क्या मां बनना ही सब कुछ है ?

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ज़िंदगी की हर रेस में जीत दर्ज करने के बावजूद उसकी क़ामयाबी तब तक अधूरी रहती है जब तक उसकी गोद न भर जाए. आख़िर बच्चे के जन्म को औरत के अस्तित्व और पूर्णता से जोड़कर क्यों देखा जाता है? क्या बच्चे को जन्म दिए बिना औरत को ख़ुशहाल ज़िंदगी जीने का हक़ नहीं है? क्या उसका अपना कोई वजूद नहीं है? महिलाओं की ज़िंदगी से जुड़े कुछ ऐसे ही संवेदनशील पहलुओं को छूने की कोशिश की है हमने अपनी इस स्पेशल रिपोर्ट में.

शादी और फिर बच्चा, ये दो शब्द ऐसे हैं जिनकी ग़ैर मौजूदगी में किसी भी औरत की ज़िंदगी को पूर्ण नहीं माना जा सकता. भले ही बेटा नकारा, निकम्मा हो और बहू दिनभर मेहनत करके घर का ख़र्च चला रही हो, फिर भी किसी कारणवश यदि वो बच्चे को जन्म देने में समर्थ नहीं है, तो उसे परिवार व समाज की चुभती निगाहों और तानों से रोज़ाना छलनी होना पड़ता है, मगर पुरुष पर कोई उंगली नहीं उठाता. हम आधुनिक और शिक्षित होने का लाख दंभ भरें, लेकिन हमारी कथनी और करनी में बहुत अंतर है. देश के अलग-अलग हिस्सों में कई औरतों को मां न बन पाने का
खामियाज़ा अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है.

क्या हमारा कोई वजूद नहीं?
एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत इंदु गुप्ता (परिवर्तित नाम) कहती हैं, “शादी के 1 साल बाद भी जब मैं प्रेग्नेंट नहीं हुई तो डॉक्टर को दिखाया. फिर दवाइयों का सिलसिला शुरू हो गया. क़रीब 2-3 साल इधर-उधर भटकने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला. एक तरफ़ दवाइयां बेअसर हो रही थीं और दूसरी तरफ़ ससुराल वालों के दबाव और तानों ने मुझे डिप्रेस कर दिया था. मैं इतनी तनावग्रस्त हो गई थी कि देर रात तक पागलों की तरह ऑफिस में ही बैठी रहती, रास्ते पर यूं ही घूमती रहती. घर में न तो किसी को मुझसे कोई लगाव था और न ही मेरी परवाह. हां, इस मुश्किल दौर में पति ने हर मोड़ पर मेरा साथ दिया. तीन साल बाद मैंने आईवीएफ ट्रीटमेंट कराना शुरू किया, मगर लाखों रुपए
फूंकने और पूरे शरीर में सूइयां चुभोने के बावजूद ये सफल न हो सका. सासू मां के ताने ‘हमारे परिवार में आज तक ऐसा नहीं हुआ’ और पार्टी-फंक्शन में लोगों के तीखे सवाल ‘अरे! तेरा हुआ कि नहीं अब तक?’ मेरे दिल को छलनी कर देते हैं, अब तो लोगों के बीच जाने से भी डर लगने लगा है.”
साइकोलॉजिस्ट निमिषा रस्तोगी कहती हैं, “हमारे देश में मां बनने को लेकर लोगों का नज़रिया बहुत संकुचित है, वो इसे महिलाओं की क़ाबिलियत से जोड़कर देखते हैं. इसी सोच के कारण महिलाएं धीरे-धीरे हीन भावना से घिर जाती हैं, जिसका असर उनकी पर्सनल लाइफ के साथ ही प्रोफेशनल लाइफ पर भी पड़ता है. बैंग्लोर की एक शिक्षिका के केस में भी ऐसा ही हुआ. बच्चा न होने के कारण वो महिला इस कदर अवसादग्रस्त हो गई कि धीरे-धीरे उसने बाहर आना-जाना, यहां तक कि नौकरी भी छोड़ दी. पति से भी उसके संबंध अच्छे नहीं रहे.”
महिलाओं के प्रति शिक्षित परिवारों की भी मानसिकता नहीं बदली है. महिलाएं कितनी भी तरक्क़ी क्यों न कर लें, लेकिन मां बने बिना उसकी सारी सफलता बेकार है. आख़िर समाज ये क्यों नहीं समझता कि औरतों का भी अपना वजूद है, उनकी भी भावनाएं हैं, उन्हें भी दर्द होता है, उनमें भी एहसास है. क्यों उसे एक मशीन की तरह ट्रीट किया जाता है?
मैरिज काउंसलर मोना बक्षी कहती हैं, “पढ़ी-लिखी और प्रतिष्ठित पद पर काम करने वाली क़ामयाब महिलाएं भी मां न बन पाने के अपराधबोध से ग्रसित रहती हैं, क्योंकि उन्हें सही मार्गदर्शन और सपोर्ट नहीं मिलता. इस स्थिति से बाहर आने के लिए परिवार, ख़ासकर पति का सपोर्ट बेहद ज़रूरी है.”

