलिए सबसे पहले आपका ख़ुश होना ज़रूरी है. आज की स्मार्ट और सुलझी हुई महिलाएं ये बात अच्छी तरह जानती हैं इसलिए वो घर-परिवार, करियर की तमाम ज़िम्मेदारियां निभाते हुए अपने लिए अलग से व़क्त निकालती हैं और अपने मी-टाइम को पूरी तरह एंजॉय करती हैं. ये टाइम स़िर्फ उनका होता है, जिसे वो अपनी फ्रेंड्स के साथ बिताना पसंद करती हैं.
महिलाओं में मी-टाइम कोई नई बात नहीं
साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ कहती हैं, “महिलाओं में मी-टाइम का चलन कोई नई बात नहीं है. बहुत पहले से ही, जब महिलाओं को बहुत एक्सपोज़र नहीं मिला था, तब भी उनके मी टाइम को ध्यान में रखते हुए उन्हें पीरियड्स के दौरान 5 दिनों का और बच्चे के जन्म के बाद 40 दिनों का मी टाइम दिया जाता था. इसी तरह साल में 2-3 बार त्योहार या रीति-रिवाज़ के नाम पर महिलाओं को उनके मायके भेज दिया जाता था, ताकि वो वहां पर अपना मी टाइम एंजॉय कर सकें. मोहल्ले की तमाम महिलाओं का इकट्ठा होकर गप्पे लड़ाना या गॉसिप करना भी उनका मी-टाइम ही होता था. पीरियड्स के दौरान महिलाएं अपने मी टाइम को अपनी इच्छानुसार बीताती थीं. इसी तरह जब महिलाएं अपने मायके जाती थीं, तो मायके वाले इस बात का ख़ास ध्यान रखते थे कि वो अपने इस टाइम को पूरी तरह एंजॉय कर सकें. मायके जाकर महिलाएं अपनी सहेलियों, भाभी, कज़िन्स आदि के साथ क्वालिटी टाइम बिताती थीं और रिफ्रेश होकर ससुराल लौटती थीं.”
करियर वुमन के लिए ज़्यादा ज़रूरी है मी-टाइम
जब तक महिलाओं की दुनिया घर की चारदीवारी तक सिमटी थी, तब तक तो उन्हें अपनी ननद, भाभी, पड़ोसन आदि के साथ मी टाइम बिताने का मौक़ा मिल जाता था, दिक्कत तब शुरू हुई जब महिलाओं ने घर से बाहर क़दम रखा और घर-बाहर दोनों जगहों की ज़िमेदारियां संभालनी शुरू की. धीरेधीरे महिलाओं को करियर बनाने की आज़ादी तो मिलने लगी, लेकिन उनकी घर की ज़िममेदारियों का बोझ कम नहीं हुआ. परिवार के लोगों को लगने लगा कि बहू को नौकरी पर भेजकर उन्होंने उस पर एहसान किया है इसलिए उसे करियर के साथ-साथ घर की ज़िममेदारियां भी पूरी तरह निभानी चाहिए. इसका नतीजा ये हुआ कि करियर वुमन की आर्थिक स्थिति तो सुधरने लगी, लेकिन उसका मी-टाइम छिन गया. करियर वुमन की ज़िंदगी घड़ी की सूइयों की नोक पर घूमने लगी. कॉलेज प्रोफेसर सुमन सिंह कहती हैं, “मुझे तो लगता है करियर वुमन होना किसी अभिषाप से कम नहीं. हमारी अपनी कोई ज़िंदगी ही नहीं होती. महिलाओं ने नौकरी करनी क्या शुरू की परिवार के लोगों ने उन्हें सुपर वुमन बना दिया. घर के सारे काम के अलावा बच्चों की पढ़ाई, घर के सारे बिल, बैंक के काम… धीरे-धीरे मर्दों ने अपने सारे काम महिलाओं की ओर सरका दिए. कभी-कभी तो लगता है कि हमसे सुखी वो महिलाएं थीं, जिन्हें घर के चूल्हे-चौके के अलावा और किसी काम से कोई मतलब नहीं था. महिलाओं के काम करते ही पुरुष जैसे रिलैक्स हो गए, अब उन्हें लगता है कि उनकी बीवी सबकुछ संभाल लेगी, लेकिन बीवी को कौन संभालेगा, इसकी किसी को परवाह नहीं रहती.”
