चाइल्ड मैरिज- ऐसे करो न मुझे विदा (Do not leave me like a child marriage )

child marriage

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जो उम्र एच फॉर हेन और एम फॉर मंकी पढ़ने की होती है, उसी उम्र में मासूम बच्चों को कई माता-पिता और हमारा समाज एच फॉर हसबैंड और एम फॉर मैरिज सिखा रहा है. तितली की तरह खुले वातावरण में उड़ता बालमन शादी जैसे भारी-भरकम शब्दों के जाल में फंसकर रह गया है. माफ़ कीजिए, स़िर्फ शब्द ही क्यों, ज़िम्मेदारी का एहसास भी कराया जा रहा है. सभ्य, सुशिक्षित और ख़ुद को आधुनिक कहने वाला ये समाज मासूमों को कम उम्र में शादी के बंधन में पूरे उल्लास और बैंड-बाजे के साथ बांध रहा है. आइए, देखते हैं ऐसे ही कुछ उदाहरण जब अपनी गुड़िया को दुल्हन बनाने वाली मासूम बच्चियां ख़ुद दुल्हन बनकर इस कुप्रथा की सूली चढ़ीं.

  • जुलाई 2015 में राजस्थान के एक 35 साल के पुरुष ने 6 साल की लड़की से इसलिए शादी की, क्योंकि उसका किसी दूसरी शादीशुदा महिला के साथ संबंध था. समाज को चुप कराने के लिए उसने ये विवाह किया ताकि अब उसे कोई कुछ न कह पाए. बताया जाता है कि ये पुरुष पार्षद है. सुनकर भले ही आपको विश्‍वास न हो, लेकिन ये घटना सत्य है.
  • जून 2015, उत्तर प्रदेश के भावली गांव की विधवा राधा की तीन बेटियां और एक बेटा है. बड़ी बेटी की शादी पहले हो चुकी थी. अपनी 17 वर्षीया मझली बेटी और 13 साल की छोटी बेटी का विवाह भी राधा ने तय कर दिया है. बड़ी वाली लड़की के लिए 26 साल का दुल्हा, तो छोटी के लिए उसने 35 साल के पुरुष को अपने दामाद के रूप में चुना. बेटे और गांव के बाकी लोगों के मना करने पर भी जब राधा नहीं मानी, तो उसके अपने ही बेटे ने मां के ख़िलाफ़ पुलिस में मामला दर्ज करवाया. पुलिस के सामने तो राधा ने छोटी बेटी के विवाह को रोक दिया, किंतु अपनी 17 साल की नाबालिग बेटी का विवाह कर दिया. लोगों को लगा कि अच्छा हुआ उसने 13 साल की अपनी बेटी का विवाह नहीं किया, किंतु बाद में उसी दिन राधा ने छोटी बेटी का भी विवाह कर दिया.
  • मई 2015 में ही मध्य प्रदेश के जैतहरी क्षेत्र की 15 वर्षीया लड़की की शादी की ख़बर मिलते ही पुलिस ने वो शादी तो रोक दी, लेकिन कुछ ही दिन बाद फिर से दोनों परिवार वालों ने मिलकर शादी को अंजाम दे दिया.
    क्या है कारण?