प्यार व त्याग के बदले अपमान
परिवार के लिए किए उसके सारे त्याग व समझौते क्या बच्चा न होने के कारण ज़ाया हो जाएंगे? ये कहां की नैतिकता है? पराये घर से आने के बावजूद वो आपके घर को, उसके तौर-तरीक़ों को न स़िर्फ अपनाती है, बल्कि उन्हें बेहतर बनाने की कोशिश में अपनी पूरी ताक़त लगा देती है, मगर इन कोशिशों का उसे क्या सिला मिलता है?
मुंबई की अचला (परिवर्तित नाम) शादी के 13 साल बाद भी मां नहीं बन पाईं. कई साल डॉक्टरों के चक्कर काटने के बाद उन्हें पता चला कि कमी उनके पति में है. कोई पति की मर्दानगी पर सवाल न उठाए और परिवार व समाज के सामने उनका सिर शर्म से न झुक जाए, इसलिए अचला ने पति के बाप न बन पाने वाला राज़ अपने सीने में ही दफ़न कर लिया. अचला ने तो पति से यहां तक कह दिया कि यदि वो चाहे तो बच्चे के लिए दूसरी शादी कर सकता है, उसे कोई दिक्क़त नहीं है, मगर उसके इस त्याग के बदले उसे मिली ज़िल्लत और दर्द. ससुराल वाले उसके पति पर उसे छोड़कर दूसरी शादी का दबाव डालने लगे. जिस पति की कमी को उसने दुनिया से छिपाया, वही पति मां और भाई की बातों में आकर उसे ही प्रताड़ित करने लगा. उस पर किसी और से रिश्ता होने का झूठा आरोप लगाकर हर रोज़ शारीरिक व मानसिक रूप से परेशान करने लगा. इन सबसे आजीज़ आकर अचला अब अलग रह रही हैं और पति से तलाक़ लेना चाहती हैं, मगर वो उसे आसानी से तलाक़ देने को भी राज़ी नहीं है, क्योंकि तलाक़ की सूरत में उसे मुआवज़ा देना पड़ेगा.
हमारे देश में अचला के पति और ससुराल वालों जैसी ओछी मानसिकता वाले लोगों की कोई कमी नहीं है. बच्चे के लिए बेटे की दूसरी शादी कराने वाले लोग ये जानने की ज़हमत भी नहीं उठाते कि कमी बहू में है या बेटे में. लोगों ने तो जैसे मान ही लिया है कि जो भी बुरा होता है उसके लिए बहू ही ज़िम्मेदार है. मैरिज काउंसलर मोना बक्षी कहती हैं, “कई केसेस में महिलाएं इतनी परेशान व डिप्रेस्ड हो जाती हैं कि वो ख़ुद ही पति से दूसरी शादी करने के लिए कह देती हैं. बच्चा न होने के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार मानकर वो हमेशा एक अपराधबोध से घिरी रहती हैं.”

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क्यों मंज़ूर नहीं गोद लेने का विकल्प?
21वीं सदी में जब हम आधुनिकता का दंभ भरते हैं ये स्थिति बदलनी बेहद ज़रूरी है. लोगों को ये समझना होगा कि पति और बच्चे से अलग भी महिला का अपना एक अलग अस्तित्व होता है और बच्चा न होने का ये मतलब नहीं कि ज़िंदगी ही ख़त्म हो गई. किसी ग़रीब, बेसहारा अनाथ बच्चे को गोद लेकर न स़िर्फ उसकी ज़िंदगी संवारी जा सकती है, बल्कि ममता के सुख से वंचित महिलाओं की ज़िंदगी के खालीपन को भी भरा जा सकता है. निमिषा कहती हैं, “एडॉप्शन को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं, जैसे- अपना बच्चा या ख़ून का रिश्ता ही सच्चा है, गोद लिए बच्चे को जब सच्चाई का पता चलेगा तो वो हमें छोड़कर चला जाएगा, पता नहीं उसकी रगो में कैसा ख़ून है? आदि. ऐसी सोच के कारण ही ज़्यादातर दंपति बच्चा गोद नहीं लेते, मगर ये सोच बिल्कुल ग़लत है. कुछ साल पहले मेरे पास एक केस आया जिसमें शादी के 12 साल बाद भी मां न बन पाने के कारण वो महिला बहुत ज़्यादा तनावग्रस्त हो गई थी. दो बार आईवीएफ करवाने का भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ. अब वो फोबिया की शिकार हो चुकी थी, उसे इंजेक्शन और डॉक्टर से चिढ़ हो गई थी, वो रिश्तेदारों व अपने कलीग से भी मिलना पसंद नहीं करती थी. जब ये कपल मेरे पास आए, तो कई हफ़्तों तक लगातार सेशन करने के बाद वो बच्चा गोद लेने के लिए राज़ी हो गए. उन्होंने अनाथाश्रम से 1 महीने की बच्ची को गोद लिया. आज अपनी इस प्यारी-सी बच्ची के साथ ये कपल बहुत ख़ुश है. वो मानते हैं कि अपनी पुरानी सोच बदलकर उन्होंने समझदारी का काम किया, तभी तो आज एक ओर जहां उनकी ज़िंदगी की कमी पूरी हो चुकी है, वहीं उस बेसहारा बच्ची को भी परिवार का प्यार और सहारा मिल गया.”
मोना बक्षी कहती हैं, “जो लोग इस डर से कि गोद लिया बच्चा हमसे अटैच हो पाएगा या नहीं, बच्चा एडॉप्ट करने से कतराते हैं, उन्हें ये याद रखना चाहिए कि जब बच्चा पैदा होता है तो उसका मां से भी कोई अटैचमेंट नहीं होता, वो मां से तब जुड़ता है जब वो उसे पहली बार गोद में लेती है और फिर धीरे-धीरे ये रिश्ता गहरा होता है.”