…क्योंकि बदलाव ज़रूरी था
साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ के अनुसार, “महिलाओं ने यदि मी-टाइम की डिमांड करनी शुरू की, तो इसमें कुछ ग़लत नहीं है. अति किसी भी चीज़ की अच्छी नहीं होती. महिलाएं जब घर और करियर दोनों जगहों पर अपनी क्षमता से ज़्यादा काम करती हैं, तो इससे उनकी मेंटल और फिज़िकल हेल्थ बिगड़ने लगती है, जो न उनके लिए सही है और न ही उनके परिवार के लिए. लंबे समय तक घर-बाहर की दोहरी ज़िममेदारियां निभाते हुए महिलाओं को ये महसूस होने लगा कि उनके साथ ज़्यादती हो रही है, इसीलिए उन्होंने मी-टाइम की डिमांड करनी शुरू कर दी. आप इसे महिलाओं का मी-टाइम और शी-टाइम भी कह सकते हैं, क्योंकि अपने इस टाइम को वो परिवार के साथ नहीं, बल्कि अपनी फ्रेंड्स के साथ बिताना पसंद करती हैं. जहां न उन्हें कोई रोकने-टोकने वाला हो और न ही उन पर किसी तरह की कोई ज़िम्मेदारी हो.”
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इसलिए ज़रूरी है मी टाइम-शी टाइम
दिन-रात मेहनत करते हुए जब कुछ समय बेफिक्रे होकर अपने फ्रेंड्स के साथ बिताने का मौक़ा मिलता है, तो आप एक बार फिर से चार्जअप हो जाते हैं. इससे आपको नई ऊर्जा मिलती है और आप अपना काम और तमाम ज़िम्मेदारियां ख़ुशी-ख़ुशी पूरी कर लेते हैं. महिलाएं जब फ्रेंड्स के साथ शॉपिंग, डिनर या हॉलिडेज़ पर जाती हैं, तो उस समय उन पर किसी तरह का बोझ नहीं होता, लेकिन जब वो परिवार के साथ घूमने जाती हैं, तो उनका पूरा समय परिवार के सभी सदस्यों की सेवा-टहल में ही गुज़र जाता है और वो अपने हॉलिडेज़ को एंजॉय नहीं कर पातीं. हॉलिडेज़ पर भी परिवार के सदस्य यही उम्मीद करते हैं कि घर की महिलाएं वहां भी उनकी ज़रूरत की हर चीज़ उनके हाथ में दे. लेकिन महिलाएं जब अपनी फ्रेंड्स के साथ घूमने जाती हैं, तो वो पूरी तरह आज़ाद होती हैं और अपने हॉलिडेज़ को ज़्यादा एंजॉय कर पाती हैं.

मिल रहा है परिवार का सपोर्ट
कुछ समय पहले तक जब महिलाएं स़िर्फ घर और करियर के बीच ही उलझी रहती थीं, तो उनके काम के बोझ का असर उनकी सेहत और व्यवहार पर भी पड़ने लगा, जिससे कपल्स के बीच झगड़े होना, परिवार में वाद-विवाद की स्थिति बढ़ने लगी. ऐसे में सुलझे हुए परिवार के लोगों को भी ये समझ आने लगा कि उनके घर की महिलाएं ख़ुश नहीं हैं और ऐसा होना परिवार के लिए ठीक नहीं है. ऐसे में घर की महिलाओं ने जब मी-टाइम की डिमांड करनी शुरू की, तो परिवार के लोगों को भी उनकी मांग सही लगी और उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी महिलाओं को अपने इस स्पेशल टाइम को एंजॉय करने की इजाज़त देनी शुरू कर दी. बस, यहीं से एक बार फिर शुरुआत हुई महिलाओं के मी-टाइम की. अब तो महिलाएं बकायदा वीकेंड पर या महीने में एक बार अपनी फ्रेंड्स के साथ मी टाइम ज़रूर बीताती हैं. साथ ही अब महिलाएं एक साथ हॉलिडेज़ पर जाने लगी हैं और उनके परिवार भी उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी घूमने जाने देते हैं. महिलाओं में आया ये बदलाव उनकी फिज़िकल-मेंटल हेल्थ के लिए बहुत अच्छा है. रिटायर्ड बैंक ऑफिसर माधवी शर्मा ने बताया, “हमारे ज़माने में इतना ही काफ़ी था कि ससुराल वाले हमें नौकरी करने की इजाज़त दे रहे हैं. मी-टाइम के बारे में सोचने की तो कभी हिम्मत ही नहीं हुई. किसी भी महिला के लिए घर और करियर दोनों एक साथ संभलना आसान नहीं होता. सबकी इच्छाएं पूरी करते-करते महिलाएं अपने बारे में सोचना ही भूल जाती हैं. मैंने झेला है इस तकलीफ़ को इसलिए मैं अपनी बहू के साथ ऐसा नहीं होने देना चाहती. वो दिन-रात हम सबके लिए इतनी मेहनत करती है, मेरे बेटे के जितना ही कमाती भी है, तो क्या ये हमारी ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि हम भी उसकी ख़ुशी के बारे में सोचें.”