    बाल विवाह जैसी घातक बीमारी का क्षेत्र बढ़ता ही जा रहा है. क्या आप जानते हैं कि इस कुप्रथा का आख़िर कारण क्या है?
    ग़रीबीः भले ही आज दुनिया चांद-सितारों पर पहुंच गई हो, लेकिन इसी धरती पर कुछ जगहें ऐसी भी हैं, जहां पेटभर खाना भी लोगों को नसीब नहीं होता. मां-बाप सारा दिन काम करते हैं, तब कहीं रात को आधा पेट खाना मिल पाता है. ऐसे में माता-पिता अपने बच्चों को ज़िंदा देखने के लिए कम उम्र में उनकी शादी कर देते हैं.
    अशिक्षाः बाल विवाह का दूसरा सबसे बड़ा कारण अशिक्षा है. ग़रीबी के चलते अशिक्षा का जन्म होता है. जहां पेटभर खाने को नहीं मिलता, वहां के बच्चे स्कूल जाएं, ये सपने में भी नहीं सोचा जा सकता. शिक्षा से कोसों दूर लोगों को ये लगता है कि कम उम्र में बच्चों की शादी करके वो उन्हें सही राह दिखाते हैं.
    कन्यादानः उत्तर प्रदेश की 40 साल की जमुनाबाई (बदला हुआ नाम) से जब हमने पूछा कि बेटी की शादी इतनी कम उम्र में क्यों कर रही हैं, तो उनका जवाब सुनकर हम दंग रह गए. बकौल जमुनाबाई, “ये तो सही उम्र है वियाह (विवाह) की. अरे, माहवारी से पहिले (पहले) ही लड़कियों की शादी कर देनी चाहिए. तभी तो कन्यादान हुआ न. इससे हम लोगों को पुण्य मिलता है.” जमुनाबाई अकेली ऐसा नहीं सोचतीं. इस देश में कई जमुनाबाई हैं, जो इस तरह की सोच को समर्थन देती हैं.

क्या कहते हैं जानकार?
देशभर में अब तक कई बाल विवाह निरस्त करा चुकीं जोधपुर की साइकोलॉजिस्ट और समाज सेविका कृति भारती कहती हैं, “बाल विवाह किसी बीमारी की तरह है. जिस तरह नई बीमारी को रोकने के लिए नई दवाइयां तो बना दी जाती हैं, लेकिन कई बार बीमारी से ग्रसित लोगों तक सही दवा पहुंचाई नहीं जाती, ठीक उसी तरह बाल विवाह रोकने के लिए सरकार और ग़ैर सरकारी संस्थान दोनों बहुत प्रयास कर रहे हैं, लेकिन जो बच्चे इस बीमारी से ग्रसित हो चुके हैं यानी जिनका बाल विवाह हो चुका है, उनके लिए सरकार कुछ नहीं कर पा रही. बाल विवाह रोकना तो आसान है, लेकिन जिनका हो चुका है उसे निरस्त करना मुश्किल है. सरकार को इसी बात पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए. अभी भी गांव-गांव तक जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है. स़िर्फ अनपढ़ और ग़रीब लोग ही इसके शिकार नहीं हैं. मैंने ऐसे तमाम पढ़े-लिखे और अमीरों को भी बाल विवाह करवाते देखा है. स़िर्फ अक्षय तृतीया या ऐसे ही कई महत्वपूर्ण दिन ही बाल विवाह नहीं होते, बल्कि देशभर में हर दिन मासूम बच्चे इस कुप्रथा के शिकार होते हैं.
ऐसा नहीं है कि कम उम्र की लड़कियों की शादी हमेशा उनके उम्र के लड़कों के साथ ही होती है. आए दिन अख़बारों में ऐसी ख़बरें भी पढ़ने को मिलती हैं, जब मां-बाप अपनी फूल-सी बच्ची का कन्यादान अधेड़ उम्र के पुरुष से करते हैं. सवाल ये उठता है कि ख़ुद को समाज का कर्ता-धर्ता कहने वाले उन पुरुषों का दिमाग़ तब कहां चला जाता है, जो अपनी पोती और बेटी से भी कम उम्र की लड़कियों के साथ विवाह करते हैं. भारत के साथ ही कई अन्य देशों में भी इस कुप्रथा ने महिलाओं के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया है.”

बलात्कार के भय से बढ़ती ये कुप्रथा
गांव ही नहीं, बल्कि आजकल तो बड़े-बड़े शहरों में भी लड़कियां और महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. आए दिन इस तरह की घटनाएं घटती रहती हैं. गांव में इस तरह की घटना का असर इस क़दर लोगों के दिलो-दिमाग़ में घर कर गया है कि लोग छोटी उम्र में ही अपनी बच्चियों की शादी कर देते हैं. अपनी बेटियों की सुरक्षा से चिंतित ग्रामीण महिलाएं दिल पर पत्थर रखकर बेटियों का बाल विवाह करने को मजबूर हैं. झारखंड के एक गांव की संगीता देवी का कहना है, “अब हम लोग कर भी क्या सकते हैं. दूसरा कोई उपाय नहीं है हमारे पास. हम भी सोचे थे कि अपनी बेटियों की शादी 18 साल के बाद ही करेंगे, लेकिन संभव ही नहीं है.” स़िर्फ झारखंड के गांव ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्‍चिम बंगाल, हरियाणा समेत कई गांवों की महिलाओं की यही राय है.