महिलाओं के लिए ज़रूरी है थोड़ी सतर्कता
कई बार महिलाएं करियर या किसी मुक़ाम पर पहुंचने की ख़ातिर मां बनने का फैसला टालती रहती हैं और जब वो बच्चा चाहती हैं, तो उनका शरीर साथ नहीं देता या किसी मेडिकल प्रॉब्लम की वजह से वो कंसीव नहीं कर पातीं. ऐसे में सब कुछ होते हुए भी वो तनाव से घिर जाती हैं और उन्हें अपनी सारी क़ामयाबी बेकार लगने लगती है. अतः करियर और बाक़ी चीज़ों के साथ ही ज़रूरी है कि अपनी ज़िंदगी के इस महत्वपूर्ण फैसले को हल्के में न लें और सही समय पर प्लानिंग कर लें. डॉक्टर किरण कोयले के अनुसार, “30 वर्ष के बाद प्रेग्नेंसी में कई तरह के कॉम्पलीकेशन हो सकते हैं.”

मां बनना ज़िंदगी का हिस्सा है, ज़िंदगी नहीं
अपनी तरफ़ से सावधानी बरतने और हर चीज़ का ख़्याल रखने के बाद भी यदि आप मां नहीं बन पाती हैं, तो इस ग़म को दिल से लगाकर बैठने की बजाय ख़ुद को ख़ुश करने के दूसरे तरी़के निकालिए. समाज और परिवार क्या कहेगा? की चिंता छोड़ दीजिए. यदि आपका दिल कहता है कि बच्चा गोद लेकर आप इस कमी को पूरा कर सकती हैं, तो बेझिझक अपने दिल की सुनिए. हो सकता है, घरवाले इसका विरोध करें, मगर ये ज़िंदगी आपकी है और इसे अपनी मर्ज़ी व ख़ुशी से जीने का आपको पूरा हक़ है. मां बनना किसी भी औरत की ज़िंदगी का ज़रूरी हिस्सा है, मगर ये ज़िंदगी नहीं है. क्या पिता न बनने पर पुरुष जीना छोड़ देते हैं? नहीं ना, तो फिर महिलाएं ऐसा क्यों करती हैं? वैसे भी मां बनने के लिए बच्चे पैदा करना ज़रूरी नहीं है. यशोदा ने कृष्ण को जन्म नहीं दिया था, मगर उनकी मां तो वही कहलाती हैं, क्योंकि उन्होंने कृष्ण को दिल से प्यार किया, आप भी ऐसा कर सकती हैं.

एक्सपर्ट स्पीक
यदि हम सोच बदल लें तो आईवीएफ और सरोगेसी की ज़रूरत ही नहीं रहेगी. किसी बेघर अनाथ को अच्छी ज़िंदगी देकर हम अपने घर और उसकी ज़िंदगी दोनों को रोशन कर सकते हैं.     – मोना बक्षी, साइकोलॉजिस्ट

लोगों की संकुचित मानसिकता के लिए कहीं न कहीं मीडिया भी ज़िम्मेदार है. कई सीरियल्स में वही दकियानूसी सोच दिखती है कि मां न बन पाने पर ज़िंदगी अधूरी है. ये ग़लत है और इसे बदलने की ज़रूरत है.       – निमिषा रस्तोगी

– कंचन सिंह