ट्रैवल कंपनियां देती हैं स्पेशल पैकेज
महिलाओं में बढ़ते मी-टाइम और शी-टाइम को देखते हुए अब ट्रैवल कंपनियां भी लेडीज़ स्पेशल ट्रैवल पैकेज देने लगी हैं, जिसमें महिलाओं की सेफ्टी और कंफर्ट का ख़ास ध्यान रखा जाता है. महिलाएं अपनी फ्रेंड्स के साथ इन ट्रैवल पैकेज का जमकर लुत्फ़ उठा रही हैं और अपने मी-टाइम को और भी ख़ास बना रही हैं. आरती अपनी चार सहेलियों के साथ हर साल एक हफ्ते के लिए घूमने का प्लान बनाती हैं और फ्रेंडस के साथ ख़ूब एंजॉय करती हैं. आरती ने बताया, “हम पांचों सहेलियां वर्किंग हैं और दिन-रात अपने काम में बहुत बिज़ी रहती हैं, लेकिन हम सब महीने में एक दिन ज़रूर मिलते हैं और उस दिन हम स़िर्फ अपने मन की करते हैं. वो एक दिन हम सबके लिए स्ट्रेस बस्टर का काम करता है और महीनेभर मेहनत करने की ऊर्जा देता है. हम सब साल में एक बार हफ्तेभर के लिए हॉलिडेज़ पर भी जाते हैं और ये हमारा गोल्डन टाइम होता है. परिवार-ऑफिस की सभी झंझटों से दूर इस एक हफ्ते को हम जी भर के जी लेते हैं. मुझे लगता है महिलाओं का मी टाइम उनकी ख़ुशी से ज़्यादा उनके मेंटल और फिज़िकल हेल्थ के लिए ज़रूरी है.
गर्लफ्रेंड के साथ घूमना इसलिए है फ़ायदेमंद
साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ कहती हैं, “जब एक लड़का और लड़की साथ घूमने जाते हैं, तो वो घूमना एंजॉय करने के बजाय एक-दूसरे को इंप्रेस करने में लगे रहते हैं, जिससे वो खुलकर नहीं रह पाते, लेकिन जब स़िर्फ लड़कियों या स़िर्फ लड़कों का ग्रुप कहीं घूमने जाता है, तो उनके बीच कोई फॉर्मेलिटीज़ नहीं होतीं, जिससे वो अपनी ट्रीप को पूरी तरह एंजॉय कर पाते हैं. यही वजह है कि मैरिड कपल भी एक-दूसरे के बजाय अपने फ्रेंड्स ग्रुप के साथ घूमने जाना ज़्यादा पसंद करते हैं और इसमें कुछ ग़लत नहीं है.”
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ये हैं महिलाओं में बढ़ते मी टाइम की ख़ास वजहें
* अपनी आज़ादी को महसूस करने और ख़ुशी के पल जुटाने की चाह.
* कुछ समय के लिए घर-परिवार, करियर की तमाम ज़िम्मेदारियों से ख़ुद को अलग करने की चाह.
* अपना मेंटल स्ट्रेस कम करने के लिए महिलाएं चाहती हैं मी टाइम.
* वर्किंग वुमन को कई बार काम के कमिटमेंट के कारण बच्चों की छुट्टियों में भी मायके जाने का मौक़ा नहीं मिलता इसलिए वो फ्री टाइम में फ्रेंड्स के साथ घूमना पसंद करती हैं.
* वो अपनी आर्थिक आज़ादी को महसूस करना चाहती है और ऐसा वो अपने मी टाइम में ही कर पाती है.
– कमला बडोनी