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बाल विवाह से जुड़ा क़ानून
बॉम्बे हाईकोर्ट के एडवोकेट राजेश मिश्रा बताते हैं कि बाल विवाह को रोकने के लिए बाल विवाह निषेध क़ानून में संशोधन करके इसे और कठोर बनाया गया है. बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के अनुसार, बाल विवाह करवाने में शामिल माता-पिता, अभिभावक या ऐसे लोग जिनके संरक्षण में बाल विवाह हो रहा है, उन्हें 2 साल की कठोर सज़ा या एक लाख रुपए का जुर्माना या फिर दोनों हो सकता है.

क्या इसे रोका जा सकता है?
कृति भारती का कहना है, “बाल विवाह निषेध क़ानून के अनुसार, बाल विवाह को पूरी तरह से रोका जा सकता है, लेकिन आज समाज में ये कुप्रथा इस क़दर घर कर चुकी है कि इसे पूरी तरह ख़त्म करने के लिए एक-दो लोग नहीं, बल्कि पूरे समाज को मिलकर काम करना होगा. आम लोगों के साथ सरकार को भी इस मामले में ठोस क़दम उठाना चाहिए. स़िर्फ क़ानून बना देने से समस्या का हल नहीं निकल पाएगा. सबसे पहले सरकार को दंड प्रक्रिया और कड़ी करनी चाहिए, जिससे कोई भी व्यक्ति इस तरह की हरक़त करने से पहले सौ बार सोचे. कई बार तो मैंने सरकारी कर्मचारियों को भी बाल विवाह करवाते देखा है. सरकारी कर्मचारी के ऐसा करने पर सरकार को उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए. देश की अदालतों को भी इस मुहिम से जुड़ना चाहिए. जब भी कोई बाल विवाह का मामला कोर्ट में आए, तो ज़्यादा से ज़्यादा 3 दिन के भीतर कोर्ट को उसमें डिक्री (निर्णय) दे देनी चाहिए. बहुत लंबा नहीं खींचना चाहिए. इन सबके अलावा ख़ुद महिलाओं को भी इसे रोकने के लिए आगे आना ही पड़ेगा, नहीं तो ऐसे ही स्थिति बद से बदतर होती जाएगी. मेरी महिलाओं से ये विनती है कि अपनी बेटियों की शादी रोकने का प्रयास वो ख़ुद ही करें.”

जीजा संग रचाई शादी
राजस्थान के एक गांव की चंपा (परिवर्तित नाम) ने अपना परिचय गुप्त रखने पर अपने दिल की बात हमसे शेयर की. चंपा ने अपनी भाषा में हमें पूरा वाक़या बताया, जिसका हिंदी भाषा में रूपांतरण करके हम आपको बता रहे हैं. चंपा के मुताबिक, “जब मैं दस साल की थी तभी मेरी बहन की मौत हो गई. अपने पीछे वो अपना 1 साल का बेटा छोड़ गई. जीजाजी की उम्र 30 साल थी उस समय. दीदी के बेटे की ख़ातिर मां-बाप ने मेरी शादी जीजाजी से करवा दी. ये बात 2010 की है. मेरी उम्र अब 15 साल है. मैं भी अब एक बच्चे की मां बन गई हूं. दीदी के बच्चे की ज़िंदगी तो बन गई, लेकिन मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो गई. मेरी भी एक बेटी है. मैं उसका विवाह कम उम्र में नहीं करूंगी.”

