कहीं आप अपने बच्चे को डराते तो नहीं?

कुछ पैरेंट्स अपने बच्चों को कंट्रोल में रखने के लिए उनके मन में ढेरों डर भर देते हैं. समय के साथ ये डर उनके मन में इस कदर बस जाते हैं कि उन्हें निकालना मुश्किल हो जाता है. इस विषय पर हमें अधिक जानकारी दी काउंसलिंग सायकोलॉजिस्ट माधवी सेठ ने.

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किस प्रकार के पैरेंट्स अपने बच्चों को डराते हैं?
आमतौर पर देखा गया है कि लगभग सभी पैरेंट्स अपने बच्चों को डराते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि बिना किसी डर के बच्चा वह काम नहीं करेगा, लेकिन हर किसी के डराने का तरीक़ा अलग-अलग होता है. पर समस्या तब खड़ी होती है, जब आप बेवजह के डर उनके मन में डालने की कोशिश करते हैं. आइए जानें, किस प्रकार के पैरेंट्स अपने बच्चों को ग़लत तरी़के से डराते हैं.
1. ग़लत अनुभव को सही माननेवाले: सबसे पहले वो पैरेंट्स हैं, जो पढ़े-लिखे तो हैं, पर क्योंकि बचपन में उनके पैरेंट्स ने उन्हें अनुशासन में रखने और अपनी बात मनवाने के लिए यही तरीक़ा अपनाया था, इसीलिए अपने अनुभव के आधार पर वे भी अपने बच्चों को कंट्रोल में रखने के लिए इसे सबसे अच्छा तरीक़ा मानते हैं.
2. अनजाने में डरानेवाले: ये वो पैरेंट्स हैं, जो पढ़े-लिखे हैं और अपने बच्चों की परवरिश पर पूरा ध्यान भी देते हैं. ये पैरेंट्स जान-बूझकर ऐसा नहीं करते, पर अनजाने में ही उन्हें डराकर रखते हैं.
3. दुष्परिणामों से अनजान पैरेंट्स: इस तरह के पैरेंट्स कम पढ़े-लिखे होने के कारण अपनी बात मनवाने के लिए अपने बच्चों को डराते हैं, क्योंकि ये इस डर के परिणामस्वरूप भविष्य में होनेवाले दुष्परिणामों से अनजान होते हैं.

कितना सही, कितना ग़लत?
– कई पैरेंट्स के मन में यह डर होता है कि अगर वे अपने बच्चों को डराएंगे नहीं, तो वे उनकी बात नहीं मानेंगे. अपने डर को दूर भगाने के लिए वे बच्चों के मन में डर डाल देते हैं, जो बिल्कुल ग़लत है.
– माना कि कुछ बच्चे ऐसे होते हैं, जिन्हें संभालना बहुत मुश्किल होता है, ख़ासकर हाइपर एक्टिव बच्चे, जो कोई भी बात जल्दी नहीं सुनते. लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि आप उनके मन में बेवजह के डर भर दें.
– डराने से पहले सोच लें कि आप अपने बच्चे को ख़ुद डरना सिखा रहे हैं, जबकि आपको उन्हें निडर बनाना है.
– बच्चों को कभी भी भूत-प्रेत, डाकू, चोर, कुत्ते, शेर, पुलिस, एक्ज़ाम आदि के नाम पर नहीं डराना चाहिए.

डर के दुष्परिणाम
– ऐसे डर के कारण बच्चों के मन में असुरक्षा की भावना घर कर जाती है, जो उनके व्यक्तिगत विकास में बाधा बन सकती है.
– ये बच्चे ज़्यादातर डरे-सहमे होते हैं. जिन चीज़ों से उन्हें डर लगता है, उन्हें देखकर वे अक्सर सहम जाते हैं और कई बार ख़ुद को ही नुक़सान पहुंचा लेते हैं.
– इनमें आत्मविश्‍वास की कमी होती है. डर के कारण स्कूल की एक्टिविटीज़ में हिस्सा लेने से कतराते हैं, जिसका सीधा असर इनके व्यक्तित्व पर पड़ता है.
– डर इनके मन में इस कदर बसा होता है कि उस डर के सामने आते ही उससे छुटकारा पाने के लिए ये किसी भी अनजान व्यक्ति पर बड़ी आसानी से विश्‍वास कर लेते हैं, जिसका परिणाम कई बार बहुत घातक हो सकता है.
– बच्चों के मन में कई ग़लत धारणाएं बैठ जाती हैं, जिसका उनकी सोच पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है.
– बच्चों के मन में यह बात बैठ जाती है कि बच्चों से बात मनवाने का यही सही तरीक़ा है, जो आगे चलकर वो भी अपने बच्चों के साथ वैसा ही व्यवहार कर सकते हैं, जैसा उनके साथ हुआ हो.

पैरेंट्स गाइड
– पैरेंट्स को यह बात समझनी होगी कि प्यार से जो काम आप करवा सकते हैं, वो डर से कभी नहीं हो सकता.
– क्या गारंटी है कि जो काम आप डर दिखाकर करवाना चाहते हैं, वो बच्चा करेगा ही?
– डर एक बाहरी दबाव है और आप बच्चे को चाहे जितना भी डराएं, जब तक उसके मन में उस काम को करने की इच्छा नहीं होगी, वह उसे नहीं करेगा.
– बड़े होने पर भी बच्चों के मन से यह डर निकलता नहीं है.
– डराने से ज़्यादा ज़रूरी है कि आप बच्चों को अनुशासित बनाएं. कई पैरेंट्स अनुशासन के नाम पर कभी कड़ी निंदा करते हैं, तो कभी आसानी से माफ़ कर देते हैं, इससे बच्चेके मन में एक दुविधा बनी रहती है कि वो काम करने पर उसे सज़ा मिलेगी या नहीं और वह काम करने में कोताही बरतता है.

क्या करना चाहिए?
– अगर आपका बच्चा कोई ग़लती करता है या आपकी बात नहीं मानता है, तो उसे प्यार से समझाएं.
– जानकारों के मुताबिक़ 6-7 साल तक के बच्चों को समझाना थोड़ा मुश्किल है, पर आप अगर समझदारी से अपनी बात रखें, तो बच्चा ज़रूर समझेगा.
– वहीं 8 साल की उम्र के बाद आपको ज़्यादा मश़क्क़त नहीं करनी पड़ती. इस उम्र के बच्चों को किसी भी काम को करने और न करने के परिणामों के बारे में समझाया जाए, तो वे ज़रूर समझ जाएंगे.
– प्यार से अपने बच्चे की बात सुनें और अगर उसे उस काम से जुड़ी कोई समस्या है, तो उसे दूर करने की कोशिश करें.
– बच्चे के व्यवहार को समझने की कोशिश करें.
– किसी भी काम को करने की एक निश्‍चित सीमा तय करें और समय पर काम पूरा करने के लिए बच्चे को प्रोत्साहित करें.
– हर काम को करने से कुछ सीखने को मिलता है, यह बात बच्चे को समझाएं.
– बच्चे हमेशा अपने पैरेंट्स को देखकर उनकी नकल उतारने की कोशिश करते हैं, इसलिए घर में आपका व्यवहार व कार्यशैली बहुत मायने रखती है.
– अगर आपको लगता है कि यह डर आपके बच्चे की ज़िंदगी को ख़तरे में डाल सकता है, तो तुरंत किसी प्रोफेशनल काउंसलर या सायकोलॉजिस्ट से मिलें.
– कुछ पैरेंट्स बच्चों के एक्ज़ाम को हौवा बना देते हैं, जिससे बच्चे के मन में एक्ज़ाम का डर बैठ जाता है, जिससे एक्ज़ाम नज़दीक आते ही बच्चे को बुख़ार आना, ध्यान न लगना आदि समस्या होने लगती है. ऐसे डर को दूर भगाने के लिए किसी काउंसलर की मदद लेना ज़्यादा सही होगा

                                                                                                                                                                                – अनीता सिंह