कम उम्र में शादी के भयंकर परिणाम
कारण चाहे जो भी हो, लेकिन हर दिन देश के हर हिस्से में बाल विवाह हो रहे हैं. इसका सबसे बुरा असर उन मासूम लड़कियों पर पड़ता है, जिन्होंने अब तक ज़िंदगी को सही तरह से देखा भी नहीं है. कृति भारती के अनुसार, बाल विवाह वो बीमारी है, जो हर तरह से लड़कियों की ज़िंदगी बर्बाद कर देती है. इसका बहुत बुरा असर होता है उन पर.
असमय मृत्युः कम उम्र में शादी के बाद अक्सर परिवार की ओर से वंश बढ़ाने का ज़ोर भी लड़कियों को झेलना पड़ता है. 15 साल की उम्र के अंदर बच्चा पैदा करना किसी तरह से सही नहीं है. बच्चा पैदा करते समय उस असहनीय दर्द के कारण तो कभी हैवी ब्लीडिंग के कारण मासूमों की जान चली जाती है.
मानसिक रोगीः खेलने-कूदने की उम्र में ही इन बच्चियों पर परिवार की ज़िम्मेदारी आ जाती है. उस पर पति का हर रात ज़ोर-ज़बर्दस्ती करके उनके शरीर को रौंदकर ख़ुद को संतुष्ट करना जैसी बातें उन मासूमों को अंदर तक झकझोर देती हैं. समाज में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब ऐसी मासूम बच्चियां डिप्रेशन की शिकार हो जाती हैं. उन्हें संभालना बहुत मुश्किल होता है. गांव-खेड़े में लोग इन्हें पागल कहने लगते हैं. डिप्रेशन के कारण कई बार लड़कियां कभी पंखे से लटककर, तो कभी कुएं में कूदकर, कभी ज़हर खाकर, तो कभी पेड़ से लटकर मौत को गले लगा लेती हैं
शारीरिक बीमारियांः कम उम्र में शादी करने और बच्चा होने के बाद लड़कियों को कई तरह की शारीरिक बीमारियों से जूझना पड़ता है. ख़ून की कमी, हड्डियों से जुड़ी बीमारी आदि. कई बार एड्स का ख़तरा भी बढ़ जाता है. इसके साथ ही सेक्सुअल ट्रांसमिटेड डिसीज़ का भी ख़तरा रहता है.
ज़रा सोचिए, आपकी नन्हीं लाड़ली जो अभी खेलना-कूदना चाहती है, कुछ बनना चाहती है, आपकी ग़रीबी में आपके साथ खड़ी होना चाहती है, आपको हर तरह से संपन्न करने और बहुत सारा सुख देने की चाहत रखती है, लेकिन आप उसके साथ क्या करते हैं? उसके इन सपनों को झोले में भरकर आप उसे एक तरह से मारकर किसी के साथ विवाह करके विदा कर देते हैं. क्या ऐसा करते हुए आपका दिल एक बार भी नहीं पसीजता? कैसे मां-बाप हैं आप? अरे, अब तो संभल जाइए. आख़िर कब तक ऐसे ही विदा करते रहेंगे अपनी लाड़ली को!

टॉप 5 स्टेट
1 राजस्थान
2 मध्य प्रदेश
3 उत्तर प्रदेश
4 बिहार
5 झारखंड

बाप-महतारी के मजबूरी
“हमार बियाह 10 साल के रहली तबैै होई गयल. तब हम बियाह करे नाहीं चाहत रहे… (कुछ सोचते हुए और आंखों से आंसू पोंछते हुए)
अब होनी के केहू टाल नाही सकत. इ गरीबी और ऊपर से हमरे बाप-महतारी के मजबूरी के कारन हमार बियाह जल्दी होई गयल.” ये कहना है बिहार के एक गांव की कुसुम का. कुसुम के कहने का मतलब ये था कि उनके माता-पिता की मजबूरी और ग़रीबी के कारण उसकी शादी 10 साल में ही कर दी गई थी. अब कुसुम की उम्र 15 साल है और वो एक बच्चे की मां है.

 

– श्‍वेता सिंह